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                                                                                                                                                  वसंत

आए महंत वसंत


आए महंत वसंत
मखमल के झूल पड़े हाथी-सा टीला
बैठे किंशुक छत्र लगा बाँध पाग पीला
चंवर सदृश डोल रहे सरसों के सर अनंत
आए महंत वसंत

श्रद्धानत तरुओं की अंजलि से झरे पात
कोंपल के मुँदे नयन थर-थर-थर पुलक गात
अगरु धूम लिए घूम रहे सुमन दिग-दिगंत
आए महंत वसंत

खड़ खड़ खड़ताल बजा नाच रही बिसुध हवा
डाल डाल अलि पिक के गायन का बँधा समा
तरु तरु की ध्वजा उठी जय जय का है न अंत
आए महंत वसंत

- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना





       वसंती हवा



हवा हूँ , हवा मैं,
वसंती हवा हूँ।
सुनो बात मेरी-
अनोखी हवा हूँ।
बड़ी बावली हूँ,
बड़ी मस्तमौला।

नहीं कुछ फिकर है,
बड़ी ही निडर हूँ।
जिधर चाहती हूँ,
उधर घूमती हूँ,
मुसाफिर अजब हूँ।

 
न घरबार मेरा,
न उद्देश्य मेरा,
न इच्छा किसी की,
न आशा किसी की,
न प्रेमी न दुश्मन,
जिधर चाहती हूँ,
उधर घूमती हूँ।
हवा हूँ , हवा मैं,
वसंती हवा हूँ।

 
जहाँ से चली मैं.
जहाँ को गई मैं-
शहर, गाँव, बस्ती,
नदी, रेत निर्जन,
हरे खेत, पोखर,
झुलती चली मैं।
झुमाती चली मैं!

हवा हूँ , हवा मैं,
वसंती हवा हूँ।   

-केदारनाथ अग्रवाल    




     धरती का डोले मन



धरती का डोले मन
के बसंत ऋतू आई

सूरज जो छुप के बैठा था
खिड़की खोल ले मुस्काया
उसकी सुनहरी धूप ने
धरती का कण कण चमकाया
हर्ष हर्ष बोले सुमन
के बसंत ऋतू आई
धरती का डोले मन
के बसंत ऋतू आई

ओढ़ बसंती चूनर
धरा सुन्दरी  इतराए
बादल जो राही बन भटके 
उस का मन भी भरमाये
बहे बसंती बयार होके मगन
के बसंत ऋतू आई
धरती का डोले मन
के बसंत ऋतू आई 

फूलों ने घूँघट खोले
तो भवरे ने ली अंगड़ाई
पी का संग पाने को
प्रकृति सुन्दरी बौराई
प्रेम राग से गूंजे गगन
के बसंत ऋतू आई
धरती का डोले मन
के बसंत ऋतू आई 
 

-रचना श्रीवास्तव




     मन मेरा भी...



मन मेरा भी महक उठा
सूरज ने गिराए परदे
तपिश धूप की कम हुई
खोल दी गांठ 
हवाओं ने
मौसम की आंख नम हुई
बदली ऋतू तो
कण कण चहक उठा
मन मेरा भी महक उठा
गदराये पेड़
मादमाई किरणे
वन में खग
उपवन में मृग
हो आतुर विचरें
छटा ऐसी
वैराग्य बहक उठा
मन मेरा भी महक उठा
आँचल पर आकाश के
ज़रदोज़ी से तारे
कुसमित पवन
सजा दीप
आरती उतारे
रूठी जो
ऐसे में चांदनी
चाँद  कसक उठा
मन मेरा भी महक उठा  
 

-रचना श्रीवास्तव  




किसलय वसना प्रकृति सुन्दरी



पहन शाटिका पीली-पीली,

प्रकृति प्रिया ने रूप सजाया.

परिमल के मिस भेज सन्देशा,

प्रिय बसन्त को पास बुलाया.

त्याग निशा की श्याम चूनरी,

पहनी अंगिया आज सुनहरी.

पूर्व दिशा के स्वर्ण रंग में,

रंगी खड़ी है प्रकृति छरहरी.

शीतल, मन्द, सुगन्ध पवन है,

वन-उपवन छाई हरियाली.

फ़ूले फ़ूल खड़े हैं लेकर-

कर में नव पराग की थाली.

नाच रहीं तितलियां मनोहर,

भौंरे गुन-गुन करते गुन्जन.

हरी-मखमली दूब बिछी है,

जहां ओस करती है नर्तन.

श्यामा अनिली भी कोयल से,

करती अन्ताक्षरी मनोहर.

फ़ैलाये निज बांह सभी को,

न्योता देते कमल सरोवर.

बौरा उठे आम बागों में,

मह-मह महुआ मदिरा ढारे.

कचनारों की गन्ध उड़ाकर,

खेल खेलते हैं सब न्यारे.

किसलय वसना प्रकृति सुन्दरी,

दुल्हन सी सजकर है आई.

प्रिय वसंत की बांहों में आकर

लेती हो प्रमुदित अंगड़ाई.

-नीरजा द्विवेदी     





    वसंत मुआ लगा रहा



चूड़ियां क्यों खनक रहीं, दमक रही मांग है,
प्रियतम की याद क्यों, मन में रही जाग है?

 

कली क्यों मुसका रही, क्या भर गया पराग है,
हवा क्यों पगलाई है, क्या लग गया माघ है?

 

श्वान का छौना तक श्वानिन पीछे रहा भाग है,
नागिन पर क्यों प्यार से फुफकार रहा नाग है?

 

पहले से जानती है उसका प्रियतम बड़ा घाघ है,
गोरी आज क्यों घबरा रही, लग न जाये दाग़ है?

 

उसकी याद में रमेसर रात भर गाता रहा फाग है,
कब वह आयेगी, कब होगा झंकृत भैरवी राग है?

 

क्या पाहुन आ रहा, क्यों मुंडेर पर बैठा काग है?
वसंत मुआ लगा रहा, प्रेमियों के हृदय में आग है।

      -महेश चन्द्र द्विवेदी