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                                                                                                                                                     - वैद्यनाथ झा

                                                                                                                                                

दो पाटन के बीच में

एक स्कूल अद्यापक हूं तथा प्रार्थना सभा में अनुशासन की देखभाल मेरे कर्तव्य में शामिल है। प्रार्थना सभास्थल पर एक नई प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। प्रार्थना में लेट आने वाले दसवीं, बारहवीं कक्षा के ज्यादा बच्चे ट्यूशन से लौटने में लेट हो जाते हैं। ऐसे बच्चे लगभग पांच सवा पांच बजे सबेरे घूमने निकलिए तो अक्सर स्कूल की वर्दी पहने, पीठ पर रस्सी वाला बैग लटकाए भागते से चलते किशोर दिखाई पड़ जाएँगे। एक दिन जिज्ञासा हुई कि पता करें ये बच्चे इतनी भोर में कहां जाते हैं क्योंकि स्कूल तो आठ बजे शुरु होते हैं।


' बेटे, आप किस स्कूल में पढ़ते हैं ? '


  ' वेलकम मॉडल स्कूल ' 


' वह तो आठ बजे लगता है। तुम तीन घंटे पहले कहां के लिए निकलते हो ?  '


'  अंकल, ट्यूशन पढ़ने जाता हूं।  '


'  किस क्लास में हो ? '


' बारहवीं में '


' साइंस, आर्टस् या कामर्स? '


' साइंस। ' विद्यार्थी का जवाब था।


जिज्ञासा बढ़ी कि घर से पांच बजे निकलने वाला विद्यार्थी कितने बजे बिस्तर पर जाता होगा,  कितने  बजे बिस्तर छोड़ता होगा। नींद कैसे पूरी होती होगी?


एक स्कूल अद्यापक हूं तथा प्रार्थना सभा में अनुशासन की देखभाल मेरे कर्तव्य में शामिल है। प्रार्थना सभास्थल पर एक नई प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। प्रार्थना में लेट आने वाले दसवीं, बारहवीं कक्षा के ज्यादा बच्चे ट्यूशन से लौटने में लेट हो जाते हैं। ऐसे बच्चे लगभग  दौड़ते-हँफते स्कूल के फाटक में दाखिल होते हैं। अपराध-बोध से ग्रस्त सिर झुकाकर खड़े हो जाते हैं। यह कैसी विडंबना है कि 90 प्रतिशत से ज्यादा अंक लाने वाले मेधावी बच्चे भी सिर छुकाए खड़े होते हैं और दंडस्वरूप कंधे पर बैग लटकाए खेल के मैदान का चक्कर लगाते हैं।

अगला एपिसोड देखिए –बाहवीं कक्षा का वेदांत भोतिकी की क्लास में है। अध्यापक आप्टिकस के फार्मूले को विस्तृत विवेचन कर रहे हैं। उसे एक झपकी आती है कि अध्यापक की डांटती हुई आवाज गूंजती है-' वेदांत, दूसरे पीरियड में ही ऊँघने लगे ? क्या करते हो रात भर ? नींद पूरी नहीं होती क्या ? '

' सारी सर ! ' सारे सवालों का एक ही जवाब। आप समझ सकते हैं कि वेदांत को प्रातः नौ बजे ही झपकी क्यों आती है ?

जिस वेदांत के 92 प्रतिशत अंक आते हैं उसके अभिवावक बुलाया जाता है पेरेंट्स मीटिंग में। वहां भौतिकी, गणित के अध्यापक वेदांत के पिता को कहते हैं- ‘ भाई साहब, थोड़ा मेहनत और नहीं करा सकते क्या ?  आज के युग में 90-92 प्रतिशत को कोई नहीं पूछता । जाब सेक्टर में कितना कंपटीशन है ? फिर यह क्लास में ऊंघता रहता है।

