साहित्य का महातीर्थ हिन्दी भवन भोपालःलेखनी जून/ जुलाई15

बाइसवीं पावस व्याख्यानमालाः एक रपट

-गोवर्धन यादव

 

साहित्य का महातीर्थ हिन्दी भवन भोपाल. हिन्दी भवन भोपाल में आयोजित बाईसवीं पावस व्याख्यानमाला में, हिन्दी साहित्य के गौरव कवि प्रदीप एवं डा.शिवमंगल सिंह “सुमन” की जन्मशताब्दी समारोह पर केन्द्रीत त्रि-दिवसीय समारोह ( 17से 19 जुलाई2015) विशाल जनसमूह की उपस्थिति में, अपनी संपूर्ण भव्यता और गरिमा के साथ सानन्द संपन्न हुआ. यह वह अवसर था जब स्वयं देवराज इन्द्र अपने अनुचरों (मेघों) की उपस्थिति में जल बरसा रहे थे. भीषण गर्मी और उमस से आतप्त तन और मन दोनों खिल से जाते हैं. मौसम खुशनुमा हो उठता है. इस प्रतिष्ठा समारोह में कवि प्रदीप की सुपुत्री मितुल प्रदीप, सुमनजी के सुपुत्र कर्नल अरूणसिंह सुमन, धर्मयुग के संपादक रहे प्रख्यात साहित्कार स्व. धर्मवीर भारतीजी की पत्नि श्रीमती पुष्पा भारतीजी, रमेशचन्द्र शाहजी, डा प्रभाकर श्रोत्रियजी ,डा.प्रमोद त्रिवेदी, डा दामोदर खडसे, ध्रुव शुक्ल, डा विजय बहादुर सिंह,,डा श्रीराम परिहार आदि एवं महिला कथाकारों सहित देश के लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यकार-लेखक-कवि-चित्रकार-संपादक एवं पत्रकार बडी संख्या में उपस्थित थे विगत बाईस वर्षों से अनवरत आयोजित की जा रही पावस व्याख्यानमाला के अलावा शरद-व्याख्यानमाला, वसन्त व्याख्यानमाला तथा अन्य होने वाले साहित्यिक अनुष्ठानों की अनुगूंज देश के कोने-कोने में सुनी जा सकती है. यदि इस नगरी को साहित्य का महातीर्थ की संज्ञा से अलंकृत किया जाए तो आतिशयोक्ति नहीं होगी. हिन्दी भवन भोपाल में लगभग पूरे वर्ष साहित्यिक अनुष्ठान आयोजित होते रहते हैं. इन आयोजनों के बारे में जानने के साथ ही, हम हिन्दी भवन की स्थापना तथा अन्य आयोजनों के बारे में, संक्षिप्त जानकारी भी प्राप्त करते चलें, तो उत्तम होगा. मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल, जहाँ वह अपने विशाल ताल के लिए जगप्रसिद्ध है. इसके अलावा यहाँ बहुत कुछ है देखने के लिए-. जैसे लक्ष्मीनारायण मन्दिर, मोती मस्जिद, ताज-उल-मस्जिद, शौकत महल, सदर मंजिल, पुरातात्विक संग्रहालय,भारत भवन,इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, भीमाबेटका, भोजपुर. इनके अलावा श्यामला हिल्स पर स्थित है गांधी भवन,मानस भवन और इन दोनो भवनों के बीच स्थित है साहित्य का महातीर्थ हिन्दी भवन. संभवतः भारत का यह एक मात्र ऎसा स्थान है जहाँ होली के पावन पर्व पर शहर के तथा बाहर से आए हुए साहित्यकार एकठ्ठे होकर रंग-बिरंगे त्योहार को सौहार्द के साथ मनाते हैं. यह वह स्थान है जहाँ दीपवाली जैसे त्योहार पर सभी साहित्यकार इकठ्ठा होकर दीपपर्व मनाते हैं.यह वही स्थान है जहाँ पर ऋतुओं के अनुसार पावस व्याख्यानमाला, शरद व्याख्यानमाला, वसन्त व्याख्यानमाला का आयोजन किया जाता है. इसके अलावा हिन्दी दिवस पर साहित्यिक आयोजन आयोजित किए जाते हैं. हिन्दी से इतर जो साहित्यकार अपनी साहित्य-साधना कर रहे हैं, उन्हें भी यहाँ आमंत्रित कर उनका सम्मान किया जाता है.अतः यह कहा जा सकता है कि हिन्दी भवन भोपाल देश का एकमात्र ऎसा स्थान है जहाँ पूरे वर्ष भर साहित्यिक आयोजन बडॆ पैमाने पर आयोजित किए जाते है. शायद ही कोई ऎसा साहित्यकार होगा, जो यहाँ न आया हो. सभी ने अपनी उपस्थिति से इस भवन के प्रांगण को गुलजार बनाया है. पावस व्याख्यानमाला अपने आपमें एक ऎसा अनूठा आयोजन है, जिसमें भारत के कोने-कोने से साहित्यकार आकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं और अपने आपको अहोभागी मानते हैं. पावस व्याख्यानमाला एक ऎसी अनूठी व्याख्यानमाला है जो प्रत्येक वर्ष के माह जुलाई में आयोजित की जाती है. यह वह समय होता है जब समूचा आकाश बदलॊं से अटा पडा होता है या बादलों का जमघट होना शुरू होता है. बादल तो खूब आते हैं,लेकिन बरसते नहीं हैं. शायद उन्हें इस बात का इन्तजार रहता होगा कि कब व्याख्यानमाला शुरू होती है? जैसे ही इसकी शुरूआत होती है, वे जमकर बरस उठते हैं. भीषण गर्मी और उमस के चलते जहाँ प्राण आकुल-व्याकुल हो रहे होते हैं, बादलों के बरसते ही राहत मिलना शुरू हो जाती है. मन प्रसन्नता से झूम उठता है. जैसा कि आप जानते ही हैं कि एक नवम्बर 1956 को नए मध्यप्रदेश का गठन हुआ और पं रविशंकर शुक्ल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. ठीक इसी समय समिति का कार्यालय जो इन्दौर में स्थित था, भोपाल स्थानांतरिक हुआ और राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के कार्यों में गति मिलती गई. हिन्दी के प्रति उत्कट प्रेम रखने वाले पंडितजी ने हिन्दी भवन के लिए सवा एकड भूमि आवंटित कर दी. कालांतर में म.प्र. के जो राज्यपाल और मुख्यमंत्री आए, उन सबका स्नेह और सहयोग मिलता गया. दानदाता भी पीछे कहाँ रहने वाले थे, उन्होंने ने भी इस के निर्माण में तन-मन-धन से सहयोग दिया. फ़लस्वरूप हिन्दी भवन का निर्माण पूरा हुआ और हिन्दी प्रचार समिति की व्यवस्थापिका सभा ने सर्वानुमति से प्रस्ताव पास कर पं.रविशंकर शुक्ल हिन्दी भवन न्यास का गठन किया.वर्तमान में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अध्यक्ष श्री सुखदेव प्रसाद दुबेजी, मंत्री-संचालक श्री कैलाशचन्द्र पन्तजी, महामहिम राज्यपाल, मान.मुख्यमंत्री म.प्र.शासन, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के प्रधानमंत्री सहित अन्य गणमान्य नागरिक इस न्यास के न्यासी हैं. “रामकाज किए बिना मोहे कहाँ विश्राम” की तर्ज पर चलने वाले मान.श्री कैलाशचन्द्र पन्तजी आखिर चुप कैसे बैठ सकते थे ?. नयी-नयी योजनाएं आपके मन के भीतर आकार लेती चलती हैं. उसी का सुपरिणाम है कि इस पावन भूमि पर एक भव्य और सुन्दर साहित्यकार-निवास ने आकार ग्रहण किया. इसी भवन में निर्मित तेरह कमरे, देश के मुर्धन्य साहित्यकार –श्री माखनलाल चतुर्वेदी, आचार्य श्री विनयमोहन शर्मा, श्री भवानी प्रसाद मिश्र, श्री रामेश्वर शुक्ल “अंचल”, डा.शिवमंगलसिंह सुमन, डा.चन्द्रप्रकाश वर्मा, श्री बालकृष्ण शर्मा “नवीन”, श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान, श्री जगन्नाथप्रसाद मिलिन्द श्री हरिकृष्ण प्रेमी तथा श्रीकृष्ण सरलजी की पावन स्मृतियों को समर्पित किया गया. इसके अलावा एक वातानुकूलित सेमिनार कक्ष और एक सामान्य संगोष्ठी कक्ष का भी निर्माण किया गया, जिनका उपयोग साहित्यिक आयोजनो के लिए किया जाता है. यहाँ एक पुस्तकालय भी संचालित किया जाता है, जिसमें अनेकानेक विषयों की करीब छब्बीस हजार पुस्तकें पाठकों के लिए उपलब्ध हैं. सन 1972 से इस पुस्तकालय का संचालन म.