दक्षिण भारत के हिंदी शोध की बानगी : ‘संकल्पना’

sankalpana

हिंदी के क्षेत्रीय और भौगोलिक लक्ष्मण रेखाओं का अतिक्रमण करके सार्वदेशिक अखिल भारतीय भाषा बनने का एक सुखद परिणाम यह सामने आया है कि हिंदीतर भाषी कहे जाने वाले क्षेत्रों में स्थित उच्च शिक्षा संस्थानों और विश्वविद्यालयों में बड़ी संख्या में हिंदी भाषा और साहित्य पर केंद्रित शोध को प्रोत्साहन मिला है. डॉ. ऋषभदेव शर्मा और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा द्वारा संपादित ‘संकल्पना’ (2015) दक्षिण भारत में हो रहे ऐसे ही शोधकार्यों का एक नमूना है. इसमें ऐसे 39 शोधपत्र संकलित हैं जो मुख्य रूप से हैदराबाद स्थित शोधकर्ताओं के द्वारा लिखे गए हैं. इनमें भी बड़ी संख्या ऐसे शोधकर्ताओं की है जो अभी अनुसंधान पथ के अन्वेषी पथिक हैं. इसके बावजूद संतोष का विषय यह है कि इनकी शोध दृष्टि एकदम साफ, तटस्थ, वाद निरपेक्ष और मानव सापेक्ष है. विषय चयन और समीक्षा पद्धति की दृष्टि से इन शोधपत्रों का वैविध्य भी सुखद प्रतीत होता है. इस पुस्तक में अध्येय पाठ के रूप में काव्य, उपन्यास, कहानी, नाटक, बाल साहित्य और साक्षात्कार जैसी विविध विधाओं के साथ-साथ पत्रकारिता, मीडिया और वैज्ञानिक साहित्य तक को भाषिक अनुसंधान के दायरे में लाया गया है. यह कहने में कोई अतिशयोक्ति न होगी कि इससे निश्चय ही हिंदी अनुसंधान के क्षेत्र को व्यापकता प्राप्त हुई है. ये अध्ययन जहाँ एक ओर सांस्कृतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक समीक्षा दृष्टियों का उपयोग करते हैं वहीं दूसरी ओर स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श, पर्यावरण विमर्श, विस्थापित विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, दलित विमर्श, वृद्धावस्था विमर्श और मीडिया विमर्श जैसे अद्यतन विमर्शों को भी समृद्ध करते हैं.

‘संकल्पना’ का महत्व इस बात से और भी बढ़ जाता है कि इसमें भाषा विमर्श पर सर्वाधिक बल है. वृद्धों की भाषा, दलितों की भाषा, स्त्रियों की भाषा और विज्ञान की भाषा का विवेचन तो अपनी जगह है ही स्त्री की देह भाषा के प्रकाश में किसी साहित्यकार की रचनाओं का विवेचन तो वास्तव में अनोखा ही है. पाठ विश्लेषण और शैलीविज्ञान तो अपनी जगह है ही. इसी प्रकार स्त्री विमर्श पर केंद्रित सामग्री भी घिसेपिटे ढर्रे से हटकर मानवाधिकारों, स्त्री सशक्तीकरण, स्त्री संघर्ष और शोषण के प्रतिकार जैसे पहलुओं को सामने लाती है. दलित विमर्श के अंतर्गत वर्ण व्यवस्था के क्रूर स्वरूप को उभारने के साथ ही दलित समुदाय द्वारा अपनाए जा रहे प्रतिरोध के चित्रण का मूल्यांकन भी किया गया है. इसी प्रकार जनजाति विमर्श के अंतर्गत एक तरफ बस्तर तो दूसरी तरफ अरुणाचल प्रदेश की जनजातीय संस्कृति को अध्ययन का विषय बनाया गया है. संस्कृति, पर्यावरण और मीडिया विमर्श के अतिरिक्त बाल साहित्य और अनुवाद विमर्श पर केंद्रित सामग्री भी पर्याप्त अभिनव, मौलिक और अनुसंधानपूर्ण है.

कुल मिलाकर यह कहना उचित होगा कि ‘संकल्पना’ जहाँ एक ओर दक्षिण भारत के हिंदी शोधकार्य की अभिनवता की बानगी है वहीं नए शोधनिर्देशकों और शोधार्थियों के लिए हिंदी शोध की व्यापक संभावनाओं का परिचायक भी है.

समीक्षित पुस्तक : संकल्पना
संपादक : ऋषभदेव शर्मा, गुर्रमकोंडा नीरजा
प्रकाशक : परिलेख प्रकाशन, वालिया मार्केट, निकट साहू जैन कॉलेज, कोतवाली मार्ग, नजीबाबाद – 246763, मोबाइल : 09897742814, 09838120022
संस्करण : 2015
पृष्ठ : 256
मूल्य : ₹ 300
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समीक्षक : अरविंद कुमार सिंह
संपादक ‘शार्प रिपोर्टर’
नीलकंठ होटल, जिला कलेक्ट्रेट
आजमगढ़

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