हममे से कई ऐसे भी हैं, जो जहां कदम टिका दें, वही उनका घर बन जाता है। न पीछे छूटे की याद आती है और न कल क्या होगा इसकी ही फिक्र! खुश किस्मत हैं ऐसे इन्सान जो इतनी बेफिक्र और मस्त जिन्दगी जी पाते हैं, अधिकांशतः तो ऐसे ही होते हैं कि इसके चप्पे-चप्पे से प्यार करने लग जाते हैं। कुछ दिन दूर रहे नहीं कि इसकी याद सताने लग जाती है फिर चाहे वह पांचतारा सुख-सुविधाओं से लैस होटल हो या राजसी वैभव से भरापूरा राजमहल। कुटिया, छप्पर , चाल या आलीशान महल, घर तो घर ही है। हो भी क्यों न गृहस्वामी और गृहस्वामिनी जो बना देता है यह एक आम इन्सान को । यही तो वह नीड़ है जहां हम जीवन की पहली सांस लेते हैं, पहला शब्द बोलते हैं और जिसके आंगन में जीवन का पहला कदम चलते हैं। … घर बसाने का सपना आदमी तो आदमी पशु पक्षियों तक को होता है। घर जिसके अन्दर परिवार की पूरी मोह ममता और वात्सल्य किलकता है: घर जिसके अन्दर प्यार और ममत्व के साथ-साथ अगर ध्यान न दो तो सारी बुराइयों और लड़ाइयों की जड़ें भी उतनी ही आसानी और तेजी से बढ़ और पनप सकती हैं और पूरे ही घर का स्वास्थ बिगाड़ देती हैं । उष्मित वातावरण हो तो जर, जोरू, जमीन तीनों ही फैल-फूटकर पल्लवित होने लग जाती हैं, फल देने लगती हैं। यही कारण है कि घर की रक्षा और सुरक्षा का ध्यान विशेष रूप से रखता है आदमी और उसे प्राणों से भी ज्यादा प्यारा होता है अपना घर। घर...जिसके लिए लडाइयां लड़ी ही नहीं, जीती और हारी भी जाती हैं। किसी ने चोरी का सेव खाने पर अपना स्वर्ग छोड़ा था (एडम और ईव) तो किसी ने अपनी अतिशय भलमनसाहत के रहते( भगवान श्री राम) चाहे जैसे छूटे, पीछे छूटा घर आजीवन भटकाएगा जरूर...कभी देश बनकर तो कभी बूढ़े मां बाप बनकर। कुछ नहीं तो मात्र चन्द यादें ही बनकर। सदियों से ही यह घर छूटने का दुख ऐसा दुख है जिससे आदमी मुश्किल से ही उबर पाता है...चाहे फिर उसने घर स्वेच्छा से छोड़ा हो या किसी मजबूरी के तहत। यदि इस दुख की तीव्रता को अनुभव करना है तो हमें किसी प्रवासी या रिफ्यूजी का मन जानना पड़ेगा। अकेले विदेश में काम करने गये नौजवान से पूछना होगा। घर जिसकी तलाश में कई बेघर आजीवन भटकते ही रह जाते हैं और यह एक नासूर बना उनके अस्तित्व और पहचान दोनों को ही पूरी तरह से मिटाता चला जाता है...एक नयी पहचान लेने पर मजबूर कर देता है। मिल जाए तो स्वर्ग न मिले तो नर्क वाली कहावत जितनी घर पर चरितार्थ होती है शायद ही किसी और पर।
घर, जिसके अन्दर बैठकर छोटी से छोटी हैसियत का आदमी भी खुदको किसी राजा से कम नहीं समझता, इसी घर-परिवार का संतुलन यदि जरा-सा भी बिगड़ जाए तो कई घर तो ऐसे भी बन जाते हैं जहां घरवाले एक-दूसरे के साथ आजीवन अजनबियों की तरह रहते ही जीवन निकाल देते हैं । दूसरी तरफ जिस घर की नींव प्यार की हो और छत विश्वास की, उसे आंधी-पानी, दुख-दर्द, कुछ भी नहीं हिला पाते ।
आज एकबार फिर विश्व भारत की तरफ देख रहा है। ब्रिटेन के पूर्व विदेशमंत्री जैक स्ट्रा ने कुछ वर्ष पूर्व भारत के बारे में कहा था कि भारत की मूल्यों की संस्कृति उसकी सबसे बड़ी पूंजी है और कोई कारण नहीं कि भारत विश्व के अग्रणीतम देशों में न जाए। क्या हम वाकई में विश्व को उसका खोया आत्मबल वापस दिलवा सकते हैं...कहीं ऐसा तो नहीं कि आज यह जो भारत के गुणगान गाए जा रहे हैं उसके पीछे भारत की आर्थिक उन्नति ही हो...एकबार फिरसे भारत सोने की चिड़िया नजर आने लगा हो। खैर वजह जो भी हो, हमें यह तो मानना ही पड़ेगा कि आज पूरे ही विश्व को भारत...उसका रहन-सहन, खाना-पीना सभी कुछ बहुत पसंद आने लगा है। हमारे हजारों साल पहले लिखे वेदों में, धर्मग्रन्थों में आज भी करीब-करीब हर समस्या का समाधान है। चाहें तो आज हम हाथ पर हाथ धरे आत्म श्लाघा की नदी में बहते रह जाएं, और चाहें तो आर्थिकता वाद और उपभोक्ता वाद की इस अंधी -दौड़ में दौड़ने से पहले अपने मूल्यों को दोहरा लें क्योंकि ऐसा करना आजभी हमारे लिए जरूरी ही नहीं, लाभकारी भी सिद्ध होगा। भूलें नहीं कि आज की समस्याओं के प्रत्युत्तर में नहीं, हमारा देश तो वह देश है जहां सदैव से ही प्रकृति और पुरुष के सामंजस्य की बातों को समझा और सहधर्म की तरह माना गया है। एक एक तने में कोटि-कोटि देवताओं के बसने की बात कही गयी है। पदार्थों और वस्तुओं का जितना पुनः उपयोग (recycling) भारत में है, शायद ही कहीं और हो। नदी, सूर्य, धरती को आज भी हमारे यहां देवता ही माना जाता है और संकट के समय (ग्रहणादि पर दान-पुण्य के अलावा सामूहिक प्रार्थना व हवनादि) इनके उद्धार व निदान के लिए आज भी कई-कई उपाय किए जाते हैं। ये कितने सार्थक हैं पता नहीं, पर एक जुड़ने का अहसास जरूर देते हैं और प्रकृति व पृथ्वी को मात्र एक उपयोग की वस्तु नहीं , पूज्यनीय अवश्य बनाए रखते हैं। कम-से-कम 'यूज, एब्यूज और डिस्कार्ड' वाली श्रेणी से अलग और ऊपर तो रखते ही हैं।
कहने का तात्पर्य बस यही है कि हम भारत और भारतीय चाहें तो आज भी विश्व के आध्यात्मिक गुरु और सखा बन सकते हैं और पर्यावरण और शांति के संदर्भ में सफल उदाहरण बनकर विश्व को दिखा सकते हैं। गत चार फरवरी को नासा ने बीटल्स द्वारा गाई ओम ध्वनि को अंतरिक्ष में हमारे ब्रह्माँड का प्रतिनिधित्व करने के लिए छोड़ा है। यही वह ध्वनि है जो अन्य सहजीवी या सहचरों को (यदि वे कहीं हैं तो) हमारे अस्तित्व का परिचय देगी...हम पृथ्वी के प्राणी हैं, कहेगी। निश्चय ही यह हम भारतीयों के लिए कम गौरव की बात नहीं, पर साथ साथ ही इससे हम सभी भारतीयों की जिम्मेदारी थोड़ी और बढ़ी सी भी महसूस होती है क्योंकि एकबार फिर विश्व हमारी तरफ देख रहा है...जहां हम पश्चिम के जैसा होना चाहते हैं, विश्व हमसे एकबार फिर बहुत कुछ जानना और सीखना चाह रहा है! न सिर्फ हमारी तरफ देख रहा है, अपितु हमारे ग्रन्थों और संस्कारों में अपनी दुरूह समस्याओं के हल तक ढूँढ रहा है।हमारी संस्कृति और परंपरा, जैसे कि संयुक्त परिवार और बुजुर्गों का सम्मान आदि पुराने परन्तु हिमालय से दृढ मूल्यों में नए फायदे और नए आयाम ढूँढ रहा है। आइये इस अंक में अपने इसी ‘घर’ की तरफ मुड़ते हैं। इसके आराम, इसकी परेशानियाँ...इसकी बेचैनियों में अपना चैन ढूँढते हैं… ।
पढ़ लिख गए तो हम भी कमाने निकल गए घर लौटने में फिर तो ज़माने निकल गए
सूखे गुलाब, सरसों के मुरझा गए हैं फूल उनसे मिलने के सारे बहाने निकल गए
पहले तो हम बुझाते रहे अपने घर की आग फिर बस्तियों में आग लगाने निकल गए
किन साहिलों पे नींद की परियाँ उतर गईं किन जंगलों में ख़्वाब सुहाने निकल गए
ख़ुद मछलियां पुकार रही हैं कहाँ है जाल तीरों की आऱजू में निशाने निकल गए
‘शाहिद’ हमारी आँखों का आया उसे ख़्याल जब सारे मोतियों के ख़ज़ाने निकल गए
-शैल अग्रवाल
जिनके जहां हैं घर, वे अब वहां नहीं रहते
लौट जाएंगे हम भी एक दिन जरूर
उम्र गुजर गई है बस यही कहते-कहते।
घर की ना कद्र, ढूंढा किए नए घर
दूर से ही पूछ लेते हैं हाल-चाल
सब बूढ़े मां-बाप और परिवार के
लायक सपूत वो ऐसे तो नहीं होते
जिनके जहां हैं घर, वे अब वहां नहीं रहते
लौट जाएंगे हम भी एक दिन जरूर
उम्र गुजर गई है बस यही कहते-कहते।
न मन का पता न घर का ही आज
जीवन का हर गणित लेना-देना जोड़-भाग
पिंजरे में बन्द देखा शेर जो पालतू बना
आदमी ही करता रहता शिकार एक-दूजे का
मेहनत ईमानदारी शब्द निरर्थक, बेजान
बिल नहीं सांप बनाते बंगले आलीशान।
जिनके जहां हैं घर, वे अब वहां नहीं रहते
लौट जाएंगे हम भी एक दिन जरूर
उम्र गुजर गई है बस यही कहते-कहते।
भटकी फिर गौरैया बना-बना के
ड्रेन पाइप में नित घोंसले
पेडों की कौन कहे अब तो
जंगल भी नहीं बचते..।.
जिनके जहां हैं घर वे अब वहां नहीं रहते
लौट जाएंगे हम भी एक दिन जरूर
उम्र गुजर गयी है बस यही कहते-कहते।
ऋषभ देव शर्मा
तोड़ने की साजिशें हैं हर तरफ़, है बहुत अचरज कि फिर भी घर बसे हैं, घर बचे हैं !
भींत, ओटे जो खड़े करते रहे पीढियों से हम; तानते तंबू रहे औ' सुरक्षा के लिए चिक डालते; एक अपनापन छतों सा- छतरियों सा- शीश पर धारे युगों से चल रहे; झोंपड़ी में- छप्परों में- जिन दियों की टिमटिमाती रोशनी में जन्म से सपने हमारे पल रहे; लाख झंझा- सौ झकोरे- आँधियाँ तूफान कितने टूटते हैं रोज उन पर पश्चिमी नभ से से उमड़कर ! दानवों के दंश कितने तृणावर्तों में हँसे हैं, है बहुत अचरज कि फिर भी घर बसे हैं, घर बचे हैं !
घर नहीं दीवार, ओटे, घर नहीं तंबू, घर नहीं घूंघट; घर नहीं छत, घर न छतरी; झोंपड़ी भी घर नहीं है, घर नहीं छप्पर .
तोड़ दो दीवार, ओटे, फाड़ दो तंबू, जला दो घूंघटों को, छत गिरा दो, छीन लो छतरी, मटियामेट कर दो झोंपड़ी भी, छप्परों को उड़ा ले जाओ भले.
घोंसले उजडें भले ही, घर नहीं ऐसे उजड़ते. अक्षयवटों जैसे हमारे घर हमारे अस्तित्व में गहरे धँसे हैं, है नहीं अचरज कि अब भी घर बसे हैं, घर बचे हैं ! घर अडिग विश्वास, निश्छल स्नेह है घर. दादियों औ' नानियों की आँख में तैरते सपने हमारे घर. घर पिता का है पसीना, घर बहन की राखियाँ हैं, भाइयों की बाँह पर ये घर खड़े हैं; पत्नियों की माँग में ये घर जड़े हैं. आपसी सद्भाव, माँ की मुठियों में घर कसे हैं, क्यों भला अचरज कि अब तक घर बसे हैं- घर बचे हैं...
