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                                        सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर
                                                लेखनी- फरवरी-मार्च 2012




                                                  





                                               " 

                                                 मैं बल खाता जाता था
                                                  मोहित बेसुध बलिहारी
                                                  अन्तर के तार खिंचे थे
                                                    तीखी थी तान हमारी  । "                                                         


                                                               -जयशंकर प्रसाद


                                                                  ' राग-विराग'


                                                                 (अंक 60- वर्ष 5)                                             


                                                                   इस अंक में- 


कविता धरोहरः अज्ञेय। माह के कविः विजय सत्पत्ति। कविता आज और अभीः अशोक बाजपेयी,  प्रयाग शुक्ल,  पुष्पिता अवस्थी,  शील निगम, शिरीष ढोबले, शैल अग्रवाल, यतीन्द्र मिश्र, लता श्री, आलोक श्रीवास्तव, ओम निश्चल । ग़ज़लः वशीर बद्र। माह विशेषः  नन्द किशोर आचार्य।  बाल कविताः द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ।


कवि परिचयः ओम निश्चल। मंथनः ओम निश्चल।  कहानी समकालीनःशमोएल अहमद। कहानी समकालीनः रजनी कुमार पंड्या। कहानी समकालीनः विजय सत्पत्ति। कहानी धरोहरः चंद्रधर शर्मा गुलेरी। लघुकथाःशैल अग्रवाल। लोककथाः अनीता रश्मि। धारावाहिकः दयानंद पाण्डेय।  स्मृति शेषः रूपसिंह चन्देल।परिदृश्यः रजनीश शुक्ला।  चौपालः वेदप्रताप वैदिक। हास्य-व्यंग्यः संजीव निगम। चांद परियाँ और तितलीः प्रेरक पुरुष ।

                                                                           साथ में
                                              माह की साहित्यिक खबरों के साथ विविधा

                                                                              व

                                        नई पुरानी रचनाओं के साथ  होली विशेषः संकलन 

                                                                 RANG-RANGOLI     

                                  
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                                                     संरचना, संपादनः शैल अग्रवाल

                                        Contact Mail: editor@lekhni.net; shailagrawal@hotmail.com 
                        
                                            पत्रिका माह की पहली  तारीख को  परिवर्तित की जाती है।

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                                                                                                                                                       अपनी बात

हाल ही में एक कवि सम्मेलन में हास्य रस के सुप्रसिद्ध कवि सुरेन्द्रशर्मा की द्वारिकाधीश कविता सुनी। कविता अच्छी थी, गहरी सोच के साथ।   मन में कई सवाल उठे और पल भर को प्रेम में आस्था विचलित भी हुई। फिर तुरंत ही मन ने उत्तर दिया,  प्रेम तो संपूर्ण भक्ति और समर्पण है। विश्वास और आस्था है। यहाँ दूर-पास और हार-जीत ..मैं और तू -सभी भेदभाव मिट जाते हैं.. दुख व पीड़ा तक सुख का पर्याय बन सकती है...फिर संशय कैसा...जो सवाल सुरेन्द्रशर्मा की राधिका रानी ने उठाए थे वह प्रेम दीवानी राधा सोच भी नहीं सकती थी, उन्हें अपने किशन के चरित्र , सिद्धांत व ध्येय, सभी पर पूरा भरोसा था इतनी कृष्णमय थी वह कि कृष्ण कभी दूर ही नहीं हुए उनसे।


वास्तव में राह सच की हो या प्रेम की प्रायः दुर्गम और कांटों भरी ही रही है फिर भी  इस डर से इस अनादि अनंत बगिया के सौंदर्य में कभी कोई कमी नहीं आई - न तो फूलों के नैसर्गिक रूप और महक में और ना ही भँवरों की गुनगुन में।


यह भी एक अद्भुत संयोग ही है कि प्रेम पर केन्द्रित यह अंक शिवरात्रि के दिन पाठकों तक पहुँच रहा है- शिव जो अपने विकारों और अहं को शेर की छाल की तरह बिछाकर समाधिस्थ हो सकते हैं...शिव जो अपने त्रिशूल की तरह ही मनसा, वाचा, कर्मणा जन कल्याण के लिए समर्पित हैं। शिव जिन्होंने रूप और चौंसठ कलाओं के प्रतीक चंद्रमा को अपने मस्तिष्क पर धारण कर रखा है, वह भी ओजस्वनिनी गंगा के शीतल प्रवाह समेत....कहीं कोई विकार या परेशानी नहीं, बस शान्त और निर्मल उजाला ही उजाला...


पहले यह अंक बेवफाई पर संजोने का मन बनाया था फिर सोचा जिसमें बेवफाई हो वह प्रेम कैसा.... प्रेम में एकनिष्ठ समर्पण और त्याग का ध्यान आते ही जिस जुगल किशोर का सर्वोपरि ध्यान आता है वह राधाकृष्ण ही हैं। जनवरी से घर से दूर भारत में हूँ । पारिवारिक सामाजिक और निजी व्यस्तताओं के चलते अंक काफी विलंबित हो चुका है अतः अब बिना किसी और अधिक मंथन या उद्वेलन के इसबार की अपनी बात अपने ही फरवरी 2008 के संपादकीय से उद्धृत एक अंश के  साथ समाप्त करती हूँ । 


मात्र इच्छा या कामना नहीं, वह एक दूसरे के प्रति  उनका अदम्य और अपराजेय प्रेम ही तो था, जिसने राधेश्याम को आजतक अलग नहीं होने दिया। मीरा को जहर के प्याले के बाद भी जिन्दा रखा। पर इतना प्यार इतनी आस्था; इतना विश्वास भी तो साधारण जीवन में  संभव नहीं। इतनी सच्चाई और इतना समर्पण भी तो होना चाहिए, साथ-साथ हिम्मत भी। यूँ तो प्रेम की निर्मल धारा युगों से अविरल बह रही है , पर उस निश्छलता में भीग पाना, उस अमृत को आत्मसात कर पाना विरलों को ही आ पाता है। इसी संदर्भ में याद आ रही है फैज साहब की एक मशहूर नज्म, 

वो लोग बोहत खुश किस्मत थे

जो इश्क को काम समझते थे

या काम से आशिकी करते थे

हम जीते जी मशरूफ रहे

कुछ इश्क किया, कुछ काम किया

काम इश्क के आड़े आता रहा

और इश्क से काम उलझता रहा

फिर आखिर तंग आकर हमने

दोनों को अधूरा छोड़ दिया।

                                 

अधिकांशतः भृतहरि की नायिका जैसा ही तो हाल रहता है , जो यह तक न जान पायी कि जरूरी काम के लिए जाते नायक को किन शब्दों के साथ विदा दे । यदि वह ' जाओ' कहती है तो नायक सोचेगा कि वह उसे प्यार ही नहीं करती, इसीलिए तो झट से जाओ कह दिया। 'मत जाओ' कहने पर भी उसका ही नुकसान होगा और ' थोड़ा और रुककर जाओ' कहने पर काम भी बिगड़ेगा और साथ में जाने की घड़ी भी नहीं टलेगी। अन्त में वह हारकर नायक से ही पूछती है कि अब वही बताए कि ऐसे समय में वह उसे क्या कहकर विदा दे।  

ठहर कर सोचा जाए तो प्रेम के ' पनघट' की 'डगर' वाकई में 'कठिन' है और आज भी झटपट 'गगरी' भर लाने का ना कोई सुगम पथ और ना ही मूलमंत्र। आज भी प्यार के हर प्रश्न का प्यार ही एक उत्तर है।यही वजह है कि प्रेम-प्यार का प्रसंग चलते ही आज भी आँखों में जो छवि सर्वोपरि उभरती है वह राधाकृष्ण की ही होती है। ऐसा नहीं कि बहुत धार्मिक हूँ, या भारतीय हूँ, इस वजह से ऐसा होता है... या फिर रोमियो जूलियट, हीर-राँझा, शीरी फरहाद और लैला मजनू, आदि की प्रेम कहानियों से परिचित नहीं।

रासरंग और मिलन व विछोह के अनगिनित प्रसंगों के बाद भी जो संयम और ठहराव...काल और स्थान की दूरियों को लांघता अभिन्न और अविच्छेद सामीप्य इस जोड़ी में दिखता है, वह और कहीं है ही नहीं...एक ऐसी अजेय ललकार है इनके प्यार में जो अलग या दूर होने की सोच तक को तुरंत ही धिक्कार देती है।  शायद इसलिए कि कर्तव्य की मांग पर योगी-सा कृष्ण का राधा से अलग होने का फैसला खुद अपना था...  निर्णय जो अपने लिए नहीं; सार्वजनिक हित में ... जन कल्याण के लिए लिया गया था  ! विश्वास था उन्हें अपने प्रेम पर। समझ थी अपने कर्तव्य की। मीरा सी दीवानगी संभव है और समझ में भी आती है क्योंकि 'गिरधर गोपाल' के लिए उनका प्यार, साकार होकर भी अमूर्त था। भक्त और भगवान का रिश्ता था। परन्तु राधाकृष्ण तो युगल थे..मित्र थे। सदैव साथ-साथ थे। फिर भी समय की; कर्म की पुकार पर हर व्यक्तिगत सुख (बांसुरी और राधा) तकको छोड़ दिया कृष्ण ने। और राधा भी उनके निर्णय के आड़े नहीं आयी। यह इस युगल का त्याग ही तो है जिसने उनके प्यार को तप की ऊंचाइयों तक पहुँचा दिया। इस निर्वाह के लिए जो अदम्य साहस और संयम चाहिए, वह  आसान नहीं, चाहे हम इन्सानों में ढूँढें या देवी-देवताओं में।पर राधा-कृष्ण का तप हो या मीरा की दीवानगी और हट, दोनों  ही वन्दनीय हैं। विशेषतः तब जब दोनों ही रिश्ते सांस और शरीर-से हैं... आस्था की उस दीवानगी को छूते हैं जो या तो प्रिय में लीन होकर एकाकर हो जाती है और मिलन या विछोह से ऊपर उठ  जाती है या फिर पत्थर तक को भगवान बना देती है। वैसे भी इस ढाई आखर के शब्द के रहस्यों को समझना या इस चंचल मन को पूरी तरह से बस में कर पाना इतना आसान तो नहीं! जबकि इसकी हर बात ही निराली है । इस दरिया की धार तो सदैव ही उलटी बही हैः इसमें तो डूबकर ही उबरा जाता है।



खुसरो दरिया प्रेम का उलटी वाकी धार।

जो उतरा सो डूब गया जो डूबा सो पार।    

और इस उलझन को चतुर राधारानी ने समझा भी था और सुलझाया भी... जो कृष्णमय होकर अपना जीवन जिया उन्होने। यही वजह थी कि उनकी झलक मात्र कृष्ण को हर्षा देती है क्योंकि संसारिक सारी बाधाओं के बावजूद भी कृष्ण की सांस-सांस की जरूरत को समझा उन्होने...उनके मन की हर बात जानी और निबाही। तभी तो बिहारी ने कृष्ण की नहीं, राधा की प्रार्थना की। वे जानते थे , राधा हैं तो कृष्ण हैं। 

" मेरी भवबाधा हरो राधा नागरि सोय। जा तन की झाँई परे स्याम हरित दुति होय "

राधा वास्तव में चतुर थीं क्योंकि वे प्रेम में बाधा नहीं सहायक बनीं। और यही है प्रेम की वास्तविक परिभाषा; जो आज भी किताबों में नहीं, जीवन में ही मिलेगी। कब सोच और शरीर ही नहीं, जीवन तक प्रिय को समर्पित हो जाता है प्रेमी को पता ही नहीं चल पाता और यही 'स्व' का मिटना ही उनके अमर सुख का कारण बनता है। जीवन के कांटों पर फूलों-सा रंग और खुशबू बिखेरता है। तभी तो कबीरदास कह गये कि "पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित हुआ न कोय, ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।" यही कबीर एक दूसरे दोहे में लिखते हैं - "प्रेम न बाड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय। राजा प्रजा जेहि रुचै शीष देय लहि जाय " ऐसे प्रेम को पाने के लिए ' शीष' यानी अहं को, अस्तित्व के अलगाव को त्यागना ही पड़ेगा। और यह कितना कठिन है हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं।

जमला ऐसी प्रीत कर जैसे निसि औ चन्द्। चन्दा बिन निसि फीकरी निसि बिन चन्दो मन्द।।  

और एकबार यदि ऐसा प्रेम मिल भी जाए तो उसे संभालकर रखना भी तो आना ही चाहिए।

" रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाए।।" 

कितना भी हम तौलें परखें, यह तो मानना ही पड़ेगा कि ईश्वर की तरह प्रेम आज भी जिन्दा है। शाश्वत है। सार्वभौमिक है। तभी तो हजार उत्तेजक खबरों के धमाकों के बीच बैठे  हम आप आज भी इसकी बातें कर रहे हैं। इसमें रुचि ले रहे हैं। इसके बारे में लिख-पढ़ रहे हैं। 

हर युग में नई पीढी इसे अपने एक नये ढंग से महसूस करेगी और पाएगी। वक्त  के साथ प्रेमियों के नए-नए स्वरूप और नए-नए प्रतिमान उभरकर आयेंगे... प्रतिमान जो प्यार और त्याग की उद्दाम ऊंचाइयों को छूते रहे हैं, छूते रहेंगे। क्योंकि प्रेम का वास्ता आज भी मन से ज्यादा, बुद्धि से कम है। आजभी प्रेम ही इस सृष्टि का आधार है। यह वही खुशबू और रंग है जिसे जीवन की धूप और हवा उड़ाती भी है और बढ़ाती भी है। इसी दुरुह पर असंभव नहीं, प्रेम-भाव का उत्सव मनाने का प्रयास किया है लेखनी के इस वर्षान्त के अंक ने।  

इन्द्रधनुषी इस अहसास की सतरंगी परछांई को संजोने का एक लघु प्रयास है यह; किस रंग ने आपको छुआ, रचा और समेटा , बांटेंगे तो अच्छा लगेगा!...    

                                                                                                      -शैल अग्रवाल

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                                                                                                                                                       कविता धरोहर  
                                                                                                                                                           -अज्ञेय

अमराई महक उठी...


अमराई महक उठी
हिय की गहराई में


पहचानें लहक उठीं।
तितली के पंख खुले
यादों के देवल के
उढ़के दो द्वार खुले
प्‍यार के तरीके
प्‍यार के तरीके तो और भी होते हैं
पर मेरे सपने में मेरा हाथ
चुपचाप
तुम्‍हारे हाथ को सहलाता रहा
सपनें की रात भर.....











चॉंदनी चुपचाप सारी रात


चाँदनी चुपचाप सारी रात-
सूने आँगन में
जाल रचती रही ।

मेरी रूपहीन अभिलाषा
अधूरेपन की मद्धिम-
आँच पर तचती रही ।

व्यथा मेरी अनकही
आनन्द की सम्भावना के
मनश्चित्रों से परचती रही ।

मैं दम साधे रहा
मन में अलक्षित
आँधी मचती रही ।

प्रात बस इतना कि मेरी बात
सारी रात
उघड़ कर वासना का
रूप लेने से बचती रही ।











   अपलक रूप निहारूँ


तन-मन कहॉं रहे गए?
चेतन तुझ पर वारूँ,
अपलक रूप निहारूँ।
अनझिप चैन, अवाक् गिरा
हिय अनुद्विग्‍न, आविष्‍ट चेतना
पुलक-भरा गत-मुग्‍ध करों से
मैं आरती उतारूँ।
अपलक रूप निहारूँ।











तुम्‍हारी पलकों का कँपना


तुम्हारी पलकों का कँपना ।
तनिक-सा चमक खुलना, फिर झँपना ।
तुम्हारी पलकों का कँपना ।

मानो दीखा तुम्हें किसी कली के
खिलने का सपना ।
तुम्हारी पलकों का कँपना ।

सपने की एक किरण मुझको दो ना,
है मेरा इष्ट तुम्हारे उस सपने का कण होना,
और सब समय पराया है
बस उतना क्षण अपना ।

तुम्हारी
पलकों का कँपना ।

 








आज मैने


आज मैंने पर्वत को नयी ऑंखों से देखा।
आज मैंने नदी को नयी ऑंखों से देखा।
आज मैंने पेड़ को नयी ऑंखों से देखा।

 
आज मैंने पर्वत पेड़ नदी निर्झर चिड़िया को
नई ऑंखों से देखते हुए
देखा कि मैंने उन्‍हें तुम्‍हारी ऑंखों से देखा है।

 
यों मैंने देखा
कि मैं कुछ नहीं हूँ
(हॉं, मैंने यह भी देखा
कि तुम भी कुछ नहीं हो)
मैंने देखा कि हर होने के साथ
एक न –होना बँधा है
और उसका स्‍वीकार ही बार बार
हमें हमारे होने की ओर लौटा लाता है
उस होने को एक प्रभा-मंडल से मँढ़ता हुआ।

 
आज मैंने अपने प्‍यार को
जो कुछ है और जो नही है उस सबके बीच
प्‍यार के एक विशिष्‍ट आसन पर प्रतिष्‍ठित देखा।
(तुम्‍हारी ऑंखों से देखा।)
आज मैंने तुम्‍हारा
एक आमूल नए प्‍यार से अभिषेक किया
जिसमें मेरा, तुम्‍हारा और स्‍वयं प्‍यार का
न होना भी है वैसा ही अशेष प्रभा-मंडित

आज मैंने
तुम्‍हें
प्‍यार किया, प्‍यार किया, प्‍यार किया..........
प्‍यार अकेले हो जाने का...
प्‍यार अकेले हो जाने का एक नाम है
यह तो बहुत लोग जानते हैं
पर प्‍यार
अकेले छोड़ना भी होता है इसे
जो
वह कभी नही भूली
जिसे मैं कभी नहीं भूला....

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                                                                                                                                                                  माह के कवि
                                                                                                                                                              -विजय सत्पति

तेरा नाम क्या है मेरे प्रेम ?


अचानक ही ये कैसे अहसास है
कुछ नाम दूं इसे
या फिर ;
अपने मौन के साथ जोड़ दूं इसे

किसी मौसम का नया रंग हो शायद
या फिर हो ज़िन्दगी की अनजानी आहट
एक सुबह हो ,सूरज का नया रूप लिये

पता नहीं …..
मेरी अभिव्यक्ति की ये नयी परिभाषा है

ये कैसे नये अहसास है
मौन के भी शब्द होतें है
क्या तुम उन्हें सुन रही हो .....

पलाश की आग के संग ...
गुलमोहर के हो बहुत से रंग
और हो रजनीगंधा की गंध
जो छा रही है मन पर
और तन पर
तेरे नाम के संग …..

तेरा नाम क्या है मेरे प्रेम ?











           राह


सूरज चढ़ता  था और उतरता था....
चाँद चढ़ता था और उतरता था....
जिंदगी कहीं भी रुक नही पा रही थी,
वक्त के निशान पीछे छुठे जा रहे थे ,
लेकिन मैं वहीं खड़ा हूं ...
जहाँ तुमने मुझे छोडा था....
बहुत बरस हुए ;
तुझे ,  मुझे भुलाए हुये !

मेरे घर का कुछ हिस्सा अब ढ़ह गया है !!
मुहल्ले के बच्चे अब जवान हो गए है ,
बरगद का वह पेड़ ,
जिस पर तेरा मेरा नाम लिखा था
शहर वालों ने काट दिया है !!!

जिनके साथ मैं जिया ,वह मर चुके है
मैं भी चंद रोजों में मरने वाला हूं
पर,
मेरे दिल का घोंसला ,
जो तेरे लिए मैंने बनाया था,
अब भी तेरी राह देखता है.....











           देह


देह के परिभाषा
को सोचता हूँ ;
मैं झुठला दूं !

देह की एक गंध ,
मन के ऊपर छायी हुई है !!

मन के ऊपर परत दर परत
जमती जा रही है ;
देह ….
एक देह ,
फिर एक देह ;
और फिर एक और देह !!!

देह की भाषा ने
मन के मौन को कहीं
जीवित ही म्रत्युदंड दे दिया है !

जीवन के इस दौड़ में ;
देह ही अब बचा रहा है
मन कहीं खो सा गया है !
मन की भाषा ;
अब देह की परिभाषा में
अपना परिचय ढूंढ रही है !!

देह की वासना
सर्वोपरि हो चुकी है
और
अपना अधिकार जमा चुकी है
मानव मन पर !!!

देह की अभिलाषा ,
देह की झूठन ,
देह की तड़प ,
देह की उत्तेजना ,
देह की लालसा ,
देह की बातें ,
देह के दिन और देह की ही रातें !

देह अब अभिशप्त हो चुकी है
इस से दुर्गन्ध आ रही है !
ये सिर्फ अब इंसान की देह बनकर रह गयी है :
मेरा परमात्मा , इसे छोड़कर जा चूका है !!

फिर भी घोर आश्चर्य है !!!
मैं जिंदा हूँ !!!











          तलाश


कुछ तलाशता हुआ मैं कहाँ आ गया हूँ .....
बहुत कुछ पीछे छूट गया है .....
मेरी बस्ती ये तो नहीं थी .....

मट्टी की वो सोंघी महक ...
कोयल के वो मधुर गीत ...
वो आम के पेड़ो की ठंडी ठंडी छांव ..
वो मदमाती आम के बौरो की खुशबू ...
वो खेतो में बहती सरसराती हवा ....
उन हवा के झोंको से बहलता मन ..
वो गायो के गले बंधी घंटियाँ ...
वो मुर्गियों की उठाती हुई आवाजे ....
वो बहुत सारे बच्चो का साथ साथ चिल्लाना ....
वो सुख दुःख में शामिल चौपाल ....
लम्बी लम्बी बैठके ,गप्पो की …

और सांझ को दरवाजे पर टिमटिमाता छोटा सा दिया .....
वो खपरैल की छप्पर से उठता कैसेला धुआ...
वो चूल्हे पर पकती रोटी की खुशबू ...
वो आँगन में पोते हुए गोबर की गंध ...

वो कुंए पर पानी भरती गोरिया ...
वो उन्हें तांक कर देखते हुए छोरे...
वो होली का छेड़ना , दिवाली का मनाना ...

वो उसका; चेहरे के पल्लू से झांकती हुई आँखे;
वो खेतो में हाथ छुड़ाकर भागते हुए उसके पैर ;
वो उदास आँखों से मेरे शहर को जाती हुई सड़क को देखना

वो माँ के थके हुए हाथ
मेरे लिए रोटी बनाते हाथ
मुझे रातो को थपकी देकर सुलाते हाथ
मेरे आंसू पोछ्ते हुए हाथ
मेरा सामान बांधते हुए हाथ
मेरी जेब में कुछ रुपये रखते हुए हाथ
मुझे संभालते हुए हाथ
मुझे बस पर चढाते हुए हाथ
मुझे ख़त लिखते हुए हाथ
बुढापे की लाठी को कांपते हुए थामते हुए हाथ
मेरा इन्तजार करते करते सूख चुकी आँखों पर रखे हुए हाथ ...

फिर एक दिन हमेशा के हवा में खो जाते  हुए हाथ !!!

न जाने ;
मैं किसकी तलाश में शहर आया था ....




 

 


 

 
         अलविदा


सोचता हूँ 
जिन लम्हों को ;
हमने एक दूसरे के नाम किया है
शायद वही जिंदगी थी !

भले ही वो ख्यालों में हो ,
या फिर अनजान ख्वाबो में ..
या यूँ ही कभी बातें करते हुए ..
या फिर अपने अपने अक्स को ;
एक दूजे में देखते हुए हो ....

पर कुछ पल जो तुने मेरे नाम किये थे...
उनके लिए मैं तेरा शुक्रगुजार हूँ !!

उन्ही लम्हों को ;
मैं अपने वीरान सीने में रख ;
मैं ;
तुझसे ,
अलविदा कहता हूँ ......!!!

अलविदा !!!!!!

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                                                                                                                                                            ग़ज़ल  
                                                                                                                                                       बशीर बद्र

        वो कसक


 वो कसक दिल की दिल में चुभी रह गयी,
जिन्दगी में तुम्हारी कमी रह गयी।

 
एक मैं एक तुम एक दीवार थी,
जिन्दगी आधी-आधी बंटी रह गयी।

 

रात की भीगी भीगी छतों की तरह,
मेरी पलकों में थोड़ी नमी रह गयी।

 

मैंने रोका नहीं वो चला भी गया,
बेबसी दूर तक देखती रह गयी।

 

मेरे घर की तरफ धूप की पीठ थी,
आते-आते इधर चांदनी रह गयी।







 

सोए कहाँ थे...


सोए कहाँ थे, आँखों के तकिये भिगोये थे,
हम भी कभी किसी के लिए खूब रोये थे।

 

अँगनाई में खड़े हुए, बेरों के पेड़ से,
वो लोग चलते वक्त गले मिल के रोये थे।

 

हर साल जर्द फूलों का, इक काफिला रुका,
उसने जहाँ पे धूल अटे पाँव धोए थे।

 

आँखों की कश्तियों में सफर कर रहे हैं वो
जिन दोस्तों ने दिल के सफ़ीने डुबोये थे।

 

कल रात मैं था, मेरे अलावा कोई न था
शैतान मर गया था फरिश्ते भी सोये थे।

 









दूसरों को....


दूसरों को हमारी सजाएँ  न दे
चाँदनी रात को बद्दुआएँ न दे।

 

फूल से आशिकी का हुनर सीख तो
तितलियाँ खुद रुकेंगी सदायें न दे।

 

सब गुनाहों का इकरार करने लगे,
इस कदर खूबसूरत सजाएँ न दे।

 

मैं दरख़्तों की सफ़ का भिखारी नहीं,
बेवफा मौसमों को कबाएँ न दे।

 

मोतियों को छिपा, सीपियों की तरह
बेवफाओं को अपनी वफाएँ न दे।

 

मैं बिखर जाऊँगा आँसुओं की तरह,
इस कदर प्यार से बद्दुआयें न दे।

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                                                                                                                                         कविता आज और अभी

आसान  नहीं


प्रेम  आसान नहीं है
उसमें इतनी निराशाऍं होती रही हैं
फिर भी वही एक उम्‍मीद है
वही आग है
वही लौ है
वही अर्थ की दहलीज़ है।











जब


जब  आएगी 
वही आएगी:
जब गाएगी 
वही  गाएगी 
प्रेम का असमाप्‍य गान।

जब छुएगी
वही छुएगी
पंखुरी पंखुरी  सुगंधित फूल,
तारे तारे खिला आकाशा,
वनस्‍पति  वनस्‍पति रसी-बसी पृथ्‍वी
शरीरों को तपाती आग
इच्‍छाओं को बहाती नदी
सब कुछ को मंत्र की तरह
धारण करती हवा।









वहाँ यहॉं


वहाँ वह बेहद गरमी में
पानी का गिलास उठाती है,
यहॉं  मैं जानता हूँ
कि ठीक उसी समय
मेरी प्‍यास बुझ रही है।

 







तुम चले जाओगे


तुम चले जाओगे
पर थोड़ा सा यहॉं भी रह जाओगे
जैसे रह जाती है पहली बारिश के बाद
हवा में धरती की सोंधी गंध
भोर के उजास में
थोड़ा सा चंद्रमा
खंडहर हो रहे  मंदिर में
अनसुनी प्राचीन नूपुरों की झनकार

 तुम चले जाओगे
पर थोड़ी सी हँसी
ऑंखों की थोड़ी सी चमक यहीं रह जाऍंगे
प्रेम के इस सुनसान में

तुम चले जाओगे
पर मेरे पास
रह जाएगी प्रार्थना की तरह पवित्र
और अदम्‍य
तुम्‍हारी उपस्‍थिति
छंद की तरह गॅूंजता
तुम्‍हारे पास होने का अहसास
तुम चले जाओगे पर.....


-अशोक वाजपेयी











          प्रेम


बहुत दूर था चंद्रमा
उसकी आभा थी
पास

 
एक हाथ था
मेरे हाथ में
धमनियों में
बह रही थी
पृथ्‍वी।


-प्रयाग शुक्‍ल











      चुपचाप


आंखों के भीतर
आंसुओं की नदी है।
पलकें मूंदकर
नहाती हैं आंखें।

अपने ही आंसुओं की नदी में
दुनिया से थक कर।

ओठों के अन्दर
उपवन है,
जीते हैं--ओठ

चुप होकर स्मृति
प्यास से जल कर
एकाकीपन की आग में।

हृदय की वसुधा में
प्रणय का निर्झर नियाग्रा है
मेरे लिए ही झरता हुआ…।

 

 




आकाशगंगा


तुम्हारे बिना
समय--नदी की तरह
बहता है--मुझमें।

मैं नहाती हूं--भय की नदी में
जहां डसता है--अकेलेपन का सांप
कई बार।

मन-माटी को बनाती हूं--पथरीला
तराशकर जिसे तुमने बनाया है मोहक
सुख की तिथियां
समाधिस्थ होती हैं--
समय की माटी में।

अपने मौन के भीतर
जीती हूं--तुम्हारा ईश्वरीय प्रेम
चुप्पी में होता है
तुम्हारा सलीकेदार अपनापन।

अकेले के अंधेरेपन में
तुम्हारा नाम ब्रह्मांड का एक अंग
देह की आकाशगंगा में तैर कर

आंखें पार उतर जाना चाहती हैं
ठहरे हुए समय से मोक्ष के लिए।


     - पुष्पिता अवस्थी














मूक प्रेम 


मौन शब्दों की बैसाखी पर टंगा तुम्हारा प्रेम ,                                                                                                               कब तक रख पायेगा अपना अस्तित्व?
तोड़ दो यह मौन, तोड़ दो यह बंधन,
आज चाँद को भी होने दो यह एहसास ,
कि सागर में उठा ज्वार,केवल उसके लिए नहीं है.
आज चन्द्रिका को भी होने दो एहसास .
कि सागर की उछलती  लहरें ,
केवल उसे ही छूने की कोशिश नहीं करती .
सागर में उठा यह तूफ़ान,
लहरों का उठना, उठ कर गिर जाना ,
चाँद और चन्द्रिका को छू पाने की
यह नाकाम कोशिश, और कुछ नहीं,
केवल मेरे और तुम्हारे बीच की भावनाएँ हैं 
जो एक दूसरे तक पहुँचने की कोशिश में ,
भटक रही हैं एक दूसरे के आस-पास .
तोड़ दो ये मौन,तोड़ दो यह बंधन ,
इन भावनाओं को भी होने दो एहसास 
कि तुम्हारा प्रेम केवल मेरा ही है.
और किसी का नहीं,
मौन शब्दों की बैसाखी पर टंगा तुम्हारा प्रेम 
तब ही रख पायेगा अपना अस्तित्व.

-शील निगम










 
एक नदी के...


एक नदी के वलय
हमारी कायाओं
पर लिपटे हुए हैं

 
न हमारी
न नदी की
इच्‍छा है
सुलझने
की।


-शिरीष ढोबले











रोशनी के लिए


क्या कभी देखा है तुमने
रात के इस सियाह में
तारों को लहरों पे
यूँ अठखेलियाँ करते
जैसे तुम्हारी आँखों के
जलते-बुझते ये दिये

लेकर सारी खुशियाँ
सपनों की, अपनों की

 
वो कल आए या न आए
पर सहेज कर रखूँगी
इस मंजर को मैं
इक रौशनी के लिए।

       

 

 

देखो,  फिर ना कहना....


देखो, फिर ना यह कहना
कि तुम मुझे भूल नहीं पाओगे
भूलना जरूरत उस किरण की
डूबता जो न देख पाए सूरज



भूलना जरूरत उस पीर की
मन की परतों को चीर-चीर
टीस-सी उभर आती है
पीर देती है जो नित नयी
और मीत-सी भरमाती है


भूलता जो बादल सिंधु को
नभ पर छा जाता है
भूलता जो पल आज को
बाँहों में कल नया ले आता है 


सूखता जब नेह गारा
चटक आती इसमें भी दरार
सपनों की गहरी नींव मांगती
ठोस ईंटों की ऊँची दीवार


मीरा जब मैं कान्हा तुम थे
शबरी हूँ तो तुम ही राम
आत्मा से बसे  हम रोम-रोम
हरियाली-सा है अपना साथ

सच तुम बस इतना ही जानो                                                                                                                                       बरसते रोज रोज जरूर, पर
चुकते नहींकभी यह                                                                                                                                                         उमड़े घन-श्याम।


  -शैल अग्रवाल











प्रेम धागा यह टूटता ना


यह प्रेम का धागा
जिसने हमें बॉंधा है
टूटता नहीं
इस धागे से तुम्‍हारी
वेणी के फूल गिर गए हैं
और तुम जो मायानदी हो उसमें
एक रूप, एक गोराई, एक आभा मिल गयी है
मैं अपनी इच्‍छाओं  के सारे उत्‍सवों में
तुमको वेणी के फूल जितना कोमल पाता हूँ
और यह जो अटूट-सा हममे रिश्‍ता है
वह टूटे हुए धागों को फिर
उतने ही जतन से बॉंधने से बनता है
प्रेम का यह धागा टूट कर भी
गांठ भर हमको जोड़ता है।


-यतीन्‍द्र मिश्र











भीगी नींद के गीले ख्वाब-सा


मैं बौराई निःशब्द हूँ कि
जो खत मैं कभी लिख न पाई
आज बरसों बाद उसका जवाब  आया है

एक ही  आँच में पिघलते
सुलगती रूह की लौ में
पोरों से जज्ब करते
जज्बे का फंदा
जो बाँधा था
विहँसते चाँद को सिरहाने रख
रात की गहरी सिलवट में
मदहोश सुबह-सी लरजती तुम
थरथराती नजदीकियों के फासले से ही
मेरे काँधों पर रख कर
जो  अधबुना स्वेटर नापा था

इतना तो यकीं है
तुमने भी उसे उधेड़ा न होगा
जिसकी गरमाई
का सरापा है
         बताओ, क्या
          मैं  और तुम से  अलग
          उस  आधे हम की छुअन
          कभी जानबूझ कर
          कभी  अनजाने ही बेखयाली से
          तुम्हारी उँगलियाँ
          नहीं तलाशती
          आज भी

और मुझमें वो  अधूरापन
भींगी नींद के गीले ख्वाब-सा
रात के पिछले पहर
धुआँ बन भीतर
कहीं बहुत भीतर
गहराता है
रोज-रोज-रोज.....


