" मानव जीवन बेदी पर, परिणय है विरह मिलन का सुख-दुख दोनों नाचेंगे, है खेल आँख का मन का"
-जयशंकर प्रसाद
` (रिश्ते)
(अंक-7- वर्ष-2-सितंबर-2008)
कविता धरोहर में भवानी प्रसाद मिश्र, माह के कवि-रामेश्वर कंबोज ' हिंमाशु' कविता- आज. और अभी में सुधीर सक्सेना-सुधि, कविता वाचक्नवी, बुद्दिनाथ मिश्र, प्रभाकिरण जैन, शैल अग्रवाल, कुसुम सिंहा, कुसुम अग्रवाल और वंदना केंगरानी व बाल कविताएँ।
व्यंग्य में धर्मपाल महेन्द्र जैन और पर्यटन में ड्रैकुला और परियों का मनोहारी शहर बुडापेस्ट.
समकालीन कहानी -गौतम सचदेव (यू.के), मन्थन-डॉ. रामदरश मिश्र, लघुकथा- सुभाष नीरव, शैल अग्रवाल, दृष्टिकोण-कमला सिंघवी, परिचर्चा-शैल अग्रवाल, बाल कहानी-स्मार्टी, गतांक से आगे शेष-अशेष-भाग-12 व स्थाई स्तंभ विविधा आदि के साथ,
क्या आज का युवा विवाह और संयुक्त परिवार जैसे बंधनों में नहीं बंधना चाहता? ‘दिस इज माइ लाइफ’ वाले युग में जिम्मेदारियों का बोझ स्वीकार नहीं उसे। तेजी से बदलते विश्वीकरण के इस युग में बहुत कुछ टूट रहा है...मर्यादायें, आस्थाएं, संस्थाएँ, सभीकुछ। जहां मानव विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में ऊंची उड़ानें ले रहा है, उसका मन निरंतर ही भ्रम के कुहासे के नीचे दबा-खोया है व व्यक्तिगत और सामाजिक, दोनों ही स्तर पर भांति-भांति की ग्रन्थियों और कुंठाओं को जन्म दे रहा है...आज के समाज में व्याप्त एक बेचैन असंतोष ही नहीं, अपराध और अराजकता का कारण बन रहा है। रिश्ते हों या समाज दोनों को ही निरंतर सींचना और संवारना पड़ता है। प्यार के साथ-साथ धैर्य व अपने लिए जगह मांगते हैं ये। और सही अनुपात में न मिले तो मधुर से मधुर रिश्तों के बीच भी अक्सर एक ऐसा शिकायतों का उफनता मगर खामोश समंदर फैलता चला जाता है, जिसमें बड़े-से-बड़े जहाज आराम से डूब सकते है। मोह-विमोह से भरे ये रिश्ते, पुलक और सिहरन ही नहीं,, सावधानी न बरतो तो चुभन और कसक देने में भी देर नहीं लगाते। सही ही तो है; जबतक सह्य तो साथ, वरना एक असह्य बोझ! हाल ही में हंस के संपादक और स्वनाम धन्य लेखक श्री राजेन्द्र यादव जी का जयन्ती रंगनाथन के साथ हुआ एक साक्षात्कार पढ़ा। यादव जी विद्वान और बेबाक हैं । उनकी स्पष्ट-वादिता और खुलापन अच्छा तो लगा पर दर्पण दिखा गया। स्त्री-पुरुष के...अपने रिश्तों के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहाः " नई कहानी का सारा दर्द यही है. खास कर मोहन राकेश का-अंधेरे बंद कमरे, आषाढ़ का एक दिन सबकी थीम यही है. हमने स्त्री को पर्सनालिटी दी, आत्मनिर्भरता दी, स्वतंत्रता दी, लेकिन हमारी मानसिकता उसे बर्दाश्त नहीं कर पायी. हमारे संस्कारों में है कि हम रात कहें तो वो रात कहे, दिन कहें तो दिन. ये स्त्रियां अलग थीं. शायद इसलिए हमारी जनरेशन के पुरुष स्ट्रांग स्त्री के साथ निबाह नहीं कर पाए." मुझे लगता है कि नई कहानी का ही नहीं जिन्दगी का भी यही दर्द है। स्ट्रांग या वीक, धातु की तरह ही हर व्यक्ति की भौतिक और मानसिक अपनी एक संरचना होती है जो उसी हिसाब से परवाह और लालन-पालन चाहती है। लोहे और शीशे का एक सा इस्तेमाल या निर्वाह नहीं किया जा सकता। आजके सामाजिक और पारिवारिक दोनों ही संदर्भ में इस विघटन और विध्वंस के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए, अधिकांशतः वजह बतायी जाती है उम्र की नादानी... अनियंत्रित आवेग और उन्माद! परन्तु मुझे लगता है कि एक बड़ी वजह है; असीमित अपेक्षाएँ और तृणमूल जरूरतों को समझने के लिए वक्त की कमी या बेहद लापरवाही। कल तक पति का पूरक समझी जाने वाली स्त्री आज जब अपनी स्वतंत्र पहचान तलाशती अपने लिए नयी पहचान स्थापित कर रही है तो मूल्यों और परिवार के ढांचे में भी बदलाव करना ही होगा और उसे बराबर का वक्त व इज्जत दोनों ही देने पड़ेंगे।
...रिश्ता चाहे कैसा भी हो और कोई भी व्यक्ति क्यों न हो, वक्त और जरूरतों के साथ जब वह केन्द्र से परिधि में आता है तो धैर्य और सामंजस्य के साथ एक बुनियादी अपनेपन की अपेक्षा करता है अपनों से । राजा का राजपाट जीता जा सकता है, उसे बनवास दिया जा सकता है, परन्तु अपने ही घर में संतरी बनाकर नहीं खड़ा किया जा सकता। परिवार भी एक ऐसा ही राजपाट है, कल तक सूर्य की तरह केन्द्र में रहने वाले मां-बाप का अचानक ही स्टेपनी की तरह इस्तेमाल या उनकी पूर्ण अवहेलना असंतोष तो देगा ही , साथ ही परिवार की सुख-शान्ति और मर्यादा पर भी कई-कई प्रश्न-चिंह लगाएगा।
जून महीने की कड़ी को ही आगे बढ़ाते हुए लेखनी का यह अंक जीवन की दूसरी अहम समस्या ‘विवाह-बन्धन’ या जीवन में स्थायित्व जैसे ध्रुव-प्रश्नों पर केन्द्रित है। रिश्तों की मर्यादा और मिठास पर केन्द्रित है...समन्वय और सामंजस्य पर केन्द्रित है और जब इन बातों पर ध्यान दिया जाए तो धुरी में बैठे 'प्रेम को' स्वतः ही केन्द्र में आना ही पड़ेगा; यही तो हर रिश्ते की वास्तविक उर्जा या प्रेरणा है। कृष्ण की बांसुरी और सीता का बनवास है। स्वार्थ और लेनदेन की बुनियाद पर टिके रिश्ते क्षणिक और फुसफुसे ही होंगे...रात खतम तो बात खतम जैसे...। जो सहज न हो, सामंजस्य न कर सके, वो जुड़ नहीं सकता। लाश ढोने की बात नहीं कर रही; उसका तो दाहसंस्कार ही उचित है, बस उस विष का उल्लेख कर रही हूं जिसे पीकर शिव, शिव बने और हमारी पूरी कोशिश रहनी चाहिए कि उस शिवत्व के अंश और गुण बने रहें समाज में...व्यक्ति में... खास करके उन संदर्भों में जो हमें जी-जान से प्यारे हैं। बाथ टब के पानी के साथ बेबी नहीं फेंका जा सकता।
क्या वजह है कि कभी जन्म-जन्मांतर का समझा जाने वाला शादी जैसा पवित्र- बन्धन भी आज गरिमा खो रहा है।कहीं को हैबिटेशन के इस युग में एकबार फिर मानव पशु-पक्षियों के स्तर पर तो नहीं उतर आया है और शादी की जरूरत ही नहीं रह गई उसे! विज्ञान की मानें तो टेस्ट ट्यूब बेबी तो हैं हीं, पर अब जब समलैंगिक शादियों को कानूनन मान्यता मिलचुकी है कई पाश्चात्य देशों में, तो अब वह दिन भी दूर नहीं जब ऐसे दम्पति भी खुद अपने बच्चे तक रच पाएंगे, विज्ञान इन तकनीकों तक पहुंच चुका है ...फ्रैंकेस्टाइन की कहानियां कभी डरावनी रही होंगी आज तो ये विज्ञान की जीत और उपलब्धि की दास्तानें हैं।
चौंका देने वाली इन वैज्ञानिक खबरों को भूलकर, एक बार फिर वर्तमान में लौटते हैं। पश्चिम में आंकड़ों अनुसार हर तीसरी शादी टूटती है, और साठ प्रतिशत दम्पतियों के अवैध या अतिरिक्त संबंध होते हैं। भारत जैसे देशों में भी इन्हें अब आधुनिकता की निशानी माना जाने लगा है और बड़े शहरों में ये प्रवृत्तियां व प्रथाएं आम होती जा रही हैं व उनसे उत्पन्न तनाव व बीमारियां भी। क्या पश्चिम की उच्छ्रंखल स्वतंत्र मनोवृत्ति अब पूरब की मिट्टी में भी रिस रही है? क्यों अब रिश्तों में संतोष और सामंजस्य नहीं दिख पाता? क्या वजह है कि हमारे यहां भी पहले की अपेक्षा अच्छी-खासी बड़ी उम्र तक युवक-युवती या तो शादी करते ही नहीं या कर नहीं पाते, और कर भी लें तो निभा नहीं पाते, घर नहीं बना पाते?
कहीं इक्कीसवीं सदी की खरीदने या इस्तेमाल करने के पहले 'टेस्ट-ड्राइव' वाली प्रवृत्ति तो मुख्य अड़चन नहीं ...सहज विश्वास की जगह अविश्वास तो केन्द्र में नहीं इस सबके... और कहीं तीव्र गति वाले इस आज के युग की अपेक्षाओं का आकाश यथार्थ से दूर और बेहद खोखला तो नहीं? और-और व बेहतर से बेहतर की तलाश ही तो नहीं जो बहकाती और भटकाती रह जाती है आजीवन? फिर कहीं युवाओं की अड़चन और उलझनों को जटिल बनाने में हमारा, यानी कि पिछली पीढ़ी का भी तो कुछ योगदान नहीं? पालन-पोषण और शिक्षा में अभिवावक और शिक्षकों का गैर जिम्मेदाराना रवैया ही तो जिम्मेदार नहीं इस चरित्र हनन का? क्या मीडिया जैसा कुरूप और घिनौना परिवार और उसके सदस्यों (विशेषतः नारी चरित्र-सास, ननद वगैरह) का चित्रण, जो रोज ही हमारे सीरियल्स में परोसा जा रहा है, वह एक औसत घर का माहौल बिगाड़ने और स्वार्थी संस्कृति( हम दो, हमारे दो) को उकसाने के लिए काफी नहीं! क्या समाज की कुरीतियां जैसे दहेज और जातिवाद भी इस असफलता की अग्नि में घी का काम नहीं करतीं, फिर क्या बहुओं को जला देना, तलाक और गर्भपात ही इन समस्याओं के हल रह गये हैं? ये और अन्य, कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनपर थमकर सोचना आज के युवा और बुजुर्ग, दोनों के लिए ही बेहद जरूरी है।
मतिभ्रम, दिशाहीनता, अराजकता और लापरवाही जैसे शब्दों का आरोप अक्सर ही युवाओं पर लगाया जाता है जबकि भूलना नहीं चाहिए कि यदि हर उम्र के संघर्ष अलग हैं तो लड़ाई के तरीके और सामंजस्य भी।... जीत-हार तक के अर्थ बदल जाते हैं, उम्र के हर अगले पडाव पर। युवावस्था भी अपवाद नहीं। उमंग और स्फूर्ति से भरे युवा पंखों में जहां असीम को नापने की ललक होगी वहीं चोंच में छुपे चन्द तिनके नीड़ बनाने के लिए, थमने के लिए भी तो मजबूर करेंगे ही ... ऐसे में थोड़ा-सा भ्रम, थोड़ी-सी लापरवाही समझ में आती है, और माफ भी कर देनी चाहिए । सृजन ही तो नियम है जीवन की अमराई का और फिर जब नया सृजन होगा, तो नए परिवर्तन भी। बसंत ऋतु के आगमन के साथ-साथ पुराने पत्ते खुद-ब-खुद झरते हैं और नये कुल्ले फूटते हैं। नए फलफूल उगते हैं...हवाओं में तैरती एक नयी और ताजी महक और पंछियों का कलरव; सूचना दे देते है आगामी मधुमास की। हमें भी इन संकेतों को समझना और अपनाना चाहिए। जड़ चेतन सभी को...सारे आसार प्रत्यक्ष दिखने लग जाते हैं और सभी सहर्ष स्वीकार भी कर लेते हैं हर परिवर्तन को, फिर हम ही क्यों नहीं? कोई आरोप नहीं लगाता, नई शाखों पर कि उन्होंने पुरानी डालों की व्यवस्था क्यों बिगाड़ दी अपना कद बढ़ाकर...परिवार बढ़ाकर! फिर हजार सदेच्छाओं के बाद भी, हर नई शाख पल्लवित और कुसुमित ही हो पाए, यह भी तो जरूरी नहीं, कभी-कभी हो सकता है बेवक्त की आंधी-पानी, कुसमय ही इनका विनाश भी कर दे। यहीं पर पहली पीढ़ी का सहारा...विवेक और व्यवहार कुशलता की उपयोगिता है।... आपद खतरों से अवगत कराना और उनसे बचने के उपाय अनुभवों के आधार पर बतलाना और समझाना । बस अवगत कराना, उपदेश या आदेश नहीं...कोई जोर जबर्दस्ती नहीं। बंधन जंजीरों के हों तो आदमी तोड़ने को बेचैन होता है पर कच्चे धागों में स्वेच्छा से ही बंधते देखा गया है।
हां, जब युवा अपने लिए एक नया भविष्य, नयी दिशा तलाश रहे हों, नए नीड़ बना रहे हों , तो यदा-कदा परम्परागत मूल्य और उनकी समकालीन उपयोगिता या अनुपयोगिता की तरफ इंगित कर देने में बुराई नहीं। मतिभ्रम का कुहासा भेदने में शायद कहीं कुछ काम आ ही जाए, किसी विनाश को रोक ही ले।
सहित होकर भी साहित्य कभी उपदेश या आज्ञा नहीं, इशारा मात्र ही है...नीर-क्षीर विवेकी समय खुद ही उपयुक्त का वरण कर लेगा। जो समय की कसौटी पर खरा उतरे वही सोना है चाहे वह समाज हो, व्यक्ति हो या रीति-रिवाज...संस्था या प्रथा। जैसे कोई व्यक्ति समाज या संघ से ऊपर नहीं वैसे ही कोई प्रथा या मान्यता भी नहीं। वक्त के साथ थोड़ा बहुत बदलाव, सामंजस्य और सुधार होता ही है जिसे हम ‘ प्रगति ’ भी कह सकते हैं। परन्तु प्रगति तो स्वभावतः ही आगे ले जाती है जो अवरुद्ध करे, या पीछे घसीटे वह प्रगति नहीं हो सकती। ‘ को-हैबिटेशन’ या ‘ विवाह’ नाम चाहे जो भी दें किसी न किसी रूप में पशु-पक्षियों तक में नर-मादा सदा साथ हैं। मनुष्य ने अपना मनुषत्व इस सोच में डालकर इसे सुचारु, गौरवमय और कल्याणकारी सामाजिक ढांचा पहना दिया है...बस। अब जो सत्य शिव और सुन्दर है वह इतनी आसानी से तो नहीं टूटेगा...भटककर, घूमफिरकर हम फिर वहीं लौटते हैं।...यही होता आया है और होता भी रहेगा। यदि हमारी आस्था विवाह और संयुक्त परिवार जैसी सनातन संस्थाओं में थोड़ी बहुत डगमगाई है तो इसका अर्थ यह नहीं कि ये टूट रही हैं, बस वक्त के हिसाब से थोडा-बहुत परिवर्तन, थोड़े सामंजस्य की मांग कर रही हैं, यह भी तो एक अर्थ हो सकता है इन बातों का...इस विद्रोह का कि शायद आज की भौतिक और लेन-देन भरी संस्कृति में प्यार और सहज संवेदनाएं कहीं पीछे छूटती जा रही हैं, कुंठित और अवहेलित हो रही हैं...वैदिक संस्कृति और सूत्र; जैसे कि मां, बाप, गुरु, पति, पत्नि ये पांचो पूज्य हैं समाज में, फिरसे याद करने की जरूरत है आज ! अहम् और मन, दोनों ही इतने निर्बल भी नहीं नहीं होने चाहिएँ कि छोटी-से-छोटी फूंक डांवाडोल कर दे। आज जब नारी पुरुषों के साथ घर के अन्दर और बाहर, बराबर की साझेदारी निभा रही है, कंधे-से-कंधा मिलाकर चल रही हैं, तो फर्ज बनता है कि पति भी बराबर का साथ दे, अपने स्वामित्व को भूल, परमेश्वर के उच्च आसन से उतर, सखा और सहयोगी बन जाए, नारी का हृदय जीते। नारी भी घर से बाहर निकलकर भी अपने नारी सुलभ गुणों को हर संभव कायम रखे, तरल और सरल रहे, व्यवहार और जीवन में अनियंत्रित इच्छा और अपेक्षाओं की कटुता न आने दे...कौनजाने असंख्य दुरुहताओं के बाद भी, आज के युग की भी, बस चन्द सरल-सी यही मांगें हों!...