ऐसा नहीं, कि गृहिणी होने की वजह से ही प्रिय विषय है यह। ईश्वर के मुंह की तरह ही बृहद रूप में सभी कुछ ही तो संजोए हुए है यह...हर चीज से ही तो जुड़ा है अपनी दीवार, छत नींवों जैसा...खिड़की और झरोखों जैसा। खिड़की या गवाक्ष खोलकर भीतर से देखो तो जहांतक आँखें देख और समेट पाएँ, पूरा ही धरती और आकाश है यह और यदि दरवाजे से बाहर निकलो, तो एक कबीला या समाज। दो कदम और आगे चलो तो शहर है। शहर जो किसी देश का हिस्सा है और देश जो इस विश्व या पृथ्वी में ही है और फिर अगर थोड़ी और उदार व निष्पक्ष दृष्टि से देख पाएं, तो पृथ्वी ब्रहमांड से अलग कहां...सभी कुछ तो एक दूसरे से जुड़ा हुआ है।
बिल, घोंसला, कोटर से गुफा तक, यह बसेरे की कहानी शायद तबसे चली आ रही है जबसे सृष्टि की संरचना हुई । पृथ्वी पर रहने वाले ये जीव-जन्तु ही क्यों उस रचयिता को भी तो क्षीर-सागर और कैलाश पर्वत की जरूरत पड़ ही गई। शेर और बाघ जैसे अन्य अपने से अधिक ताकतवर सहचरों की तरह ही सदियों से गुफाओं में छुपे मानव ने बुद्धि के विकास के साथ-साथ अनेकानेक नवीनतम जीवनी के साधन जुटा लिए और इसके नित-नित, नए-नए और भव्यतम रूप हमारी आँखों के आगे आने लगे, आ रहे हैं व भविष्य में भी आते ही रहेंगे...सुना है अबतो बुलेट प्रूफ कारों की तरह ही हरतरह के हमले से पूर्णतः सुरक्षित घरों का निर्माण भी किया जाएगा।
.. सारी प्रगति और मानवता के हजारों साल के इतिहास और विकास के बाद भी, झोंपड़े और झुग्गियां तो आज भी हैं जो घोंसले और कन्दरा के बीच ही कहीं आज भी वैसी ही दयनीय दशा में ही लटकी हुई हैं अपनी मूल रचना और स्वरूप में। पचास प्रतिशत इन्सान आज भी उसी गुफा या सच कहा जाए तो गुफाओं से भी अस्थाई और असुरक्षित घरों में रह रहे हैं या बेघर ही घूम रहे हैं। परन्तु गुफा से घर और घर से महल और महल से राजमहल तक का यह सफर मुख्यतः मानवता के विकास का सफर रहा है, चन्द लोगों की योजना, संचालन और ताकत व बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन भी। यही वजह है कि एक साधारण सी संरचना, करीब-करीब बुनियादी यह जरूरत, हमें पूरी मानवता का इतिहास बता देती है। उसका भूगोल, इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति... पूरा-का-पूरा ज्ञान-विज्ञान समेटे हुए है क्योकि एक सफल और सुचारु घर के लिए भी प्यार और सद्भाव के साथ-साथ कर्मठता और कुशल संयोजन उतना ही जरूरी हैं, जितना कि एक देश या पूरे मानव समाज के लिए, वरना घर, घर नहीं, मात्र एक ढांचा ही रह जाता है, जहां उम्र गुजारने के बाद भी कई-कई अजनबी अपने अपने अकेलेपन में भटकते उसे पिंजरे में तब्दील कर लेते हैं...बहुत आसान है कुबुद्धि के साथ किसी भी घर का मात्र एक पिंजरा बन जाना। जैसे कि एक अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता वैसे ही एक अकेली ईंट घर नहीं बना सकती।
एक सुचारु और आदर्श गृह-संरचना के लिए नींव और छत के साथ-साथ फर्श और रौशनदान या खिड़की व दरवाजे की जरूरत होती है वैसे ही घर घर हो, उसके लिए प्यार और सूझबूझ चाहिए। कर्मठता, त्याग व सद्भाव की अपेक्षा करता है एक खुशहाल घर, परिवार के हर सदस्य से। जहांतक घर की बुनियादी जरूरतों का सवाल है आजभी प्रकृति से, आसपास बिखरे कीड़े-मकोड़े पशु-पंछियों से, विशेषतः चीटियों और मधुमक्खियों की लगन व श्रम ही नहीं उनकी कुशल संयोजना व संचालन, बया की कला और शेरनी का संरक्षण और सियार की एकजुटता व नेवले का साहस और मकड़ी का ललच व लापरवाही; सभी से बहुत कुछ सीखा जा सकता है घर-परिवार के बारे में...ममत्व और संरक्षण के बारे में ...आखिर यही दो तो घर की असली परिभाषाएं हैं।
माना कि हम सभी ये सारी बातें जानते हैं पर फुरसत कहां है आज हमें जो बुनियादी इन बातों को याद रख पाएँ। मशहूर और बेहद संवेदनशील लेखिका और कुशल संपादिका पद्मश्री मेहरुन्निसा परवेज़ ने भी अपने किसी पुराने संपादकीय 'आत्मदृष्टि' में यही बात बहुत सुन्दर ढंग से समझाई है। अपनी बात को और खुलकर कहने के लिए समरलोक के उनके एक संपादकीय क एक अंश बहुत श्रद्धा व सम्मान के साथ उद्ध्रत करना चाहूंगी ;
" मधुमक्खी का छत्ता भी देखने और समझने की चीज है। छत्ते में ढेरों घर बने होते हैं । कितनी ढेर मजदूर मधुमक्खियां वहां दिन-रात काम करती हैं। कितनी लगन और परिश्रम से हर घर में मधु तैयार होता है। अलग-अलग मधुमक्खी के द्वारा यह तैयार होता है, लेकिन एक-सी तासीर और गुणों वाला होता है। बोतल में रखो तो जरा भी अन्तर नहीं दिखता। इस तरह एकजुट होकर लगन से एक-सा कार्य करने वाले मजदूर क्या और किसी फैक्टरी में हैं? क्या इंसान के भीतर ऐसा श्रम, साधना, भाव और लगन पैदा हो सकती है ? क्या हम संसार के लिए अमृत बन सकते हैं? हम अपने भीतर का छल-कपट-बैर-जहर क्यों नहीं निकाल फेंकते ? हम अपने भीतर को शहद के छत्ते की तरह मीठा और गुणकारी क्यों नहीं बना लेते? शहद निकालने के बाद भी छत्ते में कितना मोम भरा होता है। मधुमक्खी शहद बनाकर भूल जाती है। उसे अपने महान कार्यों का, उपकारों का ध्यान नहीं रहता, ऐसा मनुष्य क्यों नहीं कर पाता? वह अपने छोटे से कार्यों को उपकारों को भूल तक नहीं पाता? मधुमक्खी की सारी मेहनत की कमाई को मनुष्य ले उड़ता है और वह इस बेइमानी को भूल जाती है। नया निर्माण करने में जुट जाती है, ऐसा सद्गुण इंसान के भीतर क्यों पैदा नहीं होता? हम दूसरे के छल-कपट को कभी नहीं भूल पाते ? अपने को मोम कर लेने की क्षमता हमारे भीतर नहीं है। दूसरे के मन को दुःखाने में इन्सान को कितना आनंद आता है, दूसरे से बदला लेकर वह अपने को कितना बड़ा समझने लगता है। ये सारी बातें यदि हम एक नन्ही-सी मधुमक्खी से सीखें तो कितने बड़े-बड़े कार्य कर सकते हैं। इन्सान अपनी महानता का बखान करता है। अपनी पूजा करवाता है, अपनी मूर्ति चौराहे पर लगवाकर शताब्दियों तक अपने को जीवित रखने की योजना में लगा रहता है।
जानवर, पक्षी, चींटी, मधुमक्खी को आखिर कौनसा भगवान जन्म देता है? भगवान या अल्लाह ? इनका स्वर्ग-नरक, जन्नत-दोज़ख कहां है? हम तो धर्म के बिना एक कदम नहीं चल पाते, एक घूंट किसी का छुआ पानी नहीं पीते, यह कैसे बिना धर्म के जिन्दा रहते हैं। मरने के बाद का स्वर्ग-नरक का भय इन्हें क्यों नहीं तंग करता। यह ढेर-ढेर बातें जो कुछ सोचने पर मजबूर करती हैं।"
इसी सम्पादकीय में आगे चलकर उन्होंने भारत के संदर्भ में कहाकि हम आत्मबल और त्याग के बल पर ही ब्रिटिश सरकार जैसी सशक्त सत्ता से लड़ पाए जिसके बारे में यह तक कहा जाता था कि उसके राज्य में सूरज कभी नहीं डूबता । पर आजकी युवा पीढ़ी दिशाहीन हो गयी है उसके आगे कोई संकल्प ही नहीं। यही बात पूरे विश्व के बारे में भी आज कही जा सकती है। हम सभी एक बड़ी सोच से हटकर छोटी सोच में सिमट गए हैं। सभी अपना ही घर भरे जा रहे हैं। समाज सुधारक और सेवक एक भी नहीं आज चारोतरफ बस नेता ही नेता हैं। जिनकी आँखों में अपना पराया कुछ नहीं सिर्फ मेरा ही मेरा होता है। हम भूल गए हैं कि इस पृथ्वी पर हम कुछ समय के लिए 'केयर-टेकर' की तरह आए हैं, उसके मालिक या शहंशाह की तरह से नहीं। यही बात तो गुलजार साहब भी कह रहे हैं, जब उन्होंने खुदा को एक मीठा प्यार भरा उलाहना देते हुए, लिखा,
ज़मीं भी उसकी,ज़मी की नेमतें उसकी
ये सब उसी का है,घर भी,ये घर के बंदे भी
खुदा से कहिये, कभी वो भी अपने घर आयें!
-गुलजार
क्या हम इस अमानत को किसी कीमती जेवरात-सा सम्भाल-सम्भाल कर पहन-ओढ़ नहीं सकते अपनी आने वाली पीढ़ी को कम-से-कम यह एक तोहफा तो वैसे ही लौटा पाएँ, जैसा कि यह हमें अपने पूर्वजों से मिला था।
सोचा भी नहीं था कि यूं मिलेगा... अचानक ही साथ हो लिया था वह, आंचल से लिभड़ा-लिभड़ा ! पलटकर हाथ में लेकर, खुशी से बल्लियों उझलते मन के साथ रिधू देखे जा रही थी। विश्वास ही नहीं हो पा रहा था ...कैसे आया, कहां से आया यह?
फिर तो ढूंढती आंखें बयार की बेचैनी से चारो तरफ घूम गईं और तुरंत ही ठीक आँख के सामने, वहीं दरवाजे के पास मिल भी गया उसे वह ...वही सुनहरा चमकता रंग, मानो आकाश का सारा सोना उन नाजुक पंखड़ियों मे सिमट आया हो...रंग-रूप, आकार, सब कुछ तो वही था। झुककर नाम पढ़े, इसके पहले ही सेल्स काउन्टर पर खड़ी लड़की समझाने आ पहुंची थी।
“ कितना सुन्दर है...है ना...जब पूरी रवानी में खिलेगा तो और भी सुन्दर लगेगा ! लबर्नम की एक नई किस्म है, पहली बार यहां इंगलैंड में । हमारे नारंगी फूल जो आग की लपटों से चमकते हैं, उनसे थोड़ी फरक। इन्डियन लबर्नम...यह भी परीनियल ही है। हर साल इन्ही दिनों खूबसूरत समा बांध दिया करेगा।
“ क्या तुम भारत से हो ?” , अचानक ही वृद्ध से दिखते व्यक्ति ने काउन्टर के पीछे से ही पूछा ।
“ हां।“
रिधू ने घूमकर देखा।
कमीज उतारे पंखे के सामने बैठा और आइसक्रीम खाता वह आदमी अचानक ही आई इस गर्मी की लहर के सारे मजे ले रहा था। रिधू का तो जैसे मन ही पढ़ लिया था उसने। “ अच्छा है ना मौसम यह, गुलाबी-गुलाबी गरमियों का, बिल्कुल तुम्हारी गुलाबी-गुलाबी सरदियों की ही तरह ...क्यों भारत की याद आ रही है ना ?”