-लता श्री











अब उसके बारे में सोचना है


अब उसके बारे में सोचना है
कि जिसको सोचा नहीं है अब तक
दुआऍं करना है उसके हक में
कि जिसको देखा नहीं है अब तक

       वो हैं खयालों की रहगुजर में     
        वही डगर में  वही सफर में
         लतीफ सॉंसों में--बात में वो
         है दिन की रौनक में--रात में वो

बहुत रुलाती है उसकी खुशबू
एसएमएस से आती है उसकी खुशबू
वो रुह में यूँ समा गया है
बदन से आती है उसकी खुशबू

       वो ख्‍वाब बेशक है सबसे बेहतर
       जो शक्‍ल लेता रहा है अक्‍सर
        अभी नहीं है हमें मयस्‍सर
        मगर ये चाहेंगे हम बराबर
       कभी तो बैठे वो पास आकर

है जो सितारा पहुँच से बाहर
अब उसके बारे में सोचना है।


       -आलोक श्रीवास्‍तव














  तुम्हारे संग


तुम्हारे संग सोना हो,
तुम्हारे संग जगना हो।
कुटी हो प्यार की कोई
कि जिसमें संग रहना हो।
कही जो  अनकही बातें तुम्हारे संग करनी हों
तुम्हारे संग जीना हो तुम्हारे संग  मरना हो।

 
यहीं होता कहीं पर गाँव  अपना एक छोटा सा
बसाते हम क्षितिज की छाँव में कोई बसेरा सा
खिली सरसों कहीं होती कहीं फूली मटर होती
यहीं कोई भँवर होता यहीं कोई नदी होती

 जहाँ तक दृष्टि जाती....
खिलखिलाता एक झरना हो।

बरसता मेह सावन में हवा यों गुनगुनाती हो
कि जैसे गॉव की बगिया में कोयल गीत गाती हो
उनींदे स्व्रन के परचम फहरते रोज नींदों में
तुम्हारी साँवली सूरत बगल में मुस्कराती हो

 तुम्हारे साथ इक लंबे सफर पर
                   फिर गुजरना हो।

 
भटकते चित्त को विश्वास का इक ठौर मिल जाए,
मुहब्बत के चरागों को खुदा का नूर मिल जाए
तुम्हारी चितवनों से झाँकती कोई नदी उन्मन
हमारा मन  अयोध्या हो तुम्हारी देह वृन्दावन

 समय की सीढ़ियों पर
साथ चढ़ना हो  उतरना हो।







मेघदूत सा मन


साँस तुम्हारी योजनगंधा,
मेघदूत सा मन मेरा है।

 दूध धुले हैं पाँव तुम्हारे
अंग  अंग दिखती उबटन है
मेरी जन्मकुंडली जिसमें,
लिखी हुई हर पल भटकन है

कैसे चलूँ तुम्हारे द्वारे
तुम रतनारी हम कजरारे,
कमलनाल सी देह तुम्हारी ,
देवदासा तन मेरा है।

 साँझ तुम्हें प्यारी लगती है
प्रात सुहाना फूलों वाला
मुझे डँसा करता है हर पल
सूरज का रंगीन उजाला

कैसे पास तुम्हारे  ाा।ँ
चंचल मन कैसे बहला।ँ
हँसी तुम्हारे होठ लिखी है
दर्द भरा यौवन मेरा है।

सुबह जगाता सूरज तुमको,
साँझ सुला जाती पुरवाई
मुझसे दूर खड़ी होती है
मेरी  ापनी ही परछाईं,

बाधा ाों के बीच गुजरना
तुमसे झूठ मुझे क्या कहना
सीमा ाों का साथ तुम्हारा,
सैलानी जीवन मेरा है। 

 


 

भीतर एक नदी बहती है


चंचल हिरनी बनी डोलती
मन के वन में बाट जोहती,
वैसे तो वह चुप रहती है
भीतर एक नदी बहती है।

 सन्‍नाटे का मौन समझती
इच्‍छाओं का मौन परखती
सॉंसों के सरगम से निकले
प्राणों का संगीत समझती

तन्‍वंगी, कोकिलकंठी है
पीड़ाओं की चिरसंगी है
अपने निपट अकेलेपन के
वैभव में वह खुश रहती है
भीतर एक नदी बहती है।

 
अभी कहॉं उसने जग देखा
किया पुण्‍य का लेखा-जोखा
अभी सामने सारा जीवन
उम्‍मीदों का खुला झरोखा
कुछ सपने उसके अपने हैं
महाकाव्‍य उसको रचने हैं
मन ही मन गुनती बुनती है
पर अपने धुन में रहती है
भीतर एक नदी बहती है।

 
शब्‍द शब्‍द हैं उसकी थाती
जिनसे लिखती है वह पाती
वह कविता के अतल हृदय में
बाल रही है स्‍नेहिल बाती
लता-वल्‍लरी-सी शोभन वह
इक रहस्‍य-सी है गोपन वह
किन्‍तु हुलस कर बतियाती वह
कभी-कभी सुख-दुख कहती है
भीतर एक नदी बहती है।


-ओम निश्‍चल

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                                                                                                                                                          माह विशेष
                                                                                                                                                   नन्द किशोर आचार्य

 बचने की खातिर


कुछ नहीं बचता
स्‍मृति के सिवा जो
आखिर:
न सही वजूद अपना
होने दो स्‍मृति
अपनी मुझे
मेरे बचने की ख़ातिर।

 







हरी हो आती है


सूख कर झरता है
जब भी कोई पत्‍ता
झरे पत्‍तों में
हरी हो आती है स्‍मृति
सूख कर झरने की अपने---
हरे थे जितने भी सपने। 

 







उसकी नहीं हुई जो


हर कोई परीशॉं है
दुनिया के हाल पर
पर दुनिया है कि मगन है 
            अपने में
कोई फर्क नहीं पड़ता उसे
कुछ भी कहीं भी हो--- 
          किसी के---
खुद उस के भी साथ 
और ईश्‍वर है कि रो रहा है 
अपनी उस दुनिया पर 
उस की भी नहीं हुई जो











क्‍या कहे पर नींद


कृतज्ञ उस नींद का हूँ मैं 
देखा जिसमें
सपना वह  

क्‍या कहे पर नींद  
      सपने को 
जब से देखा है
उसे जाने कहॉं जा कर
सो गयी है वह।











रह गया होकर कहानी


कविता होना था मुझे
रह गया होकर 
      कहानी
न कुछ हो पाने की 

 
मेरा सपना
होना था जिसे
रह गयी होकर रात
नींद के उखड़ जाने की                                                                                                                                                 


उम्र पूरी चुकानी थी
एक पल मुस्‍कराने की।

                    (--'गाना चाहता पतझड़' से गृहीत)

 







जल के लिए


जितना भी जला दे
सूरज
सुखा दे पवन
सूखी फटी पपड़ियों में
झलक आता है
धरती का प्‍यार
जल के लिए----------
गहरे कहीं जज्‍ब है जो









 





   दुनिया है अगर


तुम हो
दुनिया में मेरी
नहीं हूँ पर
दुनिया में तुम्‍हारी मैं

 
नही हूँ मैं यानी
अपनी ही दुनिया में
-----और वह दुनिया
फिर भी
दुनिया है मेरी

 
नही है जो
उसकी
हो सकती है कैसे
कोई दुनिया

 
दुनिया है अगर
तो कहीं वह भी है---
कितना भी हो
न होकर वह।















क्‍या प्‍यार करता है


हवा के हर मिज़ाज के                                                                                                                                                  साथ
बदल जाता है
इसका रूप 
यह मरुथल भी
क्‍या प्‍यार करता है 
हवा को।











समानान्‍तर ही सही


कभी जो नहीं मिल पातीं
समानान्‍तर पटरियॉं ही सही
यात्रा हो जाना
साथ मंजिल तक पहुँचना है

कभी जो नहीं मिल पाते
दो किनारे ही सही
बीच जल के साथ
बहना
नदी होना है

 प्रेम क्‍या है
यों साथ साथ
चल कर बह कर
यात्रा हो जाने
नदी हो जाने
नदी होने के सिवा--
समानान्‍तर ही सही।

 











रहूँगा फिर भी


नहीं रहूँगा---
रहूँगा फिर भी
ठहरे पानी में जैसे
धड़कता रहता है बहना

 
उमस में रुँधी रहती है
           हवा जैसे
सोयी रहती है राख
           आग में
धूप में जैसे
रहती रहती है छाया 

 
रहूँगा ऑंखों में ही 
सूखे ऑंसू -सा
ख़ामोश साज़ में राग-सा
मैं रहूँगा फिर भी। 












सपना है आत्‍मा


रचता है असत्
सत् को
ज्‍योति को तमस जैसे

 तुमको रच देती है
मेरी कामना वैसे

 देह का सपना है आत्‍मा
अपने अँधेरों में जो
रचती रहती है उसे।















       ऐसी भी


ऐसी भी होती होगी 
आवाज़
न कोई बोलता जिसमें
न सुनता है जिसे कोई

 

होता होगा ऐसा मंजर
न जिसमें दीखता है कुछ
न जिसको देखता कोई

 

प्रतीक्षा होगी ऐसी भी
किसी के लिए नहीं है जो
न जिसको कर रहा कोई

 

प्रेम की बस्‍ती देखो
बसती है फिर भी
न इसको बसाता कोई
न इसमें बसता है कोई।












    सपना सही


सपना सही तुम्‍हारा
             मै
रहोगे देखते जब तक
मेरे बंदी रहोगे तुम----


देखोगे नहीं तो भला
कैसे रह सकोगे ईश्‍वर
          तुम मेरे
मुझ ही में है तुम्‍हारी
                मुक्‍ति


बांध पाता है जो सपना
मुक्‍त भी वही करता है।

                                                                                                                 (--'केवल एक पत्‍ती ने' से गृहीत)

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                                                                                                                                      नंदकिशोर आचार्य की कविताएँ


                                                                                                                                                     -  ओम निश्चल

निज मन-मुकुर


पिछले तीन-चार वर्षों में नंदकिशोर आचार्य के तीन संग्रह आए। 'चॉंद आकाश गाता है', 'गाना चाहता पतझड़' और हाल ही में 'केवल एक पत्‍ती ने' पर सच कहा जाए तो इन तीनों संग्रहों का मिजाज एक-सा है। यों देखने में उनकी कविताऍं अपने ही चित्‍त में रमी हुई लगती हैं जैसे सामाजिक सरोकारों से उनका कोई लेना देना ही न हो। पर अज्ञेय के नक्‍शेकदम पर चलने वाले नंदकिशोर आचार्य ने उन्‍हीं की तरह अपनी कविता को निज-मन-मुकुर बनाने की चेष्‍टा की है। अज्ञेय की कविता तो अपने इस कौल करार के बाद भी बहुधा ज्‍यादा ही बोलती है, पर आचार्य की कविताऍं वाकई कम बोलती हैं। इस तरह खामोशी को ही रचने-बुनने की अज्ञेय की अवधारणा के वे सच्‍चे अनुयायी दिखते हैं। पर नंद किशोर आचार्य के कवित्व में न केवल मितभाषिता है, बल्‍कि उसमें अर्थ-गांभीर्य भी है। भारवि के अर्थ-गौरव की तरह नंदकिशोर आचार्य की लघु कविताओं में अपार भाव-संसार लहराता मिलता है। जल-संकट से जूझने वाले राज्‍य राजस्‍थान के रहने वाले आचार्य के यहॉं जल और जल-संकट को लेकर जितने बिम्‍ब और अनुगूँजें मिलेंगी, उतनी शायद अन्‍य कवियों में नहीं, यहॉं तक कि राजस्‍थान के कवियों में भी नहीं। अचरज नहीं कि कविता के सरोवर में आचार्य के उतरने का पहला साक्षी 'जल है जहाँ' रहा है जो कि उनका पहला संग्रह ही नहीं, कविता में उनकी प्राथमिक पैठ का परिचायक भी है। उनके भीतर अक्‍सर अवसान, मृत्‍यु और उदासियों का लगभग वैसा ही सुपरिचित वातावरण मिलता है जैसा प्राय: कलावादियों के यहॉं । पर यह अच्‍छी बात है कि उनके यहॉं समकालीनों जैसी स्‍थूलता के दर्शन नही होते, बल्‍कि प्रकृति, स्‍वभाव, पंचभूतों और फैले हुए अछोर जीवन के छोटे से छोटे क्षण-कण बीनते- बटोरते हुए वे एक ऐसी अर्थच्छटा बिखेर देते हैं जैसे धरती पर हास बिखेरती चॉंदनी या आकाश में उजास फेंकती तारावलियॉं। उनकी कविताओं की गैलेक्‍सी में अनुभूति के हर लम्‍हे को महसूस किया जा सकता है। उनकी एक कविता : 'रह गया होकर कहानी' के बोल हैं:

कविता होना था मुझे

रह गया होकर कहानी

न कुछ हो पाने की




मेरा सपना

होना था जिसे

रह गयी होकर रात

नींद के उखड़ जाने की



उम्र पूरी चुकानी थी

एक पल मुस्‍कराने की।

एक जीवन की पूरी यात्रा--पूरी नियति सन्‍निहित है इन पदावलियों में। आचार्य जहॉं एक तरफ तत्‍वचिंतक की हैसियत रखते हैं, गांधीवादी मानववादी चिंतन की आस्‍तित्‍विक पहचान उनके यहॉं दीखती है, वहीं उनके भीतर निवास करने वाले एक सुकोमल चित्‍त वाले कवि से भी भेंट होती है जो 'सनातन' और 'चिति' का उपासक है। अज्ञेय ने लिखा था न कि : ''कवि गाता है: अनुभव नहीं/ न ही आशा-आकांक्षा: गाता है वह/ अनघ/ सनातन जयी।'' यह चिरन्‍तनता आचार्य की कविताओं में मौजूद है जो समय के सुदीर्घ अंतराल के बावजूद कुम्‍हलाने वाली नहीं है। वह मानवीय भावनाओं की एक सतत उपस्‍थिति है। आचार्य इसी सातत्‍य के अनुगायक हैं। अछोर समय के बहते संगीत के श्रोता हैं। अपने कवि-स्‍वभाव का परिचय देते हुए वे एक कविता : 'भाषा से प्रार्थना' में कहते हैं: वह-- एक शब्‍द है/ एक शब्‍द है –तुम/ भाषा से मेरी

बस यही प्रार्थना है / तुमको 'वह' न कहना पड़े/ इसलिए खोजने दो / अपने में

अपने 'मैं' को मुझे--- / शब्‍द है वह भी।

अपने 'मैं' को अपने में खोजते हुए इस कवि को भले ही कोई निज की चित्‍तवृत्‍ति का प्रकाशक माने, अंतत: कविता का प्रदेय क्‍या यही नहीं है कि हम उसमें अपना अक्‍स देख सकें। वह समाज का दर्पण होने के पहले कवि का अपना दर्पण भी तो है। हालॉंकि आचार्य ने एक जगह कविता को दर्पण नहीं, चाकू बताया है---आत्‍मा में गहरे तक धँसा, न जिसको रख पाना मुमकिन, न निकाल पाना। तथापि, आचार्य ने अपनी कविता को समाज का दर्पण होने के पहले निज का मन-मुकुर बनाया है। उनकी कुछ कविताऍं उद्धृत करते हुए मैं कहना चाहता हूँ कि प्रेम कविता किस तरह हमारे चित्‍त को बींधती है, इसे कोई कवि ही महसूस कर सकता है। जिसका अनुभव जितना व्‍यापक, संवेदी और गहरा होगा, उसकी अभिव्‍यक्‍ति भी उतनी ही अनूठी और वेधक होगी। ये कविताऍं इस बात की गवाही देती हैं :

शब्‍द से ही रचा गया है सब-कुछ

--यह मैं नहीं मानता था

जब तक मैंने

नहीं सुनी थी तुम्‍हारी आवाज़

हर पल ही

रचती रहती है

संसार जो मेरा। (तुम्‍हारी आवाज़)




तुम्‍हारी नींद में जागा हुआ

हूँ मैं

मेरे ध्‍यान में सोयी हुई

हो तुम

ध्‍यान में जगा भी लूँ तुम्‍हें

जाग कर फिर सो जाओगी---

नींद में जगता रहूँगा मैं। (नींद में जगता)




आना

जैसे आती है सांस

जाना

जैसे वह जाती है

पर रुक भी जाना

कभी

कभी जैसे वह

रुक जाती है। (रुक भी जाना कभी)




'केवल एक पत्‍ती ने' पर विहंगम दृष्‍टि डालते हुए अचानक एक बेहतरीन प्रेम कविता के अवलोकन में दीठ बिलम जाती है और वह कविता है भी ऐसी नव्‍य भव्‍य :

जंगल बोलता है चिड़िया की खामोशी

बोलता है

तुम्‍हारी चुप में सूनापन

मेरा जैसे

जंगल खिल आता है

फूल होने में

खिल आता हूँ मैं

तुम्‍हारे होने में जैसे

तुम्‍हें सुना करता हूँ

मैं

मुझमें खिल आती हो

तुम । (खिल आती हो तुम)




इन कविताओं से आचार्य का जो मिजाज सामने आता है, वह सामान्‍यत: एक रोमैंटिक कवि का-सा लगता है। वह है भी इस अर्थ में कि कविता में रोमैंटिक होना कवि के लिए अपकर्ष का कारण नहीं है। पूरी योरोपीय रोमैंटिक कविता गवाह है कि मानव-मन के रहस्‍य को उकेरने-व्‍यक्‍त करने में उसने कामयाबी हासिल की है। इन प्रेम कविताओं में एक निरलंकृति है किन्‍तु अपनी पूरी झंकृति के साथ। एक परिष्‍कृति है अपनी सुसंगति के साथ। और आचार्य जैसा कवि तो हर कविता को प्रेम कविता मानने वाला कवि है। उनकी हर कविता प्रेम कविता है। अशोक वाजपेयी ने लिखा है: 'शब्‍द से भी जागती है देह/ जैसे एक पत्‍ती के आघात से होता है सबेरा।' आचार्य की कविताओं में हम शब्‍दों का जादू महसूस कर सकते हैं। जैसे केवल एक पत्‍ती में हम प्रकृति के समूचे सौंदर्य को महसूस कर सकते हैं, एक चावल में परिपक्‍वता के आभास की तरह।




समकालीनता की मॉंग हम हर कवि से नहीं कर सकते। नंद किशोर आचार्य समकालीनता में सॉंस लेते हुए भी समय के पार जाने वाले कवियों में हैं। बहुत बोलने वाली कविता उन्‍हें स्‍वीकार्य नहीं है। आखिरकार वे अज्ञेय के शिष्‍यों में हैं जिसे सन्‍नाटे का छंद बुनना भला लगता रहा है तथा जिन्‍होंने कहा भी है :'शोर के इस संसार में मौन ही भाषा है।' अकारण नहीं कि बार बार वे खामोशी की ओर लौटते हैं और उसमें डुबकी लगाते हुए एक विरल अर्थ खोज लाते हैं। क्‍योंकि बकौल कवि, ''निरर्थक ध्‍वनि ही तो है वह/ जिसे अपना अर्थ दूँगा मैं....../ मेरी कहन होगी वह।'' आचार्य इसी 'कहन'---इसी 'गहन मौन' के कवि हैं। अपनी तरह से कविता की तलाश में यायावरी करते हुए वे आखिरकार यही सवाल करते हैं---

और क्‍या होता है

होना

कविता होने के सिवा----

एक लय चुप कर देती है

अपनी खामोशी में

लेती हुई मुझे। (शब्‍द होता है)




नंदकिशोर आचार्य की कविता पढ़ने के बाद हमारे मन में कुछ वैसी ही अनुगूँज बची रह जाती है जैसे मंदिर में की गयी प्रार्थना की पुकार। धूप, दीप, नैवेद्य से सुवासित वातावरण में व्‍याप्‍त सुगंध। वे अपनी कविताओं में मानवीय सुगंध का एक कोना हमेशा बचाए रखते हैं। सच तो यह कि आज की अति-वाचाल कविता के इस शोरोगुल में उनकी कविता आत्‍मा के उपचार की तरह है, जिसकी जरूरत आज सबसे ज्‍यादा है।

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                                                                                                                                              कहानी समकालीन


                                                                                                                                                    -शमोएल अहमद





 सब्ज़ रंगों वाला दूत   

हम सब जिस कस्बे में रहते थे वो जिस्म की रगों की तरह पेचदरपेच पहाडियों से घिरा था। हम में से कुछ (जो हम में से थे) कच्ची और कमजोर किस्म की लकडियों के मकानों में रहते थे जहां दीवारें कागज  की तरह पतली और बारीक थीं और हम में से कुछ(जो हम में से नहीं थे) गगनचुम्बी इमारतों में रहते थे जहां दीवारों का रंग गहरा सब्ज था । धूप की साफ रौशनी में ये बुल्रद इमारतें कीमती नगीनों की तरह जगमगाती थीं और हम उधर से गुजरते तो हसरत से इन इमारतों की ऊंचाइयों की तरफ देखते थे । तब हमें अपने कमजोर और तंग मकानों की सेलिन और घुटन का एहसास होने लगता था । हम ने भी अपनी खिडकियां धूप के जवार में खोल रखी थीं लेकिन धूप किसी सभ्य अजनबी की तरह हमारे कमरों में आने से ठिठकती थी । हम ने आज तक दीवारों पर  धूप के स्पर्श की गरिमा को महसूस नहीं किया था । यहां तक कि हमारी दीवारों का रंग जगह जगह से फीका पड  गया था और सियाहीमय हो गया था ।

हम ने सफ़र में जब भी कोई नया रास्ता तलाशने का यत्न किया था तो हमारे कदम किसी न किसी पेचदार मोड़ पर ठिठक गये थे और हमे लगा था कि हम विपरीत दिशाओं से आने वाली हवाओं में सांस ले रहे हैं । ऐसे मोड़ पर हमारी मशालें बुझ गयी थीं और हम अपने इर्दगिर्द फैले हुए गैरहमवार रास्तों की तरफ देखते तो हमारी आंखों में बुझी हुई लौ का धुआं तैरने लगता और महसूस होता कि पेचदार रास्तों से घिरे पहाड़ों के सफर में हम बेहद थक चुके हैं । कभी कभी हमारी खिड़कियां इन हवाओं के झोकों से जोर जोर से आपस में टकराने लगतीं तो लगता कि शायद हम कच्चे मकानों की छतों से भी वंचित हो जाएंगे ।

इस कस्बे में हमारे साथ सब्ज आंखों वाला एक हमसफर भी था । अगरचः वो भी हममें से था और उसके कमरे में भी घुटन और अंधेरा था लेकिन हम ने आज तक उसके चेहरे पर धूप के हरजाईपन का कोई आभास नहीं देखा था और न कभी उससे मौसम की बेरूखी की बातें सुनी थीं । उसके कमरे की दीवारों का रंग भी जगह जगह से फीका पड  गया था लेकिन वो इनपर हमेशा सब्ज  रंग चढ़ाता रहता । एक मशाल बुझ जाती तो दूसरी जला लेता और नये रास्ते की तलाश में निकल पड़ता । जब हम अंधेरी रूतों का जिक्र करते कि हमारे सीने में आकांक्षाएं ऐब होती जा रही हैं तां वो धीरे से मुस्कराता और फिर आसमान की तरफ तर्जनी उठा कर कहता कि एक दिन यकीनन बारिश होगी । तब नदी हमारी दहलीज  को छू कर गुजरेगी तो हम उसके साफ और मीठे पानियों में अपने हाथ धोएंगे ।

''ऐसा कब होगा....? ऐसा कब होगा....?'' हम मे से कोई थके हुए लहजे में पूछता तो वो उसी तरह मुस्कराता और आसमान की तरफ  इशारे करते हुए कहता कि आरजूओं के दीये वहां जलाओ तो बादल छट जाएंगे और तब तुम सूर्य के तमाम आशीश बटोरना ।

लेकिन उसकी बातें हमारी सांसें हमवार करने में कारगर साबित नहीं हो सकी थीं । दरअसल हम इस सफ़र में इतना थक चुके थे कि अब आगे चलने का यारा नहीं था । हम में से कुछ तो सफर का किस्सा ही खत्म कर देने की बातें करते । तब वो कहता कि इस तरह तो हम आखिरी सफर में कांटों पर ही चलते रहेंगे । फिर वो हमारे कंधे थपथपाते हुए कहता कि बाजुओं की खरोचें हमे उर्जावान रखती हैं और मुखालिफ हवाओं ने हमें जिंदा रखा है। एक दिन जब सूर्य रंगों की थाल लिए हमारी चौखट पर आएगा तो हम धनक के तमाम रंग समेट लेंगे ।

''ऐसा कभी नहीं होगा....ऐसा कभी नहीं होगा ....!'' हम उसी तरह बेजान स्वर में कहते ।

'' बेशक ऐसा होगा....जरूर होगा ।'' वो उसी तरह मुस्कराते हुए कहता और हमें उसकी आंखों में सब्ज परों वाली खुशरंग तिलियां थिरकती सी नजर आतीं ।  हम सब उसे सब्ज रंगों वाला दूत कहने लगे ।

एक बार हम में से कोई कस्बे के वर्जिंत एलाके में चला गया । वो जब वहां से लौटा तो उसकी सांसों में जले हुए गोश्त की महक थी और आंखों में थिरकते शोलों का नशा था। तब दूत ने हमें पांच जंगली घोड़ों के किस्से सुनाए।

एक शख्स था । उसने पांच जंगली घोड़े पाल रखे थे । वो इन्हें खूब खिलाता पिलाता था । एक घोड़ा बहुत मुंहजोर था और बेशक इस घोड़े पर किसी का जोर नहीं चलता है ।वो इसे भी खूब खिलाता पिलाता रहा । फिर उसने इनकी बारी बारी सवारी की । लेकिन हरदम लहुलहान हुआ । मुंहजोर घोड़े की सवारी से वापस हुआ तो उसका चेहरा सियाह पड़ गया और वो एक गहरी खाई में गिर पड़ा।

एक और शख्स था । उसने भी पांच जंगली घोड़े पाल रखे थे । वो इन्हें कम खिलाता पिलाता था और मुंहजोर घोड़े को ( बेशक इस पर किसी का जोर नहीं चलता ) काबू में रखने के लिए और कम खिलाता था । लेकिन उसे भी इनकी सवारी में लहुलहान होना पड़ा । मुंहजोर घोड़ा लहलहाती फसलें देख कर बिदका था और नतीजे में उसकी चोटें आई थीं ।

दूत ने पूछा कि ऐसा क्यों है कि दूसरे सवार को भी मुंहजोर घोड़े की जिल्लतें उठानी पड़ीं?     

हम सब चुप रहे ।

तब दूत ने पांच और जंगली घोड़े की कहानी सुनाई । उसने कहा कि एक और शख्स था । उसने भी पांच जंगली घोड़े पाल रखे थे । वो उन्हें एक सीमा में खिलाता पिलाता था । मुंहजोर घोड़े के लिए उसने चाराघर खरीद लिया । फिर उसने सवारी की तो गीत गाता हुआ आया था ।

तब दूत ने पूछा कि ऐसा क्यों है कि उनकी सवारी में वो ,यश का भागी हुआ ?

हम सब चुप रहे ।

ऐसा इसलिए हुआ कि उनकी सवारी करते हुए भी वो उनपर सवार नहीं था । बाकी सवारों पर खुद घोड़े सवार थे ।

तब दूत ने कहा कि इस तरह कांटे बोने की लज्जत में तुम अपने हाथ सियाह मत करो वरना सफर के आखिरी पड़ाव में तुम्हारे पास क्या बचेगा ?

और हम मे से किसी ने कहा कि ये सब फिजूल बातें हैं । जिनके हाथ सियाह हैं और पेशानी धूल भरी है उनकी इमारतों पर धूप हमेशा चमकती रही है । उन्होंने कांटों की फसलें बोई हैं और फूलों की फसलें काटी हैं । ऐसा क्यों है ? उनकी तरफ आसमान का रंग सुर्ख क्यों नहीं होता ?

दूत मुस्कराया । फिर उसने कहा कि उनके फूलों में सुगंध नहीं है । यही फूल सफर के दूसरे चरण में अंगारे बनेंगे ।

कभी कभी दूत की ये बातें हमारे बाज़ूओं को मजबूत हाथों की तरह थाम लेतीं । हमे एहसास होता कि एक दिन हम वाकई सुरज के तमाम रंग समेट लेंगे । लेकिन हम घने और साएदार दरख्तों की उम्मीद में हमेशा सूखे और वीरान रास्तों से गुजरते रहे । फिर भी दूत के चेहरे पर हमने सफर की कोई थकान नहीं देखी । उसने हमेशा इसी तरह रंगोसुगंध से भरी बातें कीं ।

            एक बार दूत ने बताया कि उसकी भी एक कहानी है । और हम सब उसे हैरत से देखने लगे । तब उसने दो रौशन और हंसती हुई आंखों की बातें बताईं । उसने कहा कि उसके बाल काले और चमकदार हैं । हम सब ने महसूस किया कि उन हंसती हुई आंखों के जिक्र में दूत बच्चों की तरह मासूम हो गया है । उसने कहा कि जब बादल छट जाएंगे तो वो उन काले और चमकदार बालों को अपने बाजुओं में कैद कर लेगा ।

एक दिन दूत की आंखों में धनक के रंग घुले हुए थे । उसके होटों पर दिलनवाज  मुस्कराहट तैर रही थी । उसने बताया कि तमाम बंद दरवाजे उस पर खुल गये हैं ।

हम हैरत और खुशी से उसको देखने लगे ।

हर्ष भरी आवाज़ में दूत ने कहा कि अब वो कचनार भरी वादियों से गुजरेगा कि सूर्य उसकी चौखट पर रंगों की थाल लिए आ गया है ।

''ऐसा कैसे हुआ....? ऐसा कैसे हुआ....?'' हमने एक साथ पूछा था ।

तब उसने आसमान की तरफ तर्जनी उठाई । ''तुम सब उसकी असीम करूणा को क्यों भूले बैठे हो ?''

हम सब हैरत से दूत को देखते रहे ।

'' अब तुम सब्ज वादियों से गुजरते हुए हमें भूल तो न जाओगे ।?''

''नहीं...नहीं...ऐसा नहीं होगा ।''

''क्या हम तुम्हें रौशनी के ऊंचे मीनार से नजर आ सकेंगे ?''

क्यों नहीं ? क्यो नहीं ? और सुनो ! तुम भी कभी दुख और मायूसी के गैरमुनासिब एहसास से मत गुजरना कि दुख और मायूसी बरकतों के रास्ते ब्रद कर देते हैं ।''

फिर दूत मुस्कराया और कहने लगा कि अब वक्त आ गया है । अब वो हंसती हुई आंखों को आवाज़ देगा । अब काले और चमकदार बाल उसके कंधों पर लहराएंगे ।''

''मुबारक हो ।'' हमने एक साथ कहा था ।

''उन हंसती हुई आंखों को हमारा सलाम जिनमें तुम्हारे इंतजार की रौशनी है ।''

 ''वो आंखें वाकई मुबारक हैं जो किसी के इंतजार में रौशन रहती हैं ।''

दूत हमारे दरमियान से चला गया तो हम देर तक गैरसुरक्षा के एहसास से गुजरते रहे थे ।

लेकिन दूत को गये दो दिन भी नहीं हुए थे कि किसी ने खबर दी कि वो अब सफर में नहीं है ।

इसपर हम हैरत से उसको देखने लगे थे ।

''खुद उसने ही अपना किस्सा खत्म कर डाला ।'' उस शख्स ने बताया ।

''नहीं...नहीं...ऐसा नहीं हो सकता ? ऐसा कैसे हो सकता है ।'' हम एक साथ बोल पड़े थे ।

'' ऐसा ही हुआ है....ऐसा ही हुआ है ।''

उसने जानबूझ कर अपना किस्सा खत्म कर डाला ।''और उस शख्स ने बताया कि असल में दो हंसती और चमकती हुई आंखों ने उसकी तरफ़ देखने से इनकार कर दिया था ।''

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                                                                                                                                                        कहानी समकालीन


                                                                                                                                                 - रजनी कुमार पंड्या


                        कंपन जरा जरा

लड़के की कॉपी से एक कविता निकली।  बतौर एक बाप के पढ़ने का मेरा फर्ज.।  पढ़ा तो उस में किसी बेनाम लड़की के प्रति कुछ मुक्तक थे।  इस जमाने में किसी को कविता बनानी नहीं पड़ती।  फिल्म के गीत ही ये काम कर देते हैं।  फिर भी कनक को क्या जरूरत पड़ी कविता करने की? लगता है कुछ ज़्यादा ही डूब गया है आशिकी में।  अभी तो मूंछ के चार डोरे फूटे हैं और आवाज की घांटी भी नहीं फूटी।  तभी से यह। हकीकत में ज्यादा दोष लड़कियों का ही होता है।  नज़र से नज़र वह मिलाए? आंखें पटपटाए और फिर सामने वाला आसामी तनिक घायल हो कि ये मायाएं दो-चार कड़े तीर उड़ा दे।  फिर तो कविता? शेरोशायरी और ऐसा ही सब कुछ नरम मुलायम रूई जैसा उड़ता रहे और इसी तरह टांगागाड़ी जुड़ जाए।  हमारे ज़माने में बिलकुल ऐसा नहीं था।

लड़के की कॉपी से एक पिचका हुआ फूल भी निकला।  इस के अतिरिक्त तितली का एक पर? किसी ऐक्टर के हस्ताक्षर? किसी दोस्त का पता? फोन नंबर वह सब एक बारगी निकला।  एक पन्ने पर गावस्कर के द्वारा किए गए रन की लिखी-काटी सूची।  दूसरे पन्ने पर एस-टी  के पास का नंबर और उस के नीचे भी दो बादाम जैसे दो दिलों को एक ही तीर से बींधे और भीतर से रक्त रिसता रहे ऐसी बूंदें।  दरअसल यह सब उस उम्र की खासियत है यह भी सच है और यह भी सही है कि इससे कोई मुक्त नहीं।

लेकिन हमारे ज़माने में ऐसे फंडे नहीं थे।  कनक ने घंटी बजाई तो मैने झटपट उसकी कॉपी बंद कर दी और सामने के शीशे में गहरा उतर गया होऊं,  यूं उसके ड्रेसिंग टेबल पर ही चिपका रहा।  उस ने दरवाजा खोला तो ड्रेसिंग टेबल पर पड़ी अपनी कॉपी देख कर उसे कुछ असुख-सा महसूस हुआ है यह मैं ने शीशे में देखा।  लेकिन मैं भी कम नहीं।  हम तो ऐसे देखते रहे गोया नोट बुक को देखा ही किसने हैं।

 उसने झट से कॉपी उठाई, बगल में दबाई और जाने के लिए कदम उठाया तभी मैं शीशे से बाहर निकला?

वह अचकचाकर खड़ा रह गया।

 "कहां चले यूं आ के तुरंत?”

"फ्रैंड के घर।" वह बोला? "पढ़ने के लिए।"

"कौन-सा? "

 मुंह पर आया सो नाम फेंक कर गच्छंती की उसने मंशा।  लेकिन हमने भी सिर के सारे के सारे सफेद बाल चुन थोड़े न लिए थे, सब समझते हैं।  लेकिन किसी को सीधा नोच कर खुला करने की अपनी आदत ही नहीं।  फिर चाहे बेटा ही क्यों न हो।

"अपनी मम्मी से मिल कर जाना।"

"क्यों?"

