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                                 सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर
                                          लेखनी- नवंबर-2010



                                                      "यह  दीप, अकेला, स्नेह भरा,
                                                         है गर्व भरा मदमाता, पर
                                                         इस को भी पंक्ति को दे दो।
"


                                                                                  --अज्ञेय    


                                                                 ( इक्कीसवीं सदी में)


                                      संसार एक खुला बाज़ारः समस्या या समाधान ! 


                                                                   (अँक-45-वर्ष-4)


दीपावली विशेष-संकलन दीपमालाः ' नीरज ', रामअवतार त्यागी, ' अज्ञेय ', दीनदयाल उपाध्याय, कीर्ति चौधरी, महेन्द्र भटनागर, अगेन्द्र, जया पाठक, रामेश्वर कम्बोज ' हिमांशु,' रचना श्रीवास्तव, तोषी अमृता, शैल अग्रवाल । कविता धरोहरः दुष्यंत कुमार। माह विशेषः गजानन माधव ' मुक्तिबोध' । कविता आज और अभीः कुमार अम्बुज, दिनेश ध्यानी, सतेन्द्र श्रीवास्तव,  मालती शर्मा, प्रभाकर पांडेय, कादम्बरी मेहरा,  राजेन्द्र प्रकाश वर्मा । माह के कविः प्राण शर्मा। बाल कविताः  रतन चन्द ' रत्नेश'।


दृष्टिकोणः शैल अग्रवाल। मंथनः देवेन्द्र इस्सर।   कहानी समकालीनः शैल अग्रवाल।  कहानी समकालीनः सुषम बेदी। कहानी धरोहरः भीष्म साहनी। लघुकथाः फजल इमाम मल्लिक। रूबरूः रवीन्द्र अग्निहोत्री  । परिदृश्यःसीताराम गुप्ता। हास्यव्यंग्यः प्रेम जन्मेजय । सरोकारः वेदप्रताप वैदिक । मुद्दाः राघवेन्द्र सिंह। परिचर्चाः मनोज मिश्रा। स्मृति शेषः वेदप्रताप वैदिक।  चौपालः अजय पराशर।   चांद परियां और तितलीः  बाल कहानीः  शैल अग्रवाल।

                                                   संरचना व संपादनः शैल अग्रवाल

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                                                                                                                                            अपनी बात


‘ रोटी सा चांद
सपनों का आकाश
भूखों का नहीं।‘

भारत के किसी भी शहर का  दृश्य हो सकता था वह , पर था मेरे अपने शहर का ही। सामने पंडाल में दावत चल रही थी और वह सात-आठ साल की बच्ची और कुत्ता दोनों ही ठीक उसी के सामने,  बाहर की दीन-दुनिया से बेखबर कूड़े के ढेर में बड़ी तन्मयता से कुछ ढ़ूंढे जा रहे थे। ...शायद खाना। स्थिति असह्य थी। आते-जाते, खाते-पीते, सभी को दोनों की ही आदत पड़ चुकी थी। किसी का उनपर ध्यान नहीं गया। किसी ने कुछ करने की या बच्ची पर ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी।...शायद देखा ही नहीं। और तब उस निराश परिदृश्य के दबाब में कलम से  हाइकू कहिए या इस उच्छवास का जन्म  हुआ था। आज भी किसी भी बाजार या वाद की बात करने से पहले समता की बात करनी जरूरी हो जाती है। दोहन और वितरण की बात जरूरी हो जाती है।...शाइनिंग इंडिया और भी शाइन कर रहा है। अरबों खरबों खर्च हो रहे हैं । कहीं महल बन रहे हैं तो कहीं भव्य सरकारी अंतर्राष्ट्रीय आयोजन। पर अपने भूखे नंगों को पूरी तरह से भुलाकर। उनकी तरफ से पूरी तरह से अंधे बहरे बनकर।

मुक्तिबोध ने कहीं कहा था कि भारत जैसे राष्ट्र-परक और सदिंयों से चले आ रहे वर्ण ,वर्ग व्यवस्था वाले देश में कार्लमार्क्स को नहीं अपनाया जा सकता क्योंकि उसकी सोच में व्यक्ति और समाज के हितों का समिष्ट रूप से समन्वय नहीं है। मुक्तिबोध  कम्यूनिज्म के पक्षधर थे  क्योंकि उनकी संवेदना पिछड़े और अभावग्रस्त समाज के साथ थी ।  वे जानते थे कि इस पूँजीवाद के दौर में ये लोग और भी निर्धन और पीड़ित, शोषित ही होते चले जाएंगे और मदद के लिए भी कोई नहीं आएगा। राष्ट्र या सरकार भी नहीं।


विश्वीकरण और पूंजीवाद के उत्कर्षकाल में राष्ट्रों की सीमाएँ भी तो टूटने लगती हैं,   ताकत फिसलने और छूटने लगती है। विकासशील और अविकसित राष्ट्रों के संसाधनों पर शक्तिशाली राष्ट्रों का नियन्त्रण हो जाता है। हर जगह खुली प्रतियोगिता का बोलबाला हो जाता है और सबसे बडी बात यह होती है कि जनकल्याणकारी राज्य सरकारों के हाथ से शासकीय नियन्त्रण समाप्त हो जाते हैं, सरकार केवल ’फेसिलिटैटर‘ या बिचौलिए की भूमिका में आ जाती है और विश्व स्तर पर एक ’विश्व गाँव‘ की स्थापना होकर नए तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी ज्ञान की सहायता से उत्पादन तंत्र पर पूँजीवादी राष्ट्र अपना शिकंजा कसते चले जाते हैं। जहाँ आत्मीयता, ममता, भ्रातृत्व, सौहार्द, दया, क्षमा, सहिष्णुता का कोई स्थान नहीं ।

हमारे यहाँ भी वैश्वीकरण का प्रभाव व्यापार और रहन-सहन के साथ-साथ, साहित्य संस्कृति कला और भाषा पर भी व्यापक स्तर पर पड़ा  है। बाजारवाद और उपभोक्तावाद के साथ भौतिकता बढ़ रही है, जिसकी वजह से सभी क्षेत्रों में मूल्यहीनता और  संवेदनहीनता भी बढती जा रही है। जबकि हमारे चिन्तन में तो सदैव से ’’वसुधैव कुटुम्बकम्‘‘ की अवधारणा ही रही है और इसी से भावात्मक स्तर पर भ्रातृत्व का भाव, बन्धुता का भाव हमारे संस्कारों में अभी तक रमा रह पाया है। वस्तुतः हमारा विश्वव्यापी दृष्टिकोण परस्पर मानवीय सहयोग एवं पारस्परिक मेलजोल और लेन देन, आपसी सहयोग और सामंजस्य पर ही तो टिका हुआ है । वर्ण व्यवस्था की भी मूल रूप में यही जरूरत रही होगी कभी कि सामाजिक और पारिवारिक काम, जरूरत और जिम्मेदारियों को योग्यतानुकूल बांटकर सहज और सुचारु रूप से रखा जा सके , इसके केन्द्र में आधिपत्य या बाजारवाद नहीं था । किन्तु मार्शल मैकलुहान के ’विश्व गाँव‘ की परिकल्पना में हर वस्तु बिकाऊ हो जाती है; यहाँ तक कि माँ-बाप, भाई-बहन, पिता-पुत्र के पवित्र रिश्ते तक बिकाऊ हो सकते हैं जरूरत पड़ने पर।

दया-ममता के स्रोत सूखते जा रहे हैं और जो कुछ है, वह ’मैं‘ पर ही केन्द्रित हो रहा है। जो हो सो मेरे लिए हो, जो सोचूं तो ’मेरे‘ लिए, जो लिखूं तो ’मेरे‘ लिए, जो बोलूं तो ’मेरे‘ लिए...खाऊं, पीऊं , हंसू, गाऊं बस मैं ही, अर्थात् सबके केन्द्र में ’मैं‘ ही रहूं सदा ही। भले ही उसके लिए मेरी पात्रता हो या न हो। दूसरे भूखे मरते हो तो मरें।  प्यासे हैं तो रहें, फुटपाथ पर पडे हैं तो हैं,  मेरा घर तो सुरक्षित और आलीशान है। ऐसी मानसिकता में ईर्ष्या, द्वैष, हिंसा, अन्धी प्रतिस्पर्धा तो होगी ही, जिसमें नैतिकता का क्षरण होना भी स्वाभाविक है। यही वजह है कि हमारी आज की इस विश्वीकरण और बाजारवाद की सभ्यता में हर तरफ से बस  ’मैं ’ की ही बू आने लगी है। भाव और शब्द क्या, रिश्ते तक अपनी मिठास खोते जा रहे हैं। आत्मबोध या अस्मिता बुरी अवधारणा नहीं, पर अति हर चीज की बुरी है और मूल्यांकन व उपयोग व उपलब्धि सही हो तो बाजार भी हमारे सुख और आराम का पहिया हैं पर असंतुलित परिस्थितियों में तो खरगोश और हिरण को भी  देखकर उनकी खाल के पीछे छुपे भेड़ियों का ही शक होंना आदमी का स्वाभाव बन जाता है।  


लेखनी का नवंबर का यह अंक इसी  विश्वीकरण और इससे उत्पन्न चुनौतियों और संभावनाओं पर है। नजदीक होती दूरियों की समझ और राजनीति पर है। संक्षेप में कहूं तो तेजी से बदलते इस विश्व और इसके बाजारवाद पर है । कुछ हद तक संचय प्रेरित लालच और पूंजीवाद पर थम कर सोचना चाहा है लेखनी ने। समाज और प्रवृतियों में आ रहे तेजी से बदलाव पर रपटी नहीं , आ थमी है।


विदेश जाना अब दूसरे शहरों में जाने जैसे होता जा रहा है। जेट एज में भौगौलिक दूरियां अर्थहीन हो गई हैं। कार हों या कपड़े , कहीं बनते हैं, कहीं सिलाई  होती है और लेबल जाकर कहीं और लगता है। आज पूरी दुनिया एक बड़ा बाजार है, और बड़ा कारखाना भी।  जी चाहे जो जहां से  खरीदो और बेचो, कोई बन्दिश नहीं। बस उत्पादन की खरीदने बेचने की...सही क्षमता होनी चाहिए। खेल के दांव पेंच आने चाहिएं। सब कुछ चयन पर है। आर्थिक क्षमता पर है। जिस व्यक्तिवाद का विलय समाज के समन्वय के लिए था वही आज अपनी सारी ताकत के साथ व्यक्ति विशेष या परिवार  विशेष  बनकर उभर रहा है। और उसके साथ  पनप रही हैं स्पर्धा , लालच, वैमनस्य और अन्य सभी तामसिक और अपराध प्रवृत्तियां। ऐसा नहीं कि सबकुछ खराब ही खराब हो रहा है। ज्यों-ज्यों मानव सोच मथ रही है। निरंतर नए धरातल और नए क्षितिज तलाशना सहज होता जा रहा है। भारतीय युवाओं और प्रतिभाओं ने तकनीकि, चिकित्सा वित्त, वाणिज्य , कला, हर क्षेत्र में आधिपत्य कर रखा है और गौरव पताका ही नहीं , देश की आर्थिक स्थिति में भी सुगढ़ योगदान कर रहे हैं वे। पर सही माने में यह तभी संभव है जब अपने परों की ताकत का सही अंदाजा हो उन्हें और परखने वाली कसौटी पर भी कोई दवाब, कोई मिलावट न हो। राजा निरपेक्ष हो और प्रजा उसके प्रति पूर्ण समर्पित।

आज इस अति व्यावहारिक और सुलभ दुनिया में मां बाप और बच्चे , परिवार की भी तो यही परिभाषा रह गई है - माई फैमिली यानी मां बाप और बच्चे - जहां ग्रैन और ग्रैनी वीकएन्ड और त्योहारों पर विजिट करने आते हैं और अन्य रिश्तेदार तो बस कभी –कभार ही। आए भी तो उनका इन्तजाम अधिकांशतः होटलों में ही करवाया जाता है। न अब लोगों के घरों में इतनी जगह है और ना ही दिलों में।और अब किसी को यह अखरता भी नहीं।


कैसा महसूस करते हैं आप इस बदलते संसार में? क्या सोचते हैं इस वैचारिक आंधी और व्यापारिक अवसर व चुनौतियों के बारे में? क्या वैयक्तिक और नैतिक  मूल्यों में इस वजह से जटिलता आ गई है, टकरा रहे हैं वे? क्या यह बदलाव बहुत तेजी से आ रहा है और जड़ों से उखाड़ रहा है या पसंद कर रहे हैं आप इसे? क्या  मात्र एम. टी.वी या चाइना और अमेरिका को दोष देकर परिवार और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों से छुटकारा पाय जा सकता है ?
विश्व ही नहीं भारत के कोने-कोने से भी अब आए दिन तरह- तरह की आवाजें उठने लगी हैं और आह व वाह के साथ-साथ आरोपों और प्रत्यारोपों का बाजार भी गर्म है। आवाजें जिनमें झूठ है, हिंसा है, क्रोध है , विद्रोह है, अपनी बात मनवाने के लिए युद्ध है। अब आतंक और विष्फोट दोनों ही हमारे जीवन के अभिन्न हिस्से बनते जा रहे हैं और शक व असुरक्षा ने हमारी मानसिकता को पूरी तरह से खोखला कर दिया है।  कहीं इस उथल-पुथल के मूल में हमारा खुला बाजारवाद, उसका लालच जहां व्यक्ति ही - विशेष हो जाता है , समूह नहीं क्योंकि उसीके मूल्यांकन पर सभी कुछ टिका हुआ है , दाम भी और मुखौटा भी। फिर वह दलितों को , अपने से कमजोरों को कुचलना भी झट ही सीख  भी तो लेता है।


तो कहीं मुख्य कारण  समाज में बढ़ती गरीब और अमीरों की आर्थिक विषमता की खाई ही तो नहीं?  असल में पूंजीवाद की यही सबसे बडी कमजोरी है कि वह मानव की संवेदना को मारकर उसे एक दौड़ में छोड़ देती है।  पर मानव की चिर-प्रतीक्षित आकांक्षा तो सदा से शांति की  ही रही है, जो न केवल उसके अस्तित्व, विकास एवं प्रगति के लिए आवश्यक है, बल्कि परिवार, समाज, राष्ट्र एवं विश्व के शान्तिपूर्ण उत्थान के लिए भी जरूरी है। यह भी निश्चित है कि जिस तरह से युद्ध, आतंकवाद, दंगे-फसाद आदि मानव मस्तिष्क की उपज हैं, शांति भी उसी मानव मस्तिष्क से ही, उसके अपने अन्दर से ही  जन्म लेगी। बाह्य दबाव या अतिक्रमण से नहीं।


 हां, इतना जरूर है कि  जहां भी बात नियम की आएगी तो समानता की भी आनी ही चाहिए, चाहे हम समाज की बात कर रहे हों या साहित्य की । और जहां भी बात खुद सोच पर नियंत्रण की, या काम निकलवाने की होगी तो समवेदना और निष्पक्षता के बिना यह संभव ही नहीं। वरना विद्रोह , आतंक और अंततः आक्रोश और विष्फोटक परिस्थितियों का ही जन्म होगां और बारबार होता ही रहेगा।

सतही उपचारों से कुछ नहीं होँना , बुराइयों का जड़ से उन्मूलन करना पड़ेगा। और इसमें साहित्य अपनी भूमिका आदिकाल से ही बखूबी निभाता आ रहा है, निभा सकता है। यदि साहित्य में ईसा मसीह की मानवीयता है तो कृष्ण का सौन्दर्य-बोध भी तो है; राम की मर्यादा है तो बुद्ध की करुणा; टैगोर का भक्तिभाव भी तो है। बिहारी का विलास है तो निराला की संघर्ष चेतना भी तो है । शरद् के आंसू हैं तो काका हाथरसी के ठहाके भी तो हैं।


 साहित्य ने सदा से ही विश्व सभ्यता, विश्व संस्कृति, विश्व शांति और विश्व एकता के द्वार खोले हैं , खोलने की कोशिश में सतत् प्रयत्नशील रहा है । पितु, मातु, सहायक, स्वामि सखा सबकुछ बनने की शक्ति ऱंखता है साहित्य, पर नाथ नहीं है। यही इसकी सबसे बड़ी खूबी भी है, और इसका सबसे बड़ा शस्त्र भी।  सूर और तुलसी गवाह हैं इसके। कबीर और नामदेव , शेक्सपियर , तौल्सतौय, गोर्की, विक्टर ह्यूगो , विश्व साहित्य की तरफ देखें तो नामों की फहरिस्त आसमान पर छिटके तारों सी अनगिनत है। फिर हमारा समाज तो आज भी अंधेरे पर उजाले की जीत का उत्सव मनाने वाला समाज है । राम की रावण पर विजय गाथा से प्रेरणा लेता है...न सिर्फ प्रेरणा लेता है बल्कि पूजा करता हैँ।

वैसे भी रावण तो बस रावण ही है न..अति के दस-दस विकारी मुखों वाला ...अत्याचारी , दंभी और पाखंडी । जिसके सिर कटकटकर फिर-फिर के उग आते हैं।

आइये राम के गुण गाएं और आसपास के , खुद अपने अंदर के ;  समाज में , मन में छुपे रावणों को पहचानें और खदेड़ें। एक नए तरह का दशहरा, इक्कीसवीं सदी की जरूरतों के उपयुक्त दिवाली मनाएं, जहां दिए विवेक के हों और पटाके हमारे सद्भाव और सत्कर्मों के ।...

तमसो मा ज्योतिर्गमय-‘  आगामी  ज्योतिपर्व का  प्रकाश  आपके जीवन को सत्कर्मों के उजास और अपनों के नेह से भर दे,  इसी मंगल कामना के साथ,

                                                                                                                                -शैल अग्रवाल 


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                                                                                                                                                        कविता धरोहर

                                                                                                                                                         -दुष्यंत कुमार    

  जा तेरे स्वप्न बड़े हों।








जा तेरे सवप्न बड़े हों।
भावना की गोद से उतर कर
जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें ।
चांद तारों सी अप्राप्य उंचाइयों के लिए
रूठना मचलना सीखें।

देखें
मुसकुराएं                                                                                                                                                                                  गायें
दीये की रोशनी देखकर ललचाएं

उंगली जलाएं।

अपने पांव पर खड़े हों
जा तेरे स्वप्न बड़े हों।



 

 

   कौन यहां आया था








कौन यहां आया था
कौन दिया बाल गया
सूनी घर-देहरी में                                                                                                                                                    ज्योति-सी उजाल गया 

पूजा की वेदी पर
गंगाजल भरा कलश
रक्खा था, पर झुक कर
कोई कौतूहल वश
बच्चों की तरह हाथ
डालकर खंगाल गया 

आंखों में तिर आया
सारा आकाश संहज
नये रंग रंगा थका-
हारा आकाश सहज
पूरा अस्तित्व एक
गेंद सा उछाल गया 

अधरों में राग, आग
अनमनी दिशाओं में
पार्श्व में, प्रसंगों में
व्यक्ति में, विधाओं में
सांस में, शिराओं में
पारा-सा ढाल गया

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                                                                                                                                     कविता आज और अभी


          अतिक्रमण








अतिक्रमण के समाज में जीवित रहने के लिए
सबसे पहले दूसरे के हिस्से की जगह चाहिए
फिर दूसरे के हिस्से की स्वतंत्रता

अनंत है अतिक्रमण के विचार की परिधि
इसलिए फिर दूसरे के हिस्से का जीवन भी चाहिए
वासनाएं नए क्षेत्रों में करती है घुसपैठ
सिद्धांत और सुभाषित बदलने लगते हैं हथियारों में

समुद्र की तरफ
अंतरिक्ष की तरफ
पालात की तरफ
दसों दिषाओं में लालसाएं मारती हैं झपट्टा

फिर मारने की चीज के बारे में लंबे प्रचार के बाद
तय कर दिया जाता है कि वह जचाने के चीज है
जैसे जिसके पास अस्त्र है वही अमर है

फिर मनुष्य ही करते हैं
मनुष्यों पर अतिक्रमण
घेरते हुए खुद को वस्तुओं से
आसक्ति की चाषनी में वे पागते चले जाते हैं
एक नया संसार
जिसमें मानवीय दिखाता हुआ हर उपक्रम
किसी नयी वस्तु को ले सकने का सामर्थ्य बताता है
कितना दबाया हुआ है
दूसरे के जीवन का रकबा
और पृष्ठभूमि में से झांकती है कितनी वस्तुएं
इन बातों से ही फिर बनने लगती है
समाज में आदमी की आदरणीय पहचान ।


      -कुमार अम्बुज




 





         अक्ष







आज सुबह मैंने शीशे में
अपने चेहरे को देखा है।
जरा गौर से नजर गड़ाई
दशकों का इतिहास भरा है। 

उसमें धूमिल दिखा हिमालय
गंगा-यमुना का दुःख झलका।
छिन्न-भिन्न सी दिखी प्रकृति
वन अरू घन का नाम नही।

मृत प्रायः सी दिखी मानवता
संबधों में आंच नही थी।
आमा, बूबू मात-पिता की
स्नेहिल छाया मुझे दिखी।

तुम वहां थी छाया बनकर
मेरे आगम और निगम में।
तुम बिन अब तक रहा अधूरा
लेकिन अब दिखता हूं पूरा। 

अपने गांव अरू पनघट की
पगड़डी पर नजर गई। 

बंजर सा था गांव लग रहा
उजड़े घर अरू सूखा पंदेरा।
नौनिहाल लग रहे थके से
उनमें अपना अक्ष निहारा।

लेकिन ये क्या बचपन में ही
कांति रहित था बचपन सारा।
शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क अरू पानी 


जैसा पहले वही कहानी। 
रोटी की खातिर आज भी
शहरों को बहती है जवानी।
बात वही है वही कहानी
बहता पानी बहती जवानी।

अपने ही लहू में जैसे
नही रही अब शेष रवानी।।


    -दिनेश ध्यानी









       नीरो








नीरो फिर अपनी लय-तार-धुन बजा रहा
सपनों का रोम जल रहा, वह दिखा रहा
कितना था विस्तृत साम्राज्य
स्नेह-प्यार का
पावन संस्पर्शों के
उष्मित संसार का
निभृत विष्फोटों को वह बाहर ला रहा
पट्टों-स्तंभों पर
अंकित इतिहास था
दुर्ग थे उपलब्धि के
मन का प्रकाश था
नीरो अब इन सबकी ईँट-ईंट गिरा रहा
यह नीरो-जो न हुए हम,
उसका दर्द है
गहरे अभावों की आँधी की गर्द है
अब वह अहसासों की कीलें चुभा रहा
स्वप्न जहां होते हैं
नीरो भी होता है
जो न उसे जान सका, जीवन भर खोता है
नीरो विश्वास की धज्जियां उड़ा रहा 


          -सतेन्द्र श्रीवास्तव

 












अंग्रेजी और इंडिया









चले गए अंग्रेज
रह गई अंग्रेजी
सत्ता के सिर पर
चढ़ बैठी अंग्रेजी
हिंन्दी बन रही
विश्व की भाषा
भारत की भाषा अंग्रेजी !!

 
भारत अब भी बना हुआ है इंडिया
बच्चे-बच्चे की जुबान पर
चढ़ा हुआ है इंडिया!!!

पूरे विश्व में जाना जाता
भारत का नाम ‘ इंडिया ‘
समुद्रों में वह तैर रहा है
और उड़ रहा विमानों पर
खेलों के मैदानों में भी
खेल रहा है इंडिया



बाम्बे बना ‘  मुम्बई ‘
लेकिन उस मुंबई में अब भी
बना न भारत-द्वार
बना है ‘ गेट वे ऑफ इंडिया ‘

भारत की आजादी के दिन
अगणित वीर शहीद हुए
सूने हुए माँओं के आंचल
मांगों के सिंदूर पुछे

उनकी बलदानी आस्थाएं
जहां बोलतीं भारत की जय
भारतीय गणतंत्र और संस्कृति
जहां विराट रूप लेते
जलती ‘अमर जवान ज्योति‘ जहां
वहां भी ‘ इंडिया गेट‘ है!!


-डॉ.मालती शर्मा











        गौरैया








चाय की चुस्कियों के बीच
सुबह का अखबार पढ़ रहा था
अचानक
नजरें ठिठक गईं
गौरैया शीघ्र ही विलुप्त पंक्षियों में।
वही गौरैया,
जो हर आंगन में
घोंसला लगाया करती
जिसकी फुदक के साथ
हम बड़े हुए।
क्या हमारे बच्चे
इस प्यारी व नन्ही-सी चिड़िया को
देखने से वंचित रह जाएंगे !
न जाने कितने ही सवाल
दिमाग में उमड़ने लगे।
बाहर देखा
कंक्रीटों का शहर नजर आया
पेड़ों का नामोनिशां तक नहीं
अब तो लोग घरों में
आंगन भी नहीं बनवाते
एक कमरे के फ्लेट में
चार प्राणी ठुंसे पड़े हैं।
बच्चे प्रकृति को
निहारना तो दूर
हर कुछ इंटरनेट पर ही
खंगालना चाहते हैं।
आखिर
इन सबके बीच
गौरैया कहां से आयेगी ?

-श्री कृष्ण कुमार यादव








          मैं ब्राह्मण हूं 










मैं हिन्दू हूँ, जी हाँ एक हिन्दू,
कुछ रुढ़ियों एवं प्रथाओं का एक बिन्दू,
हाँ मैं एक हिन्दू.
ना-ना-ना,
हिन्दू तक तो ठीक था,पर जानते नहीं,
मैं हिन्दू में ही हूँ, ब्राह्मण, पंडित, चंदनधारी,
अच्छे कर्मों का अधिकारी.
छूना मत मेरा भोजन वर्ना वह अपवित्र कहलाएगा,
मैं रह जाऊँगा भूखा-भूखा, जानते नहीं,
तूझे मेरा भोजन छिनने का पाप लग जाएगा.
मैं भी जानता हूँ, इस अन्न को तूने ही उगाया है,
कूट-पीसकर चावल बनाया है,
ये मिर्च व मसाले हैं तेरे खेत के,
नमक को भी तूने ही सुखाया है.
जहाँ तक है इस बरतन का सवाल,
तूने ही दिया इसको यह आकार.
कुछ भी हो तुम क्षुद्र ही तो हो,
पर मैं तुमसे ऊँचा हूँ, ब्राह्मण हूँ.
ये ठीक है इस कूप को खोदने में,
हर जीव को जल देने में,
तूने खून-पसीना एक किया,
पर अब अपना लोटा ना डुबा,
इस वक्त इसे ना करो अपवित्र,
पहले मुझे जल भर लेने दो,
हींकभर पी लेने दो, वर्ना
मैं जल बिन मीन हो जाऊँगा.
देखो कितनी तेज बारिश है,
मैं भीग रहा हूँ, निकलो झोपड़ी से बाहर,
मैं कैसे बैठूँ तेरे साथ, अपवित्र हो जाऊँगा.
ब्राह्मण हूँ.
मैंने कब कहा कि ये कपड़े,
जो मैंने पहने हैं, तूने नहीं बनाए,
अरे साफ कर दिए तो क्या हुआ,
यह अपवित्र हुआ ?
पर मेरे छूने से पवित्र हुआ,
मैं इतना देखता चलूँ तो पागल हो जाऊँगा,
देख ! इसे अब मत छूना,मैं ब्राह्मण हूँ.
आओ बैठो पैर दबाओ,थोड़ा ठंडा तेल लगाओ,
करो धीरे-धीरे मालिश,दूँगा तूझे ढेर आशीष,
पर तुम मुझको छूना नहीं,अपवित्र हो जाऊँगा.
ब्राह्मण हूँ.
मैं मानता हूँ, तेरे बिन मैं जी नहीं सकता,
हर वक्त,हर क्षण मुझे तेरी जरूरत है,
जबतक तू ना देता बनाकर शादी का डाल,
नहीं हो सकता मेरा शुभविवाह.
पर मैं तुमसे ऊँचा हूँ, ब्राह्मण हूँ.
मेरी माँ भी कहती थी, मेरे पैदा होने के वक्त,
तू माँ के पास रह रही थी,अरे यह क्या ?
मेरे जमीं पर गिरने के वक्त तो,
माँ दर्द से छटपटा रही थी,
उस समय तू मुझे सीने से लगाए,
प्रेम से चुमचाट रही थी.
पर देख अब मुझे मत छूना, ब्राह्मण हूँ.
मैंने धारण किए जनेऊ,माथे पर चंदन,
करुँगा प्रभु का पूजन,
पर तू कर पहले मेरा पूजन,
मैं ब्राह्मण हूँ.
मैं स्पष्ट कहता हूँ,
तेरी कृपा से ही जिंदा रहता हूँ,
पर इससे क्या,यह तेरा एहसान नहीं,
मेरा ही एहसान है तुझपर.
मैं ब्राह्मण हूँ, हूँ, हूँ. छूना मत.
अपवित्र हो जाऊँगा.


      -प्रभाकर पाण्डेय





बाब शिलिंगटन अकेले क्रिकेट खेल रहा है 








बाब शिलिंगटन अकेले क्रिकेट खेल रहा है 
बाब शिलिंगटन जिसके
सफेद / भूरे बाल बिखरे हुए हैं
बाब शिलिंगटन जिसने
गर्मी में भी तीन ऊनी कोट पहन रखे हैं।
बाब शिलिंगटन जो थोड़ी देर पहले ही
सोकर उठा है,
और उठते ही
बगल में रखी लगभग खाली बोतल से
रात की बची हुई दो घूंट शराब को
अंतड़ियों में डालकर
अपने दफ्ती के बक्से को जो उसका बिस्तर
और रजाई है
तह कर, कोने में रखकर
एक-दो आने-जाने वालों को
भला बुरा कहकर
अब एक उठती अधूरी दीवार के
सहारे तीन ईंट खड़ी करके
क्रिकेट खेल रहा है।
बाब शिलिंगटन अपने हाथों में
डेढ़ हाथ की पतली लकड़ी लेकर
उसे जमाकर, हटा हिलाकर
नीचे रखकर, आसमान को दिखाकर अब
बैटिंग कर रहा है।
बाब शिलिंगटन
अपने बैट को आधा उठाकर चिल्ला रहा हैः
फेंको
सालों / तुम सब फेंको
एक-एक कर फेंको
तेज फेंको /  स्लो फेंको /  गुगली फेंको
एक-एक गेंद को मैं हनूंगा
हन्-हन् कर मारूंगा
चौव्वा मारूंगा, छक्का मारूंगा
सबकी मारूंगा
एक-एक की मारूंगा
बाब शिलिंगटन चिल्ला-चिल्ला कर
क्रिकेट खेल रहा है बाब शिलिंगटन
लेकिन यह भी महसूस कर रहा है
कि कोई बालिंग नहीं कर रहा है
किसी तरफ से नहीं कर रहा है।
किसी तरफ से नहीं फेंका जा रहा है कोई गेंद
थोड़ी देर बाद, अब
बाब शिलिंगटन अपना बल्ला
ईंटों के स्टैंप के पास रख रहा है
और आते-जाते लोगों की ओर देख रहा है
कभी-कभी हंस रहा है।
कभी-कभी गालियां दे रहा है।
बाब शिलिंगटन ने अभी-अभी एक एशियाई
को देखा उसके सामने जाकर खड़ा हो गया।
उससे चाय के पैसे मांगे।
एशियाई ने पैसे नहीं दिएं।
देखकर आगे बढ़ गया
बाब शिलिंगटन कुछ देर उसे देखता रहा।
फिर चिल्ला पड़ा
उल्लू के पठ्ठे
यहां बिना बुलाए आते हैं ।
हमारा ही खाते हैं
और हमीं को कौड़ी तक नहीं देते।
बाब शिलिंगटन फिर चुप होकर बैट उठा रहा है
हर तरफ उसे दिखाकर बल्लेबाजी किए जा रहा है।
बाब शिलिंगटन सबको गालियां देता है
सिर्फ बच्चों को छोड़कर
आते-जाते लड़के कभी उस पर कंकड़ी या
केले के छिलके या कुछ और फेंक देते हैं।
कुछ उसके करीब जाकर
रूमाल नाक पर रखकर
उसके बदबूदार कोट पर थूक देते हैं।
तो भी बाब शिलिंगटन कुछ नहीं कहता
सिर्फ हंसता है।
और जब वे चले जाते हैं
तो चिल्लाने लगता है
सब जाएंगे वक्त आते ही सब बिला जाएंगे।
बिना कुछ बदले सब गुजर जाएंगे
जैसे पीटर गया, मुंह बाए, हाथ फैलाए...
साला कप्तान बनता था अपने को
मेरे सामने...
सब जाएंगे हां हां सब जाएंगे
जैसे हिटलर गया, स्टालिन गया, फ्रैंको,
सालाजार गया
जैसे मेजर लेविंग्स्टन गया
आउट करना चाहता था मुझको
मक्कार धोखेबाज...

हां हां सब जाएंगे, एक-एक कर जाएंगे
जैसे मैगी जाएगी, जैसे मदर टैरेसा जाएगी
यहां आईं थीं हमको कलकत्ता बताने...
रोज की तरह आज भी,
बाब शिलिंगटन अकेले क्रिकेट खेल रहा है
हन्-हन् कर मार रहा है।
चिल्ला कर गालियां दे-देकर कह रहा है 
फेंको, सालों फेंको ...
तेज फेंको, स्लो फेंको, गुगली फेंको
फेंको, जी भर कर फेंको... ! 


       -सतेन्द्र श्रीवास्तव  


 





       बहुरानी








मेरी बहुरानी
मेरे सुहाग की साक्षी
आओ मेरे पास बैठो
तुम नवजीवन हो
कुन्द की डाली, फूल झरो!



मेरे जीवन की तल्ख़ियाँ
मेरी झुर्रियों में जमीं हैं
आओ अपनी सरल मुस्कान का
इन पर आलेपन करो
नहीं चाहिए मुझे एंटिरिंकल क्रीम

 

यह मेरे चेहरे की पथराई नाराज़ी
न तुम्हारे लिये है, न ही है तुम्हारे कारण
जो इसे यहाँ जड़ गए वो अब नहीं रहे
फिर भी आभारी हूँ उनकी
कि तुम्हें ख़ुश देख सकूँ!