इसके पहले कि रिधू कुछ भी पूछ पाए कि ‘ इतनी अच्छी हिन्दी कहां से सीखी ,’ या कुछ भी और, खुद ही बोल पड़ा था वह,
” पांच साल रहा हूं भारत में। सन बयालिस से सैंतालिस तक। अब भी अक्सर जाता हूँ। मुझे भारत बहुत अच्छा लगता है। वहां के लोग बहुत अच्छे हैं...खाना-पीना, रीति-रिवाज़ सभी कुछ। दुनिया में छुट्टी मनाने की एक बेहद अच्छी ज़गह है भारत। ...कितनी वैरायटी है उस देश में।“
फिर खुद ही उसके पास आकर बोला, “ ले जाओ इसे। अच्छा लगेगा तुम्हे। लगेगा कि भारत ही वापस आ गया तुम्हारे बगीचे में या फिर तुम खुद ही वापस भारत पहुंच गईं।“ अब रिधू कैसे रुक पाती, झटपट पैक करवाकर घर ले आयी। रास्ते भर आँखें सपने देख रही थीं। कभी पल भर में दिल्ली पहुंच जातीं चाणक्य पुरी के उस घर में, जिसके दरवाजे पर वह अमलतास का पेड़ था...वहीं, जहां वह दरबान बैठा करता था, तो कभी अपने लंदन के इस घर के दरवाजे पर अमलतास फूलों से लदा-फंदा दिखाई देने लगता उसे। वैसे तो उसकी पूरी गली पर ही ये अमलतास की टहनियां छतरी सी तन जाया करती थीं और जब-जब धूप से तपती सड़कों पर ये पत्तियां अपना सुनहरा कालीन बिछातीं तो रिधू तुरंत ही तपती धूप में भी चप्पल हाथों में लेकर चलने लग जाती।
वह तो यहां भी वे सारे ही पेड़ लगाएगी, जो भारत में उसके अपने कमरे की खिड़की के नीचे थे, पेड़ जो एक हल्के हवा के झोंके के साथ खुशबू भरभरकर उसका स्वागत किया करते थे ... पेड़ जिनकी फूलों लदी टहनियां उसके कमरे की दीवारों को अपनी परछांइयों से तस्बीर सा सजा देती थीं... रात की रानी, हार-सिंगार, सभी कुछ तो। यूं तो यहां भी एपल ब्लौजम और चेरी ब्लौजम की पत्तियां वैसे ही झर-झर के सफेद गुलाबी कालीन बनाती हैं पर इनमें उन फूलों जैसी मस्त महक नहीं होती और यह बात अक्सर ही रिधू की आत्मा तक को तरसाती रहती। गरमी की उन महकती रातों की याद आते ही आज भी रिधू का मन भारत के लिए तरसने लग जाता...पर कौन कहता है कि भारत छूट गया रिधू से... उसने तो कभी दूर ही नहीं होने दिया भारत को खुदसे। जहाज में बैठते ही आठ घंटे में ही तो दिल्ली पहुंच जाती है वह ...कभी कभी तो नागपुर वाली दीदी को ज्यादा वक्त लग जाता है घरतक पहुंचने में। अब दादा जी की मौत पर ही ले लो... दादा जी के बुलाते ही रिधू तो तुरंत ही पहुंच गई थी पर दीदी उनके गुज़रने के दो दिन बाद ही पहुंच पाईं थीं।
दूरियां तो बस मन में ही होती हैं और फिर जहां चाह वहां राह। अब रिधू को अपनी समझ और दूरदर्शिता पर कुछ कुछ भरोसा-सा होने लगा था या फिर उसने खुद को फुसलाना सीख ही लिया था। “ सबकुछ मिलने लगेगा अब यहींपर धीरे-धीरे..इन सब्जी और मसालों की तरह ही।“ बच्चे उसके मन में उठती भारत के प्रति बेताबी को देखकर उसे समझाते न थकते। फिर रिधू खुदको भी तो रोज एक नई तसल्ली दे लेती थी, कभी यह कहकर कि, ये क्या समझेंगे अपनी मिट्टी से बिछुड़ने का गम, यह तो यहीं पैदा हुए हैं। तो कभी यह कहकर कि उसका दुःख बर्दाश्त नहीं होता इन बच्चों से इसीलिए तो नयी- नयी बातों से उसे बहलाना फुसलाना चाहते हैं। वैसे भी तो वही धरती-आसमान...सूरज, चांद तारे हैं सब जगह ...इतने दुःख की तो कोई बात ही नहीं। बस एक अपने लोग ही तो नहीं यहां पर ! पर अब भारत में भी तो कौन बचा रह गया है...धीरे-धीरे सभी तो छूटते जा रहे हैं और फिर बेटी हो या बेटा किसी न किसी बहाने सबको ही तो घर छोड़ना पड़ता है...घर की तो छोड़ो, एकदिन तो यह शरीर तक छोड़ना पड़ता है ? रिधू ने नम हो आईं आंखें पोंछ डालीं, जबसे मम्मी पापा गए हैं, कैसी बहकी-बहकी बातें सोचने लग गई है वह और कितना बदला-बदला लगता है सब उसे, मानो धूप कुछ कम चमक वाली हो गई हो और चारो तरफ उमड़ती वह खुशी किसी ने चप्पा-चप्पा पोंछ डाली हो ..। अब तो वह बाजार में नई रेशमी साड़ियों की सरसराहट और चूड़ियों की खनक तक पुलकित नहीं कर पाती उसे। जबसे पापा गए है कहां इतना घूमती-फिरती है वह...फिर क्यों इतना सोचती है भारत के बारे में ... अब तो उसके बच्चों के भी बच्चे हैं। यही तो है उसका देश और यहीं तो है उसका पूरा परिवार !
कुछ दिन पहले ही केली और नयनतारा के फूल तक देखे हैं उसने यहां पर---.यहीं. इसी पास वाली चौमुहानी पर ही। कितना अच्छा लगा था यहां इंगलैंड में इन्हें देखकर। स्नो ड्रौप्स के साथ-साथ सफेद-गुलाबी, प्याजी,प्याजी फूल। नीली नीली बूंदों में अनोखी छटा बिखरी पड़ी थी, मानो सियाह रात में आकाश रंग-बिरंगे तारों सहित नीचे उतर आया हो...।
और तब घंटों स्केच करती कई वह अलसाई दुपहरियां याद आ गईं थीं रिधू को जब वह किसी ऐसी ही छतनारी छांव में बैठी फूलों को निहारती रह जाती थी। अब पोती को सिखाएगी स्केच करना...पर पहले बोलना... कलम पकड़ना तो सीख ले लाडली... अपनी लंगड़ी दौड़ मारती सोचपर रिधू खुद भी मुस्कुराए बगैर न रह सकी। किसने बोई खेती और किसने बुनी कपास?---दादी का मुहावरा अनायास ही मुंह से निकला तो रिधू को भी आश्चर्य-चकित कर गया! कितनी मां और दादी-सी ही होती जा रही है वह ...कल ही तो खाने की प्लेट लेकर अवनी के पीछे-पीछे भाग रही थी, बिल्कुल वैसे ही जैसे दादी और मां उसके पीछे भागा करती थीं कभी? सामने शीशे में देख कनपटी तक लटके सफेद बाल को उसने बिल्कुल मां और दादी के ही अन्दाज़ मे ही कान के पीछे कर लिया और जी खोलकर मुस्कुरा पड़ी... मां दादी की तरह नहीं, तो किसकी तरह लगूंगी अब भला मैं ?
घर पहुंचते ही ठीक मेन गेट के पास हाइडरेन्जर की झाड़ के बगल में ही गाढ़ दिया रिधू ने उसे।
अब तो मानो रिधू के प्राण ही लटक गए थे पौधे में। खिड़की से सटी खड़ी, निहारती ही रह जाती थी दिन भर उसे।
“शुरु शुरु में कुछ हफ्ते, दिन में दो बार थोड़ा-थोड़ा गुनगुना पानी डालना।“ चलते वक्त उस आदमी ने हिदायत दी थी, पर रिधू तो पूरी तरह से व्यस्त हो चुकी थी उसकी देख-रेख में। जितनी बार चाय बनाने जाती, केतली में दुगना पानी उबालती और सबसे पहले बचा पानी पेड़ में जाता फिर किसी को चाय मिलती। दिन में बीस बार जाकर उन हरी-भूरी टहनियों को देख आती, कहीं कोई नई पत्तियों का कुल्ला तो नहीं फूटा ...फूलों के नए गुछ्छे तो नहीं निकल आए? पर दो दिन बाद भी...बस वही दो गुच्छे ही लटके दिखाई दिये निराश रिधू को। वापस घर में लौटते ही पति ने मजाक किया, “ कल देखना पूरा पेड़ निकल आएगा वैसे ही चाणक्य पुरी की तरह ही ...फूलों से लदा-फंदा, और खड़ा हो जाएगा तुम्हारे दरवाजे पर!”
रिधू भी तो यही चाहती थी, बिना कोई ज़बाव दिए, बस मन-ही-मन मुस्कुराकर रह गई ...क्यों नहीं, देखना ज़रूर ऐसा ही होगा एक दिन !
दिन क्या, महीनों यूं ही निकल गए उस बेसब्र इन्तजार में । कहीं-कहीं कुछ कुल्ले फूटे भी, एक-आध पत्तियां आईं भीं, पर खुद ही कुम्हलाकर भूरी भी पड़ गईं और चुपचाप झर भी गईं, पर रिधू आस न छोड़ पायी।
“ बीबीजी, आप कहो तो इस सूखी लकड़ी को निकाल दूं, अब हरी तो होने से रही।“ जितनी बार माली पूछता, उतनी ही बार रिधू खुद टूट जाती अंदर-ही अंदर। अब वह पेड़ बस एक पेड़ नहीं, रिधू की अस्मिता से जुड़ चुका था...उसकी नज़र में पूरे भारत की आशाओं से जुड़ गया था। अगर एक भारतीय पेड़ तक को न रोप पाई वह ,तो भारतीय मान्यताओं और संस्कारों को क्या रोप पाएगी इस धरती पर? इंगलैंड की इस धरती पर इसे तो जमना ही होगा... हजारों उन शहीदों की खातिर पनपना होगा, जिन्होंने देश के लिए जानें न्योछावर की थीं ...आखिर हम भी तो इनके रंग में रंगे थे...हमपर से तो इनका रंग आज तक नहीं उतरा !.