प्रतिक्रिया स्वरूप पिता घऱ आकर उसे डांटते हैं – कितनी मुश्किल से एडमिशन मिला इस स्कूल में, कितनी ज्यादा फीस ट्यूशन में लगाता हूं। सारी सुविधाएँ दे रखी हैं हमने ! फिर परसेंटेज एक्सपेक्ट करना क्या बुरा है? ‘

वेदांत बोलता है- ‘ पापा, आप खुद देखिए, सबेरे से शाम तक कितना बिजी रहता हूं। रात बारह, साढ़े बारहबजे सोता हूँ, चार बजे सोकर उठता हूं, पांच बजे ट्यूशन, फिर स्कूल, शाम से देर रात तक , स्कूल का होमवर्क, प्रोजेक्ट, एसाइनमेंट, ट्यूशन का होमवर्क। अब और ज्यादा क्या करूँ ? ‘ उसके स्वर में लाचारी और परेशानी है।

‘ मैं कुछ नहीं जानता। अच्छे नंबर जरूरी हैं। मार्केट में स्टैंड करने के लिए खुद को बेहतर साबित करना जरूरी है। वर्क मोर।‘ पापा ने फरमान सुनाया। वेदांत चुपचाप सुनता रहा।

यह एक वेदांत की कहानी नहीं है। आज नगर या महानगर में दसवीं, बारहवीं या उच्चस्तरीय व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए तैयारी में लगे विद्यार्थी की यही गाथा है। आज के विद्यार्थी के पास अपना कुछ नहीं रह गया है। उसके पास अपने तन-मन को आराम देने या मनोरंजन के लिए न तो वक्त है, न ही मानसिकता। हर वक्त युटिलिटी, सर्वाइवल, प्रूव बेस्ट, करिअर जैसे शब्द उसके वायुमंडल में घूमते रहते हैं।

दरअसल आज का विद्यार्थी दो पाटों के बीच में पिस रहा है। पहला पाट है-विद्यालय। आज सरकारी, केन्द्रीय विद्यालय या लब्धप्रतिष्ठित निजी विद्यालय, सभी खुद एक प्रकार के तनाव में जी रहे हैं। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सी.बी.एस.ई.) के चेयरमैन अशोक गांगुली ने एक बार कहा था- हमारा शिक्षा प्रबंधन और परीक्षा नीति का सारा जोर इस बात पर होता है कि हमारे बच्चे ज्ञान और प्रतियोगिता के मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर की गुणवत्ता के अनुरूप खरे उतरें।

इसी मूल उद्देश्य के कारण ही पाठ्यक्रम और परीक्षा के स्तरों में परिवर्तन व्यापक और तेज हो रहा है। स्कूलों के तनाव का कारण है इस तीव्र परिवर्तन के अनुरूप स्तरीय बने रहने का दबाव। उन पर शत-प्रतिशत रिजल्ट देने ही नहीं, अधिकाधिक बच्चे मैरिट में लाने का दबाव भी होता है।

सरकारी स्कूलों पर तो यह भी दबाव रहता है कि छह घंटे 10 मिनट के दैनिक वाले 252 कालदिवसों (वर्ष भर) में खेलकूद, सास्कृतिक, कला, वैचारिक प्रतियोगिताओं का आयोजन करते हुए शैक्षणिक एजेंडा भी पूरा करें। इस उच्चतम परिणाम के लिए कार्यशालाएं, सेमिनार, आंतरिक परीक्षाओं की आवृत्ति में वृद्धि, पाठ्यपुस्तकों से इतर सहायक अध्ययन सामग्रियां तैयार कराने, हर विद्यार्थी के अनवरत् मूल्यांकन, तदनुसार अपेक्षित शैक्षणिक पोषण प्रदान करने के लिए स्कूल व्यस्त कार्यक्रम तैयार करते हैं। वैश्वीकरण और बाजारवादी संस्कृति के प्रभाव के कारण स्कूल भी उपभोक्ता संस्कृति के दायरे में हैं।

