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                                               सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर
                                                         लेखनी- जुलाई 2012


                                                       "रोया फिर फिर मुड़ मुड़के
                                                       धरती का   वो चटका कोना
                                                         बूंद बूंद में भीगी धरती
                                                           एक बूंद ना मेरे पास..."


                                                                 -शैल अग्रवाल


                                                                  (आधे-अधूरे)


                                                                अंक 65- वर्ष 6


इस अंक मेः   


माह विशेषःफुहारें। गीत और गजलः श्यामल सुमन । कविता धरोहरः मुक्तिबोध।  माह के कविः बाल स्वरूप रही। कविता आज और अभीः रचना श्रीवास्तव, खुशबू सिंह,  सरस्वती माथुर,   कुँवर नरायण,  शैल अग्रवाल, खुरशीद हयात, स्वप्निल श्रीवास्तव, बीनू भटनागर, दिनेश ध्यानी, सितेश आलोक, रेनू चंद्रा, शील निगम और कवि याकूब ।  बाल कविताः अज्ञात ।


रूबरुः विजेन्द्र शर्मा विजित । कविता में इन दिनो: ओम निश्चल। कहानी धरोहरः मोहन राकेश। कहानी विशेषः निर्मल वर्मा। कहानी समकालीनः शैल अग्रवाल। कहानी समकालीनः दिलीप भाटिया। लघुकथाः गोवर्धन यादव। धारावाहिकः दयानंद पाण्डेय। परिदृश्यः गौतम सचदेव।  परिचर्चाःरवीन्द्र अग्निहोत्री। तीज त्योहारःसरस्वती माथुर।   हास्य व्यंग्यः भारतेन्दु हरिशचन्द। चौपालः विजेन्द्र शर्मा। आकलनः अमृतलाल वेगड़े, हरिकृष्ण निगम, रूपसिंह चन्देल।  चांद परियाँ और तितलीः नीतिकथा  ।


                                                                                 और


 माह की साहित्यिक खबरों से भरपूर  रंगारंग विविधा और वीथिका में  कबिरा खड़ा बाजार में के अंतर्गत वेदप्रताप वैदिक की विचारोत्तेजक टिप्पणी ।


                              अगले माह के विषय की सूचना और विवरण 'अबाउट अस' पृष्ठ पर है।

                                              परिकल्पना, संपादन, संचालनः शैल अग्रवाल


                                                      सहयोगः डॉ. ओम निश्चल ( भारत)


                                             संपर्क सूत्र: editor@lekhni.net; shailagrawal@hotmail.com 
                        
                                             पत्रिका माह की पहली तारीख को परिवर्तित की जाती है।


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                                                                                                                                                                   अपनी बात

आकाश में उमड़ते मेघों को देखते ही मुग्ध मयूर नाचने लगता है। पंखों का सौंदर्य मोरनी को ही नहीं, उसे भी आत्म-विभोर कर देता है। परन्तु जैसे ही दृष्टि पैरों पर पड़ती है, मिलन के इस सुखद पल में भी वह रो पड़ता है। उसे अपनी कुरुपता और अधूरेपन का अहसास जो हो गया। आधी अधूरी कहानी कोई अच्छी नहीं, चाहे वह राजा-रानी की हो या हमारी आपकी। अंधेरे में घुसकर रौशनी न ढूँढे वह लेखनी ही कैसी? विकलांगता अभाव पैदा करती है और अभाव सदा दुख देता है क्योंकि यह विकलांगता देता है...चाहे तन की हो या मन की और  विकलांगता सदा अवरुद्ध ही करती है।


फिर आधे-अधूरेपन का अहसास, यह अतृप्ति कहाँ और किसके साथ नहीं...इसकी भी तो अपनी एक अलग दुनिया है, अलग नियम हैं कहीं आकर्षण है तो कहीं स्पर्धा, क्षोभ लालच... कोई भी वजह  -हमेशा एक लाचारी...एक नाइंसाफी का ही तो अहसास कराती है। और उसके साथ जन्म लेता है गहरा असंतोष और विषाद -या फिर एक हट..हद से आगे गुजर जाने की तमन्ना-


देखा है बौने जलधर का
शशि छूने को ललकना
वो हाहाकार मचाना
उठ-उठकर यूँ गिरना

-जयशंकर प्रसाद


अंकिचनता या विपन्नता से इसका कोई संबंध नहीं। कभी बुद्धि की तो कभी हृदय की  प्यास है यह और हमारे अणु तत्वों में तेजी से फैल कर  बेचैन करती है। मानव के विकास की प्रेरणा तो कभी विनाश का कारण बन जाती है।  

अभाव में ही नहीं, तृप्त, भरे पेट और महलों में भी यह उतना ही सताती है जितनी कि एक भूख से बिलखते गरीब को। भूखे व्यक्ति को चांद प्रियतमा नहीं, रोटी की याद दिला सकता है , तो अमीर को सोने के सिक्कों की।  कहीं एक नए प्रोजेक्ट का मापचित्र बनकर यही चांद नींद उड़ा देगा, तो एक आम गृहिणी को फ्रिज में कटी रखी उस नीबू की फांक तक की याद दिला सकता है जिसे वह सलाद पर निचोड़ना भूल चुकी थी। 


तृषा का संबंध कभी पानी से नहीं, प्यास से ही होता हैः एक ऐसी प्यास जिसे जितना ही तृप्त करने की कोशिश की जाए, और-और बढ़ती जाती है। 

सच है कि  हर सपने को पानी की तरह पीने के गिलास में ढाल लेना संभव नहीं और कामना का कटीला संसार ललचने के लिए नए-नए  बहाने ढूँढ ही लेगा...बेहतर-से-बेहतर, सुन्दर-से-सुन्दर चीज या स्थिति से बेहतर और सुन्दर वस्तु, व्यक्ति और स्थितियों से ही तो भरा है यह संसार और आदमी का कद इस विशालता के आगे बेहद बौना। आसमां को बांहों में लेने की कोशिश की जाए तो जमीं पर से पैर ऊपर उठ जाते हैं और जमीं पर नीचे नजरें गड़ाए रखें तो आकाश दृष्टि से ओझल हो जाएगा।


बस में ही नहीं यह हमारे।  पर मन की जिद भी तो निराली है , ऊँची से ऊँची डाल पर ही उड़कर बैठता है। सावन के अंधे तक को कितना भी हरा-हरा दिखे, दूसरे का बगीचा ही अपने से ज्यादा मनभावन लगता है। चाहें या न चाहें, कितनी भी कोशिश करें, जिन्दगी में भटकाती और बिलखाती चाहत और सपनों का; अभिलाषा और आकांक्षाओं का गिलास हमेशा आधा ही रहेगा, चाहे आधा भरा हो या  आधा खाली । संतोष, सामर्थ और धैर्य की कोई सीमा नहीं तो अभिलाषा और आकांक्षाओं की भी नहीं। जब पाँच उँगलियाँ तक समान नहीं, तो विविधता भरे इस  इंद्रधुनुषी संसार में समानता कैसे हो सकती है...हाँ दमन-शमन या जिसकी लाठी उसकी भैंस -जैसी प्रवृत्तियों की रोकथाम हर जागरूक का कर्तव्य अवश्य समझ में आता है।


भांति-भांति की भाप पर चांद तक ऊुपर उठती  दुनिया का प्राय़ः अनदेखा और आधा-अधूरा एक किरदार औरत भी  है जिसे समझने की कोशिश में पुरुष ने प्रायः गलत सिरे से ही बात शुरु की है। अर्धनारीश्वर बनकर भी इस गुत्थी को नहीं सुलझा पाया है वह और उसके आधिपत्य भरे इस  समाज में गुत्थी कहाँ और कैसे उलझती चली गई खुद औरत को भी समझना ही पड़ेगा। उद्धृत करना चाहूंगी अलका सिन्हा के आलेख का एक अंशः


" स्त्री बाहर आ रही है और उसकी क्षमताओं का संवर्धन हो रहा है, मगर फिर भी, इस बात की ओर पर्याप्त सजग रहने की जरूरत है कि औरत औरत ही रहे, कहीं मर्द न बन जाए। मर्द होना अपनी तरह से जरूरी है और औरत होना अपनी तरह से। पहले स्त्री को अबला बना कर उसका शोषण किया जाता रहा, अब ‘बोल्ड’ बना कर उसका शोषण किया जा रहा है। मगर तकलीफ की बात तो यह है कि विमर्श की आड़ में जो खिलवाड़ उसके साथ किया जा रहा है, वह स्वयं उसका हिस्सा बनती जा रही है। स्त्री-विमर्श के नाम पर एक ऐसा चक्रव्यूह रचा जा रहा है जिसमें औरत सहर्ष प्रवेश करती जा रही है। शोषण बलात् हो या स्वेच्छा से, हठात् हो या वरण करके- उससे एक स्वस्थ उत्पत्ति नहीं हो सकती। कहीं ऐसा तो नहीं कि स्त्री-विमर्श घरों में खुलापन लाने के ख्याल से उन दीवारों को ही ढहाने लगा है जिनसे घर बनता है। स्त्री-विमर्श को अगर देह के स्तर पर भी केन्द्रित कर दिया जाए, तो भी, मुक्त होने और उन्मुक्त होने के बीच के फर्क को समझना होगा। स्त्री की देह ईश्वर की कला का सुंदर नमूना है। न तो यह बिकाऊ है और न ही भड़काऊ, न यह समस्या है और न ही तपस्या। "


समस्या कोई भी हो, अभावपूर्ति के लिए कर्म प्रेरणा नहीं रह गया अब। हर आदमी उंगली टेढ़ी करने को तैयार है। गलत को सही मानेगा यदि लक्ष पूरा हो, तो। योग्यता नहीं, छीनने की प्रवृत्ति बढ़ रही है आज। इससे उत्पन्न क्षुब्ध स्वार्थी लिप्सा या आत्मघातक उदासी, मूल्यों और संस्कारों को दीमक की तरह चाटती, मानव-समाज की सकारात्मक उर्जा व आशा, दोनों का हनन करती, आत्मघात के कगार तक खींच लाई है। रिश्तों की मिठास और सद्भावना तो छोड़ें खुद मानवता  दम तोड़ी नजर आ रही है, जहाँ क्रोध , हिंसा और लालच ही नहीं मौज मजे के लिए भी अब हत्याएँ होने लगी हैं । गरिमाहीन और अमर्यादित जीवन में हर चीज या तो नपा तुला व्यापार ही तो है या फिर उत्तेजना और मनोरंजन।


प्यार, उपकार.
मान अपमान
वैभव या तिरस्कार
व्यापार है जिन्दगी
एक प्यास ...
जैसे रेत सूखी
जैसे आस में                                                                                                                                                                                        तिरकी धरती
सोख लेगी सब
तन और मन...
सूखा  एक कंकाल
बेहाल  जिन्दगी।


विश्व व्यापी बढ़ते आक्रोश और अपराधों के मद्दे नजर , लेखनी का यह अंक हमने इसी आधे-अधूरेपन के अहसास पर केन्द्रित किया है। इसकी टीस और कसक के साथ-साथ इससे उत्पन्न क्रोध, भय, विद्रोह , अत्याचार और भ्रष्टाचार... विशेषतः युवा समाज और समाज के कर्णधारों में, आज सोचने-समझने व रोकने के विषय हैं। भ्रष्ट समाज, भ्रष्ट नेता ...राजा प्रजा सभी को। कहीं आग लग जाती है तो कहीं फाइलें गायब। और हम इस जादू पर तालियां बजाते हैं। जादूगर को जयमाल पहनाते हैं  'टके सेर भाजी और टके सेर खाजा ' के युग में। 


शब्द के बृहम को हर कलम को पहचानना होगा ।


 तपन के बाद ही ठंडी फुहारें आती हैं और उनका भरपूर आनंद लिया जा सकता है। बदलाव की जरूरत महसूस कर पाना  भी बदलाव की शुऱुवात है। तीन जुलाई से सावन का महीना है। लेखनी  आपके लिए शीतल फुहारें लेकर आई है –सावन और बरसात पर मनोहारी कविताएं , हाइकू, तांका, माही और लोकगीत आदि । प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।

उम्मीद है अंक न सिर्फ पसंद आएगा , अपितु सकारात्मक सोच की तरफ प्रेरित करेगा।


एकबार फिर सुधी पाठकों के विचारात्मक और रचनाकारों के रचनात्मक सहयोग की अपेक्षा के साथ-

                                                                                                         - शैल अग्रवाल 

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                                                                                                                                                                                    रूबरू


                                                                                                                                                                         - विजेन्द्र शर्मा

मौला ये तमन्ना है की जब जान से जाऊं
जिस शान से आया हूँ उसी शान से जाऊं


एक शख्सीयत…… मुनव्वर राना

सर्दी की वो एक  कंपकंपाती रात थी उर्दू अकादमी,दिल्ली ने गणतंत्र दिवस के उपलक्ष में एक मुशायरे का आयोजन किया था जगह थी दिल्ली का ताल-कटोरा इंडोर स्टेडियम ! जहाँ तक मुझे याद है 24 जनवरी2003 कादिन था और मुशायरे की  निज़ामत कर रहे थे जनाब मलिकज़ादा 'मंज़ूर ' उन्होंने एक नाम पुकारा कि अब मैं ज़हमते - सुखन दे रहा हूँ कलकत्ते से तशरीफ़ लाये जनाबे - मुनव्वर राना को पूरा हाल तालियों से गूँज उठा मैंने नाम तो सुना था पर उनके क़लाम से वाकिफ़ न था ! बड़ी- बड़ी आंखों वाला एक रौबीला चेहरा माइक के सामने आया जैसा नाम वैसा मुनव्वर चेहरा और उन्होंने बिना किसी तमहीद (भूमिका ) के एक मतला सुनाया:--
बस इतनी बात पे उसने हमें 'बलवाई' लिखा है हमारे घर के एक बर्तन पर आईएसआई लिखा है
मतला सुनते ही फिर एकबार पूरा हाल वाह- वाह से गूँज गया ,मुझे लगा कि मैंने आज तक जो शायरी सुनी थी वो सब इस मतले के आगे फीकी थी ! इसके बाद उन्होंने अपनी एक ग़ज़ल सुनाई जिसे सुनने के बाद तो मैं उनका मुरीद हो गया उस ग़ज़ल का मतला और एक शेर यूँ था ...
मुहब्बत करने वाला ज़िन्दगी भर कुछ नहीं कहता
के दरिया शौर करता है, समन्दर कुछ नहीं कहता

तो क्या मजबूरियां बेजान चीज़ें भी समझती हैं
गले से जब उतरता है तो ज़ेवर कुछ नहीं कहता
इसके बाद उन्होंने एक दो ग़ज़लें और सुनाई और अपनी जगह ले ली सच में शायरी के एक नए रंग से उस दिन मैं रु-बरु हुआ था , उनके एक-एक मिसरे पे सच में सन्न हो गया ! मैंने देखा कि मुनव्वर साहेब पीछे की तरफ़ गये है ,मैं भी उनसे मिलने के लिए गया दरअसल मुनव्वर साहेब सिगरेट का कश लेने मंच के पीछे आये थे दुआ - सलाम के तकल्लुफ़ के बाद मैंने कहा कि हुज़ूर ये शेर ज़राखुला नहीं अगरआप इसकी वज़ाहत कर दें तो बड़ी मेहरबानी होगी उन्होंने कहा कहिये ,मैंने शेर सुनाया "तो क्या मजबूरियां बेजान चीज़ें भी समझती हैं /गले से जब उतरता है तो ज़ेवर कुछ नहीं कहता"
उन्होंने कहा कि जब आप किसी को कोई चीज़ दिलाते है या फ़र्ज़ करिए अपनी बीवी को आप कोई चेन दिलाते है तो वो ज़ेवर ख़ुद बढ़ चढ़ के बोलता है कि मुझे किसी ने पहना है !मगर किसी मज़बूरी में जब वही चेन बिकती है तो ज़ेवर चुप –चाप बिक जाता है यानि जो मज़बूरी होती है उसे बेजान चीज़ें भी समझती है यही मफ़हूम है इस शेर का इतना सुनना था कि मेरी आँखे नम हो गई और उसदिन से मैं मुनव्वर साहेब का मुरीद हो गया ! शायरी ऐसे मौजू पे भी हो सकती है मैंने ज़िन्दगी में पहली मरतबा देखा,सुना और महसूस किया!
मुनव्वर राना का जन्म सई नदी के किनारे बसे तारीख़ी शहर रायबरेली (उतर प्रदेश ) में 26 नवम्बर, 1952 में हुआ ! इनके बुज़ुर्ग बरसों से वहाँ मदरसे में पढ़ाने का काम करते थे मगर जब मुल्क का बँटवारा हुआ तब मुनव्वर साहेब के दादा – दादी पकिस्तान चले गये और मुनव्वर साहेब के अब्बू मरहूम सैयद अनवर अली अपनी ज़मीं से मुहब्बत के चक्कर में पकिस्तान नहीं गये ! हालात् ने उनके हाथ में ट्रक का स्टेरिंग थमा दिया और इनकी माँ मजदूरी करने लगी अच्छा भला परिवार मुल्क केटुकड़े होने के बाद ग़ुरबत की चाद्दर में लिपट गया !हालात् ने मुनव्वर राना को बचपन में  ही जवान कर दिया !मुनव्वर साहेब ने कहीं लिखा है कि मेरे अब्बू ट्रक चलाके थक जाते थे उन्हें नींद आती थी और मुमकिन है उन्होंने बहुत से  ख़्वाब देखें हो ,अम्मी से नींद कौसों दूर थी लिहाज़ा अम्मी ने कभी ख़्वाब नहीं देखे! मुनव्वर साहेब के वालिद ने 1964 में अपना ट्रांसपोर्ट का छोटा सा कारोबार कलकत्ते में शुरू किया और 1968 में मुनव्वर साहेब भी अब्बू के पास रायबरेली से कलकत्ते आ गये ! मुनव्वर साहेब ने कलकत्ता के मोहम्मद जान स्कूल से हायर सेकेंडरी और उमेश चन्द्र कालेज से बी.कॉम.किया !इनके अब्बू शायरी के शौकीन थे सो शायरी की तरफ़ झुकाव वाज़िब था मुनव्वर साहेब के वालिद नहीं चाहते थे कि वे शायर बने पर तक़दीर के लिखे को कौन टाल सकता है जदीद (आधुनिक ) शायरी को नया ज़ाविया जो मिलना था , ग़ज़ल जो मैखाने से कभी बाहर नहीं निकली थी , जो कोठों से कभी नीचे नहीं उतरी थी ,महबूब के गेसुओं में उलझी ग़ज़ल को नया आयाम जो मिलना था ! मुनव्वर न चाहते हुए भी शायर हो गये,शुरूआती दिनों में वे प्रो. एज़ाज़ अफ़ज़ल साहेब से कलकत्ते में इस्लाह लेते  थे और उनका तख़ल्लुस था ' आतिश'  यानी क़लमीनाम था मुनव्वर अली'आतिश' ! बाद में लखनऊ में उनकी मुलाक़ात वाली आसी साहेब से हुई जो मुनव्वर राना के बाकायदा उस्ताद हुए ! मुनव्वर अली"आतिश"को नया नाम मुनव्वर राना उनके उस्ताद वाली आसी ने ही दिया !
फिलहाल मुनव्वर साहेब का अपना ट्रांसपोर्ट का बहुत बड़ा कारोबार कोलकत्ता में है और वे ख़ुद आजकल लखनऊ में रह रहे है!पिछले साल नवम्बर महीने में उनके घुटनों का ओपरेशन इंदौर में हुआ उसके बाद उनके घुटने कई बार खुले अभी भी उनका इलाज़ एम्स दिल्ली में चल रहा है!
इसमें कोई शक़ नहीं कि मुनव्वर राना ने शायरी की रिवायत से हटकर शे'र कहें हैं उनका मानना है कि ग़ज़ल के मानी महबूब से गुफ्तगू करना है ,तुलसी के महबूब राम थे और मैं अपनी माँ कोअपना महबूब मानता हूँ ! माँ पर  कहे उनके शे'र पूरी दुनिया  में मक़बूल है :-----
चलती - फिरती हुई आँखों में अजाँ देखी है
मैंने जन्नत तो नहीं देखी है, माँ देखी है

तेरे दामन में सितारे हैं तो होंगे फ़लक
मुझको अपनी माँ की मैली ओढ़नी अच्छी लगी

बुलंदियों का बड़े से बड़ा निशान छुआ
उठाया गोद में माँ ने तो आसमान छुआ

ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता
मैं जब तक घर लौटूं मेरी माँ सजदे में रहती है

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में जाती है
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में जाती है

'
मुनव्वर' माँ के आगे कभी खुलकर नहीं रोना
जहाँ बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आयी
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आयी

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आंसू
मुद्दतों नहीं धोया माँ ने दुपट्टा अपना
मुनव्वर राना की शायरी में महबूब की जुल्फें ,मैखाने का मंज़र , साकी-ओ- पैमाना और हुस्न की तारीफ़ तो नज़र नहीं आती पर मुनव्वर साहेब ने माँ , बेटी, बचपन, रिश्तों की नाज़ुकी ,ग़ुरबत,वतन ,घर- आँगन और ज़िन्दगी के तमाम रंगों पे शायरी की है ! उनके ये अशआर इस बात की तस्दीक करते है !

ग़ज़ल वो सिन्फ़ नाज़ुक है जिसे अपनी रफ़ाक़त से
वो महबूबा बना लेता है, मैं बेटी बनाता हूँ
****
समझोतों की भीड़ -भाड़ में सबसे रिश्ता टूट गया
इतने घुटने टेके हमने आख़िर घुटना टूट गया
****
हम सायादार पेड़ ज़माने के काम आये
जब सूखने लगे तो जलाने के काम आये
तलवार की मयान कभी फेंकना नहीं
मुमकिन है, दुश्मनों को डराने के काम आये
****
शक्कर फिरकापरस्ती की तरह रहती है नस्लों तक
ये बिमारी करेले और जामुन से नहीं जाती
*****
सो जाते है फुटपाथ पे अख़बार बिछाकर
मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते
****
फ़िज़ां में घोल दी है नफरतें अहल सियासत ने
मगर पानी कुँए का आज तक मीठा निकलता है
****
बिछड़ना उसकी ख़्वाहिश थी, मेरी आरज़ू लेकिन
ज़रा-सी ज़िद ने आँगन का बँटवारा कराया है
****
उम्र भर सांप से शर्मिन्दा रहे ये सुन कर
जब से इन्सान को काटा है फन दुखता है
****
ये देख कर पतंगे भी हैरान हो गई
अब तो छतें भी हिन्दू - मुसलमां हो गई
****
ज़िन्दगी से हर ख़ुशी अब ग़ैरहाज़िर हो गयी
इक शक्कर होना थी बाकी वो भी आख़िर हो गयी
***
बदन में दौड़ता सारा लहू ईमान वाला है
मगर ज़ालिम समझता है कि पाकिस्तान वाला है
****
हमारे फ़न कि बदौलत हमे तलाश करे
मज़ा तो जब है कि शोहरत हमे तलाश करे
मुनव्वर राना की शायरी में जो सबसे  अहम बात  है कि वे काफ़िये भी रिवायत से हटकर इस्तेमाल करते है जैसे:-
दुनिया सलूक करती है हलवाई की तरह
तुम भी उतारे जाओगे मलाई की तरह

माँ बाप मुफलिसों की तरह देखते हैं बस
कद बेटियों के बढ़ते हैं महंगाई की तरह

हम चाहते हैं रक्खे हमें भी ज़माना याद
ग़ालिब के शेर तुलसी की चौपाई की तरह

हमसे हमारी पिछली कहानी पूछिए
हम खुद उधड़ने लगते हैं तुरपाई की तरह
मुनव्वर राना सही मायनों में कलन्दर शायर है,उनके ये मिसरे इसकी पुरज़ोर गवाही देते है :-
ये दरवेशों कि बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगा
लिबास ज़िन्दगी फट जाएगा मैला नहीं होगा
****
जाओ, जाकर किसी दरवेश की अज़मत देखो
ताज पहने हुए पैरों में पड़े रहते है
****
कलन्दर संगेमरमर के मकानों में नहीं मिलता
मैं असली घी हूँ ,बनिए की दुकानों में नहीं मिलता
***
चले सरहद की जानिब और छाती खोल दी हमने
बढ़ाने पर पतंग आए तो चरखी खोल दी हमने

 

पड़ा रहने दो अपने बोरियेपर हम फकीरों को

फटी रह जायेंगी आँखे जो मुट्ठी खोल दी हमने
मुनव्वर राना ने देश के विभाजन का दर्द झेला है उनकापूरा परिवार उस वक़्त पाकिस्तान चला गया इस दर्द को उन्होंने अपनी नई प्रकाशित किताब मुहाजिरनामा में बयान किया है एक हीरदीफ़ काफ़िये पे उन्होंने तकरीबन500 शेर कहे है ! दरअसल मुहाजिरनामा उन लोगों का दर्द है जो उस वक़्त हिनुस्तान छोड़कर पाक चले गये थे और मुहाजिरनामा मुहाजिरों की जानिब से हुकूमते पाक को एक करारा जवाब भी है !मुहाजिरनामा में से कुछअशआर :-

मुहाजिर है मगर हम एक दुनिया छोड़ आये है
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आये है
वुजू करने को जब भी बैठते है याद आता है
कि हम उजलत में जमुना का किनारा छोड़ आये है
तयम्मुम के लिए मिट्टी भला किस मुंह से हम ढूंढें
कि हम शफ्फाक़ गंगा का किनारा छोड़ आये है

हमें तारीख़ भी इक खान - - मुजरिम में रखेगी
गले मस्जिद से मिलता एक शिवाला छोड़ आये है

ये खुदगर्ज़ी का जज़्बा आज तक हमको रुलाता है
कि हम बेटे तो ले आये भतीजा छोड़ आये है

जाने कितने चेहरों को धुंआ करके चले आये
जाने कितनी आंखों को छलकता छोड़ आये है

गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब,
इलाहाबाद में कैसा नाज़ारा छोड़ आए हैं


शकर इस जिस्म से खिलवाड़ करना कैसे छोड़ेगीके

हम जामुन के पेड़ों को अकेला छोड़ आए हैं


अभी तक मुनव्वर राना की ये किताबें मंज़रे-आम पे आ चूकी है:-
नीम के फूल, कहो ज़िल्ले इलाही से,बग़ैर नक़्शे का मकान, सफ़ेद जंगली कबूतर ,ग़ज़ल गाँव, मौर पाँव, पीपल छाँव, सब उसके लिए ,
बदन सराय ,माँ ,घर अकेला हो गया , चेहरे याद रहते है, फिर कबीर ,मुनव्वर राना की सौ ग़ज़लें ,जंगली फूल ,नए मौसम के फूल और मुहाजिरनामा !
फिलहाल मुनव्वर राना साहेब अपनी घुटनों की बिमारी से जूझ रहेहै ,पिछले दिनों उन्हें अस्पताल में बहुत रहना पड़ा वहाँ उन्होंने एक ग़ज़ल कही उसी का एक मतलाऔर एक शे'र :-

मौला ये तमन्ना है की जब जान से जाऊं
जिस शान से आया हूँ उसी शान से जाऊं

क्या सूखे हुए फूल की क़िस्मत का भरोसा
मालूम नहीं कब तेरे गुलदान से जाऊं
लिखने को तो मुनव्वर राना की शख्सीयत और उनके क़लाम पे हज़ारों सफ़े लिखे जा सकते है आख़िर में उन्ही के एक शे'र के साथ अपना ये आलेख  ख़त्म करता हूँ..
जाने अब कितना सफ़र बाक़ी बचा है उम्र का
ज़िन्दगी उबले हुए खाने तलक तो गयी 

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                                                                                                                                                        गीत और गजल

                                                                                                                                                         -श्यामल सुमन

                    संवाद


काम कितना कठिन है जरा सोचना।
गाँव अंधों का हो आईना बेचना।।

गीत जिनके लिए रोज लिखता मगर।
बात उन तक न पहुँचे तो कटता जिगर।
कैसे संवाद हो साथ जन से मेरा,
जिन्दगी बीत जाती न मिलती डगर।
बन के तोता फिर गीता को क्यों बाँचना।
गाँव अंधों का हो आईना बेचना।।

बिन माँगे सलाहों की बरसात है।
बात जन तक जो पहुँचे वही बात है।
दूरियाँ कम करूँ जा के जन से मिलूँ,
कर सकूँ गर इसे तो ये सौगात है।
बिन पेंदी के बर्तन से जल खींचना।
गाँव अंधों का हो आईना बेचना।।

सिर्फ अपने लिए क्या है जीना भला।
बस्तियों में चला मौत का सिलसिला।
दूसरे के हृदय तार को छू सकूँ,
सीख लेता सुमन काश ये भी कला।
आम को छोड़कर नीम को सींचना।
गाँव अंधों का हो आईना बेचना।। 







                     पहलू


मुस्कुरा के हाल कहता पर कहानी और है
जिन्दगी के फलसफे की तर्जुमानी और है

जिन्दगी कहते हैं बचपन से बुढ़ापे का सफर
लुत्फ तो हर दौर का है पर जवानी और है

हौसला टूटे कभी न स्वप्न भी देखो नया
जिन्दगी है इक हकीकत जिन्दगानी और है

ख्वाब से हटकर हकीकत की जमीं पर आओ भी
दर्द से जज्बात बनते फिर रवानी और है

जब सुमन को है जरूरत बागबां के प्यार की
मिल गया तो सच में उसकी मेहरबानी और है









               दीपक


जिन्दगी में इश्क का इक सिलसिला चलता रहा
लोग कहते रोग है फिर दिल में क्यों पलता रहा

आँधियाँ थीं तेज उस पर तेल भी था कम यहाँ
बन के दीपक इस जहाँ में अनवरत जलता रहा

इस तरह पानी हुआ कम दुनियाँ में, इन्सान में
दोपहर के बाद सूरज जिस तरह ढ़लता रहा

जिन्दगी घुट घुट के जीना मौत से बेहतर नहीं
जिन्दगी से मौत डरती वक्त यूँ टलता रहा

बेवफाई जिसकी फितरत वो वफा सिखलाते हैं
आजतक ऐसे जमाने को वही छलता रहा

बन गया लगभग बसूला कहते हैं अपना जिसे
दर्द अपनापन का दिल में अबतलक खलता रहा

जिन्दगी तो बस मुहब्बत और मुहब्बत जिन्दगी
तब सुमन दहशत में जीकर हाथ क्यों मलता रहा









            इंसानियत


इंसानियत ही मज़हब सबको बताते हैं
देते हैं दग़ा आकर इनायत जताते हैं

उसने जो पूछा हमसे क्या हाल चाल है
लाखों हैं बोझ ग़म के पर मुसकुराते हैं

मजबूरियों से मेरी उनकी निकल पड़ी
लेकर के कुछ न कुछ फिर रस्ता दिखाते हैं

खाकर के सूखी रोटी लहू बूँद भर बना
फिर से लहू जला के रोटी जुटाते हैं

नज़रें चुराए जाते जो दुश्वारियों के दिन
बदले हुए हालात में रिश्ते बनाते हैं

दुनिया से बेख़बर थे उसने जगा दिया
चलना जिसे सिखाया वो चलना सिखाते हैं

फितरत सुमन की देखो काँटों के बीच में
खुशियाँ भी बाँटते हैं खुशबू बढ़ाते हैं 










                खिलौना


देख के नए खिलौने, खुश हो जाता था बचपन में।
बना खिलौना आज देखिये, अपने ही जीवन में।।

चाभी से गुड़िया चलती थी, बिन चाभी अब मैं चलता।
भाव खुशी के न हो फिर भी, मुस्काकर सबको छलता।।
सभी काम का समय बँटा है, अपने खातिर समय कहाँ।
रिश्ते नाते संबंधों के, बुनते हैं नित जाल यहाँ।।
खोज रहा हूँ चेहरा अपना, जा जाकर दर्पण में।
बना खिलौना आज देखिये, अपने ही जीवन में।।

अलग थे रंग खिलौने के, पर ढंग तो निश्चित था उनका।
रंग ढंग बदला यूँ अपना, लगता है जीवन तिनका।।
मेरे होने का मतलब क्या, अबतक समझ न पाया हूँ।
रोटी से ज्यादा दुनियाँ में, ठोकर ही तो खाया हूँ।।
बिन चाहत की खड़ी हो रहीं, दीवारें आँगन में।
बना खिलौना आज देखिये, अपने ही जीवन में।।

फेंक दिया करता था बाहर, टूटे हुए खिलौने।
सक्षम हूँ पर बाहर घर के, बिखरे स्वप्न सलोने।।
अपनापन बाँटा था जैसा, वैसा ना मिल पाता है।
अब बगिया से नहीं सुमन का, बाजारों से नाता है ।।
खुशबू से ज्यादा बदबू, अब फैल रही मधुबन में।
बना खिलौना आज देखिये, अपने ही जीवन में।।

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                                                                                                                                                     कविता धरोहर
                                                                                                                                          -गजानन माधव मुक्तिबोध

        मृत्यु और कवि 


घनी रात, बादल रिमझिम हैं, दिशा मूक, निस्तब्ध वनंतर
व्यापक अंधकार में सिकुड़ी सोयी नर की बस्ती भयकर
है निस्तब्ध गगन, रोती-सी सरिता-धार चली गहराती,
जीवन-लीला को समाप्त कर मरण-सेज पर है कोई नर
बहुत संकुचित छोटा घर है, दीपालोकित फिर भी धुंधला,
वधू मूर्छिता, पिता अर्ध-मृत, दुखिता माता स्पंदन-हीन
घनी रात, बादल रिमझिम हैं, दिशा मूक, कवि का मन गीला
"ये सब क्षनिक, क्षनिक जीवन है, मानव जीवन है क्षण-भंगुर" ।

ऐसा मत कह मेरे कवि, इस क्षण संवेदन से हो आतुर
जीवन चिंतन में निर्णय पर अकस्मात मत आ, ओ निर्मल !
इस वीभत्स प्रसंग में रहो तुम अत्यंत स्वतंत्र निराकुल
भ्रष्ट ना होने दो युग-युग की सतत साधना महाआराधना
इस क्षण-भर के दुख-भार से, रहो अविचिलित, रहो अचंचल
अंतरदीपक के प्रकाश में विणत-प्रणत आत्मस्य रहो तुम
जीवन के इस गहन अटल के लिये मृत्यु का अर्थ कहो तुम ।

क्षण-भंगुरता के इस क्षण में जीवन की गति, जीवन का स्वर
दो सौ वर्ष आयु होती तो क्या अधिक सुखी होता नर?
इसी अमर धारा के आगे बहने के हित ये सब नश्वर,
सृजनशील जीवन के स्वर में गाओ मरण-गीत तुम सुंदर
तुम कवि हो, यह फैल चले मृदु गीत निर्बल मानव के घर-घर
ज्योतित हों मुख नवम आशा से, जीवन की गति, जीवन का स्वर ।









           ऐ इन्सानों


आँधी के झूले पर झूलो

आग बबूला बन कर फूलो
कुरबानी करने को झूमो
लाल सबेरे का मूँह चूमो
ऐ इन्सानों ओस न चाटो
अपने हाथों पर्वत काटो

पथ की नदियाँ खींच निकालो
जीवन पीकर प्यास बुझालो
रोटी तुमको राम न देगा
वेद तुम्हारा काम न देगा
जो रोटी का युद्ध करेगा
वह रोटी को आप वरेगा ।

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                                                                                                                                                     माह के कवि
                                                                                                                                                -बाल स्वरूप राही

एक दूरीः मेरे और तुम्हारे बीच


सांझ
ज्यों मेंहदी-रचा गोरी वधू का हाथ
काम से लौटा अभी हूँ
एक कुर्सी पर लुढ़क कर मैं तनिक सुस्ता रहा हूँ
शिथिल, संज्ञाहीन, आहत...

 
एक मक्खन-सा मुलायम हाथ
पर,
सहसा दृगों को मींच लेता है
वाम लोचन पर मृणाली अँगुलियों की छाप
दायीं पर हथेली का गरम अहसास
यह प्रणय का इंद्रधनुषी बोध
पूरी चेतना को सींच देता है।

 
हाथ यह शायद तुम्हारा है
( तुम कि जो मेरे दिवास्वप्नों
अधूरी साध का प्रतिबिम्ब हो।)

 
पर तभी मेरे-तुम्हारे बीच आ जाती
वृद्ध, जर्जर, रुग्ण भर्राई हुई आवाज
‘ आ गए बेटे ?’

...आ गए बेटे!

हाय, केवल तीन शब्दों में भरे हैं अर्थ कितने
मिल गया वेतन?
बहन की मांग का सिंदूर लाए हो ?
मेरी टूटी हुई ऐनक करा दी ठीक?
( रोशनी देखे हुए बूढ़े पिता को हो गए कै रोज़)
मां के वास्ते लाए न बैसाखी अभी तक

 

आ गए बेटे...
और भी हैं प्रश्न, अनगिन प्रश्न
जो इनसे जुड़े हैं।
उत्तर में तभी मैं डाल देता हूं
पिता की खुली मुठ्ठी में महीने की कमाई।

 
थूक सहसा इस कदर कड़वा गया
निगला नहीं जाता
तिक्तता यह फैल जाती है समूची देह में
विष-दंश-सी
और इस विष-दंश से सब स्वप्न मेरे चिटख जाते हैं।

 

 उस पराई अजनबी कोमल कलाई
( कि जो मेरी नहीं है)
चूड़ियों की खनक सहसा  लौट जाती है
किसी सरसब्ज़ वादी में
जहां जाना अभी मेरे लिए सम्भव नहीं है।










 सीखचे गुलाबों के


एक उच्छंखल विहंगम-सा हृदय देकर
नियति ने
कैद मुझको पींजरे में कैद कर दिया है।

 

मैं तड़पता-छटपटाता, सिर पटकता हूं
मगर इन सींखचों को छू नहीं सकता!

 
सींखचे ये क्योंकि लोहे से नहीं
पीले गुलाब से बने हैं
और पंखुरियां गुलाबों की बहुत सुकुमार होती हैं
आग सहना तो बहुत दूर की है बात
ये न सह सकतीं उदासी से घिरी
भीगी निगाहों का नरम आघात !

 
माथ सहलाती हुई मां की अंगुलियां
या पिता का वरद स्नेहिल हाथ
या कि तन कसती प्रिया की संदली बाहेः
लौह की जड़ श्रृंखलाओं से अदिक मजबूत होती हैं!

 
इन सभी के प्यार के प्रति?
आह
जो दायित्व मेरा है

क्या कभी उड़ने न देगा उन सुनहली चोटियों के पार
जिन को मैं
झरोखे से निरंतर झांकते बेबस निरखता हूं
एक, केवल एक क्षण की मुक्ति के हित
हाय, मैं कितना तरसता हूं!

 
क्या यही मेरी नियति है
मैं जियूंगा
किंतु जीने की समूची प्रेरणा मर जायगी
याकि यह मेरी शिखर के पार जाने की तड़प
परिवार के सब बन्धनों से
मुक्त मुझ को एक दिन कर जाएगी?

 
पर अभी तो
एक नभकामी विहंगम का हृदय रखते हुए भी
मैं गुलाबी सीखचों में कैद हूँ !









अनबरसी बदली


वह विदा-क्षणः
जब तुम्हारे लोचनों के सांवले आकाश में
एक उफनती हुई बदली घिरी।
घिर गई लेकिन बरस पाई नहीं
क्योंकि थी वह कैद सामाजिक नियमों के पाश में!

 
मात्र बिजली एक कौंधी थी तुम्हारी आंख में
यह अर्थ लेकरः
‘अब कभी मिलना न होगा।
अब कभी मिलना न होगा
मैं विवश हूं प्राण!’

 
मैं तभी से अनभिगोया वक्ष से
मरुभूमि-सा तपता रहा हूं
और मैं करता रहा हूं इंतज़ार
उस दिवस का

जब कि हर बदली दहकती आग में ढल जाएगी
और जिस में हर विवशता मोम-सी गल जाएगी!

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                                                                                                                                                कविता आज और अभी

         एक बेल


एक बेल
जो सहारे की तलाश में निकली
तुमसे  लिपटी
और तुम्हारी होके रह गई
तुम्हारी पीठ पर
 उतारे उसने
बहारों के कई रंग 
हथेलियों  में खिलाये गुलाब
उसने  उतनी ही धूप ली
जितनी  तुमने दी l
हवा की टहनी पर
उतना ही झूली 
जितना तुमने चाहा
धरा के उस छोटे टुकड़े को
घर कहती रही
जिस पर तुमने  इशारा किया
एक रोज अचानक
 गिरने लगी
कट कट के वो
पीले पड़े
अपने पत्तों को समेटती
मुरझाये फूलों की
पंखुडियां उठती
अपनी  ही लाश पर
बहुत देर रोती
घूल में समां गई 
उस रोज  तुमने उससे कहा था
"और कितनो के लिए
बहीं है ऐसे ही
भावनाए  तुम्हारी "


-रचना श्रीवास्तव









        कभी-कभी


कभी - कभी
मेरे अन्दर का कोई
कर देता है
इनकार
हर इक रिश्ते से
जो उसका है मेरे साथ ..

मै चुप
सुन लेती हूँ सब
भर जाती हूँ आत्मग्लानि से

लेकिन बाज़ नहीं आती

कभी - कभी
मै खुद
खड़ा कर देती हूँ
उस अन्दर के शख्स को
कटघरे में
और गाड़ देती हूँ
अपनी खूंखार निगाहें
उसके चेहरे पर

वो चुप
झेल जाता है सब
दब जाता है बेबसी के बोझ से ...

लेकिन साथ नहीं छोड़ता

कभी - कभी
होता हैं यूँ भी
वो हाथ थाम
बैठा लेता है मुझे
पास अपने
दिखाता है फिर
अपनी ही दुनिया की एक किताब
समझाने लगता है ...इंसानियत

मै हार जाती हूँ
उसकी अच्छाई से ..

तो कभी- कभी
मै उठ,
फेंक देती हूँ वो किताब
और त्योरियां चढ़ा
समझा देती हूँ

बकवास बंद करो !!

तुम तो किताबो मे जीते हो
मुझे दुनिया में जीना है ..


- खुशबू सिंह











"मेघ भी न बरसे ! "


सूखी चमड़ी
पास न दमड़ी
फटी धोती में 
वो कैसे महके

बच्चों की भूख जागे
वो मन ही मन रोये
घर घर भागे बासन मांजे
मैले कपडे धोये
ऊपर से गर्मी की आंच
गले में जैसे फंसी फांस
मेह भी न बरसे

महलों में पंखे ऐसी चलें
झोंपड़ी लू में जले
भात का मांड पिला
चटाई पे बच्चों को सुला
वो लेती कुछ साँस
मन आराम को तरसे

घर से दर से
पति की मार से
जैसे तैसे निभाती
वो कैसे चहके



-डॉ सरस्वती माथुर











     यह कैसी...


यह कैसी विवशता है-
किसी पर वार करो
वह हंसता रहता
या विवाद करता।
यह कैसी पराजय है-
कहीं घाव करें
रक्त नहीं
केवल मवाद बहता।

-
कुंवर नारायण














      अकेला


शोर और शराब से
डूबी इस महफिल में
लँगड़े बहरे लोग
कहकहों की बैसाखी पे
दौड़े जा रहे हैं

दोस्ती की जिस
रेशमी डोर से
उसने खुद को
इन रंग-बिरंगे लोगों को
बाँध रखा था

आज उसी में उलझकर
चारो खाने चित होकर
उसके सपनों ने
अभी-अभी यहाँ
उसी  की पथराई
आँखों के आगे
ङताश आत्महत्या
कर ली है

और

खोखले शब्दों सा रीता
एक गिलास
लुढ़कता-ढुलकता
जा पहुँचा है उसतक
मुस्कुराता
बनकर कुछ उदास-

‘ च् च्
मरगया क्या बेचारा
कितना अकेला था                                                                                                                                                                दोस्त  यह   हमारा !’


- शैल अग्रवाल














               रेत घरौंदे


वह सुनहरी सी थी
सुनहरी आज भी है
वह तपती थी
तपती आज भी है
समुंदर की इक प्यास लिए
भटकती थी
भटकती आज भी है
कभी नर्म हथेलियों से
चिपक जाती थी
कभी समय की तरह
फिसल जाती थी
फिसलती आज भी है .
आज उन फिसलते हुये लम्हों मे
तेरी याद बहुत सतायी
याद आई
रेत घरौंदों की
उन दरवाज़ों की
जो दायेरे की शक्ल लिए होते थे
उन दायरों की कोई दिशाएँ नहीं होती थीं ....
आज हर चेहरा अपनी
दिशाएँ लिए साथ चलता है
और दो अंजान मासूम हथेलियाँ
रेत घरौंदे - दायेरे से
हमें आवाज़ देती हैं .
जब जब दायरों को तोड़ोगे
नयी दिशाएँ तुम्हें आवाज़ देंगी
तब तुम मुझ से मिलने आ जाना
रेत घरौंदों मे
मासूम हथेलियाँ
इक प्यास लिए
तुम्हारे स्पर्श के इंतज़ार में हैं



-ख़ुर्शीद हयात 










    एक बड़े शहर में


एक बड़े शहर में माता-पिता और बेटे
अलग-अलग मकानों में रहते हैं
अलग-अलग होता है उनका जीवन
अलग-अलग होती हैं उनकी तकलीफें

 
वे एक दूसरे के जीवन में बहुत कम
हस्तक्षेप करते हैं
एक-दूसरे से अजनबियों की तरह
मिलते हैं
हालचाल पूछकर अलग हो जाते हैं

बेटे नहीं पिता जरूर सोचते हैं
काश वे बेटे के साथ रहते तो
थोड़ी हो जाती सहूलियत

 
एक ही शहर में रहते हुए माता-पिता
बूढ़े होते रहते हैं
और याद करते रहते हैं कि उन्होंने
पैदा किया था एक बेटा

जो सुख क्या दुख भी नहीं
देता है उन्हें।




-स्वप्निल श्रीवास्तव









         ज़िन्दगी


ज़िन्दगी तुझे क्या नाम दूँ।
जानी पहचानी है तू
फिर भी अन्जान है तू।

आज शिशु है उगता सूरज है।
कल यौवन की धूप है।
जब शाम ढलने लगी,
गोधूलि तू।

शाम नीली है ,सलोनी है।
रात के प्रहर मे भी अलबेली है।
एक अनबूझी पहेली है तू,
खुली किताब भी है तू।

तू वीरान सपाट है कभी,
कभी चुलबुली सहेली है।
कभी काँटे हैं पथरीली है तू,
कभी चम्पा ,चमेली है तू।

तू शांत सागर है,
गंभीर भी है,
आँधी तूफ़ान भी है
बड़ी मनचली है तू।

मेरा तुझसे नाता कया है,
कब साथ छोड़ दे,
किसकी हुई है तू,
फिर भी जब तक साथ है,

मेरी है मेरी अपनी है
मेरी पहचान है तू,
मेरी सहेली है तू।


-बीनू भटनागर










न वो शहर रहा, न वो घर रहा


ये कैसी बेबसी?
इस घर को किसकी नजर लगी?

थी सांस मेरी जहां बसी
अब उसमें घुटता है दम मेरा
उस घर में कैद हूं क्यूं भला?
इस बात ना ही पता चला।

कहने को घर मेरा अपना है
सच कहूँ ये खालिस
न वो शहर रहा, न वो घर रहा

न वो शहर रहा न वो दर रहा
न वो लोग हैं न वो घर रहा
मेरा घर कहीं इस शहर में था
वो मकां में कैसे बदल गया?

जिस घर में बसती थी जिन्दगी
जहां अपने पन की बयार थी,
उस घर में केसा सपना है
जहां लोग टुकड़ों  में जीते हैं
क्या उसी को घर कहा करते हैं?

इस शहर की ये कैसी रीत है
न तो प्रेम है ना ही प्रीत है,
रिश्तों की सूखी सी बेल है
इन्हें झेलना कोई खेल है?

है लगती बोझ सी जिन्दगी
अब सहा न जाए ये बेकसी
रह-रह करके सालता दर्द है
क्या ये कैसा ये मर्ज है।।
दिनेश ध्यानी


 






      बाज़ार में गुड़िया


अब वह प्रश्न नहीं पूछती
राजकुमारी...
चुपचाप
कभी अपनी गुडि या की ओर देखती है
और कभी
देखती है अपने पिता की
सूनी आँखों में
झाँकता हुआ
वही प्रश्न

 
कल की ही तो बात है
- कल करेंगे गुडि या का ब्याह
ठुमकती हुई कहती थी रज्जो।

 
- कल नहीं...
कभी कहतीं दादी
- कल तो कथा होगी।

या कभी
फिर किसी दिन
- कोई अच्छा-सा गुड्‌डा तो ढूँढ ले!
या... क्या योंही विदा कर देगी
किसी नंगे-भूखे के साथ!

 
और माँ समझातीं
- पहले कपड़े बनवा ले
गुडिया के
कुछ गहने जोड  ले।

 
रज्जो कभी समझ पाती
और कभी
रोकर...
या मन मसोस कर रह जाती।

 
और टलता जाता
इस तरह
गुडिया के ब्याह का दिन।

 
मचलती थी रज्जो
कभी झगड ती और झुँझलाती भी

 किन्तु...
कभी पिता की बीमारी
कभी मेहमान
कभी गठिया दादी का                                                                                                                                                                         तो कभी भैया का एक्सिडेन्ट;
कभी परीक्षा
तो कभी मरम्मत घर की।

इस सब के बीच
चलता रहता था सभी कुछ
सोना और खाना
पिता का दफ्तर जाना
और उसका स्कूल...

बात बस एक ही थी
जिसके लिए
निकलती नहीं थी कोई राह
और टलता रह जाता था
उसकी गुडिया का ब्याह।

 


बस गुडिया ही थी
जो कभी कुछ नहीं कहती थी
और रज्जो चुपचाप
उसका भी दुख सहती थी।

 
अब... बडी हो गई है रज्जो
पूछती नहीं
देखती है बस, चुपचाप...
बाजार में, कभी
दुकानों पर सजी गुडियाँ देख
घबरा उठती है।

 
मन होता है उसका
कि कहे चिल्लाकर .
अब कहीं...
कोई भी, नई गुडिया न बनाए

जब तक
ब्याह न हो जाए हर गुडिया का...
जब तक बाजार में बिकने के लिए
 एक भी गुडिया जाए।


- सीतेश आलोक











 तुम्हीं कहो..


मैं कठ्पुतली सी
अब ना नाचूँगी
सम्मोहित हो
इर्द गिर्द तेरे
मैने अब जीना
सीख लिया है
मैं ना बोलूँगी
बेमाने से बोल तेरे
मैं अब अपनाउँगी
राह वही जो
होगी न्याय संगत
ना झेलूँगी अन्याय तेरे
मुझे पता है
मेरी सीमाऐं
ना लांघूँगी उन्हें कभी
हाँ साथ चलूँगी तेरे
ना अनभिज्ञ रहूंगी जग से
मैं पढ़ लिख कर
इन्सान बनूँगी
आकाश की उँचाईयों से
पँख ज्ञान के लिए हैं मैंने
सँस्कार से रंग लिए
सभ्यता यही सिखाती है
गरिमा में रह कर
सारी दुनिया देखूँगी
कुरीतियों का
बहिष्कार कर
भ्रष्टाचार से लड़
जाने को तैयार रहूँगी
तुम्हीं कहो फिर कैसे
मै नारी, अबला
अब कहलाउँगी ?



 --रेनू चन्द्रा









मूक प्रेम 


मौन शब्दों की बैसाखी पर टंगा तुम्हारा प्रेम ,

कब तक रख पायेगा अपना अस्तित्व?
तोड़ दो यह मौन, तोड़ दो यह बंधन,
आज चाँद को भी होने दो यह एहसास ,
कि सागर में उठा ज्वार,

केवल उसके लिए नहीं है.
आज चन्द्रिका को भी होने दो एहसास .
कि सागर की उछलती  लहरें ,
केवल उसे ही छूने की कोशिश नहीं करती .
सागर में उठा यह तूफ़ान,
लहरों का उठना, उठ कर गिर जाना ,
चाँद और चन्द्रिका को छू पाने की
यह नाकाम कोशिश, और कुछ नहीं,
केवल मेरे और तुम्हारे बीच की भावनाएँ हैं 
जो एक दूसरे तक पहुँचने की कोशिश में ,
भटक रही हैं एक दूसरे के आस-पास .
तोड़ दो ये मौन,तोड़ दो यह बंधन ,
इन भावनाओं को भी होने दो एहसास 
कि तुम्हारा प्रेम केवल मेरा ही है.
और किसी का नहीं,
मौन शब्दों की बैसाखी पर टंगा तुम्हारा प्रेम 
तब ही रख पायेगा अपना अस्तित्व.

-शील निगम 











          कसौटी


जबतक आप कविता लिखते रहते हैं
न जाने आपने ध्यान दिया है कि नहीं-
फन फैलाए सांप घूमता ही रहता है आसपास
फुंफकारते हुए
सृजन के क्षणों को डसने की
जन्म लेते ही अक्षर को मारने की
भरसक कोशिश करते हुए

 कागजों को एक तरफ रखकर सो गए तो
सपनों की बांबी में घुसकर
कल्पना में ही सृजन के क्षणों को खतम करने का
प्रयत्न करता है वह

क्या कविता सेवा करती है?
इन्सान को जोड़ती है?
रचना क्या सचमुच बदल सकती है समय को?
डराने के लिए या प्रतिकार के लिए

क्या पास ही बैठा है सांप?

*

कैद की सलाखों के पीछे सृजन का क्षण
आपातकाल में मुँह खोलने वाली जेलों में
आवाज उठाने वाला सृजन का झण
लाठियों और गोलियों का

सीना तानकर सामना करने वाला सृजन का क्षण...

जब टूटने लगता है इंसान
रंग बदलने लगता है मज़हब
सलीब पर जब आंसू बहाने लगता है समय

तब

शब्दों की कसौटी में बदलता है सृजन का क्षण
इसी लिए यह फुफकार-
उससे डरने वाले सृजन के क्षण
सुरक्षित हैं समय की नली में।

वाक्य के बाद दूसरा वाक्य बनकर
इंसान की बगल में इंसान की तरह
हौसला बढ़ाने वाले सृजन क्षण ही हैं

सच्चा इतिहास
सच्ची कविता!


  - कवि याकूब 

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                                                                                                                                            कविता में इन दिनोः भगवत रावत


                                                                                                                                                                      - डॉ. ओम निश्चल

(पिछले दिनों हिंदी कविता के वरिष्‍ठ कवि भगवत रावत नहीं रहे। अनेक कविता संग्रहों और एकाधिक आलोचनात्‍मक कृतियों के बलबूते उन्‍होंने हिंदी कविता में एक मुकम्‍मल जगह बनाई है। उनसे मिलना किसी बहुत अपने से मिलने-जैसा था। वे कवियों-लेखकों से मिल कर प्रसन्‍न होने वाले कवियों में थे। आप उनके घर जाऍं तो वे शाम होते ही पास पड़ोस के साहित्‍यिकों से मिलवाने के लिए उद्यत हो उठते। ऐसी एकाधिक शामों का मैं मुरीद हूँ जब भोपाल में उनके साथ राजेश जोशी, राजेन्‍द्र शर्मा और कमला प्रसाद आदि लेखकों से मुलाकात हो सकी। ‘कविता में इन दिनों’ के तहत नंद किशोर आचार्य, अरुण कमल, वर्तिका नंदा के बाद इस बार भगवत रावत के कविता संसार पर एक नजर।)

अमल धवल भाषा से अलग :

एक कवि की दी हुई दुनिया

भगवत रावत हिंदी के उन कवियों में हैं जिन्‍होंने भाषा को कभी कविता का कारागार नहीं बनने दिया। बोलचाल की आमफहम भाषा में उन्‍होंने कविताऍं लिखी हैं। लेकिन उनकी कविता को भाषा के सरलीकरणों के आधार पर नहीं देखा जा सकता। वे बड़ी से बड़ी बात सीधे-सादे शब्‍दों में कह देने में महारत रखते हैं। भगवत रावत जी से उनके घर पर एकाधिक मुलाकातें हैं, आमने-सामने की मुख्‍तसर बातचीत भी और अचरज यह कि मिलने पर यह पता नहीं लगता कि हम हिंदी के एक दिग्‍गज कवि से मुखातिब हैं। अपनी कविताई को एकदम परे रखते हुए वे सदैव सहजता से मिलते । यहॉं तक कि यह शिकायत भी नहीं कि हिंदी समाज ने उनकी कविताओं को ठीक से नहीं समझा। उनके समवयस् या उनसे कम उम्र के तमाम लोगों को जिस तरह से पुरस्‍कृत-सम्‍मानित किया गया, उसकी अपेक्षा उन्‍हें बेशक कम महत्‍व के पुरस्‍कार मिले पर इसका भी उन्‍हें कोई मलाल न रहा। लिहाजा बारह कविता संग्रहों के प्रशस्‍त काव्‍यलोक के बावजूद वे एक सामान्‍य कवि बने रहे। पर कविता का जनता से जो रिश्‍ता होता है, जनचित्‍त से जो रिश्‍ता होता है, हृदय से जो रिश्‍ता होता है, इस मामले में वे अपने समकालीनों से कहीं ज्‍यादा निकट थे। अकारण नहीं कि विष्‍णु खरे का भी यह मानना है कि भगवत रावत से यह सीखा जा सकता है कि एक सादा, रोजमर्रा हिंदुस्‍तानी जुबान और अनलंकृत शैली में प्रभावी कविता कैसी लिखी जाए।




समुद्र के बारे में, दी हुई दुनिया, हुआ कुछ इस तरह, सुनो हिरामन, अथ रूपकुमार कथा, सच पूछो तो, बिथाकथा, ऐसी कैसी नींद, कहते हैं दिल्‍ली की है कुछ आबोहवा और, अम्‍मा से बातें और कुछ लंबी कविताऍं, और देश एक राग है जैसे कविता संग्रहों और निर्वाचित कविताऍं, हमने उनके घर देखेकवि ने कहा जैसे कविता चयन के कवि भगवत रावत ने कविता में एक लंबी यात्रा तय की है और यह सिद्ध किया है कि आभरणों और अलंकरणों से छिटकी हुई सीधी सादी भाषा में भी जीवन की बड़ी से बड़ी बात की जा सकती है। और उन्‍होंने यही किया है। ‘समुद्र के बारे में’ से आरंभ कविता यात्रा का आखिरी पड़ाव ‘देश एक राग है’ था। उससे पहले ‘अम्‍मा से बातें और कुछ लंबी कविताऍं’ के जरिए उन्‍होंने अपनी लंबी कविता में अपनी गहरी मौजूदगी दर्ज की। इन कविताओं में प्‍यारेलाल के लिए विदागीत, सुनो हिरामन, अथ रूपकुमार कथा, कचरा बीनने वाली लड़कियॉं, बेतवा, अम्‍मा से बातें, जो भी पढ़ रहा है या सुन रहा है इस समय, नकद उधार और कहते हैं कि दिल्‍ली की है कुछ आबोहवा और---प्रमुख हैं। दिल्‍ली पर लिखी कविता नया ज्ञानोदय में छपी और खासा चर्चित हुई । दिल्‍ली की बेदिली के अनेक किस्‍से हैं किन्‍तु भगवत रावत ने उसे देश-काल के व्‍यापक संदर्भ में देखा-परखा है।




भगवत रावत टीकमगढ़ के रहने वाले थे सो उनका तन - मन बुंदेलखंडी था। बुंदेली भाषा की काव्‍य परंपरा से उनका जन्‍मजात रिश्‍ता रहा है। इसलिए उस विरासत से उन्‍होंने बहुत कुछ लेकर अपनी भाषा को समृद्ध किया। यही वजह है कि उनकी भाषा में वैसी ही देशज लोच है जो उनकी खड़ी बोली को एक नरम छुवन देती है। बेतवा के जल को स्‍पर्श कर उन्‍हें पुरखों की याद हो आती है। जिन्‍हें कवि ने बचपन में नहीं देखा, उन मॉं-पिता के स्‍पर्श को वह बेतवा के इसी जल को छूकर महसूस कर लेता है। बुंदेलखंड की गरीबी, पिछड़ेपन के बीच यह जो अप्रतिहत और स्‍नेही मन है जो प्राय: समूचे बुंदेलखंड के किसानों-मजदूरों का है, उसकी झीनी-झीनी छवि भगवत रावत के यहॉं मिल जाती है। हॉं, बुंदेलखंड की प्रशस्‍त जीवन-छवि देखनी हो तो केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं में सुलभ है। पर कविताई का गहरा रंग भगवत रावत में उनसे ज्‍यादा है। बुंदेलखंडी अस्‍मिता को गहराई से महसूस करते हुए भी उन्‍होंने न तो अपनी कविताओं को आंचलिक बनाने की कोशिश की और न ही ‘लोक’ की वैसी लकीर पीटी जैसी खड़ी बोली में एक ‘कृत्रिम लोक’ रचने की कोशिश होती रही है। कहते हैं कविता ही कवि की आत्‍मकथा है। उसके पाठ में ही कहीं न कहीं उसका आत्‍मचरित व्‍यक्‍त होता है। ऐसी ही एक कविता है: ‘जो भी पढ़ रहा है या सुन रहा है इस समय’ । इस कविता में एक जगह कवि अपने बचपन के दोस्‍त रामचरन को याद करता है, अपनी एक जंगल में रहने वाली भूरे रंग की भाभी को याद करता है, जिसकी गोद में उसके बचपन का एक हिस्‍सा बीता था। विरल साहचर्य की दास्‍तान समेटे इस कविता में अंतत: यह खुलासा भी है कि वह कवि तो है पर अपने हर श्‍ाब्‍द को मंत्र में नहीं बदल सकता। वह तो बस इतना चाहता है कि एक दिन ऐसा आए कि दोस्‍त रामचरन और उसकी भूरी भाभी का ताम्‍बई चेहरे के पीछे छिपा चेहरा वापस मिल जाए। पर ’बेतवा’ का यह लाड़ला कवि कहना चाहते हुए भी कविताओं में कितना कम कह पाता है। किसी दर्पस्‍फीत भाव से परे किन्‍तु दिल की गहराइयों से उसका यह कहना कितना छू जाता है हम सबको कि:

कितना कठिन था फिर लौटना वहॉं से

कविता में कह पाना कब रहा आसान

कविता की अपनी निजता होती है लेकिन जीवन की

ऐसी निजताओं के लिए उसमें

जगह हमेशा कुछ कम पड़ जाती है

(बेतवा/ अम्‍मा से बातें)




कविताओं से हट कर सीधा आदमी पर आना चाहता हूँ ‘----‘समुद्र के बारे में’ में संकलित इस कविता के जरिए उन्‍होंने अपनी जिस चाहत का इजहार किया था, उस कौल पर वे आद्यंत कायम रहे। वे इस बात के लिए विकल रहे कि उनकी कविता चोट खाए हुए लोगों के लिए मरहम का काम करे, उनकी कविता सुनकर राह चलता हुआ आदमी भी यह कहने को विवश हो जाए कि यह किसी सच्‍चे आदमी की आवाज़ है। वे चाहते थे कि हारे हुए आदमी की तरह उन्‍हें यह दुनिया न छोड़नी पड़े। वे मर्मस्‍पर्शिता को कविता का एक अचूक गुण मानते आए हैं। ‘कवि ने कहा’ की भूमिका में उन्‍होंने इसकी तसदीक की है: ‘’जो कविताऍं पाठकों के जीवन के अनुभवों का मर्मस्‍पर्शी हिस्‍सा नही बन पातीं, वे सच पूछो तो कविता कहलाने का हक नहीं रखतीं, ज्‍यादा से ज्‍यादा वे काव्‍याभ्‍यास हो सकती हैं।‘’ ‘दी हुई दुनिया’ में उनकी एक कविता है: ‘चिड़ियों को पता नहीं।‘ यह उस दौर की कविता में चिड़ियों की आवाजाही के तमाम रूपकों, बिम्‍बों के निषेध में लिखी गयी कविता है जो यह मानती है कि चिड़ियों की वास्‍तविक जगह कविता नही, पेड़ और घर ऑंगन है। वे कविताओं में भले न सही, पेड़ से उतर कर दो चार बार घर जरूर आ जाया करें।




‘हमने उनके घर देखे/ घर के भीतर घर देखे/ घर के भी तलघर देखे/ हमने उनके डर देखे।---‘सच पूछो तो’ संग्रह की यह कविता इस बात की ओर इंगित करती है कि भगवत रावत के प्रेक्षण कितने लक्ष्‍यवेधी हैं। उनकी व्‍यंजनाऍं कितनी सटीक हैं। कुछ ऐसा ही विट उनकी कविता: ‘समूह गीत’ में मिलता है जो ‘हुआ कुछ इस तरह’ में संग्रहीत है। इसी कविता का एक अंश है: ‘’हमने देखी पीर पराई/ हमने देखी फटी बिवाई/ हमने सब कुछ रखा ताक पर/ हमने ली लंबी जमुहाई/ हमने घोखा ज्ञान पुराना/ अपने मन का कहना माना/ पहले अपनी जेब सँभाली/ फिर दी सारे जग को गाली।‘’ मनुष्‍य की मनोवृत्‍ति पर यह एक कवि का अवलोकन है। सूक्ष्‍म अवलोकन। दुनिया के दुखों से ऑंख मूँदे इस जगत में कवि की ऑंखें हमेशा खुली होती हैं, उसका हृदय विशाल होता है। वही है जो दुखों के रसायन से विचलित होता है। कवि दृष्‍टि वह है जो थके हुए की थकान पहचान ले, सूनेपन में मन के भीतर के सन्‍नाटे को परख ले। ‘थक चुकी है वह’--ऐसी ही कविता है जो एक स्‍त्री या कह लें अपनी ही पत्‍नी की थकान, उसकी अथक दिनचर्या के बारे में है। दाम्‍पत्‍य की अनुरागमयी संवेदना इस कविता में है। अपनी ही पत्‍नी को अथक कामकाज में डूबे हुए देख उसे एक दिन घुमाने ले जाने की इच्‍छा का इज़हार कितना सहज और अनायास है। मुझे याद है वे एक उपजीव्‍य कवि भी हैं। अपने समकालीनों को कविता की खुराक देने वाले। तभी तो उनकी कविता : बच्‍चे काम पर जा रहे हैं---कालांतर में एक युवा कवि के काम आती है। इसी शीर्षक से उसकी वह कविता हिंदी साहित्‍य संसार में सुपरिचित कविता बन जाती है। पर कम लोग जानते हैं कि उस कविता की बुनावट में इस कविता का एक बड़ा हाथ है। ऐसी और भी कविताऍं हैं जो अपने बेहतरीन शिल्‍प में उनके अन्‍य समकालीनों में देखी जा सकती हैं। कविता क्‍या होती है यह समझाना हो तो उनकी एक कविता सहसा ध्‍यान में आती है: ‘बिटिया’। कविता देखें:

लगभग चार बरस की बिटिया ने

माँ से हाथ फैलाते हुए कहा

दीदी की किताब में

इत्‍ता बड़ा समुद्र है !

मां ने आश्‍चर्य जताते हुए कहा

अच्‍छा !

हॉं, बिटिया ने कहा

देखो मैंने उसमें उँगली डाली

तो भीग गई। (दी हुई दुनिया)




भगवत जी तिहत्‍तर की वय में दुनिया से विदा हुए । पर जैसे वे इस विदा की तैयारी से बहुत पहले से कर रहे हों।‘हाथ बढ़ाओ’--में उन्‍होंने लिखा कि ‘हाथ बढ़ाओ और विदा दो/ देखो मेरे जाने का वक्‍त हो गया है। ....खुद भी चल देना चाहता हूँ/ झटक कर सब कुछ/ इसलिए नहीं कि किस तरह एक झटके में/ आदमी चला जाता है दूर/ एक दुनिया से निकल कर दूसरी दुनिया में/ बल्‍कि इसलिए हाथ बढ़ाओ और विदा दो/ताकि वापस आ सकूँ।‘ (दी हुई दुनिया) फिर फिर धरती पर लौट आने का विश्‍वास उनमें कूट कूट कर भरा था। ‘एक बार फिर आऊँगा’ कविता में वे इस बात की तस्‍दीक करते हैं:--




एक बार फिर आऊँगा

आऊँगा और फिर से आग के

गोल गोल घेरे से होकर निकलूँगा

और अबकी बार तो

आग की दरिया के पार

तैर कर दिखाऊँगा।

(ऐसी कैसी नींद)




यह पुनर्जन्‍म में आस्‍था के कारण नहीं, कविता के प्रति गहरी आस्‍था के कारण है। कविता में लौट कर आने का भरोसा वे बार बार जताते हैं। ‘ऐसी कैसी नींद’ में उन्‍होंने ऐसी कविताऍं लिखीं हैं जो उनके सांसारिक मन की देदीप्‍यमान आभा को प्रतिबिम्‍बित करती हैं। इस संग्रह में अवसान और मृत्‍यु पर कविताऍं हैं। ‘इतनी बड़ी मृत्‍यु’ एक अलग ढंग की कविता है जिसमें उन्‍हें हर एक ऐसे जाता हुआ दिखता है जैसे पकड़नी हो उसे चुपके से कोई ट्रेन। वे लिखते हैं: ‘इतनी बड़ी मृत्‍यु/कोई रोता नहीं दिख रहा/ कोई किसीके साथ होता नहीं दिख रहा/ कोई किसी को बतला नहीं पा रहा/ वह कहॉं जा रहा है।‘ (ऐसी कोई नींद) यह नींद कोई सामान्‍य नींद नहीं है। ‘ऐसी कैसी नींद’ का आखिरी पद इस बात की गवाही है कि जिसे आप सबसे ज्‍यादा जानने का दावा करते हैं, उस दावे की पोल अंत में खुलती है कि हमने उसे कितना कम जाना। यह वह रचा और सिरजा हुआ संसार है जिसमें कवि की अपनी भागीदारी है। पर वह देख कर अचरच करता है कि क्‍या यह वही दुनिया है जैसी उसने बनायी थी। या यह ‘दी हुई दुनिया’ है जिसमें सब कुछ अनजाना-सा है। कवि एक मासूम सवाल इस कविता में फेंकता है--- जाहिर है किसी उत्‍तर के लिए नहीं, न किसी दिलासा के लिए बल्‍कि यह जतलाने के लिए कि यह दुनिया जैसी दिखती है,वैसी है नहीं और जैसी है, वैसी दिखती नहीं। कविता का आखिरी हिस्‍सा:

किंतु मृत्‍यु का भय मेरा भय नहीं क्‍योंकि वह परम सत्‍य है

मैं तो जग के इस विराट् में अपनी दुनिया खोज रहा हूँ

जिसे रचा था मैंने अपने ही हाथो से

कौन चुराकर उसे ले गया

ऐसी कैसी नींद लग गई !




ऐसा नहीं कि यह भगवत जी की कविता में औचक कोई सूफियाना रंग उभर आया है। वे जगत की रीति से वाकिफ हैं और जब जब भीतर झाँकते हैं, ऐसे सवाल उन्‍हें विकल कर देते हैं। भगवत रावत ने अलग अलग तेवर की कविताऍं भी लिखी हैं। जीवन के क्रिया व्‍यापारों को अनेक कविताओं में निकट से लक्ष्‍य किया है। ‘मेरा चेहरा’ ऐसी ही एक अलग तरह की कविता है। कोई शख्‍स कवि के बगल पान की पीक थूक कर चला गया है, इस दृश्‍य की पृष्‍ठभूमि में उतरते हुए वे उस पूरे मनोविज्ञान को विश्‍लेषित करते हैं जिसकी वजह से एक काला कलूटा आदमी पान की दूकान में घुस कर सबसे पहले पान लगवा लेना चाहता है। पास की झुग्‍गी झोपड़ियों के लोगों की परवाह न करता हुआ जो स्‍वयं शायद उसके इस मिजाज से वाकिफ और अविचलित हैं। बस एक कवि है जो उसकी हड़बड़ी भॉंप कर अलग छिटक कर खड़ा हो जाता है । वह शख्‍स थोड़ी देर बाद कवि को देखता है और बगल में पीक थूक कर चला जाता है। कवि के लेखे: ‘उसने मेरे हटने को लक्ष्‍य कर लिया था/ और यह शायद उसका सबसे बड़ा अपमान था।‘ यह एक बहुत की सामान्‍य सा उदाहरण है कस्‍बाई चरित्रों का फिर भी इस घटना के उल्‍लेख में एक कवित्‍व है। यह पान की पीक के बहाने एक विचार का उद्गम है। ऐसे सामान्‍य क्रिया कलापों की नोटिस भी कविता का विषय हो सकती है,यह देखने योग्‍य है। ‘ऐसी कैसी नींद’ खुद में एक मार्मिक कविता है। कवि को यह मलाल है कि उसे जो चाहिए था, उसकी खोज में जैसे यह पूरा जीवन बीत गया, पर वह चीज हासिल न हुई। एक ऐसे खालीपन को वह निरंतर महसूस करता है, जिसके लिए उसमें अनवरत उद्विग्नता बनी रही है। ‘बस उसी को समझा नहीं पाया’---कविता इसी अप्राप्‍ति का इजहार है: ‘’बस उसी को समझा नही पाया/ जिसे समझाने में बिता दी उम्र। .....बस एक वही नहीं था/ जिसे होना था जीवन में/ कम से कम एक बार।‘’ और जब ऐसा अवसर आया कि जीवन में अभाप्‍सित संग साथ मिला तो कवि ऐसे प्रत्‍युत्‍तर की खोज में है कि ‘धन्‍यवाद’ इस तरह अदा किया जाए कि वह ‘धन्‍यवाद’ जैसा न लगे। रिश्‍तों के निभाव की कवि की निष्ठा की यह पराकाष्‍ठा है। उसी के शब्‍दों में:




रहे वे लोग, जिनके बीच गुजारी उम्र तो अब उनके साथ को

किस भाषा में कहूँ जिससे सचमुच निकले---

यह अर्थ कि उनके बिना जीवन संभव कहॉं था

उनके बिना मिलते कैसे जीवन के इतने स्‍वाद

किस तरह उन्‍हें दूँ धन्यवाद कि वह

सिर्फ धन्‍यवाद जैसा न लगे।

(ऐसी कैसी नींद)




रिश्‍ते नातों की कद्र वे इतनी करते थे कि शायद कवियों में ऐसा हितैषी और कोई न हो। ‘बहिनें’ कविता में उनका यह दुख प्रकट होता है कि वे लगातार कम होती जा रही हैं। सहोदरा बहनें तो और भी लगातार कम हो रही हैं। उन्‍हें भय है कि एक दिन वे किसी लोकधुन में ही छिप कर न रह जाऍं। उन्‍हीं की शब्‍दावली में देखें यह दुश्‍चिंता:




अब कोई किसी स्‍त्री को बहिन कहना नही चाहता

एक दिन खोजने पर भी वे नहीं मिलेंगी

तब बहिनों के बिना दुनिया कैसे लगेगी।

कहॉं बिला गई वे सारी की सारी मुँहबोली बहिनें

जो बैठी रहती थीं इंतजार में

कि कोई आए न आए

भाई तो जरूर भागता हुआ आएगा

(रचनाक्रम, जनवरी-जून, 2010)




बाजारवाद के अहर्निश शोरोगुल में भगवत रावत को इस बात का इत्‍मिनान है कि बाजारवाद के जमाने में भी ऐसे लोग होंगे जिन्‍हें खरीदा या बेचा नही जा सकता। शायद धर्मवीर भारती की कविता का अंश है कि ‘कह दो जो खरीदने आए हैं उन्‍हें/ हर भूखा आदमी बिकाऊ नहीं होता।‘ भगवत रावत इस कौल के मुरीद हैं। ‘ऐसी कैसी नींद’ में उनका यह कहना मानीखेज़ है कि:


एक दिन बाज़ार में बेचने वाले ही बचेंगे
कोई खरीदने वाला नहीं होगा
तब जो बेचा या खरीदा नहीं जा सकेगा
वही होगा अर्थवान
जो पड़ा रहा किसी धागे के टुकड़े सा
किसी कोने में चुपचाप
वही उठेगा और दुनिया की फटी चादर सिलेगा
(मानो या न मानो, पृष्ठ 94)







अब तक हिंदी कविता में भगवत रावत को जो लोग हाशिए पर रखते आए हैं, जिन्हें उनकी कविता निस्तेज नज़र आती रही है, उन्हें उनका संग्रह ‘ऐसी कैसी नींद’ अवश्य पढ़ना चाहिए। कौन नहीं जानता कि उनकी अनेक कविताओं ने आज के जाने-पहचाने कवियों की कविताओं के लिए नींव का काम किया है। एक ऐसा उर्वरक उनकी कविताओं में हमेशा से विद्यमान रहा है जिसके संसर्ग से उनके समकालीनों ने कविता की उन्नत फसल काटी है। किन्तु भगवत रावत की लेखनी बिना किसी रचनात्मक अफसोस के उन विषयों, सरोकारों को भी अपने कविता केंद्र में शामिल करती आई है जो ऊपरी तौर पर प्रगतिशील मूल्य-मानकों से दूर जा छिटके हैं। यह निर्भयता और अटूट भारतीयता से भरी उनकी सहृदयता न हो तो वे ‘गाय’ जैसी सांप्रदायिक समझ लिए जाने की संभावना से भरी प्राणि प्रजाति पर कविता नहीं लिखते और यह भावविह्वल अफसोस न व्यक्त करते-‘’गाएँ हमारे जीवन से क्या गयीं/ घरेलू सुंदरता आँखों का अपनापन/ अकिचनता के ऐश्वर्य का विश्वास और धीरज/ जीवन से चला गया।‘’ यह महज संयोग नहीं है कि भगवत की अभीप्सा कविता के गहरे कूप में झिलमिलाते मूल्यवान अर्थ की खोज है-एक ऐसी प्यास-एक ऐसी जिजीविषा है जिसमें मरने का भय नहीं है, केवल उस अदम्य आकांक्षा को पा लेने की विकलता है, जिसमें अर्थ के स्वातिजल की एक बूँद ही उसे तृप्त कर देने के लिए काफी है। क्योंकि अब तक के जिए जीवन के छंद में उसे तुकें तो मिलीं पर अर्थ की तृप्ति नहीं--



मृत्यु के पास कहीं कोई आकर्षण नहीं
हवा का काई झोंका, कोई बारिश की बूँद नहीं
रंग नहीं, रूप नहीं, धरती आकाश नहीं,
लेकिन एक बार अर्थ के स्वाति जल की
एक बूँद मिल जाती
तो इसके बाद मृत्यु से नहीं डरता
( आत्मा का गीत, पृष्ठ 10)

भगवत की कविता बिम्बों और प्रतीकों के सघन समुच्चय से परे सहज वाक्य विन्यास की कविता है। इस दृष्टि से उनके बारे में नरेश सक्सेना का कथन वाकई सटीक जान पड़ा है कि भगवत रावत की सबसे बड़ी उपलब्धि और शक्ति वह सहजता है जो अपनी भाषा के सबसे सरल वाक्यों से भी अपने समय के सबसे कठिन और गहरे आशयों को अभिव्यक्त कर दिखाती है। रघुवीर सहाय की तरह भगवत रावत भी समूचे वाक्यों के कवि हैं-कभी बतकही, कभी स्वगत चिंतन, कभी एकालाप- हालाँकि वह विकलता और उद्विग्न कर देने वाली चेतना जो रघुवीर सहाय में है, वैसी चेतना भगवत जी के यहॉ प्रायः नहीं है तो भी कविता में सभी तरह की प्रविधियॉ भगवत जी ने इस्तेमाल की हैं। ऐसी कैसी नींद जिस शीर्षक से उन्होंने अपनी कविताओं का नामकरण किया है, वह इस क्षोभ से भरा है कि यह दुनिया जैसी कवि ने चाही थी, वैसी नहीं रही। आँगन से छायादार पेड़ के कटने-सी पीड़ा कवि के हृदय को बींधती है, जिन जिन चीजों, वस्तुओं, व्यक्तियों से कवि का हृदयछंद मिलता था-जिसे रचा था कवि ने अपने ही हाथो, कोई उसे चुरा कर ले गया है। कवि अचरज करता है ‘ऐसी कैसी नींद लग गई।‘ !


भगवत की सादगी, सरलता और सहजता को विष्णु खरे,कमला प्रसाद और नरेश सक्सेना लगभग सभी ने लोकेट किया है किन्तु क्या यह सादगी त्रिलोचन या रामदरश मिश्र जैसी है या यह किसी निरे नैरेटिव के स्‍थापत्‍य में है या विमुग्ध कर देने वाले पदों प्रत्ययों के अभाव से लैस। जाहिर है कि भगवत रावत की सादगी-पारदर्शिता का एक अलग चेहरा है-वह विशुद्घ कलावादी झटके देने वाली रीति से अलग, कहें कि शुद्घ कविता की प्रतिष्ठा को भी तनिक क्षति पहुँचाने वाला अपनी राह खोजने वाला चेहरा है जो पूर्णतावादी किस्म के सधे-सँवरे जीवन से अलग लगता है। यही वजह है कि ‘हुआ कुछ इस तरह’ में भगवत रावत को यह लिखना पड़ा----‘’सब कुछ भला भला/ सब तरफ उजियाला/ कहीं न कोर कसर/ सब कुछ आला आला/ सब कुछ सुथरा साफ/सभी कुछ सजा सजा/ बोली बानी मोहक / अक्षर अक्षर सधा सधा/ सब कुछ सोचा समझा सब पहले से तय/ ऐसे घर में/ जाने क्यों लगता है भय।‘’ सच कहें तो उनकी कविता के स्वभाव का यह सबसे सटीक आकलन है। जिन्हें भगवत के नैरेटिव में कविता की मौजूदगी विरल दिखायी देती है, उनके लिए भगवत जी के यहाँ छोटी किन्तु प्रखर कविताएँ भी हैं। ‘हमने उनके घर देखे/ घर के भीतर घर देखे/ घर के भी तलघर देखे/ हमने उनके डर देखे’--- छोटी होकर भी अपनी भावात्‍मक वेध्यता में अचूक है।

भगवत रावत अक्सर सामान्य जन-जीवन में कौंधती वे प्रवृत्तियाँ, विलक्षणताएँ अपनी कविता के लिए चुनते हैं जो साधारण होकर भी असाधारण हैं। याद आती हैं अब्दुल बिस्मिल्लाह की पंक्तियाँ –‘’मैं जब उस्तरे की धार पर मुसलमान बनाया गया था/ तब मैं केवल चार बरस का था।‘’ इसी तापमान पर भगवत जी का यह सोचना कि ‘’मैं मुसलमान नहीं हूँ/ इन दिनों खुश होने के लिए / यह क्या कोई कम बात है’’--- बीते हुए समय की सांप्रदायिक उथल-पुथल के बीच यह मनुष्य के लिए कितना निरीह आश्वासन है। सच कहते हैं विष्णु नागर कि वे एक सुंदर सा, मार्मिक-सा वक्तव्य देकर रह जाने वाले कवियों में नहीं हैं बल्कि कविता के जरिए आपसे बातचीत करते हैं। वे जहाँ देवभाषा की तरह बोलने वाली देश में उभरी एक नई प्रजाति के खतरे की ओर हमारा ध्यान दिलाते हैं, वहीं आकर्षक साध्वियों की तरह अमल-धवल लगने वाली बोली-बानी की कविता से भी अपना रिश्ता अलगाते हैं। जीवन के सहज धर्म और कर्म से निकली उनकी कविता –‘फिर भी’-- भादौं में क्वांर की धूप के लिए सटीक भाषा खोजने के लिए विकल नज़र आती है। एक विक्षुब्धता कवि के हृदय में बजती रहती है कि ‘’आज हत्यारे सम्मानित किए जा रहे हैं, मनुष्यता को बचाने का कहीं कोई जोखिम नहीं बचा।‘’


कवि, सच पूछिये तो, अपनी संस्कृति और सभ्यता के पहरुए होते हैं। वे जीत की रात में भी सावधानी का बिगुल बजाते हैं – ‘आज जीत की रात/पहरुए सावधान रहना।‘ भगवत रावत तेज उड़ती दुनिया का अंजाम भाँपते हुए अंततः एक बैलगाड़ी पर अपना भरोसा टिकाते हैं और कहते हैं, जब पृथ्वी पर चमक दमक वाले वाहनों के लिए जगह नहीं रह जाएगी, पूरी विनम्रता से सभ्यता के सारे पाप ढोती हुई कहीं न कहीं एक बैलगाड़ी जरूर नज़र आएगी। कवि को यकीन है, ’’एक वही है जिस पर बैठा हुआ है हमारी सभ्यता का आखिरी मनुष्य। एक वही तो है जिसे खींच रहे हैं/ मनुष्यता के पुराने भरोसेमंद साथी दो बैल।‘’ (बैलगाड़ी) भगवत ऐसे ही कवियों में हैं जो सहज चलते आख्यान के बीच कहीं न कहीं अपनी कविता का जादू बिखेर देते हैं। बैलगाड़ी पर भरोसा टिका कर न तो वे समकालीन आधुनिक प्रगति के तेज दौड़ते पहियों के विद्घ हैं न ही उदारतावाद की आँधी के बीच शासकों की देवोपम भाषा के मुरीद, वे ठीक उस जगह उँगली रखना अपना धर्म समझते हैं जहाँ खतरे और जोखिम की संभावनाएँ सबसे ज्यादा हैं। वे व्याकरण-सम्मत समय, आचरण, सजावटी शालीनता और सजे-धजे घर सबको संदेह की निगाह से देखते हैं और अंततः यह यकीन रखते हैं कि ‘’मनुष्य का पारा उतरते उतरते जब/ शून्य से नीचे उतर जाएगा/ तब किसी बर्फीली पहाड़ी के किसी मोड़ पर/ पीछे छूट गयी टूटी बेंच वाली चाय की गुमटी की तरह/ वह कविता काम आएगी/ जो पड़ी रही वहीं की वहीं/ अपनी भाषा में सूखी लकड़ियाँर्‍कंडे बटोरती/ एक दिन वहीं ठिठुरती आत्मा में/ चाय के गरम घूँट सी उतर जाएगी।‘’(मानो या न मानो/ऐसी कैसी नींद)



कविता में भगवत रावत किस परंपरा से जुड़ने वाले कवियों में हैं? क्‍या वे निराला से जुड़ते हैं, त्रिलोचन या नागार्जुन से। या अपनी ही मातृभूमि बुंदेलखंड के कवि केदारनाथ अग्रवाल से ? कहना होगा कि वे इन सबसे अलग हैं। न उनकी कविता निराला की परंपरा में है न त्रिलोचन और न ही नागार्जुन की परंपरा में। वह केदारनाथ अग्रवाल की किसानी कठ-काठी की कविता से भी कोई घना रिश्‍ता नहीं रखती और न ही साम्राज्‍यवादी शक्‍तियों को उस तेवर और भंगिमा में ललकारती है। वह अपनी अलग पहचान के साथ कविता के संसार में दाखिल होती है और खुद पर किसी परंपरा और वैशिष्‍ट्य की छाया नहीं पड़ने देती। नगण्य और किंचित की भूमिका के प्रति भरोसेमंद भगवत रावत का कविता-संसार किसी भी कवि से अतुलनीय और अद्वितीय है।

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                                                                                                                                                                                           मंथन


                                                                                                                                                                                  - देवेन्द्र इस्सर

समंदर पर पुल बांधने का वक्त आया

पहले एक किस्सा सुनिएः काजी हाउस में एक दिन उसकी मुठभेड़ एक वेटर से हो गई जो रामपुर से था। कहने लगा इंतज़ार सहब, आपने अपनी कहानियों में जो ज़बान लिखी है वह हमारे रामपुर में कंजड़ियां बोला करती हैं। कभी शरीफ़ज़ादियों की ज़बान और अशराफ ( अभिजात्य ) का मुहावरा लिखकर दिखाइये।

रामपुरी वेटर की बात सुनकर इंतजार हुसेन अपना-सा मुंह लेकर रह गया। फिर उसने दिल्ली और लखनऊ का मुहावरा लिखने के लिए बहुत ज़ोर मारा मगर कहां दिल्ली और लखनऊ के अशराफ और कहां डबाई का रोड़ा। उसने जल्दी ही अपनी हैसियत को पहचाना और पैंतरा बदल लिया। दिल्लीवालों को अपनी कोसर में धुली हुई उर्दू पर नाज था। उसने कहना शुरू किया कि मैं तो गंगा में धुली हुई उर्दू लिखता हूं। किसी ने पूछ लिया –‘ यह उर्दू तुमने सीखी किससे है? ‘  जबाव दिया ‘ संत कबीर से।‘ पूछनेवाला उनका मुंह तकने लगा और बोला – उर्दू का कबीर से क्या वास्ता? ‘ इंतजार हुसेन ने ढीठ बनकर जबाव दिया कि ‘ कबीर उर्दू का सबसे बड़ा शायर है।‘

जिक्र आया तो यह बात भी सुन लीजिए। जब पाकिस्तान में गालिब की 200वीं बरसी मनाने का सवाल आया तो वहां के कुछ लोगों ने यह आवाज उठाई कि गालिब का पाकिस्तान से क्या संबंध। वह तो हिंदुस्तानी शायर है।

प्रश्न सिर्फ यह नहीं कि हम कैसे प्रभावित होते हैं बल्कि यह है कि जो हमारा समाज है , जिस संस्कृति में हम परवरिश पाते हैं उसके दर रहते हुए हमकिस प्रकार अपने साहित्य का सृजन करते हैं और इस साहित्य से दूसरी भाषाओं से किस तरह के रिश्ते बनते या बिगड़ते हैं। प्रश्न यह है कि इस समाज और संस्कृति और इन भाषाओं से हमारे सर्जनात्मक संबंध क्य हैं। हैं भी या नहीं ! यदि हैं तो किस प्रकार के हैं। हर दौर में कोई न कोई प्रभावी प्रवृत्ति पनपती है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब भाषाएं एक ही भूखंड की उपज हों। जैंसे कि हिन्दी और उर्दू। लेकिन राजनीतिक कारणों से भाषा अस्मिता का प्रश्न बन जाती हैं। उर्दू पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा है लेकिन वह वहां किसी भी हिस्से में बोली नहीं जाती।

हम बड़े ही नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे दौर में भाषाएं अस्मिता की समस्या बन गई हैं। एक राजनेता की बात याद है कि ‘ उर्दू बहैसियत एक सांस्कृतिक बिरसे के मुस्लिम अस्मिता का प्रश्न बन गई है। ‘ यदि हम तकनीकी तौर पर बात करें उर्दू उत्तरी भारत के अधिकतर मुसलमानों की ज़बान है। वह ज़बान जो उनकी मज़हबी ज़रूरतों को पूरा करती है। वे महसूस करते हैं कि यह ज़बान उनकी मज़हबी और तहज़ीबी पहचान बन गई है।

तो इस दौर में संयुक्त संस्कृति का क्या होगा ? जब मैं इस विषय पर बुद्धिजीवियों को इतिहास के उद्धरण देते हुए सुनता हूं तो मुझे परेशानी होती है कि भारत विभाजन के साथ ही पैराडाइस शिफ्ट हो गया है। समाज में विभाजन (स्वतंत्रता ) के बाद जितने परिवर्तन हो रहे हैं उनके बारे में कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। लेकिन परिवर्तन की प्रक्रिया तथा प्रकृति को पहचान कर उसकी दिशा और रफ्तार का अनुभव अवश्य लगाया जा सकता है। इन संभावनाओं को समझकर ही हम परिवर्तन की प्रक्रिया में सर्जनात्मक हस्तक्षेप कर सकते हैं।

अल्विन टाफलर ने अपनी पुष्तक द थर्ड वेव में विखा है ‘ हमारे जीवन में एक नयी सभ्यता का उदय हो रहा है। दृष्टिहीन लोग हर जगह इसके आगमन को रोकने का प्रयत्न कर रहे हैं। यह नयी सभ्यता अपने साथ नए पारिवारिक संबंध, कामकाज के नए तौर-तरीके, प्यार और जीने के नए अंदाज, नई वैज्ञानिक व्यवस्था, नए राजनीतिक संघर्ष और इन सबसे बढ़कर एक नई बदली हुई चेतना ला रही है। ‘ नई सभ्यता का उदय हमारे जीवन की सबसे अधिक विष्फोटक सच्चाई है।

मैंने अपनी बात इंतज़ार हुसेन के उद्धरण से शुरू की थी और अंत भी उन्ही के उपन्यास ‘ आगे समन्दर है ‘ के एक उद्धरण पर खत्म करना चाहता हूं। ‘ एक वक्त ऐसा होता है कि हम कश्तियां बनाते हैं और एक वक्त ऐसा होता है कि हम कश्तियां जलाते हैं। लेकिन एक समंदर बिफरा हुआ है हमारे अंदर, उसकी तरफ हम ज्यादा ध्यान नहीं देते। ‘ कुछ इस क़िसम की बात है कि साहित्य और संस्कृति में अब कोई कश्तियां नहीं बनाता। शायद हमने अपने अंदर बिफरे हुए समन्दर को पहचानना बंद कर दिया है। मैं नहीं जानता कि वक्त कश्तियां बनाने का है या जलाने का। लेकिन यह जानता हूं कि यह वक्त अपने अंदर और बाहर बिफरते हुए समंदर पर पुल बनाने का जरूर है।

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                                                                                                                                                          कहानी धरोहर


                                                                                                                                                                         -मोहन राकेश

                                                     मलवे का मालिक

साढ़े सात साल के बाद वे लोग लाहौर से अमृतसर आये थे। हॉकी का मैच देखने का तो बहाना ही था, उन्हें ज़्यादा चाव उन घरों और बाज़ारों को फिर से देखने का था जो साढ़े सात साल पहले उनके लिए पराये हो गये थे। हर सडक़ पर मुसलमानों की कोई-न-कोई टोली घूमती नज़र आ जाती थी। उनकी आँखें इस आग्रह के साथ वहाँ की हर चीज़ को देख रही थीं जैसे वह शहर साधारण शहर न होकर एक अच्छा-ख़ासा आकर्षण-केन्द्र हो।

तंग बाज़ारों में से गुज़रते हुए वे एक-दूसरे को पुरानी चीज़ों की याद दिला रहे थे...देख-फतहदीना, मिसरी बाज़ार में अब मिसरी की दुकानें पहले से कितनी कम रह गयी हैं! उस नुक्कड़ पर सुक्खी भठियारिन की भट्‌ठी थी, जहाँ अब वह पानवाला बैठा है।...यह नमक मंडी देख लो, ख़ान साहब! यहाँ की एक-एक लालाइन वह नमकीन होती है कि बस...!

बहुत दिनों के बाद बाज़ारों में तुर्रेदार पगडिय़ाँ और लाल तुरकी टोपियाँ नज़र आ रही थीं। लाहौर से आये मुसलमानों में काफ़ी संख्या ऐसे लोगों की थी जिन्हें विभाजन के समय मज़बूर होकर अमृतसर से जाना पड़ा था। साढ़े सात साल में आये अनिवार्य परिवर्तनों को देखकर कहीं उनकी आँखों में हैरानी भर जाती और कहीं अफ़सोस घिर आता-वल्लाह! कटरा जयमलसिंह इतना चौड़ा कैसे हो गया? क्या इस तरफ़ के सब-के-सब मकान जल गये थे?...यहाँ हक़ीम आसिफ़अली की दुकान थी न? अब यहाँ एक मोची ने कब्ज़ा कर रखा है?

और कहीं-कहीं ऐसे भी वाक्य सुनाई दे जाते-वली, यह मस्ज़िद ज्यों की त्यों खड़ी है? इन लोगों ने इसका गुरुद्वारा नहीं बना दिया!

जिस रास्ते से भी पाकिस्तानियों की टोली गुज़रती, शहर के लोग उत्सुकतापूर्वक उस तरफ़ देखते रहते। कुछ लोग अब भी मुसलमानों को आते देखकर आशंकित से रास्ते से हट जाते, जबकि दूसरे आगे बढक़र उनसे बगलगीर होने लगते। ज़्यादातर वे आगन्तुकों से ऐसे-ऐसे सवाल पूछते-कि आजकल लाहौर का क्या हाल है? अनारकली में अब पहले जितनी रौनक होती है या नहीं? सुना है, शाहालमीगेट का बाज़ार पूरा नया बना है? कृष्णनगर में तो कोई ख़ास तब्दीली नहीं आयी? वहाँ का रिश्वतपुरा क्या वाकई रिश्वत के पैसे से बना है?...कहते हैं, पाकिस्तान में अब बु$र्का बिल्कुल उड़ गया है, यह ठीक है?... इन सवालों में इतनी आत्मीयता झलकती थी कि लगता था, लाहौर एक शहर नहीं, हज़ारों लोगों का सगा-सम्बन्धी है, जिसके हाल जानने के लिए वे उत्सुक हैं। लाहौर से आये लोग उस दिन शहर-भर के मेहमान थे जिनसे मिलकर और बातें करके लोगों को बहुत ख़ुशी हो रही थी।

बाज़ार बाँसाँ अमृतसर का एक उजड़ा-सा बाज़ार है, जहाँ विभाजन से पहले ज़्यादातर निचले तबके के मुसलमान रहते थे। वहाँ ज़्यादातर बाँसों और शहतीरों की ही दुकानें थीं जो सब की सब एक ही आग में जल गयी थीं। बाज़ार बाँसाँ की वह आग अमृतसर की सबसे भयानक आग थी जिससे कुछ देर के लिए तो सारे शहर के जल जाने का अन्देशा पैदा हो गया था। बाज़ार बाँसाँ के आसपास के कई मुहल्लों को तो उस आग ने अपनी लपेट में ले ही लिया था। ख़ैर, किसी तरह वह आग काबू में आ गयी थी, पर उसमें मुसलमानों के एक-एक घर के साथ हिन्दुओं के भी चार-चार, छ:-छ: घर जलकर राख हो गये थे। अब साढ़े सात साल में उनमें से कई इमारतें फिर से खड़ी हो गयी थीं, मगर जगह-जगह मलबे के ढेर अब भी मौ$जूद थे। नई इमारतों के बीच-बीच वे मलबे के ढेर एक अजीब वातावरण प्रस्तुत करते थे।

बाज़ार बाँसाँ में उस दिन भी चहल-पहल नहीं थी क्योंकि उस बाज़ार के रहने वाले ज़्यादातर लोग तो अपने मकानों के साथ ही शहीद हो गये थे, और जो बचकर चले गये थे, उनमें से शायद किसी में भी लौटकर आने की हिम्मत नहीं रही थी। सिर्फ़ एक दुबला-पतला बुड्ïढा मुसलमान ही उस दिन उस वीरान बाज़ार में आया और वहाँ की नयी और जली हुई इमारतों को देखकर जैसे भूलभुलैयाँ में पड़ गया। बायीं तरफ़ जानेवाली गली के पास पहुँचकर उसके पैर अन्दर मुडऩे को हुए, मगर फिर वह हिचकिचाकर वहाँ बाहर ही खड़ा रह गया। जैसे उसे विश्वास नहीं हुआ कि यह वही गली है जिसमें वह जाना चाहता है। गली में एक तरफ़ कुछ बच्चे कीड़ी-कीड़ा खेल रहे थे और कुछ फ़ासले पर दो स्त्रियाँ ऊँची आवाज़ में चीख़ती हुई एक-दूसरी को गालियाँ दे रही थीं।

"सब कुछ बदल गया, मगर बोलियाँ नहीं बदलीं!" बुड्ढे मुसलमान ने धीमे स्वर में अपने से कहा और छड़ी का सहारा लिये खड़ा रहा। उसके घुटने पाजामे से बाहर को निकल रहे थे। घुटनों से थोड़ा ऊपर शेरवानी में तीन-चार पैबन्द लगे थे। गली से एक बच्चा रोता हुआ बाहर आ रहा था। उसने उसे पुचकारा, "इधर आ, बेटे! आ, तुझे चिज्जी देंगे, आ!" और वह अपनी जेब में हाथ डालकर उसे देने के लिए कोई चीज़ ढूँढऩे लगा। बच्चा एक क्षण के लिए चुप कर गया, लेकिन फिर उसी तरह होंठ बिसूरकर रोने लगा। एक सोलह-सत्रह साल की लडक़ी गली के अन्दर से दौड़ती हुई आयी और बच्चे को बाँह से पकडक़र गली में ले चली। बच्चा रोने के साथ-साथ अब अपनी बाँह छुड़ाने के लिए मचलने लगा। लडक़ी ने उसे अपनी बाँहों में उठाकर साथ सटा लिया और उसका मुँह चूमती हुई बोली, चुप कर, ख़सम-खाने! रोएगा, तो वह मुसलमान तुझे पकडक़र ले जाएगा! कह रही हूँ, चुप कर!"

बुड्ढे मुसलमान ने बच्चे को देने के लिए जो पैसा निकाला था, वह उसने वापस जेब में रख लिया। सिर से टोपी उतारकर वहाँ थोड़ा खुजलाया और टोपी अपनी बग़ल में दबा ली। उसका गला ख़ुश्क हो रहा था और घुटने थोड़ा काँप रहे थे। उसने गली के बाहर की एक बन्द दुकान के त$ख्ते का सहारा ले लिया और टोपी फिर से सिर पर लगा ली। गली के सामने जहाँ पहले ऊँचे-ऊँचे शहतीर रखे रहते थे, वहाँ अब एक तिमंज़िला मकान खड़ा था। सामने बिजली के तार पर दो मोटी-मोटी चीलें बिल्कुल जड़-सी बैठी थीं। बिजली के खम्भे के पास थोड़ी धूप थी। वह कई पल धूप में उड़ते ज़र्रों को देखता रहा। फिर उसके मुँह से निकला, "या मालिक!"

एक नवयवुक चाबियों का गुच्छा घुमाता गली की तरफ़ आया। बुड्ढे को वहाँ खड़े देखकर उसने पूछा, "कहिए मियाँजी, यहाँ किसलिए खड़े हैं?"

बुड्ढे मुसलमान को छाती और बाँहों में हल्की-सी कँपकँपी महसूस हुई। उसने होंठों पर ज़बान फेरी और नवयुवक को ध्यान से देखते हुए कहा, "बेटे, तेरा नाम मनोरी है न?"

नवयुवक ने चाबियों के गुच्छे को हिलाना बन्द करके अपनी मुट्‌ठी में ले लिया और कुछ आश्चर्य के साथ पूछा, "आपको मेरा नाम कैसे मालूम है?"

"साढ़े सात साल पहले तू इतना-सा था," कहकर बुड्ढे ने मुस्कराने की कोशिश की।

"आप आज पाकिस्तान से आये हैं?"

"हाँ! पहले हम इसी गली में रहते थे," बुड्ढे ने कहा, "मेरा लडक़ा चिराग़दीन तुम लोगों का दर्ज़ी था। तक़सीम से छ: महीने पहले हम लोगों ने यहाँ अपना नया मकान बनवाया था।"

"ओ, गनी मियाँ!" मनोरी ने पहचानकर कहा।

"हाँ, बेटे मैं तुम लोगों का गनी मियाँ हूँ! चिराग़ और उसके बीवी-बच्चे तो अब मुझे मिल नहीं सकते, मगर मैंने सोचा कि एक बार मकान की ही सूरत देख लूँ!" बुड्ढे ने टोपी उतारकर सिर पर हाथ फेरा, और अपने आँसुओं को बहने से रोक लिया।

"तुम तो शायद काफ़ी पहले यहाँ से चले गये थे," मनोरी के स्वर में संवेदना भर आयी।

"हाँ, बेटे यह मेरी बदब$ख्ती थी कि मैं अकेला पहले निकलकर चला गया था। यहाँ रहता, तो उसके साथ मैं भी..."कहते हुए उसे एहसास हो आया कि यह बात उसे नहीं कहनी चाहिए। उसने बात को मुँह में रोक लिया पर आँखों में आये आँसुओं को नीचे बह जाने दिया।

"छोड़ो गनी मियाँ, अब उन बातों को सोचने में क्या रखा है?" मनोरी ने गनी की बाँह अपने हाथ में ले ली। "चलो,तुम्हें तुम्हारा घर दिखा दूँ।"

गली में ख़बर इस तरह फैली थी कि गली के बाहर एक मुसलमान खड़ा है जो रामदासी के लडक़े को उठाने जा रहा था...उसकी बहन वक़्त पर उसे पकड़ लायी, नहीं तो वह मुसलमान उसे ले गया होता। यह ख़बर मिलते ही जो स्त्रियाँ गली में पीढ़े बिछाकर बैठी थीं, वे पीढ़े उठाकर घरों के अन्दर चली गयीं। गली में खेलते बच्चों को भी उन्होंने पुकार-पुकारकर घरों के अन्दर बुला लिया। मनोरी गनी को लेकर गली में दाख़िल हुआ, तो गली में सिर्फ़ एक फेरीवाला रह गया था, या रक्खा पहलवान जो कुएँ पर उगे पीपल के नीचे बिखरकर सोया था। हाँ, घरों की खिड़कियों में से और किवाड़ों के पीछे से कई चेहरे गली में झाँक रहे थे। मनोरी के साथ गनी को आते देखकर उनमें हल्की चेहमेगोइयाँ शुरू हो गयीं। दाढ़ी के सब बाल सफ़ेद हो जाने के बाव$जूद चिराग़दीन के बाप अब्दुल गनी को पहचानने में लोगों को दिक्कत नहीं हुई।

"वह था तुम्हारा मकान," मनोरी ने दूर से एक मलबे की तरफ़ इशारा किया। गनी पल-भर ठिठककर फटी-फटी आँखों से उस तरफ़ देखता रहा। चिराग़ और उसके बीवी-बच्चों की मौत को वह काफ़ी पहले स्वीकार कर चुका था। मगर अपने नये मकान को इस शक्ल में देखकर उसे जो झुरझुरी हुई, उसके लिए वह तैयार नहीं था। उसकी ज़बान पहले से और ख़ुश्क हो गयी और घुटने भी ज़्यादा काँपने लगे।

"यह मलबा?" उसने अविश्वास के साथ पूछ लिया।

मनोरी ने उसके चेहरे के बदले हुए रंग को देखा। उसकी बाँह को थोड़ा और सहारा देकर जड़-से स्वर में उत्तर दिया, "तुम्हारा मकान उन्हीं दिनों जल गया था।"

गनी छड़ी के सहारे चलता हुआ किसी तरह मलबे के पास पहुँच गया। मलबे में अब मिट्‌टी ही मिट्‌टी थी जिसमें से जहाँ-तहाँ टूटी और जली हुई ईंटें बाहर झाँक रही थीं। लोहे और लकड़ी का सामान उसमें से कब का निकाला जा चुका था। केवल एक जले हुए दरवाज़े का चौखट न जाने कैसे बचा रह गया था। पीछे की तरफ़ दो जली हुई अलमारियाँ थीं जिनकी कालिख पर अब सफ़ेदी की हल्की-हल्की तह उभर आयी थी। उस मलबे को पास से देखकर गनी ने कहा, "यह बाकी रह गया है, यह?" और उसके घुटने जैसे जवाब दे गये और वह वहीं जले हुए चौखट को पकडक़र बैठ गया। क्षण-भर बाद उसका सिर भी चौखट से जा सटा और उसके मुँह से बिलखने की-सी आवाज़ निकली, "हाय ओए चिराग़दीना!"

जले हुए किवाड़ का वह चौखट मलबे में से सिर निकाले साढ़े सात साल खड़ा तो रहा था, पर उसकी लकड़ी बुरी तरह भुरभुरा गयी थी। गनी के सिर के छूने से उसके कई रेशे झडक़र आसपास बिखर गये। कुछ रेशे गनी की टोपी और बालों पर आ रहे। उन रेशों के साथ एक केंचुआ भी नीचे गिरा जो गनी के पैर से छ:-आठ इंच दूर नाली के साथ-साथ बनी ईंटों की पटरी पर इधर-उधर सरसराने लगा। वह छिपने के लिए सूराख़ ढूँढ़ता हुआ ज़रा-सा सिर उठाता, पर कोई जगह न पाकर दो-एक बार सिर पटकने के बाद दूसरी तरफ़ मुड़ जाता।

खिड़कियों से झाँकनेवाले चेहरों की संख्या अब पहले से कहीं ज़्यादा हो गयी थी। उनमें चेहमेगोइयाँ चल रही थीं कि आज कुछ-न-कुछ ज़रूर होगा...चिराग़दीन का बाप गनी आ गया है, इसलिए साढ़े सात साल पहले की वह सारी घटना आज अपने-आप खुल जाएगी। लोगों को लग रहा था जैसे वह मलबा ही गनी को सारी कहानी सुना देगा-कि शाम के वक़्त चिराग़ ऊपर के कमरे में खाना खा रहा था जब रक्खे पहलवान ने उसे नीचे बुलाया-कहा कि वह एक मिनट आकर उसकी बात सुन ले। पहलवान उन दिनों गली का बादशाह था। वहाँ के हिन्दुओं पर ही उसका काफ़ी दबदबा था-चिराग़ तो ख़ैर मुसलमान था। चिराग़ हाथ का कौर बीच में ही छोडक़र नीचे उतर आया। उसकी बीवी जुबैदा और दोनों लड़कियाँ, किश्वर और सुलताना, खिड़कियों से नीचे झाँकने लगीं। चिराग़ ने ड्योढ़ी से बाहर क़दम रखा ही था कि पहलवान ने उसे कमीज़ के कॉलर से पकडक़र अपनी तरफ़ खींच लिया और गली में गिराकर उसकी छाती पर चढ़ बैठा। चिराग़ उसका छुरेवाला हाथ पकडक़र चिल्लाया, "रक्खे पहलवान, मुझे मत मार! हाय, कोई मुझे बचाओ!" ऊपर से जुबैदा, किश्वर और सुलताना भी हताश स्वर में चिल्लाईं और चीख़ती हुई नीचे ड्योढ़ी की तरफ़ दौड़ीं। रक्खे के एक शागिर्द ने चिराग़ की जद्दोजेहद करती बाँहें पकड़ लीं और रक्खा उसकी जाँघों को अपने घुटनों से दबाए हुए बोला, "चीख़ता क्यों है, भैण के...तुझे मैं पाकिस्तान दे रहा हूँ, ले पाकिस्तान!" और जब तक जुबैदा, किश्वर और सुलताना नीचे पहुँचीं, चिराग़ को पाकिस्तान मिल चुका था।

आसपास के घरों की खिड़कियाँ तब बन्द हो गयी थीं। जो लोग इस दृश्य के साक्षी थे, उन्होंने दरवाज़े बन्द करके अपने को इस घटना के उत्तरदायित्व से मुक्त कर लिया था। बन्द किवाड़ों में भी उन्हें देर तक जुबैदा, किश्वर और सुलताना के चीख़ने की आवाज़ें सुनाई देती रहीं। रक्खे पहलवान और उसके साथियों ने उन्हें भी उसी रात पाकिस्तान दे दिया, मगर दूसरे तबील रास्ते से। उनकी लाशें चिराग़ के घर में न मिलकर बाद में नहर के पानी में पायी गयीं।

दो दिन चिराग़ के घर की छानबीन होती रही थी। जब उसका सारा सामान लूटा जा चुका, तो न जाने किसने उस घर को आग लगा दी थी। रक्खे पहलवान ने तब कसम खायी थी कि वह आग लगाने वाले को ज़िन्दा ज़मीन में गाड़ देगा क्योंकि उस मकान पर नज़र रखकर ही उसने चिराग़ को मारने का निश्चय किया था। उसने उस मकान को शुद्ध करने के लिए हवन-सामग्री भी ला रखी थी। मगर आग लगानेवाले का तब से आज तक पता नहीं चल सका था। अब साढ़े सात साल से रक्खा उस मलबे को अपनी जायदाद समझता आ रहा था, जहाँ न वह किसी को गाय-भैंस बाँधने देता था और न ही खुमचा लगाने देता था। उस मलबे से बिना उसकी इज़ाज़त के कोई एक ईंट भी नहीं निकाल सकता था।

लोग आशा कर रहे थे कि यह सारी कहानी ज़रूर किसी न किसी तरह गनी तक पहुँच जाएगी...जैसे मलबे को देखकर ही उसे सारी घटना का पता चल जाएगा। और गनी मलबे की मिट्‌टी को नाख़ूनों से खोद-खोदकर अपने ऊपर डाल रहा था और दरवाज़े के चौख़ट को बाँह में लिये हुए रो रहा था, "बोल, चिराग़दीना, बोल! तू कहाँ चला गया,ओए? ओ किश्वर! ओ सुलताना! हाय, मेरे बच्चे ओएऽऽ! गनी को पीछे क्यों छोड़ दिया, ओएऽऽऽ!"

और भुरभुरे किवाड़ से लकड़ी के रेशे झड़ते जा रहे थे।

पीपल के नीचे सोए रक्खे पहलवान को जाने किसी ने जगा दिया, या वह ख़ुद ही जाग गया। यह जानकर कि पाकिस्तान से अब्दुल गनी आया है और अपने मकान के मलबे पर बैठा है, उसके गले में थोड़ा झाग उठ आया जिससे उसे खाँसी आ गयी और उसने कुएँ के फ़र्श पर थूक दिया। मलबे की तरफ़ देखकर उसकी छाती से धौंकनी की-सी आवाज़ निकली और उसका निचला होंठ थोड़ा बाहर को फैल आया।

"गनी अपने मलबे पर बैठा है," उसके शागिर्द लच्छे पहलावन ने उसके पास आकर बैठते हुए कहा।

"मलबा उसका कैसे है? मलबा हमारा है!" पहलवान ने झाग से घरघराई आवाज़ में कहा।

"मगर वह वहाँ बैठा है," लच्छे ने आँखों में एक रहस्यमय संकेत लाकर कहा।

"बैठा है, बैठा रहे। तू चिलम ला!" रक्खे की टाँगें थोड़ी फैल गयीं और उसने अपनी नंगी जाँघों पर हाथ फेर लिया।

"मनोरी ने अगर उसे कुछ बता-वता दिया तो...?" लच्छे ने चिलम भरने के लिए उठते हुए उसी रहस्यपूर्ण ढंग से कहा।

"मनोरी की क्या शामत आयी है?"

लच्छा चला गया।

कुएँ पर पीपल की कई पुरानी पत्तियाँ बिखरी थीं। रक्खा उन पत्तियों को उठा-उठाकर अपने हाथों में मसलता रहा। जब लच्छे ने चिलम के नीचे कपड़ा लगाकर चिलम उसके हाथ में दी, तो उसने कश खींचते हुए पूछा, "और तो किसी से गनी की बात नहीं हुई?"

"नहीं।"

"ले," और उसने खाँसते हुए चिलम लच्छे के हाथ में दे दी। मनोरी गनी की बाँह पकड़े मलबे की तरफ़ से आ रहा था। लच्छा उकड़ूँ होकर चिलम के लम्बे-लम्बे कश खींचने लगा। उसकी आँखें आधा क्षण रक्खे के चेहरे पर टिकतीं और आधा क्षण गनी की तरफ़ लगी रहतीं।

मनोरी गनी की बाँह थामे उससे एक क़दम आगे चल रहा था-जैसे उसकी कोशिश हो कि गनी कुएँ के पास से बिना रक्खे को देखे ही निकल जाए। मगर रक्खा जिस तरह बिखरकर बैठा था, उससे गनी ने उसे दूर से ही देख लिया। कुएँ के पास पहुँचते न पहुँचते उसकी दोनों बाँहें फैल गयीं और उसने कहा, "रक्खे पहलवान!"

रक्खे ने गरदन उठाकर और आँखें ज़रा छोटी करके उसे देखा। उसके गले में अस्पष्ट-सी घरघराहट हुई, पर वह बोला नहीं।

"रक्खे पहलवान, मुझे पहचाना नहीं?" गनी ने बाँहें नीची करके कहा, "मैं गनी हूँ, अब्दुल गनी, चिराग़दीन का बाप!"

पहलवान ने ऊपर से नीचे तक उसका जायज़ा लिया। अब्दुल गनी की आँखों में उसे देखकर एक चमक-सी आ गयी थी। सफ़ेद दाढ़ी के नीचे उसके चेहरे की झुर्रियाँ भी कुछ फैल गयी थीं। रक्खे का निचला होंठ फडक़ा। फिर उसकी छाती से भारी-सा स्वर निकला, "सुना, गनिया!"

गनी की बाँहें फिर फैलने को हुईं, पर पहलवान पर कोई प्रतिक्रिया न देखकर उसी तरह रह गयीं। वह पीपल का सहारा लेकर कुएँ की सिल पर बैठ गया।

ऊपर खिड़कियों में चेहमेगोइयाँ तेज़ हो गयीं कि अब दोनों आमने-सामने आ गये हैं, तो बात ज़रूर खुलेगी...फिर हो सकता है दोनों में गाली-गलौज़ भी हो।...अब रक्खा गनी को हाथ नहीं लगा सकता। अब वे दिन नहीं रहे।...बड़ा मलबे का मालिक बनता था!...असल में मलबा न इसका है, न गनी का। मलबा तो सरकार की मलकियत है! मरदूद किसी को वहाँ गाय का खूँटा तक नहीं लगाने देता!...मनोरी भी डरपोक है। इसने गनी को बता क्यों नहीं दिया कि रक्खे ने ही चिराग़ और उसके बीवी-बच्चों को मारा है!...रक्खा आदमी नहीं साँड है! दिन-भर साँड की तरह गली में घूमता है!...गनी बेचारा कितना दुबला हो गया है! दाढ़ी के सारे बाल सफ़ेद हो गये हैं!...

गनी ने कुएँ की सिल पर बैठकर कहा, "देख रक्खे पहलान, क्या से क्या हो गया है! भरा-पूरा घर छोडक़र गया था और आज यहाँ यह मिट्‌टी देखने आया हूँ! बसे घर की आज यही निशानी रह गयी है! तू सच पूछे, तो मेरा यह मिट्‌टी भी छोडक़र जाने को मन नहीं करता!" और उसकी आँखें फिर छलछला आयीं।

पहलवान ने अपनी टाँगें समेट लीं और अंगोछा कुएँ की मुँडेर से उठाकर कन्धे पर डाल लिया। लच्छे ने चिलम उसकी तरफ़ बढ़ा दी। वह कश खींचने लगा।

"तू बता, रक्खे, यह सब हुआ किस तरह?" गनी किसी तरह अपने आँसू रोककर बोला, "तुम लोग उसके पास थे। सब में भाई-भाई की-सी मुहब्बत थी। अगर वह चाहता, तो तुममें से किसी के घर में नहीं छिप सकता था? उसमें इतनी भी समझदारी नहीं थी?"

"ऐसे ही है," रक्खे को स्वयं लगा कि उसकी आवाज़ में एक अस्वाभाविक-सी गूँज है। उसके होंठ गाढ़े लार से चिपक गये थे। मूँछों के नीचे से पसीना उसके होंठ पर आ रहा था। उसे माथे पर किसी चीज़ का दबाव महसूस हो रहा था और उसकी रीढ़ की हड्डी सहारा चाह रही थी।

"पाकिस्तान में तुम लोगों के क्या हाल हैं?" उसने पूछा। उसके गले की नसों में एक तनाव आ गया था। उसने अंगोछे से बगलों का पसीना पोंछा और गले का झाग मुँह में खींचकर गली में थूक दिया।

"क्या हाल बताऊँ, रक्खे," गनी दोनों हाथों से छड़ी पर बोझ डालकर झुकता हुआ बोला, "मेरा हाल तो मेरा ख़ुदा ही जानता है। चिराग़ वहाँ साथ होता, तो और बात थी।...मैंने उसे कितना समझाया था कि मेरे साथ चला चल। पर वह ज़िद पर अड़ा रहा कि नया मकान छोडक़र नहीं जाऊँगा-यह अपनी गली है, यहाँ कोई ख़तरा नहीं है। भोले कबूतर ने यह नहीं सोचा कि गली में ख़तरा न हो, पर बाहर से तो ख़तरा आ सकता है! मकान की रखवाली के लिए चारों ने अपनी जान दे दी!...रक्खे, उसे तेरा बहुत भरोसा था। कहता था कि रक्खे के रहते मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मगर जब जान पर बन आयी, तो रक्खे के रोके भी न रुकी।"

रक्खे ने सीधा होने की चेष्टा की क्योंकि उसकी रीढ़ की हड्डी बहुत दर्द कर रही थी। अपनी कमर और जाँघों के जोड़ पर उसे सख़्त दबाव महसूस हो रहा था। पेट की अंतडिय़ों के पास से जैसे कोई चीज़ उसकी साँस को रोक रही थी। उसका सारा जिस्म पसीने से भीग गया था और उसके तलुओं में चुनचुनाहट हो रही थी। बीच-बीच में नीली फुलझडिय़ाँ-सी ऊपर से उतरती और तैरती हुई उसकी आँखों के सामने से निकल जातीं। उसे अपनी ज़बान और होंठों के बीच एक फ़ासला-सा महसूस हो रहा था। उसने अंगोछे से होंठों के कोनों को साफ़ किया। साथ ही उसके मुँह से निकला, "हे प्रभु, तू ही है, तू ही है, तू! ही है!"

गनी ने देखा कि पहलवान के होंठ सूख रहे हैं और उसकी आँखों के गिर्द दायरे गहरे हो गये हैं। वह उसके कन्धे पर हाथ रखकर बोला, "जो होना था, हो गया रक्खिआ! उसे अब कोई लौटा थोड़े ही सकता है! खुदा नेक की नेकी बनाये रखे और बद की बदी माफ़ करे! मैंने आकर तुम लोगों को देख लिया, सो समझूँगा कि चिराग को देख लिया। अल्लाह तुमहें सेहतमन्द रखे!" और वह छड़ी के सहारे उठ खड़ा हुआ। चलते हुए उसने कहा, "अच्छा रक्खे,पहलवान!"

रक्खे के गले से मद्धिम-सी आवाज़ निकली। अंगोछा लिये हुए उसके दोनों हाथ जुड़ गये। गनी हसरत-भरी नज़र से आसपास देखता हुआ धीरे-धीरे गली से बाहर चला गया।

ऊपर खिड़कियों में थोड़ी देर चेहमेगोइयाँ चलती रहीं-कि मनोरी ने गली से बाहर निकलकर ज़रूर गनी को सब कुछ बता दिया होगा कि गनी के सामने रक्खे का तालू कैसे खुश्क हो गया था!...रक्खा अब किस मुँह से लोगों को...मलबे पर गाय बाँधने से रोकेगा? बेचारी जुबैदा! कितनी अच्छी थी वह! रक्खे मरदूद का घर...न घाट, इसे किसी की माँ-बहन का लिहाज़ था?

थोड़ी देर में स्त्रियाँ घरों से गली में उतर आयीं। बच्चे गली में गुल्ली-डंडा खेलने लगे। दो बारह-तेरह साल की लड़कियाँ किसी बात पर एक-दूसरी से गुत्थम-गुत्था हो गयीं।

रक्खा गहरी शाम तक कुएँ पर बैठ खंखारता और चिलम फूँकता रहा। कई लोगों ने वहाँ गुज़रते हुए उससे पूछा, "रक्खे शाह, सुना है आज गनी पाकिस्तान से आया था?"

"हाँ, आया था," रक्खे ने हर बार एक ही उत्तर दिया।

"फिर?"

"फिर कुछ नहीं। चला गया।"

रात होने पर रक्खा रोज़ की तरह गली के बाहर बायीं तरफ़ की दुकान के त$ख्ते पर आ बैठा। रोज़ वह रास्ते से गुज़रने वाले परिचित लोगों को आवाज़ दे-देकर पास बुला लेता था और उन्हें सट्‌टे के गुर और सेहत के नुस्खे बताता रहता था। मगर उस दिन वह वहाँ बैठा लच्छे को अपनी वैष्नो देवी की उस यात्रा का वर्णन सुनाता रहा जो उसने पन्द्रह साल पहले की थी। लच्छे को भेजकर वह गली में आया, तो मलबे के पास लोकू पंडित की भैंस को देखकर वह आदत के मुताबिक उसे धक्के दे-देकर हटाने लगा, "तत-तत-तत...तत-तत...!!"

भैंस को हटाकर वह सुस्ताने के लिए मलबे के चौखट पर बैठ गया। गली उस समय सुनसान थी। कमेटी की बत्ती न होने से वहाँ शाम से ही अँधेरा हो जाता था। मलबे के नीचे नाली का पानी हल्की आवाज़ करता बह रहा था। रात की ख़ामोशी को काटती हुई कई तरह की हल्की-हल्की आवाज़ें मलबे की मिट्‌टी में से सुनाई दे रही थीं...च्यु-च्यु-च्यु...चिक्‌-चिक्‌-चिक्‌...किर्‌र्‌र्‌र्‌-र्‌र्‌र्‌र्‌-रीरीरीरी-चिर्‌र्‌र्‌र्‌...। एक भटका हुआ कौआ न जाने कहाँ से उडक़र उस चौखट पर आ बैठा। इससे लकड़ी के कई रेशे इधर-उधर छितरा गये। कौए के वहाँ बैठते न बैठते मलबे के एक कोने में लेटा हुआ कुत्ता गुर्राकर उठा और ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगा-वऊ-अऊ-वउ! कौआ कुछ देर सहमा-सा चौखट पर बैठा रहा, फिर पंख फडफ़ड़ाता कुएँ के पीपल पर चला गया। कौए के उड़ जाने पर कुत्ता और नीचे उतर आया और पहलवान की तरफ़ मुँह करके भौंकने लगा। पहलवान उसे हटाने के लिए भारी आवाज़ में बोला, "दुर्‌ दुर्‌दुर्‌...दुरे!" मगर कुत्ता और पास आकर भौंकने लगा-वऊ-अउ-वउ-वउ-वउ-वउ...।

पहलवान ने एक ढेला उठाकर कुत्ते की तरफ़ फेंका। कुत्ता थोड़ा पीछे हट गया, पर उसका भौंकना बन्द नहीं हुआ। पहलवान कुत्ते को माँ की गाली देकर वहाँ से उठ खड़ा हुआ और धीरे-धीरे जाकर कुएँ की सिल पर लेट गया। उसके वहाँ से हटते ही कुत्ता गली में उतर आया और कुएँ की तरफ़ मुँह करके भौंकने लगा। काफ़ी देर भौंकने के बाद जब उसे गली में कोई प्राणी चलता-फिरता नज़र नहीं आया, तो वह एक बार कान झटककर मलबे पर लौट गया और वहाँ कोने में बैठकर गुर्राने लगा।

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                                                                                                                                                                  कहानी विशेष


                                                                                                                                                                   -निर्मल वर्मा

                                                                धागे

उस रात खाने के बाद कॉफी पीते हुए हम केशी के नये रिकॉर्डों की चर्चा करने लगे।
'' मुझे तो रात को नींद नहीं आती मैं ने ग्रामोफोन लायब्रेरी में रखवा दिया है।''


मीनू ने कहा।
'' क्या वह अब भी पीते हैं?'' मैं ने धीरे से पूछा।'' केशी दूसरे कमरे में है।''
'' हाँ लेकिन मेरे कमरे में नहीं।''


मीनू ने दरवाजा खोलकर परदा उठा दिया। बरामदे के परे लॉन अंधेरे में डूबा था। एक अपरिचित सी घनी सी शान्ति सारे अहाते में फैली थी। हम कॉफी पी चुके थे और अपने अपने खाली प्यालों के आगे बैठे थे। मीनू कुर्सी खिसका कर मेरे पास सरक आयी।

'' तुम्हारे हाथ बहुत ठण्डे हैं।'' उसने मेरे दोनों हाथ अपनी मुट्ठियों में भर लिये, '' तुम्हें इतनी देर कैसे हो गयी? शैल तुम्हारी राह देखते देखते अभी सोई है।''
'' मैं फाटक से तुम्हारे कमरे तक भागती आई थी।'' मैं ने कहा। मैं ने झूठ कहा था। मैं मीनू से यह नहीं कहूंगी कि मैं पिछले आधे घण्टे से लॉन में अकेली बैठी रही थी - कहूंगी, तो वह विश्वास नहीं करेगी।
'' क्यों तुम्हें अब भी अंधेरे से डर लगता है?'' मीनू हंस रही थी। उसका एक हाथ अब भी मेरी गोद में पडा था। बिजली की रोशनी में उसकी सफेद पतली बांहें बहुत सफेद थीं, बहुत पतली थीं। मुझे अजीब सा लगता। केशी इन हाथों को कैसे चूमता होगा? कैसे इन बांहों के महीन भूरे रोयों को सहलाता होगा?

'' सुनो परसों रात तुम क्या कर रही थीं?
'' क्यों अपने कमरे में थी।'' मैं ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
'' कनॉट प्लेस से घर लौटते हुए हम तुम्हारे हॉस्टल आये थे।''
'' बहका रही हो?'' मैं ने कहा।
'' सच आये थे- केशी से पूछ लेना। लेकिन इतनी रात भीतर कैसे आते तुम्हारी मिसेज हैरी देखतीं तो हमें कच्चा चबा जातीं।'' वह हंस रही थी।
'' क्या तुम लोग रुके थे?''
'' हम हॉस्टल के बाहर खडे रहे थे तुम्हारे कमरे की बत्ती जली थी। केशी ने कई बार हॉर्न बजाया था। हमने सोचा था तुम हमारी कार का हॉर्न पहचान जाओगी लेकिन तुमने सुना नहीं।''
'' मैं शायद सो गई थी मुझे कुछ पता भी नहीं चला।''
'' तुम अब भी लाइट जला कर सोती हो?'' मीनू ने पूछा, मिसेज हैरी कुछ नहीं कहतीं?''
''यह वर्किंग वीमेन्स हॉस्टल है, और मिसेज हैरी कोई कॉन्वेन्ट स्कूल की मेट्रन थोडे ही हैं।'' मैं ने कहा, मीनू समझ गई। हम दोनों को एक बहुत पुरानी घटना याद आ गई थी और हम दोनों हंसने लगे थे।

उन दिनों मैं और मीनू स्कूल के हॉस्टल में रहा करते थे। कमरे में बत्ती जला कर सोने की सख्त मनाही थी। अंधेरे में डर के मारे मेरी देह के पोर पोर से पसीना छूटने लगता था और मैं सबकी आंख बचाकर चोरी - चुपके बत्ती जला लेती थी। डिनर के दो घण्टे बाद जब कभी मैट्रन कमरों का राउण्ड लगाने आती, तो मेरा दिल रह रह कर दहल जाता। मैं आंखें मूंद कर प्रार्थना करती रहती। किन्तु मैट्रन की आंखें चील की तरह तेज थीं। उन्हें धोखा देना आसान नहीं था। वह बडबडाते हुए मेरे कमरे में आतीं और बत्ती बुझा जातीं। किन्तु जब वह मेरे कमरे से जाने लगतीं तो मैं कांपते हाथों से उनकी स्कर्ट पकड लेती, '' प्लीज मैट्रन! '' वह हत्बुध्दि सी मेरी ओर देखने लगतीं और झिडक़ने लगतीं, '' क्या बात है, यह क्या बचपना है?''  वह कहतीं, किन्तु मैं उनकी स्कर्ट पकडे रहती और सिसकते हुए बार बार कहती, '' प्लीज मैट्रन,प्लीज - प्लीज ''

सारे हॉस्टल में यही बात फैल गयी थी। ऊंची क्लास की लडक़ियां या मीनू की सहेलियां जब भी मुझे देखतीं, हंसते हुए बार- बार कहतीं,'' प्लीज मैट्रन,प्लीज - प्लीज ,प्लीज ''

'' मीनू  शिमला याद आता है न जाने कितने बरस बीत गये?'' मैं ने कहा।
'' हमने सोचा है‚ अगली गर्मियों में वहां जायेंगे केशी ने अभी तक शिमला नहीं देखा  तुम्हें उन दिनों छुट्टी मिल जायेगी? ''
मैं मीनू को देखती हूं, मुझे कुछ समझ नहीं आता।
'' तुम्हें नहीं मालूम तुम कैसी हो गयी हो कभी शीशे में अपना चेहरा देखा है? ''
'' हाँ, देखा है बडा प्यारा सा लगता है।'' मैं ने कहा।
'' नहीं रूनी मजाक की बात अलग है। तुम्हें हमारे संग चलना होगा। जब से तुम जबलपुर से आई हो।''
लेकिन मीनू आगे कुछ नहीं बोलती। शायद आगे मौन का एक दायरा है जिसे हम दोनों छूते हुए कतराते हैं। शायद मेरा चेहरा बहुत सफेद सा हो गया है और वह डर सी गई है।

मीनू कुर्सी से उठकर मेरे पास - बहुत पास आ गई। उसने मेरे गले में अपने दोनों हाथ डाल दिये। उसकी आंखों में अजीब सा विस्मय है। मुझे भ्रम होता है कि वह मेरे और केशी के बारे में सब कुछ जानती है वे बातें जो सिर्फ मेरी हैं, जिन्हें मैं अपने से भी छिपा कर रखती हूं। किन्तु वह कभी मुझसे कहेगी नहीं  वह बडी बहन है, इसलिये वह  मार्टर  है। वह हमेशा मुझे अपने से बहुत छोटा समझती रहेगी।
ये कुछ ऐसे क्षण हैं, जब मैं मीनू से घृणा करती हूं बचपन से करती आई हूं।

कमरे में सन्नाटा खिंचा रहा। न जाने हम दोनों कितनी देर तक ऐसे ही बैठे रहे।
'' तुम बुरा मान गईं।'' उसका स्वर भीगा- सा था।
'' तुम पागल हो मीनू! ''
'' इस तरह हॉस्टल में अकेले कब तक रहोगी?''
मैं ने उसकी ओर हंसते हुए देखा।
'' अब मुझे डर नहीं लगता।''

मीनू कुछ बोली नहीं, चुपचाप अपनी ऊंगलियों को मेरे बालों में उलझाती रही। उसकी आंखे बहुत उदास हैं। वह मुझसे बडी है, लेकिन ऐसा नहीं लगता कि मैं उससे छोटी हूं। लगता है, जैसे दिन बीतते जाते हैं और वह वहीं - एक ही स्थान पर - खडी रही है, जहां वह बरसों पहले थी। फिर भी उसके सामने मैं अपने को हमेशा ही बहुत हीन पाती हूं। लगता है वह सब कुछ है, मैं उसके सामने कुछ भी नहीं। यह उसका बडप्पन नहीं  वह होता तो कुछ भी मुश्किल नहीं था; तब मैं उससे लड लेती; उसे दोष देकर छुटकारा पा लेती। लगता है, जैसे वह कहीं बहुत ऊंची दीवार पर बैठी है और मैं उसे सिर उठाकर विस्मित आंखों से देख रही हूं।

'' रूनी बहुत देर हो गयी, तुम कपडे नहीं बदलोगी?'' मीनू उठ खडी हुई।
'' ठहरो चलती हूं। यह स्वेटर किसका है?'' मेरी निगाहें सामने सोफा पर टिक गईं जहां हल्के सलेटी रंग के ऊन की लच्छियां और उनमें उलझी सलाइयां पडीं थीं।
'' केशी का पुलोवर है  पूरी बांहों का।'' बुना हुआ हिस्सा उठा कर उसने मेरे हाथों में रख दिया।
'' कैसा है कल ही शुरु किया है।'' मैं ने उसे छुआ नहीं, एक लम्बे क्षण तक उसे अपने हाथों पर वैसे ही पडा रहने दिया मेरे हाथ उसके नीचे दब गये हैं। उसके नीचे दब कर सिकुड से गये हैं। मीनू की स्निग्ध, शांत आंख और मेरे कांपते हाथों के बीच केशी का अधबुना स्वेटर एक लम्बे पल के लिये बिना हिले डुले पडा रहता है।

मैं ने आज तक केशी को फुल स्लीव का पुलोवर पहने नहीं देखा। पता नहीं उस पर कैसा लगेगा?

मीनू ड्राईंगरूम में चली गई। मैं कुछ देर तक उस कमरे में अकेली बैठी रहती हूं। सब ओर सन्नाटा है। केवल किचन से प्यालों और प्लेटों की हल्की खनखनाहट सुनाई दे जाती है। दरवाजे क़ी जाली पर फीकी सी चांदनी उतर आई है।

खिडक़ी के परे बरामदा है, लाल बजरी की सडक़ है। उसके पीछे मोटर रोड को लांघ कर पहाडी आती है, जिसके टीले लॉन से दिखाई देते हैं और लॉन में पत्तियां हैं, हवा में सरसराती घास है
'' तुम अभी तक यहां बैठी हो?'' मीनू के स्वर में हल्की सी झिडक़ी थी। मैं चौंक गई। केशी का स्वेटर अब भी मेरी गोद में पडा था।
'' मीनू क्या झाडियों में बेर आ गये?''
'' अभी कहाँ? कहीं दिसम्बर में जाकर पकेंगे। याद नहीं पिछले साल इन्हीं दिनों हम पहाडी में पिकनिक पर गये थे। बेर खाकर शैल का गला पक आया था।''
'' वे कच्चे थे।तुमने पके बेर नहीं खाये, बिलकुल काफल जैसे मीठे होते हैं मीनू, शिमले के काफल याद हैं?''
'' और खट्टे दाडू  तुम उनका लाल रस अपनी उंगली पर लगाकर कहती थीं - यह मेरा खून है।'' और मां डर जाती थीं।''

हम उस क्षण भूल गये कि इन बरसों के दौरान ढेर सी उम्र हम पर लद गयी है कि बरसों पहले उसका विवाह हुआ था और मैं एक बच्चे की मां हूं। हम दरवाजे पर खडे ख़डे देर तक एक दूसरे को वे बातें याद दिलाते रहे, जो हम दोनों को मालूम थीं, जिन्हें हमने कितनी बार दुहराया था, किन्तु हर बार यही लगता था कि हम उन्हें भूल गये हों, हर बार उन्हैं दुबारा याद करने का बहाना सा करते थे।

'' कल तुम्हारा ऑफ डे है  हम लोग पहाडी पर जायें तो कैसा रहे?''
'' सच! '' मैं ने खुशी से मीनू का हाथ पकड लिया।
'' केशी से कहेंगे वह अपना ग्रामोफोन ले चले बिलकुल पिछले साल की तरह।''
'' रूनी, इट विल बी वण्डरफुल सच बिलकुल पिछले साल की तरह।''

पिछला साल  एक ठण्डी, बर्फीली सी झुरझुरी मेरी पीठ पर सिमट आई वह सितम्बर का महीना था, मैं शैल को लेकर दिल्ली आई थी। सब कुछ पीछे छोड आई थी, अपना घर बार अपनी गृहस्थी। सबने यही समझा था कि मैं कुछ दिनों के लिये रहने आई हूं। कुछ दिन रहूंगी और फिर वापस चली जाऊंगी। यही सितम्बर का महीना था  हम पहाडी पर पिकनिक के लिये गये थे बेर की झाडियों के पीछे मैं ने साहस बटोर कर मीनू से पहली बार बात कही थी, जो इतने दिनों से मैं अपने में छिपाती चली आ रही थी। मीनू ने समझा था मैं हंसी कर रही हूं, किन्तु अगले पल जब उसने मेरे चेहरे को देखा तो वह चुप रही थी, कुछ भी नहीं बोली थी एकदम फटी फटी आंखों से मुझे निहारती रही थी

कल उस बात को बीते एक साल हो जायेगा। कल हम फिर पिकनिक के लिये जायेंगे।

गेस्टरूम की बत्ती जली है। मैं दरवाजे के पास जाकर ठिठक जाती हूं। पीछे देखती हूं। फाटक के पास चांदनी में मेरी छाया लॉन के आर पार खिंच गई है। लगता है, रात सफेद है, बंगले की छत, दूर पहाडी क़े टीले, घास पर एक दूसरे को काटती छायाएं  सब कुछ सफेद हैं। घास के तिनके अलग अलग नहीं दीखते एक हरा सा धब्बा बन कर पेडों के नीचे वे एक दूसरे के संग मिल गये हैं।

यहां से उस कमरे का कोना दीखता है, जिसमें मीनू और केशी सोते हैं  कोना भी नहीं, केवल दीवार का एक टुकडा - जो झाडियों से जरा दूर है लेकिन लगता है जैसे झाडियां अंधेरे के संग संग दीवार के पास तक खिसक आई हैं। एक क्षण के लिये भ्रम होता है कि मैं भूल से यहां आ गई हूं, कि यह मीनू का बंगला नहीं है, वह लॉन नहीं है, जिसके कोने कोने से मैं परिचित हूं। जब कभी कोई पक्षी झाडियों से बाहर निकल कर उडता है, उसके डैनों की छाया घूमते हुए लहू की तरह चांदनी पर फिसलने लगती है।

कमरे में दबे पांवों से आई। मेरे पलंग के पास शैल का बिस्तर लगा था। चप्पल उतार कर मैं धीरे से उसके पास बैठ गई। देर तक उसकी मुंदी आंखों को देखती रही एक बार उसने आंखें खोलकर मुझे देखा था केवल निमिष भर के लिये - किन्तु नींद ने दूसरे ही क्षण उसकी पलकों को अपने में ओढ लिया था।

बत्ती बुझा कर मैं अपने बिस्तर पर लेट गयी। चांदनी इतनी साफ है कि बुक केस पर रखी केशी की किताब का टाइटल भी अंधेरे में चमक रहा है   टाइम, स्पेस एण्ड आर्किटैक्चर। बाहर की खुली खिडक़ी पर शैल के झूले की रस्सी टंगी है। उसकी छाया खिडक़ी की जाली पर तिरछी रेखाओं सी पड रही है। जब हवा का झौंका आता है, तो ये रेखाएं मानो डरकर कांपती हुई एक दूसरे से सट जाती हैं।

न जाने क्यों मेरा दिल तेजी से धडक़ने लगता है। शायद मेरा भ्रम रहा होगा और मैं सांस रोके लेटी रहती हूं। कमरे की चुप्पी में एक अजीब सी गरमाहट है जैसे कोई चीज दीवारों से रिस रिस कर बहती हुई मेरे पलंग के इर्द गिर्द जमा हो गयी हो। लगता है जैसे पास लेटी शैल की सांस मेरे पास आते आते भटक जाती है और मैं उसे सुन नहीं पाती।

सुनती हूं  कुछ देर ठहरकर, कुछ निस्तब्ध पलों के बीच जाने के बाद दुबारा सुनती हूं। न, पहला भ्रम महज भ्रम नहीं था। बीच के गलियारे में धीमी सी आहट हुई है। कुछ देर तक सन्नाटा रहता है। कई मिनट इसी तरह अनिश्चित प्रतीक्षा में बीत जाते हैं। बाहर का दरवाजा हवा चलने से कभी खुल जाता है, कभी बन्द हो जाता है। जब खुलता है तो गलियारे में धूल से सनी पत्तियां दीवार से चिपटी हुई तितलियों की तरह उडने लगती हैं।

गलियारे के सामने लाइब्रेरी की बत्ती जली है।खूंटी से मीनू की शॉल उतार कर मैं ने ओढ ली। बाहर आई नंगे पांव। लाइब्रेरी का दरवाजा खुला था। टेबललैम्प के हरे शेड के पीछे केशी का चेहरा छिप गया है सोफा पर केवल उसकी टांगे दिखाई देती हैं। सामने तिपाई पर कोन्याक की बोतल और खाली गिलास पडे हैं उनकी छाया हू ब हू वैसी ही स्टिल लाइफ की तरह दीवार पर खिंच आई है। बिलकुल चुप, बिलकुल स्थिर।

'' तुम अभी सोई नहीं?''
उसने मुझे देख लिया था। मैं कुछ देर तक चुपचाप देहरी पर खडी रही।
'' इतनी रात यहां क्या कर रहे हो? ''
वह सोफा पर बैठ गया। उसकी उंगली अभी तक किताब के पन्नों के बीच दबी थी।
'' मीनू को पसन्द नहीं कि मैं उसके कमरे में पियूं। रात को मैं अकसर यहां आ जाता हूं।''
'' यहीं सोते हो?'' मेरा स्वर कुछ ऐसा था कि खुद मुझसे नहीं पहचाना गया।''
'' कभी कभी  एनी वे, इट हार्डली मेक्स एनी डिफरेन्स, इज लेट?'' उसने धीमे से हंस दिया। मैं कभी उसकी ओर देखती रही। बाहर अंधेरे में बजरी की सडक़ पर भागती पत्तियों का शोर हो रहा था। कुछ देर तक हम दोनों रात की इन अजीब, खामोश आवाजों को सुनते रहे।

'' मैं तुम्हारे कमरे तक आया था - फिर सोचा, शायद तुम सो गई हो।''
'' कुछ कहना था?''
'' बैठ जाओ।''
केशी का चेहरा पत्थर सा भावहीन और शान्त था। उसमें कुछ भी ऐसा नहीं था, जिसे मैं पढ पाती। उसकी छाया आधी ग्रामोफोन पर, आधी दीवार पर पड रही है। ग्रामोफोन और किताबों की शेल्फ के बीच एक छोटी सी मेज है, जिस पर रिकार्डों का बण्डल रखा है, जो शायद अभी तक नहीं खोला गया
'' ज़बलपुर से चिट्ठी आई है।''
केशी ने मेरी ओर नहीं देखा। वह शायद यह भी नहीं जानता कि मैं उसकी ओर देख रही हूं।
'' तुमसे पूछना था कि क्या उत्तर दूं।'' उसने कहा।
मैं प्रतीक्षा कर रही हूं - लेकिन केशी चुप है। वह भी शायद प्रतीक्षा कर रहा है।
'' तुम्हें क्यों भेजा है?''
'' पत्र तुम्हारे लिये है, सिर्फ लिफाफे पर मेरा नाम है।'' केशी ने जेब से लिफाफा निकाला और उसे ग्रामोफोन पर रख दिया।
'' इसे पढ लो।''

लिफाफे पर जो हस्तलिपी है, उसे पहचानती हूँ। उसे देखकर जिस व्यक्ति का चेहरा आंखों के सामने घूम जाता है, उसे पहचानती हूँ। क्या मैं कभी अपने अतीत से छुटकारा नहीं पा सकूंगी वह हमेशा छाया की तरह पीछे आता रहेगा?
'' पढोगी नहीं?''
'' क्या होगा?''
केशी हताश भाव से मुझे देखता है मैं जानती हूँ, वह क्या सोच रहा है।
'' तुम्हें बुलाया है।''
'' जानती हूँ।''
'' वह एक बार शैल को देखना चाहते हैं।''
'' वह शैल के पिता हैं जब आकर देखना चाहें देख लें अपने संग ले जाना चाहें ले जायें मैं रोकूंगी नहीं।''
मैं रोकूंगी नहीं यही मैं ने कहा था। केशी निर्विकार भाव से मुझे देखता रहा था।

वह सोफा से उठ खडा हुआ। मैं अपनी कुर्सी से चिपकी बैठी रहती हूँ। मुझे लगता है, मैं रात भर इसी कुर्सी पर बैठी रहूंगी, रात भर केशी खिडक़ी के पास खडा रहेगा।
'' रूनी, तुमने सोचा क्या है? क्या ऐसे ही रहोगी?''
मेरी आंखें अनायास उसके चेहरे पर उठ आईं थीं। कुछ है मेरे भीतर जो बहुत निरीह है, बहुत विवश है। केशी उसे नहीं देखता- देखता है, तो भी शायद आंखें मूंद कर। इस क्षण भी वह चुप है। उसकी भावहीन, पथरीली आंखों में कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसे मैं ले सकूं, जो वह मुझे दे सके। मुझे अचानक शर्म आती है- अपने पर, अपनी कमजोरी पर और मैं हंस पडती हूँ। मेरी समूची देह बार बार किसी झटके से हिल उठती है।
'' रूनी! ''
केशी का मुख एकदम म्लान सा हो उठा था। उसका स्वर मुझे अजीब सा लगा था। मैं हंसते हंसते सहसा चुप हो गयी। वह धीमे झिझकते कदमों से मेरे पास चला आया था। बीच में ग्रामोफोन था, ग्रामोफोन पर लिफाफा रखा था।
'' रूनी, मुझे तुमसे कुछ और नहीं कहना है। तुम चाहो तो, अपने कमरे में जा सकती हो। ''
मैं कुछ नहीं कहती  मैं सिर्फ उसकी कमीज क़ा खुला कॉलर देख रही हूँ, जिसके पीछे उसकी छाती के भूरे बाल बिजली की रोशनी में चमक रहे हैं। दूसरे कमरे में कभी कभी सोती हुई शैल की सांसे सुनाई दे जाती हैं। उन्हें सुनकर मन फिर स्थिर हो जाता है। लगता है उन नरम सांसों की आहट ने कमरे की हवा को बहुत हल्का सा कर दिया है।

'' सुना है, तुम कुछ नये रिकॉर्ड लाए हो?''
'' हाँ, सुनोगी?''
'' अभी नहीं, शैल सो रही है।''
'' हम तुम्हारे हॉस्टल गये थे।''
'' हां, मीनू ने कहा था। तुमने कार का हॉर्न बजाया था।''
'' तुमने सुना था? तुम नीचे क्यों नहीं आईं? हम पोर्च के बाहर खडे रहे थे।''
'' मैं सो रही थी। मुझे लगा, मैं सोते हुए सुन रही हूँ।''

कुछ देर तक हम चुप बैठे रहे। मुझे लगा हम दोनों किसी छोटे से स्टेशन के वेटिंग रूम में बैठे हैं। दोनों चुपचाप अपनी अपनी ट्रेनों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। किन्तु बीच के इन लम्हों को हम अच्छी तरह गुजार देना चाहते हैं ताकि बाद में हम दोनों में से किसी को एक दूसरे के प्रति कोई गिला, कोई शिकायत न रहे।

'' यू वोन्ट माइन्ड रूनी विल यू?'' किन्तु उसने मेरे उत्तर की प्रतीक्षा नहीं की। मैं ने चुपचाप सिर हिला दिया।
ग्लास में कोन्याक ढालते हुए उसने मेरी ओर देखा था।
'' तुम्हें बुरा तो नहीं लगता रूनी?'' उसका स्वर बहुत धीमा सा कोमल हो आया था।
'' मीनू को बुरा लगता है। रात को वह मुझे अपने कमरे में नहीं पीने देती।''
मैं चुपचाप उसकी ओर देखती रहती हूँ। लगता है इस क्षण भी, जब वह मेरे सामने तिपाई पर झुका हुआ पी रहा है - उसमें कुछ ऐसा है - जिसके केवल होने भर का आभास होता है, किन्तु जो उंगलियों में आता आता फिसल जाता है। मैं उसका गोल, पीला चेहरा, गालों की चौडी, उभरी हुई हड्डियां, तनिक गहरी उदास आंखें देख सकती हूँ। सिर के बाल धीरे धीरे उडते जा रहे हैं, जिनके कारण माथा बहुत ऊंचा दिखाई देता है। कुछ चेहरे होते हैं जो तुरन्त अपना प्रभाव अंकित कर जाते हैं। केशी का चेहरा ऐसा नहीं था। उसमें कुछ भी ऐसा नहीं था जो दृष्टि को रोक सके, एकाएक स्तम्भित कर सके। वह चेहरा बहुत पुराना है, जिसे देखना नहीं होता, केवल पहचानना होता है। यह अजीब है, किन्तु जब कभी मैं उसके चेहरे को देखती हूँ, पुराने पत्थरों पर खुदा  हायरोग्राम  याद हो आता है बहुत दूर किन्तु पहचाना सा

'' आज शाम मैं ने तुम्हें खिडक़ी से देखा था।'' उसने कहा।
'' कहाँ?''
'' तुम अंधेरे में लॉन में बैठी थीं मैं ने तुम्हें बंग्ले में आते देखा था। तुम फाटक के भीतर घुसी थीं। तुम घास पर बैठी रही थीं और भीतर किसी को मालूम नहीं हुआ कि तुम हॉस्टल से आ गई हो अंधेरे में घास पर बैठी हो। वे सब तुम्हारी राह देखते रहे थे।''

केशी ने अपने गिलास में कुछ और कोन्याक ढाल ली, हालांकि अभी गिलास खाली नहीं हुआ था। वह मेरी ओर नहीं देख रहा  वह खिडक़ी के बाहर देख रहा है, मानों मैं अब भी कमरे में न होकर अंधेरे लॉन में बैठी हूँ।''

'' इन गर्मियों में शायद हम शिमला जायेंगे।''
'' हाँ, मीनू ने बताया था।''
'' तुम भी हमारे संग चलोगी?''
मैं हंसने लगती हूँ। फिर हम खामोश हो जाते हैं। बाहर गलियारे में एक छोर से दूसरे छोर तक सूखे पत्ते भाग रहे हैं। हवा से दरवाजा कभी खुलता है, कभी बन्द होता है।

'' केशी, एक बात पूछूँ? ''
'' क्या रूनी? ''
'' तुमने मुझे वह पत्र क्यों दिखाया? क्या तुम सचमुच सोचते थे कि मैं वापस लौट जाऊंगी।''
'' यह तुम्हारी इच्छा है रूनी।''
'' और तुम? '' मैं हकला कर चुप हो जाती हूँ क्योंकि मैं जानती हूँ, आगे कुछ भी कहना बेकार है। लगता है हम दोनों एक ऐसी स्थिति में पहुंच गये हैं, जहां शब्दों के कोई अर्थ नहीं रह जाते, जहां हम बिना सोचे समझे एक दूसरे से झूठ बोल सकते हैं, क्योंकि झूठ कोई मानी नहीं रखता। लगता है शब्दों का झूठ सच हमसे नहीं जुडा है  वे अपनी जिम्मेदारी पर खुद खडे है। उस क्षण मुझे पहली बार पता चला कि जो शब्द हम बोलते हैं, वे कभी कभी अपने में कितने अकेले हो जाते हैं।

केशी ने धीरे से गिलास उठाया। गिलास के कांच और उंगलियों के बीच रोशनी का धब्बा कोन्याक पर धीरे धीरे तिर रहा है।
'' तुम यहां हॉस्टल में कब तक रहोगी?''
मैं धीरे से हंस देती हूँ।
'' तुम मेरे बारे में कबसे सोचने लगे केशी?''
कोन्याक पर केशी की आंखें थिर हैं  माथे पर पसीने की हल्की झांई उभर आई है। उसके होंठ गिलास से चिपके हैं वह पी नहीं रहा।

वह पी नहीं रहा और मैं चुप बैठी हूँ और मुझे लगा कि मुझे कुरसी से उठ जाना चाहिये और अपने कमरे में चला जाना चाहिये, फिर भी मैं बैठी रही और मैं कुछ भी नहीं सोच रही थी - और मुझे जरा अजीब लगा था कि मीनू अपने कमरे में सो रही है और इतनी रात गये मैं केशी के कमरे में बैठी हूँ और दूसरे कमरे में शैल है जो कल मुझे अपने बिस्तर के पास देख हैरान हो जायेगी और मुझे धीरे धीरे बहुत देर तक ढेर सी खुशी हो रही है कि कल शाम को मैं वापस अपने हॉस्टल लौट जाऊंगी  वहां मिसेज हैरी हैं, मेरा अकेला कमरा है निखिल है ये सब इस बंगले की परिधि से बाहर हैं, केशी के ग्रामोफोन से, ग्रामोफोन पर रखे लिफाफे से बाहर हैं वे मेरा अतीत नहीं जानते, और मुझसे कभी कोई ऐसा प्रश्न नहीं पूछते, जिसका कोई उत्तर नहीं है-  मेरे पास नहीं है।

निखिल केशी से कितना अलग है! निखिल का सम्बन्ध बहुत सी चीजों से है  यदि हम उन्हें समझ लें तो निखिल को जानना सहज है। केशी निखिल नहीं है - उसके डिजाइन, उसके रिकॉर्ड, सब उससे अलग हैं; उसे समझने के लिये केवल उसके पास ही जाया जा सकता है, और वह चुप है।

मैं ने एक बार केशी से पूछा था कि वह आर्किटैक्ट है, उसे क्लासिकल म्यूजिक़ से इतना लगाव कैसे उत्पन्न हो गया?
''देयर इज स्पेस, '' उसने बहुत धीरे से अंग्रेज़ी में कहा था।
'' स्पेस? '' मैं आश्चर्य से उसकी ओर देखती रही थी।
'' हाँ, स्पेस दोनों ही अपने अपने ढंग से छूते हैं।'' उस क्षण उसके होंठों पर झिझकती सी मुस्कुराहट सिमट आई थी।

मैं ने उसकी आंखों में वह अजीब सी दूरी देखी थी, जो उस बूढे अंग्रेज की आंखों में थी, जिसने हमें सिमिट्री के भीतर जाने से रोक लिया था। तब मैं बहुत छोटी थी। एक शाम अपने नौकर के संग सैर करती हुई शिमले में संजौली की सिमिट्री तक चली गई थी। चारों तरफ पहाडियां थीं, बडे बडे पत्थरों के बीच उगती लम्बी घास थी। हम कब्रों को देखना चाहते थे, लेकिन सिमिट्री का फाटक बन्द था। कुछ देर बाद एक बूढा अंग्रेज हमारे पास आया था। उसने हमसे पूछा था कि हम वहां - सिमिट्री के सामने - क्यों खडे हैं। '' इसका फाटक क्यों बन्द है?'' मैं ने पूछा था।
'' हमेशा बन्द रहता है।'' उस अंग्रेज ने हंसते हुए कहा था, '' सो द डेड मे लाई इन पीस।''

आज बरसों बाद भी मैं उस बात को भूली नहीं हूं आज भी जब कभी केशी  स्पेस  की बात करता है, तो उसकी आंखों में वही आलंघ्य, अपरिचित दूरी का सा भाव घिर आता है, जो बरसों पहले मैं ने उस अंग्रेज की आंखों में देखा था और मुझे लगता है कि सामने बन्द फाटक है, जो कभी कोई नहीं खोलेगा, कब्रें हैं , पहाडी हवा है, और पत्थरों के बीच लम्बी घास है, जो हवा में कांपती है, धीरे से मेरे कानों में कह रही है - '' लेट द डेड लाइ इन पीस

गलियारा पार करके मैं अपने कमरे में लौट आई थी अपने बिस्तर पर लेटी रही थी। न जाने कितने मिनट गुज़र गये। देर तक लॉन में झिंगुरों का स्वर सुनाई देता रहा। परदे के रिंग चांदनी में बडे बडे छल्लों से चमक रहे हैं, और जब हवा चलती है तो धीरे से खनखना उठते हैं।

केशी के कमरे की बत्ती का आलोक अधखुले दरवाज़े से निकल कर मेरे संग संग भीतर चला आया है। बंगले के परे लॉन के परे पहाडी मौन का है इस समय भी वहां चांदनी फैली होगी ह्न झाडियों पर, पुराने पत्थरों पर कोई नहीं जानेगा कि कहां टीलों और सदियों पुरानी चट्टानों के बीच एक बेर की झाडी है पिछले साल उस झाडी क़े पीछे मैं ने मीनू से कुछ कहा था, वे शब्द आज भी कहीं कच्चे बेरों के संग पडे होंगे।

आधी रात को सहसा मेरी आंख खुल गयी थी। शायद खिडक़ी के सामने झूले की रस्सी की परछांई को देखकर मैं डर गयी थी। रजाई उठाने के लिये मैं ने अपना हाथ आगे बढाया था  क्षण भर के लिये मेरे हाथ कमरे के अंधेरे में फैले रहे थे। मैं एकाएक आतंकित सी हो उठी थी; मुझे लगा था जैसे मेरी टांगे एकदम बर्फ सी ठण्डी हो गयी हैं। मैं ने शैल के बिस्तर की ओर देखा वह सो रही थी, उसका आधा चेहरा कम्बल में छिपा था, आधे चेहरे पर फीकी सी चांदनी सरक आई थी।

मैं बिस्तर से उतर कर कमरे की देहरी तक चली आई गलियारे में निपट अंधेरा था। लायब्रेरी की बत्ती गुल हो गई थी, लेकिन दरवाज़ा खुला था मैं देहरी पर खडी रही।

एक आवाज है  आवाज भी नहीं, केवल एक प्रवाह है, जो टूट रहा है, जितना टूट रहा है, उतना ही ऊपर उठ रहा है हवा से भी पतली एक चमकीली झांई धीमे, बहुत धीमे एक उखडी, बहकी हुई सांस की मानिन्द मेरे पास चली आती है। चली आती है, और उसे कोई नहीं रोकता, जैसे वह अपना दबाव खुद है। खुद अपने दबाव के नीचे खिंच रही है। लगता है जैसे हवा स्वयं एक घूमते हुए घेरे के बीच आ गई हो भूल से फंस गई हो और उडने के लिये, उस घेरे से मुक्ति पाने के लिये अपने पंख फडफ़डा रही हो।

'' केशी।'' मैं ने धीरे से कहा - '' केशी '' - मैं अंधेरे में खडी रही- देहरी पर। मुझे लगता है जैसे मेरे भीतर बादल का एक श्यामल टुकडा आ समाया है - वह बूंद बूंद टपक रहा है। मैं उसके नीचे खडी हूं और भीग रही हूं देर तक खडी भीग रही हूँ!

शायद कोई लांग - प्लेयिंग रिकॉर्ड रहा होगा - क्योंकि जब तक मैं सो नहीं गई वह बजता रहा था। आज केशी नये रिकॉर्ड लाया है - जब तक वह सब नहीं बजा लेगा - तब तक उसे शान्ति नहीं मिलेगी।

मैं करवट बदल कर लेट जाती हूँ - मैं ने अपना एक हाथ शैल के तकिये के नीचे रख दिया और मैं धीरे धीरे उसके पास खिसक आती हूँ। मैं चाहती हूँ कि उसकी देह की गरमाई अपने में खींच लूं।

चांदनी का एक चौकोर, बित्ते भर का टुकडा केशी की किताब पर पड रहा है  स्पेस, टाइम एण्ड आर्किटैक्चर  । मैं देर तक उस टाइटल को देखती रहती हूँ। फिर पलकें झुक जाती हैं सोने के पहले केवल एक धुंधला सा विचार बह आता है

कल हम सब पिकनिक करने पहाडी पर जायेंगे।

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                                                                                                                                                                    कहानी समकालीन


                                                                                                                                                                         -शैल अग्रवाल

                       सपना वही एक

" तू तो मेरी नन्ही-सी राजकुमारी है... "

" कौन सी, परियों वाली--" अपने रूई से फूले, गढ्ढे वाले गालों में उँगलियाँ घुमाते हुए चारु ने चहककर पूछा ?

" नहीं, असली वाली। परियों वाली में क्या रखा है बिट्टो ! जिन्दगी के सब सुख तो असली राजकुमारी ही लेती है।" गुड़िया सी बेटी को गोदी में बिठाकर पापा बोले।

बिना जादू की छड़ी और परों के असली राजकुमारी क्या मजे ले पाती होगी चार साल की चारू के कुछ भी समझ में नहीं आ  पाया, फिर भी उसने चुपचाप पापा की बात मान ली क्योंकि वह जानती थी कि उसके पापा सबकुछ जानते हैं। कभी गलत हो ही नहीं सकते। सोमेन्द्र ने भी तो अपना तन-मन, जिन्दगी का हर पल, सब कुछ बस बेटी के ही नाम तो कर रखा था। वह उसे इतना समर्थ और समझदार देखना चाहते थे कि जिन्दगी में हार का मुँह तक न देखे--य़थासंभव धोखा न खाए कभी उनकी गुड़िया। इतना सुख देना चाहते थे कि कभी उसे लगे ही नहीं कि वह असली राजकुमारी नहीं -- एक साधारण-सी लड़की है और एक साधारण-से आदमी के घर में पैदा हुई है।

पापा यह भी जानते थे कि सुख-सुविधाओं के बाद भी सफल जीवन के लिए योगियों जैसा सँयम भी कितना जरूरी है। निष्काम रहना जरूरी है। इसलिए नहीं, क्योंकि ऋषि-मुनी और योगी यही कहते और करते आए हैं, बल्कि इसलिए कि यदि दुखों से बचना है, तो यही और सिर्फ यही एक तरीका है, इस कठिन दुनिया में जिन्दा रहने का। छोड़ना और छूटना--बस यही तो दो इस जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई हैं। मानो कभी यह राज-पाठ किसी वजह से छूट ही जाए या फिर छोड़ना ही पड़ जाए, तो कम-से-कम दुख तो न पाए उनकी लाडली। आसानी से सब छोड़ पाए, बिल्कुल सीता मैया की तरह। वैसे भी यह सुख-दुख, आम- खास कुछ भी तो नहीं। बस मन के खेल हैं सब। जो आज आम है, कल खास भी तो हो सकता है। बात बस भरोसे और विश्वास की ही तो है। और यही एक विरासत--सच्चाई और आत्म-विश्वास की राज-गद्दी अपने बाद वह अपनी नन्ही के लिए छोड़ना चाहते थे।

असली राजकुमारी बनना कितना कठिन है, यह ठीक से पहली बार चारु को उस दिन समझ में आया , जब स्कूल से घर आते ही, पापा का प्यार नहीं वरन् जाँच-पड़ताल का सामना करना पड़ा था उसे। चारू को स्कूल शुरू किए बस अभी कुछ महीने ही बीते थे और आज पहली बार रोज की तरह पापा ने उससे स्कूल में क्या खाया-- क्या पढ़ा---कौन-सा डाँस का नया स्टेप सीखा --- कौन-सी तस्वीर बनाई यह सब कुछ नहीं पूछा था। बस बिना कुछ पूछे और कहे अदालत के कटघरे में ला खड़ा किया था उसे। जज की तरह लाल आँखों और कड़कती आवाज में वह बारबार पूछे जा रहे थे, " सच-सच बतलाओ चारु, आज तुमने कितने पानी के बताशे खाए थे ? चार या छह ?"

चारू कुछ जबाव दे इसके पहले ही मा ने आकर उसे अपनी गोदी में छुपा लिया था। इतनी कड़ी-कड़कती आवाज, वह भी चारु के लिए, इस घर में किसी ने कभी नहीं सुनी थी। सच्ची बात तो यह है कि उसदिन तो मा भी डर गई थीं।

"---यह कैसा अटपटा सवाल है---चार खाए या छह-- क्या फर्क पड़ता है ?"

मा सफाई में धीरे से बुदबुदार्इं।

" पड़ता है--- मुझे पड़ता है। " पता नहीं कैसे पापा ने सब सुन लिया था और अब वह आपे से बाहर थे।

" मैं जानता हूँ वह चाट वाला सरासर झूठ ही बोल रहा था। मेरी बेटी उधार के बताशे कभी नहीं खाएगी। सुसरा, आज बीच बाजार में खीसें निपोर रहा था-‘बाबूजी, अबतो अपनी बिटिया बड़ी हो रही है। आज पूरे छह बताशे खा लिए उसने।‘ छह-? तुम ही कहो, यह कैसे हो सकता है ? मैं तो इसे बस एक रुपया देता हूँ और एक रुपए में सिर्फ चार बताशे आते हैं। फिर इसने छह कैसे खा लिए ? मैने भी तुरँत उसके मुँह पर अठन्नी दे मारी और खबरदार किया कि आइँदा यदि पैसे चाहिएँ तो मुझसे माँगे, पर शेखी में भी चारू के खिलाफ कोई उलटी-सीधी बात न करे। मेरी बेटी है वह-- भूखी रह लेगी पर उधार का नहीं खाएगी।"

छोटी होकर भी चारु पापा की बात समझ रही थी। पापा का डगमग आत्म-सम्मान और बेटी के चरित्र पर अटूट भरोसा- दोनों ही देख पा रही थी वह। यही भरोसा ही तो था जिसे वह कभी नहीं तोड़ पाई थी, बड़ी होकर भी नहीं। हजार तकलीफों के बाद भी नहीं...आकर्षण चाहे कितना भी सशक्त हो और कीमत कितनी भी बड़ी।

पापा उसे कितना प्यार करते थे या नहीं करते थे, यह वह कभी भी पूरी तरह से ठीक-ठीक नहीं जान पाई थी पर पापा की जरा सी तकलीफ भी उससे बर्दाश्त नहीं होती थी। यही वजह थी कि उस दिन भी मा की गोदी से उतर कर, चार साल की नन्ही चारु, चुपचाप बिना कुछ बोले, बिना बुलाए ही, लड़खड़ाते कदमों से पापा के आगे जा खड़ी हुई थी । सर झुकाए-झुकाए ही बोल पड़ी थी ,

" आई एम सॉरी पापा, मैने छह बताशे ही खाए थे। मेरी-- " इसके पहले कि चारु का वाक्य पूरा हो, पापा का कड़कड़ाता और जिन्दगी का पहला चाँटा झनझनाकर चारु के कोमल गाल पर था। चाँटा नहीं जिन्दगी का पहला पाठ था यह। जान गई थी चारू कि पापा नहीं चाहते कि उनकी राजकुमारी पहले मोड़ पे ही फिसले। पापा के आँसू कह रहे थे कि उसे मारकर उन्हें भी कम तकलीफ नहीं हुई थी, परन्तु बात ही कुछ ऐसी तेज और धारदार थी---वैसे तो, कुछ भी नहीं। फिर भी बहुत कुछ।

राजकुमारी हो या परी, जरूरतों को अपनी सामर्थ से ज्यादा बढ़ाने पर दुख मिलना निश्चित है और अपनी राजकुमारी के लिए दुख की कल्पना मात्र पापा के लिए असँभव थी। मम्मी की बात और थी। मम्मी का बस चलता तो आकाश के सारे तारे तोड़कर बेटी के पैरों के नीचे बिछा देतीं। उनकी ममता सही-गलत की सीमाएँ नहीं जानती थी। बस अपनी गुड़िया की मुस्कान उनके जीवन का ध्येय और मोक्ष दोनों ही थी। बेटी को उन्होंने बस एक ही हिदायत दे रखी थी। छूठ मत बोलना, किसी को दुख मत देना। तुमने अगर इन दोनों में से

एक भी गलत काम किया तो तुम्हारी भी जानवरों की तरह दुम निकल आएगी। क्योंकि ऐसे बिना सोचे-समझे, दूसरों को तकलीफ देने वाले काम बस जानवर ही तो करते हैं।

" पर जानवरों को तो बात करनी नहीं आती मां ? " चारु के प्रश्न पूछने पर मा ने हँसकर कहा था

" आती क्यों नहीं--- बस उनकी बात का कोई मतलब नहीं होता जैसे छूठों की बात का नहीं होता।"

नन्ही चारु को सब समझ में आ गया--सच क्या होता है, झूठ क्या है और मा की बात मानना उसके लिए कितना जरूरी है।

और फिर उसके बाद एकदिन गुसलखाने के शीशे के आगे रुँआसी खड़ी चारु, चढ्ढी सरकाए घँटों अपना पिछवाड़ा

निहारती रह गई थी। जब मा से और नहीं रहा गया तो प्यार से पूछ ही बैठी थीं--

" क्यों परेशान है बेटा ?" और रुआँसी चारु बोली थी--" क्या निकल आई मा ?"

मा नहीं समझ सकीं बेटी क्या कह रही है--और क्या निकल आयी ?

तब परेशान बेटी ने कुछ शरमाकर, कुछ ग्लानि से पूछा था----" वही दुम ?"

मा को सब समझ में आ गया। वह जानती थीं कि किसी भी हालत में उनकी चारु झूठ नहीं बोलेगी--इतना विश्वास है उन्हें उस पर और आत्म-विश्वासस है उनकी बेटी के पास। जरूर किसी बच्चे से आज पहली बार लड़ाई हुई है। हाथा-पाई हुई है और पहली बार आवेशवश उनकी चारु वह कर आई है जो उसे नहीं करना चाहिए था। और अब बस मा की बताई कथित दुम निकलने का इन्तजार कर रही थी ।

जानते हुए भी कि बेटी ने आज नियम तोड़ा है, मा ने उसे डाँटा या मारा नहीं था-- ना ही वे उसपर नाराज ही हुर्इं थीं। बल्कि उसे गोदी में लेकर, उसके परेशान मन को बारबार तसल्ली देने की कोशिश की थी। ढाढस बँधाया था। प्यार से समझाया-बुझाया था,

" डरो मत, यदि गलती करके माफी माँग ली जाए, वचन दिया जाए कि अब दुबारा फिर कभी ऐसा नहीं होगा तो भगवान भी माफ कर देता है और कोई दुम नहीं निकलती। "

हमेशा की तरह उस दिन भी मा की गोदी में जाते ही परेशान चारु हँस पड़ी थी, विश्वस्त हो गई थी। और उसने मा को सच-सच सब कुछ बता दिया था --कैसे और क्यों उसने अपनी सहेली को मारा था-- जाने क्यों, वह उसकी गुड़िया ही नहीं दे रही थी और वह अपनी गुड़िया माँग-माँगकर थक गई थी।

और तब मा ने बेटी का माथा चूमकर एक और नया सच समझाया था उसे,

" अपने अधिकार के लिए तो लड़ना ही चाहिए हमेशा, बस कोशिश यह रहनी चाहिए कि कम-से-कम तोड़-फोड़ हो, मनमुटाव हो।

जो सच्चा है वही साफ-सुथरी लड़ाई लड़ सकता है। "

जिन्दगी एक सपने की तरह निकल रही थी। चारु हर इम्तिहान में ही खरी उतर रही थी। आज तो इन दिवाली के दियों की तरह सोमेंद्र का मन भी झिलमिल कर रहा था। उमँगों सी बढ़ती बेटी को देख-देखकर वह फूला नहीं समाता था। हरतरफ बस खुशी ही खुशी थी। जब से चारु आई थी जीवन के हर काम में उत्साह और आनन्द चौगुना हो गया था।

" सेठजी अब पूजा की थाली में चार सुपाड़ी और कलावा और रख लीजिए। लक्ष्मी पूजन विधि-विधान से न हो तो कोई मतलब नहीं रह जाता। "

एक तरफ पँडित जी विधि-विधान का महत्व समझा रहे थे तो दूसरी तरफ,

" पापा--पापा मेरी तरफ देखो, देखो मैने कितनी सुन्दर अल्पना बनाई है। ", पापा की ढुड्डी प्यार से अपनी तरफ घुमाते हुए चारु आग्रह पर आग्रह किए जा रही थी। ठीक भी तो है जब तक पापा उसकी तरफ मुड़कर प्यार से देखें नहीं, चारु कुछ भी तो नहीं कह पाती है उनसे। पर जब चौथी बार भी पापा ने नहीं सुना, मुड़कर नहीं देखा तो नन्ही चारु का धैर्य छूट गया। बिना कहे ही अपनी बात मनवाने वाली चारु और बर्दाश्त न कर सकी। कोई और होता तो बात और थी। चारु में धैर्य ही धैर्य था। सबकुछ सह लेती थी वह। पर यह तो उसके अपने पापा थे---सिर्फ उसके अपने पापा--। इन मिट्टी के लक्ष्मी-गणेश के पीछे, उस आसमान में बैठे भगवान के पीछे-- उसके अपने पापा को पता तक नहीं चल पा रहा था कि उनकी चारु उन्हें कबसे बुला रही है। चारु की आँसू भरी आँखें अब और कुछ नहीं देख पा रही थीं। बिना सोचे समझे ,बिना आगा-पीछा सोचे, गुस्से और इर्षा वश उसने पूजा की थाली को हाथ मारकर बिखेर दिया।

अगले पल ही चारु के सामने की धरती घूम गई और आकाश के सारे तारे एकसाथ ही आँखों के आगे टिमटिमाने लगे। पापा का वह अप्रत्याशित गुस्से से भरपूर चाँटा सच में ही जबर्दस्त और भरपूर था। उस चाँटे की गूँज अब भी, तीस साल बाद तक चारु सुन सकती है। अगले तीन दिन तक पापा चारु से नहीं बोले थे और न ही वह खुद ही पापा के आगे जा पाई थी। बस चुपचुप अकेली-अकेली रोती रही थी। पापा ने भी उसे नहीं मनाया था। पर चौथे दिन पापा खुद ही आए, खूब सारी गुड़िया और मिठाइयों के साथ। चारु पापा से आँखें नहीं मिला पा रही थी इसलिए नहीं कि वह नाराज थी बल्कि इसलिए कि वह अपने आप से बहुत शर्मिन्दा थी। उस उमर में भी उसे समझ में आ गया था कि मन के आगे कभी इतना अधिक मजबूर नहीं होना चाहिए।

और तब अपनी बेहद दुखी बेटी को पापा ने गले से लगा लिया था।

" बेटा खुदको कभी इतना महत्व मत दो कि दूसरों से ईर्षा होने लगे।"

और यह पापा का अपनी समझदार बेटी के लिए दूसरा और बेहद महत्वपूर्ण सबक था।

खट्टी-मीठी स्मृति को सँजोए, हर प्यारी चीज को चुपचाप आसानी से पीछे छोड़ती, चारु बड़ी हो रही थी।

समय के साथ राजकुमार भी आया और अपनी राजकुमारी को ले गया। सुख-सुविधाओं के बावजूद भी धीरे-धीरे वह, अपने पापा की सचमुच की राजकुमारी, स्वेच्छा से अपने घर की रानी, नौकरानी, सब बन गई। चारु ने सुहाग का ताज और प्यार की बेड़ियाँ दोनों ही हँसकर पहन लीं। शायद बड़े होने की यही सजा है---असली राजकुमारियों को भी अपने राजकुमार का, जिन्दगी का गुलाम बनना पड़ता है। यदा-कदा बस उस बचपन में खोई राजकुमारी की इक्की-दुक्की यादें, जब पुरानी सहेलियों सी मन की दहलीज पर आ खड़ी होतीं, और सवाल करतीं- बोल चारु-- क्या यह समझदारी और दुनियादारी ही तेरा जीवन है ? क्या कुछ और नहीं चाहिए तुझे जीवन से ? क्या अपने इस राज-पाठ की रानी बनकर ही खुश है तू ?, तो चारु उन्हें मन के अन्दर आमन्त्रित ही नहीं करती। दरवाजे से ही विदा दे  देती।

ठीक ही तो है--आखिर रानी बनने के लिए ही तो हर राजकुमारी बड़ी होती है।

अब तो उसकी अपनी गुड़िया भी सवाल-जबाब करने लगी है--बिल्कुल चारु की तरह ही। पर चारु से बहुत ज्यादा समझदार और दुनियादार है वह। सच की धरती को कभी अपने पैरों के नीचे से फिसलने नहीं देती दिया। कल ही की तो बात है जब उसने चारु को घेर लिया था।

" मम्मी--मम्मी, आप अपने पापा के पास क्यों नहीं रहतीं,  क्या आप उनसे प्यार नहीं करतीं ?"

" ऐसी बात नहीं, हर लड़की को शादी के बाद अपने पापा को छोड़कर अपने पति के घर जाना पड़ता है। "

" पति क्या होता है?", गुड़िया ने परेशान होकर फिरसे पूछा ?

" पति, जिससे हमारी शादी होती है--जिसे हम सबसे ज्यादा प्यार करते हैं।" हँसकर चारु ने बताया।

" तब तो बस मैं अपने पापा से ही शादी करुँगी---" दिया ने भी बहुत सोच-विचारकर अपना निर्णय सुना दिया।

" पर पापा की तो मम्मी से शादी हो चुकी है---" चारु ने बेटी की समस्या को बढ़ाते हुए एकबार फिरसे उसे छेड़ा ?

अब पाँच साल की दिया सच में डर गई थी। पापा मम्मी से बिछुड़कर नहीं रह सकती वह-- दौड़कर पापा से लिपट गई।

सुबक-सुबककर रोते-रोते फिर सोचा, " तो क्या फिर मैं अपने नेक्स्ट डोर नेबर से शादी कर सकती हूँ पापा ? "

पापा के पास रहने का बस एक यही तरीका दिया को समझ में आया था। रात में भी पापा से आँख खोलकर सोने की फरमाइश करने वाली दिया पूरी जिन्दगी उनसे दूर कैसे रह सकती थी?

बेटी के दर्द और डर को चारू और समीर दोनों ही समझ रहे थे। बाल सहलाते हुए समीर ने डूबती गहरी आवाज में कहा, " ठीक है बेटा, तुम हमेशा अपने पापा के पास ही रहोगी। कोई तुम्हें पापा से दूर नहीं ले जा सकता। डरो मत तुम---तुमतो मेरी प्यारी-प्यारी राजकुमारी हो। "

दिया खुश होगई। आँखों में चमक भी वापस आ गई," सच पापा,  प्रौमिस! कौन सी? वही महलों में रहने वाली, असली ? "

चारु की आँखें भर आर्इं, फिर वही सवाल--फिर वही  एक सपना आज भी?

चारु जानती थी असली राजकुमारी बनना कितनी बड़ी समस्या है ? जिम्मेदारी और कठिनाईयों की बेड़ियाँ पहने कैसे-कैसे मन को मारना पड़ता है। फिर नियम और सँयमों में बँधा जीवन इतना आसान भी तो नहीं ? बचपन से ही बुजुर्ग बनकर क्यों जियें ? क्या उसकी कोमल दिया का मन, इस नन्ही उमर से इस जिम्मेदारी का बोझ उठा पाएगा ? वैसे क्यों करना पड़ता है हमें यह सच और सपनों का समझौता और बँटवारा--? क्या सपने भी सच का ही अँश नहीं? यही आँखें तो उन्हें भी देखती हैं ?

इसके पहले कि समीर कोई जबाब दे, चारु ने भरी आँखों से कहा, " नहीं, मेरी गुड़ियारानी, परियों वाली। "

" असली राजकुमारी तो बस दुनिया के गोरख-धँधों में ही फँसी रहजाती है। "

" कहानी किस्सों के पन्नों में रहने वाली तुम्हारी यह राजकुमारी, महलों में रहने वाली असली राजकुमारी की कैसे बराबरी कर पाएगी चारु? "  हैरान पति ने बीच में ही उसकी बात काट डाली ।

" बिल्कुल वैसे ही समीर, जैसे आकाश धरती से करता है। यह यथार्थ के ठोस धरातल पर खड़ी कड़ी धरती शायद आज भी बस इसीलिए हरीभरी और सुहानी है क्योंकि कल्पना के आकाश से ढकी है। नभ के चाँद-सूरज से जगमग है। शायद यही वजह है कि हम सह भी पाते हैं इसे और जी भी पाते हैं इस पर। मेरी परियों की राजकुमारी के पास चन्दा-सूरज से दो कल्पना के पर हैं, एक जादू की छड़ी है। इनके सहारे तो वह बहुत कुछ कर सकती है। मन चाहा हासिल कर सकती है। चाहे जो बन सकती है। चाहे जहाँ आ-जा सकती है। कुछ भी तो असँभव नहीं उसके लिए। "

" पर माँ, मेरे पास तो कोई पर और जादू की छड़ी नहीं? "

नन्ही, बाप-सी व्यवहारिक दिया कैसे यह मन का छुपा-ढका और ज्ञान-विज्ञान की बातो-सा रहस्य समझ पाती-- हैरत और आश्चर्य से बस मा को देखती ही रह गई वह। यह मा को क्या हो गया है आज। कैसी उलझी-उलझी बातें कर रही हैं वो ?

" ना मेरी नन्ही परी, ऐसे नहीं कहते---ऐसा नहीं सोचते। पर और छड़ी तो दोनों ही हैं हम सब के ही पास। बस, इस जिन्दगी की भाग-दौड़ में हम कहीं खो न दें, इसलिए भगवान ने सँभालकर मन के अन्दर छुपा दिया है इन्हें। ढूँढना भी तो अब हमें खुद ही पड़ेगा ना ।"

पूरे आत्म-विश्वास के साथ चारु ने सही और सच्चा-सच्चा जवाब दिया-- उसे लगा कि आज वह पहली बार किसी को क्या, खुदको भी, अपना असली सच बताने की हिम्मत कर पाई है।
चारू की मुस्कुराती सँतुष्ट आँखें अब बँद थीं और दिया देख रही थी कि मा की पुतलियाँ बन्द पलकों के अँदर ही, खुशी-खुशी तेजी से इधर-उधर घूम रही थीं--मानो मन के अँदर रखा, बरसों पुराना कुछ ढूँढ रही हों---बरसों का खोया, कुछ छू-छूकर बारबार टटोल रही हों--      

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                                                                                                                                                     कहानी समकालीन


                                                                                                                                                    -दिलीप भाटिया

टकराव नहीं समझौता

?,
    स्नेह,                                                                                                                                                                                समाजिक सम्बन्घों एवं पारिवरिक रिश्तों के दर्दनाक अनुभवों से त्रस्त तुमने मुझसे भी किसी भी सम्बोधन यथा प्रिय, स्नेही, बेटी, अनुजा, मेडम को स्वीकार नहीं करने का ई-मेल किया है. इसलिए तुम्हें सम्बोधन में प्रश्न चिन्ह ही मुझे सवोत्तम सम्बोघन प्रतीत हो रहा है.

   नारी सशक्तीकरण, महिला दिवस, डाटर्स डे, मदर्स डे, रक्षा-बन्घन, भाई दूज, करवा चैथ, इत्यादि कई अनुष्ठान दिवसों महिलाओं को समर्पित त्यौहारों के युग में भी नारी की स्थिति लाचार बेबस दयनीय चाहे नहीं भी हो, पर अच्छी तो क्या, इनसान वाली भी नहीं कही जा सकती है, यह भलीभांति मै स्वयं एक पुरूष होते हुए भी जानता हूँ।
   
   सास एंव जीवनसाथी से प्रतिरोध कर तुमने कन्या-भ्रूण का गर्भपात नहीं करवाया एंव एक प्यारी सी बिटिया को इस संसार में लाई इस आत्म-साहस के लिए मैं दिल से तुम्हारा अभिनन्दन करता हूं। भोली गुडि़या एंव तुम्हें ससुराल गेंदा फूल में उपेक्षा का दंड मिला रहा है, तुम्हारी इस पीड़ा से मैं द्रवित हूँ। तुम्हारे सास-ससुर की आंखें खोलने के प्रयास चाहे अभी तक निरर्थक रहें हो, पर मैनें हार नहीं मानी है, भरोसा है, मुझे स्वयं पर कि मैं तुम्हारे जीवन की वर्तमान अमावस्या को एक दिन पूर्णिमा में बदल कर ही रहूंगा शीघ्रता मत करो पहाड़ पर चढ़ने का एक नियम है, झुक कर चलो, दौड़ो मत. जिन्दगी मे गलत बातों पर झुकना निश्चय ही कमजोरी है, एवं समय के साथ शायद झुक कर सामने वाले को एक दिन झुकाया जा सकता है.

   तुम्हारी अधूरी शिक्षा को पूरी करने की भी अनुमति तुम्हें नहीं मिली, घर पर ट्यूशन करने की भी मनाही है, काम करने वाली बाई को हटा दिया गया है, निश्चय ही ऐसे रूढिवादी अंधविश्वासी दकियानूसी परिवार को कोई भी स्वाभिमानी बहू स्वीकार नहीं करेगी, परन्तु ऐसी मानसिकता को परिवर्तित करने में संयम, धैर्य, तपस्या की आवश्यकता होती है इस परिवर्तन में कितना समय लगेगा, यह भविष्यवाणी तो मैं नहीं कर सकता पर मेरे तुम्हारे निरन्तर प्रयास एवं सकारात्मक  दृष्टिकोण काली रात के बाद सुहानी भोर ला सकेंगे.

 टकराव, सम्बन्ध विच्छेद, तलाक, पीहर, मैके पर भार बन कर रह जाना कोई अच्छे विकल्प नहीं हैं. तन-मन-धन से इतनी समर्थ महसूस कर सको कि स्वयं का एवं नन्ही गुडि़या का पालन पोषण कर सको, तभी घुटन भरे माहौल से निकलने का निर्णय लेना. वृद्ध मम्मी-पापा कितने दिन तुम्हारा भार वहन करेंगे एंव उनके बाद भाई-भाभी जब तुम्हें सड़क पर छोड़ देंगे, तो तुम कौन सा दरवाजा खटखटाओंगी? कुऐं से निकलकर खाई में गिरना एक मूर्खता ही होगी.
 तुम्हारी उलझनों को सुलझाने के लिए मेरे पास कोई संजीवनी बूटी नहीं है. पत्र, फोन, एस एम एस, ई-मेल की एक सीमा होती है. मैं अगले सप्ताह स्वयं तुमसे आकर मिलूंगा. तुम्हारी बिटिया को आशीर्वाद भी दूंगा एवं हम खुल कर सभी पहलुओं पर विस्तृत चर्चा करेंगे. मुझे भरोसा है कि तुम्हारे जीवन की उजड़ रही बगिया में पुनः महकते हुए फूल खिलेंगे. टकराव की अपेक्षा समझौते का एक प्रयास तो हम कर ही सकते है. शीघ्रता में गलत निर्णय मत लेना, मेरी प्रतीक्षा करना.
 
    सस्नेह-                                                                                                      


                                                                                                                      शुभाकांक्षी-
                                                                                                                         कैलाश

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                                                                                                                                             बांसगांव की मुनमुन


                                                                                                                                              -दयानंद पाण्डेय

         भाग-15

‘कुछ नहीं कहेंगे।’ मुनमुन बोली, ‘बेटी जब आप की सुख से रहने लगेगी तो सब के मुंह सिल जाएंगे। हां, अगर रोज़ ऐसे ही छोड़-पकड़ लगी रहेगी तो ज़रूर सब के मुंह खुले रहेंगे। अब आप सोच लीजिए कि क्या करना है आप को?’ वह बोली, ‘जल्दबाज़ी में कोई निर्णय मत लीजिए। अभी घर जाइए। सोचिए-विचारिए। और घर में पत्नी से, बेटी से, परिजनों से विचार विमर्श करिए। ठंडे दिमाग़ से। दो-चार-दस दिन में आइए। फिर फ़ैसला करते हैं कि क्या किया जाए?’‘ठीक बहिनी!’ कह कर वह बेटी को ले कर चला गया। दो दिन बाद फिर वह आया। बेटी को साथ ले कर। और मुनमुन से बोला, ‘हम ने फ़ैसला कर लिया है। अब आप जो कहिए, जैसे कहिए हम सब कुछ करने को तैयार हैं।’

‘अच्छी बात है।’ मुनमुन उस की बेटी की तरफ़ देखती हुई बोली, ‘क्या तुम भी तैयार हो?’

पर वह कुछ बोली नहीं। चुपचाप कुर्सी पर बैठी नीचे की ज़मीन पैर के अंगूठे से कुरेदती रही। ऐसे गोया कुछ लिख रही हो पैर के अंगूठे से।

‘पैर के अंगूठे से नहीं, हौसले से अपनी क़िस्मत लिखनी होती है।’ मुनमुन बोली, ‘अगर तुम तैयार हो तो स्पष्ट रूप से हां कहो और नहीं हो तो ना कहो। बिना तुम्हारी मंज़ूरी या मर्ज़ी के कुछ नहीं करने वाली मैं।’

वह फिर चुप रही। हां, अंगूठे से ज़मीन कुरेदना बंद कर दिया था उस ने।

‘तो तैयार हो?’ मुनमुन ने अपना सवाल फिर दुहराया।

‘जी दीदी!’ वह धीरे से बोली।

‘तो चलो फिर थाने चलते हैं।’ वह ज़रा रुकी और बोली, ‘पर पहले एक वकील पकड़ना पड़ेगा।’

‘वह किस लिए?’ लड़की के पिता ने अचकचा कर पूछा।

‘एफ़.आई.आर. का ड्रा़ट लिखवाने के लिए।’

‘तो वकील तो पैसा लेगा।’

‘हां लेगा तो।’ मुनमुन बोली, ‘पर ज़्यादा नहीं।’

‘पर मैं तो अभी किराया भाड़ा छोड़ कर कुछ ज़्यादा पैसा लाया नहीं हूं।’

‘कोई बात नहीं।’ मुनमुन बोली, ‘वकील को पैसे बाद में दे दीजिएगा। अभी सौ पचास रुपए तो होगा ही, वह टाइपिंग के लिए दे दीजिएगा।’

‘ठीक है!’

वकील के पास जा कर पूरा डिटेल बता कर, नमक मिर्च लगा कर एफ़.आई.आर. की तहरीर टाइप करवा कर मुनमुन बाप बेटी को ले कर थाने पहुंची। थाने वाले ना नुकुर पर आए तो वह बोली, ‘क्या चाहते हैं आप लोग सीधे डी.एम. या एस.एस.पी से मिलें इस के लिए? या थ्रू कोर्ट आर्डर करवाएं?’ वह बोली, ‘एफ़.आई.आर. तो आप को लिखनी ही पड़ेगी। चाहे अभी लिखें या चार दिन बाद!’

अब थानेदार थोड़ा घबराया और बोला, ‘ठीक है तहरीर छोड़ दीजिए। जांच के बाद एफ़.आई.आर. लिख दी जाएगी।’

‘और जो एफ़.आई.आर. लिख कर जांच करिएगा तो क्या ज़्यादा दिक्क़त आएगी?’ मुनमुन ने थानेदार से पूछा।

‘देखिए मैडम हमें हमारा काम करने दीजिए!’ थानेदार ने फिर टालमटोल किया।

‘आप से फिर रिक्वेस्ट कर रहे हैं कि एफ़.आई.आर. दर्ज कर लीजिए। मामला डावरी एक्ट का है। इस में आप की भी बचत ज़्यादा है नहीं। और जो नहीं लिखेंगे अभी एफ़.आई.आर. तो इसी वक्त शहर जा कर डी.एम. और एस.एस.पी. से मिल कर आप की भी शिकायत करनी पड़ेगी। आप का नुक़सान होगा और हमारी दौड़ धूप बढ़ेगी बस!’ थानेदार मान गया। रिपोर्ट दर्ज हो गई। लड़की के ससुराल पक्ष का पूरा परिवार फ़रार हो गया। घर में ताला लगा कर जाने कहां चले गए सब। रिश्तेदारी, जान-पहचान सहित तमाम संभावित ठिकानों पर छापा डाला पुलिस ने। पर कहीं नहीं मिले सब। महीना बीत गया। महीने भर बाद ही पारिवारिक अदालत में मुनमुन ने लड़की की ओर से गुज़ारा भत्ता के लिए भी मुक़दमा दर्ज करवा दिया। अब ससुराल पक्ष की ओर से एक वकील मिला बाप बेटी से। वकील ने लड़की के पिता से कहा कि, ‘सुलहनामा कर लो और वह लोग तुम्हारी बेटी को विदा करा ले जाएंगे।’

लड़की के पिता ने मुनमुन से पूछा कि, ‘क्या करें?’

‘करना क्या है?’ वह बोली, ‘मना कर दीजिए। और कोई बात मत कीजिए। अभी जब कुर्की की नौबत आएगी तब पता चलेगा। देखें, कब तक सब फ़रार रहते हैं।’

‘पर वह लोग बेटी को विदा कराने के लिए तैयार हैं।’

‘कुछ नहीं। यह मजबूरी की पैंतरेबाज़ी है। कुछ भी कर लीजिए वहां अब आप की बेटी जा कर कभी ख़ुश नहीं रह पाएगी।’

‘क्यों?’

‘क्यों कि गांठ अब बहुत मोटी पड़ गई है।’ मुनमुन बोली, ‘थोड़े दिन और सब्र कीजिए। और दूसरे विवाह के लिए रिश्ता खोजिए। इन सब को भूल जाइए।’

और अंततः सुलहनामा हुआ। मुनमुन के कहे मुताबिक़ लड़की के पिता ने दस लाख रुपए बतौर मुआवजा मांगा। बात पांच लाख पर तय हुई। दोनों के बीच तलाक़ हो गया। लड़की के पिता ने इस पांच लाख रुपए से लड़की की दूसरी शादी कर दी। लड़की के बारे में सब कुछ पहले से बता दिया। कटी अंगुली से लगायत पूर्व विवाह तक। कोई बात छुपाई नहीं। एक दिन लड़की अपने दूसरे पति के साथ मुनमुन से मिलने आई। लिपट कर रो पड़ी। मुनमुन भी रोने लगी। यह ख़ुशी के आंसू थे। बाद में लड़की बोली, ‘दीदी आप ने मुझे नरक से निकाल कर स्वर्ग में बिठा दिया। ये बहुत अच्छे हैं। मुझे बहुत मानते हैं।’ फिर उस ने धीरे से जोड़ा, ‘दीदी अब आप भी शादी कर लीजिए!’

मुनमुन चुप रह गई। कुछ देर तक दोनों चुप रहीं। और वो जो कहते हैं न कि इतिहास जैसे अपने को दुहरा रहा था। मुनमुन कुर्सी पर बैठे-बैठे पैर के अंगूठे से नीचे की मिट्टी कुरेद रही थी।

‘दीदी बुरा न मानिए तो एक बात कहूं?’ चुप्पी तोड़ती हुई लड़की बोली।

‘कहो।’ मुनमुन धीरे से बोली।

‘छोटा मुंह और बड़ी बात!’ लड़की बोली, ‘पर दीदी आप ने ही एक बार यहीं बैठे-बैठे मुझ से कहा था कि पैर के अंगूठे से नहीं, हौसले से अपनी क़िस्मत लिखनी होती है!’

‘अच्छा-अच्छा!’ कह कर मुनमुन धीरे से मुसकुराई।

‘तो दीदी आप भी शादी कर लीजिए!’ लड़की ने जैसे मनुहार की।

‘अब मेरे नसीब में जाने क्या लिखा है मेरी बहन!’ कह कर उस लड़की को पकड़ कर वह फफक पड़ी, ‘समझाना आसान होता है, समझना मुश्किल!’ कह कर वह उन दोनों से हाथ जोड़ती हुई, रोती हुई घर के भीतर चली गई। रोना घोषित रूप से छोड़ देने के बाद आज मुनमुन पहली बार ही रोई थी। सो ख़ूब रोई। बड़ी देर तक। तकिया भीग गया। जल्दी ही मुनमुन फिर रोई। चनाजोर गरम बेचने वाले तिवारी जी का निधन हो गया था। वह पता कर के उन के घर गई और तिवारी जी की विधवा वृद्धा पत्नी के विलाप में वह भी शामिल हो गई। फिर बड़ी देर तक रोई। तिवारी जी ने उस के नाम से चनाजोर गरम बेच कर जो मान, स्वाभिमान और आन बख़्शा था, वह उस की ज़िंदगी का संबल बन गया था, यह बात वह तिवारी जी के निधन के बाद उन के घर जा कर महसूस कर पाई। शायद इसी लिए उस का रुदन श्रीमती तिवारी के रुदन में अनायास मिल गया था। ऐसे जैसे छलछलाती यमुना गंगा से जा मिलती है। मिल कर शांत हो जाती है। फिर साथ-साथ बहती हुई एकमेव हो गंगा बन जाती है। और वो जो कहते हैं न कि पाट नदी का यमुना की वजह से चौड़ा होता है, पर नाम गंगा का होता है। तो यहां भी बाद में रोई ज़्यादा मुनमुन पर श्रीमती तिवारी का विलाप सब ने ज़्यादा सुना। गंगा के पाट और श्रीमती तिवारी के विलाप का यह एकमेव संयोग भी जाने क्यों मुनमुन का रुदन नहीं रोक पा रहा था। घर में तो तकिया भीग गया था। पर यहां क्या भीगा? क्या यह बहुत दिनों तक मुनमुन के नहीं रोने की ज़िद थी? कि सावन भादो में सूखा पड़ा था और क्वार कार्तिक में बाढ़ आ गई। इतनी कि बांध टूट गया! यह कौन सा मनोभाव था?

समझा रही हैं मुनमुन की अम्मा भी मुनमुन को कि, ‘अब तुम या तो अपनी ससुराल जाने का मन बनाओ और जाओ। और जो वहां न जाने की ज़िद है तो दूसरा विवाह ढूंढ कर कर लो। इस-उस के साथ घूमने से तो यही अच्छा है!’

‘क्या करें अम्मा!’ मुनमुन कहती है, ‘साथ घूमने-सोने के लिए तो सभी तैयार रहते हैं हमेशा! पर शादी के लिए कोई नहीं।’ वह जोड़ती है, ‘इस के लिए तो सब को दहेज चाहिए!’

‘तो दूसरों को दहेज बटोरने का टोटका बता सकती हो। दहेज का मुक़दमा लिखवा कर, गुज़ारा भत्ता का मुक़दमा लिखवा कर लाखों का मुआवज़ा दिलवा कर दहेज जुटा कर दूसरी शादी का रास्ता सुझा सकती हो तो ख़ुद अपने लिए यह रास्ता क्यों नहीं अख़्तियार कर सकती हो?’

‘इस लिए नहीं कर सकती अम्मा कि यह सब कर के मैं अपने तौर पर उस शादी को मान्यता दे बैठूंगी जिस को कि मैं शादी नहीं मानती!’ मुनमुन कहती है, ‘मैं यह नहीं करने वाली!’

‘लोग बदल गए, चीज़ें बदल गईं। तुम्हारे सब भाई तक बदल गए। पर तुम और तुम्हारे बाबू जी नहीं बदले।’

‘ऐसे तो बदलेंगे भी नहीं अम्मा।’ वह बोली, ‘कि बेबात सब के आगे घुटने टेक देंगे। स्वाभिमान और आन गिरवी रख देंगे? हम इस तरह तो नहीं बदलेंगे अम्मा!’

क्यों नहीं बदलती मुनमुन? और उस के बाबू जी! यह एक नहीं, अनेक जन का यक्ष प्रश्न है! घनश्याम राय का भी यह प्रश्न है। भले ही वह इस प्रश्न का उत्तर भी साथ ले कर घूमने लगे हैं। जैसे कि कहीं बात चली कि, ‘आप का लड़का जब लुक्कड़, पियक्कड़ और पागल है तो मुनमुन जैसी लड़की कैसे रह सकती है उस के साथ?’ तो घनश्याम राय का जवाब था कि, ‘लड़का हमारा पागल और पियक्कड़ है। मैं तो नहीं। मैं रख लूंगा मुनमुन को। दिक्क़त क्या है?’

सवाल करने वाला शर्मिंदा हो गया पर घनश्याम राय नहीं। सवाल करने वाले ने टोका भी कि, ‘क्या कह रहे हैं राय साहब, बहू भी बेटी समान होती है।’

‘तो?’ घनश्याम राय ने तरेरा।

घनश्याम राय का यह जवाब बड़ी तेज़ी से सब तक पहुंचा। मुनमुन तक भी। सुन कर वह बोली, ‘मैं शुरू से ही जानती हूं कि वह कुत्ता है। अघोड़ी है।’

फिर उस ने घनश्याम राय को फ़ोन कर उन की जितनी लानत-मलामत कर सकती थी किया। और कहा कि, ‘आइंदा जो ऐसी वैसी बात कही तो तुम्हारे बेटे को तो अपने दरवाज़े पर जुतियाया था, तुम्हें तुम्हारे दरवाज़े पर ही जुतियाऊंगी!’

‘इतनी हिम्मत हो गई है तेरी!’ घनश्याम राय ने हुंकार तो भरी पर डर भी गए और फ़ोन काट दिया।

फिर एक वकील से मशविरा किया। और मुनमुन की विदाई के लिए मुक़दमा दायर कर दिया। मुनमुन को जब इस मुक़दमे का सम्मन मिला तो वह मुसकुराई। वकील की बेटी थी सो तुरंत जवाब दाखिल करने के बजाय तारीख़ें लेने लगी। तारीख़ों और आरोपों के ऐसे मकड़जाल में उसने घनश्याम राय को उलझाया कि वह हताश हो गए। मुनमुन कचहरी में घनश्याम राय और उस के बेटे राधेश्याम राय को ऐसे तरेर कर देखती कि दोनों भाग कर अपने वकील के पीछे छुप जाते। कि कहीं मुनमुन भरी कचहरी में पीट न दे। लेकिन मुनमुन का सारा जोश, सारी बहादुरी घर में आ कर दुबक जाती। अम्मा तो पहले ही कंकाल बन कर रह गई थीं, बाबू जी भी कंकाल बनने की राह पर चल पड़े थे। कंधा और कमर भी उन की थोड़ी-थोड़ी झुकने लगी थी। चेहरा पिचक गया था। एक तो मुनमुन की चिंता, दूसरे बेटों की उपेक्षा, तीसरे विपन्नता और बीमारी ने उन्हें झिंझोड़ कर रख दिया था। यह सब देख कर मुनमुन भी टूट जाती। इतना कि अब वह मीरा बनना चाहती थी। ख़ास कर तब और जब कोई अम्मा बाबू जी से पूछता, ‘जवान बेटी कब तक घर में बिठा कर रखेंगे?’

वह मीरा बन कर नाचना चाहती है। मीरा के नाच में अपने तनाव, अपने घाव, अपने मनोभाव को धोना चाहती है। नहीं धुल पाता यह सब कुछ। वह अम्मा बाबू जी दोनों को ले कर अस्पताल जाती है। दोनों ही बीमार हैं। डाक्टर भर्ती कर लेते हैं। एक वार्ड में बाबू जी, एक वार्ड में अम्मा। वह चाहती है कि दोनों को एक ही वार्ड मिल जाता तो अच्छा था। डाक्टरों से कहती भी है। पर डाक्टर मना कर देते हैं कि पुरुष वार्ड में पुरुष, स्त्री वार्ड में स्त्री। अब उस के अम्मा बाबू जी पुरुष और स्त्री में तब्दील हैं। तो वह ख़ुद क्या है? वह सोचती है। सोचते-सोचते सुबकने लगती है। हार कर रीता दीदी को फ़ोन कर के सब कुछ बताती है। बताती है कि, ‘अकेले अब वह सब कुछ नहीं संभाल पा रही है। पैसे भी नहीं हैं अब।’

‘भइया लोगों को बताया?’ रीता ने पूछा।

‘मैं भइया लोगों को बताने वाली भी नहीं रीता दीदी। तुम्हें जाने कैसे बता दिया। और अब मेरे फ़ोन में पैसा भी ख़त्म होने वाला है। बात करते-करते कभी भी बात कट सकती है!’

‘ठीक है तुम रखो मैं मिलाती हूं।’ रीता बोली।

लेकिन फिर रीता का फ़ोन नहीं आया। मुनमुन ही अम्मा बाबू जी को ले कर वापस घर आती है। स्कूल के हेड मास्टर ने मदद की है। पैसे से भी और अस्पताल से आने में भी। घर आ कर बाबू जी पूछ रहे हैं आंख फैला कर मुनमुन से, ‘बेटी ऐसा कब तक चलेगा भला?’

‘जब तक चल सकेगा चलाऊंगी। पर अगर आप चाहते हैं कि अन्यायी और अत्याचारी के आगे झुक जाऊं, तो मैं हरगिज़ झुकूंगी नहीं। चाहे जो हो जाए!’ कह कर वह किचेन में चली गई। चाय बनाने।
बिजली चली गई है। वह किचेन से देख रही है आंगन में चांदनी उतर आई है। वह फुदक कर आंगन में आ जाती है, चांदनी में नहाने। ऐसे जैसे वह कोई मुनमुन नहीं गौरैया हो! उधर किचेन में भगोने में चाय उबल रही है और वह सोच रही है कि सुबह सूरज उगेगा तो वह क्या तब भी ऐसे ही नहाएगी सूरज की रोशनी में, जैसे चांदनी में अभी नहा रही है। उधर चांदनी में नहाती अपनी बिटिया को देख कर श्रीमती मुनक्का राय के मन में उस के बीते दिन, बचपन के दिन तैरने लगे हैं किसी सपने की तरह और वह गाना चाह रही हैं मेरे घर आई एक नन्हीं परी, चांदनी के हसीन रथ पे सवार! पर वह नहीं गा पातीं। न मन साथ देता है, न आवाज़! वह सो जाती हैं। किचेन में चाय फिर भी उबल रही है!

                                                                                                                                                            जारी...

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                                                                                                                                                                        दो लघुकथाएँ


                                                                                                                                                                        - गोवर्धन यादव

        समस्या

पानी की समस्या ने विक्राल रुप धारण कर लिया था. सरकारी नल दो-चार दिन में घण्टा-आधा घण्टा के लिये तो आते परन्तु कम दबाव के चलते समुचित पानी नहीं मिल पाता था. घरों में लगी पानी की टोटियां मुहं चिडाती सी लगती थी. इतना सुब कुछः होने के बावजूद पानी की बर्बादी और दुरुपयॊग रोके नहीं रुक रहा था. एक दिन ऐसा भी आआ कि कुल्ला करने तक को पानी नहीं बचा. हम पानी की समस्या को लेकर दो- चार हो ही रहे थे ,तभी गांव मे रहने वाला हमारा एक परिचित व्यक्ति आ पहुंचा . मैने उससे पूछा * रामू- यहां तो पानी को लेकर बुरा हाल है. हम शहर वाले पानी को लेकर कितना कश्ट ऊटा रहे हैं. तुम्हारे गांवं के क्या हाल है. रामू ने मुस्कुराते हुये जबाब दिया- भइयाजी, हमारे यहां तो कोई समस्या नहीं है. गावं के पास ही एक नदी बहती है, हालाकिं उसमें पानी की कमी जरुर है.हम गांव वाले पूरे परिवर के साथ वहां जाकर नहा-धो लेते हैं, अपने कपडे भी धो आते हैं और लौट्ते समय एक घडा पानी पीने को भी ले आते है. दिशा-मैदानसे तो हम वहीं फ़ारिग हो लेते हैं. हमारे घरों में फ़्लेश लेत्रिन भी तो नहीं है जि्समें ज्यादा पानी लगताहै. और न ही हमारे यहां शावर ही है. निपट देहात में रहने वालो ने अपनी सूझबूझ से पानी की समस्या पर नियन्त्रन पा लिया था. पता नहीं हम शहर वालों को कब अकल आयेगी ?










             रोटी

एक दिन मैं अपनी स्कुटर सुधरवाने के लिये एक गैराज में बैठा था. वहाँ आठ-दस साल का एक लडका हेल्पर के रुप मे काम कर रहा था. शायद वह नया-नया लगा था. मैकेनिक ने बगैर उसकी तरफ़ देखे १९-२० का पाना माँगा. लड्के ने एक पाना उठाया और उसके हाथ में पकडा दिया. वह पाना उस नम्बर का ना होकर कोई दूसरे ही नम्बर का था . सही पाना न पाकर उस मैकेनिक को क्रोध आ गया और उसने गंदी गालियाँ बकते हुये उसके गाल पर कस कर एक झापड मार दिया. लडके की आँख छलछला आयी.


थोडी देर बाद वह मिस्त्री किसी आवश्यक कार्य से बाहर गया. मैने जिग्यासावश उस लड्के से पूछा:- मिस्त्री तुम्हारा कौन लगता है.और कितनी तन्खाह देता है?.


लडका थोडी देर तो चुप रहा ,फ़िर हलक को थूक से गिला करते हुये उसने कहा:-रिश्ते में तॊ कोई लगता नहीं है. खाने को दो जून की रोटियाँ देता है..


मैने आश्च्रर्य से पूछा ’- केवल रोटियाँ,और कुछ नहीं ?.

उस लडके ने बडी मासुमियत से जबाब दिया" साहबजी....जिंदा रहने के लिये रोटियाँ ही काफ़ी है.

छोटी सी उम्र में उस लडके ने जीवन की सबसे बडी जरुरत को समझ लिया था।

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हाल ही में, इसी नौ जून को अपना 73 वां जन्मदिन मनाकर गौतम सचदेव जी ने 29 जून को एक असफल  हृदय शल्य चिकित्सा के कारण अंतिम  सांस ली। हिन्दी के वरिष्ठ सेनानी और ब्रिटेन के मूर्धन्य साहित्यकार व मित्र स्व. गौतम सचदेव को लेखनी परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि के साथ प्रस्तुत है उनका यह विचारोत्तेजक आलेख जो उन्होंने हाल ही में लेखनी के लिए भेजा था और हम जिसे अगस्त की जगह उन्हें याद करते हुए इसी अंक में दे रहे हैं। 


                                                                                                                                                                           परिचर्चा


                                                                                                                                                                       -गौतम सचदेव

बदलाव की अधूरी आस

भारतीय भ्रष्टाचार के हमाम में वैसे तो सब नंगे थे, लेकिन जो इस हमाम में नहीं घुसे थे, नंगे लोग उनके कपड़ों को भी उतारने और फाड़ने की होड़ लगा रहे हैं। नंगई का आलम यह है कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए जो गिनती के नि:स्वार्थी और समर्पित लोग मैदान में कूदे हैं, भ्रष्ट नंगे उन पर भी कीचड़ और गोबर उछालने में गर्व अनुभव कर रहे हैं। भारत के कुछ इलाकों में बड़ी गंदी होली खेली जाती है, जब लोग एक दूसरे पर कुछ भी फेंकने को मौज-मस्ती करार देते हैं, लेकिन होली के इस हुड़दंग के पीछे चाहे जैसी भी हो, एक प्रकार की सदाशयता होती है, लेकिन आजकल भारत में जो हो रहा है उसके पीछे सदाशयता नहीं, द्वेष और अनैतिकता का बोलबाला है। बदले की भावना दिखाई देती है। ऐसा लगता है मानो भ्रष्ट लोगों द्वारा ईमानदार और निर्दोष लोगों को डरा-धमकाकर, पीटकर और बदनाम करके अन्याय, रिश्वतखोरी, बेईमानी, धांधली और धोखाधड़ी का निष्कंटक साम्राज्य फैलाए रखने की प्रतियोगिता-सी चल रही है। इसका परिणाम क्या होगा, इसकी चिंता न तो भ्रष्ट सत्ता भोगियों को है और न ही अपने लिए सुख-सुविधाएं बटोरने में लगे लोगों को। सोचिए, जिस लोकतंत्र में सत्ताधारियों को हर कीमत पर कुर्सियां हासिल करने और उन्हें बचाने की ही चिंता हो और जनता या तो आंखें मूंदे रखे या स्वय को असमर्थ समझकर तमाशा देखती रहे, उस लोकतंत्र का भविष्य क्या होगा? क्या वह अपराध, बेईमानी, अनैतिकता, भाई-भतीजावाद, स्वार्थ और हिंसा का गढ़ नहीं बन जाएगा? क्या आज भारत यही बनता दिखाई नहीं देता?



कहने को लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि होती है, लेकिन एक चुनाव से लेकर अगले चुनावों तक क्या उसके हाथ कट नहीं जाते? इस अवधि में वह सिवाय विरोध प्रदर्शनों के और क्या कर सकती है। जनता के लिए अगले चुनावों का मूल्य भी क्या रह जाता है जब पूरी व्यवस्था भ्रष्ट अथवा निकम्मी हो चुकी हो? उन चुनावों में फिर पहले जैसे लोग ही जीत कर कुर्सियों पर जम जाते हैं और भ्रष्टाचार का अंतहीन सिलसिला चलाते रहते हैं। ऐसे में व्यवस्था को बदलना बेहद जरूरी हो जाता है, लेकिन सवाल उठता है कि इसे बदले कौन और बदले तो कैसे बदले? इसके लिए भारत में अगर स्वामी रामदेव और अन्ना हजारे जैसे इक्का-दुक्का जनसेवक बीड़ा उठाते हैं तो जाहिर है निहित स्वार्थो वाले यथास्थितिवादी भ्रष्ट और स्वार्थी लोग हर वह हथकंडा अपनाएंगे जिससे ऐसे जनसेवक हरगिज सफल न हो सकें। वे उन्हें पिटवाएंगे, उन पर झूठे आरोप लगाकर उन्हें बदनाम करेंगे और अवसर मिलने पर जेल में भी डलवाएंगे।


अगर भारत की पूरी व्यवस्था को बदलने की बात की जाए तो कहा जा सकता है कि ऐसा शायद कभी संभव नहीं होगा, क्योंकि इसके पीछे स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश का चौसठ वर्षो का इतिहास है, एक विशिष्ट भारतीय जनमानस है, जो इसी व्यवस्था में पला, बढ़ा और परिपक्व हुआ है। इसलिए व्यवस्था के विशेषज्ञ मानते हैं कि पूरी व्यवस्था को बदलने के बजाय केवल निर्वाचन प्रक्रिया को बदलने से भ्रष्टाचार पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। इससे आशिक सफलता तो शायद मिल जाए, लेकिन जब तक नैतिकता का पोषण और चरित्र का उत्थान नहीं होगा तब तक चुनावों में खड़े होने वाले उम्मीदवार तो इसी समाज से ही आएंगे और निर्वाचित होने के बाद वे वैसे ही कानून भी बनाएंगे। जनलोकपाल की नियुक्ति के बारे में भी यही बात लागू होती है। उससे आशिक लाभ तो निश्चित रूप से होगा, लेकिन उसको लाने के साथ-साथ निर्वाचन पद्धति में परिवर्तन करना तथा अन्य बहुत-सी चीजों को भी बदलना पड़ेगा। राजनीतिक दलों के गठन और सविधान को भी सुधारना होगा। इन सारे परिवर्तनों के साथ-साथ यह भी करना होगा कि भ्रष्ट लोगों को जवाबदेह बनाया जाए, उन्हें शीघ्र और समुचित दंड दिया जाए और गलत काम करने वालों की कुर्सियां छीनी जाएं। अगर वे जनप्रतिनिधि हों तो उन्हें वापस बुलाया जाए।



इधर ट्यूनीशिया, मिस्न और लीबिया जैसे अरब देशों में आई जनजाग्रति और क्रांति के उदाहरण हमारे सामने आए हैं। सीरिया में भी जनादोलन चल रहा है। क्या भारतीय जनता को अरब देशों का अनुकरण करना चाहिए और क्या वह उन जैसी हिंसात्मक सत्ता परिवर्तन की शैली का अनुकरण कर सकती है? उत्तर है-नहीं। भारतीय जनता न उनका अनुकरण कर सकती है, न रूस जैसे देशों का, जहां खूनी क्रांतियों से सत्ता परिवर्तन हुए हैं। मत भूलिए कि क्रांतियों के लिए जिस प्रकार की मानसिकता और नेतृत्व की जरूरत होती है वह भारत में नहीं पनपा है। भारतीय जनता व्यापक रूप से अहिंसक और शांतिप्रिय है। लोकतंत्रात्मक शासन की विशेषता यह होती है कि सत्ता परिवर्तन या अन्य प्रकार के परिवर्तन क्रांतियों से नहीं, जनमत से कराए जाते हैं। भारत में भी इसी तरह की शासन पद्धति है, इसलिए यहां भ्रष्ट सत्ताधारी भी शान से कहता है कि हमें जनता ने चुना है। अगर आप हमें नहीं चाहते तो अगले चुनावों में किसी और को चुन लीजिएगा। आज भारत में भ्रष्टाचार का जैसा बोलबाला है उसे देखते हुए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि भारत का भविष्य क्या है? आज जनता को कम-से-कम देश की न्यायपालिका का भरोसा अवश्य है, लेकिन यह काम अकेले न्यायपालिका कैसे करती रह सकती है? अगर भारत में भ्रष्ट लोकतंत्र है और वह भविष्य में भी भ्रष्ट ही बना रहता है तो क्या पूरा लोकतंत्र ही नहीं ढह जाएगा? यह बात आज सबके सोचने की है। उनकी भी जो इस लोकतंत्र के कर्णधार हैं और उनकी भी, जो इसके मूलभूत आधार हैं और इसके हितचिंतक हैं। मैथिलीशरण गुप्त की रचना ‘भारत भारती’ की दो पक्तियां हैं-


" हम कौन थे क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी, आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएं सभी।"

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                                                                                                                                                                तीज त्योहार


                                                                                                                                                               -  डॉ सरस्वती माथर

                           आई-आई सावणिया री तीज:

सावन के इंद्रधनुषी माहौल के बीच सुनाई देती है मधुर स्वर लहरी 'आई-आई सावणिया री तीज...'।
 महकती मेहंदी-महावर की कटोरियां, रंग-बिरंगी लहरियों की छटा बिखेरती झिलमिल पोशाकें और आभूषण, झूलों के झोटों से खिलखिलाता घर-आंगन, सत्तू और घेवर बांटता तीज पर्व जन-जन को प्रफुल्लित कर देता है।
सा वन के इस खुशनुमा माहौल में रोम-रोम में हिलोरें उठने लगती हैं। श्रावण के गीत मोती की लडियों से झरने लगते हैं। इस महीने शुक्ल तृतीया को हरियाली तीज का उत्सव बड़ी उमंग से मनाया जाता है। विविध प्रदेशों में तीज पर्व की अलग-अलग आस्थाएं और परंपराएं हैं, पर भावनाएं एक हैं। मान्यतानुसार तीज माता भगवती की तृतीय शक्ति का नाम है, जिसमें सरस्वती, रूद्री और लक्ष्मी तीनों शक्तियां व्याप्त हैं। भागवत में इसी आद्य-शक्ति को ब्रह्म कहा गया है। इन शक्तियों के बगैर न तो  ब्रह्मा सृष्टि का सृजन कर सकते हैं, न शिव संहार और न ही विष्णु संरक्षण। इसलिए यही आद्य शक्ति इन त्रिदेवों की शक्ति तीज माता कहलाई।
पहली तीज मायके में
भारतीय संस्कृति में लोक मान्यता है कि पति-पत्नी के मिलन, सुहाग और सौभाग्य के लिए तृतीया को पार्वती की 'तीज माता' के रूप में पूजा की जाती है। इस दिन कन्याएं और सुहागन महिलाएं स्वर्ण गौरी व्रत का अनुष्ठान करके पार्वती की उपासना करती हैं। तीज का व्रत रखकर अपने लिए भी अर्घनारीश्वरोपासना से रीझने वाले शिव के समान पति की आकांक्षा रखती हैं। जनश्रुति के अनुसार इस पवित्र दिन को हिमाचल पुत्री पार्वती की तपस्या पूरी हुई थी। इस दिन कुंवारी लड़कियां हरी-दूब लेकर घर जाती हैं। प्रेम और सौहार्द के बंधनों को सुदृढ़ करती हैं। इसके बाद बागों में जाकर झूला झूलती हैं और गीत गाती हैं। इसे 'मल्हार रागिनी' भी कहते हैं।
जिन लड़कियों की शादी के बाद तीज का पहला त्योहार होता है, वे पहली तीज मायके में मनाती हैं और उनके ससुराल तीज का सिंजारा लेकर उसके मायके आते हैं। सिंजारे में सुहाग का जोड़ा, चूड़ी, मेहंदी, काजल, सिंदूर, लहरिया के साथ जेवर, फैनी, फल, मेवा, मिश्री, पकवान होते हैं।
सावन के झूले पड़े
ऎसा कहा जाता है कि पहले सावन माह में सास-बहू को साथ नहीं रहना चाहिए, इसलिए परंपरा के अनुसार जब भी शादी के बाद लड़की का पहला सावन होता है तो मायके से पिता या भाईउसे लेने ससुराल पहुंच जाते हैं। श्रावणी तीज पर बहन को ले जाने का और उसकी विदाई का बड़ा ही माधुर्यपूर्ण वर्णन 'अब के बरस भेज भैया को बाबुल, सावन में लीजो बुलाए रे...','सावन के दिन चार सखी री...','सावन के झूले पड़े...' जैसे तीज के असंख्य गीतों में हुआ है। हरियाली तीज का प्रमुख आकर्षण झूला है। पीहर में एकत्र सभी नवविवाहिताएं इस अवसर पर किसी पेड़ पर झूला डाल कर झूलती हैं और आपस में हंसी मजाक करते हुए एक-दूसरे से प्रियतम का नाम पूछती हैं। तीज का त्योहार सारे उत्तरी भारत में मनाया जाता है। बड़े-बड़े नगरों में शाम के समय तीज के मेले लगते हैं और वॉलीबॉल, रस्साकसी, लंबी कूद तथा ऊंची कूद के मुकाबले होते हैं, पहलवानों के दंगल होते हैं।

