LEKHNI
APNI BAAT
KAVITA DHAROHAR
GEET AUR GAZAL
DOHE
MAAH VISHESH
KAVITA AAJ AUR ABHI
MAAH KE KAVI
KAVITA ME IN DINO
MANTHAN
KAHANI DHAROHAR
KAHANI SAMKALEEN
KAHANI SAMKALEEN
DHARAWAHIK
LAGHU KATHA
PARIDRISHYA
HASYA VYANGYA
CHAAND PARIYAN AUR TITLI
LEKHNI SANIDHYA 2014
VIVIDHA
MY COLUMN
FAVOURITE FOREVER
POETRY HERE & NOW
CLASSIC
STORY
KIDS' CORNER
VEETHIKA
SADA SAATH
KAVI-SAMKALEEN
KIRTI STAMBH
LEKHAK SAMKALEEN
OLD MASTERS
WRITERS
SCANNING THE FAVOURITES
POETS
LEKHNI SANIDHYA
PARYATAN
OLD ISSUES
YOUR MAILS & E.MAILS
GUEST BOOK
ABOUT US
   
 



                             सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर


                                              शरद विशेषांक -नवंबर 2008
                                                       नाँव द्वार आवेगी बाहर,
                                                 स्वर्ण जाल में उलझ मनोहर,
                                               बचा कौन जग में लुक छिप कर
                                                        बिंधते सब अनजान!


                                                          -सुमित्रानन्दन पंत



                                                                   (अँक 21)


                                                            (Spell Of Autumn)


माह विशेष- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', मीरा। कविता धरोहर- सुमित्रानन्दन पंत। माह की कवियत्री प्रतिभा मुदलियार। कविता आज और अभी- इला कुमार, कुसुम सिन्हा, रचना श्रीवास्तव,  रामचन्द्र रॉय,  बीना त्रिपाठी । बाल कविता-गौतम सचदेव और शैल अग्रवाल।


 मंथन-  डॉ. कृष्णदेव झारी। मुद्दा- दिनेश ध्यानी। परिचर्चा- सीताराम गुप्त। पर्यटन- उर्मिला जैन। व्यंग्य- नरेन्द्र कोहली।कहानी-शैल अग्रवाल। लघुकथा- आरती झा व शैल अग्रवाल। धारावाहिक-शेष अशेष, बाल कहानी व विविधा।      


        In the English section : Khalil Zibran , John Keats . Roald Dahl, Robert Louis Stevenson, Shail agrawal.                    


                  Kid's corner special-an eighteenth century children 's song  & an age old all time favourite .                                                                                                                               


                                                      संरचना व संपादनः शैल अग्रवाल                            


                                        संपर्क सूत्रः editor@lekhni.net; shailagrawal@hotmail.com 


                                                   Lekhni is updated on every first day of the month.


                                           पत्रिका प्रति माह की पहली तारीख को परिवर्तित की जाती है।

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                                अपनी बात


नीला-धुला स्वच्छ आसमान, साफ सुथरी नदियां, फलफूलों से लदे बाग-बगीचे। गुलाबी गुनगुनी धूप में सोने सी चमकती धरती और साथ में ‘ शुभ्र ज्योत्सना पुलकित यामिनी‘ ।‘ जीवेत शरदम् शतम्।‘  कुछ तो विशेष होगा इस शरद ऋतु में, जो पूर्वज –‘ सौ-सौ शरद ऋतु जिओ, उनका भरपूर आनंद लो’, आशीर्वाद दिया करते थे! 
आशीष यह सोच,  उस वैदिक युग की है जब आदमी प्रकृति पर पूरी तरह से निर्भर था, आधुनिक वैज्ञानिक सुविधाजनक अन्वेषण तो छोड़िए बिजली तक नहीं उपलब्ध थी उसे। ऐसे में शरद ऋतु, जो न ज्यादा गर्मी, न ज्यादा ठंड... ना ही गर्मी का सूखा और ना ही बरसाती बाढ़ें, चारो तरफ एक सुखद संतुलन लेकर आती है, निश्चय ही आनन्ददायी व आयुवर्धक मानी जाती  होगी।  स्वर्ग में यदि कोई मौसम हो, तो शायद ऐसा ही होगा! आश्चर्य नहीं, कि आदि कवि वात्मीकि और कालीदास से लेकर निराला और पंत व आज तक के अनगिनित कवि, सभी ने स्निग्ध और सौम्य इस ऋतु को काव्य और साहित्य, दोनों में ही  खूब उकेरा है। आदि कवि वाल्मीकि का शरद वर्णन देखिए, जहाँ उन्होंने श्वेत वस्त्रा शरद ऋतु का वर्णन एक ऐसी  सर्वांग सुन्दरी नारी के रूप में किया है जिसकी  तेजस्वी  मुखाभा पूर्णिमा के चांद-सी है और  झिलमिल तारे कुछ और नहीं,  उसके सुन्दर नयनों की उल्लसित ज्योति हैं;


शशांकोदित सौम्य वस्त्रा,
तारागणोन्मीलित चारू नेत्रा।
ज्योत्स्नांशुक प्रावरणा विभाति
नारीव शुक्लांशुक संवृतांगी।।



श्रंगार-रस के संदर्भ में तो बसंत और बरखा से भी ज्यादा इस ऋतु का वर्णन मिलता है, विशेशतः मिलन और रति या ऐसे ही अन्य अभिसारिक और श्रांगारिक चित्रण में; चाहे वह कालीदास का ऋतु-संहार हो या फिर वाल्मीकि की संस्कृत रामायण।


बसंत और वर्षा ऋतु में  यदि गति और उत्तेजना है...लगातार कुछ होते रहने, परिवर्त और एक क्रमिक विकास का अहसास है, तो शरद ऋतु में तृप्ति और ठहराव है। एक सौम्य व स्वप्निल-संतोषजनक अनुभूति है, जब नदी आकाश तक शान्त और निर्मल हो जाते हैं।  पुराने जमाने में जब हमारे ऋषि-मुनियों ने मौसम के हिसाब से राग-रागनिओं की रचना की तो शरद ऋतु के लिए राग मालकोंस को रचा और यह  हर संगीत-प्रेमी जानता है कि चांदनी की तरह यह भी  कितनी शांत और चित् को थिर करने वाली राग है।

सौंदर्य-प्रेमियों व साहित्यकार और संगीतकारों की ही नहीं, प्रेमी-युगलों की भी प्रिय है यह ऋतु। चांदनी रातों में नौका-बिहार, नदी किनारे और बागबगीचे आदि में भ्रमण करते नेहबद्ध युगल, मनोहारी इस ऋतु का आनंद लेते साहित्य के पन्नों पर ही नहीं, जीवन में भी बहुलता से दिख जाएंगे। कहते हैं कि प्रेम और सौंदर्य का प्रतीक ताजमहल तो अनूठा और दिव्य रूप ही ले लेता है शरद-चांदनी की धवल ज्योत्सना में। कृष्ण ने भी तो गोपियों के संग रास इन्ही उजेरी रातों में ही रचाया था ;   आज भी एक लालित्य और माधुर्य है शरद ऋतु में।


हो भी क्यो न हीं...सांसारिकता का लिबास ओढ़े, रहस्यमय उदात्त और सात्विक भावों का सृजन करती, यह सौम्य, सुन्दर ऋतु और इस ऋतु की मानव के प्रति अति उदारता, मनों के साथ खेत-खलिहान, सभी तो पूरे-के-पूरे भर देती है। एक तरफ गुलाब, गुलदाऊदी, डहेलिया जैसे भांति-भांति के रंग-बिरंगे फूल तो दूसरी तरफ पकी तैयार गेंहू और जौ की फसलें ... चारो तरफ फल-फूल और धन-धान्य सभी की बहुलता...मानो योगी और भोगी संग-संग सृजन के इस ऐश्वर्यपूर्ण विलासी पल की तैयारी में  आ जुटे हों! आश्चर्य नहीं, कि हमारे यहाँ एक-के-बाद-एक त्योहारों की भरमार आ  जाती  है इस ऋतु में। नवरात्रि दशहरा –दिवाली के साथ-साथ तो मानो सभी देवी-देवताओं का पुनः अवतरण ही  हो जाता है धरती पर... कहीं रामलीला तो कहीं रास-लीला और रासगरबा तो कहीं मां दुर्गा का पूर्ण श्रंगार व आवाहन और इनके स्वागत में नवीनतम परिधानों और आभूषणों से सजे-संवरे नर-नारियों का  उल्लास और शोभा भी तो कुछ कम मोहक नहीं।  

जहां भारत में रमणीयता और सुन्दरता की परिचायक है शरद ऋतु, चाहे हम उजली-धुली चांदनी की बात करें या फिर महकती-गमकती रात की रानी और चांदनी के मनमोहक सफेद और चम्पई फूलों की,  वहीं इंगलैंड में झरते पीले पत्तों और अंधेरे से  ढकी धरती मानव मन को एक अजीब और रहस्यमय उदासी से घेरे रहती है। पात विहीन नंगी शाखें और रौशनी विहीन आकाश...मानो उल्लसित प्रेमी नहीं, एकाकी विधुर हो। हिन्दी तिथियों के अनुसार क्वार और कार्तिक, इन दो महीनों को शरद ऋतु माना गया है जो कि अंग्रेजी के करीब-करीब अक्तूबर और नवंबर महीने के समकालीन हैं परन्तु इंगलैंड का ‘ औटम’ भारत की शरद ऋतु से बिल्कुल ही भिन्न है... पर द्यान से और रमकर देखें तो इसका भी अपना एक अलग रूप और जादू जरूर  है...जादू भी ऐसा-वैसा नहीं, तेज अंधड़ के साथ आँखों में धूल झोंकता, काला जादू।


यदि भारत में हर चीज एक शुभ्रता और पारदर्शिता ले लेती है,  तो यहां अंधेरा बढ़ना शुरू हो जाता है और एक दूसरे ही तरह के रंगमंच की तैयारी होने लगती है...एक वर्जित, अनिश्चित, रहस्यमय मंच मानो थकी प्रकृति अंत का उद्घोष करना चाहती है...पत्तियां तक कई-कई रंग बदल डालती हैं। पंछियों और तितलियों-सी चारो तरफ उड़ने और गिरने लगती हैं। तेज हवा की सन-सन सुर लहरी पर उड़ती खड़खड़ाती ये पत्तियां  रहस्यमय पंचम (हाई औक्टेव) सुर साध लेती हैं और चारो तरफ कुशल नृत्यांगनाओं-सी थिरकती-फिसलती  कोना-कोना ढकती गिर पड़ती हैं, मानो  प्रकृति का स्वान-सौंग गा रही हों (कहते हैं कि  हंसों को अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो जाता है और हंसिनी के वियोग से दुखी हंस, मरने से पहले बहुत ही सुन्दर व अति मार्मिक अंतिम नृत्य करता है )। यदि इन्हें ही इस ऋतु का यहां पर मुख्य कलाकार कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।


ओक और मेपल के पेड़ों की अनगिनित कतारों के नीचे बाग बगीचों में टहलते जो भी इस पर्ण बरखा-या पत्तों की नृत्य-नाटिका में फंसा, पूरी तरह से मुग्ध हुए बिना नहीं रह सका। मौसम का यह विशिष्ट रूप लुभावना होने के साथ-साथ कभी-कभी अति रूद्र भी हो सकता है...प्रकृति की ताकत और महत्ता को पूरी तरह से दर्शाता हुआ...हवा इतनी तेज कि पत्तियां क्या, कभी-कभी तो लगता है कि साथ-साथ सैलानी को भी ले उड़ेगी। भारत में ऐसे पतझण की कल्पना तक दुर्लभ है। आंधी पानी और हड्डियों तक को कंपाने वाली बर्फीली हवाएं तो हैं  हीं, कब हिमपात भी शुरू हो जाए, कहा नहीं जा सकता। और यही हुआ भी इसबार। पहली बार व्हाइट क्रिसमस की तरह सफेद दिवाली  मनाई गई....सफेद यानी कि बरफ़ से ढकी हुई और अगली सुबह बच्चों  को पटाके छोडने की बजाय  स्नोमैन बनाना ज्यादा रुचिकर लगा।


शायद मौसम के इन्ही रहस्यमय रूपों से विस्मित और पूरी तरह से अभिभूत यहां के लोगों ने ‘ हैलोईन’ नाम के त्योहार की कल्पना की। मान्यता यह है कि इस दिन तरह-तरह के भूत-प्रेत और चुड़ैलें घूमने निकलती हैं। जादूई जोंगा ओढ़, लम्बा-नुकीला टोपा पहनकर, वे झाड़ू पे सवार होकर, तेज हवा में झुंड बना-बनाकर इधर-उधर दौड़ती हैं। करीब-करीब सभी पाश्चात्य देशों में, विशेषतः अमेरिका में विशेश धूमधाम से हैलोईन का यह अनूठा और मजेदार त्योहार हर साल अक्तूबर महीने के आखिरी दिन, इक्कतीस तारीख को मनाया जाता है। और तो और, दावत में परोसी गई खाने -पीने की चीजों तक के नाम वर्मपाई और ब्लडीकेक आदि होते हैं इस दिन। त्योहार के सारे रूप-रंग और मनाने के तरीके बेहद मजेदार और निराले हैं। हफ्तों तैयारियां होती हैं। हफ्तों पहले से इस त्योहार की तैयारी में बजार में तरह-तरह के डरावने चेहरे, कपड़े और अन्य विचित्र-विचित्र मनोरंजन की चीजें बिकनी शुरू हो जाती हैं।  बच्चों की डरावनी पार्टियां होती हैं। भूत-प्रेतों और कंकालों जैसे डरावने चेहरे और काले-नीले कपड़े पहनकर बच्चे संग-संग नाचते कूदते हैं। घर-घर जाते हैं और ट्रिक या ट्रीट का सवाल करते हैं। यदि आपने ट्रीट कहा तबतो ठीक है। आपसे कुछ चौकलेट्स और स्वीट्स लेकर चले जाएँगे, वरना ट्रिक कहने पर या स्वीट्स न मिलने पर आपको डराएंगे, दरवाजे और खिड़कियों पर अंडे और टमाटर सौस आदि पोत जाएंगे और इस दिन इन्हें यह शैतानियां माफ भी हैं। कम ही लोग होंगे, जो बच्चों को इस दिन इन छोटी-मोटी शरारतों पर डांटते-डपटते होंगे, या बातों का बुरा मानते होंगे। गोल, सूखे कद्दूओं को काटकर उनके अंदर मोमबत्ती आदि जलाकर दरवाजे पर रखने की भी प्रथा है इस दिन। कहा जाता हैं कि इससे दुरात्माएं दूर होती हैं। कुछ-कुछ अपने यहां की झांझी और टेसू जैसी ही प्रथा है यह भी और लगभग उन्ही दिनों के आसपास भी है, जब दिवाली के आसपास मिट्टी की बनी झांझी और टेसू में दिए जलाकर बच्चे बड़ों से पैसे और मिठाई आदि लेते हैं। यह तो हुई बच्चों की बात, बड़ों के भी सारे त्योहार पूरे ही विश्व में और सभी संस्कृतियों में करीब-करीब मिलते-जुलते से ही तो हैं और एक ही वक्त के आसपास आते भी हैं। रंग और रौशनी के ये त्योहार होली और दिवाली से मिलते-जुलते  ही हैं और  फरक-फरक नाम से और थोड़े-बहुत बदलाव के साथ  विश्व के कई-कई देश और संस्कृतियों में मनाए जाते हैं। 


प्रकृति और पुरुष का, मानव और उसके पर्यावरण का यह सामंजस्य या अनूठा तालमेल, आज भी पूरे विश्व में करीब-करीब एक-सा ही है और होना भी चाहिए, क्योंकि पूरब में रहें या पश्चिम में, मानवीय अनुभव, हमारी नैसर्गिक संवेदनाएं... प्रीत, भय, नफरत और हर्ष आदि तो  एक-से-ही रहे हैं, और कहीं-न-कहीं आदिकाल में हमारे पूर्वज भी । फिर प्रकृति से ज्यादा मन को उद्वेलित या शांत करने वाली और कौनसी नैसर्गिक ताकत है! बस, स्थान और परंपराओं के अनुसार इन त्योहारों की प्रथा और प्रकरण में थोड़ा बहुत हेर-फेर होता रहा है।


कल्पनातीत प्रकृति के  विविध रूप  और दृश्यों को शब्दों में बांधना आसान नहीं,  इन्हें तो बस अनुभव ही किया जा सकता है। हर ऋतु का अपना एक अलग ही रूप -रंग और मिजाज है। अपने अनूठे तेवर और अहसास हैं, अगर वक्त है हमारे पास  सुनने समझने को, इन्हें महसूस करने को। जो रम्य है वही मनोहारी भी। और जो मनोहारी है, वही तो मनोबल दे सकता है। सृजन जितनी निष्टा और एकाग्रता की अपेक्षा करता है,  इसकी सौंदर्य अनुभूति भी उतनी ही शांति, एकाग्रता, मनोयोग... एक आंतरिक जुड़ाव मांगती है । 


आज हम कितनी भी प्रगति कर लें,  प्रकृति के आधिपत्य को मानें या न मानें, पर यह तो मानना ही होगा कि यदि मानव मन और बुद्धि, एक जिज्ञासा, एक कौतुहल ... शिशु-सी है, तो प्रकृति हमारी जननी और इसी गोद से हमें न सिर्फ सभी जीवनदायी पोषण मिलते हैं,  अपितु  जीवन के अनगिनित  रहस्यों के उत्तर;  सारे सुख भी।... .      


                                                                                                                                           -शैल अग्रवाल           

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                            माह विशेष 








                         शरद गीत










शरद की शुभ्र गन्ध फैली,

खुली ज्योत्सना की सित शैली।

 

काले बादल धीरे-धीरे,

मिटे गगन को चीरे-चीरे,

पीर गई उर आए पी रे,

बदली द्युति मैली।

 

शीतावास खन्नों ने पकड़े,

चह-चह से पेड़ों को जकड़े,

यौवन से वन-उपवन अकड़े

ज्वारों की लटकी है थैली।

       सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ‘ 





 











                      शरद ऋतु










शरद ऋतु की सर्द हवाएँ भिगो गयीं मेरा आँचल

तन भी भीगा मन भी भीगा भीगगया सारा आँगन

कोपलें खिलीं प्रष्फुटित हो गयीं नन्ही कलियां बागों में

पायल की रुनझुन करती वो आ पहुँची मेरे आँगन में

हरियाली का आँचल ओढ़े बूटे बूटे पुलक उठे

झूम उठे हैं पात पात और फल भी आने को मचले

पत्ती पत्ती डाली डाली झूम उठी मानो ऐसे

शरद ऋतु की सर्द हवा ने अमृत पिला दिया जैसे

शरद ऋतु की सर्द हवाएँ भिगो गयीं मेरा आंचल

भिगो गयीं मेरा आँचल ।
                                        
 

                                                                           -मीरा


-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                            कविता आज और अभी


कैसी है तुम्हारी हंसी ?
ऊचाई से गिरती जलधारा सी?
कल कल छल छल करती
मैं चकित सी देखती रह गई
सारी नीरसता सारा विषाद
तुम्हारी हंसी की धारा में बह गए
तुम्हारी हंसी है सावन की फुहार
भीगे मन प्राण
नीरस मरूथल से मन पर
जैसे बहार की हरियाली
तुम्हारी हंसी है मावस के बाद की
दूधिया चांदनी
या फिर सूखे में
अचानक फूट पडनेवाला
मीठे पानी का झरना
उदास मन में जैसे
प्रेम का मीठा अहसास
भटकते मन को मिले जैसे
एक प्यारी पगडंडी
जलती दुपहरिया में
अचानक चले जैसे
ठंढी ठंढी मधुर बयार
शून्य विजन में जैसे
कूक पडी हो कोयल
सावन का पहला मेधखंड हो जैसे
ऐसी ही तो है तुम्हारी हंसी?
कैसे बचा पाए तुम ?
इस निर्मम संसार में
अपनी ये हंसी?