न्यायपालिका ने भी स्कूलों को सेवा प्रदाता और विद्यार्थियों को उपभोक्ता माना है। सन 2005 में हुए एक व्यापक सर्वेक्षण के अनुसार देश भर में फैले केंद्रीय विद्यालयों को देश के टाप टेन सेवा-प्रदाताओं में पचीसवां स्थान प्राप्त हुआ था। अपनी स्वायत्त नीतियों और उच्च गुणवत्ता के कारण ये केन्द्रीय विद्यालय सी.बी.एस.ई. के परीक्षा परिणामों में आज भी प्रथम या द्वितीय स्थानों पर चल रहे हैं। अब देश के विद्यालयों के एजंडे में रवीन्द्रनाथ टैगोर, गांधी, शास्त्री, मालवीय तैयार करना नहीं, व्यापक प्रबंधक, बिजनेस टाइकून, ग्लोबल उद्योगपति, मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव आदि तैयार करना है। इन्ही बहुमुखी गतिविधिओं के केन्द्र में आज का किशोर है, अतः स्वाभाविक रूप से तनाव के केन्द्र में भी वही होता है।

विद्यार्थियों के लिए दूसरा पाट होता है- अभिवावक। आज का अभिवावक उत्तर आधुनिक है। उसके सोच पर बाजार हावी है, विश्व उनके लिए एक गांव है, सतरंगे सपनों का संसार है। उसकी संतान उसके सपनों, आकांक्षाओं के केन्द्र में है और उसकी महत्वाकांक्षाओं का निर्धारण बाजार करता है। यही बाजार उसका सामाजिक स्टेटस भी मोल्ड करता है। बेटे-बेटी के लिए कम-से-कम समय में अधिक से अधिक कमाई वाला करिअर उसकी सर्वोच्च प्रथमिकता होती है। अध्यापक, सैनिक, पत्रकार, पर्यावरण विज्ञान, समाज सेवा उसके लिए आउटडेटेड करिअर हैं, बंधी-बधाई तनख्वाह वाली सरकारी सेवाएं बेमानी हैं। अभिवावक अपनी इन्ही महत्वाकांक्षा का प्रतिरोपण अपनी संतानों में करता है। उसकी यही महत्वाकांक्षा बच्चों को तनावग्रस्त करती है। एक छटपटाहट को जन्म देती है। इसी छटपटाहट के कारण वह 98 प्रतिशत अंकों के लिए दो शिफ्टों में स्कूलिंग करता है ( पहला ट्यूशन दूसरा रेगुलर स्कूल) तीसरी पारी एसाइनमेंट, प्रैक्टिस में बीतती है। सबेरे पांच बजे से रात बारह बजे तक मशीन बना रहता है। उसका जीवन स्कूल और अभिवावक नामक दो ध्रुवों के बीच दौड़ लगाते बीतता है। यह कहने में कोई संकोच नहीं कि मैकाले पूर्व शिक्षा मूल्यपरक व्यक्तित्व तैयार करती थी। मैकाले कालीन शिक्षा ने सरकारी क्लर्क पैदा किए तो आज बुशकालीन भूमंडलीय अर्थप्रधान शिक्षा 6-7 अंकों वाले वेतन की चाह रखने वाली पीढ़ी तैयार कर रही है, जहां चरेवेति चरेवेति तो है भले ही उसके लिए दूसरे का गला काटना पड़े, दूसरे को लंगड़ी मारनी पड़ जाए या बाप-बेटा, मां-बेटा, भाई-भाई, भाई-बहन, दादा-पोता मोबाइल का बिल देखते हुए अपने रिश्ते का निर्वाह करें। रिश्ते यांत्रिक, रिश्तों का निर्वाह यांत्रिक। और इन दो पाटों के बीच पिस रहा है आज का तरुण होता किशोर।           

                                                                                                                              साभार जनसत्ता -' सबरंग '