अब क्यों और त्यों।  ऐसे सवाल ही गैरज़रूरी होते हैं।  यह तो वह भी समझ सकता है।  मैंने 'क्यों' का जवाब दिया तो उस ने कॉपी को टेबल की दराज़ में ठूंस कर दराज़ को चाबी लगा दी और अंदर के कमरे में गया।  मैं पुनः सोच में पड़ गया।

 
ज़माना बारीक है।  किसी तीसरी के प्रेम में पड़े हुए जवान लड़के  को सीधा यूं ही दूसरी को पसंद करने के लिए कहना हो तो उस के लिए भी होशियारी चाहिए? जो अपने पास न मिले।  इस मामले में मुझे बीच बचाव करना चाहिए ऐसा विचार भी पैदा हो कर मर गया।  विचार इसलिए मर गया कि दूर की सोचने पर यह समझ में आया कि औरतें जिस नज़ाकत से बात कर सकती है हम नहीं कर सकते।  व्यापार में भले ही हम जो भी चालाकी कर लें? लेकिन ऐसे मामले में तो आखिरी फैसले पर मार ही खा जाएं।  मान लो कि यह इकलौता बेटा कहे कि कॉपी में लिखी हुई इस लड़की के सिवा दूसरी नहीं चलेगी तो क्या हम सामने मुस्कुरा सकेंगे? अरे धौल-धपाट तक बात पहुंच जाए और यूं करने के बाद भी निपटे तो नहीं नहीं नहीं ही।  अतः आखिर उसकी मम्मी के ज़िम्मे डाल दिया।

 
वह अंदर के कमरे में गया और मैं यहां वह प्रेम क्या चीज है इस सोच में पड़ गया।  अपने को हुआ था या नहीं किसी दिन, याद्दाश्त पर बड़ा ज़ोर दिया? याद किया? खूब याद किया? देर लगी।  पचास-साठ साल का अंतर पिछले पैरों काटें तो देर तो लगेगी ही। न जाने कितनी बिन्दियां भाल-प्रदेश झलकीं-छलकीं और छुप गईं। शुरू-शुरू के दो-चार अफलातून थे।  वे सब  पंद्रह सत्रह की रही होंगी? और मैं बीसेक का? मुश्किल से।

 

छोटी-सी दुकान पर नौकरी करता था।  कितनी पगार? लिखना यह भी तय नहीं।  पढ़ सकते थे  उतना भर पढ़ लिया।  बाकी नौकरी तय करवा दी थी इसलिए करता था।  साइकिल चलानी आती थी, यह अपनी योग्यता।  इधर-उधर नज़र नहीं डालने की यह दूसरी योग्यता।

 
विचार यहां तक पहुंचा तभी अंदर से कनक आ गया।  पीछे-पीछे उसकी मम्मी आई।  ड्रेसिंग टेबल के आईने में वे दोनों मुझे दिखाई दिए कि तुरंत ही मैं, जो मन में दूर तक आगे निकल गया था, पीछे मुड़ गया।  बोला "क्यों, कनक मान गया है? " वह बोली? "तुम बाप-बेटे कल सवेरे निकल जाओ।"

 कनक की ओर मैं ने देखा लेकिन उसने नहीं देखा।  खीझ में हो तो मेरी बला से।  अपने को तो वह साथ आने के लिए रेडी हो गया यही नफ़ा था।  लड़की को देखेगा फिर तो नफा ही नफा है।  मनहर गोविंद की लड़की में क्या कमी है- रूप, गुण, पढ़ाई, पैसा और गठन सब कुछ है।

 
कनक के ना कहने का कोई कारण नहीं।  एक दफा यदि उस में वह भीग गया तो फिर नोटबुक वाली बेनाम लड़की के लिए लिखी सारी कविताएं उस के नाम ट्रांसफर हो जाएं, यह बात कठिन नहीं हो सकती है।

 
सवेरे हम निकले तो साथ ही लेकिन वह मुझ से बिलकुल अजनबी-सा चलता रहा।  उस के बगल थैले में देखा तो वही नोटबुक।  तो यह बात है, कच्ची बुद्धि करीब बीस एक साल तक रहती है।  अभी इसे इक्कीसवां लगा है।  वरना यह कूड़ा साथ में लेने का कोई कारण, पूछा तो बोला कि मेरी इम्पॉर्टन्ट क्वेश्चन्स और श्योर सजेशन्स की नोटबुक है।  रास्ते में पढ़ने के लिए रख ली है।  हालांकि मैं जानता था कि अंदर कौन से क्वेश्चन्स और कौनसे सजेशन्स हैं और किस तरह के इम्पॉर्टन्ट हैं? लेकिन उसकी मम्मी के साथ मैं ने बोली की थी कि जहां तक हो सके ऐसा व्यवहार करूंगा कि मैं इस लड़के के बारे में कुछ जानता ही नहीं।  वरना हो सकता है कि कहीं ऐसा हो कि इस का दिमाग फिर जाए और यह प्लेटफॉर्म से ही वापस लौट जाए, इसलिए मैंने कहा, "अच्छा"।

 
बाकी लड़की जो  मुझे इस वक्त याद आई वह थी परागी।  उस के साथ कोई प्रेम जैसी चीज़ अपने पास नहीं मिलेगी।  बात सिर्फ इतनी कि हमारे घर में मैं चौदह साल का हुआ तब से कुछ भनभन हुआ करती थी कि उस के साथ मेरी सगाई होने वाली है।  उस वक्त एक दफा उसे देख लेने को मन किया था, सो ज्यों का त्यों बना रहा।  मौका ढूंढ़ रहा था तभी मिल गया।  एक दोस्त के बड़े भाई की साली लगती थी वह। परागी? परागी नाम उस के मुंह से बारबार सुनता और फिर वह नाम भी ऐसा कि किसी का न हो इसलिए मैंने जब दोस्त से पूछा कि यह जो परागी परागी होता है वह मगन भगवान की लड़की तो नहीं?  यदि वही हो तो जिस के साथ मेरा रिश्ता जोड़ने की बातचीत चलती है, वही है।  अपने को एक बार अकेले में देखने को मिल सकती है?

 
एकांत में देखने को मिले इसके लिए मैं दोस्त से इतनी दफ़ा बोलता रहा कि कुछ दिन तो उसने मेरे साथ बोलना ही छोड़ दिया।  उस वक्त यह हाल था।  इस कनक  की तरह ऐसा नहीं कि नोटबुक में कविता बविता लिखी है और तितली का पंख जुटाया है और दिल-बिल खींच कर खून-बून निकाला है।  कनक नोटबुक ले कर स्टेशन पर इस तरह घूमता था जैसे मैं हड़प लेने वाला होऊं।  बचकानापन ही है? उसके सिवा और क्या, ब्रक्त गाड़ी चलने के बाद मेरे मन में सरसराहट हुई? "अरे भई? क्या है इस में इतना कि इस कदर चिपकाए रहता है?

पहले तो वह चौंक गया।  लेकिन फिर गंभीर हो गया।  बोला, "सच बताऊं पापा? इस में मेरी अपनी फ्रैंन्ड पर लिखी कविताएं हैं।"

गोया मैं कुछ जानता ही नहीं।  कहने की क्या जरूरत, "गर्लफ्रैंड"  वह आंखें नचाता हो इस अंदाज में बोला, "बड़ी स्वीट लड़की है, पापा  . . ."

 
मैंने उसकी मम्मी के साथ बोली की थी कि बात नहीं छेडूंगा।  लेकिन अब जबकि भाई श्री खुद ही बात की गुत्थी छोड़ रहे हैं तो मुझे अपनी थोबड़ी बन्द रखने की कोई वजह हो सकती है, पूछ ही डाला? "लव-बव का कोई लफड़ा तो नहीं हैं न, बेटे? "

"क्यों"

हंस दिया वह।  मंद मुस्कान से ज्यादा।  बच्चे की तरह बांकी मुस्कान के साथ वह बोला, "हो भी तो क्या पापा, आप मुझे उस के साथ मैरेज करने देंगे? " वह बोला,  "मम्मी बता रही थी कि करने ही नहीं देंगे।"

 
हद हो गई  इस लड़के की। ऐसा पूछा जाता है। परागी के साथ मेरी सगाई की बात करीब नब्बे प्रतिशत निश्चित थी फिर भी मैं ने कभी अपने बाप से यह पूछा था कि सगाई कब करने वाले हो? अरे, उस विचार से ही अपनी नस फट जाती और बात से बाप की नस फट जाती।  वैसे मन तो यही करता कि पूछ, पूछ।  क्योंकि परागी मुझे अच्छी लगती थीं।  यूं तो नाम से ही अच्छी लगने लगी थी लेकिन बाद में जब एक विवाह-प्रसंग में हम आमने-सामने आ गए तभी तय कर लिया था कि शादी करनी होगी तो इस सूरत के साथ ही।  बात दरअसल यूं बनी कि मैं और मेरा दोस्त चले जा रहे थे और देखा तो सामने से एक मक्खन का पिंड-सा चला आ रहा है।  आसपास दो-चार सहेलियां भी थीं।  लेकिन वह सबसे अलग उभर आती थी।  ताज़ा-ताज़ा कमल।  यूं लगे जैसे तालाब से नहा कर सीधी चली आ रही हो।  मुझे देख कर क्या पता किसी सहेली ने उस के बाजू पर चुटकी ली हो या भगवान जाने, पर वह एकदम धीमी पड़ गई।  सामने देखा-अनदेखा किया और पुतलियां झुक गई।  उसकी सहेलियां भी कैसी कि आसपास इधर-उधर हो गई।  बावरी-बावरी सी हो कर वह आसपास देखने लगी।  उस वक्त मैं ने देखा तो मेरा भी दोस्त अंतर्धान- हमें मिलाने की यह साजिश।  उस का मुंह लाल-लाल हो आया।  आंखों में नज़र करो तो  बिलकुल तराशी हुई लगें।  बारबार पलकों के पलकने से एक पैमाने पर घूमती रहें।

 मुझे खुशी, संकोच, छाती धकधक- सब एक साथ हो आया था, मुझे याद है।

 वह भी खड़ी रह गई थी, वहीं पर।  मैं आगे चला।  उसके नज़दीक आया तो लगा गोया सुख का ढेर यहीं हैं।  यहां होने का सुख यानी दुनिया भर का सब से बड़ा सुख।

"कैसी हो? "- बिलकुल आहिस्ता सांस में बोलना हो, यूं बोला मैं।

चिड़िया की चोंच की तरह गुलाबी ओठों में कुछ कंपन हुआ लेकिन कोई शब्द अंदर से फड़फड़ा कर बाहर आ पड़े उस से पहले ही बाहर यकायक शहनाई के सुर शुरू हो गए।  औरतों के झुंड की इस ओर आने की पदध्वनि सुनाई दी।  परागी कुछ कांप उठी और तुरंत ही सावधान हो गई।

"आप जाइए यहां से।"  वह बोली? "बाद में  . . .बाद में मिलिए।"  बोलते-बोलते उसे लगा कि कुछ महापाप हो गया हो जैसे।  वह ऊपर-तले होने वाली छाती पर हाथ लगा कर बोली? "हाय मां? अब क्या होगा !

 
लेकिन कुछ हुआ नहीं।  मैं आगे निकल गया।  थोड़ा-सा कंपन तो मुझ में भी व्याप्त गया होगा।  बर्फ की तरह क्षण के सुख का गठ्ठर पिघलने लगा।  बाहर निकल कर जा कर देखता हूं तो समूची दुनिया ही बदल गई थी।  ढोली  ढोल पीट रहा था? ब्राह्मण श्लोक बोल रहे थे।  औरतें बैठी-थकी आवाज में गीत गा रही थीं और गली में कोने पर जूठी पत्तलों का ढेर पड़ा था।  गाय वहां खड़ी हो कर नथुने फड़का रही थी।  सब कुछ बड़ा मामूली लग रहा था।  मेरे मतलब का उस में कुछ नहीं था।  मैं  इन सबसे दूर,  अलग जरा ऊपर उठ गया था।  छलक-छलक हो रहा था अंदर ही अंदर।  दोस्त ने आ कर पीछे से पीठ पर मुक्का लगाया।  कान के पास किसी ने पटाखा फोड़ा हो,  इस तरह मैं  सहम गया।

 
ऐसा होता था उस वक्त, चालीस साल पहले।  खूब याद किया तो पूरा टूकड़ा ज्यों का त्यों निकल आया।

 "पापा  . . .",  कनक से पूछा, " किस विचार में खो गए? "

"कुछ नहीं, यह तो  . . ." मैं ने कहा, "अपनी मैरिज की बात तुम ने खुद निकाली इसलिए सोच रहा था कि हम जिस कन्या को देखने जा रहे हैं वह यदि मन में जंचे तो फिर ज्यादा खींच तान मत करना। हां कर देना।"

 
उसकी मुस्कान भी मज़ाक जैसी -या मुझे ही ऐसा लगा हो।  चालू गाड़ी में ज्यादा क्या कहना, वरना अपना दिमाग तेज़।  कुछ नहीं बोला वह और आंखें बंद कर सोच में पड़ गया।  पहली बार मुझे यह महसूस हुआ कि इसे रेज़र से रोज़-रोज़ की मूंछे उतार लेनी चाहिए।  यूं तो आदमी देवदास लगे। 

कुछ बात तो करनी चाहिए न, पूछा? "वह है कौन?"

हाथों को दाब और आंखें खोल कर मेरे सामने देखा? "कौन?"

"यह जो तुम बता रहे थे वही तुम्हारी गर्लफ्रैंड, गलत नहीं कहा जाएगा।  उस के गालों पर कुछ शर्म तो झलक आई।  हमारे ज़माने में हम जिस तरह शर्म में गड़ जाते थे वैसा नहीं।  हमारे ज़माने में तो अपने पिता जी के साथ ऐसे डायलॉग कभी होते ही नहीं थे।  यदि डायलॉग हो सकता तो मैं ज़रूर कह देता कि हमारी परागी के साथ ही जमने दो। और आज लगता है कि कहा होता तो शायद हो भी जाता।  ओहो? ओहो- तो फिर बात कहां करनी- बिल्कुल उधेड़ लिया था उसने अपने को।  जहां-तहां भीड़ में मैं उसे ही चुनता फिरता।  और मिले नहीं तो न मिलने के लिए उस पर खीझ भी आ जाती।  एक दफा स्कूल जाती हुई लड़कियों के झुंड के पीछे-पीछे दो-तीन गलियों तक आया और उन में से लंबी  झूलती चोटी वाली जो हैं वही परागी? यूं नज़र को मनाता रहा।  लेकिन निकली कोई और ही।  उस वक्त भी उस पर खीझ चढ़ी।  उस झुंड में वह क्यों नहीं थीं... होना चाहिए, यह बात मैंने अपने दोस्त से कही तो वह बोला कि परागी तो दूसरे स्कूल में पढ़ती है।  वह इस रोड से कैसे निकलती... यह बात भला अपने को कैसे मालूम होती... मैं काई उसे पूछने थोड़ी न गया था कि, भई तू किस स्कूल में पढ़ती है... कब जाती है... किस-किस से मिलती है... रास्ते में मैं फव्वारे के पास मिलूं तो टेढ़ी नज़रों से भी मेरे सामने देख लेगी या नहीं... लेकिन एक बार फेस टु फेस हो तो पूछूं ...जहां  चेहरा ही दुबारा मुश्किल से देखने को मिला वहां दूसरी बात कैसे की जाए-

 

दुबारा चेहरा देखने को मिला वह भी मुश्किल से।  गुरूकुल के मैदान में गांव के तमाम स्कूलों का कोई समारंभ जैसा था।  दोस्त ने बताया कि उस में परागी तो आएगी, आएगी और आएगी ही।  उस में आना अनिवार्य होता है।  इस संजोग का तो अपने को लाभ लेना ही है, यूं अस्सी मिनट में मन में गांठ लगा ली।

गाड़ी रूकी तो कनक ने पूछा?  "पापा? आप फिर सोच में पड़ गए... ? "

"ना  . . .ना-" मैं ने कहा? "यह तो ज़रा यूं ही नींद-सी लग रही थी।"

 

वह उतर कर नमकीन ले आया।  पानी के गिलास भर लाया।  हमने नाश्ता भी किया लेकिन चुपचाप।  आखिर उस के मन में ही जो हलचल मची हुई थी सो उसी ने पूछा? "पापा? आप कुछ कह रहे थे न... ? "

"क्या? "

"कि मेरी वह स्वीट गर्ल फ्रैऱ्न्ड  . . ."

"तू शर्माने लगा तो मैं ने पूछना छोड़ दिया।" फिर सुस्ताने लगा।

 
वह आंखों में चमक भर के बोला? "उस में तो ऐसा है पापा कि चोरी नहीं।  हमारा पूरा कॉलेज जानता है कि उस के लिए मुझे ऐसा है।"

मुझे कुछ याद आ गया? "लेकिन वह खुद जानती है या नहीं? "

"जानती ही होगी? "

"जानती होगी के माने... तुम्हारी कभी बात नहीं हुई? "

"ना" वह बोला? "बात तो नहीं हुई, एक बार फेस टु फेस मिले थे उतना ही  . . .लेकिन उस में वह समझ नहीं सकती... "

काफी काफी दूर से पटाखे की आवाज़ आ रही हो यूं मेरे मन में एक शब्द फूटा : "लड़की  . . ."

मैं प्रकट रूप से बोला? "लड़की की जात का कुछ कहा नहीं जाता। लेकिन बात हुए बगैर किस तरह ...तुझे बात कर लेनी चाहिए न? "

  उस के बाद मेरे शब्द तड़ातड़ फूटे? "बात कर ही लेनी चाहिए,  यह कोई पहले का ज़माना थोड़े ही है।  आजकल तो कितना अच्छा है कि लड़के-लड़कियां साथ पढ़ते हैं  . . . एक दूसरे के साथ बातें करते हैं और  . . ."

"लेकिन  . . ."  उसने कहा, "लड़कियां आज भी शर्माती हैं।"

बात सही होगी। परागी के साथ दो शब्द बोलने के लिए अपने राम ने जितने प्रपंच किए थे उसकी फेहरिस्त बड़ी लंबी है।  स्कूल के समारोह के समय गुरूकुल के पिछले भाग में मिलने की बात मैंने मन ही मन तय कर ली थी।  उस में भी एक पुराना आम का पेड़ मैंने मन ही मन सजा लिया।  ज़्यादा कोई अनुमान नहीं बस इतना ही पूछना था कि, '"मैं तुझे अच्छा लगता हूं ? दोस्त से कह दिया था कि तुम्हारा तो उस के घर आना-जाना है।  यूं इतना मिलने का कुछ जमा दो तो उपकार।  कोई न जाने ऐसे कह देना।  लेकिन दोस्त भी ऐसे दिमाग का कि कहने के बाद आठ दिन तक झांक कर देखा तक नहीं।  यहां मेरी जान जाती थी।  परागी के स्कूल के मार्ग पर सुबह-शाम हाथ में हरकारे की डाक हो यूं खड़ा रह जाता।  उसे आते-जाते देखता।  उस का ध्यान जाता तो वह नीचे नज़र करके और लड़कियों के साथ निकल जाती।  मुझे तो उस से इतना ही पूछना था कि, "तू तो मुझे विद्या की कसम इत्ती अच्छी लगती है कि बात नहीं। लेकिन मैं तुझे अच्छा लगता हूं...यदि इतनी बात का जवाब 'हां' में मिले तो यह भी पूछना था कि, "हमारी सगाई की बातचीत चल रही है। वह तेरे घर में कहां तक पहुंची? "

 

इतनी बात करने के लिए गुरूकुल के पुराने आम के पेड़ के पास मुझ से मिलाने के लिए दोस्त से कहा था तो वह मुझे लटका कर आठवें दिन आया और बोला कि? "कह दिया है।"  मैंने पूछा कि "क्या... तो बोला कि,  "उस में रिपीट क्यों करवाता है... तू ने कहा था वही कह दिया है।"  मैंने पूछा कि, "हां कही या ना...  तो पूछता है, "किस बात की? "  मैंने कहा कि "मूरख, मिलने की। मिलने की हां कही या ना।  जवाब में वह बोला नहीं, पर हंसोड़ की तरह  अपने को खीझ चढ़े यूं हंस दिया।  हंसते-हंसते दूर चला गया और वहां खड़े-खड़े पेन्सिल की नोक निकालने लगा।  बाद के चार दिन तो कैसे गुज़रे वह मेरा मन जानता है।  परागी ने मिलने की हां कही होगी या ना... लड़की की जात है।  डरपोक होती है।  न भी आए।  हालांकि मन कहता था कि आएगी? आएगी ज़रूर।

 

समारोह के दिन सबेरे से गुरूकुल के पिछवाड़े के मैदान में हेरा-फेरी करता रहा।  न जाने क्यों जी मचल रहा था। सेठ के पास से छुट्टी ले कर सबेरे से ही निकल गया था लेकिन यूं लगता था जैसे नौकरी में था ही नहीं।  होना भी नहीं चाहिए।  सब से अलग-थलग फिरता और बारबार नज़र पुराने आम के तने के पास डोरे की तरह लिपटती रहती।  ऐसा होता था। इस वक्त याद आ रहा है।

 

यकायक ज़ंजीर खींची गई और गाड़ी रूक कर खड़ी हो गई।  बिलकुल वीराना-सा था तो भी सब नीचे उतरने लगे।  कनक उतरे तो मुझे अच्छा न लगे।  अतः उसे बिठाए रखने के लिए ही मैं ने पूछा? "मिले हो या नहीं किसीं दिन? "

"यूं तो एक बार एक नाटक में हमें एक साथ उतरना था।" वह बोला और फिर विचारों में बह गया।  लेकिन तभी गाड़ी हिचकोले के साथ चली।  कोई बोला कि किसी ने यूं ही बिना किसी वजह जंजीर खींची थी।  चालू गाड़ी को व्यर्थ ही हिचकोले खाने पड़े।  फिर से कनक मेरे सामने देख कर बोला, "पापा, सच बताऊं, मुझे और उसे एक ही डायलॉग एक साथ बोलना था।  लेकिन बात यह हुई कि वह मेरे सामने आई और मैं डायलॉग भूल गया।  वह अपना डायलॉग बोल कर चली गई और मेरे बाद बोलने की जिस की बारी थी वह लड़का भी अपना डायलॉग बोल कर चला गया।  में स्टेज पर रहा लेकिन कुछ बोल नहीं सका।  उसी में घपला हो गया।"

"ऐसा हो जाता है? कई बारऋथ्ुेतऌ  मैंने उसे आश्वासन देने के हिसाब से कहा।

 

मैं तो साढ़े पांच बजे से पुराने आम के पेड़ के पास पहुंच गया था।  बेवजह पहले से ही मन में दहशत पैदा हो गई थीं कि परागी नहीं आएगी।  और कमबख्.त बुरी कल्पना सच बनने के लिए हमेशा आगे दौड़ती रहती है।  अपने को इस बात का खूब अनुभव है।  पौने छह? पौने छह और पांच? छह में पांच कम और छह भी बज गए।  झाडू की तरह आंखें घुमाऋघुमाकर थक गया।  साढ़े छह बज गए।  कहीं दिखाई न दी।  थोड़ीऋसी ठंड? थोड़ीऋथोड़ी हवा।  सात बजे और आम के पत्ते खड़कने लगे।  लेकिन सब कुछ खाली लग रहा था।  फीका और नीरस।  बिलकुल मरियल।  बिलकुल रंग विहीन। 

 

साढ़े सात बजे एक बूढ़ा आया।  चपरासी के सिवा कौन हो सकता है! मुझ से पूछा? कौन है? यहां क्यों खड़ा है! मैं क्या जवाब देता ! उसने मुझे मैदान से बाहर निकाल दिया।  मुझे यह भरोसा करना अच्छा लगा कि यदि पौने आठ तक रहने दिया होता तो शायद परागी आ भी जाती।

 

निकल कर समारोह में जुड़ गया।  लड़कियों का गरबा नृत्य चल रह था।  एक-एक चेहरा देख लिया।  कहीं परागी नहीं थी।  बाहर निकला तो वह दोस्त मिल गया।

 

"क्यों !  उसने पूछा? "खूब राह देखी न !  फिर उपहास के अंदाज़ में बोला, "कैसे आती! आज दोपहर को उस को मामा आ कर ले गए।"

 

फिर पता चला कि बड़ी साज़िश चल रही थी।  मामा ने अपने साले का लड़का उस के लिए तय किया था।  दिखाने ले गए थे।  सवाल एक ही कि बिलकुल यूं ही चली गई होगी! किसी तरह की हां- नहीं की होगी ! फिर मुझे ही दूकान में बैठे-बैठे पुनः विचार आया कि ये सारे सवाल ही बचकाना थे।  जिन का जवाब न कह 'ना' में ही आता था।  पहली बात तो यह कि हमें और उसे क्या प्रेम-ब्रेम था! बात-वात हुई थी! सगाई की बात जारी थी।  हुई नहीं थी? होने वाली थी।  यह बात अलग है।  रूबरू भी तो ज्यादा मिले नहीं थे।  मामले में था कुछ कि अंदर ही अंदर कुलबलाते रहें! यदि एकाध बार मिले होते तो भी बात व्यावहारिक लगती।

"कनक ! मुझसे अनायास कनक को पूछा गया? "उस नाटक वाले मामले के बाद तू मिला या नहीं कभी उससे !

"नहीं मिला? मिलूंगा कभी।"

 

मिल लिए अब ! न जाने वह 'कभी' कब आए ! किसे पता ! 'कभी' पचास साल के बाद भी आ सकता है।  दोस्त खबर लाया था कि परागी की सगाई हो गई।  सुना तब मैं जूनागढ़ के पार्सल की लिस्ट बना रहा था।  उसे पूरा किए बिना उठा नहीं जा सकता था।  पूरा करके पान खाने गया तभी पूरी बात सुनी।  सोडा पीने का मन न जाने क्यों हो आया।  सोडा अच्छी चीज़ है।  उस से मुंह का फीकापन दूर हो जाता है।  वह सब रास आ गया दो-तीन साल में।  अपनी भी सगाई हो गई।  ठाठ-बाट में पड़ गए।  नौकरी का नशा दिमाग पर सवार हो गया।  धंधा शुरू किया तो उसका और भी डबल स्ट्रांग नशा चढ़ा।  पांच साल-सात साल-दस साल-शादी? संसार और बच्चे।  पैसे पैदा किए - उसका भी नशा कुछ ऐसा-वैसा थोड़ी न रहता है ?

 

बीच-बीच में परागी के समाचार मिल जाते थे।  पति के साथ पटती नहीं थी।  पीटता था खूब उसे।  किस का दोष है ! उसने दूसरी बीवी की? यह समाचार भी किसी ने दिया।  उसका छोटा भाई मेरे पास वाली दूकान में गुमाश्तागीरी करता था।  उसी ने एक दफा बताया था कि बहन घर आ गई है और अब उसे वापस भेजना नहीं हैं।

 

उसी शाम मैं गुरूकुल के मैदान से छोटे रास्त पर मंदिर जा रहा था।  मैदान के फाटक में दाखिल होते ही दूर तक नज़र दौड़ गई।  यूं भी हर रोज़ पुराने आम के पेड़ से टकराने की एक अहमक आदत-सी पड़ गई थी।  उस दिन भी नज़र दौड़ा दी तो शाम के हलके धुंधलके में दूर से एक सफेद धब्बा-सा दिखाई दिया।  ज़रा दस-पंद्रह कदम पार किए तो दिखाई पड़ा कि कोई सफेद साड़ी में आम के तने के पास पीठ करके खड़ा था।  कमर के नीचे से फूली हुई कोई औरत है यह तो तुरंत समझ में आ गया था लेकिन परागी है यह तो बिलकुल पास जाने पर ही पता चला।  लंबे- काले बाल कहां गए!अरे ! एक छोटा-सा जूड़ा लटकता था।  साड़ी सफेद? लेकिन उतर कर गर्दन तक आ गई थी इसलिए मालूम पड़ा कि अच्छी-खासी सफेदी छंट गई थी बालों पर।  शरीर स्थूल।  न जाने क्यों? पगडंडी की ओर पीठ करके आम के ठूंठे तने को अपलक आंखों से देखती हुई खड़ी थी।  मानो उसके सामने खड़े हो कर उसका ध्यान धर रही हो।  मैंने गला खंखारा तो उसने चौंक कर पीछे देखा।  मुझे पहचान तो लिया होगा ऐसा लगता है? क्योंकि आंखों में ज़रा-सी ठंडी मुस्कान की फुसफुसाहट-सी हुई।  लेकिन वह तो एक ही पल।  फिर गंभीर हो गई।

 

किसी ने जंजीर खींच कर गाड़ी को रोक दिया हो यूं।  मैं भी रूक कर खड़ा रह गया।  बोलूं।  बोलूं? मन किया।  पर क्या बोलूं ! बोलने का सवाल ही कभी कहां पैदा हुआ था हमारे बीच ! 'कैसे हो' पूछना भी नसीब नहीं हुआ।  मुंह में शब्द बनते-बनते रह गया।  नज़रों में पहचान जगी और फिर व्यवहार बनते-बनते रह गई।  एक आध पल मैं रूका।  ज़रा-सा मुंह मुस्का दिया और कंपन-सा लगा।  तुरंत आगे निकल गया।  कोई पीछे से धक्का मारता चला रहा हो, इस कदर तेज़ी से मैं चलने लगा।  कोलाहल-कोलाहल-कोलाहल हो गया मन में।  लेकिन रूका नहीं।  समझता था कि वह सब व्यर्थ है।  मन व्यर्थ ही फुफुड़-फुफुड़ होता है।  जिस के साथ सिर्फ एक बार ही सगाई की बात चली थी  और एक बार 'कैसे हो?  का व्यवहार हुआ था उसके लिए भला इतना सारा कोलाहल ! चलते हुए बैल को आकर घोंचने का काम व्यापारी का नहीं।  कितने सुखी हैं हम।  घर-बार? धंधा? आबरू? नौकर-चाकर? घर सम्हाले ऐसी पत्नी? जब कहो तब कन्या देखने के लिए चल पड़े ऐसा लड़का।  माल-मिल्कियत क्या नहीं है अपने पास ! एक हरकारे की पेढ़ी में काम करते थे उसमें से यह सब बसाया।  कितना भोगा ! तब कहीं सफल हुए।  ज़िंदगी में सफल हुए।  कभी भी किसी चीज़ का गम अपने को रहा नहीं? डंक रहा नहीं।  फिर भी यह पुराने आम के ठूंठ के पास से निकलते समय खटका क्यों होता है? क्यों ! कोई कारण है भी ! डंक जैसा क्यों लगता है ! कारण ! यूं ही।

 

शीघ्रता से मंदिर में जा कर एक हाथ में टोपी उतारी,  ज़ोर से घंटा बजाया तो इतने ज़ोर से बजा कि सब विस्मय से देखते रह गए।  कानों में घंटी की कंपन हुई तो ज़ोर से आंखें बंद कर के भगवान की स्तुति में ओंठ फड़फड़ाने लगे।  फिर पीछे हारमोनियम ले कर भजन गाने के लिए बैठे हुए भगत से कहा,  "आप अपना चालू कीजिए।"  मैं कुछ कांप उठा था।  ऐसा हुआ था तब।

"कनक ! विचारों से बाहर निकल कर मैं ने कहा. "हम जब तुम्हारी उम्र के थे तो हमें भी किसी के साथ बात करना अच्छा लगता था। इसकी ना नहीं। लेकिन यूं पढ़ाई या धंधे की बलि दे कर तो कुछ भी नहीं समझे- मुझे लगता है? आजकल के लड़के उलटी खोपड़ी के होते हैं।  एक कान से सुन कर तत्काल दूसरे कान से निकाल दें।  कनक भी उन से अलग नहीं।  इतना-इतना कहने के बावजूद वह चालू गाड़ी में उस नोटबुक को निकाल कर पढ़ने लगा।  क्या कहना... जैसे ही उसने कॉपी खोली कि भीतर से तितली का कटा हुआ पंख नीचे सरक गया और हवा के  थपेड़े के साथ खिड़की से बाहर उड़ गया।  वह खड़ा हो गया और आंखें फाड़ फाड़ कर खिड़की से बाहर झांकने लगा।

न जाने क्या सूझा कि मैंने भी उठकर खिड़की से बाहर गर्दन निकाल कर देखा।  लेकिन सरपट भागती गाड़ी के बाहर उड़ जाने वाली पंख जैसी चीज़ यूं भला फिर से देखने को मिल सकती है... वह तो गई सो गई ही।  मैं भी लड़के के साथ लड़का हो गया सो देखने को मन हुआ।  वरना ऐसे कंपन की मैं भला परवाह क्यों करू....

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                                                                                                                                             कहानी समकालीन


                                                                                                                                           - विजय सत्पति


               मुसाफ़िर

इंजिन की तेज सीटी ने  मुझे नींद से उठा दिया ... मैंने उस इंजिन को कोसा; क्योकि मैं एक सपना देख रहा था.. उसका सपना !!!

ट्रेन , पता नहीं किस स्टेशन से गुजर रही थी, मैंने अपने थके हुए बुढे शरीर को खिड़की वाली सीट पर संभाला ; मुझे ट्रेन की खिड़की से बाहर देखना अच्छा लगता था !

बड़े ध्यान से मैंने अपनी गठरी को टटोला ,वक़्त ने उस पर धुल के रंगों को ओढा दिया था .... उसमे ज्यादातर जगह ;मेरे अपने दुःख और तन्हाई ने घेर रखी थी और कुछ अपनी - परायी यादे भी थी ; और हाँ एक फटी सी तस्वीर भी तो थी ; जो उसकी तस्वीर थी !!!

बड़ी देर से मैं इस ट्रेन में बैठा था, सफ़र था की कट ही नहीं रहा था, ज़िन्दगी की बीती बातो ने कुछ इस कदर उदास कर दिया था की, समझ ही नहीं पा रहा था की मैं अब कहाँ जाऊं..

सामने बैठा एक आदमी ने पुछा, “बाबा , कहाँ जाना है ?” बेख्याली में मेरे होंठो ने कहा ; “होशियारपुर !!!”  कुछ शहर ज़िन्दगी भर के लिए; मन पर छप जाते है , अपने हो जाते है ..! होशियारपुर भी कुछ ऐसा ही शहर था ये मेरा शहर नहीं था , ये उसका शहर था;
क्योंकि, यही पहली बार मिला था मैं उससे !


आदमी हंस कर बोला , “बाबा , आप तो मेरे शहर को हो ...मैं भी होशियारपुर का बन्दा हूँ”  “बाबा, वहां कौन है आपका ?” दमी के इस सवाल ने मुझे फिर इसी ट्रेन में ला दिया
जिसके सफ़र ने मुझे बहुत थका दिया था   मैंने कहा .. “कोई है अपना  ....जिससे मिले बरसो बीत गए ...”   उसी से मिलने जा रहा हूँ .. बहुत बरस पहले अलग हुआ था उससे
तब उसने कहा था की कुछ बन के दिखा  तो तेरे संग ब्याह करूँ… तेरे घर का चूल्हा जलाऊं !!   “मैंने कुछ बनने के लिए शहर छोड़ दिया  पर अब तक ……. कुछ बन नहीं पाया  बस; सांस छुटने के पहले.. एक आखरी बार उससे मिलना चाहता हूँ !!!”

आदमी एक दर्द को चेहरे पर लेकर चुप हो गया  मैंने खिड़की से बाहर झाँका ...
पेड़, पर्वत, पानी से भरे गड्डे, नदी, नाले, तालाब ; झोपडियां , आदमी , औरत , बच्चे
सब के सब पीछे छूटे जा रहे थे.  भागती हुई दुनिया ......भागती हुई ज़िन्दगी
और भागती हुई ट्रेन के साथ मेरी यादे...

किस कदर एक एक स्टेशन छुटे जा रहे थे , जैसे उम्र के पड़ाव पीछे छुट गए थे
कितने दोस्त और रिश्तेदार मिले , जो कुछ देर साथ चले और फिर बिछड गए
लेकिन वो कभी भी मुझसे अलग नहीं हुई.. अपनी यादो के साथ वो मेरे संग थी
क्योंकि, उसने कहा था ; “तेरा इन्तजार करुँगी करतारे  जल्दी ही आना” ;

आदमी बोला , “फगवारा गया है अभी जल्दी ही जालंधर आयेगा , फिर आपका होशियारपुर !!!”

मेरा होशियारपुर ..!!! मैंने एक आह भरी हाँ , मेरा हो सकता था ये शहर .. लेकिन क्या शहर कभी किसी के हो सकते है, नहीं , पर बन्दे जरुर शहर के हो सकते है. जैसे वो थी ......इस शहर की मैंने अपने आप से मुस्कराते हुए कहा, “अगर वो न होती तो मेरे लिए ये शहर ही नहीं होता !” 

आदमी को जवाब देने के लिए; जो ,मैंने कहीं पढ़ा था ; कह दिया कि.. “दुनिया एक मुसाफ़िरखाना है , अपनी अपनी बोलियों बोलकर सब उड़ जायेंगे !!!”


जालन्धर पर गाडी बड़ी देर रुकी रही , आदमी ने मेरे लिए पानी और चाय लाया
रिश्ते कब ,कहाँ और कैसे बन जाते है , मैं आज तक नहीं समझ पाया

जैसे ही ट्रेन चल पढ़ी , अब मेरी आँखों में चमक आ गयी थी मेरा स्टेशन जो आने वाला था

आदमी ने धीरे से , मुझसे पुछा “बहुत प्यार करते थे उससे”

मैंने कहीं बहुत दूर ……बहुत बरस पहले ; डूबते हुए सूरज के साथ , झिलमिल तारो के साथ , छिटकती चांदनी के साथ , गिद्धा की थाप के साथ, सरसों के लहलहाते खेतो में झाँककर कहा “हाँ .. मैं उससे बहुत प्यार करता था.. वो बहुत खूबसूरत थी ….. सरसों के खेतो में उड़ती हुई उसकी चुनरी और उसका खिलखिलाकर हँसना ... बैशाखी की रात में उसने वादा किया था  की वो मेरा इन्तजार करेंगी  मुझे यकीन है कि ; वो मेरा इन्तजार कर रही होंगी अब तक ; बड़े अकेले जीवन काटा है मैंने अब उसके साथ ही जीना है ;
और उसके साथ ही मरना है”

नसराला स्टेशन पीछे छुटा  तो , मैंने एक गहरी सांस ली और मैंने अपनी गठरी संभाली
एक बार उसकी तस्वीर को देखा  अचानक आदमी ने झुककर ; तस्वीर को बड़े गौर से देखा फिर मेरी तरफ देखा  और फिर मुझसे धीरे से कहा , “इसका नाम संतो था क्या ...”