- कुसुम सिन्हा









कार्तिक का पहला गुलाब


कार्तिक का पहला गुलाब
सुर्ख पंखरियां सुबह की धूप में
तमाम पृथ्वी को अपनी चमक से आंदोलित करती हुईं
तहों की बंद परत के बीच से सुगंध भाप की तरह उपर उठती हैं

वह मात्र सुगंध है गुलाब नहीं
वह रंग
वह गंध
वह पंखरियों के वर्तुल रूपक में लिपटा
कोमलता, सुकुवांरता, सौंदर्य प्रतीक

दृष्टि दूर तक स्वयं के संग जाना चाहती हैं
कार की भांति चढ़ाती गिराती भंगिमाओं के बीच
मालिकाना भाव से पोशित तत्व को सम्पूर्णता में परख लेना चाहती है

मान्यताओं की सीपना के बीच
वक्त बीतता हुआ
अचानक दम लेने को ठमक जाता है


                                  -इला कुमार












तुम नहीं आए


         आ गया मघुमास
आ गय मथुमास लेकर
            फूल मुस्काते
गूजते हैं गीत के स्वर
            भ्रमर है गाते
याद आई फिर तुम्हारी
           तुम नहीं आए

फूल कलियों ने सजाया
           फिर से उपवन को
झील के जल पर
        गगन के रूप का जादू
ळहरों पे है डोलता
        किरण के रंग का जादू
याद आई फिर तुंम्हारी
         तुम नहीं आए
फिर हृदय के वृक्ष पर
          कुछ फूल खिल आए
मिलन के सपनों ने
           अपने पंख फैलाए
याद आई फिर तुम्हारी
           तुम नहीं आए
याद करती हैं ये लहरें
           पास आ आ कर
लौट आती हैं व्यथित
           तुमको नहीं पाकर
गगन में उडते पखेरू
          घर को लौटे हैं
याद आई फिर तुम्हारी
          तुम नहीं आए
हृदय के तारों पर लगा
           कोइ गीत है बजने
जागकर सोते से
           सपने हैं लगे सजने
याद आई फिर तुम्हारी
            तुम नहीं आए


                      कुसुम सिन्हा













ग्रीष्म में  तपते
साये ,जलते मन
सुलगती हवाएं
शरद ऋतू के आगमन पे
हर्षित हो जायें
गुलाबी ठण्ड की
आहट लिए
प्रकृति का करता सिंगार
शरद ऋतू की सुषमा 
 है शब्दों से पार
श्वेत नील अम्बर तले
नव कोपलें फूटतीं
कमल कुमुदनियों
की जुगल बंदी से
मधुर रागनी छेड़ती 
भास्कर की मध्यम  तपिश
सुधा बरसाती चांदनी
धरती के कण कण में
प्रेम रस छलकाती
मौसम की ये अंगडाई
विरह प्रेमियों  के ह्रदय में
टीस सी उठाती ...

-रचना श्रीवास्तव














रजनीगंधा









रजनीगंधा


बिछावन पर लेटे-लेटे


मैं सत्य और सुन्दर पर सोच ही रहा था


एकाएक


दौड़ती हुई


बिटिया ने कहा-


दादू ने रजनीगंधा तोड़ लिया।


बिछावन से उठा


दौड़ते हुए


खिड़की से


उस पौधे की ओर निहारा


जहाँ


कुछ देर पहले


अकेली


प्रस्फुटित हो वह


मेरे उद्यान की शोभा बढ़ा रही थी


उसकी पंखुड़ियों पर मकरंद के लिए


भ्रमर मंडराते रहते थे


पवन प्रहरी


अपने  झोकों से


उसे


हिलाती-डुलाती  खिलाती रहती थी


और


वह इठलाती रहती थी


मौन हो


कुछ देर खिड़की से


उस पौधे की ओर निहारा


जहाँ कुछ पल पहले


अकेली ही वह


मेरे समग्र उद्यान में सुगंध बिखेर रही थी।


कुछ देर बाद


पूजा घर में आकर देखा


डंठल सहित


देवों के चरणों पर सुशोभित है।


                             -रामचन्द्र रॉय








  






        ठूंठ








एक ठूंठ


दिखता है मुझे


बगीचे के कोने में


जहां सतत


हरे-भरे नज़ारों के बीच


सिर्फ वहीं खींचता है मुझे





जिस पर कभी होंगे


हरी पत्तियां शिराएं


शिखाएँ निश्चित ही


पर किसी कारण से


छिल-छिल कर खंड-खंड


इसे दिया गया यह रूप


पर फिर भी यह


सधा हुआ, तना हुआ


खड़ा है


विशेष आकर्षण के साथ


ठीक ऐसे ही


शहर के बीच


शानो शौकत से भरे


निचली सतह पर


अपनों के बीच


अपनों से तिरस्कृत


फिर भी दिखती है सख्त


हौसले से बुलंद, वह औरत


जिसकी, आंखों में चमक


और होठ


कुछ कहने से पहले रुक जाते हैं


सहम जाते हैं


एहसास दिलाते हैं।


दिलाते हैं


ठूँठ की तरह!


  -बीना त्रिपाठी

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                         कविता धरोहर


                                                                                                                                              सुमित्रानन्दन पंत


 चांदनी










नीले नभ के शतदल पर
वह बैठी शारद-हासिनि,
मृदु करतल पर शशि-मुख धर
नीरव, अनिमिष एकाकिनि।

वह स्वप्न-जड़ित नत-चितवन
छू लेती अग-जग का मन,
श्यामल, कोमल चल चितवन
जो लहराती जग-जीवन!

वह फूली बेला की वन
जिसमें न नाल, दल, कुड्मल
केवल विकास चिर निर्मल
जिसमें डूबे दस दिशि-दल!

वह सोई सरित-पुलिन पर
साँसों में स्तब्ध समीरण,
केवल लघु-लघु लहरों में
मिलता मृदु-मृदु उर-स्पन्दन!

अपनी छाया में छिपकर
वह खड़ी शिखर पर सुन्दर,
है नाच रही शत-शत छवि
सागर की लहर-लहर पर!

दिन की आभा दुलहिन बन
आई निशि-निभूत शयन पर
वह छवि की छुई-मुई-सी
मृदु मधुर लाज से मर-मर

जग के अस्फुट स्वप्नों का
वह हार गूँथती प्रतिपल,
चिर सजल, सजल करुणा से
उसके ओसों का अंचल!

वह मृदु मुकुलों के मुख में
भरती मोती के चुम्बन,
लहरों के चल करतल में
चाँदी के चंचल उडुगण!

वह लघु परिमल के घन-सी
जो लीन अनिल में अविकल,
सुख के उमड़े सागर-सी
जिसमें निमग्न उर-तट-स्थल!

वह स्वप्निल शयन-मुकुल-सी
है मुँदे दिवस के द्युति-दल,
उर में सोया जग का अलि
नीरव जीवन-गुँजन कल!

वह नभ के स्नेह श्रवण में
दिशि का गोपन-सम्भाषण,
नयनों के मौन मिलन में
प्राणों का मधुर समर्पण!

वह एक बूँद संसृति की
नभ के विशाल करतल पर
डूबे असीम सुषमा में
सब ओर-छोर के अन्तर!

झंकार विश्व जीवन की
हौले-हौले होती लय
वह शेष, भले ही अविदित,
वह शब्द-युक्त शुचि आशय!                                                                                                                                             


वह एक अनन्त प्रतीक्षा
नीरवस अनिमेष विलोचन,                                                                                                                                                  अस्पृश्य, अदृश्य, विभा वह,
जीवन की साश्रु-नयन क्षण!

वह शशि-किरणों से उतरी
चुपके मेरे आँगन पर,
उर की आभा में कोई,
अपनी ही छवि से सुन्दर!

वह खड़ी दृगों के सम्मुख
सब रूप, रेख, रंग ओझल
अनुभूति मात्र-सी उर में
आभास-शान्त, शुचि उज्जवल!

वह है, वह नहीं, अनिर्वच,
जग उसमें, वह जग में लय,
साकार चेतना-सी वह
जिसमें अचेत जीवाशय!










            नौका-विहार








शांत स्निग्ध, ज्योत्सना धवल!
अपलक अनंत, नीरव भूतल!

सैकत शय्या पर दुग्ध-धवल,
तन्वंगी गंगा, ग्रीष्म-विरल
लेटी है श्रान्त, क्लान्त, निश्चल!
तापस बाला गंगा, निर्मल,
शशि-मुख में दीपित मृदु करतल
लहरे उर पर कोमल कुंतल!
गोरे अंगों पर सिहर-सिहर,
लहराता तार तरल सुन्दर
चंचल अंचल सा नीलांबर!
साड़ी की सिकुड़न-सी जिस पर,
शशि की रेशमी विभा से भर
सिमटी है वर्तुल, मृदुल लहर!

चाँदनी रात का प्रथम प्रहर
हम चले नाव लेकर सत्वर!
सिकता की सस्मित सीपी पर,
मोती की ज्योत्स्ना रही विचर,
लो पाले चढ़ी, उठा लंगर!
मृदु मंद-मंद मंथर-मंथर,
लघु तरणि हंसिनी सी सुन्दर
तिर रही खोल पालों के पर!
निश्चल जल ले शुचि दर्पण पर,
बिम्बित हो रजत पुलिन निर्भर
दुहरे ऊँचे लगते क्षण भर!
कालाकाँकर का राजभवन,
सोया जल में निश्चित प्रमन
पलकों पर वैभव स्वप्न-सघन!

नौका में उठती जल-हिलोर,
हिल पड़ते नभ के ओर-छोर!
विस्फारित नयनों से निश्चल,
कुछ खोज रहे चल तारक दल
ज्योतित कर नभ का अंतस्तल!
जिनके लघु दीपों का चंचल,
अंचल की ओट किये अविरल
फिरती लहरें लुक-छिप पल-पल!
सामने शुक्र की छवि झलमल,
पैरती परी-सी जल में कल
रूपहले कचों में ही ओझल!
लहरों के घूँघट से झुक-झुक,
दशमी की शशि निज तिर्यक् मुख
दिखलाता, मुग्धा-सा रुक-रुक!

अब पहुँची चपला बीच धार,
छिप गया चाँदनी का कगार!
दो बाहों से दूरस्थ तीर
धारा का कृश कोमल शरीर
आलिंगन करने को अधीर!
अति दूर, क्षितिज पर
विटप-माल लगती भ्रू-रेखा अराल,
अपलक-नभ नील-नयन विशाल,
माँ के उर पर शिशु-सा, समीप,
सोया धारा में एक द्वीप,
ऊर्मिल प्रवाह को कर प्रतीप,
वह कौन विहग? क्या विकल कोक,
उड़ता हरने का निज विरह शोक?
छाया की कोकी को विलोक?

पतवार घुमा, अब प्रतनु भार,
नौका घूमी विपरीत धार!
ड़ाड़ो के चल करतल पसार,
भर-भर मुक्ताफल फेन स्फार,
बिखराती जल में तार-हार!
चाँदी के साँपो की रलमल,
नाचती रश्मियाँ जल में चल
रेखाओं की खिच तरल-सरल!
लहरों की लतिकाओं में खिल,
सौ-सौ शशि, सौ-सौ उडु झिलमिल
फैले फूले जल में फेनिल!
अब उथला सरिता का प्रवाह;
लग्गी से ले-ले सहज थाह
हम बढ़े घाट को सहोत्साह!

ज्यों-ज्यों लगती है नाव पार,
उर में आलोकित शत विचार!
इस धारा-सी ही जग का क्रम,
शाश्वत इस जीवन की उद्गम
शाश्वत लघु लहरों का विलास!
हे नव जीवन के कर्णधार!
चीर जन्म-मरण के आर-पार,
शाश्वत जीवन-नौका विहार!
मै भूल गया अस्तित्व-ज्ञान,
जीवन का यह शाश्वत प्रमाण
करता मुझको अमरत्व दान!

 










द्रुत झरो






 




द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र!
हे स्त्रस्त ध्वस्त! हे शुष्क शीर्ण!
हिम ताप पीत, मधुमात भीत,
तुम वीतराग, जड़, पुराचीन!!

निष्प्राण विगत युग! मृत विहंग!
जग-नीड़, शब्द औ\' श्वास-हीन,
च्युत, अस्त-व्यस्त पंखों से तुम
झर-झर अनन्त में हो विलीन!

कंकाल जाल जग में फैले
फिर नवल रुधिर,-पल्लव लाली!
प्राणों की मर्मर से मुखरित
जीव की मांसल हरियाली!

मंजरित विश्व में यौवन के
जगकर जग का पिक, मतवाली
निज अमर प्रणय स्वर मदिरा से
भर दे फिर नव-युग की प्याली!

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                             माह की कवियत्री





                                                                                                                        -                                                                                                                           

                                                                                                                                      प्रतिभा मुदलियार



      कुछ क्षण






 





ठहर जाये अब

कुछ पल

बैठा जाये

कुछ क्षण -शांत

उर्वर चेतना के पार्श्व में

हाथ में थामें हाथ

"मौन मधु" हो

गंधित हो ले

कुछ देर

समीपता की सुगंध में,

हो जाये

अहसास तरल

स्पर्श भी

मुखर

और ठहर जाये

काल अनंत ! 

 










     अक्सर









 

अक्सर

 कसौंटियाँ और अग्निपरिक्षाएँ

 खडी प्रतिक्षारत

 हर मोड पर,

 संसार में बने रहने की

शर्त पर,

अक्सर

समझ की सीमा पर

शेष होता है

समर्पण, समझौते का

मात्र एक विकल्प,

और संवेदना की सीमा पर

अक्सर शेष रहता

आत्म से घिरा सन्नाटा

और उसका अपना

नितांत अकेलापन.




 

 


     सन्नाटा






 





जहाँ तक

मेरी आत्मा का अस्तित्व है

वहाँ तक

घिर आया है

सन्नाटा

एक भूचाल के बाद,

दीवारें

जो गवाह थी

कै सी खींची सी

सख्त खडी हैं

सन्नाटे में निरपेक्ष,

पसरता जा रहा है

धीरे धीरे

सब पर

सन्नाटा,

मेरे वजूद का

शेष नहीं अब

कुछ भी

उसकी गिरफ्त से।

सन्नाटे की भाषा होती

तो पूछ लेती

कि तबाही के बाद

जरुरी क्यों है सन्नाटा

जहां, रहस्यों से

उठते जाते हैं

परदे

और खिसक जाती हे

चट्टान सी जमीन

पैरों तले से,

सच,

सच का सामना

किसी भूचाल से कम नहीं होता़

ढह जाता है

पूरा का पूरा अस्तित्व

और शेष अगर रहते हैं

तो बस

निष्प्राण देह

और अंतहीन

प्रश्न और प्रश्न   ???? 

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                                        मंथन


                                                                                                                                                        डॉ.कृष्णदेव झारी




कवि-पंत की सौंदर्य-भावना






सौंदर्य-प्रवृत्ति

सौंदर्य-प्रवृत्ति या सौंदर्य-भावना मानव की सहज वृत्ति है. सौंदर्य का आकर्षण अद्भुत होता है। प्रत्येक सहृदय मनुष्य मंत्र-विमोहित-सा सौंदर्य की ओर खिंचा जाता है। प्रकृति के सुन्दर दृश्य, नारी का रूप-सौंदर्य, बालक का चंचल एवं भोला सौंदर्य, चित्रकार की तूलिका के कमाल आदि सौंदर्य के विभिन्न रूप प्रत्येक प्राणी को आकर्षित करते हैं। सौंदर्य केवल बाह्यपरक नहीं होता, मन और आत्मा का सौंदर्य भी मुग्ध करता है। बाहरी तौर पर चाहे इस अन्तः सौंदर्य में कुछ विशेषता न दिखाई पड़ें पर भावों का सौंदर्य---आत्मा का सौंदर्य---बाह्य सौंदर्य से भी अधिक प्रभावकारी होता है। काव्य में सौंदर्य के ये दोनों रूप ---बाह्य सौंदर्य एवं अंतः सौंदर्य ---भिन्न-भिन्न प्रकार के कवि-अनुभूति का विषय बनते रहे हैं।

छायावाद के प्रमुख स्तंभ कविवर पंत का काव्य ‘सुन्दरम्’ से ओतप्रोत है। उनके छायावादी काव्य में तो ‘सुन्दर’ का प्रमुख स्थान है, ‘शिव’ और ‘सत्य’ का स्थान उसके बाद है। पंत जी की काव्य चेतना में परिवर्तन के साथ-साथ उनकी सौंदर्य चेतना भी बदलती रही है।

प्रकृति सौंदर्यः अल्मोड़ा जिले के पर्वतीय प्रांत में उत्पन्न हुआ कवि आरंभ में प्रकृति की अनंत सुषमा से प्रभावित हुआ। तुषार-मण्डित शुभ्र शैल-श्रेणियों, हरियाली उपत्यकाओं, जल प्रपातों, झीलों, झरनों, रजत-रजनियों में उन्मुक्त विचरने प्रकृति का अनुरागी बन गया। यौवनागमन के समय मानव के लिए मानवी-सौंदर्य का आकर्षण सर्वाधिक होता है। युवक कवि नारी-सौंदर्य पर भी मुग्ध हुआ। पर कई बार तो प्रकृति ने उसे इतना आकृष्ट किया है कि उसकी तुलना में उसे नारी सौंदर्य कम आकर्षक प्रतीत हुआ है। वह अपनी कल्पना की सुन्दरी बाला से स्पष्ट कहता है कि प्रकृति की अनंत सुषमा को छोड़कर मैं तेरे मांसल सौंदर्य की सीमा में अपने को कैसे बांध सकता हूँ?

छोड़ द्रुमों की मृदुल छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया

बाले! तेरे बाल-जाल में, कैसे उलझा दूं लोचन।

तज कर तरल तरंगों को, इन्द्रझनुष के रंगों को;

तेरे भ्रू भंगों में कैसे, बिंधवा दूं निज मृग सा मन।।

प्रकृति के सुकुमार कवि पंत ने “ मधुकर का-सा जीवन “ अपनाकर कटीले कांटों से बचते हुए, निशि-भोर “सुमन दल चुने“ हैं। प्रकृति के सौंदर्य में कवि ने खूब मन रमाया हैः चांदनी रातों में घंटों नौका-बिहार किया है। उसने सैकत-शैय्या पर लेटी दुग्ध-धवल गंगा का पूत तापसी-रूप निहारा है। प्रकृति के अनेक सौंदर्य-चित्रों का पंत जी ने अपनी अनुभूति के बल से सजीव अंकन किया है। एक उदाहरण देखिएः

नौका से उठती जल-हिलोर

हिल पड़ते नभ के ओर-छोर

 

सामने शुक्र की छवि झल-मल, पैरती परी-सी जल में कल,

रूपहले कचों में हो ओझल।

लहरों के घूंघट से झुक-झुक दशमी का शशि निज तिर्यक मुख

दिखलाता मुग्धा-सा रुक-रुक।

-नौका-बिहार

पिक के कल-कूजन, भ्रमरों की मधु गुंजार, सरिताओं और झरनों के सरगम कवि पंत को मुग्ध करते हैं। मधुप कुमारी से अनुनय-विनय करता हुआ कवि कहता हैः

सिखला दो ना हे मधुप कुमारी! मुझे भी अपना मीठा गान।

नारी सौंदर्यः इस प्रकार कवि पंत की सौंदर्य भावना का प्रथम विकास प्राकृतिक सौंदर्यानुभूति के रूप में हुआ। प्रकृति की शांत, आल्हादक, चित्र-विचित्र रंगों और रूपों में सजी क्रीड़ा को पाकर कवि मंत्र-मुग्ध सा हो जाता है। पर इसके साथ-साथ कवि नारी-सौंदर्य का भी अनुरागी रहा है। नारी के अंग-प्रत्यंग सोंदर्य में कवि ने प्रकृति की स्वाभाविक सुषमा-जैसी छटा ही अनुभव की हैः होठों की लाली में प्रातः की अरुणिमा, वाणी में पिक की मधु तान और त्रिवेणी की लहरों का गान, घने काले केशों में मेघों की श्यामलता हैः

(1)     अरुण अधरों का पल्लव-प्रात, मोतियों का हिलता हिम हास,

    हृदय में खिल उठता तत्काल, अध-खिले अंगों का मधुमास।

(2)     तुम्हारे छूने में था प्राण ! संग में पावन गंगा-स्नान !