भई, सूरज जरा इस आदमी को जगाओ भई, पवन जरा इस आदमी को हिलाओ, यह आदमी जो सोया पड़ा है, जो सच से बेखबर सपनों में खोया पड़ा है। भई पंछी, इसके कानों पर चिल्लाओ! भई सूरज! जरा इस आदमी को जगाओ! वक्त पर जगाओ नहीं तो जब बेवक्त जागेगा यह तो जो आगे निकल गए हैं उन्हें पाने घबरा के भागेगा यह! घबरा के भागना अलग है क्षिप्र गति अलग है क्षिप्र तो वह है जो सही क्षण में सजग है सूरज, इसे जगाओ, पवन, इसे हिलाओ, पंछी इसके कानों पर चिल्लाओ!
स्नेह-पथ
हो दोस्त या कि वह दुश्मन हो, हो परिचित या परिचय विहीन तुम जिसे समझते रहे बड़ा या जिसे मानते रहे दीन यदि कभी किसी कारण से उसके यश पर उड़ती दिखे धूल, तो सख्त बात कह उठने की रे, तेरे हाथों हो न भूल। मत कहो कि वह ऐसा ही था, मत कहो कि इसके सौ गवाह, यदि सचमुच ही वह फिसल गया या पकड़ी उसने गलत राह- तो सख्त बात से नहीं, स्नेह से काम जरा लेकर देखो; अपने अन्तर का नेह अरे, देकर देखो। कितने भी गहरे रहे गत', हर जगह प्यार जा सकता है, कितना भी भ्रष्ट जमाना हो, हर समय प्यार भा सकता है, जो गिरे हुए को उठा सके इससे प्यारा कुछ जतन नहीं, दे प्यार उठा पाये न जिसे इतना गहरा कुछ पतन नहीं। देखे से प्यार भरी आँखें दुस्साहस पीले होते हैं हर एक धृष्टता के कपोल आँसू से गीले होते हैं। तो सख्त बात से नहीं स्नेह से काम जरा लेकर देखो, अपने अन्तर का नेह अरे, देकर देखो। तुमको शपथों से बड़ा प्यार, तुमको शपथों की आदत है; है शपथ गलत, है शपथ कठिन, हर शपथ कि लगभग आफ़त है, ली शपथ किसी ने और किसी के आफत पास सरक आयी, तुमको शपथों से प्यार मगर तुम पर शपथें छायीं-छायीं। तो तुम पर शपथ चढ़ाता हूँ तुम इसे उतारो स्नेह-स्नेह, मैं तुम पर इसको मढ़ता हूँ तुम इसे बिखेरो गेह-गेह। हैं शपथ तुम्हारे करूणाकर की है शपथ तुम्हें उस नंगे की जो भीख स्नेह की माँग-माँग मर गया कि उस भिखमंगे की। है सख्त बात से नहीं स्नेह से काम जरा लेकर देखो, अपने अन्तर का नेह अरे, देकर देखो।
चार कौए उर्फ़ चार हौए
बहुत नहीं थे सिर्फ़ चार कौए थे काले उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले
उनके ढंग से उड़ें, रुकें, खाएँ और गाएँ वे जिसको त्योहार कहें सब उसे मनाएँ।
कभी-कभी जादू हो जाता है दुनिया में दुनिया-भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गए इनके नौकर चील, गरूड़ और बाज हो गए।
हंस मोर चातक गौरैयें किस गिनती में हाथ बाँधकर खड़े हो गए सब विनती में
हुक्म हुआ, चातक पंछी रट नहीं लगाएँ पिऊ-पिऊ को छोड़ें कौए-कौए गाएँ।
बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को खाना-पीना मौज उड़ाना छुटभैयों को
कौओं की ऐसी बन आयी पाँचों घी में बड़े-बड़े मनसूबे आये उनके जी में
उड़ने तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले उड़ने वाले सिर्फ़ रह गए बैठे ठाले।
आगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन है यह दिन कवि का नहीं चार कौओं का दिन है
उत्सुकता जग जाए तो मेरे घर आ जाना लंबा किस्सा थोड़े में किस तरह सुनाना!
माली ने वादा खिलाफी की और फूलों की हँसी छीन ली. मौसम ने भी माली का साथ दिया और हरियाली के लिए प्रवेश-निषेद्ध कर दिया. पेड़ चिल्लाये, पौधे चीखे- यह जुल्म है. माली ने सुना, मौसम ने सुना दोनों हंसने लगे. यह हँसी पिछले कई बरस से बरस रही है और बाग़ की दूब मुसकराने भर को तरस रही है. बच्चे, जो पहले रोज आते थे बाग में लुका-छिपी खेलने, अब नहीं आते. घरों में ही रहते हैं वे और स्लेट पर बनाते हैं बन्दूक के चित्र. सोचता हूँ मैं कि- शायद बच्चे भी सोचते होंगे कि जब वे बड़े हो जाएंगे तब माली और मौसम उनसे बच कर कहाँ जाएंगे!
-सुधीर सक्सेना 'सुधि' ( जयपुर)
रिश्ते : दो स्थितियाँ
(1)
रूठें कैसे नहीं बचे अब मान मनोव्वल के रिश्ते अलगे-से चुपचाप चल रहे ये पल दो पल के रिश्ते .
कभी गाँठ से बंध जाते हैं कभी गाँठ बन जाते हैं कब छाया कब चीरहरण, हो जाते आँचल के रिश्ते
आते हैं सूरज बन, सूने में चह-चह भर जाते हैं आँज अँधेरा भरते आँखें छल-छल ये छल के रिश्ते
कच्चे धागों के बंधन तो जनम-जनम पक्के निकले बड़ी रीतियाँ जुगत रचाईं टूटे साँकल के रिश्ते
एक सफेदी की चादर ने सारे रंगों को निगला आज अमंगल और अपशकुन कल के मंगल के रिश्ते
(2)
रँगी परातों से चिह्नित कर चलते पायल -से रिश्ते हंसी-ठिठोली की अनुगूँजें भरते, कलकल-से रिश्ते
पसली के अंतिम कोने तक कभी कहकहे भर देते दिन-रातों की आँख-मिचौनी हैं ये चंचल-से रिश्ते
उमस घुटन की वेला आती धरती जब अकुलाती है घन-अंजन आँखों से चुपचुप बरसें बादल -से रिश्ते
पलकों में भर देने वाली उंगली पर रह जाते हैं बैठ अलक काली नजरों का जल हैं, काजल -से रिश्ते
कभी तोड़ देते अपनापन कभी लिपट कर रोते हैं कभी पकड़ से दूर सरकते जाते, पागल -से रिश्ते
- कविता वाचक्नवी
आकाश पर चढ़े सूरज
आकाश पर चढ़े सूरज पूछना चाहूंगी मैं तुमसे कौन है यह पृथ्वी तुम्हारी मां, बहन, सखी, प्रियतमा किस अधिकार से आते तुम रोज रोज... अगन बरसाते आंखें दिखलाते सात घोड़ों के रथ पर सवार!
पत्नी है शायद... तभी तो तुम भूल सब हर रात ही चैन से सो जाते!
-शैल अग्रवाल
मुस्कुराती नहीं हैं लड़कियां '
अक्सर ही जाने क्यूं- मुस्कुराती नहीं हैं लड़कियां औरत' बन जाने के बाद क्या यह ' औरत ' शब्द ही लड़कियों से छीन लेता है उनकी मुस्कराने की अदा गालों पे छा जाने वाली सुर्खी आंखों से झांकती शरारतें और ओठों की थिरकन
जाने क्यूं खिलखिलाती नहीं हैं लड़कियां ' औरत ' बन जाने के बाद क्या यह ' औरत ' शब्द ही छीन लेता है उनकी खिलखिलाने की अदा गालों में पड़ जाने वाले गड्ढे आंखों के रेशमी सपने और ओठों का अनछुआपन।
लड़कियों मुस्कुराओ,हंसो खिलखिलाती रहो ' औरत' बन जाने के बाद भी क्यूंकि-तुम्हें ही तो विरासत में देनी है
हंसी-मुस्कुराहट-खिलखिलाहट- अपनी बेटियों को जो- चलाएंगी वंश
बढ़ाएँगी तुम्हारी शान
और तुम्हें- तुम्हारी- खिलखिलाहटों की पहचान के बदले मिलेंगे आन-बान और मान।
-प्रभाकिरण जैन
गर तुम गुलाब होते
तुम्हें देख प्रेमी प्रेम पत्र लिखते वफा की कसमें खाते
गर तुम गुलाब होते किसी किशोरी के गाल लाज से लाल हो जाते क्योकि तुम उसे उस गुलाब की याद दिलाते जिसे लगाया था किसी ने उसके बालों में गर तुम गुलाब होते आकाश में दोडते बादल कुछ जल की बूदें छिडक हंसते हंसते भाग जाते गर तुम गुलाब होते नाचती हुई हवा तुम्हें चूमकर ही आगे बढती गर तुम गुलाब होते भंवरे अपनी गुनगुन से अपने प्यार की अभिव्यक्ति करते गर तुम गुलाब होते कितने कितने कवि तुम पर काव्य लिखते किसी सुन्दरी के कपोल और अधरों से तुम्हारी तुलना करते गर तुम गुलाब होते उषा की किरणे प्रथम तुम्हारा स्पर्श करके आगे बढतीं गर तुम गुलाब होते लोगों के ह्रदय सोदर्य और सुगन्ध से भर उठते सारे फुल तुमसे इर्श्या करते लेकिन तुम तुम मेरे लिये किसी भी फूल से सुन्दर हो और मैं तुम्हें सदा से प्यार करती हूं करती रहूंगी...
-कुसुम सिन्हा
ओ मेरी मंजरी
मेरे कंधे पर सिर रखकर तुम सो जाओ ओ मेरी मंजरी आम की।
मैं तुममें खो जाऊं तुम मुझमें खो जाओ मेरी मंजरी आम की।
ये पावों के छाले बतलाते हैं, तुमने मेरी खातिर कितनी पथ की व्यथा सही है
पीर तुम्हारी हर लूँ यह चाहता बहुत हूँ किंतु कंठ से मुखरित होते शब्द नहीं हैं
मेरी शीतल चंदन वाणी तुम हो जाओ ओ मेरी मंजरी आम की।
वह भी कैसा सम्मोहन था खिंचकर जिससे आये हम उस जगह जहां दूसरा नहीं है।
यह भी क्रूर असंगति जीनी पड़ी हमी को घर अपना है, पर अपना आसरा नहीं है
बीज बहारों के पतझर में तुम बो जाओ औ मेरी मंजरी आम की।
मेरे कंधे पर सिर रखकर तुम सो जाओ ओ मेरी मंजरी आम की।
- बुद्दिनाथ मिश्र
विवाह
विवाह नहीं,
मात्र बंधन जिस्मानी
यह तो है वंधन
सात जन्मों का
या फिर
जन्म-जन्मांतर का
लेकर सात फेरे
मान कर साक्षी
अग्नि को
एक दूसरे का
करके पाणिग्रहण
दिया जाता, वचन
साथ निभाने का।
विवाह तो है
एक तैरती हुई
जीवन नौका
पतवार जिसकी
थामता है पति
और पत्नी
पूरे विश्वास से
देती उसको सहारा
विवाह तो है
जिन्दगी की गाड़ी
पहिये हैं दो
जिसके पति-पत्नी
पहिये जब चलते
प्यार की धुरी पर
दौड़ती जाती
जिन्दगी की गाड़ी
जमीं चाहे हो जितनी
ऊबड़-खाबड़
पहियों का संतुलन मगर
बिगड़ जब जाता
हो जाता सब कुछ
तब गडबड
जरा-सी भी ऊँची-नीची
होती जब जमीं
ठोकर खाकर तब
लुढ़क जाती
जिन्दगी की गाड़ी
यही विवाह तब
अभिशाप बन कर
बन जाता
बोझ जिन्दगी का।
-डॉ.कुसुम अग्रवाल
प्यार पर बहुत हो चुकी कविताएं
प्यार पर- बहुत हो चुकी कविताएं
पिता की फटी बिवाइयों पर-
अभी तक नहीं लिखी कविताएं
जो- रिश्ता ढूंढते-ढूंढते- टूटने पर कसकता है
नहीं पढ़ी गई कविताएं
बेटी के चेहरों की रेखाओं पर जो- उभर आती है अपने आप असमय ही मुझे लगता है अब इन रेखाओं की गहराइयों पर कविताएं लिखूं प्यार पर बहुत हो चुकी कविताएं!
विवाह जीवन का एक अनिवार्य एवं महत्वपूर्ण प्रसंग रहा है। वह जीवन का एक महान उत्सव तो रहा ही है, एक ऐसे संबंध का प्रारंभ रहा है जो अत्यंत रागात्मक तो है ही व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन संदर्भों में एक बड़ा मूल्य भी है। यह दो प्राणियों को तन मन से जोड़ता है, सृजन के स्रोत खोलता है और आनंद के साथ अनेक पारिवारिक और सामाजिक उत्तरदायित्वों से उन्हें संपन्न करता है। वास्तव में स्त्री और पुरुष का एक-दूसरे के प्रति आकर्षण, देहात्मक संलिप्ति और सृजन एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया समस्त प्राणियों में व्याप्त है। मनुष्य ने अपनी निरंतर सांस्कृतिक यात्रा में अपने पशु सुलभ कर्म को सुंदर और मूल्यवान बनाने का प्रयास किया है ताकि जिओ और जीने दो की प्रवृत्ति विकसित हो और व्यक्तिगत अराजकता के स्थान पर सामाजिक लय एवं नियंत्रण का विकास हो सके। विवाह उन्ही प्रयत्नों में से एक है।
विवाह वर-वधू को तो एक नियंत्रित और दायित्वपूर्ण रागात्मक बंधन में बांधता ही है, दो परिवार भी बंधते हैं, गांव भी बंधते हैं और राग संबंध का एक वृत्त निर्मित होता है। पहले जब संयुक्त परिवार थे तब विवाह से पहले लड़की की देखा देखी नहीं होती थी। किसी गांव का कोई व्यक्ति अपने दो-चार साथियों के साथ अपने संबंध के किसी गांव में जाता था और उस गांव के अनेक वरिष्ठ लोग मिल जुलकर किसी घर के किसी लड़के का विवाह तय कर देते थे। संयुक्त परिवार टूटने लगे। विभक्त परिवारों के शादी व्याह में गांव की भूमिका समाप्त हो गयी। लड़के-लड़कियां विवाह पूर्व एक-दूसरे को देखने लगे। स्वीकृतियों, अस्वीकृतियों का दौर शुरु हुआ। धीरे-धीरे विवाह एक परिवार का और फिर केवल पति-पत्नी का विषय बनकर रह गया।
इस स्वरूप परिवर्तन के बावजूद विवाह जीवन का अनिवार्य प्रसंग बना रहा। अभी तक उसका कोई ठोस विकल्प सामने नहीं आया। विवाह से परिवार बनता है। उस परिवार में मनुष्य बहुत सुरक्षित अनुभव करता है। कोई कितना भी यशस्वी क्यों न हो, संपन्न क्यों न हो, भीड़ छंटने के बाद निपट अकेला रह जाता है। परिवार ही वह जगह है जहां व्यक्ति आश्वस्ति पाता है, जहां श्रेय में प्रेय और प्रेय में श्रेय का अनुभव करता है। बाहर की थकान से पस्त आदमी घर में आता है तो लगता है हां, घर आ गया है। लेकिन इस घऱ की सशक्त धुरी स्त्री होती है। विवाह के समय बोले जाने वाले मंत्र वर-वधू से प्रण कराते हैं कि दोनों एक-दूसरे के प्रति श्रद्धा और प्रेम से समर्पित रहेंगे, जीवन पर्यंत एक दूसरे की रक्षा और सम्मान करेंगे। उनके संबंधों को जन्म-जन्मांतर का संबंध बताया जाता है। लेकिन व्यवहार में क्या होता है, सबको ज्ञात है। स्त्री तो पुरुष को सात जन्म तक पाने की आकांक्षा पाले होती है, उसके प्रति समर्पित होकर उसकी मंगल-कामना में अपने को घुलाती रहती है, व्रत उपवास के द्वारा देवताओं से उसके सुख और आयु की याचना करती है और पुरुष उसे तरह-तरह की यातनाएं देता है, अपमानित करता है, उसे व्यक्ति नहीं, वस्तु समझता है, तरह तरह के नियंत्रणों में जकड़ कर उसके जीवन को बंदी बना देता है। उसके द्वारा बनाए गये विधानों और परंपराओं ने स्त्री को ऐसा पाठ पढ़ाया है कि वह पुरुष द्वारा दिए गए अपमान और ताड़ना को सहज क्रिया-कलाप मान कर स्वीकार कर लेती है और अपने स्त्रीत्व को स्वयं हीनता का पर्याय मान लेती है।
तो सच्चाई यह है कि सभी वर्गों में स्त्री की स्थिति यही है, अपवाद सब जगह होते हैं, यहां भी हैं। आज शिक्षा का व्यापक प्रसार हो रहा है, आशा की जाती रही कि शिक्षित व्यक्ति नयी चेतना के आलोक में स्त्री-पुरुष के बीच व्याप्त वैषम्य को समझेगा, उसकी पीड़ा अनुभव करेगा और स्त्री को उसका मानवीय रुतवा प्रदान करेगा, उसे दासी नहीं मित्र, वस्तु नहीं व्यक्ति समझेगा लेकिन व्यवहार में हो क्या रहा है? पढ़े लिखे घरों में भी स्त्रियां अपमानित हो रही हैं, ताड़ित हो रही हैं, दहेज के कारण जलायी जा रही हैं। जो लड़कियां स्कूल-कालेज में बहुत ही तेजस्वी एवं प्रतिभाशाली होती हैं और संकेत देती हैं कि वे भावी जीवन में बहुत कुछ करेंगी वे विवाह के बाद पुरुष के दासता चक्र में पिसने लग जाती हैं और घर के काम-काज में खपा दी जाती हैं। जो लड़कियां नौकरी करती हैं, पुरुष के समान ही पद पर होती हैं और उसके समान ही कार्य करती हैं वे भी घर आते ही घर की दासी बन जाती हैं। यानी पुरुष तो स्वच्छंद भाव से अपने दोस्तों से गपशप करता है या अपने य़श अर्जन का काम करता है और थकी-मांदी स्त्री को घर आते ही घर को अपने सिर पर उठा लेना पड़ता है। वह घर के कामों में खपती है और पुरुष हुकुम चलाता है।
नारियां अब पढ़-लिख कर और अपने पैरों पर खड़े होकर स्वतंत्र हो रही हैं। वे विवाह के पीछे निहित विडंबनाओं एवं पुरुष की धूर्तताओं को समझने लगी हैं। मंगलकामना के लिए बनाए गये तमाम यातनामूलक आचारों के खोखलेपन को समझने लगी हैं। जन्म-जन्मांतर के झूठे संबंधों के निर्वाह की प्रक्रिया में इस जन्म को नरक बना देने के विधान को चुनौती देने लगी हैं। देश-विदेश में जागृत स्त्री-विमर्श नारी को उसकी मानवीय अस्मिता के प्रति सचेत कर रहा है। अतः अब दाम्पत्य जीवन में टकराहटें होने लगी हैं, तलाक की संख्या बढ़ती जा रही है।
वैवाहिक संबंध टूट रहे हैं सो टूट रहे हैं। अब अनेक स्वावलंबी लड़कियां विवाह से विमुख भी हो रही हैं। वे कुछ करना चाहती हैं, कुछ बनना चाहती हैं किन्तु उन्हें लगता है कि वैवाहिक जीवन उनकी भावी प्रगति के मार्ग में व्यवधान बन जायेगा। उनकी अस्मिता दबा दी जायेगी और पुरुष तथा उसके लोगों की ताड़ना तो सहनी ही पड़ेगी। कुछ पुरुषों में भी विवाह के प्रति उदासीनता लक्षित हो रही है। वे भी परिवार के उत्तरदायित्वों से मुक्त होकर स्वतंत्र जीवन बिताना चाहते हैं। विवाह की अनिवार्यता के साथ जो धार्मिकता जुड़ी थी, उसकी व्यर्थता का बोध उन्हें होने लगा है। अतः लग रहा है कि विवाह प्रथा चरमरा रही है।
मुझे लगता है कि विवाह-प्रथा का आधार बहुत मजबूत है, उसकी परिकल्पना के पीछे बहुत गहरा चिंतन और मूल्य-दृष्टि है। आज भी इसका कोई सही विकल्प लक्षित नहीं होता। विवाह न करके मुक्त जीवन बिताना किसी भी व्यक्ति का निजी अधिकार है। लेकिन यदि सभी लोग मुक्त जीवन बिताने लगे तो सृजन परंपरा ही समाप्त हो जायेगी या जो सृजन होगा वह लावारिस होगा। जब तक हमारे समाज का मिजाज नहीं बदलता, ऐसा सृजन नाजायज माना जाएगा और अनाथालयों की शोभा बढ़ाता रहेगा। हां, यदि स्त्री-पुरुष छाती ठोक कर उस सृजन को अपना घोषित करते हैं और हमारी समाज व्यवस्था तथा कानून व्यवस्था में उसकी सम्मानपूर्ण जगह बनती हो तो कोई हर्ज नहीं।
बन पायेगी क्या? तो मुझे नहीं लगता कि थोड़ी बहुत चरमराहट के बावजूद विवाह प्रथा समाप्त होगी। आवश्यकता इस बात की है कि इसकी मूल परिकल्पना की पहचान कर इसमें आयी कुरीतियों, विषमताओं और गंदगी को दूर किया जाए। यह पशुता से मनुष्यता की ओर आने वाली संस्कृति यात्रा की महत्वपूर्ण देन है। यह स्वयं पशुता के लक्षणों से भर जाये, निश्चय ही यह बहुत पीड़ादायक स्थिति है।
वह घरमें गैस ठीक करने आया था। पर चारों तरफ बिखरे फूलों और मेहमानों को देखकर ठिठक गया। "कोई उत्सव चल रहा है क्या - दिवाली तो खत्म हो गई - फिर?" "हां - घर में शादी है।" "शादी यू मीन अरेन्ज्ड मैरिज?" "नहीं लव मैरिज।" "लव मैरिज - ऐतराज नहीं?" "नहीं काबिल, मनचाहा और भरोसे-मन्द जीवनसाथी हो तो इससे ज्यादा मां-बाप और क्या चाह सकते हैं?" उसकी अतिक्रमण करती जिज्ञासा को शान्त करते हुए मैंने प्रश्न पर प्रश्न पूछा। "क्या तुमने कोई भी सवाल जवाब नहीं किया था - पूरी तरह से आश्चर्य चकित था वह?" "नहीं, मुझे अपने बच्चों की पसंद और चरित्र, दोनों पर ही पूरा भरोसा है जैसे उन्हें अपने मां बाप और परिवार के अन्य सदस्यों पर। क़्योंकि भरोसा बस प्यार पर ही तो पनप पाता है और एक दूसरे पर पूरा भरोसा कर पाएं इतना प्यार हम एक-दूसरे से करते हैं।" "तुम और तुम्हारा परिवार दूसरे एशियन से काफी फरक है। अभी मैं ऐस्टन में किसी एशियन के घर गया था वहां वह लड़की घर में अकेली थी और मुझे गैस-बौयलर दिखला रही थी, इतने में उसका पति काम से वापस आ गया और अकेली पत्नी को मुझसे बातें करते देख, वहीं मेरे सामने ही लड़की के मुँह पर कसकर तमाचा मार दिया। लड़की के साथ-साथ मैंने भी बहुत अपमानित महसूस किया खुदको। उस परिवार में विश्वास नाम की कोई चीज थी ही नहीं।" "किसी एक परिवार को तुम पूरे समाज का प्रतीक नहीं मान सकते। शायद वह एक अशिक्षित और असुरक्षित परिवार हो।" "हां, तुम्हारे यहां तो कुलीन और पिछड़ी दो तरह की जातियां होती हैं ना? वैसे भी तुम्हारे जैसे दिखते वह लोग शायद दूसरे देश और धर्म से थे। वह अपने विचारों में ज्यादा कट्टर होते हैं।" "नहीं, बात देश, समाज, और धर्म या सवर्ण और कुवर्ण से ज्यादा शिक्षा और सुखी परिवार की है। ऐसे परिवार हर समाज में होते हैं। बचपन में हमें कितनी देखरेख और प्यार मिला स़ंभवत: हम उतने ही सुलझे और सफल वयस्क बन पाते हैं। अकेला, डरा और जूझता बच्चा तो बस एक उलझी और तलख मानसिकता का असुरक्षित वयस्क ही बन पाएगा ज़िसके लिए समाज की तो छोड़ो, अपने परिवार पर भी भरोसा कर पाना मुश्किल काम होगा। कुछ दिन पहले मैं यहां मार्क्स स्पेन्सर में खरीददारी कर रही थी। अचानक तुम्हारे समाज का वह छह-साढ़े छह फुट का व्यक्ति अपनी विचित्र वेशभूषा और रंग-बिरंगे खड़े बालों के साथ अपने साथियों समेत स्टोर में घुसा और एक बेहद कमजोर और बूढ़ी एशियन महिला पर बेहद अभद्रता के साथ हंसते हुए, उसके सर पर थूककर आगे बढ़ गया। मुझे उस पर बेहद गुस्सा आई, इसलिए नहीं कि वह किसी और समाज से था ; इसलिए कि उसे किसी ने इतनी भी शिक्षा नही दी थी कि बुजुर्गों की इज्जत कर सके! य़दि कमजोरों की मदद नहीं कर सकता तो कम से कम उनके साथ बदतमीजी तो न करें। उसके व्यवहार और आकार से मुझे डरना चाहिए था पर मैं आगे बढ़ी और मैंने उससे कहा,"एक्सक्यूज मी - क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुमने अभी-अभी अपनी दादी समान बुजुर्ग महिला के साथ जो अभद्र व्यवहार किया है, वह भी बिना किसी वजह के, उसके लिए तुम्हें उनसे जा कर माफी मांगनी चाहिए।" एक मिनट को उसके चेहरे पर एक डरावनी हंसी कौंधी फिर शायद मेरे चेहरे और इरादों की दृढ़ता देख 'सॉरी' कहकर आगे बढ़ गया वह। किया हुआ अभद्र व्यवहार तो वापस नहीं हो सकता था पर चोट थोड़ी सहने लायक हो गई। मैं ऐसे वयस्कों को किसी जाति या समाज की नहीं पूरी मानवता की हार मानूंगी। और ऐसी मानसिकता लेकर बच्चे बड़े हों यह हर जाति और समाज के मां-बाप के लिए एक शर्मनाक बात है।
बच्चे वहीं करते हैं जो घर में बड़ों को करता देखते हैं। अगर हम कहेंगे कि काला रंग खराब है तो बचे यही मान्यता लेकर बड़े होंगे। ऐसा ही कुछ हुआ था मेरे साथ जब एक दिन मैं बस में जा रही थी और नौ-दस साल का वह दुबला-पतला बच्चा अपने भारी भरकम बस्ते के साथ बस के हर बार मुड़ने पर बड़ी मुश्किल से खुद को खड़ा रख पा रहा था। जैसे-तैसे खुद को थोड़ा सिकोड़-समेटकर उसके बैठने लायक जगह बनाते हुए मैंने उससे कहा यहां बैठ जाओ। पर उसने बिना मेरी तरफ देखे ही जवाब दिया मैं पाकीज (यहां हर एशियन को अक्सर लोग इसी नाम से बुलाते हैं) के पास नहीं बैठता। मानस पर प्रंकित यह घटना आज बीस साल बाद भी भुलाए नहीं भूलती और आज भी अक्सर ही अकेले में मैं सोचती हूँ उ़सकी इस मानसिकता में दोष किसका था उसका या उसके मां बाप का - शायद ऐसे ही बच्चे बड़े होकर समाज में विद्रोह और तोड़-फोड़ फैलाते हैं नाजी मानसिकता को जिन्दा रखते हैं। दूसरी जाति के लोगों के घरों में चोरी करते और आग लगाते हैं। घटनाओं की एक लम्बी श्रृंखला गिनाई जा सकती है पर सारांश बस यही है कि किसीको न जानो तो संदेह और अंधविश्वास दोनों ही जन्म लेते हैं और संदेह और अंधविश्वास से न बुझने वाली नफरत जन्म लेती है।
"हां इसलिए हम जब छोटे थे तो हमारे मां बाप जो कि हैन्सवर्थ में रहते थे (हैन्सवर्थ आज बरमिंघम का लाहौर और लुधियाना बन चुका है) हमें एशियन बच्चों के साथ खेलने देते थे और जब भी कोई नया एशियन पड़ौसी पड़ौस में आता था तो हम उनसे मिलने जाते थे।"
यही तो मुश्किल है हमारे आज के इस इक्कीसवीं सदी के समाज की प़हले जो साधारण होता था आज अच्छा समझा जाता है और जो खराब समझा जाता था आज उसे हम आम मान चुके हैं। जो अच्छा था उसे तो अब हम पूरी तरह से भूल ही चुके हैं। पड़ौसियों के साथ मेल-जोल और सद्व्यवहार तो एक आम बात होनी चाहिए हर समाज में। यदि हम एक सुचारू समाज चाहते हैं तो हमें अपनी मान्यताएं फिरसे बदलनी और सही करनी पड़ेंगी। मापदंड के तराजू की सूई को थोड़ा खसकाना पड़ोगा जिससे अच्छा भी उसकी रेन्ज में आ जाए और एकबार फिरसे समाज उसे पहचानने लगे।
अब आक्रमण करने की उसकी बारी थी। "क्या तुम कभी ऐस्टन वगैरह के घरों में गई हो वहां लोग आज भी दूसरी ही दुनिया में रहते हैं। वे औरतें चौकों के फर्श पर बैठकर सब्जी और मछली काटती हैं, कोई चौपिंग बोर्ड नहीं - वर्क सरफेस नहीं - नीचे एक कागज का टुकड़ा तक नहीं और वहीं से आवाज देंगी क्या तुम चाय पीओगे अ़ब तुम्हीं बताओ क्या तुम वहां चाय पीओगी? उनके घर में विश्वास करोगी कि चाय साफ बर्तन में बनी होगी और साफ कप में पीने को मिलेगी।"
"हां - क्यों नहीं, क्योंकि बनाने के पहले वह उसे साफ तरह से धोएंगी तभी खाना बनेगा और परोसा जाएगा। उन्होंने सब्जियों को जमीन से उगते देखा है और इसलिए उन्हें जमीन से कोई परहेज नहीं। उनका फर्श दिन में दो बार धुलता और साफ होता है। यह अविश्वास एक दूसरे के बारे में न जानने की वजह से ही होता है।"
वह मेरे जवाब से पूर्णत: विश्वस्त नहीं था। पर बात का सारांश समझ रहा था। बातें छोटी सी थीं और औपचारिक छोटी-छोटी बातों के साथ उठी थीं पर बड़े बड़े और गहरे अर्थ ले चुकी थीं - हम दोनों एक दूसरे से बहुत कुछ कह और समझा गए थे - छोटे-छोटे बीजों से ही तो बड़े-बड़े वृक्ष उगते हैं और शायद ऐसे वृक्ष ही आने वाली पीढ़ियों को ठंडी छांह दे पाएंगे।
" बरसों हो गये तुमसे बात किये। सुना है तुम अब भी अकेले हो। मैं भी अकेली हूं। जल्दी मिलना चाहती हूं। नये साल की शुभकामनाएं।" - तुम्हारी (न हुई) रंजना।
संजीव को नये साल पर शुभकामनाओँ के जो दर्जनों कार्ड मिले थे, उनमें एक यह भी था।
रंजना शुभकामना दे रही है या ताना।
संजीव को लगा वह ताना दे रही है। इतने लम्बे अरसे के बाद इस तरह का कार्ड भेजने का उसका और इरादा क्या था?
" तुम्हारी (न हुई) रंजना।" न हुई? अरे तुम हो भी कैसे सकती थीं? और देखो, किस अधिकार से लिख रही है " तुम्हारी " ! जब हुई ही नहीं तो तुम्हारी कैसे हो गई?
संजीव खीज उठा। अरे मैने तो बरसों पहले तुमसे कोई भी रिश्ता रखने से इंकार कर दिया था। ऊपर से कहती है, सुना है तुम अब भी अकेले हो।
हां, हूं। तुमसे मतलब मुझे क्यों लिखती हो-"मैं भी अकेली हूं।" रहो। तुम जैसी औरतें अकेली रहने के लिए
ही पैदा होती हैं। "जल्दी मिलना चाहती हूं ", हंह, ऐसे बता रही है जैसे मैं बैठा उसका इँतजार कर रहा हूं। क्यों मिलें? तुममें है ही क्या?
बड़बड़ाते हुए संजीव ने कार्ड को फाड़कर कूड़े दान में डाल दिया। शेष कार्ड उसने कमरे में बंध उस डोरी पर लटका दिये, जिस पर पहले और कई कार्ड सजा रखे थे।
रंजना के कार्ड को फाड़कर भी संजी की खीझ नहीं मिटी। उल्टे उसकी पुरानी यादों में चुभा कांटा फिर से टीसने लगा और वह अनचाहे अतीत के उन कैक्टस भरे खंडहरों में पहुंच गया जिनके भुरभुरे पत्थरों पर पांव रखने से उसने खुद को बरबस रोक रखा था। ढलान से लुढ़ककता हुआ वह जिस जगह जाकर रुका, वहां सामने एक तस्बीर थी। बदरंग और बदनुमा।
रंजना पहली मुलाकात में जिस तरह मुस्कुराई थी, उससे संजीव को देखते ही उससे नफरत हो गयी थी।
यह लड़की मुझसे शादी करना चाहती है। मेरे साथ जीवन काटने के लिए प्रस्तुत है। कट सकेगा? हरगिज नहीं। जो देखने में ऐसी बदसूरत है, उसके प्रति आकर्षण का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। उभरे चौड़े मसूड़े और बेतरतीब दांत, मानो कच्चा मांस खाती है। इसकी तो नाक भी कितनी लम्बी और चोंचीली है और माथा कितना छोटा है, माना बिज्जू हो। मुस्कुराती है तो लगता है चिंपाजी ने खीसें निपोरी हैं। शरीर भी वैसा ही है बंदरिया का। सपाट वक्षस्थल, कंधे छोटे और पेंदा स्थूल। लड़की न हुई, बैंगन हुई। और देखो, खुद को वही समझती भी है। सिर पर बैंगन के डंठल जैसा जूड़ा बनाकर आयी है। मैं क्या तुम्हारा भुर्ता बनाऊँगा?
संजीव ने उसे आर्य समाज की विवाहेच्छुक लड़कियों की सूची में से चुना था। उम्र, कद, योग्यता और प्रोफेशन के आधार पर और टेलिफोन पर औपचारिक बातचीत के बाद एक एक रेस्टोरेंट में उससे मिलने और उसे देखने गया था, लेकिन जल्दी ही पिंड छुड़ाकर भाग आया था।
यह कोई चौबीसवीं या पच्चीसवीं लड़की थी, जिससे संजीव मिला था। उसके पिता जी ने उसकी अरेन्ज्ड शादी करने के लिए ईलिंग के आर्य समाज के रजिस्टर में उसी तरह उसका नाम भी लिखवा दिया था, जिस तरह अन्य सैकड़ों लोगों ने लिखवा रखा था। जब लड़की वाले पिता जी से संपर्क करते, तो वे उन्हें संजीव की इस पसंद से अवगत करा देते कि पारिवारिक तौर पर मिलने से पहले लड़का लड़की से मिलना चाहेगा। क्या करें, मॉडर्न खयालों का है। वे मानो उसकी आधुनिकता को ऐब बताते हुए अपनी तरफ से सफाई देते और यह जताते कि देखिए इतने बरस इंगलैंड में रहने के बाद भी हम पुराने आदर्शों पर कायम हैं। तब संजीव लड़की से स्वयं बात करता और मिलने का स्थान तथा समय नियत करता।
मुलाकात होने पर उसे किसी का भूगोल अच्छा न लगता, तो किसी का इतिहास। कोई उसे हथिनी लगती या आलुओं का थैला, तो कोई बेंत या गन्ना। किसी का नाम-नक्शा उबकाई पैदा करता, किसी की चाल-ढाल या बातचीत का लहजा। बहुत कम लड़कियां मिली जिनसे उसने लम्बी बातचीत करना और दुबारा मिलना चाहा, लेकिन तब उन लड़कियों ने ही कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। वैशाली को तो वह अब तक नहीं भूल पाया। कितनी सुन्दर थी और मधुर स्वभाव वाली भी। संजीव उसे देखते ही फिदा हो गया था और पहली मुलाकात में उसने उससे विवाह करने का प्रस्ताव कर दिया था, लेकिन वैशाली अपने से भी ज्यादा हैंडसम लड़के की तलाश में थी, जो साथ में रईस भी हो। उसने संजीव को जरा भी घास नहीं डाली थी। वैशाली की उपेक्षा से संजीव में ऐसा हीनभाव उभरा कि उसका दिल टूट गया था।
रही-सही कसर उस गुजरातिन दीक्षा ने पूरी कर दी थी, जिसने शालीनता नकाब पहनकर पूछा था- तुम्हारी आय तो ठीक-ठाक है न, मेरा खर्चा उठा सकोगे?
शादी न हुई, कुत्ता बिल्ली या कोई पालतू जानवर रखना हुआ। संजीव को गुस्सा आया था। भला इन लड़कियों की संझ में यह क्यों नहीं आता कि खर्च का बोझ क्या सिर्फ पति उठाता है? इसे मिलकर उठाया जाता है।
संजीव को दो-तीन लड़कियां ऐसी भी मिलीं, जिनके मां-बाप ने दबाव डाला था, लेकिन उनके ब्वॉयफ्रेंड थे। यह तो अच्छा हुआ कि उन्होंने खुद ही संजीव को बता दिया, वरना बाद में मुसीबत होती। और वह समीरा, वह कितनी चालाक थी-संजीव को याद आया। उसने एक लड़का पहले ही पसंद कर रखा था, लेकिन संजीव से यह देखने के लिए मिलने आई थी कि दोनों में से कौन ज्यादा ठीक रहेगा। बाय-बाय कहते समय उसने कितनी अकड़ के साथ कहा था-सॉरी संजीव, यू आर नॉट टु माई एक्सपेक्टेशेज। आई हैव अ बैटर् ऑप्शन।
एक और थी, नवीना। कई महीने उसने संजीव को बीमा पॉलिसी की तरह अटका रखा था। देखने में बुरी नहीं थी और शायद संजीव उसे दो तीन मुलाकातों के बाद पसंद भी कर लेता, लेकिन मिलने की बजाय वह टेलिफोन पर मीठी-मीठी बातों का चारा डालती रही। जिस लड़के को वह चाहती थी, उसे शादी की कोई जल्दी नहीं थी और नवीना को डर था कि अगर बाद में वह मुर्गा हाथ से निकल गया तो मैं कहीं की नहीं रहूंगी। संजीव उस मछली की तरह कांटे में फंसा रहा, जिसे मछलीमार ने ज्यादा देर तक जिंदा रखने के लिए पानी में ही रहने दिया था।
और इस तरह संजीव बरसों लड़कियां देखता रहा।
संजीव को सुन्दर कहा जा सकता है और वह खुद को सुन्दर मानता भी था। आखिर उसमें कमी क्या थी-पांच फुट साढ़े आठ इंच कद, मध्यम छरहरा बदन, गोरा रंग और न्यूहम काउंसिल के हाउसिंग डिपार्टमेंट में अठ्ठारह हजार पाउंड सालाना वेतन पाता था, जो लड़कियों को देखते-देखते कुछ और बढ़ गया था। बाप का अकेला बेटा। लड़कियों को और क्या चाहिए था ?
...लेकिन लड़कियों को वाकई बहुत कुछ और भी चाहिए था। आर्य समाज के अलावा संजीव हिन्दू सोसाइटी, एसियन एसोसियेशन और मन्दिरों की शरण में तो गया ही, मैरिज ब्यूरो जैसी दुकानों में भी गया। उसने उनके द्वारा आयोजित ' शुभ मिलन ', ' हैप्पी यूनियन' या ' लकी चान्स ' जैसा कोई समारोह नहीं छोड़ा।
उसे लड़की चाहिए थी भारतीय, लेकिन ब्रिटेन में पली-पुसी और शिक्षित और इन सबसे बढ़कर सुन्दर। सुन्दर लड़कियों का इन समारोहों में एकदम अकाल था। वे या तो भारत से आई ही नहीं थी या भारतीय माता-पिताओं ने इंगलैंड आकर सुन्दर लड़कियां पैदा करना बंद कर दिया था य़ा शायद मां-बाप द्वारा ढूंढ़े खूंटे बंधने से पहले ही वे रस्सी तुड़ाकर भाग गयी थीं। संजीव शादी-शुदा होने के ख्वाब देखता रह गया।
...और फिर वह ख्वाब भी टूट गया। जब वह करीब चालीसवीं लड़की को मिलने के बाद घर लौटा, तो पिताजी के यह पूछने पर चिढ़ गया कि कहो, कैसी लगी?
वह लाल कपड़े से भड़के सांड की तरह बोली--शिट थी।
पिताजी उसके अब तक एक भी लड़की पसंद न करने से दुखी थे ही, उनके मुंह से निकल गया--वत्तरों लांघ जाओ तो इह ही हुंदा है।
पंजाबी के इन शब्दों का अर्थ वह समझता था, यानि शादी की उम्र निकल जाने पर ऐसा ही होता है। छत्तीस वर्षीय संजीव को लगा, पिता जी भी मुझे ताना दे रहे हैं कि तेरी शादी की उम्र निकल गयी। जब तक वह इस आघात से उबरता, पिताजी के इस कथन ने तो मानो बांध ही तोड़ दिया--हमने तो बेटा, अपने मां-बाप की चुनी हुई तेरी मां का चेहरा पहली बार शादी के बाद देखा था। तूने इतनी लड़कियां देखीं, क्या एक भी पसन्द नहीं आई? अब यहां बसरे की हूर तो मिलने से रही।
मैं आपकी तरह घोंचू नहीं हूं--संजीव ने पिता की इज्जत तक को धूल में मिलाते हुए कहा। इस जवाब को सुनकर जो होना था, वही हुआ। बाप -बेटे में जमकर तकरार हुई और पिताजी ने अल्टीमेटम दे दिया--तुम अपने बाप को घोंचू कहते हो, तो मां को क्या कहोगे? जाओ दफा हो जाओ और रहो कंआरे। ऐसी नालायक औलाद से तो मैं...
उन्हें न जाने आगे क्रोध में कुछ सूझा नहीं या उन्होंने अपने ऊपर अंकुश लगाते हुए वाक्य पूरा नहीं किया, लेकिन संजीव के मन में भरे अब तक की विफलता के बारूद के लिए इतनी चिंगारी बहुत थी। वह एकदम फटता हुआ बोला--मुबारक हो आपको अपना घर और निपूता रहना भी, यही कहना चाहते थे न? संभालिए अपना यह कूड़ादान? मैं इसी वक्त इसको छोड़कर जा रहा हूं।
वह सचमुच चल दिया और मां के पकड़-पकड़ कर रोकने और रोकर तथा लिपट-लिपट कर मनाने पर भी नहीं रुका।
अब तो पांच साल हो रहे हैं, इस घटना को।
संजीव ने घर छोड़ने के बाद कुछ दिन एक होटल में काटे थे और फिर यह फ्लैट ले लिया था। फिर उसने आधे मन से चार-पांच लड़कियां और देखी थीं, लेकिन अपनी पसंद की लड़की मिल जाने के इंतजार में उन्हें भी ठुकरा दिया था। उसे विश्वास था कि मुझे अपनी मनचाही बीबी अवश्य मिलेगी,बिना कोई कम्प्रोमाइज किये। यह करते-कराते पूरा एक वर्ष निकल गया। आखिर तंग आकर उसने शादी न करने की ही भीष्म प्रतिज्ञा कर डाली, लेकिन वह अरेंज्ड मैरिज में अब भी कोई खराबी नहीं मानता था। उसने एक व्रत लिया। व्रत यह था कि वह पॉपुलर मिलन समारोहों से हटकर बिलकुल नए तरीके से खुद लड़के-लड़कियों को मिलवाने का प्रबंध करेगा और उनकी शादियां करवायेगा। अब यही उसके जीवन का मिशन होगा।
बहुत सोच-विचार कर संजीव ने इंटरनेट को अपना साधन बनाया और अपनी वेबसाइट का नाम रखा--वन बाई वन डॉट कॉम।
लड़की वालों को लड़के और लड़के वालों को लड़कियां नहीं मिल रही थीं, इसलिए जल्दी ही उसकी वेबसाइट लोकप्रिय हो गई और उसके लगभग एक सौ ग्राहक भी बन गये। और तब उसने पहली ' वन बाई वन ईवनिंग' का आयोजन किया।
अन्य समारोहों के विपरीत इसमें भाग लेने के लिए उसने केवल उन्ही लड़के और लड़कियों को बुलाया, जिन्होंने इंटरनेट पर अपने-अपने विवरणों का आदान प्रदान कर लिया था और एक-दूसरे को फोट भी भेज दिए थे। आयोजन को सफल ही कहा जाएगा, क्योंकि कुल मिलाकर उसमें कोई तीस लड़के-लड़कियां शामिल हुए, जिनमें से चार लड़के और चार लड़कियों ने एक-दूसरे को भावी दम्पति बनने के बचन भी दे डाले। संजीव अपनी सफलता से प्रसन्न था।
इस पहली ' वन बाई वन ईवनिंग ' से आठ साल पहले उसे रंजना मिली थी।
वह रंजना को भूल जाना चाहता था, लेकिन वह शायद हार मानने वाली लड़की नहीं थी। वह यदा-कदा फोन करके उसके खयालों में जगह बनाने की कोशिश करती रही। कई बार उसने नये साल की शुभकामनाओं का कार्ड भी बेजा। फिर अचानक उसके फोन और कार्ड आने बन्द हो गये और संजीव ने जान बची सो लाखों पाए वाली मानसिकता के साथ यह मान लिया कि रंजना को पार्टनर मिल गया है। लेकिन आज चार वर्षों के बाद अचानक रंजना का कार्ड पाकर उसे यों महसूस हुआ, मानो पुराना ढोल फिर गले पड़ने के लिए पंख लगाकर लपका आ रहा है।
क्या करूं इस फेविकॉल से पिंड छुटाने के लिए?
पता बदल लूं?
लेकिन वह मुझे मेरे वन बाई वन के जरिये तब भी ढूंढ निकालेगी। क्यों न इसे साफ-साफ बता दूं कि मैने विवाह न करने की प्रतिज्ञा की है? लेकिन मैं इसे बताऊं ही क्यों ? मेरी कुछ लगती तो है नहीं। बताने का मतलब होगा इससे संपर्क करना और वह मैं चाहता नहीं। तब ?
भाड़ में जाए रंजना और उसका कार्ड--यह कहते हुए संजीव अचानक उठा और घर से बाहर निकल गया।
उसके फ्लैट के पास ही पार्क था, जिसमें एक छोटी-सी झील भी थी। गर्मियां होतीं तो झील के किनारे प्रैम लिए माताएं बैठी मिल सकती थीं, जो बत्तखों को चुग्गा डाल रही होतीं। बेंचों पर सुस्ताते या बतियाते बूढ़े पेंशनर भी मिल सकते थे। कुछ नहीं तो कुत्तों को टहलाने वाले ही घूम रहे होते, लेकिन पार्क एकदम सुनसान था। दो दिन पहले गिरी बर्फ से अधिकांश घास अब भी ढकी हुई थी।
संजीव को महसूस हुआ मानो बर्फ भी रंजना है, जो पिघलने और अपनी स्थिति से समझौता करने की बजाय मजबूर घास को दबोचकर उससे चिपके रहना चाहती है। अपने भारी बूटों से बर्फ को कुचलते और ठोकर मारकर उड़ाते हुए वह थोड़ी देर वहां टहलता रहा, लेकिन फिर ऊबकर वापस फ्लैट पर आ गया। आज वह दफ्तर नहीं गया था, इसलिए उसे अकेलापन और भी ज्यादा उबाऊ लगने लगा। अकेले किसी और जगह जाने को भी उसका मन नहीं हुआ तो वह उठकर सवेरे पढ़ा हुआ अखबार पढ़ने लगा। जब इसमें भी मन नहीं लगा तो उसने फिल्मी गानों का सीडी लगा दिया। हालांकि वे पुराने गाने थे, उसे बेहद पसंद थे, लेकिन उसे इस समय वे बिल्कुल बोर लगे। कुछ गाने अमर होते हैं, वे कभी नहीं मरते। वह खुद यह कहा करता था, लेकिन आज उसे ये जिंदा होते हुए भी नीरस और मुर्दा प्रतीत हुए। उसने संगीत बंद किया और लेट कर आँखें बंद कर लीं।
अगर मैने किसी से शादी कर ली होती तो आज यूं अकेला न होता-वह सोचने लगा। लेकिन किससे करता? कोई भी तो पसंद या हाथ नहीं आई। पता नहीं लोग कैसे पसंद कर लेते हैं और शादी करके बच्चे भी पैदा करने लगते हैं। मैं उन्हें देखता हूं तो उनकी पसंद पर तरस आता है। छोटी-से-छोटी और बेजान चीज तक को लोग जब तक पसंद नहीं करते, तब तक खरीदते नहीं, लेकिन बदसूरत बेडौल और अपने से छोटी या लम्बी औरत को वे जाने किस आधार पर चुन लेते हैं। पैसे के कारण या सेक्स के लिए? लेकिन पैसा टोटल टोटल सैटिसफैक्शन कहां दे पाता है और सेक्स के लिए भी--जो सिर्फ एक बार के लिए नहीं होगा--निरंतर आकर्षण चाहिए । तो क्या प्यार के कारण? लेकिन प्यार हो जाने का भी तो कोई आधार होता है। रंग, रूप, योग्यता, चाल-ढाल, पैसा पर्सनेलिटी, यानि कोई भौतिक, मानसिक या आर्थिक कारण तो होता ही है। संजीव किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका। उसका ध्यान रंजना की ओर गया। अगर मैने उसे पसंद नहीं किया, तो किसी और ने भी तो नहीं किया। मर्द का तो चलो, फिर भी किसी-न-किसी तरह समय निकल जाता है, लेकिन औरत? वह जिन्दगी भर कुंवारी या अकेली कैसे रह सकती है? वह तो बनी ही संगिनी या मां बनने के लिए है। मान लो मैं ही उससे आंख बन्द करके शादी कर लेता, तो हमारा भी शारीरिक संबंध होना ही था।
संजीव इस कल्पना से सिहर उठा। क्या मैं उससे शारीरिक संबंध स्थापित कर पाता? हरगिज नहीं। मुझे तो उसके पास जाने पर ही उबकाई आ जाती या जड़ता जकड़ लेती। नहीं, लेकिन लोग वेश्याओं के पास भी तो जाते ही हैं। वे कौन-सी सब सुन्दर होती हैं या सुन्दर रह पाती हैं, फिर भी लोग अपना उबाल ठंडा कर लेते हैं।
क्या मैं भी ऐसा नहीं कर सकता था?
तब बच्चे भी होते।
उफ, रंजना की कोख से मेरे बच्चे! वह इस कल्पना से ही घबरा गया, लेकिन फिर सोचने लगा, अगर होते तो पता नहीं उनकी सूरत किस पर जाती? अगर मिश्रित भी होती, तो भी मैं उन्हें स्वीकार न कर पाता।
शाम घिर आई थी, गहरी सलेटी और बर्फीली शाम, सर्दियों वाली। जब तीन बजे ही अंधेरा हो जाता है। हालांकि लंदन में घोंसलों को लौटते हुए पक्षी नजर आते, फिर भी एक मानसिकता तो होती ही है शाम की--जैसे अंदर भी एक अँधेरा-सा घिर आता है। हल्के आलस्य के पंख घेरने लगते हैं। नाइट लाइफ से उत्तेजित और तरंगित होने वालों की बात छोड़ दें तो तो शिथिलता का अदृश्य-सा क्लोरोफार्म असर करता प्रतीत होता है। खम्भों की लाइटें इस अहसास को और गहरा करती हैं। फिर आस पास के फ्लैटों के दरवाजे खुलने और बन्द होने लगते हैं, जिनसे मालूम हो जाता है कि किस-किसने दिहाड़ी पूरी कर ली। जिन्दगी का एक दिन और पूरा हुआ...या कम हुआ।
ठंड के बावजूद बाहर सड़क का हल्का-हल्का शोर संकेत कर रहा था कि लोग काम से घर लौटने लगे हैं।
संजीव ने उठकर एक पैग बनाया और गटागट पी गया। ग्लेनफिडिच की स्कॉच उसे चीरती हुई उतर गई। कमबख्त बोतल कितनी आसानी से खाली होने को प्रस्तुत हो जाती है और गिलास भी कितना निर्लिप्त रहता है--उसने सोचा।
पड़ोसी माइकल विचेल का दरवाजा जोर से बजने की आवाज से वह चौंका। वह शाम को लौटता है तो घर होने पर संजीव को हमेशा यह आवाज सुनाई देती है। माइकल के दरवाजे के या तो कब्जे ढीले हो गए हैं या उनकी चूलें। जब वह ठीक से बन्द नहीं होता, तो नशे में धुत माइकल उसे लात मारकर बन्द करता है और फिर गाली बकता हुआ अन्दर चला जाता है--यू फकिंग डोर...
माइकल अकेला है --संजीव ने सोचा--लेकिन शाम को पब में गम गलत करके घर आता है। उसने जेसिका के किसी दूसरे ब्वॉयफ्रेंड के साथ भाग जाने का भी बुरा मानना छोड़ दिया है। बल्कि अब तो जब कभी वह आते-जाते मिल जाता है, तो सका नाम तक नहीं लेता।
संजीव उसकी तुलना खुद से करने लगा। अकेलापन मुझे क्यों परेशान करता है ? जो रास्ता मैने चुना है, अपनी मर्जी से चुना है। और रंजना ? क्यों परेशान हूं मैं उसका कार्ड आने पर? क्या यह मेरी कमजोरी है या शराफत? अगर मैं रंजना को एब्यूज करना चाहता तो भी वह इन्कार न करती। जितना समर्पण वह करने को तैयार थी, मेरे सम्पर्क में आई और कोई लड़की नहीं। पर छोड़ो, जो हुआ सो हुआ। अब तो मैने एक व्रत लिया है, उसे ही पूरा करूंगा।
संजीव ने अपने निश्चय को याद करके सहज होने की कोशिश की, लेकिन फिर न जाने उसे क्या सूझा कि वह कूड़ेदान से रंजना के कार्ड के टुकड़े निकालने लगा। सारे टुकड़े जमा हो जाने के बाद वह उन्हें बिस्तर पर जिगसॉ पजल की तरह बिछाकर जोड़ने लगा। टुकड़े कुछ ज्यादा तो थे नहीं, इसलिए जल्दी ही रंजना का कार्ड फिर से पढ़ने योग्य बन गया।
बरसों हो गये तुमसे बात किये...नये साल की शुभकामनाएँ...तुम्हारी (न हुई) रंजना। लेकिन जो चीज संजीव ढूंढ रहा था, वह से वहां नहीं दिखी। उस पर रंजना ने अपना टेलिफोन नम्बर तो लिखा ही नहीं था।।
कहीं नम्बर कार्ड की उल्टी ओर तो नहीं लिखा?
यह सोचकर संजीव ने उन टुकड़ों को उलटकर जोड़ना शुरु किया। अबकी बार टुकड़े और भी जल्दी जुड़ गये, लेकिन टेलिफोन नम्बर वहां पर भी नहीं था।
शायद नम्बर लिफाफे पर लिखा हो--यह सोचकर वह कूड़ेदान में फेंके दर्जनों लिफाफों में से रंजना का लिफाफा ढूंढने लगा। थोड़ी-सी मेहनत से ही लिफाफा मिल गया। संजीव ने पढ़ा, उसके कोने में रंजना ने अपना पता और फोन नम्बर लिखा था।
संजीव ने फौरन फोन मिलाया।
फोन की घंटी बहुत देर तक बजती रही। वह घर पर नहीं थी। संजीव को सूझा ही नहीं कि वह अभी काम से नहीं लौटी होगी।
रिसीवर को पटककर उस पर अपना गुस्सा निकालते हुए बड़बड़ाया--स्टूपिड ने आंसरिंग मशीन तक नहीं लगा रखी।
' दादी नहीं रहीं। आज 26 अगस्त, शाम को सात बजकर पांच मिनट पर मैसिव हार्ट अटैक---दो घंटे की अथक लड़ाई के बाद सब खतम। अँतिम संस्कार कल सुबह 11 बजे।'
आदमी कितना भी अपने में एक टापू बनकर रहे, हर टापू किसी चट्टान, किसी समन्दर से जुड़ा और घिरा होता है और अपनी एक ऐसी ही सशक्त चट्टान को ढूंढता मनु का मन, आज खुद न जाने किस समुन्दर की असुरक्षित, डरावनी गहराइयों में डूब चुका था। समने स्क्रीन पर छपे शब्द, आखों के आगे काले धब्बे बने परिन्दे-से उड़ रहे थे, अर्थहीन शोर करते। एक को भी पकड़ या समझ पाना अब मनु के बस में नहीं था। खुद को ही समझाने और बहलाने का तरह-तरह से प्रयास करती, वह उड़-उड़कर बारबार दादी की ही गोदी में जा बैठ रही थी और शब्दों की उस धधकती चिता से निकल कर दादी भी तो, जीती-जागती सामने आ खड़ी हुई थीं, मानो कुछ हुआ ही न हो, मानो खबर पूरी तरह से झूठी ही है- ‘ तुझे छोड़कर कहां जा पाऊंगी मैं।‘ –कह-कहकर, अब भी तो उसे ही वे तसल्ली और सांत्वना दिए जा रही थीं ... प्यार से गोदी में सिर रखकर आंसू पोंछ रही थीं। कभी माथा, तो कभी बाल सहला रही थीं।
मनु जो बचपन से ही दादी के साथ ही लिभड़ी रहती थी, दादी को यूं इसतरह से अलविदा कहने में असमर्थ थी। मौत की इस खबर को पूरी तरह से झुठला देना चाहती थी वह। वैसे भी इतना आसान तो नहीं कि पल भर में ही चन्द आड़े-तिरछे शब्दों पर विश्वास कर लिया जाए ....खबर झूठी भी तो हो सकती है! किसी की शैतानी भी तो हो सकती है यह...भगवान करे, किसी की शैतानी ही हो! ... सुबह ही तो दादी और जोनुस, दोनों से उसकी बात हुई थी। तबतक तो सब कुछ ठीक था, फिर अचानक ही यह सब कैसे ....कैसे संभव है यह? ...दादी उसे छोड़कर नहीं जा सकती ...बिना कुछ कहे, बिना गले मिले तो हरगिज ही नहीं! कैसे रह पाएगी वह दादी के बगैर... उनकी सलाह के बगैर! दादी के बिना तो उसका एक काम भी पूरा नहीं हो पाता। दादी की यादों में भटकती बीस साल पुराने अतीत में जा पहुंची थी मनु। मां-बाप को सोता ही छोड़, सूरज की पहली किरण से भी पहले, दबे पांव दादी के पास जा पहुंचती थी वह और सोती दादी के कान में पहुंचते ही फुसफुसाती थी; -‘दादी, आप अंधेरे में ही अपने सारे काम कैसे कर लेती हो, सिखलाओ ना मुझे। दादी तुरंत आँखें खोलो। दादी सुबह होने वाली है।‘ और तब भी दादी आँखें न खोलें तो नन्ही उंगलियों में समेटकर अगले पल ही दोनों आंखें खोल भी देती थी चार साल की नन्ही, उतावली मनु,- ‘प्लीज दादी आंखें खोलकर सोया करो ना , वरना आप मुझे कैसे देख सकती हो !’ और तब दादी पोती की बेताबी पर हंस पड़तीं। मुस्कुराकर पूछती,-‘क्या काम करना चाहती है तू, पहले जरा यह भी तो बता मुझे? लगन और चाह हो तो सब कुछ खुद ही तो आ जाता हैं...अब देख मेरे पास भी तो अँधेरे में ही चलकर आई है तू?' और मनुश्री उस छोटी-सी उम्र से ही, श्रीमना की तरह ही स्वावलंबी होना सीख गई थी। सीखती भी कैसे नहीं... रूप, गुण, स्वभाव, सभी कुछ तो श्रीमना के ही पाए थे उसने, हाँ महत्वाकांक्षा की चटख तीव्रता जरूर ठाकुर काका सुब्रतो सरकार से और मिजाज की तेज तर्रार गरमी मां पिनाकी से ले ली थी।
अनजाने ही दिन-प्रतिदिन बंधती ही चली गई थी श्रीमना पोती के नेहपाश में। मानो उनका अपना बचपन ही लौट आया था एकबार फिर खुद उनके अपने पास ही। बेटी के सानिद्य के सारे सुख... सारे लाड़-चाव जी भर-भरकर के ले रही थीं श्रीमना। न दादी को पोती बिना चैन था और ना ही पोती को दादी बिना। बचपन से एक मजबूर-सी आदत थी मनु की, जब भी मन नहीं लगा, या उदास हुई तो दौड़कर दादी के पास जा पहुंची । कभी हाथ पकड़े, तो कभी रेशम-से मुलायम ऊनी शॉल के कोने से चुपचाप खेलती, बिना कुछ बोले या दिनचर्या में व्यवधान डाले, दादी की बगल में घंटों बैठी रह जाती। और तब दादी हाथ का काम खत्म करते ही तुरंत गोदी में बिठा लेतीं लाडली को। नई-नई कविता-कहानियां सुनातीं। कभी पुरानी गीता-रामायण में पढ़ी, तो कभी तुरंत ही ताजी-ताजी गढ़ी-बुनी। पहेलियां पूछतीं, जोड़-बाकी और गुणा-भाग सिखलातीं उसे। अनमोल खज़ाना था दादी के पास सुख और राहत का। सुबह-सुबह नहा-धोकर तैयार होने से लेकर रात में सोते वक्त तक, कहानी सुनने और पढ़ने, खाने-पीने तक के सारे काम दीदा के साथ ही तो होते थे मनु के। इसी नाम से पुकारती थी चार साल साल की नन्ही मनु श्रीमना को अपनी तोतली जुबान में। कितनी बार दादी और पापा ही नहीं, परिवार के हर सदस्य ने समझाया उसे, –दीदा नहीं, मनु सीधा बोलो, -‘ दादी।‘ पर मनु के लिए दीदा हमेशा दीदा ही रहीं, दादी नहीं। दादी को भी आदत पड़ चुकी थी मनु के मुंह से दीदा सुनने की और यही सही भी लगता था उन्हें। आंख बन्द करके जब दीदा पूजा कर रही होतीं, तो मनु बगल में बैठी तन्मयता से घंटी बजाती। दादी को खाना खाना होता तो प्लेट और चम्मच लिए मनु पहले से ही खाने को उतावली और तैयार उनकी गोदी में बैठी दिखती। मां ने तो मनु को दादी की चमची की उपाधि तक दे डाली थी और जब मनु अपनी गर्दन टेढ़ी करके शरमाती-शरमाती मां की नकल करती तो मानो पूरे घर में ही एक आनन्द-लहरी बह उठती। मनु, बाबा, खुद श्रीमना सभी को तो बहुत पसन्द थी मनु की यह उपाधि। रात में सोते समय ज़िद करती मनु,- दीदा, वही परियों वाली कहानी सुनाओ ना, तो मन में उठते स्नेह के उबार में डूबी श्रीमना पूछती, ' कौनसी मेरी मनु-सी सुन्दर और प्यारी परी वाली?
'नहीं, दादी जैसी ...जिन्न वाली।‘
‘अच्छा, तो दादी जिन्न है और तू परी?‘
दोनों तब मुश्किल से ही हँसी रोक पाती थीं । और तब बहुत सोच-विचारकर दादी-सी ही समझदारी के साथ मनु ज़बाव देती, ' ‘ हाँ दीदा। परी तो बस प्यारी और सुन्दर है, पर जिन्न तो मेरी दीदा की तरह ही सब कुछ कर सकता है...सारे काम आते हैं उसे भी।'
मन में उठती वात्सल्य की हिलोरों में डूबी, आनन्द-मग्न दादी पोती को आँखें भर-भरके देखती और देखती ही रह जाती। बारबार बलैया लेती और हंसकर कहती, पहले थोड़ी बड़ी तो हो जा फिर मेरे सारे काम सीख लेना तू भी...पहले ज़रा ठीक से दादी कहना और बोलना तो सीख ले।... औऱ आज बड़ी होकर, सबकुछ सीखकर भी क्या कर पाई मनु ...दादी के किसी भी काम तो न आई वह? आंसू पोंछना तो दूर की बात, अंतिम विदा के समय दो बोल तसल्ली तक के न दे पाई वह तो उन्हें? पश्चाचाप और दुःख के ताप में झुलसकर मनु का एक-एक आंसू सूख चुका था। बस...आंख और मस्तिष्क की वह जलन ही नहीं जा पा रही थी, और तब उस स्क्रीन और अकेलेपन के दाह से बचने के लिए मनु ने कम्प्यूटर बन्द कर दिया और बाहर बगीचे में आकर बैठ गयी।
पर उस वीराने में भी तो साँय-साँय करती यादों की राख हुई तस्बीरों के अलावा, कुछ और नहीं दिख पा रहा था मनु को। 'आखिर बुराई क्या है इसमे? मनु एकबार फिरसे सोचने पर मजबूर थी,- मौत ही अच्छी है उस बिना आस, बिना दिशा की, अंधेरे में लटकी अँधी गली-सी जिन्दगी से...बस, यूं ही अकेले-अकेले जीते रहने से... शरीर की तारतार और जर्जर इस खोली में पड़े रहने से भी आखिर क्या फायदा--- ? वैसे भी नब्बे वर्ष कम तो नहीं होते, यूँ घुट-घुटकर जीने के लिए, कभी हार न मानते हुए, खुदसे, इस कठोर एकाकी जीवन से लगातार अकेले ही लड़ते रहने के लिए? ' मनु ने एकबार फिर खुदको और अपनी सोच को समझाने की एक और असफल कोशिश की। हल्की-हल्की बूंदाबांदी थोड़ी बहुत शीतलता और राहत ही दे रही थी मनु को , पर बस वही एक बात फिर-फिरकर मथे जा रही थी उसे... ले-देकर बस एक यह ई. मेल ही क्यों रह गया था उसके और दादी के बीमार संबन्धों बीच... वह उस समय वहाँ उनके पास भी तो हो सकती थी! । सुबह से ही दादी का वह झुर्रियों वाला मुस्कुराता चेहरा, बूढ़ी-सलेटी उदास आंखों के साथ मानो मनु के कंधे पर ही सर रखकर सो चुका था। थकी मनु नहीं जानती थी कि अब उसे आगे और क्या करना चाहिए जिससे कि उसके इस पोती वाले, जिम्मेदारी-से जुड़े रहने के अहसास को चैन मिल पाए,,,? दादी न लौटने के लिए, साथ मिल-बैठकर अब कभी न हंसने और मुस्कुराने को, दूर, बहुत दूर जा चुकी थीं और ये अन्तिम विछोह के पल में वहां न होना...उनके लिए कुछ भी न कर पाना ....ये भौतिक दूरियां साल रही थीं मनु के रिसते मन को!
आखिर क्यों सोच रही है वह इतना, खतम तो बस खतम। वहां पहुंचने से पहले ही सारी छुट्टियां खतम हो जाएंगी। अभी पिछले महीने ही तो लौटी है वह भारत से? नहीं जा पाएगी इस वक्त वह...नहीं जूझ पाएगी काली बाड़ी में बिना दादी के पसरी उस वीरानगी से वह। अच्छा हुआ जो जोनुस को घूमना था और रुक गया था वह, वहीं दादी के पास। क्या फायदा...किसके पास लौटेगी वह अब...कौन होगा वहां सिवाय उस डरावने भुतहे खंडहर काली बाड़ी के और उस रूखे-सूखे जंगल के? परन्तु जाना तो पड़ेगा ही। सालभर का सोचा, बचाया फिरसे स्वाहा...उस मकान की मरम्मत भी तो करवानी ही है ...आखिर पुरखों की एकमात्र धरोहर है...उसके अपने देश में उसकी अपनी पहचान है...पर इसके लिए अभी तुरंत यह आहत और अपंगु मन लेकर जाना तो जरूरी नहीं ? नहीं, वह नहीं जा पाएगी, यादों का एक और स्मारक तैयार करने के लिए। कुछ नहीं हासिल होगा कोरी भावुकता से। पता भी नहीं चलेगा , न तो काली बाड़ी में और ना ही कार्तिक निवास में किसी को, कि कब मनु आई और कब चली भी गयी वापस?...कोई भी नहीं महसूस करेगा उसकी कमी को। बस भीड़ का एक हिस्सा बनकर जाएगी और चुपचाप लौट भी आएगी, वैसे ही हमेशा की तरह ही... किसी पर बोझ या उलझन तो नहीं, जरूरत से ज्यादा तो नहीं रुक गई, यही सब सोचती-समझती...अब आगे आना भी चाहिए या नहीं, यही गुनती-बुनती।
सर में गूंजती आवाजों से घबराई मनु ने हारकर जाने कब काली बाड़ी का नम्बर मिला ही डाला।
आवाजें अब सर के अन्दर से ही नहीं, बाहर भी सुनाई दे रही थीं।
‘ हलो, जोनुस!’
‘ हाँ, मनु।‘
‘ सब खतम?’
‘ हाँ।‘
‘ गंगाजी हो आए?’
‘ हाँ, बस अभी-अभी ही लौटे हैं। घर के अन्दर घुसे ही थे।‘
‘ क्या सब कुछ नौर्मल था, या बहुत तकलीफ हुई थी दादी को?’
मनु को विश्वास नहीं हुआ खुदपर...क्या पूछ रही थी वह, क्या मौत भी कभी साधारण हो सकती है? पर जोनुस समझाता था, उसे भी, और उसके सोचने के तरीके को भी। इसके पहले कि वह कोई और सफाई दे, खुदका स्पष्टीकरण करे, जोनुस ने बतलाया कि, " हां, वैसे तो सब कुछ नौर्मल ही था। कल बस थोड़ी ज्यादा तबियत खराब हो गई थी। करीब घंटे, आधे घंटे ऊर्ध्व सांस चली थी। आक्सीजन वगैरह का ट्यूब तक निकाल फेंका था पर दादी ने-अब और नहीं, कहकर। बोलीं, बस अब और कुछ नहीं। और फिर थोड़ी ही देर में सब खतम, और मैं निरीह निर्वाक देखता रहा उन्हें मौत से जूझते, उसकी गोद में जाते।" कहते-कहते जोनुस का गला रुंध आया।
‘ क्या याद कर रही थीं हममें से किसीको वह?’
‘ नहीं। बस इतना ही कहा था, कि मनु का, शेखर का ध्यान रखना।‘
मनु नहीं सोच पाई कि अब आगे और क्या पूछे? नब्बे-बानबे साल की उम्र मैं यही नौर्मल है...इसीकी पलपल आशंका रहती है सबको। कगार पर लटका, झुका, बूढ़ा पेड़...इन्हें तो देर सबेर ढहना ही पड़ता है। कुछ देर फोन पर एक बेचैनी-भरी चुप्पी छाई रही। सहा नहीं गया तो मनु बोल पड़ी-" समझ में नहीं आता अब और क्या पूछूं ...रखती हूं जोनुस ?"
" आओगी नहीं?"
" नहीं।"
" ठीक है जोनुस, रखती हूं फिर। तीन-चार दिन में फिर बात करूंगी।"
उत्तर का इंतज़ार किए बग़ैर ही, स्थिति की जटिलता से घबराई मनु ने फ़ोन रख दिया। सरलता और स्पष्टवादिता पर, दुःख से उलझने पर, दूर रहने के बावजूद भी अपनों से जुड़े रहने की अदम्य इस चाह पर, जोनुस हँस पड़ा था---वही पुरानी मजबूर, सरल और थकी-सी हंसी। क्या कहे मनु भी आखिर...बचा ही क्या था अब कहने सुनने को? स्थिति पारदर्शी और स्पष्ट थी और अपरिवर्तनीय थी। मनु काम पर काम करती चलती गई परन्तु कहीं मन ही नहीं लग रहा था। अकेली ही सबसे लड़ती और हार न मानती मनु की छाती पर एक भारी अपराध-बोध शिला-सा रखा हुआ था । उसका दम घोट रहा था। कुछ ही देर में वह फिर से फ़ोन के पास जा बैठी थी-
' हलो, 5476 डडली जू...क्या मैं जू कीपर शेखर सरकार से बात कर सकती हूं... "
" जी, आप कौन? "
" जी, मैं मनुश्री। "
बाबा के सभी संगी-साथी अच्छी तरह से जानते थे मनु को। नाम सुनते ही " अच्छा, मनु बिटिया, अभी बुलाता हूं, मैं।"-कहकर फ़ोन रख दिया था उसने और तुरंत ही बाबा को बुला भी लाया था।
दूसरी तरफ़ अब लाइन पर बाबा ही थे,
" हलो, हां मैं शेखर बोल रहा हूं।" लगा एक ताज़ा हवा का झोंका आ गया। हमेशा की तरह आत्मीयता से भरी और सहज थी बाबा की आवाज़।
" बाबा, मनु बोल रही हूं। कैसे हैं आप ?"
" भूखा हूं...बहुत भूखा। अपनों से मिलने को...मिल-बैठकर चार बातें करने को।"
मन फिरसे भर आया ...कैसी है यह भूख, जो अब आजीवन ही भटकाएगी इन्हें। अगर इतनी ही आत्मा अतृप्त थी तो फिर क्यों जाने दिया दादी को! मौत तो अब लेकर गई है , खुद से दूर तो पहले ही कर दिया था !
" भूखे रहने की आदत नहीं पड़ी क्या अभी तक आपकी...? डाल लो। बस भूखे ही तो रहना है अब आपको।"
जाने किस विष्तृणा में डूबी, दर्द से कटती मनु बिना सोचे-समझे बोले जा रही थी।
" हां, भूखा ही रहना पड़ेगा अब तो आपको...दादी नहीं रही। जोनुस ने आपको भी तो बताया ही होगा...उसका ई.मेल आया है अभी-अभी !"
मनु ने एक बार भी नहीं सोचा कि दादी की मौत की इस अचानक खबर को बाबा यूं टेलीफ़ोन पर कैसे झेल रहे होंगे या झेल पाएंगे ?
" वैसे भी, क्या फर्क पड़ता है आपको कि दादी रहीं या नहीं ? एक बात कहूं, सच में तो आपने कभी प्यार किया ही नहीं, वरना यूं अकेला न छोड़ देते उन्हें वहां मरने को! आपने तो दादी को ही क्या, किसीको भी प्यार नहीं किया। अब सच कहूं तो मुझे तो आप कभी सच्चे इन्सान ही नहीं लगे। किसी भी रिश्ते के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं आपके मन में...बस, हमेशा खुदको ही छलते रहे हो आप। मैं ऐसा...मैं वैसा...इसका पति, उसका बेटा...किसको हो आप? छलना ही छलना है आपके जीवन में। आप बस भ्रम में जीते हो।"
फ़ोन की दूसरी तरफ टूटे-बिखरे बाबा बच्चों से सुबक रहे थे---
"...मां-बाप, भाई, सब छोड़ गए मुझे। कहां जाऊँ, किसके पास जाकर बैठूं मैं अब, कौन समझ पाएगा मुझे या किससे कुछ कह पाऊंगा मैं अब...? "
बाबा लगातार रोए जा रहे थे और मनु अपने उस दुःख और पश्चाताप के आवेग में क्रुद्ध, अनर्गल अलाप किए जा रही थी। मां-बाप को सदा-से ही एक इकाई की तरह देखने की चाह रखने वाली मनु को बाबा का मां के प्रति रूखा व्यवहार बचपन से ही अखरता था। छत्तीस के आंकड़े की तरह साथ होते हुए भी, वे कभी भी तो साथ नहीं हो पाए थे। और श्रीमना की मौत ने अनचाहे ही सही, उसकी न जाने किस दुखती रग को छू दिया था कि मन का सारा गुबार...सारा आवेश अनियंत्रित शब्दों में बहता जा रहा था, बाबा को बेहद ही बेरहमी से बेधता और काटता हुआ। मनु को परवाह नहीं थी कि कौन-सा शब्द कितनी तकलीफ दे रहा होगा...बस बोलती ही चली गयी वह और बाबा सुनते रहे, वैसे ही जैसे कि उसके बाद बाबा रोते रहे और मनु सुनती रही। जो कुछ हुआ या हो रहा था, बाद में टेलीफ़ोन का बिल देखकर ही समझ में आ पाया मनु को। उस समय तो स्तब्ध ती मनु...बेहद निर्मम थी मनु। दुःख के उस असह्य पल में जब निशब्द रोती मनु के लिए बाबा की मनःस्थिति और भी असह्य हो चली, तो चुपचाप फ़ोन काट दिया था मनु ने..बिना किसी औपचारिकता या अलविदा के... बाबा की बात पूरी तरह से सुने-या समझे बगैर ही। अंदर-ही-अंदर गूंजती आवाजें अब धिक्कार रही थीं, चैन नहीं लेने दे रही थीं उसे। ...बाबा का क्या होगा...सह पाएंगे क्या वह, यह सब? आवाजों का मेला था और मन सी ही बेचैन उंगलियां तेजी से इधर-उधर घूम रही थीं, समस्याओं का दूर तक नज़र न आने वाला एक मनचाहा हल तलाशती। इसीलिए तो वह बाबा से बात तक नहीं करती। बिल्कुल ही टूट गए हैं अंदर से। कोई संयम नहीं रह गया, बात-बातपर रोने लगते हैं। ओल्ड इंडियन मेन्टैलिटी...कोरी भावुकता...बस बातें ही बातें हैं और ढेर सारे थोथे आदर्श। मनु को याद आया कि पर उसे भी तो कुछ ऐसा ही महसूस हो रहा है, उसका भी तो मन भर आया है, दादी की यूं पूरे हो जाने की बेरहम यह खबर अचानक ही इस तरह से जानकर। वह भी तो पाषाण बनी, स्तब्ध है.. उसकी भी तो समझ में नहीं आ रहा कि किसके पास और कहां जाकर बैठे...उसे भी तो जरूरत है किसी बेहद अपने की, जिसके पास बैठ, दो बातें कर वही पुराना बेफ़िक्र अपनेपन का चिर-परिचित अहसास वापस मिल जाए उसे?
पापा और दादी के साथ तो वह किसी भी परिस्थिति का सामना कर सकती थी। कहीं भी सुरक्षित महसूस करती थी। मन रो रहा था कि बस एक बार फिर से दादी आकर चुपचाप हाथ पकड़ लें और उसके और बाबा के सारे ही आंसू पोंछ डालें। हमेशा की तरह उतरा चेहरा देखकर मुस्कुराएं और कहें,- ' नहीं जा रही तुझे छोड़कर मैं कहीं। बिल्कुल बाप पर गई है, पगली। पूरे समय, बस, मेरा ही पल्ला चाहिए तुझे भी...।'
परन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। दादी कभी वापस न आने के लिए दूर जा चुकी थीं। उसके और बाबा, दोनों के ही जीवन में अब उन्हें वापस लाने का कोई रास्ता शेष नहीं था। क्यों होता है ऐसा कि कलतक जिस दुनिया को हम अपने चारो तरफ एक आरामदेह कंबल-सा ओढ़े आश्वस्त बैठे रहते हैं, वही एक झटके में पूरी-की-पूरी बिखर जाती है...डरावनी लगने लगती है!
..बाबा के पास, उनकी गोद में सर रखकर रोने के लिए वापस कैसे जा पाए मनु? यह रास्ता भी तो खुद उसने ही बन्द किया था। क्या बाबा उसके कठोर वचनों को, बचकाने दुर्व्यवहार को माफ भी कर पाएंगे कभी... ? सच्चाई तो यह थी कि बाबा भले ही माफ कर दें, क्या मनु खुद बाबा से आंख तक मिला पाएगी अब? भूल चुकी थी मनु बाबा के नेह की छाया और वात्सल्य का हर ठौर-ठिकाना? अपनी ही सोच की भंवरों में भटकती वह तो यह भी भूल चुकी थी कि अपनों से कैसी और कबतक की नाराजगी?
आखिर ऐसा क्या हो गया था उन दोनों के बीच जो मात्र दस-पंद्रह मील की दूरी तय करते-करते पूरा-का-पूरा हफ़्ता निकल जाता है? वैसे भी आखिर कैसा है यह रिश्ता अब उसका और बाबा का, जो अक्सर चाहकर भी, हर पल याद करके भी, बात तक नहीं कर पाती मनु उनसे? मनु के अंदर ही अंदर कहीं कुछ चटका, टूटा और किरच-किरच होकर बिखर गया। फिर तो खुदको समेटते-सुलझाते ही पूरा दिन बीत गया।
' तू आएगी ना मेरे पास? ' ' नहीं।' वही एक वार्तालाप चलता रहता निरंतर मन के बीहड़ में और अकेले बाबा और अकेली मनु को मथता रहता। अक्सर ही दोनों खुद को ही दोहराते रहते। जानते हुए भी कि नहीं रह पाएंगे एक दूसरे के बिना वे, दोनों ही बीच में फैली दूरी तय नहीं कर पा रहे थे। मनु खुद को अक्सर कहता पाती, -नहीं क्या करूंगी मैं अब आकर। और बाबा उसके रोते सूनेपन को जबाव देते,-हां, वैसे तो तेरी यह बात भी सही है। जाने वाले, खास करके रूठे, भला कब लौट पाते हैं अपनों तक। क्यों बाबा, आपने एकबार भी क्यों नहीं कहा कि नहीं, तेरा आना बहुत जरूरी है। अपनों में बैठ लो, मिलकर रो लो तो सारे दुख हलके हो जाते हैं?" मनु के बहते आंसू बाबा की तरह ही अपनी ज़िद पर अड़े रहे। दुःख और पश्चाताप से दुहरी पड़ती मनु को एकबार फिर उसकी कलम ने ही सहारा दिया और बचपन से ही अंतरंग डायरी के पन्नों को वह एकबार फिर अपने ही आंसुओं से रंगने लगी,
योगी-सा मुंडेर पर बैठा कबूतर और मेनका-सी नाचती उद्वेलित लहरें
देख किनारों का हठ, यह संयम, कौन भला कैसे अब जिद छोड़े?
हालचाल लेने के लिए नानी ने फोन किया तो तीन साल की सोनू ने ही फोन उठाया। 'कैसी है मेरी गुड़िया?' पूछने पर चहक कर तुरंत ही उसने बताया, ' अच्छी हूँ,नानी। ' क्या कर रही है मेरी सोनू ?' लाड़भरी नानी की आवाज टेलीफोन पर ही सही, सोनू को बहुत अच्छी लगती थी। ' मैं पापा के संग किताब पढ़ रही हूं और मम्मी किचन में खाना बना रही है।'
सुनकर बहुत अच्छा लगा उन्हें, पर विश्वास नहीं हुआ कि दोनों व्यस्त जूनियर डॉक्टर मां-बाप, दिन में इस वक्त, घर पर ही थे !
अब तक रिसीवर मीना ( नौकरानी) ले चुकी थी।
' आज साहब, मेमसाहब दोनों घर पर ही....छुट्टी ले रखी है क्या? ' उनका जोश और जिज्ञासा भरा अगला प्रश्न था।
' कहां, मम्मी जी, कोई नहीं है घर पर। बस, ऐसे ही मनगढ़न्त कहानियां सुनाती रहती है बेबी दिन भर ! ' मीना ने हल्की हंसी के साथ तुरंत ही बात आयी गयी कर दी।
निरुत्तर थीं वह। गले में कुछ पत्थर सा आ फंसा।... रुंधे गले से बोलीं ,' अच्छा, बेबी का ध्यान रखना। खेल भी लिया करो, थोड़ा-बहुत इसके साथ बीच-बीच में ! '
-शैल अग्रवाल
'
तिड़के घड़े का पानी
“सुनो जी, बाऊजी से कहो, लैट्रिन में पानी अच्छी तरह डाला करें। भंगन की तरह मुझे रोज साफ करनी पड़ती है।”
गुड़ुप !
“बाऊजी, देखता हूँ, आप हर समय बैठक में ही पड़े रहते हैं। कभी दूसरे कमरे में भी बैठ जाया करें। इधर कभी कोई यार-दोस्त भी आ जाता है मिलने।”
गुड़ुप !
“बाऊजी, आप तो नहाते समय कितना पानी बर्बाद करते हैं। सारा बाथरूम गीला कर देते है। पता भी है, पानी की कितनी किल्लत है।”
“अम्मा, हर समय बाऊजी के साथ क्यों चिपकी रहती हो। थोड़ा मेरा हाथ भी बटा दिया करो। सुबह-शाम खटती रहती हूँ, यह नहीं कि दो बर्तन ही मांज-धो दें।”
गुड़ुप ! गुड़ुप !!
“बाऊजी, यह क्या उठा लाए सड़ी-गली सब्जी ! एक काम कहा था आपसे, वह भी नहीं हुआ। नहीं होता तो मना कर देते, पैसे तो बर्बाद न होते।”
गुड़ुप !
“अम्मा, आपको भी बाऊजी की तरह कम दीखने लगा है। ये बर्तन धुले, न धुले बराबर हैं। जब दुबारा मुझे ही धोने हैं तो क्या फायदा आपसे काम करा कर। आप तो जाइए बैठिये बाऊजी के पास।”
गुड़ुप !
दिनभर शब्दों के अनेक कंकर-पत्थर बूढ़ा-बूढ़ी के मनों के शान्त और स्थिर पानियों में गिरते रहते हैं। गुड़ुप-सी आवाज होती है। कुछ देर बेचैनी की लहरें उठती हैं और फिर शान्त हो जाती हैं।
रोज की तरह रात का खाना खाकर, टी वी पर अपना मनपसंद सीरियल देखकर बहू-बेटा और बच्चे अपने-अपने कमरे में चले गये हैं और कूलर चलाकर बत्ती बुझाकर अपने-अपने बिस्तर पर जा लेटे हैं। पर इधर न बूढ़े की आँखों में नींद है, न बूढ़ी की। पंखा भी गरम हवा फेंक रहा है।
“आपने आज दवाई नहीं खाई ?”
“नहीं, वह तो दो दिन से खत्म है। राकेश से कहा तो था, शायद, याद नहीं रहा होगा।”
“क्या बात है, अपनी बांह क्यों दबा रही हो ?”
“कई दिन से दर्द रहता है।”
“लाओ, आयोडेक्स मल दूँ।”
“नहीं रहने दो।”
“नहीं, लेकर आओ। मैं मल देता हूँ, आराम आ जाएगा।”
“आयोडेक्स, उधर बेटे के कमरे में रखी है। वे सो गये हैं। रहने दीजिए।”
“ये बहू-बेटा हमें दिन भर कोंचते क्यों रहते हैं ?” बूढ़ी का स्वर धीमा और रुआंसा-सा था।
“तुम दिल पर क्यों लगाती हो। कहने दिया करो जो कहते हैं। हम तो अब तिड़के घड़े का पानी ठहरे। आज हैं, कल नहीं रहेगें। फेंकने दो कंकर-पत्थर। जो दिन कट जाएं, अच्छा है।”
तभी, दूसरे कमरे से एक पत्थर उछला।
“अब रात में कौन-सी रामायण बांची जा रही है बत्ती जलाकर। रात में इत्ती-इत्ती देर तलक बत्ती जलेगी तो बिल ज्यादा तो आएगा ही।”
'यदि बहू माँ बाप को आदर दे और पति को प्यार, तो शायद घर स्वर्ग बन सकता है '
परिवार के बदलते मूल्यों की इस माह दृष्टिकोण में पड़ताल कर रही हैं कमला सिंघवी।
संयुक्त परिवार के बदलते परिवेश और नए सीमांत
इसे हम एक प्राकृतिक सिद्धांत कह सकते हैं, हमारे बदलते हुए सामाजिक परिवेश का एक अनिवार्य परिणाम मान सकते हैं, किन्तु यह एक सुस्पष्ट परिणाम अवश्य है कि वृद्ध हो रहे माता-पिता अपने परिवार के साथ नहीं रह पाते---और यदि रहते हैं तो अधिकांशतः कटुता और कठिनाई के बीच। मुश्किल यह है कि अलग रहकर भी पीढ़ियों के बीच सामान्यतः उस गहरी आत्मीयता, संवेदनशीलता और सहज प्रेम का निर्वाह नहीं हो पाता जो पीरिवारिक संबंधों के आदर्श की याद और धरोहर के रूप में शेष रह गया है।
पशु जगत में प्रकृति का यह नियम अक्सर देखने में आता है कि बच्चे जब तक बड़े नहीं हो जाते तब तक उनकी माँ और कई बार माँ-बाप दोनों बत्तों का लालन-पालन करते हैं, उनको अपनी सुरक्षा तथा आहार प्राप्त करने के तौर-तरीके सिखाते हैं। किन्तु स्वावलंबी होते-होते उऩको अलग कर दिया जाता है और वे अपनी-अपनी जिन्दगी अलग-अलग बसर करते हैं।
किंतु मनुष्य समाज की संरचना का आधार था---परिवार, और परिवार की धुरी था---पति-पत्नी और बच्चों के प्रति उनका दायित्व। कबीलों से जब गांव शहर और राष्ट्र बने तब भी परिवार का महत्व कम नहीं हुआ। संयुक्त परिवार की परिकल्पना पुरातन भारत की एक सामाजिक देन और उपलब्धि थी।
जब तक संयुक्त परिवार की रचना और प्रस्थापना का सामाजिक सामंजस्य बना रहा और उसमें सन्निहि सांस्कृतिक अवधारणा सुदृढ़ रही, संबंधों की मर्यादा से जुड़ी रही। तब तक परिप्रेक्ष और समस्याएँ दूसरी प्रकार की थीं। परस्पर प्रेम, निष्ठा, वफादारी और एक दूसरे के लिए त्याग व उत्कर्ष के श्रेष्ठतम उदाहरण हमें संयुक्त परिवार के इतिहास-पटल पर मिलते हैं। संयुक्त परिवार एक तरह का सामाजिक बीमा भी रहा। किंतु संयुक्त परिवार में भी कई कठिनाइयाँ और विसंगतियां उत्पन्न हुईं, पीढ़ियों के बीच रिश्ते विषम हुए और कई बार व्यक्ति की आजादी, महिलाओं और कनिष्ठ सदस्यों के स्वातंत्र्य पर आँच आती रही।
संयुक्त परिवार की परंपराएं टूटीं। पहले संयुक्त परिवार का विस्तार अधिक था, फिर वह सीमित हुआ, दंपति और उस दंपति की संतान तक। हम सब उन सीमित संयुक्त परिवारों का भी विघटन देख रहे हैं। भारतीय परिवार परंपरा में से संधिकाल कहा जा सकता है। गाँवों में अभी भी कमोबेश संयुक्त परिवार की परंपरा चल रही है, किंतु शहरों में यह परंपरा संकटापन्न है।
कुछ अरसा पहले एक लेख कहीं पढ़ा था कि प्रौढ़ हो आए पुरुष भी अपनी माँ का पल्लू कभी नहीं छोड़ पाते, बल्कि सारी उम्र वे अपनी पत्नी की तुलना अपनी मां से करते रहते हैं। पति-पत्नी के बीच संबंधों में दरार के लिए पति की माँ पर दोष मढ़ते हुए और माँ नाम के प्राणी के प्रति अपनी शिकायत की खींचतान के साथ गे बढ़ाते हुए लेखिका अपनी यह अजीबोगरीब प्रस्थापना प्रस्तुत करती है कि यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि अपने द्वारा तैयार किए गए मर्द को एक पराई औरत के पास सरकता देखकर अजीब तरह का खालीपन, चिड़चिड़ाहट, पराजय और उदासी माँ नाम की औरत में पनपने लगते हैं। मुझे लगता है कि मां नाम के व्यक्ति को लेखिका ने समझा ही नहीं और अधकचरे मनोविज्ञान का सहारा लेकर माँ-बेटे के रिश्ते को कठघरे में खड़ा कर दिया।
पश्चिम में अकसर पति-पत्नी की पसी तकरार के लिए पत्नी की माँ को दोषी ठहराते हुए कहा जाता है कि पत्नी अपनी माँ की तरफ जब ज्यादा तवज्जो देने लगती है तब पति को अच्छा नहीं लगता और उसकी उकताहट पति-पत्नी के बीच मतभेद अंकुरित करने लगती है।
मुझे आश्चर्य होता है कि आज की आधुनिक नारी एक कमाऊ समझदार और दो तीन बच्चों के बाप को अपनी माँ की गोद में सिर रखे देखकर परेशानी महसूस करती है। यदि प्रौढ़ और परिपक्व आयु का व्यक्ति अपनी मां के प्रति आदर और सके वात्सल्य की डोर में अपने को बँधा पाता है तो यह आधुनिक नारी सीधे सिगमन फ्रायड की पुस्तकों में संदर्भ ढूंढने चल देती है। इसे एक त्रासदी नहीं तो और क्या कहा जाए। वास्तव में इस प्रकार का सोच ही सास-बहू के रिश्ते को विषाक्त करने के लिए जिम्मेदार है।
पश्चिम में तो अधिकांश लड़के-लड़कियां वयस्क होते-होते अपने माँ-बाप का घर छोड़कर अलग रहने लगते हैं और अपने जीवन साथी की तलाश करते हैं; किंतु भारत में आज भी बेटे के विवाह और पुत्रवधू के विषय में मां ही सपने के बंदनवार सजाती है। भारत में बेटे की शादी की ललक माँ को अनुप्राणित करती है। माँ अपने बेटे की शादी के मौके पर खुशियों से झूम उठती है। यह दूसरी बात है कि बेटे की शादी के बाद कई ऐसे कारण और बन जाते हैं, जिनके फलस्वरूप सास और बहू के संबंधों में दरार पड़ने लगती है, मन मुटाव हो जाता है, गलतपहमियों की विष-बेल बढ़ने लगती है। उन स्थितियों में दोष बहू का भी हो सकता है, सास का भी हो सकता है या फिर जैसा कि अधिकांशतया होता है, सास और बहू दोनों ही दोषी हो सकती हैं। किंतु इसका यह अर्थ नहीं कि बेटे कृतघ्न होकर अपनी माँ का प्यार और दुलार भूल जाएँ या अपनी पत्नी के प्रति उनका जो कर्तव्य है, उसकी उपेक्षा करें।
हमारी परंपरा में मां को आदर और श्रद्धा का स्थान दिया गया है। वह इस आदर और श्रद्धा की अधिकारी भी है। क्योंकि हर पारिवारिक इकाई की धुरी होती है माँ। यदि बेटा और बहू माँ से अलग रहते हैं तो उनके बीच के मतभेद और मनभेद के लिए माँ को दोष देना न्यायसंगत प्रतीत नहीं होता। ऐसे लोगों के कितने ही विवाह-संबंध टूटते हुए नजर आते हैं, जिसके लिए माँ को मुजरिम करार देना एक निहायत गैर जिम्मेदाराना व्यवहार है। ज्यादातर तो देखने में यह आया है कि विवाह के टूटने में पति और पत्नी का मतभेद ही विशेष कारण बनता है। कई बार यह मतभेद रिश्तों की मर्यादा को न समझने के कारण या बहू तथा उसके माँ-बाप के हावी होने के कारण भी होता है।
सास-बहू के रिश्तों का विषय बहुत उलझन भरा है। एक तरफ दहेज की मांग के कारण ये रिश्ते विषम हो जाते हैं तो दूसरी ओर संयुक्त परिवार में सबके सात हिल-मिलकर रहने की प्रवृत्ति के अभाव में चारों ओर तनाव-ही-तनाव नजर आता है। विसंगति इसमें नहीं है कि बेटा अपनी माँ को प्यार करे या उसे आदर दे। विसंगति इसमें है कि बहू अपने पति की माँ का तिरस्कार करे या उसे आदर न दे। बेटे का माँ को प्रेम और आदर देना स्वाबाविक है, किंतु बहू का सास को स्नेह और आदर देना घर को सुखी बनाने के लिए अति आवश्यक है। यदि बहू माँ को आदर दे और पति को प्यार तो शायद घर स्वर्ग बन सकता है।
वस्तुतः आजकल कई लड़के शादी के बाद या पैरों पर खड़े होने लायक होते ही अलग रहने लगते हैं। अकसर यह होता है कि अलग होने की बात तब उठती है जब पति-पत्नी को लगता है कि अब वे स्वावलंबी हो गए हैं और तब उन्हें माता-पिता भार-स्वरूप लगने लगते हैं। इसके कुछ विशेष कारण होते हैं, जिसमें बहू की नकारात्मक भूमिका ही प्रमुख होती है। शायद बहू को तब यह लगने लगता है कि सास-ससुर के साथ रहने में उसकी स्वतंत्रता पर अंकुश लग सकता है, उसकी स्वतंत्रता सीमित हो जाती है। अपनी सास के साथ अपने मतभेद और दृष्टिकोण के कारण सास-ससुर पर पति की आय का कोई भी खर्चा हो तो वह उसे अप्रिय लगने लगता है। वह समझती है कि जब उसका पति इतना कमा रहा है तो क्यों नहीं वह अपने ऊपर अधिक खर्च करे, क्यों नहीं वह अपने पीहर के रिश्तेदारों को और मित्रों को बिना सास -ससुर को बताए उपहार दे , क्यों नहीं वह अपनी जिन्दगी अपने तरीके से जिए। उसे अपने सास-ससुर और अपने पति के भाई-बहन पर हो रहे खर्च नहीं सुहाते। ले-देकर वह मौके-बे मौके पति के सामने एक ही राग अलापने लगती है कि मुझे अलग होना है। एक अघोषित शीतयुद्ध इस प्रकार प्रारम्भ हो जाता है। जब-तब पत्नी कोपभवन की मुद्रा और मूड अपना लेती है। अपने बाग्बाणों से पति और सास-ससुर को इस प्रकार आहत करने लगती है कि संबंधों के आधार चरमराने लगते हैं।
बहू यदि अपने पति और बच्चों को लेकर अलग घर बनाना चाहे तो उसके लिए पति के माँ-बाप से झंझट करना क्यों अनिवार्य हो जाता है, यह बात मनोविज्ञान का प्रश्न बनकर उपस्थित होता है।
सौ बातों की एक बात यह है कि जब अपनी युवावस्था में बहू-बेटे आर्थिक रूप से स्वावलंबी हो जाते हैं तो उनको माँ-बाप बहुत कुछ गैर-जरूरी लगने लगते हैं। बेटे का रुझान पने माँ-बाप के प्रति कुछ बी हो, बहू को अकसर संयुक्त परिवार का अनुशासन अमान्य ही रहता है। ऐसा भी होता है कि कभी माँ-बाप की बढ़ती उम्र में उनकी अस्वस्थता से आशंकित होकर बहू अलग रहना अधिक पसंद करती है, ताकि सेवा सुश्रुषा का भार उस पर कभी न पड़े।
किंतु मूल बात यह है कि सामाजिक संस्कार बदल रहे हैं, पीढ़ियों के बीच नए प्रकार की दूरियां उभर रही हैं। और संयुक्त परिवार की संस्कृति का स्वार्थपरक जीवन-शैली के कुठार से मूलोच्छेद हो रहा है। अब हम लाख भारतीय संस्कृति और मूल्यों की दुहाई दें , संयुक्त परिवार की परंपराएँ तो टूट ही चुकी हैं; किंतु उनकी जगह कोई ऐसी मुकम्मिल व्यवस्था हम नहीं बना सके हैं जो उन परंपराओं का स्वस्थ विकल्प बन सके। एक ओर तो हमारे समाज में आर्थिक विपन्नता है और वह आर्थिक विपन्नता बढ़ती हुई उम्र की बीमारी और बेबसी को लगभग असाध्य बना देती हैं। दूसरी ओर मुद्रास्फीति के कारण पेंशन सर्वथा अपर्याप्त हो जाती है। फिर आर्थिक सम्पन्नता कभी माँ-बाप के प्रति सहज प्रेम और पुत्र-प्रेम की ललक का स्थान नहीं ले सकती। पश्चिम के जीवन दर्शन से प्रभावित और उसी प्रवाह में तिनके की तरह बह जाने वाली मानसिकता को क्या कहिए कि जो पुत्र के सहज स्नेह और माँ-बाप के सहज वात्सल्य पर भी आनन-फानन ऊल-जलूल प्रश्नचिन्ह लगा देती है।
हमारी संस्कृति के विश्व में बड़े ही चर्चे हैं। जो भी विदेशी, भारत सरकार के आमंत्रण पर सरकारी सुख भोग गया है वह हमारी संस्कृति का गायक बन गया है और हर उपयुक्त अवसर पर कहता है कि संसार में कोई संस्कृति है तो भारतीय संस्कृति। एशियाड के सफल आयोजन और गुट-निरपेक्ष देशों के सम्मेलन की सफलता ने तो संसार को सोचने के लिए मजबूर कर दिया था कि भारत में ऐसा क्या है जो सफलता की कुंजी इसके पास है? इस मुद्दे पर तमाम लोगों के नजरिये अलग-अलग हो सकते हैं, फिर भी, वे मुझसे सहमत होंगे कि हमारी सफलता की कुंजी हमारी सहमति है यानि कि बातचीत, बाद-विवाद और लिखापढ़ी के बाद अंततोगत्वा हमारा विषय वस्तु सेहमतहो जाना है।
अंग्रेजों ने जब कृषि प्रधान भारत में पदार्पण किया था तब निश्चित ही एक अंग्रेज ने दूसरे से कहा होगा ' सर्च्ड, वी सर्च्ड एन एग्रीकल्चर्ल कंट्री। ' उनका यह उद्बोधन हमारे चरित्र का सही विश्लेषण करता है। एग्री अर्थात सहमत और कल्चर यानि संस्कृति। शायद इस आधार पर भी भारत सहमत संस्कृति का देश माना जाता है। भारत का ऐसा संस्कृति-चरित्र आदि से हो या न हो पर अंग्रेजों के जमाने से जरूर था। कबीर जैसे संत कवि ने पन्द्रहवीं सदी में लिखा था-
कबीरा खड़ा बजार में सबकी मांगे खैर।
ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर।।
कबीर से लेकर अब तक लोगों को सहमत बनाने की दर में बेहद वृद्दि हुई है। तर्क व्यवस्था को छोड़ कर चमचा व्यवस्था अपना लेने से सहमति बनाने की दिशा में गति आई है। अब हर अच्छी बात का श्रेय सत्तारूढ़ नेता को और बुरी बातों के लिए अति-उत्साही अधिकारियों को लताड़ने की परंपरा बन गई है। सहमति संस्कृति के रख-रखाव के लिए सरकार ने बाबुओं की फौज भर्ती कर रखी है जो प्रति दिन यस सर- यस सर और हां जी - हां जी की मुद्रा में व्यायाम करती है। कनिष्ठ अधिकारी अपनी सहमति 'या ' कहकर प्रकट करते हैं। इस सुसंस्कृत फौज के कारण ही कागजी प्रगति से सरकार और जनता दोनों परस्पर सहमत हो जाते हैं।
सहमति की संस्कृति के प्रसार में भारतीय प्रेस आदमी-आदमी को देखकर अपना धर्म निभाती है। आदमी फायदे का लगे तो उसकी इमेज बढ़े ऐसा छापना और कांटेदार हो तो वह ठिकाने लग जाए, ऐसी प्रेस की प्रतिभा है। जैसे वे खबर छापते हैं -'चालीस मंत्रीमंडल के सभी सदस्यों ने उपस्थित हो कर हायकमान का स्वागत किया। ' वे आगे लिखते हुए अपने चार-छः लोगों के नाम लिख देंगे और शेष को आकड़ों में जोड़ देंगे। यदि सहमति-विधा न पनपी होती तो पाठकों को अरोचक नाम बी पढ़ने पड़ते। वह तो अच्छा हुआ समाचार को पुनः चार एजेंसी वाला समाचार बना दिया अन्यथा ' समाचार ' की भाषा और शब्दों में ' आकाशवाणी ' की तरह सहमति-समाचार व्यवस्था स्थापित हो जाती।
सहमति-संस्कृति की मूल भावना पर विचार करें तो लगता है कि हम उनसे सहमत हैं जो सत्तासीन हैं या जिनकी सत्ता तक पहुंच है। साफ शब्दों में कहें कि उनमें वजन है। भारत में वजनदार राजनीतिज्ञ कभी अपने स्वार्थ के लिए नहीं लड़ता, वह तो कुछ सिद्धान्तों की खातिर लड़ता है और पद पा कर सहमत हो जाना ही सका सबसे बड़ा सिद्धांत है। सहमति-संस्कृति में ज्यादा वजन भी है और संतुलन भी। आप में वजन है तो मैं आपसे सहमत हूं और मुझसे ज्यादा वजन है तो आप स्वतः मुझ से सहमत हो ही जाएंगे।
यह सहमति की संस्कृति का ही असर मानिए कि जनता एक आवाहन पर देश के लिए कुर्बानी दे सकती है और दूसरे आवाहन पर अपने ही राज्य में शांति और व्यवस्था का भुरता बना सकती है। जनता जानती है कि जीने के लिए दाल-रोटी चाहिए इसलिए वह दालरोटी पर सहमत हो जाती है और नेता लोग वक्तव्य दे देते हैं कि देश खुशहाली और प्रगति की ओर बढ़ रहा है। कर्मचारी भी इस कागजी स्थिति से सहमत हो जाते हैं और मंहगाई भत्ता , बोनस, वेतन, वृद्धि आदि की मांग करने लगते हैं। सरकार आदतन् ना नुकुर करती है और फिर सहमत हो जाती है। फिर भी, सहमति संस्कृति में पुलिस की भूमिका अहम अनिवार्य है, क्योंकि वह ही तो एक ऐसा सिद्ध माध्यम है जो असहमति को सहमति बना सकती है। पुलिस जब कभी सहमति के स्तर से ज्यादा सताने लगती है तो दाल-रोटी के चक्कर में पड़े आदमी की ओर से विपक्षी राजनीतिज्ञ अलार्म घड़ी की तरह टनटना उठते हैं और जनता उनकी तर्ज में लोकतंत्र चाहिए, जनतंत्र चाहिए आदि गीत गुंजाने लग जाती है। भरतपुरी लोटे की तरह आम भारतीय के मन में सत्ता पक्ष भी है और प्रतिपक्ष भी। जब एक बिगड़ैल हो जाता है तो दूसरा लाडला हो जाता है और संस्कृति, सहमति के साम्य पर बनी रहती है।
सहमति-संस्कृति का ध्येय सभी लोगों को सुखी करना है, सर्वे भवन्तु सुखिनः। सब लोगों को प्रसन्न करने के लिए सरकार प्रति वर्ष बजट प्रस्तुत करती है और जान-बूझकर बहुत से कर लगा देती है। सत्तारूढ़िए ऐसे बजट को प्रगतिशील और सर्वोत्तम बजट बताते हैं तो प्रतिपक्ष वाले बजट को घोर अन्याय करने वाला और गला घोटू बताते हैं। बेचारी जनता तमाशा देखती है सरकार कुछ टैक्स कम कर दे। सरकार सहमति-संस्कृति की प्रवक्ता है, वह करों में कुछ राहत घोषित करती है और सरकार के प्रजातंत्रीय होने पर आम सहमति हो जाती है।
हंगरी की राजधानी और डेनबू नदी के किनारे बसा बुडापेस्ट दो हिस्सों में बंटा हुआ हैः पहाड़ी वाला बुडा और व्यापारिक हब पेस्ट, 1778 के आसपास जिन्हें एक खूबसूरत पुल से जोड़कर बुडापेस्ट बना दिया गया था। पुल के दोनों तरफ खड़े चार भव्य शेर दोनों हिस्सों की रक्षा करते हैं। किसी परियों की कहानी वाली किताब-सा आकर्षक यह शहर आधुनिक तो है, पर आजभी पूरी तरह से अपने सभी मध्यकालीन दुर्ग और राजमहलों को संजोए-समेटे है। ध्यान से आँख बंद करके देखो तो इसके सुन्दर झरोखों में आज भी परियों की राजकुमारी बैठी दिख जाएगी और अंधेरे कोनों में ड्रैक्यूला और वैम्पायर्स।
दूसरे विश्वयुद्ध में पूरी तरह से ध्वस्त यह शहर आज सिर्फ पचास साल में अपनी पूरी गरिमा के साथ फिरसे कैसे खड़ा हो गया , देखकर आश्चर्य होता है। निश्चय ही यह यहां के लोगों की जिजीविषा और स्वाभिमान ही है -कड़ी मेहनत मेहनत और खुद में विश्वास है, जिसकी वजह से यह संभव हो पाया। शायद यह इस दुनिया का अकेला शहर है जिसकी चर्च में वहाँ के संरक्षक सेंट, सेंट स्टीवेन का कटा हुआ हाथ आज भी सुरक्षित और प्रदर्शित है ( आपसे कहा था न कि परियों और ड्रैकुला दोनों का शहर है यह---यानी कि कोमल और वीभत्स दोनों साथ-साथ और बगल-बगल में)। यहाँ का पार्लियामेंट हाउस अपनी सुरुचि, वैभव और कला से चमत्कृत करता है। आर्ट म्यूजियम में स्पैनिश और इटैलियन आर्टिस्टों का सबसे बड़ा और बहुमूल्य संकलन है। तस्बीरें ऐसी कि देखते-देखते बात करने लग जाएँ। तस्बीरें ऐसी कि देखते-देखते बात करने लग जाएँ। मांसलता के रंग इतने सजीव कि चुटकी काटने को मन करता है। इन तस्बीरों में खड़े मासूम बच्चों को खिलौनों और मिठाइयों की तरफ ललचाई नजर से देखते देख, मन उन्हें सबकुछ दे देना चाहता है। फूलों से खुशबू आने लगती है और कपड़ों की तहें और सिलवटों की कोमलता स्वयं अपने बदन पर महसूस होने लगती है। तैलीय पद्धति के चित्रों में आज भी दुनिया इन कलाकारों से बहुत कुछ सीख सकती है। रैम्ब्रांट की 'जोसेफ्स ड्रीम' नाम की तस्बीर में तो मन ऐसा रमा कि पतिदेव को मुझे बाँह खींचकर जगाना पड़ा। गोया, मुलर, आमरीनी सब एक-से-एक बढ़कर। कितने ऐसे जिन का शायद हमने नाम भी न सुना हो पर अपने काम में उतने ही माहिर और अभिव्यक्ति में दक्ष।
अगले दिन फिशर कासल की कई घुमावदार सीढ़ियों से चढ़कर जब ऊपर पहुंची तो फिर से वही एक रोमांटिक जिप्सी गांव जैसा ही माहौल था। कहीं कोई तस्बीरें बना रहा था , तो कहीं औरतें बहुत बारीक और खूबसूरत लेस से बनी चीजें बेच रही थीं। यहां तक कि बचपन में बारबार देखे और खेले, उस दाने चुगते तीन मुर्गे वाले लकड़ी के सुन्दर और रंग-बिरंगे खिलौने को देखकर लगा कि कहीं अपने जाने-पहचाने देश में ही तो नहीं! विश्वास हो चला कि यह लोग भी जरूर पहले कभी, शायद आठवीं शताब्दी में एशिया के उन्ही हिस्सों से आए थे जहां से हम आप हैं। हमारे पूर्वज एक हैं। कासल के उत्तरी हिस्से से आती, हवा में गूंजती, वह वॉयलिन पर बजती मधुर धुन की स्वर-लहरी एक अदृश्य डोर-सी अपनी तरफ खींचे जा रही थी। अकेली चुपचाप बैठी में घूमना-फिरना सब भूल, एक के बाद एक वे सुरीली धुनें सुनती और पिघलती चली गयी। वह भी अपनी धुन में मस्त बजाता रहा, बिना इसकी परवाह किए कि कोई सुन भी रहा है या नहीं।
सारी थकान और भूख रफूचक्कर थे और मचलती थिरकती धुनें बारबार राजकपूर की फिल्में और दिवगंत शंकर जयकिशन की यादें दिलाती चली गयीं। पता नहीं किसका किस पर असर था, पर मन एक नयी आत्मीयता से भर चुका था। मेरी तल्लीनता देख उसने खुद मुस्कुराकर बताया कि ' हमारा संगीत बहुत कुछ तुम्हारे भारतीय संगीत की तरह ही है।' और मैं अब हर हंगेरियन को ध्यान से देखने लगी। शायद यह भी कभी हमारी तरह ही थे। इनके सोचने का तरीका तो जरूर हमारी तरह ही था। वही दुख से जुड़े रहने की एक मजबूर सी आदत। वही संघर्षरत जीवन- वही झूठी शान में डूबे रहना- वरना गाइड चर्च घुमाते हुए कुछ यूँ न कहती कि पेगन धर्म के पिछड़ेपन से निकलने में हमें भी कई सौ साल लग गये थे। शायद यह भी अब यूरोपियन कम्यूनिटी में जुड़ने का बड़ी बेसब्री से इन्तजार कर रहे हैं। पाश्चात्य के भौतिक विकास से यह भी तुरंत ही जुड़ जाना चाहते हैं। पुर्तगाल और ग्रीस की आर्थिक समृद्धि की मिसाल हर पल इनकी आँखों के सामने है। पर आगे बढ़ने की धुन में उम्मीद है यह अपनी संस्कृति और कला नहीं भूलेंगे क्योंकि मुझे बहुत सारा जो इनके देश में सुन्दर और आकर्षक लगा, पुराना और अतीत से जुड़ा हुआ ही था।
इन्होंने आज भी अपना अच्छा-बुरा सब संजो रखा है। कुछ एक खुले घाव-से अपने अपमान और हार के निशान भी छोड़ रखे हैं, जिससे कि सुखमय वर्तमान संघर्षमय अतीत का आभारी रह पाए। सजी संवरी इमारतों के बीच आज भी एक इमारत यूं ही गोलियों से बिंधी और टूटी-फूटी खड़ी दिखाई दी। उसकी किसी ने मरम्मत नहीं की। किसी ने सजाया संवारा नहीं, जिससे कि याद रखा जा सके कि इनके साथ क्या-क्या बीती थी। शायद हमारी तरह इन पौलीएशियन लोगोंके लिए भी इनका अतीत और इतिहास अपनी सारी जिल्लत और दर्द के साथ भी एक गौरव का ही विषय है। क्योंकि काले और घुप अँधेरों से निकलकर यह भी हमारी तरह ही एक समृद्ध और सुखी सदी और भविष्य का सपना देखने वाले ही लोग हैं।---
रूई के फाये-सा सफेद और पूरा-का-पूरा गोलमटोल, वह जाने कब लुढ़कता-पुड़कता चुपचाप घर में घुस आया था। अब तो जहां-जहां अंशू जाता पीछे-पीछे वह भी चल देता। मम्मी-पापा सब परेशान थे यह सोच-सोचकर कि अंशू अब खाना-पीना सब भूलकर चौबीसों घंटे बस इसे ही तो नहीं खिलाता रह जाएगा और बस इसी के साथ तो नहीं खेलता रहेगा! ... ज्यादा कुछ तो नहीं, हां, सुबह से अंशू उसे अपना आधा चौकलेट केक, तीन-तीन स्ट्राबेरी और मां की नजर चुराकर सारा दूध जरूर पिला चुका था। पर उसकी कूं-कूं अभी भी नहीं मिटी थी। अंशू गोदी में ले लेता तो वह चुप हो जाता और नीचे रखते ही फिर चालू हो जाता। बॉल की तरह उछल-उछलकर वापस गोदी में चढ़ने को कूदने लगता। मम्मी डांटकर घर से बाहर न निकाल दें, इसलिए अंशू भी उसे गोदी से नहीं उतार रहा था। वे बेस्ट फ्रैन्ड भी बन चुके थे। अंशू यानी कि छः साल के अँशुल को डर लग रहा था कि कहीं मां उसे घर में रखने के लिए मना न कर दें , क्योंकि उसे लग रहा था कि मां को उसका सबसे अच्छा दोस्त पसंद ही नहीं आ रहा था।
अन्य और कई वजहों के साथ इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि जब-जब अंशुल बाहर बगीचे से खेलकर वापस घर को लौटता तो वह खुद तो दरवाजे के पास पड़ी मैट पर जूते उतारता और पैर भी अच्छी तरह से रगड़कर साफ करता, पर स्मार्टी मिट्टी-सने पंजे लेकर ही अंदर दौड़ा चला आता और पैर भी तो दो नहीं, चार-चार थे उसके पास। हां, स्मार्टी कहकर ही अंशुल बुला रहा था अब उसे और वह भी तो अंशुल की एक ही पुकार पर ऐसे ललक कर दौड़ता, मानो हमेशा-से यही और बस यही नाम था उसका। पूरे सफेद शरीर के साथ दायीं आंख पर कुदतरन पड़ा वह काला पायरेट पैच वाकई में बहुत स्मार्ट लग रहा था और अगली बार जब उसके दोस्त खेलने आएँगे, तो सारे खेलों में बस उसे ही पायरेट बनाने का निश्चय भी कर लिया था अंशुल ने। उसकी एक ही वुफ-वुफ से टीना और सारे दोस्त तो वैसे ही डर जायेंगे और खिलौनों को छूने तक की हिम्मत नहीं करेंगे। ऐसा नहीं था कि वह अपनी तीन साल की बहन टीना और सारे दोस्तों से प्यार नहीं करता था, या फिर साथ-साथ खिलौने शेयर नहीं करना चाहता था; बस, सारे खिलौने बिखेरते तो दोस्त और समेटता अकेला अंशुल। अब स्मार्टी मदद किया करेगा उसकी--- सोचते ही अंशुल के चेहरे पर बड़ी-सी मुस्कान आ गई- कुछ और नहीं तो उसे अकेला छोड़कर सोने तो नहीं ही भाग जाया करेगा । टीना की नकल करने की आदत से भी बहुत चिढ़ थी उसे। आए या न आए, करपाए या न करपाए उसे हर वही काम करना होता था, जो अंशुल कर रहा हो। उसी पेंसिल से उसी कागज पर तस्बीर बनाती जिसपर कि अंशुल बना रहा होता और न करने देता, तो रोने बैठ जाती। अंशुल देख रहा था कि टीना की कौन कहे अब तो मम्मी भी थोड़ा-थोड़ा स्मार्टी से डर रही थीं। साफ-सुथरे चौके में चारोतरफ कीचड़ सने पंजों की डिजाइन बना डाली थी उसने। मम्मी ने अगले पल ही आदेश दिया कि तुरंत ही इसे घर से बाहर निकालो। घबराकर चुपचाप अंशू बाहर छोड़ भी आया उसे। पर वह कहीं गया ही नहीं। रातभर वहीं दरवाजे पर बैठा कूं-कूं करता रहा और अगली सुबह जैसे ही अखबार उठाने के लिए मम्मी ने दरवाजा खोला, कूदकर फिरसे अंदर आ गया वह। अंशू भी अपने दोस्त को वापस पाकर बहुत ही खुश हुआ और मारे खुशी के ताली बजाने लगा। अब फिर आगे-आगे अंशू दौड़ रहा था और पीछे-पीछे स्मार्टी। टीना भी उनके इस ' भागो-भागो' वाले खेल में किलकारियां मार-मारकर आ जुड़ी थी। दोनों बच्चों को इतना खुश देखकर पापा को बहुत अच्छा लग रहा था और उन्होंने बच्चों की खातिर स्मार्टी की सारी देखभाल की, खिलाने-पिलाने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। अंत में हारकर मां ने भी इस शर्त पर उसे घर के अंदर रखने की इजाजत दे ही दी कि अंशू ध्यान रखेगा इस बात का कि स्मार्टी गंदे, मिट्टी-सने पंजों के साथ घर के अंदर नहीं ही आ पाए।
मां की बात अच्छी तरह से समझ में आ गई उन्हें और इस बात का अंशू और उसके पापा ने कड़ाई से ध्यान भी रखा। वे भी अच्छी तरह से जानते थे कि अगर ज़रा भी ढील दी तो स्मार्टी के साथ-साथ उन्हें भी बाहर बगीचे में ही रहना और सोना पड़ेगा। पापा ने दरवाजे के पास एक पानी भरा तसला रख दिया और अब वे घर में घुसने के पहले स्मार्टी के पैर उसमें डुबोकर साफ कर लेते , फिर ही घर के अन्दर आते।
अब तो अंशू दिनभर अपने दोस्त के साथ बगीचे में फुटबाल खेलता है। उसे बास्केट में बिठाकर साइकिल की सैर भी कराता है और मां उसपर गुस्सा भी नहीं होतीं। यही नहीं, कभी-कभी तो स्मार्टी ब़ॉल की तरह ही मम्मी-पापा की चिठ्ठियां और अखबार भी मुंह में दबाकर ले आता है और पापा के साथ-साथ मम्मी से भी दोस्ती हो गई है उसकी। अक्सर ही मम्मी पीठ पर हाथ फेरकर उसे प्यार करती हैं और हंसकर अंशू को बताती हैं, कि बस नाम का ही नहीं, वाकई में बहुत स्मार्ट है यह स्मार्टी और प्यारा भी कितना, बिल्कुल खिलौने-सा । और बच्चों अंशू को अपना साफ-सुथरा समझदार दोस्त कितना अच्छा लगता है। कितना नाज है उसे इसपर, यह तो तुम अंशू की चमकती आंखें और कानतक खिंची मुस्कान को देखकर समझ ही सकते हो !...
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चिड़िया रानी
चिड़िया रानी बड़ी सयानी
फुदक-फुदक करतीं मनमानी
ले-ले तिनके चोंच में उड़तीं
कितना सुन्दर घर को सजातीं
उड़कर पहुंचूं मैं भी वहाँ
दे दो तुम जो जरा हौंसला।
चंदा मामा
चंदा मामा नीचे आ जा दूध-मलाई संग-संग खा जा। मम्मी तो सो गईं हमारी तू ही आकर मुझे सुला जा।।