चाय की चुस्कियों में तुमः समीक्षाः संतोष श्रीवास्तव

tea cover page (3)

ताज़ी बयार चली तो है….

 

उत्तराखंड के हरे भरे परिवेश से आकर महानगर की कंकरीट और यांत्रिक दुनिया में प्रवेश करने वाली सुमीता प्रवीण केशवा का पहला काव्य संग्रह ‘चाय की चुस्कियों में तुम’ ताज़गी का एहसास कराता है। हर युग में कविता के मापदंड बद्ल जाते हैं। नये-नये प्रतीकों और बिंबों को लेकर कविताओं का सृजन होता है लेकिन अब कविता में जोखिम भी बढ़ गया है। बदलते परिवेश में कविता के धर्म को निभा पाना जटिल ही नहीं चुनौती भरा भी है। एक सौ बत्तीस पृष्ठों के इस काव्य संग्रह में कवयित्री ने यह चुनौती स्वीकार की है। वे एक ऐसे पुल से गुज़री हैं जो दोनों किनारों को जोडकर नदी की दुर्गमता खत्म करता है। इन कविताओं का एक अपना अलग संसार है. जहां किसी भी तरह के हस्तक्षेप को वे नकारती हैं। उनके इस संसार में यथार्थ के ठोस धरातल पर कल्पना के रंग भी बिखरे हैं,प्रेम का ज्वार भी है तो कटघरे में प्रेम भी है जो रूह की अदालत में खड़ा है। स्त्री की सच्चाईयां भी हैं।

एक नदी बहती है मुझमें भी/ तुम हौले से छू लेते हो/ तो तरंगित हो उठती है………प्रेम की इस पराकाष्ठा में जब भगीरथ का आगमन होता है तो कितने बहाने बन जाते हैं हर जगह प्रेम उद्दीपन के। लेकिन वे अपने ढंग से जीना चाहती हैं…बहने दो एक नदी / मुझमें भी गंगा की ही तरह……वे अपने हिस्से की जमीन पे,अपने हिस्से के आकाश पे अपनी तरह से चलना,उड़ना चाहती हैं लेकिन कहीं प्रेम के प्याली के छलक जाने, खाली हो जाने का डर भी है उनमें और इसलिए वे इस प्रेम को समूची कायनात में बिखेर देना चाह्ती हैं। वे अपनी गुज़र चुकी उम्र को भी प्रेम के स्पर्श में ढूंढती हैं…….तुम्हारे स्पर्श ने मेरी सोई हुई/ उम्र को जगा दिया जैसे / खुद को ढूंढने लगी मैं आईनों में कहीं……

सुमीता जी की कविताएं साहित्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को व्यापक परिप्रेक्ष्य में रेखांकित करती है। कहीं वे निजीकरण की भेंट चढ़ चुके प्रगतिशील देश के युवाओं को लेकर चिंतित हैं……..भूमंडलीकरण और बाज़ारवाद की संस्कृति में गले-गले तक निमग्न युवाओं का पहला हक बनता है अपने देश पे……वह देश जो बाज़ारवाद की आंधी में अब सुरक्षित नहीं है। पूरी दुनिया ही बाज़ार में ढल गई है जहां सब कुछ बिकाऊ है। युवाओं की सोच भी,उनके भीतर का तेज भी,दिमाग भी। कहीं कवयित्री पहाड़ों को लेकर चिंतित है और यह कहने पे मजबूर कि पहाड़ों की जवानी की कोई कहानी नहीं होती / खत्म हो जाती है पहाड़ों की जवानी/ दो रोटियों की तोड़ पानी में। ‘पहाड़ की औरत’ में वे ये कहने से नहीं चूकतीं कि पहाड़ की औरत देह का विमर्श नहीं जानती / न ही उसे कोई सरोकार है/ देह की आज़ादी से / उसे तो चाहिए सिर्फ भूख से आज़ादी। और इसी भूख से विवश एक मां अपनी बेटी को मायके आने से रोकती है क्योंकि वे कहती हैं- पहाड़ की मिट्टी पत्थर बन चुकी है/ और पाथरों में कहां उगती है रोटी/ मत आना चेली / अब तू मैत मत आना………