तुम्हारी वाणी में कल्याणी ! त्रिवेणी की लहरों का गान।।

नारी-सौंदर्य का कैसा पावन, सूक्ष्म मानसिक चित्रण है! कवि पंत ने रीतिकालीन कवियों जैसा स्थूल सौंदर्य-चित्रण नहीं किया। प्रकृति के भव्य उपमान चुनकर ही पंत जी ने अपनी ‘प्रेयसी’ और ‘भावी पत्नी’ का श्रंगार किया है। बहुधा प्रकृति ने ही अपनी सौंदर्य-निधि प्रदान कर नारी की अंग-यष्टि का भव्य निर्माण किया है। नील गगन ने नयनों में चुपचाप नीलिमा ढाल दी, लहरों ने चंचलता प्रदान की---

मुग्ध स्वर्ण किरणों ने प्रात, प्रतम खिलाए वे जलजात।

नील व्योम ने ढल अज्ञात, उन्हें नीलिमा दी नव जात।

आकुल लहरों ने तत्काल, उनमें चंचलता दी ढाल।।

यही नहीं, प्रेयसी का अद्भुत सौंदर्य भी प्रकृति में सुषमा भरता है। उसकी सुगंधित श्वासों से ही प्रकृति में मधुमास छा जाता है, उस तन्वी से प्रेरणा लेकर ही लवंग लता अपने अंग चुनाती हैः

तुम्हारी पी मुख-वास छवि आज बौरे भौंरे सहकार।

चुनौती लवंग लता निज अंग, तन्वी तुमसे बनने सुकुमार।।

रहस्य सौंदर्यः इस प्रकार प्रकृति-सौंदर्य और मानवी सौंदर्य पंत काव्य में एकाकार हो गया है। प्रकृति की सौंदर्य छटा से ही विस्मय-विमुग्ध हुआ कवि उसमें अलौकिक सत्ता का आभास पाने लगता है। वह आश्चर्यचकित हो प्रश्न कर उठता है, कि वह परम सौंदर्य-राशि कहां है, जिस पर जगत की अनंत सुषमा भी मुग्ध हैः

मैं चिर उत्कंठातुर

जगति के अखिल चराचर

यों मौन-मुग्घ किसके वश?

संध्या की लाली में वह उस परम सौंदर्य सत्ता की मुस्कान का अनुभव करता है---

हुआ था जब संध्यालोक, हंस रहे थे तुम पश्चिम ओर।

विहग-रथ बनकर मैं चितचोर! गा रहा था गुण किंतु कठोर!

सत्यं-शिवं-सुंदरम् रा समन्वयः पंत की सौंदर्य-भावना सत्य और शिव से समन्वित है। सौंदर्य में सत्य का संधान कवि पंत को रहस्य-सत्ता की ओर ले गया और शिवं की खोज ने उसे मानव-सौंदर्य की ओर आकृष्ट किया। कवि ने उस परम सत्य के निमंत्रण, संकेत, आदेश प्राकृतिक सुषमा में ही अनुभव किए। कवि को विस्मय होता है कि न जाने कौन नक्षत्रों के द्वारा उसे मौन निमंत्रण देता है, न जाने कौन सौरभ के मिस मौन संदेश भेजता है? और कवि उस सौंदर्य-सत्ता का दर्शन करने को व्याकुल हो उठता हैः

ऐ असीम सौंदर्य राशिमय हृदयकम्पन से अन्तर्धान।

विश्वकामिनी की पावन छवि, मुझे दिखाओ करुणावान्।

और अंत में इतनी कातरता और विह्वलता के पश्चात् कवि-जीवन में रूप-सुधा बरसी, उसे जीवन-निधि प्राप्त हुई, सत्य का साक्षात्कार ही नहीं हुआ, कवि उससे एकाकार हो गया---

एक हूँ मैं तुमसे सब भांति जलद हूं मैं यदि तुम हो स्वाति।

मानव-जीवन-सौंदर्यः कवि पंत ने प्रकृति से सत्य और शिव की उपलब्धि की। प्रकृति के उपादान मानव के सम्मुख जीवन के अनेक सत्यों का उद्घाटन करते हैं। वन की सूनी डाली पर खिली कली मानव को दुख भी सुखपूर्वक सहने की शिक्षा देती है, हंसमुख प्रसून महत् त्मबलिदान का संदेश देते हैः

हंसमुख प्रसून सिखलाते पल भर है जो हंस पाओ

अपने उर की सौरभ से जग का आंगन भर जाओ।

सौंदर्य भावना में परिवर्तनः  ‘गुंजन ’ में आकर कवि पंत की सौंदर्य भावना में परिवर्तन की दशा दिखाई दी। वह मानव-जीवन-सौंदर्य का गायक बन गया।  ‘ युगांत ‘ में आकर तो कवि की सौंदर्य-भावना में अद्भुत परिवर्तन हो गया। ‘गुंजन‘ में कवि पंत जग जीवन का गायक बना था, वह सुन्दर से सुन्दरतम् की आकांक्षा इसी जग-जीवन में करने लगा---

सुन्दर से सुन्दरतर सुन्दरतर से सुन्दरतम

सुन्दर जीवन का क्रम रे सुन्दर सुन्दर जग-जीवन

विहग, तरु, सुमन---प्रकृति –भी सुन्दर है पर मानव सबसे सुन्दर है—

 ‘ सुन्दर हैं विहग, सुमन सुन्दर, मानव तुम सबसे सुन्दरतम्‘ (युगान्त)

मानव-जीवन-सौंदर्य की इस तीव्र आकांक्षा ने कवि पंत की सौंदर्य-चेतना में जबरदस्त परिवर्तन उपस्थित कर दिया। ‘युगांत ‘ ‘ युगवाणी ‘ और ‘ग्राम्या ‘ में कवि का दृष्टिकोण सर्वथा बदल गया. वह पुकार उठा---

आज सुन्दर लगते सुन्दर, प्रिय पीड़ित –शोषित जन

जीवन के दैन्यों से जर्जर मानव मुख हरता मन।
(युगवाणी)

इसी भावना-परिवर्तन के कारण कवि पंत को सौंदर्य और प्रेम का प्रतीक ताजमहल असुन्दर और ‘‘ मृत्यु का पार्थिव पूजन ‘‘-सा लगने लगता है। कवि जग-जीवन की विषण्णता पर शोक प्रकट करता हुआ कहता हैः

शव को दें हम रूप-रंग आदर मानव का ?

मानव को हम कुत्सित चित्र बना दें शव का?

अपनी एस सौंदर्य-दृष्टि के संबंध में स्वयं कवि पंत ने कहा है, “ मानव-स्वभाव का भी मैने सुन्दर ही पक्ष ग्रहण किया है। सी से मेरा मन वर्तमान समाज की कुत्साओं से कटकर भावी समाज की कल्पना की ओर प्रभावित हुआ—यह आशा मुझे अज्ञात रूप से सदैव आकर्षित करती रही है---

“ मनुज प्रेम से जहाँ रह सकें, मानव ईश्वर।

और कौन-सा स्वर्ग चाहिए मुझे धरा पर ?“

प्रगतिवाद या भौतिक जीवन-दर्शन का कवि पर पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि वह जर्जर और दलित जीवन का गायक बन गया। जीवन की इस विषमता के रहते, प्रकृति के कल्पना-लोक में विचरने का किसे अवकाश है?---

कहाँ मनुज को अवसर देखे मधुर प्रकृति-मुख?

भव-अभाव से जर्जर प्रकृति उसे देगी सुख?

अब तो ग्राम-प्रकृति ही सुन्दर प्रतीत होती है। ‘भारत माता ग्राम-वासिनी ‘ का धूल भरा ग्राम प्रांत का मटमैला आंचल ही अब सौंदर्य भावना जगाता है। प्रकृति भी अब जग के दुख-दैन्य पर आठ-आठ आंसू बहाती प्रतीत होती हैः

चांदनी कायह वर्णन देखिए---

जग के दुख-दैन्य शयन पर यह रुग्णा जीवन बाला

रे कब से जाग रही वह आंसू की नीरव माला !

ग्राम-प्रान्त का यह रात्रि-वातावरण जर्जर जीवन को और भी विषण्ण बना रहा है---

बिरहा गाते गाड़ी वाले, भूंक-भूंक कर लड़ते कूकर।

हुआ-हुआ करते सियार, देते विषण्ण निशि-बेला को स्वर।


अंतिम परिणतिः ‘युगवाणी ‘ और ‘ग्राम्या ‘ के बाद कवि मानव-जीवन के सांस्कृतिक-विकास की ओर अधिक उन्मुख हुआ। यद्यपि इस प्रगतिवादी काल में भी उसने केवल भौतिक उन्नति को सब कुछ नहीं माना, वस्तुतः जीवन के पूर्ण विकास के लिए वह आत्मिक उन्नति को भी आवश्यक मानता रहा। परवर्ती रचनाओं में कवि पंत ने सांस्कृतिक और आत्मिक विकास को महत्व प्रदान किया। ‘स्वर्णकिरण ‘ और  ‘ स्वर्णधूलि ‘ तथा अन्य परवर्ती रचनों में कवि ने उच्च सांस्कृतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा में ही सौंदर्य का अवलोकन किया है। अरविन्द के आध्यात्म-दर्शन का भी उस पर प्रभाव पड़ा। सभी जीवन-दर्शनों और सौंदर्य दृष्टियों का समन्वय कवि के काव्य की विशेषता बन गई। वह संकुचित घेरों से बाहर निकलकर विश्व-संस्कृति और मानवताबाद का पोषक बन गया। विश्व-कल्याण-कामना ही उसकी सुन्दरतम सौंदर्य भावना बन गई। इस प्रकार कवि पंत की सौंदर्य चेतना ने परिवर्तन की कई करवटें ली हैं। आरम्भ में वह सुन्दरम का ही मुख्य गायक था, पर शनैः शनैः वह सत्यं और शिवं की ओर बढ़ता गया।   

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                    कहानी समकालीन


                                                                                                                                                          -शैल अग्रवाल




                                                                                                                                    