एक आधुनिक आत्मविश्वास से भरपूर आज़ाद भारत के सपने की खातिर पनपना होगा इसे। हमारी इस गुलामी को भी तो एक अरसा गुज़र गया ...वक्त और ज़माना दोनों ही बदलना चाहिए अब तो ...यह सदी हमारी है, हमारे भारत की है...इसे तो पनपना ही होगा... फलना-फूलना ही होगा! कृत संकल्प-सी रिधू घंटों बैठी रहजाती पेड़ के आगे... उस सूखती टहनी से बातें करती...उसका देश-प्रेम और स्वाभिमान दोनों ही बच्चों से मचलने लगते।
तरह- तरह की खाद डालती रिधू पेड़ में , पर पेड़ पर कोई असर नहीं होता। जाड़े भर पाले से बचाकर रखा उसने। रोज नई-नई पौलीथिन में लपेटती। आंधी, पानी तक को पास न आने दिया कभी। हाथों से सहलाती...घंटों बातें करती ...इसलिए शायद मरा नहीं, पर रिधू की हिम्मत ही नहीं पड़ी कि कभी डंडी उठाकर एकबार देख तक ले कि पेड़ ने जड़ें पकड़ीं भी हैं या नहीं., उसे खुदपर... अपने भगवान पर एक अटूट विश्वास जो था ? यह बात दूसरी है कि माली अब भी उसे सूखी लकड़ी ही कह रहा था, और वह बदरंग पड़ चुकी लकड़ी दिनरात खटकती रहती थी उसकी अनुभवी आँखों में।
मई जून सब निकल गए। घूरते-घूरते अब तो आंखे तक जलने लगतीं रिधू की पर एक नया पत्ता न निकला पेड़ में और तब बज़ाय इसके कि निराश हो, रिधू चौके में वापस जाती और एक केटल और गुनगुना पानी डाल जाती पेड़ की जड़ों में। पत्ते तो नहीं आए पर रिधू को पूरी तरह से विस्मित करते हुए एक चिड़िया ने जरूर घोंसला बना डाला दीवाल और टहनी की बीच बची उस जरा-सी जगह में। रिधू की कल्पना और आशा दोनों को ही एक नयी प्रेरणा मिली। कहते हैं इन पक्षियों की छठी ज्ञानेन्द्रियां बहुत तेज़ होती है। जरूर ही शुभ होगी यह जगह और फले फूलेगी भी, वरना चिड़िया बसेरा न करती यहांपर...रिधू बारबार सोचती और खुश हो लेती।
कुछ दिन बाद की ही बात है, उस दिन जब कार रिवर्स कर रही थी रिधू अचानक ही स्टीयरिंग फिसली और पेड़ से जा टकराई और तब सारी आशाओं पर पानी फेरता वह अनर्थ हो गया जिसकी रिधू कल्पना तक नही कर सकती थी। वह सपनों का पेड़...वह आधी सूखी, आधी हरी टहनी, कुचली और टुकड़े-टुक़ड़े होकर भय-विस्मित आँखों के आगे ही गिर पड़ी, बिल्कुल वैसे ही जैसे कभी अचानक ही देश-प्रेमियों के आगे इन अंग्रेजों ने भारत की राजगद्दी संभाल ली होगी...वैसे ही हज़ारों परिवारों को कुचलते उज़ाड़ते जैसे आज उसके हाथों चिड़िया का यह घोंसला उजड़ चुका था।
“ अच्छा हुआ जो यह तुमसे हुआ, अगर कहीं मुझसे हुआ होता तो तुमतो..”,.उसके चेहरे की असह्य पीड़ा देखकर पति आधी बात कहते-कहते ही चुप और चिंतित हो गए। रिधू कार से उतरी और दौड़कर धम् से आकर सोफे पर पड़ रही। “ रिधू यह चिड़िया का घोंसला तो बिल्कुल ही नही टूटा ...पर बच्चे जरूर बहुत छोटे हैं।”,बहुत ही हिफाजत से चिड़िया के उन नवजात शिशुओं को हथेली पर उठाए पति आश्वासन दे रहे थे और घोसले को वहीं वापस दूसरी शाख पर टिकाकर आश्वस्त थे।
इतने नन्हे बच्चे...रिधू का कलेजा उमड़ा आ रहा था...नहीं बचेंगे ये। चिड़िया पलटकर आएगी ही नहीं। ...आदम-गन्ध जो आ गई। सुबह तक सारे के सारे बिल्ली के पेट में होंगे। पलटकर बगीचे के उस कोने की तरफ देख तक नहीं पाई वह...ना ही चौबीसों घंटे बगीचे में रहने वाली रिधू कई दिनों तक बगीचे में ही वापस जा पाई और ना ही उन सूखे गुलाबों तक को काट पाई...कहीं वे चिड़िया के बच्चे डिस्टर्ब हो गए तो… अलबत्ता खिड़की और गुलाब की झाड़ पर बैठे वे नन्हे चिड़िया के बच्चे जरूर फुदक-फुदककर दिन में दस बार रिधू का हालचाल पूछ जाते और डालियों में उलझे उनके अधटूटे कच्चे पंख फड़फड़ा-फड़फडाकर नित नए संघर्ष और जोश की कहानी सुना जाते उसे।
पड़ोसन और सहेली ली जब भी दिखती, रिधू से पूछती आजकल बहुत व्यस्त हो गई हो ...बगीचे में भी नही दिखती? रिधू एक फीकी मुस्कान के साथ “ हाँ “ कहकर बात पलट देती। पर ली समझ चुकी थी कि कहीं कुछ ऐसा है जो कि खाए जा रहा है सहेली को---पर कैसे जाने ---क्या करे वह , कुछ समझ में नही आ रहा था। कभी वह रिधू के लिए फेयरी केक बनाकर लाती तो कभी उसे अपने घर कौफी पर बुलाती पर रिधू को तो मानो गुमसुम रहने की आदत-सी पड़ती जा रही थी। “ सब ठीक तो है घरपर या तुम्हारे साथ ?”,कई-कई बार पूछा उसकी चिंतित सहेली ने और हर बार ही वही हल्की और छोटी-सी “ हां” कहकर चुप हो जाती रिधू।
कई-कई गार्डन सेंटर गई रिधू पर इंडियन लैबर्नम नहीं मिला। “ अगली बार भारत से ले आना ।” पति ने समझाने की कोशिश की। “ पर जरूरी तो नहीं कि वह भी पनपे ही !” .दबाते-दबाते मन की बात होठों पर आ ही गई।
उसकी आवाज़ की गहराई और थर्राहट से दुःख का तो पता चल जाता था पर असली भेद शायद ही कभी कोई जान पाए...फिर ऐसी बातें कही भी तो नहीं जा सकतीं...एक नहीं कई-कई पीढ़ियों का दुःख था यह उसका...और वह भी बेहद अपना...।
तीन साल निकल गए इस बात को भी। गदर के 150 साल का फन्कशन था इँडियन एम्बेसी में, साथ में उसी विषय पर एक नुमाईश भी। तैयार रिधू जाने को निकली ही थी कि फूलों का एक गुच्छा एकबार फिर आँचल से लिपटा-लिपटा संग-संग हो लिया। चुपचाप गाड़ी में आकर गोदी में आन बैठा।
गुच्छे को पागल की तरह सीने से लगाए रिधू भावातिरेक से कांप रही थी। बरसाती नदी-सा भावनाओं का एक ज़लज़ला था अब चारोतरफ। मन में उमड़ा सारा वह पानी आंखों से बह निकला। नदी के रिसते दो किनारों-सी खुद को संभालती रिधू अपने ही आवेग में बही जा रही थी... राह के रोड़े , यादों की गीली मिट्टी, अच्छा बुरा सब साथ लिए और समेटे-सहेजे...।
यह लड़ाई उसके अस्तित्व की थी...जड़ें जमाने की ही नहीं, फलने-फूलने की भी थी...खुली हवा में सांस लेने की थी।
रिधू ने एक-एक करके सारे आंसू पोंछ डाले। अब हजारों यादें शंख सीपी सी इतिहास की रेत में पड़ी भी रह जाए, तो भी कोई फरक नही पड़ता, उसका विश्वास फल-फूल गया था। हजार कठिनाइयों और शकों से जूझता, एकबार फिर जीत चुका था।
नन्हा ही सही, अमलतास का वह पेड़ एक नहीं कई-कई गुच्छों के साथ पीले पंखुड़ियों के कालीन पर उसके स्वागत में खड़ा था ...वह भी उसके अपने दरवाजे पर, और यहीं, इंगलैड की धरती पर। हर तपन से रखवाली कर रहा था उसकी , छांव दे रहा था उसे, जैसे कभी चाणक्य पुरी वाले अम्मा बाबा के घर पर दिया करता था।
रिधू का मन किया जी खोलकर हंसे। हर उस अविश्वासी को प्यार की ताकत बताए , जो इस पर विश्वास नहीं करते। उसके विश्वास ने जाने कौनसा बीज इस धरती में बो दिया था कि अब छांव ही छांव थी चारो-तरफ....आँखों को भी और मन को भी।
हर्षातिरेक से कांपती रिधू को ली ने आकर संभाला। “ अरे यह तो वही अमलतास का पेड़ है ना जो दिल्ली या भारत के कई और शहरों में दिखता है? हाइडरेंजर्स की तरह इसे भी तो लोग ड्राइव्स या सड़कों के किनारों पर ही लगाते हैं, हैं ना ?“ इमीग्रेशन डिपार्टमेंट में सरकारी वकील की तरह नियुक्त ली को अक्सर ही भारत जाने के मौके मिलते रहते है और साधारण जन-जीवन के करीब आने के भी। “ हां, हां, वही है यह...इंडियन लैबर्नम। अब देखना हर बगीचे, हर घर में तुम्हे बस यही दिखाई देगा।“ पता नही किस अंदाज़ और भाव से कही थी रिधू ने यह बात कि ली को बहुत ही गंभीर कर गई और तब खुद को और माहौल को हलका करने के लिए मज़ाक किए बगैर न रह सकी वह।
“ हां, हां, क्यों नहीं। तुम एशियन की तरह ही इसे भी यहां बसने में कोई वक्त थोड़े ही लगेगा। हम ब्रिटिश लोग हमेशा से ही बहुत सहनशील कौम हैं आखिर।“
यह क्या कह गई यह---कितनी गलत-फहमी है इन्हें खुद को लेकर, बेशर्म या अवसरवादी कहती तो शायद ज्यादा सही रहता...रिधू के सर से पैर तक आग लग चुकी थी...आंखों के आगे इतिहास के कई राख पड़ते पन्ने फिर से धधक उठे थे।
माना ली सहेली है, पर है तो ब्रिटिश ही, आखिर अपना रंग दिखा ही दिया , रिधू सोचे बगैर न रह सकी।
पर ली उसके मन में उठते तूफान को देख भी पा रही थी और समझ भी। उसे दुःखी करने का तो उसका कतई इरादा नही था। गले लगाकर बोली, “ चालीस साल से यहां रह रही हो , इतनी स्ट्रौंग इन्डियन आडेंटिटी रखोगी, तो जी नही पाओगी खुशी–खुशी। किसी भी क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ने देगी तुम्हें तुम्हारी यह अलग –थलग सोच और पहचान !”
रिधू का मन नही किया कि अब वह उसके साथ कहीं भी जाए, पर इतनी नरम दिल और सहृदय थी कि गुस्से में भी किसी का मन दुखाना आता ही नही था उसे।
“ क्या आदमी को अपने ही घर में मन-माफिक नहीं रहना चाहिए ...खुश नहीं होना चाहिए? आगे बढ़ते जाना क्या इतना ज्यादा ज़रूरी है ली ?” बस, यही पूछती चुपचाप कार में जा बैठी रिधू।
अब स्तब्ध होने की अंग्रेज सहेली ली की बारी थी। क्या सब वे हिन्दुस्तानी उसकी इसी सहेली की तरह स्वाभिमानी और द़ढ थे? कैसे उसके पूर्वजों ने इतने साल राज किया फिर ...शायद नहीं...या फिर शायद कभी एक दूसरे के बारे में कुछ जानना ही नहीं चाहा हो... !
पर वे दोनों सहेलियां एक दूसरे के बारे में आज बहुत कुछ नया जान चुकी थीं ...कुछ ऐसा जो सच होकर भी उद्वेलित कर रहा था दोनों को और सोच से होड़ लगाती कार भी तो घुमावदार सड़कों पर उनकी सोच की ही रफ्तार से बढ़ी जा रही थी। उतरते ही दोनों ने ही एक दूसरे के उदास चेहरे को देखा और जबरर्दस्ती ही मुस्कुराने की असफल कोशिश की । जब नहीं रहा गया तो रिधू ने ही पहल की, “ मुस्कुराओ ली, तुम मुस्कुराती और चहकती हुई ही अच्छी लगती हो।“ उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए ली ने भी हँसने की कोशिश की पर एक छोटी सी मुस्कान ही होठों पर खींच पाई ,“ तुम बहुत अच्छी, बहुत सरल हो रिधू। भला तुम्हें उदास देखकर मैं कैसे खुश हो सकती हूँ? “ , उसकी गहरी रुँधी आवाज से रिधू जान गई थी कि सहेली झूठ तो नहीं ही बोल रही है और अगर अभी, इसी वक्त उसने इसे माफ नही किया तो रो भी पड़ेगी।
“देखो, आज भी तो तुम अपनों के ही बीच में हो, और अपने ही घर में हो रिधू।“
ली अभी भी सहेली की खोई मुस्कान नहीं ढूंढ पा रही थी।
और तब रिधू ने आगे बढ़कर ली को एकबार फिरसे गले लगा लिया। अब ली को गला खंखारने की बहुत ज्यादा जरूरत थी, कैसे भी अपने को संयत करती, रिधू के गले लगी-लगी ही वह दुबारा बहुत ही धीमी और भावभीनी आवाज मे रुँधे गले से कहने लगी,
” एक बात और बताऊं रिधू, मुझे पहले से ही पता था कि तुम यही कहोगी, जो तुमने आज और अभी अभी कहा और वही करोगी, जो किया भी। तभी तो तुम मेरी सहेली हो।“
अब खिलखिलाकर हंसने की रिधू की बारी थी, “ हमारे पूर्वजों के बीच जो घटा क्यों न हम उसे इतिहास के पन्नों में ही रहने दें ली, वैसे भी क्या किसी के कहने भर से फूल महक बदल देता है, हीरा चमक खो देगा? “
रिधू और ली के स्नेह-पगे आंसू एकसाथ ही सदियों से बंजर पड़ी नफरत और गलतफहमियों की दरारों से तारतार जमीं पर गिरे और उसे सींचने लग गए...जमीन जिसे कभी हजारों के खून ने रंगा था, नफरत की आग ने झुलसाया था।
रिधू को लगा आज जरूर ही कोई त्योहार होना चाहिए ...होली, दिवाली-सा एक बड़ा त्योहार... आज न सिर्फ रिधू के घर में अमलतास फूला था, अपितु बरसों से भटकती, प्यासी और तरसती रिधू की जड़ें तक नम थीं... अपनी जमीन, अपना बसेरा पा चुकी थीं।...