मैंने ख़ुशी से उससे पुछा “तुम जानते हो उसे” , आदमी ने तस्वीर देख कर कहा
“ये ……............................................... ……….ये तो कई बरस पहले ही पागल होकर मर गयी किसी करतारे के प्यार में पागल थी.. हमारे मोहल्ले में ही रहती थी .................”

फिर मुझे कुछ सुनाई नहीं पड़ा  ट्रेन धीमे हो रही थी …. कोई स्टेशन आ रहा था शायद..
मुझे कुछ दिखाई भी नहीं दे रहा था  शायद बहते हुए आंसू इसके कारण थे गला रुंध गया था …सांस अटकने लगी थी  धीरे धीरे सिसकते हुए ट्रेन रुक गयी.

एक दर्द सा दिल में आया  फिर मेरी आँख बंद हो गयी  जब आँख खुली तो देखा ; डिब्बे के दरवाजे पर संतो खड़ी थी  मुस्कराते हुए मुझसे कहा चल करतारे , चल , वाहे गुरु के घर चलते है !!  मैं उठ कर संतो का हाथ पकड़ कर वाहे गुरु के घर की ओर चल पड़ा...

पीछे मुड़कर देखा तो मैं गिर पड़ा था  और वो आदमी मुझे उठा रहा था
मेरी गठरी खुल गयी थी  और मेरा हाथ  संतो की तस्वीर पर था
डिब्बे के बाहर देखा ;  तो स्टेशन का नाम था ….. ……..होशियारपुर !!!
मेरा स्टेशन आ गया था !!!

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                                                                                                                                                          कहानी धरोहर


                                                                                                                                             -चंद्रधर शर्मा गुलेरी


         उसने कहा था

बड़े-बडे शहरो के इक्के-गाडी वालो की जबान के कोड़ो से जिनकी पीठ छिल गई हैं और कान पक गए हैं , उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बू कार्ट वालो की बोली का मरहम लगावे । जबकि बड़े शहरो की चौड़ी सड़को पर घोडे की पीठ के चाबुक से धुनते हुए

इक्के वाले कभी धोडे की नानी से अपना निकट यौन संबंध स्थिर करते है, कभी उसके गुप्त गुह्य अंगो से डाक्टर को लजाने वाला परिचय

दिखाते है, कभी राह चलते पैदलो की आँखो के न होने पर तरस खाते हैं , कभी उनके पैरो की अंगुलियों के पोरो की चींथकर अपने ही को

सताया हुआ बताते हैं और संसार भर की ग्लानि और क्षोभ के अवतार बने नाक की सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर मे उनकी बिरादरी

वाले तंग चक्करदार गलियो मे हर एक लडढी वाले लिए ठहर कर सब्र का समुद्र उमड़ा कर , 'बचो खालसाजी', 'हटो भाईजी', 'ठहरना

भाई', 'आने दो लालाजी', 'हटो बाछा' , कहते हुए सफेद फेटो , खच्चरो और बतको, गन्ने और खोमचे और भारे वालो के जंगल से राह

खेते हैं । क्या मजाल हैं कि जी और साहब बिना सुने किसी को हटना पड़े । यह बात नही कि उनकी जीभ चलती ही नही, चलती हैं पर

मीठी छुरी की तरह महीन मार करती हुई । यदि कोई बुढिया बार-बार चिटौनी देने पर भी लीक से नही हटती तो उनकी बचनावली के ये

नमूने हैं -- हट जा जीणे जोगिए, हट जा करमाँ वालिए, हट जा , पुत्तां प्यारिए. बच जा स लम्बी वालिए । समष्टि मे इसका अर्थ हैं कि

तू जीने योग्य है, तू भाग्योवाली है, पुत्रो को प्यारी हैं, लम्बी उमर तेरे सामने है, तू क्यो मेरे पहियो के नीचे आना चाहती हैं ? बच जा ।

ऐसे बम्बू कार्ट वालो के बीच मे होकर एक लडका और एक लडकी चौक की दुकान पर आ मिले । उसके बालो और इसके ठीले सुथने से

जान पडता था कि दोनो सिख हैं । वह अपने मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था और यह रसोई के लिए बड़ियाँ । दुकानदार

एक परदेशी से गुथ रहा था, जो सेर भर गीले पापड़ो की गड्डी गिने बिना हटता न था ।

'तेरा घर कहाँ हैं ?'

'मगरे मे - और तेरा?'

'माँझे मे, यहाँ कहाँ रहती हैं?'

'अतरसिंह की बैठक मे, वह मेरे मामा होते हैं ।'

'मैं भी मामा के आया हूँ, उनका घर गुरु बजार मे हैं ।'

इतने मे दुकानदार निबटा और इनका सौदा देने लगा । सौदा लेकर दोनो साथ-साथ चले । कुछ दूर जाकर लड़के ने मुसकरा कर पूछा --

'तेरी कुडमाई हो गई ?' इस पर लड़की कुछ आँखे चढाकर 'धत्' कहकर दौड गई और लड़का मुँह देखता रह गया ।

दूसरे तीसरे दिन सब्जी वाले के यहाँ, या दूध वाले के यहाँ अकस्मात् दोनो मिल जाते । महीना भर यही हाल रहा । दो-तीन बार लड़के ने

फिर पूछा, 'तेरे कुडमाई हो गई?' और उत्तर में वही 'धत्' मिला । एक दिन जब फिर लडके ने वैसी ही हँसी मे चिढाने के लिए पूछा तो

लड़की लड़के की संभावना के विरुद्ध बोली ,'हाँ, हो गयी ।'

'कब?'

'कल, देखते नही यह रेशम से कढा हुआ सालू ।' लड़की भाग गई ।

लड़के ने घर की सीध ली । रास्ते मे एक लडके को मोरी मे ढकेल दिया, एक छावडी वाले की दिन भर की कमाई खोई, एक कुत्ते को

पत्थर मारा और गोभी वाले ठेले मे दूध उंडेल दिया । सामने नहा कर आती हुई किसी वैष्णवी से टकरा कर अन्धे की उपाधि पाई । तब

कहीं घर पहुँचा

4


'होश मे आओ। कयामत आयी हैं और लपटन साहब की वर्दी पहन कर आयी हैं ।'

'क्या?'

'लपचन साहब या तो मारे गये हैं या कैद हो गये हैं । उनकी वर्दी पहन कर कोई जर्मन आया हैं । सूबेदार मे इसका मुँह नही देखा । मैने

देखा हैं , और बाते की हैं । सौहरा साफ उर्दू बोलता हैं , पर किताबी उर्दू । और मुझे पीने की सिगरेट दिया हैं ।'

'तो अब?'

'अब मारे गये । धोखा हैं । सूबेदार कीचड़ मे चक्कर काटते फिरेंगे और यहाँ खाई पर धावा होगा उधर उनपर खुले मे धावा होगा । उठो , एक काम करो । पलटन मे पैरो के निशान देखते देखते दौड़ जाओ । अभी बहुत दूर न गये होगे । सूबेदार से कहो कि एकदम लौट आवें। खंदक की बात झूठ हैं । चले जाओ, खंदक के पीछे से ही निकल जाओ । पत्ता तक न खुड़के। देर मत करो ।'

'हुकुम तो यह है कि यहीं ---'

'ऐसी तैसी हुकुम की ! मेरा हुकुम है - जमादार लहनासिंह जो इस वक्त यहाँ सबसे बड़ा अफसर हैं , उसका हुकुम हैं । मैं लपटन साहब की खबर लेता हूँ ।'

'पर यहाँ तो तुम आठ ही हो ।'

'आठ नही, दस लाख। एक एक अकालिया सिख सवा लाख के बराबर होता हैं । चले जाओ ।'

लौटकर खाई के मुहाने पर लहनासिंह दीवार से चिपक गया । उसने देखा कि लपटन साहब ने जेब से बेल के बराबर तीन गोले निकाले ।

तीनो को जगह-जगह खंदक की दीवारो मे घुसेड़ दिया और तीनो मे एक तार सा बाँध दिया । तार के आगे सूत की गुत्थी थी, जिसे सिगड़ी के पास रखा । बाहर की तरफ जाकर एक दियासलाई जलाकर गुत्थी रखने ---

बिजली की तरह दोनो हाथो से उलटी बन्दूक को उठाकर लहनासिंह ने साहब की कुहली पर तानकर दे मारा । धमाके के साथ साहब के हाथ से दियासलाई गिर पड़ी । लहनासिंह ने एक कुन्दा साहब की गर्दन पर मारा और साहब 'आँख! मीन गाट्ट' कहते हुए चित हो गये ।

लहनासिंह ने तीनो गोले बीनकर खंदक के बाहर फेंके और साहब को घसीटकर सिगड़ी के पास लिटाया । जेबो की तलाशी ली । तीन-चार लिफाफे और एक डायरी निकाल कर उन्हे अपनी जेब के हवाले किया ।

साहब की मूर्च्छा हटी । लहना सिह हँसकर बोला -- 'क्यो, लपटन साहब , मिजाज कैसा हैं ? आज मैने बहुत बाते सीखी । यह सीखा कि सिख सिगरेट पीते हैं । यह सीखा कि जगाधरी के जिले मे नीलगाये होती हैं और उनके दो फुट चार इंच के सींग होते है । यह सीखा कि मुसलमान खानसामा मूर्तियो पर जल चढाते है और लपटन साहब खोते पर चढते हैं । पर यह तो कहो, ऐसी साफ़ उर्दू कहाँ से सीख आये? हमारे लपटन , साहब तो बिना 'डैम' के पाँच लफ़्ज भी नही बोला करते थे ।'

लहनासिंह ने पतलून की जेबो की तलाशी नही ली थी । साहब ने मानो जाड़े से बचने के लिए दोनो हाथ जेबो मे डाले ।

लहनासिंह कहता गया -- 'चालाक तो बड़े हो, पर माँझे का लहना इतने बरस लपटन साहब के साथ रहा हैं । उसे चकमा देने के लिए चार

आँखे चाहिए । तीन महीने हुए एक तुरकी मौलवी मेरे गाँव मे आया था । औरतो को बच्चे होने का ताबीज बाँटता था और बच्चो को दवाई देता था । चौधरी के बड़ के नीचे मंजा बिछाकर हुक्का पीता रहता था और कहता था कि जर्मनी वाले बड़े पंडित हैं । वेद पढ़ पढ़ कर उसमे से विमान चलाने की विद्या जान गये हैं । गौ को नही मारते । हिन्दुस्तान मे आ जायेंगे तो गोहत्या बन्द कर देगे । मंडी के बनियो को बहकाता था कि डाकखाने से रुपये निकाल लो, सरकार का राज्य जाने वाला है । डाक बाबू पोल्हू राम भी डर गया था । मैने मुल्ला की दाढी मूँड़ दी थी और गाँव से बाहर निकालकर कहा था कि जो मेरे गाँव मे अब पैर रखा तो --'

साहब की जेब मे से पिस्तौल चला और लहना की जाँध मे गोली लगी। इधर लहना की हेनरी मार्टिन के दो फ़ायरो ने साहब की कपाल-क्रिया कर दी ।


धडाका सुनकर सब दौड आये ।

बोधा चिल्लाया -- 'क्या है ?'

लहनासिंह मे उसे तो यह कह कर सुला दिया कि 'एक हडका कुत्ता आया था , मार दिया' और औरो से सब हाल कह दिया । बंदूके लेकर सब तैयार हो गये । लहना ने साफा फाड़कर घाव के दोनो तरफ पट्टियाँ कसकर बाँधी । घाव माँस मे ही था । पट्टियो के कसने से लूह बन्द हो गया ।

इतने मे सत्तर जर्मन चिल्लाकर खाई मे घुस पड़े । सिखो की बंदूको की बाढ ने पहले धावे को रोका । दूसरे को रोका । पर यहाँ थे आठ (लहना सिंह तक तककर मार रहा था -- वह खड़ा था औऱ लेटे हुए थे ) और वे सत्तर । अपने मुर्दा भाईयो के शरीर पर चढकर जर्मन आगे घुसे आते थे । थोड़े मिनटो से वे ---

अचानक आवाज आयी -- 'वाह गुरुजी का फतह ! वाहगुरु दी का खालसा!' और धड़ाधड़ बंदूको के फायर जर्मनो की पीठ पर पड़ने लगे ।

ऐन मौके पर जर्मन दो चक्को के पाटो के बीच मे आ गये । पीछे से सूबेदार हजारासिंह के जवान आग बरसाते थे और सामने से

लहनासिंह के साथियो के संगीन चल रहे थे । पास आने पर पीछे वालो ने भी संगीन पिरोना शुरु कर दिया ।

एक किलकारी और -- 'अकाल सिक्खाँ दी फौज आयी । वाह गुरु जी दी फतह ! वाह गुरु जी दी खालसा ! सत्त सिरी अकाल पुरुष! ' और लड़ाई खतम हो गई । तिरसठ जर्मन या तो खेत रहे थे या कराह रहे थे । सिक्खो में पन्द्रह के प्राण गए । सूबेदार के दाहिने कन्धे मे से गोली आर पार निकल गयी । लहनासिंह की पसली मे एक गोली लगी । उसने घाव को खंदक की गीली मिट्टी से पूर लिया । और बाकी का साफा कसकर कमर बन्द की तरह लपेट लिया । किसी को खबर नही हुई कि लहना के दूसरा घाव -- भारी घाव -- लगा हैं ।

लड़ाई के समय चाँद निकल आया था । ऐसा चाँद जिसके प्रकाश से संस्कृत कवियो का दिया हुआ 'क्षयी' नाम सार्थक होता है । और हवा ऐसी चल रही थी जैसी कि बाणभट्ट की भाषा मे 'दंतवीणो पदेशाचार्य' कहलाती । वजीरासिंह कह रहा था कि कैसे मन-मनभर फ्रांस की भूमि मेरे बूटो से चिपक रही थी जब मैं दौडा दौडा सूबेदार के पीछे गया था । सूबेदार लहनासिह से सारा हाल सुन और कागजात पाकर

उसकी तुरन्त बुद्धि को सराह रहे थे और कर रहे थे कि तू न होता तो आज सब मारे जाते ।

इस लड़ाई की आवाज तीन मील दाहिनी ओर की खाईवालो ने सुन ली थी । उन्होने पीछे टेलिफोन कर दिया था । वहाँ से झटपट दो डाक्टर और दो बीमार ढोने की गाड़ियाँ चली , जो कोई डेढ घंटे के अन्दर अन्दर आ पहुँची । फील्ड अस्पताल नजदीक था । सुबह होते होते वहाँ पहुँच जायेगे , इसलिए मामूली पट्टी बाँधकर एक गाडी मे घायल लिटाये गये और दूसरी मे लाशे रखी गयी । सूबेदार ने लहनासिह की जाँध मे पट्टी बँधवानी चाही । बोधसिंह ज्वर से बर्रा रहा था । पर उसने यह कह कर टाल दिया कि थोडा घाव है, सवेरे देखा जायेगा । वह गाडी मे लिटाया गया । लहना को छोडकर सूबेदार जाते नही थे । यह देख लहना ने कहा -- तुम्हे बोधा की कसम हैं
और सूबेदारनी जी की सौगन्द हैं तो इस गाजी मे न चले जाओ ।

'और तुम?'

'मेरे लिए वहाँ पहुँचकर गाडी भेज देना । और जर्मन मुर्दो के लिए भी तो गाड़ियाँ आती होगी । मेरा हाल बुरा नही हैं । देखते नही मैं खड़ा हूँ ? वजीरालसिंह मेरे पास है ही।'

'अच्छा, पर --'

'बोधा गाडी पर लेट गया ।भला आप भी चढ आओ । सुनिए तो , सुबेदारनी होराँ को चिट्ठी लिखो तो मेरा मत्था टेकना लिख देना ।

और जब घर जाओ तो कह देना कि मुझसे जो उन्होने कहा था, वह मैने कर दिया ।'

गाडियाँ चल पड़ी थी। सूबेदार ने चढते-चढते लहना का हाथ पकडकर कहा -- तूने मेरे और बोधा के प्राण बचाये हैं । लिखना कैसा ?

साथ ही घर चलेंगे । अपनी सूबेदारनी से तू ही कह देना । उसने क्या कहा था ?

'अब आप गाड़ी पर चढ जाओ । मैने जो कहा वह लिख देना और कह भी देना ।'

गाडी के जाते ही लहना लेट गया । 'वजीरा, पानी पिला दे और मेरा कमरबन्द खोल दे । तर हो रहा हैं ।'

5

मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ हो जाती है । जन्मभर की घटनाएँ एक-एक करके सामने आती हैं । सारे दृश्यो के रंग साफ होते है, समय की धुन्ध बिल्कुल उनपर से हट जाती हैं ।

लहनासिंह बारह वर्ष का हैं । अमृतसर मे मामा के यहाँ आया हुआ हैं । दहीवाले के यहाँ, सब्जीवाले के यहाँ, हर कहीं उसे आठ साल की लड़की मिल जाती हैं । जब वह पूछता है कि तेरी कुड़माई हो गई ? तब वह 'घत्' कहकर भाग जाती हैं । एक दिन उसने वैसे ही पूछा तो उसने कहा-- 'हाँ, कल हो गयी , देखते नही, यह रेशम के फूलों वाला सालू? ' यह सुनते ही लहनासिंह को दुःख हुआ । क्रोध हुआ । क्यों हुआ ?

'वजीरासिंह पानी पिला दे ।'


पचीस वर्ष बीत गये । अब लहनासिंह नं. 77 राइफल्स मे जमादार हो गया हैं । उस आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा, न मालूम वह कभी मिली थी या नही । सात दिन की छुट्टी लेकर जमीन के मुकदमे की पैरवी करने वह घर गया । वहाँ रेजीमेंट के अफ़सर की चिट्ठी मिली । फौरन चले आओ । साथ ही सूबेदार हजारासिंह की चिट्ठी मिली कि मैं और बोधासिंह भी लाम पर जाते हैं , लौटते हुए हमारे घर होते आना । साथ चलेंगे ।

सूबेदार का घर रास्ते में पड़ता था और सूबेदार उसे बहुत चाहता था । लहनासिंह सूबेदार के यहाँ पहुँचा।

जब चलने लगे तब सूबेदार बेडे मे निकल कर आया । बोला -- 'लहनासिंह, सूबेदारनी तुमको जानती हैं । बुलाती हैं । जा मिल आ ।' लहनासिंह भीतर पहुँचा । सूबेदारनी मूझे जानती हैं ? कब से ? रेजीमेंट के क्वार्टरों मे तो कभी सूबेदार का घर के लोग रहे नही । दरवाजे

पर जाकर 'मत्था टेकना' कहा । असीम सुनी । लहनासिंह चुप।

'मुझे पहचाना ?'

'नहीं ।'

'तेरी कुडमाई हो गयी ? --- घत् -- कल हो गयी -- देखते नही, रेशमी बूटो वाला सालू -- अमृतसर में --'

भावो की टकराहट से मूर्च्छा खुली । करवट बदली । पसली का घाव बह निकला ।

'वजीरासिंह, पानी पिला' -- उसने कहा था ।

स्वप्न चल रहा हैं । सूबेदारनी कह रही है -- 'मैने तेरे को आते ही पहचान लिया । एक काम कहती हूँ । मेरे तो भाग फूट गये । सरकार ने बहादुरी का खिताब दिया हैं , लायलपुर मे जमीन दी हैं , आज नमकहलाली का मौका आया हैं । पर सरकार ने हम तीमियो की एक घँघरिया पलटन क्यो न बना दी जो मै भी सूबेदारजी के साथ चली जाती ? एक बेटा हैं । फौज मे भरती हुए उसे एक ही वर्ष हुआ ।

उसके पीछे चार और हुए , पर एक भी नही जिया ।' सूबेदारनी रोने लगी --'अब दोनो जाते हैं । मेरे भाग! तुम्हे याद हैं, एक दिन टाँगे वाले का घोड़ा दहीवाले की दुकान के पास बिगड गया था । तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाये थे । आप घोड़ो की लातो पर चले गये थे । और मुझे उठाकर दुकान के तख्त के पास खड़ा कर दिया था । ऐसे ही इन दोनो को बचाना । यह मेरी भिक्षा हैं । तुम्हारे आगे मैं आँचल पसारती हूँ ।'

रोती-रोती सूबेदारनी ओबरी मे चली गयी । लहनासिंह भी आँसू पोछता हुआ बाहर आया ।

'वजीरासिंह, पानी पिला' -- उसने कहा था ।

लहना का सिर अपनी गोद मे रखे वजीरासिंह बैठा हैं । जब माँगता हैं, तब पानी पिला देता है । आध घंटे तक लहना फिर चुप रहा , फिर बोला -- 'कौन ? कीरतसिंह?'

वजीरा ने कुछ समझकर कहा -- हाँ ।

भइया, मुझे और ऊँचा कर ले । अपने पट्ट पर मेरा सिर रख ले ।'

वजीरा ने वैसा ही किया ।

'हाँ, अब ठीक हैं । पानी पिला दे । बस । अब के हाड़ मे यह आम खूब फलेगा । चाचा-भतीजा दोने यहीँ बैठकर आम खाना । जितना बड़ा तेरा भतीजा हैं उतना ही बड़ा यह आम जिस महीने उसका जन्म हुआ था उसी महीने मैने इसे लगाया था ।'                                                                                                                         वजीरासिंह के आँसू टप टप टपक रहे थे ।

कुछ दिन पीछे लोगो ने अखबारो में पढ़ा --

फ्रांस और बेलजियम -- 67वीं सूची -- मैदान मे घावो से मरा -- न. 77 सिख राइफल्स जमादार लहनासिंह ।

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                                                                                                                                                        दो लघुकथाएँ


                                                                                                                                                     -  शैल अग्रवाल


       प्यार

उसने कहा, ' प्यार एक पहेली है ।'                                                                                                                                   ' नहीं, प्यार समर्पण है। प्यार विश्वास है। जीवन की आँख है। असली संदर्भ-कोष है, जैसे रौशनी की एक किरण फूटी और कोने-कोने का अंधेरा मिटा आई। '                                                                  '  पर क्या कभी तुमने  दोबारा देखा है उस पराजित अंधेरे को  ? एक क्रूर विद्रूप हंसी फैल गई है उसके होठों पर । ' 'इतनी हिम्मत एक नन्ही किरण की, इतना दुस्साहस – देख लूँगा इसे भी, मैं ..  '   गुस्से में यही तो दोहराता है।'             

'  इसमें पहेली वाली कौनसी बात है । यह तो बस लड़ाई है अपने-अपने हक की । '

वह एकबार फिर उसकी तरफ प्यार से देखकर मुस्कुरा रही थी।


 '  अच्छा। ऐसे तो मैंने कभी सोचा ही नहीं था।  ' 


अब वह बहुत शांत और संतुष्ट दिख रहा था और सारी परेशानियों को भूल , एक  खुशनुमा धुन फिरसे गूंजने लगी थी उनके चारो तरफ ।









          परछांई

खुश थे दोनों; वह और उसकी परछांई। जब भी उदास अंधेरा घेरता , मात्र रोशोनी की एक किरन के सहारे भी, तुरंत ही आ बैठती परछांई उसके पास। वह आंगन में, तो वह मुंडेर पर। धूप के खुशनुमा टुकड़े की तरह कोने कोने से छनती, कभी आँखों में, तो कभी होठों पर एक संतुष्ट मुस्कान बनी देखती रहती उसे।

सपने और गीत सा साथ था वह । लोगों ने देखा और कहा, निकम्मे और नासमझ है, वे । ऐसे तो जीवन नहीं बीतेगा रात-दिन बस यूँ ही हंसते-गुनगुनाते, एक दूसरे में खोए-खोए। दूर कर दिया दोनों को। अब अंधेरा ही अंधेरा था चारो तरफ। न वह था और न ही उसकी परछांई। ढूँढते और भटकते रहे दोनों। अचानक एकदिन एक मोड़ पर परछांई मिल ही गई उसे,  उसी की तरह  गुमसुम और उदास।

'कहाँ चली गई थीं तुम मुझे यूँ अकेला छोड़कर? बोलो, क्या खुश रह पाईं मेरे बिना ? ' वह और दुखी था, कितनी मुरझाई और मलिन लग रही थी सदा हंसती-खेलती उसकी परछांई!

परछांई ने सहज भाव से कहा, ' खुशी और उदासी मैं क्या जानूँ , मैं तो बस तुम्हारी अपनी परछांई हूँ।'


उसकी आंखें भर आईँ। आगे बढ़कर परछाँई को बांहों में भर लेना चाहा उसने । पर आगे बढ़ते ही एकबार फिर सामने वहाँ कोई नहीं था।


तब पहली बार समझ में आया- उसके अपने अंदर ही तो रहती है...उसकी परछांई...

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                                                                                                                                                 लोककथा


                                                                                                                                       पुनर्लेखनः अनिता रश्मि


बालमइत रानी
( नागपुरी लोककथा)

एक छोटा सा शहर। उसमें एक राजा अपनी दो बेटियों के साथ निवास करते थे। बड़ी का नाम था धनमइत और छोटी का बालमइत! वे दोनों काफी सुन्दर और गुणी थीं। पर छोटी अत्यधिक सुंदर थी। उनके सुनहले बाल सबको आकर्षित कर लेते. 

 
एक दिन दोनों बहनों ने नदी में स्नान करने का मन बनाया। नहाते हुए बालमइत का एक केश उखड़ गया। उसने इधर-उधर देखा. पानी में बहता हुआ एक बेल आ रहा था।  उसने लपककर बेल को थाम लिया और केश को गोल-गोल लपेटकर बेल में भरकर बहा दिया।

 
उसी नदी में नीचे के घाट पर एक राजकुमार और उसके साथी नहा रहे थे। उसने साथियों को कहकर बेल को मंगा लिया। बेल में एक सुनहला बाल देखकर राजकुमार कल्पना में डूब गया. जिस लड़की का केश इतना सुंदर है, वह जरूर बहुत सुंदर होगी। मैं ब्याह करूंगा, तो इसी सुंदर केशवाली से।

 राजकुमार ने घर आते ही खटवास-पटवास ले लिया। खाना-पीना छोड़कर बस बालमइत के धियान में रहने लगा।  सब पूछते रह गए, उन्होंने किसी को कुछ नहीं बताया। अंत में एक बुढि़या को राजकुमार का रोग पता लगाने का जिम्मा दिया गया।  उसने अपनी पारखी आंखों से राजकुमार के रोग के बारे में पता लगाकर राजा-रानी को बता दिया।  राजा और रानी उस लंबे सुनहले केशवाली लड़की से राजकुमार का ब्याह करने के लिए राजी तो हो गए, पर अइब उसे ढूँढे कहां?

   बुढि़या पता लगाने निकली. उसने काफी ढूँढा।  अंत में दोनों बहनों के बारे में उसे पता लग गया। उसने बालमइत से भेंट की। उसके सुनहले केशों को देखकर समझ गर्इ, इसी का बाल राजकुमार को मिला था।  उसने राजकुमारी को राजकुमार की सिथति के बारे में बताया।  उसे राजकुमार की तस्वीर भी दी। बालमइत यह जानकर खुष हुर्इ कि वह राजकुमार उससे शादी करना चाहता है। उसने अपने माता-पिता से अपनी इच्छा कही।  वे दोनों भी सहमत हो गए।

 
शादी की तारीख पक्की हो गर्इ। सही समय में बारात पहुंची।  धनमइत ने जैसे ही राजकुमार को देखा, उसके मन में राजकुमार बस गया। अब उसका मन उससे ब्याह करने का होने लगा। उसने र्इर्शावश बालमइत के केशों में नाग को गुंथवाकर वेणी बनवा दी। बालमइत को नाग ने डंस लिया। विवाह के समय बेहोश बालमइत को उठाया गया। उठाए जाने पर उसने लड़खडाते हुए धनमइत के द्वारा नाग से कटवाए जाने की बात राजा को बता दी और मर गर्इ।

 
राजकुमार का मन कांप उठा। वह राकुमारी के प्रेम में वह पागल था।  उसने बालमइत का दाह संस्कार कर दिया तथा चिता की राख को साथ लेता आया।  उसकी उदासी दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ने लगी।

 


वह जहां सोता था, वहां उसके नहीं रहने पर सब कुछ व्यवसिथत रहता. उसे आष्चर्य होता कि उसकी कोठरी में कौन आता है? सब कुछ इतना सुंदर ढंग से कौन सजाता है? उसने सच्ची बात पता लगानी चाही.। उस दिन जान-बूझकर उसने सब अस्त-व्यस्त कर दिया। फिर बाहर निकल एक किनारे जाकर छिप गया। 

 
उसने देखा,  घड़े में रखे राख से बालमइत राजकुमारी निकली और पूरा कमरा व्यवसिथत करने लगी। राजकुमार को खूब आष्चर्य हुआ. वह धीरे-धीरे अंदर घुसा और बालमइत राजकुमारी को पकड़ लिया। राजकुमारी बार-बार छोड़ने का जिदद करने लगी। 

 
नहीं! हाम तुमको नय छोड़ेंगे.- राजकुमार ने कहा.

 
बालमइत जिदद करती रही. 

 
-नहीं! जिदद मत करो. हाम तुम्हारे बिना नय रह सकते हैं. बहुत मुश्किल से तुम्हें पाए हैं.। अब तो जीवनभर साथ रहेंगे।

 
बालमइत राजी हो गर्इ और दुबारा राखवाले घड़े में नहीं गर्इ। इस प्रकार उनका सच्चा प्यार जीत गया.।   अपने पुनर्मिलन के बाद वे दोनों सुखपूर्वक दिन बिताने लगे।








शंख और कोइल नदी की उत्पति

एक गांव में दो बहनें थीं. एक का नाम शंख, दूसरे का कोइल था। वे दोनों बहनें खजूर के पत्ते के समान एक थीं। बड़ी होने पर दोनों का विवाह जयपुर और नागपुर नामक स्थान में क्रमशः: हुआ था। अब वे जितिया के पत्तों के समान अलग-अलग होकर दूर-दूर उड़ गर्इं थीं। दोनों को एक-दूसरे तथा मायके की याद खूब आती।  पुराने दिन भुलाए नहीं भूलते। एक-दूसरे से वे मिलने के लिए छटपटा रहीं थीं।

 वहां पास में एक बाजार लगता था. दोनों ने वहां जाकर मिलने का मन बनाया। मायके जाने के लिए भी वे लालायित थीं। उनलोगों ने दिन, स्थान, समय तय किया और बाजार में मिलीं।  वहीं उन दोनों ने मायके जाने की योजना बनार्इ। नैहर जाने का दिन और स्थान तय किया। घर के लोगों को पता नहीं लगे, इसके लिए उन्होंने सांप का रूप धारण कर वहां जाना चाहा।  ससुरालवालों की मर्जी के बिना मायका जाने के लिए यह रूप परिवर्तन आवष्यक था।

 वे नाग-नागिन बनकर अपने-अपने घर से नियत समय पर निकलीं। दोनों ने तय किया था कि किसी भी परिसिथति में वे पीछे मुड़कर नहीं देखेंगी।

  कुछ दूर जाते ही अकेले चलती शंख को शक हुआ, कोर्इ पीछा तो नहीं कर रहा है। थोड़ी देर तो वह तेज-तेज चलती रही। फिर पीछे मुड़कर देखने लगी। उसी समय उसकी आंख में एक तिनका उड़कर पड़ गया।  दर्द से वह बेहाल हो उठी। वह ठीक से रास्ते को देख नहीं पा रही थी। फिर भी चलती रही। सही जगह पर कोइल उसका इंतज़ार कर रही थी।


दोनों मायके के रास्ते पर एक साथ बढ़ चलीं, लेकिन एक जगह पर दोनों भटक गर्इं।

 नैहर पहुंचने के स्थान पर वे दोनों सागर के पास जाकर उसमें मिल गर्इ।

 वे दोनों नाग-नागिन बनकर चलीं थीं. इसलिए वे जिस रास्ते से लहराकर निकलीं, वे नदी बन गर्इं। सर्पिल नदी की तरह. वे दोनों कोइल और शंख नदियां अब भी झारखंड की महत्वपूर्ण नदियां हैं। 

 दोनों बहनें जहां मिली थीं, वह मिलन बिंदु वेदव्यास... राउरकेला, सुंदरगढ़ उड़ीसा था। वेदव्यास से मिलकर वे दोनों एक साथ ब्राहमणी नदी कहलार्इ. और ये दोनों नदियां एक होने के बाद आगे बढ़तीं हुर्इं समुद्र में जा समार्इ।

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                                                                                                                                                                      मंथन


                                                                                                                                                           -ओम निश्चल  

मेरे युवा आम में नया बौर आया है
खुशबू बहुत है क्योंकि तुमने लगाया है।

इस धरती पर मानव सभ्यता जितनी पुरानी है उतना ही पुराना प्रेम। प्रेम मनुष्य की उन जीवनदायी शक्तियों में एक है, जिसके उन्मेर परिपाक के बिना जीवन अर्थ नहीं है। नीरज का एक लोकप्रिय गीत है- प्यार  अगर थामता न पथ में/उँगली इस बीमार उमर की/हर पीड़ा वेश्या बन जाती/ हर  आँसू  आवारा होता। कहना न होगा कि प्यार मनुष्यता के लिए  औषध है। जहाँ भी हिंसा हो रही है, जाति नस्ल मजहब की दीवारें खिंची हैं,उसके पीछे प्यार का  अभाव है। प्यार एक ऐसा उर्वरक है, जिसके बिना जीवन की फसलइ नही लहलहाती। बल्कि कहें कि जीवन का  अस्तित्व ही प्रेम के कारण है तो अत्युक्ति नहीं। स्त्रीपुरुष के लाखों वर्षों के साहचर्य के बावजूद आज भी  अगर कहीं  अजनबी जैसा जीवन जिया जा रहा है तो जाहिर है कि ऐसे लोग प्रेम के रस से सराबोर नहीं हुए हैं। उन्होंने प्रेम का स्वाद नहीं चखा है। उसकी केमिस्ट्री से  अनजान है, अभी कामदेव के बाणों ने उन्हें बींधा नहीं है।

 