मेले लगते हैं:
तीज के त्योहार पर चंडीगढ़ में विशेष मेले का आयोजन होता है। यहां हरे कांच की चूडियां, सिंदूर, काजल, मिठाई और मेहंदी पीहर से माता-पिता ससुराल भेजते हैं। विवाहिताएं बायना निकालती हैं। उत्तरप्रदेश में भी सावन लगते ही तीज के त्योहार की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। दोज को सिंजारा मनाया जाता है। सिंजारा यहां भी पीहर से आता है, सिंजारे के दिन महिलाएं मेहंदी लगाती हैं, कुंआरी और विवाहित सभी महिलाएं सावन के चारों सोमवार के साथ-साथ तीज के दिन भी व्रत रखती हैं।
राजस्थान की संस्कृति में तो यह अनूठा, रंगीन और उल्लासमय लोक सांस्कृतिक पर्व है। इस संदर्भ में तो यहां एक कहावत प्रसिद्ध है-'तीज त्योहार बावड़ी, ले डूबी गणगौर...' जयपुर में तीज के अवसर पर हर्षोल्लासित करने वाला नजारा रहता है। यहां भव्य मेले का आयोजन होता है। तीज माता की शोभायात्रा निकलती है। तीज की प्रतिमा 'पार्वती' का प्रतीक होती है। चूंकि यह पर्व çस्त्रयों के अक्षय सौभाग्य का प्रतीक है इसलिए उनकी अनंत मंगलकामनाएं इस पर्व में सिमटी हैं।


तो आइए इस पर्व से हम पारिवारिक सुख-सुहाग की बेल सींचें, यही इस पर्व की सार्थकता भी है, महत्व भी है, आज की जरूरत भी और संदेश भी।

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                                                                                                                                                                            परिदृश्य


                                                                                                                                                               -रवीन्द्र अग्निहोत्री


शब्द शक्ति  की  महिमा


कहा गया है कि शब्द में बड़ी शक्ति होती है. अंग्रेजी कहावत भी प्रसिद्ध  है , “ Pen is mightier than sword . “  इसमें  pen  लिखित शब्द का ही  तो प्रतीक है.  संस्कृत में तो यहाँ तक कहा गया है कि  " एकः  शब्दः  सम्यक् ज्ञातः सुप्रयुक्तः स्वर्गलोके  कामधुक् भवति "  एक  शब्द को ही अगर ठीक   से जान लिया जाए ,  उसका  ठीक  से प्रयोग किया जाए  तो सारी कामनाएं   पूरी हो सकती हैं.  शायद इसीलिए  कुछ लोग किसी शब्द / मंत्र  आदि  का देर तक जाप करते हैं या  कागज  पर प्रतिदिन उसे बार - बार लिखते हैं , कोई 101 बार तो कोई 1001 बार,   और कोई तो उसका कीर्तन ही करते हैं .  इससे उस शब्द / मन्त्र की शक्ति बढ़ी या उन्हें कोई लाभ हुआ - इसका तो मुझे  कोई प्रमाण नहीं मिला, पर हाँ , ऐसे अनेक लोग मिले  हैं  जिनके जीवन की दिशा बदलने में किसी विद्वान के मौखिक अथवा लिखित शब्दों ने  विशेष भूमिका निभाई . स्वामी दयानंद सरस्वती  से  शंका समाधान करने के बाद  मुंशीराम का ( जो बाद में स्वामी श्रद्धानंद बने) , या रामकृष्ण परमहंस से वार्तालाप करने के बाद नरेन्द्र नाथ दत्त का ( जो बाद में स्वामी विवेकानंद बने ) जीवन बदलने के उदाहरण हम सबके सामने हैं .  अनेक धार्मिक ग्रंथों ने तो लोगों के जीवन को बदला ही है,  अन्य प्रकार की पुस्तकों ने भी ऐसा करिश्मा किया है . जान रस्किन की अर्थशास्त्र संबंधी पुस्तक  ' अन  टु दिस लास्ट '  ( 1862 )  से गाँधी जी का परिचय 1904  में हुआ और इसी पुस्तक ने गाँधी जी को ' सर्वोदय ’ का  विचार दिया  ( गाँधी जी ने  सर्वोदय नाम से ही इस पुस्तक का गुजराती में अनुवाद 1908  में किया था ) एवं  इसी पुस्तक ने उन्हें  फोनिक्स आश्रम की स्थापना की प्रेरणा दी. कथा, कहानी, नाटक , उपन्यास आदि को हम प्रायः  मनोरंजन की ही सामग्री मानते हैं, पर इस सामग्री में भी ऐसे रत्न छिपे हुए हैं जिन्होंने गंभीर पाठकों  का   जीवन बदल दिया. ऐसा ही एक उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है. 




चेन्नई  ( तत्कालीन मद्रास )  में 18  जुलाई  1878  को जन्मे  एम. वेंकटसुब्बा  राव  एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी थे . मद्रास क्रिश्चियन कालेज से  ग्रेजुएशन  करने के बाद   उन्होंने वकालत की परीक्षा  पास की और उस समय के एक प्रसिद्ध वकील सर सी. वी. कुमारस्वामी शास्त्री के सहायक के रूप में लगभग एक वर्ष काम करने के बाद  जुलाई 1904 में  अपने एक सहपाठी राधाकृष्णैया के साथ अपनी फर्म बनाकर स्वतंत्र रूप से प्रैक्टिस शुरू की . शीघ्र ही  उनकी प्रसिद्धि  एक योग्य - विद्वान  वकील के रूप में होने लगी . उनकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर जब  उन्हें 1921 में मद्रास हाईकोर्ट का जज बनाया गया  तो यह घटना दो दृष्टियों से  विशेष बन  गई  . पहली तो यह कि  स्वतंत्र वकालत करने वाले वे पहले व्यक्ति थे जिसे जज बनाया गया और दूसरी यह कि अन्य जजों की तुलना में वे उस समय सबसे कम उम्र के जज थे.  बाद में 1939 में मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के रूप में वे रिटायर हुए. इसके बाद  हैदराबाद के निजाम ने भी उन्हें बरार का एजेंट बनाकर उनकी योग्यता का लाभ उठाया . 




जज बन जाने के बाद 1922  में  उन्होंने  अंडाल अम्मा  नामक जिस युवती से विवाह किया वह यों तो संपन्न परिवार की महिला थीं ,  सुशिक्षित थीं  जो उस ज़माने में बहुत बड़ी बात थी,  पर कम उम्र में ही  विधवा हो गई थीं . हमारे समाज में विधवा  की स्थिति तब कैसी होती थी, यह सर्व विदित है.  फिर तत्कालीन समाज में , और वह भी उच्च वर्ग  में विधवा - विवाह करना बहुत बड़ा  क्रांतिकारी कदम था. वेंकटसुब्बा राव साहसी व्यक्ति थे , समाज सुधार के बहुत बड़े समर्थक थे . स्त्रियों की दुर्दशा दूर करने के लिए  तो मानों वे कृतसंकल्प थे. अतः इस विवाह के लिए वे स्वयं आगे आए.  




वे अध्ययनशील भी  थे और उनकी रुचि क़ानून के अलावा  साहित्य में भी थी. देश  में उन दिनों  कहानीकार के रूप में  प्रेमचंद  की ख्याति फैल रही थी. उनके  साहित्य का अन्य भारतीय भाषाओं में भी अनुवाद किया जा रहा था. प्रेमचंद की एक कृति का तमिल अनुवाद वेंकटसुब्बा  राव ने पढ़ा . उस पुस्तक ने उनके दिल -दिमाग में हलचल पैदा कर दी . उन्होंने अपनी पत्नी को भी वह पुस्तक पढ़ने के लिए प्रेरित किया. उसे पढ़ने पर उनकी पत्नी भी सोच में डूब गईं . आपस में विचार - विमर्श करके उन्होंने एक संस्था की स्थापना करने का निश्चय किया . उस संस्था ने  मद्रास के सामाजिक जीवन की भी दिशा बदल दी . प्रेमचंद की उस पुस्तक का नाम था " सेवा सदन ".           




जो पाठक सेवा सदन से परिचित न हों उन्हें बता दूँ कि प्रेमचंद का यह  उपन्यास अनमेल विवाह की समस्याओं  पर आधारित है जो उन दिनों बहुत प्रचलित था  . नायिका अपने अनमेल विवाह से त्रस्त है , पारिवारिक समस्याओं से जूझ रही है . उसका असंतोष उसे इस कदर तोड़ देता है कि वह  वेश्यावृत्ति  अपनाने में भी संकोच नहीं करती , पर शीघ्र ही उसे अपनी भूल का अहसास होता है और फिर वह अपनी  भूल का प्रायश्चित करते हुए एक ऐसा  अनाथालय खोलती है जहां वेश्याओं की बच्चियां रखी जाएँ , उन्हें शिक्षा पाने की सुविधा मिले  ताकि वे समाज में सम्मानजनक रूप से जी सकें और उनके इस  गर्त में गिरने की संभावना न रहे.  इस अनाथालय का ही नाम है,  " सेवा सदन “.




यह उपन्यास प्रेमचंद ने पहले उर्दू में " बाज़ार - ए -  हुस्न "  नाम से लिखा था  , पर आर्य समाज उन दिनों समाज सुधार का सबसे बड़ा आन्दोलन था, प्रेमचंद जब उसके संपर्क में आए तो एक ओर तो उन्हें हिंदी के महत्व का अनुभव हुआ  और दूसरी ओर सामाजिक समस्याओं के केवल चित्रण नहीं, बल्कि  उनके समाधान की ओर भी उनका ध्यान गया . परिणामस्वरूप उन्होंने इसे हिंदी में ' सेवा सदन ' के नाम से लिखा और कथानक में भी परिवर्तन कर दिया. उर्दू उपन्यास दुखांत था , उसमें नायिका अंत तक  वेश्या ही बनी रहकर पछताती रहती है ;  वहीँ हिंदी उपन्यास में नायिका को सन्मार्ग पर लाकर उसे सुखान्त बना दिया है. संयोग से यह उपन्यास छपकर हिंदी में पहले ही 1919 में आ गया जबकि उर्दू में पांच वर्ष बाद 1924 में आया. हिंदी उपन्यास से प्रेमचंद  को आर्थिक लाभ भी हुआ . उन्हें रायल्टी के रूप में 450 रु. मिले, जबकि उर्दू उपन्यास से बहुत जद्दो-जहद करके  250 रु, ही मिल पाए.   




वेंकटसुब्बा राव और अंदाल अम्मा को इस उपन्यास का अंत बहुत पसंद आया . स्त्रियों की दुर्दशा को सुधारने का उन्हें यह एक अच्छा उपाय लगा . उन्होंने 1928 में जिस संस्था  की स्थापना की , उसका नाम ' सेवा सदन ' ही रखा  .  स्त्रियों की शिक्षा की व्यवस्था करना और आश्रयहीन स्त्रियों को आश्रय एवं सुरक्षा प्रदान करना इस संस्था का मुख्य उद्देश्य बनाया. इस कार्य के लिए उन्होंने  अपनी कई एकड़ ज़मीन तथा  महलनुमा कोठी उसे दान कर दी. उनकी पत्नी ने भी  अपनी सारी जायजाद,  अपने गहने , हीरे - जवाहरात  सब कुछ उस सेवा सदन के नाम लिख दिया.  इस  युगल की इन सेवाओं का सम्मान जनता ने तो किया ही, सरकार ने भी किया . अँगरेज़ सरकार ने वेंकटसुब्बा राव को 1936  में ' सर ' की उपाधि से विभूषित किया तो  आज़ादी मिल जाने के बाद सरकार ने अंडाल वेंकटसुब्बा राव के योगदान की सराहना करते हुए  उन्हें 1957 में ' पद्म भूषण ' से सम्मानित किया .  




" मद्रास सेवा सदन " की जब लोकप्रियता बढ़ने लगी तो फिल्मकारों का भी ध्यान इस ओर गया . फिल्म निर्देशक  / निर्माता  के. सुब्रमण्यम ने मद्रास युनाइटेड आर्टिस्ट कारपोरेशन के बैनर तले " सेवा सदनम " नाम से 1938 में फिल्म बनाई जिसके कथा लेखक के रूप में प्रेमचंद का नाम दिया गया.  तमिल फिल्म इंडस्ट्री में यह युगांतरकारी फिल्म सिद्ध  हुई. यद्यपि रूढ़िवादी लोगों ने इसका जमकर विरोध किया , पर फिल्म ज़बरदस्त रूप से सफल हुई .  एस . सुब्बुलक्ष्मी ( 1916 - 2004 ) यों तो गायिका थीं , पर उन्होंने कुछ  विशिष्ट फिल्मों में  यादगार  अभिनय भी किया.  सेवा सदनम  ही वह फिल्म थी जिससे उन्होंने अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत की थी. 


वेंकटसुब्बा राव और अंडाल अम्मा ने जो स्वप्न देखा था, वह  " मद्रास  सेवा सदन " ( और बेंगलुरु में भी  " अभय निकेतन " ) के रूप में साकार हुआ. जहाँ आज यह  धर्मार्थ संस्था के रूप में रजिस्टर्ड है और इसके अंतर्गत एक दर्जन  से अधिक संगठन नारी उत्थान एवं समाज कल्याण के लिए कार्य करके न केवल  उनकी यशःकीर्ति की पताका फहरा रहे हैं , बल्कि प्रेमचंद का भी अद्वितीय स्मारक बन गए हैं   


साहित्य समाज को कैसे प्रभावित कर सकता है, यह इसका जीता - जागता उदाहरण है. शब्द शक्ति की यह अनूठी मिसाल है. 

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                                                                                                                                                                            हास्य व्यंग्य


                                                                                                                                                                              भारतेंदु हरिश्चंद्र 
                                                                                                                                                                                 (सं 1936)

बन्दर सभा



(इन्दर सभा उरदू में एक प्रकार का नाटक है वा नाटकाभास है और यह बन्दर सभा उसका भी आभास है।)

आना राजा बन्दर का बीच सभा के,

सभा में दोस्तो बन्दर की आमद आमद है।

                        गधे औ फूलों के अफसर जी आमद आमद है।

मरे जो घोड़े तो गदहा य बादशाह बना।

                        उसी मसीह के पैकर की आमद आमद है।

व मोटा तन व थुँदला थुँदला मू व कुच्ची आँख

व मोटे ओठ मुछन्दर की आमद आमद है ।।

हैं खर्च खर्च तो आमद नहीं खर-मुहरे की

          उसी बिचारे नए खर की आमद आमद है ।। 1 ।।

बोले जवानी राजा बन्दर के बीच अहवाल अपने के,

पाजी हूँ मं कौम का बन्दर मेरा नाम।

बिन फुजूल कूदे फिरे मुझे नहीं आराम ।।

सुनो रे मेरे देव रे दिल को नहीं करार।

जल्दी मेरे वास्ते सभा करो तैयार ।।

लाओ जहाँ को मेरे जल्दी जाकर ह्याँ।

सिर मूड़ैं गारत करैं मुजरा करैं यहाँ ।। 1 ।।

आना शुतुरमुर्ग परी का बीच सभा में,

आज  महफिल  में  शुतुरमुर्ग  परी  आती  है।

गोया गहमिल से व लैली उतरी आती है ।।

तेल और पानी से पट्टी है सँवारी सिर पर।

मुँह पै मांझा दिये लल्लादो जरी आती है ।।

झूठे  पट्ठे  की  है  मुबाफ  पड़ी  चोटी  में।

देखते  ही  जिसे  आंखों  में  तरी  आती  है ।।

पान  भी  खाया  है  मिस्सी  भी  जमाई  हैगी।

हाथ  में  पायँचा  लेकर  निखरी  आती  है ।।

मार सकते हैं परिन्दे भी नहीं पर जिस तक।

चिड़िया-वाले के यहाँ अब व परी आती है ।।

जाते ही लूट लूँ क्या चीज खसोटूँ क्या शै।

बस इसी फिक्र में यह सोच भरी आती है ।। 3 ।।

गजल जवानी शुतुरमुर्ग परी हसन हाल अपने के,

गाती  हूँ  मैं  औ  नाच  सदा  काम  है  मेरा।

ऐ   लोगो   शुतुरमुर्ग   परी   नाम   है   मेरा ।।

फन्दे  से  मेरे  कोई  निकले  नहीं  पाता।

इस गुलशने आलम में बिछा दाम है मेरा ।।

दो  चार  टके  ही  पै  कभी  रात  गँवा  दूँ।

कारूँ  का  खजाना  कभी  इनआम  है  मेरा ।।

पहले जो मिले कोई तो जी उसका लुभाना।

बस  कार  यही  तो  सहरो  शाम  है  मेरा ।।

शुरफा  व  रुजला  एक  हैं  दरबार  में  मेरे।

कुछ सास नहीं फैज तो इक आम है मेरा ।।

बन जाएँ जुगत् तब तौ उन्हें मूड़ हा लेना।

खली हों तो कर देना धता काम है मेरा ।।

जर  मजहबो मिल्लत मेरा  बन्दी  हूँ  मैं  जर  की।

जर ही मेरा अल्लाह है जर राम है मेरा ।। 4 ।।

(छन्द जबानी शुतुरमुर्ग परी)

राजा  बन्दर  देस  मैं  रहें  इलाही  शाद।

जो मुझ सी नाचीज को किया सभा में याद ।।

किया  सभा  में  याद  मुझे  राजा  ने  आज।

दौलत  माल  खजाने  की  मैं  हूँ  मुँहताज ।।

रूपया मिलना चाहिये तख्त न मुझको ताज।

जग में बात उस्ताद की बनी रहे महराज ।। 5 ।।

ठुमरी जबानी शुतुरमुर्ग परी के,

आई हूँ मैं सभा में छोड़ के घर।

लेना  है  मुझे  इनआम में जर ।।

दुनिया में है जो कुछ सब जर है।

बिन  जर  के  आदमी  बन्दर है ।।

बन्दर   जर   हो  तो   इन्दर है।

जर ही के लिये कसबो हुनर है ।। 6 ।।

गजल शुतुरमुर्ग परी की बहार के मौसिम में,

आमद से बसंतों के है गुलजार बसंती।

है  फर्श  बसंती  दरो-दीवार  बसंती ।।

आँखों में हिमाकत का कँवल जब से खिला है।

आते हैं नजर कूचओ बाजार बसंती ।।

अफयूँ मदक चरस के व चंडू के बदौलत।

यारों के सदा रहते हैं रुखसार बसंती ।।

दे जाम मये गुल के मये जाफरान के।

दो चार गुलाबी हां तो दो चार बसंती ।।

तहवील जो खाली हो तो कुछ कर्ज मँगा लो।

जोड़ा हो परी जान का तैयार बसंती ।। 7 ।।

होली जबानी शुतुरमुर्ग परी के,

पा लागों कर जोरी भली कीनी तुम होरी।

फाग खेलि बहुरंग उड़ायो ओर धूर भरि झोरी ।।

धूँधर करो भली हिलि मिलि कै अधाधुंध मचोरी।

न सूझत कहु चहुँ ओरी।

बने दीवारी के बबुआ पर लाइ भली विधि होरी।

लगी सलोनो हाथ चरहु अब दसमी चैन करो री ।।

सबै तेहवार भयो री ।। 8 ।

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                                                                                                                                                                                आकलन


"जब समय दोहरा रहा हो इतिहास्"


( पुष्तक चर्चा)


तह्खाने की सीढी पर बैठी नासिरा शर्मा की तहरीरे बरसती चान्दनी मे मुझ से बाते कर रही है,और यह भी सच है कि हर ज़िन्दा तहरीरे बोलती है .अपने समय से बहुत आगे का सफर तय करती है.शब्द साहित्य की ज़मीन पे अलग-अलग सतरंगी लिबास पहन कर सफर करते है , सफर जीवन क प्रतीक होता है ,और शब्दो की प्यास मे ज़िन्दगी की अलामत छिपी होती है.चला बात करब...नासिरा शर्मा से बरसत चान्दनी म...अन्धेरे तह्खाने की पत्थर सीढिया और हाथो की हथेलियो पर , अपना मासूम सा ,सूरज की सतरंगी किरणो जैसा ,चेहरा लिये अन्धेरे मे कुछ तलाश कर रही है नासिरा शर्मा की निगाहे .शब्द जब किसी की निगाहे बन जाय तब शब्द एक दुसरे की आंखो मे आंखे डाल कर बाते करते है . शब्दो को ज़ुबान अता करने का हुनर नासिरा शर्मा को आता है.शब्दो को एक नई पोशाक,नया अर्थ,नयी वाणी ,एक नया फलक ,और् व्यापक अर्थ् रचनाकार् देता है ,आलोचक शब्दो मे नई रूह नही फूंक सकता. आज नई सदी मे ऐसी आलोचना लिखी जा रही है कि जहा आप को एक घुटन का एह्सास होगा..वही लकीर के फक़ीर्..ढोल बाजे के साथ...अपनी अपनी डफ्ली बजाते हुए साहित्य नगर के हर चौराहे पे दिखाई दे जाते है .कहानी बहुत आगे-आगे तो आलोचक पीछे -पीछे हांपते कांपते भागा जा रहा है..मंज़िल क पता नही..आज भी मंज़र कुछ ऐसा ही है.मेरा कहना है कि भाई मेरे ! किसी भी रचना पे आलोचना करते समय तुम भी उसी पीडा से गुज़रो ,या गुज़रने की कोशिश करो उसी रचना प्रक्रिया से ,फिर होगा यह कि आलोचना भी कहानी,कविता की तरह पढी जयेगी,और सोया हुआ शहर भी जाग जयेगा.मै अपने कमरे मे बैठा हू..और मोर् सामने नासिरा शर्मा की पुस्तक "जब समय दोहरा रहा हो इतिहास " हवै...नासिरा जी कि उंग्लियो से निकलने वाले शब्द  कभी कहानिया ,कभी संस्मरण्,रिपोर्ताज़,यात्रा व्रतांत् के रूप मे इस पुस्तक मे मौजूद है . जहा देश से विदेश तक जो मंज़र है वह पाठको की सोच लहरो को अपने साथ साथ ले कर चलने मे कामयाब नज़र आती है.       "उस लड्की को देश और काल ने बडा किया था .इस लिये जह एक खुलापन था        वही पर अपनी जडो को पूरी तरह न समझ सक्ने की बदनसीबी थी,जिस ने        बार बार पीछे मुड कर देखने पर मजबूर किया....खान्दानी वैभव अपने खण्डर       होते भविष्य की तरफ बढ रहा था...."(तह्खाने की सीढी पर बैठी लड्की)जिस देश काल मे हम बडे होते है ,उसी काल की जडो को हम अपनी ही उंग्लियो से कुरेद्ते है..आज के ताजिरान ए वक़्त मौत की कैसी तिजारत मे लगे है ?वर्तमान की तरफ पीठ कर के बैठे है और आने वाले सुनहरे कल का सपना देख रहे है..जडे खोखली होती जा रही है..और पत्तियो पर पानी का छिड्काव् जारी है. हाय !हम हम नही रहे..क्या से क्या हो गये ??आदमी अब आदमी कहा रह गया ...हे मानव तुम दानव क्यो बनते जा रहे हो,तुम्हे इस धर्ती पे क्यो भेजा गया था,तुम्हारा वजूद मानवता  के लिये था..मगर...       "फूलो से भरी इस वादी मे /       बन्दूक़ो की धाये धाये पर/        फाख्ताओ का उछल कर मरना/        जैसे सूखे पत्तो से उठ्ता हो रुदन/         डल झील पर डोगो की जगह.."(बरसती चान्दनी मे तवी का रुपह्लापन)नासिरा शर्मा हरे भरे दरख्तो,पौधो,पत्तियो और फूलो को सिर्फ नही देखती ,देखती है उन की निगाहे अपनी संस्क्रिति /तह्ज़ीब की फैली हुई जडो को ..हरे भरे दरख्तो की पत्तिया अपने दर्द का इज़हार् तो करती है,मगर जडो को जब जब अपनी पीडा व्यक्त करने लका मौक़ा मिला,तब तब बारिश की बून्दो ने उसे एक नया आवरण् दे दिया,फिर से धरती पे उग आये एक नये पौधे की पीडा..रात के अन्धेरे मे एक शय चमकती सी दिखायी दे रही है मुझे,नासिरा!कही ये मेरा वहम तो नही ?यह सच है..तुम्हारे शब्दो ने ऐसा ही कुछ कहा मुझ से..नासिरा शर्मा ने जब 22,अगस्त,1948 मे आंखे खोली तब उन्हे साहित्य संस्कार विरासत मे मिले ,जिसे अपने देश की संस्क्रिति के आंचल मे समेटे,तेज़ आन्धी-तूफान से बचाते हुए देश विदेश का भ्रमण करती रही ..मगर एक पल के लिये भी उन्हे क़रार न मिला..युद्ध बन्दियो पर जर्मन व फ्रांसीसी दूरदर्शन् के लिये बनी इन की फिल्मे हो या ढेर सारे उपन्यास,कहानी संग्रह पाठको के दिल मे अपनी जगह बनाते गये .नीम की ठन्डी छांव का एह्सास दिलाने वाली नासिरा शर्मा के साहित्य की ज़ोबान कभी भी धमा-चोक्डी वाली नही रही.आम ज़िन्दगी की चहल-पहल वाली इस औरत के अन्दर काय्नात की वुसअते समायी हुई है.मह्सूसात की जलती चट्टानो पे नंगे पांव चलने वाली नासिरा माई !तुम्हारी तहरीरो से रु ब रु होने के बाद जब मै घर से बाहर निकल रहा था ,तब मैने मह्सूस किया कि मेरे मिट्टी बदन वजूद के अन्दर फैली पहाडियो से ज्वालामुखी रिसने लगा है .मै आगे ही आगे बढा चला जा रहा था और सोया हुआ शहर भी जागता सा दिखायी दिया मुझे.जागती ज़िन्दगी का क़िस्सा अभी जारी है.कि लालटेन लिये नासिरा ज़िन्दगी की सडक पे खडी है।


खुर्शीद हयात   


मोबाइल नं. 975247534








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सैर का जुनून , प्यार की तलाश

लेखक प्रवीण कारखानीस अपने दिल में सैर का जुनून और आँखों मे प्यार की तलाश लिए, सात हम-खयाल दोस्तों के साथ, मोटरसाइकिल पर सवार होकर दुनिया की सैर करने निकले, ये आज से करीब पैंतीस बरस पहले की बात है ।

उस सफर में काफी जद्दोजह के बावजूद वो पाकिस्तान नही जा पाये । कई सालों के इन्तजार के बाद सन २००४ में जब पाकिस्तान की सरज़मीन पर पाकिस्तान और हिद्नुस्तान के दरमियान क्रिकेट मैचों के खेले जाने का ऐलान हुआ तब प्रवीणजी ने मोटरसाइकिल पर से ना सही लेकिन बस से,  तन्हा पाकिस्तान जाने के लिए वीज़ा हासिल कर लिया । फिर भी वो सोचते रहे कि वो दिन कब आयेगा जब हम आजाद पंछियों की तरह उडान भरेंगे, जब इन्सान से इन्सान को बाँटनेवा ली सरहदें, खूनी लकीरें, नही होंगी ।

कहां से चले थे हम, आये कहां तक

पहुंचना तो है, मंजिलों के निशां तक

अभी फासले है, अभी दूरियां है

हमारे यहां से, तुम्हारे वहां तक

ये फासले जाने कब मिटेंगे, ये दूरियां जाने कब सिमटेंगी, हम क्यों प्यार की राहें छोडकर नफरत की राहों में आ

निकले हैं- यही सोचते-सोचते वो पाकिस्तान की ओर निकल पड़े । कराची, रावलपिंडी, पेशावर और लाहौर जैसे बड़े शहरों में वो छोटे-छोटे होटलों में रहे, ढाबों में खाते रहे, नुक्कडों पर बैठे चायवालों से गपशप करते चाय पीते रहे । उन्होंने मैच का मज़ा लिया, शहर भी देखे और आम आमी से मेलजोल करते प्यार भी बाँटा । आम आमी से उन्हे बेहद खुलूस मिला, बेइन्तहां मुहब्बत मिली और कभी न देखी थी न सुनी थी ऐसी मेहमाननवाजी मिली । आम आदमी की ज़बानी अपने देश की तारीफ सुनकर वो बागबाग हो गए । उन को कोई फर्क नही महसूस हुआ । मुंबई और कराची, दोनों शहर उन को एक से लगे ।

महज पंद्रह दिन के अरसे में वो पाकिस्तान को इतना जान गए थे जितना शायद बरसों में जानना मुश्किल होता है। ''मंजिलएमकसूद.... पाकिस्तान'' इस नाम से लिखी उन की इस किताब में उन पंद्रह दिनिों के वाकयात जो भी पढ़ेगा, प्रवीणजी की दनिश और हिम्मत का कायल हो जायेगा । प्रवीणजी का हर कदम इन्सानियत की राह में रहा । वो

दोनों देशों के रहनुमाओं को यही कहना चाहते हैं --

हम ने क्या पा लिया हिन्दू या मुसलमां होकर

क्यों न इन्सां से मुहब्बत करे, इन्सां होकर

- - नक्श लायलपुरी (वरिष्ठ गीतकार)

अपनी लंबी घुम्मकड़ जिंदगी में प्रवीण कारखानीस पाकिस्तान काफी बाद में जा पाए और वह भी महज पन्द्रह दिनिों के लिए । वे वहाँ भारत-पाकिस्तान के बीच खेले जाने वाले मैचों को देखने गए थे । उसी यात्रा का वृत्तांत है यह । लेकिन यह केवल यात्रावृत्तांत नहीं है, बल्कि दो देशों के बीच भाईचारे की महीन डोर है । कारखानीस का जीवन की बुनियादी अच्छाइयों पर भरोसा है । इसी विश्वास के साथ वे पाकिस्तान गए थे और उन्हें कहीं भी निराश नहीं होना पड़ा । यह पुस्तक इस बात का प्रमाण है कि भलाई हर जगह है ।

जहाँ डगडग पर रुकावट हो, पगपग पर पहरा हो और जहाँ यात्री अपने निर्धारित मार्ग से टस से मस नहीं हो

सकता, वहाँ के लोगों का लेखक के प्रति सद्भावना प्रदर्शन एक सुखद आश्चर्य है । पुस्तक मानो हमसे कहती है कि मानवजाति वेत्र् सबसे अच्छे हथियार प्रेम और सौहार्द्र हैं, बम और शक नहीं ।

वहाँ खेले गए मैचों का वर्णन इतना जीवंत और रोमांचक है कि हमारी साँस भी थम सी जाती है । चार मैचों तक दोनों देश बराबरी पर रहे । पाँचवे और निर्णायक मैच में पाकिस्तान के युवा गेंदबाज हमारे खिला़डियों पर कहर ढा रहे थे। लगता था भारत हार जाएगा । हमारे दिग्गज खिलाड़ी जा चुके थे । लेकिन हमारे बाकी खिला़डियों ने अपनी विध्वंसक बल्लेबाजी से खेल को पलट कर रख दिया और भारत को शानदार जीत मिली । यह वर्णन पढ़ते ही बनता है । मुझे आश्चर्य इस बात का है कि महज पन्द्रह दिन की यात्रा को लेकर वे इस सुंदर पुस्तक का सृजन वैत्र्से कर सके ।

काश, इस पुस्तक का उर्दू में भी अनुवाद हो और वह पाकिस्तान में भी पढ़ी जाए । मुझे पूरा विश्वास् है कि

पाकिस्तान के शासक अगर इस पुस्तक को पढ़ेंगे तो वे कारखानीस को अपने देश में सादर आमंत्रित करेंगे और उन्हें पूरे देश में जहाँ चाहे वहाँ जाने की आजादी देंगे ।

कारखानीस दो देशों में से किसी भी देश के राजदूतत नहीं हैं । लेकिन वे शांतिदूत दोनों देशों के हैं ।

- अमृतलाल वेगड़

लेखक : सौंदर्य की नदी नर्मदा

अमृतस्य नर्मदा

तीरे  तीरे नर्मदा

भलाई हर जगह

१८३६, राइट टाउन,

जबलपुर  २, मध्यप्रेश

 

मंजिलएमकसू... पाकिस्तानः लेखक  प्रवीण कारखानीस : अनुवाक  सुलभा कोरे,

प्रकाशक  संस्कार साहित्य माला, ५०१, वृत्र्ष्णा विहार, टाटा कम्पाऊन्ड, इर्ला ब्रिज, एस. वी. रोड, अंधेरी (प),

मुम्बई  ४०० ००५८; प्रथम संस्करण  २०१२; पृष्ठसंख्या  १६० मूल्य  रु. २००.००

मूल रुप से मराठी में लिखी इस पुस्तक के लेखक प्रवीण कारखानीस का यह यात्रा वृत्तांत उनकी १५ दिनों तक की सन २००४ में की गई उस पाकिस्तानी यात्रा पर केन्द्रित है जो उनको इस छोटे से अरसें में वहाँ के बारे में इतना निकट महसूस करा सका जो कदाचित उन्हें बरसों मे जानना मुश्किल होता । वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आम आदमी में कहीं कोई फर्क नहीं होता है, चाहे वह मुम्बई हो या कराची, दोनों शहर उन्हें एक से लगे । अपनी इस सीमित समयकी यात्रा में वे लाहौर, कराची, रावलपिंडी और पेशावर जैसे बड़े शहरों में छोटेछोटे होटलों मे रहे और आम आमी की जिन्दगी को उन्होंने पास से देखा । य़द्यपि दोनों देशों के सम्बंध उतार-चढाव के साथ सदैव एक पहेली बने रहे, कड़वाहट, युद्ध और उन्माद के क्षणों से परे हम लोग इन्हें राजनेताओं की नजर से देखते रहे । लेखक के अनुसार यह एकांगी दृष्टी रही है । लेखक के घुमक्कड़ी शौक ने क्रिकेट के बहाने पड़ोसी की खिड़की से भीतर झांकने का जो अवसर पाया उसे वह मानवीय रिश्तों का अपना स्वयं का भोगा मूल्यवान दस्तावेज मानता है ।

प्रख्यात लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार विश्वनाथ सचदेव ने इस पुस्तक वेत्र् बारे में जो लिखा है वह मै निस्संकोच रेखांकित करना और दोहराना चाहूंगा । जिस सहजता के साथसाथ लेखक ने पाकिस्तान के वर्तमान परिदृश्य के अलावा वहां के भूगोल और इतिहास से भी पाठक को जोड़ा है वह हमारे साझे अतीत का जीवन चित्र प्रस्तुत करता है ।

मूल रुप से मराठी के गणमान्य लेखक प्रवीण कारखानीस एक पर्यटक है और उन्होंने क्रिकेट मैच देखने के लिए

पाकिस्तान की यात्रा की थी । प्रस्तुत संस्मरण मात्र यात्रा विवरण नही है, वे दो देशों के रिश्तों के उन सूत्रों की पहचान करते है जो राजनीतिक विभाजन से परे साझी विरासत को चित्रित करते है । लेखक ने पाकिस्तानी समाज का गहन अध्ययन भी किया है और आपका हिन्दी और र्उदू पर भी समानाधिकार है, य़द्यपि मराठी के वे सच्चे लेखक है । अपने संक्षिप्त दौरे में पाकिस्तान के बारे में वुत्र्छ अत्यन्त रोचक जानकारियां प्राप्त कर उन्होंने पुस्तक का महत्त्व बढ़ा दिया है ।

जो बात लेखक को अपनी पाक यात्रा में सदैव दृष्टिगत होती रही कि भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में दो अलग-अलग दुनियां है - राजवाले और सत्तारूढ़ नौकरशाहों के रिहायशी इलाके समृद्धि के सभी उपकरणों के साथ हैं जिन्हे अत्याधुनिक जीवन शैली की अनिवार्यता कहा जा सकता है । साधारण नागरिकों की बस्ती का वही हाल है जहाँ धूल, धूप, धुआं और विपन्नाता हर मोड़ पर भारत के नगरों में दिखता है । बहुधा कराची और मुम्बई की तुलना की जाती है वह एक अर्थ में वैसी ही है जेसी हम यहाँ स्वयं देखते है । लगता है यह पुस्तक समाजशास्त्रीय क्षेत्र में भी हस्तक्षेप करती है जब वह स्थानीय मुम्बईकरों की समस्या बसे हुए दूसरे लोगों के संदर्भ में प्रस्तुत करता है । यह बात वस्तुतः महत्वपूर्ण है कि लेखक भारत-पाक में समानताएं खोजता है और उन्ही संदर्भों के साथ प्रस्तुत करता है।

लेखक ने अपने वृतान्त में पाकिस्तान के जन्म से लेकर बाद तक के अनेक अल्पज्ञात तथ्यों पर उपयोगी जानकारी के साथ साथ वहाँ के प्रतिभाशाली लेखकों, खिलाड़ियों और वैज्ञानिकों के योगदान का भी यथास्थान रोचक वर्णन किया है।स्पष्ट है कि अपनी पुष्तक लिखने के पहले उन्होंने पर्याप्त शोध भी किया है। कराची  पुरानी इमारतों, विभाजन के पहले वहां के हिन्दु, धार्मिक व सामाजिक संघटनों, व्यवसाइयों एवं उद्योगों की प्रगति आदि के द्वारा लेखक ने कराची का विश्वसनीय इतिहास ही लिख डाला है। इसी संदर्भ में मोहम्मद अली जिना के जीवन और राजनीति को प्रभावित करने वाली अनेक झलकियां और प्रसंग भी लेखक ने दिए हैं। वहां के लोग भारत के बारे में क्या जानते हैं, क्या जानना चाहते हैं और वहां की सरकार का दुष्प्रचार किस तरह कभी-कभी हमारी छवि पर आंच डालता है, यह इस पुस्तक में विस्तार से लिखा गया है। आज भी पाकिस्तान के आम लोग, भारत के अतीत, दरियादिली, और विशालता पर सम्मोहित हैं, इस बात को लेखक ने सकारात्मक दृष्टि के साथ किताब में दर्शाया है। यद्यपि विभाजन की त्रासदी के पीछे घृणा के पंचांग रचने वालों को लेखक क्षमा नहीं करता है, उसे वहां की सामान्य जवता में शिष्टता और  मेहमाननवाजी वैसे ही दिखती है, जैसे कोई भी पर्यटक; किसी मित्र देश में महसूस कर सकता है।

पुस्तक में आठ पृष्ठों में यात्रा-वृतांत से जुड़े गए चित्र दिए गए हैं। मूल मराठी से सहज और सुन्दर अनुवाद सुलभा कोरे द्वारा किया गया है। पुस्तक पठनीय और संग्रहणीय है।

-हरिकृष्ण निगम

-1002, पंचशील हाइट्स,

महावीर नगर, कान्दिवली (),

मुम्बई - 400 067








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अनिल प्रभा कुमार की कहानियाँ
गहन संवेदना की सूक्ष्म-अभिव्यक्ति





कहानी संग्रह—बहता पानी , कथाकार— अनिल प्रभा कुमार, प्रकाशक—भावना प्रकाशन,

109-ए, पटपड़गंज, दिल्ली-110091, संस्करण—2012, पृष्ठ संख्या—166, मूल्य—रु॰ 300/


अमेरिका के प्रवासी हिन्दी लेखकों में पिछले कुछ वर्षों में जिन साहित्यकारों ने अपनी गंभीर रचनात्मकता का परिचय दिया है, अनिल प्रभा कुमार उनमें एक नाम है। उन्होंने न केवल कहानी के क्षेत्र में बल्कि कविता के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाई है। उनकी कहानियाँ जीवनानुभूति की उस वास्तविकता से परिचित करवाती हैं जिनसे आमजन दिन-प्रतिदिन गुजरता, जूझता, टूटता और बिखरता है। उनकी कहानियों में पात्रों और परिस्थितियों का सूक्ष्म अध्ययन प्रतिभासित है।

प्रवासी लेखकों के विषय में प्रायः कहा जाता है कि वे नॉस्टेल्जिया के शिकार होते हैं, लेकिन क्या यह बात यहाँ (यानी मुख्यभूमि भारत में) रहकर लेखन कार्य कर रहे लेखकों के संदर्भ में उतनी ही सच नहीं है? लेखक अपने अतीत से मुक्त कैसे हो सकता है! अनेकों वर्षों पूर्व महानगरों में आ बसा एक संवेदनशील लेखक अपने गाँव-गली, कस्बे-मोहल्ले, नगर को भुला नहीं सकता। वह उसकी साँसों में रचा-बसा होता है और किसी न किसी रूप में उसकी रचनात्मकता का हिस्सा बनता है। अनिल प्रभा कुमार की कुछ कहानियों में भी वह विषयानुकूल प्रभावकारी रूप में चित्रित हुआ है। उनका शिल्प उसे और अधिक प्रभावोत्पादक बनाता है।

हाल में अनिल प्रभा कुमार का कहानी संग्रह ‘बहता पानी’ दिल्ली के ’भावना प्रकाशन’ से प्रकाशित हुआ है। संग्रह में उनकी चौदह कहानियाँ संग्रहीत हैं। यद्यपि उनकी प्रत्येक कहानी अमेरिकी परिवेश पर आधारित है तथापि कुछेक में भारतीय परिवेश भी उद्भासित है। काल, परिवेश और वातावरण का निर्धारण रचना की विषयवस्तु पर आधृत होता है। अनिल प्रभा कुमार का कथाकार रचना की अंतर्वस्तु की माँग को बखूबी जानता-पहचानता है और उसे अपने सुगठित शिल्प और सारगर्भित भाषा में पाठकों से परिचित करवाता है. अनेक स्थलों पर उनके वाक्य-विन्यास विमुग्धकारी हैं। छोटे-वाक्यों में बड़ी बात कहने की कला लेखिका के शिल्प कौशल को उद्घाटित करती है। अन्य बात जो पाठक को आकर्षित करती है और पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी कहानी में जो छीजती दिखाई दे रही है वह है रचनाकार का प्रकृति प्रेम। ‘किसलिए’, ‘दीपावली की शाम’, ‘फिर से’ कहानियों में यह दृष्टव्य है। कहानियों की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति उन्हें मार्मिक और सशक्त बनाती है।

अनिल प्रभा कुमार के पात्र पाठक में विचलन पैदा करते हैं और उसके अंतर्मन को आप्लावित कर एक अमिट छाप छोड़ते हैं। उनकी एक भी कहानी ऎसी नहीं जो सोचने के लिए विवश नहीं करती और उस सबका कारण उनमें रेखांकित जीवन की विडंबना और विश्रृखंलता है। ‘उसका इंतजार’ अंदर तक हिला देने वाली एक ऎसी युवती की कहानी है जो मनपसंद युवक की प्रतीक्षा में अपनी आयु की सीढ़ियाँ चढ़ती चालीस तक पहुँच जाती है। यह आज का कटु सच है जो न केवल अमेरिका के किसी प्रवासी भारतीय की बेटी का सच है बल्कि भारत की हर उस दूसरी-तीसरी पढ़ी-लिखी लड़की का सच है जो नौकरी करते हुए अपने पैरों पर खड़ी है। कल, यानी नानी-दादी के कल, की भाँति वह समझौते के लिए तैयार नहीं, क्योंकि जीवन के निर्णय अब वह स्वयं लेती है, भले ही उस निर्णय में चूक हो जाती है। ‘उसका इंतजार’ की विधु के साथ भी यही हुआ। अपनी माँ से विधु का कथन दृष्टव्य है—“माँ, तुम भी यहाँ आकर इन सबसे मिल गई हो? मुझे बछिया की तरह एक अनजाने खूँटे से बाँधने को तैयार हो गईं?” अंत में उसका कथन उसके आत्मविश्वास को दर्शाता है—“जब मैंने इतना इंतजार किया है तो थोड़ा और सही—मैं सिर्फ शादी करने के लिए अपने दिल से समझौता नहीं करूँगी। इतनी हताश नहीं हुई अभी मैं।” लेकिन अनिल प्रभा कुमार यहीं नहीं रुकतीं। एक मनोवैज्ञानिक की भाँति वह विधु के अंतर्मन में झाँकती हैं और विधु का यह कथन पाठक को छील जाता है—“माँ, तुम देखना, एक दिन जरूर आएगा वह। छह फुट लंबा, सुन्दर, आकर्षक, गठीला शरीर, बेहद पढ़ा-लिखा, अमीर, खानदानी, हँसमुख, मुझपर जान छिड़कने वाला, हाजिर जवाब, दिलचस्प, गंभीर, उदार विचारोंवाला, बिल्कुल अमेरिकी मॉडल लगेगा पर मूल्य बिलकुल भारतीय होंगे। मैं उसे देखते ही पहचान लूँगी और वह----.” विधु के होठ बुदबुदा रहे थे लेकिन गाल पर ढुलक आए आँसू का उसे पता ही नहीं चला।

अनिल प्रभा कुमार की कहानियों के अंत उन्हें सिद्धहस्त रचनाकार सिद्ध करते हैं।

‘किसलिए’ कहानी उस व्यक्ति की कहानी है, जो नौकरी से अवकाश प्राप्तकर घर में अपनी बेटी ईशा के ‘पेपे’ (कुत्ता) के साथ रहता है। पत्नी बानी नौकरी के चलते हफ्ते में एक या दो दिन आती है और ईशा बाहर रहती है। ‘पेपे’ उस व्यक्ति के जीवन का इतना अहम हिस्सा बन जाता है कि वह उसके बिना रह नहीं सकता। यह एक जीवंत और वास्तविक कहानी है और ऎसी कहानी वही लिख सकता है जिसने ऎसे क्षण जिए हों। इस कहानी को पढ़ते हुए मुझे जैक लंडन के ‘काल ऑफ दि वाइल्ड’ की याद आती रही। वह कुत्तों पर ही आधारित है, जिसमें लंडन ने उनका मानवीकरण किया है। यद्यपि अनिल प्रभा की कहानी में ऎसा नहीं है, लेकिन ‘पेपे’ की गतिविधियाँ और मालिक के संकेतों को समझने व कार्यान्वित करने की उसकी क्षमता आकर्षित करती है। वह व्यक्ति उसे बेटे की भाँति प्यार करता है। ढाई हजार डालर खर्च कर उसका ऑपरेशन करवाता है, लेकिन वह उसे बचा फिर भी नहीं पाता। ‘पेपे’ और उस व्यक्ति का जो मनोवैज्ञानिक चित्रण लेखिका ने किया है वह कहानी को अविस्मरणीय बनाता है।

‘गोद भराई’ किसी स्त्री के संतान न होने की पीड़ा और भारत से किसी बच्ची को गोद ले आने को केन्द्र में रखकर लिखी गई है। ‘घर’ अमेरिकी संस्कृति, सभ्यता, और वातावरण को रेखांकित करती है। यह मात्र सलिल और सलीम की कहानी नहीं, उस पूरे समाज की कहानी है जहाँ पति-पत्नी के विलगाव का दुष्प्रभाव बच्चों को झेलना पड़ता है। अकस्मात सलीम की माँ अपने पिता की सिफारिश पर उसके यहाँ आकर रहने वाले महेश के साथ जाकर जब अलग रहने का निर्णय करती है, सलीम इस पीड़ा को बाँट किसी से नहीं पाता लेकिन वह उसे अंदर ही अंदर कुतरती रहती है। मेडिकल में जाने की क्षमता रखने वाला सलीम चिड़ियाघर की छोटी नौकरी करने के लिए अभिशप्त हो जाता है, क्योंकि पिता भी दूसरी शादी करके कनाडा में बस जाते हैं और डाक्टरों ने उसे सलाह दी कि उसे प्रकृति के नजदीक रहना चाहिए। कहानी का अंत बेहद मार्मिक है—“रात की कालिमा खत्म हो चुकी थी। आकाश का रंग ऎसा हो गया, जैसे रात जाने से पहले राख बिखेर गई हो। सलिल वहीं कार में बैठा देखता रहा। सलीम धीरे-धीरे पैर घसीटता हुआ, उस राख के शामियाने के नीचे जा रहा था—अपने घर।” यानी चिड़ियाघर जो अब सलीम का घर था।

‘दीपावली की शाम’ एक ऎसे परिवार की कहानी है जिसके पास अपार संपत्ति है, लेकिन घर का बड़ा लड़का चवालीस साल का और छोटा छत्तीस का…तीन बेटों में कोई भी विवाविह नहीं, और तीन भाइयों के बीच एक बहन भी अविवाहित…। घर का स्वामी अपने घर की तुलना ताजमहल से करता नहीं अघाता लेकिन उसी ताजमहल में दीपावली के दिन सन्नाटा उसे परेशान अवश्य करता है। घर में न कहीं रोशनी न उत्साह। अपनी परेशानी को गृहस्वामी यह कहकर छुपाता है—“अगली दीपावली हिंदुस्तान में मनाएँगे। सभी जाएँगे। बस, पास रोकड़ा होना चाहिए।”

‘फिर से’ कहानी पारिवारिक विघटन को व्याख्यायित करती है। केशी और तिया की कहानी। केशी सेना में युद्धभूमि में और तिया उसकी अनुपस्थिति में उसकी मान मर्यादाओं की सीमाएँ तोड़ती है। लौटकर वह फिर भी बच्चों की खातिर उसके साथ रहने को तैयार हो जाता है, लेकिन तिया को उसका उपकार नहीं चाहिए था। दोनों अलग हो जाते हैं। केशी बच्चों को लेकर अमेरिका जा बसता है। वही तिया जिस क्षण बच्चों से मिलने अमेरिका पहुँचती है उस क्षण को बहुत ही सधे भाव से लेखिका ने कहानी में चित्रित किया है। पुनः मिलकर भी दोनों के अहं टकराते हैं और केशी बेटी संजना के घर से जाने का निर्णय कर लेता है। उस क्षण को कहानी में जिस प्रकार अनिल प्रभा कुमार ने बिम्बायित किया है वह आकर्षक है—“खाली कमरे के बीचों-बीच खड़े वह बाढ़ में सब-कुछ जल-ग्रस्त हो जाने के बाद खड़े एकाकी पेड़ जैसे लग रहे थे। नितांत अकेला, उदास वृक्ष। प्रकृति जैसे उसे पीटने के बाद, रहम खाकर, जिन्दा रहने के लिए छोड़ गई हो।”

‘बरसों बाद’ दो सहेलियों की मिलन गाथा है, जो तीस वर्षों बाद मिलती हैं। अपनी बेटी के प्रसव के लिए अमेरिका पहुँची सहेली, जिसका पति प्रोफेसर था, अपनी पीड़ा जब इन शब्दों में बयान करती है—“नौकरी करती रही न! ऊपर से बीमारियों-तनाव की वजह से। एहसास—बस कौरव महारथियों के बीच अभिमन्यु के घिर जाने जैसा। यूँ ही घर-गृहस्थी के रोज-रोज के ताने, व्यंग्य, आरोप। मुझे लगता है कि जैसे मैं दुनिया की सबसे बुरी औरत हूँ।” वह काँप रही थी। एक आम भारतीय नारी, वह पढ़ी-लिखी नौकरी पेशा है तो क्या, की स्थिति का वास्तविक आख्यान करती यह कहानी कितने ही विचारणीय प्रश्न उत्पन्न करती है।

संग्रह की शीर्षक कहानी ‘बहता पानी’ अमेरिका से भारत आयी एक महिला की कहानी है, जिसके दिल-दिमाग में घर और स्थानों की वही छवि अंकित है जिसे छोड़कर वह प्रवास में गयी थी। उसकी सहेली माधवी का प्रश्न है—“तू पुरानी जगहों से इतनी चिपकी हुई क्यों है?”

“पता नहीं. शायद वह मेरी स्मृतियों के स्थल हैं.” वह आगे कहती है, “शायद मैं उसी पुरानेपन, उन्हीं बिछुड़े सुखों की तलाश में लौटती हूँ। वह मेरा कंफर्ट जोन है। इस नयेपन में मेरी पहचान खो जाती है और मैं अपने को गँवाना नहीं चाहती।” वह भाई से विशेषरूप से अनुरोध कर अपने घर के उन हिस्सों को देखती है जहाँ उसके पिता लेटते थे, जहाँ वह पढ़ती थी। और जब वापस लौटती है, वह मुड़कर उस खिड़की की ओर देखना चाहती है जहाँ खड़े होकर अशक्त पिता उसे विदा करते थे। अपनी पुरानी यादों में जीती यह एक स्त्री की प्रभुविष्णु कहानी है।

‘बेटे हैं न!’ एक वृद्ध माँ की दारुण कथा है, जो पति की आकस्मिक मृत्यु के बाद अपने तीन बेटों में अपना भविष्य सुखी और सुरक्षित देखती है। उसके तीनों बेटे अमेरिका में जा बसते हैं। वह भी अपने सबसे चहेते बेटे प्रकाश के साथ चली जाती है। प्रकाश के बच्चे जब तक छोटे होते हैं सत्या के प्रति प्रकाश की पत्नी अमला का व्यवहार ठीक रहता है, लेकिन जरूरत समाप्त होते ही सत्या उसे बर्दाश्त से बाहर हो जाती है—“तो क्या हमने आपका ठेका ले रखा है?” अपना आपा खो बैठी अमला कहती है। अंततः अमला द्वारा प्रताड़ित-अपमानित सत्या को प्रकाश भारत भेज देता है, जहाँ सत्या की छोटी बहन दमयंती उसे एयरपोर्ट पर रिसीव करती है। दमयंती के पूछने पर, “बहन जी, क्या हो गया?” सत्या फूट पड़ती है, ‘दमी, उस दिन नहीं, पर आज मैं सचमुच विधवा हो गयी हूँ।” कहानी की मार्मिकता पाठक में उद्वेलन उत्पन्न करती है।

‘मैं रमा नहीं’, अमेरिका निवासी एक अपाहिज पति के लिए समर्पित रमा, एक प्रोफेसर और ऎसी आधुनिका युवती की कहानी है जो भारत से शोध और नौकरी के लिए अमेरिका जाती है। एक ओर रमा है जो दूसरों के लिए भोजन पकाकर अपना और अपने उस पति का पोषण कर रही है जो कभी इंजीनियर के रूप में वहाँ गया था, लेकिन एक दुर्घटना के कारण अशक्त जीवन जी रहा था। दूसरी ओर वह युवती है जो अपने पति को छोड़कर टोरटों में रह रहे अपने भाई के मित्र अर्जुन के साथ लिव-इन रिलेशन में रहती है। प्रोफेसर के यह पूछने पर कि, “तुम अर्जुन से विवाह क्यों नहीं कर लेतीं? बाकी सब-कुछ तो वैसा ही है।” वह उत्तर देती है, “विवाह करने से प्रेम के सारे आयाम बदल जाते हैं।” और अंत में वह प्रोफेसर को एक और झटका देती है, “मैं आपको एक बात और बता देना चाहती हूँ…” उसने होंठों को भींचा, “---कि मैं रमा नहीं हूँ।” यह कहानी पीढ़ियों के अंतर को बखूबी दर्शाती है।

‘ये औरतें, वे औरतें’ एक ऎसे सच से पर्दा उठाती है,जहाँ नमिता के घर की नौकरानी तीबा यदि अपने पति से प्रताड़ित है तो वहीं आभिजात्य सिम्मी और नमिता भी हैं। तीबा का पति मामूली-सी बातों में उसे पीटता है, गर्म प्रेशर कुकर से जला देता है तो नमिता का पति जया के साथ अँधेरे का लाभ उठाने पर नमिता के प्रश्न पर उसे थप्पड़ रसीद कर देता है। कहानी अपरिवर्तित सामंती पुरुष मानसिकता, उसकी लंपटता और शोषित-प्रताड़ित नारी जीवन की विडंबना को अत्यंत सार्थकता से अभिव्यक्त करती है। ‘रीती हुई’ , ‘वानप्रस्थ’, और ‘सफेद चादर’ भी उल्लेखनीय कहानियाँ हैं।

अनिलप्रभा कुमार की कहानियों से गुजरते हुए एक महत्वपूर्ण बात यह भी उभरकर आती है कि उनमें एक उपन्यासकार विद्यमान है। ‘बेटे हैं न!’ में एक अच्छे और बड़े औपन्यासिक कथानक की संभावना अंतर्निहित है। यह एक व्यापक फलक की कहानी है।

अंत में, यह कहना अप्रसांगिक न होगा कि अनिल प्रभा कुमार की कहानियां ही नहीं, कविताओं की भी मौलिकता, भाषा की प्रांजलता और शिल्प वैशिष्ट्य अनूठा है।


                                                                                                                                 -रूपसिंह चन्देल


                                                                                                        समीक्षक संपर्क : 09811365809 / 09810830957

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                                                                                                                                                                         चौपाल


                                                                                                                                                               - विजेन्द्र शर्मा


उफ़ ये झूठी वाह -वाह ........


भौतिकता के दौर में जहाँ नई नस्ल अदब से दूर होती जा रही है वहीं इंटरनेट पर कुकुरमुत्तों की तरह फ़ैल रही सोशिअल साइट्स और कुछ ब्लॉग लिखने वालों ने साहित्य से नए लोगों का रब्त तो कायम रखा है ! इंटरनेट के कारण बहुत से लोगों में साहित्य के प्रति रुझान पैदा हुआ है और उन्होंने क़लम उठाने की ज़हमत भी की है मगर एक दूसरे की झूठी वाह -वाही ने इन नए कवियों /शाइरों /कवियत्रियों/शाइरात को ख़ुशफ़हमी नाम की नई बीमारी भी लगा दी है !

ये लोग उल्टी- सीधी चार पंक्तियाँ लिख कर नेट पे डाल देते है और फिर इंतज़ार शुरू हो जाता है नेट पे बने नकली मित्रों की टिप्पणियों का , अगर कोई महिला लेखिका है तो टिप्पणियों की तादाद में इज़ाफा होना सौ फीसदी तय है ! नेट पे छाये हुए ये अदीब स्वयं पे मुग्ध होने की बिमारी से भी ग्रस्त हो गये है ! सोते - जागते बस इन्हें अपनी बे-सर पैर की रचना पे आने वाली टिप्पणियों का इंतज़ार रहता है ! इन अदीबों के किरदार भी मुख्तलिफ़- मुख्तलिफ़ किस्म के हैं !

इनमें से एक किरदार अपने आप को हिन्दी, उर्दू ,राजस्थानी, पंजाबी ,अंग्रेज़ी और भी कई विलायती भाषाओं का मेयारी कवि समझता है और अपने फेसबुक के नकली चहरे की वाल पे दिन में कई मरतबा बे-अदबी ज़ुबान में कुछ कुछ लिख देता है ! शालीनता की ओट में थोड़ी अश्लीलता मिलाकर परोसना इन्हें और इनके तमाम दोस्तों को बहुत भाता है ! दिनभर में 20 -25 कमेन्ट जाते है और इनका भोजन आसानी से पच जाता है !इस तरह के किरदार अपने आप को शब्द का बहुत बड़ा सौदागर भी समझते है जबकी साहित्यकार को शब्द का साधक होना चाहिए !

इस तरह के किरदार वहम नाम के रोग से भी पीड़ित हो गये है ! इनको ये भी वहम है कि फेसबुक पे मेरे जो हज़ारों दोस्त है ये सब मेरे फैन है ! राहत इंदौर साहब के दो मिसरे मुझे यहाँ बरबस याद रहें हैं :----

ज़मीं पे सात समन्दर सरों पे सात आकाश

मैं कुछ नहीं हूँ मगर एहतमाम क्या-क्या है

साहित्य की चद्दर ओढने -बिछाने वाले बहुत से लोग ब्लॉग लिखते है और इसमे भी कोई शक़ नहीं कि वे मेयारी नहीं लिखते मगर साहित्य के प्रति उनकी इमानदारी पे वहाँ शक़ होने लगता है जब वे किसी अन्य ब्लॉग पे जाकर किसी अन्य कवि/शाइर/कवियत्री की रचना पे अपनी कसीदानुमा टिप्पणी लिखते हैं ! ऐसे ही एक अदीब दोस्त के ब्लॉग पे साहित्य जगत की एक मक़बूल महिला लेखिका की कविता पढ़ रहा था , मैंने सोचा ये उनकी किसी विदेश यात्रा का यात्रा-वृत्तांत है मगर ऊपर लिखा था श्रीमती ......की चार कविताएँ ! यूरोप के किसी मुल्क की यात्रा का उनका आधा -अधूरा वृत्तांत मैं पढता चला गया मगर कविता नाम की शैय से मुलाक़ात नहीं हुई ! जिस तरह मन का भी एक मन होता है उसी तरह कविता का भी अपना एक मन होता है ,कविता की रूह होती है अगर कोई कवि पाठक को अपनी कविता की रूह का दीदार नहीं करवा सकता तो उसकी कविता फिर कविता की कसौटी पे खरी नहीं उतरती ! उनकी तथाकथित कविताएँ जैसे ही समाप्त हुई तो लोगों की टिप्पणियाँ प्रारम्भ हो गई मैंने सोचा ज़रूर ये पढ़ने को मिलेगा कि , महोदया इसमे काव्य वाली कौनसी बात है , आप विदेश गई ,आपके खट्टे -मीठे अनुभव है ,आप इसपे अच्छा -खासा आलेख लिख सकती थी मगर ऐसी टिप्पणी एक भी पढ़ने को नहीं मिली ! पढ़ने को मिला तो सिर्फ़ कसीदा ,वाह -वाह ...फलानी जी आपने क्या बिम्ब उतारा है , आपकी ये कविताएँ तो संवेदना का दस्तावेज़ है ....जबकी उन कविताओं का संवेदनाओं से कोई दूर -दूर का रिश्ता भी नहीं था ! महोदया ने लिखा कि आज मेरी आँख देरी से खुली , आज मुझे ब्रेकफास्ट नहीं मिला , मेरा पैर फिसल गया .....क्या यही होती है कविता ? क्या यही है संवेदना का दस्तावेज़ ? मोहतरमा लिखने के लिए स्वतंत्र है , जैसा उनके मन में आये वे लिख सकती है ...पर तनक़ीद के बड़े -बड़े बादशाह जिन पर अदब भी फख्र करता है ,वे भी ऐसी गद्य-नुमा कविता की तारीफ़ के पुल बांधते हुए नहीं थकते, कारण एक ही है किसी को नाराज़ क्यूँ किया जाए ,ऊपर से महिला लेखिका को तो कदापि नहीं ! नेट पे आपस में जुड़े ये साहित्यिक मित्र क्यूँ एक-दूसरे को नाराज़ नहीं करना चाहते ? क्यूँ सही मायने में जानकार लोग किसी रचना पे अपनी ईमानदाराना टिप्पणी नहीं देते ? इन प्रश्नों का उत्तर शायद इन अदीबों के पास भी नहीं है क्यूंकि ये लोग भी तो थोड़ा -थोड़ा कसीदा सुनने के रोग से ग्रसित हो गये है ! मुझे लेखिका की साहित्य सेवा से ,उनके लेखन से कोई शिकायत नहीं है , जैसा उनके मन में आया उन्होंने लिखा पर उनकी रचना पे टिप्पणी करने वाले इन बड़े- बड़े साहित्यकारों से इस तरह की उम्मीद कतई नहीं थी कि ये लोग भी झूठी वाह- वाही की कश्ती में सवार हो जायेंगे ! मैंने कई मरतबा इस तरह की कविताओं और ग़ज़लों पे अपनी समझ के अनुसार ईमानदारी से टिपण्णी की मगर टिप्पणी को छापने से पहले ही क़त्ल कर दिया गया क्यूंकि ब्लॉग चलाने वाले को ये अधिकार है कि वो कौनसा कमेन्ट रखे कौनसा मिटा दे ! अपने इसी मिज़ाज की वजह से मैंने नेट पे अपने बहुत से नकली वाले दोस्त भी खो दिये , बहुत से लोग मुझ से ख़फा भी हो गये बहरहाल , यही सोच के खुश हूँ कि मन में ये तो तसल्ली है कि हमने कम से कम झूठी वाह -वाह तो नहीं की सच को अगर सच कहा तो कौनसा गुनाह किया है ..तभी तो ये दोहा हो गया :---

 
 

इक सच बोलाऔर फिर , देखाऐसा हाल !

कुछ ने नज़रेंफेर ली,कुछकी आँखेंलाल !!

झूठी तारीफों का ये आलम फेसबुक ,ऑरकुट, ब्लोग्स के अलावा धरातल पे भी बहुत है ! जिस अदबी शहर की आबो-हवा में सांस ले रहा हूँ वहाँ का और ये कहूँ तो भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी की तक़रीबन सभी जगह का यही हाल है ! एकल काव्य -पाठ के नाम पे नशिस्तें रखीं जाती है ,जिसका एकल -पाठ होता है वो तमाम ख़ाने -पीने का इंतज़ाम करता है ! इतवार के दिन शहर के कुछ साहित्यकार एक जगह एकत्रित होते है कुछ आपसी गिले -शिकवे कुछ चुगली-बाज़ी फिर कवि /शाइर साहब को सुनते है !जब क़लाम सुनाया जा रहा होता है तो सब आपस में काना-फूसी करते रहते है कि क्या बकवास लिखा है, इसमें शाइरी वाली कौनसी बात है , ये तो काफ़िये से खारिज़ है मगर जब चर्चा शुरू होती है और तनक़ीद(आलोचना ) का वक़्त आता है तो सभी कसीदा पढ़कर बैठ जाते है ! ये सब क्या ड्रामा है ? अदब के ये स्वयम्भू ठेकेदार ऐसा क्यूँ करते हैं ? किसी नए कवि /शाइर को ये लोग ख़ुशफ़हमी की दवा क्यूँ पीला देते है ? उसे साफ़ -साफ़ क्यूँ नहीं कह्ते कि तुम्हारी ग़ज़ल में शेरियत वाली कोई बात नहीं है , तुम्हारी ग़ज़ल बहर की पटरी पे नहीं चल पा रही है , तुम अपना वक़्त और काग़ज़ दोनों को बरबाद कर रहे हो , जाओ पहले ख़ुद को तपाओ फिर कहो ग़ज़ल ! मगर ऐसा कहने का हौसला इन अदीबों में नहीं है और ना ही ऐसा सुन ने का मादा नई नस्ल के लेखकों में है ! मैंने अगर अपने एक मज़मून में इस बात का ज़िक्र किया तो बहुत से लोग मुझे देख के रस्ता बदलने लगे और आख़िर विवश हो यही लिखना पड़ा :----

उल्टे - सीधे काफ़िये , उस पे ग़लत रदीफ़ !

कह दी सच्चीबात तो , शायरको तकलीफ़ !!

आलोचना करने वाले माहिर लोग भी सिर्फ़ ये सोच के कि हम क्यूँ बे-वजह बुरे बने और अपनी तनक़ीद में तारीफ़ के पुल बाँधने लग जाते है ! इन क्रिया -कलापों से यह तो तय है कि अदब इस माहौल में महफूज़ नहीं रह सकता !

नए क़लमकारों को भी थोड़ा मनन करना चाहिए कि अगर आपकी कृति की कोई आलोचना कर रहा है तो आप उस पे अमल करें , पहली बात तो अपने क़लाम को स्वयं एक आलोचक की निगाह से देखें ! एक और अहम् बात कि झूठी तारीफ़ करने वालों को अपना मित्र नहीं शत्रु समझे ! पवन दीक्षित साहब का एक शे' है :____

मेरे एब को भी बताये हुनर ,

मेरे यार तू भी ख़तरनाक है

अपनी तारीफ़ सुनने और स्वयं पे मुग्ध होने की कुछ बीमारी तो निश्चित तौर पे नेट की इन सोशिअल साइट्स की देन है मगर एक बहुत बड़ी वजह है इन दिनों में उस्ताद - शागिर्द की रिवायत का लुप्त हो जाना ! एक ज़माना था जब शागिर्द अपना लिखा उस्ताद के सामने लेकर जाता था तो ये नहीं कहता था कि उस्ताद मेरा शे' देखें ज़रा , वो यही कहता था कि उस्ताद दो मिसरे हुए है ज़रा आपकी निगाह फरमाई हो जाए ! शागिर्द अपनी पंक्तियों को तब तक शे' नहीं मानता था जब तक कि उस्ताद की मोहर ना लग जाए !पर आज तो ऐसों की तादाद दिन दिन बढ़ती जा रही है जो अदब के मख्तबे में ख़ुद ही शागिर्द हैं और ख़ुद ही अपने उस्ताद !चाहे हिन्दी साहित्य की कोई विधा हो या शाइरी का मु- आमला अपने आप को तालीबेइल्म समझना बे-हद ज़रूरी है !

नेट की दुनिया के कुछ तथाकथित कवि/शाइर/ कवयित्री/शाइरा अगर वाकई अदब की जानिब संजीदा हैं तो इन्हें छपने से पहले थोडा तपना पडेगा और मन को अच्छी लगने वाली टिप्पणियों से परहेज़ करना पडेगा तभी अदब का भला होगा ! एक और बात जो वाकई जानकार लोग है उन्हें भी अपनी ज़िम्मेवारी समझनी होगी , अपने ज़ाती मरासिम से हटकर उन्हें भी नए लोगों को सही राह दिखानी होगी कि इस तरह की टिप्पणी कि क्या बात है , आपने तो बस कमाल लिख दिया , आपमें तो सुभद्रा कुमारी चौहान नज़र रही है ..वैगैरा -वैगैरा !

जो लोग सोशिअल साइट्स पे अपनी मक़बूलियत को ही अगर मक़बूलियत का असली पैमाना समझते है तो उन्हें भी इस वहम की गुफा से बाहर खुले आकाश में आना होगा ,वहम तो यथार्थ से कौसों दूर होता है ! आख़िर में एक और गुज़ारिश कि मेरा ये सब लिखने का मक़सद किसी को नीचा दिखाना नहीं बल्कि सिर्फ़ ये बताना है कि आप झूठी वाह-वाही से पेहेज़ करें ...जो भी लिखें सार्थक लिखें , लिखने के बाद इस्लाह ज़रूर लें और जो भी आपके लिखे पे सच्ची टिप्पणी करे उस पे दिल से अमल करें कि उस शख्स से दूर भागें ! ताहिर फ़राज़ के इन्ही मिसरों के साथ ...:----

नज़र बचा के गुज़रते हो गुज़र जाओ ,
मैं आईना हूँ मेरी अपनी ज़िम्मेदारी है

ख़ुदा हाफ़िज़....

विजेंद्र शर्मा

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                                                                                                                                                 चांद-परियाँ और तितली


लालची कुत्ता

एक कुत्ता मुख में रोटी का टुकड़ा लिए कहीं जा रहा था. बीच में पानी पड़ता था। पानी गहरा नहीं था। कुत्ता जब पानी में होकर चलने लगा, तब उसे पानी में अपनी परछाई दिखाई पड़ी।

कुत्ते ने सोचा- ‘पानी में दूसरा कुत्ता आधी रोटी लिए जा रहा है। मैं इसकी रोटी छीन लूँ तो मेरे पास पूरी रोटी हो जाएगी।‘

कुत्ते ने जैसे ही परछांई वाले कुत्ते की रोटी छीनने के लिए मुंह खोला, उसके मुंह की आधी रोटी पानी में गिर गयी। वह अपना-सा मुँह लेकर रह गया।

तभी से कहा जाता है-

आधी छोड़ पूरी को धावै, आधी रहै न पूरी पावै।।











***











झूठ बोलने का फल


एक गड़ेरिए का था बाल।
बड़ी बुरी थी उसकी चाल।।


भेड़ चराने जंगल जाता।
झूठ-मूट वह था चिल्लाता।।

दौड़ो अरे भेड़िया आया।
उसने मेरी भेड़ उठाया।।  ‘

लोग दौड़कर थे जब आते।
उसे मजे से हंसते पाते।।

सचमुच एक भेड़िया आया।
तब वह मूर्ख बहुत चिल्लाया।।

पर उसको सब झूठा जान।
रहे बैठ बिल्कुल चुप ठान।।

भेड़ भेड़िया लेकर भागा।
पछताया वह बाल अभागा।।

झूठ बोलते हैं जो बच्चे।
लोग न कहते उनको अच्छे।।

हैं खोते सबका विश्वास।
पछताते सब खोकर आस।।

 साभार लेखनी के लिए‘उपयोगी कहानियां ‘ से