हीथ्रो हवाई अड्डा छोड़े तीन घंटे से ज्यादा हो चुके थे और बाहर बढ़ती धुंध और मन में फन उठाती आशंका, दोनों ही से उद्विग्न मनु अबतक न जाने कितनी बार घड़ी देख चुकी थी। घड़ी की सूई कुछ ज्यादा ही तेज थी। कई बार कान पे लगाकर सुन भी चुकी थी वह कि चल भी रही है, या फिर यूं ही कमबख़्त गलत-शलत मनमाना वक्त बताए जा रही है... ? कितनी अज़ीब-सी बात है कि जब घड़ी तेज हो तो रास्ते और भी लम्बे और भूलभुलैया भरे हो जाते हैं और सारा ट्रैफिक भी बस उसी एक रास्ते पर जाने कहां से आ जाता है। कई बार देखा है उसने ऐसा ही होते, और वह दिन भी अपवाद नहीं था। बाबा के पास पहुंचने की जल्दी में पूरी तरह से भूल चुकी थी मनु कि शुक्रवार की शाम थी वह और लंदन क्या पूरे इंगलैंड में ही शुक्रवार की शाम ऐसे ही वाहन और यातायात की बहुलता से रुकी-थमी और फंसी-फंसी रहती है, फिर वह तो उस बदनाम मोटरवे पर थी, जिसका बारह महीने और चौबीस घंटे यही हाल रहता है। अचानक ही उसकी उलझन को कुछ और बढ़ाते, टैक्सी ड्राइवर ने औक्सफर्ड के पास पहुंचकर सर्विस-स्टेशन की तरफ टैक्सी मोड़ी और पार्किंग प्लेस में ले जाकर खड़ी कर दी, “चाहो तो आप भी फ्रेश हो लो, पांच मिनट कम से कम पैर तो सीधे कर ही लो, मैडम। मैं बस गया और आया। “ कहता, वह लपकता-भागता बिना जबाव सुने ही अदृश्य हो गया। मनु ने एकबार फिर घड़ी देखी, रात के 1-35 थे। ‘अब तक तो उसे बाबा के पास होना चाहिए था। जरूरत है बाबा को उसकी। कमबख्त उस लारी को भी आज ही उलटना था ...पूरे दो घंटे इंतजार करवाया। पाले की चादर बिछी है चारो तरफ और बाबा खुले जंगल में तीन दिन से यूं ही बिना कुछ खाए पीये, अकेले बैठे हैं...कहीं कुछ निमोनिया वगैरह पकड़ लिया तो थके फेफड़ों ने !’ सोच-सोचकर ही गला रुँधा आ रहा था उसका और बारबार ही पलकों के कोर भीगे जा रहे थे।
’ जाने कितनी और तकलीफें लिखी हैं बाबा के हिस्से में। हे देवी मां, मेरे बाबा का ठीक से ध्यान रखना!’ बेहद धार्मिक न होते हुए भी, हाथ जोड़कर मन-ही मन कई बार बाबा के स्वास्थ और आराम के लिए भगवान से प्रार्थना की थी उसने...यह बात दूसरी है कि आंखें बन्द करते ही देवी का चेहरा हरबार ही दीदा के चेहरे में बदल जाता और देवी के रूप में स्वयं दीदा ही आँखों के आगे आकर खड़ी हो जातीं, वैसे ही देवी मां की तरह मुकुट लगाए, आठों हाथों से भरपूर आशीर्वाद देतीं हुई , साथसाथ भाला. कमल सबकुछ कुशलता से संभालकर और जरा भी क्रुद्ध या विचलित नहीं, वैसे ही मुस्कुराकर प्यार से देखती और आश्वासन देती, मानो समझा रही हों-‘ देखना कुछ नहीं होगा मेरे शेखर को। बस तुम हिम्मत मत हारना। परेशान क्यों हो, मैं हूं ना वहाँ उसके पास देखभाल के लिए। ‘
चैन कहाँ था मनु को पर... दौड़ती सड़क को मुठ्ठी में जकड़कर तुरंत ही बाबा के पास पहुंच जाना चाहती थी वह। पर सड़क थी कि अपनी ही रौ में मस्त दौड़ती-भागती और दूर, आगे-आगे ही सरकती जा रही थी। रात की टेढ़ी-मेढ़ी अँधेरी ढलान को टैक्सी-सी ही आड़ी-तिरछी हो-होकर पार करती, बेहद डराती और घबराती मनु की तरह ही भटक रही थी सड़क उस रात की अन्तहीन और धुँधभऱी गर्त में।
‘ बाबा की एक रात और यूं ही ठंड में सिकुड़-सिकुड़कर ही गुजरेगी अब। शायद ही रोक पाऊं इसे, कुछ नहीं कर पाऊँगी मैं। अभी भी एक-डेड़ घंटा तो लगेगा ही डडली पहुंचते-पहुंचते।‘ बेहद ही मज़बूर और लाचार महसूस कर रही थी मनु। इंगलैंड पहुंचकर भी, अँधेरी टैक्सी की छोटी-सी दुनिया में इस तरह असहाय और कैद बैठे-बैठे ही रात गुजरेगी, कब सोचा था उसने। सोचते-सोचते ही आँखें लबालब भर आईं। मनोबल तोड़ते उन कमजोर आँसुओं को अगले पल ही दृढ़ता से पोंछ डाला मनु ने। टूटने नहीं देगी खुद को वह...अब जो है, सो है। बिना बात क्यों इतना चिड़चिड़ा महसूस कर रही है ..क्यों .कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा उसे... क्यों कुछ भी बर्दाश्त नहीं कर पा रही वह...ड्राइवर का रेडियो पर गाना सुनना, नैसर्गिक जरूरत के लिए सर्विस स्टेशन पर कुछ मिनटों के लिए रुकना, कुछ भी नहीं...। इस मनःस्थिति में तो वह एक सही निर्णय नहीं ले पाएगी , बाबा को संभालना या तसल्ली देना तो दूर की बात है । अपनी भटकती सोच को कस के फटकार दिया मनु ने। पर कोई सोच, कोई याद कुछ पल से ज्यादा नहीं उलझा पा रही थी छटपटाते मन को। जल्दी से बस बाबा के पास पहुंचना था। भूख-प्यास सबकुछ भूल चुकी थी मनु। गोदी में सोए विश्वास तक से बेखबर थी वह। बस उसका सर यंत्रवत् रह-रहकर सहलाए जा रही थी, मानो उसकी केसर ही लेटी थी गोद में। केसर की याद आते ही एक क्षीण सी मुस्कान आ गयी मनु के होठों पर। कितनी बड़ी हो गयी होगी अब...तीन दिन में कोई बच्चा कितना बड़ा होता है? अपनी बेवकूफी पर इतनी जोर से हंसी मनु कि टैक्सी-ड्रावर ने भी दरवाजा खोलते-खोलते उसकी तरफ आश्चर्य से देखा, मानो पूछ रहा हो-सब ठीक तो है, इतनी उदास और फिर इतनी खुली हंसी...वह भी अकेले बैठे-बैठे ही!
मनु की बेचैनी को भांपते ही, तुरंत ही, बिना कुछ कहे टैक्सी वापस स्टार्ट कर दी उसने। एक बार फिर टैक्सी मोटरवे की उन सीधी चौड़ी सड़कों पर तेजी से सरपट दौड़ी जा रही थी... रौशनी के खम्बों को, पेड़ों की अनगिनित काली कतारों को तेजी से पीछे छोड़ती। अधीर मनु को अभी भी लग रहा था कि रास्ता जैसे थम गया था, टैक्सी चल ही नहीं रही थी...या फिर चल भी रही थी तो बहुत ही धीरे-धीरे। बारबार ही स्पीडोमीटर पर आँखें चली जातीं---डायल 75 और 80 के बीच ही था। इससे और ज्यादा क्या तेज चला सकता है...आजकल तो जगह जगह कैमरे लगे हैं। सत्तर मील की रफ्तार तो ऊपरी स्पीड लिमिट है मोटर वे पर। अनचाहा वह विलंब और भी उतावला और विचलित कर रहा था उसे। मनु ने ठंडी सांस ली और एकबार फिर हेडरेस्ट पर सिर टिकाकर आंखें बन्द कर लीं। आँखें बन्द करते ही घटनाओं का पीछे छूटा काल-चक्र एकबार फिरसे किसी विडियो-रील की तरह ही घूमने लगा उसकी बन्द आँखों के आगे।
... यह तो सभी भलीभांति ही जानते थे कि स्वावलंबी और स्वाभिमानी मनु को किसी हस्तक्षेप या इजाजत की आदत नहीं। हमेशा से ही जिन्दगी के सारे छोटे-बड़े फैसले खुद ही तो लेती आई है मनुश्री सरकार। शायद यही वजह थी कि टैगोर की तरह ही “ जोदि के डाक सुने केऊ ना आचे, तौबे एकला चलो रे “ में विश्वास रखने वाली मनु ने निश्चय करते ही, तुरंत ही बाबा को लिख भी दिया कि वह जल्दी ही जोनुस के साथ विवाह करने जा रही है। हाँ, यह बात और है कि पत्र पढ़ते ही परिवार में जो विष्फोट और विघटन हुआ, वह किसी महायुद्ध से कम नहीं था।
उस दिन मां और बेटी में से किसकी आँखें ज्यादा तरल थीं, कहना मुश्किल था, जैसे कि यह कहना कि किसके मन को ज्यादा चोट लगी है। एक बार फिर बस वही मध्य वर्गीय मानसिकता का पुराना षडयंत्र था। पिनाकी को लगा कि मनु, उसकी छोटी सी मनु नहीं, वरन् अपने हक़ के लिए, अपनी सोच के लिए लड़ती वह लाचार औरत है, जो सीता और राधा से लेकर आजतक न जाने कितने रूपों में जन्म ले चुकी है और शेखऱ सरकार को लगा मानो उनके पूरे परिवार की इज्जत ही दाँव पर आ लगी थी।
“उनकी अपनी बेटी का एक गैर हिन्दू और क्रिश्चियन से विवाह…? गांव के जमींदार और काली बाड़ी के मालिक प्रमिल सरकार की पोती का विवाह किसी जौनेथन अब्राहम के साथ ?... नहीं, ऐसा कैसे होने दे सकते हैं वह ! कैसे-कैसे और किन-किन जाति के लोगों को बहला-फुसलाकर क्रिश्चियन बनाया गया था, अच्छी तरह से जानते हैं वे! धर्म निरपेक्षता और बात है और सब्ज बाग दिखाकर धर्म परिवर्तन करना, गरीबों को बर्गलाना दूसरी। ...चलो, माना वह भूल भी जाएँ, पर यह समाज तो नहीं ही भूलने देगा। फिर इसके पूर्वज तो यूगांडा, केनिया, जाने किन-किन देशों में रह चुके हैं और जाने किन-किन मिश्रित जातियों का खून बह रहा है इसकी रगों में? मनु भले ही भारत छोड़कर आगे बढ़ चुकी हो, ऐसा निष्क्रिष्ट कर्म वह नहीं होने देंगे परिवार में। देश बदलने से सोच तो नहीं ही बदलनी चाहिए आदमी की। “
शेखर सरकार की उलझी सोच उन्हें पल भर के लिए भी चैन नहीं लेने दे रही थी। कोई भी देश, काल हो, मिट्टी और संस्कार तो आज भी वही पुराने और रूढ़िवादी ही थे शेखर सरकार के। डाली से टूटकर आधे लटके पत्ते की तरह काँपती पत्नी को वैसे ही अकेला छोड़कर, शेखर सरकार ने बीच में ही फोन काट दिया था ...बिना मनु की पूरी बात सुने या समझे और उसी वक्त वैसे ही बाहर पड़ी कुरसी पर वापस जाकर अपनी आधूरी छूटी क्रासवर्ड पूरी करने लग गए थे, मानो कुछ हुआ ही न हो... मानो ये तो रोज़-रोज़ की बेहद साधारण-सी घटनाएँ थीं, जिनसे निबटना, उबरना हर गृहस्वामी को आता ही है।
“मुझसे रिश्ता रखना है, या मेरी इज्जत करती हो, तो अपनी यह ज़िद तो छोड़नी ही पड़ेगी तुम्हें। “
स्पष्ट और कड़े शब्दों में मन्तव्य का एलान कर चुके थे वह। पूरा विश्वास था उन्हें कि हमेशा की तरह ही दोनों मां-बेटी उनके किसी भी फैसले के खिलाफ नहीं जा पाएँगी। बहुत प्यार जो करती हैं दोनों उनसे...इज्जत करती हैं उनकी आखिर। वैसे भी बिरादरी और समाज के आगे कैसे मुँह दिखला पाएँगे वह इस कुकर्म में साझेदारी करके...किस-किसको सफाई देते फिरेंगे आखिर! चाहे कितनी भी कसी क्यों न हो, परिवार के जटिल फैसलों की डोर तो पुरुषों के हाथ में ही सही रह पाती है। इन दोनों को भी यह बात समझनी ही पड़ेगी। फैसला मानना ही होगा। सोच मात्र से शेखर सरकार का चेहरा तना और बेहद कठोर दिख रहा था असमंजस के उस कठिन और दुरूह एक पल में।