 एक बगुला ख़ुशी की पोटली लाया था
अब तुम सिन्दबाद की चील बनकर
इसका अपहरण मत करना
मैं चिर यशोधरा
मैने पुत्र दान कर दिया, अपना सर्वस्व!


मेरी ममता का कवच ओढ़े
तुम्हारा सुहाग है यह
इसी से हैं तुम्हारी वो ख़ुशियाँ
जो सिर्फ़ तुम, बस एक तुम
युग युग तक समेट पाओगी


मै इतनी समर्थ तो हूँ ही
कि तुम्हें कोई अभाव न होने दूँ
पर जो अभाव मैंने झेले
उनका विष धो डालो
वंड के खाओ ख़न्ड खाओगी

 
आओ मेरी ममता को बाँट लो
उस पयस्विनी धारा को
जो मुझ से तुम तक बह रही है
और बहती रहेगी तुम्हारे अंश में
धारा कभी पीछे नहीं मुड़ती


तुम्हारे नूपुरों में इसकी कल कल
आगे आगे बहेगी – सागर बनेगी
इस पर स्वार्थ का बँध मत बाँधना
तुम भी भीगना
मुझे भी भिगाना 

 
तुम्हारे कमरे के ये बन्द कपाट
सुनहरे राज़ बतियाते हैं
भले ही तुम उनमें खोई बन्द बैठो
पर ये चार बर्तनों का खड़कना
फ़ोन पर किसी और को न सुनाओ 

 
हम धातु के बने हैं
वर्षों से मँजे धुले हैं
हमको दुनिया के सामने ना पटको
चिब्भें पड़ जाएंगी
तुम्हें हमीं से निभाना है 

 
जब तुम्हारी ममता फलेगी
उसमें चौथाई ही सही पर
मैं विद्यमान रहूँगी
तुम्हारे चौखटे में मेरा स्वरूप हँसेगा
तुम उसे पहचानोगी और हंसती रहोगी. 


                      - कादम्बरी मेहरा 












      प्रतिष्ठा








अपने पड़ोसी से
मैंने पूछा
आप अंग्रेजी अखबार
क्यों मंगाते हैं
जबकि आप
अंग्रेजी नहीं पढ़ पाते हैं?

वे बोले-
अंग्रेजी अखबार
मंगाने से
प्रतिष्ठा बढ़ जाती है
इसकी रद्दी भी
ज्यादा भाव में
बिक जाती है।

 राजेन्द्र प्रकाश वर्मा 

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                                                                                                                                                             माह विशेष
                                                                                                                                                              मुक्तिबोध


चाहिए मुझे मेरा असंग बबूलपन










मुझे नहीं मालूम
मेरी प्रतिक्रियाएँ
सही हैं या ग़लत हैं या और कुछ
सच, हूँ मात्र मैं निवेदन-सौन्दर्य

सुबह से शाम तक
मन में ही
आड़ी-टेढ़ी लकीरों से करता हूँ
अपनी ही काटपीट
ग़लत के ख़िलाफ़ नित सही की तलाश में कि
इतना उलझ जाता हूँ कि
जहर नहीं
लिखने की स्याही में पीता हूँ कि
नीला मुँह...
दायित्व-भावों की तुलना में
अपना ही व्यक्ति जब देखता
तो पाता हूँ कि
खुद नहीं मालूम
सही हूँ या गलत हूँ
या और कुछ

सत्य हूँ कि सिर्फ मैं कहने की तारीफ
मनोहर केन्द्र में
खूबसूरत मजेदार
बिजली के खम्भे पर
अँगड़ाई लेते हुए मेहराबदार चार
तड़ित-प्रकाश-दीप...
खम्भे के अलंकार!!

सत्य मेरा अलंकार यदि, हाय
तो फिर मैं बुरा हूँ.
निजत्व तुम्हारा, प्राण-स्वप्न तुम्हारा और
व्यक्तित्व तड़ित्-अग्नि-भारवाही तार-तार
बिजली के खम्भे की भांति ही
कन्धों पर रख मैं
विभिन्न तुम्हारे मुख-भाव कान्ति-रश्मि-दीप
निज के हृदय-प्राण
वक्ष से प्रकट, आविर्भूत, अभिव्यक्त
यदि करता हूँ तो....
दोष तुम्हारा है

मैंने नहीं कहा था कि
मेरी इस जिन्दगी के बन्द किवार की
दरार से
रश्मि-सी घुसो और विभिन्न दीवारों पर लगे हुए शीशों पर
प्रत्यावर्तित होती रहो
मनोज्ञ रश्मि की लीला बन
होती हो प्रत्यावर्तित विभिन्न कोणों से
विभिन्न शीशों पर
आकाशीय मार्ग से रश्मि-प्रवाहों के
कमरे के सूने में सांवले
निज-चेतस् आलोक

सत्य है कि
बहुत भव्य रम्य विशाल मृदु
कोई चीज़
कभी-कभी सिकुड़ती है इतनी कि
तुच्छ और क्षुद्र ही लगती है!!
मेरे भीतर आलोचनाशील आँख
बुद्धि की सचाई से
कल्पनाशील दृग फोड़ती!!

संवेदनशील मैं कि चिन्ताग्रस्त
कभी बहुत कुद्ध हो
सोचता हूँ
मैंने नहीं कहा था कि तुम मुझे
अपना सम्बल बना लो
मुझे नहीं चाहिए निज वक्ष कोई मुख
किसी पुष्पलता के विकास-प्रसार-हित
जाली नहीं बनूंगा मैं बांस की
जाहिए मुझे मैं
चाहिए मुझे मेरा खोया हुए
रूखा सूखा व्यक्तित्व

चाहिए मुझे मेरा पाषाण
चाहिए मुझे मेरा असंग बबूलपन
कौन हो की कही की अजीब तुम
बीसवीं सदी की एक
नालायक ट्रैजेडी

जमाने की दुखान्त मूर्खता
फैन्टेसी मनोहर
बुदबुदाता हुआ आत्म संवाद
होठों का बेवकूफ़ कथ्य और
फफक-फफक ढुला अश्रुजल

अरी तुम षडयन्त्र-व्यूह-जाल-फंसी हुई
अजान सब पैंतरों से बातों से
भोले विश्वास की सहजता
स्वाभाविक सौंप
यह प्राकृतिक हृदय-दान
बेसिकली गलत तुम।










              शून्य







भीतर जो शून्य है
उसका एक जबड़ा है
जबड़े में माँस काट खाने के दाँत हैं ;
उनको खा जायेंगे,
तुम को खा जायेंगे ।
भीतर का आदतन क्रोधी अभाव वह
हमारा स्वभाव है,
जबड़े की भीतरी अँधेरी खाई में
ख़ून का तालाब है।
ऐसा वह शून्य है
एकदम काला है,बर्बर है,नग्न है
विहीन है, न्यून है
अपने में मग्न है ।
उसको मैं उत्तेजित
शब्दों और कार्यों से
बिखेरता रहता हूँ
बाँटता फिरता हूँ ।
मेरा जो रास्ता काटने आते हैं,
मुझसे मिले घावों में
वही शून्य पाते हैं ।
उसे बढ़ाते हैं,फैलाते हैं,
और-और लोगों में बाँटते बिखेरते,
शून्यों की संतानें उभारते।
बहुत टिकाऊ हैं,
शून्य उपजाऊ है ।
जगह-जगह करवत,कटार और दर्रात,
उगाता-बढ़ाता है
मांस काट खाने के दाँत।
इसी लिए जहाँ देखो वहाँ
ख़ूब मच रही है,ख़ूब ठन रही है,
मौत अब नये-नये बच्चे जन रही है।
जगह-जगह दाँतदार भूल,
हथियार-बन्द ग़लती है,
जिन्हें देख,दुनिया हाथ मलती हुई चलती है। 












  पूंजीवाद समाज के प्रति








इतने प्राण, इतने हाथ, इनती बुद्धि
इतना ज्ञान, संस्कृति और अंतःशुद्धि
इतना दिव्य, इतना भव्य, इतनी शक्ति
यह सौंदर्य, वह वैचित्र्य, ईश्वर-भक्ति
इतना काव्य, इतने शब्द, इतने छंद –
जितना ढोंग, जितना भोग है निर्बंध
इतना गूढ़, इतना गाढ़, सुंदर-जाल –
केवल एक जलता सत्य देने टाल।
छोड़ो हाय, केवल घृणा औ' दुर्गंध
तेरी रेशमी वह शब्द-संस्कृति अंध
देती क्रोध मुझको, खूब जलता क्रोध
तेरे रक्त में भी सत्य का अवरोध
तेरे रक्त से भी घृणा आती तीव्र
तुझको देख मितली उमड़ आती शीघ्र
तेरे ह्रास में भी रोग-कृमि हैं उग्र
तेरा नाश तुझ पर क्रुद्ध, तुझ पर व्यग्र।
मेरी ज्वाल, जन की ज्वाल होकर एक
अपनी उष्णता में धो चलें अविवेक
तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ
तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ। 










        दूर तारा








तीव्र – गति
अति दूर तारा
वह हमारा शून्य के विस्तार नीले में चला है !

और नीचे लोग उस को देखते हैं, नापते हैं गति, उदय औ’ अस्त का इतिहास !
किंतु इतनी दीर्घ दूरी
शून्य के उस कुछ-न-होने से बना जो नील का आकाश
वह एक उत्तर
दूरबीनों की सतत आलोचनाओं को
नयन-आवर्त के सीमित निदर्शन या कि दर्शन-यत्न को !
वे नापने वाले लिखें उस के उदय औ’ अस्त कि गाथा
सदा ही ग्रहण का विवरण !
किंतु वह तो चला जाता
व्योम का राही
भले ही दृष्टि के बाहर रहे- उस का विपथ ही बना जाता !

और जाने क्यों, मुझे लगता कि ऐसा ही अकेला नील तारा
तीव्र -गति
जो शून्य मे निस्संग
जिस का पथ विराट-
वह छिपा प्रत्येक उर में
प्रति ह्रदय के कल्मषों के बाद भी है शून्य नीलाकाश !
उसमें भागता है एक तारा
जो कि अपने ही प्रगति पथ का सहारा
जो कि अपना ही स्वयं बन चला चित्र
भीतिहीन विराट-पुत्र !
इसलिए प्रत्येक मनु के पुत्र पर विश्वास करना चाहता हूँ !

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                                                                                                                                                      माह के कवि
                                                                                                                                                         प्राण शर्मा




    









आज नहीं तो कल - परसों को अपने आप ही गंदलायेगा
झील का ठहरा - ठहरा पानी कब तक सुथरा   रह  पायेगा 

 
मेरे हमसाये का कुछ क्या  उसकी लपट से    बच पायेगा
मेरे   घर को आग लगी तो उसका घर    भी   जल जाएगा 

 
इतनी ज़ोर से फैंक नहीं तू   ऊँचे   पर्बत   से   पत्थर   को
पत्थर   तो   पत्थर   है  प्यारे जिसको लगा  वो   चिल्लाएगा 

 
अनजानी राहों में रहबर जैसा   मिले   तो बात  बने  कुछ
इक   अनजाना   अनजाने  को राह  भला  क्या   दिखलायेगा 

 
मान  मेरी ये  बात तू अपने साथ  लिए जा  कुछ    सौगातें 
भूल   पे   अपनी पछतायेगा खाली हाथ जो   घर    जाएगा 

 
हुशियारी    अच्छी   है लेकिन इतना भी हुशियार नहीं  बन
जग  से छिपने वाले   क्या तू अपने से भी छिप   पायेगा 

 
" प्राण " जुटाओ पहले रोटी फिर तुम उसका साथ निभाओ
भूखे   पेट  किसी   को   कैसे   प्यार    तुम्हारा    बहलायेगा 

 

 

 

  










हाथी -  घोड़ा   बन कर सब को खुश हर बार किया करते हैं
लोग  बुजुर्गी   में   बच्चों   से   कितना   प्यार  किया  करते हैं 

 
रस्ते    की     हर    कठिनाई    को    अंगीकार  किया  करते हैं
सुख   से   दुःख  से भी जो नित   आँखें  चार किया करते हैं 

 
सब्र   किसे   कहते  हैं  यारो   वो  क्या   जानें , वो  क्या   समझें
हर  सुविधा  को  पाकर    भी    जो    हाहाकार   किया  करते हैं 

 
बेचारे    काँटों   की   कीमत वो    आँकें   ये    नामुमकिन    है
व्यापारी   तो  बस   फूलों    का     कारोबार   किया   करते हैं 

 
खुश   रहते  हैं  मेरे    भाई   जीवन  में  वे  लोग कि  जो भी
हर   कारज  करने  से   पहले   सोच - विचार  किया  करते हैं 

 
यूँ   तो वो  चुप रहने   का   ही   आदी है लेकिन अपनों के
कुछ    ताने  उसको  कुछ कहने  पर   लाचार   किया  करते हैं 

 
उनसे   मिलना   कितना   अच्छा लगता है ए " प्राण " सभी को
बच्चे   क्या   बूढों   से  भी  जो    सद्व्यवहार किया   करते हैं 

 

 


















इक   दिन   ऐसा   आयेगा   जब   रंग बरसता  देखूँगा
तुझको   भी  हँसता देखूँगा खुद को भी हँसता देखूँगा

 
जाने   क्यों   मुझको   लगता है इक दिन ऐसा भी आयेगा 
सागर   होगा    मेरे    आगे   मैं  खुद  को तरसता देखूँगा 

 
ए   काश  न मेरा दम  निकले  उस वक़्त कि जब घर के बाहर
उसके    हाथों  में   मेरे    लिए  प्यारा  गुलदस्ता    देखूँगा 

 
ए  दोस्त , हमेशा अपनों का विश्वास तो करना   पड़ता   है
तूने   है   दिया   आने   का वचन जा तेरा रस्ता   देखूँगा 

 
नफ़रत   से  तंग   आया हूँ  मैं उससे छुटकारा   पाने   को
जो   प्यार   के   घर   ले   जाता  हो कोई ऐसा रस्ता देखूँगा 

 
इतनी भी क्या जल्दी है अभी हालात बदल जाने दे  कुछ
ए   दोस्त  ,  तुझे   रफ्ता - रफ्ता इस दिल में बसता देखूँगा 

 
ये  तो तय है , ऊबड़ -  खाबड़ रस्ते पे अगर मैं  चलता हूँ
ए  " प्राण "  शिकंजा  मुश्किल का अपने पर कसता  देखूँगा

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                                                                                                                                                       दृष्टिकोण





                                                                                                                                                    

                                                                                                                                                                -शैल अग्रवाल

वसुधैव कुटुम्बकम्

' वसुधैव कुटुम्बकम् ' माना कि यह एक आदर्श वैदिक खयाल है पर आगे–आगे अब और क्या –– क्योंकि आज के इस भौतिक युग में तो शांति और सौहार्द की इस लाठी को आगे बढ़ने के लिए नहीं – सुगमता से चलने–फिरने के लिए ही नहीं, अपितु दूसरों को डराने–धमकाने, एक दूसरे का सर फोड़ने,  ताकत के लिए भी उपयोग में लाया जा रहा है। आज हर सभ्यता, हर संस्कृति बस यही चाहती है कि यह कुनबा उसी की जाति, उसी के देश और उसी के जैसा हो।  

क्या है यह जिस ने हमारी इक्कीसवीं सदी की मानसिकता से सहानुभूति, सहिष्णुता और समझ को हटा दिया है। मानसिकता पर शायद शिक्षा–दीक्षा से ज्यादा परिवेष, पर्यावरण और पालन–पोषण का ही असर पड़ता है। तो क्या आजके इस व्यस्त भौतिक युग में, जीवन की इस भागदौड़ में मां–बाप अपनी जिम्मेदारी भूल रहे हैं – क्या 'यह मेरी अपनी जिन्दगी है' के स्वार्थी और एकाकी इस संसार में हर व्यक्ति जुड़ना और समाज में रहना भूलता जा रहा है? समाज ही क्या, परिवार तक के बंधन उसे स्वीकार नहीं। लौटना तो नहीं चाहती थी पर क्या ईराक की यह लड़ाई भी इसी स्वार्थी मानसिकता का ही एक परिणाम नहीं – क्या सद्दाम की तरह हम भी शीशे में बस अपनी ही शकल नहीं सजाते संवारते रह गए।

 

याद आ रही है हाल ही में सुनी अनिल जी के दोहे की एक पंक्ति 'जिसकी मां ममतामयी वह क्यों फिरे अनाथ' लगता है मां बाप ही नहीं, बच्चे भी अपनी उत्सुकता और महत्वाकांक्षा के पीछे मां–बाप, उनका प्यार, उनकी ही नहीं अपनी भी जरूरतें, सब कुछ भूलते जा रहे हैं। आत्मिक सुख और आत्मिक संतुलन से वंचित यह भौतिक समाज कब तक और कहां तक भटकेगा, कहना संभव नहीं – क्योंकि संरचना और संवेदना के साथ–साथ यह नया मानव अपने परिवेष और पर्यावरण को भी तो बदल रहा है। टूटती सरहदों और अपराजित अहं के आगे कल तक जो अवांछनीय और सच से परे था आज सही और ग्राह्य भी समझ में आने लगा है, अब झूठ और धोखा – सच और ईमानदारी से ज्यादा प्रचलित सोच हैं – सोच के भी तो आयाम बदल रहे हैं – नये नियम और नए–नए मापदंड हैं।

 

पहले कहा जाता था व्यक्ति या समाज के लिए जो सही है वही हमारी असली ताकत है पर आज बस ताकत ही सही है। जो उठा और ले सकते हो – ले लो – सही–गलत कुछ नहीं, बस सफलता की कसौटी ही सब कुछ परखती और निश्चित करती है। परिणाम से प्रभावित समाज में नैतिक अनैतिक तरीकों का नहीं बस साध्य का ही अर्थ रह जाता है। और इसी संदर्भ में बारबार याद आ रही है चाल्र्स साची द्वारा आयोजित लंडन की सामयिकी कलाकृतियों की वह प्रदर्शनी जिसमें एक बीच से आधी–कटी भेड़ प्रदर्शित थी। एक औरत का आधा कटा धड़ प्रदर्शित था। कहीं बड़े–बड़े स्तनों के नीचे लिखा था मां शब्द – मन वितृष्णा से भर गया – क्या ममतामयी मां, बस बढ़ती शारीरिक जरूरतों का ही एक साधन है? वहीं पास ही में एक आलिंगनबद्ध युगल पूरा धागों से ममी की तरह बंधा प्रदर्शित था – शीर्षक था – 'किस विथ द स्ट्रिंग्स अटैच्ड।' – देख कर पहले तो सब कुछ बहुत ही अटपटा और असंगत लगा पर धीरे धीरे सब समझ में आने लगा, प्रदर्शनी सामयिकी थी और आजके इस समाज में क्या प्यार खुशी सब कुछ एक शर्त–एक कीमत पर ही नहीं – एक व्यापार ही नहीं? जीवन की तरह कला को भी तो अब सत्यं शिवं सुन्दरम् से हटकर कांटे सा ही होना पड़ेगा जो बारबार पैरों में चुभकर इस निरर्थक भागती दौड़ती जिन्दगी के कसैलेपन और दर्द का एहसास दिलाती रह सके।

 

सिर्फ शिकायतों से काम नहीं चलेगा, थमकर सोचना होगा कैसे रोक सकते हैं हम इस फिसलन को, इस अंधी भागदौड़ को? समय की कसौटी पर खरे उतरे मूल्यों और मान्यताओं की सार्थकता को निश्चित ही वापस लाना होगा। समझना पड़ेगा कि यदि तुम भगवान या स्वर्ग–नरक को नहीं मानते तो मत मानो पर इतना तो मानो कि तिरस्कार और तुच्छता का चांटा दूसरे के गालपर भी उतना ही तड़कता है जितना अपने पर। दूसरों की भी वही हमारी जैसी भूख–प्यास और साधारण जरूरतें ही होती हैं। क्या हुआ जो अपने भरे–पूरे भंडारों की वजह से हम उस दर्द का एहसास तक भूल चुके हैं। दिखावे और प्रचार की इस दुनिया में याद रखना होगा कि बस एक अली अब्बास ही वह बच्चा नहीं जो  लड़ाई में शरीर और आत्मा से घायल हुआ था, उसके जैसे हजारों चारो तरफ कराह रहे हैं। बस एक का इलाज करवाकर उत्तदायित्व से नहीं उबरा जा सकता।

 

कहते हैं यहां ब्रिटेन में साढ़े तीन लाख से भी ज्यादा पढ़े लिखे और सफल वयस्क हैं जो शादी की सार्थकता और परिवार जैसी संस्था और संयम में विश्वास नहीं करते। अपने साथी के साथ वे एक आर्थिक और मानसिक समझौते बतौर रहते हैं – किसी भी तरह के उत्तरदायित्व से मुक्त। और अगर उस समझौते के बाइ–प्रोडक्ट की तरह बच्चे इस दुनिया में आ भी जाएं तो उनके प्रति उनकी बस आर्थिक जिम्मेदारी के अलावा कोई और जिम्मेदारी नहीं होती। अब ऐसे सामाजिक ढांचे में बढ़े बच्चे कितना समाज और समूह को अपना मानेंगे खुद ही सोचा और समझा जा सकता है। और फिर आर्थिकवाद के इस युग मे समाज भी तो अपनी नैतिक जिम्मेदारी भूलता जा रहा है। हाल ही में एक 53 वर्षीय ब्रिटिश औरत जो पीठ के दर्द से पीड़ित थी और 59 वर्षीय उसके पति जिन्हें दौरे पड़ते थे और दम्पति जो उदासी की बीमारी से पीड़ित था, की सामूहिक आत्महत्या की अरजी को स्विटजरलैंड ने मंजूर कर लिया, वह भी बिना किसी जांच–पड़ताल के, जबकि याद रहे यह क्लीनिक बस लाइलाज बीमारियों से पीड़ित मरीजों की आत्महत्या में सहायता के लिए ही खुली थी। उत्तदायित्वों के प्रति ऐसी लापरवाही किसी भी सामाजिक परिपेक्ष में एक खतरनाक और डरावना मोड़ है। इस सामूहिक सामाजिक विघटन में क्या चीज़ है जो लोगों को जोड़े रख सकती है – उन्हें टूटने या बिखरने नहीं देगी? भय निश्चित ही एक हो सकता है। स्वार्थ और लालच दूसरे। पर यह तो खुद इतने घने संबल हैं कि एक स्थाई सामाजिक ढांचे को क्या संभाल पाएंगे? जबतक हम दूसरों से क्या खुद से भी सच बोलना नहीं सीखेंगे, हर आचरण और व्यवहार पर ही प्रश्न–चिन्ह लगते चले जाएंगे और ईराक की लड़ाई की तरह हम सफाई में कुछ भी नहीं कह पाएंगे।

 

सुनते हैं जिस लेबर पार्टी के नेता ने इस लड़ाई का समर्थन किया उनकी ही पार्टी के एक एम•पी पर सद्दाम का प्रशंसक व उससे पार्टी के लिए बड़ी रकम लेने का आरोप है। दो तरफी यह राजनीति अब कैसे खुदको स्पष्ट कर पाएगी आज निश्चित ही एक कठिन सवाल है। सामूहिक व सामाजिक विघटन में विचारों का आदान–प्रदान या एक दूसरे को समझने की ईमानदार कोशिश ही शायद हमें एक दूसरे से जोड़े रख सकती है। इसके लिए एक सशक्त और समझ में आनेवाली भाषा का होना जरूरी है – भाषा जो खुली और सच्ची हो – बांटने नहीं जोड़ने वाली हो पर यह तभी संभव हैं जब हम खुद अपने विचारों और कार्यों के प्रति सच्चे और समर्पित हों।

 

संस्कृति और सभ्यता की चेतना व्यवहार और भाषा में ही होती है। भाषा के महत्व को ठुकराया नहीं जा सकता। खुले 'भ' और बंद 'म' का ख्याल रखना जरूरी है ध्यान न दो तो दुख–भरा मन दुख–मरा मन हो जाता है। जबतक अपनी संस्कृति को सुरक्षित रखने की जरूरत समाज महसूस करेगा, नैतिकता और भाषा भी सुरक्षित रहेगी। मुश्किल तब आती है जब रोटी–रोजी की बढ़ती जरूरतों के साथ अन्य चीजों का महत्व घट जाता है।

 

शायद यही वजह है कि आजके इस व्यस्त समाज में चन्द सामूहिक प्रयासों को छोड़कर हिन्दी के प्रति पूर्णतः उदासीनता नज़र आती है। अन्य बातों की तरह भाषा पर भी किसी समाज के आधिपत्य का ही प्रभाव पड़ता है। यहां इंग्लैंड में अपेक्षित है कि अंग्रेजी का ही अधिपत्य हो पर जब पाश्चात्य की अंधी नकल में भारत के महानगरों में भी यही स्थिति नज़र आती है तो मन को दुख होता है। स्थापित और सशक्त समाज में भाषा एक व्यक्तिगत आचरण होता है पर बदलते प्रवासी समाज में सामाजिक जरूरतों को ही प्राथमिकता दी जाती है। शायद यही वजह है कि यहां ब्रिटेन में एक मंत्री ने हमसे अंग्रेजी को अपनाने का आग्रह किया और कहा कि जब अंग्रेजी जीसस क्राइस्ट के लिए एक उपयुक्त भाषा है तो फिर हम भारतीयों के लिए क्यों नहीं?

 

दूसरा क्या सोचता है, हम बदल नहीं सकते पर अपनी सोच को बदलना जरूरी है। अपने प्रति, अपनी भाषा व्यवहार के प्रति इतना उदासीन होना, एक बीमार मानसिकता का ही प्रतीक है। पंजाबी शरणार्थियों की अधिकता की वजह से आज यहां ब्रिटेन में पंजाबी भाषा और पंजाबी संस्कृति की महत्ता बढ़ रही है। अफ्रीका से बड़ी संख्या में आए बसे गुजरातियों की वजह से गुजराती भी पीछे नहीं पर इनकी बूढ़ी और बीमार बहन हिन्दी अदृश्य–सी होती जा रही है। क्या इस उपेक्षा और उदासीनता का उत्तरदायित्व हम हिन्दी भाषियों के अपने ऊपर ही नहीं?

 

हमारी समृद्ध भाषा और संस्कृति अपने वैभव से सदियों से ही हर संस्कृति और हर देश को अपनी तरफ आकर्षित करती रही है फिर हम भारतीय ही अपना सही मूल्यांकन क्यों नहीं कर पाते? हाल ही में रशियन मूल की हिन्दी भाषा विद् डॉ लूदमिला से जब मैंने पूछा कि आखिर हिन्दी से ही आपका इतना लगाव क्यों, कैसे और कबसे, तो उन्होंने जो जवाब दिया उसे मैं ज्यों का त्यों आपके साथ बांटना चाहूंगी – शायद हम आम भारतीयों को भी अपने देश, अपनी भाषा का खोया गौरव और अपना उत्तरदायित्व वापस याद आ जाए –

 

'बचपन से ही मुझे अधिकतम सखियों की भांति ही रूसी बच्चे–युवकों समेत भारत की ओर बहुत आकर्षण था। रूस का वातावरण भारत से लड़ाइयों, मैत्री एवं भाईचारे की भावनाओं से भरा था। यह पांचवे दशक की बात है। ऐसे वातावरण में मैं पली बढ़ी। मेरी यही आकांक्षा थी कि जल्दी से स्कूल समाप्त करके विश्व विद्यालय में पढ़ना शुरू करूं और हिन्दी सीखूं। मेरा यह विश्वास था और है कि भाषा के माध्यम से ही किसी देश की जनता के निकट पहुंचा जा सकता है, इस की संस्कृति का अध्ययन किया जा सकता है और मुख्य बात, उसका साहित्य पढ़ा जा सकता है, जो जनजीवन का प्रतिबिम्ब है। विश्वविद्यालय में मैंने हिन्दी के अतिरिक्त संस्कृत और भारत से संबन्धित दूसरे विषय भूगोल, इतिहास, आर्थिक स्थिति, संस्कृति आदि विषय पढ़े जो अनिवार्य तौर पर हिन्दी के हर विद्यार्थी के लिए आवश्यक होता है। हिन्दी में एम•ए•करके मैंने उर्दू भी सीखी, इसमें (उर्दू साहित्य में) पी–एच•डी• भी किया। हिन्दी और उर्दू साहित्य का विश्लेषण किया, लेख और पुस्तकें लिखीं, साथ–साथ मास्को विश्वविद्यालय में मैं दोनों भाषाएं और साहित्य पढ़ाती हूं।'


                                                                                                                                                           -अप्रैल 2003

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                                                                                                                                                                     मंथन


                                                                                                                                                              -देवेन्द्र इस्सर

समंदर पर पुल बांधने का वक्त आया

पहले एक किस्सा सुनिएः काजी हाउस में एक दिन उसकी मुठभेड़ एक वेटर से हो गई जो रामपुर से था। कहने लगा इंतज़ार सहब, आपने अपनी कहानियों में जो ज़बान लिखी है वह हमारे रामपुर में कंजड़ियां बोला करती हैं। कभी शरीफ़ज़ादियों की ज़बान और अशराफ ( अभिजात्य ) का मुहावरा लिखकर दिखाइये।

रामपुरी वेटर की बात सुनकर इंतजार हुसेन अपना-सा मुंह लेकर रह गया। फिर उसने दिल्ली और लखनऊ का मुहावरा लिखने के लिए बहुत ज़ोर मारा मगर कहां दिल्ली और लखनऊ के अशराफ और कहां डबाई का रोड़ा। उसने जल्दी ही अपनी हैसियत को पहचाना और पैंतरा बदल लिया। दिल्लीवालों को अपनी कोसर में धुली हुई उर्दू पर नाज था। उसने कहना शुरू किया कि मैं तो गंगा में धुली हुई उर्दू लिखता हूं। किसी ने पूछ लिया –‘ यह उर्दू तुमने सीखी किससे है? ‘  जबाव दिया ‘ संत कबीर से।‘ पूछनेवाला उनका मुंह तकने लगा और बोला – उर्दू का कबीर से क्या वास्ता? ‘ इंतजार हुसेन ने ढीठ बनकर जबाव दिया कि ‘ कबीर उर्दू का सबसे बड़ा शायर है।‘

जिक्र आया तो यह बात भी सुन लीजिए। जब पाकिस्तान में गालिब की 200वीं बरसी मनाने का सवाल आया तो वहां के कुछ लोगों ने यह आवाज उठाई कि गालिब का पाकिस्तान से क्या संबंध। वह तो हिंदुस्तानी शायर है।

प्रश्न सिर्फ यह नहीं कि हम कैसे प्रभावित होते हैं बल्कि यह है कि जो हमारा समाज है , जिस संस्कृति में हम परवरिश पाते हैं उसके दर रहते हुए हमकिस प्रकार अपने साहित्य का सृजन करते हैं और इस साहित्य से दूसरी भाषाओं से किस तरह के रिश्ते बनते या बिगड़ते हैं। प्रश्न यह है कि इस समाज और संस्कृति और इन भाषाओं से हमारे सर्जनात्मक संबंध क्य हैं। हैं भी या नहीं ! यदि हैं तो किस प्रकार के हैं। हर दौर में कोई न कोई प्रभावी प्रवृत्ति पनपती है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब भाषाएं एक ही भूखंड की उपज हों। जैंसे कि हिन्दी और उर्दू। लेकिन राजनीतिक कारणों से भाषा अस्मिता का प्रश्न बन जाती हैं। उर्दू पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा है लेकिन वह वहां किसी भी हिस्से में बोली नहीं जाती।

हम बड़े ही नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे दौर में भाषाएं अस्मिता की समस्या बन गई हैं। एक राजनेता की बात याद है कि ‘ उर्दू बहैसियत एक सांस्कृतिक बिरसे के मुस्लिम अस्मिता का प्रश्न बन गई है। ‘ यदि हम तकनीकी तौर पर बात करें उर्दू उत्तरी भारत के अधिकतर मुसलमानों की ज़बान है। वह ज़बान जो उनकी मज़हबी ज़रूरतों को पूरा करती है। वे महसूस करते हैं कि यह ज़बान उनकी मज़हबी और तहज़ीबी पहचान बन गई है।

तो इस दौर में संयुक्त संस्कृति का क्या होगा ? जब मैं इस विषय पर बुद्धिजीवियों को इतिहास के उद्धरण देते हुए सुनता हूं तो मुझे परेशानी होती है कि भारत विभाजन के साथ ही पैराडाइस शिफ्ट हो गया है। समाज में विभाजन (स्वतंत्रता ) के बाद जितने परिवर्तन हो रहे हैं उनके बारे में कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। लेकिन परिवर्तन की प्रक्रिया तथा प्रकृति को पहचान कर उसकी दिशा और रफ्तार का अनुभव अवश्य लगाया जा सकता है। इन संभावनाओं को समझकर ही हम परिवर्तन की प्रक्रिया में सर्जनात्मक हस्तक्षेप कर सकते हैं।

अल्विन टाफलर ने अपनी पुष्तक द थर्ड वेव में विखा है ‘ हमारे जीवन में एक नयी सभ्यता का उदय हो रहा है। दृष्टिहीन लोग हर जगह इसके आगमन को रोकने का प्रयत्न कर रहे हैं। यह नयी सभ्यता अपने साथ नए पारिवारिक संबंध, कामकाज के नए तौर-तरीके, प्यार और जीने के नए अंदाज, नई वैज्ञानिक व्यवस्था, नए राजनीतिक संघर्ष और इन सबसे बढ़कर एक नई बदली हुई चेतना ला रही है। ‘ नई सभ्यता का उदय हमारे जीवन की सबसे अधिक विष्फोटक सच्चाई है।

मैंने अपनी बात इंतज़ार हुसेन के उद्धरण से शुरू की थी और अंत भी उन्ही के उपन्यास ‘ आगे समन्दर है ‘ के एक उद्धरण पर खत्म करना चाहता हूं। ‘ एक वक्त ऐसा होता है कि हम कश्तियां बनाते हैं और एक वक्त ऐसा होता है कि हम कश्तियां जलाते हैं। लेकिन एक समंदर बिफरा हुआ है हमारे अंदर, उसकी तरफ हम ज्यादा ध्यान नहीं देते। ‘ कुछ इस क़िसम की बात है कि साहित्य और संस्कृति में अब कोई कश्तियां नहीं बनाता। शायद हमने अपने अंदर बिफरे हुए समन्दर को पहचानना बंद कर दिया है। मैं नहीं जानता कि वक्त कश्तियां बनाने का है या जलाने का। लेकिन यह जानता हूं कि यह वक्त अपने अंदर और बाहर बिफरते हुए समंदर पर पुल बनाने का जरूर है।

                                                                                                            ' साभार 'चेतना का आत्मसंघर्ष'

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                                                                                                                                                            दीपावली विशेष


                                                                                                                                                               -शैल अग्रवा ल 

                                                        दिए की लौ

'मार उडारी नि चिड़िए, तू मार उड़ारी...'
हॉल के कोने-कोने से गूँजती मधुर धुन और भारत की भिन्न-भिन्न वेश-भूषा में सजे ब्रेक डान्स और भांगड़ा की लय बीच भाव-भंगिमा बदलते नर्तक-नर्तकियाँ। सामने स्टेज पर भारी रेशमी परदे और उन पर आते जाते लोगों की लंबी-लंबी थिरकती साँप-सी बलखाती आदमकद परछाइयाँ, ऱंग-बिरंगी बीम्स पर चढ़ी उनसे भी ज़्यादा तेज़ नाचती हुई। माहौल में पूरी तरह से डूबी पैरिस की आँखे कोने-कोने का जायज़ा लेने लगीं, कहीं मेंहदी, चूड़ी, और बिंदी की डिज़ाइनों का ढेर तो कहीं हँस-हँसकर सब कुछ छाँटती-ख़रीदती किशोरियाँ। कहीं भारत की हस्तकला में डूबे तरुण, तो कहीं मंत्रमुग्ध अपनी हस्त रेखाओं में भविष्य ढूँढ़ता विद्यार्थियों का जत्था। एक जोशीला और रंगीनमाहौल था विद्यालय के उस प्रांगण में मानो नन्हा भारत बादलों के पंख चढ़ उतर आया हो वहाँ, अपना सारा उल्लास और समन्वय समेटे हुए। गोरे काले सभी देश और भूषा के बच्चे माथे पर टीका लगाए, माला पहने घूम रहे थे। हाथ की बनी रंग-बिरंगी और आकर्षक तैरती हुई मोमबत्तियाँ, किताबें, खिलौने, कपड़े सभी कुछ तो था वहाँ पर और माहौल को परवान चढ़ा रही थी महकती चंदन चमेली की मोमबत्तियों के धुएँ में गडमड बगल के रसोईघर से उठती ज़ायकेदार छोले, पकौड़ियों और गुलाबजामुनों की सोंधी-सोंधी महक, हँसी कहकहों और प्यार के रस में पगी-रची। पैरिस को लगा कि यह स्टूडेंट यूनियन का हॉल नहीं, अलादीन की जादुई गुफ़ा थी। सभी कुछ तो था यहाँ पर एक मस्त और यादगार शाम के लिए सिवाय अविक के, अ़विक जो कहीं दिखाई ही नहीं दे रहा था। मंच पर होने का पूरा आनंद उठाते किशोर-किशोरियों से खुद को छुपाती-बचाती बेचैन वह तुरंत ही बाहर आ गई।..


"दिवाली-मेला देखने चल रहे हो ना अविक। बोलो अविक, चल रहे हो ना, सभी तो हैं वहाँ पर?"


शोर-शराबेसे दूर अपने कमरे में गाना सुनते अविक से पैरिस पलट-पलटकर पूछे जा रही थी पर अविक तो मानोसबसे परे मनपसंद स्वर-लहरियों में डूब संगीत-समाधि ले चुका था। सारी आतुरता, मेला सब कुछ भूल मंत्र-मुग्धा-सी पैरिस वहीं ज़मीन पर ही उसके सामने बैठ गई और चुपचाप एकटक देखने लगी। डूबते सूरज की गुलाबी सुनहरी आभा में नहाया, आँख बंद किए संगीत का आनंद लेता अविक और भी ज़्यादा अलग और चित्र-सा सुंदर दिख रहा था, अपने नाम-सा ही विभोर और संकल्पित। मेपल वृक्ष की घनी पत्तियों से छन-छनकर आती धूप ने कमरे में हर दीवार,  हर वस्तु पर रंगमंच के पर्दे-सा मनोहारी और रहस्यमय दृश्य अंकित कर दिया था। खिड़की के फ्रेम को खुद में समेटे धूप की आड़ी तिरछी किरनों बीच गुँथी पत्तियाँ सुर और लय की ताल पर परछाई बनी चारो तरफ़ थिरक रही थीं और शाम के इस सुरमई धुँधलके में अविक एक बार फिर उसे इस दुनिया का नहीं,  देवदूत-सा अलौकिक लगा,  उसके हर सपने को पूरा करने में समर्थ, इतना सुंदर कि खुद को रोको ना, पीछे ना हटो तो उसे तो प्यार तक कियाजा सकता था। अपनी इस बेतुकी सोच से बचने के लिए पैरिस ने आँखें बंद कर लीं, पर बंद आँखों में भी तो वही बैठी मुस्कुरा रहा था। हारकर पैरिस ने खुद से लड़ना छोड़ दिया, बुराई भी क्या थी इसमें ये रिश्ते विद्यालय के इन्हीं दिनों में ही तो जुड़ पाते हैं, अविस्मरणीय प्रेम-कहानियों से विद्यालय की स्मारिकाएँ भरी पड़ी हैं। उसके अपने माँ-बाप भी तो यहीं मिले थे, मालकोंस के आरोह-अवरोह पर तैरते सुर अंतिम झंकार से गुज़र चुके थे और सितार एक बहुत ही घुमावदार और नाजुक मीड़ लेकर कब का थम चुका था। एकटक देखने की अब अविक की बारी थी। हमेशा चहकती रहने वाली पैरिस यों गुमसुम और चुपचाप भी तो कम आकर्षक नहीं लग रही थी।


"कहाँ खो गई पैरिस?" अविक ने आवाज़ दी।



"कहीं भी तो नहीं, बस अपनी पालतू चिड़िया से बात कर रही थी।" सोच की चुटकी भर-भर अपने संगमरमरी गालों पर संध्या का सारा गुलाल मलती पैरिस हड़बड़ाकर जग गई।



"चिड़िया प़र मुझे तो कोई चिड़िया नहीं दिखाई देती यहाँ?" अविक आश्चर्य-चकित था।


"तुम नहीं जानते अविक, हम सब अपने-अपने सर के घोंसले में एक बाबरी चिड़िया पाले रहते हैं, जिसे बहुत प्यार करते हैं हम और चाहे-अनचाहे, जब मनचाहे यह हमसे बात करने लग जाती है, हमें खुद से भरमाती है और तब हम सारी दुनिया भूल उसमें, उसकी बातों में खो जाते हैं।"पैरिस ने बड़े ही सूफियाना अंदाज़ से अपनी सारी भावनाओं को समेट लिया। चिड़िया का तो पता नहीं पर सामने बैठी पगली सहेली अविक को बहुत ही रोचक लगी।


"जानती हो पैरिस, जब मेरी माँ बनारस में पढ़ रही थीं तो ये बीटल्स भी वहीं पर भारतीय संगीत सीख रहे थे और आज देखो वह पूर्व की तपस्या और पश्चिम की तकनिकियों ने कैसा जादुई नशा बुना है। रवि शंकर भी तो बनारस के ही हैं जिनकी पहल से सितार का जादू पश्चिमी देशों तक चल पाया।"


"कंधे पर झूलते सुनहरे बालों के गुच्छे से खेलती पैरिस धीरे-धीरे बनारस की गलियों में खोने लगी, बनारस जिसे उसने बस किताबों में ही पढ़ा और तस्वीरों में ही देखा था, "अच्छा तो तुम्हारी माँ बनारस से हैं,.. जहाँ के बिस्मिल्ला खाँ बहुत अच्छी शहनाई बजाते हैं और जहाँ की सिल्क बहुत ही सुंदर और मशहूर हैं। जहाँ सूरज की पहली किरन के लहरों पर उतरते ही घाट और मंदिर दोनों एक साथ जग जाते हैं, अलौकिक और रहस्यमय दिखने लग जाते हैं। जो भारत का सबसे पुराना शहर माना जाता है। कहते हैं लौर्ड शिवा ने खुद अपने त्रिशूल पर बसाया था इसे। काशी भी तो कहते हैं इसीको, क्या कभी तुम मुझे वहाँ पर ले चलोगे अविक?" उत्साहित पैरिस अविक से बहुत कुछ एक ही साँस में कहना और जानना चाहती थी।"हाँ, हाँ क्यों नहीं, तुम तो बनारस के बारे में बहुत कुछ जानती हो।"


अविक ने मुस्कराकर जवाब दिया।



"नहीं, जानती तो नहीं पर जानना ज़रूर चाहती हूँ, इसीलिए तो मैंने इंडियौलाजी पढ़ने का निश्चय लिया। क्या गंगा के किनारे बसी काशी भीइतनी ही सुंदर है जितना कि कैम रिवर के किनारे बसा यह कैंब्रिज।"


सेंट जॉन्सकॉलेज के रोइंग क्लब में जाते, पुलके ऊपर से गुज़रते, नीचे बहती नावों और पथरीली सकरी गलियों से गुज़रते कई बार जाने क्यों उसने भी तो केंब्रिज की तुलना बनारस सेकी ही है।



"हाँ, सुंदर तो है, कितना सुंदर इसका निश्चय तो तुम्हें खुद ही वहाँ जाकर उसे देख-समझकर करना पड़ेगा। भारत अभी एक गरीब देश है पैरिस, और गरीबी की अपनी अलग समस्याएँ होती है। समानता होते हुए भी बनारस और केंब्रिज की तुलना करना सही नहीं होगा। दोनों ही विद्वानों के सुंदर शहर हैं पर अलग-अलग। अपनी-अपनी तरह के।"


"जानते हो अविक, मैंने तो यह भी सोचा है किमैं अपनी बेटी का नाम काशी ही रखूँगी जैसे कि मेरे माँ बाप ने मेरा नाम पैरिस रखा था क्यों कि मेरी संरचना पैरिस में हीतो हुई थी।"



पैरिस अपनी रौ में डूबी बोले जा रही थी और केंब्रिज के छात्रावास के उस एकाकी कमरे में बैठा अठ्ठारह वर्षीय अविक कान तक बीरबहूटी-सा लाल होता चला गया, सामने बैठी यह मात्र हफ्तेभर की सहपाठिनी पैरिस कितनी खुली और बेबाक है, ऐसी बातें करने, ऐसे सपने देखने में क्या इसे ज़रा भी संकोच नहीं होता, पर दोष इसका भी तो नहीं, इनकी तो संस्कृति ही ऐसी है, लड़की हों या लड़के, यहाँ अपने योग्य साथी ढूँढ़ने की ज़िम्मेदारी भी तो इन पर खुद ही होती है। वैसे भी मात्र लड़कों के स्कूल में पढ़े और संकोची स्वभाव के अविक को लड़कियों से इतनी खुलकर बात करने की आदत नहीं थी, होने वाले बच्चों के नाम के बारे में तो हरगिज़ ही नहीं। भविष्य पर लटके इस ताले की चाभी तो प्राय: बड़ों के ही हाथ होती है उनके समाज में। बातें कोई ख़तरनाक और नज़दीकी मोड़ लें इसके पहले ही वह इस वार्तालाप को फिसलने से रोक देना चाहता था, अविक अभी सोच रहा था कि एक हाथ में बीयर की बोतल और दूसरे से एक दूसरे को सँभाले रूपम और सानिया ने धावा बोल दिया। चलो-चलो, उठो हम सभी दिवाली मेला देखने चल रहे हैं अभी इसी वक्त। बहुत ज़बर्दस्त मेला लगा है आज। खाना, फायरवर्क्स सभी कुछ है वहाँ पर। जेम्स का फ़ोन आया था।केंब्रिज एशियन एसोसियेशन ने एक फैशन शो भी रखा है। हम सभी उसमें भाग लेंगे। इसके पहले कि अविककोई जवाब दे तीनों ने उसे हाथों-हाथ उठा लिया। नई दोस्ती और नई यूनिवर्सिटी का नया-नशा, वैसे भी यह रिफ्रेशर सप्ताहही तो था और रिफ्रेशर सप्ताह का क्या मतलब है, चारों चंद दिनों में ही अच्छी तरह से जान चुके थे, रोज़ एक नई पार्टी, एक नई एसोसियेशन, एक नया हंगामा। गंभीर पढ़ाई में डूबने के पहले बचपन और यादों को खुद से अलग करने का एक अनूठा और बेफिक्र यूरोपियन अंदाज़। अरे आज तो दिवाली है ना, रुको मैं अभी कपड़े बदलकर आता हूँ, पहले हम सब मिलकर पूजा करेंगे फिर दिवाली मेले में चलेंगे। सुरुचिपूर्ण नए कपड़ों में गणेश और लक्ष्मी की प्रतिमा के आगे दीप जलाता, नहाया-धोया अविक और भी ज़्यादा ओजस्वी और सौम्य लगा पैरिस को। यही नहीं अविक ने मित्र-मंडली को माँ के हाथ की स्वादिष्ट मिठाई और खाना भी लाकर दिए। सानिया और रूपम तो तुरंत ही खाने पर टूट पड़े, पर पैरिस हिरनी-सी बड़ी-बड़ी आँखों से पूछ रही थी, "क्या मैं भी एक दिया जला सकती हूँ अविक।"


"क्यों नहीं ज़रूर..."प्यार और प्रशंसा से उसकी तरफ़ देखते हुए अविक तुरंत ही अंदर गया और एक धूपबत्ती उसकी फैली हथेलियों पर लाकर रख दी। अभी तो बस इससे ही काम चला लो पैरिस, मेरे पास बस एक ही दिया था। लौटकर हम सब मिलकर बहुत सारे दिए जलाएँगे और फुलझड़ियाँ भी चलाएँगे, माँ ने वह भी तो रख दी हैं मेरे साथ। यह मेरी पहली दिवाली हैं जब मैं घर पर नहीं हूँ। माँ तो बहुत ज़ोर-शोर से दिवाली मनाती हैं। घंटे डेढ़ घंटे तो पूजा की तैयारी और मोमबत्तियाँव दिए जलाने में ही लग जाते हैं। सबके लिए कपड़े, उपहार, हफ्तों ख़रीदारी और तैयारियाँ ही चलती रहती हैं हमारी भी। तुम्हारे क्रिसमस की तरह हम हिंदुओं का भी तो यह बड़ा त्योहार है।


' उस दिन राम चौदहवर्ष के बनवास के बाद अयोध्यासे वापस लौटे थे ना? ' पैरिस बीच में ही बात काट कर बोल पड़ी, "अरे पैरिस तुम तो मेरे से भी ज़्यादाजानती हो।"


रूपम एशियन होने के बावजूद भी कुछ न जानने की वजह से एक अजीब-सी शर्मिंदगी महसूस कर रहा था।


अविक उसकी मन:स्थिति समझ सकता था, प्राय: उसके सभी भारतीय मित्रों का यही हाल था। ऐसा नहीं था कि उन्हें भारत और भारतीयता के प्रति आकर्षण नहीं था, बस जीविका की आपाधापी में डूबे माँ बाप के पास इतना समय ही नहीं होता था कि दो मिनट पास बैठते, उन्हें भारत, भारतीय संस्कृति के बारे में बता या समझा पाते। माँ बाप के साथ बैठकर फुरसत से दो बातें करना तो दूर, अक्सर उनके दर्शन तक दुर्लभ हो जाते थे बिचारों के लिए। अविक का मन दर्द और सहानुभूति से भर आया।



"अगर तुमलोग चाहो तो अगले वर्ष मेरे घर चल सकते हो दिवाली पर। खुद ही देख लेना दिवाली कैसे मनाई जाती है और आइ एम श्योर माँ भी बहुत खुश होंगी तुम सबसे मिलकर।"


परउ समें तो अभी पूरा एक साल बाकी है अविक, पैरिस की आवाज़ निराशा में डूबी हुई थी।
वे बात कर ही रहे थे कि फ़ोन की घंटी बज पड़ी। लाइन पर माँ ही थीं।


"पूजा करली अविक बेटा।"


"हाँ माँ, मेरे कुछ मित्र भी हैं यहीं पर और हम सब मिलकर दिवालीमेला देखने जा रहे हैं। दिवाली के बारे में सबकुछ जानने को बहुत ही उत्सुक हैं ये लोग।"


"अगर ऐसीबात हैं तो, इन सबको लेकर घर ही आ जा न। हम सब दिवाली मिलकरमनाएँगे।"


अविक की आँखें खुशी से चमकने लगीं "पूछता हूँ माँ।"


इस आमंत्रण पर सभी खुश थे और निश्चय यह हुआ कि केंब्रिज और लंडन की घंटे भर की दूरी कुछ भी ज़्यादा नहीं। पहले मेला फिर माँ के साथ दिवाली।



पर मेले का भीड़भरा माहौल चारों मित्रों को दस मिनट से भी ज़्यादा न रोक पाया। सभी का कहना था कि यह तो बस एक बाज़ार जैसा है ब़सकोई भी एक और पार्टी। उन्हें तो पारंपारिक भारतीय अंदाज़ में दिवाली मनानी हैं और चारों अविक केघर माँ के साथ दिवाली मनाने चल पड़े।अशोक के पत्तों मेंगुँथी फेयरी लाइट और उनकेबीच बीच छोटी-छोटी घंटियाँ, नीचेकरीने से माला-सी सजी दियों की लंबी कतार और सामने प्रवेश द्वार पर ही फूलों कीघूमती रंगोली के बीच कमल के आकार की दीप्त मोमबत्ती, लक्ष्मी के स्वागत में सजे सँवरे घर के बंदनवार ने नन्हीं-नन्हीं घंटियों से गूँजकर मेहमानों का स्वागत किया। माँ हाथ में पूजा की थाली लिए दरवाज़े पर ही खड़ी मिलीं और वहीं माथे परतिलक लगाकर स्वागत किया उन्होंने अपने मेहमानों का।


"यह क्या माँ?"
"यह नएवर्ष के लिए मेरी तरफ़ से मंगल कामना और तुम्हारा भारतीय अंदाज़ में स्वागत है।" माँ ने मुस्कुराकर कहा, जैसे शायद अयोध्या वासियों ने कभी अपने राम का किया होगा। माँ के इतना कहते ही चारों बच्चों ने खुद को बहुत ही ज़िम्मेदार और विशिष्ट महसूस किया।


"और अब हमें क्या करना चाहिए?" तीनों के एकसाथ पूछने पर माँ ने उन्हें बताया कि अभी-अभी मैं पूजा से उठी हूँ। भारत में तो बच्चे बड़ों के पैर छूते हैं पर तुम सब मुझे नमस्ते कर लो ऐसे माँ ने दोनों हाथ जोड़कर नमस्ते की, पर इसके पहले कि माँ का वाक्य पूरा हो चारों एक साथ माँ के आगे झुके हुए थे और चारों का दायाँ हाथ माँ के चरणों पर था। हर्ष और प्यार से गदगद माँ ने चारों को गले से लगा लिया। बच्चोंके लिए ही नहीं,अविक की माँ के लिए भी यह एक अभूतपूर्व अनुभव था, हर्षातिरेक से छलके आसुओं को और खुद को सँभालती वह बस इतना ही कह पाई, ''खूब खुश रहो, माँ बाप का नाम रौशन करो। चलो तुम अब सब हाथ मुँह धोकर तरोताज़ा हो लो तब तक मैं खाना गरम करती हूँ, बिस्तर पर तुम तीनों के लिए कुछ नए कपड़े हैं, जल्दीसे पहनकर आओ। दिवाली की पूजा नए कपड़े पहन कर ही की जाती है। माँ कह रहे हो तो बात भी माननी पड़ेगी, मुझे अच्छा लगेगा।"



"जरूर माँ, पर पहले हम खाना गरम करने और खाने की मेज़ लगाने में आपकी मदद करेंगे फिर आप जैसे चाहोगी वैसे ही दिवाली मनाएँगे।" आदतन मजबूरसहृदय पैरिस एकबार फिर तुरंत ही बोल पड़ी थी और फिर तो चारों बच्चों ने "हाँ, माँ आप अब आराम कीजिए बाकी का काम अबहम करेंगे।" की एक स्वर तुमुल घोषणा कर दी।


आनन-फाननबातों-बातों में ही सारा खाना गरम होकर कब खाने की मेज़ पर पहुँचा किसी को पता भी न चल पाया औरअगले पाँच मिनटों में ही अविक रूपम सानिया और पैरिस चारों ही माँ के दिए भारतीय कपड़ों मेंजलते हुए दिए से जगमग थे।सबने मिलकर लक्ष्मी की मूर्ति पर फूल चढ़ाए और फिर खील बताशे भी। कौन-सी मिठाई खाई जाए कौन-सी छोड़ी जाएनिश्चय करना एक कठिन समस्या हो चली थी उनके लिए, बारबार माँ का प्यार भरा आग्रह और साथ में बेहद सलीके से सजा अतिस्वादिष्ट भोजन। बाहर छूटते अनार और चकरी में ज़्यादा जोश था या इन पाँचों के मन में, आज तो शायद भगवान भी यह निश्चय नहीं कर पाते।


"हमारे भारत में तो घर भरके मिठाई बनती है और अगले दिन सब मिलने जुलने वालों और गरीबों में बाँटी जाती है, गाना बजाना, मिलना जुलना सभी कुछ चलता रहता है इन तीन-चार दिन। पहले धन-तेरस, फिर छोटी बड़ी दिवाली, पड़वा और भैयादूज, पूरे पाँच दिन का त्योहार है यह। नए कपड़े, खिलौने, खूब मौज मस्ती रहती है बच्चे बड़े सभी की। माँ बच्चों के से जोश से बोले जा रही थीं। कमरे में लौटते ही माँ ने ढोलक और हारमोनियम निकाल लिए। अविक तबले पर माँ हारमोनियम पर। गाने बजाने की महफिल ऐसी चली कि सुबह ही हो जाती अगर माँ बीच में ही न रोक देतीं,  अरे...अभी तो हमें ताश भी खेलने हैं। ताश?  सबके मुँह आश्चर्य से खुले हुए थे। हाँ, आज के दिन ताश भी तो खेलते हैं। गंभीर और भारी भरकम समझी जाने वाली भारतीय सभ्यता का यह एक नया और अनूठा पहलू था पैरिस के लिए।


'कोई भी खेल माँ?'


''नहीं, तीन पत्ती।''


''तीन पत्ती क्या?''


रूपम, पैरिस और सानिया तीनों आश्चर्य-चकित एकसाथ ही बोलपड़े। ''यू मीन बैग पर यह तो जुआ है माँ।''


''नहीं, जुआ तब कहा जाएगा जब हम अपनी सामर्थ्य से ज़्यादा दाँव पर लगा दें और हार जीत बर्दाश्त करने लायक न रहें। अपना नुकसान कर लें। हर चीज़ के दो पहलू होते हैं, इस खेल से हम सीखते हैं कि लालच से कैसे बचा जाता है और संयम क्या है। पर दिवाली पर ताश खेलने का रिवाज तो महज़ अगले साल काशुभ-अशुभ देखने के लिए हैं।"


चारों बच्चों को पाँच-पाँच पौंड देकर माँ काउंटर निकाल लाई और खेल के नियम समझाते हुए माँ ने पत्ते बाँट दिए। हरेक के पास पाँच-पाँच पेन्स के सौ काउंटर थे। जैसे-जैसे पैसे खतम होंगे खिलाड़ी हटता जाएगा, माँ ने निर्णायक अंदाज़ में समझाया।सबसे पहले माँ ही खेल से निकलीं। और खेल में सबसे कमज़ोर फूल-सी नाजुक पैरिस के पास जा बैठीं। माँ के सहयोग से अंत में पैरिस और रूपम ही जीते। पैरिस के पास बीस पौंड और रूपम के पास पाँच पौंड थे। पैरिस ने पैसे लौटाने चाहे पर माँ ने यह कहकर वापस कर दिए कि "नहीं-नहीं यह तो तुम्हारी अमानत है, आजकी इस शुभ रात्रि में माँ और लक्ष्मी का आशीर्वाद।"  आशीर्वाद शब्द को पैरिस एक ही रात में पहचानने लगी थी। उसने स्वत: ही उठकर माँ के पैर छू लिए। माँ के लिए सबकुछ बहुत ही अप्रत्याशित था बरसों से अजन्मी बेटी के लिए उमड़ता प्यार आँखों से बह निकला, "कभी-कभी अविक के साथ मिलने तो आएगी ना?" भावातिरेक की वजह से रूँधेगले से वह बस इतना ही कह पाई।


अगली सुबह पैरिस अविक के कमरे में पैरों से ज़मीन कुरेदती खड़ी थी।


"उम्मीद है तुम बुरा नहींमानोगे अविक औरकॉलेज के बॉल में मेरे साथी बनकर चलोगे। यह दो टिकटें तुमसे पूछे बगैर ही ख़रीद ली थीं मैंने।"



"नहीं।"अविक के शब्द पैरिस पर बिजली की तरह गिरे।



"मैं जिसके साथ भी बॉल में जाऊँगा उसकी टिकट भी मैं ही खरीदूँगा, वह नहीं। उस साथी को पसंद करने का अधिकार सिर्फ़ मेरी माँ का है, मेरा तक नहीं।"



इससे पहले कि अपने अजन्मे सपने, काशी को सीने से लगाए खड़ी पैरिस के आँसू उसे विचलित कर पाएँ, बुत-सी खड़ी पैरिस को वहीं छोड़ अविक कमरे से बाहर निकल आया, बिना देखे और जाने कि बाहर खड़ी मुस्कुराती माँ ने न सिर्फ़ सब कुछ देख और सुन लिया था अपितु समझ और जान भी लिया था, वह भी आज नहीं कल ही जब नीले रंग के बनारसी जाल के दुपट्टे से सर ढके पूजा की थाली हाथ में पकड़े दिए की लौ-सी जलती पैरिस भगवान से भी ज़्यादा अविक पर ही ध्यान दे रही थी, माँ ने पहचान लिया था अपनी परी को, परी जिसकी कहानी वह अपने राजकुमार को सुनाया करती थीं, आज खुद ही चलकर उनके घर में आ गई है।
अगले दिन लौटतेसमय खाने के डिब्बेके साथ माँ के हाथ में एक लिफ़ाफ़ा भी था।
"दो टिकटें हैं यह," मुस्कुराती माँ जाने किस खुशी के सातवें आसमान पर जा बैठी थीं।


"मैंने खरीदी हैं। और सुन,  मेरी परी को साथ लेकर ही तू बॉल मेंजाएगा।"


"परी, यह पैरिस माँ की परी कबसे हो गई"  अविक दंग था, "पर इसे तो अभी हम ठीक से जानते तक नहीं माँ, और इसे तो कुछ भी नहीं आता, ना रोटी, ना गीता, ना रामायण और फिर मैं भी तो बहुत छोटा हूँ अभी।"


"सच्चे साथी और सच्ची निष्ठा को पहचानना सीखो अविक। जहाँ तक सवाल रोटी, गीता और रामायण का है, मैं सिखा दूँगी सब इसे। और हर छोटा कभी ना कभी तो बड़ा होता ही है खुशी-खुशी इंतज़ार कर लूँगी मैं उस दिन का, तुम हाँ करके तो देखो।"

अविक अवाक खड़ा देख रहा था यह कैसा जादू जानती है पैरिस, एक ही रात में माँ के ऊपर काबू कर लिया। माँ पूरी तरह से उस पर फिदा हैं, शायद वही जादू जिससे बचने के लिए वह पिछले एक महीने से रोज़ नए उपाय ढूँढ़ रहा था। अविक ने मुड़कर गौर से एक बार फिर उस जादूगर के तिलिस्म को समझना चाहा पर पैरिस तो उसी जाने पहचाने सरल भाव से बस एकटक उसे ही  देखे जा रही थी और माँ पैरिस को।                                                                                                                                                                                       .... रंग और जाति की सारी विभिन्नताओं के बाद भी अविक को दोनों की ही आखें एक-सी और जानी-पहचानी लगीं, प्यार से लबा लब भरी और छलकती हुई...

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                                                                                                                                                कहानी समकालीन

                    

                                                                                                                                                       -   सुषम बेदी

                              चिडिया और चील

मम्मी ने पिंजरे का किवाड ख़ोल दिया और इंतजार करने लगी कि चिडिया वापस पिंजरे में लौट आए... लेकिन चिडिया लांग जंप भर कर कभी रसोई की अलमारी की छत पर जा बैठती तो कभी खाने की मेज पर। रसोई की खिडक़ी खुली थी मम्मी को डर हुआ कि चिडिया कहीं बाहर न उड ज़ाएवे पिंजरे के पास हथेली में दाना लिये उसे पुकारने लगीं।

सहसा उन्हें रीढ में झुरझुरी सी महसूस हुई फरफराते पंखों पर ममी को कितनी ही तसवीरें तिरती-सी दिखने लगीं -

झालरोंवाली फ्रॉक में इठलाती नन्ही गुडिया, चटक रंगो वाली बिकनी पहने बीच पर गीली रेत में लोटती चिडिया...हाँ यही तो था उसका नाम। घर पर सब प्यार से उसे चिडिया बुलाते थे। चिडिया की तरह तो दाना चुगती थी वह  चिडिया की ही तरह चहचहाती थी..तब पर नहीं निकले थे उसके कि फुर्राकर उड सके...बस डाल से डाल तक फुदका करती थी। हिन्दुस्तान छोडने से पहले इन डालियों की कमी भी नहीं थी  लगातार एक गोद से दूसरी गोद...

ममी उसे डॉक्टर बनाना चाहती थीं, डैडी वकील। दोनों खुद भी डॉक्टर थे, डैडी कार्डियोलोजिस्ट और मम्मी रेडियोलोजिस्ट। न पैसों की कमी , न प्रोत्साहन की। ढाई साल की उम्र से ही इस अमरीकी शहर के सबसे बढिया प्राइवेट नर्सरी स्कूल में प्लास्टिक के अक्षरों और नम्बरों को हाथ से महसूसती वह जल्दी ही उन्हें पहचान कर सबको अपनी प्रतिभा से प्रभावित करने लग गई थी। ममी जब भी पास होती, बस यही सवाल पूछतीं -

''स्कूल में क्या हुआ... ''
और स्कूल से लौटने पर...  बेबीसिटर क्या सिर्फ उसे टेलीविजन तो नहीं दिखाती रही?
कुछ फुरसत होती तो ममी कहतीं, ''अच्छा, वो वाली राईम सुना दो...ट्विन्कल ट्विन्कल लिटल स्टार... ''
ममी को खुश करने के लिये चिडिया दुहराने लगती तो ममी जरूर कहती,
''यू विल बी ए स्टार माई चाईल्ड!''
फिर चिडिया को जैसे कुछ याद आ जाता और वह मचल कर कहती,
''विल यू गो टू वर्क टुमारो?''
''यैस आई हैव टू, नहीं तो तुम्हारे स्कूल की फीस कौन देगा? ''
 ''आई डोन्ट वान्ट टू गो टू स्कूल टुमारो !''
 ''दैट इज इम्पॉसिबल यू हैव टू गो टू स्कूल ! ''
 ''नो वी गो टू पार्क।''
 ''संडे, वी गो टू पार्क।''
 ''नो टुडे।'' चिडिया जिद करती
 लेकिन अब तो शाम हो गई अंधेरे में पार्क नहीं जाते।

नर्सरी से किंडरगार्टन और फिर र्फस्ट ग्रेड में पहुँच जाती है चिडिया एक दिन।

'' मॉम, हु डू यू लव मोस्ट ? ''
ममी उसे प्यार से दुलारती है,  ''अपनी चिडिया को! ''
 ''नो दैट इज रांग मिस बर्गर सेज एवरीवन लव्ज हिमसेल्फ मोस्टयू लव योरसेल्फ मोस्टनॉट मी! '' ममी अवाक् उसे देखती रहती हैं।

फिर एक दिन डिपार्टमेन्टल स्टोर से बाहर निकलते ही वह पैसे मांगने लगती है, कोई फटेहाल, बेघर, गरीब इन्सान पैसा मांगता है और चिडिया उसे देना चाहती है, ममी ने तब डांट लगा दी थी - '' सब झूठमूठ की गरीबी है इस देश में...ड्रग खाकर पडे रहते हैं ओर फिर आने जाने वालों को तंग करते हैं..रहने दे, कुछ नहीं देना इसको।

चिडिया बडी हो रही है।
''ममी, कैन आई हैल्प इन द किचन? ''
'' नहीं, बिटिया वह सब मैं खुद संभाल लूंगीतू जा पढ..अपना होमवर्क खत्म कर ले, फिर तेरी भरतनाटयम की भी तो क्लास है आज, उसका अभ्यास भी करना होगा वरना तेरी टीचर गुस्सा करेगी। ''
एक बार ममी बीमार पड ज़ाती है। चिडिया कहती है -'' मैं स्कूल नहीं जाऊंगीघर पर कौन देखभाल करेगा तुम्हारी! ''
''जा जा, मेरे बहाने स्कूल मिस करने की कोई जरूरत नहीं। ऐसी कोई बीमार नहीं कि मेरे लिये तुम पढाई का हर्ज करो। पढना तुम्हारे लिये सबसे ज्यादा इंपोर्टेन्ट है! ''
''बस पढो पढो पढो इससे हटकर तुम कोई बात ही नहीं करतीं।''
''और क्या...इस देश में सफलता की यही कुंजी है। तुमको अपने अमरीकी साथियों से बेहतर ग्रेड्स लाने होंगे। तभी तो तुम बढिया हाई स्कूल फिर आईवी-लीग युनीवर्सिटी में जा सकोगी। एक बार किसी आईवी-लीग युनीवर्सिटी में पहुँच गयीं, तब तो हमेशा के लिये जिन्दगी बन गई समझो...तरक्की का हर रास्ता खुल जाता है, तुम

सहसा ममी की कमर में तीखा दर्द उठा और वे बोलते बोलते रुक गयीं। चिडिया ने ममी के चेहरे पर उभरती दर्द की छाप देखी पर वह रुकी नहीं, उसे स्कूल पहुँचना था।''

उस दिन चिडिया एक टेलेफोन नंबर रट रही थी ममी ने हैरान होकर पूछा तो वह पूरी कहानी सुनाने लगी, '' मॉम, लिंडा के मॉम और डैड ने उसको इतना मारा कि वह मर ही गई...उसके मॉम और डैड को पुलिस पकड क़र ले गई...मिस जॉनसन कहती हैं कि ये टेलेफोन नम्बर चाइल्ड एब्यूज हैल्प का है। अगर तुम्हारे मॉम और डैड तुमको मारें तो इस नम्बर पर फोन कर देना...फिर उनको भी पुलिस पकड क़र ले जाएगी। अब तुम मुझ पर गुस्सा करोगी न, तो मैं पुलिस को फोन कर दूंगी...मॉम, लिंडा अब कभी स्कूल नहीं आएगी जब मर जाते हैं तो फिर कभी स्कूल नहीं जाते''

ममी को लगा था उनके हाथ से कुछ बहुत कीमती फिसला जा रहा है...बहुत चाह कर भी जिसे पकडे रखना नामुमकिन हो रहा है। कुछ घर से बाहर भी है जिस पर उसका अपना कोई बस नहीं...क्या ये समाज उनको भी कोई धमकी दे रहा है।

खैर पढते-पढते चिडिया शहर के नामी हाईस्कूल में भी पहुँच गई।  बडी मुश्किल से दाखिला मिलता है इस स्कूल में हजारों परीक्षा देते हैं, लेकिन दाखिला दो तीन सौ को ही मिलता है इस स्कूल में प्रतियोगिता से प्रताडित उन सैकडों छात्रों के बीच चिडिया कुछ फिसलने लगी। छमाही रिर्पोट कार्ड मिला तो ममी सकते की हालत में थी।

'' यह बायोलॉजी में तुझे सी कैसे मिला? ''
 ''आय थिंक, द टीचर डज नॉट लाईक मी! ''

ममी उसके टीचर से मिलीं थीं...बायोलोजी की क्लास सुबह साढे आठ बजे होती थी टीचर ने ममी से कहा था - '' लगता है आपकी बेटी को पूरी नींद मिलतीमेरी क्लास में कुछ सुस्त और सोयी सोयी सी दिखती है।''
ममी शाम होते ही चिडिया के पीछे पड ज़ाती, ''टाईम मत वेस्ट कर जल्दी सोना है तुझे तो हमने डॉक्टर बनाना हैबायलोजी में पिछड ग़यी तो काम कैसे चलेगा? ''
''पर ममी मैं जल्दी नहीं सो सकती...इंग्लिश टीचर के लिये आज यह किताब पढक़र बुक-रिर्पोट लिखनी है।''

ममी को समझ नहीं आता क्या करे-कहे।

बायोलॉजी में दुबारा कम नम्बर आए तो ममी के हाथ पैर ठण्डे पड ग़ए थे।फिर चिडिया से सलाह करके एक झूठ गढक़र टीचर को बताया गया था।  टेस्टवाले दिन चिडिया बीमार थी। डर के मारे टेस्ट कर दियाक्या अब दुबारा ले सकती हैं? डैड के प्रोत्साहन पर चिडिया ने स्कूल की स्पीच टीम में भी हिस्सा लिया है वकील के लिये पब्लिक स्पीकिंग बहुत जरूरी होती है न!

आज शाम चिडिया को कल सुबह होने वाले गणित के इम्तहान की तैयारी करनी है। दोपहर के स्पीच टूर्नामेन्ट के लिये स्पीच को रट्टा लगाना हैरात को एक बजे तक चिडिया जगी रही सुबह बायोलोजी के पहले घंटे में वह फिर नींद के झूले ले रही थी।
शाम को डैड ने पूछा था कि स्पीच कैसी रही तो चिडिया पुरस्कार न जीत पाने के अपराध भाव को एक उदासीनता से ढक कर बोली, '' आई डिड नॉट विन।''
''वाय?''
'यूं डैड ने विस्तार से जानने के लिये ऐसा पूछा था..पर चिडिया का अपराध भाव अब आक्रमण का आकार ले बैठा..भडक़ कर बोली, '' वैल, यू कान्ट विन ऐवरी टाईम ।''
चिडिया को शान्त करने के लिये डैड पूछ बैठे, ''तुम्हारी स्पीच का टॉपिक क्या था?
आई डोन्ट वान्ट टू रीपीट यू कैन रीड इट योरसैल्फ।''

लिखित भाषण की कॉपी चिडिया ने डैड को पकडा दी। डैड ने शीर्षक पढा -  टीन एज सुसाईड्स याने किशोर आत्महत्याएं पहला पैराग्राफ इस तरह था कि - ' इस देश में हर साल करीब दस हजार टीन एजर्स आत्महत्या के शिकार होते हैं जिसकी वजह ड्रग, इन्सिक्योरिटी, डिप्रेशन और अकेलेपन के साथ साथ, खासकर आप्रवासियों के बीच इसकी वजह किशोरों पर उनके माँ-बाप द्वारा बढता हुआ दबाव है। आप्रवासी माँ-बाप अपनी ख्वाहिशों अधूरे सपनों को अपनी औलाद द्वारा पूरा करवाने के लिये इन किशोरों को बदहवास घोङों की तरह मार मार कर चलवाए रखना चाहते हैं जिसका परिणाम बहुत भीषण होता है।

भौंचक्के भाव से डैड ने बार बार वे पंक्तियां पढीं। उनको विश्वास ही नहीं हो पा रहा था कि जो वे पढ रहे हैं, वह कुछ घण्टे पहले उनकी बेटी एक भाषण में कह चुकी है। सहसा वे जोर से फटकारने लगे।

'' यह सब क्या बकवास लिखी है? ''

अब की चिडिया शान्त रही।

'' बकवास नहीं, डैड..यूं भी इस स्पीच के तथ्य एक जाने माने शोधकर्ता के हैं। स्कूल में यूं सबको स्पीच पसंद आयी थी। सहसा डैड एकदम चुप हो गए। थोडी देर बाद पता नहीं क्या सोचते- सोचते बोले - '' क्या तुमको ऐसा लगता है कि हम तुम पर प्रेशर डाल रहे हैं? ''
कभी-कभी...पर यह मेरे अपने बारे में तो नहीं यह तो
''खैर, अब मैं तुझे कुछ नहीं कहूंगा।'' लेकिन ममी को डैड के इस रुख पर गुस्सा आ गया था - '' रहने दो, तुम तो फालतू में घबरा जाते हो! हम ऐसे तो डाक्टर नहीं बन गए। दिन रात पढते थेघर के काम भी करते थे। इससे तो मैं कुछ भी कराती ही नहीं कम से कम पढक़र अपने आप में कुछ बन जाना तो इसका फर्ज है। हम अपने फायदे की बात थोडे ही करते हैं। देखो, भरतनाटयम भी छूट गया इसका...किसी भी काम के लिये वक्त नहीं है...तो वक्त है किसलिये? ज्यादा ही दिमाग बिगाड देते हैं यहाँ बच्चों का...माँ बाप न हुए मानो दुश्मन हों बच्चों के फालतू में माँ बाप में भी गिल्ट।

मन ही मन ममी डर गयी थीं जैसे कोई उन्हें कोई धमकी दे रहा हो। लेकिन भूमिकाएं अदला बदली हो रही थीं। ममी डैडी कुछ भी चिडिया का नापसंद करते तो वह भडक़ जाती - '' काम डाउन आई विल डू एट माय ओन पसंद।''

बडी तेजी से ममी डैडी उसकी जिन्दगी में फालतू और बेकार की चीज होते जा रहे थे।उसे ममी डैडी की बातें, उनके अनुभव अपने संदर्भ में एकदम इररैलेवेन्ट लगने लगे...उनमें एक और जीवन शैली, एक और संस्कृति की बू थी जिसे चिडिया अपने लिये बहुत पिछडा और हानिप्रद भी समझने लग गयी थी। ममी डैडी के खिलाफ बोलते हुए उसकी आवाज में एक मसीहापन होता, जैसे कि दुनिया भर के माँ बापों के खिलाफ आंदोलन में वह किशोरों का नेतृत्व कर रही हो। उसे विश्वास हो गया था कि उसके अपने और ज्यादातर माँ बाप बातें प्रजातन्त्र की करते हैं पर होते तानाशाह हैं।

चिडिया आईवी लीग तो नहीं पर एक अच्छे कॉलेज में दाखिला पा गई थी होड यहाँ भी कम नहीं थी। उधर अब चिडिया के पर भी तो निकलने लगे थेवह उडना चाहती थीघरौंदे से बाहर खुली हवा पर तैरना चाहती थी....एक सहपाठी उसे अपनी ओर खींच रहा था। हवाओं पर साथ साथ तैरने का आमंत्रण।

उसने सहपाठी से कहा,  ''ममी को लडक़ों से दोस्ती पसंद नहीं।''
सहपाठी बोला,  ''ममी को कुछ बतलाने की जरूरत ही क्या है? ''
''लेकिन ममी को यूं मैं सब कुछ...
उसने बात काट कर पूछा,  ''कितने साल की हो? ''
''अठारह।''
''तो तुम वयस्क हो। अब ममी की जेल से रिहा हो जाओ।''
लेकिन वह अभी भी घबरा रही थी।
सहपाठी बोला, ''किसकी जिन्दगी है यह? ''
''मेरी।''
''तो ममी ने जीना है या तुमने? ''
घर पर चिडिया ने कहा,  ''मैं बोर्डिंग में रहना चाहती हूँ।''
 ''क्यों?''
 ''इंडिपेन्डेन्टली रहूँगी।''
 अभी से ऐसी बात...पढाई खत्म कर ले, फिर शादी के बाद तो हमसे अलग रहना ही है।
 ''लेकिन घर पर पढाई ठीक से नहीं होती।''
 ''यहाँ घर पर भला कौन तुझे डिस्टर्ब करता है ? ''
 '' क्या तुम समझ पाओगी कि अकेले रहने की भी एक जरूरत होती हैकि मां बाप के साथ रह कर बच्चे का पूरा विकास नहीं होतातुम्हारा जमाना, तुम्हारा देश बहुत फर्क था...क्या तुम्हें भरोसा नहीं होता कि मेरी दुनिया तुमसे बहुत अलग हो सकती है''

ममी नहीं मानी। चिडिया और ममी में आए दिन किच किच होती। चिडिया की सहनशक्ति खत्म हो रही थी - '' आई डोन्ट अण्डरस्टैन्ड  आय एम एन एडल्ट नाओ तुम लोग मनमर्जी से क्यों नहीं रहने देते! ''
'' जब खुद कमाने लगोगी तो रह लेना मनमर्जी सेकुछ ज्यादा ही पर निकल आए हैं।''
'' मेरे कॉलेज की फीस देती हो। मुझे खाने-पहनने को देती हो, इतना ही रौब है ।''

ममी को जैसे लकवा मार गया हो, '' कैसे कह गई तू ये बात..बस यही नाता है तेरा हमारा बस इसीलिये टिकी है तू यहाँ कि और कोई तेरे कॉलेज की फीस नहीं भरेगा हमारा प्यार हमारी कद्र हमारे साथ रहना अब गुलामी लगती है तुझे! ''

अचानक चिडिया डर गई...ये तो बतंगड बन गया। ममी को नाराज क़रके वह जाएगी कहाँ?अभी तो उसके परों में उडने की पूरी ताकत कहाँ है?'' सॉरी मॉम!आई डिड नॉट मीन टू हर्ट यूआई लव यू! ''
और ममी के जिगरे में फिर से वात्सल्य का दरिया बह निकला।
'' देख बिटिया हम जो कहते हैं, वह तेरे भले के लिये ही, पहले पढ लिख कर अपने पैरों पर खडी हो जा, फिर बस मॉम, हो गया न भाषण शुरुजब भी मैं तुमको आई लव यू कहती हूँ, तुम इतनी इंसपायर्ड हो जाती हो कि बस कभी न रुकने वाली स्पीच रेन शुरु हो जाती है।''
''चल चल, मजाक करना ज्यादा ही सीख गई है।'' ममी बनावटी गुस्से से कहती हैं।

और उस शाम चिडिया के लिये खास पकवान बनते हैं।उसका पॉकेट अलाउंस बढा दिया जाता है और ममी उसे नया ड्रेस खरीदवाने ब्लूमिंगडेल्ज ले जाती हैं। चिडिया ने जब सारा किस्सा अपने सहपाठी से कहा तो वह बोला - '' तुम्हारी ममी बहुत लोनली और इनसिक्योर हैं तुमको खोने से डरती हैं। इसी से तुम्हें तरह तरह की रिश्वत देकर अपने पास रखना चाहती हैं।''
 ''तुम्हारा मतलब?''
 ''देखो, मां बाप का भी अपना स्वार्थ होता है। वे अपना पजेशन खोना नहीं चाहते। इसलिये हर तरीके से बच्चों  एडल्ट बच्चों को भी अपने कब्जे में रखने की कोशिश रहती है उनकी अभी यह आसान भी है क्योंकि तुम उन पर पूरी तरह से डिपेन्डेन्ट हो।
चिडिया आत्मदया से भर उठी,  कैसी एग्जिस्टेंस है हमारी कि अपने सरवाईवल तक के लिये दूसरों का मुँह जोहना पडता है मेरा उस घर में कतई मन नहीं लगतापर कहीं और रहने का ठिकाना भी तो नहींपता नहीं कब छुटकारा होगा।''
''हम दोनों अगर नौकरी कर लें तो कोई छोटी सी जगह किराए पर लेकर साथ रह सकते हैं।''
''और पढाई?''
''पढाई साथ साथ चलती रहेगी।''

और चिडिया अपने घरौंदे से उडक़र आ गई। एक छोटी सी नौकरी कर ली। डॉक्टर वकील बनने के सपने तो यूं भी उसने नहीं उसके मॉम डैड ने देखे थे। खुद वह ऐसा कुछ करना चाहती थी जिससे एकदम मशहूर हो जाएपर अभी उसके दिमाग में साफ नहीं था कि क्या करने से वह फटाफट नाम और शोहरत पा सकती है। कभी कभी वह फिल्म बनाने की सोचती..पर अभी न पैसा था न ट्रेनिंग, न ही स्पष्ट विचार या विषय...लेकिन महत्वाकांक्षा थी, और दम था....भीतर एक अकुलाहट सी बनी रहती...उसका सहपाठी सादा जिंदगी जीने में विश्वास रखता था...एकदम मिनीमलिस्ट...कम से कम चीजों के साथ गुजारा करना...मिट्टी से जुडी ज़िंदगी की ओर लौटना...लेकिन इस नयी आत्मनिर्भर जिंदगी का अपना ही सुख था। चिडिया पूरी तरह से अपनी नयी दुनिया में मस्त हो गयी। हर दिन आर्ट, हिस्ट्री के नये नये कोर्स की किताबें पढते हुए, नये नये लोगों से मिलते, नये घर का दायित्व निभाते हुए वह मॉम डेड को भूल सी गयी। कम से कम नये जीवन में उसे कहीं भी उनका संदर्भ नहीं दीखा।

एक बार ममी बहुत बीमार हो गयीं थीं...उनका ऑपरेशन होना था। डैड का फोन आया था, पर चिडिया को बहुत पढाई करनी थी। तब ममी ने हिन्दुस्तान से मौसी को बुलवाया था अपनी देखभाल के लिये। मौसी ने दिन रात ममी की तीमारदारी में लगा दिया था पर चिडिया के रुख से वे बहुत खफा थीं। वे ममी से कहतीं -

'' तुम तो अपनी बेटी से डरती हो, कुछ कहती ही नहीं। मेरी बेटी इस तरह करे तो उसकी टांगे तोड क़र न धर दूं...इतनी आजादी आखिर क्यों? कुछ मकसद भी तो होना चाहिये न। '' ममी सुनती रहतीं और मौसी कहती जातीं।
'' दरअसल तुमको बच्चे पालना आता ही नहीं...यहाँ आजादी के बोल बोले, उसकी चर्चा और नारों से इतना आतंकित हो जाते हो कि बच्चों को अनुशासित भी नहीं करते..तभी ये बच्चे न हिन्दुस्तानी रह पाते हैं न अमरीकी।''
ममी नीरीह भाव से कहती,  ''जवानी का जोश है...मेरी बात तो सुनती ही नहीं।''
मौसी को और भी तरह मिल जाती,  ''वह कौनसा जानवर होता है - हाँ, सर्पिणी अपने अण्डों को खुद खा जाती है न...पर कभी सुना है ऐसा शिशु जो अपने पैदा करने वाले को खा डाले! ''
'' यह कैसी बात कह रही हो तुम...चिडिया भोली है...उम्र के साथ मां बाप के दिल को समझने पहचानने लगेगी।''
'' और नहीं तो अपने उसी सहपाठी के साथ शादी कर ले जिसके साथ रह रही है। कम से कम तुम्हारी तो मुक्ति हो।''

उधर कई सालों तक चलने वाले अस्थायी रैनबसेरे में अब चिडिया की सहपाठी से नोकझौंक होने लगी। तंगी की उस जिन्दगी से चिडिया तंग आने लगी थी। दोनों एक दूसरे से कुछ ऊबने लगे । शादी की बात उठी तो सहपाठी बोला -

'' आई बिलीव इन कमिटमेन्ट ऑफ हार्ट्स...शादी तो आदमी तब करे जबकि सामाजिक स्वीकृति कुछ मायने रखती हो।''

''जल्द ही उसके दिल की कमिट्मेन्ट किसी और से हो गयी।''

मौसी के बहुत समझाने पर ममी डैडी चिडिया को छुट्टी मनाने के बहाने हिन्दुस्तान ले गये, वहाँ उसे शादी लायक कई लडक़े दिखाए गये। चिडिया ने ममी से कहा -

'' ये कैसा खिलवाड क़र रहे हो तुम लोग...जिसे न जानती न बूझती, उसके साथ जिन्दगी बिताउंगी! क्या बेवकूफ समझ रखा है तुमने मुझे..यह नहीं होगा।''

अमरीका लौट कर चिडिया को नये सिरे से घोंसला खोजना था। अपनी छोटी सी तनख्वाह में कोठरी का किराया, खाना पीना और दूसरे खर्च नहीं चला सकती थी। पहले सहपाठी के साथ सबकुछ शेयर करती थी...अकेले बूते मुश्किल था। दूसरे सहसा सहपाठी से अलग होकर उसने यह भी महसूस किया कि वह खामखाह अपने आप को मॉम डैड के घर के वैभवपूर्ण माहौल से वंचित कर रही थी...अकेले रहने से उसका स्तर बहुत ज्यादा गिर जाता था...ऐसी हालत में तो उसकी महत्वाकांक्षा, उसका फिल्म बनाने का सपना कभी भी पूरा न होगा।

और चिडिया अपना तिनका भर सामान लेकर ममी डैडी के घर आ गयी...हमेशा की तरह ममी ने अपना सब कुछ उसके लिये बिछा दिया था। चिडिया को दिनों बाद बहुत चैन और राहत मिली।

लेकिन घर में बहुत जल्द ही तनाव शुरु हो गये। दरअसल चिडिया वहाँ रहते हुए भी रह नहीं रही थी। बस रैन भर के बसेरे की ही बात थी। और अगर दिन में घर पर होती भी तो कमरा बंद किये पडी रहती। ममी के मिलने वाले आते तो लाख मिन्नत करने पर बडी मुश्किल से वह उन्हें हैलो करने बाहर आती, फिर मिनट भर में वापस लौट किवाड बंद कर लेती। ज्यादातर उसे खाने की भूख नहीं होती थी, शायद डायटिंग के चक्कर में, या फिर घर वालों से बचने का बहाना होता। ममी अब उसे घर में रखने की बजाय घर से निकालने के चक्कर में थीं। दिन रात एक ही सवाल -

'' तू शादी क्यों नहीं करती? ''

चिडिया सोचती है वह ममी डैडी की अकेली सन्तान है...इस घर पर उसी का हक है...अगर वह यहीं रहती रहे तो गलत क्या है!

मौसी का दूसरा चक्कर लगा तो फिर ममी से कहने लगीं,
'' बहुत बिगाडा हुआ है, तुमने लडक़ी को...तीस से तो ऊपर हो गयी शादी कब करेगी? ''
चिडिया बिगड उठती है,  '' आपकी आँखों में मैं भला क्यों खटकती हूँ? आखिर मेरा घर है..शादी करुं या न...जब तक चाहूंगी, यहीं रहूंगी....आखिर मेरे माँ बाप हैं आपको क्या!''
मौसी भी गुस्से में बोली,  ''बडे स्वार्थी बच्चे हैं आजकल के! मां बाप पर अपने हक को तो खूब समझते हैं, पर उनके लिये करने का कोई भाव नहीं...बस जब मन आया चले आये, इस्तेमाल किया और फिर उड ग़ए अपने ठिकाने को...कम से कम मां बाप की खुशी के लिये ही शादी कर लो।''
अब के ममी बीच में बोल पडती हैं,  '' रहने दो शीला ! आखिर बच्ची है..इसके घर आ जाने से रौनक आ जाती है वरना जिन्दगी में अब ज्यादा है ही क्या! ''

लेकिन उस रौनक के बीच अन्दर ही अन्दर ममी को कुछ सालता रहता है..बत्तीस बरस की लडक़ी के घर लौटने पर वह खुश होये या रोये...वह यह भी जानती है कि चिडिया किसी भी पल उडने की फिराक में है...यह घर उसके लिये ऐसी सराय है जिसने उसे मुफ्त पनाह दी हुई है...क्या सच में ममी का इस्तेमाल किया जा रहा है? चिडिया को तो इस घर में किसी से कोई सरोकार नहीं...सुबह सुबह काम पर निकल जाती है और देर रात गए घर लौटती है...पता नहीं मौसी के कहे का बुरा मान गई या क्या...अब तो कि किसी दोस्त या रिश्तेदार के आने पर हैलो कहने अपने कमरे से नीचे तक नहीं उतरती। घर सच में सराय था।

फिर ममी सोचती है...सारी उम्र तो उसने चिडिया को कोई जिम्मेदारी नहीं दी..सिर्फ लाड प्यार दिया अब भला वह जिम्मेदारी निभाने के काबिल कैसे हो ? कभी दूसरों के लिये कुछ करने को कहा सिखाया नहीं..तब चिडिया कैसे जाने और उदास मन से ममी ने मान लिया कुसूर उन्हीं का है।

अब चिडिया को दाने पानी की या आशियाने की फिक्र करने की जरूरत नहीं थी सारी सुख सुविधाएं मुहैय्या थीं..अगर इनकी एवज में कभी ममी का उपदेश सुनना पड ज़ाता तो वह कानों में वाकमैन के इयर प्लग खोंसकर पॉप संगीत सुनने लग जाती।

अब वह फिर फिल्म बनाने के सपने देखने लगी...नौकरी से अब कुछ पैसा बच रहा था, पर वह काफी नहीं था....और फिर ममी डैडी का पैसा भी तो आखिर उनकी चिडिया का ही है।

उसने ममी से कहा, ''मैं फिल्म बनाना चाहती हूँ...पैसा लगाओगी? ''

तो चिडिया को अभी भी ममी पापा के सहारे की जरूरत थी! क्या ममी की परवरिश ने ही इतना कमजोर बना दिया था कि चिडिया की अधूरी सी फुदकन भर फिर से मां के घोंसले में आ गिरी है? क्या अभी उडना नहीं सीखा उसने? कभी सीख पाएगी? जब पर निकलने को हुए थे, तभी क्या ठीक से उडने देना चाहिये था...कहां, क्या गलत हो गया उनसे....चिडिया की बांहो से जैसे नये पंख निकालना चाहते हुए ममी ने कहा,

'' तू जो चाहती है कर...बस अपने पैरों पर खडी हो जा...तेरे होने से घर में सब कुछ चहक उठा है...पर दूर पहाडों से, हवाओं से और फिर बादलों से फिसलकर आती चहचहाहट शायद कहीं ज्यादा मीठी सुनाई पडती है...चिडिया तो स्वच्छंद आकाश में उडती हुई ही सबसे प्यारी और मोहक लगती है।''

चिडिया अभी ममी की पूरी बात समझ भी नहीं पाई थी कि अचानक ममी को कुछ ध्यान हो आया और वह बोलीं,

'' तेरे डैडी नाराज तो नहीं होंगे...कहते हैं उसे मन मांगा देकर बिगाड रही हो।''
चिडिया कडक़ी,  ठीक है रखलो संभाल कर...चिता पर धर कर साथ ले जाना, जीते जी मुझे डिप्राईव करके सुख मिलता है तो लो...मैं भी तुम दोनों के मरने का इंतजार कर लूंगी...मां बाप भी पता नहीं किस बात के बदले लेते रहते हैं....ट्रस्ट को पैसा देंगे अपनी औलाद को नहीं...पैदा करने का यह मतलब तो नहीं कि सारी उम्र उन्हें दबोच कर कोख में ही रख लिया जाये।'

सहसा ममी ने देखा..चिडिया वहाँ नहीं थी। शायद रसोई की खिडक़ी से बाहर चली गयी थी। ममी घबरा कर बाहर की ओर दौडीं...बाहर सिर्फ एक बडी चील आसमान को गिरफ्तार किये हुए थी....ममी बदहवास चिडिया को खोजने लगीं। चिडिया कहीं नहीं थी...अचानक ममी को लगा उन्हें कुछ भ्रम सा हो रहा है...शायद कोई चील वहां नहीं थी, या शायद चील चिडिया को उगल दे और आसमान पर आंखें टिकाए वह चिडिया के लौटने का इंतजार करने लगीं।

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                                                                                                                                                          कहानी धरोहर


                                                                                                                                                       - भीष्म साहनी

                                                           अमृतसर आ गया है

गाड़ी के डिब्बे में बहुत मुसांफिर नहीं थे। मेरे सामनेवाली सीट पर बैठे सरदार जी देर से मुझे लाम के किस्से सुनाते रहे थे। वह लाम के दिनों में बर्मा की लड़ाई में भाग ले चुके थे और बात-बात पर खी-खी करके हंसते और गोरे फौंजियों की खिल्ली उड़ाते रहे थे। डिब्बे में तीन पठान व्यापारी भी थे, उनमें से एक हरे रंग की पोशाक पहने ऊपर वाली बर्थ पर लेटा हुआ था। वह आदमी बड़ा हंसमुख था और बड़ी देर से मेरे साथ वाली सीट पर बैठे एक दुबले-से बाबू के साथ उसका मंजांक चल रहा था। वह दुबला बाबू पेशावर का रहनेवाला जान पड़ता था क्योंकि किसी-किसी वक्त वे आपस में पश्तो में बातें करने लगते थे। मेरे सामने दायीं ओर कोने में, एक बुढ़िया मुंह-सिर ढाँपे बैठी थी और देर से माला जप रही थी। यही कुछ लोग रहे होंगे। सम्भव है दो-एक और मुसांफिर भी रहे हों, पर वे स्पष्टत: मुझे यादनहीं।
गाड़ी धीमी रंफ्तार से चली जा रही थी, और गाड़ी में बैठे मुसांफिर बतिया रहे थे और बाहर गेहूं के खेतों में हल्की-हल्की लहरियाँ उठ रही थीं, और मैं मन-ही-मन बड़ा खुश था क्योंकि मैं दिल्ली में होने वाला स्वतन्त्रता-दिवस समारोह देखने जा रहा था।
उन दिनों के बारे में सोचता हूं, तो लगता है, हम किसी झुटपुटे में जी रहे हैं। शायद समय बीत जाने पर अतीत का सारा व्यापार ही झुटपुटे में बीता जान पड़ता है। ज्यों-ज्यों भविष्य के पट खुलते जाते हैं, यह झुटपुटा और भी गहराता चलाजाताहै।
उन्हीं दिनों पाकिस्तान के बनाये का ऐलान किया गया था और लोग तरह-तरह के अनुमान लगाने लगे थे कि भविष्य में जीवन की रूपरेखा कैसी होगी। पर किसी की भी कल्पना बहुत दूर तक नहीं जा पाती थी। मेरे सामने बैठे सरदार जी बार-बार मुझसे पूछ रहे थे कि पाकिस्तान बन जाने पर जिन्ना साहिब बम्बई में ही रहेंगे या पाकिस्तान में जाकर बस जाएंगे, और मेरा हर बार यही जवाब होता—बम्बई क्यों छोड़ेंगे, पाकिस्तान में आते-जाते रहेंगे, बम्बई छोड़ देने में क्या तुक है! लाहौर और गुरदासपुर के बारे में भी अनुमान लगाए जा रहे थे कि कौन-सा शहर किस ओर जाएगा। मिल बैठने के ढंग में, गप-शप में, हंसी-मंजांक में कोई विशेष अन्तर नहीं आया था। कुछ लोग अपने घर छोड़कर जा रहे थे, जबकि अन्य लोग उनका मजाक उड़ा रहे थे। कोई नहीं जानता था कि कौन-सा कदम ठीक होगा और कौन-सा गलत। एक ओर पाकिस्तान बन जाने का जोश था तो दूसरी ओर हिन्दुस्तान के आंजाद हो जाने का जोश। जगह-जगह दंगे भी हो रहे थे, और योम-ए-आजादी की तैयारियाँ भी चल रही थीं। इस पूष्ठभूमि में लगता, देश आंजाद हो जाने पर दंगे अपने-आप बन्द हो जाएंगे। वातावरण में इस झुटपुट में आजादी की सुनहरी धूल-सी उड़ रही थी और साथ-ही-साथ अनिश्चय भी डोल रहा था, और इसी अनिश्चय की स्थिति में किसी-किसी वक्त भावी रिश्तों की रूपरेखा झलक दे जाती थी।
शायद जेहलम का स्टेशन पीछे छूट चुका था जब ऊपर वाली बर्थ पर बैठे पठान ने एक पोटली खोल ली और उसमें से उबला हुआ मांस और नान-रोटी के टुकड़े निकाल-निकालकर अपने साथियों को देने लगा। फिर वह हंसी-मंजांक के बीच मेरी बगल में बैठे बाबू की ओर भी नान का टुकड़ा और मांस की बोटी बढ़ाकर खाने का आग्रह करने लगा था—''का ले, बाबू, ताकत आएगी। अम जैसा ओ जाएगा। बीवी बी तेरे सात कुश रएगी। काले दालकोर, तू दाल काता ए, इसलिए दुबला ए...''
डिब्बे में लोग हंसने लगे थे। बाबू ने पश्तो में कुछ जवाब दिया और फिर मुस्कराता सिर हिलाता रहा।
इस पर दूसरे पठान ने हंसकर कहा—''ओ जालिम, अमारे साथ से नई लेता ए तो अपने हाथ से उठा ले। खुदा कसम बर का गोश्त ए, और किसी चीज का नईए।''
ऊपर बैठा पठान चहककर बोला—''ओ खंजीर के तुम, इदर तुमें कौन देखता ए? अम तेरी बीवी को नई बोलेगा। ओ तू अमारे साथ बोटी तोड़। अम तेरे साथ दाल पिएगा...''
इस पर कहकहा उठा, पर दुबला-पतला बाबू हंसता, सिर हिलाता रहा और कभी-कभी दो शब्द पश्तो में भ्ी कह देता।
''ओ कितना बुरा बात ए, अम खाता ए, और तू अमारा मुँ देखता ए...'' सभी पठान मगन थे।
''यह इसलिए नहीं लेता कि तुमने हाथ नहीं धोए हैं,'' स्थूलकाय सरदार जी बोले और बोलते ही खी-खी करने लगे! अधलेटी मुद्रा में बैठे सरदार जी की आधी तोंद सीट के नीचे लटक रही थी—''तुम अभी सोकर उठे हो और उठते ही पोटली खोलकर खाने लग गये हो, इसीलिए बाबू जी तुम्हारे हाथ से नहीं लेते, और कोई बात नहीं।'' और सरदार जी ने मेरी ओर देखकर आँख मारी और फिर खी-खीकरनेलगे।
''मांस नई खाता ए, बाबू तो जाओ जनाना डब्बे में बैटो, इदर क्या करता ए?'' फिर कहकहा उठा।
डब्बे में और भी अनेक मुसांफिर थे लेकिन पुराने मुसांफिर यही थे जो संफर शुरू होने में गाड़ी में बैठे थे। बाकी मुसांफिर उतरते-चढ़ते रहे थे। पुराने मुसांफिर होने के नाते उनमें एक तरह की बेतंकल्लुंफी आ गयी थी।
''ओ इदर आकर बैठो। तुम अमारे साथ बैटो। आओ जालिम, किस्सा-खानी की बातें करेंगे।''
तभी किसी स्टेशन पर गाड़ी रुकी थी और नये मुसांफिरों का रेला अन्दर आ गया था। बहुत-से मुसांफिर एक साथ अन्दर घुसते चले आये थे।
''कौन-सा स्टेशन है?'' किसी ने पूछा।
''वजीराबाद है शायद,'' मैंने बाहर की ओर देखकर कहा।
गाड़ी वहाँ थोड़ी देर के लिए खड़ी रही। पर छूटने से पहले एक छोटी-सी घटना घटी। एक आदमी साथ वाले डिब्बे में से पानी लेने उतरा और नल पर जाकर पानी लोटे में भर रहा था तभी वह भागकर अपने डिब्बे की ओर लौट आया। छलछलाते लोटे में से पानी गिर रहा था। लेकिन जिस ढंग से वह भागा था, उसी ने बहुत कुछ बता दिया था। नल पर खड़े और लोग भी, तीन-चार आदमी रहे होंगे—इधर-उधर अपने-अपने डिब्बे की ओर भाग गये थे। इस तरह घबराकर भागते लोगों को मैं देख चुका था। देखते-ही-देखते प्लेटफार्म खाली हो गया। मगर डिब्बे के अन्दर अभी भी हंसी-मजाक चल रहा था।
''कहीं कोई गड़बड़ है,'' मेरे पास बैठे दुबले बाबू ने कहा।
कहीं कुछ था, लेकिन क्या था, कोई भी स्पष्ट नहीं जानता था। मैं अनेक दंगे देख चुका था इसलिए वातावरण में होने वाली छोटी-सी तबदील को भी भाँप गया था। भागते व्यक्ति, खटाक से बन्दर होते दरवाजे, घरों की छतों पर खड़े लोग, चुप्पी और सन्नाटा, सभी दंगों के चिह्न थे।
तभी पिछले दरवाजे की ओर से, जो प्लेटफार्म की ओर न खुलकर दूसरी ओर खुलता था, हल्का-सा शोर हुआ। कोई मुसांफिर अन्दर घुसना चाह रहा था।
''कहाँ घुसा आ रहा है, नहीं है जगह! बोल दिया जगह नहीं है,'' किसी ने कहा।
''बन्द करो जी दरवाजा। यों ही मुंह उठाए घुसे आते हैं।'' आवांजें आ रही थीं।
जितनी देर कोई मुसांफिर डिब्बे के बाहर खड़ा अन्दर आने की चेष्टा करता रहे, अन्दर बैठे मुसांफिर उसका विरोध करते रहते हैं। पर एक बार जैसे-तैसे वह अन्दर जा जाए तो विरोध खत्म हो जाता है, और वह मुसांफिर जल्दी ही डिब्बे की दुनिया का निवासी बन जाता है, और अगले स्टेशन पर वही सबसे पहले बाहर खड़े मुसांफिरों पर चिल्लाने लगता है—नहीं है जगह, अगले डिब्बे में जाओ...घुसे आतेहैं...
दरवाजे पर शोर बढ़ता जा रहा था। तभी मैले-कुचैले कपड़ों और लटकती मूंछों वाला एक आदमी दरवांजे में से अन्दर घुसता दिखाई दिया। चीकट, मैले कपड़े, जरूर कहीं हलवाई की दुकान करता होगा। वह लोगों की शिकायतों-आवांजों की ओर ध्यान दिए बिना दरवाजे की ओर घूमकर बड़ा-सा काले रंग का सन्दूक अन्दर की ओर घसीटने लगा।
''आ जाओ, आ जाओ, तुम भी चढ़ जाओ! वह अपने पीछे किसी से कहे जा रहा था। तभी दरवांजे में एक पतली सूखी-सी औरत नंजर आयी और उससे पीछे सोलह-सतरह बरस की सांवली-सी एक लड़की अन्दर आ गयी। लोग अभी भी चिल्लाए जा रहे थे। सरदार जी को कूल्हों के बल उठकर बैठना पड़ा।''
''बन्द करो जी दरवाजा, बिना पूछे चढ़े आते हैं, अपने बाप का घर समझ रखा है। मत घुसने दो जी, क्या करते हो, धकेल दो पीछे...'' और लोग भी चिल्ला रहेथे।
वह आदमी अपना सामान अन्दर घसीटे जा रहा था और उसकी पत्नी और बेटी संडास के दरवाजे के साथ लगकर खड़े थे।
''और कोई डिब्बा नहीं मिला? औरत जात को भी यहाँ उठा लाया है?''
वह आदमी पसीने से तर था और हाँफता हुआ सामान अन्दर घसीटे जा रहा था। सन्दूक के बाद रस्सियों से बंधी खाट की पाटियाँ अन्दर खींचने लगा।
''टिकट है जी मेरे पास, मैं बेटिकट नहीं हूं।'' इस पर डिब्बे में बैठे बहुत-से लोग चुप हो गये, पर बर्थ पर बैठा पठान उचककर बोला—''निकल जाओ इदर से, देखता नई ए, इदर जगा नई ए।''
और पठान ने आव देखा न ताव, आगे बढ़कर ऊपर से ही उस मुसांफिर के लात जमा दी, पर लात उस आदमी को लगने के बजाए उसकी पत्नी के कलेजे में लगी और वहीं 'हाय-हाय' करती बैठ गयी।
उस आदमी के पास मुसांफिरों के साथ उलझने के लिए वक्त नहीं था। वह बराबर अपना सामान अन्दर घसीटे जा रहा था। पर डिब्बे में मौन छा गया। खाट की पाटियों के बाद बड़ी-बड़ी गठरियाँ आयीं। इस पर ऊपर बैठे पठान की सहन-क्षमता चुक गयी। ''निकलो इसे, कौन ए ये?'' वह चिल्लाया। इस पर दूसरे पठान ने, जो नीचे की सीट पर बैठा था, उस आदमी का सन्दूक दरवाजे में से नीचे धकेल दिया, जहाँ लाल वर्दीवाला एक कुली खड़ा सामान अन्दर पहुंचा रहा था।
उसकी पत्नी के चोट लगने पर कुछ मुसांफिर चुप हो गये थे। केवल कोने में बैठो बुढ़िया करलाए जा रही थी—''ए नेक बख्तो, बैठने दो। आ जा बेटी, तू मेरे पास आ जा। जैसे-तैसे सफर काट लेंगे। छोड़ो बे जालिमो, बैठने दो।''
अभी आधा सामान ही अन्दर आ पाया होगा जब सहसा गाड़ी सरकने लगी।
''छूट गया! सामान छूट गया।'' वह आदमी बदहवास-सा होकर चिल्लाया।
''पिताजी, सामान छूट गया।'' संडास के दरवाजे के पास खड़ी लड़की सिर से पाँव तक काँप रही थी और चिल्लाए जा रही थी।
''उतरो, नीचे उतरो,'' वह आदमी हड़बड़ाकर चिल्लाया और आगे बढ़कर खाट की पाटियाँ और गठरियाँ बाहर फेंकते हुए दरवाजे का डंडहरा पकड़कर नीचे उतर गया। उसके पीछे उसकी व्याकुल बेटी और फिर उसकी पत्नी, कलेजे को दोनों हाथों से दबाए हाय-हाय करती नीचे उतर गयी।
''बहुत बुरा किया है तुम लोगों ने, बहुत बुरा किया है।'' बुढ़िया ऊँचा-ऊँचा बोल रही थी—''तुम्हारे दिल में दर्द मर गया है। छोटी-सी बच्ची उसके साथ थी। बेरहमो, तुमने बहुत बुरा किया है, धक्के देकर उतार दिया है।''
गाड़ी सूने प्लेटफार्म को लाँघती आगे बढ़ गयी। डिब्बे में व्याकुल-सी चुप्पी छा गयी। बुढ़िया ने बोलना बन्द कर दिया था। पठानों का विरोध कर पाने की हिम्मत नहीं हुई।
तभी मेरी बगल में बैठे दुबले बाबू ने मेरे बाजू पर हाथ रखकर कहा—''आग है, देखो आग लगी है।''
गाड़ी प्लेटफार्म छोड़कर आगे निकल आयी थी और शहर पीछे छूट रहा था। तभी शहर की ओर से उठते धुएँ के बादल और उनमें लपलपाती आग के शोले नंजर आने लगे।
''दंगा हुआ है। स्टेशन पर भी लोग भाग रहे थे। कहीं दंगा हुआ है।''
शहर में आग लगी थी। बात डिब्बे-भर के मुसांफिरों को पता चल गयी और वे लपक-लपककर खिड़कियों में से आग का दृश्य देखने लगे।
जब गाड़ी शहर छोड़कर आगे बढ़ गयी तो डिब्बे में सन्नाटा छा गया। मैंने घूमकर डिब्बे के अन्दर देखा, दुबले बाबू का चेहरा पीला पड़ गया था और माथे पर पसीने की परत किसी मुर्दे के माथे की तरह चमक रही थी। मुझे लगा, जैसे अपनी-अपनी जगह बैठे सभी मुसांफिरों ने अपने आसपास बैठे लोगों का जायजा ले लिया है। सरदार जी उठकर मेरी सीट पर आ बैठे। नीचे वाली सीट पर बैठा पठान उठा और अपने दो साथी पठानों के साथ ऊपर वाली बर्थ पर चढ़ गया। यही क्रिया शायद रेलगाड़ी के अन्य डिब्बों में भी चल रही थी। डिब्बे में तनाव आ गया। लोगों ने बतियाना बन्द कर दिया। तीनों-के-तीनों पठान ऊपरवाली बर्थ पर एक साथ बैठे चुपचाप नीचे की ओर देखे जा रहे थे। सभी मुसांफिरों की आँखें पहले से ज्यादा खुली-खुली, ज्यादा शंकित-सी लगीं। यही स्थिति सम्भवत: गाड़ी के सभी डिब्बों में व्याप्त हो रही थी।
''कौन-सा स्टेशन था यह?'' डिब्बे में किसी ने पूछा।
''वजीराबाद,'' किसी ने उत्तर दिया।
जवाब मिलने पर डिब्बे में एक और प्रतिक्रिया हुई। पठानों के मन का तनाव फौरन ढीला पड़ गया। जबकि हिन्दू-सिक्ख मुसांफिरों की चुप्पी और ज्यादा गहरी हो गयी। एक पठान ने अपनी वास्कट की जेब में से नसवार की डिबिया निकाली और नाक में नसवार चढ़ाने लगा। अन्य पठान भी अपनी-अपनी डिबिया निकालकर नसवार चढ़ाने लगे। बुढ़िया बराबर माला जपे जा रही थी। किसी-किसी वंक्त उसके बुदबुदाते होंठ नंजर आते, लगता, उनमें से कोई खोखली-सी आवांज निकल रही है।
अगले स्टेशन पर जब गाड़ी रुकी तो वहाँ भी सन्नाटा था। कोई परिन्दा तक नहीं फड़क रहा था। हां, एक भिश्ती, पीठ पर पानी की मशकल लादे, प्लेटफार्म लांघकर आया और मुसांफिरों को पानी पिलाने लगा।
''लो, पियो पानी, पियो पानी।'' औरतों के डिब्बे में से औरतों और बच्चों के अनेक हाथ बाहर निकल आये थे।
''बहुत मार-काट हुई है, बहुत लोग मरे हैं। लगता था, वह इस मार-काट में अकेला पुण्य कमाने चला आया है।''
गाड़ी सरकी तो सहसा खिड़कियों के पल्ले चढ़ाए जाने लगे। दूर-दूर तक, पहियों की गड़गड़ाहट के साथ, खिडक़ियों के पल्ले चढाने की आवांज आने लगी।
किसी अज्ञात आशंकावश दुबला बाबू मेरे पास वाली सीट पर से उठा और दो सीटों के बीच फर्श पर लेट गया। उसका चेहरा अभी भी मुर्दे जैसा पीला हो रहा था। इस पर बर्थ पर बैठा पठान उसकी ठिठोली करने लगा—''ओ बेंगैरत, तुम मर्द ए कि औरत ए? सीट पर से उटकर नीचे लेटता ए। तुम मर्द के नाम को बदनाम करता ए।'' वह बोल रहा था और बार-बार हँसे जा रहा था। फिर वह उससे पश्तो में कुछ कहने लगा। बाबू चुप बना लेटा रहा। अन्य सभी मुसांफिर चुप थे। डिब्बे का वातावरण बोझिल बना हुआ था।
''ऐसे आदमी को अम डिब्बे में नईं बैठने देगा। ओ बाबू, अगले स्टेशन पर उतर जाओ, और जनाना डब्बे में बैटो।''
मगर बाबू की हाजिरजवाबी अपने कण्ठ में सूख चली थी। हकलाकर चुप हो रहा। पर थोड़ी देर बाद वह अपने आप उठकर सीट पर जा बैठा और देर तक अपने कपड़ों की धूल झाड़ता रहा। वह क्यों उठकर फर्श पर लेट गया था? शायद उसे डर था कि बाहर से गाड़ी पर पथराव होगा या गोली चलेगी, शायद इसी कारण खिड़कियों के पल्ले चढ़ाए जा रहे थे।
कुछ भी कहना कठिन था। मुमकिन है किसी एक मुसांफिर ने किसी कारण से खिडक़ी का पल्ला चढ़ाया हो। उसकी देखा-देखी, बिना सोचे-समझे, धड़ाधड़ खिड़कियों के पल्ले चढ़ाए जाने लगे थे।
बोझिल अनिश्चत-से वातावरण में सफर कटने लगा। रात गहराने लगी थी। डिब्बे के मुसांफिर स्तब्ध और शंकित ज्यों-के-त्यों बैठे थे। कभी गाड़ी की रंफ्तार सहसा टूटकर धीमी पड़ जाती तो लोग एक-दूसरे की ओर देखने लगते। कभी रास्ते में ही रुक जाती तो डिब्बे के अन्दर का सन्नाटा और भी गहरा हो उठता। केवल पठान निश्चित बैठे थे। हां, उन्होंने भी बतियाना छोड़ दिया था, क्योंकि उनकी बातचीत में कोई भी शामिल होने वाला नहीं था।
धीरे-धीरे पठान ऊँघने लगे जबकि अन्य मुसांफिर फटी-फटी आँखों से शून्य में देखे जा रहे थे। बुढ़िया मुंह-सिर लपेटे, टांगें सीट पर चढ़ाए, बैठी-बैठी सो गयी थी। ऊपरवाली बर्थ पर एक पठान ने, अधलेटे ही, कुर्ते की जेब में से काले मनकों की तसबीह निकाल ली और उसे धीरे-धीरे हाथ में चलाने लगा।
खिड़की के बाहर आकाश में चाँद निकल आया और चाँदनी में बाहर की दुनिया और भी अनिश्चित, और भी अधिक रहस्यमयी हो उठी। किसी-किसी वक्त दूर किसी ओर आग के शोले उठते नंजर आते, कोई नगर जल रहा था। गाड़ी किसी वक्त चिंघाड़ती हुई आगे बढ़ने लगती, फिर किसी वक्त उसकी रंफ्तार धीमी पड़ जाती और मीलों तक धीमी रंफ्तार से ही चलती रहती।
सहसा दुबला बाबू खिड़की में से बाहर देखकर ऊँची आवांज में बोला—''हरबंसपुरा निकल गया है।'' उसकी आवांज में उत्तेजना थी, वह जैसे चीखकर बोला था। डिब्बे के सभी लोग उसकी आवांज सुनकर चौंक गये। उसी वक्त डिब्बे के अधिकांश मुसांफिरों ने मानो उसकी आवांज को ही सुनकर करवट बदली।
''ओ बाबू, चिल्लाता क्यों ए?'', तसबीह वाला पठान चौंककर बोला—''इदर उतरेगा तुम? जंजीर खींचूँ?'' अैर खी-खी करके हंस दिया। जाहिर है वह हरबंसपुरा की स्थिति से अथवा उसके नाम से अनभिज्ञ था।
बाबू ने कोई उत्तर नहीं दिया, केवल सिर हिला दिया और एक-आध बार पठान की ओर देखकर फिर खिड़की के बाहर झाँकने लगा।
डब्बे में फिर मौन छा गया। तभी इंजन ने सीटी दी और उसकी एकरस रंफ्तार टूट गयी। थोड़ी ही देर बाद खटाक्-का-सा शब्द भी हुआ। शायद गाड़ी ने लाइन बदली थी। बाबू ने झाँककर उस दिशा में देखा जिस ओर गाड़ी बढ़ी जा रही थी।
''शहर आ गया है।'' वह फिर ऊँची आवांज में चिल्लाया—''अमृतसर आ गया है।'' उसने फिर से कहा और उछलकर खड़ा हो गया, और ऊपर वाली बर्थ पर लेटे पठान को सम्बोधित करके चिल्लाया—''ओ बे पठान के बच्चे! नीचे उतर तेरी मां की...नीचे उतर, तेरी उस पठान बनाने वाले की मैं...''
बाबू चिल्लाने लगा और चीख-चीखकर गालियाँ बकने लगा था। तसबीह वाले पठान ने करवट बदली और बाबू की ओर देखकर बोला—''ओ क्या ए बाबू? अमको कुच बोला?''
बाबू को उत्तेजित देखकर अन्य मुसांफिर भी उठ बैठे।
''नीचे उतर, तेरी मैं...हिन्दू औरत को लात मारता है! हरामजादे! तेरी उस...।''
''ओ बाबू, बक-बकर् नई करो। ओ ख्रजीर के तुख्म, गाली मत बको, अमने बोल दिया। अम तुम्हारा जबान खींच लेगा।''
''गाली देता है मादर...।'' बाबू चिल्लाया और उछलकर सीट पर चढ ग़या। वह सिर से पाँव तक का/प रहा था।
''बस-बस।'' सरदार जी बोले—''यह लड़ने की जगह नहीं है। थोड़ी देर का सफर बाकी है, आराम से बैठो।''
''तेरी मैं लात न तोडूं तो कहना, गाड़ी तेरे बाप की है?'' बाबू चिल्लाया।
''ओ अमने क्या बोला! सबी लोग उसको निकालता था, अमने बी निकाला। ये इदर अमको गाली देता ए। अम इसका जबान खींच लेगा।''
बुढ़िया बीच में फिर बोले उठी—''वे जीण जोगयो, अराम नाल बैठो। वे रब्ब दिए बंदयो, कुछ होश करो।''
उसके होंठ किसी प्रेत की तरह फड़फड़ाए जा रहे थे और उनमें से क्षीण-सी फुसफुसाहट सुनाई दे रही थी।
बाबू चिल्लाए जा रहा था—''अपने घर में शेर बनता था। अब बोल, तेरी मैं उस पठान बनाने वाले की...।''
तभी गाड़ी अमृतसर के प्लेटफार्म पर रुकी। प्लेटफार्म लोगों से खचाखच भरा था। प्लेटफार्म पर खडे लोग झाँक-झाँक कर डिब्बों के अन्दर देखने लगे। बार-बार लोग एक ही सवाल पूछ रहे थे—''पीछे क्या हुआ है? कहा/ पर दंगा हुआ है?''
खचाखच भरे प्लेटफार्म पर शायद इसी बात की चर्चा चल रही थी कि पीछे क्या हुआ है। प्लेटफार्म पर खड़े दो-तीन खोंमचे वालों पर मुसांफिर टूटे पड़ रहे थे। सभी को सहसा भूख और प्यास परेशान करने लगी थी। इसी दौरान तीन-चार पठान हमारे डिब्बे के बाहर प्रकट हो गये और खिड़की में से झाँक-झाँक कर अन्दर देखने लगे। अपने पठान साथियों पर नंजर पड़ते ही वे उनसे पश्तो में कुछ बोलने लगे। मैंने घूमकर देखा, बाबू डिब्बे में नहीं था। न जाने कब वह डिब्बे में से निकल गया था। मेरा माथा ठिनका। गुस्से में वह पागल हुआ जा रहा था। न जाने क्या कर बैठे! पर इस बीच डिब्बे के तीनों पठान, अपनी-अपनी गठरी उठाकर बाहर निकल गये और अपने पठान साथियों के साथ गाड़ी के अगले डिब्बे की ओर बढ़ गये। जो विभाजन पहले प्रत्येक डिब्बे के भीतर होता रहा था, अब सारी गाड़ी के स्तर पर होने लगा था।
खोंमचे वालों के इर्द-गिर्द भीड़ छंटने लगी। लोग अपने-अपने डिब्बों में लौटने लगे। तभी सहसा एक ओर से मुझे वह बाबू आता दिखाई दिया। उसका चेहरा अभी भी बहुत पीला था और माथे पर बालों की लट झूल रही थी। नजदीक पहुँचा, तो मैंने देखा, उसने अपने दाएं हाथ में लोहे की एक छड़ उठा रखी थी। जाने वह उसे कहाँ मिल गयी थी! डिब्बे में घुसते समय उसने छड़ को अपनी पीठ के पीछे कर लिया और मेरे साथ वाली सीट पर बैठने से पहले उसने हौले से छड़ को सीट के नीचे सरका दिया। सीट पर बैठते ही उसकी आँखें पठान को देख पाने के लिए ऊपर को उठीं। पर डिब्बे में पठानों को न पाकर वह हड़बड़ाकर चारों ओर देखने लगा।
''निकल गये हरामी, मादर...सब-के-सब निकल गये!'' फिर वह सिटपिटा कर उठ खड़ा हुआ चिल्लाकर बोला—''तुमने उन्हें जाने क्यों दिया? तुम सब नामर्द हो, बुजदिल!''
पर गाड़ी में भीड़ बहुत थी। बहुत-से नये मुसांफिर आ गये थे। किसी ने उसकी ओर विशेष ध्यान नहीं दिया।
गाड़ी सरकने लगी तो वह फिर मेरी वाली सीट पर आ बैठा, पर वह बड़ा उत्तेजित था और बराबर बड़बड़ाए जा रहा था।
धीरे-धीरे हिचकोले खाती गाड़ी आगे बढ़ने लगी। डिब्बे में पुराने मुसांफिरों ने भरपेट पूरियाँ खा ली थीं और पानी पी लिया था और गाड़ी उस इलाके में आगे बढ़ने लगी थी, जहाँ उनके जान-माल को खतरा नहीं था।
नये मुसांफिर बतिया रहे थे। धीरे-धीरे गाड़ी फिर समतल गति से चलने लगी थी। कुछ ही देर बाद लोग ऊँघने भी लगे थे। मगर बाबू अभी भी फटी-फटी आँखों से सामने की ओर देखे जा रहा था। बार-बार मुझसे पूछता कि पठान डिब्बे में से निकलकर किस ओर को गये हैं। उसके सिर पर जनून सवार था।
गाड़ी के हिचकोलों में मैं खुद ऊँघने लगा था। डिब्बे में लेट पाने के लिए जगह नहीं थी। बैठे-बैठे ही नींद में मेरा सिर कभी एक ओर को लुढ़क जाता, कभी दूसरी ओर को। किसी-किसी वक्त झटके से मेरी नींद टूटती, और मुझे सामने की सीट पर अस्त-व्यस्त से पड़े सरदार जी के खर्राटे सुनाई देते। अमृतसर पहुँचने के बाद सरदार जी फिर से सामने वाली सीट पर टाँगे पसारकर लेट गये थे। डिब्बे में तरह-तरह की आड़ी-तिरछी मुद्राओं में मुसांफिर पड़े थे। उनकी बीभत्स मुद्राओं को देखकर लगता, डिब्बा लाशों से भरा है। पास बैठे बाबू पर नंजर पड़ती तो कभी तो वह खिड़की के बाहर मुंह किये देख रहा होता, कभी दीवार से पीठ लगाए तनकर बैठा नंजर आता।
किसी-किसी वंक्त गाड़ी किसी स्टेशन पर रुकती तो पहियों की गडग़ड़ाहट बन्द होने पर निस्तब्धता-सी छा जाती। तभी लगता, जैसे प्लेटफार्म पर कुछ गिरा है, या जैसे कोई मुसांफिर गाड़ी में से उतरा है और मैं झटके से उठकर बैठ जाता।
इसी तरह जब एक बार मेरी नींद टूटी तो गाड़ी की रंफ्तार धीमी पड़ गयी थी, और डिब्बे में अ/धेरा था। मैंने उसी तरह अधलेटे खिड़की में से बाहर देखा। दूर, पीछे की ओर किसी स्टेशन के सिगनल के लाल कुमकुमे चमक रहे थे। स्पष्टत: गाड़ी कोई स्टेशन लाँघ कर आयी थी। पर अभी तक उसने रंफ्तार नहीं पकड़ी थी।
डिब्बे के बाहर मुझे धीमे-से अस्फुट स्वर सुनाई दिए। दूर ही एक धूमिल-सा काला पुंज नंजर आया। नींद की खुमारी में मेरी आँखें कुछ देर तक उस पर लगी रहीं, फिर मैंने उसे समझ पाने का विचार छोड़ दिया। डिब्बे के अन्दर अँधेरा था, बत्तियाम् बुझी हुई थीं, लेकिन बाहर लगता था, पौ फटने वाली है।
मेरी पीठ-पीछे, डिब्बे के बाहर किसी चीज को खरोचने की-सी आवांज आयी। मैंने दरवांजे की ओर घूमकर देखा। डिब्बे का दरवांजा बन्द था। मुझे फिर से दरवाजा खरोंचने की आवांज सुनाई दी। फिर, मैंने साफ-साफ सुना, लाठी से कोई डिब्बे का दरवाजा पटपटा रहा था। मैंने झाँककर खिड़की के बाहर देखा। सचमुच एक आदमी डिब्बे की दो सीढ़ियाँ चढ़ आया था। उसके कन्धे पर एक गठरी झूल रही थी, और हाथ में लाठी थी और उसने बदरंग-से कपड़े पहन रखे थे और उसके दाढ़ी भी थी। फिर मेरी नंजर बाहर नीचे की ओर आ गयी। गाड़ी के साथ-साथ एक औरत भागती चली आ रही थी, नंगे पाँव, और उसने दो गठरियाँ उठा रखी थीं। बोझ के कारण उससे दौड़ा नहीं जा रहा था। डिब्बे के पायदान पर खडा आदमी बार-बार उसकी ओर मुड़कर देख रहा था और हाँफता हुआ कहे जा रहा था—''आ जा, आ जा, तू भी चढ़ आ, आ जा!''
दरवाजे पर फिर से लाठी पटपटाने की आवांज आयी—''खोलो जी दरवांजा, खुदा के वास्ते दरवांजा खोलो।''
वह आदमी हांफ रहा था—''खुदा के लिंजए दरवाजा खोलो। मेरे साथ में औरत जात है। गाड़ी निकल जाएगी...''
सहसा मैंने देखा, बाबू हड़बड़ाकर उठ खड़ा हुआ और दरवाजे के पास जाकर दरवाजे में लगी खिड़की में से मुंह बाहर निकालकर बोला—''कौन है? इधर जगह नहीं है।''
बाहर खड़ा आदमी फिर गिड़गिड़ाने लगा—''खुदा के वास्ते दरवाजा खोलो। गाड़ी निकल जाएगी।...''
और वह आदमी खिड़की में से अपना हाथ अन्दर डालकर दरवाजा खोल पाने के लिए सिटकनी टटोलने लगा।
''नहीं है जगह, बोल दिया, उतर जाओ गाड़ी पर से।'' बाबू चिल्लाया और उसी क्षण लपककर दरवांजा खोल दिया।
''या अल्लाह! उस आदमी के अस्फुट-से शब्द सुनाई दिए। दरवाजा खुलने पर जैसे उसने इत्मीनान की सांस ली हो।''
और उसी वक्त मैंने बाबू के हाथ में छड़ चमकते देखा। एक ही भरपूर वार बाबू ने उस मुसांफिर के सिर पर किया था। मैं देखते ही डर गया और मेरी टांगें लरज गयीं। मुझे लगा, जैसे छड़ के वार का उस आदमी पर कोई असर नहीं हुआ। उसके दोनों हाथ अभी भी जोर से डंडहरे को पकड़े हुए थे। कन्धे पर से लटकती गठरी खिसटकर उसकी कोहनी पर आ गयी थी।
तभी सहसा उसके चेहरे पर लहू की दो-तीन धारें एक साथ फूट पड़ीं। मुझे उसके खुले होंठ और चमकते दाँत नंजर आये। वह दो-एक बार 'या अल्लाह!' बुदबुदाया, फिर उसके पैर लडख़ड़ा गये। उसकी आँखों ने बाबू की ओर देखा, अधमुंदी-सी आँखें, जो धीर-धीरे सिकुड़ती जा रही थीं, मानो उसे पहचानने की कोशिश कर रही हों कि वह कौन है और उससे किस अदावत का बदला ले रहा है। इस बीच अँधेरा कुछ और छन गया था। उसके होंठ फिर से फड़फड़ाये और उनमें सफेद दाँत फिर से झलक उठे। मुझे लगा, जैसे वह मुस्कराया है, पर वास्तव में केवल क्षय के ही कारण होंठों में बल पड़ने लगे थे।
नीचे पटरी के साथ-साथ भागती औरत बड़बड़ाए और कोसे जा रही थी। उसे अभी भी मालूम नहीं हो पाया था कि क्या हुआ है। वह अभी भी शायद यह समझ रही थी कि गठरी के कारण उसका पति गाड़ी पर ठीक तरह से चढ़ नहीं पा रहा है, कि उसका पैर जम नहीं पा रहा है। वह गाड़ी के साथ-साथ भागती हुई, अपनी दो गठरियों के बावजूद अपने पति के पैर पकड़-पकड़कर सीढ़ी पर टिकाने की कोशिश कर रही थी।
तभी सहसा डण्डहरे से उस आदमी के दोनों हाथ छूट गये और वह कटे पेड़ की भाँति नीचे जा गिरा। और उसके गिरते ही औरत न भागना बन्द कर दिया, मानो दोनों का सफर एक साथ ही खत्म हो गया हो।
बाबू अभी भी मेरे निकट, डिब्बे के खुले दरवाजे में बुत-का-बुत बना खड़ा था, लोहे की छड अभी भी उसके हाथ में थी। मुझे लगा, जैसे वह छड़ को फेंके देना चाहता है लेकिन उसे फेंक नहीं पा रहा, उसका हाथ जैसे उठ नहीं रहा था। मेरी सांस अभी भी फूली हुई थी और डिब्बे के अँधियारे कोने में मैं खिड़की के साथ सटकर बैठा उसकी ओर देखे जा रहा था।
फिर वह आदमी खड़े-खड़े हिला। किसी अज्ञात प्रेरणावश वह एक कदम आगे बढ़ आया और दरवांजे में से बाहर पीछे की ओर देखने लगा। गाड़ी आगे निकलती जा रही थी। दूर, पटरी के किनारे अँधियारा पुंज-सा नंजर आ रहा था।
बाबू का शरीर हरकत में आया। एक झटके में उसने छड़ को डिब्बे के बाहर फेंक दिया। फिर घूमकर डिब्बे के अन्दर दाएं-बाएं देखने लगा। सभी मुसांफिर सोये पड़े थे। मेरी ओर उसकी नंजर नहीं उठी।
थोड़ी देर तक वह खड़ा डोलता रहा, फिर उसने घूमकर दरवांजा बन्द कर दिया उसने ध्यान से अपने कपड़ों की ओर देखा, अपने दोनों हाथों की ओर देखा, फिर एक-एक करके अपने दोनों हाथों को नाक के पास ले जाकर उन्हें सूंघा, मानो जानना चाहता हो कि उसके हाथों से खून की बू तो नहीं आ रही है। फिर वह दबे पांव चलता हुआ आया और मेरी बगलवाली सीट पर बैठ गया।
धीरे-धीरे झुटपुटा छंटने लगा, दिन खुलने लगा। साफ-सुथरी-सी रोशनी चारों ओर फैलने लगी। किसी ने जंजीर खींचकर गाड़ी को खड़ा नहीं किया था, छड़ खाकर गिरी उसकी देह मीलों पीछे छूट चुकी थी। सामने गेहूं के खेतों में फिर से हल्की-हल्की लहरियाँ उठने लगी थीं।
सरदार जी बदन खुजलाते उठ बैठे। मेरी बगल में बैठा बाबू दोनों हाथ सिर के पीछे रखे सामने की ओर देखे जा रहा था। रात-भर में उसके चेहरे पर दाढ़ी के छोटे-छोटे बाल उग आये थे। अपने सामने बैठा देखकर सरदार उसके साथ बतियाने लगा—''बड़े जीवट वाले हो बाबू, दुबले-पतले हो, पर बड़े गुर्दे वाले हो। बड़ी हिम्मत दिखायी है। तुमसे डर कर ही वे पठान डिब्बे में से निकल गये। यहाँ बने रहते तो एक-न-एक की खोपड़ी तुम जरूर दुरुस्त कर देते...'' और सरदार जी हँसने लगे।

बाबू जवाब में मुसकराया—एक वीभत्स-सी मुस्कान, और देर तक सरदार जी के चेहरे की ओर देखता रहा।




                                                                                                                                                           

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                                                                                                                                                             दो लघुकथाएँ


                                                                                                                                                  फजल इमाम मल्लिक

                         सवेरा  

उस अंधेरे कमेरे में बंद ढेर सारे बच्चों के चेहरे पर दहशत की लिखी इबारत साफ़ पढ़ी जा सकती थी। अलग-अलग हिस्सों से पकड़ कर उन्हें लाया गया था और इस अंधेरे कमरे में बंद कर दिया गया था। कमरे का ताला बंद करते हुए वह सोच रहा था कि इस बार अच्छा-ख़ासा मुनाफ़ा होगा। बच्चों की तादाद ज्यादा है। एक बच्चे पर उसे कितना मिलेगा वह दिन भर यही हिसाब जोड़ता रहा। सालों से वह इस धंधा में लगा हुआ है। बच्चों को चुराना और फिर उन्हें बेच देना उसका धंधा था......बस आज की रात बीतनी थी.....कल सुबह ग्राहक आएगा और वह बच्चों को उनके हवाले कर फिर से शिकार पर निकल जाएगा........यह सब सोचते-सोचते उसे नींद आ गई। नींद बहुत ही गहरी थी। पता नहीं कितनी देर तक वह सोता रहा। नींद खुली तो रात हो चुकी थी। उसने कमरे की तरफ़ देखा। ताला उसी तरह लगा था। उसे भूख लग रही थी।
वह उठा और बाज़ार की तरफ़ निकल पड़ा। लौटते हुए अचानक उसके क़दम ठिठक कर रुक गए। कोई मज़हबी जलसा था। लोगों की भीड़ लगी थी। कोई मौलाना तक़रीर कर रहे थे। वह भी भीड़ में शामिल हो गया। यह पहला मौक़ा था जब वह इस तरह के किसी जलसे में बेमन से ही सही शरूक हुआ था। ले देकर ीद-बक़रीद की नमाज़। बस मज़हब के नाम पर काम पूरा। पता नहीं मौलाना के शब्दों में क्या था कि वह तक़रीर खत्म होने तक वहीं खड़ा रहा। लौटते हुए उसके कानों में मौलाना के शब्द गूंज रहे थे- ‘पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद ने किसी से भेदभाव नहीं किया। लोगों को ग़ुलाम बनाए जाने के वे ख़िलाफ़ थे। उन्होंने हज़रत बलाल हब्शी को ग़ुलामी से निजात दिलाई। वे इंसानी रिश्तों में मोहब्बत के क़ायल थे। सबसे बड़ी बात यह है कि हम जो ज़िंदगी जी रहे हैं वह झूट है, सच सिर्फÞ और सिर्फÞ मौत है। मरने के बाद हमें अपने कर्मों का हिसाब देना है। यह तय आपको करना है कि आप अपने साथ वहां क्या ले जाएंगे।’ बार-बार उसके सामने मौलाना के शब्द गूंज रहे थे। उसे लगा मौत उसके सामने खड़ी है और उसका हाथ ख़ाली है। ख़ुदा के यहां वह क्या लेकर जाएगा। बस यही एक लम्हा था जब रोशनी उसके अंदर फूटी और वह रास्ते में ही बैठ कर जाÞर-ज़ार रोने लगा। दिल पर जमा बरसों का मैल धुलने लगा। पता नहीं कितनी देर तक वह उसी तरह रोता रहा। आंसू थमे तो सारा मैल धुल चुका था।
रात बीत चुकी थी। तेज़-तेज़ क़दमों से चलता हुआ वह कमरे पर पहुंचा। बच्चों के कमरे का ताला खोल कर बत्ती जलाई। देखा बच्चे नींद में डूबे हैं। उनके चेहरे पर फैली मासूमियत को देख कर वह फिर रोने लगा। देर तक रोता रहा। फिर अपनी जगह से उठा। बच्चों के हाथ-पांव में बंधी रस्सियां खोलीं। उनकी जेबों में कुछ रुपए रखे। बच्चे अब भी नींद में मदहोश थे। फिर वह उन्हें उसी हाल में छोड़ कर कमरे से निकल गया.....। रात ढल रही थी और रोशनी की मधिम सी किरण धीरे-धीरे धरती पर फैल रही थी। दूर मस्जिद से फ़जिर की नमाज़ की अज़ान गूंजने लगी.....आज पहली बार उसके क़दम मस्जिद की तरफ़ उठ रहे थे.....अब उसके अंदर...बहुत अंदर एक सकून फैला था....।  








                   पनाह
 

मौलाना   साहब कभी भी उस गली से होकर नहीं गुज़रते। आख़िर शहर की सबसे बदनाम गली थी और उनके जैसा परहेज़गार आदमी उस गली की तरफ़ मुंह करना भी पसंद नहीं करेगा। वे लंबा रास्ता तय कर घर से मस्जिद आते-जाते। हालांकि इस रास्ते का इस्तेमाल कर के वे समय भी बचा सकते थे। लेकिन उन्होंने इस छोटे रास्ते से होकर घर जाने की बजाय बड़े रास्ते को ही तरजीह दिया। कितनी ही जल्दी क्यों न हो उन्होंने उस छोटे रास्ते का इस्तेमाल कभी नहीं किया। बरसों से यह उनका मामूल था.....
एक रात अशां की नमाज़ पढ़ा कर घर लौट रहे थे। उन दिनों शहर का माहौल ठीक नहीं था। बात-बात पर लोग एक-दूसरे का गला काटने पर आमादा हो जाते थे। रात ज्यादा हो गई थी। पर वे मामूल के मुताबिक़ धीरे-धीरे कÞदम धरते हुए घर की तरफ़ लौट रहे थे। छोटे से रास्ते को छोड़ कर ज्यों ही वे बड़े रास्ते की तरफ़ मुड़े गली से बदहवास सी दौड़ती एक लड़की को आते देख कर उनके क़दम ठिठक गए.......लड़की ने भी उन्हें देख लिया था। वह तीर की तरह उनकी तरफ़ आई.....मुझे बचा लें....
वे कुछ बोल भी नहीं पाए थे कि गली से चार-पांच लड़के निकले। वे उस लड़की के पीछे आए थे। उन्हें देख कर ही लग रहा था कि उनके तेवर ठीक नहीं हैं......पर मौलाना साहब को देख कर लड़के भी दूर ही रुक गए.......मौलाना ने उन लड़कों को पहचान लिया.....वे उनके मोहल्ले के ही लड़के थे.....।
मौलाना को माजरा समझते देर नहीं लगी......मौलाना के साथ खड़ी लड़की को देख कर लड़के पसोपेश में थे.....एक ने हिम्मत कर कहा ‘इसे हमारे हवाले कर दें।’
‘क्यों.....’ मौलाना ने पूछा।
‘इसे हलाल कर डालना है’। उसने फिर कहा।
‘लेकिन इसका क़सूर क्या है ?’ मौलाना ने पूछा।
‘इसका क़सूर बस इतना है कि यह हिंदू है’ इस बार दूसरे लड़के ने कहा।
‘तो क्या हुआ’ मौलाना ने बहुत शांत स्वर में कहा।
‘और मज़हब में काफ़िरों को मारने की इजाज़त है’ तीसरे ने बात को आगे बढ़ाई।
‘मज़हब को बीच में मत ला।’ अचानक मौलाना की आवाज़ तेज़ हो गई.....उन्हें इस तरह गुiस्सा करते हुए वे लड़के पहली बार देख रहे थे।
‘किस मज़हब की बात करते हो.....मज़हब ने इजाज़त दी है....’मौलाना ग़ुस्से से कांप रहे थे। ‘मज़हब ने कभी भी औरतों, बच्चों और बूढ़ों को मारने की इजाज़त नहीं दी है और बेक़सूरों को मारने की तो उसने कभी भी इजाज़त नहीं दी है। यह लड़की मेरी पनाह में है और इसकी तरफ़ हाथ क्या नज़र भी उठाने की कोशिश की तो मैं तुम लोगों की आंखें निकाल लूंगा’। फिर वे लड़की से मुख़ातिब हुए ‘चलो बेटी, तुम्हें तुम्हारे घर तक छोड़ दें’। उसे साथ लेकर वे उस छोटे रास्ते से उस गली में दाख़िल हो गए जहां अब तक उन्होंने पांव नहीं धरा था।  

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                                                                                                                                                              रूबरू
                                                                                                                                              -डा. रवीन्द्र  अग्निहोत्री


हम  भारत  के  लोग

 

 

                     दृश्य  

बात लगभग चार दशक पुरानी है. भोपाल में मौलाना आजाद  कालेज ऑफ़ टेक्नोलोजी ( एम् ए  सी टी ) की  स्थापना हुई ही  थी और भोपाल में ही रहने वाला मेरा भांजा वहीँ से  इंजीनियरिंग  का कोर्स कर रहा था . छुट्टियों में  मेरे पास जयपुर  आया.  बाज़ार से सामान  लाने और  दौड़ - भाग के काम करने में उसकी विशेष रुचि थी. अतः  मेरी पत्नी ने बाज़ार से  सब्जी - फल   आदि लाने के   लिए उससे  कहा.  उसने कागज़ - पेन उठाया और बोला  हाँ,  मामी जी, बोलिए,  क्या - क्या लाना है. पत्नी बोल रही थीं -  आलू , मटर,  फूलगोभी धनिया , सेव ,  केला -------- .  वह  लिखता जा रहा था.  जब वह लिख चुका तो मैंने उससे  वह कागज़ माँगा . उसने  कागज़ पर रोमन में  लिखा था  -aaloo , matar , gobhi , dhania ,   ........  मैंने झिड़कते हुए  कहा ,' वीरेन्द्र , यह क्या  है  ?   यह कौन सी भाषा है ?  क्या ये अंग्रेजी के शब्द  हैं जो  तुमने अंग्रेजी की  रोमन लिपि में लिखे हैं ?  अगर तुम  इनके  अंग्रेजी  नाम लिखते तो  मैं यह मान लेता कि तुम अंग्रेजी शब्दों का अभ्यास कर रहे हो ; पर  ये  नाम हिंदी के और लिपि अंग्रेजी की ? आधा तीतर आधा बटेर ! ‘ 

वह मुस्कराते हुए बोला, बस मामा जी, ऐसे ही लिख लिए. मैंने उसे  आगे से ध्यान रखने की नसीहत  दे डाली.  





 




                       दृश्य  २ 

बात लगभग तीन दशक  पुरानी है.  भारतीय  स्टेट बैंक के केन्द्रीय  कार्यालय , मुंबई  में राजभाषा विभाग के अध्यक्ष  के रूप में  काम  करते  हुए तरह - तरह के मित्र बने. उन्हीं में एक वरिष्ठ अधिकारी थे - श्री गुप्ता, जो मूल निवासी  इलाहाबाद  के थे पर  उस समय मुंबई में थे. बाद में उनका स्थानान्तरण लखनऊ हो गया.  हंसी में बोले, ससुराल जा रहा हूँ.  पता चला, लखनऊ में उनकी ससुराल है . कुछ समय बाद बैंक के ही काम से मेरा  लखनऊ जाना हुआ तो उनसे भी भेंट हुई . उन्होंने अत्यंत आग्रहपूर्वक घर  पर भोजन के लिए आमंत्रित किया. उनके घर  जाने का यह मेरा पहला अवसर था. घर पहुंचा ही था कि  उनकी १२ - १३ वर्ष की बेटी पानी   लेकर कमरे में आई. मित्र ने उसे  मेरा परिचय देते हुए कहा, बेटा, यह डाक्टर अग्निहोत्री हैं, यू नो, व्हेन वी  वर  इन बॉम्बे ........ इसके बाद गुप्ता जी ने उसे सारा परिचय अंग्रेजी में  दिया. बेटी  बड़े आदरपूर्वक मुझसे बात करने लगी . वह एक कान्वेंट स्कूल में नवीं कक्षा की छात्रा  थी. मैं हिंदी में बोल रहा था, पर वह लगभग सारे समय अंग्रेजी में ही बोलती रही. स्कूल की मैगेजीन में उसकी कुछ रचनाएं  छपी थीं. उसने वे  दिखाईं . मैंने उनकी  प्रशंसा करते हुए पूछा, क्या हिंदी में भी कुछ लिखती हो ? उसने मना किया. मैंने जब  उससे यह   पूछा कि   कोर्स की किताबों के अलावा  भी  तुम कुछ  पढ़ती हो, तो  उसने  अंग्रेजी की ही  कुछ  पुस्तकों / मैगजीनों के नाम  बताए. मैंने पूछा   धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान,  सरिता, मुक्ता  आदि भी पढ़ती हो ?   उसने मुस्कराकर धीरे से  सिर हिलाकर  मना कर  दिया. मैंने फिर पूछा , हिंदी की मैगेजीन  तुम्हारे  स्कूल में  आती तो होंगीं ? उसने फिर न की मुद्रा में सिर हिला दिया . "और  घर पर ?"  मेरे इस प्रश्न के उत्तर में गुप्ता जी बोल पड़े " असल में वाइफ को  अंग्रेजी ही पसंद है. सो घर पर अंग्रेजी की ही मैगेजीन लेते हैं."

इलाहाबाद , लखनऊ से सम्बन्ध रखने वाले  उत्तर प्रदेश के  एक संपन्न परिवार में हिंदी  की यह स्थिति देख कर  मेरा मन विषाद से भर गया. मैं वहां भोजन करने गया था. भोजन तो किया,  पर  अत्यंत प्रेम से,  वास्तव  में  अत्यंत  प्रेम से  खिलाए हुए  उस स्वादिष्ट भोजन का भरपूर आनंद  नहीं ले सका क्योंकि मन कहीं और खो गया था .




 

 

                       दृश्य  ३

संसदीय राजभाषा समिति  ऐसी समिति है जिसके ' आतंक ' के बल पर ही  केन्द्रीय सरकार से संबंधित कार्यालयों में  हिंदी का कुछ  ' प्रवेश '   हो सका  है. समिति   विभिन्न कार्यालयों में जाती है और  इस बात पर जोर देती है कि  हिंदी का अधिक से अधिक प्रयोग किया जाए . जहाँ केवल हिंदी का प्रयोग संभव न हो वहां हिंदी - अंग्रेजी  दोनों भाषाओं का  एक साथ प्रयोग किया जाए. केवल अंग्रेजी का  प्रयोग देखते ही माननीय सदस्यों की भवें तन जाती हैं और जिह्वा  पर उतर  आती है  ' संसदीय - सरस्वती '  (यह उस सरस्वती से भिन्न है जिसकी सामान्य व्यक्ति उपासना करता है ).  नई संसद के गठन के साथ समिति के सदस्य भी   बदलते रहते हैं. इंदिरा जी तब प्रधानमंत्री  थीं जिनके बारे में प्रसिद्ध है कि घर में तो सामान्यतया  हिंदी का प्रयोग करती  ही  थीं, सरकार के  कामों में  भी हिंदी के प्रयोग को प्रोत्साहित करना चाहती थीं. जिस समिति की चर्चा कर रहा हूँ, उसकी एक सदस्य मेरे मित्र की पत्नी थीं. हिन्दीभाषी क्षेत्र के  निवासी  मेरे वे  मित्र  हिंदी के एक प्रसिद्ध साहित्यकार  थे और इसी कारण उन्हें  एक राजनीतिक दल ने महत्वपूर्ण स्थान दे दिया था. उनके देहांत के बाद उनकी पत्नी को राज्य सभा का सदस्य भी  बना दिया. भारतीय स्टेट बैंक के एक प्रशिक्षण संस्थान का निरीक्षण करते हुए उन्होंने वहां तैयार किए गए प्रशिक्षण साहित्य की एक प्रति अपने लिए माँगी पर उसके भारी - भरकम  आकार को देखते हुए यह इच्छा व्यक्त की कि इसे उनके घर के पते पर डाक से  भिजवा दिया जाए . मैंने उनसे घर का पता  माँगा तो उन्होंने अपना विजिटिंग कार्ड  मुझे दिया. वह केवल अंग्रेजी में था. मुझसे रहा नहीं गया . मैंने कहा, " आपका कार्ड केवल अंग्रेजी में ? यह तो आँखों को चुभ रहा है . " पर उनका उत्तर तो दिल को भी चुभने लगा . वे बोलीं, " अरे, वह क्या है कि बेटे ने छपवा दिया. अब ऐसा है न कि घर में तो अंग्रेजी  ही चलती है ."

 

मैं अवाक रह गया . जो समिति सरकारी कार्यालयों में  हिंदी को प्रतिष्ठित  करने के लिए यहाँ - वहां  दौड़ रही है  उसके  सदस्य के घर में  अंग्रेजी  ही चलती  है , और यह घर उस साहित्यकार का ही  घर  है जिसे  और  जिसकी पत्नी को  यानी जिसके  परिवार को  हिंदी  के कारण  ही यह सम्मान  मिला है !  दुखवा  मैं कासे कहूँ  ...........  

 

 
 

 

 

                      दृश्य  

पिछले कुछ समय से मैं आस्ट्रेलिया में हूँ.  प्रवासी  भारतीय  यहाँ काफी संख्या में हैं और  भारत के लगभग हर राज्य से  हैं.  अगर आंकड़ों की बात की जाए तो डेढ़ लाख से  भी अधिक  हैं  ( इसमें वे लोग शामिल नहीं हैं जो अध्ययन करने  या घूमने आए  हैं ) .  प्रायः  सभी सुशिक्षित  और प्रतिष्ठित  हैं . कुछ  नौकरी  कर रहे हैं  तो कुछ व्यवसाय कर रहे हैं . अनेक  भारतीय   लोग   परस्पर संपर्क बनाए रखने   और   आस्ट्रेलियाई  समाज में  " अपनी पहचान "  बनाए रखने की  दृष्टि से  पत्रिकाएं भी निकाल रहे हैं जो  लगभग सभी  इंटरनेट  पर भी   उपलब्ध  हैं और  मुद्रित  भी  की  जाती  हैं  जिनमें से कुछ  तो     १५ हज़ार  से भी  अधिक संख्या में  छापी  जाती  हैं .  ये पत्रिकाएं बेची नहीं जातीं ,  मुफ्त बांटी जाती हैं . विभिन्न संपर्क स्थलों  ( जैसे, इंडियन स्टोर ) पर   रखी रहती हैं .  मैं मेलबर्न के निकट हूँ . अतः मेलबर्न से  निकलने वाली  लगभग दस पत्रिकाओं  में जब   मैंने यह जानने का प्रयास किया कि वे किस   भाषा में निकलती हैं तो  पाया कि   एक - दो   पंजाबी, गुजराती , तेलेगु  भाषा की पत्रिकाओं को छोड़   सभी अंग्रेजी में हैं . केवल एक पत्रिका ऐसी मिली जो है तो अंग्रेजी में ही ,  पर उसमें एक छोटा - सा हिंदी  खंड   भी है.  अन्य किसी पत्रिका का  हिंदी से कोई  सरोकार नहीं,  फिर  चाहे वह पंजाबी,  गुजराती या तेलेगु  की ही पत्रिका क्यों न हो ; बल्कि  एक पत्रिका तो ऐसी  मिली जिसके दो  भाषाओं  में  अलग - अलग संस्करण  निकल रहे हैं, पर भाषाएँ हैं - गुजराती और अंग्रेजी. यानी दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता कि  विदेशों में भी हम या तो  पंजाबी - गुजराती  आदि हैं या फिर  अंग्रेजी - भाषी ' इंडियन ' .  स्पष्ट है कि    " भारतीय " यहाँ भी नहीं है . हमारी इस मानसिकता  की   एक  परिणति यह भी हुई  कि  यहाँ की सरकार ने विदेशों से आए लोगों को उनकी ही भाषा में आवश्यक सूचनाएं उपलब्ध कराने की जो प्रमुख -व्यवस्था  लगभग  पंद्रह  भाषाओं में  की  हुई है और  जिसका वह तरह - तरह से विज्ञापन भी करती है, उसमें   चीन की   केंटोनीज  और  मंदारिन -  दो  भाषाएँ  हैं ( चीन  के   प्रवासियों  की संख्या भी  यहाँ   लगभग दो लाख है  ) , और  योरूप की  क्रोशियन , पोलिश , मेसिडोनियन  जैसी कई ऐसी  भाषाएँ  भी हैं   जहाँ के लगभग ५०  हज़ार  या  उससे  भी  काफ़ी कम  लोग  यहाँ रहते हैं ;  पर डेढ़ लाख से अधिक  भारतीयों की   कोई भाषा नहीं है . हो भी क्यों, क्योंकि यहाँ तो  कोई " भारतीय " है  ही  नहीं. जो  हैं वे "इंडियन " हैं , उनकी भाषा अब अंग्रेजी ही है . वे स्वयं " अपनी " भाषाओँ को भूल चुके हैं  तो  विदेशी  उन  " विस्मृत "  भाषाओँ की  याद  क्यों  करें ? 

ये दृश्य अपनी भाषा के प्रति हम भारत के लोगों की ,  विशेष  रूप  से  हिंदी - भाषियों  की  मानसिकता की बानगी मात्र  हैं , पूरा परिदृश्य नहीं .  ये  बता रहे हैं कि   ' भाषा '  और ' लिपि ' दोनों ही स्तरों  पर हिंदी  हमारे निजी  जीवन से   धीरे - धीरे किस प्रकार  गायब होती जा  रही है . अंग्रेजी पढ़ने वाली पुरानी पीढ़ी के जीवन में अपनी भाषा  के लिए  जो स्थान शेष रह गया था,  अब स्वतंत्र भारत में " अंग्रेजी माध्यम " से  पढ़ने वाली पीढ़ी में वह भी नहीं बचा है . तभी तो  घर में बच्चों को  हम   अब ' सब्जी - फल '  नहीं ,  ' Vegetables   - Fruits   '  खिलाते  हैं , ' आम ,  अंगूर,   केला '  नहीं,  '  Mango ,  Grapes , Banana  '  देते  हैं . ' चावल    परोसते  '  नहीं ,  ' Rice  serve '  करते  हैं .  इसी मानसिकता के कारण हिंदी हमारे  सामाजिक जीवन  से भी हटती जा  रही है . तथाकथित हिन्दीभाषी प्रदेशों  के किसी भी शहर  की आवासीय कालोनी   या बाज़ार में चले जाइए .  घर के बाहर लगे  नाम पट  (नेम  प्लेट ) और दुकानों के बोर्ड पर नज़र डालिए . जो  नाम पट / बोर्ड हिंदी में दिखाई दे जाएंगे,  वे  आपको अपवाद  जैसे  ही लगेंगे  क्योंकि  प्रमुखता तो  अंग्रेजी की  ही मिलेगी ; और  अब जो नए बाज़ार बने हैं - " मॉल ", वहां तो हिंदी का जैसे प्रवेश ही वर्जित है. उनके सारे बोर्ड  और   वहां  बिकने  वाली  चीज़ों के नाम  सब अंग्रेजी में होते हैं. हम खरीदते हैं लौकी , करेला, आंवला ; वह अंग्रेजी में रसीद देता है  ' Bottle Gourd , Bitter Gourd , Indian Gooseberry .  हिंदी  का  कोई  सिनेमा  देखिए या   टी. वी. पर  निजी चैनलों के विभिन्न हिंदी कार्यक्रम देखिए.  सिनेमा / सीरियल / कार्यक्रम  हिंदी  का  है ,  पर  पात्रों  के नामों का ,  कार्यक्रम बनाने में विभिन्न सहयोगियों  के नामों  का  परिचय   आदि  हिंदी  में  पाने  की  तो आप कल्पना कर ही नहीं सकते. हिंदी फिल्मों  के पुरस्कार वितरण समारोह  में  पुरस्कार देने और लेने वाले दोनों ही अपनी अंग्रेजी सुनाकर अपने को भी  धन्य करते हैं और हमें भी. संविधान  के प्रावधानों का पालन सरकार नहीं कर रही है, यह शिकायत तो हम हमेशा करते हैं, पर शिकायत करने के अलावा  भी क्या  हम  कुछ कर रहे हैं ?  कभी यह भी विचार किया है कि यह संविधान है किसके लिए ?  संविधान के प्रारंभ में  दी " उद्देशिका " ( Preamble )  पढ़ी है  जहाँ कहा गया है ,   " हम भारत के लोग ......... आत्मार्पित करते हैं. "   इसी  संविधान के दिए अधिकार से  सरकार हम  ही तो चुनते हैं . प्रतिनिधियों को चुनते समय भी क्या हमें  कभी  अपनी शिकायत याद आती है ?   

 

 समाज - भाषावैज्ञानिकों का कहना है कि कोई भी भाषा  निरंतर उपयोग के द्वारा ही किसी समाज में जीवित रहती है और तभी वह  सामाजिक प्रयोग एवं शिक्षा  के द्वारा  आगामी पीढ़ी को  हस्तांतरित की जाती है ; पर यदि  किसी भाषा के प्रयोगकर्ता   उस भाषा  का प्रयोग  करना  बंद कर देते हैं तो  वह ' मर '  जाती है . शिकागो यूनिवर्सिटी  के भाषावैज्ञानिक सलिकोको  मुफ्वेने  ( Salikoko  Mufwene ) के शब्दों  में  तो  इसे कुछ  ऐसा ही समझिए  जैसे   किसी समाज के सदस्य   संतान को जन्म देना ही बंद कर  दें और   कालान्तर  में वह    समाज   नष्ट हो जाए.  " Languages do not kill languages; speakers do. A language is transmitted and maintained in a community through continuous use. Languages die when their speakers give them up. It is like having a population whose members refuse to produce offspring." आज अनेक भाषाओं की इस दुर्दशा के लिए उन्होंने यूरोपीय देशों के विगत चार सौ वर्षों के उपनिवेश वाद को ज़िम्मेदार बताया है, " How do populations find themselves in such predicaments? For the past 400 years, European colonization has been the main culprit. " Languages don't kill languages; speakers do ".

 

क्या  संयोग  है  कि  जिन  यूरोपीय लोगों ने   उपनिवेश  बनाए  और  वहां   अपनी भाषा की श्रेष्ठता का  मायाजाल  फैलाया ,  अब   उन्हीं  के वंशज   समाज-भाषावैज्ञानिक  के  रूप  में  उसकी वास्तविकता , और  उसके  कारण  उत्पन्न  हो रहे  खतरों के  प्रति    विश्व   को  सावधान  कर रहे हैं.  कोपनहागन  बिज़नेस स्कूल के डॉ. राबर्ट फिलिप्सन ( Dr   Robert Philipson )  ने   अंग्रेजी  के  सन्दर्भ में   विशेष  चर्चा  अपनी  अनेक पुस्तकों में,  विशेष  रूप  से  " Linguistic Imperialism " (१९९२)   नामक   पुस्तक के अध्याय २ और ३ में विस्तार की  है. साथ  ही,   उपनिवेश  समाप्त हो  जाने के बाद  उस   मायाजाल  को  सुरक्षा कवच प्रदान करने  में   ब्रिटिश काउन्सिल, अंतर-राष्ट्रीय मुद्रा कोष , विश्व बैंक , अंग्रेजी भाषा के स्कूल ,  विभिन्न   अमरीकी संगठन  आदि जो  भूमिका  निभा रहे हैं ,  वह भी एक पृथक  अध्याय में    स्पष्ट  की है.  इतना ही  नहीं,   . अंग्रेजी पढ़ाने की विधियों को लेकर जो ' मिथक '  विकसित किए गए हैं , उनकी भी उन्होंने गहन  परीक्षा की है  और उन्हें ' भ्रम '  सिद्ध   किया  है  ( जैसे, अंग्रेजी को अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ाना चाहिए,  अंग्रेजी पढ़ाने वाला शिक्षक अंग्रेज़ भाषी होना चाहिए,  अंग्रेजी पढ़ना जितनी जल्दी  शुरू  किया  जाएगा,  परिणाम  उतने ही अच्छे आएंगे,    अंग्रेजी  जितनी  अधिक पढ़ाई जाएगी, परिणाम उतने ही अच्छे होंगे,  यदि अंग्रेजी के अध्ययन के साथ  दूसरी भाषाएँ भी पढ़ाई जाएंगी  तो अंग्रेजी का स्तर गिरेगा  आदि). पर हम लोगों की दृष्टि तो  इस मायाजाल की चकाचौंध में इतनी चौंधिया गई है कि हम इसके पार कुछ देख ही नहीं पा रहे हैं. परिणाम यह है कि हमारी भाषाएँ उस  मृत्यु  की ओर बढ़ती जा रही हैं जिसकी चर्चा भाषा - वैज्ञानिक कर रहे हैं .  

समाज -  भाषावैज्ञानिकों  ने यह  भी  स्पष्ट  किया     है  कि   भाषा के ' मरने ' की यह   प्रक्रिया  इतनी  धीमी  होती है  कि जल्दी  पकड़ में नहीं आती . वास्तविकता  यह  है  कि    प्रयोगकर्ता  स्वेच्छया  अपनी भाषा का प्रयोग करना बंद नहीं करते ,  उन्हें ऐसा  प्रायः  विवशता में  इसलिए करना पड़ता है क्योंकि दूसरी भाषा से उन्हें  कुछ व्यावहारिक - भौतिक लाभ मिलते हैं . जैसे,  किसी बड़े  समाज  के साथ  समन्वय करना,   कोई अच्छी  नौकरी या  व्यवसाय पाना,   सामाजिक - आर्थिक  उन्नति के अवसर मिलना  आदि.   कभी - कभी वे  कतिपय सामान्य कामों के लिए  अपनी पैतृक भाषा को भी बचाए रखते हैं ,  पर विशिष्ट कामों के लिए  अधिक  लाभ देने  वाली  भाषा का ही प्रयोग  करते  हैं .   इस स्थिति में   इनकी पैतृक भाषा के मरने  की  प्रक्रिया  कुछ  धीमी  अवश्य   हो जाती है ,  पर  अन्दर  ही  अन्दर   वह   कमज़ोर  उसी  प्रकार होती चली   जाती है  जैसे किसी को क्षय रोग ( टी. बी )   हो जाए और उसका स्वास्थ्य धीरे - धीरे   कमज़ोर होता जाए  क्योंकि किसी भी  भाषा के विकास  और पुष्टि  के  लिए  दो  बातें   अत्यंत  आवश्यक  हैं. सबसे  पहली तो  यह  कि उसके   प्रयोग का  उत्तरदायित्व   नई  पीढी  संभाले ; और  दूसरी  यह  कि उसका  प्रयोग  केवल   कविता,  कहानी  आदि  के  पारंपरिक  कामों  के  लिए नहीं,  निरंतर    नए - नए  कामों के  लिए  किया  जाए, ज्ञान -  विज्ञान के विभिन्न  क्षेत्रों  के लिए  किया जाए, व्यापार -  वाणिज्य  के  लिए  किया जाए . यदि  ऐसा  नहीं किया जाता  और  केवल पुरानी  पीढ़ी के लोग  ही  अपने कतिपय  पारम्परिक कार्यों के लिए उस भाषा का प्रयोग करते हैं  तो  ज्यों - ज्यों  यह  पुरानी  पीढ़ी समाप्त होती  जाती है,  वह भाषा भी  ' मरती ' जाती है .  ( द्रष्टव्य  :  Andrew  Dalby :    Language in Danger ; The Loss of Linguistic Diversity and the Threat to Our Future   ;  Columbia University  ;  2002   ) .  

 

यूनेस्को  की  विशेषज्ञ  समिति   ने भी इस खतरे के प्रति सावधान  करते हुए प्रतिवर्ष  21 फरवरी का दिन  Mother  Language  Day  (  मातृभाषा  दिवस )  के रूप में  मनाने का विश्व से अनुरोध लगभग  एक  दशक  पहले  1999  में    किया था . दस वर्ष का समय कम  तो नहीं होता. क्या  अब  यह सर्वेक्षण करने की आवश्यकता  है  कि  Valentine Day ,  Friend 's  Day ,  Mother 's Day , Father 's Day  आदि  मनाने  के पीछे  दीवाने  बने  हमारे देश के  लोगों ने  ' Mother Language  Day '  किस  प्रकार  मनाया  ?  या    सर्वेक्षण के परिणाम पूर्वज्ञात हैं ?

यह तो निश्चित  बात है  कि  यदि  हम  अपनी भाषा का प्रयोग नहीं कर रहे तो   हिंदी  की गौरव  गाथा के  प्रशस्ति - गान,  संविधान के प्रावधान , महामहिम राष्ट्रपति के आदेश,  संसद के  अधिनियम - नियम,  संसद के  संकल्प , संसदीय राजभाषा  समिति  के  दौरे  और   उसकी  रिपोर्टें , सरकार के अनुदेश - निदेश  --  कोई  हमारी  भाषा को बचा नहीं सकते. भाषा - वैज्ञानिक  चेतावनी दे रहे हैं कि आज  विश्व में जो लगभग छह हज़ार भाषाएँ बोली जा रही हैं, कुछ ही समय बाद उनमें से  छह  सौ भाषाएँ  ही बच पाएंगी  और  इस  शताब्दी  के  समाप्त  होते - होते  दो  सौ  भाषाएं  भी  ' जीवित ' रह  जाएँ  तो  बड़ी  बात  होगी  क्योंकि आज  इनमें से  केवल ४%  भाषाओं का व्यवहार  विश्व  के  लगभग  ९६%  लोग करने लगे हैं  ( David Crystal ,  Language  Death , Cambridge University  Press ,  2000 ) .

ऊपर वर्णित  घटनाओं  की ,  और समाज-भाषा वैज्ञानिकों की चेतावनी  की चर्चा  के बाद  क्या आपको विश्वास है कि हिंदी को कोई खतरा नहीं है ? आपके उत्तर और उसके  अनुरूप  आपके  व्यवहार  पर ही  हिंदी का  भविष्य  निर्भर  करता  है .  
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                                                                                                                                                           परिदृश्य


                                                                                                                                                 -सीताराम गुप्ता

        नये भगत का मंत्र

नाइट ड्यूटी पूरी करने के बाद सुबह नौ-साढ़े नौ बजे जैसे ही डॉक्टर विकास हॉस्पिटल की मुख्य बिल्डिंग से बाहर निकल रहे थे एक महिला और एक पुरुष लगभग दौड़ते हुए उनके क़रीब पहुँचे और उनसे कहा, ‘‘डॉक्टर साहब हमारा बेटा बहुत बीमार है एक बार उसे देख लीजिए।’’ डॉक्टर विकास ने कहा, ‘‘देखिए मैं कल सुबह से ही ड्यूटी पर हूँ और बहुत थक गया हूँ। आप सामने ओपीडी में बच्चे को दिखला दीजिए और घबराने की ज़रूरत नहीं है।’’ उन्हें आश्वस्त कर डॉक्टर विकास बाहर निकलने लगे तो महिला ने डॉक्टर विकास का बाज़ू पकड़ लिया और रोने लगी। उसने कहा, ‘‘ डॉक्टर साहब आप हमारे साथ चलो हमारा बच्चा बहुत बीमार है।’’
     चौबीस घंटे की ड्यूटी के बाद डॉक्टर विकास ख़ुद मरीज़ लग रहे थे लेकिन डॉक्टर विकास सचमुच एक डॉक्टर हैं। डॉक्टर विकास ने ध्यान से देखा तो पाया कि बच्चा सचमुच बहुत बीमार है। उस वक़्त उनको पता था कि एक डॉक्टर का एक साधारण दंपत्ति के बीमार बच्चे के साथ होना उनके लिए क्या मायने रखता है। डॉक्टर विकास बिना देर किए बच्चे को अंदर ले गए। बच्चे को हॉस्पिटल में एड्मिट करना पड़ा। इस पूरी प्रक्रिया में बारह बज गए। बच्चे को एड्मिट कराने के बाद डॉक्टर विकास बच्चे के माँ-बाप को केंटीन में ले गए और उनको चाय पिलाई तथा ख़ुद भी पी। इसके बाद डॉक्टर विकास ने उन्हें फिर आश्वस्त किया और घर के लिए रवाना हो गए।
     बच्चा कई दिन हॉस्पिटल में एड्मिट रहा। बच्चे के माँ-बाप डॉक्टर विकास की कॉलोनी में ही उसके घर के पास प्रेस करने का काम करते थे। अगले दिन डॉक्टर विकास का ऑफ डे था। वैसे भी डॉक्टर विकास दूसरे डिपार्टमेंट में थे लेकिन जब तक बच्चा हॉस्पिटल में एड्मिट रहा बच्चे के माँ-बाप डॉक्टर विकास को बच्चे को देखने के लिए ज़रूर ले जाते क्योंकि इससे उन्हें बहुत सुकून मिलता था। डॉक्टर विकास भी रोज़ उनके बच्चे को देखने के लिए ज़रूर जाते। कुछ दिनों बाद बच्चा स्वस्थ हो गया और हॉस्पिटल से चला गया।
     इस घटना के कुछ दिन बाद की बात है। डॉक्टर विकास घर पर अकेले थे। नहाने के बाद जैसे ही उन्होंने कबर्ड खोला देखा कि एक भी कपड़ा प्रेस किया हुआ नहीं है। उनके कपड़े घर पर ही प्रेस होते थे लेकिन संयोग से उस समय बिजली भी नहीं थी और डॉक्टर विकास को किसी ज़रूरी काम से फौरन बाहर जाना था। डॉक्टर विकास के ज़ह्न में फौरन कॉलोनी में उसके घर के पास प्रेस करने वाले दंपत्ति का चेहरा कौंध गया। डॉक्टर विकास फुर्ती से उठे और कपड़े निकालकर प्रेस कराने के लिए चल दिए।
     डॉक्टर विकास ने वहाँ पहुँचकर किंचित अपनापन जतलाते हुए प्रेसवाले से पूछा, ‘‘भगतजी कैसे हो? आपका बेटा कहाँ है और कैसा है वो?’’ ‘‘बच्चा ठीक है’’, अत्यंत सपाट लहजे में प्रेसवाले ने जवाब दिया। फिर डॉक्टर  के हाथ में कपड़े देखकर डॉक्टर के बिना कुछ कहे ही साथ ही खड़ी प्रेसवाले की पत्नी ने बेरुख़ी से कहा, ‘‘आज हमारे पास पहले ही ज़्यादा कपड़े हैं आप कहीं और से प्रेस करवा लो।’’

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                                                                                                                                                              हास्य-व्यंग्य





                                                                                                                                                                                 

                                                                                                                                                           प्रेम जनमेजय

तुम ऐसे क्यों आईं लक्ष्मी 

लोग दीपावली पर लक्ष्मी पूजन करते हैं, मेरा सारे वर्ष चलता है। फिर भी लक्ष्मी मुझपर कृपा नहीं करती। मैं लक्ष्मी-वंदना करता हूँ हे भ्रष्टाचार प्रेरणी, हे कालाधनवासिनी, हे वैमनस्यउत्पादिनी, हे विश्वबैंकमयी! मुझपर कृपा कर! बचपन में मुझे इकन्नी मिलती थी पर इच्छा चवन्नी की होती थी, परंतु तेरी चवन्नी भर कृपा कभी न हुई। यहाँ तक मुझमें चोरी, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी आदि की सदेच्छा भी पैदा न हुई वरना होनहार बिरवान के होत चिकने पात को सही सिद्ध करता हुआ मैं अपनी शैशवकालीन अच्छी आदतों के बल पर किसी प्रदेश का मंत्री/किसी थाने का थानेदार/किसी क्षेत्र का आयकर अधिकारी/आदि-आदि बन देश-सेवा का पुण्य कमाता और लक्ष्मी नाम की लूट ही लूटता। युवा में मैं सावन का अंधा ही रहा। जिस लक्ष्मी के पीछे दौड़ा, उसने बहुत जल्द आटे-दाल का भाव मुझे मालूम करवा दिया। हे कृपाकारिणी मुझपर इस प्रौढ़ावस्था में ही कृपा कर। मैं मानता हूँ कि मैंने मास्टर बनकर तेरी आराधना के समस्त द्वार बंद कर दिए हैं परंतु हे रिश्वकेशी तेरे प्रताप से जेलों के ताले खुल जाते हैं, एक दी-हीन मास्टर के द्वार क्या चीज़ है। एक दरवाज़ा मेरी ही खोल दे।

तभी दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी। पत्नी बोली, "सुनते हो, देखो शायद लक्ष्मी आई है।" मैं मुद्रस्फीति-सा एकदम उठकर लक्ष्मी के स्वागत को बढ़ा परंतु रुपए की अवमूल्यन-सा लुढ़क गया। क्यों कि मेरी पत्नी ने जिस लक्ष्मी के स्वागत के लिए दरवाज़ा खोलने का अलिखित आदेश दिया था, वह उस समय के अनुसार हमारी कामवाली हो सकती थी जिसके स्वागत की परंपरा हमारे परिवारों में कतई नहीं है।

"दरवाज़ा तुम ही खोल दो।" मेरे स्वर में आम भारतीय की हताशा थी।
पत्नी ने दरवाज़ा खोला, सामने लक्ष्मी नहीं, लक्ष्मीकांत वर्मा थे। उनका चेहरा सरकारी कर्मचारी को महंगाई-भत्ता मिलने के समाचार-सा खिला हुआ था। लक्ष्मीकांत बोले, "भाभी जी, आज तो फटाफट मिठाई मँगवाइए, बढ़िया चाय पिलवाइए और घर में बेसन हो तो पकौड़े भी बनवा दीजिए।"
उसकी इस मँगवाइए/बनवाइए आदि योजनाओं पर अपनी तीव्र प्रतिक्रिया देते हुए मैंने कहा, "क्यों शर्मा, क्या तू विश्व बैंक का प्रतिनिधि है जो तेरा अभूतपूर्व स्वागत करने को हम बाध्य हों?"
"यही समझ ले घोंचूलाल! देख, मैं भाभी जी से बात कर रहा हूँ, तू बीच में अपनी टाँग क्यों अड़ा रहा है? भाभी जी, मैं आपके लिए हज़ारों रुपए मिलने की ख़बर लाया हूँ और ये है कि," लक्ष्मीकांत ने अमेरिकी स्वर में कहा।
"तुम चुप रहो जी!" पत्नी ने ससम्मान मुझे डाँटा और लक्ष्मीकांत की तरफ़ मुस्कराकर देखा तथा कहा, "आप बैठिए न भाई साहब मैं अभी आपके लिए सबकुछ बनाकर लाती हूँ। आप हज़ारों मिलने वाली बात बताओ न।" पत्नी में ऐसा सेवाभाव मैंने कभी नहीं देखा था।
"भाभी जी, आपको याद होगा कि मैंने आपसे एक हज़ार रुपए लेकर एक कंपनी के शेयर भरवाए थे, उसका अलोटमेंट लैटर आ गया है।"
"यानी हमारे हज़ार रुपए डूब गए। तुझे तो खुशी ही होगी हमारे रुपए डूबने की, तू हमारा सच्चा दोस्त जो है।" मैंने इस मध्य आह भरी।
"अरे बौड़म, रुपए डूबे नहीं हैं, उस हज़ार रुपए के तीन महीने में दस हज़ार हो गए हैं। कंपनी का दस रुपए का शेयर आज सौ में बिक रहा है सौ में कुछ समझे संत मलूकदास जी।"

पत्नी विवाहित जीवन के पच्चीस वसंत देखने से पूर्व या तो चहकी थी या फिर उस दिन लक्ष्मीकांत उवाच के कारण चहकी और चहकते हुए उसने पूछा, "हमारे कितने शेयर हैं।"
"सौ शेयर।"
"सौ शेयर! और अगर हम उन्हें बेचें तो हमें दस हज़ार रुपए मिलेंगे दस हज़ार! अजी सुनते हो लक्ष्मी भैया की बदौलत हमें दस हज़ार मिलेंगे।" (सुधीजन नोट करें, धन लक्ष्मी मैया के अतिरिक्त लक्ष्मी भैया की बदौलत भी मिल सकता है। अत: हे संतों, सदैव लक्ष्मी का स्मरण करें।) ये दस हज़ार हमें कब मिलेंगे लक्ष्मी मैया!"
"भाभी जहाँ इतना इंतज़ार किया वहाँ थोड़ा इंतज़ार और कर लो। आप देख लेना कुछ दिनों में ये दो-सौ नहीं तो डेढ़ पौने दो पर तो जाएगा ही। सिर्फ़ दस-पंद्रह दिन की बात है दौड़ते घोड़े को चाबुक नहीं मारनी चाहिए। आप तो अब पार्टी की तैयारी कर लो और पंद्रह बीस हज़ार गिनने की भी तैयार कर लो।" लक्ष्मीकांत ने आशीर्वादात्मक मुद्रा में कहा।
"पार्टी तो आप जितनी ले लो। पंद्रह-बीस हज़ार! भाई साहब मुझे लगता है कि आप मेरा मन रखने के लिए ऐसा कह रहे हैं, मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा है। बेसन नहीं मैं आपके लिए ब्रजवासी की पिस्तेवाली बरफी मँगवाती हूँ कोला तो आपको पीकर ही जाना होगा। तुम आराम से सोफ़े पर क्या बैठे हो जल्दी से बाज़ार हो आओ हे भगवान!"

लक्ष्मीकांत तो अपना सत्कार कर के चले गए परंतु हम पति-पत्नी एक अंतहीन बहस में उलझ गए। पत्नी अंतर्राष्ट्रीय सहायता कोषरूपा हो गई और उसने बजट बनाने के दिश निर्देश मुझे जारी कर दिए। माता-पिता को भेजी जाने वाली राशि में कटौती करवाई, मुझसे अनेक वायदे लिए तथा चाय-पानी जैसी ज़रूरी चीज़ों को बेकार सिद्ध किया। पत्नी के सुप्रयत्नों से मेरा भुगतान-संतुलन बिगड़ गया और मित्रों की निगाह में दीन-हीन बन गया।

भविष्य के लिए वह जो भी बजट बनाती, वह पंद्रह हज़ार से कम बन ही नहीं रहा था। पंद्रह अभी आए नहीं थे पर उसकी आशा में उधारी के छह-सात हज़ार शहीद हो चुके थे। बड़ी चादर की अपेक्षा में पैर फैल रहे थे। पत्नी रोज़ सुबह मुझे उठाती, हाथ में अख़बार पकड़ाती और जैसे मैं कभी माँ को रामायण सुनाया करता था वैसी ही श्रद्धा से पत्नी को शेयरों के भाव पढ़कर सुनाया करता। हम घंटों उस पेज को घूरते रहते। देश में कहाँ हत्या हो रही है, किसका घर जल रहा है और कौन जला रहा है ऐसे समाचारों में हमें कोई दिलचस्पी नहीं रह गई थी। जिस दिन शेयर का भाव बढ़ जाता उस दिन पत्नी अच्छा नाश्ता और भोजन खिलाती और जिस दिन घट जाता उस दिन घर में जैसे मातम छा जाता। बच्चे पिट जाते और पति-पत्नी के बीच महाभारत का लघु संस्करण खेला जाता। पत्नी का रक्तचाप पहले केवल मेरे कारण बढ़ता-घटता रहता था, आजकल शेयर बाज़ार की उसमें महत्वपूर्ण भूमिका रहती।

महीना बीत गया। शेयर डेढ़ सौ पर जाने की बजाय साठ पर आ गया यानी नौ हज़ार का काग़ज़ी नुकसान हमें हो गया। पत्नी ने संतोषधन नामक मंत्र का जाप किया और आदेश दिया कि प्रिय तुम शेयर-संग्राम में जाओ और इसका कुछ कर आओ। मैंने लक्ष्मीकांत से अनुरोध किया तो उसने हमारी हड़बड़ी पर लेक्चर दे डाला तथा सहज पके सो मीठा होय नामक मंत्र का जाप करने को कहा। उसने आत्मविश्वासात्मक स्वर में कहा कि कंपनी के रिज़ल्ट अच्छे आने वाले हैं और तब यह निश्चित ही दो सौ पर जाएगा। हम अपना परिणाम भूल कंपनी के परिणाम पर ध्यान देने लगे। लक्ष्मीकांत ने हमारे मन में लालच का दीपक पुन: जगा दिया था। मेरा पढ़ना-लिखना बंद हो गया और मन विदेश-भ्रमण के लालच-सा सदैव शेयर बाज़ार के ईद-गिर्द ही मँडराता रहता।

जिस तरह से लक्ष्मी भैया ने लक्ष्मी मैया के आने का धमाका किया था वैसे ही उसके जाने का किया। कंपनी के परिणाम ठीक नहीं आए, उसे घाटा हुआ था अत: शेयर लुढ़कता-फुड़कता ग्यारह पर आ टिका। हमने भागते चोर की लंगोटी नामक मुहावरे की सार्थकता सिद्ध की तथ शुक्र मनाया की गाँठ से पैसा नहीं गया। पत्नी ने सवा पाँच रुपए का प्रसाद चढ़ाया और ऋण भुगतान में जुट गया।


अब मैं लक्ष्मी वंदना नहीं करता हूँ, बस लक्ष्मी मैया से एक प्रश्न करता हूँ तुमने आने का अभिनय क्यों किया लक्ष्मी! कहीं तुम भी तो चुनाव नहीं लड़ रही हो!"

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                                                                                                                                                          सरोकार




                                                                                                                                                   

                                                                                                                                                      - वेदप्रताप वैदिक


बात सिर्फ शराब की नहीं

 एक ताजा सर्वेक्षण से पता चला है कि भारत के कुछ नगरों के 45 प्रतिशत नौजवानों को शराब की लत पड़ गई है। दिल्ली से इंदौर तक के ग्यारह शहरों के 2000 नौजवानों के सर्वेक्षण से ये आंकड़े मिले हैं। इन नौजवानों की उम्र 15 से 19 वर्ष है। पिछले 10 साल में इस लत का असर दुगुना हो गया है। कोई आश्चर्य नहीं कि अगले दस साल में देश के लगभग शत प्रतिशत नौजवान शराबखोर बन जाएं। 

जरा सोचें कि अगर हालत यही हो गई तो 21वीं सदी के भारत का क्या होगा? हम गर्व करते हैं कि आज नौजवानों की जितनी संख्या भारत में है, दुनिया के किसी भी देश में नहीं है। भारत अगर विश्व-शक्ति बनेगा तो इस युवाशक्ति के दम पर, लेकिन अगर हमारी युवाशक्ति इन पश्चिमी लतों की शिकार बन गई तो भारत आज जिस बिंदु पर पहुंचा है, उससे भी नीचे खिसक जाएगा। यह मामला सिर्फ शराब का ही नहीं है, शराब जैसी अन्य दर्जनों लतों का है, जो भारत के भद्रलोक की नसों में मीठे जहर की तरह फैलती जा रही हैं।

शराब के बढ़ते चलन के पीछे जो तर्क दिख रहे हैं, वे सतही हैं। उनके पीछे छिपे रहस्यों को जानना जरूरी है। इन रहस्यों को हम अगर जान पाएंगे तो दूसरी आधुनिक बीमारियों के मूल तक पहुंचने में भी हमें आसानी होगी और उनका इलाज करना भी कठिन नहीं होगा।

हमारे नौजवान शराब इसलिए पी रहे हैं कि उनके हाथ में पैसे ज्यादा आ रहे हैं। वे अपना तनाव मिटाना चाहते हैं और माता-पिता उन पर समुचित ध्यान नहीं दे पाते हैं। ये तीनों तर्क अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन ये ऊपरी हैं।

असली सवाल यही है कि हमारा नौजवान शराब को ही अपना एकमात्र त्राणदाता क्यों मान रहा है? और इस गंभीर भूल का पता चलने पर भी माता-पिता और समाज की तरफ से कोई उचित कार्रवाई क्यों नहीं होती?

इसका कारण यह है कि भौतिक विकास की दौड़ में पागल हुआ हमारा समाज बिल्कुल नकलची बनता चला जा रहा है। वह कहता है कि हर मामले में पश्चिम की नकल करो। अपना दिमाग गिरवी रख दो। अपने मूल्यमानों, आदर्शे, अपनी परंपराओं को दरी के नीचे सरका दो।

यदि शराब पीना, मांस खाना, व्यभिचार करना, हिंसक बनना, कर्ज लेकर ऐश करना आदि को पश्चिमी समाज में बुरा नहीं माना जाता तो हम उसे बुरा क्यों मानें? आधुनिक दिखने, प्रगतिशील होने, सेकुलर बनने, भद्र लगने के लिए जो भी टोटके करने पड़ें, वे हम करें। चूके क्यों? जरा गौर करें कि सर्वेक्षण क्या कहता है?

उसके अनुसार हमारे नौजवान ज्यादा शराब कब पीते हैं? क्रिसमस या वेलेंटाइन डे के दिन! ये दोनों त्योहार क्या भारतीय हैं? हमारे ईसाई भाई क्रिसमस मनाएं, यह तो समझ में आता है, लेकिन जो शराबखोरी करते हैं, उन आम नौजवानों का ईसा मसीह या क्रिसमस से क्या लेना-देना है? शराब पीना ही उनका क्रिसमस है और वह इसलिए है कि क्रिसमस पश्चिमी समाज का त्योहार है। होली और दिवाली पर उन्हें खुमारी नहीं चढ़ती, लेकिन क्रिसमस पर चढ़ती है, यह किस सत्य का प्रमाण है?

दिमागी गुलामी का! यही गुलामी वेलेंटाइन डे पर प्रकट होती है। जिन भारतीय नौजवानों को महात्मा वेलेंटाइन की दंत-कथा का भी सही-सही पता नहीं है, वे आखिर वेलेंटाइन डे क्यों मनाते हैं? वेलेंटाइन डे से भी सौ गुना अधिक मादक वसंतोत्सव है, लेकिन वे उससे अपरिचित हैं? क्यों हैं? इसीलिए कि वेलेंटाइन डे पश्चिमी है, आयातित है और ‘आधुनिक’ है।

शराब भी वे प्राय: विदेशी ही पीते हैं। ठर्रा पी लें तो उन्हें दारूकुट्टा या पियक्कड़ कहने लगेंगे। यह कड़वी बात उन्हें कोई कहता नहीं है, लेकिन सच्चई यही है कि इन नौजवानों को अपने भारतीय होने पर गर्व नहीं है। वे नकलची बने रहने में गर्व महसूस करते हैं।

अगर ऐसा नहीं है तो मैं पूछता हूं कि आज भारत के 90 प्रतिशत से अधिक शहरी नौजवान पेंट-शर्ट क्यों पहनते हैं? टाई क्यों लगाते हैं? उन्हें कुर्ता-पायजामा पहनने में शर्म क्यों आती है? स्कूल-कॉलेजों में कोई भी अध्यापक और छात्र धोती पहने क्यों नहीं दीखता?

कोई वेश-भूषा कैसी भी पहने, उसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन कोई अपनी स्वाभाविक वेश-भूषा, जलवायु के अनुकूल वेश-भूषा, पारंपरिक वेश-भूषा को तो हीन भाव से देखे और अपने पुराने मालिकों की वेश-भूषा को गुलामों की तरह दैवीय दर्जा देने लगे तो उसे आप क्या कहेंगे?

ठंडे देशों में शराब का प्रचलन है और टाई समेत थ्री-पीस सूट पहने जाते हैं, लेकिन भारत जैसे गर्म देश में भी इन चीजों से चिपके रहना कौन सी आधुनिकता है? खुद को असुविधा में डालकर नकलची बने रहना तो काफी निचले दर्जे की गुलामी है। यदि ऐसी गुलामी भारत में बढ़ती चली जाए तो उसके संपन्न होने, शक्तिमंत बनने और स्वतंत्र होने पर लानत है।

यहां मामला शराब और वेश-भूषा का ही नहीं है, सबसे गंभीर मामला तो भाषा का है। आजादी के 63 साल बाद भी अंग्रेजी इस देश की पटरानी बनी हुई है और हिंदी नौकरानी! किसी को गुस्सा तक नहीं आता। बुरा तक नहीं लगता। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से लेकर बाबुओं और चपरासियों ने भी अंग्रेजी की गुलामी का व्रत धारण कर रखा है।

शराब की गुलामी से भी ज्यादा खतरनाक अंग्रेजी की गुलामी है। विदेशी भाषाओं और ज्ञान-विज्ञान से फायदा उठाने का मैं जबर्दस्त समर्थक हूं, लेकिन अपनी मां पर हम थूकें और दूसरे की मां के मस्तक पर तिलक लगाएं, इससे बढ़कर दुष्टता क्या हो सकती है? यह दुष्टता भारत में शिष्टता कहलाती है।

यदि आप अंग्रेजी नहीं बोल पाएं तो इस देश में आपको कोई शिष्ट और सभ्य ही नहीं मानेगा। देखा आपने, कैसा सूक्ष्म सूत्र जोड़ रहा है शराब, पेंट-शर्ट और अंग्रेजी को। हम यह भूल जाते हैं कि शराब ने रोमन और मुगल जैसे साम्राज्यों की जड़ों में मट्ठा डाल दिया और विदेशी भाषा के जरिए आज तक दुनिया का कोई भी राष्ट्र महाशक्ति नहीं बना, लेकिन इन मिथ्या विश्वासों को हम बंदरिया के बच्चे की तरह छाती से चिपकाए हैं। दुनिया में हमारे जैसा गुलाम देश कौन सा है?

इस गुलामी को बढ़ाने में ‘कॉमनवेल्थ’ का योगदान अप्रतिम है। ‘कॉमनवेल्थ’ को क्या हमने कभी ‘कॉमन’ बनाने की आवाज उठाई? उसका स्थायी स्वामी ब्रिटेन ही क्यों है? हर दूसरे-तीसरे साल उसका अध्यक्ष क्यों नहीं बदलता गुट निरपेक्ष आंदोलन की तरह या सुरक्षा परिषद की तरह? उसकी भाषा अंग्रेजी क्यों है, हिंदी क्यों नहीं? कॉमनवेल्थ के दर्जनों देश मिलकर भी भारत के बराबर नहीं हैं। हिंदी दुनिया की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है।

दुर्भाग्य तो यह है कि आज देश में हमारे राजनीतिक दल और यहां तक कि साधु-महात्मा भी शक्ति-संधान और पैसा-महान में उलझ गए हैं। दयानंद, गांधी और लोहिया की तरह कोई ऐसा आंदोलन नहीं चला रहे, जो भारत के भोजन, भजन, भाषा, भूषा और भेषज को सही पटरी पर लाए।
 

इस पंचमकार का त्याग अगर भारत नहीं करेगा तो पंचमकार- मद्य, मांस, मीन, मुद्रा, मैथुन का मार्ग तो पश्चिम ने हमें दिखा ही रखा है। पश्चिम तो अब उठकर गिर रहा है, हम उठे बिना ही गिर जाएंगे।

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                                                                                                                                                          मुद्दा 


                                                                                                                                                  - राघवेन्द्र सिंह

चीन के द्वारा भारत की घेराबंदी

वर्ष 2007 में चीन द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अतिक्रमण या उससे मिलती जुलती लगभग 140 घटनायें हुई, वर्ष 2008 में 250 से भी अधिक तथा वर्ष 2009 के प्रारम्भ में लगभग 100 के निकट इसी प्रकार की घटनायें हुई इसके बाद भारत सरकार ने हिमालयी रिपोर्टिंग, भारतीय प्रेस पर प्रतिबन्ध लगा दिया। आज देश के समाचार पत्रों एवं इलेक्ट्रिानिक मीडिया को सूचनायें मिलना बन्द हैं। क्या उक्त प्रतिबन्ध से घुसपैठ समाप्त हो गयी या कोई कमी आयी। इस प्रतिबन्ध से चीन के ही हित सुरक्षित हुये तथा उनके मनमाफिक हुआ। जरा हम चीन के भारत के प्रति माँगों की सूची पर गौर करें - वह चाहता है अरुणाचल प्रदेश उसे सौंप दिया जाये तथा दलाईलामा को चीन वापस भेज दिया जाये। वह लद्दाख में जबरन कब्जा किये गये भू-भाग को अपने पास रखना चाहता है तथा वह चाहता है। भारत अमेरिका से कोई सम्बन्ध न रखे इसके साथ-साथ चीन 1990 के पूरे दशक अपनी सरकारी पत्रिका ‘‘पेइचिंग रिव्यू’’ में जम्मू कश्मीर को हमेशा भारत के नक्शे के बाहर दर्शाता रहा तथा पाक अधिकृत कश्मीर में सड़क तथा रेलवे लाइन बिछाता रहा। बात यही समाप्त नहीं होती कुछ दिनों पहले एक बेवसाइट में चीन के एक थिंक टैंक ने उन्हें सलाह दी थी कि भारत को तीस टुकड़ों में बाँट देना चाहिये। उसके अनुसार भारत कभी एक राष्ट्र रहा ही नहीं। इसके अतिरिक्त चीन भारत पर लगातार अनावश्यक दबाव बनाये रखना चाहता है। वह सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता पाने की मुहिम का विरोध करता है तो विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में अरुणाचल प्रदेश की विकास परियोजनाओं के लिये कर्ज लिये जाने में मुश्किलें खड़ी करता है। इसके साथ-साथ तिब्बत में सैन्य अड्डा बनाने सहित अनेक गतिविधियाँ उसके दूषित मंसूबे स्पष्ट दर्शाती हैं।
 आज से लगभग 100 वर्षों पूर्व किसी को भी भास तक नहीं रहा होगा, वैश्विक मंच पर भारत तथा चीन इतनी बड़ी शक्ति बन कर उभरेंगे। उस समय ब्रिटिश साम्राज्य ढलान पर था तथा जापान, जर्मनी तथा अमेरिका अपनी ताकत बढ़ाने के लिए जोर आजमाइश कर रहे थे। नये-नये ऐतिहासिक परिवर्तन जोरों पर थे। आज उन सबको पीछे छोड़ चीन अत्यधिक धनवान तथा ताकतवर राष्ट्र बनकर उभरा है। कुछ विद्वानों का मत है चीन अनुमानित समय से पहले अमेरिका को पीछे छोड़ देगा। भारत भी अपनी पूरी ऊर्जा के साथ लोकतंत्र को सीढ़ी बना अपनी चहुमुखी प्रगति की ओर अग्रसर है। चीन अपने उत्पादन तथा भारत सेवा के क्षेत्र में विश्व पटल पर अपनी उपस्थिति अग्रणी भूमिका के रूप में बनाये हुए है। यह बात सत्य है कि चीन भारत के मुकाबले अपनी सैन्य क्षमता में लगभग दोगुना धन खर्च कर रहा है। अतः उसकी ताकत भी भारत के मुकाबले दोगुनी अधिक है। उसकी परमाणु क्षमता भी भारत से कहीं अधिक है। इन सबके साथ यह भी सत्य है कि चीन की सीमा अगल-अलग 14 देशों से घिरी है अतः वह अपनी पूरी ताकत का उपयोग भारत के खिलाफ आजमाने में कई बार सोचेगा। परन्तु चीन की उक्त बढ़ती हुई सैन्य एवं मारक शक्ति भारत के लिए चिन्तनीय अवश्य है।
 एक तरफ चीन अपनी जी0डी0पी0 से कई गुना रफ्तार से रक्षा बजट में खर्च कर रहा है वहीं वह अपने रेशम मार्ग जहाँ से सदियों पहले रेशम जाया करता था, पुनः चालू करना चाहता है। वह अफगानिस्तान, ईरान, ईराक और सउदी अरब तक अपनी छमता बढ़ाना चाहता है। निश्चित ही वह वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग अपने हित में करना चाहता है। जिसके उक्त कार्य में निश्चित ही पाकिस्तान की भूमिका महत्वपूर्ण रहने वाली है। देखना यह है कि उसकी यह सोच कहाँ तक कारगर रहती है।
 चीन महाशक्ति बनने की जुगत में है, जिससे भारत को चिन्तित होना लाजमी है, उसकी ताकत निश्चित ही भारत को हानि पहुँचाएगी। लगातार चीनी सेना नई शक्तियों से लैस हो रही है। पाकिस्तान तथा बांग्लादेश में समुद्र के अन्दर अपने अड्डे बनाकर वह अपनी भारत के प्रति दूषित मानसिकता दर्शा रहा हैं। वर्ष 2008 में चीन पाकिस्तान में दो परमाणु रिएक्टरों की स्थापना को सहमत हो गया था। जिसका क्रियान्वयन होने को है।
हमारे नीति निर्धारकों को उक्त विषय की पूरी जानकारी भी है। परन्तु फिर भी वे एकतरफा प्यार की पैंगे बढ़ाते हुए सोच रहे हैं। कि एक दिन चीन उनपर मोहित हो जाएगा, तथा अपनी भारत विरोधी गतिविधियाँ समाप्त कर देगा। हमारे देश के प्रधानमंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह का वैश्विक मंच पर कहना अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की दुनिया में चीन हमारा सबसे महत्वपूर्ण सहोदर है तथा भारतीय विदेशमंत्री का कहना तिब्बत चीन का अंग है। उचित प्रतीत नहीं होता। उक्त दोनों बयान भारत को विभिन्न आयामों पर हानि पहुँचाने वाले प्रतीत होते हैं। चाणक्य तथा विदुर के देश के राजनेता शायद यह भूल गये कि राष्ट्र की कोई भी नीति भावनाओं से नहीं चलती। अलग-अलग विषयों पर भिन्न-भिन्न योजनाएँ लागू होती हैं। परन्तु भावनाओं का स्थान किसी भी योजना का भाग नहीं है। आज भारत को चीन से चौकन्ना रहने की आवश्यकता है। उसे भी कूटनीति द्वारा अपनी आगामी योजना बनानी चाहिए। उसे चाहिए चीन की अराजकता से आजिज देश उसके विषय में क्या सोच रहे हैं। उसके नीतिगत विकल्प क्या हैं ? भारत को अमेरिका के साथ-साथ दक्षिण पूर्व एशिया के महत्वपूर्ण देशों के साथ खुली बात-चीत करनी चाहिए। चीन का स्पष्ट मानना है कि भारत में कई प्रकार के आंतरिक विवाद चल रहे हैं चाहे वह अंतर्कलह हो, आतंकवाद हो या साम्प्रदायिक खींच-तान। भारत क्षेत्रीय विषयों पर भी बुरी तरह बटा हुआ है। चीन उक्त नस्लीय विभाजन का लाभ देश को बाटने के लिए कर सकता है। वहाँ के दूषित योजनाकारों के अनुसार प्रांतीय स्तर पर अलग-अलग तरीके से क्षेत्रीय वैमनस्यता एवं विवादों को भड़का भारत का विभाजन आसानी से किया जा सकता है।
निश्चित रूप से आगे आने वाले वर्ष भारत के लिए काफी मुश्किलों भरे हो सकते हैं। वर्ष 2011 के बाद पश्चिमी सेना काबुल से निकल जाएगी। इसके बाद बीजिंग-इस्लामाबाद-काबुल का गठबंधन भारत के लिए मुश्किलें खड़ी करेगा। चीन नेपाल के माओवादियों को लगातार खुली मदद कर रहा है। वहाँ की सरकार बनवाने के प्रयासों में उसकी दखलंदाजी जग जाहिर है। पाकिस्तान भारत में नकली नोट, मादक पदार्थ, हथियार आदि भेज भारत को अंदर से नुक्सान पहुँचाने की पूरी कोशिश कर रहा है। उसकी आतंकी गतिविधियाँ लगातार जारी हैं। भारत चीन के साथ व्यापार कर चीन को ही अधिक लाभ पहुँचा रहा है। वहाँ के सामानों ने भारतीय निर्माण उद्योग को बुरी तरह कुचल डाला है। यदि आगे आनेवाले समय में भारत सरकार चीनी उत्पादनों पर पर्याप्त सेल्स ड्यूटी या इसी प्रकार की अन्य व्यवस्था नहीं करती है तो भारत का निर्माण उद्योग पूरी तरह टूट कर समाप्त हो जाएगा। इसे भी चीन का भारत को हानि पहुँचाने का भाग माना जा सकता है।
भारत को चाहिए 4,054 किलोमीटर सरहदीय सीमा की ऐसी चाक-चौबन्द व्यवस्था करें कि परिंदा भी पर न मार सके। इसके साथ-साथ देश के राज्यीय राजनैतिक शक्तियों को अपने-अपने प्रान्तों को व्यवस्थित करने की अति आवश्यकता है। जिससे वह किसी भी सूरत में भारत की आंतरिक कमजोरी का लाभ न ले सके। देश की सरकार को जल, थल तथा वायु सैन्य व्यवस्थाओं को और अधिक ताकतवर बनाना चाहिए। जिससे चीन भारत पर सीधे आक्रमण करने के बारे में सौ बार विचार करे। 1954 के हिन्दी-चीनी भाई-भाई तथा वर्तमान चिन्डिया के लुभावने नारों के मध्य चीन ने 1962 के साथ-साथ कई दंश भारत को दिये हैं। भारत को आज सुई की नोक भर उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए। चीन जैसे छली राष्ट्र के साथ विश्वास करना निश्चित ही आत्मघाती होगा। हमें अपनी पूरी ऊर्जा राष्ट्र को मजबूत एवं सैन्य शक्ति बढ़ाने में लगाना चाहिए।

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                                                                                                                                                              स्मृति शेष
                                                                                                                                                        डॉ. वेदप्रताप वैदिक




इंदिरा ने भारत को बनाया महाशक्ति

भारत की विदेश नीति तो बनाई जवाहरलाल नेहरू ने और चलाई कई प्रधानमंत्रियों ने लेकिन जैसे झंडे इंदिरा गांधी ने गाड़े, कोई और नहीं गाड़ सका| ऐसे चमत्कारी काम कभी-कभी सुसंयोग और अनुकूल परिस्थितियों के कारण भी हो जाते हैं लेकिन जिन कामों का यहां जिक्र किया जा रहा है, वे हो ही नहीं सकते थे, अगर इंदिरा गांधी नहीं होतीं| इंदिरा गांधी नहीं होतीं तो क्या बांग्लादेश बन सकता था ? क्या पोखरन का परमाणु-विस्फोट हो सकता था ? क्या सिक्किम का विलय हो सकता था ? क्या श्रीलंका की हिंसक बगावत काबू की जा सकती थी ? क्या दीन-दरिद्र और बड़बोला भारत दक्षिण एशिया की महाशक्ति बन सकता था?

                  इंदिरा गांधी को जो विदेश नीति मिली, वह कैसी थी ? 1962 के युद्घ में भारत चीन से पराजित हो चुका था और 1965 के युद्घ में हमें पाकिस्तान के साथ ताशकंद समझौता करना पड़ा था| गुट-निरपेक्षता और विश्वयारी का सपना चूर-चूर हो चुका था| दुनिया का कोई भी राष्ट्र भारत की सहायता के लिए नहीं दौड़ा| जिस सोवियत संघ को हम अपना स्वाभाविक मित्र् मानते थे, उसने चीन के विरूद्घ पत्ता तक नहीं हिलाया| हमें झक मारकर अमेरिका की शरण में जाना पड़ा| जॉन एफ. केनेडी सरकार से कई छोटी-मोटी मदद लेनी पड़ीं| गुट-निरपेक्षता के बहाने भारत जो उपदेश झाड़ा करता था, उन्हें डिब्बे में बंद करना पड़ा| गुट-निरपेक्ष संसार में भारत की चमक फीकी पड़ गई| उधर पाकिस्तान के हौसले इतने बढ़ गए कि उसने डंडे के जोर पर कश्मीर हथियाने की हिमाकत की| उसके घुसपैठियों को भारत ने मार भगाने की कोशिश की तो पाकिस्तान ने युद्घ ही छेड़ दिया| भारत ने जब अंतरराष्ट्रीय सीमा पार की तो सारी दुनिया में शोर मच गया| किसी ने भी भारत का साथ नहीं दिया| भारत की विदेश नीति इतनी कमज़ोर हो गई थी कि भारत के पड़ौसी देश भी अमेरिका और चीन से अपने संबंध बढ़ाने लगे थे| भारत को आर्थिक स्थिति भी विषम होती चली जा रही थी| भारत को पीएल-480 का अनाज आयात करना पड़ता था और रूपए का अवमूल्यन करना पड़ा था|

                 ऐसे विकट समय में इंदिरा गांधी ने भारत की कमान संभाली| सबसे पहले उन्होंने हरित क्रांति के जरिए अनाज के मामले में भारत को आत्म-निर्भर बनाया ताकि उसे विदेशी शक्तियों के आगे हाथ न फैलाना पड़े| उन्होंने गुट-निरपेक्षता की गुम हुई चमक को वापस लौटाया| अमेरिकी राष्ट्रपतियों के साथ उन्होंने मातहत का नहीं, बराबरी का व्यवहार किया| लिंडन जॉन्सन, रोनाल्ड रेगन और रिचर्ड निक्सन जैसे राष्ट्रपतियों के संस्मरण इस तथ्य के प्रमाण हैं| उन्होंने हर मुद्रदे पर वही राय प्रकट की, जो भारत के हित में थी| वे दबाव में नहीं आईं| चाहे वियतनाम का मसला हो, चेकोस्लोवाकिया का हो, फलस्तीन का हो या अफगानिस्तान का हो| बांग्लादेश युद्घ के समय रिचर्ड निक्सन ने भारत को डराने के लिए बंगाल की खाड़ी में 'एंटरप्राइज़' नामक जंगी बेड़ा भेजा दिया था| इंदिरा गांधी ने साफ कह दिया कि अगर वह बेड़ा पाकिस्तान की तरफ से हस्तक्षेप करेगा तो हम उसे डुबो देंगे| अमेरिकी गीदड़भभकी कुछ काम नहीं आई और बांग्लादेश बन गया| निक्सन को मजबूर होकर नए दक्षिण एशिया को मान्यता देनी पड़ी| उन्हें मानना पड़ा कि भारत दक्षिण एशिया की प्रमुखतम शक्ति है|

 

                         इसी प्रकार अमेरिका और अन्य अनेक पश्चिमी राष्ट्रों ने भारत पर तरह-तरह के दबाव डाले ताकि वह परमाणु-अप्रसार संधि पर दस्तखत कर दे| उन्होंने प्रलोभन भी दिए| लेकिन इंदिरा गांधी अपने संकल्प पर डटी रहीं| उन्होंने न केवल उस संधि पर दस्तखत नहीं किए बल्कि 1974 में परमाणु अंत:स्फोट कर दिया| सारी दुनिया चकित हो गई| किसी भी राष्ट्र ने भारत का समर्थन नहीं किया लेकिन इंदिरा गांधी ज़रा भी नहीं घबराईं| उन्होंने पश्चिमी राष्ट्रों और उनके पिछलग्गुओं को डटकर जवाब दिए| परमाणु सामंतवाद को सीधी चुनौती दी| पश्चिमी राष्ट्रों ने खिसियाकर भारत पर अनेक प्रतिबंध थोप दिए लेकिन इंदिराजी ने उनकी ज़रा भी परवाह नहीं की| 1971 में बांग्लादेश के निर्माण और 1974 के परमाणु अंत:स्फोट ने भारत को दुनिया की छठी महाशक्ति बना दिया| वह पांच बड़ों के क्लब में अपने आप शामिल हो गया| पश्चिमी राष्ट्रों की खुमारी टूटने लगी| उनका वह चिरपोषित सपना भंग होने लगा, जिसके तहत भारत और पाकिस्तान को एक ही जाजम पर बिठाने की कोशिश की जाती थी| भारत की इज्ज़त गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों के बीच रातोंरात दुबारा चमक उठी| भारत के परमाणु बम को गुट-निरपेक्ष बम का अयाचित दर्जा मिल गया| पड़ौसी देश भी अपना रूख बदलने लगे| चीन अपना बम एक दशक पहले फोड़ चुका था लेकिन उसने भी भारत का विरोध किया| परमाणु मामले में भारत का विरोध करने के बावजूद चीन ने महसूस किया कि उसे अब भारत से अपने संबंध सहज करने होंगे| भंग हुए कूटनीतिक रिश्ते दुबारा कायम हुए| पाकिस्तान को पहली बार यह बात समझ में आई कि डंडे के ज़ोर पर कश्मीर हथियाना लगभग असंभव है| जनरल जि़या के पाकिस्तान ने अयुद्घ-संधि का हाथ बढ़ाया लेकिन इंदिरा गांधी ने उसे झटक दिया|

                   इंदिरा गांधी ने पश्चिमी राष्ट्रों को कई झटके दिए लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने सोवियत संघ के आगे आत्म-समर्पण कर दिया| उन्होंने 1968 में उस सोवियत सैन्य हस्तक्षेप की निंदा नहीं की, जो दूबचेक की सरकार के विरूद्घ चेकोस्लावाकिया में किया गया था लेकिन उन्होंने उसका समर्थन भी नहीं किया| उन्हीं दिनों लियोनिद ब्रेझनेव ने 'सीमित संप्रभुता' और 'एशियाई सामूहिक सुरक्षा' के सिद्घांत भी पेश किए| इंदिराजी ने इन दोनों सिद्घांतों को रद्रद कर दिया| वे भारत को किसी भी क़ीमत पर सोवियत गुट का पिछलग्गू बनाने को तैयार नहीं थीं| ब्रेझनेव ने बहुत कोशिश की कि भारत अफगानिस्तान में रूसी हस्तक्षेप का समर्थन कर दे लेकिन इंदिराजी बराबर कहती रहीं कि वे अफगानिस्तान के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप का विरोध करती हैं| अफगान प्रधानमंत्र्ी बबरक कारमल के अनुरोध के बावजूद उन्होंने भारतीय फौजें काबुल नहीं भेजीं| इंदिराजी ने वही नीतियां चलाईं, जिनसे भारत का राष्ट्रहित सधता था|

                   उन्होंने चीन से संबंध सुधारे लेकिन सीमा और तिब्बत के सवाल पर वे ज़रा भी टस से मस नहीं हुईं| इसी प्रकार उन्होंने पाकिस्तान से भी संवाद शुरू किया लेकिन कश्मीर के सवाल पर उन्होंने कोई नरमी नहीं दिखाईर्| पाकिस्तानी नेताओं के दिलों मंे इंदिरा गांधी के नाम की कैसी दहशत बैठी हुई थी, यह मैंने उन दिनों पाकिस्तान-प्रवास के दौरान खुद देखा है| पंजाब में चले आतंकवाद के विरूद्घ की गई उनकी कार्रवाई ने पाकिस्तान के छक्के छुड़ा दिए थे| यदि इंदिरा गांधी जीवित होतीं तो कारगिल की हिमाकत के पहले पाकिस्तान हजार बार सोचता| तालिबान से निपटने के लिए वे अमेरिकियों का मुंह नहीं ताकतीं| वे उनकी जड़ों पर प्रहार करतीं|

                        इंदिरा गांधी ने सिर्फ पड़ौसी देशों और महाशक्तियों के साथ ही उचित संबंध नहीं बनाए, उन्होंने भारत के विदेश-व्यापार और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संबंधों को भी नए आयाम प्रदान किए| पहली बार भारत के प्रधानमंत्र्ी ने अफ्रीका, आग्नेय एशिया और लातीनी अमेरिकी देशों को विशद यात्रएं की| सारी दुनिया भारत को महात्मा गांधी की वजह से जानती थी, अब वह इंदिरा गांधी की वजह से भी जानने लगी| इंदिरा गांधी ने भारत की विदेश नीति को आदर्शों के आसमान से नीचे उतारकर यथार्थ की कठोर भूमि पर खड़ा किया| ज्यों-ज्यों समय बीत रहा है, विदेश नीति के क्षेत्र् में इंदिरा गांधी का नाम पहले से ज्यादा चमकता जा रहा है| इंदिरा गांधी अपने पीछे विदेश नीति की इतनी शानदार विरासत छोड़ गई हैं कि कई सदियों बाद भी उसको भुलाना असंभव होगा| 

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                                                                                                                                                             परिचर्चा
                                                                                                                                                         -मनोज मिश्र


        ओबामा की चिन्ता के केन्द्र में भारतीय छात्र

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की नवम्बर की बहुप्रतीक्षित भारत यात्रा पर कई देशों में आम भारतीयों की नजर भी लगी हुई है। कई समीक्षक उनकी विदेश नीति तथा कई अन्य विषयों पर उनके रूख की समीक्षा कर रहे है। बराक ओबामा की यह यात्रा निसंदेह उत्साहपूर्ण वातावरण में हो रही है। संसद के संयुक्त अधिवेश्न सहित वे कई आर्थिक-राजनैतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेगें। बराक ओबामा की सोच भारत के बारे में क्या है? वे भारत के विश्व पटल पर उभरने की संभावना को राजनैतिक-कूटनीतिज्ञ कारणों से नहीं अपितु अन्य कारणों से देख रहे है। ओबामा जब से अमेरिका के राष्ट्रपति बने है तब से कई बार भारतीय छात्रों एवं उनकी मेधा की चर्चा विभिन्न मंचों पर कर चुके है। उनकी चिन्ता उभरती अर्थव्यवस्था के प्रतीक भारत एवं चीन के वे छात्र हैं जो विश्व पटल पर छा जाने के लिए जबर्दश्त मेहनत कर रहे है। इन छात्रों के परिवारीजन अपने सारे संसाधन झांेक कर उनको उच्च शिक्षा तथा तकनीकी शिक्षा मुहैया करा रहे है।
शिक्षक से अमेरिका के राष्ट्रपति बने बराक ओबामा की इन चिन्ताओं की जड़ में उनकी अमेरिका के प्रति गहरा लगाव तथा संवेदनशीलता है यह लगाव और संवेदनशीलता उनके द्वारा लिखी गई किताबों ‘‘ड्रीम्स फ्राम माई फादर, दि आडोसिटी आफ होप तथा चेन्ज वी कैन विलीव इन’’ से समझी जा सकती है। पहली किताब ड्रीम्स फ्राम फादर में  श्वेत-अश्वेत संदर्भ के साथ-साथ उनके अपने निजी संघर्ष का गहरा चित्रण है। दूसरी तथा तीसरी किताब अमेरिका के सीनेटर तथा राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी बराक ओबामा की अमेरिकी नेता को तौर पर प्रस्तुति है। बराक ओबामा निसंदेह अपने कई समकक्षी राष्ट्रपतियों की तुलना में जमीन से उठकर राष्ट्रपति के पद पर मेरिट से चुने गये राष्ट्रपति है यह उनकी योग्यता ही लगती है कि श्वेत-अश्वेत संघर्ष के प्रतीक बनकर पहले अश्वेत अमरीकी राष्ट्रपति बनने का गौरव उन्हे हासिल हुआ। अमेरिकी की रंगभेद नीति के साथ उन्हे अपने देश की समस्याओं और भविष्य की चुनौतियों का अन्दाज है। आज का अमेरिका भी अन्यों देशों की तरह कई ऐसी चुनौतियों से जूझ रहा है जिसके परिणाम अमेरिका के भविष्य के लिए अच्छे होने के संकेत नहीं है।
अपने राष्ट्रपति चुनाव के दौरान बराक ओबामा अपने भाषणों में कहा करते थे कि सबसे विकसित देश में 4 करोड़, 70 लाख लोग बिना स्वास्थ्य बीमा के रह रहे हैं। स्वाथ्य बीमा के प्रीमियम की वृद्धि दर लोगों की आय वृद्धि की दर से कहीं ज्यादा है। एक करोड़ से कुछ अधिक अवैध आव्रजक है। अमेरिका तथा सुदूर प्रान्तों में धन तथा कम्प्यूटर के अभाव में स्कूल आधे टाइम से बन्द हो जाते है। अमेरिकी सीनेट उच्च शिक्षा में बजट में कटौती कर रही है। जिससे लाखों छात्रों के उच्च शिक्षा में प्रवेश के द्वारा बन्द हो जाने का खतरा है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी तथा शिक्षा का स्तर अपेक्षित तौर पर बढ़ नहीं पा रहा है तथा छात्रों का मन इन विषयों में न लगकर टीवी तथा कम्प्यूटर गेम्स में लग रहा है। देश पर उधारी लगातर बढ़ती जा रही है तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत तथा चीन जैसे कई देश बड़ी चुनौती प्रस्तुत करने की ओर है। ऊर्जा पर बढ़ती निर्भरता उनकी चिन्ता का प्रमुख कारण है। आउट सोर्सिंग के कारण नौकरियॉ विदेश स्थानान्तरित हो रही है तथा गूगल जैसी कम्पनियों में आधे कर्मचारी एशियाई है जिनमें से भारत तथा चीन के ज्यादा संख्या में है।
अमेरिका के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद बराक ओबामा ने पूर्व घोषित कार्यक्रमों में से दो प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित किया। इन दो कार्यक्रमों में से एक सबकी पहुंच में स्वास्थ्य बीमा तथा अमेरिकी शिक्षा व्यवस्था को उच्च स्तरीय तथा प्रतिस्पर्धी बनाना। अपने स्वास्थ्य एजेण्डा हेतु स्वास्थ्य विधेयक प्रस्तुत किया तथा कड़े संघर्ष के बाद जीत दर्ज की। स्वास्थ्य विधेयक के बाद बराक ओबामा की चिन्ता प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक की सुधार का प्रयास। बराक ओबामा को लगता है कि भारत और चीन के छात्र अपने को वैश्विक स्तर पर ज्यादा प्रतिस्पर्धी सिद्ध कर रहे है तथा उनके अभिभावक उनका मार्गदर्शन तथा सहयोग कर रहे है। इसके विपरीत उनके अपने देश में ओबामा के अनुसार छात्रों की रूचि पढ़ाई से घट रही है। भारत तथा चीन अपने-अपने शिक्षा के स्तर में निरन्तर सुधार कर रहे है तथा अपना बजट बढ़ा रहे है। भारत में दिन प्रतिदिन उच्च तथा तकनीकी शिक्षा का विस्तार हो रहा है। उनकी गुणवत्ता में सुधार के गम्भीर प्रयास हो रहे है। भारत सूचना युग में बढ़त बना चुका है तथा अब शैक्षिक इनफ्रास्ट्रकचर सुधार कर ज्ञान के युग का दोहन कर रहा है। बराक ओबामा के अनुसार अमेरिकी डाक्टरों, इन्जीनियरों तथा अन्यों पेशेवरों का मुकाबला उनके अपने ही देश के प्रतिस्पर्धियों से न होकर भारत तथा चीन के पेशेवरों से होगा। भारत तथा चीन अपने-अपने पेशेवरों को इस वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार कर रहें है, जबकि अमेरिका ऐसे समय में अपने उच्च शिक्षा तथा शोध के बजट में 20 प्रतिशत की कटौती कर रहा है उनके अनुसार यह कटौती अमेरिका के भविष्य पर पड़ने की संभावना है जिसके कारण लगभग 20 लाख अमेरिकी छात्र उच्च शिक्षा से वंचित  रह जायेगे।
राष्ट्रपति बराक ओबामा की चिन्ता के सन्दर्भ में भारत को भी सबक लेने की जरूरत है। जो चिन्तायें ओबामा के मस्तिष्क में है वे चिन्तायें भारत के लिए संभावना के नये-नये द्वारा खोलती है। आउट सोर्सिंग पर प्रतिबन्ध राजनैतिक कारणों से तो ठीक हो सकता है परन्तु अमेरिकी कम्पनियों के लिए आर्थिक कारणों से उचित नही है। आउट सोर्सिंग के क्षेत्र में भारत कई तरीके के बिजनेश माडल प्रस्तुत कर रहा है तथा अमेरिकी कम्पनियों को उनके हित लाभ के लिए आकर्षित कर रहा है। विज्ञान, टैक्नोलॉजी तथा शिक्षा के क्षेत्र मंे बजट बढ़ाकर विश्व स्तरीय छात्र तैयार कर भविष्य का मस्तिष्क युद्ध भारत जीत सकता है। ज्ञान के इस युग मंे ब्राडबैण्ड की उपलब्धता तथा विस्तार कर देश के सुदूर भाग को शैक्षिक क्रान्ति का भागीदार बनाया जा सकता है। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तथा तकनीकी शिक्षा को वैश्विक स्तर का बनाना हमारा प्रथम लक्ष्य होना चाहिए। राज्य सरकारें तथा केन्द्र सरकार को अपने-अपने पार्टी हितों को छोड़कर राष्ट्रीय हित में गम्भीर प्रयास करने चाहिए। भारत में शिक्षा का प्रसार हो तो रहा है परन्तु उनकी गुणवत्ता अपेक्षित स्तर की नही है। प्रान्तीय सरकारों में दूरदर्शी नेतृत्व का अभाव है तथा शिक्षा इनकी अन्तिम प्राथमिकता है। अतः हमें विश्व पटल पर एक सुनहरा अवसर प्राप्त हो रहा है जिसे यदि सरकार चाहें तो हम इसकों सफलता में बदलकर वैश्विक प्रतिस्पर्धा का रूख अपनी ओर कर सकते है। बराक ओबामा ने कहा कि पिछली एक सदी में कोई भी युद्ध अमेरिकी धरती पर नहीं लड़ा गया है। परन्तु अब साइबर क्रान्ति के कारण हर देश और कम्पनी का रूख अमेरिका की ओर है। और उनकी यही चिन्ता है। अब युद्ध का हथियार ज्ञान होगा जिसके लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा का वैश्विक मन्च तैयार हो रहा है और भारत एक बड़ा खिलाड़ी बनकर उभर सकता है। हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सभी जरूरी संसाधन पर्याप्त मात्रा में देश मंे उलब्ध है हमारे यहॉ बहुत सी नीतियॉ और संस्थायें है। चुनौती है तो बस शिक्षकों, विद्यार्थियों और तकनीक तथा विज्ञान को एक सूत्र में पिरोकर एक दिशा में सोचने की। 

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                                                                                                                                                              चौपाल


                                                                                                                                                      -   अजय पाराशर

मोटे अनाज से संभव है भूख और स्वास्थ्य का इलाज़

 कभी आपने सोचा है कि पहाड़ी या मैदानी क्षेत्रों के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले अधिकांश लोग क्यों सर्दी, गर्मी और बरसात के असर से बेपरवाह रहते हैं या हमारे पूर्वज क्यों मौसम की मार आसानी से सह लेते थे? उनकी सेहत क्यों तरोताज़ा बनी रहती है और उनमें शहरी लोगों या ग्रामीण इलाकों के सम्पन्न लोगों की अपेक्षा क्यों अधिक दम$खम दिखता है? अगर नहीं तो उनके खान-पान का चार्ट देखिए और आपको उनके स्वस्थ रहने का मंत्र पता चल जाएगा। मोटा अनाज, हरी पत्तेदार सब्जियां और ऐसा खालिस दूध, जो जानवरों को कृत्रिम चारा नहीं बल्कि हरा-ताजा घास खिलाकर प्राप्त किया जाता है, उनके भोजन का मुख्य हिस्सा होता है या होता था। परन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् हमने अपनी कृषि नीति को बदल कर गेहंू और चावल जैसी फसलों पर अपनी निर्भरता बढ़ा ली। बढ़ते बाज़ारीकरण ने भी मोटे अनाजों से लोगों की दूरी बढ़ा दी। हरित क्रान्ति के दौर में गेहंू और चावल के उत्पादन को बढ़ावा दिए जाने से कुल कृषि उत्पादन में मोटे अनाजों की पैदावार धीरे-धीरे कम होती गई। मोटे अनाजों की तुलना में पिछले चालीस सालों में धान का उत्पादन दो गुना और गेहूं की पैदावार तीन गुना बढ़ी है। हरित क्रांति के इस दौर में एकफसली खेती को अत्याधिक बढ़ावा दिए जाने से गेहूं तथा चावल प्रमुख फसलों के रूप में उभर कर सामने आए हैं। परन्तु देहाती समझकर जिन मोटे अनाजों को आज रसोई से बाहर किया जा चुका है, उनकी पौष्टिकता वैज्ञानिक शोधों से सत्यापित की जा चुकी है।
 यह निर्विवाद सत्य है कि गेहूं तथा चावल के अधिक उत्पादन से कृषि चक्र के साथ-साथ मानव का आहार चक्र भी गड़बड़ा गया है। पहले घर में तैयार किए जाने वाले आटे में चना, बाजरा, जौ, मक्का, मडुआ, कुटकी, रागी आदि मिलाये जाते थे। परन्तु अब यह बीते ज़माने की बातें हैं और अगर आज के बच्चों से इन अनाजों की पहचान पूछी जाए तो उनमें से अधिकांश ने इन अनाजों के बारे में सुन भी नहीं रखा होगा। पर अन्य अनाजों की तुलना में मोटे अनाज अधिक पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक होते हंै।  इन फसलों के उत्पादन से गिरते भू-जल के संवद्र्धन के अलावा जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा संकट, स्वास्थ्य और खाद्यान्न संकट जैसी समस्याओं पर काबू किया जा सकता है। इन फसलों के लिए कम पानी दरकार होता है और अपेक्षाकृत कीटनाशक तथा रासायनिक उर्वरक भी कम लगते हैं।  कीटनाशकों तथा रासायनिक उर्वरकों का कम प्रयोग होने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति पर भी कम प्रभाव पड़ता है। इससे भू-जल पर भी विपरीत असर नहीं पड़ता।  उदाहरण के लिए अगर हम पंजाब की बात करें तो यहां पिछले कई सालों से की जा रही धान की खेती का सीधा असर भू-जल पर पड़ा है और प्रतिदिन गिरते भू-जल के स्तर के कारण अब यहां मक्का की खेती की संस्तुति की जा रही है। यह भी दिलचस्प तथ्य है कि मोटी फसलों के उत्पादन में लागत भी कम आती है।  यह फसलें सूखा प्रतिरोधी होती हैं और इनको कम उपजाऊ ज़मीन पर भी आसानी से सफलतापूर्वक बीजा जा सकता है।
 ग्रैमिनी या घास कुल के पौधे जिनको बीज के लिए उगाया जाता है, अनाज कहलाते हैं। एक भली प्रकार पके हुए दाने के तीन हिस्से होते हैं। भू्रण या जर्म, स्टॉर्चयुक्त इंडोस्पर्म और बाहरी आवरण, जिसे पेरीकॉर्प भी कहा जाता है। कुछ अनाजों के दानों की बाहरी परत रेशेदार छिलकों से कसी होती है, जिनको आमूमन मंडाई से भी नहीं निकाला जा सकता। इन अनाजों को मोटा अनाज कहते हैं, जिनमें चना, बाजरा, ज्वार, कोदो, मडुआ, मक्का, सांवा, कंगनी, कुटकी, रागी आदि शामिल हैं।  मोटे अनाजों में गूदा अधिक होने से यह आंतों में नहीं फंसता और इससे कब्ज़ नहीं होती है। ऐसे अनाज सुपाच्य होते हैं और मोटापे को हावी नहीं होने देते।  पहले माताएं शिशुओं को ज्वार और आटे का घोल पिलाती थीं, जिससे उनकी प्रतिरोधक क्षमता काफी मज़बूत होती थी। मोटे अनाजों की पैदावार मुख्यत: कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तामिलनाडु और महाराष्ट्र में होती है।
 फसल विज्ञानी डॉ उमा रघुनाथन के अनुसार सांवा, कोदो, मक्की, रागी आदि जैसे मोटे अनाज गेहूं तथा चावल की अपेक्षा अधिक पौष्टिक होते हैं। इस संबन्ध में उनके शोधपत्र भी प्रकाशित हो चुके हैं। उनके अनुसार जहां गेहूं में अल्प अवधि में घुन लग जाता है, वहीं मडुआ का दाना दो दशकों तक यथावत बना रहता है।  एक ही मात्रा में लेने पर कंगनी चावल की अपेक्षा 81 प्रतिशत अधिक पौष्टिक होती है। काबुली चना में 23 प्रतिशत अधिक प्रोटीन होती है। रागी में 3340 प्रतिशत अधिक कैल्शियम होता है। सांवा में 840 फीसदी अधिक वसा, 350 प्रतिशत फाईबर और 1229 प्रतिशत आयरन, बाजरा में 85 प्रतिशत फासफोरस और कोदो में 633 प्रतिशत अधिक खनिज तत्व होते हैं।
 जई में आसानी से पचने वाले फाइबर के अतिरिक्त कम्पलैक्स  कार्बोहाईडे्रट्स मौजूद होते हैं। इसमें कैल्शियम, जिंक, मैग्रीज, लोहा और विटामिन बी और ई भारी मात्रा में मौज़ूद रहते हैं। यह हृदय रोगों के खतरे को कम करता है और एलडीएल की क्लियरैंस को बढ़ाता है। इसमें विद्यमान एंटीकैंसर फोलिक एसिड बच्चों के लिए उपयोगी होता है। यह मधुमेह तथा डिसलिपिडेमिया के रोगियों के लिए लाभदायक होता है।  जौ में फाईबर की अधिकता होती है और यह ब्लड कोलेस्ट्रोल कम करके ब्लड ग्लूकोज को बढ़ाता है। यह मैग्रीशियम का अच्छा स्रोत है और एंटीऑक्सीडेंट है। इसमें अल्कोहल अधिक मात्रा में होती है और यह हाईपरटैंशन के रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक होता है। रागी में कैल्शियम प्रचुर मात्रा में विद्यमान होता है, जो ऑस्टेपेनिया तथा ऑस्टियोपोरोसिसग्रस्त लोगों के लिए लाभदायक है।  मासिक चक्र रुकने के बाद यह महिलाओं को स्वस्थ्य रहने में विशेष मदद करता है। लेक्टोज की समस्या से पीडि़तों के लिए लाभकारी होने से इसका प्रयोग छोटे बच्चों में भी होता है। बाजरा की तासीर गर्म होती है जिसके चलते यह सर्दियों में विशेष गुणकारी होता है। परन्तु इसे किसी और अनाज में मिलाकर खाया जाना चाहिए। यह प्रोटीन, विटामिन बी, आयरन और कैल्शियम का भंडार होता है। मैथाइन, ट्राइप्टोफॉन और इनलिसाइन का भंडार माना जाता है। ज्वार में वसा तो कम होती है पर इसमें कार्बोहाइड्रेट प्रचुर मात्रा में मौज़ूद होता है। इसे भी सर्दियों में प्रयोग किया जाता है।  आयरन और कैल्शियम से भरपूर ज्वार पोलिसिस्टिक ऑवेरी सिंड्रोम से पीडि़तों के लिए काफी लाभदायक होता है। यह मूत्र प्रक्रिया को सुचारू बनाए रखने में मदद करता है तथा हाईपरटैंशन के रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक होता है।
 आज के परिवेश में अगर हम आवश्यकता की बात करें तो जनसंख्या विस्फोट तथा मंहगाई के दौर में गरीबी से जूझ रहे हमारे राष्ट्र के लिए मोटे अनाजों की उपयोगिता कई गुना बढ़ जाती है।  अगर हम आंकड़ों के दर्पण में झांकें तो पता चलता है कि वर्तमान में भारत की जनसंख्या 119.80 करोड़ है जो विश्व की सर्वाधिक आबादी वाले देश चीन से बस 14.7 करोड़ ही कम है। जनसंख्या के मामले में हम संसार में दूसरे नम्बर पर हैं। परन्तु पिछले पांच साल में बढ़ोतरी की भारतीय दर 1.4 फीसदी रही है और चीन की केवल 0.6 प्रतिशत।  इस तरह भारत की जनसंख्या 2050 में 161.38 करोड़ हो जाएगी जबकि चीन की आबादी 147 करोड़ होगी। यह भी एक दिलचस्प तथ्य है कि भारत के आठ राज्यों, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा तथा मध्य प्रदेश में दुनिया के 26 गरीब अफ्रीकी देशों से भी अधिक गरीब बसते हैं।  हमारे इन आठ राज्यों में 42.1 करोड़ गरीब लोग रहते हैं जबकि इन 26 देशों की जनसंख्या 41 करोड़ ही है। इस तरह कहा जा सकता है कि गिरते भू-जल स्तर, बढ़ती जनसंख्या, दिन पर दिन घटती खेती योग्य भूमि तथा कृषि चक्र में एकाकीपन अपनाने से आने वाले सालों में भारत में अन्न समस्या गहराने वाली है।  ऐसे में बेहतर होगा कि हम अभी से ही बतौर सजग नागरिक पहल करते हुए मोटे अनाजों की ओर रुख करें तथा अपना और राष्ट्र का भविष्य स्वस्थ एवं सुरक्षित बनाने का प्रयास करें। 

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                                                                                                                                          चांद परियां और तितली











एक था राजा...

एक राजा था। बहुत अमीर, पर बहुत लालची। उसका घर आंगन, धन-धान्य, सोने-चांदी से भरा रहता , पर उसकी और-और की लत खतम ही नहीं होती। जनता को लूटता , पड़ोसी देशों पर हमले करता और उनके जेवर-जेवरात भी लूट-लपाट कर अपने खजानों में भरवा लेता। बात यहां तक बढ़ी कि उसके महल की सारी दीवारें , कोना-कोना सोने से मढ़ चुका था। जगह-जगह हीरे-पन्ने चमक रहे थे। राजा देखता और मन ही मन खुश होता पर उसकी और और की लालसा बढ़ती ही जाती। भगवान सब कौतुक-से देख रहे थे। नारद जी ने पहले ही उन्हें उस बेहद लालची, बेहद घमंडी राजा के बारे में बता दिया था। बता दिया था कि कैसे उसे अपने सिवाय किसी और की परवाह नहीं थी। हंसने-रोने का कोई मतलब नहीं था उसके जीवन में। उसका मन मचलता तो बस चमकते-चमकते स्वर्णिम सोने से।

भगवान से नहीं रहा गया । वह उसके सामने प्रकट हो गये। पूछा - कि अब तो तुम्हारे पास दुनिया में सबसे ज्यादा धन –दौलत है , अब तुम दुनिया के सबसे शक्तिशाली, सबसे अमीर राजा हो । अब और क्या चाहते हो।

राजा ने सोचा- यही सबसे अच्छा मौका है। झट मांग बैठा- भगवान मैं चाहता हूं कि मेरे पास ऐसी शक्ति हो कि मैं जिस चीज को छुऊँ , सोने की हो जाए।

भगवान ने कहा-सोच लो, एक बार शक्ति आ गई तो मैं वापस नहीं ले पाऊंगा। राजा ने कहा- सोचना क्या भगवान ! यही  तो मेरी सबसे बड़ी , और बचपन से इच्छा है।

भगवान ठहरे भगवान। सर्व शक्तिमान और सब कुछ जानने-समझने वाले। यही तो चाहते थे वह। तुरंत ही आशीर्वाद दे दिया और अंतर्ध्यान हो गए ।

राजा अब बहुत खुश था। बगीचे के जिस पेड़ पत्ते को छूता, सोने का हो जाता। एक-एक पत्ती, तना , जड़ सब सोने का। फूल-फल, कलियां सब सोने की।  देखते-देखते पूरा बगीचा सोने का हो गया। राजा की आंखें खुशी से चमकने लगीं। हंसता-किलकता,ताली बजाता पोता सामने खेल रहा था । अपनी उपलब्धि दिखाने, यह नया कौतुक दिखाने के लिए , जैसे ही उसने उसे गोदी में उठाया , वह भी सोने का हो गया। अब तो बहू-बेटा , रानी, नौकर-चाकर जो-जो मदद को आए, जिस-जिस को राजा ने छुआ सोने के हो गए। उसकी पूरी प्रजा तक सोने की हो गई। राजा फटी आंखों से सब देखता रह गया , कुछ नहीं कर पाया।


अकेला-अकेला वह प्रेत-सा अपनी सोने की नगरी में रोता-बिलखता रहा। सोने की दीवारों से सिर मारता रहा, पर भगवान उसे कहीं नहीं मिले, जो अपना वरदान वापस ले पाते। अब रो-रोकर उसका बुरा हाल था। आखिर में एक दयालु पड़ोस के राजा से उसका दुख नहीं देखा गया और उसने उस सोने के महल में , सोने की नगरी में उससे पूछकर बाहर से ताला लगवा दियां, ताकि वह और जिन्दा लोगों को सोने की लाश में बदलने के दुख से बच सके। 


आते-जाते लोग बताते हैं कि प्रेत-सा वह राजा अपने सोने के राज्य में बहुत ही दुखी है।  कुछ खाने-पीने को भी नहीं है उसके पास। जिसे भी हाथ लगाता है सोने का हो जाता है। खाने का कौर , पीने का पानी सभी कुछ। बात करने को कुटुम्ब, परिवार और यार-दोस्त क्या, चिड़िया तक पर मारने को नहीं हैं आसपास। सब कुछ बस सोने का  जो है वहां  , जैसा कि वह चाहता था। ...

                                                                        -शैल अग्रवाल                                                        

                                                         ( एक यूरोपियन लोककथा से प्रेरित)








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           ताजा खबर











चश्मा चढ़ाए आंखों पर,
बिल्ला जी पढ़ रहे थे अखबार।
एक खास खबर को वे
बांच रहे थे बारबार।
 

तभी रसोई से चीखी बिल्ली,
बाद में, पढ़ना यह अखबार ।
बच्चों ने नाश्ता करना है,
चूहे मार लाओ दो चार।



बिल्ला बोला, तुम्हें खबर है
क्या कर रही अपनी सरकार।
चूहे अब मिला करेंगे
खुले आम बीच बाजार।                                                                                                   

रतन चन्द  रत्नेश