घर का ठूँठ

" चलो न दादी माँ, आप भी हमारे साथ चलो वहाँ। अमेरिका बहुत अच्छा मुल्क है। और वहाँ के बाजार तो इतने बड़े-बड़े हैं। "
दोनों हाथ पूरे के पूरे फैलाते हुए नन्ही किरन ने कहा, "  आपका इंगलैंड तो बिल्कुल हिन्दुस्तान के गाँव जैसा लगता है। "
किरन और शैरन दोनों चन्नी के गले में हाथ डालकर उसकी पीठपर झूलते हुये जिद किए जा रही थीं। " अच्छा बाबा " मुस्कराती चन्नी ने अपनी उन दोनों आँख की पुतलियों को पीठ पर से उतारा और कमरे में लटके भारी, कीमती परदे खोल दिये। सामने हरा-भरा लॉन रँग-बिरँगे फूलों से सजा-सँवरा लहरा रहा था पर चन्नी की उदास आँखें उन सबसे फिसलकर, आदतन मजबूर, आज फिर उसी कोने वाले ठूँठ पर जा अटकी थीं। चन्नी की तरह यह भी बरसों से यूँ ही खड़ा है। हवा-पानी, ऑधी, बहार, पतझण किसी मौसम का इसपर भी कोई असर नहीं होता। कोई महकते हरे-भरे पत्ते इसमें नहीं आते। न ही किसी फल-फूल से इसकी भी गोद कभी भरती है। हॉ इक्की-दुक्की चिड़िया जरूर अक्सर सूखी टहनियों पर फुदकती रहतीं हैं। इधर से उधर, उधर से इधर बिल्कुल ही बेमतलब, बेकार ही,  घड़ी की सूँई की तरह। या फिर कभी-कभी इसकी बूढ़ी बीमार फुनगियों पर उलटी-सीधी लटक कर तरह-तरह के करतब दिखाती रहती हैं, बिल्कुल शीरी और किरी की तरह।
चन्नी के चेहरे पर बच्चियों के नाम से ही चमक आ गई पर उसे मालुम था कल सुबह ये भी उससे दूर बहुत दूर चली जायेंगी, वैसे ही जैसे बरसों -सालों पहले वह अपने पीछे सबकुछ छोड़कर यहाँ चली आई थी। नहीं, फ़र्क था इनके और उसके जाने में। चन्नी का छोटा सा परिवार, सैकड़ों अन्य परिवारों की तरह, लुटा-छिना, अनजान वतन में, जड़ से उखड़कर जा रहा था। इस कहर के मौसम में, कितने पनप पायेंगे, न चन्नी जानती थी न वे सब ही। सबकी आँखों पर डरका एक कोहरा-सा पड़ा हुआ था। सबकी आँखें नम और ऊदी-ऊदी-सी थीं पर दीप के साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं है।
 चौधरी एन्टरप्राइजेज आज एक जाना-माना नाम है और नवदीप सिंह उसका इकलौता वारिस। लक्ष्मी की बेहिसाब कृपा है उसके परिवार पर। उसका दीप चाहे तो इँगलैंड और अमेरिका को जोड़ता हुआ पुल बना दे। फिर वहाँ जाने की, काम बढाने की, क्या ज़रूरत है --चन्नी की समझ में कुछ नहीं आरहा था? चन्नी तो बस यह जानती थी कि वह हर सुबह, हर रात इन्तजार करेगी, कभी इनके ख़त का, तो  कभी फ़ोन का।
 पर सन अड़तालीस में चन्नी का इन्तजार करने वाला दूर-दूरतक कोई नहीं बचा था। गाँव का वह पुराना बरगद का पेड़ तक, जिसके नीचे गुट्टे खेलती, छलाँगे मारती चन्नी बड़ी हुयी थी, पाकिस्तान की सीमा में चला गया था। क्या पता उसे काटकर सड़क बना दी हो या कॉटे वाले तारों की सरहद। चन्नी की आँखें भर आईं। उसका हरा-भरा गाँव एक कुनबे जैसा था। हर घर काका-काकी और फुफ्फी या मामे का था। हर जवाँ मर्द भैया या चाचा था और हर औरत भाभी या बहना। सबकी समस्याओं की बिखरी पगड़ी चौपालों पर मिलकर बँधती थी और हर दर्द की फटी कुरती दालानों में बैठी भाभी घरके कामों के सँग बातों-बातों में सिल दिया करती थीं। उसके तो गाँव के कुँए का पानी तक बिल्कुल मीठा था, शायद उसके नीचे भी प्यार के सोते बहते थे। कितनी अजीब सी बात है, कि कुदरत के बनाए ये सोते जो कभी नही सूखते, आदमी उन्हे नफरत की मिट्टी से ढँक देता है या फिर उनकी कदर किए बगैर आगे बढ़ जाता है; कभी अनजाने में तो कभी मजबूरी में। चन्नी भी तो ऐसे ही मजबूर होकर ही बढ़ी थी।
 जैसे इस ठूँठ ने अपने तनों में हज़ारों बातें घूँट रखी हैं, चन्नी ने भी अपने दिल की टूटती-बिखरती दराज़ों में यादों के कई कीमती ज़ेवर समेट रखे हैं। लियालपुर के छोटे से गाँव में जन्मी चरनजीत कौर, सरदार कुलविन्दर सिंह की इकलौती बेटी थी। वह सिर्फ नाम की ही कौर नहीं, राजकुमारियों की तरह पली और बड़ी भी हुई थी। माँ के प्यार में गुँथी रोटी और बापू की समझ की पिलाई छाछ, उसे आज भी हर तपन और शीत से बचाने की सामर्थ रखती है। सामर्थ क्या, बचा ही रही है। आंगन में चिड़िया सी फुदकती नन्ही चन्नी पूरे घर की जान थी।
 छरहरे कद की शान्त समझदार चन्नी, कब जवान हुयी, उसे याद नही, बस इतना जरूर याद है कि मलकीता सिंह ने जब कुड़माई के बाद पहली बार चरनजीत को देखा था तो उसने काही रँग का पीले बूटों वाला सूट पहन रखा था। पहली नजर पड़ते ही वह बोल पड़ा था, "तू तो महकती धरती सी सरसों के बूटों में फूट पड़ी है। लगता है खेत-खलिहानों की तरह तेरी भी रखवाली करनी पड़ेगी।" उसकी आंखों की चमक और होठों की मुस्कान देखकर चन्नी को लगा था, इस पल को, इस सामने खड़े मलकीता सिंह को, हमेशा के लिए ही अपने पल्लू में गाँठ बाँधकर रख ले। समय की घड़ी की सूई तोड़ दे या उसकी बैटरी निकाल कर परले पोखरे में फेंक आये।
 शादी के तुरन्त बाद ही एक बात तो चन्नी को खूब अच्छी तरह से समझ में आ गई थी कि उसके मलकीते का पहला प्यार उसकी धरती है, उसके खेत-खलिहान हैं पर चन्नी भी तो किसानों के ही घर जन्मी थी और धरती का मोल-मरम उसे भी तो खूब अच्छी तरह से मालुम था। उसने अपने मलकीते की हर चीज को अपना लिया। मलकीते की मा तो रब से भी ज्यादा बहू के गुण गाने लगी। रब के यहाँ देर हो सकती थी पर उसकी चन्नी तो कहे बग़ैर सबकी बात समझ लेती थी। ऐसी समझदार लक्ष्मी, सरस्वती सी बहू, बड़े पुण्य-प्रताप से ही मिलती है। पर क्या दे पाई थी बन्तो उसे ? पहले बरस में ही उसके घर की छत उड़ गई। दँगे वालों ने घर का चूल्हा तक तोड़ डाला। आब की चूनर टुकड़े-टुकड़े बाँट दी गयी। उसकी बहना, उसकी सौतन, धरती का वह टुकड़ा, जाने कहाँ नफ़रत और राजनीति की आँधियों में उड़कर उसकी पहुँच से दूर-बहुत-दूर जा गिरा।
 दिल्ली की धरती पर खड़ी चन्नी के लिए सबकुछ अजनबी था। सब नया था। शरणार्थियों के बीच खड़ा उसका कुनबा उसे जीते जी दफ़न होता-सा दिख रहा था। चौधरियों की बेटी, चौधरियों के घर ब्याही, रोटी खिलाने के बजाय आज खुद रोटियों के लिए हाथ फैला रही थी। डूब मरने जैसी बात थी। बात-बेबात चन्नी की आँखें भर आतीं और हाथ दुआ के लिए उठ जाते, " वाहे गुरू की कब किरपा होगी।"
 मलकीता सिंह अपनी नवेली को यूँ उदास देखकर खून के आँसू पीकर रह जाता। बूढ़ी बन्तो, जिसने कभी ज़मीन पर पैर नही रखा था; आज सब कुछ सह रही थी। बेटे-बहू का दर्द भी। झुकी आँखों के सँग भी तो वह कुछ नहीं छिपा पा रहे थे। आख़िर बन्तो ने बेटे को नौ महीने कोख में रखा था पर बन्तो की बुढ़ापे की सोच, जोश की नहीं, होश की थी। कुछ करना होगा। बेटे-बहू को यूँ तिल-तिल मरते नहीं देख सकती वह। सुना है राज वाले विलायत जाने का परमिट दे रहे हैं। वहाँ उन्हे कहीं कपङों की मिलों और मशीनों की मिलों में काम करने वालों की ज़रूरत है। कम से कम दो बख़त की रोटी तो इज़्ज़त से कमाकर लायेगा उसका मलकीता। कबतक झुलसेंगे वह नफ़रत और ज़िल्लत की आग में? पर कैसे कहे वह यह सब सरदार हुकुम सिंह के बेटे से? हुकुमसिंह जो अपने इलाके में शेर-सा घूमता था, शेर-सा दहाड़ता था, और लड़ाई के मैदान में भी शेर-सा ही जूझा था। आज भी गाँव-गाँव के खलिहानों और चौपालों में उसकी बहादुरी के रसिए और चौपाई गाने वाले मिल जाएँगे। कहने वाले तो यही कहेंगे न कि चौधरी के कुनबे ने दुश्मनों से साँठ-गाँठ करली। मुल्क छोड़कर भाग गये। किन लोगों के बारे में सोच रही है वह? ये सँग खड़े बुझी आँखोंवाले लोग? यह सब तो उसीकी तरह खुद भी अपने पैरों के नीचे ज़मीन ढूँढते फिर रहे हैं। सर छुपाने को, अपना कहने को, एक टुकङा आसमान ढूँढ रहे हैं या फिर वह लोग, जो उनकी तकलीफों से बेखबर आराम से सो रहे हैं।
 " मलकीते---"
 " आया माँ। "
 मा की पुकार सुनते ही, तीन घंटे की लाइन में खड़ा मलकीता अपनी जगह छोड़, मा की तरफ दौड़ा।
 " पुतर, चल हम बिलायत चलते हैं। " शब्द बिजली-से उसपर गिरे और छ: फुट का जीता-जागता मलकीता पत्थर का बुत बन गया। सामने बैठी माँ, अपने पहले रूप की परझार्इं मात्र रह गई थी। उसकी आँख की शोक और सोच की गहरी दलदल में डूबते मलकीता सिंह का दम घुटने लगा। भगवान राम भी तो मा बाप के कहने पर बनवास गए थे। मानो तो सब अपने ही हैं। क्या फ़रक पड़ता है ? सारे धरती आसमान सब उसी परमेश्वर के बनाए हुये हैं। और मलकीते ने अपने आदर्शों को, अपने को, मा के आदेश पर कुर्वान कर दिया। मा का बोल मलकीते के लिए ग्रन्थसाहब की बानी थे। और सर झुकाये पीछे चलती चन्नी मैनचेस्टर के उस बदरँग, काली-सी ईटों वाले, दो कमरों के बंद सीलन भरे मकान में आ बसी।
चन्नी आज भी नहीं भूल पाई है कि कैसे पाँच साल के इन्दर और पचास साल की बन्तो दोनों ने ही सीलन फेफड़ों में समेट ली थी। चन्नी और मलकीता खुदको भूलकर हर परेशानी से लड़ रहे थे, बिल्कुल वैसे ही जैसे उसका बाप जँग में लड़ा था। खाकी पीला सूट अब भी था चन्नी के पास, पर अब उसमें से, इतनी ठँड के बाद भी, लड़ाई में लड़ रहे जवानों के पसीने जैसी महक आती थी। " मेरी मा के कलेजे को हरा रखना," मलकीता ने कभी बातों-बातों में कहा था। और सीधी-साधी चन्नी ने उसी दिन अपने मन के मन्दिर में भगवान की जगह सास को बिठा लिया था। सास और देवर के सँग रहती चन्नी मा-बाप का लाड़-दुलार, सहेलियों की मीठी बातें, गाँव की महकती अमराई, ऐश, आराम सब पीछे छोड़ आई थी। मलकीता सिंह रोज शाम को इन्दर को घुमाने सामने वाले पार्क में ले जाता था। कभी-कभी चन्नी और मा भी चली जाती थीं।
 दूर से झुके हुए कन्धों वाली चन्नी भी बन्तो सी ही लगती थी। " कुड़िए तन कर चलाकर। अभी तो पहाड़ सी जिन्दगी पड़ी है। यह इन्दर मेरा नही तेरा ही बेटा है। " और बन्तो इन्दर को चन्नी की गोद में बिठा देती। नन्हा इन्दर भी भाभी की गोद में जाकर ऐसे चैन से सो जाता जैसे चन्नी ही उसकी माँ हो। थी ही चन्नी उसकी माँ। नहलाती चन्नी, खिलाती चन्नी और अगर रात में रोता तो दौड़कर गले से लगाती चन्नी।
 बन्तो तो बहू के हाथ घर द्वार सौंपकर, ग्रन्थसाहब की सेवा में लग गयी थी। आखिर परलोक भी तो सुधारना था। चन्नी को लोक-परलोक का कोई होश नहीं था। उसका तो जीवन ही एक तीर्थजात्रा बन चुका था, जिसकी लगन में न कभी उसके हाथ-पैर दुखते थे, न शीत-ताप का कोई असर होता था। मलकीते की एक तृप्त मुस्कान चन्नी के हर दु:ख की मरहम थी और उस पर तो चन्नी अपने सौ जन्म तक कुर्बान कर सकती थी। चन्नी की उलझनों और परेशानियों को पढ़ता तो सिर्फ़ इन्दर बड़ा हो रहा था। बेबे जब मैं बड़ा होउँगा न तो आपके लिए चार कामवाली लगाउँगा, और चन्नी उसे गोद में उठाकर माथा चूम लेती। वारी जाउँ मेरे लाल। कङुए नीम से भी बड़ा हो जा। फिर खुद ही अपनी उँगली काट लेती। सच यहाँ तो नीम का दरख़्त ही नहीं दिखता। चल दूध पी ले, वह सामने की चिमनी देख रहा है न, जल्दी ही उससे भी बड़ा हो जाएगा। रो़ज़ चन्नी कपड़े की मिल की उँची चिमनी की तरफ़ इशारा करके इन्दर को दिखाती और रोज़ इन्दर एक ही घूँट में सारा दूध पीकर दरवाजे के सहारे एड़ियाँ उचकाकर खड़ा हो जाता। "देख बेबे, आज तो थोड़ा सा जरूर बढ़ा होउँगा। आज तो मैने एक भी बूँद दूध गिलास में नहीं छोड़ा है।" आती उबकाई को किसी तरह मुँह में रोककर इन्दर कहता। चन्नी जानती थी छोटे से इन्दर को बड़े होने की कितनी जल्दी थी।
 मा, भाभी किसी का भी दु:ख तो वह बर्दाश्त नही कर पा रहा था। भैया अकेले-अकेले बहुत जल्दी बूढ़ा होता जा रहा था। सरदार हुकुमसिंह के बेटे में शेरों जैसी कोई बात न थी। गम्भीर सँभल-सँभलकर कदम रखने वाला मलकीता जिम्मेदार और ज़मीन से जुड़ा हुआ था। उसके अकेले कन्धों पर चार जनों के परिवार का बोझ था। और उसके मन पर बोझ था, पीछे छूटी, टूटी बिखरी, आधी-अधूरी पुरखों की ज़मीन का, जिसकी धूल में खेलकर उसके कुनबे की सात पुश्तें बड़ी हुयी थीं। आज उसी धरती मा को वह अब कभी देखतक नही सकता।
 सबकुछ उसकी पहुँच से कितनी दूर था। चलो जी क्या हुआ ? अपनी-अपनी किस्मत है। उसके दरबार में कोई बेइन्साफी नही होती। सीधा-सीधा, अगले-पिछले जनम का हिसाब है। और मलकीते को खूब अच्छी तरह से पता था कि अगले जनम में वह अपनी उसी धरती की गोद में मस्त होकर फिरसे खेलेगा, बिल्कुल पीले, महकते, सरसों के बूटे की तरह। चन्नी जानती थी उसके मलकीते के इसी शान्त और धैर्य वाले स्वभाव की वजह से ही, इस बेगाने मुल्क में भी उसका पूरा परिवार अपनी सारी परेशानियाँ उसे सौंपकर चैन की नींद सो जाता था।  
 " दादी माँ ठूँठ क्या होता है ? " दोनों लड़कियों ने एकसाथ सिर खुजाते हुए पूछा। चन्नी के मुँह से बार-बार सुनकर उनके लिए भी यह शब्द रहस्यमय बनता जा रहा था।
 " ठूँठ," हँसकर चरणजीत कौर बोली, " उस मरते हुए बूढ़े पेड़ को कहते हैं जिसपर कभी कुछ नही उगता। बिल्कुल बेकार। अब गिरा, तब गिरा, पर गिरता ही नहीं। "
 " कैसी बातें करती हैं बेबे, आपभी? " सामने खड़ा इन्दर जब और बर्दाश्त न कर सका तो भरे गले से बोला, " रब आपको सौ सालकी उमर दे। न तो आप बुढ्ढी हैं, ना ही बिल्कुल बेकार। मैं इन बच्चों को सैटल कराके दो हफ़्ते में ही उलटे पाँव लौट आऊँगा। " चन्नी उसका दर्द समझती थी पर वह यह भी खूब अच्छी तरह से जानती थी कि वक्त की नदी सिर्फ आगे बहना जानती है। उसके इस बहाव मे कितने रिश्ते बहेंगे, बिछड़ेंगे, डूबेंगे, यह तो नदी के हाथ में भी नहीं होता। ऐसा ही कुछ तो उसके साथ भी हुआ था, बरसों पहले; जब सत्रह-अठारह साल की चन्नी इँग्लैंड आई थी, सबकुछ पीछे छोड़कर। कितना छोटा और असमर्थ महसूस किया था उसने भी। वह तो किसी से कुछ कह भी नहीं पाई थी। कितनी बार लौटना चाहा था उसने भी, पर परछाइयों को भला कौन पकड़ पाया है? सबकुछ तो जलकर भस्म हो गया था, ऩफ़ऱत और धरम की आग में। वह तो अमृतसर के गुरुद्वारे भी गई थी। दारजी कहते थे, जब अपनी चन्नी की शादी होगी तो चूनर चढ़ाने जाएँगे। चन्नी की शादी भी हुई, चूनर भी चढ़ी, पर आज इस मौके पर दारजी या बीबीजी कोई भी नही थे। और चन्नी दुहरी होकर, फफक-फफककर, वहीं सीढियों पर रो पड़ी थी। अब तो पता नहीं, कौन उस घर में रहता होगा ? पता नहीं घर होगा भी या नहीं।
 " उठो बेटी, सम्भालो अपने आपको। साहब के दरबार में हर दुआ पूरी होती है। "
 फकीर ने बड़ी हमदर्दी से उसकी पीठपर हाथ रखते हुए कहा था। चन्नी तुरन्त चुनरी के छोर से आँसू पोंछती हुई उठ खड़ी हुई थी। उसका बाँका सरदार, उसका शीश-सुहाग उसके सामने जो खड़ा था। उसे अब और क्या चाहिए था ? चलो जी, अभी तो चारो धाम की जात्रा करनी है और वैष्णव देवी भी जाना है। लगता था उनके जो भी सगे-सँबन्धी, रिश्तेदार छूटे थे, इन्ही मूर्तियों में समा गए थे और चन्नी व मलकीता हर शहर, हर मन्दिर, हर गुरद्वारे में जाकर उनसे मिल रहे थे।
 उन पुरखों का ही तो असीस था कि आज यहाँ इँगलैंड में उनके पास अपना कहने को घऱ था। इज़्ज़त थी। उसका अपना लियालपुर का सरदार, मिल का मजदूर सरदार, सर मलकीत सिंह कहलाता था। दुनिया भर का वैभव और उपाधियाँ उसके आस-पास गेहूँ के बालों सी लहलहा रही थीं। पर आज भी उसके लिए हिन्दुस्तान ही सिर्फ़ घर था और उसका पुश्तैनी घर तोड़ दिया गया था। मलकीत सिंह अपनी यादों में हमेशा सन् सैंतालीस से पहले के हिन्दुस्तान में ही रहा। वही उसका वतन था और गाँव का घर ही उसका अपना घर। अपने से दिखने वाले सब उसके अपने ही तो थे। लियालपुर के, पँजाब के, कई लोग उसे मिलने लगे और मलकीता सबको अपने घर लाने लगा। भूल गया कौन हिन्दू है, कौन मुसलमान। पीछे वतन में क्या हुआ था। नाइन्साफी तो दोनों के ही साथ हुयी थी और दोनों ने ही की भी थी।
 यही उसका नया कुनबा था। भूले-भटके लोगों का कुनबा। एक मिट्टी से निकले दो बूटों की तरह उनमें से एक ही धरती की खुशबू आती थी। किन भाइयों में कभी मनमुटाव नही होता। यह उसकी जिम्मेदारी है कि अपने घरको, अपने देशको, बिखरने से बचाये। बन्तो, चन्नी, इन्दर और खान भाई सब उसका दर्द समझते थे। एक गाड़ी में लगे चार पहियों की तरह सब चल पड़े थे; उसी दिशा में जहाँ वह जाना चाहता था। आज बसन्ती बयार सी मलकीते के यश की महक उसके नेक कामों की तरह इंग्लैंड, हिन्दुस्तान, पाकिस्तान सब जगह फैल गई थी।
 चन्नी को कल सा याद है वह दिन जब खान भाई उसके घर आए थे। मलकीते ने दरवाजे से ही आवाज़ दी थी, " देख चन्नी, खानभाई आए हैं। तू रोती थी न कि गाँव का कोई नही दिखता। किस को रखड़ी बाँधू ? ले आ राखी , ख़ान भाई अपने लियालपुर के ही हैं। " उस दिन से चन्नी के हाथ पैरों में पँख निकल आए थे। चन्नी दौड़कर अन्दर गई थी और बरसों बाद उसने सेवयीं वाली खीर , हलवा पूरी और रसे के आलू, सब बनाए थे, बिल्कुल वैसे ही जैसे मा सलूने के दिन बनाती थी। राखी बाँधने के बाद जी भरकर वीरा की आरती भी उतारी थी। और खानभाई के दिए हुए उस एक शिलिंग के सिक्के को हथेली पर रखे वह यूँ ही घँटों घूरती रही थी मानो बादशाह सलामत का ख़ज़ाना मिल गया हो। खानभाई ने भी बहना को प्यार देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। दोनों परिवारों की सूखी जड़ों को फिर से प्यार की नम धरती मिल गई थी। और उख़ड़े पौधों ने जमीन पकड़ना शुरू कर दिया।
  यही नहीं, आकाश में बैठे मुकद्दर के बादशाह ने भी उनके लिये बड़े-बड़े मनसूबे बाँध रखे थे। कपड़े की एक पुरानी, बरसों से बन्द पड़ी मिल बिकाऊ थी और मलकीत व ख़ान दोनों ने ही थोड़े-थोड़े पैसे बचाये हुए थे। उनका खर्च ही कितना था ? दोनों को ही कोई बुरी आदत नहीं थी, और दोनों के ही घर अन्नपूर्णा का वास था। घरमें किसी चीज़ की कमी कभी नही होती थी। अगर होती भी हो तो न कभी मलकीतसिंह को महसूस हुआ न रियाज खान को। थोड़ा सा सरकार से कर्ज लेकर दिनरात एककर दोनों ने, बरसों की जँग लगी मशीन को चन्द महीनों में ही इस लायक कर दिया कि कपड़े के थान पर थान उगलने लगी। वैभव के ढेर लग गए और सरदार मलकीत सिंह और रियाज़ ख़ान देखते देखते शहर की जानी-मानी हस्तियों में गिने जाने लगे। पर मलकीत सिंह की बेचैन रुह उजड़े-भटके परिवारों में ही रहती। पर पार्टीशन के समंदर से निकले सारे जहर को खुद पीने की इच्छा वाला मलकीता गुमनामी के अँधेरे में ज्यादा दिन छुप न सका। लोगों ने उसे देवता बना दिया। उसके नाम के मन्दिर बना दिए गए। पर मलकीता आज भी उस पीछे छूटी दुनिया में ही भटकता रहा। अभी भी उसे चारो तरफ हज़ारों भूखे और असहाय इन्सान ही दिखाई दे रहे थे। अस्पताल पर अस्पताल और धर्मशालायें बनती चली गयीं। किसी ने उसका हाथ नही रोका, हिसाब नहीं पूछा, न खान ने ,न छोटे भाई इन्दर ने; जो अब उसका दाँया हाथ था। और न ही किस्मत के मुनाफे ने। सब कुछ था उसके पास, सिवाय लियालपुर के। सर मलकीत सिंह का मन चौधरियों की पगड़ी पहन कर अपने गाँव की चौपाल पर बैठने को मरते दमतक तरसता रहा पर यादों के ठूँठ पर कब पत्ते आते हैं।
 चन्नी को याद नहीं कब उसने अपनी जिन्दगी को सामने खड़े ठूँठ जैसा पाया था। शायद तब, बरसों पहले जब पाँच हफ़्ते के कुलविन्दर को धरती की गोद में सुलाने के कई बरस बाद भी उसकी गोद दुबारा नही भरी थी और गुरुद्वारे में किसी औरत ने बातोंबातों में कहा था, "ऐसी ठूँठ सी जिन्दगी कैसे काटेगी बेटी। देवर आखिर देवर ही होता है। भगवान ने बिचारी को इतनी धन माया सब कुछ दी पर एक बेटा ही नही दिया।" चन्नी अँगारे सी जल पड़ी थी, नन्हे इन्दर को गोदी में उठाए, वहीं जमी-जमी। इन्दर उसका बेटा था। मरती सास ने देवर नही बेटा कहकर सौंपा था उसे। वैसे भी शादी के पहले दिन से ही उसीके पास तो रहा है उसका इन्दर। इन्दर के हर छोटे बड़े दर्द को उसने मा की तरह ही सहा और महसूस किया है और इन्दर भी उसके माथे की हर शिकन और होठों की हर मुस्कान को पढ़ता हुआ ही बड़ा हुआ है। बिल्कुल वैसे ही जैसे वह अपने दारजी और बीजी के मन की हर बात बिना बताए ही समझ जाती थी।
 रिश्ते कोई एक जनम में तो नहीं बनते, यह तो कई जन्मों की बात है। इन औरतों के कहने से क्या होता है, चन्नी खूब अच्छी तरह से जानती थी इन्दर उसी का बेटा है। इसके पहले कोई उसके इन्दर को उससे छीने, वह दौड़ती हाँफती अपने घर लौट आई थी और घऱ में आते ही, सबसे पहले उसने अपने कान और घर के दरवाजे दोनों ही बाहर की दुनिया के लिए बन्द कर लिए थे। छोटे से इन्दर से मलकीता जब भी लाड़ में आकर पूछता भैया किसका बेटा है तो चन्दा सा मुस्कराता इन्दर "बेबे का" कहकर चन्नी के आँचल में छुप जाता और तब मलकीते की आँख बचाकर चन्नी उसकी नज़र उतारती। उसकी लम्बी उमर की दुआ करती। हर मा की तरह उसने भी अपने इन्दर के लिए कई सपने देख रखे थे। उसका बेटा इन्दर आज खुद बाप क्या दादा तक बन चुका था।
 सामने वाले ठूँठ पर रँग-बरँगी चिङिया बैठी हुई थीं। चन्नी ने भी ठूँठ की लम्बी शाखों की तरह अपनी बाँहें फैला दीं। किरी और शैरेन दौड़कर उसकी पीठपर लद गईं। "यस दादी मा, पिगी राइड प्लीज़।" "दादी मा को सोने दो," हेलेन ने आवाज़ लगायी। लड़कियाँ चुपचाप सहमकर उतर गईं और सोने के लिए चली गईं। पर चन्नी की आंखों में आज नींद नहीं थी। बच्चों को अब न जाने कब, ठीक से नाश्ता मिले। चन्नी उठी और नीचे चौके में जाकर भीगे चने छौंक दिये। भटूरे सुबह गरम-गरम उतार देगी। भल्ले तो दुपहर में ही उसने बना लिए थे। 
 