चन्द दिनों बाद ही, अगले हफ्ते ही मनु और जोनुस भारत आ गये थे...आज्ञा नहीं, आशीर्वाद लेने और तब चार कदम पीछे हटकर न सिर्फ शेखर सरकार ने आशीर्वाद देने से मना कर दिया था, अपितु जोनुस की बारबार गिड़गिड़ा-गिड़गिड़ाकर मनु की अपनी जान से भी ज्यादा हिफाजत करने की गुहार तक को पल भर में ही अनसुना करके, बेहद निर्ममता के साथ ठुकरा भी दिया था।
" अगर जरा भी शराफत है, या अपना भला चाहते हो, तो मनु के पास तक न आना। शादी तो दूर, उसके बारे में सोचना तक नहीं, वरना हाथ पैरों से भी हाथ धोना पड़ सकता है तुम्हें। मैं तुम्हें यह चेतावनी बहुत ही सोच-विचारकर ठंडे दिमाग से दे रहा हूं" गुस्से में मुठ्ठियां भींचते हुए, यह और न जाने क्या-क्या धमकियां भी दे डाली थीं साथ-साथ ही उसी पल। यही नहीं, इस पूरी अवांछनीय घटना के दौरान जोनुस की कमीज का कॉलर इतनी कसकर पकड़े हुए थे वे कि बिचारा गुस्से का बोझ संभालने में असमर्थ दो हिस्सों में चिर गया था और मनु सा ही दयनीय दिख रहा था अब। पर स्वाभिमानी जोनुस की गर्दन अपने इरादों की दृढ़ता के साथ अभी भी वैसे ही सीधी खड़ी थी उनके सामने।
' मनु को प्यार न करना मेरे बस में नहीं, परन्तु आप हमारे बड़े हैं, इसलिए आपकी इच्छा की मैं पूरी कद्र करूंगा। '
शेखर सरकार स्तब्ध थे उसकी स्पष्टवादिता और साहस पर। कमरे में दूर खड़ी मनु सारे आंसू, सारा अपमान पलकों में समेटे जा रही थी, पर जब और नहीं सह पायी तो पलकें स्वतः ही बोझिल हो गयीं। आखिर किसे समझाए और किससे शिकायत करे? कुछ भी तो नहीं देख पा रही थी वह, न बाबा के अनियंत्रित गुस्से को और ना ही जोनुस के शान्त संयम को। आमने-सामने खड़े उसे लेकर भिड़ने वाले वे दोनों, वे दो व्यक्ति थे जिन्हें वह दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार करती है...इज्जत करती है। एक को भी हार या अपमान से आहत होते कैसे देख सकती है वह।...कौन सही है या कौन गलत, सारे फैसले विवेक से परे जा चुके थे अब उसके। और तब उसकी उलझन उसके दुख से परेशान, शालीन और संस्कारी जोनुस, निशब्द रोती मनु को यूं ही छोड़कर, जेब में पड़े मुड़े-तुड़े कागज पर जल्दी-जल्दी कुछ लिखकर पकड़ा गया था... सबके सामने ही। भरे कमरे में ही विदा का चुंबन भी दिया था उसने, मनु के आवेश से तपते माथे पर और लौट पड़ा था वह लम्बे लम्बे थके कदम लेता, चुपचाप बिना एक शब्द कहे...पलटकर देखे बगैर ही। इंगलैंड में पैदा हुआ था तो क्या, सुसंस्कृत भारतीय विचार थे उसके। दूसरों को सलाह तो दे सकता था, परन्तु जहाँ तक खुद उसकी अपनी जिन्दगी का सवाल था, बड़ों की आज्ञा और इच्छा के विरुद्ध घर बसा पाना संभव ही नहीं था उसके लिए। मनु की आँखों से ही नहीं, शहर से भी दूर चला गया वह...वापस वहीं इंगलैंड में, बिना कोई पता या ठौर-ठिकाना बताए।
परन्तु आत्मा सी रोम-रोम में बसी मनु से दूर रह पाना संभव नहीं था उसके लिए। पता नहीं किसे यूँ समझा और बहला रहा था वह अब; मनु को, खुद को---या शायद दोनों को ही,
" ओस की बूंद हैं दुख के ये पल, धूप की पहली किरन ही सोख जाएगी।
अदृश्य होकर भी जाते-जाते यह कैसा आश्वासन दे गया था जोनुस। जोनुस के बिना अपने सारे दिन-रात जिन्दगी तक की कल्पना न कर पाती थी मनु। बारबार लिखी उसकी वे पंक्तियां पढ़ती और फिर खुद ही आँसू पोंछकर, स्वयं को एक दृढ़ निश्चय से भरी तसल्ली भी दे लेती।
' यह प्रीत, यह दोस्ती भी तो आखिर भगवान सी ही होती है, जो दिखे या न दिखे, पलपल आसपास और साथ ही तो रहता है हरदम। '
कोई माने या न माने, जोनुस भी तो पास बैठा पलपल उसे समझाता और बहलाता ही रहता था दिनरात।
मनु की आँखें बस एक जोनुस की ही राह देखती रहतीं। समाज, माँ, बाप, खाना, पीना क्या, खुद तक को भूल चुकी थी वह। पर बाबा को कैसे मनाए, लाख कोशिसों के बाद भी जान नहीं पा रही थी मनु!
पढ़ाई तक बीच में छुड़वा दी गयी थी। इंगलैंड जाने को मना कर दिया था और बाबा की अवहेलना करना, उन्हें दुखी करना, मनु के बस में नहीं था---तो क्या जोनुस के प्रति उसका प्यार बस एक क्षणिक आकर्षण ही था, जिसे वह बाबा की इज्जत पर यूँ चुपचाप न्योछावर कर देगी? अपने ही भावों की विडंबना और दुरूहता में फंसी मकड़ी-सी छटपटा रही थी मनु अब।
दुख से दुहरी पड़ती, गठरी बनी बेटी को बाँहों में समेटती, तसल्ली देने का प्रयास करती पिनाकी खुद अपने आँसू तक न रोक पाती। एक ही मिनट में समझदार और सबकी प्यारी मनु , इतनी बेवकूफ और शर्मनाक कैसे सिद्ध हो गयी परिवार की आँखों में, पिनाकी समझ नहीं पाती! असंख्य विषमताओं के रहते आखिर खुद उसका अपना विवाह भी तो रचाया ही था पापा ने शेखर के साथ...वह भी आज से बीस-पच्चीस साल पहले, जबकि उसका आकर्षण तो एकतरफा ही था!
' हम माँ-बाप का क्या, कबतक बैठे रहेंगे, जिन्दगी तो इन बच्चों को ही गुजारनी है---फिर कैसा यह समाज, किसे इतनी फुरसत, जो दूसरों के बारे में इतना सोचे! ' पापा के शब्द खुद-बखुद उसके कानों में गूंजने लग जाते।
" कौन हैं ये मनु और जोनुस, थोड़े दिनों में किसी को याद तक न रहेगा! कौन ज्यादा प्यारा है तुम्हें बेटी या समाज? ", सूजी सूजी आँखों से कई बार पति को समझाने की कोशिश की पिनाकी ने परन्तु शेखर सरकार टस से मस नहीं हुए। और तब उस सारे विध्वंस को सहेजती-समेटती पिनाकी आनन-फानन बेटी को लेकर इंगलैंड वापस आ पहुँची।
" पढ़ाई तो पूरी करनी ही है इसे और इस वक्त इसे मेरी भी जरूरत है।" बेटी के दुख में डूबी बस इतना ही बता और समझा पायी थी सास और पति को वह। ' फूल-सी बेटी का इतना तिरस्कार---इतना मन दुखाया सबने मेरी लाडो का!' -बेटी की एक मुस्कान पर पूरी दुकान खरीद कर लाने वाली पिनाकी समझ नहीं पा रही थी, इस दर्द की वजह को भी और अपनी मजबूरी को भी। धीरे-धीरे ही जान पाई वह कि न तो हर चीज दुकानों में बिकती है और ना ही खरीदकर या छीनकर ली या दी ही जा सकती है। बहुत सी चीजों के लिए तो बस इन्तजार ही करना पड़ता है...दिनरात बस प्रार्थना ही करनी पड़ती है। एकबार फिर संस्कार और जरूरतों के बीच की वह खाई बहुत गहरी और डरावनी लग रही थी पिनाकी को। पर पिनाकी को तो आदत है डरों से लड़ने की, खाइयों को पाटने की...जरूरत पड़े, तो उनमें लेट तक जाने की। प्रेतात्मा की तरह हर समस्या के इर्द-गिर्द ही घूमते रहने की, जबतक कि डरकर वे उसका, उसके परिवार का पीछा न छोड़ दें। आशंका और क्रोध से कांपते पति चुप बैठे थे दूर भारत में और यहां इंगलैंड में उसके बगल में बैठी बेटी भी कोसों दूर भटक रही थी, सोच के गहरे धुंधलके में गुम और परेशान---खाने पीने सबसे ही रूठकर। किसी के मन का या किसी भी बात का पता नहीं लगा पा रही थी पिनाकी। बस सामने दीवार पर लटकी वह टिकटिक करती घड़ी जरूर सुबह शाम तेजी से व्यर्थ होते वक्त और जिन्दगी की सूचना दे जाती थी उसे।
" मन छोटा मत कर। मैं हूँ ना अभी। -क्या चाहती है तू, बता मुझे। ऐसे मत रो। बस पहले अपने मन की अच्छी तरह से थाह ले ले। क्या यही है वह, जिसकी तुझे तलाश थी? क्या यही है वह, जिसके साथ तू अपना सुख-दुख, जीवन बांटना चाहेगी---बिना किसी लाग-लगाव और पर्दे के सहज होकर रह पायेगी...घर गृहस्थी बसा पाएगी बिना किसी पश्चाताप और ग्लानि के इसके साथ? "
कई कई बार पूछने की कोशिश की पिनाकी ने और अंत में बेटी के दर्द से कटती जब और चुप्पी नहीं बर्दाश्त कर पाई तो हर संकोच, हर तर्क को परे धकेलती अचानक ही एकदिन उठी खड़ी हुई पिनाकी और जोनुस को हाथ पकड़कर ले आई बेटी के सामने। फिर अगले ही हफ्ते दोनों से स्थानीय रजिस्ट्रार के आफिस में शादी की अर्जी भी दिलवा दी। बहुत दुख सह लिए दोनों ने, कोई आए या न आये, गवाही दे या न दे, एक अकेली उसकी सहेली मालती ही काफी थी इसके लिए। वैसे भी तो यहां, कानून में बस दो ही गवाह तो चाहिएँ शादी करने के लिए और महीने भर के अन्दर ही मनुश्री, मनुश्री सरकार नहीं मनुश्री अब्राहम बन गई। मात्र एक दस्तक के साथ शादी हो गयी उसी जोनुस के साथ जिसे वह जी-जान से भी ज्यादा चाहती थी। और यह सब संभव हुआ उस मां के आशीर्वाद से जिसे वह आजतक बेहद कमजोर और असहाय ही समझती आई थी। मो, मनप्रीत, जारा ...पूरी मित्रमंडली खड़ी थी स्वागत में मुठ्ठी भर-भरके चावल और पंखुरियां नवदंपति के ऊपर फेंकती-हंसती-गाती। मालती ने अपने ही बगीचे से तोड़कर दो सुन्दर और गमकती गुलाबों की माला भी बना डाली थीं जिन्हें उन्होंने उसके कहने पर एक-दूसरे को पहनाया और फिर मां से पैर छूकर आशीर्वाद लिए, यही नहीं मन-ही-मन दीदा और बाबा को भी प्रणाम किया दोनों ने ही।। मां के हाथ के बनाए स्वादिष्ट खाने के साथ हंसी, कहकहे,गाना-बजाना सबकुछ रात देर तक चलता रहा। मनु और जोनुस की शादी का जश्न मना-मनाकर बच्चों ने मानो घर ही सरपर उठा लिया था। शैम्पेन, आतिशबाजी और तरोताजा संगीत सभी से लैस, पूरी ही तैयारी के साथ आए थे वे। हर्ष और उल्लास सबकी मुस्कुराती आँखों और थिरकते पैरों में ही नहीं, रोम-रोम से छलक रहा था।
' किसने कहा कि वे अपनों से दूर हैं!'
हर्ष और उल्लास के इस मौके पर अपनों की कमी उसे भी बहुत खल रही थी, पर आंसू भीगी तृप्त आंखों को पोंछती पिनाकी बारबार बस यही एक बात सोचे जा रही थी।...
त्रिशंकु भगवान दास जितने ज्यादा पैसे वाले हैं उतने ही दिल के भी बड़े हैं। रिश्तों का निर्वाह खूब जानते हैं भगवान दास अत: उनसे मिलने और बातचीत करने में कभी हीनता का बोध् नहीं होता। रिश्तेदार और दोस्त गऱीब हों या अमीर सबको खूब मान देते हैं। भेदभाव का सवाल ही नहीं उठता। बेटी की शादी थी। मेहमानों का स्वागत करने के लिए भगवानदास स्वयं मुख्य द्वार पर उपस्थित थे। सभी का प्रेमपूर्वक और आदरभाव के साथ स्वागत कर रहे थे। राधेश्याम जी का बड़ा आदर करते हैं भगवान दास। हैसियत में कोई मुकाबला नहीं पर बड़े भाई का दर्जा दे रखा है उन्हें। जैसे ही राधेश्याम जी ने प्रवेश किया भगवान दास ने उन्हें गले लगा लिया और उनका हाथ थामे देर तक बातें करते रहे। बच्चों को साथ न लाने की शिकायत करते रहे। इतने में एक लंबी-सी चमचमाती हुई गाड़ी बिल्कुल करीब आकर रूकी। गाड़ी में से एक नेतानुमा व्यक्ति उतरे और आगे बढ़े। जैसे ही ये सज्जन दिखलाई पड़े भगवान दास ने राधेश्याम जी का हाथ जो उन्होंने अपने हाथों में थाम रखा था तत्क्षण छोड़ दिया और राधेश्याम जी से बिना कुछ कहे फ़ौरन उस नेतानुमा व्यक्ति की ओर लपके। ''अमर प्रकाश जी आपके इंतजार में आँखें पथरा गयीं।`` भगवानदास ने दोनों हाथों को अत्यंत शिष्टता से जोड़ते हुए कहा। राधेश्याम जी की समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करें? अंदर जाएँ या बाहर क्योंकि भगवानदास ने उन्हें अधर में लटकता हुआ छोड़ दिया था। भगवान दास नये आगंतुक का हाथ थामे राधेश्याम जी की बगल से ऐसे आगे निकल गये जैसे उन्हें जानते ही न हों। कोई कहे या न कहे बहरहाल खाना तो खाना ही था इसलिए राधेश्याम जी भी अंदर की ओर बढ़ चले। फार्म हाउस की मुलायम-मुलायम मखमली घास पर भी राधेश्याम जी की चाल को देखकर ऐसा लगता था कि जैसे वो काँटों से बचने का प्रयास करते हुए संभल-संभल कर चले जा रहे हों।
समाजसेवी
अनिल कुमार जी से मेरी मुलाक़ात बहुत पहले हुई थी एक मित्र के यहाँ। राश्ट्रीयता की अवधारणा पर उनका लेक्चर सुनकर मैं वाकई उनसे प्रभावित हुए बिना न रह सका। उनका लेक्चर ही प्रभावशाली और ओजपूर्ण नहीं था अपितु क़ौम की हर खुशामद करने के लिए भी वे तत्पर दिखलाई पड़ रहे थे। समाज में व्याप्त समस्याओं और कुरीतियों को लेकर भी वे काफी चिंतित थे। मित्र ने मुझे बताया कि अनिल कुमार जी के बड़े-बड़े अच्छे-अच्छे लोगों से संबेध हैं और अपनी बिरादरी के रिश्ते कराने में भी रुचि रखते हैं।
एक दिन मैंने भी अनिल कुमार जी से कहा,``भाई साहब, हमारी बिटिया भी शादी के लायक हो गई है, उसके लिए भी कोई उपयुक्त वर हमें बतलाइये।`` ``हाँ,हाँ, क्यों नहीं? मेरा काम ही भाइयों की सेवा करना है पर एक काम करना नरेंद्र बिटिया का बायोडाटा मुझे भिजवा देना,`` अनिल कुमार जी ने आश्वस्त करते हुए कहा। मैं अगले दिन ही बिटिया का बायोडाटा लेकर अनिल कुमार जी के यहाँ पहुँच गया। मुझे देखते ही अनिल कुमार जी ने पूछा,``हाँ भई कैसे आया नरेन्द्र?`` मैंने उन्हें पिछले दिन की बात याद दिलाई और कहा,`` अनिल कुमार जी बड़ी बिटिया की शादी तो कई साल पहले कर चुका हूँ। बेटे की शादी की मुझे कोई चिंता नहीं। बस सारी चिंता छोटी बिटिया की है। मेरे पास कुल मिला कर बारह-तेरह लाख रुपये हैं और ये सारे पैसे मैंने छोटी बिटिया की शादी के लिए ही संभाल कर रखे हैं।``
मैं कुछ और कहना चाहता था पर अनिल कुमार जी ने बीच में ही मेरी बात काटते हुए कहा,``अरे मुझे क्या समझा रहा है? मुझे पहले से ही अंदाज़ा था कि तेरा बजट ऐसा ही होगा दरम्याना-सा कोई बारह-पंद्रह का।`` फिर पास ही एक मेज़ पर रखी फाइल की ओर इशारा करते हुए अनिल कुमार जी ने कहा,`` बायोडाटा सामने मेज़ पर रखी फाइल में रख दे। मैं देखता हूँ इस बजट में यदि कोई लड़का मिलता है तो।``
मैं समय से स्टेशन पहुंच गया था। गाड़ी प्लेटफार्म पर लग तो गई थी ; किंतु अभी उसकी सफाई हो रही थी। सफाई कर्मचारी ने दरवाज़ा बंद कर रखा था ; इसलिए अंदर घुसना संभव नहीं था। इच्छा तो हुई कि उससे कहूं कि भैया तुम अपना काम करते रहो, किंतु मुझे अपने स्थान पर बैठ जाने दो। न मैं तुम्हारे लिए कोई बाधा उत्पन्न करूंगा, न तुम मेरे लिए कोई परेशानी पैदा करो। पर मेरी सारी अनुनय विनय को उसने शांत मन से सुना और मुसकरा कर बोला, ''साब ! सफाई कर लेने दो। झाड़ू के आक्रमण को आप झेल नहीं पाएंगे। उड़ती धूल में बैठना संभव नहीं है। वैसे भी, आप बैठ गए तो और लोग भी आ जाएंगे। और तब मैं सफाई कर नहीं पाऊंगा। मैं डब्बे की पूरी सफाई किए बिना उतर गया तो फिर आप ही शिकायत पुस्तिका मंगाएंगे और साहब बन कर उसमें लिखेंगे कि रेलवे में आजकल सफाई नहीं होती।``
तर्क तो मेरे मन में भी बहुत सारे थे। मैं कहना चाहता था कि गाड़ी की सफाई यार्ड में क्यों नहीं होती। गाड़ी प्लेटफार्म पर लग जाती है, तब तुम लोग सफाई करने आते हो। पहले सो रहे थे क्या। और फिर डब्बा खोलोगे तो उधर से गाड़ी चलने के लिए सीटियां बजाने लगेगी। गार्ड हरी झंडी लहराने लगेगा। यात्रिायों में ऐसी भगदड़ मचेगी कि अच्छे भले सभ्य लोग भी जानवर हो जाएंगे। आखिर तुम लोग क्यों नहीं चाहते कि लोग आराम से भले लोगों के समान, गाड़ी में प्रवेश करें। शांति से मुस्कराते चेहरों से अपने स्थान पर पहुंचें और सुखी मन से अपनी शायिका पर बैठ जाएं। ...
पर यह सब मैंने कहा नहीं। प्लेटफार्म पर खड़ा प्रतीक्षा करता रहा। जब गाड़ी चलने में केवल दस मिनट रह गए तो उसने बड़ी कृपापूर्वक कपाट खोल कर हांक लगाई, '' आ जाइए साब ! डब्बा तैयार है।``
धक्कामुक्की तो होनी ही थी। हुई। अंतत: मैं अपनी शायिका तक पहुंचा और हांफता हुआ उसपर बैठ गया। जब श्वास कुछ नियमित हुआ तो उसपर बिस्तर बिछाया और लेटने की सोच ही रहा था कि एक साहब आ गए, '' आप यहां क्या कर रहे हैं ?``
''यह मेरा स्थान है।``
''स्थान आपके बाप का है।`` वे बड़े सहज भाव से बोले, '' मुझे रेलवे वालों ने ऊपर वाली शायिका दे दी है और मुझे वह पसंद नहीं है।``
''तो ?``
''तो क्या !`` वे बिफर गए, ''नीचे वाली शायिका खाली कीजिए। यहीं टिके रहना चाहते हैं तो ऊपर वाली शायिका पर चले जाइए। नहीं तो टी. सी. से कह कर कोई और स्थान ले लीजिए।``
मैंने चकित भाव से उन्हें देखा। ऐसा नहीं है कि आजतक मैंने कभी अपनी शायिका न बदली हो, पर वह तो परस्पर समझौते से होता है। कोेेेई प्रार्थना करता है, कोई याचना करता है, पर ये तो ...
''यह कोई शराफत है ?`` मैंने कहा।
'' शराफत ! कभी शराफत से भी कोई स्थान खाली हुआ है ?`` वे बोले, '' हमको तो खाली कराने का यही तरीका आता है।``
''मैं तो खाली नहीं करूंगा।``
''आपके फरिश्ते भी करेंगे।`` वे बोले, ''आपका सामान उठा कर बाहर फेंक दूंगा, तो खाली करेंगे या नहीं।``
''आप समझते हैं कि मैं आपका विरोध नहीं करूंगा।`` मैंने कुछ तेजस्वी स्वर में कहा,
'' चुपचाप सह लूंगा, सब कुछ ?``
''आजतक तो सहते ही आए हैं। कभी विरोध नहीं हुआ। `` वे पूर्णत: आश्वस्त थे।
'' क्या मतलब ?``
''आप ने ईरान खाली किया तो विरोध किया ?`` वे मुसकरा रहे थे, '' अफगानिस्तान खाली किया तो कोई आपत्ति की ?``
''मैं समझा नहीं।``
''अभी समझाता हूं।``वे बोले, ''१९४७ में पख्तूनिस्तान, बलूचिस्तान, सिंध, आधा पंजाब और आधा बंगाल खाली किया। कोई विरोध किया आपने ?``
'' जी !``
'' स्वतंत्राता के पश्चात् अपनी सेनाओं की छाया में आपने कश्मीर खाली किया।`` वे मुसकरा रहे थे, '' कोई विरोध किया आपने ?``
मेरे मुख से एक शब्द भी नहीं निकला। फटी फटी आंखों से उन्हें देखता रहा।
''वह तो पता नहीं कैसे क्या हो गया, नहीं तो एक दो गोधरा के पश्चात् आप गुजरात भी बिना किसी आपत्ति के खाली कर देते।``
मैं चकित भाव से उनकी ओर देखता रह गया। सत्य का यह रूप तो मेरे सामने कभी प्रकट हुआ ही नहीं था।
महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने शिवमंगल सिंह 'सुमन' को छायावादी वृहत्रयी ( पंत, प्रसाद, निराला) की काव्य-वाटिका में महकते सुमन की संज्ञा दी थी। छायावादोत्तर काल के प्रमुख कवियों- दिनकर, बच्चन, अंचल, नरेन्द्र शर्मा के साथ सुमन का नाम अनिवार्यतः जुड़ा है।
साधारण व्याख्याता से लेकर विक्रम विस्वविध्यालय के उपकुलपति, नेपाल में भारत के सांसकृतिक दूत और उ.प्र. उपाध्यक्ष पद तक उनकी जीवन यात्रा एक संघर्षशील व्यक्तित्व की जिजीविषापूर्ण एक सार्थक जीवन-यात्रा है।
कवियों का खानदान
भारत के तत्कालीन सबसे बड़े महाविध्यालय (माधव महाविध्यालय, उज्जैन) के वे यशस्वी प्राचार्य रहे। बनारस हिंदू विश्वविध्यालय में आचार्य रामचंद्र शुक्ल और पं. केशवप्रसाद मिश्र के प्रिय छात्रों में सुमन एक थे। यूं हर व्यक्ति की तरह वे यशकामी हैं। किन्तु इस युग में भी वे उस विरल व्यक्तिओं में से एक हैं, जो किसी की निन्दा नहीं करते। व्यस्ततम क्षणों में भी किसी अनाम, अपरिचित कवि-लेखक के आगमन पर उल्लसित मन से उसे अंक में भर लेते। कवि सुमन कहते- " भाई, अपना तो खानदान ही कवियों का है। "
सांसों का हिसाब
लगभग चार दशक तक सुमनजी के साथ रहकर पाया कि वे यध्यपि अतिशय भावुक हैं लेकिन उतने ही ' केलकुलेटिव ' भी। कटुता के बीज उन्होंने कभी नहीं बोए, इसलिए महामना मालवीय, पं. नेहरू, मोरारजी देसाई से लेकर राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह और अटल बिहारी बाजपेयी तक वे स्नेह और श्रद्धाभाजन बने रहे।
जवाहरलाल जी पर उनकी प्रसिद्ध कविता " मैं तुमसे, तुमको मांगता हूं " की पंक्तियों से प्रभावित होकर श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित उन्हें नेहरूजी से भेंट करवाने उनके निवास पर स्वयं ले गयी थीं। आकाशवाणी से " सांसों का हिसाब " सुनकर भारत के क्रान्तिकारी शायर जोश मलीहाबादी उन्हें मिलने सीधे रेडियो स्टेशन पर पहुंचे थे।