एक ओर वे स्त्री का जन्म लेना जरूरी समझती हैं जबकि वे बेटी के पैदा होने से सामंती पिता के विद्रोही तेवरों को भली भांति समझ रही हैं…….लेकिन पिता की मन:स्थिति का सारा समीकरण ठहर जाता है जब वे कहती हैं….सुनो, पिता के लिबास में/ छिपे हुए दंभी “पुरुष”/ यह अच्छी तरह जान लो/ और गांठ बांध लो/ कि तुम्हें जन्म देने के लिए मेरा [स्त्री] का जन्मना बेहद जरूरी है। तो दूसरी तरफ वे धरती की व्यथा कथा से पीड़ित भी। जो द्रौपदी की ही तरह अपने पांच पतियों आकाश,वायु,सूर्य,जल और चांद के बीच बंटने को मजबूर तो है लेकिन द्रौपदी की तरह किसी अर्जुन से प्रश्न नहीं कर सकती कि क्यों उसका बंटवारा किया गया/ बगैर उसके मर्जी के/ पांडवों के बीच…….

संग्रह में कुछ स्त्री विमर्श पर आधारित कविताएं भी हैं। ‘बड़ी हो गई हो तुम’ जिसमें वे लिखती हैं…..अम्मा बड़ी होना तो सिखाया तुमने/ अन्याय के विरूद्ध लड़ना/ क्यों नहीं सिखाया तुमने?/ सिखाया होता तो आज मैं ज़िंदा होती/ आज मैं ज़िंदा होती अम्मा……..’मां तू मुझसे’ कविता में वे कन्या भ्रूण हत्या के तहत मां की कोख से आवाज़ उठाती हैं…..मां तू क्यों मुझसे खफ़ा हो गई/ कोख तेरी मेरी कब्रगाह हो गई। ‘पता नहीं क्यों’ कविता में….स्त्री की स्वतंत्रता का/ गलत फायदा उठाने लगी हूं/ और खुद से ही अप्रसन्न रहने लगी हूं मैं। कहते हुए वे ढूंढती हैं स्त्री स्वतंत्रता का अर्थ और ‘सड़क के किनारे’ उस मजबूर औरत तक पहुंचकर वे ठिठक कर रह जाती हैं,जिसकी सूखी छातियों में दूध नहीं है फिर भी वह विवश है बच्चे पैदा करने के लिए क्योंकि अकेले मजदूर पति की कमाई से/ नहीं बुझ पाती है सबकी भूख/ कमाई के लिए और भी/ कई हाथों की जरूरत है/ इसलिए वह जनती है/ हर साल कमाई के लिए/ हाड़-मास के साधन…….यह कविता जिसका मुख्य सरोकार गरीबी रेखा के नीचे पल रहे मनुष्यों के लिए सत्ता की नैतिकता की धज्जियां उड़ाना है जो हमारे सामन्ती तथा बुर्जुआ समाज की सभ्यता तथा संस्कृति के अतल तल में विधमान है।

संग्रह का नाम ‘चाय की चुस्कियों में तुम’ इस नज़रिए से सार्थक बन पड़ा है कि चाय जहां स्फूर्ति और काम करने की ऊर्जा देती है वहीं उसकी कमी की तलब डिस्टर्ब भी करती है। कवयित्री जिस ‘तुम’ के संग तमाम कविताओं की शब्द यात्रा करती हैं….उस ‘तुम’ की तलब उनकी कविताओं की आत्मा बन गई है। इन कविताओं को सिर्फ कविता होने की वजह से नहीं, उसमें निहित गहरे और व्यापक प्रेम,सामाजिक आशयों के लिए भी पढ़ा जाना चाहिए।

चाय की चुस्कियों में तुम [काव्य संग्रह] सुमीता केशवा

प्रकाशक- मानव प्रकाशन १३१,चितरंजन एवेन्यू

कोलकाता-७०००७३.

मूल्य-२००/रू.

 

 

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