धुली दूध सी चान्दनी में गहरे भूरे, काही रँग का ठूँठ बड़ा ही प्रभावशाली और रहस्यमय लग रहा था। तने पर आड़ी-तिरछी लकीरों के साथ, बीचोबीच दो बड़े गहरे भँवर, मानो सब देखती-समझती आँखें। मुस्कराते होंठ। चन्नी जानती थी, यह घर का ठूँठ खड़ा-खड़ा सब देखता-समझता रहा है। अपने कई परेशान क्षणों में चन्नी ने भी उससे बातें की हैं। उसे सुना और समझा है। 
 इन्दर के कमरे से गीता की आवाज आ रही थीं। जब भी वह परेशान होता है यही सब गाता-सुनता है। बरसों का यही सिलसिला है। 'सुख दु:खे समे कृत्वा लाभ-लाभौ जयोजया:' सुख दुख में, हार जीत में जो एक सा रहे --- चन्नी नहीं जानती, भगवान श्रीकृष्ण गीता में किसके गुणों का बखान कर रहे थे; किसी सन्त महात्मा के या उसके अपने सामने खड़े ठूँठ के। ठूँठ की पतली सूखी टहनियाँ घुँघराले बालों सी उलझी-उलझी खड़ी थीं और फैली लम्बी शाखायें बड़े आश्वासन के साथ सब कुछ समेटे और सम्भाले हुए। चन्नी को आज सबकुछ समझ में आ गया। जबतक काम खत्म हुआ, रात के दो बज चुके थे। सारी कि सारी चिड़ियायें ठूँठ पर से उड़कऱ जाने कहाँ चली गइं थीं।

"सुबह फिर खुद ही आ जायेंगी" चन्नी बुदबुदायी और परदा खींच दिया। ठूँठ का तो पता नहीं पर बरसों की थकी हारी चन्नी बिस्तर पर सर रखते ही आँखें मूँदकर सो गई।---


-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                                  शेष अशेष


                                                                                                                                                                 शैल अग्रवाल




भाग-14

उस दिन, बाबा के जाने के बाद भी उसी एक जगह पर, रात भर कम्प्यूटर की टेबल पर ही तो बैठी रह गई थी मनु। वहां से हिली तक नहीं थी वह। लिखना चाहती थी मनु, सिर्फ लिखना, जबतक मन का विध्वंसक क्रोध... लावे सा धधकता क्षोभ और बरसाती नदी-सा सारी सीमाएं तोड़ता मन में उमड़ता बाबा के प्रति आक्रोश, करुणा...प्यार, खुद उसकी अपने माथे की बेहद कमजोर दुखती-तड़कती नस, शब्दों में बिंधकर सफेद सपाट स्क्रीन पर किरच-किरच न बिखर जाए। पर क्या ऐसा संभव है? क्या मन में और इस कम्प्यूटर में...उसकी उंगलियों और थके मस्तिष्क में कोई तालमेल शेष भी है?  मनु जानती थी कि बढ़ती हर टिकटिक के साथ वह खुद को और अपने बाबा को एक अनकहे विध्वंस की तरफ धकेले जा रही थी। पर सारी बेचैनी और सारी व्यग्रता के बावजूद भी, जाने अनजाने हर प्रयास के बाद भी कुछ  थिर क्यों नहीं कर पा रहा था उसे! चित्रकार होती तो आज मन में उमड़ती परस्पर विरोधी लहरों के इस जहरीले फेनिल में दुनिया के सारे रंग उड़ेल देती और कैसे भी शांत कर लेती खुदको।और अगर ऐसा न भी कर पाती तो  भी  छुपा तो जरूर ही लेती खुद को खुद से ही... कमसे कम यूँ आत्महत्या न कर पाने की ग्लानि में तो न झटपटाती। गायक होती तो गा-गाकर ही मन की सारी बातें कह लेती या फिर कम-से-कम पागल ही हो पाती; जी भर-भरकर हंस और रो तो सकती थी ! कहीं कुछ अटपटा न लगता, कोई जान तक न पाता उसके मन में चल रहे इस विषम और त्रासद कुचक्र को। पर वह तो पूरे होशो-हवास में थी और वैसे भी यह  खुद उसकी अपनी लड़ाई थी... अपनों से थी। कैसे और कहाँ तक भागती, कहां  जाकर छुपती आखिर! सामने सफेद सपाट स्क्रीन पर टिक-टिक करते शब्द मन के सारे राज खोले जा रहे थे।



यह तो आत्म हत्या है...! मनु रुक गई। बाबा को कैसे मुंह दिखा पाएगी वह्...! आत्महत्या भी तो वक्त और हिम्मत मांगते हैं...क्या हैं दोनों मनु के पास आज ...वक्त और उससे भी ज्यादा बाबा को पूरी तरह से टूटा देखने की हिम्मत? कई बार जिन्दगी जीना तो छोड़ो, मरने तक की फुरसत नहीं देती हमें। मनु सचेत हो चुकी थी और अधलिखी स्क्रिप्ट को वैसे ही अधूरा छोड़कर उठ खड़ी हुई वह वहाँ से।        

जाने से पहले, मनु को बहुत सारी औपचारिकताएँ पूरी करनी थीं। कई घरेलू व्यवस्थाएँ करनी थीं। भागदौड़ में वह तो यह भी भूल गई थी कि कल तेरह तारीख़ है और तेरह तारीख़ और उसकी हवाई यात्राओं का एक अजीब-सा बेचैन और परेशान करने वाला इतिहास रहा है। इसके पहले कि वह कतार की फ्लाइट पकड़े, माँ और केसर दोनों के लिए ही पूरा इंतज़ाम करना था उसे, तभी बेफ़िक्र होकर कहीं जा पाएगी वह।

       माँ और जैनी, दोनों को ही घर ले आई थी मनु उसी रात। जैनी उसकी सहेली और जोनुस की बहन, जो हर आड़े वक्त में मनु का साथ देती आई है। अनुपस्थिति में भी कभी जोनुस की कमी नहीं महसूस होने दी है जेनी ने उसे। उसके सहारे माँ और केसर, दोनों को ही आराम से छोड़ सकेगी मनुश्री अब्राहम। निÏश्चत मनु अब पूरी तरह से आश्वस्स्त और तैयार थी अपनी इस आकस्मिक यात्रा के लिए।

 " हलो एयरपोर्ट ट्रैवेल्स एक टिकट कतार की कल शाम की। टिकट मैं वही काउंटर से ही उठा लूँगी।" 

दिन भर की भागदौड़ और तैयारी के बाद आखिर जहाज पर बैठ ही गई मनु। बादलों के कालीन पर जहाज उड़ा चला जा रहा था और नीचे भूरी मटमैली वादियाँ नए नए नक्शे बना और बिगाड़ रही थीं। अचानक ही रात आई और तस्बीर से मचलते उस बिस्तार को अंधेरे की चादर उढ़ाकर सुला दिया। मनु ने भी जहाज की खिड़की बन्द कर ली और सोने की तैयारी में कंबल को गरदन तक खींच लिया पर नींद को भी तो घर परिवार की तरह ही बहुत पीछे छोड़ आई थी मनु आज़। कुछ समय के लिए सभी कुछ तो पीछे छूटा जा रहा था--- माँ, बाबा, केसर जोनुस--- घर, परेशानी और अनगिनित मुँह फाड़े खड़ीं उसकी दैनिक ज़िम्मेदारियाँ, सभी कुछ। धरती के अभागों की बड़ी बड़ी समस्याएँ सुलझाने जा रही थी वह और जब ऐसी ज़टिल समस्याएँ सुलझानी हों तो छोटी-छोटी व्यक्तिगत और पारिवारिक समस्याओं को तो भूलना ही पड़ता है? मनु को आस पास बैठा हर व्यक्ति बेहद संपन्न और संतुष्ट लगरहा था, मानो सारे दुख-दर्द दुनिया के कुछ खास हिस्सों के लिए ही सहेज़कर रख रखे थे उस ऊपर वाले ने।

      दौड़ते जहाज में अब यूँ आराम से बैठकर ठंडा औरेंज जूस पीना और सहयात्रियों को देखना व पढ़ना सुख दे रहा था मनु को। जबसे वह रेशमा के संगठन से जुड़ी व सक्रिय हुई है, आदत सी पड़गई है मनु को इन अनगिनित विमान यात्राओं की। आए दिन ही, चन्द घंटों की सूचना पर ही, कभी कहीं तो कभी कहीं... पैलेस्ताइन, मिश्र इजराइल, अफगानिस्तान, कम्बोडिया, कश्मीर--- किसी भी लड़ाई से तार तार टूटे बिखरे देश में पहुँच जाती है मनु... सान्त्वना और सहायता देती, उनके टूटे घरों और बिखरे अधिकारों की माँगें करती। कई अभागे और अनाथ बच्चों को जिन्होंने लड़ाई में पूरे-के-पूरे परिवार खो दिए हैं, जिन्दगी की नई शुरुवात, प्यार परिवार और शिक्षा दी है उसकी संस्था ने। एकबार फिर से खुद में आत्म-विश्वास देकर पुन: जीने के काबिल बनाया है उन अनाथों को ।

       परन्तु कितनी अजीब है यह ज़िंदगी और इसकी अज़गर सी फैली समस्याएँ, कभी इनके आगे आदमी कमज़ोर और असहाय लगता है तो कभी सबको गोद में लिए बैठी धरती माँ का तार तार होता आँचल ही। साथ-साथ कभी-कभी ऐसा भी तो होता है कि बड़ी से बड़ी परेशानी भी थोड़े से ही प्रयास के साथ चुटकियों में सुलझ जाती है। रेशमा से मनु की मुलाकात भी तो बस एक ऐसा ही इत्तिफाक थी।

       जोनुस के साथ ही गई थी वह शर्ली में बसे उन पादरी दम्पति एडम और मैरी के घर पर, वह भी ऐसे ही, बस चन्द घंटों की सूचना पर ही।

        " इजराइल और पैलेस्ताइन से मिलकर कुछ लोग आए हैं और साथ साथ मिलकर शान्ति के लिए काम कर रहे हैं। बहुत कुछ खोया है इन परिवारों ने और अब अपने आंसू पोंछकर वे साथ-साथ दुनिया को अपनी-अपनी कहानी सुनाने निकले हैं। शायद कहीं कोई समर्थ सुन ही ले, समझ ही ले, इन्हे भी और इनके दुख-दर्द को भी। शायद कोई मदद हो ही जाए इनकी और अस्तित्व की लड़ाई लड़ते इनके देश की-- यह अमानवीय लड़ाई, यह खून खराबा कितना निरर्थक है पता तो चलना ही चाहिए ना इन समृद्ध और सशक्त देशों को भी? ज्यादा कुछ नही, तो कुछ आर्थिक सहायता ही कर सकते हैं हमलोग। चन्दे  वगैरह में कुछ पैसे ही जमा कर लेगें –बोलो मनु, क्या तुम भी आना चाहोगी मेरे साथ?" जोनुस ने पूछा कम और आग्रह अधिक किया था मनु से।

       अजीब सा माहौल था वहाँ उस शाम। धीमी जलती मोमबत्तियों की रौशनी में बैठे हर व्यक्ति के चेहरे पर मौत और ग्लानि, मानो खुद ही आ कर छप गयी थीं। पहले तमारा ने अपनी कहानी सुनाई। तमारा तेलबीब में रहती थी और अपने बीस साल के बेटे को नृशंष लड़ाई में खो चुकी थी। अब वह इस मार-काट का अन्त चाहती थी क्योंकि उसने अपने दुख में हर उस माँ का दुख देख लिया था जिसने अपने जवान बेटे को खोया है। कोई फर्क नही पड़ता कि किस देश, किस धर्म और किस जाति का है कोई और किससे लड़ रहा है! कोई हल नही निकलता इन लडाईयों से सिवाय आंसू और अर्थहीन विध्वंस के। दोस्त या दुश्मन--- यह भेदभाव भी तो राजनीतिज्ञों ने ही तय किए हैं आम आदमी तो बस यूँ ही बीच में पिसता है… कथित धर्म युद्ध में जान गँवाने के लिए ---बिना जाने या पहचाने, कि यह लड़ाई जो वह लड़ रहा है कितनी" होली" या "अनहोली" है? पैलेस्ताइन से आए अली का नुकसान भी तमारा से कुछ कम नही था। अपने दो बड़े जवान भाइयों को खोया था उसने इस जिहाद में---जिहाद जो अब अबोधों के खून से लथपथ और निरर्थक थी उसके लिए। दोनों ही तरफ के लोग अपनों को खो रहे थे। आखिर कौन जीत रहा है इस नफरत और जिल्लत में?" शब्दों में उमड़ते दर्द को समेटना जब असंभव हो गया तो मनु से नही रहागया और दर्द से कटती वह बोल पड़ी,' क्यों नही हम सब माँ बहन पत्नियाँ लड़ाई का पूर्ण बहिष्कर कर दें और रोक लें अपने अपने पति, भाई और बेटों को सेना में जाने से, ये खूनी लड़ाइयाँ लड़ने से!''

       तमारा के चेहरे पर अब एक और उदास व्यंगात्मक मुस्कुराहट थी, ''हाँ किया था,यह भी किया था कुछ परिवारों ने हमारे इजराइल में और नतीजा यह था कि पाँचसौ से भी अधिक लोग एक हफ्ते के अन्दर ही जेल में डाल दिए गए थे। ''

       और तब बगल में बेहद उद्वेलित खड़ी सुधा ने कहा था, आओ हम सब मिलकर शान्ति पाठ करें---हाँ हाँ क्यों नही जमीला ने तुरंत ही उसका साथ दिया। सामूहिक प्रार्थना का असर कम नही होता, सबकी परेशान और असमर्थ आंखों में पूरी सहमति थी। उसके बाद तो हाथ में हाथ पकड़े एक गोल घेरे में बैठकर कितनी प्रार्थनाएँ की गईं मनु को याद भी नही, हाँ इतना जरूर याद है कि उपस्थित हर औरत ने अपना अपना बटुआ उलट दिया था मदद के लिए बिना गिने या जाने कि कितने पैसे हैं उसके अन्दर।

       परन्तु मनु का मन नही भर पा रहा था बस चन्द पैसों का दान करके। कुछ और ठोस व सकारात्मक करना चाहती थी वह। और तब उसने और रेशमा ने मिलकर अगले दिन ही सात आठ लोगों को दुपहर के खाने पर बुलाया था अपने घर पर। एक ऐसी संस्था की योजना बनाई गयी, जहाँ कुछ जरूरतमंद अनाथ और घायल बच्चों का इलाज भी करवाया जा सके और उन्हे रखा भी जा सके--एक घर परिवार जैसा माहौल दिया जा सके। और आज उसी शाम का नतीजा था कि पैलेस्तीन इजराइल मिश्र और भारत, को मिलाकर पाँच अनाथालय में सैकड़ों बच्चे पल बढ़ रहे थे। अभी संतुष्ट यादों की उजास मनु के चेहरे पर पूरी तरह से फैल तक नही पाई थी कि लगातार खड़-खड़ की आवाज़ के साथ जहाज ने दो ग़ोते लगाए और सुरक्षा पट्टी बाँधने का वह नियौन साइन बेतहाशा अपने आप में ही जलने बुझने लगा। मनु ने भी घबराकर अन्य यात्रियों की तरह ही, स्वयं को सुरक्षा पेटी से कस लिया।

       ' मैं आपका कैप्टेन बोल रहा हूँ। आप घबराएँ नहीं। उड़ान और जहाज, दोनों ही पूरी तरह से हमारे नियंत्रण में हैं। अचानक जहाज के दो इंजन एक साथ बंद हो गए हैं और अब हमें इस आपद कालीन स्थिति में निकटवर्ती साउदी अरब के देहरान एयर पोर्ट पर ही उतरना होगा। हमें मालूम है कि यह हमारे गंतव्य में नहीं था पर हमारे पास कोई और विकल्प नहीं है। यही देश इस समय हमारे सबसे अधिक नज़दीक और हमारी पहुँच में है। अगले पाँच मिनट में हम भरी हुई पेट्रोल की टंकियों को, बस ज़रूरत भर का पेट्रोल रखकर, ख़ाली कर देंगे और भगवान ने चाहा तो सुरक्षित हवाई अड्डे पर उतर पाएँगे।'

       दुर्भाग्य पूर्ण इस ख़बर को सुनते ही पूरे कैबिन में भय का सन्नाटा छा गया और सभी ज़मीन पर उतरने का बेसब्ररी-से इंतज़ार करने लगे, मन ही मन नमाज , हनुमान चालीसा, ग्रन्थ साहब जिसे जो आता था दोहराते और रटते। अब किसी को भी कोई परवाह नहीं थी कि एयरपोर्ट कौन सा था या किस देश का था और कितनी देर वहां रुकना होगा।

       ज़मीन पर पैर रखते ही मनु को लगा कि वह इतिहास के पन्ने पलटकर पाँच सौ साल पीछे चली गई है।  सिन्दूरी और धूलभरा वह आकाश चित्रमय और नाटकीय था और वातावरण में भी एक बेचैन और ठहरी गंध व घुटन थी।  वेशभूषा, रहन-सहन हर चीज़ में चारों तरफ़ एक आभास था अजनबी पन का। वहाँ काम करते कर्मचारी और औरतों के चेहरे तक पर एक परत थी भय और असुरक्षा की। ' आप चाहें तो इस सदमे से उबरने के लिए स्थानीय हौलीडे इन में आराम कर सकते हैं और सुबह की उड़ान ले सकते हैं।'

       सदमे के धक्के को बर्दाश्त लायक बनाने के लिए बार बार यही एक सूचना दी जा रही थी उन्हें। संतरे के रस और कोक भरे गिलासों के साथ-साथ हर व्यक्ति को फूलों का गुलदस्ता भी दिया जा रहा था। सभी यात्रियों के लिए चार तारा होटल में अगली उड़ान तक रुकने की व्यवस्था कर दी गई थीं। यही नहीं जहाज के सुरक्षित उतर आने की खुशी में पंक्ति बद्ध खड़े अधिकारी तालियों की गड़गड़ाहट के साथ जोरदार स्वागत कर रहे थे एक एक यात्री का, मानो वे किसी कठिन अभियान या मौत के मुँह से वापस लौटे थे। अब चारो तरफ़ एक तफ़रीह का आलम था। लोग हँस-हँसकर खा-पी रहे थे और अपनी अपनी विभिन्न हवाई यात्राओं की अनहोनी घटनाएँ और आपबीती सहयात्रियों को चुसकी ले-लेकर सुना रहे थे।