सांस्कृतिक दूत
वे वर्षों नेपाल के भारतीय दूतावास में सांस्कृतिक सचिव के पद पर रहे। भाषाओँ के प्रति इतना अनुराग कि वहां नेपाली भाषा सीखी। हिन्दी के प्रचंड पक्षधर और अप्रतिम वक्ता सुमन संस्कृत, उर्दू, मराठी और गुजराती के भी विद्वान हैं। वाल्मीकि, कालीदास, भवभूति से लेकर गालिब, फिराक, फैज उनकी जबान पर हैं। तुलसी के वे भक्त हैं। कालिदास और रविन्द्रनाथ उनके प्रिय कवि हैं।
हिल्लोल, प्रलय सृजन, मिट्टी की बारात, विस्वास बढ़ता ही गया आदि उनके प्रसिद्ध काव्य संकलन हैं। हिन्दी कवि सम्मेलनों के वे प्राण हुआ करते थे। उनके समकालीन मंचीय कवियों में सोहनलाल द्विवेदी, दिनकर, बच्चन से लेकर वीरेन्द्र मिश्र, नीरज, अटलबिहारी वाजपेयी, नागार्जुन, बाल कवि बैरागी तक रहे।
हिन्दी के प्रोफेसर, समीक्षक होते हुए भी वे कभी किसी गुट से संबद्ध नहीं रहे। लोकप्रिय प्राध्यापक के रूप में सुमन आज भी याद किए जाते हैं। उनके छात्रों में वीरेन्द्र मिश्र, रामकुमार चंचल, अटल बिहारी बाजपेयी, बालकवि बैरागी आदि रहे हैं।
भव्य व्यक्तित्व
उनके व्यक्तित्व के सम्मुख कभी-कभी उनकी कविता बौनी नजर आती है। कृतित्व को अतिक्रमण करने वाला निराला का व्यक्तित्व भी तो ऐसा ही था।
पचास के दशक के एक पत्र में उन्होंने लिखा था-" कवि की कविता से बढ़कर मनुष्य की मनुष्यता होती है। वह कहीं मिले तो संजोकर रखिए। "
(साभार कादम्बिनी से ) -------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
मध्यमाहेश्वर (दैवीयता की ओर बढ़ते कदम) -डॉ. ईश्वर दत्त वर्मा
एक समय ऐसा था जब तीर्थ यात्रा को अपने अँतःकरण प्रकृति और ईश्वर के साथ जोड़ने का एक साधन समझा जाता था। तीर्थयात्रा को तब अधिक अर्थपूर्ण और सार्थक समझा जाता था जब वह यात्रा अधिक दुर्गम, कठिन और सुख-सुविधाओं से वंचित होती थी।
लेकिन आज हम सुगम मार्ग की खोज में रहते हैं। हिमालय क्षेत्र में आरामदायक सड़कों के निर्माण ने तीर्थ यात्राओं का परिदृश्य पूर्णतः बदल दिया है। सैकड़ों किलोमीटर की कठिन पहाड़ी यात्रा अब चन्द घंटों में की जा सकती है। आजकल कठिन मार्गों पर पदयात्रा करते हुए तीर्थयात्रियों को देखना दुर्लभ हो गया है और न ही आजकल हम उन छोटे विश्रामस्थलों को पाते हैं जिन्हें छट्टी कहा जाता था जो तीर्थयात्रा मार्ग में प्रत्येक 5-10 कि.मी. के फासले पर होते थे।
इस तथाकथित विकास के बावजूद भी गढ़वाल क्षेत्र के पांच केदार अभी भी पक्की सड़कों से नहीं जुड़े हैं। उन तक पहुंचने के लिए पदयात्रा करनी ही पड़ती है। इनके केदारों की यात्रा के दौरान आपके पास मार्ग में बनी छट्टियों में ठहरने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है। इन्ही यात्राओँ के दौरान आप उस गुजरे समय के उस अनुभव को पुनः जी सकते हैं जब तीर्थ यात्राओं में अधिक समय लगा करता था और उनमें जोखिम और रोमांच भी होता था।
पौराणिक प्रसंगों के अनुसार महाभारत के पाणडवों ने कौरवों के साथ आँख मिचौली करते हुए भगवान शिव के मध्य भाग को मध्य माहेश्वर में देखा। तभी से पांच केदारों में से एक यह केदार श्रद्धालुओं के लिए एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बन गया। मध्य माहेश्वर तक पहुंचने के लिए तीस कि.मी.लम्बी पदयात्रा करनी होती है। जिसका आरंभ कालीमठ से होता है । कालीमठ सरस्वती नदी के तट पर बने 40-50 घरों का एक छोटा गांव है। यह समुद्र स्थान समुद्र तल से 1463 मीटर की ऊंचाई पर है। ऐसा समझा जाता है कि महान संस्कृत कवि कालिदास का जन्म इसी के समीप स्थित एक गांव कविठा में हुआ था।
इस यात्रा के दौरान अनेक छट्टियां और बुग्याल ( उंचे पर्वतों से घिरे हरियाले मैदान) आते हैं। यह मार्ग सर्वत्र प्रकृति की मनोरम छटा से परिपूर्ण है। पर्वतीय भू भाग की सभी बाधाओं को लांघती छोटी नदियां और उनका सरस्वती के साथ संगम इस सुहाने वातावरण में मंत्रमुग्धकारी लगता है।
प्रकृति की अपार संपदा का आनंद उठाते हुए आप 3200 मीटर की उंचाई पर स्थित मध्य माहेश्वर पहुंचते हैं जहां शिव मन्दिर एक हरियाले बुग्याल के बीचोबीच स्थित है। मन्दिर का मनोरम परिवेश और वहां व्याप्त नीरवता पदयात्री के हृदय में श्रद्धा के भाव भर देती है।
पदयात्री का अगला पड़ाव वृद्ध माहेश्वर है जो मध्य माहेश्वर से केवल दो कि.मी. आगे और 200 कि. मी. की ऊंचाई पर स्थित है। जैसे जैसे आप आगे बढ़ते हैं दमकती धवल हिम से लदी भव्य चौखम्बा चोटी दृष्टिगोचर होने लगती है। इस मार्ग पर आगे बढ़ने के साथ-साथ चौखम्बा के मोहक सौंदर्य और रहस्य का खुलासा होता जाता है। मध्य माहेश्वर में आपको यह आभास होता है कि आप प्राकृतिक सौंदर्य के चरम स्थल पर पहुंच गए हैं लेकिन वृद्ध माहेश्वर मन्दिर में जो उसी प्रकार के बुग्याल में स्थित है, में पहुंचने पर वह भान गलत सिद्ध होने लगता है। आपको लगेगा कि मानो आप उसी मन्दिर की दूसरी मंजिल पर पहुंच गये हैं। न जाने क्यों इस स्थान को वृद्ध माहेश्वर कहा जाता है जबकि यहां पर प्रकृति के सौंदर्य में यौवन की मिठास घुली है।
शीतकाल के दौरान पूर्णिमा के दिन यहां की यात्रा का कार्यक्रम बनायें क्योंकि तब आपको हिमाच्छादित चोटियों का असीम अनंत दृश्य देखने को मिलेगा।
मुझे माँ के पास सोना है प्यारे बच्चों मेने अन्विक्षा के बारे मे बताया था न आज आप को उसकी एक और बात बताती हूँ .अनवी (अन्विक्षा )हाँ प्यार से हम उसको अनवी कहते हैं जब ५ साल की हुई तो उसकी माँ उसके लिए एक बेबी लाने वाली थी .माँ ने कहा की "मै जानती हूँ की मेरी बेटी अकेला महसूस करती है तो हम आप के साथ खेलने के लिए एक भाई या बहन लाने वाले हैं। आप को क्या चाहिए भाई या बहन ? "इतना सुन के अनवी बहुत खुश हो गई। बोली, "माँ मुझे तो भाई ही चाहिए। वो मेरे साथ खेलेगा मै उस को राखी बाधूँगी उसको खूब प्यार करूंगी और माँ वो मुझे गिफ्ट भी तो देगा। " अनवी की बात सुनके माँ बोली "बेटा बहन भी तो आप के साथ खेलेगी फ़िर भाई ही क्यों ?"माँ भाई को मै राखी भी बाँध सकती हूँ न " हूं, माँ जानती थी अनवी के पास हर बात का जवाब होता था।
फ़िर दिन बीतने लगे और वो दिन भी आगया अनवी की प्रार्थना भगवान ने सुन ली, उसको एक भाई हुआ। अनवी बहुत खुश हुई। उसने जब उसको देखा तो बोली, "माँ ये इतना छोटा क्यों है ?"अरे बेटा ये अभी तो आया है तो छोटा ही होगा धीरे-धीरे बड़ा होगा न तुम्हारी तरह। " अनवी कुछ बोली नही पर थोड़ा दुखी हो गई क्यों की उसने सोचा था की इतना बड़ा होगा कि उसके साथ खेल सकेगा । क्यों की उसने इस से पहले किसी छोटे बच्चे को नही देखा था, अनवी का सारा उत्साह ठंडा हो गया। भाई का नाम स्वरित रखा गया। माँ थोड़े दिनों मै स्वरित को ले के घर आ गई। घर आके अनवी को सब कुछ बदला बदला सा लगा उस के कमरे मै भाई का क्रिब लगा दिया गया। अनवी जो हमेशा माँ के पास सोती थी अब भाई सोने लगा था। उसको पापा के साथ सोना होता था। कभी कभी वो कहती भी, " पापा, मुझे माँ के पास सोना है।" वो भाई को प्यार बहुत करती थी पर कभी कभी उसको लगता की स्वरित ने उस की सारी जगह ले ली है। घर मे जब भी कोई आता, स्वरित से खेलता। उस को प्यार करता। अनवी को भी करता, पर ज्यादा धयान स्वरित पे ही रहता। अनवी को बहुत बुरा लगता। माँ बीच बीच मे अनवी को भाई के बारे मे बताती, उसकी हरकते दिखाती, पर अनवी को ज्यादा मजा नही आता । " माँ, माँ "अनवी ने बुलाया "क्या है बेटा? बोलो!" माँ ने कहा। "माँ, यहाँ आओ। देखो, मेने क्या बनाया है? "बेटा मै स्वरित को नहला रही हूँ, अभी नही आ सकती। बाद मे देखूंगी।" .अनवी चुप हो गई। अनवी के पापा लैब से आए और स्वरित के साथ खेलने लगे। माँ ने देखा कि अन्विक्षा दूर बैठ के चुप चाप पापा को स्वरित के साथ खेलते देख रही है। माँ ने स्वरित को पापा के पास छोड़ा और अनवी के पास आके बोली, "क्या बात है बेटा, आप ऐसे चुप से क्यों बैठे हो ?"अनवी ने कहा, "माँ, जब से स्वरित आया है सभी उसी मे लगे रहते है। पापा भी आते ही उसी के साथ खेलने लगते है, मुझे तो देखते ही नही । पूर्णिमा .मौसी भी अब मुझे ज्यादा प्यार नही करती, वो भी सवारित के साथ खेलने मे लग जाती है। और आप भी अब मेरे बुलाने पे आती नही, हमेशा स्वरित के काम में ही लगी रहती हैं । माँ स्वरित ने आ के मुझे अकेला कर दिया है। अब मुझको कोई भी प्यार नही करता। केवल मामा और मौसा ही मेरे साथ खेलते हैं। " माँ ये सब सुन के अवाक रह गईं उनकी छोटी सी बेटी उनको अचानक बहुत बड़ी लगने लगी। माँ ने अनवी को गले लगा लिया और उसकी आँखों से आंसू निकल रहे थे वो रोते हुए बोली, "बेटा ऐसा नही सोचते। माँ पापा की तो तुम दुलारी हो। भाई अभी छोटा है न, इसी लिए उसका ध्यान रखना होता है। तुम भी जब छोटी थी न, हम इसी तरह से तुम्हारी भी देखभाल करते थे । अच्छा बेटा, तुम ये देखो।" कहके माँ ने उसका जो बचपन का विडियो बनाया था उसको दिखाया । देख के अनवी बहुत खुश हो गई। "अरे माँ, ये मै हूँ! तुम तो मुझे नहला रही हो और यहाँ पे आयल लगा रही हो। ओहो, माँ वही सब जो स्वरित के लिए कर हो, वही सब मेरे लिए भी कर रही हो। माँ, अब मैं समझ गई हूँ कि भाई छोटा है, जैसे इस में मैं छोटी हूँ। ".और अनवी हँसती हुई माँ के गले लग गई ।
माँ के दिल से एक बोझ हल्का हुआ। उस दिन के बाद से माँ पापा इस बात का बहुत ध्यान रखते की अनवी को अकेला न लगे .अनवी को भी अब अपने भाई से कोई शिकायत नही थी .वो भाई के साथ खेलती उसका सारा काम करती और बहुत प्यार करती।