प्र.शासन के स्कूल शिक्षा विभाग एवं नगर निगम भोपाल के सहयोग से किया जा रहा है साहित्य की बेजोड द्वैमासिक पत्रिका “अक्षरा” का प्रकाशन विगत तीस वर्षॊं से हो रहा है.आज इसकी गणना देश की श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं में होती है. म.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के मंत्री-संचालक श्री कैलाशचन्द्र पन्तजी इस पत्रिका के प्रधान सम्पादक और डा.सुनीता खत्रीजी सम्पादक हैं. अपनी श्रेष्ठ सम्पादकीय और पद्मश्री रमेशचन्द्र शाहजी के आलेख”शब्द निरन्तर”इस पत्रिका के प्राण होते हैं,जिन्हें पढकर आप चमत्कृत हुए बिना नहीं रह सकते.वक्ताओं के व्याख्यानों की आडियो-विडियो बनाकर उसे संरक्षित करना और “संवाद और हस्तक्षेप” का प्रकाशन कराना,कोई सरल काम नहीं है. इसी क्रम में “हिन्दी भवन संवाद” का मासिक अंक प्रकाशित होता है, जिसमें प्रदेश की साहित्यिक खबरें प्रमुखता से स्थान पाती हैं. हिन्दी भवन प्रदेश में संचालित समितियों के माध्यम से “प्रतिभा प्रोत्साहन प्रतियोगिताएँ” का आयोजन माह सितम्बर में करवाती है. इसमें कक्षा नौ से लेकर बारहवीं तक अध्ययनरत छात्र-छात्राएं भाग लेती है. देश भक्ति पर आधारित प्रसिद्ध कवियों की कविताओं का मुखाग्र पाठ, साहित्यिक अंत्याक्षरी, लोकगीत गायन प्रति.तथा वाद-विवाद प्रतियोगिताएं होती है और इसमें विजेताओं को स्मृति-चिन्ह, प्रमाणपत्र, तथा नगद राशि प्रदत्त किए जाते है. इन प्रतियोगिताओं के आयोजन के पीछे बच्चों को देशप्रेम के अलावा अपनी मातृभाषा हिन्दी के प्रति ललक जगाना होता है. शरद व्याख्यानमाला का शुभारंभ 2003 में हुआ था. इसका उद्देश्य ज्ञान आधारित तथा मौलिक लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए किया गया . विख्यात कवि एवं कथाकार स्व.श्री नरेश मेहताजी की स्मृति में वांगमय पुरस्कार स्थापित किया गया. इसी वर्ष (2003), सम-सामयिक- सामाजिक विषयों पर विचार करने की परम्परा को स्थापित करने के लिए, सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायमूर्ति श्री रमेशचन्द्र लाहोटीजी के गरिमामय उपस्थिति में बसन्त व्याख्यानमाला की शुरुआत हुई. यात्रा सिर्फ़ यहीं आकर नहीं रूकती नहीं. निर्बाध गति से बहती यह यह पुण्यसलिला अपने प्रवाह में अनेकानेक कीर्तिमान स्थापित करती हुई, अनेकों पडावों को स्पर्श करती हुई, आगे बढती रही है. इन्ही अनूठे आयोजनों में प्रतिष्ठित पुरस्कारों की भी स्थापना की गई. श्री नरेश मेहता वांगमय सम्मान 31000/-रू., श्री शैलेश मटियानी स्मृति चित्रा-कुमार कथा पुरस्कार 11000,रू.,श्री वीरेन्द्र तिवारी स्मृति रचनात्मक पुरस्कार 21000/-,रू. श्री सुरेश शुक्ल “चन्द्र” नाट्य पुरस्कार 11000/-रू.,श्रीमती हुक्मदेवी स्मृति प्रकाश पुरस्कार 5000/-,रू, इन पुरस्कारों के अलावा अन्य चौदह पुरस्कार दिए जाने की यहाँ व्यवस्था है. जिनमें हिन्दीतर भाषी हिन्दी सेवियों(सभी भारतीय भाषाओं के) को प्रदेश के महामहीम राज्यपाल द्वारा प्रदत्त किए जाते हैं.

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