सदियों पुरानी कहानी है, जब  आदम ने पहली बार ईडेन गार्डेन में एक पेड़ पर बैठे दो पक्षियों को कूकते देख ईश्वर से यह जानना चाहता कि पेड़ पर बैठे ये पक्षी क्या कर रहे हैं तो ईश्वर ने कहा, वे एक दूसरे से प्रेम कर रहे हैं। कुछ समय बाद आदम को फिर एक खेत में गाय  और साँड़  आपस में  अभिसाररत दिखे तो फिर उसने ईश्वर से पूछा, प्रभु,यह क्या है ? ईश्वर ने फिर कहा,  आदम, वे  आपस में प्यार कर रहे हैं। तब  आदम ने मलिनमुख होकर कहा, प्रभु, मेरे पास तो कोई भी ऐसा नहीं है फिर मैं किससे प्रेम करूँ। ईश्वर ने कहा, आदम, कल तुम एक नई दुनिया देखोगे।  आदम को जैतून के पेड के नीचे गहरी नींद  आ गयी  और जब वह जगा तो पाया कि उसके निकट एक  अनिंद्य सुंदरी ईव बैठी है।  आदम ने उसका हाथ पकड़ा  और वे दोनों एकांत की  ओर चल दिए। प्रेम का वर्जित फल चखने का ही परिणाम यह सृष्टि है-सारी समसयाओं की रणभूमि। किन्तु सृष्टि के आकार लेते ही हमने प्रेम की जड़ों पर ही  आघात करना शुरू कर दिया। हमने प्रेम के  आख्यान लिखे, गीत लिखे, मंदिरों के स्थापत्य को प्रेम के उत्कीर्णनों से भर दिया पर जीवन में प्रेम छीजता रहा। प्रेम का जैसा स्वीकार और बखान हमारे साहित्य में है, वैसा समाज में नहीं है। यह  आज भी एक गोपनीय कार्रवाई की तरह है। किसी शायर की सलाह है लफज मत घोलना इबादत में/ इश्क को इश्तहार मत करना।  और हमने यही तो किया है इश्क को इश्तहार बनाया है। जहॉ भी हमें  अवसर मिला, पत्थरों,दीवालों पर, यहाँ तक कि सार्वजनिक शौचालयों की भीत तक पर  आई लव यू की  अश्लील  और भद्दी उद्‌घोषणाएँ लिखीं। प्रेम की विफलता पर हमने तेजाब उड़ेले। सगोत्रीय प्रेम में हमने प्रेमियों को फॉसी पर लटकाया। ताकि जनता के सामने यह नज़ीर रहे कह दो कोई न करे यहाँ प्यार/ इसमें खुशियाँ हैं कम, बेशुमार हैं ग़म/ इक हँसी  और  आँसू हजार। इतिहास गवाह है कि नकार और तिरस्कार के बावजूद प्रेम खत्म नहीं होता, परवान चढ़ता है। क्योंकि सृष्टि के उद्‌गम में ही प्रेम है। यह वर्जनाएँ नहीं मानता, नैतिक विचलनों से इसे भय नहीं। यह हर व्यक्ति के भीतर एक नई  अनुभूति के साथ उदित होता है। दो युवा जब प्रेम करते हैं तो प्रेम की दुखांत कहानियाँ  और उसके  अंजाम उनकी स्मृति में नहीं होते। वे  अपने प्रेम को सर्वथा नए  और मौलिक अनिंद्य तरीके से जी रहे होते हैं। उनका प्रेम किसी का  अनुकरण नहीं होता, वे किसी से प्रेरित नहीं होते। वे प्रेम का वर्जित फल चखना चाहते हैं। इसका  अंजाम भले ही यह हो- नहीं एक ऐसे तुम्ही यहाँ जिसे प्यार मिल न सका कभी/ कई लोग पहले भी  आए थे यही चोट खा के चले गए। फिर भी उनमें प्रेम के नए कल्ले फूटते हैं। वे प्रेम का  अपना एक  अलग जनपद बसाते हैं। प्यार के खेल में शिकस्त बेशक मिले,उसकी कशिश कभी खत्म नहीं होती,  प्यार की आँच मंद भी पड़ जाए तो भी उसकी गरमाई बची रहती है  और दिल में उम्र भर मोमिन की यह ग़ज़ल गूँजती रहती हैःकभी हममें तुममें भी चाह थी,कभी हममें तुममें भी राह थी/ कभी हम भी तुम भी थे  आशना,तुम्हें याद हो कि न याद हो।

 

प्रणय की  अनिंद्य तहरीरें

हमारा  अतीत प्रेम की कहानियों से भरा है। लेकिन उस प्रेम के कोई मानी नहीं, जिसमें जद्दोजेहद न हो, प्रतिदान न हो। इसीलिए प्रेम की चर्चा चलने पर वहीं कहानियाँ हमारे जेहन में जगह बनाती हैं, उच्चादर्श कायम करती हैं, जो  अक्सर दुखांत की कहानियाँ हैं। सुरक्षित दुर्ग में बैठ कर किया गया प्रेम प्रणय नहीं सुविधा का उपभोग है। जिस प्रेम मे प्रतीक्षाएँ न हों, जिसमें आँसू न निकलें, जिसमें बंदिशें न हों, विद्रोह और बंदिशों, वर्जनाओं से पार जाने का दुस्साहस न हो, ऐसे प्रेम की परिणति मन में संवेग नहीं जगाती। ;सीलिए प्रायः सर्वोत्तम प्रेम की कहानियॉ वही हैं, जो दुखांत हैं जिसके किरदार विद्रोही रहे हैं।

 

प्रेम के कई रूप हैं।  अशरीरी प्रेम,  आत्मिक या रूहानी प्रेम  और शरीरी प्रेम। प्रेम का यह विस्तार पारिवारिक  और रिश्तेनातों के दायरे से लेकर मैत्रीपूर्ण संबंधों तक फैला है। हमारी स्मृतियों में चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी उसने कहा था  आज भी जीवित है। प्लैटानिक यानी  अशरीरी प्रेम की यह कहानी  अपनी बुनावट में,  अपनी सूक्ष्म  अनुभूतियों में  अद्वितीय है। एक लड़की से किशोर वय में हुई मुलाकात और उससे उपजे एकांतिक प्रेम की परिणति जिस तरह हुई,वह  अनूठा है। जमादार लहना सिंह को जब कालांतर में पता चलता है कि  अपनी ही पलटन में सुबेदार हजारा सिंह की पत्नी बन चुकी उस लड़की से ही कभी वह प्रेम कर बैठा था,  और उससे जब एक संयोगवश मुलाकात होती है तो उसके कहे के  अनुसार वह लड़ाई के मैदान में उसके पति सूबेदार  और बेटे की रक्षा में  अंततः  अपने प्राण गँवा कर प्रेमिका को दिए वचन की रक्षा करता है। इस कार्रवाई ने लहना सिंह को प्रणय के किरदार के रूप में  अमर बना दिया है।  आत्मिक  और रूहानी प्रेम का दूसरा उदाहरण राजा दशरथ का है। यों तो ऐसा प्रेम घटित होना आसान नहीं है  और यदि ऐसा प्रेम घटित हो गया तो फिर उससे विछोह  असह्य है। दशरथ को राम बहुत प्रिय थे। किन्तु  अपने वचन की रक्षा मे कैकेयी की बात मान कर उन्हें राम को वनवास की राजाज्ञा देनी पड़ी।  राम से उनका केवल जैविक नाता ही नहीं, आत्मिक प्रेम इतना  अटूट था कि उनके वनवास की  ओर रुख करते ही उन्होंने  अपने प्राण त्याग दिए।  आत्मिक प्रेम का एक दूसरा उदाहरण  अमीर खुसरो का है। खुसरों निजामुद्दीन  औलिया को  अपना महबूब मानते थे। वे कही बाहर गए थे। रास्ते में खबर मिली कि महबूब नहीं रहे तो तुरन्त दिल्ली की  ओर रवाना हो गए। दिल्ली  आकर जैसे ही उनका जनाजा देखा, खुसरो  अपने को सँभाल नहीं पाए। बोले, गोरी बैठी सेज पर डाले मुख पर केस/ चल खुसरो घर  आपने रैन भई चहुँ देस।  और  अपने प्राण त्याग दिए।

 

प्रसिद्घ कथाकार  ओ. हेनरी की एक मशहूर कहानी हैः द गिपट ।  इस कहानी में पति पत्नी एक दूसरे को उत्कट प्रेम करते हैं पर उनकी माली हालत  ाझछी नहीं है। पत्नी के केश बड़े सुंदर  और मुलायम होते हैं, जिन पर पति मरता है। एक बार वैवाहिक वर्ष गॉठ पर पत्नी पति के लिए गिपट लेने बाजार जाती है । वह पति की सोने की घड़ी के लिए सोने की चेन खरीदना चाहती है पर उतने रूपये उसके पास नहीं होते कि वह उसे खरीद सके। तब वह एक ब्यूटी पार्लर जाती है। पार्लर का मालिक कहता आपके बाल बहुत खूबसूरत हैं। इन्हें बेच दें तो हम आपको रूपये दे सकते हैं। वह  अपने बाल पार्लर में कटवा देती है तथा उनसे मिले रूपयों से वह सोने की चेन खरीद कर घर लौटती है  और चाहती है कि पति को जल्दी से उसे भेंट करे ताकि वे कलाई पर घड़ी बाँध सकें। पर उसे देखते ही पति पूछता है ये बाल कैसे कटवा दिए ? उसने मामला समझाया तो उसका चेहरा उतर गया। उसने कहा कि तुम्हारे बाल इतने लंबे थे कि उन्हें सुलझाने में कठिनाई होती थी। इसीलिए मैं  अपनी घड़ी बेच कर तुम्हारे लिए सोने की कंघी लाया था। पर त्रासदी देखें कि न पत्नी के बाल बचे हैं जिसके लिए पति सोने की कंघी लाया है, न पति की घड़ी बची है, है + जिसके लिए पत्नी  अपने खूबसूरत केश बेच कर सोने की चेन लाई है। प्रेम की  अभिव्यक्ति की कितनी मार्मिक कहानी है यह। प्रेम का एक ऐसा रूप भी हम देखते हैं जहाँ एक दूसरे के लिए लोग मरने जीने की हद तक गुजर जाते हैं। प्रेम को लेकर, उसके सूक्ष्म  अहसासात को लेकर तालस्ताय, मोपासाँ, चेखव, मार्केस, मिलान कुंदेरा तथा हिंदी व भारतीय भाषओं में तमाम कहानियाँ हैं जो  अपनी किस्सागोई में सुगठित  और चित्ताकर्षक हैं। रेणु की तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम में प्रेम की धमक का  अपना ही रूपरंग है जिसे सेल्यूलाइड पर राज कपूर ने  अमर बना दिया । प्रेम का होहल्ला आज जितना है, उतना प्रेम समाज में दीखता नहीं। पति पत्नी, प्रेमी प्रेमिका, भाई बहन, पिता पुत्र तथा  अन्य तमाम रिश्तों को  आज स्वार्थपरता ने निष्प्रभ बना दिया है। लेन देन, भौतिकता  और बाजारवाद के चलते रिश्तों को उपयोगितावाद की कसौटी पर तौला जाता है।  आज प्रेम नहीं, प्रेम का प्रदर्शन ज्यादा है। लिहाजा इसके लिए हमने एक दिन मुकर्रर कर रखा है वेलेंटाइन डे। संत वेलेंटाइन को प्रेम का प्रतीक मान कर हमने इस दिन  को अपने प्रणय के इजहार का दिन बना दिया। इस दिन की विशिष्ट मुलाकातों,  और उपहारों कार्डों के  आदान प्रदान को हमने उत्सव का नाम दिया। हमारी स्मृति में संसार के  अनेक प्रेमियों की दुखांत प्रेम कहानियॉ तैरती हैं। हीर राँझा, लैला मजनूँ, शीरी फरहाद, ढोला मारू, सोहिनी महिवाल, रोमियो जूलियट, क्लियोपेट्रा, मार्क एंटोनी, पिरामिस एवं थिसबे, सलीम अनारकली, शाहजहाँमुमताज, मैरीपियेरे क्यूटी   आदि। ये कहानियाँ भले ही इस बात की ताकीद करती हों, कि प्रेम की परिणति या तो विछोह है या मृत्यु, किन्तु जैसे सृष्टि  अनवरत चलती है, प्रेम भी  अक्षुण्ण है, उसकी  अनुभूति  अनछुई है, उसकी तहरीरें  अनिंद्य  ओर  अमिट हैं।
 

 

छाया मत छूना मन

रोमियो जूलियट प्रसिद्घ प्रेमी जोड़े कहे जाते हैं। इन्हें प्रेम का पर्याय माना जाता है। शेक्सपियर के इस दुखांत नाटक में दो परस्पर शत्रु परिवारों के युवक-युवती प्रेम करते हैं। किन्तु  अंततः दोनो  असामयिक मृत्यु का शिकार होते हैं। यह कहानी बहुत ही भावप्रवण  और विचलित करने वाली है। क्लियोपेट्रा  और मार्क एंटोनी की प्रेम कहानी भी स्मरणीय  और विचलित करने वाली है। इन ऐतिहासिक किरदारों की कहानी को शेक्सपियर ने एक मार्मिक नाट्य रूप दिया है। दोनों के  आपसी रिश्तों से मिश्र एक शक्तिशाली स्थिति में  आ गया था, किन्तु इनके प्रेम ने रोमवासियों को नाराज कर दिया। तमाम जोखिम के बावजूद दोनो ने विवाह किया। कहा जाता है कि रोमनों के खिलाफ लड़ते हुए ऐंटोनी को क्लियोपेट्रा की मौत की झूठी खबर मिली, जिससे विषण्ण होकर वह अपनी ही तलवार पर गिर पड़ा। उधर जब क्लियोपेट्रा को एंटोनी की मौत का पता चला उसने भी  अपनी जान दे दी। महान प्रेम बलिदान माँगते हैं। पाओलो  और फ्रैन्सेस्का के प्रेम को दाँते की क्लासिक डिवाइन कामेडी ने  अमर बना दिया है। फ्रैन्सेस्का गियान्सि ओट्‌टो से ब्याही है जो एक उजबक किस्म का  आदमी है। वह धीरे धीरे उसके भाई पाओलो से प्रेम करने लगती है। एक साथ एक किताब पढ़ते हुए उनका प्रेम परवान चढ़ता है। बाद में ईर्ष्यादषध गियान्सि ओट्‌टो उन दोनों को मौत के घाट उतार देता है। ईरान के जाने माने कवि निजामी  अपनी रोमैंटिक कविता- लैला मजनूँ के लिए जाने जाते हैं। यह  अपरार्य प्रेम की दुखांत कहानी है। सदियों से इसकी कहानी कही और सुनी जाती रही है। लैला  और कैस स्कूल में ही एक दूसरे के प्रेम में पड़ जाते हैं। जानकारी होने पर उनकी मुलाकातों पर बंदिश लगा दी जाती है। निराश कैश रेगिस्तान की  ओर चला जाता है  और खाना पीना छोड़ पागल सा बन जाता है। लैला का पिता उसकी शादी मजनू से न कर किसी  और से कर देता है। उसके पति की मृत्यु के बाद वे निकट  आते हैं पर अपने जीवन के बिखराव को वे दोनो समेट नहीं पाते। मौत के बाद उनकी कब्रें  आस पास दफनाई गईं। पिरामिस  और थिसबे की कहानी भी कुछ कुछ ऐंटोनी  और क्लियोपेट्रा जैसी है। यह एक ऐसे निस्वार्थ भाव से किए गए प्रेम की कहानी है जो यह बताती है कि मृत्यु के बाद भी उन्हें कोई जुदा नहीं कर सकता। परिवारों की खिलाफत के बावजूद दोनों ने प्रेम किया। वे घर से भागे। एक मालबरी के वृक्ष के नीचे मुलाकात तय हुई किन्तु जैसे ही पिरामिस वहाँ पहुँचा शेर के पंजे में उसका बुरका दबा मिला और उसे लगा कि थिसबे मर चुकी है। उसने तत्काल  अपनी ही तलवार से  अपनी हत्या कर ली। बाद में शेर के डर से दुबकी हुई थिसबे ने जैसे ही उसे मृत देखा, उसने  अपने प्रेमी की तलवार से  अपने को मार डाला। जेन  आस्टिन ने डार्सी  और एलिजाबेथ की दिलचस्प प्रेम कथा लिखी है। मध्यकालीन इतिहास में झाँकें तो सलीम और  अनारकली की प्रेम कहानी सुन कर कौन विचलित नहीं होगा। महान मुगल शासक  अकबर का बेटा सलीम दरबार की मामूली नर्तकी से प्रेम कर बैठता है। पर  अकबर को यह सहन नही हुआ कि उनका बेटा मामूली सी नर्तकी से प्रेम करे। उसने हरचंद कोशिश की कि सलीम का दिल उस पर से हट जाए पर ऐसा नहीं हुआ। सलीम ने  अपने पिता  अकबर के विरुद्घ युद्घ छेड़ दिया।पर  अकबर की फौज ने सलीम को हरा कर उसे मौत का फरमान सुना दिया।  अनारकली ने हस्तक्षेप करने की चेष्टा की तो सलीम के सामने ही उसे दीवारों में चुनवा दिया गया।

प्रेम की खातिर जान देने और जान लेने की ये दास्तानें कई ज्वलंत उदाहरण सामने लाती हैं। जिस प्रेम का ढिंढोरा हमारे कवि  और संत महापुष सदियों से पीटते  आए हैं, उसकी परिणति प्रेम के गौरवपूर्ण क्षणों में इस तरह हुई है कि सारी मनुष्यता शर्मशार हो उठे। इसके बावजूद प्रेम है। प्रेम के लिए दिलों में  अभी भी जगह है। प्रतीक्षाएँ हैं,  आकुलता है,  अधीरता है। प्रेम के लिए मरने मिटने की कसमें हैं। एरिक फ्राम ने प्रेम के तमाम पहलुओं पर एक किताब लिखी है-द  आर्ट  आफ लविंग। उनकी नजर में प्रेम केवल स्त्री  और पुरुष के बीच का मामला नही है। इसमें ईश्वरीय  और  आत्मप्रेम सहित नाना प्रकार के प्रेम प्रसंगों पर चर्चा की गयी है। वे कहते हैं प्रेम की जरूरत हमारे सामूहिक  अस्तित्व से जुड़ी है। उनका मानना है कि किसी के प्रेम में इतना डूब जाना कि सारी दुनिया को भूल जाना पड़े, यह प्रेम की गहराई की नहीं, बल्कि अकेलेपन की निशानी है। पश्चिमी समाज में घटते जा रहे प्रेम को देखते हुए ही एरिक फ्राम ने प्रेम करने की कलात्मक क्षमता के विकास की जरूरत बताई है  और इसका एक रास्ता उन्हें मेडिटेशन मे दिखायी देता है। किन्तु उनकी चिंता है कि  आज किसी के पास  अपने लिए ही कुछ क्षण बिताने का वक्त नही है तब वह मेडिटेशन को भला कितना वक्त दे पाएगा ! यों तो  आज लव गुरुओं की भरमार है। इंटरनेट का गवाक्ष खुलते ही प्रेम का न्यौता देने वाली तमाम साइटें नजर  आती हैं। प्रेम कैसे करें, किससे करें। क्या करें क्या न करें, रूठे हुओं को कैस मनाएँ, मनुहार के अनेक ट्रिक्स बटन दबाते ही हाजिर । जैसे उन्हें  आपकी ही तलाश है, या  आपको उनकी। एक दूजे के लिए यहाँ एक से एक दिलचस्प  आकर्षण मौजूद हैं।

 

प्रेम क्या है

प्रेम की  अनेक परिभाषाएं की गयी हैं। कवियों, शायरों, चिंतकों ने प्रेम को  अनेक तरीके से परिभाषित किया है। गाँधी कहते हैं, प्रेम कभी दावा नहीं करता, हमेशा देता है। प्रेम हमेशा सहन करता है, कभी बुरा नहीं मानता, कभी प्रतिफल नहीं लेता। किसी विचारक का कहना है प्रेम साधारण कुटिया को भी महल बना देता है। लेकिन इंटरनेट पर खँगालने पर कुछ अलग सी परिभाषाएँ मिलीं। कुछ परिभाषाएं यों हैं-प्रेम वह है जब मेरी माँ मेरे पिता के लिए काफी बनाती हैं  और उन्हें परोसने के पहले एक सिप लेकर  आश्वस्त हो जाना चाहती हैं कि स्वाद  अच्छा है।..... यदि तुम बेहतर तरीके से प्रेम करना चाहते हो तो उस शख्स से मिलो जिससे तुम नफरत करते हो।..... प्रेम उसे कहते हैं जब कोई लडकी एक लड़के से कहे कि उसकी शर्ट बहुत  अच्छी है  और वह उसे रोजाना पहनना शुरू कर दे। .....मैने प्यार करना  अपने दुश्मनों से सीखा है। जे कृष्णमूर्ति कहते हैं, जहाँ निर्भरता व  आसक्ति हो, वहाँ प्रेम नहीं रह सकता। हमारा भारतीय साहित्य प्रेमप्रसंगों के वर्णन से भरा हुआ है। प्रेम ने  कवियों को इतना उद्वेलित किया है कि इस प्रसंग पर  अनेक काव्य, महाकाव्य लिखे गए हैं । जयदेव ने गीत गोविंद लिखा तो उर्वशी  और पुरवा पर दिनकर जी ने उर्वशी।  कनुप्रिया लिख कर धर्मवीर भारती ने अपूर्व ख्याति पाई। गुनाहो का देवता भी किशोर प्रेमियों ने खूब पढ़ा। हाल ही प्रकाशित पुष्पा भारती के नाम लिखी भारती की चिटि्‌ठयों को पढ़कर रोमांच हो उठता है।  अचलाः एक मनःस्थिति में प्रेम के भोग  और  आत्मिक प्रेम दोनों पहलू उजागर होते हैं। जहॉ तक स्वकीया  परकीया का सवाल है, हिंदी साहित्य को खँगाला जाए तो प्रायः प्रेम की सभी सर्वोत्तम  अभिव्यक्तियॉ परकीया प्रेम को लेकर की गयी हैं। प्रेम के यूटोपिया  और यथार्थ में भारी  अंतर है। लीलाधर जगूड़ी लिखते हैं,प्यार में प्रत्येक प्रश्न  अनिवार्य है।  भारती ने गुनाहो का गीत में माना है कि न हो यह वासना तो जिन्दगी की माप कैसे हो। कवयित्री कात्यायनी कहती हैं, सभी वासनाएँ दुष्ट नहीं होतीं। कविवर घनानंद ने प्रेम की अनूठी परिभाषा बताई है -अति सूधो सनेह को मारग है/ जहँ नैकु सयानपन बाँक नहीं/ तहँ साँचे चलैं तजि  आपनपौ/ झिझकैं कपटी जे निसांक नहीं। प्रेम का मार्ग सीधा-सच्चा है। इस मार्ग पर वही चल सकता है जो  अपने  अहं का विसर्जन कर दे। छलीकपटी के लिए प्रेम में कोई जगह नहीं है। कबीर ने लिखा थाशीश उतारै भु धरै । प्रेम व्यक्तित्व का विलोपन है। एक ऐसा रसायन है कि  आदमी को तन्हा नहीं रहने देता। बशीर बद्र कहते हैं, मुहब्बत एक खुशबू है हमेशा साथ चलती है/ कोई इंसान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता। प्रेम की आँच में वह गुलाबी गरमाहट होती है जो समूचे जीवन को  अनुराग के धूप-दीप-नैवेद्य से सुगंधित रखती है। इसकी रंगतें  अलग अलग हैं। नाते-रिश्तों का परिसर भले ही बहुत बड़ा होता हो, किन्तु सभी रिश्तों को प्यार का रिश्ता नहीं कहा जा सकता। माँ,पिता,बहन,भाई  प्यार के साथ बने  रिश्तों में संबंधों की खुशबू  अलग होती है। प्यार एक नियति भी है। सगे संबंधी कितने ही निकट के हों,  अगर उनके भीतर प्रेम की धारा नहीं बहती तो वे  असह्य हो उठते हैं। सारे संबंध बेमानी लगने लगते हैं। पारिवारिक रिश्तों में माँ-पिता के प्रेम को कदाचित सबसे ज्यादा  अहमियत दी गयी है। इनमें भी माँ का प्रेम अनूठा है निस्वार्थ  और सच्चा प्रेम जिसका कोई प्रतिदान वह बच्चे से नहीं चाहती। एक कहावत हैः माई देखै ठठरी मेहर देखै गठरी। माँ की मोहब्बत से लोगों ने बड़ी से बड़ी ऊँचाइयाँ हासिल की हैं। मुनव्वर राना कहते हैं-कौन समझाए ये तनकीद के शहजादों को / माँ पे हम शेर न कहते तो यह शोहरत होती ? मोहब्बत का जज्बा हो तो बिना रिश्तों की डोर में बँधे हुए भी लोग दिल को सच्चा सुकून देते हैं।

 

ये इश्क नहीं  आसाँ-  इज़हार ए इश्क

प्यार के  अहसास भर से जिस तरह का रोमांच होता है, उसके इज़हार में उतनी ही कठिनाई होती रही है। गालिब लिखते हैं, ये इश्क नहीं  आसाँ, बस इतना समझ लीजै/ इक  आग का दरिया है  और डूब के जाना है। आज दुनिया इश्क में डूबी है। कहीं कोई  आग का दरिया नहीं है। मोबाइल पर हर तीसरा एसएमएस प्यार का लिखा जा रहा है  और हर चैटिंग की भाषा रूमानी है। एक दौर था, प्रेम का इज़हार करने में उम्र बीत जाती थी। न टेलीफोन थे, न मोबाइल। न इंटरनेट का जमाना हुआ करता था न संचार सेवाएँ इतनी द्रुत थीं। महीनों इंतजार के बाद जब चिट्‌टीरसा कोई ऐसा खत लाकर देता था तो प्रेमियों की बाँछें खिल जाती थीं। लड़कियाँ ऐसे खत सँभाल कर रखतीं  और फुर्सत के क्षणों में निकाल कर बार बार पढ़तीं। ऐसी चिटि्‌ठयों में रस होने के चलते ही कदाचित पोस्टमैन का नाम चिट्‌ठीरसा पड़ा होगा। ,एक शायर का कहना है, प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है। ऐसी चिटि्‌ठयाँ बड़ा सुकून देती हैं। कई बार चिट्‌ठी लिख कर हम उसे भेजने या न भेजने के असमंजस से घिरे रहते हैं। कुँवर नारायण की पंक्तियाँ हैं-फिर कभी कागज हआ/ तो चाहूँगा जिन्दगी किसी ऐसे खत का इंतजार हो/ जिसे कोई प्यार से लिखे /  और होठों से चिपका कर सोचे कि उसे भेजे या न भेजे। केदारनाथ सिंह की एक कविता में चार चार पत्रों के मिलने का कोई रोमांच कवि को नहीं है क्योंकि उसे तो उस पाँचवीं चिट्‌ठी का इंतजार है जो  अभी तक नहीं  आई। ऐसे पत्र का मजमून जाहिर है, रोमैंटिक ही होगा। किन्तु तब प्रेम में संजीदगी थी। एक गहरा पैशन था । सूर की गोपिकाएँ सीधी सच्ची थीं, मिडिल पास लड़कियों की तरह। वे उद्घव के झाँसे में आ गयीं। निशि दिन बरसत नैन हमारेके दिन थे वे। प्यार हुआ भी तो  आँसू ही उसकी परिणति हुआ करते थे।  रत्नाकर की गोपियाँ थोड़ी  आधुनिक थीं, उद्घव की एक न चली। कृष्ण के प्रेम में पगी गोपियों ने चुप रहो उद्घव सूधौ पथ मथुरा को गहो कह कर उद्घव को खदेड़ दिया था। प्रेम की  आतुरता उनमें इतनी उत्कट थी कि उद्घव के  आते ही एड़ियों के बल खड़ी हो वे फौरन यह जान लेना चाहती थीं-हमको लिवयौ है कहा हमको लिवयौ है कहा? मीरा ने कृष्ण के प्रेम में जहर का प्याला पी लिया। केहि विधि मिलना होय की जुगत में ही जीवन बीत गया।  श्रीकांत वर्मा की एक कहानी है-शवयात्रा। एक वेश्या जिसका प्रेमी मैलागाड़ी ढोने वाला बंसीलाल है, उसकी यह दिली तमन्ना होती है कि वह कभी उससे मिले, प्यार करे। पर ऐसा संभव नहीं होता। कालांतर में जब उसे कहीं से वेश्या इमरतीबाई के निधन की खबर मिलती है तो वह अपनी ठेलागाड़ी पर लाद कर उसे श्मशान घाट लाता है। रजिस्ट्रेशन खिड़की पर बाबू के नाम,उम्र पूछते ही वह सारा ब्यौरा देने के बाद जब पति का नाम पूछा जाता है तो तपाक से वह शख्स  अपना नाम बोल देता है-बंशीलाल बाल्मीकि  और  अपने तुच्छसे प्रेम को  आदर्श बनाते हुए  आगे बढ़ कर रजिस्टर पर दस्तखत कर देता है। इससे उसे कितनी  आश्वस्ति  मिलती है, इसका सहज ही  अनुमान लगाया जा सकता है। इसलिए प्रेम के  अनेक शेड्‌स हैं। जटिल है इसे कह पाना।  और भी जटिल है समझ पाना। कभी मीर ने लिखा था-इश्क इक मीर भारी पत्थर है/ कौन तुझ नातवाँ से उठता है। जबकि  आज प्रेम का इज़हार कितना सरल हो गया है। मैंने एक लड़के से पूछा, एक लड़की जिसे तुम चाहते हो, कितनी देर में उससे  अपने प्यार का इज़हार कर सकते हो। लड़का बोला, महज तीन सेकंड में। फिर उसने एक एसएमएस मुझे किया। लिखा था, मैं तुमसे प्यार करता हूँ, कहने में महज तीन सेकंड चाहिए, तीन मिनट इसे स्वीकार करने में , दो घंटे इसके प्रदर्शन में और तीन दिन इसे समझने में। लेकिन इसे सिद्घ करने के लिए पूरा जीवन चाहिए। एसएमएस के जमाने में प्यार का इज़हार कितना सरल हो गया है। टच स्क्रीन छूते ही  आपका संकोच उड़नछू हो जाता है।  अब  अगले का काम है कि वह इसे किस तरह लेता है।  आरकुट, फेसबुक सभी प्यार जाहिर करने के मंच बन गए हैं। चट मँगनी पट ब्याह की तर्ज पर ईमेल  और चैटिंग से दिल का हाल बयाँ किया जा रहा है।  आपका चेहरा एक क्लिक भर से महबूबा के दिल के मानीटर में कैद हो उठता है।  तमाम कविताएँ और शायरी दर असल प्रेम का ही तो इज़हार हैं। गिरिजा कुमार माथुर के गीत में नायिका यह कह कर ही  अपने प्रेम का इज़हार करती है- मेरे युवा  आम में नया बौर  आया है/ खुशबू बहुत है क्योंकि तुमने लगाया है। जिस प्रेम के इज़हार में जीवन बीत जाया करता था, उससे मिलन की प्रतीक्षा में भारतभूषण ने सौसौ जन्मों की बात कही है। सौसौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ, प्रिय ! मिलने का वचन भरो तो। पर किशन सरोज ऐसा नहीं मानते। कहते हैं- बीत यह जीवन चला  अब/ प्रिय न दो विश्वास  अभिनव/ मिल सको तो  अब मिलो । अगले जनम की बात छोड़ो।  आज मिलने की  आधीरता इतनी है कि टेलीफोन पर बतकहियाँ नहीं सुहातीं। किसी दिन सामने आओ हमारे रू ब रू बैठो/ ये टेलीफोन पर बातें हमें  अच्छी नहीं लगतीं। प्रेम में नजदीकियाँ जरूरी हैं।  आफ द साइट  आफ द माइंड। इसीलिए कवि कहता है-इतना मत दूर रहो गंध कहीं खो जाए/  आने दो  आँच, रोशनी न मंद हो जाए। बकौल लक्ष्मीशंकर वाजपेयी,  आज का प्रेमी जानता हैः जरा सी परवरिश भी चाहिए हर एक रिश्ते को/ जो सींचा ही नहीं जाए वो पौधा सूख जाता है। इसलिए प्यार में नमी बनी रहे, ईमेल, एसएमएस और चैटिंग इसे कायम रखने में मददगार साबित हुए हैं।

 

छोड़ दे कुछ नहीं है रंजिश में

हमारा साहित्य प्रणय की अनुभूतियों से रचाबसा है। प्रेम की उदात्तता को व्यंजित करने के लिए कितने ही उपन्यास  और काव्य लिखे गए हैं। बाजारवाद के चलते सभी चीजें  आज उपयोगितावादी नजरिए से देखी जा रही हैं। प्रेम  और नैतिकता को लेकर बहसें चलती रही हैं। किन्तु उच्चवर्ग  और निम्न वर्ग में प्रेम की वर्जनाएँ टूटी हैं।  और  अब तो मध्यवर्ग की नैतिकता की सीवनें भी उधड़ रही हैं। चैनल रातदिन प्रेम  और सेक्स परोस रहे हैं।  अनेक धारावाहिकों को देख कर लगता है,  औरतें  और पुरुष  अपने  अपने वैवाहिक जीवन से संतुष्ट नहीं हैं। वे वैवाहिक दायरे से बाहर सुख तलाश रहे हैं। इश्क में  आज रोना धोना नहीं चलता।  आँसू नहीं बहाए जाते।


प्रेम के विकल्पों की आज कमी नहीं। बुद्घिनाथ मिश्र की कविता तो यही कहती है-एक बार  और जाल फेंक रे मछेरे/ जाने किस मछली में बंधन की चाह हो।  और  अगर प्रेम में बेवफाई की जा रही है तो उसके लिए मुनव्वर राना का एक शेर है-तू बेवफा है तो ले इक बुरी खबर सुन ले/कि मेरा इंतजार कोई दूसरा भी करता है।  आज चारो तरफ भौतिकता का बोलबाला है। भावुकता के दिन लद चुके हैं। प्रेम के रास्ते पर पहला कदम रखते ही कुछ लोग सेक्स की मंजिल तक पहुँच जाना चाहते हैं। उनके लिए स्त्री महज एक  आब्जेक्ट है। वे नहीं जानते कि स्त्री की  आँखे उस राडार की तरह हैं जो पुरुष के मनोभावों को दूर से ही पढ़ लेती हैं। प्रेम में छल है, कपट है, विरह है, व्यथा की  अकथ कथा है। फिर भी समाज में प्रेम की  आज सर्वाधिक जरूरत है। मोहब्बत करने वाले खूबसूरत लोग होते हैं। इसलिए हो सके तो अपने जीवन में एक प्रेम का खाता जरूर खोलिए। क्रियेट ए लव एकाउंट। वेलेंटाइन डे के बहाने ही सही, मोहब्बत के हक में हम एक शायर के शद्बों में यही कहना चाहेंगे

        छोड़ दे कुछ नहीं है रंजिश में

         आ ! मेरे साथ खेल बारिश में।

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                                                                                                                                           बांस गांव की मुनमुन


                                                                                                                                             -दयानंद पाण्डेय


         भाग 10

वह क्या करें? किंकर्त्तव्य विमूढ़ हुआ एक वृद्ध पिता सिवाय अफ़सोस, मलाल और चिंता के कर भी क्या सकता था? लोग समझते थे कि उन का परिवार प्रगति के पथ पर है। पर उन की आत्मा जानती थी कि उन का परिवार पतन की पराकाष्ठा पर है। वह सोचते और अपने आप से ही कहते कि भगवान बच्चों को इतना लायक़ भी न बना दें कि वह माता पिता और परिवार से इतने दूर हो जाएं। अपने आप में इतना खो जाएं कि बाक़ी दुनिया उन्हें सूझे ही नहीं। अख़बारों में  वह पढ़ते थे कि अब दुनिया ग्लोबलाइज़ हो गई है। जैसे एक गांव हो गई है समूची दुनिया। पर उन को लगता था कि अख़बार वाले ग़लत छापते हैं।बेटियों से तो कोई उम्मीद थी नहीं। पर उन के चारों बेटे जाने किस ग्रह पर रहते थे कि उन का दुख, उन की यातना उन्हें दिखती ही न थी। बेटों की इस उपेक्षा और अपमान की बाबत वह किसी से कुछ कह भी नहीं पाते थे। मारे लोक लाज के। कि लोग क्या कहेंगे? वह सोचते यह सब और अपने आप से ही पूछते कि, ‘क्या इसी को ग्लोबलाइजे़शन कहते हैं?’

सवाल तो उन के पास कई थे। पर इन का जवाब एक भी नहीं। कहा जाता है कि दिल पर जब बोझ बहुत हो तो किसी से शेयर कर लेना चाहिए। दिल का बोझ कुछ कम हो जाता है। पर मुनक्का राय यह सोचते कि किस से वह अपने बेटों की शिकायत करें? वह मर न जाएंगे जिस दिन अपने बेटों की शिकायत किसी से करेंगे। उलटे वह तो जब भी कहीं बेटों का ज़िक्र आता तो कहते कि, ‘हमारे बेटे तो सब रत्न हैं रत्न!’

पर यह बेटे सब जाने किस राजा के रत्न बन बैठे थे कि माता पिता के दुखों को देखे बिना बिसार बैठे थे। एक बार धीरज से फ़ोन पर उन्हों ने कहा भी था कि, ‘बेटा जब तुम अध्यापक थे तो ज़्यादा अच्छे थे। हम लोगों का दुख-सुख ज़्यादा समझते थे। तुम्हें याद होगा उन दिनों तुम्हारे नियमित मदद के वशीभूत मैं ने तुम्हारा नाम कभी नियमित प्रसाद तो कभी सुनिश्चित प्रसाद रखा और कहा करता था।’ पर वह इस पर कुछ बोला नहीं उलटे अपनी व्यस्तताएं और ख़र्चे बताने लगा था।

चुप रह गए थे मुनक्का राय। उन्हीं दिनों टी.वी. पर आ रहे कवि सम्मेलन पर एक कवि ने कविता सुनाई थी, ‘कुत्ते को घुमाना याद रहा पर गाय की रोटी भूल गए/साली का जनम दिन याद रहा पर मां की दवाई भूल गए।’ सुन कर वह फिर अपने आप से बोले, ‘हां, ज़माना तो बदल गया है।’ बाद में पता चला धीरज की दो-दो सालियां उस के साथ नियमित रह रही हैं। और वह ससुराल पर ख़ासा मेहरबान है। एक बड़ा सा कुत्ता भी रख लिया है। शायद इसी लिए वह अपने नियमित प्रसाद और सुनिश्चित प्रसाद को भूल गया। भूल गया कि अम्मा बाबू जी खाना भी खाते हैं और दवाई भी। बाक़ी ज़रूरतें भी अलग हैं। नातेदारी, रिश्तेदारी, न्यौता हकारी। सब भूल गया नियमित प्रसाद उर्फ सुनिश्चित प्रसाद उर्फ धीरज राय।

क्या डिप्टी कलक्टरी ऐसे ही होती है?