       पर मनु को तो आज शाम को ही रेशमा और उन अनगिनित माँओ से मिलना था जो इंतज़ार कर रही थीं उसका कतार में---क्या पता इस मुलाक़ात का, आंदोलन का कब और क्या उचित परिणाम हो --बूँद बूँद जुड़कर ही तो नदी बन पाती है ? मनु अपने उद्देश्यों के प्रति बेहद उत्साहित थी।

       मनु ने जहाज से उतरते ही पता लगा लिया था कि अगले बीस मिनट में ही एक उड़ान कतार के लिए

तैयार खड़ी थी और मनु यह भी जानती थी कि यही उड़ान उसकी उड़ान है जो उसे शीघ्र ही अपने गंतव्य तक पहुँचा देगी। बग़ल में खड़े सुरक्षा अधिकारी ने उसका पासपोर्ट चैक करके न सिर्फ़ उसे वापस पकड़ा दिया था वरन एक अधिकारी को भी उसके साथ भेज दिया था, जो कि न सिर्फ़ अब उसके साथ चल रहा था अपितु बार बार उससे यह भी पूछे जा रहा था कि मैडम को कतार जाना है न फ्लाइट नं. 121 से---अब तो मनु भी नहीं भूल सकती उस उड़ान को।

बारबार पूछता और समझता, वह सुरक्षा अधिकारी की वर्दी में लैस आदमी, अंदर जहाज की सीट तक बिठलाकर ही लौटा था मनु को। जहाज पूरी तरह से खचाखच भरा हुआ था उन सफ़ेद काले पठान सूट पहने मर्दों से, परंतु पूरे जहाज में दूर तक अपने अलावा एक भी और औरत नज़र नहीं आ रही थी मनु को। अजीब उड़ान है यह? मनु ने एक गहरी साँस ली और अपने शक और भय को बटुए की तरह ही गोदी में समेटकर बैठ गई वह, उन दो पसीने और गुलाब के इत्र में नहाए अनजानों के बीच सिकुड़ती सिमटती-सी--- एक वह जो मनचली नज़रों से मनु को घूरे जा रहा था और दूसरा वह जो हर लफ़ंगे से मनु की सुरक्षा का ज़िम्मा अपने सिकुड़े कंधों पर ओढ़े खुदको उसका संरक्षक घोषित कर चुका था। दोनों को ही भुलाकर मनु ने पर्स से कई बार पढ़ी पत्रिका निकाली और एकबार फिरसे पढ़ने की नाकाम कोशिश करने लगी-- पढ़ पाएगी या नहीं यह सब तो बाद में समझेगी, अभी तो बस राहत चाहिए थी उसे इस सदमे से। यह कैसे संभव है कि इस उड़ान में बस एक ही तरह के --संभवतः: एक ही धर्म के सारे मर्द ही मर्द हैं? खूँख़ार गिद्ध जैसी आँखों से बचने के लिए पत्रिका के पीछे छुपी मनु बारबार न चाहकर भी, इसी उधेड़बुन में उलझकर बेबस-सी हो गई थी।

  "फ्लाइट एस वी 121 पर आपका स्वागत हैं।" गुड़िया सी सजी एयर होस्टेस ही सही, दूसरी महिला को देखकर मनु की आँखों की खोई चमक वापस आ गई।

"हम आज पैंतीस हज़ार फ़िट की ऊँचाई पर उड़ेंगे और अगले चार घंटे में इस्लामाबाद पहुँच जाएँगे।" बिजली के करेंट जैसे झटके से मनु उड़ते  जहाज में ही खड़ी हो गई, "रोको, रोको--- तुरंत रोको। मुझे पाकिस्तान नहीं जाना है। मैं ग़लत जहाज में हूँ। मुझे कतार जाना है, इस्लामाबाद नहीं।"...

एयर होस्टेस दौड़ी-दौड़ी मनु तक आई और उसे वापस सीट पर बिठला गई। पता नहीं किसी कि साज़िश थी या महज़ एक गलती, जहाज तुरंत ही मुड़ा और वापस उसी रन वे पर उतर आया जहाँ से अभी-अभी कुछ देर पहले उड़ा था। उतरते ही अब मनु परेशान थी कि क्या पता कतार जाती वह उड़ान अभी भी रन वे पर है भी या उसे पहुँचने में देर हो गई--- और उसका सामान--- सोचते ही आशंका से काँप उठी वह---कहीं तैयार की हुई प्रस्तुति और बैग दोनों ही लेकर उड़ान इस्लामाबाद तो नहीं जा पहुँची? हज़ारों पूछताछ और टेलिफ़ोन के बाद भी अब कुछ संभव था या नहीं, मनु नहीं जानती थी? क्या औरतों को हमेशा एक मज़ाक ---एक खेल का सामान और उनके उद्देश्यों को हमेशा निरर्थक ही समझा जाता रहेगा इन देशों के पुरुष प्रधान समाज़ में--- कितनी बार नहीं पूछा था उस औफिसर ने कि कहाँ जा रही है वह ? निराशा से अपाहिज मनु अब आगे कुछ और सोचने या समझने में असमर्थ हो चली थी और निढाल एयरपोर्ट पर बैठी 'अब आगे क्या होगा ', का इंतज़ार करने लगी। अब तो कोई अलौकिक शक्ति ही उसे इस आपदा से उबार सकती थी। 

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                             दो लघु कथाएँ


                                                                                                                                          आरती झा,  शैल अग्रवाल

प्यार

झील के शान्त नीले जल को देखना अच्छा लग रहा था। चप्पू की आवाज सुरीली थी। बोटवाला लड़का  इक्कीस-बाइस साल का होगा। गहरी  भूरी  आंखें कुछ ढूँढती हुई-सी।                                                                                                                                                             

" क्या करते हो बोट चलाने के अलावा ? " मैने पूछा।                                                                                                                                                         

" पढ़ाई! कामर्स पढ़ रहा हूँ। यह पार्ट टाइम जॉब है मेरा। अभी पीक सीजन है न! टूरिस्टों की भीड़ रहती है, सो अपनी अच्छी कमाई हो जाती है। "                                                                


"बोट क्या तुम्हारी अपनी है ? "                                                                                                


"नहीं ! मालिक की है। अपनी कहाँ से ? " थोड़ी देर चुप वह कुछ सोचता रहा फिर बोला, " लकड़ी महँगी आती है बोट की....तीस-चालीस हजार रुपये पड़ जाते हैं एक अच्छी और मजबूत बोट बनाने में। "                                                                                                                                                                         

" आप यह पहाड़ी देख रही हैं न...यह स्यूसाइडल प्वाइंट है।"                                                                                         
उसकी बात सुन मेरा सर चकरा गया। " क्या ? क्या कहा ? " मैने घोर आश्चर्य के साथ उसे गहरी नजरों से देखा।                                                                       


" हाँ, सच ! वहाँ से लोग कूदकर जान दे देते हैं। अभी कल की ही बात है...एक लड़की वहाँ से कूदकर मर गयी। साथ में लड़का भी कूदनेवाला था, मगर कूद नहीं पाया...अब भी जेल में बन्द है।" उसके चेहरे पर उदासी छा गयी। किसी दूसरी दुनिया में वह खो-सा गया। मैं कुछ कहना चाहती थी कि तभी जैसे किसी स्वप्न से जागकर वह बोलने लगा, " बड़ा प्यार करता था लड़की से...साथ-साथ जीने-मरने की कसमें खाया करता था। मगर जाने क्यों हिम्मत नहीं कर पाया कूदने की। "                                                                                                                                                              


मैने कुरेदा, " क्या कहना चाहते हो, प्यार में कमी थी उसके ? प्यार क्या है तुम्हारी नजर में ? "                             


उसकी गहरी भूरी आँखें बिल्कुल स्थिर थीं, झील की तरह। मानो बिना कुछ कहे बहुत कुछ बताना चाह रहा हो।   उसने मेरी बात अनसुनी करते हुए कहा, " उधर देखिए ...कुछ दिखाता हूँ आपको मैं...।" 


झील की दूसरी तरफ मंदिर था । पूरा तो नहीं, बस एक हिस्सा दिखाई दे रहा था।


" कैसे देखूँ?  हलचल हो रही है। चप्पू से... पानी बिखर रहा है।"                                                                                                                                                                                           


"ठहरिए ! चप्पू चलाना बन्द करता हूँ। अब देखिए...दिखा ?"


"हां! कुछ हिस्सा दिख तो रहा है , धुंधला-सा। " मैने कहा।                   


 वह बोला, "ऐसा ही है प्यार भी। हलचलों के बीच स्थिर-सी कोई चीज... कुछ देखा और बहुत कुछ अनदेखा। "


                                                                                              -आरती झा








***




                                                                                                                                                       








व्रत

व्रत की तैयारियां बहुत जोर-शोर से चल रही थीं। मीना ने पूरा खाना बहुत मन से बनाया था। मालिक-मालकिन का  व्यवहार और एक दूसरे के प्रति प्यार और सत्कार उसके मन को भी दिनरात एक अनोखी शांति और पुलक से भरे रहता। बहुत ही धर्मनिष्ठ और धर्म-कर्म में पूरा विश्वास करने वाली थी मीना। एक अच्छे पति, भरी-पूरी गृहस्थी के सपने देखने वाली औसत लड़की। शादी की पहली साल ही मां ने बताया कि पति की लम्बी आयु और सात जन्मों के साथ के लिए  सुहागिन इस व्रत को रखती हैं और मां के कहने पर उसने भी तो बेहद नियम और श्रद्धा से व्रत रखा भी।                                                                                                                                  यहां मालकिन ही नहीं, मालिक भी तो मालकिन के लिए करवा चौथ का व्रत करते हैं। उसने दो पूजा की थालियां पूरे मनोयोग से तैयार कर दीं।


"दीदी आपकी पूजा और सरगी की सब तैयारी कर दी है। कल करवा चौथ है न!  !"


" हां। तुम भी तो करोगी  ना, व्रत ?  तुम्हारी थाली कहां है ?  "


" नहीं। इस बार से नहीं। " एक फीकी हंसी के साथ उसने बताया।


" क्यों, ऐसी क्या बात हो गई .... ऐसा कैसे कर सकती हो तुम ? " मालकिन पूछे बिना न रह सकीं। 


" आप ही बताओ,  इस पति को अगले सात जनम तक  क्यों लेना चाहूंगी  मैं, भला? रवैया या व्यवहार; किसी में तो फरक नहीं आया, शादी के दस साल बाद भी! घर परिवार, मेरा, किसीका ध्य़ान नहीं। काम का न काज का, ढाई मन अनाज का ! "


नम आंखों को पल्लू से छुपा, मालकिन को पूरी तरह से चौंकाते हुए, आखिर उसने  अपना जबाव  दे ही दिया।  


                                                                                                                                  -शैल अग्रवाल

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                           मुद्दा





                                                                                                                                                  

                                                                                                                                                दिनेश ध्यानी


पानी बिन प्यासे लोग


देश के अधिकांश भागों में गर्मी बढ़ते ही पेयजल की गंभीर स्थिति से लोगों को दो चार होना पड़ता है। लेकिन यदि गंगा यमुना सहित दर्जनों छोटी-बड़ी नदियों का मायका उत्तराखण्ड में पेयजल के लिए लोगों को दर-दर भटकना पड़े तो हालात किस कदर खराब हैं और आने वाले दिनों में क्या स्थिति होगी इसका आकलन करके रूह कांप जाती है। आज सब कह रहे हैं कि पानी बचाओं लेकिन इस स्थिति की गंभीरता को न तो हमारी सरकारें समझ पा रही हैं और न हम।  कारण जहां से देश के लिए नीतियां और नियम बनते हैं वहां अभी हमें काम चलाने के लिए पानी आसानी से मुहैया हो रहा है। अन्यथा किसी को अगर सूखे और पानी की कमी का आकलन करना है तो बुन्देलखण्ड से होते हुए पौड़ी गढ़वाल कि विकास खण्ड नैनीड़ांड़ा के हल्दूखाल, नैनीड़ांड़ा जाकर हालात का जायजा लिया जा सकात है। उत्तरराखण्ड में हालात इस कदर खराब हैं कि जनता को धरने-प्रदर्शन करने के बावजूद भी पेयजल मुहैया नही हो पा रहा है। कई गांवों में तो दसियों किलोमीटर से टैंकरो द्वारा पीने का पानी मंगाया जा रहा है। ग्रामीण सुबह से शाम तक पानी के लिए पंधेरों-नौलों पर लाईन लगाये देखे जा सकते हैं लेकिन फिर भी गला तर करने की हसरत पूरी नही हो पा रही है। पारा बढ़ने के साथ ही हालात और खराब होने के पूरे आसार हैं। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में पहाड़ में पानी की भयंकर कमी हो जायेगी। इसके मूल में ग्लोबल वार्मिंग तथा धरती के तापमान में बढ़त तो जिम्मेदार है ही स्थानीय निवसियों द्वारा जंगलों का नाश करना तथा सरकारों की गलत नीतियां भी इस स्थिति के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं। हालात इस कदर खराब हैं कि नैनीड़ांड़ा विकास खण्ड के अपोला गांव में लोगों को अपने ही गांव में पानी की किल्लत के मारे धरने पर बैठना पड़ा। यहां दीबाड़ांड़ा से एक पेयजल योजना रवणा रौल से आयी है जिससे लगभग पन्द्रह बीस स्थानीय गांव लाभान्वित होते हैं। अपोला मंगरों इस योजना के दूसरे छोर पर हैं लगभग पन्दह बीस किलोमीटर लम्बी इस योजना का रखरखाव ठीक से नही हो पा रहा है तथा स्थानीय जनता मेने लाईन से अवैध कनैक्शन लेकर आगे वाले गांवों के लिए दिक्क्त पैदा कर देते हैं। अपोल गांव का अपना परम्परागत पानी का श्र्रोत है लेकिन धीरे-धीरे यह सूखने लगा है। हालात यह है कि लोगों को बूंद-बूंद पानी के लिए तरसना पड़ रहा है। पाईप लाईन से यहां तीन साल से पानी आना बन्द हो गया है अभी तक गांव वाले जैसे तैसे काम चला रहे थे लेकिन अब समस्या विकट होने के कारण लोगों को धरना प्रदर्शन करने को मजबूर होना पड़ रहा है। यही हाल पोखार  लोल्यूंड़ांडा के गांवों की है यहां भी रेवा से पानी लाया गया है लेकिन अक्सर लाईन टूटने के कारण ग्रामीणों को परेशानी होती है। पौड़ी जिले के पोखड़ा प्रखण्ड में भी गंभीर पेयजल का संकट बरकरार है। यही हाल अल्मोड़ा तथा नैनी ताल के कई इलाकों का है। कुल मिलाकर समूचे उत्तराखण्ड में पेयजल समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है। हालात कभी भी काबू से बाहर हो सकते हैं। वीरोंखाल विकासखण्ड के कांड़ा, सैंधार तथा कदोला आदि गांवों में भी हालात काबू से बाहर हैं लोगों को रात रात भर जागकर पानी की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। जिला मुख्यालय पौड़ी की पेयजल समस्या तो दशकों से जस की तस है लेकिन अभी तक कोई कारगार योजना तैयार नही हुई जो इस प्यासे शहर को दो बूंद पानी पिला सके। कोटद्वार हो या रामनगर, सतपुली हो या रिखणीखाल सभी जगह पेयजल संकट से दो चार होते लोगों को देखा जा सकता है।
यों तो समूचे देश तथा पूरी दुनियां में पीने के पानी की किल्लत शिद्दत से महसूस की जा रही है लेकिन जिस धरा से नदियों का उद्गम होता हो और जहां वरसात में असंख्य नदी नाले पूरे उफान पर होते हैं वहां पेयजल का इस कदर संकट कि लोग पानी के लिए सड़कों पर उतर आयें तथा पूरा दिन पानी ढोने में ही खप जाये। इससे ज्ञात होता है कि कहीं न कहीं गंभीर चूक हुई है। उसी का खामियाजा आज भयंकर जल संकट के रूप में सामने है। किसी ने कहा भी है कि आने वाले समय में यदि दुनियां की सभ्यताओं में युद्ध होगा तो वह पानी के लिए होगा। भारत में अभी से इसे समझा जा सकता है। आज भारत की नदियों के पानी को बोतलों में बन्द करके वर्गवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है। जिसके पास पैसा है उसे तथाकथित मिनरल वाटर आसानी से मिल रहा है और गरीब आदमी अपनी प्यास बुझाने की हसरत पाले भटक रहा है। आने वाले दिनों के लिए यह बात संकेत करती है कि जिसके पास पैसा और पावर होगी वह तो विदशों से भी पानी मंगाकर पी सकता है लेकिन आम आदमी का क्या होगा? इस बात की किसी को फिकर नही है। आम आदमी के हकों को तभी कायम रखा जा सकता है जब देश में जो जलश्र्रोत हैं उनका संरक्षण तथा देखभाल अच्छी तरह से की जाय। हमारे देश में पानी की उतनी कमी नही है जितना इसके संरक्षण तथा वितरण में खामियां हैं। इसके दोषी सरकारें कम और यहां के लोग अधिक हैं।    
उत्तराखण्ड सहित देश में हालात बेकाबू होने के पीछे कई कारक हैं जिसमें सरकार तथा वन विभाग के नुमाइंदों अदूरदर्शिता व स्थानीय ग्रामीणों की नासमझी तथा निजी स्वार्थों के कारण जंगलों का बिनाश करना आदि हैं यही कारण है कि जल श्रोत सूख गये हैं। पहली बात यहां के ग्रामीणों ने जंगलों का इस कदर विनाश कर दिया है कि जंगलों में हरियाली की जगह झाड़-फंूस ही बची है। लोग अपनी दैनिक जरूरतों के लिए हरे पेड़ों को बेरहमी से काटते है, घास, जलाने के लिए तथा दैनिक कृर्षि कार्य आदि के लिए स्थानीय किसान जंगलों पर पूरी तरह से निर्भर हैं। लोगों में इतनी जागरूकता नही है कि जिन जंगलों को हम बेरहमी से काट रहे हैं उनके बिना हमारा जीवन नही चल सकता है। रहभी वन विभाग पहाड़ों में हरियाली के नाम पर यूकेलिप्टिस, सफेदा तथा चीड़ के पेड़ों को बढ़ावा दे रहे हैं जो कि धरती से पानी सोख लेते हैं तथा अपने नीचे न तो पानी सिंचित करते हैं और न अपने नीचे किसी अन्य वनस्पतियों को उगने देते हैं। पहाड़ में जहां बॉंज तथा बुरांश के जंगल हैं वहां का वातावरण सुहावना तथा वहां बाराहोंमास पानी की कमी नही होती है। लेकिन बांज बुरांश की पौध तैयार करना उतना आसान नही जितनी आसानी से चीड़ तथा सफेदा की पौध उगाई जा सकती है। इनका संचयन तथा रोपण भी सस्ता तथा आसान होता है इसलिए सरकारी स्तर पर बॉंज-बुरांश को तिलांजलि दे दी गई है। जहां भी देखें पूरे पहाड़ में चीड़ के जंगल हैं जोकि धरती को सूखा करते हैं तथा जंगलों में आग लगने का मुख्य कारण होता है। आजकल पहाड़ में जंगल आग की चपेट में हैं पहले भी यहां जंगलों में आग लगती थी लेकिन इतनी भंयकर आग पहले नही लगती थी। यह सब चीड़ के कारण हो रहा है। आये दिन पहाड़ में जंगल भयंकार आग में स्वाहा हो रहे हैं। इस साल भी गढ़वाल-कुमॉंउ की तमाम जंगल आग की भेंट चढ़ चुके हैं। कहीं-कहीं तो यह आग स्थानीय लोगों द्वारा भी लगाई जाती है। कारण जंगलों में आग लगाने से बरसात में घास अच्छी होती है इसलिए घास के लालच में लोग पूरे जंगलों को आग के हवाले कर देते हैं। जंगलों में बीड़ी-सिगरेट आदि पीने के बाद माचिस बीड़ी को जंगलों में ही छोड़ देने के कारण आग लग जाती है। इसलिए वन विभाग को वनों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तमाम तरह के उपाय करने चाहिए।
पीने के पानी के लिए आग भी कम जिम्मेदार नही है। इससे भी धरती का जल सूख रहा है। तीसरी बात जो मुख्य है यहां सड़को का अव्यवस्थित जाल जो फैलाया जा रहा है उसमें यह नही देखा जाता कि गांवों के प्राकृतिक जलश्रोतों पर इसका क्या असर पड़ेगा। फलत: सड़क बनने से गॉंवों के पेयजल श्र्रोत सूख जाते हैं। पहाड़ में जल संचयन की भी व्यवस्था नही है। इसलिए अच्छी बरसात होने के बावजूद पूरा का पूरा पानी नदियों के माध्यम से बह जाता है। गॉंवों में अब पारम्परिक रास्तों की जगह सीमेंट के खंड़जें बन गये हैं जिनसे पानी सीधे बह जाता है। इसलिए खेतों-खलिहानों में पानी जमा नही हो पाता है। एक अहम पहलू यह भी है कि जिन गांवों में नलों द्वारा पेयजल पहुॅंचाया जा रहा है उनमें से अधिकांश गांवों ने अपने परम्परागत पेयजल स्रोतों को लावारिश छोड़ दिया है जिस कारण धरती का जल स्तर कम हो गया है तथा परम्परागत पेयजल श्र्रोत समय के साथ-साथ बिलुप्त हो गये हैं। भारतीय संस्कृति में प्रत्येक चीज का महत्व है इसीलिए पानी का महत्व भी कुछ कम नही है। जल ही जीवन है यह यों ही नही कहा गया है। हमारे गॉंवो में पानी के स्रोत का पूजन देवता के समान किया जाता है। गांव में जब दुल्हर अपने ससुराल आती है तो उसके पहले दिन की शुरूआत पानी भेंट से होती है। नई नवेली दुल्हन अपने ससुराल में पंधेरे में पूजा करने जाती है और वहां देवता के समान पानी को पूजती है। पुराने लोगों ने पानी की महत्ता को ध्यानी में रखते हुए यह रिवाज शुरू किया होगा लेकिन आज यह मात्र एक औपचारिकता रह गया है इसके मूल में जो गूढ़ अर्थ छुपा है उसे लोग भूल गये हैं। असल में जल ही जीवन है की उक्त को ध्यान में रखते हुए नई दुल्हन को यह अहसास दिलाया जाता है कि पानी जीवन के लिए महत्वपूर्ण है इसलिए आज से तुम इस गांव में अपने परिवार में पानी का कभी निरादर नही करोगी। इसीलिए पानी की देवतुल्य पूजा की जाती रही है।
वर्तमान में पहाड़ में वर्षा जल संचयन तथा नदियों के बहाव को एकत्र कर पानी को धरती के अन्दर जाने का मार्ग प्रशस्त करना हेागा तभी धरती का जल स्तर बढ़ेगा। दूसरी बात पहाड़ में बांज-बुरांश प्रजाति के पेड़ अधिक से अधिक लगायें जायें ताकि धरती में नमी तथा सघन वनस्पतियों को उपजाने का मार्ग प्रशस्त हो सके। सरकार तथा गांवों के स्तर पर पानी तथा जंगलों की महत्ता को ध्यान में रखते हुए कार्य किये जाने चाहिए। यदि हम आज भी नही चेते तो आने वाले समय में पहाड़ में पानी के झरने तथा नदियां जनश्रुतियों की चीजें बनकर रह जायेंगी।

आज आवश्यकता है जल, जंगल तथा जमीन की सुरक्षा तथा पर्यावरण संरक्षण की ताकि हम आराम से अपना जीवन यापन कर सकें तथा आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ जल तथा सुन्दर पर्यावरण दिया जा सके। पानी की उपयोगिता के आधार पर नई-नई योजनायें बनाने की आवश्यता है तथा गांव-गांव में पानी को जमा करके दैनिक कार्यों के लिए जल का संचयन किया जाना चाहिए। इससे एक तो लोगों की जरूरते पूरी होंगी तथा दूसरे धरती में जल का भण्डारण करने में भी मदद मिलेगी। देखने में आ रहा है कि दिनों दिन पहाड़ में पानी की समस्या विकाराल रूप धारण करती जा रही है यदि हमारी उदासीनता इसी प्रकार रही तो आने वाले दिनों में हमें बूंद-बूंद पानी के लिए तरसना होगा और तब हमारे पास प्रयाश्चित करने का समय भी नही रहेगा। इसलिए अभी समय है कि हम अपने सूखते जल स्रोतो का संरक्षण करें तथा धरती के पर्यावरण को अपने अनुकूल बनाने के लिए वनों के संरक्षण की ओर भी ध्यान दें। 


-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                                 हास्य-व्यंग्य


                                                                                                                                                         -   नरेन्द्र कोहली


केरल के वन

वन में कुछ असाधारण गतिविधि थी।
                                                                                                                                                                                    संदेह हुआ तो छापा मारना ही था। पुलिस ने छापा मारा और उन्हें पकड़ लिया। उनके पास गोला-बारूद भी था और बंदूकें, पिस्तौलें भी। तैयार बम भी थे और बम बनाने की सामग्री भी।
 ''यह क्या है?'' पुलिस ने पूछा, ''हत्या करने का इरादा है या क्रांति करने का।''  


''नहीं। न हत्या न क्रांति। मैं तो पाठशाला चला रहा हूं। अध्यापन में कोई अपराध है क्या?'' उनके मास्टर जी ने कहा।  


''पाठशाला चला रहे हो तो गांव-देहात में चलाओ। नगर में चलाओ। तिरुवनन्तपुरम में चलाओ।'' पुलिस ने कहा, ''यहां वन में क्या कर रहे हो ?''


 ''गांव-देहात में लड़कों को बम फोड़ना सिखाऊंगा तो आस-पास के लोग मारे जाएंगे न।'' मास्टर जी बोले, '' यहां वह संकट नहीं है। वैसे हम यहां बम फोड़ेंगे नहीं। बस लड़के सीख रहे हैं और मैं सिखा रहा हूं।''  


''पर तुम बम फोड़ना क्यों सिखा रहे हो, गांधीगिरी क्यों  नहीं सिखा रहे ?''  


''उसका एक कारण तो यह है कि न मैं गांधी जी के समान महान हूं, न ये लड़के।'' मास्टर जी बोले, ''वैसे  बताओ, तुम्हारी पुलिस और फौज को गांधीगिरी क्यों  नहीं सिखाई जाती?''
 ''उन्हें' तो देश के लिए लड़ना है।''  


''इन्हें' भी कौम के लिए मरना है।''


 ''तुम्हा'री पाठशाला का क्या नाम है ?'' पुलिस ने पूछा।  


''सिम्‍मी।''  


''वह, जो फिल्म  अभिनेत्री थी?''  


''नहीं, साब जी।'' छोटी पुलिस ने धीरे से, बड़ी पुलिस के कान में कहा, ''यह एक आतंकवादी संगठन है और सरकार द्वारा प्रतिबंधित है।''



 ''तुम प्रतिबंधित संगठन के नाम से पाठशाला क्यों  चलाते हो ?'' पुलिस ने कहा, ''नया नाम नहीं रख सकते ?''  


''रख लिया। इंडियन मुजाहिदीन।''  ''अब ठीक है ?''


पुलिस ने छोटी पुलिस से पूछा।  ''आप ठीक समझते हैं तो ठीक ही होगा।''  


''तो बम कहां फोड़ोगे ?'' पुलिस ने पूछा।


 ''कर्नाटक में, राजस्था।न में और गुजरात में। आपके केरल को कोई खतरा नहीं है।'' मास्टर जी ने कहा, ''वैसे तो हम उत्तेर प्रदेश और बिहार के जंगलों में भी यह पाठशाला चला सकते थे; किंतु वहां अब मुलायमसिंह और लालूप्रसाद यादव का राज नहीं है न। वहां तो हमें अपनी पाठशाला का नाम भी बदलना नहीं पड़ता। उन्हें  हमारा सिम्मी नाम ही बहुत पसंद है। वे तो हमें अपनी पुलिस से दो एक मास्टर भी दे देते। जब दिल्ली उच्चन्यायालय ने हम पर से प्रतिबंध हटाया था तो उन दोनों को हार्दिक प्रसन्नता हुई थी।''
 


''तो तुमने केरल के वन को ही क्यों चुना ? वन तो कर्नाटक, राजस्थान और गुजरात में भी हैं।'' पुलिस ने कहा, ''ऐसे ही पूछ रहा हूं। अपनी जेनरल नॉलेज बढ़ाने के लिए। कोई आपत्ति नहीं कर रहा हूं। न तुमको अरेस्ट  कर रहा हूं।''  


''अरेस्ट क्यों नहीं कर रहे?'' मास्टर जी ने कहा, ''मैं भी अपनी जेनरल नॉलेज बढ़ाने के लिए ही पूछ रहा हूं। आपत्ति नहीं कर रहा हूं।''  


''तुमने बम फोड़ा तो है नहीं।'' पुलिस बोली, ''अपराध हुआ नहीं, तो अरेस्ट किस कारण करें।''  


''पर बम फूटेंगे तो।''  


''जहां फूटेंगे, वह स्थांन हमारे थाने के अधिकार-क्षेत्र से बाहर है। तो हम पंगा क्यों  लें।'' पुलिस मुस्कराई, ''अब तुम मेरे प्रश्न का उत्तर दो। तुमने केरल के वनों को ही क्यों चुना?''
 


''पहली बात तो यह है कि मैं जानता था कि केरल की पुलिस बहुत शरीफ है। किसी से पंगा लेने में विश्वास नहीं करती।'' मास्टर जी बोले, ''दूसरे यहां मुस्लिमलीग और मार्क्सवादियों का शासन है। उन दोनों की ही सहानुभूति हमारे साथ है।''  


''तुम्हारे साथ क्यों  है ? उन्हें  देश की चिंता नहीं है ?''



 मास्टर जी जोर से हंसे, ''मुस्लिमलीग तो देश की नहीं अपनी कौम की चिंता करती है। और मार्क्सदवादी मानते हैं कि देश या राष्ट्र का अर्थ है, 'भारतीय जनता पार्टी।' देश नष्ट होगा अर्थात् भारतीय जनता पार्टी नष्ट होगी। वे उसके शत्रु हैं। इसलिए वे बंगाल में भी हमारे साथ हैं और केरल में भी।''


 ''लालू और मुलायम क्यों  तुम्हारे पक्ष में हैं।''  


''उन्होंने यह भ्रम पाल रखा है कि हिंदुओं को मरवाने से मुस्लिम वोट उनको मिलेंगे। देश जाए भाड़ में, उन्हें अपनी गद्दी की चिंता है।'' वह जोर से हंसा, ''ये उन्हीं  जागीरदारों ओर सूबेदारों की परंपरा में पैदा हुए हैं, जिन्होंने अपनी जागीर को बनाए रखने के लिए इस्लाम भी स्वीकार किया था ओर मुगलों और अंग्रेजों की गुलामी भी।''  


''अच्छा, अब जल्दी' अपनी पाठशाला समेटो। हमें भी अपनी नौकरी की चिंता है, जैसे उन्हें अपनी जागीर की थी।''


                                                                                                                                                            ( 21.8. 2008)

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                                    परिचर्चा   


                                                                                                                                                            सीताराम गुप्ता

आनंद का अनुपम स्त्रोत हैं तीज-त्यौहार और मेले-ठेले

भारत उत्सव प्रधान देश है। हर दिन कोई न कोई त्यौहार मनाया ही जाता है। एक-एक दिन में कई-कई उत्सव अनेकानेक आयोजन। श्राद्ध  समाप्त हुए तो नवरात्रा प्रारंभ हो गए। दशहरे से लेकर दीपावली तक उत्सव का समाँ ही तो बंध जाता है। हफ्र्त़ों नहीं महीनों तक चलते हैं कई उत्सव तो। नववर्ष की शुरुआत से लेकर अगले नववर्ष की पूर्व संध्या तक उत्सव ही उत्सव। आखिर क्यों मनाए जाते हैं ये तीज-त्यौहार और विभिन्न पर्व? क्या मात्र किसी की याद ताजा करने  के लिए अथवा किसी के योगदान से प्रेरणा लेने  के लिए? वस्तुत: त्यौहार हमें आनंद प्रदान करते हैं। त्यौहार मनाने से आनंद की अनुभूति होती है। आनंद की अवस्था में हमारे शरीर में तनाव कम करने वाले तथा शरीर में रोग अवरोधक क्षमता उत्पन्न करने वाले रसायन उत्सर्जित होते हैं जो हमें स्वस्थ बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं। इस प्रकार त्यौहारों के आयोजन का सीधा संबंध हमारे उत्तम स्वास्थ्य तथा रोगमुक्ति से है।
 त्यौहार का शाब्दिक अर्थ भी खुशी ही है। मुस्लिम या पारसी त्यौहरों के नाम से पहले एक शब्द जुड़ा होता है 'ईद` जैसे ईदुलफ़ित्रा, ईदुज्जुहा, ईदे-मीलादुन्नबी, ईदे-नौरो आदि। इनका शाब्दिक अर्थ हुआ फ़ित्रा की खुशी,   कुर्बानी या समर्पण की खुशी, नबी के जन्मदिन की खुशी तथा नये दिन की खुशी। जिस प्रकार 'ईद` शब्द खुशी या प्रसन्नता या पर्व का पर्यायवाची है उसी प्रकार त्यौहार, पर्व या उत्सव भी खुशी के ही पर्यायवाची हैं। किसी भी धर्म अथवा समुदाय के तीज-त्यौहार या पर्व हों हमें खुशी प्रदान करते हैं। जब हम खुद कोई त्यौहार मनाते हैं तब तो आनन्द की अनुभूति होती ही है साथ ही दूसरों को त्यौहार मनाते देख भी कम आनन्दानुभूति नहीं होती। यही कारण है कि आज अनेक उत्सव, तीज-त्यौहार और मेले-ठेले पर्यटन से जुड़ते जा रहे हैं। ब्रज की होली देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं तो भारत में होली और दूसरे पर्वों का आनंद उठाने के लिए विदेशों से अनेक पर्यटक त्यौहारों के दिनों में ही आते हैं।
 अब प्रश्न उठता है कि ये तीज त्यौहार हमें खुशी तो प्रदान करते हैं पर कैसे? त्यौहारों के आयोजन और उनके मनाने के तरीकों पर नजर डालिए। त्यौहारों के अवसर पर जो सबसे पहला काम किया जाता है वह है घरों की साफ-सफाई। साफ-सफाई और रंग-रोगन के बाद घरों को सजाया जाता है। रात को रोशनी की जाती है तथा आतिशबाजी भी की जाती है। पूजा-पाठ और विभिन्न अनुष्ठान किये जाते हैं जो पर्यावरण की शुद्धि  के साथ-साथ शरीर की शुद्धि करने में भी सक्षम हैं। अनुष्ठान से पूर्व व्रत आदि भी रखे जाते हैं। इस्लाम में ईदुलफ़ित्रा से पूर्व तीस रोजे रखे जाते हैं। मुस्लिम ही नहीं, हिन्दू,  पारसी और इसाई भी व्रत, रोजे या फास्ट रखते हैं। यह शरीर शुद्धि का परंपरिक तरीका है। शरीर शुद्धि  के बाद मन की शुद्धि भी अनिवार्य है। विभिन्न प्रकार के अनुष्ठान इसमें सहायक होते हैं। त्यौहारों के अवसर पर दान देने की भी व्यवस्था है। दान की भावना व्यक्ति को प्रसन्नता प्रदान करती है। उसके अंदर सहयोग और करुणा की भावना का विकास होता है।
 त्यौहारों पर उपहारों का आदान-प्रदान भी होता है। उपहार लेना और देना दोनों खुशी प्रदान करते हैं। विभिन्न प्रकार के विशेष स्वादिष्ट भोजन और मिष्ठान तैयार किये जाते हैं और दोस्तों और रिश्तेदारों के यहाँ भेजे जाते हैं। त्यौहारों पर इस प्रकार की क्रियाएँ अत्यंत आनंदप्रद होती हैं। नये-नये कपड़े पहनते हैं। हर प्रकार की खरीददारी होती है। घरों और बाजारों में सब जगह गहमागहमी होती है। इस गहमागहमी का हिस्सा बनना भी कम प्रसन्नता प्रदान नहीं करता। ध्यान से देखें तो त्यौहारों से जुड़ी सारी क्रियाएँ या तैयारियाँ खुशी प्रदान करती हैं तथा हमारे परिवेश और जीवन स्तर को उन्नत बनाती हैं।
 ये बात तब की है जब व्यक्ति इतना समर्थ नहीं था। सब चीजें व्यक्ति स्वयं बनाता था। साफ-सफाई और सजावट से लेकर खाने-पीने की चीजें और उपहार की वस्तुएँ घर में ही तैयार होती थीं। आज सब चीजें बाजार में सुलभ हैं अत: इन वस्तुओं और क्रियाओं द्वारा सृजन का सुख नहीं मिल पाता है। यही कारण है कि त्यौहार वास्तविक प्रसन्नता प्रदान करने में सक्षम प्रतीत नहीं होते।
 लेकिन क्या आज भी ये सब आयोजन या त्यौहार आनन्द प्रदान करने में सक्षम हो सकते हैं? वस्तुत: आनंद मन का एक भाव है अत: त्यौहार के मनाने का संबंध मन से होना चाहिए। लेकिन आज इसमें अनेक आयाम जुड़ गए हैं। त्यौहार मनाना बहुत जटिल कार्य हो गया है। जटिलता में आनंद कहाँ और आनंद के अभाव में शरीर में लाभदायक रसायनों का उत्सर्जन असंभव है। यही वास्तविक स्वास्थ्य है और स्वास्थ्य के अभाव में आनंद कहाँ?
 एक समय था जब किसी पर्व के आगमन से हफ्तो और महीनों पहले तैयारियाँ शुरू हो जाती थीं। सारा काम हाथ से होता था। साफ-सफाई और सजावट से लेकर खाने-पीने की चीजें मिष्ठान्न तथा कपड़े-लत्ते तैयार करने का सारा काम हाथों से घर में ही होता था। इन सब कामों को हाथ से करने में सृजन का सुख मिलता था। इसमें पैसे का प्रदर्शन नहीं भावना जुड़ी होती थी। त्यौहार मनाने में जहाँ पैसा मुख्य हो जाता है वहाँ आर्थिक स्तर महत्वपूर्ण हो जाता है। मन के भावों का स्थान गौण हो जाता है। त्यौहार को धूम-धाम से मनाना प्रतिष्ठा का प्रतीक बन जाता है। इससे त्यौहार की मूल भावना का ह्रास होकर त्यौहार एक औपचारिकता या मजबूरी बन जाता है जिससे आनंद की प्राप्ति असंभव है।
 जब समाज में अत्यध्कि आर्थिक विषमता मौजूद हो तो वहाँ पैसे वालों के लिए त्यौहार मनाना उनके अहं की तुष्टि का कारण बनता है। उनमें अहंकार की भावना अधिक पुष्ट होती है। जो कमजोर हैं उनमें हीनता की भावना आती है। इस प्रकार त्यौहार के आयोजन से किसी को आत्मिक सुख नहीं मिलता। ऐसे में त्यौहार की क्या प्रासंगिकता हो सकती है?
 त्यौहार हमेशा मिल-जुलकर मनाए जाते हैं। अकेला व्यक्ति हमेशा तनावग्रस्त रहता है। त्यौहारों के कारण मिलना-जुलना तनावमुक्ति का एक अच्छा स्रोत है। तनावमुक्ति मनुष्य के स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण तत्त्व है। अत: त्यौहारों का सामाजिक पक्ष भी सीध हमारे स्वास्थ्य से जुड़ता है। त्यौहारों पर मिलना-जुलना तभी संभव है जब आर्थिक असमानता का अभाव हो अथवा त्यौहारों को अत्यंत सादगी से आडंबररहित होकर मनाया जाए। आडम्बररहित होना वास्तव में सही रूप में आनन्द प्रदान करता है।
 बाजारवाद ने धीरे-धीरे त्यौहारों को पैसा कमाने का माध्यम बना दिया है। समाज के विभिन्न वर्ग भी किसी न किसी स्वार्थ से जुड़कर त्यौहार मनाने को विवश हैं। त्यौहारों पर व्यावसायिकता इस कदर हावी हो गई है कि त्यौहार मनाने की मूल भावना या उद्देश्य कहीं भी नजर नहीं आता। त्यौहारों के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपयों का व्यापार हो रहा है। व्यापार बुरी बात नहीं लेकिन त्यौहारों को माध्यम बनाकर साधनों का अपव्यय और खाद्य पदार्थों की बिक्री तकलीफ़देह है। नये-नये रूपों में त्यौहार मनाने से अपसंस्कृति को बढ़ावा मिलता है।
 नई पीढ़ी कुछ हद तक दिशाभ्रमित हो चुकी है। उनके लिए त्यौहारों का अर्थ है उपहारों का आदान-प्रदान और  अ याशी। आनंद उपहारों के आदान-प्रदान और भौतिक सुख में नहीं। सच्चा आनंद है मन की प्रसन्नता में। स्वयं भी प्रसन्न रहो और दूसरों को भी प्रसन्नता प्रदान करो। त्यौहारों के माध्यम से ये बखूबी किया जा सकता है लेकिन त्यौहारों के माध्यम से आनंद की प्राप्ति तभी संभव है जब हम आडंबररहित होकर सादगी से त्यौहार मनाना सीख लें।

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                               पर्यटन


                                                                                                                                                       उर्मिला जैन


उष्ण कटिबंधीय स्वर्ग में एक दिन

उस दिन गोधूलि बेला में हम विशाल सागर के कगार पर खड़े, उस विशाल  जहाज को धीरे-धीरे खिसकते हुए देख रहे थे जो इस उष्ण कटिबंध के एक खूबसूरत छोटे-से शहर मोम्बासा में कई-कई यात्रियों को सौंपकर जा रहा था, जिसे मात्र मोम्बासा वासी ही नहीं बल्कि और-और लोग भी  उष्ण कटिबंधीय स्वर्ग कहते हैं। वहीं पर सामने था वह बहुचर्चित तैरता हुआ पुल, जो सफेद संगमरमर के पुल के समान दिक रहा था। गहरे नीले सागर के वक्ष पर सफेद संगमरमरी पुल, खूबसूरत नक्काशी वाला, उस पर डूबते सूरज की परछांई...सारा का सारा परिवेश एक अद्भुत सौंदर्य की सृष्टि कर रहा था।


फिर, जब हमने शहर देखा, घूमा, जाना तो पाया कि प्राचीन और नवीन के एक अद्भुत सामंजस्य का मिलन था वहाँ पर। कहते हैं कि जब राजा सोलेमन ने अपना राज्य सिंहासन हाथीदांत का बनवाकर उसे सोने से मढ़वाना चाहा था तो हाथीदांत के उस विशाल ढेर के लिए उसे अफ्रीका के इसी पूर्वी किनारे का सहारा लेना पड़ा था। अरब देश के व्यापारी एक जमाने से मानसून के सहारे अफ्रीका के स किनारे तक आ-आकर व्यापार करते रहे हैं। अफ्रीका के पूर्वी किनारे का सबसे बड़ा बन्दरगाह मोम्बासा ही है।


एक ओर यह यदि अत्याधुनिक वातानुकूलित भवनों,  आफिसों से सज्जित शहर हर तरह की सुख सुविधाओं से भरा-पूरा दिखा, तो दूसरी ओर इसके प्राचीर भाग में हमें अफ्रीका का प्राचीन वैभव भी देखने को मिला। छोटी-छोटी संकरी गलियों में हाथीदांत के कुशल कारीगर,  इत्र निर्माता और फरोश, मसाले आदि के व्यापारी, विभिन्न कामों में लगे, विभिन्न भाषाएँ बोलते हुए दिखाई पड़े। ऐसा लगा कि पूर्व और पश्चिम, प्राचीन और आधुनिक, असाधारण और साधारण सबका संगम है यहाँ।

पारंपरिक रूप में मोम्बासा को युद्ध का द्वीप कहते हैं। इस हरे-भरे सुरम्य प्रदेश का नाम और युद्ध से संबंध! ऐसा क्यों है, इसकी जिज्ञासा होने लगी। एक स्थानीय निवासी ने बताया कि मोम्बासा की सत्ता के लिए पहले हमेशा युद्ध हुआ करते थे। कारण, द्वीप पर अधिकार का अर्थ था - उत्तरी और दक्षिणी किनारों पर अधिकार, साथ ही उसके भीतरी भागों के कीमती हाथीदांत और गुलामों के व्यापार पर अधिकार होना। उत्तरी किनारे पर स्थित फोर्ट जेसस ने इस बात की साक्षी दी। वैसे इन दिनों यह एक अजायबघर का रूप धारण कर चुका है।       


मोम्बासा जाने और भ्रमण करने का सुअवसर भी बड़े ही दिलचस्प और अप्रत्याशित ढंग से मिला था। हमारा यान तंजानिया की राजधानी दारेस्सलाम से चला था। हमें जाना था नैरोबी। राह में यान जंजीबार में रुका। कुछ देर के लिए जब हम यान से उतरकर लाउँज में बैठे तो एक सहयात्री ने, जो अदन के थे और सैर के लिए अफ्रीका आए थे, हमसे बातों के दौरान कहा कि आप मोम्बासा क्यों नहीं उतरतीं। बड़ा खूबसूरत शहर है।


मन तुरंत तैयार हो गया। पर हमारा टिकट सीधे नैरोबी तक का था। प्लेन के अधिकारियों से बात की कि क्या यह संभव है कि हम लोग मोम्बासा उतर जाएं और वहां से ट्रेन से नैरोबी जाएं, तो क्या टिकट के बाकी पैसे वापस मिल सकते हैं?


उन्होंने बताया कि नियम ऐसा करने की अनुमति नहीं देता। लेकिन अब तक हम मोम्बासा देखने के लिए इतने उत्सुक हो चुके थे कि पैसे का मोह भी छोड़ा और नैरोबी न जाकर मोम्बासा ही उतर गए।


हमारे सहयात्री भी, जिनसे हमारा परिचय कुछ ही देर का था, खुश हो गए। उनसे इतना अपनत्व मिलेगा, इसकी आशा कतई नहीं थी। स्नेह के बन्धन से हमें और बांध लिया, जब मोम्बासा उतरने पर हमारे सहयात्री के मेजबान ने हमारा परिचय पाने पर अपने मेहमान की तरह ही हमारा भी स्वागत किया, और मना करने पर भी उन्होंने हमें होटल में नहीं जाने दिया। अपने साथ ही हमें अपनी गाड़ी में घर ले गए।


उनके घर पहुंचते ही जब उनकी पत्नी ने बादाम के शीतल शरबत से हमारा स्वागत किया तो हम यह भूल चुके थे कि हम अपनों से इतनी दूर अफ्रीका में हैं। हमारे मेजबान एक प्रवासी भारतीय थे। वह कई पीढ़ियों से अप्रीका में बस चुके हैं। लेकिन प्रयाग  और काशी की चर्चा सुनकर और यह जानकर कि मैं इलाहाबाद विश्वविध्यालय की छात्रा रही हूँ, मेरे पति बनारस हिंदु विश्वविध्यालय के छात्र रहे हैं, गद्गद हो गए । सम्भवतः हम उन्हें वैसे ही वरेण्य लगे, जैसे कि काशी और प्रयाग। अब हम उनके थे और उन्होंने पूरा मोम्बासा दिखाने और घुमाने का जिम्मा जबरन अपने ऊपर ले लिया।


खाने के बाद ङम उनकी मर्सिडीज में सैर के लिए चले। पहले उन्होंने हमें यह नहीं बताया कि वे क्या दिखाएंगे, हमें कहां ले जाएंगे। जब उन्होंने गाड़ी रोकी तो हम यह देखकर विस्मित थे कि हमारे सामने हाथीदांत की आकृति वाले दो विशाल दरवाजे खड़े थे। इतना बड़ा हाथीदांत! कहां से आया भला ! अफ्रीका के जंगलों में घूमते हुए, सफारी पर जाने पर, हमने बड़े-से-बड़े हाथियों को देखा था, लेकिन यह तो किसी दैत्याकार हाथी का दांत हो सकता है। क्या गहन वनों में इतने बड़े हाथी भी होते हैं ? 

मैं अपनी बात कह ही रही थी कि हमारे मित्र ने हंसते हुए बताया कि यह असली हाथीदांत नहीं,  बल्कि अन्य धातुओं से हातीदांत के आकार के ये दरवाजे बनाए गए हैं. ब्रिटेन की रानी के स्वागत के लिए यह मनोहर दरवाजा बनाया गया था। तब से यह दरवाजा मोम्बासा का एक प्रमुख आकर्षण है और इसके वन वैभव का प्रतीक भी।


इसके बाद दिनभर वे हमें मोम्बासा की छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी चीजें दिखाते रहे. प्राचीन और नवीन के सम्मिलन के साथ ही वह सहर कई-कई धर्मों का वाहक भी लगा। कहीं मंदिर, कहीं मस्जिद, कहीं गुरुद्वारा, कहीं जमातखाना तो कहीं चर्च! इनमें भी अलग-अलग संप्रदाय के अलग-अलग भवन ! हिंदुओं के ही कई-कई मंदिर हैं, जैन मंदिर भी था। विशाल श्वेत जैन मंदिर बहुत ही भव्य बनाया गया है। संगमरमर का यह मंदिर 1962 में बनवाया गया था। लगभग एक करोड़ रुपए की लागत से निर्मित यह मंदिर भारतीय कारीगरों द्वारा ही बनाया गया है.


अपना देस छोड़े कई महीने हो गए थे। वहां की यादें हमेशा जेहन में घूमती रहती थीं पर उस दिन मोम्बासा के भारतीय परिवेश ने हमें इस तरह मोह लिया था कि लगता था कि हम भारत के ही किसी छोटे शहर में हैं। दुकानों पर बिकती रंग-बिरंगी साड़ियां, भारतीय भोजन की सुगंध, सब कुछ बेहद अपना था। 

इन सबसे भी खूबसूरत था- मोम्बासा को प्रकृति की देन, विशाल सागर का मनोहर किनारा ! हरी-भरी धरती, ऊँचे-ऊँचे नारियल के वृक्ष! समुद्री किनारे के आस-पास रंग-बिरंगी चट्टानों के पास तैरतीं तरह-तरह की मछलियां, विविध रंगी मूंगे की चट्टानें, जो किसी भी बाग-बगीचे, चित्र या मंदिर से भी ज्यादा मोहने वाले थे। सागर का वह किनारा सबको बांध लेता था।                                                                                                                                       हम वहां अधिक और अधिक रुकना चाहते थे, पर सूरज की धुंधलाती किरणें बता रही थीं कि शाम हो चुकी है। हमें लौटना भी है।                                                                                                                                                                                        उसी दिन रात को हम एक भाव-भरी, न भूलने वाली प्यारी-सी याद लिए, ट्रेन से नैरोबी की ओर चले जा रहे थे।                                                                                                                                               साभार ( आजकल)

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                     चांद परियां और तितली



पूरी-सा चंदा








रात की कड़ाही में


पूरी-सा चंदा


कितने पास आ बैठा, मां


देखो  यह दूरी-का चंदा


प्लेट में दे दो इसको ज़रा


मैं  भी  तो देखूँ  अब


ठंडा है, या गरम  बहुत   


छत पर आ लटका  जो


जाने किस मजबूरी  में  चंदा !


                        -शैल अग्रवाल















पत्ती रानी








बगिया के नाटक में देखी


कल  यह नयी  कहानी


पानी बरसा धूप भी निकली


हवा के बैंड पर झूम-झूमके


 नाचें पत्ती रानी।


                    -शैल अग्रवाल











***











पतझर का एक पात





नन्हा नटखट पत्ता चुपचाप पेड़ से उतरा और अकेला ही घूमने चल दिया। हवा पर सवार, बादलों के पार जाने को था उसका अब मन। चलते-चलते चल पड़ा  वह एक अनजानी राह पर,  दूर, बहुत दूर, अपनों से, अपने घर से दूर । डाल-डाल पर खेल रही, दौड़ती-भागती गिलहरी ने  देखा, और शोर मचा दिया, ' -अरे-अरे, यह अकेला पात कहां चल दिया? अंधेरा होने को है। भटक जाएगा, बेचारा। कोई पीछे जाओ।पेड़ पर इसे तुरंत ही वापस लाओ !'  


पत्ते सारे डाली से उतरे और झटपट समझा-बुझाकर वापस लाने  दौड़ पड़े। पर जब  उन्होंने देखा कि कैसे सामने-सामने नटखट पत्ता हवा के रथ पर सवार मस्त-मस्त,  लहराता-झूमता चला जा रहा  है; तो वे सारे सीख भूल गए। हिलोर लेती मौजों को देख  होड़ा-होड़ी में लगे वे  भी  दौड़ने ..वैसे ही हंसते-गाते, झूम-झूमके सीटी बजाते। अब तो पेड़-पेड़ पर मच गया शोर, -' हवा के रथ पे आकर बैठो, यहां पर है बड़ी मौज  और बहुत ही धूम-धड़ाका व जोर-शोर।' 


ढेरों नन्हे पत्ते  फुदकते-फुदकते, कूदते-फांदते  पेड़ों से उतर-उतर दौड़े  चले आए और लगे मारे खुशी के गोल-गोल घूमने। कुछ हवा के रथ पर चढ़ पाए, कुछ जमीन पर गिरकर ही  ताली बजाने लगे। अपने रथ पर सवार उड़ते साथियों को देख-देखकर जोर-जोर से हंसने और गाने लगे। 


अब वे सारे पत्ते कभी जमीन पर तो कभी हवा में नाच रहे थे। पेड़ों की गोद पत्तों  से पूरी तरह से खाली हो चुकी थीं। छुंड बना-बनाकर पत्ते अपनी ही धुन में चले जा रहे थे।  पार्क और सड़क के कोने -कोने, यहाँ-वहां, मनचाहे जहाँ दौड़-दौड़कर  खेल रहे थे। कुछ नटखट तो लहरों पर सवार होकर उलटी-सीधी दिशा में बह भी रहे थे। कई-कई दिन और महीने निकल गए , पत्तों को यूं ही मनमानी करते, पर उन नटखट पत्तों का मन नहीं भरा। भूख-प्यास सब भूल, पार्कों में, सड़कों पर, नदी नालों पर दिनरात जी भर-भरकर खेलते और बहते रहे वे। देखते-देखते बहुत दूर निकल गए वे और अपने-अपने पेडों के सारे रास्ते भी भूल गए।


बेहद डर लगा तब उन्हें, क्योंकि थोड़े दिन तक तो आते-जाते लोगों ने सराहा, उत्साह बढ़ाया, पर अब वे उन्हें उपद्रवी और कूड़ा करने वाले समझने लगे थे। आते-जाते सारे बच्चे, बड़े, सभी उनके बेमतलब के खेल से ऊब-से गये थे।


और तब लोगों ने उन्हें एक किनारे करना शुरू कर दिया। झाड़ुओं की मार खा-खाकर सब-के-सब  बेचारे ढेर होने लगे। जगह-जगह और चारो तरफ कूड़े के ढेर से पड़े वे पत्ते, अब दिनरात बस यही  सोचते, ' गलत किया जो घर से दूर निकले, वह भी बिना मां को  बताए ।'


मां की, घर की बहुत याद आ रही थी उन्हें, पर घर वापस कैसे जाते? ना रास्ता जानते थे और ना ही रास्ते में बैठे उस ठंडे-अंधेरे काले राक्षस से लड़ने का साहस ही  था उनके पास! रास्ते में पड़े पत्तों को लोगों ने खूब रौंदा-कुचला, ठोकरें तक मारीं। किसी को  जरूरत नहीं थी उनकी। किसी को परवाह नहीं थी, बदसूरत, बेजान पत्तों की। मां की गोदी याद करते, बिना कुछ खाए-पिए पत्ते सिसकते रहे। मुंह बिसूरते रहे और आते-जाते लोगों को देखते रहते, पर किसी ने भी उन डरे-थके-भूखे पत्तों का रोना तक नहीं सुना। हां, हवाओं में गूंजती उनकी वह मां-मां की  आवाज  आकाश में उड़ते पक्षियों के कानों तक जरूर पहुंच गयी और तुरंत ही  वे दयालु पक्षी उन भटके पत्तों के समाचार पेड़ों को दे आए। तो इसतरह से आखिर देर-सबेर एकबार फिर पेड़ों को खबर लग ही गई पत्तों की,  दुख में वे बिचारे खुद भी तो सूखे जा रहे थे। पेड़ों ने तुरंत ही अपनी   ममतामयी शाखें फैला दीं। तुरंत ही सारे पत्ते कूदकर वापस अपनी-अपनी मां की गोदी में  जा बैठे और  लाड़-प्यार पाकर  वैसे ही, पहले जैसे  हरे-भरे हो गये।


पर बच्चों, डाल-डाल फुदकती वह गिलहरी अभी भी पूरी सतर्क एक आँख रखे हुए है उस शरारती नन्हे पत्ते पर। आखिर पतझर का नटखट पात जो ठहरा, जाने कब ऊब जाए पेड़ पर लटके-लटके और मचलने लगे फिर से, कि उसे तो अभी-अभी वैसे ही वापस उड़ना है,  उसी मनमानी रफ्तार से इधर-उधर घूमना है। पर वह तो  किसी भी हालत में दोबारा  वैसा नहीं  होने दे सकती!  फिर से चारो तरफ इतना बड़ा उपद्रव हो जाए, भगदड़ मच जाए, बगिया ही नहीं, पूरी दुनिया में और  वह भी बस इसलिए कि एक नासमझ पत्ते को रोकने  वाला कोई भी नहीं था वहां पर !...


                                                                                                                                                  -शैल अग्रवाल     








***     








पतझड़









पत्ते झड़ते खड़-खड़ झड़-झड़
पतझड़ पतझड़ आया पतझड़
टूट गए पत्ते ज्यों पापड
किसने की यह सारee  गड़बड़
ढकते हैं सब मिटटी कीचड
बच्चा न कोई कोना नुक्कड़
हांक रही पत्तों को आंधी
वे लगते भेड़ों के रेवड़
फटे-पुराने कपडों जैसा
फेंक दिया पेड़ों ने गूदड़
पेड़ हो गए सूखे नंगे
सबके दिखते कंधे कूबड़
सबको झड़ना ही पड़ता है
दुबला हो मोटा या अक्खड़
खेलें हम सूखे पत्तों से
होने दो होती है खड़-खड़ 


 

-गौतम सचदेव