ऐसे ही होते हैं न्यायाधीश?

ऐसे ही होते हैं बैंक मैनेजर?

और ऐसे ही होते हैं एन.आर.आई?

क्या एन.आर.आई. राहुल भी गाता होगा, ‘हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चांद।’ और वो पंकज उधास का गाना सुनता होगा कभी क्या कि, ‘चिट्ठी आई है, वतन से चिट्ठी आई है! सात समंदर पार गया तू हम को जिंदा मार गया तू!’ सुनता होगा क्या, ‘मैं तो बाप हूं मेरा क्या है/तेरी मां का हाल बुरा है।’ सुनता होगा इस गाने की तासीर, ‘कम खाते हैं, कम सोते हैं बहुत ज़ियादा हम रोते हैं।’ क्या पता सुनता हो? सुनते हों बाक़ी भी। न्यायाधीश भी, डिप्टी कलक्टर भी और बैंक मैनेजर भी। या हो सकता है यह गाना सुनते ही बंद कर देते हों। सुनना ही नहीं चाहते हों। जैसे कि धीरज अब फ़ोन भी नहीं सुनता। मोबाइल या तो उठता नहीं या स्विच आफ़ रखता है। लैंड लाइन फ़ोन कोई कर्मचारी उठाता है और किसी मीटिंग या बाथरूम में बता देता है। कितनी भी ज़रूरी बात हो वह नहीं सुनना चाहता। क्या वह अपने क्षेत्र की जनता की भी ऐसे ही अनसुनी करता होगा? सोच कर मुनक्का राय कांप जाते हैं।

कांप गई थी मुनमुन भी जब एक दिन अचानक उस का पति राधेश्याम बांसगांव उस के घर आ गया। मुनमुन और अम्मा दोनों ही बाहर दरवाजे़ पर ओसारे में बैठी एक पड़ोसन से बतिया रही थीं। मुनमुन को बुख़ार था। इस लिए स्कूल नहीं गई थी। राधेश्याम आया। मोटरसाइकिल दरवाजे़ पर खड़ी कर ओसारे में आया। ख़ाली कुर्सी पर धप्प से बैठ गया। मुनमुन से बोला, ‘चलो मेरे साथ और अभी चलो!’

‘कहां?’ मुनमुन अचकचा गई। पूछा, ‘आप कौन?’

‘तो अब अपने मर्द को भी नहीं पहचानती?’ राधेश्याम मां की गाली देते हुए बोला, ‘पहचान लो आज से मैं तुम्हारा हसबैंड हूं।’

‘अरे?’ कह कर वह घर में भागी। राधेश्याम शराब के नशे में धुत था। आवाज़ लड़खड़ा रही थी पर उस ने लपक कर, मुनमुन को झपट्टा मार कर पकड़ लिया। बोला, ‘चल कुतिया अभी मेरे साथ चल!’

अम्मा ने हस्तक्षेप किया और हाथ जोड़ कर बोलीं, ‘भइया पहले चाय पानी तो कर लीजिए।’

‘हट बुढ़िया!’ अम्मा को राधेश्याम ने ढकेलते हुए कहा, ‘चाय पीने नहीं आया हूं। आज इस को ‘लेने’ आया हूं।’

अम्मा का सिर दीवार से टकरा कर फूट गया। और वह गिर कर रोने लगीं, ‘हे राम कोई बचाओ मेरी बेटी को।’ मुनमुन ने प्रतिरोध किया तो राधेश्याम ने उसे भी बाल पकड़ कर पीटना शुरू कर दिया। वहां बैठी पड़ोसन बचाव में आई तो उसे भी मां बहन की गालियां देते हुए लातों जूतों से पिटाई कर दी। चूंकि यह मार पीट घर के बाहर घट रही थी सो कुछ राहगीरों ने भी हस्तक्षेप किया और राधेश्याम से तीनों औरतों को छुड़ाया। राधेश्याम को दो तीन लोगों ने कस कर पकड़ा और औरतों से कहा कि, ‘आप लोग घर में चली जाइए।’

मुनमुन और उसकी अम्मा ने घर में जा कर भीतर से दरवाज़ा बंद कर लिया। पड़ोसन अपने घर भागी। फिर राहगीरों ने राधेश्याम को छोड़ा। राधेश्याम ने राहगीरों की भी मां बहन की। और बड़ी देर तक मुनमुन के घर का दरवाज़ा पीटता गरियाता रहा। फिर चला गया। घर का दरवाज़ा शाम को तभी खुला जब मुनक्का राय कचहरी से घर आए। उन्हों ने जब यह हाल सुना तो माथा पकड़ कर बैठ गए। बोले, ‘अब यही सब देखना बाक़ी रह गया है इस बुढ़ौती में? हे भगवान कौन सा पाप किया है जो यह दुर्गति हो रही है?’

थोड़ी देर में वह गए एक डाक्टर को पकड़ कर लाए। मां बेटी की सुई, दवाई, मरहम पट्टी कर के वह चला गया। देह के घाव तो दो चार दिन में सूख जाएंगे पर मन पर लगे घाव?

शायद कभी नहीं सूखेंगे। देह के घाव अभी ठीक से भरे भी नहीं थे कि अगले ह़ते राधेश्याम फिर आ धमका। अब की वह मोटरसाइकिल दरवाज़े पर खड़ी कर ही रहा था कि मां-बेटी भाग कर घर में घुस गईं और भीतर से दरवाज़ा बंद कर लिया। लेकिन राधेश्याम माना नहीं दरवाज़ा पीट-पीट कर गालियां बकता रहा और कहता रहा, ‘खोलो-खोलो आज ले कर जाऊंगा।’

लेकिन मुनमुन ने दरवाज़ा नहीं खोला। फिर राधेश्याम बगल के एक घर में गया। वहां भी गाली गलौज की। वह लोग जानते थे कि यह मुनक्का राय का दामाद है सो हाथ जोड़ कर उसे जाने को कहा। वह फिर मोटरसाइकिल ले कर गिरधारी राय के घर गया। जब उसे पता चला कि गिरधारी राय मर गए तो भगवान को संबोधित कर के कुछ गालियां बकीं। और चाय पीते-पीते उन की एक बहू को पकड़ लिया और बोला, ‘मुनमुन नहीं जा रही है तो तुम्हीं चलो। तुम पर भी हमार हक़ बनता है।’

गिरधारी राय के बेटे भी पियक्कड़ थे सो उन की बहू पियक्कड़ों से निपटना जानती थी। सो बोली ‘हां-हां क्यों नहीं पहले कपड़ा तो बदल लूं। आप तब तक बाहर बैठिए।’ कह कर उस ने राधेश्याम को बाहर बैठा कर भीतर से दरवाज़ा बंद कर लिया। राधेश्याम ने फिर यहां भी तांडव किया। दरवाज़ा पीट-पीट कर गालियों की बरसात कर दी। फिर तो आए दिन की बात हो गई राधेश्याम के लिए। वह पी-पा कर आता। उस को देखते ही औरतें घर के भीतर हो कर दरवाज़ा बंद कर लेतीं। मुनमुन के घर वह दरवाज़ा पीट-पीट कर गालियां बकता, पड़ोसियों के घर और फिर गिरधारी राय के घर भी। जैसे यह सब उस का रूटीन हो गया था। मुनमुन के घर तो वह पलट-पलट कर आता। कई-कई बार। जैसे मुनमुन के घर गाली गलौज कर पड़ोसी के घर जाता। फिर पलट कर मुनमुन के घर आता। फिर गिरधारी राय के यहां जाता। फिर मुनमुन के यहां आता। फिर किसी पड़ोसी, फिर मुनमुन। जब तक उस पर नशा सवार रहता वह आता-जाता रहता।

एक दिन राधेश्याम गाली गलौज के दो राउंड कर के जा चुका था कि मुनमुन का फुफेरा भाई दीपक आ गया मुनमुन के घर। यह फुफेरा भाई दिल्ली में रहता था और दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक कालेज में पढ़ाता था। दीपक बहुत दिनों बाद दिल्ली से अपने घर आया था तो सोचा कि मामा-मामी से भी मिलता चले। क्यों कि वह बचपन में अकसर मामा-मामी के पास आता था और मामी बड़े शौक़ से किसिम-किसिम के पकवान बना-बना कर उसे खिलाती रहती थीं। वह मामी के पास ह़फ्ते-ह़फ्ते रह जाता था गरमियों की छुट्टियों में। मामी उसे मानती भी बहुत थीं। तब मामी ख़ूब भरी-पुरी और ख़ूब सुंदर सी दीखतीं थीं। बिलकुल फ़िल्मी हिरोइनों की तरह सजी संवरी रहतीं। मामा भी सब के सामने ही उन से हंसी ठिठोली करते रहते। मुनमुन तब छोटी सी नटखट सी थी। मामा की प्रैक्टिस तब ख़ूब चटकी हुई थी। फ़ौजदारी और दीवानी दोनों में उन की चांदी थी। लक्ष्मी जी की अगाध कृपा थी उन दिनों मामा-मामी पर। कहने वाले कहते कि मुनमुन बड़ी भाग्यशाली है। बड़े भाग ले कर आई है। साक्षात लक्ष्मी बन कर आई है। ऐसा लोग कहते। ज़िले में उन दिनों बाह्मण-ठाकुर बाहुबलियों का बोलबाला था। और बांसगांव के पास सरे बाज़ार एक गुट के सात लोग जीप से उतार कर मार दिए गए थे। अगले ह़फ्ते ही दूसरे गुट ने अगले ग्रुप के नौ लोगों को एक बाज़ार में घेरा। पांच मार दिए सरे बाज़ार और चार नदी में कूद कर तैरते हुए जान बचा कर भाग गए। शहर में सरे शाम एक छात्र नेता की हत्या मुख्य बाज़ार में हो गई तो एक विधायक की हत्या सुबह-सुबह रेलवे स्टेशन पर हो गई। यह सारी ताबड़तोड़ हत्याएं बांसगांव के लोग ही कर करवा रहे थे।

बांसगांव तब तहसील नहीं, अपराध की भट्ठी बन गया था। धर पकड़ की जैसे महामारी मची थी। और इन्हीं दिनों मुनक्का राय की प्रैक्टिस जमी हुई थी। ज़मानत करवाने में वह माहिर थे। उन का कोर्ट में खड़ा होना मतलब ज़मानत पक्की! पर वह और दिन थे, यह और दिन। अब तो मामा की प्रैक्टिस चरमरा गई थी और वह हिरोइन सी दिखने वाली मामी की भरी-पुरी देह हैंगर पर टंगे कपड़े सी हो गई थी। देह क्या हड्डियों का ढांचा रह गई थीं-मामी। उन की देह की ढलान एक बेटे की मृत्यु के बाद जो शुरू हुई तो फिर नहीं रुकी। मामी के आज चार बेटे हैं पर पहले पांच बेटे थे। तरुण और राहुल के बीच का शेखर। शेखर ने बस हाई स्कूल विथ डिस्टिंक्शन पास किया ही था कि उस की तबीयत ख़राब रहने लगी। बांसगांव के डाक्टर इलाज कर-कर के थक गए तो शहर के डाक्टरों को दिखाया मुनक्का राय ने शेखर को। दुनिया भर की जांच पड़ताल के बाद पता चला कि शेखर की दोनों किडनी फेल हो गई हैं। डायलिसिस वग़ैरह शुरू हुई। और अंततः तय हुआ कि बनारस जा कर बी.एच.यू. में किडनी ट्रांसप्लांट करवाया जाए।

मुनक्का राय ख़ुद अपनी एक किडनी देने को तैयार हो गए। बोले, ‘बेटे के लिए कुछ भी करने को तैयार हूं मैं।’ फिर भी वह बेटे से कहते, ‘बाबू शेखर जो भी खाना हो खा लो, जो भी पहनना हो पहन लो फिर पता नहीं क्या हो? पर तुम्हारी कोई इच्छा शेष नहीं रहनी चाहिए। सारी इच्छाएं पूरी कर लो।’ पर शेखर अम्मा-बाबू जी की परेशानी देख कर कहता, ‘नहीं बाबू जी हम को कुछ नहीं चाहिए।’ फिर वह जैसे जोड़ता कि, ‘बाबू जी मत करवाइए हमारा आपरेशन। बहुत पैसा ख़र्च हो जाएगा।’ वह दरअसल देख रहा था कि बाबू जी की लगभग सारी कमाई उस के आपरेशन में दांव पर लगने जा रही थी। क़र्जा अलग से। सो वह कहता, ‘आपरेशन के बाद भी जाने मैं ठीक होऊंगा कि नहीं। रहने दीजिए।’

तो भी मुनक्का राय ने शेखर के किडनी ट्रांसप्लांट में होने वाले ख़र्च के लिए पूरी व्यवस्था जब कर ली तो एक दिन वह शहर गए। शेखर को ले कर। एक हार्ट स्पेशलिस्ट थे डाक्टर सरकारी। वह बी.एच.यू. के ही पढ़े हुए थे। उन के कोई परिचित डाक्टर बी.एच.यू. में थे जो किडनी ट्रांसप्लांट करते थे। उन के लिए सिफ़ारिशी चिट्ठी डाक्टर सरकारी से लिखवाने के लिए मुनक्का राय गए थे उन के पास। डाक्टर सरकारी के सामने शेखर को लिए वह बैठे हुए थे। बातचीत के बाद डाक्टर सरकारी चिट्ठी लिख ही रहे थे कि शेखर की छाती में अचानक ज़ोर से दर्द उठा। वह छटपटाने लगा। डाक्टर सरकारी ने चिट्ठी लिखनी छोड़ दी। दौड़ कर उसे अटेंड किया। उन का पूरा अमला लग गया शेखर को बचाने के लिए। लेकिन सोलह साल का शेखर जो किडनी का पेशेंट था, हार्ट स्पेशलिस्ट के सामने हार्ट अटैक का शिकार हो गया था। और वह हार्ट स्पेशलिस्ट लाख कोशिश के उसे बचा नहीं पाया। शेखर जब मरा तो मुनक्का राय की बाहों में ही था। वह रोते-बिलखते शेखर का शव लिए बांसगांव आए। शेखर की मां पछाड़ खा कर गिर पड़ीं। कई दिनों तक बेसुध रहीं। जवान बेटे की मौत ने उन्हें तोड़ दिया था। मुनक्का राय ख़ुद भी कहते, ‘जिस बाप के कंधे पर जवान बेटे की लाश आ जाए उस से बड़ा अभागा कोई और नहीं होता।’ टूटे फूटे मुनक्का राय बहुत दिनों तक कचहरी नहीं गए।

पर धीरे-धीरे वह संभले। जाने लगे कचहरी-वचहरी। पर शेखर की अम्मा नहीं संभलीं। शेखर की याद में, शेखर के ग़म में वह गलती गईं। फिर पारिवारिक समस्याएं एक-एक कर आती गईं और वह किसी मकान के किसी कच्ची दीवार की तरह धीरे-धीरे भहराती रहीं। गलती रहीं। फिर उन की सुंदर देहयष्टि उन से जैसे बिसरने लगी। रूठ गई। वह बीमार रहने लगीं। रही सही कसर मुनमुन की तकलीफ़, बेटों की उपेक्षा और अचानक आई दरिद्रता ने पूरी कर दी। वह किसी हैंगर पर टंगी कमीज की मानिंद चलता फिरता कंकाल हो गईं। जैसे वह नहीं, उन का ढांचा चलता था। उन की मांसलता, उन की सुंदरता, उन का बांकपन उन से विदा हो गया था। उन की कंटली चाल, उन के गालों के गड्ढे और उन की आंखों की शोख़ी जैसे किसी डायन ने सोख ली थी। तो भी इस मामी का ममत्व दीपक नहीं भूल पाता था। उन के वह सुख भरे दिन याद करता और जब-जब अपने गांव आता मामी के भी चरण छूने ज़रूर आ जाता बांसगांव।

तो इस बार भी आया दीपक बांसगांव। बड़ी देर तक दरवाज़ा पीटने पर धीरे से मुनमुन की मिमियाई हुई आवाज़ आई, ‘कौन?’

‘अरे मैं दीपक!’

‘अच्छा-अच्छा।’ मुनमुन ने पूछा, ‘कोई और तो नहीं है आप के साथ?’

‘नहीं तो मैं अकेला हूं।’

‘अच्छा-अच्छा!’ कहती हुई मुनमुन ने किसी तरह दरवाज़ा खोला। बोली, ‘भइया अंदर आ जाइए।’

दीपक के अंदर जाते ही उस ने तुरंत दरवाज़ा बंद कर लिया। मुनमुन और मामी दोनों के चेहरे पर दहशत देख कर दीपक ने पूछा कि, ‘आखि़र बात क्या है?’

‘बात अब एक हो तो बताएं भइया।’

कहती हुई मामी फफक पड़ीं। बोलीं, ‘बस यही जानो कि मुनमुन का भाग फूट गया और क्या बताएं?’ फिर मामी और मुनमुन ने बारी-बारी आपनी यातना और अपमान कथा का रेशा-रेशा उधेड़ कर रख दिया। सब कुछ सुन कर दीपक हतप्रभ हो गया। उस ने मुनमुन से कहा, ‘अगर ऐसा था तो तुम ने हम को बताया होता मैं चला गया होता शादी के पहले जांच पड़ताल कर आया होता।’

‘कहां भइया आप तो दिल्ली में थे। और फिर मैं ने यहां जितेंद्र भइया से कहा था पर वह भी टाल गए।’ जितेंद्र दीपक का छोटा भाई था और यहीं शहर में रहता था। रेलवे में काम करता था।

‘अच्छा!’ दीपक बोला, ‘ऐसा तो नहीं करना चाहिए था उसे। फिर भी तुम एक बार फ़ोन या चिट्ठी पर हमें बता तो सकती ही थी। और फिर जब शादी में आया था तब भी कह सकती थी।’

‘अब शादी के समय आप भी क्या कर सकते थे?’

‘खै़र, रमेश, धीरज या तरुण को यह सब जो कुछ हो रहा है बताया?’

‘वही लोग जो हम लोगों का ख़याल रखते तो उस पियक्कड़ की हिम्मत थी जो हम लोगों के साथ यह सब करता?’ दीपक के सामने चाय का कप रखती हुई मुनमुन बोली, ‘और फिर जो इतना मेरा ख़याल रखा होता तो यह पियक्कड़ और पागल मेरी जिंदगी में आया ही क्यों होता?’

‘ये तो है!’ दीपक धीरे से बोला।

‘जानते हैं भइया इस पियक्कड़ का चेहरा शादी में जयमाल के बाद फिर पिटाई के बाद ही मैं ने यहां देखा। लगभग पंद्रह दिन वहां ससुराल में रही तो कभी भूल कर भी इस की शकल देखने को नहीं मिली। दो तीन दिन बाद हार कर इस की बहनों और भाइयों से मैं ने पता करना शुरू किया कि तुम्हारे भइया कहां सोते हैं? तो पता चला कभी बाग में सो जाते हैं, कभी टयूबवेल पर, कभी कहीं तो कभी कहीं। क्या तो गंजेड़ियों अफीमचियों और चरसियों की महफ़िल जुटती है जहां तहां। तो लत के चक्कर में इस को अपनी बीवी की तब सुधि ही नहीं थी। अब हुई है तो आ कर मार पीट करने के लिए।’

‘बताओ तमाम नातेदारी, रिश्तेदारी में इस परिवार को लोग रश्क से देखते हैं। भाइयों के गुणगान करते नहीं थकते।’

‘कुछ नहीं भइया चिराग़ तले अंधेरा वैसे ही तो नहीं कहा गया है।’

‘ये तो है।’

यह सब देख सुन कर दीपक का मन ख़राब हो गया। सोचा था कि बांसगांव वह एक रात रह कर जाएगा। मामा-मामी से ख़ूब बतियाएगा। पर यहां का माहौल देख कर वह तुरंत चलने को तैयार हो गया। मामी ने कहा, ‘अरे आज तो रुको। शाम तक मामा भी आ जाएंगे। बिना उन से मिले चले जाओगे?’

‘मामा से अभी कचहरी जा कर मिल लूंगा।’ दीपक ने बहाना बनाया, ‘शहर में कुछ ज़रूरी काम निपटाना है। इस लिए जाना तो पड़ेगा।’

‘अच्छा भइया थोड़ी देर तो रुक जाइए। अम्मा कह रही हैं तो मान जाइए।’

‘चलो ठीक है। थोड़ी देर रुक जाता हूं।’ कह कर वह रुक गया। वह देख रहा था कि घर की समृद्धि, दरिद्रता में तब्दील हो रही थी। विपन्नता देह और देह के कपड़े लत्तों, घर के सामान, भोजन आदि में ही नहीं बातचीत में भी बिखरी पड़ी थी। बात-बात में उस ने मुनमुन से रमेश, धीरज और तरुण के फ़ोन नंबर ले लिए और कहा कि, ‘देखो मैं बात करता हूं फिर बताता हूं। और हां, राहुल का फ़ोन आए तो मेरा नंबर उसे देना और कहना कि मुझ से बात करे। और हां, अपना भी नंबर दो और अपनी ससुराल का भी नंबर दो। ताकि पूछूं कि वह यह हरकत क्यों कर रहा है?’

मुनमुन ने सब के नंबर दे कर दीपक का नंबर ख़ुद ले लिया। और बताया कि, ‘धीरज भइया का फ़ोन मिल पाना बहुत मुश्किल होता है। अव्वल तो उठता नहीं। उठता भी है तो कोई कर्मचारी उठाता है और उन्हें बाथरूम या मीटिंग में भेज देता है। बात नहीं कराता है।’

‘चलो फिर भी देखता हूं।’

‘और हां, जो मेरी ससुराल फ़ोन करिएगा तो हाथ पैर जोड़ कर उन सब का दिमाग़ मत ख़राब कीजिएगा। जो भी बात करिएगा वह सख़्ती से करिएगा।’

‘नहीं-नहीं यह बात तो मैं सख़्ती से करूंगा ही कि वह यहां इस तरह शराब पी कर न आया करे। यह तो कहना ही पड़ेगा।’

‘चाहिए तो अभी कर लीजिए।’ मुनमुन उत्साहित होती हुई बोली।

‘नहीं अभी नहीं।’ दीपक बोला, ‘पहले थोड़ी प्लानिंग कर लूं। रमेश, धीरज वगै़रह से भी राय मशविरा कर लें। तब। जल्दबाज़ी में यह सब ठीक नहीं है।’

‘चलिए जैसा आप ठीक समझिए।’ मुनमुन बोली, ‘पर भइया लोग आप को मेरे मसले पर शायद ही कोई राय मशविरा दें।’

‘क्यों?’

‘अरे कोई राय मशविरा होता तो लोग ख़ुद आ कर कोई उपाय नहीं करते?’ वह बोली, ‘एक बार घनश्याम राय के कहने पर रमेश भइया ज़रूर आए पर समस्या का कोई हल निकाले बिना चले गए। फिर पलट कर फ़ोन पर भी आज तक नहीं पूछा कि तुम लोग जिंदा भी हो कि मर गए? मेरी तो छोड़िए अम्मा बाबू जी की भी कोई ख़ैर ख़बर नहीं लेता। घर का ख़र्च वर्च कैसे चल रहा है, दवाई वग़ैरह का ख़र्च से किसी भइया को काई मतलब नहीं रह गया है।’ कहती हुई मुनमुन बिलकुल फायरी हो गई। और उस की अम्मा यानी दीपक की मामी निःशब्द रोने लग गईं। दीपक भी चुप ही रहा।

माहौल ग़मगीन हो गया था। फिर थोड़ी देर में मुनमुन ने ही सन्नाटा तोड़ा और बोली, ‘जाने किस जनम की दुश्मनी थी जो बाबू जी और भइया लोगों ने मिलजुल कर मुझ से निकाली है। जीते जी मुझे नरक के हवाले कर दिया है। दूसरे, यह आए दिन की मारपीट, बेइज़्ज़ती। अब तो मेरे स्कूल पर भी जब तब आता है और गरिया कर चला जाता है। आगे मेरी जिंदगी का क्या होगा, यह कोई नहीं सोचता।’ मुनमुन किसी बढ़ियाई नदी की तरह बोलती जा रही थी।

‘इस मार-पीट की रिपोर्ट तुम पुलिस में क्यों नहीं करती?’

‘कैसे करूं?’ मुनमुन बोली, ‘इस में भी तो अपनी ही बेइज़्ज़ती है। अभी दो चार घरों के लोग जानते हैं। फिर पूरा बांसगांव, गांव और जवार जान जाएगा। किस-किस को सफ़ाई देती फिरूंगी? फिर अख़बार और समाज हमें बिलकुल ही जीने नहीं देंगे।’

‘ये तो है।’

‘और फिर संबंधों के झगड़े पुलिस तो निपटा नहीं सकती। छिंछालेदर होगी सो अलग।’ वह बोली, ‘बाबू जी के पास ऐसे मामले आते रहते हैं, मैं देखती रहती हूं।’

‘ये तो है!’ दीपक बोला, ‘काफ़ी समझदार हो गई हो।’

‘परिस्थितियां सब को समझदार बना देती हैं।’ मुनमुन बोली, ‘मेरे ऊपर गुज़र रही है। मैं नहीं समझूंगी तो भला कौन समझेगा?’

‘चलो तुम्हारा हौसला ऐसे में भी बना हुआ है तो अच्छी बात है।’ दीपक बोला, ‘यह बड़ी बात है।’

‘अब आप जो कहिए।’ मुनमुन बोली, ‘मेरे नाम तो नरक का पट्टा लिखवा ही दिया है बाबू जी और भइया लोगों ने मिल कर।’

‘ऐसे दिल छोटा मत करो।’ वह बोला, ‘कोई न कोई उपाय निकलेगा ही। बस ऊपर वाले पर भरोसा रखो।’

‘अच्छा यह सब बिना ऊपर वाले की मर्ज़ी से हो रहा है क्या कि उस पर भरोसा रखूं?’

दीपक फिर चुप हो गया। थोड़ी देर में शाम हो गई। मुनक्का राय कचहरी से आए तो घर पर दीपक को देख कर ख़ुश हो गए। ख़ूब ख़ुश। दीपक ने उन के पैर छुए तो ढेरों आशीर्वाद देते हुए उसे गले से लगा लिया। बोले, ‘तब हो दीपक बाबू और क्या हाल चाल हैं? घर दुआर कैसा है? बाल बच्चे सब ठीक तो हैं न? और मेरी दीदी कैसी हैं? और हमारे जीजा जी कैसे हैं?’

‘आप के आशीर्वाद से सभी ठीक हैं।’ दीपक बोला, ‘और आप कैसे हैं?’

‘हम तो दीपक बाबू बस जाही विधि राखे राम ताही विधि रहिए पर हैं।’ वह बैठे-बैठे छत निहारते हुए बोले, ‘बस राम जी ज़रा नज़र फेर लिए हैं आज कल हम से। और क्या कहें!’ मुनक्का राय हताश होते हुए बोले, ‘बाक़ी हालचाल मिल ही गया होगा अब तक!’ वह मुनमुन की ओर आंख से इशारा करते हुए बोले। दीपक ने उदास हो कर मुंह बिचकाते हुए स्वीकृति में सिर हिलाया।

‘बड़े-बड़े मुक़दमे निपटाए। जिरह और बहस की। दुनिया भर का झमेला देखा। सौतेली मां देखी जाने कितनी गरमी बरसात देखी। सब को फे़स किया। बहादुरी से फे़स किया। उस अभागे-नालायक़ गिरधारी भाई को फे़स किया। पर बाबू दीपक, जिंदगी के इस मोड़ पर यहां आ कर हम पटकनी खा गए। पटका गए। इस की कोई काट नहीं मिल रही।’ कहते हुए मुनक्का राय का गला रुंध गया, आंखें बह चलीं। आगे वह कुछ बोल नहीं पाए।

दीपक फिर चुप रहा। मामा के घर आए प्रलय की आंच अब वह और सघन रूप से महसूस कर रहा था। ऐसी विपत्ति में उस ने अभी तक पारिवारिक स्तर पर किसी को भी नहीं देखा था। इस समय मामा के घर में फैला सन्नाटा टूट नहीं रहा था। शाम गहराती जा रही थी, साथ ही डूबते सूरज की लाली भी। कि अचानक बिजली आ गई।

दीपक उठा खड़ा हुआ। बोला, ‘मामा जी आप से भी भेंट हो गई अब आज्ञा दीजिए।’

‘अरे दीपक बाबू आज रहिए। कल जाइएगा।’ मुनक्का राय उसे रोकते हुए बोले, ‘कुछ दुख-सुख बतियाएंगे।’

‘नहीं मामा जी कुछ ज़रूरी काम है शहर में। जाना ज़रूरी है।’

‘ज़रूरी काम है तो फिर कैसे रोक सकता हूं। जाइए।’ किंचित खिन्न होते हुए बोले मुनक्का राय।

दीपक ने मामा मामी के पैर छुए और मुनमुन ने दीपक के। चलते-चलते दीपक ने मुनमुन से फिर कहा, ‘घबराओ नहीं कोई रास्ता निकालते हैं।’

हालां कि दीपक चला था शहर के लिए पर शहर जाने के बजाय वापस अपने गांव आ गया। घर पहुंच कर दीपक ने अपने अम्मा बाबू जी को मामा-मामी और मुनमुन की व्यथा-कथा बताई। दीपक के अम्मा बाबू जी ने भी इस पर अफ़सोस जताया। पर अम्मा धीरे से बोलीं, ‘पर मुनमुन भी कम नहीं है।’

दीपक ने कोई प्रतिवाद नहीं किया। पर मामा-मामी और मुनमुन का दुख उसे परेशान करता रहा। बाद में उस ने छोटे भाई जितेंद्र से भी इस बारे में बात की। तो जितेंद्र ने भी माना कि, ‘मुनमुन की शादी ग़लत हो गई है।’

‘पर जब मुनमुन ने तुम से कहा कि एक बार शादी के पहले लड़का देख लो तो तुम्हें लड़का देख कर वस्तुस्थिति बता देनी चाहिए थी।’

‘क्या बताता?’

‘क्यों दिक्क़त क्या थी?’

‘दिक्क़त यह थी कि मैं बियहकटवा डिक्लेयर हो जाता।’

‘क्या बेवकू़फी की बात करते हो?’ दीपक बोला, ‘यह शादी होने से अच्छा था कि तुम भले बियहकटवा डिक्लेयर हो जाते यह शादी तो रद्द हो जाती।’

‘मैं ने मामा से बात की थी। मुनमुन के कहने पर कि एक बार मैं भी चलना चाहता हूं लड़का देखने। पर मामा बोले-सब ठीक है तिलक में चल कर लड़का देख लेना। फिर मैं ने धीरज भइया से बात की तो वह बोले रमेश भइया का पुराना मुवक्क़िल है। सब जाना पहचाना है। घबराने की बात नहीं है। तो मैं क्या करता?’ जितेंद्र बोला, ‘जब सारा घर तैयार था मैं अकेला क्या करता?’

‘तुम ने रमेश से बात की?’

‘नहीं। उन से बात करने की हिम्मत नहीं पड़ी मेरी।’

‘तो एक बार मुझ से ज़िक्र किया होता।’ दीपक बोला, ‘तुम क्या समझते हो यह सब जो हो रहा है मुनमुन के साथ इस में क्या हम लोगों की भी बेइज़्ज़ती नहीं हो रही? आख़िर ननिहाल है हम लोगों का। हम लोगों की देह में वहां का भी ख़ून है। उस दूध का क़र्ज़ है हम पर। यह बात तुम कैसे भूल गए? हमारी भी कुछ ज़िम्मेदारी बनती थी।’

‘हां, यह ग़लती तो हो गई भइया।’ जितेंद्र सिर झुका कर धीरे से बोला।

दीपक को उस रात खाना अच्छा नहीं लगा। दिल्ली लौट कर भी वह बहुत दिनों तक अनमना रहा। एक दिन उस ने पत्नी को मुनमुन की समस्या बताई और कहा कि, ‘तुम्हीं बताओ क्या रास्ता निकाला जाए?’

‘उन के घर में एक से एक जज, कलक्टर बैठे हैं। वह लोग नहीं समाधान निकाल पा रहे हैं तो अब आप निकालेंगे?’ वह बोली, ‘अपनी समस्याएं क्या कम हैं?’

‘वो तो ठीक है पर हम लोग भी कोशिश तो कर ही सकते हैं।’

‘चलिए सोचती हूं।’ कह कर दीपक की पत्नी सो गई।

पर दीपक नहीं सोया। उस ने रमेश को फ़ोन मिलाया। और बताया कि, ‘पिछले दिनों बांसगांव गया था। मुनमुन के बारे में जान कर दुख हुआ। तुम लोग आखि़र क्या सोच रहे हो?’

‘हम तो भइया कुछ सोच ही नहीं पा रहे हैं।’ रमेश बोला, ‘हम लोगों में आप सब से बड़े हैं आप ही कुछ सोचिए और कोई रास्ता निकालिए। आप जो और जैसे कहिएगा मैं तैयार हूं।’

‘पर तुम लोगों ने ऐसी बेवक़ूफी की शादी आंख मूंद कर कैसे कर दी?’

‘अब तो भइया ग़लती हो गई।’

‘तुम लोगों को पता है कि मुनमुन का हसबैंड पी पा कर जब-तब बांसगांव आ जाता है और मुनमुन तथा मामी की पिटाई कर, गाली गलौज करता है। जीना मुश्किल किए है वहां वह उन लोगों का?’

‘अरे यह क्या बता रहे हैं आप? यह तो नहीं पता था।’

‘अब सोचो कि तुम अब अपने घर की ख़बर से भी बेख़बर हो। वृद्ध मां बाप और जवान बहन कैसे रह रहे हैं, इस से तुम सभी भाइयों का कोई सरोकार ही नहीं रहा?’ दीपक बोला, ‘भई यह तो ठीक बात नहीं है।’

‘क्या बताऊं भइया।’ रमेश सकुचाते हुए बोला, ‘देखता हूं।’

‘कम से कम तुम घर में सब से बड़े हो, तुम्हें तो यह सब सोचना ही चाहिए।’ दीपक बोला, ‘चलो मुनमुन की समस्या बड़ी है दो चार दिन में तो नहीं सुलझती पर मामा-मामी के वेलफ़ेयर का इंतज़ाम तो तुम लोगों को करना ही चाहिए। समझो कि वह लोग साक्षात नरक जी रहे हैं। और तुम लोगों के जीते जी। यह बात कम से कम मुझे तो ठीक नहीं लगती।’

पर उधर से रमेश चुप ही रहा। दीपक ने ही उसे कोंचा, ‘चुप क्यों हो बोलते क्यों नहीं?’

‘जी भइया।’ रमेश धीरे से बोला।

‘नहीं मेरी बात अगर अच्छी नहीं लग रही तो फ़ोन रखता हूं।’

‘नहीं-नहीं ऐसी बात नहीं है।’
‘तो ठीक है। सोचना इन बातों पर। और हां, मुनमुन के बारे में भी।’

‘ठीक भइया। प्रणाम।


                                                                                                                                                                  क्रमशः...

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                                                                                                                                                               स्मृति शेष


                                                                                                                                                         रूपसिंह चन्देल


                   बड़ी दीदी

शुक्रवार 29 अप्रैल,2005 का गर्मीभरा दिन। मुझे कनॉट प्लेस स्थित कॉफी होम में अपने दो मित्रों से पांच बजे मिलना था। सुबह नौ बजे से अपरान्ह दो बजे तक लियो तोलस्तोय के अंतिम उपन्यास हाज़ी मुराद का अनुवाद कार्य करता रहा। स्वैच्छिक सेवावकाश ग्रहण करने के पश्चात् सबसे पहला काम मैंने दो वर्षों से स्थगित होते आ रहे उस कार्य को सम्पन्न करने का किया था।

उस दिन कॉफी होम बंद होने तक हम वहां बैठे रहे। जब लोग चले गए और कर्मचारियों ने मेजें खिसकाना प्रारंभ किया हम बाहर निकल आए। बाहर भी कुछ देर बातें करते रहे... साहित्यिक बातें। रात जब साढ़े नौ बजे के लगभग मैं घर पहुंचा, पता चला शाम पांच बजे से नौ बजे के मध्य कानपुर से तीन फोन आ चुके थे।

''क्यों?''

''दीदी नहीं रहीं।''

''कब?''

''आज शाम चार बजे।''

'दीदी' - यानी मेरी बड़ी बहन भाग्यवती, जो नाम से ही भाग्यवती थीं और जब तक पिता के घर रहीं भाग्यवती ही रहीं, लेकिन पति के घर जाते ही दुर्भाग्य ने जो एक बार उन्हें अपने फंदे में लपेटा तो मृत्युपर्यंत वह उसके फंदे को काट नहीं पायीं।

अशांत मन कुछ देर मैं कानपुर पहुंचने पर विचार करता रहा। समय नष्ट न कर मैंने रेलवे इन्क्वारी फोन मिलाकर कानपुर जाने वाली अंतिम ट्रेन के विषय में जानकारी मांगी। ज्ञात हुआ कि अंतिम ट्रेन साढ़े दस बजे रात की थी। उस ट्रेन को पकड़ना असंभव था। छोटे भाई राजकुमार को कानपुर फोन करके वस्तुस्थिति स्पष्ट कर अंत्येष्टि के विषय में पूछा। ज्ञात हुआ कि सुबह दस बजे तक सम्पन्न हो जाएगी।  

'अब?' मैं सोचता रहा और रातभर सो नहीं पाया।

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मैं जब डेढ़ वर्ष का था, बड़ी दीदी का विवाह कर दिया गया था। पिता जी कलकत्ता में थे। मां को किसी ने सुझाया कि उनकी बबनी के लिए उसने एक सुयोग्य वर देखा है कानपुर से तीस मील दूर पियासी नामके गांव में (बाद में इस गांव का नाम भरतपुर पड़ा)। यह गांव कानपुर के घाटमपुर तहसील में है जिसका निकटतम रेलवे स्टेशन पतारा वहां से छ: मील है। उन दिनों वहां पहुंचने के लिए पैदल के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था। मेरे बहनोई की सुयोग्यता यह थी कि तीन भाइयों में वह सबसे छोटे थे, लगभग तीस-पैंतीस बीघा उपजाऊ खेत और भाइयों ने उन्हें पहलवानी की छूट दे रखी थी। हालांकि वह मुझे कभी पहलवान जैसे नहीं दिखे। होश संभालने पर जब भी उन्हें देखा--लंबे, छरहरे,सांवले, लंबोतरे चेहरे पर छोटा-सा मुंह, छोटे बाल, छोटी आंखें, हड्डियां निकलीं, उभरी नाक। भाइयों की छूट ने उन्हें आलसी और निकम्मा बना दिया था। दोनों बड़े भाई खेत संभालते और अपने व्यवसाय भी, लेकिन सदन सिंह सेंगर...यही नाम है मेरे बहनोई का, तहमद बांधे गांव में घूमते...अपने हमउम्रों के साथ किसी चौपाल में ताश फेट रहे होते।

दीदी का जब विवाह हुआ वह तेरह-चौदह साल की थीं। दो-तीन वर्षों तक वह अच्छी बहू...देवरानी के रूप में ससुराल में रहीं। उनके सास-श्वसुर नहीं थे। भाइयों ने सोचा होगा कि शादी के पश्चात् सदन सिंह अपनी जिम्मेदारी अनुभव करेंगे और पहलवानी के साथ, जिसके लिए सुबह-शाम अखाड़े में उतरने की आवश्यकता होती है, के बाद खेतों की ओर ध्यान देंगे, लेकिन पचीस-छब्बीस वर्ष की उम्र तक खेत-खलिहान से मुक्त रहे सदन सिंह को वह सब रास नहीं आया। भाइयों की बात की उपेक्षा कर वह बदस्तूर चौपालों की शोभा बढ़ाते रहे और घर में वातावरण तनावपूर्ण होने लगा। दीदी पति के लिए दिए जाने वाले ताने सुनने को विवश थीं। अंतत: उन्होंने स्वयं कमर कसी और खेत-खलिहान तो नहीं, लेकिन घर के काम के साथ घेर का काम करने का विचार किया और एक दिन सुबह जब सदन सिंह के दोनों भाई जानवरों के सानी-चारा के लिए घेर में पहुंचे देखकर हैरान-परेशान रह गए कि उनकी छोटकी बहू जानवरों के नीचे का गोबर एकत्र कर चुकी थी। भूसे में रातिब मिलाकर भैंसों और बैलों के सामने डाल चुकी थीं और जानवर नांद में भकर-भकर मुंह मार रहे थे।

''छोटकी, मैं यह क्या देख रहा हूं?'' मंझले जेठ बदन सिंह बोले, ''सदन लंबी तानकर सो रहे हैं और तुम.....।''

छोटकी ने घूंघट सिर से नीचे खींच लिया, और जानवरों के नीचे झाड़ू लगाना जारी रखा। बोली नहीं। बदन सिंह का पुरुषत्व कोई उत्तर न पाकर आहत हुआ। घेर घर से सटा हुआ था। वह पलटे जबकि बड़े जेठ खड़े रहे...अपने बड़प्पन के बोझ तले दबे। बदन सिंह ने घर जाकर अपनी पत्नी से छोटकी की शिकायत की, ''यह क्या तमाशा है राकेश की अम्मा...छोटकी नाक कटवाने पर तुली हुई है इस खानदान की।''

''का हुआ...?''

''चलकर घेर में देखो।''

और छोटकी की दोनों जेठानियां मिनटों में घेर में हाज़िर थीं। शोर सुनकर सदन सिंह भी अपनी तहमद संभालते घेर जा पहुंचे। छोटकी किंकर्तव्यविमूढ़ हाथ में झाड़ू थाम घूंघट को और नीचे तक सरकाकर खड़ी हो गयीं।

''बदजात, मैं यह क्या तमाशा देख रहा हूं?'' सदन सिंह फुंकारे। उनका पुरुष अहं जाग्रत हो उठा था। छोटकी सोच ही रही थीं कि पति के स्थान पर स्वयं काम करके उन्होंने क्या अपराध किया था।' लेकिन उनकी सोच पूरी भी नहीं हुई थी कि सदन सिंह का मुगदर उठाने वाला हाथ उनकी पीठ पर पड़ा था और छोटकी 'हा, अम्मा...।' के चीत्कार के साथ छाती थाम ज़मीन पर बैठ गयी थीं। जिस अम्मा को उन्होंने याद किया था उसे गलियाते सदन सिंह के हाथ-पांव छोटकी पर चल रहे थे और उनके भाई-भौजाई मुंह बांधे दृश्य देख रहे थे। वे पुलकित थे या दुखी कहना कठिन है, लेकिन सदन सिंह ने पत्नी को उस दिन इतना पीटा कि पन्द्रह दिनों तक वह बिस्तर पर पड़ी दूध में हल्दी पीकर आंतरिक चोटों के ठीक होने का इंतज़ार करती रही थीं।

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दीदी की प्रताड़ना की अनंत कथाएं हैं। सदन सिंह का हाथ खुल चुका था...अब वह मामूली-सी बातों पद भी दीदी पर बरस पड़ता। दीदी पिटती, मां-पिता को याद करतीं...छटपटातीं और उसी खूंटे से बंधी रहतीं। मां...जिन तक समाचार पहुंचाना उनके लिए सहज न था। पढ़ना-लिखना उन्हें बखूबी आता था...अपढ़ मां-पिता ने अपनी संतानों को पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन उन दिनों गांव के निकट के गांव में मात्र प्राइमरी तक शिक्षा की ही सुविधा थी। आगे पढ़ने के लिए तीन: मील दूर जाना पड़ता। दीदी की पढ़ाई में पहली बाधा दूर जाने की थी और दूसरी बाधा उस परिचित ने ला उपस्थित की थी जिसने सदन सिंह की सुयोग्यता का ऐसा दृश्य उपस्थित किया  था कि मां ने उस सुयोग्य वर को छोड़ना उचित नहीं समझा था। दीदी पांचवीं तक ही पढ़ सकी थीं। लेकिन ''सर्वश्री उपमा योग भगवान की किरपा से.....'' से प्रारंभ कर पत्र लिखना उन्हें आता था। लेकिन एक अंतर्देशीय लिखकर उसे दूर गांव स्थित पोस्ट आफिस में छोड़ने की व्यवस्था वह कैसे करतीं और मां भी क्या उनकी सहायता के लिए दौड़ आतीं! भले ही वह अक्खड़, खुद्वार और निर्भीक थीं...किसी से भी न दबने वालीं, लेकिन यहां मामला कुछ और ही था। लड़की की ससुराल से जुड़ा मामला.....अति संवेदनशील। मेरे पिता और बड़े भाई कलकत्ता में थे। दीदी अपनी स्थितियां और सीमाएं जानती थीं और यातना सहने के लिए अभिशप्त थीं। उधर उनकी ससुराल का वातावरण अधिकाधिक तनावपूर्ण होता जा रहा था। जेठानियां देवर के खुल चुके हाथ का आनंद लेने लगी थीं और उनके कान भी भरने लगी थीं। दीदी की मामूली त्रुटि भी उनके लिए प्रताड़ना का कारण बन जाती। प्रताड़ना ऐसी कि आह भरने पर भी प्रतिबंध था। आखिर एक दिन पीड़ा फूट ही पड़ी थी। आंगन में पहले दिन के घेर का दृश्य उपस्थित था। सदन सिंह के लात-घूंसों की बौछार के बीच फुंकार उठी थीं रामदुलारी की बेटी, ''बहुत हो चुका...आप डांव-डांव घूमो और मैं यहां ताने सुनूं। मार डालो वह अच्छा, लेकिन ताने नहीं सुन सकती। खेतों में निराई करने गई थी...चोरी-छिनारा करने नहीं। आप अपने शरीर को नहीं खटा सकते, अपने हिस्से के काम के लिए मजदूर रखने की तौफीक पैदा नहीं कर सकते तो कोई तो काम करेगा ही...या तो खेतों में सब के बराबर काम करें या मुझे करने दें और अगर वह भी स्वीकार नही तो मुझे मेरे मायके छोड़ दें...फिर जो मन आए करें....।''

पहली बार दीदी की आवाज फूटी थी और वह भी सदन सिंह के दोनों भाइयों और भौजाइयों के सामने और सदन सिंह के हाथ रुक गए थे। हालांकि वह रुकावट अस्थाई साबित हुई थी, लेकिन दीदी को लगा था कि उनकी बात का असर हुआ था पति पर। और हुआ था...अगली सुबह सदन सिंह के दोनों भाइयों ने देखा था कि हल कंधे पर रख सदन बैलों के साथ खेतों की ओर जा रहे थे। लेकिन अनभ्यस्त हाथ और खेत में टेढ़े-मेझे चलते पैरों ने कुछ देर सही खेत जोतने के बाद हल की कुशिया जमीन में धंसकर चलने के बजाए मात्र रेखा-सी खींचती चलने लगी थी और ऐसी स्थिति में जो होना था वह हुआ। कुशिया का फाल उछलकर सदन सिंह के पैर में जा धंसा था। हल छूट गया था और सदन सिंह लंगड़ाते, खून बहाते पैर घसीटते सड़क किनारे एक खेत की मेड़ पर खड़े आम के पेड़ की ओर दौड़ पड़े थे। बैल उनके बिना जमीन पर बेड़ा पड़े घिसटते हल को तब भी खींच रहे थे। संयोग था कि दोनों बड़े भाई उसी समय वहां पहुंचे थे। एक ने दौड़कर हल को बैलों से अलग किया था, क्योंकि जो गति कुशिया ने सदन सिंह के पैर की की थी, वह दोनों बैलों के पैरों की होनी निश्चित थी।

सदन सिंह के घायल होने का दोष भी दीदी के सिर पड़ा। 'कुलच्छनी, गृहतोड़नी-बोरनी' जैसी कितनी ही उपमाओं से उन्हें विभूषित होना पड़ा और अपराधबोध से ग्रस्त वह भी अपने को वैसा ही मान रही थीं।

''मैं इसकी शक्ल नहीं देखना चाहता।'' सदन सिंह का फरमान जारी हुआ तो निर्णय किया गया कि उन्हें मायके पहुंचा दिया जाए। गांव के किसी व्यक्ति के साथ दीदी को मायके भेज दिया गया। मायके आने के बाद मां को दीदी की दारुण स्थिति ज्ञात हुई। तीन या चार महीना ही वह मायके में रही थीं कि एक दिन सफेद झक धोती-कुर्ता पहने चमरौधा चटकाते शाम आगरा-इलाहाबाद पैसेंजर से सदन सिंह प्रकट हुए। वह दीदी को लेने आए थे। दामाद बेटी को ले जाने आया था, मां ने दबी जुबान उनसे शिकायत की और दामाद ने मुस्कराकर कहा, ''अरे अम्मा, मैंने तो आपकी बिटिया की खेतों में काम करने से बदन में लगी धूल झाड़ी थी...अब आपको शिकायत का मौका नहीं मिलेगा। मैंने परचून की दुकान खोल ली है। खेतों में काम करने के लिए अपनी जगह एक मजदूर लगा दिया है। किसी को कहने का मौका नहीं दूंगा...आप निश्चिंत रहें अम्मा...।''

और मां निश्चिंत हुई थीं, लेकिन दीदी नहीं। वह सेंगरों के छद्म को भलीभांति पहचान चुकी थीं। और ससुराल पहुंचने के कुछ दिनों बाद ही उनकी आशंका सही सिध्द हुई थी। सदन सिंह ने दुकान तो कर ली थी, लेकिन वह ताश खेलने वालों का अड्डा बन गयी थी। गांव के उनके आवारा साथी वहां एकत्र होते...मुफ्त की बीड़ी-सिगरेट फूंकते...जल्दी ही दुकान घाटे का सौदा सिध्द हुई। सदन सिंह न कभी अपने प्रति जिम्मेदार हुए न घर के प्रति और न पत्नी के प्रति। भाइयों में कसमसाहट हो रही थी।

''ऐसा कब तक चलेगा?'' का प्रश्न दोनों बड़े भाइयों के बीच उछलने लगा था, ''हम खटें-कमाएं और सदन मौज करें। छोटकी हल तो नहीं चला सकती...घूर तक जाकर गोबर नहीं फेक सकती....।''

छोटकी ने सुना। हल वह भले ही नहीं चला सकती थीं, लेकिन गोबर, सानी-पानी, निराई,गोड़ाई, बुआई से लेकर जानवरों के लिए मशीन पर कुट्टी काटने जैसे काम छोटकी ने अपने सिर ओढ़ लिया। अब उनके इन सब कामों का विरोध भी कम हो चुका था। गांव में नाक कट चुकी थी, लेकिन वह नाक तो गांव के और भी कितने ही निखट्टू पतियों की उनकी पत्नियों के कारण पहले ही कट चुकी थी।

 

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समय बीतता रहा। दीदी दो बेटियों और दो बेटों की मां बन गयीं। पारिवारिक विग्रह बढ़ा और भाइयों में बटवारा हो गया। बटवारा सदन सिंह को सबक सिखाने के लिए था, लेकिन दूसरे के श्रम पर गुलछर्रे उड़ाने वाले कम लोग ही अपने को संभाल पाते हैं। सदन सिंह ने अपने हिस्से के खेत तिहाई पर दे दिए और स्वयं तहमद बांधे गांव में घूमते रहे। दीदी ने घर-खेत की जिम्मेदारी संभालीं, बच्चों की पढ़ाई और बड़ी बेटी के विवाह की चिन्ता ने उन्हें वह सब करने के लिए विवश किया जो किसी पुरुष किसान को करना होता है। इस सबके बावजूद सदन सिंह का कोपभाजन वह जब-तब होती रहीं, लेकिन बटवारे के बाद दीदी के अथक श्रम पर जीने वाले उस इंसान का साहस दीदी पर हाथ उठाने का कम ही होने लगा था। शायद एक कारण बड़े होते बच्चे रहे हों। दीदी ने अठारह की होते  हीे बड़ी बेटी का विवाह कर दिया था।

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दीदी ने नानी जैसा स्वभाव पाया था। घोर अपमान और प्रताड़ना सहकर भी परिवार के लिए समर्पित रहना क्या भारतीय ग्राम्य नारी की नियति है! दीदी ने अपने बल पर अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर ली थी। 1962 से 1965 के मध्य जब मायके की आर्थिक स्थिति दयनीय हो गयी थी, दीदी ने पति से छुपाकर सहायता की थी। उन्हीं दिनों पिता ने शादी के समय उन्हें एक सेर चांदी के दिए वे कड़े बहुत ही भारी मन से मांगा था, जिन्हें देते समय पिता जी ने कहा था, ''बेटा, ईश्वर न करे मुझे ये मांगना पड़े, लेकिन यदि ऐसी स्थिति आ ही जाएगी तब तुम इन्हें अपने भाइयों के लिए दे देना। और यह बात सदन को भी बता देना।''

मुझे याद है कड़े मांगने से पहले मां-पिता जी के बीच हुई वार्तालाप और दोनों के चेहरों के भाव। पिता के चेहरे के भाव बयां कर रहे थे कि बेटी से कड़े मांगने से पहले वे मर क्यों नहीं जाते। लेकिन वे मरे नहीं थे। उन्हें शेष परिवार के पोषण के लिए बेटी को अपनी कही बात याद दिलानी ही पड़ी थी और दीदी ने सहेजकर रखे वे कड़े पिता जी के हवाले कर दिए थे। शायद उन्होंने कभी उन्हें पैरों में नहीं डाला था। छोटे कद का कर्मठता का गवाह उनका दुबला शरीर शायद आध-आघ सेर के कड़ों का वजन पैरों पर स्वीकार करने से इंकार कर देता।

जिन दिनों हम बहनोई को दीदी के विरुध्द किसी प्रताड़ना के लिए रोकने की स्थिति में आ गए थे उन दिनों उनका कहर थमा हुआ था। कारण था घर-खेतों में दीदी की जूझ और बच्चों की परवरिश। बच्चों के लिए सदन सिंह भी चिन्तित दिखने लगे थे और इसी कारण जब बड़ा बेटा छठवीं क्लास में पहुंचा, वह उसे शहर में पढ़ाने के लिए बड़े भाई साहब के पास छोड़ गए थे। उन दिनों मेरा छोटा भाई भी छठवीं में बड़े भाई साहब के पास रहकर पढ़ रहा था। उसे पढ़ाई की परवाह नहीं थी। हम लोगों की डांट-फटकार ...यहां तक कि मारपीट भी उस पर बेअसर थी। उसके साथ राघवेन्द्र की पढ़ाई चौपट होने का खतरा भांप भाई साहब ने बहनोई को उसे वापस ले जाने के लिए संदेश भेजा। यह बात उन्हें नागवार लगनी थी...और लगी। लेकिन दीदी तो दीदी थीं...उन्होंने कभी नाराज होना जाना ही नहीं था।

 

बड़े बेटे ने इंटर करने के बाद एयर फोर्स ज्वायन किया तो दीदी को लगा कि उनके दुख के दिन बीतने वाले हैं। लेकिन कुछ ही वर्षों में उनका भ्रमभंग हो गया था। बड़ा बेटा पिता के नक्शे-कदम पर था...खानदान का प्रभाव। मां के प्रति पिता के दर्ुव्यवहार के लिए वह मां को दोष देता....उसके सामने भी बहनोई दीदी को पीटते और वह प्रस्तर मूर्ति बना रहता। लेकिन छोटा बेटा जिसे हम पप्पू पुकारते थे, मन ही मन पिता के प्रति विद्रोही हो रहा था। उसने इंटर किया तो पिता ने उसे खेतों में काम करने की सलाह दी। वह चुप रहा, लेकिन तभी एक दिन किसी बात पर बहनोई ने दीदी पर हाथ उठा दिया। पप्पू घर में था। दीदी पर पिता का हाथ पड़ता इससे पहले ही दौड़कर उसने उनका हाथ पकड़ लिया और ऊंची आवाज में बोला, ''चाचा (बड़े भाई के बच्चों का अनुसरण करते हुए मेरे भांजे-भांजियां भी पिता को चाचा कहने लगे थे) जब से होश संभाला आपको अम्मा को मारता-पीटता देखता रहा...अब नहीं। खैरियत इसी में है कि अब आप यह सब बंद कर दें।''

विवाद बढ़ा। सदन सिंह नाग की भांति फुंकारते उछलते रहे, लेकिन जवान बेटे के सामने कुछ करने में असमर्थ थे, जो उनसे भी लंबा दो इंच कम छ: फुट का था।

''आज और अभी निकल जा घर से....।'' सदन सिंह चीखे थे। पप्पू ने घर छोड़ दिया, लेकिन दीदी उसके पीछे दौड़ीं और गांव के छोर पर उसे रोककर समझाने में सफल रहीं कि उसके जाने के बाद पति का उनके प्रति दर्ुव्यहार बढ़ जाएगा जो कुछ वर्षों से थमा हुआ था। पप्पू लौट आया। वास्तव में पति से भय से अधिक एक मां की पुत्र के प्रति ममता ने उन्हें उसे लौटा लाने के लिए दौड़ाया था।

पप्पू के लौट आने से सदन सिंह की खीझ बढ़ गयी, लेकिन अब उम्र जवान खून का सामना करने की न रही थी। छटपटाकर रह गए थे सदन सिंह।     

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नवंबर, 1984 के अंत में दीदी बड़े बेटे के साथ मेरे यहां आयीं। अवकाश समाप्तकर भुज वापस लौटते समय बेटा उन्हें मेरे यहां छोड़ गया। चार माह रहीं वह। उन्ही दिनों पप्पू को पिता ने घर से निकाल बाहर किया। वह भी दिल्ली आ गया। स्टेशन से सीधे मां से मिलने मेरे यहां आया। उसने रात बितायी। दीदी ने उसे गांव लौट जाने के लिए समझाया, लेकिन वह वापस न लौटने के दृढ़ निश्चय के साथ आया था। अगले दिन वह अपने बहनोई के किसी रिश्तेदार के यहां बुध्दविहार चला गया। दीदी के रहते वह दो बार उनसे मिलने कुछ घण्टे के लिए आया। उसने किसी एक्सपोर्ट कंपनी में एकाउण्ट्स का का काम संभाल लिया था। वह लंबा,स्वस्थ-सुदर्शन युवक था।

चार माह बाद पति की बीमारी का समाचार पाकर दीदी गांव चली गयीं। मैं उनके निर्णय पर सोचने लगा था कि जिस पति ने आजीवन उन्हें सताया उसकी मामूली बीमारी के समाचार ने उन्हें विचलित कर दिया...क्या यही भारतीय नारी का वास्तविक स्वरूप है! शायद परंपरा से उसे यह सिखाया जाता रहा कि वही घर की असली संरक्षिका है...वह सर्व-स्वरूपा है। पुरुषों ने नारी को बांध रखने के कितने ही छद्म किए...वह प्रताड़ित भी होती रही और प्रताड़ित करने वालों के लिए मरने को भी तैयार होती रही। सत्यवान कैसा भी हो उसे सावित्री ही बनना होता है। मैं नहीं चाहता था कि वह जाएं , लेकिन उन्होंने मेरे सुझाव को दरकिनार कर दिया था।

''खेत कटने के लिए तैयार हैं रूप...अगर वह सच ही बीमार हैं तब न जांये ते आधी पैदावार ही मिलेगी।''

बहनोई की बीमारी शायद खेतों को लेकर ही थी और इसे दीदी ने भांप लिया था।

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दीदी ने छोटी बेटी की भी शादी कर दी और अब उनके दिन ठीक बीत रहे थे। 1994 में उन्होंने छोटे बेटे का विवाह निश्चित किया। 12 या तेरह मार्च को शादी होनी थी। पप्पू हम लोगों से मिलकर और ''शादी में आप सब अवश्य आना मामा....।'' कहकर कानपुर गया, लेकिन शादी से दो दिन पूर्व रात बारह बजे किदवई नगर से यशोदानगर जाने वाली रोड पर एक ट्रक से स्कूटर टकरा जाने से उसकी मृत्यु हो गयी थी। तब तक दीदी का बड़ा बेटा नौकरी से स्वेच्छया सेवाकाश लेकर कानपुर में बस गया था। पप्पू की मृत्यु ने दीदी को तोड़ दिया। वह बीमार रहने लगीं... मधुमेह और दूसरी तमाम बीमारियां।

राघवेन्द्र ने कार्पोरेशन बैंक ज्वायन किया और नोएडा में उसकी पोस्टिंग हुई। वह गाजियाबाद रह रहा था। एक दिन दीदी का खत मिला जिसमें उन्होंने दुखी भाव से लिखा था कि बहनोई अब फिर बात-बात पर उन पर हाथ छोड़ने लगे हैं। बड़े भाई साहब ने दीदी को अपने साथ कानपुर आकर रहने के लिए समझाया, लेकिन अपना घर छोड़ने को वह तैयार नहीं हुईं। यह उचित भी था। जिस घर को उन्होंने अपने अथक श्रम से सजाया-संवारा था, उसे छोड़कर भाई के घर रहना उन्होंने उचित नहीं समझा था। उस पत्र में दीदी ने लिखा था कि मैं राघवेन्द्र को कहूं कि वह पिता को समझाए ....पिता बड़े बेटा-बहू की बात मानते हैं।

हम पति-पत्नी गाजियाबाद गए। पत्र पढ़कर राघवेन्द्र बोला, ''मामा, सारा दोष अम्मा का ही है।''

हम हत्प्रभ-निराश लौटे। बड़ा बेटा पिता के पक्ष में खड़ा था...वह पहले भी उन्हीं के पक्ष में था और छोटा अब था नहीं। कहानी बाद में मालूम हुई। राघवेन्द्र पिता पर खेत बेचने का दबाव डाल रहा था। पिता तैयार थे, लेकिन दीदी न बेचने के लिए अड़ी हुई थीं। उन्हें बड़े बेटे की मंशा में खोट दिख रहा था और खेत न बिकते देख बेटा मां के विरुध्द था।

खेत नहीं बिके। बहनोई ने भी हथियार डाल दिए थे। लेकिन तभी एक दिन सूचना मिली कि राघवेन्द्र अंतर्ध्यान हो गया। कहां गया किसी को पता नहीं था। दीदी का हाल बेहाल था जिनका दूसरा बेटा, भले ही वह उनके विरुध्द था, सन् 2000 में अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर गायब हो गया था। हम अनुमान ही लगाते रहे और वह नहीं लौटा। दीदी उस बेटे को एक नज़र देख लेने की आस लिए 29 अप्रैल, 2005 को इस संसार को अलविदा कह गयीं। दीदी की मृत्यु के एक वर्ष बाद एक दिन पता चला कि राघवेन्द्र की पत्नी-बच्चे भी कहीं चले गये। स्पष्ट है कि राघवेन्द्र के पास ही वे गये थे। मेरे बहनोई को शायद दीदी की मृत्यु का ही इंतजार था।

मुझे यह अपराध बोध है कि मैं बड़ी दीदी के लिए कुछ नहीं कर सका सिवाय इसके कि उन्हें समर्पित दो कहानियां....'उनकी वापसी' (साप्ताहिक हिन्दुस्तान-1985) और ‘आखिरी खत’ (साहित्य अमृत-1995) लिखीं और दोनों ही कहानियाँ चर्चित रहीं।

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                                                                                                                                                                  परिदृश्य


                                                                                                                                         -डॉ. रजनीश कुमार शुक्ल


छात्र आन्दोलन की प्रासंगिकता सार्वकालिक है।

तकनीक पर निर्भरता का का विस्तार मनुष्य के महत्त्व को कम करता है। तकनीक केन्द्रित जीवन की श्रेष्ठता का यशोगान करने वाले सर्वदा यह प्रयास करते हैं कि मानव मेधा की सभी सृजनात्मक गतिविधियों को मशीनी बना कर श्रम और समय को बचाया जाय। यह इसका स्वाभाविक उद्देश्य है। इसके साथ ही बचे हुये समय को ऐन्द्रिकोपभोग में लगाने के बहुविध उपक्रम खडा करके तकनीक जनित प्रयास उपभोक्ता संस्कृति का निर्माण करते है। इस अवस्था में सृजनात्मक कल्पना स्थगित हो जाती है उत्पादन और उपभोग ही मानवीय नियति बन जाती है।फल स्वरूप समाज ऎन्द्रिक स्तर पर जीवन जीने लगता है तथा परिवर्तन के प्रयास हिंसक मोड ले लेते हैं। भारतीय समाज जीवन में भी १९९० के बाद इस तरह की जीवन प्रणाली के प्रभाव दृष्टिगोचर होने लगे हैं। इस प्रकार के जीवन का अभ्यास होने पर व्यक्ति नीजि सुख तथा तथा ऐन्द्रिक आस्वाद के लिये परिवर्तन के सजग, सकारात्मक एवं सगुण प्रयासों का बौद्धिक तर्को के आधार पर प्रतिरोध करता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पनपी यह प्रवृत्ति पूर्णतः यूरोपीय प्रत्यय है। भारत में इसने अपने पांव १९९० के बाद पसारे हैं । इस वृत्ति के समर्थक सामाजिक दण्डशक्ति के रूप में स्वतन्त्र छात्र आन्दोलन को अनावश्यक अप्रासंगिक तथा काल वाह्य मानते हैं। इस को स्थापित करने के लिये तर्क गढ़ा जाता है तथा गोयबेल्स के सिद्धान्त का अनुसरण करते हुये इन तर्कों को इतने जोर से प्रसारित किया जाता है कि कृत्रिम तर्क स्वाभाविक लगने लगता है। भारत में उपभोक्तावादी विखण्डित सामाजिक संरचना का प्रचार प्रसार करने वालों ने इसी पद्धति का अनुसरण किया है। इस दुष्प्रचार का शिकार देश की युवाशक्ति को होना पडा है। यह चर्चा दिग्भ्रमित युवा आन्दोलन जैसे विशेषणों से प्रारम्भ होता है तथा इसकी चरम निष्पत्ति छात्र युवा आन्दोलन को निरर्थक सिद्ध करने में होती है। यह विश्व व्यवस्था को संचालित करने के लिये विकसित उस नवप्रणाली का स्वाभाविक परिणाम है जो पश्चिम की वैचारिकी के उभय विध खांचे में फिट नही होती है क्योंकि यह न तो पूंजीवाद है न तो समाजवाद अपितु उपभोक्तावादी फलक्रियावाद से उपजी संकर प्रणाली है। जो समाज की संसक्तता को समाप्त करता है तथा वैयक्तिकता को पुष्ट करता है।
जो समाज यथास्थितिवादी नहीं है,सपने देखता है और सपनो को सच करने के लिये प्रयास करता है उस समाज में छात्र युवा आन्दोलन अपरिहार्य है। भारत का समाज स्वाभाविक रुप में ऐसा ही है। भारत की प्रगति समृद्धि तथा विश्वविजय की ओर बढ़ रही अप्रतिहत गति युवा गतिशीलता का ही परिणाम है। इस गतिशील विकास को समझने के लिये नब्बे के दशक के बाद की सामाजिक अभिवृत्ति को विश्लेषित करने एवं मूल्यांकित करने की आवश्यकता है। छात्र आन्दोलन को समाप्त करने तथा छात्र सक्रियता को स्तंभित करने के कारण भारत में किस प्रकार की समस्यायें आयी है इसका भी विवेचन आवश्यक है।
यदि भारतीय सन्दर्भों में छात्र सक्रियता का मूल्याकंन तथा उसकी प्रासंगिकता का विचार सही सन्दर्भों में करना है तो इसे मात्र सत्ता परिवर्तन के राजनीतिक साधन के रुप में देखने की सामान्य प्रवृत्ति से अलग सोचने की आवश्यकता भी है क्योंकि सत्ता परिवर्तन और राजसत्ता दखल के आन्दोलन वास्तविक छात्र युवा आन्दोलन नहीं हैं, अपितु यह राजनीतिज्ञों के द्वारा अपने दलीय हितो को लेकर किया जाने वाला उपक्रम मात्र है। अतः उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह द्वारा अथवा देश मॆ राहुल गांधी द्वारा चलाये जा रहे कार्यक्रमों को छात्र युवा आन्दोलन के पर्याय के रूप में देखना स्थिति का वास्तविक दर्शन नहीं है। इसका निहितार्थ तो छात्र युवा आन्दोलन को अप्रासंगिक सिद्ध करना ही है।
इसी प्रकार युवा आन्दोलन के दिन बीत गये इस प्रकार की भविष्यवाणी करने वाले लोग १९९० के बाद के उदारीकरण तथा तज्जन्य उपभोक्तावाद के अधिवक्ता एवं सृजनात्मक कल्पना से शून्य लोग हैं। उनके द्वारा परोसे जा रहे तथ्य इस देश के युवा मन का यथार्थ नहीं है। इसलिये यह आवश्यक है कि भारत के युवा का सच सामने आना चाहिये। उसे प्रचारित प्रसारित करने का बहुशः यत्न भी होना चाहिये। किन्तु भारतीय युवा का समकालीन रुप बाजार के विस्तार में सहायक नहीं है अतः इस को बाजार केन्द्रित विचार सरणि में स्थान नहीं प्राप्त हो सकता है। इन सब के होते हुये यह भी सच है कि समकालीन समाज का नियन्त्रण बाजार द्वारा हो रहा है न कि समाज में अनुकरण योग्य आदर्श प्रस्तुत कर सकने की क्षमता रखने वाले व्यक्तित्व वाले श्रेष्ठ जनों के द्वारा।
आज आवश्यक है कि स्वातन्त्र्योत्तर भारत में छात्र युवा आन्दोलन के महत्त्व तथा उसकी प्रभावकारी भूमिका का स्मरण किया जाय तथा १९९० के बाद की छात्र युवा गतिविधियों का समुचित मूल्यांकन हो। इसके बिना भारत में छात्र आन्दोलन की प्रासंगिकता का निषेध उचित नहीं है। सत्य तो यह है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति से अब तक का समकालीन इतिहास समर्थ, सशक्त और वैभवशाली भारत के निर्माण में अपना श्रेष्ठतम योगदान करने वाले छात्र आन्दोलन का ही इतिहास है। याद करें स्वतन्त्रता के बाद जब देश के संविधान निर्माण पर सामाजिक जीवन में चुप्पी थी, सन्नाटा पसरा हुआ था। संविधान सभा के बाहर देश की जनता को उसके स्वरुप तथा रचना के संबन्ध में बताने वाला कोई न था। तब इस देश के युवाओं ने रचनात्मक संघर्ष का व्रत लिया और भारतीयकरण उद्योग के नाम से एक छात्र आन्दोलन खडा हुआ। १९६२ मॆं चीन के आक्रमण के बाद पूर्वोत्तर की सीमा के मानवीय प्रश्न जिसे नक्शों और ग्रन्थों के आधार पर सुलझा या जाना संभव न था उसके लिये हृदय से संवाद करनॆ वाले मानवीय संवेदना से युक्त प्रयासो की आवश्यकता थी यह स्थिति राष्ट्रीय परिदृष्य में चुप्पी की बन गयी थी। इस मौन को तोडने के लिये पूर्वोत्तर के लोगों से मिलकार हृदयपूर्वक संवाद स्थापित करने के लिये अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने जब अन्तर्राष्ट्रिय छात्र जीवन दर्शन नाम प्रकल्प की शुरुआत की तो यह भारत के इतिहास में अनूठी घटना थी। यह रचनात्मक छात्र आन्दोलन की अनोखी पहल थी, इसने देश के उपेक्षित भूभाग के लोगों से हृदय से संवाद तथा समस्त भारत के साथ पूर्वोत्तर के युवाओं के समरस संवाद का जो वितान प्रस्तुत किया है वह किसी भी शासकीय प्रयास से संभव न था। यह सब युवा रचनाधर्मिता से ही संभव था और उसने कर दिखाया। १९७४ का छात्र आन्दोलन किस प्रकार दूसरी आजादी का आन्दोलन बना और लोकतन्त्र की समाप्ति के षडयन्त्र को अपने अदम्य पराक्रम से नेस्तनाबूँद कर छात्र शक्ति ने सामजिक दण्ड शक्ति की अपनी भूमिका को जिस यशस्विता के साथ सिद्ध किया वह इतिहास का विषय है।उस पर इतना कुछ लिखा जा चुका है कि अब बहुत कुछ कहने की आवश्यकत नही है।
इस आलेख में मैं इस पर केन्द्रित हूँ कि वर्ष ७७ के बाद भी छात्र आन्दोलन मरा नहीं है अप्रासंगिक नही हुआ है। कश्मीर की समस्या आज पूरे देश मे अपने वास्तविक एवं यथार्थ रुप मे जानी जा रही है तो यह देश के युवाओं के द्वारा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेतृत्व में चलाये गये आन्दोलन का ही परिणाम है।असम सहित समूचे भारत में घुसपैठ यदि केन्द्रिय समस्या बना है,लोगों की चिन्ता इस बात को लेकर घनीभूत हुयी है तो इसका श्रेय परिषद के नेतॄत्व में पले छात्र आन्दोलन को ही है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध १९८६-९० का संघर्ष हो अथवा कश्मीर की समस्या छात्र सक्रियता का ही परिणाम था कि इस पर समस्त समाज गंभीर हुआ। नब्बे के बाद अर्थात् वैश्विकता की कथित आंधी और उदारीकरण के व्यापारिक उपक्रम के साथ ही यह बात जोर-शोर से कही जने लगी कि छात्र आन्दोलन के दिन लद गये ।शायद इस लिये कि छात्र आन्दोलन को परिभाषित करने वाले इसे सत्ता परिवर्तन का माध्यम मानते है। चूंकि व्यापारीकरण बाजारीकरण के वैश्विक प्रयास में सरकरों की प्रासंगिकता ही समाप्त हो गयी । इसलिए छात्र आन्दोलन की भी निरर्थकता सिद्ध हो गयी है।किन्तु यह योजनबद्ध विभ्रम का निर्माण मात्र था। समस्त विश्व विशेषत: भारत में छात्र आन्दोलन सत्ता परिवर्तन का साधन नही रहा है। सत्ता परिवर्तन आन्दोलन का साधन अवश्य रहा है।वस्तुत: आन्दोलन तो हमेशा राष्ट्रिय सन्दर्भों में ही खडे हुए किन्तु सत्ता परिवर्तन के पडाव पर आते-आते उन आन्दोलनों ने दम तोड दिया । इसलिए राजनीति द्वारा व्यर्थ एवं अप्रासंगिक कहे जाने लगे।
१९९० से २००० के बीच के दस वर्ष तो इस देश में छात्र आन्दोलन के लिए अत्यन्त खराब रहे है क्योंकि वैश्विक व्यापारवाद के समर्थकों ने छात्र सक्रियता के खिलाफ़ बौद्धिक मुहिम चलायी और उसे सर्वथा अप्रासंगिक सिद्ध कर दिया ।इस काल खण्ड में विखण्डनवाद ,व्यक्तिवाद ,वैयक्तिक नीजता आदि जाने कितने प्रकार के सिद्धान्त गढे गये और उन तर्कों के आधार पर सामूहिक सक्रियता कि निस्सारता सिद्ध की जाने लगी। जिसका परिणाम हुआ कि राज सत्ता ने छात्रों की सक्रियता के सभी मंचों को प्रतिबन्धित करना, उपेक्षित करना प्रारंभ कर दिया। इसका निशाना छात्र संघ बने।
इस प्रयास ने दोधारी तलवार का काम किया। एक तरफ़ तो यह सिद्ध किया कि छात्र आन्दोलन का अर्थ मात्र छात्र संघ एवं राजनीति है दूसरी ओर छात्रों को हिन्सावादी एवं अराजक सिद्ध करने में भी सफ़लता मिली। किन्तु यह भारतीय युवा का यथार्थ नही है मूलत: भारत का छात्र युवा न तो खाओ, पीओ, मौज उडाओ की अवधारणा वाला है न ही वह इसको अपने जीवन का यथार्थ मानता है । हाँ इन समस्त प्रयासों का परिणाम यह अवश्य रहा है कि भारतीय युवा में एक प्रकार का कैरियरिज्म प्रभावी हुआ है। किन्तु इस प्रभाव के कुछ सुपरिणाम भी आये। इन परिणामों ने छात्रान्दोलन की प्रासंगिकता को पुनर्सिद्ध किया है।
आज भारत विश्वविजेता बनने की भूमिका में है तो यह इसी युवा शक्ति की मेधा का प्रतिफ़ल है आज समस्त विश्व आशाभरी निगाहों से भारत की ओर देख रहा है तो युवा श्रम एवं कौशल के कारण से ही है। वस्तुत: छात्र आन्दोलन की प्रासंगिकता को समूचे राष्ट्रिय परिप्रेक्ष्य में न देख कर मात्र राजनीति के कोष्ठक में देखने वाले ही छात्र आन्दोलन को निष्प्रभावी एवं अप्रासंगिक कह सकते है। वस्तुत: सम्पूर्ण भारतीय परिदृश्य युवा शक्ति की गतिविधि से प्रभावित है। आन्दोलन का अर्थ ध्वंस नही अग्रगामी गति है। परिवर्तन की अग्रगामिता का निर्दश बना भारतीय युवा सभी मोर्चों पर भारत विजय का सपना साकार कर रहा है वह जीत रहा है और जीतेगा।
वास्तव में राष्ट्रीय विकास की गति के आलोक में युवा आन्दोलन को न देखने का कारण स्पष्ट है। इसे एक वर्ग शक्ति के रुप में स्थापित करना इस विधा में आसान है। इस पर एक ऐसा वर्ग जो कि अनुत्पादक है, एक ऐसा वर्ग जिस पर मात्र व्यय ही होने वाला है। कोढ में खाज मुहावरों को सटीक बैठाता उदारीकरण जनित व्यापारीकरण जिसमे उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन खपत की संतृप्तता के करण मन्दी ने घेर लिया था, को भी शिक्षा का बाजार प्राण वायु के रुप में दिखने लगा है। इन सब ने छात्र समुदाय को एक तरह से निराशा ही दी है।परिसर में आर्थिक शोषण और परिसर के बाहर भविष्य का अन्धेरा इन दोनों से संघर्ष करती छात्र शक्ति को अप्रासंगिक सिद्ध करना छात्र युवा के साथ अन्याय है।
आखिर किसी भी आपदा विभीषिका के समय प्रथम स्वयंसेवी के रुप में अपने को प्रस्तुत करने वाला युवा दिखता नही। भारत की रक्षा के लिए बलिवेदी पर चढने वाला युवा विभ्रम पैदा करने वलों को क्यों नहीं दिखता। भारत सहित समस्त विश्व में अपनी मेधा का लोहा मनवा रहा युवक क्यों नही सुर्खियां बनता है। आखिर युवा आन्दोलन को किस रुप में परिभाषित किया जायेगा। राष्ट्र के विकास में गतिशील योगदान कर रहा युवा, युवा आन्दोलन का ही प्रतिफ़ल है।घुसपैठ, आतंकवाद्, अशिक्षाके विरुद्ध लड रहा युवा छात्र युवा आन्दोलन ही है। मात्र सत्ता परिवर्तन का साधन बनाने की कोशिश और उसमे असफ़ल होने पर छात्र युवा आन्दोलन को निरर्थक तथा अप्रासंगिक सिद्ध करने वाले लोग युवा आन्दोलन के पर्याय से अपरिचित तथा विभ्रम के शिकार बुद्धिजीवी है। उनके लिए उनके शर्तों पर युवा आन्दोलन का न चलना ही श्रेयस्कर है। 

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                                                                                                                                                                      चौपाल


                                                                                                                                      -  डॉ. वेदप्रताप वैदिक

14 फरवरी 2012 : भारत के बच्चों को कैसी भाषा में पढ़ाया जाए, इस बात की सुध हमारे मानव संसाधन मंत्रालय को अब आई है| उसने राज्यों को निर्देश भिजवाएं हैं कि बच्चों को ऐसी भाषा में पढ़ाया जाए, जो उनके घरों में बोली जाती हो|
क्या खूब सुझाव है ! इसे कहते हैं कि अकल का अतिरेक! बच्चों को सरल-सहज स्वाभाविक भाषा में पढ़ाया जाए या मातृभाषा में पढ़ाया जाए, इस सिद्घांत का पालन करने की बजाय अब यह नया मुहावरा गढ़ा जा रहा है| बोलचाल की भाषा का मतलब क्या है? न तो उसमें उच्चारण की, न व्याकरण की और न ही समझ की एकरूपता होती है| वह तो बोली होती है| अगर बोली में पढ़ाई होगी तो ये बच्चे आगे जाकर ऐसी भाषा का प्रयोग करेंगे, जो एक-दूसरे को समझ में ही नहीं आएगी| यह संवाद की अराजकता बन जाएगी| बोली हुई और लिखी हुई भाषाओं में सदा गहरा अंतर होता है| उस अंतर को ध्यान में रखते हुए ही बच्चों को पढ़ाया जाना चाहिए|
लेकिन बोली हुई भाषा में पढ़ाने का आग्रह करनेवाले अफसरों का हमें स्वागत करना होगा, क्योंकि कुल मिलाकर उनका आग्रह मातृभाषाओं पर आकर ही टिकेगा| इस देश में जब तक उन सब स्कूलों पर प्रतिबंध नहीं लगेगा, जो बच्चों को विदेशी भाषा के माध्यम से पढ़ाते हैं, मातृभाषा के माध्यम की पढ़ाई अच्छी हो ही नहीं पाएगी| हमारे केंद्र और राज्य के शिक्षा मंत्रालयों का बर्ताव किसी गुलाम देश के शिक्षा-मंत्रालयों की तरह रहा है| उन्होंने अंग्रेजी माध्यम के तथाकथित पब्लिक स्कूलों का कभी विरोध ही नहीं किया| सारी दुनिया के महान शिक्षाविदों की राय है कि बच्चों को विदेशी भाषा के माध्यम से पढ़ाने पर उनकी बुद्घि कुंठित हो जाती है, उनकी मौलिकता नष्ट हो जाती है, वे रट्टू-तोते बन जाते हैं| यूरोप के बच्चों पर जब अंग्रेजी थोपी गई तो मालूम पड़ा कि ज्यादातर बच्चों को अनिद्रा, विस्मरण और कंपन आदि की बीमारियां हो गई| हमारे देश में तो जिन बच्चों पर अंग्रेजी थोपी जाती है, उन्हें एक भयंकर रोग हो जाता है| उसका नाम है, उच्चता ग्रंथि! इस उच्चता के अभिमान में वे अपने देश, परिवार और माता-पिता से भी कट जाते हैं| वे भारतीय नहीं रहते| वे इंडियन बन जाते हैं| इसी गलत शिक्षा नीति के कारण हमारे एक देश में दो देश खड़े हो गए है| ‘शिक्षा मंत्रालय’ का नाम बदलकर मानव संसाधन मंत्रालय कर दिया गया| मनुष्य को जो साध्य नहीं, साधन बना दे, क्या हम उसे शिक्षा कहेंगे? शिक्षा के नाम पर देश में अशिक्षा फैलानेवाले हमारे नेताओं ने ज्ञान आयोग भी बनाया है, जिसका काम देश में अज्ञान फैलाना है| देश में अशिक्षा और अज्ञान फैलानेवाले नेताओं से जब तक छुटकारा नहीं होगा, हमारे बच्चों की पढ़ाई नहीं सुधरेगी|

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                                                                                                                                                         आकलन


                                                                                                                                                      -अशोक आंद्रे


अपने समय को परिभाषित करती हुई कहानियाँ



प्रवासी भारतीय लेखकों के मध्य एक  प्रतिबद्ध रचनाकार के रूप में इला प्रसाद ने कथा साहित्य के साथ कविता में भी अपनी  एक अलग  महत्वपूर्ण पहचान बनाई है . उनके साहित्य में जहां प्रवासी जीवन गहनता के साथ अभिव्यक्त हो रहा है वहीं वह कर्मभूमि भी व्याख्यायित है जहां वह पली-बढ़ी, पढ़ी-लिखीं और जहां रहते हुए वह हिन्दी साहित्य से जुड़ीं. वह जुड़ाव ही  उनकी रचनात्मकता को ऊर्जस्वित कर रहा है. यह ऊर्जस्विता उनमें पूरी ईमानदारी के साथ अभिव्यक्त है. हाल में उनका कहानी संग्रह ’उस स्त्री का नाम’ दिल्ली के ’भावना प्रकाशन’ से प्रकाशित हुआ है. फिलहाल मैं इस संग्रह की कहानियों को दृष्टिगत रखते हुए अपनी बात कहना चाहूंगा.

 

संग्रह की सभी कहानियां विषय को सघनतापूर्वक चित्रित करते हुए पाठक को आद्यंत बांधे रखने  में सक्षम हैं, क्योंकि इनमे जीवन की वास्तविकता उद्भासित है. ये कहानियां जीवन के  उन  क्षेत्रों में सेंध लगाकर, जिन्हें प्रायः नजरअंदाज कर दिया जाता है,  विषय  को जिस वास्तविकता के साथ शब्दायित करती है वह उल्लेखनीय है. ये कहानियां जीवनानुभव का गहन अवगाहन हैं. इला के पास सूक्ष्म पर्यवेक्षण दृष्टि है और है आकर्षक काव्यात्मक भाषा. यह भाषा तब और आकर्षक हो जाती है जब वे बेहद किफायत के साथ शब्दों का प्रयोग करती हैं. छोटे  वाक्य विन्यास उनकी शक्ति हैं और यही शक्ति  समकालीन रचनाकारों में विशेष रूप से प्रवासी रचनाकारों में उन्हें एक अलग और अक्ष्क्षुण पहचान प्रदान करती है.

 

संग्रह की पहली कहानी ’एक अधूरी प्रेमकथा’ की निमिषा एक ऎसे  पिता की संतान है जो उसकी मां से कभी विवाह नहीं करता और यही कारण है कि वह कभी अपने पिता से जुड़ाव अनुभव नहीं कर पाती. माँ के प्रति उसमें अगाध प्रेम है और यह स्थिति वह अपने प्रेमी से छुपाती नहीं और उसका प्रेमी बंटू अपने घरवालों के बहाने उससे विवाह से इंकार कर देता है. समाज का यही सच है और लेखिका ने उस सच को बेहद मार्मिक ढंग से रेखांकित किया है. लेकिन इस क्रूर समाज का एक सच यह भी है कि ऎसे प्रेमी विवाह से तो बचना चाहते हैं लेकिन प्रेम फिर भी बनाए रखना चाहते हैं, लेकिन बंटू का वह प्यार निमिषा को स्वीकार नहीं. जीवन की क्रूर वास्तविताओं से रूबरू होने के बाद कला और साहित्य में सुकून खोजने वाली निमिषा टूट जाती है. कहानी  आज की अर्थवादी सचाई को उजागर करती है जहां सभी अपनी

सोच को थोपने का ही प्रयास करते हैं और ईमानदार व्यक्ति ठगा मूक दर्शक ही बना रह जाता है.

 

 विदेश में रहते हुए भारतीय वहां की जिन्दगी में इतना रम जाते हैं कि उनके लिए रिश्ते  भी बेमानी हो जाते हैं। इसे हम ’उस स्त्री का नाम’ में देख सकते हैं . यह एक ऎसी मां की कहानी जो अपने बेटे के बुलावे पर अमेरिका जाती है, जिसका रियल एस्टेट का व्यवसाय है. लेकिन मां की देखभाल करने क़ी बजाय वह उसे ओल्ड एज होम में छोड़ देता है जहां वह अकेलेपन 

को भोगने के लिए अभिशप्त हो जाती है, फिर भी उफ नहीं करती है बल्कि उसकी प्रवृति को भी उसकी व्यस्तता से जोड़ कर अपने अकेलेपन का भी शानदार तरीके से वर्णन करती है.  इस कहानी में पूरी अमेरिकी संस्कृति उभर कर हमारे समक्ष उद्घाटित हो उठी है. यह एक मार्मिक और उल्लेखनीय कहानी है और एक यादगार कहानी के रूप में पाठक के मन को आप्लावित कर जाती है.

 

’बैसाखियाँ’ कहानी में भी  दूसरे ढंग से यही स्थिति हमें देखने को मिलती है जहां आम अमेरिकी अपनी संस्कृति को उत्सव की तरह मनाते हैं। अंधविश्वास की बैसाखियाँ पूरी दुनिया में पहनी जाती हैं, न कि केवल भारत में। ’चुनाव’ में  लेखिका पुन: एक बार भारत एवं अमेरिका के जीवनानुभवों का तुलनात्मक अध्ययन करती दिखाई देती है।

 

’मेज’ कहानी में मेज को केन्द्र में रखकर कहानी का ताना-बाना बुना गया है. ’मेज’ जो गृहस्वामिनी को एक बेकार वस्तु प्रतीत होती है बाद में पक्षियों के लिए डायनिंग टेबल 

के रूप में प्रयुक्त होने पर  जो प्रसन्नता प्रदान करती  है वह शब्दातीत है। बदरंग हुई अधटूटी 

चौकी अब मेज थी न कि चौकी जिसे फालतू  समझा जा रहा था। लेखिका प्रकृति औरपक्षियों के माध्यम से एक नया संसार रचतीहै जो मानव जीवन की भी व्याख्या प्रस्तुत करता है। कई  तरह की अर्थ छायायें हैं इस कहानी में हैं, जो इस छोटी सी कहानी को बेहद पठनीय बनाते हैं।

 

’हीरो’ कहानी एक अलग विषय को लेकर बुनी गयी है जहां घृणा पर कृतज्ञता का भाव उभरकर 

हमारे समक्ष प्रस्तुत होता है. यह अलग बात है कि यहाँ भी बनते-बिगड़ते रिश्तों की बानगी का जिक्र है जो कि अमेरिका में आम बात है. कुछ ऎसी ही भावभूमि की अभिव्यक्ति ’आकाश’, ’साजिश’   कहानियों में हमें प्राप्त होती है. जहां आम भारतीय प्रवासी भारतीयों के विषय में इस भ्रम का शिकार दिखाई देता है कि वे कितने सुखी और सम्पन्न हैं. वह उनके मानसिक संतापों को निराधार मानकर अस्वीकार करता है। दूसरी ओर सफलताओं की सीढ़ी से गिर  कर आम जिन्दगी जीता हुआ वह किस तरह कुंठाएं पाल लेता है यह कुंठा कहानी की यामिनी के रूप में स्पष्ट दिखाई देता है। ’तलाश’ और ’मुआबजा’ लेखिका की कभी न भूलने वाली कहानियां हैं.

 

    इला प्रसाद की विशेषता यह है कि वह कहानी को उभारने से पहले दृश्यों का सहारा लेतीं हैं जिससे कहानी सजीव,संप्रेषणीय, विश्वसनीय और प्रभविष्णु हो जाती है. यद्यपि आज तेजी से  उभरते आर्थिक आधार पर स्थापित रिश्ते डगमगा रहे हैं लेकिन हमारे भारतीय संस्कार इतने गहरे हैं कि वे हमें हर विपरीत स्थिति में शक्ति प्रदान करते हैं----अपनी कई कहानियों में इला इस ओर संकेत भी करती दिखाई देती हैं.  इला की कहानियां हमारे चारों ओर फैली विसंगतियों और विद्रूपताओं की कहानियां हैं , फिर भी वे अंधकार में प्रकाश की खोज की कहानियां भी हैं.                                                                                                                          
उस स्त्री का नाम: इला प्रसाद

भावना प्रकाशन,

१०९ ए, पड़पड़ गंज,

दिल्ली -११००९१

मूल्य -१५०-रूपये , पृष्ठ : १२८    

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                                                                                                                                                            हास्य-व्यंग्य


                                                                                                                                                       -संजीव निगम





कॉमरेड और यमराज  

 अभी कॉमरेड मुख्य मंत्री को खांसी जुकाम हुए बस दो ही दिन हुए कि उनके सामने यमराज प्रकट हो गए.कॉमरेड चूँकि कोलेज के दिनों से ही धर्म विरोधी रहे  थे अतः  मृत्यु के देवता  को पहचाने में वे ऐसे ही असफल रहे जैसे भारत सरकार बांग्लादेशियों को . बल्कि वे तो यह समझ कर प्रसन्न हो गए कि  भैंसे जैसी सर्वहारा  सवारी पर बैठ कर दिल्ली से पार्टी का कोई केन्द्रीय नेता उनके हाल चाल जानने चला आया है.
कॉमरेड ने उठने का दिखावा सा करते हुए कहा ," अरे आपने क्यों कष्ट किया, बस खांसी ज़ुकाम ही तो हुआ है मुझे. एक दो दिन में ठीक होकर मैं ही  अपने आप आपके पास चला आत़ा." उनके इस उत्तर ने यमराज को चकरा दिया. वे बोले, " वत्स , हमारे यहाँ कोई अपने आप नहीं  आ सकता है.हम स्वयं लेने के लिए आते हैं." यह सुन कर कॉमरेड गदगद भाव से गदगदा कर बोले," ये तो मेरा सौभाग्य है कि आप मुझे खुद लेने के लिए आये हैं. पर मुझ कॉमरेड पर अभी वहां पर कोई  बड़ी केन्द्रीय ज़िम्मेदारी मत डालियेगा. फिलहाल मैं राज्य छोड़ कर जा नहीं पाऊंगा." यमराज भी स्नेह  से बोले ," बालक , मैं तुम्हे राज्य नहीं, संसार छुडवाने आया हूँ."



यह ममता भरी धमकी सुन कर कॉमरेड गुस्से से उठ कर बैठ गए. उनका चेहरा तमतमा गया. वे बोले," सच सच बताओ कौन हो  तुम , भगवा मंडली के कॉन्ट्रेक्ट किलर या कोंग्रेस के सुपारी बाज़ .  तभी तुम  इस खतरनाक  गोबर गैस संचालित वाहन पर चढ़ कर  बिना इजाज़त यहाँ घुस आये हो ."
अपने वाहन का तिरस्कार होते देख कर यमराज भड़क  गए. उन्होंने गरज कर कहा  , " अरे मूर्ख , मैं मृत्यु का देवता हूं.मुझे कहीं भी आने जाने की परमिशन नहीं लेनी पड़ती है. चल अब मेरे साथ. तेरे  प्राण निकालने  की बेला निकले जा रही है."



यमराज का गुस्से से लाल चेहरा देखते ही कामरेड को  लगा कि  उन्हें भी लाल झंडा उठाना ही पड़ेगा.  उन्हें लगा कि अब पार्टी मीटिंगों में किये गए शास्त्रार्थी अभ्यास से काम लेने का समय आ गया है. ८७ वर्षीय कामरेड ने यमराज से कहा " आप भले ही मृत्यु के देवता हों पर आप ऐसे कैसे मेरे प्राण ले सकते हैं? अभी तो मेरी गिनती पार्टी के युवा नेताओं में होती है.अभी तो मुझे मुख्यमंत्री के रूप में कई बरसों तक पार्टी और राज्य की सेवा करनी  है." यमराज बोले ' मैं यूँ खाली हाथ नहीं जा सकता हूँ.' कामरेड बोले " और मैं खाली नहीं हूँ . वो देखिये अभी कितनी फाइलें निपटानी बाकी हैं." कामरेड ने एक तरफ  इशारा किया जहां  मेजों पर सैंकड़ों फाइलें पड़ी धूल खा रही थीं.  यमराज बोले " इतने बरसों तक इन्हें  क्यों नहीं निपटाया. ये तो जन कल्याण की फाइलें लग रही हैं."
कॉमरेड बोले," इतने साल तो राज्य से दिल्ली चक्कर लगाते और पार्टी रैलियों के लिए भीड़ जुटाते ही बीत गए. सोचा था ये खांसी जुकाम ठीक होने के बाद सर्वहारा वर्ग के लिए कुछ काम करूँगा तो आप प्राण हरने आ गए."
यमराज बोले," पर प्राण तो मुझे लेने ही पड़ेंगे."
 


कॉमरेड अड़ गए, " तो फिर मेरे ही क्यों? हमारे कई केन्द्रीय नेता यूँ ही खाली बैठे हैं, उनमे से किसी के भी प्राण ले जाईये." यमराज बोले," हमारे यहाँ पृथ्वी लोक वाली अंधेरगर्दी नहीं चलती है.जिसका नंबर आया होता है उसे ही चलना पड़ता है." कॉमरेड बोले," पर मैं आपकी सत्ता को नहीं मानता.आप अपने  हिंदुत्ववादी  कपड़ों से ही सांप्रदायिक लग रहे हैं. अगर मेरे प्राण लेने ही हैं तो कॉमरेड माओ या कॉमरेड लेनिन को भेजिए." कामरेड के  तर्कों के तीरों से यमराज अपना संतुलन खोने लगे. उन्हें लगा कि यदि मैं इसकी बातों में उलझा रहा तो इसकी मृत्यु की घडी बीत जायेगी और उसके बाद इसे मारना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन हो जाएगा.यमराज ने तेज़ी से अपनी रस्सी घुमा कर कॉमरेड के गले में डाली और उसकी आत्मा को लेकर तुरंत ऊपर आकाश की ओर उड़ चले.ऊपर जाती हुई कॉमरेड की आत्मा " इन्कलाब जिंदा बाद , क्रान्ति अमर रहे " के नारे लगाती जा  रही थी और अपनी इस पारलौकिक गिरफ्तारी का विरोध कर रही थी.



ऊपर पहुँच कर हाँफते हुए यमराज ने कॉमरेड की आत्मा को चित्रगुप्त के आगे पटका और कहा," चित्रगुप्त , शीघ्र डाल दो  इस आत्मा को नरक में." चित्रगुप्त बोले," ऐसे कैसे डाल  दूं महाराज, पहले इसका हिसाब किताब देखना पड़ेगा," चित्रगुप्त ने अपने लैप टॉप पर खातों को उल्टा पल्टा तो उनके माथे पर बल पड़ गए . वे यमराज से बोले,"महाराज  इन्हें तो आप नरक में भेज ही नहीं सकते हैं. ये तो शत प्रतिशत स्वर्ग के अधिकारी है.क्योंकि ये तो बहुत धर्मात्मा व्यक्ति हैं." धर्मात्मा व्यक्ति सुन कर यमराज तो क्यां खुद कॉमरेड भी चक्कर खा गए.कॉमरेड ने खुद चित्रगुप्त से कहा," मैं और धर्मात्मा? असंभव ." यमराज ने भी फ़ौरन चित्रगुप्त से इस बात का स्पष्टीकरण माँगा. चित्रगुप्त ने अपने लैप टॉप का मीडिया प्लयेर ऑन किया और कुछ क्लिपिंग्स दिखानी शुरू की. आश्चर्य उन सभी में कॉमरेड राम का नाम लेते और राम मंदिर का विरोध करते दिखाई दे रहे थे. इस प्रसारण को देखते ही कॉमरेड की बांछे खिल गयीं.उन्हें लगा विरोध करने का ये सुनहरा अवसर है.उन्होंने कहा," ये क्लिपिंग्स इस बात का प्रमाण हैं कि मैं आपकी धर्मं व्यवस्था का विरोधी हूँ. अतः आपका ये धार्मिक क़ानून मुझ पर लागू नहीं हो सकता है.मुझे या तो पृथ्वी  पर वापस भेज दीजिये या फिर मेरे लिए यहाँ कोई साम्यवादी लोक बनाइये . " यमराज का वास्ता ऐसे 24x7  शास्त्रार्थी से पहले कभी नहीं पड़ा था.इससे पहले  अष्टावक्र  से लेकर नानी पालखीवाला तक अनेकों तार्किक आये थे पर यहाँ आकर वे इतने बड़े बड़े दिग्गज  अपनी दलीलें भूल गए थे और इधर  एक अदद कॉमरेड से निपटने में यमराज के पसीने छूट रहे थे.तभी चित्रगुप्त ने अमरीकी स्टाइल के तर्क की मिसाईल दाग दी  ," तुमसे बड़ा धार्मिक तो कोई हो ही नहीं सकता है.राम का विरोध करते करते तुमने जितना राम नाम लिया ,उतना तो मुरारी बापू ने भी नहीं लिया है. इसलिए तुम्हे तो स्वर्ग ही मिलेगा, अप्सराएं मिलेंगी, सोमरस मिलेगा.:''
इस तरह के  अमरीकी तर्क की गहराई को समझते समझते सद्दाम हुसैन को अपनी  जान से हाथ धोना पड़ा था  , और यहाँ तो कॉमरेड तर्क सुनने से पहले ही जान दे चुके थे.इसलिए उन्हें ये तर्क समझने में कुछ वक़्त लगा.  इससे पहले कि कॉमरेड इस तर्क को समझते और कोई और तर्क छोड़ते, भयभीत यमराज ने अपने दूतों को उनको वहां से ले जाने का संकेत करके अपने प्राणों की रक्षा कर ली..!

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                                                                                                                                               चांद परियाँ और तितली


युगपुरुष महामना मदन मोहन मालवीय

भारत की पावन धरती पर अनेक महापुरुषों ने जनें लिये हैं। इन्ही महापुरुषों में एक थे पं. मदन मोहन मालवीय।
मालवीय जी के पूर्वज मालवा के निवासी थे, जो उत्तर प्रदेश के प्रयाग नगर में आकर बस गए थे।
इनके पिता पं. ब्रजनाथ मालवीय अपनी विद्वत्ता एवं मृदुभाषिता के लिए प्रसिद्ध थे। इन्ही गुणों के
कारण उन्हें राजा-महाराजाओ के यहाँ भी आदर प्राप्त था। इसी साधारण किंतु सम्मानित परिवार में 25 दिसंबर1861 को मदन मोहन मालवीय का जन्म हुआ। पिता के आचार-विचार और पाण्डित्य का प्रभाव बालक मदन मोहन पर पड़ा। बाल्यावस्था से ही वे संयमी एवं उदार थे। उनका हृदय अत्यंत निर्मल था। साधारण शिक्षा प्राप्त कर वे आरंभ में शिक्षक बने, किंतु उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर मित्रों ने उन्हें कानून पढ़ने की सलाह दी।

कानून की परीक्षा पास कर मालवीयजी प्रयाग के उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे। यद्यपि वे बड़े प्रतिभावान वकील थे, तथापि उन्हें वकीलों के दांवपेच में रुचि नहीं थी। वकालत से देश-सेवा के कार्य में बाधा पड़ रही थी। अतः समय की पुकार पर उन्होंने वकालत छोड़कर भारत माँ की सेवा का व्रत लिया।

उस समय पराधीनता की नींद में सोया भारत अँगड़ाई लेने लगा था। देश की जनता में स्वतंत्रता की भावना जागृत हो चुकी थी। मालवीयजी का युवा हृदय भी उससे अछूता न रह सका। वे भी स्वतंत्रता के आंदोलन में कूद पड़े। सन् 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन मद्रास में हुआ। उस अधिवेशन में उनका ओजस्वी भाषण सुनकर लोग चकित रह गये।

सभा में एक से एक प्रसिद्ध वक्ता उपस्थित थे। मालवीय जी ने अपनी विद्वता तथा मधुर वाणी से सारी सभा को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी प्रतिभा में उत्तरोत्तर निखार आता गया। कहते हैं उन दिनों इनके समान हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी का प्रभावशाली वक्ता कोई दूसरा न था।

मालवीयजी समाज में फैले अशिक्षा के अंधकार से बहुत चिंतित थे। वे भलीभांति जानते थे कि समाज की अनेक बुराइयों का कारण शिक्षा का अभाव ही है। अतएव उन्होंने काशी में विश्वविद्यालय की स्थापना की। वाराणसी नगर में स्थापित ' काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ' मालवीय जी के साहस और संकल्प, परिश्रम और त्याग का प्रतीक है। इस विश्वविद्यालय की कीर्ति-पताका भारत में ही नहीं, संपूर्ण विश्व में फहर रही है। यहाँ विश्व की प्रायः समस्त विधाओं का पठन-पाठन होता है। देश और विदेश के सहस्त्रों युवक और युवतियाँ उच्च शिक्षा प्राप्त कर प्रति वर्ष यहाँ से निकलते हैं।

विश्वविद्यालय के प्रवेश द्वार पर ही मालवीय जी की विशाल प्रतिमा स्थापित है। मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही विश्वविद्यालय की शोभा मन को मुग्ध कर देती है। वहाँ की सड़कें सीधी और समतल हैं। दोनों किनारों पर छायादार वृक्षों की पंक्तियां हैं, रंग-बिरंगे फूलों की महकती क्यारियां हैं। विश्वविद्यालय में अनेक ध्वज और विशाल भवन हैं जिनके शिखर-कलश ध्वज से सुशोभित हैं। इन सबको देखकर लगता है कि हम किसी नए संसार में प्रवेश कर रहे हैं।

आजादी की लड़ाई में मालवीय जी सदैव आगे रहे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वे कई बार सभापति बनाए गए। उन्होंने अपनी सूझ-बूझ से देश को सदैव सही रास्ता दिखाया। विद्यार्थी समाज से उन्हें विशेष प्रेम था। वे विद्यार्थियों को व्यायाम, संयम तथा देश-सेवा का उपदेश दिया करते थे। बालिकाओं की शिक्षा के वे बहुत बड़े समर्थक थे। उनके हृदय में मातृभाषा हिन्दी के प्रति अगाध प्रेम था।

पं. मदन मोहन मालवीय, समाजसेवा की भावना तथा उदारता के कारण ही महामना कहलाए। उनका जीवन एक तपस्वी का जीवन था। मानव के प्रति उनके हृदय में आदर था। वे सच्चे मानव, सच्चे देशभक्त और सच्चे महापुरुष थे। गांधीजी ने उनके विषय में कहा था- " मैं तो मालवीय जी का पुजारी हूँ। यौवनकाल से आजतक उनकी देशभक्ति का प्रवाह अविच्छिन्न है। उन्हे मैं सर्वश्रेष्ठ हिन्दू मानता हूँ। वे आचार में नियमित और विचारों में बड़े उदार हैं। वे किसी से द्वेष कर ही नहीं सकते। उनके विशाल हृदय में शत्रु भी समा सकते हैं।"

12 नवंबर, 1945 को भारत के आकाश का यह उज्ज्वल नक्षत्र अस्त हो गया; परन्चु उनकी अमर कीर्ति आज भी दिग्-दिगंत को आलोकित कर रही है।

                                                                                                                                साभार ज्ञान भारती








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हम सब सुमन एक उपवन के


हम सब सुमन एक उपवन के,
एक हमारी धरती सबकी
जिसकी मिट्टी में जन्मे हम,
मिली एक ही धूप हमें है
सींचे गए एक जल से हम।


पले हुए हैं झूल-झूल कर
पलनों में हम एक पवन के।।


रंग रंग के रूप हमारे
अलग-अलग हैं क्यारी-क्यारी,
लेकिन हम सबसे मिलकर ही
इस उपवन की शोभा सारी।


एक हमारा माली हम सब
रहते नीचे एक गगन के।।


सूरज एक हमारा, जिसकी
किरणें उसकी कली खिलातीं,
एक हमारा चांद चांदनी
जिसकी हम सब को नहलाती।

मिले एक-से स्वर हमको हैं,
भ्रमरों के मीठे गुंजन के।।

काँटों में मिलकर हम सबने
हँस हँस कर है जीना सीखा,
एक सूत्र में बँधकर हमने
हार गले का बनना सीखा।

सबके लिए सुगंध हमारी,
हम श्रृंगार धनी-निर्धन के।।

-द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी