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                      सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर
                                   लेखनी-अक्तूबर-2010










            

          " कह न ठंडी सांस में अब भूल वह कहानी


             आग हो उर में तभी दृग में सजेगा पानी


             हार भी तेरी बनेगी माननी जय की पताका


            राख क्षणिक पतंग की है अमर दीपक की निशानी।"


                                        - महादेवी वर्मा                                        


                                     (वर्ष 4- अंक 44)

 इस अंक में :  प्यारे बापूः. जगदीश व्योम, सीतारामगुप्ता। कविता धरोहरः सुभद्रा कुमारी चौहान । कविता आज और अभीः उमा श्री, हरिहर झा, किशोर काला, दीप्ति, बी.पी.दुबे,  देवी नागरानी।  माह की कवियत्रीः शैल अग्रवाल । माह विशेषः तस्लीमा नसरीन। बाल कविताः रामधारी सिंह दिनकर व अज्ञात।

मंथनः चन्द्रकांता, गंगाधर विमल, रोहिणी अग्रवाल। परिचर्चाः गिरेन्द्र सिंह भादौरिया प्राण। कहानी भाषान्तरः गुहना- तामिल से अनुवाद सु. गुरुमूर्ति।  कहानी समकालीनः  शैल अग्रवाल।  कहानी समकालीनः महेन्द्र दवेसर। सरोकारः ताराचन्द आहूजा । विचारः डा. शकुन्तला। हास्य व्यंग्यः श्री गोविन्द मिश्र। चौपालः डॉ. रवीन्द्र अग्निहोत्री। बाल कहानीः लोक कथा। स्मृतिशेषः शैल अग्रवाल।  माह की साहित्यिक और सांस्कृतिक खबरों से भरपूर विविधा।

                                                          संरचना, संपादनः शैल अग्रवाल  

                                           संपर्क सूत्रः : editor@lekhni.net; shailagrawal@hotmail.com 

                                           पत्रिका माह की पहली तारीख को परिवर्तित की जाती है।

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                                                                                                                                                   अपनी बात

प्रश्न  मत पूछ,  उत्तर  मत   ढूँढ
यूँ ही चलती है दुनिया, यूँ ही चलेगी
जानते जो , सोचते जो, करते नहीं कुछ
सो गये हैं सभी मुंह ढक ...                                                                                                                       

विचार जब पद्धति बन जाएँ तो खतरनाक स्थिति है और नारी के साथ तो जाने कब से यही होता आया है....समाज के रवैये में भी और खुद उसकी अपनी नजर में भी । उगते सपनों की घास और झुकते चांद की परछांई बेहद नशीली होती है और पुरुष ने तो ऐसा रोपा है उसे अपनी सुविधानुसार दोनों के बीच  कि आजतक धान-सी फल-फूल रही है, और खुश भी है वह।


अधिकार भी तो  खुद ही लेना पड़ता है। जबतक नारी खुद शिक्षित और जागरूक नहीं होगी , अपनी जाति अपने समाज का, खुद का ही हनन और शोषण करना नहीं छोड़ेगी , नारी विकास और समानाधिकार की बातें निष्फल और बेमानी ही रहेंगी।


सदियों से  चला आता समाज का दोयम दर्जें का रवैया न सिर्फ उसे हर क्षेत्र में  बेड़ियां पहनाकर जकड़ रहा है, खुद वह भी तो नियति मानकर स्वीकार चुकी है इस  स्थिति को। पुरुष की हर उच्छृंखलता को ममतामयी मां सी आंचल से पोंछने वाली नारी वाकई में लड़े तो किससे लड़े! नारी विमर्श तो वह साझा चूल्हा है जिसपर सबके लिए प्यार की खिचड़ी पकाना ही  सीख और देख पाई है वह।  अगर ऐसा न कर पाए तो दादी नानियों की कई-कई पीढ़ियों से दगाबाजी-करती आज भी तो महसूस करती है वह। उसका चूल्हा ठंडा तो रह सकता है पर जलेगा तो स्वादिष्ट पकवान ही उगलेगा।                                                      


जीने के दो ही मार्ग छोड़े गए हैं उसके लिए , या तो किसी सशक्त पुरुष  की छतनारी छाया में जा बैठे  या फिर किसीकी न होकर सबका ही मनोरंजन और कौतुक बन जाए। उसे भी तो कहीं न कहीं शायद आदत पड़ चुकी है इस सबकी, तभी तो सदैव ललायित रहती है, प्रशंसा की मात्र एक दृष्टि के लिए। बढती सौंदर्य प्रसाधनों की बिक्री गवाह है इस बात की कि उसे भी सजी-धजी गुड़िया बनकर रहना पसंद है। अपने शरीर...रूप के औजार की ताकत जानती है वह।  क्या क्या नहीं करती या कर गुजरती प्रसन्न करने को ...  खुद को भूलकर, अपने अस्तित्व को भुलाकर।  भांति भांति के श्रंगार, पकवान, तरह-तरह के आयोजन...सभी कुछ। और बदले में अधिकाशतः प्रताडना व लांछन या फिर वही अग्नि-परीक्षा। अतिशयोक्ति नहीं होगी यदि कहा जाए कि बढ़ती भौतिकवादिता के साथ आज नारी मनोरंजन और विज्ञापन का साधन मात्र बनकर ही  तो रह गई है, तस्बीरों सी या तो घरों की दीवारों पर लटक गई है या फिर पब्लिक हाउसेज और दफ्तरों में सेन्टर पीस बनी फिरकनी सी नाच रही है। किसी दूसरे के हाथ में रखे रिमोट से संचालित होकर स्वाधीनता की खुशफहमी का शिकार है। गलती से कुछ कर गुजरे, कोई मुकाम हासिल कर ले तो प्रसंशा की जगह परिहास ही ज्यादा आता है उसके  हिस्से में। 'औरत होकर इतना कर गई'- यही सुनने को मिलेगा।  क्या  उदास, बेबस और अबला जैसे शब्दों से अलंकृत यह नारी घर से बाहर वाकई में निकल पाई है ? कोई-न-कोई छतरी अवश्य तनी रहती है सिर पर वरना भांति भांति की नजरों की धूप ही पर्याप्त है सुखाने और गिराने के लिए उसे ।  शायद यही वजह है कि समानाधिकार जैसे मुद्दे इसके पक्ष में उछाले तो आए दिन ही जाते हैं पर मात्र एक गरम तवे पर छन्नाती  बूंद से पलभर में तुरंत ही सूख भी जाते हैं। आजभी ऐसे देश मिल जाएँगे जहां बच्चियां आजीवन ड्योढ़ी नहीं लांघती। जिस घर में पैदा हुईं, उसी में बच्चे संभालती अर्थी पर चढ़कर ही बाहर निकल पाती हैं।

कहीं लोहे की चोली पहने नारी तो कहीं चोलियों को जलाती नारी आज भी समाज के इस पुरुष प्रधान ताने बाने में फंसी मकड़ी सी अपने अस्तित्व के लिए झटपटा रही है । चंद अपवादों की बात छोड़ें तो कभी देवी तो कभी कुलटा का प्रमाण पत्र सजाए और लटकाए आज भी अपने सही और संतोषजनक मूल्यांकन और प्रस्थापन के लिए बेचैन है वह।

 आज भी शायद  जान नहीं पाई है कि उसकी असली स्वतंत्रता या मुक्ति तो छोड़ो , सही स्थान और कर्तव्य तक क्या हैं, कौनसी जिम्मेदारी और वफादारी ज्यादा संतोषजनक है , खुद के प्रति या परिवार और समाज के प्रति? वर्षों से त्याग की मूर्ति में ही गौरवान्वित नारी जानती ही नहीं कि आज भी उसका रिमोट पुरुषों और समाज के हाथ में ही रहना चाहिए या नियंत्रण उसे अब स्वयं खुद ले लेना चाहिए? त्याग कहीं आरक्षण के कानून का आश्वासन तो कहीं उसकी बढ़ती ताकत का आइना दिखाकर आज भी उसे पूर्ववत् ही बहलाया –फुसलाया जा रहा है और आज भी वह पुरुष-प्रधान समाज के रिमोट पर कठपुतली सी ही चलती , उपलब्धियों के नाम पर सहर्ष मनोरंजन और भोग की वस्तु ही बनी हुई है। हाल ही में माननीय विभूति नरायण सिंह जी के वक्तव्य ने जितना नारी चेतना को आलोड़ित किया उसने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर किया है– गलत को गलत कहना और समझना सही है परन्तु भयों के भूतों के पीछे अपना संयम और संतुलन खोना कहां तक सही है, यह भी एक  सोच व समझ का विषय है।...कहीं पुरुषों के इस गलत और गैर-जिम्मेदाराना रवैये में खुद इस आधुनिक नारी का भी तो भरपूर हाथ नहीं? कहीं माँ, बहन और पत्नी व प्रेयसी की भूमिका में वह अपने नारी सुलभ गुण ( संचय और पोषण ) को भूल, आगे बढ़ने की दौड़ में  एक अराजक और अतृप्त पुरुष वर्ग ही नहीं पूरा-का पूरा समाज ( जिसमें नारी खुद भी शामिल है) को तो नहीं तैयार करती जा रही वह और खुद अपने ही दुर्भाग्य का कारण बनती जा रही है।


नारी के प्रति दुर्व्यवहार और अत्याचार की श्रृंखला में दहेज और बलात्कार के साथ-साथ अब भ्रूणहत्या और औनर किलिंग जैसे नए–नए और घिनौने अपराधों में भी वृद्धि होती दिख रही है। आश्चर्य की बात तो यह है कि अक्सर घर की बड़ी-बूढ़ियों यानी कि जिम्मेदार और परिपक्व नारियों की इसमें स्वीकृति रहती है। जब खुद नारी ही नारी की सबसे बड़ी दुश्मन है तो फिर पुरुष वर्ग से किस संयम और सद् व्यवहार की अपेक्षा की जाए। व्यक्तिगत सोच पर अंकुश लगाया जा सकता है। एक आदमी का मुंह भी बन्द किया जा सकता है , परन्तु पूरे समाज को सुधारने के लिए सभी की सोच और संस्कार बदलने पड़ेंगे। खुद नारी को अपना नजरिया भी बदलना पड़ेगा। बचपन से ही बेटे-बेटी के साथ किए अपने बर्ताव को संयमित और संतुलित करना होगा। आज भी बहुत शर्म और दुख के साथ याद आती है यहीं पश्चिम के पड़ोस में रहती  वह पढ़ी-लिखी और संपन्न माँ जो बेटे को मक्खन और बेटी को मार्जरीन खिलाकर बड़ा कर रही थी, बिना किसी ग्लानि या पश्चाताप के। शायद बेटी मोटी  न हो यह सोच हो सकती है इसके पीछे परन्तु अक्सर आज भी अच्छा और पौष्टिक भोजन मां पहले बेटों को परोसती है और बचा-कुचा ही बेटियों को मिल पाता है। अब जब मां ही ऐसा दोयम दर्जे का व्यवहार करेगी तो बड़ा होता बेटा कैसे जानेगा कि उसका नारी के प्रति हेय रवैया गलत भी है । वास्तव में वह क्या चाहती है जीवन और समाज से, समझना होगा खुद नारी को भी।

नारी हो या पुरुष एक दूसरे के बिना दोनों ही अपूर्ण हैं और आधिपत्य की लड़ाई में भटके आधे-अधूरे सुख, तृप्त कम क्षुब्ध ही अधिक करते हैं। 

साहित्य सिर्फ रेखांकित करता है। समझ और सोच व्यक्तिगत्  है। रास्ते में बिखरे कंकड़ों को झाड़कर एक ओर करने का प्रयास है यह अंक, आगे क्या करना चाहिए या होना चाहिए सभी को सोचना होगा...सभी यानी स्त्री पुरुष दोनों को। बस, पाठकों से विशेषतः बहनों से इतना निवेदन अवश्य है कि यदि हममें गुत्थियाँ सुलझाने का , झाड़ने –बुहारने का माद्दा नहीं, तो इक्के-दुक्के वक्तव्यों पर आक्रोश, चाय के प्याले में उठते तूफान से ज्यादा कुछ नहीं। गलतियाँ और किरकियाँ बहुत हैं और सर्वत्र हैं परन्तु नारी स्वतंत्रता और नारी सुख आज भी दोनों के ही सुख को ध्यान में रखकर ही मिल पाएंगे।


सब कुछ देख और जानकर भी अनदेखा करते जाना आज की इक्कीसवीं सदी की पहचान बनती जा रही है। नर हो या नारी, पहाण के कगार पर खड़े होकर खाई में कूदने वाला व्यक्ति भी यह मेरा अपना जीवन है, इसीकी दुहाई देता  है। न किसी को किसी की दखलंदाजी पसंद और ना ही भागती दौड़ती मशीनरी जिन्दगी में किसी के पास फुरसत है कि दूसरे के बारे में सोचे और कुछ करे। विद्रोह और आक्रोश के बुदबुदे खदकते हैं और फिर तुरंत ही वक्त की धार में विलुप्त भी हो जाते हैं। जबतक सामूहिक जागृति नहीं, समाज वहीं –का- वहीं ही खड़ा रहेगा। यूँ ही निरर्थक और नए-नए शोर और प्रयासों की चुटपुट आवाजें होती रहेंगां...यूँ ही सब काजल-सा आँखों में खुलकर रमेगा और  बह भी जाएगा। एक आध धब्बों को इधर उधर उम्मीद के रूमाल से पोछते  हम यूं ही  अपाहिज से  देखते भी रहेंगे। खोए सुख -सा कहूं या आंख की किरकिरी सा, लेखनी में भी यह मुद्दा घूम-फिरकर बारबार ही उठा है। विवादास्पद मुद्दों से उत्तेजित करना उद्देश्य नहीं, मुद्दा तभी सार्थक है जब उसका कल्याणकारी और विवेकपूर्ण  समाधान हो।  


आधी दुनिया अर्थात् नारी जगत् को पुरुष-प्रधान समाज में पुरुष की बराबरी पर लाने के लिए दुनिया भर में जद्दोजहद लगातार जारी है।  पर नारी है कि सारी दुनिया में वहीं की वहीं खड़ी नजर आती है। एक सवाल ...एक मुद्दा, जिससे हर जागरूक  साहित्य प्रेमी भलीभांति परिचित है और  जिसने हाल ही में काफी आक्रोश भी पैदा किया है विशेषतः नारी चेतना में; पर क्या सिर्फ मुद्दे उझाल भर देने से समस्याएं खतम हो जाती हैं...मेरी समझ से तो चंद कीचड़ के धब्बों के अलावा कुछ हाथ नहीं लगेगा। रोकना है तो हमें यह दलदल ही रोकनी होगी।  क्या हैं इन गैर-जिम्मेदाराना ,   नारी के प्रति तुच्छ व उपेक्षित रवैये की वजह, पुरुष प्रधान समाज या खुद प्रगति और उपलब्धि की दौड़ में आज की भ्रमित सामाजिक व्यवस्था और कुछ हद तक खुद नारी भी...जो थम कर रुकना , सोचना  तक भूलती जा रही है? क्या नाक की सीध में दौड़ने वालों को  ठोकर लगने पर उफ् करने का अधिकार होना चाहिए? क्या भारतीय समाज में ( इक्के -दुक्के अपवादों को छोड़कर) सामंतशाही पुरुष नारी को वास्तव में बराबर का हिस्सा और इज्जत देने के लिए तैयार है, और यदि हाँ तो  क्या  हैं इन सवालों के भद्र और  सुसंस्कृत जवाब? कैसे और कहाँ से शुरु हो यह बदलाव...शिक्षा से, घर से या फिर व्यक्तिगत दैनिक आचरण से ? क्या हम रोक सकते हैं एक शांत और संयत जागरूक आन्दोलन के साथ इस फिसलन को  ! अनगिनत उपलब्धियों और स्नेह व त्याग के साथ साथ बुद्धि और श्रम में भी अद्वितीय  नारी आज भी क्यों पशु वत् ही शोषित और पोषित  हैं?। भोग और मनोरंजन की वस्तु है?  व्यापार की वस्तु है?   नवरात्रि शुरु होने वाली हैं। मातृ-संस्कृति में पले-बढ़े हमारे समाज में भी क्यों नारियों की यही दशा है? क्यों इसे एक तरफ सर्व सुखदायिनी तो दूसरी तरफ नागिन और डायन जैसी संज्ञा दी जाती हैं? आप के क्या विचार हैं नारी के इस उलझे भाग्य और कुंठित चरित्र पर?


सार्थक और संयत विचारों का स्वागत है...


नवरात्रि और दशहरा...बुद्धि , ज्ञान और विवेक...सत्य की असत्य पर विजय के त्योहार हैं। अत्याचार के अंत के त्योहार हैं।  समाज इन त्योहारों को  संदेशों के अर्थ की पूर्णता के साथ अपनाए और मनाए...इसी मंगल कामना के साथ,


                                                                                         - शैल अग्रवाल  

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                                                                                                                                             2'nd Oct 2010


                                          


                                                        है किसकी तस्बीर

                 






सोचो और बताओ आखिर है किसकी तस्बीर
नंगा बदन कमर पर धोती
और हाथ में लाठी
बूढ़ी आंख पर है ऐनक
कसी हुई कद काठी
लटक रही है बीच कमर पर घड़ी बंधी जंजीर
सोचो और बताओ आखिर है किसकी तस्बीर

 

उनको चलता हुआ देखकर
आंधी शरमाती थी
उन्हें देखकर अंग्रेजों की
नानी मर जाती थी
उनकी बाती हुआ करती थी पत्थर खुदी लकीर
सोचो और बताओ आखिर है किसकी तस्बीर

 

वह आश्रम में बैठ
चलाता था पहरों तकली
दीनों और गरीबों का था
वह शुभ चिंतक असली
मन का थ वह बादशाह पर पहुँचा हुआ फकीर
सोचो और बताओ आखिर है किसकी तस्बीर

 

सत्य अहिंसा के पालन में
पूरी उमर बिताई
सत्याग्रह कर करके जिसने
आजादी दिलवाई
सत्य बोलता रहा जनम भर ऐसा था वह वीर
सोचो और बताओ आखिर है किसकी तस्बीर

 

जो अपनी ही प्रिय बकरी का
दूध पिया करता था
लाठी डंडे बंदूकों से
जो न कभी डरता था
तीस जनवरी के दिन जिसने अपना तजा शरीर
सोचो और बताओ आखिर है किसकी तस्बीर

           डॉ. जगदीश व्योम














                                           बापू ,


मैं कोई चित्रकार नहीं हूँ                                                                                                                                                                  नहीं तो क्रॉस पर लटकाता
तेरी ही लहूलुहान तस्वीर
मैं कोई शायर या कवि भी नहीं,                                                                                                                                                नहीं तो लिखता
तेरी मृत्यु पर एक मर्सिया
एक करुणार्द्र शोकगीत
नहीं हूँ मैं एक क्षुद्र-सा मूर्तिकार भी
नहीं तो अवश्य ही बनाता
तेरी एक प्रस्तर प्रतिमा
और करता उसे प्रतिष्ठित पूजा-प्रकोष्ठ में अपने
काश!
पूजा-अर्चना के निमित्त
सुपारी पर कलेवा लपेट कर बनाई गई
विघ्न विनायक प्रतिमा की भाँति
बना पाता तेरा
एक प्रतीकात्मक विग्रह ही
न होता मैं एक महान कलाकार
एक अज़ीम शायर
एक जादूगर बुततराश
तो भी होता मैं
थोड़ा-सा बड़ा
थोड़ा महान
एक इंसान


   -सीताराम गुप्ता

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                                                                                                                                                कविता धरोहर
                                                                                                                                         सुभद्रा कुमारी चौहान

ठुकरा दो या प्यार करो।






 





देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं
सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं।

 

धूम धाम से साज बाज से वे मन्दिर में जाते हैं
मुक्तामणि बहुमूल्य वस्तुएं लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं।

 

मैं ही हूं गरीबनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लाई
फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने को आई।

 

धूप दीप नैवेद्य नहीं है झांकी का श्रंगार नहीं
हाय! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं।

 

कैसे करूं कीर्तन, मेरे स्वर में माधुर्य नहीं
मन का भाव प्रगट करने को वाणी में चातुर्य नहीं।

 

नहीं दान है, नहीं दक्षिणा खाली हाथ चली आई
पूजा की विधि नहीं जानती, फिर भी नाथ चली आई।

 

पूजा और पुजापा प्रभुवर ! इसी पुजारिन को समझो
दान दक्षिणा और निछावर इसी भिखारन को समझो।

 

मैं उन्मत्त प्रेम की प्यासी, हृदय दिखाने आयी हूं
जो कुछ है, वह यही पास है, इसे चढ़ाने आयी हूं।

 

चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो
यह तो वस्तु तुम्हारी ही है, ठुकरा दो या प्यार करो। 




 

 

 

बचपन वापस आया





बार बार आती है मुझ को मधुर याद बचपन की                                                                                                                      गया, ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी।

 

चिंता रहित खेलना खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद।

 

ऊंच नीच का ज्ञान नहीं था छुआ छूत किसने जाना
बनी हुई थी वहां तो झोपड़ी और चीथड़ों में रानी।

 

किए दूध के कुल्ले मैंने चूस अंगूठा सुधा पिया
किलकारी किल्लोल मचा कर सूना घर आबाद किया।

 

रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे
बड़े बड़े मोती से आंसू  जय माला पहनाते थे।

 

मैं रोई मां काम छोड़ कर आई मुझको उठा लिया
झाड़ पोंछ कर चूम चूम गीले गालों को सुखा दिया।

 

दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर युत दमक उठे
धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे।

 

वह सुख का साम्राज्य छोड़ कर मैं मतवाली बड़ी हुई
लुटी हुई, कुछ ठगी हुई सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई।

 

लाज भरी आंखें उमंग मेरे मन में रंगीली थी
तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी।

 

दिल में एक चुभन सी थी यह दुविधा अलबेली थी
मन में एक पहेली थी, मैं सबके बीच अकेली थी।

 

 मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने
अरे ! जवानी के फन्दे में मुझको फंसा दिया तूने।

 

सब गलियां उसकी भी देखीं उसकी खुशियां न्यारी हैं
प्यारी, प्रीतम की रंगरलियां की स्मृतियां भी प्यारी हैं।

 

माना मैंने युवा काल का जीवन खूब निराला है
आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का हृदय मोहने वाला है।

 

किंतु यही झंझट है भारी युद्ध क्षेत्र संसार बना
चिंता के चक्कर में पड़ कर जीवन भी है भार बना।

 

आ जा बचपन ! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति
व्याकुल व्यथा मिटाने वाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति

 

वह भोली सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप
क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप

 

मैं बचपन को बुला रही थी, बोल उठी बिटिया मेरी
नंदन बन सी झूल उठी यह छोटी सी कुटिया मेरी

 

‘ मां ओ ‘ कह कर बुला रही थी, मिट्टी खाकर आई थी
कुछ मुंह में कुछ लिए हाथ में मुझे खिलाने लाई थी

 

पुलक रहे थे अंग, दृग में कौतूहल था छलक रहा
मुंह पर थी आल्हाद-लालिमा विजय गर्व था झलक रहा

 

मैंने पूछा ‘यह क्या लाई‘ बोल उठी वह ‘मां काओ ‘
हुआ प्रफ्फुलित हृदय खुशी से मैंने कहा ‘तुम्ही खाओ‘

 

पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझमें नव जीवन छाया

 

मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूं, तुतलाती हूं
मिल कर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूं

 

जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया
चला गया था मुझे छोड़कर वह बचपन वापस आया  

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                                                                                                                                       कविता आज और अभी


पावों में मीरा के घुंघरू










शबरी जैसे चुन मैंने,
कितने सपन-संजोये,
मेरे नैना तुम बिन रोये...
मृगतृष्णा सी दौड़ी फिरती,
आज मेरी अभिलाषा,
सागर भी क्या तृप्त करेगा,
सरिता छोड़े आशा।

तृष्णा मेरी सागर पे,
गागर धरके रोये...
छलना मेरी सीता जैसी,
राम बनी मर्यादा,
उर्मिल बन गये आँसू मेरे,
प्रेम पीयूष अगाधा
विधिना ने क्या खेल रचाया,
दुख, सुख के संग सोये...

पांवों में मीरा के घुंघरू,
मन सुजान अनुरागी,
घनानन्द की प्रति चेतना
जब सोई तब जागी,
तन माटी की मूरत मैंने,
मुक्ताहार पिरोये...

उमा श्री














      अभागी मै






 

          
            




मुझे अपना जैसा बनाने के नाम पर
मेरा स्वत्व छिन कर ले गये
बेड़ियां उतारने के बहाने
कुछ नई बेड़ियां जोड़ गये
भोली मैं
अपनी खुशी की दुनियां में
फुदकती रही चहकती रही
अपने केशों को मर्दों की तरह
छोटा कर
जीती रही एक छलावा
पुरूषाये वस्त्र पहन कर
देती रही अपने को
एक भुलावा
भूल गई
घर के साथ दोहरा शोषण
हो रहा आफिस के काम पर
तडा़क सा किया तलाकित
अधिकार देने के नाम पर
ताकि तुम मुझे
सिंगल मदर या
अविवाहित माँ के रूप में
छोड़ कर
मुझसे अपनी नजर मुड़ा सको
नन्हा गुल मुझे सौप कर
गुलछर्रे उड़ा सको।

मैं जिन्दा थी
केवल रिश्तों के नाम पर
फूल पत्तियों से लदी
अपनी जड़ से विहिन
पर व्यक्तित्व देने के बहाने
नोचते रहे पत्तियों को मेरी शाखों से
चिपकाते रहे
ब्यूटीसेलुन के लोशन से
नकली फूल मेरी देह पर
प्रतियोगी मापदंड बना कर
निहारते रहे अपनी आंखो से।

वस्त्रों के आवरण पर आवरण
मुझे ओढ़ा दिये थे
स्वामी होने की भावना से
आदिम पुरूष ने
कि कोई मुझे
झपट न ले
बनाये थे काराग्रह मेरे चारो और
मै नाईटक्लब की बाला सी
देखती रह गई
जब तुमने एक एक भारी आवरण को उतार कर
मुझे हल्का किया बादलों सा
पर उतारते उतारते
यह क्या किया तुमने
उतार ली मेरी चमड़ी तक
कभी फैशन के नाम पर
कभी स्वतन्त्रता के नाम पर
और अभागी मै
वस्तु थी
बच्चे की पैदाईश के लिये
वस्तु रह गई
दुनियां की नुमाइश के लिये।.


     -हरिहर झा

 

 

 

 

        मेरी मर्जी







   


   

मै स्वतन्त्र हूँ
अपनी मर्जी का मालिक
गीता पढ़ुं या नमाज़
कहाँ का कैसा समाज
जो डाले मुझ पर दबाव
यह मैं और मेरा स्वभाव ।

मुझे है सड़ीगली प्रथाओं से परहेज़
यह बात अलग
कि खुद अपनी इच्छा से
बेटी के लिये दे रहा दहेज
बड़े आये तुम हड्डी में कबाब
कैसा और कौन सा दबाब
अपना घर फूँक कर
पितरों की शांति के लिये
बुलाता पन्डितों की फौज
शान से करवाता मृत्युभोज
भाड़ मे जाय समाज-सुधार
मेरा स्टेटस, मेरा अहम
मैं जो करूं मेरी मर्जी ।

हाँ मर्जी गई भाड़ में
जब जीन्स पहने कोई ग्रामीणबाला
तो करदो उसका मुँह काला
रचाये ब्याह उँचे कुल में
नीचे कुल की छोरी
या विधवा बने फिर से दुल्हन
हमारा करेगी मानमर्दन
तो काट कर रख देगें गर्दन
रहे अपनी मर्जी से अकेली
पति के नाम पर आँसू बहाकर
या अब लो जीवनमरण का प्रश्न
कोई अपनी इच्छा से
होना चाहे सती
तो धर लेगें मौन
दबाव देने वाले हम कौन
उसके प्राण उसकी मर्जी ।

भीतर का आतंकवादी
भावनाओं का करता ब्लैकमेल
और चिल्लाता
मुझे किसी ने बहकाया नहीं
फँसाया नहीं
गुमराह नहीं किया
मजहब के लिये मैं करता आत्मबलिदान
दुनिया, समाज
और यह परिवेश क्या करें ?
जो मै करता वह मेरी मर्जी ।


- हरिहर झा














          नफरत









पैदा हो जाती है नफरत
कुछ युहीं सोचते-सोचते

जब ढूँढता हूँ प्यार की राह
और खो जाता हूँ
सुनहले सपनों की दुनियां में

प्रकृति की वादिओं में
आसमान की धुंध में
शबनम बन कर टपक पड़ते हैं
दिल के अरमान
धरती कि हरी -भरी गोद में

हकीकत ही तो पैदा करती है
नफरत जो डराती है मुझे
जीवन से
जीने की राह से
भटकते हुए अरमानों कि खोज में .


          -किशोर काला














         बरसात






 


जब   भी  आती   है  बरसात,  बीती  यादें   लाती  साथ,
बचपन  में  देखी  थी  मैंने, पानी  की झम - झम बरसात,
काग़ज़  की कश्ती तैराकर, खिल खिल खिल खिल हँसती थी
दौड़ - दौड़  कर  आँगन  में, खुश  होकर भीगा  करती थी,
अँजुरी  में   नन्हे  हाथों  की,  टप - टप  बूँदें  भरती थी,
 तरुणाई   ने   दस्तक  दी,  देखा   बदल   गई  बरसात !              


जब   भी  आती   है  बरसात,  बीती  यादें   लाती  साथ.  
कोमल  भावों   की   बरसात, सुन्दर  ख्वाबों  की सौगात,
 मख़मल से नाज़ुक ख्यालों की,झड़ी लगी थी दिन  और रात
 यह  बरसात  अनोखी  थी,  हर  पल  दिल  भिगोती  थी,
हरदम  भीगे   रहना   उसमें,   ज़रा  नहीं  अखरता  था,
उस  बरसात   में  डूबे- डूबे, पलक  झपकते  बीता यौवन,
‘सोच-समझ’  ने  दस्तक  दी,  देखा  बदल  गई  बरसात !

जब   भी  आती   है  बरसात,  बीती  यादें   लाती  साथ. 
चिन्ताएँ  और  उलझा  जीवन, सपने  टूटे,  टूटा  था मन,
आहत  थे  आदर्श  बेचारे, चिटका  था  मूल्यों  का यौवन,
सुकुमार  भाव   थे  डरे - डरे, तार - तार,  झिर्रे -  झिर्रे
पीड़ा  मन में थी सिसक रही, खामोशी  से लब सिले-सिले,                    
 पीड़ा को  यूँ सहते - सहते,  पलक  झपकते बीता  जीवन,
 जीवन - संध्या  ने  दस्तक  दी,  देखा बदल गई बरसात !


                   -  दीप्ति 














               बेटी










हर हाल में अपने को झुका लेती है बेटी
चुपके से आँसुओं को छुपा लेती है बेटी

बेटा जो एक कुल को निभाने से रह गया,
दोऊ कुलों की लाज बचा लेती है बेटी

खुशियों के बीज बिहँस के बो देती है बेटी
माँ जो सुनेगी तो रोयेगी, रो देती है बेटी

नीचों को गरीबी में बूढ़ा बाप देगा क्या
मजबूर होके जान ही खो देती है बेटी

डॉ. बी.पी. दुबे














          माँ










अँधकार घर का हरने हित दीपक बनकर जलती है
बेटे की हर पीड़ा को माँ पूरी तरह समझती है
पुरुष प्रधान देश की महिमा माँ ने देखी भोगी है,
क्या कुछ होगा सही सोचकर माँ चुप बैठी रहती है


                 -डॉ. बी.पी. दुबे


                     

             





      हमें अपनी







हमें अपनी हिंदी ज़बाँ चाहिये                                                                                                                                                     सुनाए जो लोरी वो माँ चाहिये 

कहा किसने सारा जहाँ चाहिये                                                                                                                                                     हमें सिर्फ़ हिन्दोस्ताँ चाहिये

जहाँ हिंदी भाषा के महकें सुमन                                                                                                                                                     वो सुंदर हमें गुलसिताँ चाहिये 
 

जहाँ भिन्नता में भी हो एकता                                                                                                                                                 मुझे एक ऐसा जहाँ चाहिये 


मुहब्बत के बहती हों धारे जहाँ                                                                                                                                                 वतन ऐसा जन्नत निशाँ चाहिये 

तिरंगा हमारा हो ऊँचा जहाँ                                                                                                                                                            निगाहों में वो आसमाँ चाहिये 


खिले फूल भाषा के देवी जहाँ                                                                                                                                                       उसी बाग़ में आशियाँ चाहिये.  


      -देवी नागरानी












         है ग़ज़ल







अनबुझी प्यास रूह की है ग़ज़ल                                                                                                                                              खुश्क होठों की तिश्नगी है ग़ज़ल

उन दहकते से मंज़रो की कसम                                                                                                                                               इक दहकती सी जो कही है ग़ज़ल    

नर्म अहसास मुझको देती है                                                                                                                                                        धूप में चांदनी लगी है ग़ज़ल

इक इबादत से कम नहीं हर्गिज़                                                                                                                                               बंदगी सी मुझे लगी है ग़ज़ल
 
बोलता है हर एक लफ़्ज़ उसका                                                                                                                                          गुफ़्तगू यूँ भी कर रही है ग़ज़ल


मेहराबाँ इस क़दर हुई मुझपर                                                                                                                                                    मेरी पहचान बन गई है ग़ज़ल


उसमें हिंदोस्ताँ की खु़शबू है                                                                                                                                                      अपनी धरती से जब जुड़ी है ग़ज़ल


उसका श्रंगार क्या करूँ देवी                                                                                                                                                            सादगी में भी सज रही है ग़ज़ल


           -  देवी नागरानी

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                                                                                                                                                 माह की कवियत्री
                                                                                                                                                  शैल अग्रवाल


बन्द दरवाजे





 




पटक खिलौने
गुड़िया गुड्डा और
मां का बेलन,

बेटी बोली-

पढूंगी मैं,
अफसर बनूंगी।
जाऊंगी दफ्तर
भैया की तरह।
 

घर में सब गरजे
बेवजह ही बरसे-

दिक्कत होगी
पति के साथ ही तो
तेरी जिन्दगी होगी...

नौकरी करेगा वह                                                                                                                                                                              कारोबार संभालेगा
या घर गृहस्थी ले अब
तेरे पीछे-पीछे भागेगा 
बोरिया-बिस्तर यहां-वहां
रोज खोलेगा  बांधेगा ...



वैसे भी,   
अगर कहीं निकल गई                                                                                                                                                                      तू उससे आगे
चार पैसे ज्यादा ले आई
तो मुंह देखना तो दूर
दूर-दूर ही भागेगा

घर में फिर
कलह का आलम होगा
रूठा-रूठा हरदम
तेरा साजन होगा।  
 

ये गुड़िया, गुड्डा, हड़िया भांडा
खेल यही सही, खिलौने यही सही
दादी नानी ने जो खेले
उम्रभर तोड़े और जोड़े
संसार यही है अपना बेटी
सपने तो बस होते सपने।‘

समझ ना पाई बात वह
समझ में ना आने वाली
हंस तब बेटी ने खुद ही
मां को समझाया-

‘मीत होगा पति मेरा
परमेश्वर नहीं
सुख-दुख आशा अभिलाषा
बांटेंगे हम आधी-आधी

गाड़ी के दो पहिए जब
काम में ताकत में
हर बात में,
तोला-तोला माशा-माशा

एक दूसरे से
ज्यादा ना कम
फिर कैसे ये बटवारे  मां !
भीतर के बाहर के

खेल में जीवन में..?.’

 

 

 

बन्द दरवाजे









अन्दर-अन्दर 
कोठरियां
फैले-पसरे
छज्जे-दालान

 

कोठरियों में रखे
संदूकचे ताले बन्द
तालों के पीछे
तहाई हुई तहज़ीब
और नसीहतें
सुख-दुख...
आंसू व कहकहे


मौसम अनुसार बदले
हमने नित कपड़े
बीता जीवन
यूँ ही इन्हें
चढ़ाते उतारते
बाहर–भीतर

आते-जाते

छज्जे–दालानों पर

ऊँची नीची
सीढ़ियों पर                                                                                                                                                                                        हाँफते दौडते

चेहरे-पर-चेहरे ले
बेबस कितने भटके
कितने जनम और

कितने और आखिर
बन्द दरवाजे..!.

 

 

 

खुले आकाश में…






 




देखा है मैने 
चिड़िया को चहकते
डाली-डाली फुदकते
गीत गाते
घरौदा बनाते—

उमंगों के पंख चढ़
आकाश नाप आते
फिर
एक ही बार में

धप्प् से गिर धूल चाटते...

पर जाल में फंसी
सैयाद के जुर्म सहती..
वो चिड़िया...
मैं तो नहीं ...

फर्क है मुझमें
और
अदना-सी
इस चिड़िया में



भला-बुरा
जानती हूँ मैं सब 
सैयाद को चिड़िया को
भाग्य-विधाता हूँ
अपनी...

आकाश, ये जाल
सैयाद और शिकार
सब मेरे
सोचे -समझे
जाने-पहचाने हैं 



भांप सकती हूँ
हर जाल को
तोड़ सकती हूँ
अनचाहे बंधन

उड़ सकती हूं
जी चाहे जहां
पंख फैलाए
खुले आकाश में

जीत लूँ बस...
बस्स...
ज़रा...यह खेल 
शिकारी से,
रिसा-बिंधा जो
आंख में मन में                                                                                                                                                                       सपना बना  !

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                                                                                                                                                        माह विशेष


                                                                                                                                                     तस्लीमा नसरीन


प्रेरित नारी










हम हैं- प्रकृति की भेजी हुई स्त्रियाँ
प्रकृति स्त्री को पुरुष की पसलियों से नहीं गढ़ती
हम हैं, प्रकृति की प्रेरित नारियाँ
प्रकृति नारी को पुरुष के अधीन नहीं रखती
हम हैं, प्रकृति की भेजी हुई स्त्रियाँ
प्रकृति स्त्री को स्वर्ग में पुरुषों के पैरों तले नहीं रखती।

प्रकृति ने स्त्री को मनुष्य बनाया है
पुरुष द्वारा निर्मित धर्म इसमें बाधा डालता है
प्रकृति ने स्त्री को मनुष्य बताया है-
समाज अंगूठा दिखाकर ठहाके लगाता है
प्रकृति ने स्त्री को मनुष्य कहा है-
पुरुषों ने एकजुट होकर कहा है - 'नहीं'।

अनुवादः सुशील गुप्ता









 

पिता, पति, पुत्र










अगर तुम्हारा जन्म नारी के रूप मे हुआ है तो
बचपन में तुम पर
शासन करेंगे पिता
अगर तुम अपना बचपन बिता चुकी हो
नारी के रूप में
तो जवानी में तुम पर
राज करेगा पति
अगर जवानी की दहलीज़
पार कर चुकी होगी
तो बुढ़ापे में
रहोगी पुत्र के अधीन


जीवन-भर तुम पर
राज कर रहे हैं ये पुरुष
अब तुम बनो मनुष्य
क्योंकि वह किसी की नहीं मानता अधीनता -
वह अपने जन्म से ही
करता है अर्जित स्वाधीनता


अनुवाद : शम्पा भट्टाचार्य










सतीत्व






 



काया कोई छुए तो हो जाऊंगी नष्ट

हृदय छूने पर नहीं ?
हृदय देह में बसा रहता है निरंतर

काया के सोपान को पार किए बिना
जो अंतर गेह में करता है प्रवेश
वह कोई और ही होगा
पर जानती हूँ
वो मनुष्य नहीं होगा


अनुवाद : शम्पा भट्टाचार्य

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                                                                                                                                                                           मंथन


'पराजय का कटु अहसास तसलीमा के स्त्री विमर्श का प्रस्थान बिंदु है लेकिन परिणिति है दृढ़ता, संकल्पबद्धता और परिवर्तन की तीव्र आकांक्षा कि 'प्रचलित धारणाओं को चाहकर ही तोड़ा जा सकता है। चाहने से ही समाज के तरह-तरह के कुसंस्कार, पाखण्ड और अकल्याणकारी चीजों के विरुद्ध खड़ा हुआ जा सकता है  ' ( चार कन्या, पृ.36)"                          - रोहिणी अग्रवाल



“आज के इस भूमंडलीकरण और वीडियो व इंटरनेट के दौर में, जब उपभोक्तावादी रुझानों ने स्वतंत्रता के नाम पर स्त्री को एक वस्तु ही बना डाला है, मुझे लगता है हमें नए सिरे से स्त्री-अस्मिता के प्रश्नों पर विचार करने की जरूरत है। स्त्रियों को आत्ममंथन की जरूरत है कि वह कैसी स्त्री बनना चाहती हैं? दूसरी ओर यह भी विचारणीय स्थिति है कि प्रगति कई सोपान पार करने के बाद भी हम एक अँधेरे युग में जी रहे हैं, जहाँ आज भी पारिवारिक शोषण, बलात्कार, दहेज-दहन और स्त्री-उत्पीड़न की घटनाएँ आए दिन होती रहती हैं। आतंकवाद ने स्त्री को कई स्तरों पर शोषित-प्रताड़ित किया है। मैने अर्थांतर उपन्यास के माध्यम से,  तथाकथित संस्कारशील घरों में घुटते दांपत्य और अस्तित्वहीनता की यंत्रणा सहती स्त्री के अंतर्द्वंद्व ही नहीं दिखाए, बल्कि रूढ़ नैतिकता और पुरुष अहं का परीक्षण करती ' कम्मो' की सहज जीवन जीने की आकांक्षा को नए अर्थ देने की कोशिश को भी बल दिया है। अँतिम साक्ष्य उपन्यास में जहां ' बीजी ' की आस्थाओं का करुण अंत है, वहीं मीना मौसी की, टूटे परिवारों को जोड़ती अक्खड़ जिजीविषा भी है। मेरी स्त्री समर्थ होने की कोशिशों में संघर्षशील है, पर वह पुरुष को कहीं भी अस्वीकार नहीं करती, बस, बराबर में एक सम्मानपूर्ण जगह चाहती है। बाकी सब खैरियत है  उपन्यास की नायिका पारुल घर-परिवार के लिए त्याग करती अपनी इच्छाओं और स्वप्नों का होम करती है, परन्तु उसकी बेटी ऋचा, माँ के त्याग को अर्थ की तुला में हल्का पड़ते देख उस त्याग की निरर्थकता महसूस करती और कराती है।

यहां वितस्ता बहती है,  उपन्यास हो या ऐलान गली ज़िन्दा है, स्त्रियां मेरे उपन्यासों की शक्ति हैं। कहीं-कहीं व्यवस्था की जकड़नों में फँसी होने के बावजूद वे जंजीरें तोड़ने के लिए संघर्ष करती हैं ताकि जीवन भयमुक्त हो और उसे गरिमा मिले। मेरी स्त्री जननी है, घर-परिवार की धुरी , उसे सम्मानसे जीने का अधिकार है, अपने अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए वह लड़ाई लड़ती है, गलत का विरोध कर आवाज उठाती है । यहां विस्तता बहती है  की गौरी हो या ऐलान गली...की रत्नी, अपनी आकांक्षाओं को जीने का हौसला रखती हैं। अपने-अपने कोणार्क की कुनी, कोणार्क और जगन्नाथ धाम की परंपराओं को बंद आँखों नहीं स्वीकारतीं, बल्कि समय-संदर्भों के साथ सही-ग़लत का निर्णय लेकर अपनी दिशा आप तय कर लेती हैं। जीवन के सच की तलाश करतीं मेरी स्त्रियां, घर-परिवार को तोड़ती नहीं, जोड़ने की कोशिश करती हैं, पर अपने आत्मसम्मान और अधिकारों से समझौता नहीं करतीं। कथा सतीसर के ढाँचे में स्त्रियां प्राणतत्व बनकर आई हैं। रामकुमार कृषक के शब्दों में, ' इस वृहद् उपन्यास में स्त्री पात्र ही चरित्र संवेदना को सर्वाधिक झकझोरते हैं। आकस्मिक नहीं कि चंद्रकांता इनके दुःख से गहरे जुड़ी है। ' आतंकवाद ने स्त्री पर दुहरी मार कर दी है। वह शरीर और मन से शोषित होती है, पर घर-परिवार तब भी उसे अपराधी ही समझकर तिरस्कृत करते हैं। लेकिन कथा सतीसर की नसीम हो  या ' आवाज़ ' कहानी की विनी, वे आतंकवादियों से बलात्कृत होने पर खुद को न दोषी मानती हैं और न अपराधबोध पालती हैं। बल्कि तन-मन के अत्याचार उनमें अन्यायियों के प्रति घृणा और प्रतिरोध की भावना जगाते हैं। मेरे जाने अनावस्यक भय से स्त्री को मुक्त होना है, पर मानवीय गरिमा और पारिवारिक सौहाद्र के लिए भीतर के कोमल स्त्रोत भीबनाए रखने हैं। कथा सतीसर की नीलम हो या राज्ञा , प्रतिकूल परिस्थितिओं में अपनी इयता बनाए रख मानवीय दृढ़ता का उद्घोष करती हैं, नारेबाजी नहीं करतीं। मैने ' कात्या '  के रूप में लौह-स्त्री की छवि गढ़ी है , जो आपत्तियों-विपत्तियों की आँधी में डटी रहने का साहस रखती हैं। राज्ञा के रूप में टूटकर खड़ी होती स्त्री की द्वंद्व भरी कथा है जो मन को द्रवित भी करती है और संघर्ष की प्रेरणा भी देती है। मैने स्त्रियों के दुःख भी बयान किए, उनसे मुक्त होने के लिए की गई कोशिशों का स्वागत  भी किया। मन के स्त्रोत सूखने नहीं दिए। स्त्री की संवेदना के स्त्रोत यदि सूख जाएँगे तो जीवन बंजर हो जाएगा। यों तो आज भी तेजी से यंत्र होते मनुष्य को बचाने के लिए संवेदना को बचाना जरूरी है, स्त्री पर यह दायित्व कुछ अधिक ही है।“


                                                                                                                                           - चंद्रकांता








“ भारतीय स्त्री विमर्श को पश्चिम से अलग कर देखना होगा. पश्चिम में नारी विमुक्ति जैसी धारणायें वस्तुत: वहाँ की परिस्थितियों से उपजी हुई धारणायें हैं जिनका सीधा संबंध अतिभोग और भौतिक समृद्धि के चरम सीमांत हैं. जबकि भारत में गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा, अन्याय और अत्याचार का खेल धर्म परम्परा और कुलीनता की आड़ में चलता रहा है. आज भी इस कुचक्र का कोई रोक नहीं. शहरी औरतें भले ही बराबरी और आर्थिक विषमता तथा इससे जुड़े कुछ पश्चिमी से लगने वाले सवालों से आक्रांत हैं सामान्यत: स्त्री के प्रति भारतीय दृष्टि, विचार और गरिमा के स्तर पर पाखण्ड से भरी हुई है. ऐसे में एक बार फिर से इस सवाल को ठीक तरह जाँचना विमर्श की सकारात्मक शुरूआत है. औरत जितनी अधिक सतायी जाती है उसमें प्रतिरोध के स्वर उतने ही कम हैं, बल्कि नगण्य हैं. यह शोषण दैहिक, मानसिक और पशुवत शोषण है, दिखाई देता है. परन्तु संवेदना के धरातल पर वो दर्ज नहीं हो पाता.

हाल ही में स्त्रियों पर अत्याचार की जो रपटें माध्यमों से मिलती हैं वो साफ बताती हैं कि औरतों पर जुल्म और जबरदस्ती कहीं जातिवादी आड़ में अपने घृणित दृश्य प्रस्तुत करती है, तो कहीं वह धार्मिक से लगने वाले अति विशिष्ट तबकों में बिंबित होते हैं. इस दुष्चक्र से मुक्ति पाने का कारगर उपाय तो आर्थिक समानता और बराबरी के व्यवहार से ही संभव हो सकता है. परन्तु सामाजिक स्तर पर इस तरह की कोई तैयारी भारतीय समाज में नहीं दिखायी देती. इस घृणित चक्र के चलते भारतीय समाजों में सही दृष्टि से परिवार और जातिगत ढ़ाँचे में चीजों को तौलना संभव नहीं है।


इस अंधी गली की अंतिम दीवार केवल यह प्रदर्शित करती है कि आगे कोई रास्ता नहीं है. पंचायतों में यह कोटे के आधार पर स्त्रियों को जहाँ - जहाँ अवसर दिया जाना चाहिये वहाँ - वहाँ स्त्री केवल एक कठपुतली के समान विराजमान दिखायी देती है. उसकी दूरी पुरूष वर्चस्व के रहते पुरूषों के हाथों में ही रहती है और पुरूष वर्ग अपनी अहम मान्यता के कारण अपनी धौंस जमाये रखने की हर कोशिश में लगा रहता है. जिसे परिवार और समाज, जाति और धर्म से बराबर समर्थन मिलता रहता है “





                                                                                                                            -   गंगा प्रसाद विमल

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                                                                                                                                                                    परिचर्चा


                                                                                                                                    गिरेन्द्र सिंह भदौरिया ‘प्राण‘

देवी से वस्तु होती स्त्री की खुशफहमियाँ


विश्व को चमत्कृत करती रही भारतीय संस्कृति आदि से आकर्षण का केन्द्र रही है। अपनी सभ्यता और सादगी से मानवीयता के चरम को छूते हुए देश में व्याप्त बहुआयामी ज्ञान एवं प्राकृतिक सम्पदा सम्पन्न त्यागमयी यहाँ की वृत्ति ने जहां प्रसार पाया, वहीं बाजारवाद के विस्तार में पनपे भूमंडलीकरण व वैश्विक ग्राम की कल्पना के साकार होते प्रभाव में वसुधैव कुटुम्बकम् की आत्मीय धारणा पर असहय झटके झेले हैं। इतना ही नहीं वैज्ञानिक उपलब्धियों और भोगवाद की चकाचौंध के आकर्षण में उलझती इसकी मूल धुरी भारतीय स्त्री घर की चार दीववारी से तो निकली किंतु विकास के नाम पर उसके स्वयं के साथ हो रहे छलावे को वह समझ ही नहीं पायी।

सड़क पर उड़ते हुए दुपहिया वाहन पर अपने बॉयफ्रैंड के पीछे बैठी आज की सबला का चेहरा किसी ने बांधा नहीं, न ही पूरी तरह प्रदूषित पर्यावरण ही इसका मूल कारण समझ में आता है अपितु भोगवाद की गिरफ्त से उपजी तथाकथित बोल्डनेस की चपेट में अपने शोषण को सहर्ष स्वीकार करती भटकी हुई यह स्त्री चेतना का उदाहरण बनती मात्र एक काया सी नजर आती लग रही है।

लेखक यह मानता है कि स्त्री पर पुरुष वर्ग ने प्रायः अत्याचार किये, उसका शोषण किया, उसे घर में कैद रखा, इसकी इच्छाओं को मारा, उसकी आँखों का गीलापन कभी सूखने नहीं दिया, उसके जन्म को हर्ष का विषय नहीं माना किंतु इससे बड़ा सच यह है कि स्त्री के विकास में उक्त बातें भारतीय परिवेश में न तो सार्वकालिक रहीं और न सार्वभौमिक ही।

दूसरी ओर पुत्र के जन्म पर अधिक खुशी मनाने वाले पुरुष पिता ने ही नहीं बल्कि पूरे समाज ने जन्म से ही स्त्री को कन्या मानकर उसके पांव छुए, घर के लिए उसे मंगला माना, इस कन्या के दान में उसे सुखी देखने के लिए अपना घर फूंका, अपने श्रम क संचित कमाई को उसे देने का प्रयास किया। जब यह स्त्री, पत्नी और बहू के रूप में पहुँची तो पुरुष ने ही उसे घर की लक्ष्मी का सम्मान और प्यार दिया। माँ बनीं तो इस ममतामयी देवी को साक्षात् जगदम्बा मानकर पूजा की, मरने पर बिलख-बिलख कर रोते हुए पुरुष ने उसे अपने पूर्वजों में स्थान दिया। अधिकांश भारतीय परिवारों की यही कहानी रही है।

सुविधाओं के अभाव, शक्ति की विषमता और पुरुष के वर्चस्व पर प्रेमास्त्र द्वारा अपनी जीत दर्ज करती हुई वही स्त्री कहीं बहन तो कहीं भाभी और दादी आदि के रूप में प्रतिष्ठित हुई। फिर क्या कारण है इस महनीय प्रतिष्ठा व स्थिति को आज अविकसित और अव्यावहारिक माना जा रहा है। इसके पीछे मूल कारण है-योग्यता व क्षमता से अधिक अलभ्य को पाने की अदम्य लालसा, अनुशासन को संदिग्ध और पथबाधा मानने वाली उच्छृंखल मानसिकता।

भारतीय चिंतन अति को अशुभ, सम को शुभ व असाधारण को शुभाशुभ मानता है। प्रकृति में नर मादा से अधिक शक्तिशाली है। नर-मादा दोनों ही एक दूसरे को आकर्षित करते हैं। इसके मूल में काम भाव है। यह काम चार पुरुषार्थों ( धर्म, अर्थ, कर्म, मोक्ष ) में से एक है। इनमें धर्म और मोक्ष सात्विक हैं किंतु अर्थ और काम विकार भी हैं। इन्ही विकारों व नर की शक्ति के कारण त्याग और दया को धर्म में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। अर्थ को त्या के बल पर व काम को संयम और दया के बल पर नियंत्रित किया गया। चूँकि मादा प्राकृतिक रूप से नर को अपेक्षाकृत अधिक आकर्षित करती है इसलिए स्त्री के कामोत्तेजक अंगों को पूरी तरह ढक कर आंशिक ही सही किंतु काम पर अंकुश लगाया गया। नार को बली पुरुष की स्वेच्छाचारिता से बचाने के लिए समाज ने सुरक्षा कुछ इसी तरह दी।

आज की स्त्री इस सुरक्षा को धता बताती हुई बोल्डनेस के नाम पर अंग प्रदर्शन कर उठी। अब वह पुरुष की बहन-भाभी नहीं बल्कि गर्लफ्रैंड बनकर सम्पूर्ण को भोगने की तलाश में है। नर तो आदि से ही मादा की इसी माया पर विजय प्राप्त करना चाहता है। वह अपनी कामतृप्ति के लिये किसी भी हद तक जा सकता है। उसे ऐसी ही किसी वस्तु की चाहत है, जो उसकी शारीरिक जरूरतों को पूरा कर सके।

आज की स्त्री पुरुष के कार्यों को अपने हाथ में लेकर जिम्मेदारियों के बोझ में और भी इजाफा करती दिखाई दे रही है। ऑफिस का काम अपनी तरक्की के नाम पर करना है, घर का काम उसे करना उसकी अपनी मजबूरी है। स्त्री के काम पर निकलने से बेरोजगारी बढ़ना है। पुरुष के अकर्मण्य आलसी और अपंग सा होते हुए भी उसका साथ लेना उसकी अपनी मजबूरी भी है। अतः यह तो समय ही तय करेगा कि आज की स्त्री बलवती होकर समाज में उभरी है अथवा मात्र पूर्व से और अधिक शोषिता एक मशीनी वस्तु।

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                                                                                                                                                     कहानी अनुवाद


                                                                                                                                                             -गुहन -

                                                                                                                                          तामिल से अनुवाद सु. गुरुमूर्ति  

अरविंदन् नाम से एक सखा

भुवना अपनी चिट्ठी खोलकर चाव से पढ़ने लगी-

                                                                                                                                                     तिरुच्ची,
                                                                                     20-5-1987

                                                                                                                                                         
प्रिय सखी!

कुशल! कुशलता जानने की इच्छा है। कालेज की हमारी पढ़ाई को समाप्त हुए करीब एक साल गुजर गया। प्रण कर लिया था कि एक अच्छी नौकरी ढूँढ लूं, तभी दोस्तों और सखियों से लिखा-पढ़ी करूं। इसी कालावधि के बीच कभी कहीं हमारे पुराने दोस्तों से आपकी मुलाकात हुई कि नहीं?

आपकी खैर-खबर जानना चाहता हूं। कैसे समय कटता है? मां-बाप किस हाल में हैं? प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा में हूँ।

                                                                             सस्नेह, 

                                                                                                                                                    अरविंदन्

भुवना इस विचार से हर्षित हुई कि एक साल बीत चुकने पर भी उन्होंने मुझे याद किया है और खत लिखने का कष्ट उठाया है।

उसकी मुद्रा-भावना पढ़कर पिताजी ने सवाल किया, “ ओ बिटिया!  किसकी चिट्ठी है? “

“अरविंदन् नाम के एक सखा की... ! “
                
“ कौन है यह अरविंदन्? “  यह सवाल करते हुए पिताजी के चेहरे पर शंकित रेखाएं खिंच गईं।

 “मेरे कालेज के एक सहपाठी थे।“

“अच्छा, अब वह क्यों खत लिखने लगा? हाय रे भगवान!  कैसा अनर्थ हो रहा है!  ऐसी आशंका से ही मैंने एक बार तुम्हारी मां से कहा था कि तुम्हारी पढ़ाई रोक दूं। उसने मेरी सुनी!  अब तो कोई न कोई नौजवान चिट्ठी लिखने का दुस्साहस कर रहा है! “

“बेकार यों गुस्सा करने की क्या जरूरत है पिताजी? वह तो एक भले मानस हैं। कितनी सद्भावना से उन्होंने मुझे याद किया है। लीजिए यह खत; आप स्वयं पढ़ कर देख लीजिए।“

भुवना को अपने पिता की आशंका और गुस्सा निरर्थक लगा।

“ तो तुम चाहती हो कि मैं भी उस चिट्ठी की बेतुकी बातें पढ़ूं। हां, जब तक मैं तुम्हारे हाथ पीले न कर दूं तब तक मेरी बेचैनी बनी रहेगी। और एक बात। इस बीच तुम कहीं उसको अपने साथ लेकर गुमराह न हो जाना; मैं तुमसे हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूं।“

पिताजी ने सचमुच हाथ जोड़कर प्रणाम किया। उनकी इस क्रिया से भुवना लज्जावश संकुचित हो गई। फिर पल-भर के लिए भी वह वहां खड़ी न रह सकीँ, कमरे में घुसकर लेट गई।

भुवना की आंखों से आंसू की धार उमड़ पड़ी, वह चिंतित हुई कि पिताजी कैसे विचित्र ठहरे! बीस साल की पहचान के बावजूद वह अपनी पुत्री को समझ न सके !

वाह! अरविंदन् कितने बड़े जेंटिलमेन हैं। उनके उत्तम विचार तथा नेकी को मैं किस तरह समझाऊं पिताजी को? उन्होंने मेरे आकर्षक पहनावे की एक बार भी प्रशंसा नहीं की थी। कभी अधूरे नाम से मुझे संबोधित नहीं किया, न कभी मेरे रूप-लावण्य के बारे में कोई शब्द मुंह से निकाला। सच्ची दोस्ती की सीमा क्या है, वह इसकी खूब जानकारी रखते हैं।

हाय! गरीब घराने के युवक जो ठहरे। इस दुखी अवस्था में उनकी एक अच्छी नौकरी लग गई तो उनके मां-बाप ने कितनी प्रसन्नता का अनुभव किया होगा! लेकिन...लेकिन पिताजी की कटु बातों ने सारी खुशी पर पानी फेर दिया।

ह चिट्ठी खोलकर पढ़ने लगी-

                                                                                                                                           तिरुच्ची

                                                                                                                                           5.2.1990

श्रीमती भुवना जी,

कुशल! कुशलता जानने की इच्छा है। प्रशिक्षण प्राप्त करने के उद्देश्य से मैं दो साल के लिए अमेरिका चला गया था। पिछले सप्ताह ही लौटा हूं। आपने जो निमंत्रण पत्र भेजा था, वह मेरे हाथ लग गया। लेकिन आपके विवाह के दो वर्ष पश्चात मैं अपनी ओर से आशीष भेज रहा हूं। इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं। आपके स्वच्छ मन के अनुरूप निश्चय ही आपको एक योग्य वर पति स्वरूप प्राप्त हो गए होंगे। वह...श्री आनंद आप पर प्यार व स्नेह बरसाते होंगे। अपने आदरणीय जीवन साथी को आप मेरी शुभकामनाएं पहुंचा दें। यह दाम्पत्य जीवन आप दोनों के लिए सदा सुखी व सानंद सिद्ध हो, यह मेरी हार्दिक अभिलाषा है।

                                                                     अभिवादन के साथ,

                                                                          अरविंदन्

अरविंदन की ऐसी शुभकामनाएं चिट्ठी में पढ़कर भुवना बहुत आनंदित हुई। उसके विवाह के शुभ दिन यद्यपि बहुत सारे जन उपस्थित हुए थे, फिर भी अरविंदन की अनुपस्थिति निराशाजनक व दुखदायी लगी थी।

 खैर अपनी शादी होने या न होने की बात का जिक्र उन्होंने नहीं किया। क्योंकि अभी तो वह विदेश से वापस आए हैं। जल्दी ही उनकी शादी तय हो जाएगी, तब वह मुझे निमंत्रण भेजेंगे ही। पति महोदय के संग जाकर उनके विवाहोत्सव में अवश्य हाजिरी दूंगी।

“ भुवना ! पिताजी की चिट्ठी पढ़ रही हो क्या? तुम्हारे चेहरे पर भला इतनी खुशी! “पति बोला।

“ पिताजी की चिट्ठी प्राप्ति मात्र से ही प्रसन्नता होती है क्या ? एक दोस्त की चिट्ठी है यह। “

“ कौन है यह दोस्त? कला ने लिखा है या प्रिया ने ? “

“यह लीजिए चिट्ठी, अरविंदन् ने भेजी है।“

चिट्ठी लेकर पढ़ते-पढ़ते वह मुंह बनाने लगा।

“ऐसा व्यवहार मुझे बिल्कुल नापसंद है।“ उसने चिट्ठी को तह करके उसकी ओर बढ़ाया।

पति के शब्द, उच्चारण तथा ध्वनि ने समझा दिया कि वह गुस्से में है। भुवना के लिए यह अप्रत्याशित बात थी।

“जी, ऐसी बातें आपके मुंह से!“

“देखो भुवना! कोई अजनबी तुम्हें चिट्ठी लिखे, मेरे लिए असह्य है। उसके साथ हमारा क्या रिश्ता है? “

पति के शब्द भुवना के दिल में घाव कर गए। अभी पहली बार उसके हृदय में जलन का अनुभव हुआ। अपने मानस में उसने पति के प्रति जो ऊंचा किला बना रखा था वह टूट-फूटकर गिरने लगा।

छिः! आखिर यह भी एक सामान्य पुरुष सिद्ध हुए। सी.ए. की सनद पाकर इन्होंने सिर्फ हिसाब-किताब संभालना सीखा है।

“आप मुझपर विश्वास नहीं करते! एक पवित्र मैत्री को समझने में असमर्थ रह गए ! पूरे इन दो वर्षों में आपने मुझे एक संकुचित दायरे तक ही सीमित समझ रखा है। “

“ऐसी बेकार बातों से तुम मुझे बेवकूफ बनाना चाहती हो क्या? एक अपरिचित युवक ने तुम्हें खत लिखा है, यह बेचैन करने वाली गंभीर समस्या है। इस कारण, संभव है, हममें मनमुटाव पैदा हो जाए। अब इतना भर कह देना काफी समझता हूं। “

उसने बेमन से चिट्ठी खोली-

                                                                                                                                       तिरुच्ची,

                                                                                                                                        5.6.1998

श्रीमती भुवना जी,

 अखबार में यह समाचार पढ़कर अपनी आंखों पर विश्वास न कर सका कि आपके जीवन-साथी विपद् ग्रस्त होकर चल बसे। इस खबर से मेरे दिल पर मानो बिजली टूट पड़ी है। जबकि मैं स्वयं अपने दिल को सांत्वना न दे सका, तब आपको किन शब्दों के प्रयोग से तसल्ली दे सकूंगा।

बस, धीरज रखिए, क्योंकि नौ साल का आपका जो लाडला है, उसको एक भला मनुष्य बनाने का भार आपके कंधों पर है। लक्ष्य प्राप्ति पर अटल रहिए। आपको मेरी ओर से कोई सहायता आवश्यक लगे, तो लिखिएगा।

खैर, आप तो कोई खत ही नहीं लिखतीं !

                                                                        आत्मग्लानि के साथ,

                                                                               अरविंदन्

भुवना की आंखें गीली हो गईं।

“मां! आप आंसू क्यों बहा रही हैं? किसकी चिट्ठी है? “ पुत्र ने पूछा।

“अरविंदन् नाम से एक सखा ने लिखी है।“

अचानक उसने अपने गले से हाथ हटा लिए। बेचैन होकर बोला-

“अरविंदन? कौन हैं वह अंकिल? मैंने तो उनका नाम तक नहीं सुना। वह हमारे क्या होते हैं जो इस तरह आपको चिट्ठी लिखने लगे ? “

उसके अप्रिय शब्द सुनकर भुवना अवाक् रह गई!

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                                                                                                                                                         कहानी समकालीन


                                                                                                                                                           - शैल अग्रवाल

        एक और सच

     सामने औंधे मुँह पडी वह औरत बस हड्डियों का ढाँचा मात्र थी जो जरा भी हिलाने-­डुलाने क्या, छूने तक से टूट सकती थी। सूखे फूल सी झर सकती थी। मुझे यह ­सब तभी समझ लेना चाहिए था जब सुबह-­सुबह, सात बजे, बारबरा का फोन आया था­­­- ' हमारी मदद करो। यहाँ क्राइसिस सेंटर में एक हिन्दुस्तानी औरत है, जिसने हफ्ते भर से कुछ भी नहीं खाया-­पिया। स्नान  तक नहीं किया है। किसी से बात नहीं करती। पास तक नहीं आने देती। पुलिस जब से छोडक़र गई है, ऐसे ही चुपचाप, एक ही जगह पर गुमसुम बैठी है। हम सबको बहुत फिकर है इसकी। शायद अंग्रेजी न बोल पाती हो, शायद तुम्हारे आगे ही खुले और तुमसे ही कुछ मदद मिल जाए इसे? क्या पता तुम ही इसके लिए कुछ कर पाओ?'

     देखते ही सब कुछ समझ में आ गया--­­ बात बस हिन्दी या अंग्रेजी बोलने तक नहीं थी --­­­सिर्फ कुछ सवाल और जबाव की नहीं थी­--­ मुरदे में जान फूंकने जैसी, कठिन और दुर्लभ थी। कमरे की मरघटे वाली उदास गंध दूर से ही पहचानी जा सकती थी।

     मैली-­कुचैली वह औरत सो रही थी या जग रही थी, यह तो नहीं जान पाई, पर इतना निश्चित था कि उसने खुद को काट कर कब का दुनिया से अलग कर लिया था। उस बीमार -उदास भभके को झेलती मैं खुद भी वहीं जमीन पर, उसके पास ही बैठ गई। आकंठ डूबी इस औरत से क्या, और कैसे कहूँ, समझ नहीं पा रही थी। उसे बचाने आई थी और अब उस कमरे में आकर खुद भी डूबने लगी थी। इतना अंधेरा कि चेहरा देखना तो दूर अपना हाथ तक नहीं देख पा रही थी। बैठे-­बिठाए क्या मुसीबत मोल ले ली। खुदको धिक्कारती उठी और कमरे के परदे और खिडक़ी दोनों ही खोल दिए। ताजी हवा की जरूरत हम दोनों को ही थी।

     थोडी ही देर में उन अस्त व्यस्त कपडों के ढेर में थोडी-­सी हलचल हुई और कांपते पैर सिकुडक़र सीने से सट गए। मैने बिस्तर का कंबल उठाकर उसे उढ़ा दिया। वह औरत शायह पूरी तरह से अचेत नहीं थी- ­­क्योंकि कंबल हलका-­हलका, दबी-­घुटी सांसों और सिसकियों से बीच-बीच में हिल रहा था­­­---गहरी सांसें ले रहा था।

     हिम्मत करके हाथ उस कंबल पर रख दिया­­-- उसके दुख से बीमार शरीर को आहिस्ता­-आहिस्ता सहलाने लगी, " इस तरह से मन दुखाने से क्या फायदा ?  तुम चाहो तो हमारी मदद ले सकती हो। अपनी परेशानी दूर कर सकती हो।"

     कोई जबाब नहीं मिला। सिसकियां जरूर तेज हो गईं। शायद सहानुभूति के कान आदी नहीं थे- ­­या फिर थोड़ा और अपनापन मांग रहे थे­­­-बालों में उंगलियाँ फेरते हुए मैने पूछा,­­­

          " कहां से आई हो?"

          "अबरगवानी से।"

      आवाज मानो गले से नहीं किसी अंधे कुँए से आ रही थी। हफ्ते भर मौन रहकर बोला जाए, या बस रोते ही रहा जाए­­-- वह भी ग्लानि और खून के आंसू­­-- तो शायद ऐसी ही अष्फुट और फसफसी­सी आवाज ही निकलती है।

          "मैं यहां, इस देश की नहीं, अपने देश की बात कर रही हूँ ?"  एक पतली सी सहायता की डोर मैने उसकी तरफ फेंकने की कोशिश की।

     पता नहीं भाषा का अपनापन था या वेशभूषा का, हमदोनों जुड़ रहे थे। उसने न सिर्फ आंखें खोल ली थीं वरन् आंसू भरी आंखों से मेरी तरफ देख भी रही थी।

          " क्या नाम है तुम्हारा?"

          " कनकलता­­ " " हम भागलपुर, बिहार से हैं."

     अब वह मेरी बात न सिर्फ सुन रही थी अपितु थोडा­-थोडा मुझे समझ भी रही थी। मेरे होठों पर भी अपनेपन की मुस्कान आ गई। माथे पर लगातार चमकती, गिरी बिन्दी का फीका सफेद निशान और पैरों में पडे हुए बिछुए बता रहे थे कि सफल या असफल जैसी भी हो कनक की शादी हो चुकी थी और पति जिन्दा था.

          " तुम्हारे पति का क्या नाम है ?"

          " हैरी प्रसाद "

          " हैरी प्रसाद " मैने शब्द हल्के आश्चर्य से दुहराए। वैसे तो हरि का हैरी और जयकिशन का जैक्सन बनना यहां आम-­सी बात थी।

     तब पहली बार मुंह पर नयी-­नवेलियों की लाली और झिझक के साथ उसने मुझे बताया कि उसके सास-­सुसर ने वैसे नाम तो हरिप्रसाद ही रखा था पर जबसे यहां आया है, सबको हैरी ही बतलाता है। अब तो मरीज भी उसे डॉ. हैरी ही कहकर बुलाते हैं।

          " मरीज--­­" मेरा आश्चर्य और कौतुहल दोनों ही बढ़ते जा रहे थे, " क्या करते हैं तुम्हारे पति ?"

          " जी.पी. है­­­-- यहीं अबरगवानी में।"

          " तुमने पहले क्यों नहीं बताया कि तुम डॉ. प्रसाद की पत्नी हो?" मैने आश्चर्य के साथ पूछा। डा. प्रसाद तो यहां के सफल मनोवैज्ञानिक माने जाते हैं। उनकी पत्नी यहाँ और वह भी इस हालत में ?

          " पत्नी नहीं, बस ब्याहता ही कहो­--­पत्नी के सारे सुख तो अल्वा ले रही है।"

          " यह अल्वा कौन है?" अब मेरा कौतुहल छुपाए नहीं छुप रहा था।

          " उसकी दूसरी।"

          " दूसरी क्यों? ­­पत्नी क्यों नहीं­­?" मैने बातचीत को कुरेदते हुए पूछा।

          " इसलिए, क्योंकि कोई विधि-­विधान से शादी नहीं हुई। बस कागज पर दस्तक करके घर में आ बैठी है। न किसी ने कन्यादान किया, न किसी ने मंत्र पढे। आगे-­पीछे कोई नहीं था। इसके ही अस्पताल में नर्स थी। वहीं संग काम करते­-करते फांस लिया होगा? मेरी मौसी ने तो सगाई के वक्त ही कहा था कि ये डॉ. बडे रसिया होते हैं--­­चौबीसों घंटे इनकी नर्सों से छेड़­-छाड़ और हंसी मजाक चलती रहती है। पर पापा ने तुरंत ही बात काटी थी- ' हंसी-­मजाक नहीं करें तो चौबसों घंटे जीवन और मौत से कैसे खेल पाएं बेचारे?'  वे तो इसके गुण गाते-गाते न थकते थे। ' डॉ0 लडक़ा तो ढूंढे नहीं मिलता­­--जहां बैठ जाए रोटी कमा ले, जहां खडा हो जाए वहीं इज्जत पाए। '

     मेरी ही किस्मत खोटी थी जो यह ऐसा निकला। नहीं तो लोगों के तो खोटे सिक्के भी खूब चलते हैं। फिर कोई सभी डॉ. खराब ही थोडे होते हैं। दुनिया में एक से एक शरीफ डॉ. भी हैं। इस अल्वा की भी थोडी बहुत गलती तो होगी ही? देखा होगा बडे घर का लडक़ा है, बस आ चिपकी। बिना देखे, कि आगे पीछे कौन-­कौन हैं... ­­किसका घर तोड रही है? वैसे भी इन छोटी जात वालों में तो यह सब चलता रहता है। छोटी जात की ही है-­­तभी तो आंखों में शरम का एक भी बाल नहीं। एक दिन खुद ही बता रही थी कि इसके बाप-­दादे बरसों पहले सडक़ बनाने बंधुआ मजदूरों की तरह अफ्रीका गए थे। शायद यही था इसमें जो मुझमें नहीं और शायद यही था जो इसे पसंद भी आया ! "

     उन झुकी­ हुई आंखों का आक्रोश और दुख मेरे मन को छू रहा था, विचलित कर रहा था-­­­­­­­­­

          " तुमने कोई भी विद्रोह नहीं किया। आवाज नहीं उठाई कि तुम्हारे रहते वह यह सब नहीं कर सकता?"

          " पर मैं यहां होती, तभी तो आवाज उठाती। मैं तो वहां मोतीहारी में बैठी अपने राकेश को पाल रही थी। जरा सा बेटा समझदार हो जाए तो पति के पास जाउं, ऐसे रंग-­बिरंगे सपने देख रही थी।"  ब्लाउज के अन्दर से, कहीं सीने में छुपी, उसने एक सुन्दर और स्वस्थ सात­-आठ साल के बच्चे की तस्वीर मेरे आश्चर्य से फैले हाथों पर रख दी।

          " जब मेरे भाइयों को पता चला तो वहां गांव में तो लठ्ठ चल गए। सुनते हैं पांच महीने की गाभिन भी थी यह­--­ तभी शादी के समय। पता नहीं प्यार करता था या इसी दबाब में शादी कर ली। बाद में वह बच्चा भी खराब हो गया। आज तक वैसी कि वैसी ही है। दूसरे का घर फूंककर भला कौन सुखी रह पाया है? बस मेरी छाती पर मूंग दलने के लिए, मेरे घर में घुस आई। मेरे ही दूध पीते बेटे से बाप छीन लिया। पर किसे दोष दूं ? कोई सी भी जांघ उघाडूं, नंगी तो बस मैं ही होती हूं।

     अगले हफ्ते ही मेरे ससुरजी मुझे यहां इसके पास छोड ग़ए थे। इस धमकी के साथ, कि देवताओं को हाजिर-­नादिर मानकर हाथ पकडा है--­­मांग भरी है। अब जीते-­जी निभाना तो पडेग़ा ही। मैं अभागिन भी इस अनकही शर्त पर सब हार बैठी---­­­बेटे की खातिर इनकी चाकरी में जुट गई--­­ बस रोटी और एक कोठरी की तनख्वाह पर। नौकरानी, मेहतरानी, सब बन गई। ये भी खुश थे और मैं भी। इनका घर चल रहा था और मैं अपनों की आंख में, पति के घर में रह रही थी--­­क्या कहते हैं आपकी अंग्रेजी में ---­­श्रीमती कनकलता प्रसाद से बस एक हाउस मेट बनकर। यह बात दूसरी है कि इन लोगों ने मुझे मेट नहीं­­ हाउस­कीपर या हाउस­हेल्पर ही कहा। अंग्रेजी में कहो या हिन्दी में--­­अर्थ तो नहीं बदल जाता। गाली तो गाली ही रहती है, फाउल माउथ तो साफ नहीं हो पाता। मैं चुपचुप हर एब्यूज और दुर्व्यवहार सहती­झेलती रही। भूखी-­भूखी पिटती और खटती रही। खाना बनाती, छाड़ू­-पोंछा करती, कपडे-­बिस्तर सब कुछ और शाम होते ही इसके आने के पहले चुपचाप आंसू पीकर अपने कमरे में बन्द हो जाती।

     यही मेरा काम था। यही मेरी डयूटी थी। यही बताया था मुझे अल्वा और इसने। इसके बदले में यह मेरे बेटे को पांच हजार रुपए हर महीने भेजता था। कितने कम पैसों में दोनों जिम्मेदारियां निभ जाती थीं--­­बाप का फर्ज और ब्याहता का कर्ज। कितनी आसानी से, दोनों से ही सिलट जाता था यह। और शायद इसकी आत्मा भी नहीं कचोटती थी कि मुझसे मुफ्त में काम करा रहा है। वैसे पता नहीं आत्मा थी भी या नहीं। पर मैं खुश थी। मेरा राकेश माउन्ट-­व्यू स्कूल, बंगलौर में पढ रहा था और एक दिन जब बड़ा होकर, खूब बड़ा आदमी बनकर आएगा, मेरे सारे ही आंसू पोंछ देगा। अबतो शायद इसके कंधे तक आता होगा--­­क्या पता हल्की-­हल्की मूंछें भी आ गई हों। इससे तो बहुत अच्छी कद-­काठी का है वह। पता नहीं मुझे पहचान भी पाएगा या नहीं?" बेटे की याद आते ही कनकलता अपने दुख को थोडी दूर के लिए बिल्कुल भूल गई। उसकी गर्वीली दीप्त मुस्कान तैरकर आंसुओं के संग पूरे चेहरे पर फैल गई।

          " पर ­­यह सब कैसे हुआ­­­?" उसकी जली पीठ के घाव और टूटी कंधे की हड्डी के बारे में चाहकर भी, मैं खुलकर कुछ भी तो नहीं पूछ पा रही थी।

          " यह सब तो मेरी नौकरी के ‘साइड पर्क’हैं।" उसने दर्द से तार­तार, रोने से भी बदतर मुस्कुराहट से मुझे बताया­­-" यह तो रोज की ही बात है। कभी मंहगी क्राकरी टूट जाने से, तो कभी हारी-­बीमारी की बजह से। जब भी काम रह जाए तभी। शुरु-­शुरु में तो बस डांट पड़ती थी, फिर मार पड़ने लगी। और फिर जब मेरे दुखते तन और मन से गलतियां होती ही गईं, तो बात शारीरिक दुर्व्यवहार तक जा पहुंची। पर जलते गरम चिमटे से तो मैं डॉ. वर्मा से मिलने के बाद ही पिटी थी।"

     दो पल रुककर कनकलता ने अपने उमड़ते दुख को लगाम देनी चाही फिर बिना कुछ पूछे, बिना कुछ सुने ही, बोलती चली गई। मानो मुझसे नहीं खुदसे बात कर रही हो--­­ मानो आज एकबार सब कुछ दबा-­ढका याद करके हमेशा के लिए भूलना चाहती हो--­­­या फिर बरसों का पकता फोडा आज हलके से छू भर जाने से लप­लप फूट पडा था। और अब इस सारे सडे-­ग़ले मवाद और पानी को बहाकर ही रुक पाएगा---­­­­­­

          " डॉ वर्मा हमारे पास के दरभंगा के ही थे। उनकी पत्नी शीला से मैं यूं ही बजार में आते-­जाते मिल गई थी। बाद में जब उन्हें पता चला था कि, वह मेडिकल स्कूल में मेरे बडे भाई के साथ ही पढी थीं, तो मेरे लिए उनके मन में एक हमदर्दी, एक अपनापन­सा हो गया।

     कभी-­कभी तो वह खुद ही शाम को मेरे पास आने लगीं, मुझे भी बुलाने लगीं। ऐसी ही एक दीवानी शाम को मैं अपने घर और अपने बारे में सबकुछ बता बैठी। घर की इज्जत भरे बाजार में उघाड दी। बातों-­बातों में बात डॉ. वर्मा के कानों तक जा पहुंची। वह खुद मुझसे पूछने आए कि उन्होंने जो कुछ सुना है, समझा है--­­क्या सच है? मैं अभागिन जबाब तक न दे पाई, बस फूट-­फूटकर रोती रह गई--­­कैसे कहती कि मेरी मांग तो सिन्दूर से ही भरी गई थी पर मैं कुलच्छिनी ही कुछ न संभाल पाई और न जाने कब अपनी मांग राख से भर लाई। उन्होंने मुझे छोटी बहन की तरह सान्त्वना दी। समझाया कि सब फिरसे ठीक हो जाएगा। वह इस नर्स अल्वा को निकालकर ही दम लेंगे। जरूरत पडी तो मार­-पीट से भी नहीं हिचकिचाएंगे। क्योंकि एक बीबी के रहते दूसरी शादी न भारत में की जा सकती है और न यहां यूरोप में। हमारा बेटा राकेश भी यहां आ जाएगा। और तब हम खुशी-­खुशी एक साधारण परिवार की तरह साथ-­साथ ही रहेंगे।

     और अगर हैरी नहीं माना, उनकी बात नहीं सुनी, तो वह उसकी अकल ठिकाने लगवा देंगे--­­ जेल तक भिजवा सकते हैं। इतनी पहुंच और पहचान तो उनकी है ही यहां पर। ससुरा, साइकैट्रिस्ट बनना चाहता है... अपने घर तक को तो संभाल नही पा रहा­­, मरीजों की मानसिक बीमारी क्या दूर कर पाएगा? और उसी दिन शाम को ही डॉ. वर्मा ने मेरे पति का कॉलर कार से निकलते ही, वहीं घर के दरवाजे पर ही पकड लिया। खड़े-­ख़ड़े ही घंटों दोनों में बहुत सारी बातें हुईं। और उस दिन, पहली बार मैं आउट­हाउस में नहीं, अपने घर के अंदर सोई। अगले दिन मैने भगवान के आगे माथा भी टेका था­--­­शायद अब मेरे दिन फिर जाएं? अब ससुराल और मायका दोनों ही फिर से जो मिल गए थे मुझे। पर वह लंगडी ख़ुशी ज्यादा दिन तक न चल सकी। महीने भर के अन्दर ही हम सब केन्ट से उठकर वेल्स के इस छोटे से गांव में आ गए। उसके बाद तो किसी भी परदे की जरूरत नहीं थी। मैं बस मेट लता थी। बाहर की दुनिया से मेरे सभी कौनटैक्ट तोड दिए गए थे। राकेश की खबर और चिठ्ठियां तक मिलनी बन्द हो गईं।

मैके, ससुराल किसी ने भी पलटकर मेरे बारे में नहीं पूछा। शायद सबको ही विश्वास हो गया था कि कनकलता नाम की औरत अब जिन्दा ही नहीं हो सकती।

     उसके बाद की कहानी आपके आगे है। हैरी जिस बदहवासी और नफरत से मुझे मारता­-पीटता था, उससे किसी पत्थर का सीना भी चटक जाता पर मैं तो जाने किस मिट्टी की बनी हूं?  कुछ भी नहीं चटका-­टूटा। एक दिन जब मेरी चोटों से अल्वा डर गई या उसे लगा, कि अब मैं किसी काम की नहीं, तो हैरी से छुपकर पुलिस को फोन कर दिया। और इस तरह से मैं यहां, आप लोगों के पास, बोझ बनकर रहने आ गई। एक अनबूझ पहेली­-सी, आप सबका कौतुहल बन गई। कहते हैं इन जगहों का पता सबको नहीं मिल पाता, तभीतो वह मुझे ढूंढ नहीं पाया है या शायद उसने इसकी जरूरत ही नहीं समझी होगी­­­­।’’

     उसकी आंखों की नकारात्मक खाइयों में लगा वह खुद को कबका डूबो चुकी थी। इतनी घृणा और नफरत की जिन्दगी एक ही जीवन में जी पाना इतना आसान तो नहीं। जिन्दगी किसी के लिए इतनी कडवी और दगाबाज हो सकती है यह मेरे लिए आज एक नया और घिनौना सच था। जी करा कि उस सामने दुहरी बैठी कनक को बांहों में भर लूँ. बच्चों सा प्यार दूँ।

     चौके से गरम­गरम सूप ले आई और अपने हाथों से उसे पिलाने लगी। उसकी आंखों का हर आंसू चुपचाप बहकर मेरे मन में उतर रहा था। अब शायद वह बहुत थक गई थी। उसे आराम चाहिए था­­---नहाना-­धोना­­ तो कल भी हो सकता है। मैने उसके रूखे और उलझे बाल, हलका सा तेल लगाकर काढ़ दिए। शायद थोडा चैन मिला हो। साफ-­सुथरे, अभी-­अभी बदले बिस्तर में उसे लिटाकर मैने पूछा, " कनक अब तुम्हें आराम करना चाहिए मैं कल फिर आउँगी। खूब सारी बातें करेंगे और बंगलौर में राकेश से भी तुम्हारी बात करवाएँगे। तब तक तुम अपना ध्यान रखना और आराम से सोना। मैं यह बत्ती बन्द कर देती हूँ, पर यह नाइट­-लाइट जली छोड देती हूं। यह कॉल­-बेल भी तुम्हारे बिस्तर के पास ही है। किसी भी चीज की जरूरत हो तो बुला जरूर लेना­­, नर्स तुरंत ही आ जाएगी। तुम काफी कमजोर और बीमार हो। तुम्हें मदद लेने में झिझकना नहीं चाहिए। आदमी ही आदमी के काम आता है। तुम ठीक हो जाओ, तो चाहो तो, तुम भी कई दीन-­दुखियों की मदद कर सकती हो। तुम्हारा काम मैं यहीं पर लगवा दूंगी। यह पानी का जग और थोडी सी दर्द की गोलियां छोडे ज़ा रही हूं. जरूरत समझो तो ले लेना।"

     उसने बेहद थकी नजरों से मेरी तरफ देखा और विदा में हाथ जोड दिए।

     सुबह-­सुबह फिरसे फोन की कर्कश घंटी बजी और फिरसे नींद पूरी होने से पहले ही मेरी आंख खुल गई। आज तो सात भी नहीं, सुबह के छह ही बजे थे। लाइन पर फिरसे बारबरा ही थी। जल्दी से आओ। तुम्हें मेरी मदद करनी है। इट इज एन इमरजेंसी। मैं कुछ पूछूं, कहूं, इसके पहले ही वह फोन रख चुकी थी।

    

     आधे ­घंटे के अंदर ही मैं क्राइसिस सेंटर में थी। सब लोग इधर-­उधर दौड़-­भाग रहे थे मानो आज इस सेंटर में कोई बडी सी क्राइसिस टूट पडी थी। रिसैप्शन पर ही ली ने कनक के कमरे की तरफ जाने का संकेत कर दिया। धड़क़ते दिल से मैं लिफ्ट का कॉल­-बटन दबाकर, बेचैन, सीढियों पर दौड पड़ी। लिफ्ट का खुला दरवाजा कुछ देर इंतजार करके, यूं ही बन्द हो गया।

     सामने बारबरा दरवाजे पर ही खडी मिली, " लगता है रात में ही सब खतम हो गया। हमने तो सोचा था कि शायद अब खुली है, तो ठीक ही हो जाएगी।"

     मेरी नजर चैन से सोई कनकलता पर पड़ी, " क्या बात है ? क्यों तुम परेशान हो बारबरा, यह तो बस सोई हुई है ? " मैने खुद को तसल्ली देनी चाही।

          " शायद कौरोनर केस हो। इस बृहस्पतिवार को ही क्रिमिनेशन है। यहीं फॉरेस्ट­ एकड ग़्रेवयार्ड में। आ पाओगी, तो अच्छा ही होगा। हमें तो तुम्हारे हिन्दु संस्कारों के बारे में कुछ भी पता नहीं। तुम शायद जानती हो या किसी से पूछकर ही आ जाना। बेचारी की आत्मा को शान्ति मिल जाएगी। वैसे भी, हमें तो नहीं पता कि इसका कोई रिश्तेदार है भी, या नहीं ? तुम्हें किसी के बारे में, इसने कुछ बताया हो तो इनफौर्म कर देना। "

     मेरी ग्लानि­पूर्ण अपराधी आंखों ने बिस्तर के नीचे लुढ़क़ी खाली दवा की शीशी को देख लिया था। खुद को समझा पाना बहुत ही मुश्किल हो रहा था। कनक सच में ही मुझसे जुड ग़ई थी। क्या जरूरत थी इसे यह गोलियां पकडाने की? क्या अपनों से विश्वासघात की, मुंह खोलने की यह सजा दी है उसने खुदको ? उसे तो दर्द सहने की आदत थी? कभी-­कभी भला चाहते हुए भी, हम जाने किस­-किस अनर्थ के साधन बन जाते हैं! शायद मैं अपने को कभी माफ न कर पाउं! घर लौटते ही सबसे पहले राकेश को बंगलौर फोन मिलाया। पता चला कि राकेश प्रसाद नाम का तो कोई बच्चा वहां कभी आया ही नहीं--- ­­­ वह भी मोतीहारी से तो, हरगिज ही कोई भी, कभी भी नहीं। पिछले बीस साल में तो नहीं ही। हां झरिया का एक राकेश अवस्थी जरूर है। यदि मैं चाहूं, तो उसे वे बुला सकते हैं या मैसेज वगैरह दे सकते हैं।

     चुपचाप भारी मन से फोन रख दिया। कनक के राकेश का कोई और पता-­ठिकाना मेरे पास नहीं था, जहां मैं कुछ बता सकती? वैसे उस बच्चे की मां तो, उसके लिए शायद तभी मर गई होगी जब उसकी मां को उसका दादा इंगलैंड छोड आया था­­ अकेले ही, उसके हाथ से आंचल छुडाकर। अब उसे दुबारा रुलाने से क्या फायदा ? मुश्किल से ही बेचारे के आंसू सूख पाए होंगे ?

     मैं उठी और कनक की याद का दिया जलाकर भगवान के आगे रख दिया। बचपन में सुना था कि चार दिन तक मृतात्मा अपनों के आसपास ही भटकती रहती है। कनक को शायद मेरी जरूरत हो ? आखिर अब और उसका है ही कौन­­, जिसके पास वह जा पाएगी?

     इतना बडा छल? बिचारी यूं ही बेकार में ही पिसती रही ? जिस बेटे के लिए खुद को तिल­तिल मारा, उसे तो कुछ भी नहीं मिल पाया­­-- कभी किसी अच्छे स्कूल में नहीं भेजा गया उसे... क्यों रो रही हूं मैं?  वैसे भी तो कनक की जर्जर जिन्दगी, बस एक-­के-­बाद-­एक, व्यर्थ की दुर्घटनाओं और यातनाओं से घुनी और रिसी हुई ही थी। आजतो उसके मोक्ष का दिन है। मां के अपने जन्म दिन के लिए भेजे कपडे मैने निकाल लिए और बृहस्पतिवार के लिए संभालकर थैले में रख दिए।

     हलके नीले रंग की उस बूटों वाली मां की भेजी कीमती चंदेरी साड़ी में, नहाई धोई, सलीके से बाल कढी क़नक, बहुत ही सुन्दर और नाजुक लग रही थी---­­बिल्कुल नरगिस के फूल-­सी। वह कितनी सुन्दर थी, आज सभी बस यही कह रहे थे।

          " कैसी सुन्दर लडक़ी यूं ही भटक-­भटककर व्यर्थ हो गई। ओवर-डोज का ही केस था। कौरोनर ने यही मृत्यु का कारण लिखा है। हमें तो पता भी नहीं था कि इसके पास पैनाडौल की शीशी भी है। तुम इन्डियन लेडीज, ब्लाउज को पर्स की तरह भी इस्तेमाल करती हो, हमें यह बात नहीं मालूम थी। इसके पास से यह सामान भी मिला है। "  बारबरा ने राकेश की फोटो और बिछुए मेरी तरफ बढ़ा दिए।

          " आई डोन्ट नो वाट टु डू विथ हर? क्या पादरी को बुलाएं?  या तुम खुदही कुछ और करना चाहोगी­­ या फिर बस अब चलें? "

     बारबरा ने मुझ से फिर से पूछा ?  मुझे अब समझ में आया कि कहां क्या कमी रह गई थी ?  कनक इतनी सज-­धज कर भी इतनी अधूरी और उदास क्यों लग रही थी ?

     हाथ फैलाकर वे दोनों चीजें उससे ले लीं मैने। फोटो वापस अपनी जगह पर, वैसे ही कनक के सीने के पास रख दिया और बिछुए उन कमजोर नाजुक ठंडी उगलियों में फिरसे वापिस पहना दिए। मैने देखा उसकी बिन्दिया भी अब कुछ और ज्यादा ही चमक रही थी। और कनक के बंद होंठ अब मुझे पूरी तरह से संतुष्ट लग रहे थे। आखिर जिन-जिन चीजों को उसने कभी अपने से अलग नहीं किया था­­ ---­जिन पर शायद उसे हमेशा गर्व और संतोष रहा था­­­ अब फिरसे उसके पास थीं। अब वह जाने के लिए पूरी तरह से तैयार हो चुकी थी। सब कुछ अपनी जगह पर सही और ठीक लग रहा था अब।

     मैने भरपूर नजरों से आखिरी बार उसे देखा और आंखें चुराकर, भर आई आंखों को पोंछ डाला। भगवान से मन ही मन प्रार्थना करने लगी­ कि, भगवान अगले जनम में इसके लिए ढेर सारी खुशियां और सुख लिखना मत भूलना। इसकी गलतियों को माफ करना और इसका ध्यान भी रखना।

     बारबरा जाने कबसे पीछे खडी सबकुछ देख रही थी। आकर उसने मेरी पीठ पर हाथ रख दिया--­­­

          " अब चलें? हर बात इतनी मन पर मत लिया करो। तुम तो भगवान में विश्वास करती हो? तुम्हारी गीता में ही तो लिखा है कि हमारे हाथ में बस कर्म है फल नहीं। और जानती हूँ कर्म करने में कभी पीछे नहीं हटी हो तुम। तुम बस इतना ही कर सकती थीं। उसकी तो बस इतनी ही जिन्दगी थी। इतनी ही सांसें लेकर आई थी वह। "

मेरी उदास और सूनी आँखें देखकर, उसने एकबार फिर मेरा हाथ अपने हाथों में ले लिया और बेहद धीमे स्वर में बोली , मानो मुझे ही नहीं खुद को भी समझा रही हो,

" वैसे भी मरने की कोई उमर तो नहीं होती। हरेक के हर पल और हर सांस पर ही मौत का अधिकार है। हम सभी, बस एक उधार की जिन्दगी ही तो जीते हैं। लो, आंसू पोंछ लो। यह तो अब अपने सब कष्टों से मुक्त हो गई है। क्या पता एक बहुत ही अच्छा और सफल जनम इसका इन्तजार कर रहा हो। आई होप यू अन्डरस्टैंड मी­­­­--- आई मीन, रिबर्थ। तुम हिन्दु, खुद को, हरहाल में बहलाना कितनी अच्छी तरह से जानते हो। काश हम भी, इतने ही समझदार और आशावादी हो पाते। "     

     वह क्या कहना चाह रही थी, क्या कह गई­­ मैं कुछ समझ नहीं पाई पर बारबरा की हंसी इस समय मुझे बहुत ही बेतुकी और खोखली लग रही थी। शायद वह बस एक नर्वस हंसी ही थी­­,­ उसका और कोई मतलब नहीं था। कनक और दोनों काली कारें धीरे-­धीरे अपनी यात्रा के आखिरी पड़ाव पर चल पडी थीं।

     लाल ट्रैफिक­-लाइट पर रुकी मैं सोच रही थी कि अगर सच में कहीं भगवान है और अगर वाकई में वह दीनानाथ है तो इतना तो वह भी जान ही गया होगा कि अब कनक को एक बहुत अच्छा जन्म ही मिलना चाहिए क्येंकि वह अगले­-पिछले कई जन्म की तकलीफें इसी जन्म में झेल जो चुकी है। अबतो उसके हिस्से का बस सुख­-ही-­सुख बचा होगा ... अभागिन को यूं अकेले लावारिसों की तरह विदा करते हुए बादलों का मन भी उमड़ा पड़ रहा था। पर अगले पल ही गहरे काले बादलों से एक बहुत ही सुन्दर­सुनहरा सूरज निकल आया। शायद वह सच में कभी­-कभी इधर से गुजरता है। हमारी प्रार्थना सुनता है। और लगता है आज मेरी सोच को उसने भी अपनी स्वीकृति दे ही दी थी। बरबस ही उमड़ आए आंसुओं को पोंछकर एकबार फिरसे स्वस्थ और तटस्थ होना चाहा, परन्तु हो नहीं पाई। एक अवसाद...एक अधूरापन लगातार मथे जा रहा था।

यह मेरे लिए एक और नया सच था। मन का कोई एक कोना अभी भी कनक से जुड़ा था  और जुड़ा ही रहना चाहता था। कोई रिश्ता न होकर भी कनक भावात्मक रूप से मुझसे पूरी तरह से जुड़ चुकी थी और उसकी सारी जिम्मेदारियां अब मेरी थीं। उसने मुझपर विश्वास किया था, और उसके भरोसे का मान रखते हुए मुझे शीघ्र ही राकेश को ढूँढना  होगा।  घर पहुंचते ही मैने खुद को फोन पर भारत की टिकिट खरीदते पाया। मोतीहारी में राकेश कैसा है, क्या उसकी जरूरतें हैं, यह सब जानना न सिर्फ जरूरी, अपितु अब मेरे जीवन का सबसे बड़ा ध्येय बन चुका था।...

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                                                                                                                                         कहानी समकालीन





                                                                                                                                    

                                                                                                                                       -महेन्द्र दवेसर ‘दीपक’

एक नोट सौ का!  

सांझ की लाली जब बुझने को होती है और रात सुरमई अंधेरा ओढ़ने लगती है, तभी गुनिया नहा धोकर सजी, संवरी सामने आती है। फिर वह अपने भड़कीले, चमकीले वस्त्रों में मेकअप के लिए दर्पण के आगे बैठती है और देखती है अपने तीखे नयन-नक्ष और सुन्दर सुडौल शरीर को। दर्पण उसके दर्प को भड़का देता है और वह इतराती, मुस्कुराती अपने आपको देखती फूली नहीं समाती। 

तभी बड़ी बाई कमरे में आ जाती है। वह भी उसके रूप-स्वरूप को देखकर समझाती है, "बेटा जबतक तेरा रूप, यौवन सलामत है, तभी तक तेरा सिक्का चलता है। उम्र ढल गई तो कोई पूछने वाला नहीं होगा। यही दिन हैं माल कमाने के। इन्हें कभी मत खोना।" 

बड़ी बाई जो कह गयी, सो कह गयी, पर गुनिया तो अभी कोठे पर नई थी। उसे समझने में ज़रा देर लगेगी कि वास्तव में सिक्का तो बड़ी बाई का ही चलता है। उसी की आज्ञानुसार यहां की हर लड़की और दलाल को चलना होता है। जबतक यह बात गुनिया की समझ में आई, तबतक वह स्वयं सिक्के की तरह चलने लगी थी। ख़ूब कमाई होती थी और उस कमाई का काफ़ी बड़ा हिस्सा बड़ी बाई को मिलता और जो भी उसके पास बचता उसमें से काफ़ी कुछ गुलाब मार लेता।

 

गुलाब? उसी के गांव का था वह! उसी के साथ गांव में वह पली, बड़ी और जवान हुई। यहीं गली, कूचों और बाज़ार में वे मिला करते। फिर वे गांव के खेतों में मिलने लगे और फिर गुनकली नाम की यह लड़की गुलाब की गुनिया हो गई।

 

गांव के खेतों के उस पार एक नंगी, लम्बी सड़क शहर को जाती है। एक शाम गुलाब, गुनिया को शहर के इस रण्डीखाने में ले आया।

 

एक दूसरी बात जो बड़ी बाई ने सब लड़कियों को समझा रखी थी, वह यह थी कि इस मर्दों की ज़ात से बचकर रहना। गुनिया ने पूछ ही लिया, "यह कैसे हो सकता है? मर्दों के साथ सोओ भी और उनकी ज़ात से बचकर भी रहो।"

"हो सकता है गुनिया, हो सकता है। अगर तू गुलाब से बचकर रहती तो यहां कोठे पर न बैठी होती। मतलब यह कि उनसे दिल न लगाओ, धोखा न खाओ। बस अपने मतलब से मतलब रखो। उनसे माल एंठो और उन्हीं सीढ़ियों से नीचे धकेल दो जो वे चढ़कर तुम तक पहुंचते हैं। किसी मर्द को अपने कमरे में ले जाने से पहले अपनी रक़म वसूल कर लो।"

 

      बड़ी बाई कि सबसे कड़ी आज्ञा थी, "कभी बच्चा न पैदा करना। अपनी रोज़ की गोली खाती रहना, नहीं तो मैं गोली मार दूंगी।"

 

      . . . मगर बड़ी बाई की गोली के निशाने में सबसे पहले आ खड़ी हुई स्वयं गुनिया। न जाने कब, कैसे चूक हो गयी। जब दो-तीन दिन लगातार सवेरे सवेरे मतली होती रही और क़ै करने को जी करता, तो वह समझ गई कि वह गर्भ से है। गर्भपात के लिये बड़ी बाई उसे लेकर अस्पताल दौड़ी गई। लेकिन वहां से लौट कर आई अकेली। डॉक्टरों ने साफ़ कह दिया,

"कैसी सास हो तुम? लड़की के पेट में जान लेवा ट्यूमर है और तुम्हें गर्भपात की पड़ी हुई है।"


      जब गुलाब और दूसरी लड़कियों ने गुनिया का हाल पूछा तो वह बड़बड़ाती हुई अंदर चली गई, "नासपीटी के पेट में, वे कहते हैं - ट्यूमर है। दो-दो ट्यूमर हैं। एक जान का दुश्मन, दूसरा धंधे का! पहले तो वे जान बचायेंगे। धंधा गया भाड़ में!"

       गुनिया के ट्यूमर के इलाज में महीने निकल गए। इस बीच उसका गर्भ बना रहा। दिन पूरे होने पर गुनिया ने मुन्ना को जन्म दिया। गुनिया जैसा ही सुन्दर, प्यारा सा बच्चा था वह!

 
     शुरू के दिनों में तो जहां मां होती, वहीं बेटा होता। फिर धीरे धीरे उसे मां से अलग करना पड़ा ताकि वह धंधे पर बैठ सके। अब तो वह गुनकली को पहचानने लग गया था और उससे बिछुड़ते समय रोने लगता। मां का दिल पसीज जाता फिर भी वह भारी मन से रोते हुए बच्चे को बड़ी बाई या गुलाब के हवाले कर देती। वह मुन्ने को बड़े अनमने मन से संभालता क्योंकि वह उसे अपने बेटा ही नहीं मानता था। यह तो स्वाभाविक ही था क्योंकि उसे तो गुनिया के साथ रहने का अवसर ही कहां मिलता था। वैसे भी शाम को जब लड़कियां अपने अपने ग्राहकों के साथ होतीं तो बाक़ी का समय तो गुलाब के दारू-शराब का होता और ऐसे समय में रोते हुए बच्चे की ज़िम्मेदारी उसे बहुत अखरती। आज जब मुन्ना बड़ी बाई से नहीं संभल रहा था तो उसने तंग आकर उसे गुलाब के हाथों में थमा दिया।

"ले जाओ कम्बख़्त को। बाज़ार की रौनक़ दिखाओ। सो जाए तो ले आना।"
 

गुलाब के नशे का दौर चल रहा था। ऐँठ कर बोला, "पराई कमाई का सूद मैं संभालूं?"

"उसी कमाई की शराब तू उड़ा रहा है हरामख़ोर! तेरा रोटी कपड़ा भी उसी से चलता है," बड़ी बाई ने फटकार लगाई।

 
गुलाब को मुन्ना संभालना पड़ा।

 

  गुनकली की बात और है। वह निश्चय के साथ नहीं कह सकती कि मुन्ना का बाप गुलाब है या कोई दूसरा जो रात भर उसके साथ रहा और उसकी कोख में अपना बीज डाल गया और क़ीमत उसके मुंह पर मार कर सदा के लिए अलग हो गया। इस कटुता को वह भूल जाती है, जब वह मुन्ना को अपनी बाहों में लेती है। वह उसी का ख़ून है, हाड-मांस है। उसी ने उसमें सांस फूंकी है। अपने बच्चे के लिये हर मां जैसा प्यार उसके भी रोम-रोम में फूटता है। वह मुन्ना की जननी है . . . जनक कौन है, इस प्रश्न से कोई हीन भाव उसके मन को नहीं सताता।
 

      मुन्ना अब और भी बड़ा हो गया है। उसके क्रंदन के साथ शब्द भी – भले ही वे तोतले हैं – मेल खाने लगे हैं।

 
"मैं अम्मा छाथ छोऊंगा," इन चार शब्दों में व्यक्त उसकी व्यथित कामना हर शाम गूंजती और घुट कर रह जाती! यही तो वह समय है जब नए-नए 'अंकल', जिनके साथ उसकी कोई जान पहचान नहीं, आया करते हैं। वे अम्मा, ऑंटियों के हाथों में नोट थमा देते हैं और फिर वे उनके साथ अलग-अलग कमरों में बंद हो जाती हैं। हर शाम मुन्ना को यही तमाशा देखने को मिलता है। 'अंकलों' की पहचान उसे भले ही न हो, पर नोटों की पहचान और उनके जादू का कमाल कुछ-कुछ उसकी समझ में आने लगा है। उसकी मासूम तमन्ना 'अम्मा छाथ छोऊंगा' अम्मा के दरवाज़े पर दस्तक देती रहती है, पर बंद कमरों के मचलते क़हक़हों, किलकारियों में गुम हो जाती है। या फिर किसी 'अंकल' की अन्दर से ककर्श आवाज़  आती है, 'हटाओ इस मुसीबत को' और डरा-डरा सहमा हुआ मुन्ना वहां से हट जाता है।

 

      रात की थकी हारी लड़कियां दिन में, दोपहर में सोया करती हैं। तभी मुन्ना को भी मां के साथ सोने का मौक़ा मिलता है। गुनिया ने करवट बदली। तकिये के नीचे एक कोने से एक सौ का नोट झांक रहा था। बच्चे की नज़र उसपर पड़ी। उसके शब्द तोतले सही, उसकी सोच तोतली नहीं। ऐसे ही तो होते हैं वे काग़ज़ के टुकड़े जो नए नए 'अंकल' अम्मा और ऑंटियों को दिया करते हैं। एक अद्भुत चमक उसकी आंखों में जागी। अपनी नन्ही-नन्ही उंगलियों से उसने वह नोट खिसका कर अपनी बुश-शर्ट की जेब में रख लिया।

 

 गुनिया की आंख खुली तो मुन्ना ने वह पूंजी मां को सौंप दी।

"यह नोट तुझे कहां से मिला?"

मुन्ना ने तकिये के नीचे हाथ रख दिया। बेटे की होशियारी देख कर मां ज़रा सा मुस्कुराई।

उसे किसी जुर्म का अहसास होता, न होता पर याद दिलाने को मुन्ना के ये तोतले शब्द उसका कलेजा छलनी कर गए, "अब मैं लात को बी यां छोऊंगा, अम्मा छाथ!"

 



गुनिया ने आव देखा न ताव एक चपत बच्चे की गाल पर टिका दिया और चीख़ उठी,

"अभागे, तुझे हर समय मां का प्यार नहीं मिल पाता, तो उसे पाने के लिये तू पैसे देगा,

मुझे? . . . अपनी मां को?? . . . और मैं नसीबों जली अपने बेटे से पैसे लूंगी???"

मुन्ना बिलख-बिलख कर रोने लगा और साथ में रो रही थी उसकी मां।

भोला बच्चा अपनी सज़ा का कारण तो समझ न सका पर डरा, बौखलाया सा बोल उठा,

"औल पैछे नईं हैं मेले पाछ। अम्मा, लात को बी छाथ छोने दो ना . . . मैं तंग नईं कलूंगा . . . बिछतल में छु-छु बी नईं कलूंगा!" 

मुन्ना की तोतली पुकार 'लात को भी छाथ छोने दो' गुनिया के कलेजे में तीर की तरह आ चुभी। बंदिशों में बंधी, जकड़ी उसकी रातें तो बिकाऊ होती है। यह बंधन टूटे तो उसके कलेजे के टुकड़े को उसका हक़ मिले। दहक उठा उसका मन और वह हड़बड़ा कर बिस्तर से उठ खड़ी हुई।

  पल भर के लिये वह खड़ी सोचती रही। झंझा के झटके सा एक विचार उसको पूरी तरह से झकझोर गया। यहां से निकलना होगा। आज  . . . अभी!  रात की थकी-हारी लड़कियां, बड़ी बाई और सभी दलाल तपती दोपहर में चैन की नींद सो रहे थे। झटपट उसने अपने और मुन्ना के कुछ कपड़े गठड़ी में बांधे। सोने के कुछ गहने बनवाये थे। वे साड़ी के पल्लू में बांधे। बुरे दिनों के लिये कुछ रुपये छुपा कर रखे थे जो उसने अपने ब्रा में सुरक्षित किये। फिर वह मुन्ना को लेकर दबे पांव देह की उस दुकान की सीढ़ियां उतर आई . . . अन्तिम बार!

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                                                                                                                                                         दो लघुकथाएँ


                                                                                                                                                  -आलोक सातपुते

        कारण


‘‘सुन, सब्जी में नमक नहीं डाली है, क्या ? जा, जाकर नमक का डिब्बा उठा ला- तू डिब्बे को पटक कर क्यों दे रही है ?’’
‘जी हाथ से छूट गया।’
‘‘तेरा ध्यान कहां रहता है साली । जूतों से आरती उतारने के लायक़ है तू।’’
‘क्यों जूतों से क्यों आरती उतारोगे? मैंने ऐसा क्या कर दिया है ?                                                           ‘‘तेरी जूतों से आरती, उतारने के लिये यही कारण काफ़ी है कि तू एक औरत, और मैं एक मर्द हूँ। ‘‘



         संदेह


आज सुबह जब मेरे पड़ोसी ने फूलों का गुच्छा देकर मेरी श्रीमती जी को हैप्पी बर्थ-डे भाभीजी कहा तो मैं चौक पड़ा...अरे! आज तो मेरी श्रीमती का जन्मदिन है। अब मरे मन में सन्देह के बीज का अंकुरण होने लगा कि मेरे पड़ोसी को बर्थ-डे की बात कैसे पता चली...? कहीं उसे मेरी पत्नी ने तो नहीं बताया । अब मुझे अपनी पत्नी कुलटा जान पड़ने लगी, जबकि किसी को कुछ बताकर उसे भूल जाने की अपनी बीमारी को मैं भूल गया था।       

 

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                                                                                                                                               सरोकार ( खुला पत्र)

                                                                                                                                                    तारा चन्द आहूजा


मेरी पूज्यनीय प्यारी माँ

सादर वन्दे !

मैं कितनी सौभाग्यशाली हूँ कि आप जैसी ईश्वरभीरू और दयामती माँ की मुलायम कोख में निवास कर रही हूँ। मैं भगवान से दुआ करती हूँ कि आपका स्वास्थ्य अच्छा बना रहे। माँ मुझे पता है कि आपको परिवार के सदस्यों के दबाव में आकर अल्ट्रासाउन्ड से मेरा कन्या होने का पता चल गया है और आपने मुझे जन्म लेने से पहले ही समाप्त करने का मानस बना लिया है। मुझे तो विश्वास ही नहीं होता कि मेरे प्रति आपका मातृ-प्रेम इतना खोखला है जो मेरी स्नेहमयी, दयामयी और करुणामयी माँ को इस कुकृत्य को करने के लिए मजबूर कर सकता है। इसमें सच्चाई है, तो माँ! अभी मेरी कोमल बाँहें इतनी शक्तिशाली नहीं हैं कि आपको हृदय से लगा सकूँ, आपका दामन खींच सकूं और आपकी गोद में बैठकर अपने रोने की आवाज आप तक पहुँचा सकूं ताकि आपका पत्थर दिल पिघल जाये। मुझे तो यकीन ही नहीं होता कि मेरी माँ कोख में ही अपनी लाडली के शरीर को समाप्त करने की चुभन सहन कर लेगी। आपने तो गर्भपात पर डॉ. येनसेन द्वारा बनाई गई फिल्म “  साइलेंट स्क्रीम“  गूंगी चीख) देखी है जिसमें हृदय-विदारक दृश्य देखकर किसी भी निर्दयी निर्दयी व्यक्ति के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। आपको याद होगा कि किस तरह डॉ. द्वारा शल्य चिकित्सा करते समय मासूम बच्ची का डरकर सिकुड़ना, उसके दिल की धड़कन का बढ़ना और फिर औजारों द्वारा गर्भस्थ शिशु के टुकड़े-टुकड़े करना, डॉ. द्वारा शिशु की खोपड़ी तोड़ना, गाजर-मूली की तरह मासूम बच्ची के टुकड़ों को ‘ सक्शन ट्यूब ‘ माध्यम से बाहर निकालना आदि दारुण दृश्यों ने आपको रुलाने पर विवश कर दिया था। यहाँ तक कि जिस डॉक्टर द्वारा यह फिल्म बनाई गई, उसने जब फिल्म को देखा तो, वह रुआंसा होकर अपनी क्लीनिक को छोड़कर चला गया था।

मेरी प्यारी माँ! यदि आप यह समझती हैं कि बेटा ही वंश चलाता है तो आप भूल कर रही हैं क्योंकि आप तो वेदों में अगाध श्रद्धा रखती हैं जो “ वसुधैव कुटुम्बकम्“ का संदेश देते हैं। फिर आज के वैश्वीकरण के युग में सारा विश्व एक ग्लोबल विलेज यानि एक गांव का रूप लेता जा रहा है। माँ! यदि आप मेरे लिए दहेज के कारण डरती हैं तो आपका वह डर निर्मूल है क्योंकि आप तो जानती हैं कि एक मेधावी लड़की के लिए दहेज की आवश्यकता नहीं होती। और दूसरी बात यह है कि अब स्त्री-पुरुष लिंगानुपात इतना अधिक गड़बड़ा गया है कि आने वाले समय में तो वधु के लिए वर वालों को ही दहेज देना पड़ेगा, लड़की वालों के आगे गिड़गिड़ाना पड़ेगा। परन्तु माँ मैं तो विवाह उसी लड़के से करूँगी जो दहेज के दानव का महाविरोधी होगा और माँ यदि आप समझती हैं कि केवल बेटा ही बुढ़ापे की लाठी होता है तो यह केवल आपका भ्रम है। आप तो देख रही हैं कि आजकल बेटे ही अपने माता-पिता को किस प्रकार अपमानित करते हुए वृद्धाश्रम में रहने के लिए विवश कर रहे हैं। बेटी तो अपने ससुराल में रहते हुए भी माता-पिता की चिन्ता करती रहती है। बेंटे तो उन पंछियों के समान हैं जो पंख लगते ही उड़ जाते हैं जबकि बेटियाँ तो हरे-भरे पेड़ हैं जो स्वयं धूप में जलकर दूसरों को छाया देती हैं अर्थात् स्वयं चाहे दुखी हों पर माता-पिता को कभी दुख नहीं पहुँचातीं और न ही उन्हें दुखी अवस्था में देख सकती हैं।

माँ! मुझे जीने का एक अवसर दो। मैं आपसे अपने जीवन के लिए भीख मांगती हूँ। मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ कि मैं पढ़-लिखकर अपने को हर संभव योग्य और समर्थ बनाऊँगी। मैं भी मीरा, इंदिरा गांधी, लक्ष्मीबाई, लता मंगेशकर, किरण बेदी, किरण देसाई, अमृता प्रीतम, कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स, पी.टी. उषा, सानिया मिर्जा आदि वीरांगनाओं की तरह अपने माता-पिता, अपने कुल तथा अपने देश का नाम ऊँचा करूँगी । माँ आप भी तो स्वयं एक नारी हैं फिर एक नारी के प्रति आपका ऐसा कठोर रवैया क्यों है? आप मेरी हत्या करके स्वयं को नीचे क्यों गिरा रही हैं? नारी तो सृष्टि की निर्मात्री है और प्रभु की अनुपम-सुन्दर रचना है। मनु महाराज ने भी कहा है-

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः।

अर्थात् जहाँ नारियों का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं। लेकिन आप तो उल्टी गंगा बहाने जा रही हो। ऐसा मत कर मेरी अच्छी माँ , कैसी माँ है तू! पहले मुझे अपने खून से सींचती है और फिर मेरा खून बहाने के लिए तत्पर हो जाती है। मुझे पराया धन समझकर छिटकाओ मत प्यारी माँ! मैं आपकी अमूल्य निधि हूँ, आपके प्रति वफादार और समर्पित रहूँगी। मुझे संसार में आने दो प्लीज़!

काश! मुझे माँ आने देती,
जीवन सफल बनाने देती।
दुनिया को चमकाने देती,
जीने का एक अवसर देती।।

            आपकी लाडली,
               अनामिका ( अजन्मी बेटी)

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                                                                                                                                                      विचार
                                                                                                                                              -डॉ. शकुन्तला    

           बेटी का आनंद


सजा नहीं वरदान होती है बेटी

सपना नहीं हकीकत होती है बेटी

गैरों के बीच अपनी होती है बेटी

सुख-दुख के बीच सेतु होती है बेटी।।



युग-युगान्तरों से पुरुष प्रधान समाज ने बेटी के रूप में कलेजे के टुकड़े को कभी नहीं अपनाया। उसने बेटी को कभी नहीं अपनाया। ‘ पराया धन ‘ , ‘ पराईँ-जाई ‘  जैसे शर्मनाक संबोधनों से उसे संबोधित किया, किंतु वह विचलित नहीं हुई । उसने सदैव सभी का साथ दिया, उसने कभी हक की बात नहीं की। उसने सदैव दिया। वह प्रकृति के नियमों की भांति मानव के नियमों का पालन आदतन करती आ रही है।

दुर्भाग्य की बात यह है कि नारी स्वयं इस बेटी के प्रंति संवेदनशील नहीं है। प्यारी सी , भोली सी, अपनों के लिये मौन रहकर हर सहयोग करती यह अमूल्य निधि, व्यक्ति, समाज, देश तथा विश्व के लिये एक प्रेरणा स्रोत है। भाग्यशाली हैं वे जो उनका महत्व जानते हैं, उन्हें दिल से अपनाते हैं, इसीलिए व्यक्ति जीवन में दो बार रोता है-

 ‘ एक बेटी घर छोड़े तब, एक बेटा मुँह मोड़े तब ‘।

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                                                                                                                                                       चौपाल





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                                                                                                                                         -डॉ. रवीन्द्र अग्निहोत्री

     लार्ड मैकाले  का  तर्पण

आप  जानते   ही   हैं  कि  ' इंडिया '  के  कलेंडर  में  सितम्बर के   महीने का  बहुत   पवित्र   स्थान  है  क्योंकि  इसी  महीने में  हम  दो  ऐसे  पुण्य स्मरण  इतने अधिक कर  लेते  हैं  कि  फिर  उनकी  याद  करने की ज़रूरत साल  भर  नहीं पड़ती --शिक्षक  दिवस  और  हिंदी  दिवस.  परम्पराओं  को याद  करना और  भुलाना  दोनों काम  एक साथ  हो जाते हैं  वैसे  ही  जैसे शराबी  कहता है,

" रात  को  खूब  पी मय  औ '  सुबह  को  तौबा कर  ली ;

रिंद  के रिंद  रहे  हाथ  से  जन्नत न  गई . "

हमें भी  दोनों लाभ एक साथ मिल  जाते हैं .   इस  बार  का  सितम्बर  तो  और   भी  पवित्र   सिद्ध  हुआ .  एक   ओर   मुसलमान   भाइयों  ने   ईद  मनाई तो   महाराष्ट्र वालों ने  ' गणपति बाप्पा ' का त्यौहार मनाया ;  पर  इसे और   भी  अधिक   पवित्र    बनाने   वाला   समाचार   तो    दलितों    की   एकच्छत्र   नेता  बहन  मायावती  और भाई   चंद्रभान प्रसाद  के   ' उत्तर  परदेस '   से  मिला  जहाँ  वह  काम  हो  रहा है जिससे  ' इंडिया '   का नाम पूरे  ' वर्ल्ड '  में छा गया है. पता  है  वह  समाचार क्या है ?

 

वहां  एक ऐसा मंदिर तैयार किया गया है जो भारत का ही नहीं, संभवतः  विश्व का   एकमात्र   मंदिर   होगा   क्योंकि   उसमें    एकदम   नई   नवेली ' देवी '  की प्रतिष्ठा  की जा रही है .  संभव है बहुत  से  लोगों  ने  अभी तक उस  देवी का नाम भी न सुना हो, पर इससे क्या  फरक  पड़ता है  . देवी - देवताओं  की प्रतिष्ठा इसी प्रकार तो होती है.   कुछ समय  पहले  तक संतोषी  माता, साईं बाबा   जैसे देवी - देवताओं  के नाम  कौन  जानता  था ?   अब  गली - गली,  घर - घर उनके  भव्य  मंदिर हैं.  तो देस के सर्वोत्तम परदेस उत्तर परदेस में  जिस  नई  देवी  की स्थापना  होने  जा  रही है , उसका नाम है  ' अंग्रेजी देवी '  .  इस देवी की लगभग 20 किलोग्राम  वज़नी   ब्रांज  की मूर्ति  दिल्ली से बनवाकर  करीब  पांच हज़ार की  आबादी  वाले   दलित - बहुल ' बनकागांव ' जिला लखीमपुर खीरी  में  आ चुकी है और अब बस   अपनी  स्थापना  की  प्रतीक्षा  कर  रही  है.   इस   देवी  का  प्रताप देखिए  कि अभी   मंदिर में  भक्त  इकट्ठे  हुए नहीं,  पूजा - अर्चना  शुरू हुई नहीं ,  पर   उपलब्धियों   के   रिकार्ड   बनने   शुरू  हो  गए    हैं.    जैसे यह  कि मंदिर का शिलान्यास  इसी वर्ष  30   अप्रेल को किया गया था जिसमें   दो  विदेशी  पत्रकार   भी   बुलाए   गए .    देवी   की     महिमा देखिए कि   चार ही  महीनों  में  मंदिर बन गया, इस  नई  देवी की मूर्ति  का डिजाइन  बन गया,  मूर्ति  बनाने वाले कलाकार मिल गए  और  उन्होंने   एक  अँगरेज़   महिला   के   हाथ  में   ' Pen  and    Book '  देकर   ' Computer '  पर खड़ा  करके  " अंग्रेजी  देवी "  की   भव्य   प्रतिमा बनाकर  तैयार कर दी  . अब  उसकी  स्थापना का   पवित्र   मुहूर्त  भी तय  हो  गया है . " लार्ड मैकाले "  नामक   जिस महापुरुष ने  इस देश के  महामूर्ख लोगों को ज्ञान की साक्षात  देवी ,  माडर्न युग  की  सरस्वती  " अंग्रेजी देवी "  से परिचित कराया था,  उसके  जन्म दिन से   अधिक  शुभ  दिन और  कौन  सा  हो  सकता है ? भाई चंद्रभान  प्रसाद  पिछले  अनेक वर्षों से  उस महापुरुष की   ' बर्थ डे '   25 अक्तूबर  को  बड़े  धूम-धाम से मनाते  ही आ  रहे हैं . सो  बस अब उसी 25  अक्तूबर का  इंतज़ार है . " अंग्रेजी मैया "  की जय हो ,  " लार्ड मैकाले " की  जय  हो.  

अब जाकर लगा कि चलो इस बदनसीब  देश में किन्हीं तो  ऐसे  महापुरुषों ने अवतार लिया  जिन्होंने " अंग्रेजी  देवी "   और  " लार्ड मैकाले  "  को सही सम्मान  देने  की सोची , वरना  इस देश  के  अहसान - फरामोश   लोगों को देखिए कि  लार्ड   मैकाले  की   चलाई   अंग्रेजी -  शिक्षा को  पढ़ते सब रहे , छिप -  छिप  कर   अंग्रेजी  देवी  की  पूजा  भी  करते   रहे ,   पर  श्रद्धा से  नाम लेना  तो   दूर ,  खुलेआम      उन्हें   पानी   पी - पी  कर  कोसते रहे .    कितना बड़ा पाप  किया हमारे  देशवासियों ने . अब  इस  मंदिर  से  उस पाप  का  प्रायश्चित भी  हो  जाएगा . 

 

आजकल  अपने  देश  में  श्राद्ध पक्ष  चल  रहा है .  इस  अवसर  पर लोग  अपने " पितरों "  को   याद  करके  उनका  तर्पण करते  हैं ; पर अधिकतर  लोग अपने " मृत "  पितरों को  याद करते  हैं  जिसमें  मेरी कोई रुचि  नहीं क्योंकि मैं उस वातावरण में पला - बढ़ा  जिसमें  यह बताया  गया कि  " जीवित  माता - पिता -  गुरु  आदि की   सेवा करना,   उनकी   आज्ञा का  पालन   करना,   उनकी   शिक्षाओं  को अपनाना ,     उनका  सम्मान करना,  उनके  उपकारों  को  सदा याद रखना   और  ये  सारे  काम श्रद्धापूर्वक करना  ही  सच्चा  श्राद्ध  " होता  है .   जहाँ तक  मैकाले  का  सम्बन्ध है वे  आज अपने  भौतिक शरीर से  भले  ही जीवित  न  हों,  पर  अपने  यशः शरीर  से हमारे रक्त की एक - एक  बूँद  में समाए  हुए   हैं.  हमारा तो रोम - रोम उनका ऋणी  है . उनके  ऋण  के  भार से  हमारे  देशवासियों की कमर दोहरी हुई  जा रही है .  तभी  तो  कहा  गया है,

"  मैकाले  के  उपकार  जो हैं,  नहीं  गिने - गिनाए  जाते  हैं ;

उनकी  शिक्षा  से  ही  तो  हम  अब  रोज़ी - रोटी  पाते हैं. "

इसीलिए    लोग   हमें    इज्ज़त   के   साथ     उनकी      " मानसी   -   संतान " ( Macaulay's  Children )   कहकर  संबोधित  करते  हैं.  ध्यान देने की बात  यह भी है  कि  मैकाले  ने   शादी   की    नहीं  थी,   अतः उनकी    कोई अपनी " बायोलोजिकल  वैध  संतान " तो  है   ही नहीं जो उनका  तर्पण करे पर  इस से कोई  फरक  नहीं  पड़ता   क्योंकि . हमारी ही नहीं   पूरे  विश्व की  परंपरा  में देख  लीजिए, "  बायोलोजिकली  वैध संतान  "   से  अधिक महत्त्व "  मानसी संतान "  को  दिया  गया  है . गौतम   बुद्ध  हों   या  ईसा मसीह,    कबीर हों  या नानक , आधुनिक युग के स्वामी दयानंद हों या  स्वामी विवेकानंद  -   सभी  अगर  आज  जीवित  हैं  तो  अपनी   मानसी  संतान के कारण . बायोलोजिकल  संतान को तो    उत्तराधिकार  में केवल  रुपया - पैसा मिलता है, पर  मानसी  संतान  को तो वह  सब  मिलता है  जिसके कारण उस व्यक्ति  का  जीवन  केवल  घर  के लिए नहीं,  पूरे  समाज के लिए  उपयोगी  बना . देखा   जाए   तो  मानसी - संतान से ही महापुरुषों  का वास्तविक  वंश चलता है . हमारे दार्शनिकों ने  भी  बताया  है  कि हमारा  शरीर  पांच कोषों  से बना है .   केवल अन्नमय कोष वाला यह शरीर  तब तक  व्यर्थ  है   जब तक इसमें  प्राणमय कोष,  मनोमय कोष,  विज्ञानमय कोष और  आनंदमय  कोष का  समावेश  नहीं हो जाता . और ये  कोष  जिन स्रोतों से आते हैं  उनमें हमारे " मानसी  पिता " ( गुरु ) का अद्वितीय  स्थान होता  है. यह व्यवस्था हमारे  ऋषि  दे  ही गए हैं कि संतानहीन  गुरु  का तर्पण  उसके शिष्य   करते हैं.  फिर लार्ड मैकाले के  बाद से तो  हमारे  न जाने  कितने गुरुओं की पीढ़ियाँ  बीत  गईं . इसलिए  लार्ड मैकाले तो  हमारे लिए   गुरुओं   के  गुरु यानी " महागुरु "  हैं . उनका  तर्पण  करने  का  हमें अधिकार भी और  हमारा कर्तव्य भी. " कीर्तिर्यस्य  स जीवति " ( जिसकी कीर्ति  शेष  है वह जीवित  है ) पर विश्वास करते हुए  मैं  उन्हें   जीवित मानकर  ही   अपने  मानस  पिता का,  उनके  गुणों का  और   उनके उपकारों  का श्रद्धापूर्वक  स्मरण कर  रहा हूँ . इस  पुण्यस्मरण में  आप सहभागी  बनें  तो  आपका  स्वागत  है .

लार्ड  मैकाले  हमारे  दो  सौ  साल  पुराने " पितर "  हैं . इतने  लम्बे समय बाद हम  लोग  बहुत सी  बातें  भूल गए  होंगे,  इसलिए  सबसे पहले  उनके जन्म आदि  की बात  कर  ली जाए . अब से छह -  सात दशक     पहले   जब      अपने     इस    मानस - पिता  से     मेरा     पहला                परिचय  हुआ  तो  न  जाने  क्यों,   मेरे उस  समय    के    पितरों   ने   पूरा   नाम   बताने   के      बजाय     ' टी. बी.  मैकाले '  बताकर  डरा - सा  दिया . आप जानते  ही  हैं  कि तब   टी. बी.  '  असाध्य '  रोग   माना जाता था.  अब आज की   बात  अलग   है  क्योंकि  अब  न  वह   रोग  लाइलाज  रहा,    न     उसका डर ;     और    अब   तो   जब    अपने    मानस -  पिता    का      पूरा             नाम ' Thomas  Babington Macaulay ' मालूम हुआ,  तो  रहा - सहा  डर भी  जाता रहा. उनके पिता  जाकरी मैकाले (Zachary Macaulay )  मूलतः स्काट्लेंड. के थे . सरकारी  क्षेत्र में  उनकी ऊंची  पहुँच  थी और वे  वेस्ट इंडीज़ ,  सिएरा लियन में विदेश सेवा में भी रहे.   हमारे मानस पिता  का जन्म   अपने    माता  -  पिता  की  सबसे    बड़ी    संतान   के  रूप   में

25 अक्तूबर 1800 को  ( और देहांत  28 दिसंबर 1859 को )   हुआ . उनकी दो बहनें थीं - हन्नाह (Hannah ) और  मार्गरेट (Margaret ) जो उनसे 10 और 12 साल  छोटी थीं .  दोनों के  संपन्न परिवारों  में  विवाह  हुए, पर मार्गरेट का  जल्दी ही देहांत हो गया . वे अपनी बहनों  से और  उनके परिवारों  से  बहुत प्यार करते थे.  आज अपने इस  पिता के बारे में हमारे पास जो अंतरंग जानकारी है, उसका   बहुत    कुछ   भाग उन  पत्रों  में  छिपा है  जो  उन्होंने अपनी  बहनों  को लिखे और    बाद  में    जिनका   संकलन    उनके     भांजे    सर    जार्ज     ट्रेवेलियन       ( Sir  George  Trevelyan ) ने 1876 में  The  Life & Letters  of  Lord  Macaulay नामक पुस्तक में किया . पढाई में हमारे पिता  शुरू से ही तेज़ साबित हुए . उच्च शिक्षा के लिए ट्रिनिटी कालेज , कैम्ब्रिज गए. वहां पढ़ाई  तो कानून की भी की, पर वकालत करने के बजाय उन्हें राजनीति अधिक भाई . मारिया  नाम की एक  लडकी से उन्होंने प्यार भी  किया , पर बात शादी  तक पहुँच नहीं पाई . तो फिर उन्होंने जीवन भर शादी की ही नहीं. 1830 में एडिनबरा  से  वे पहली बार  मेंबर                                     ऑफ़    पार्लियामेंट     बने.     उन्हें    उस       " बोर्ड    ऑफ़    कंट्रोल   ” का   एक ' कमिश्नर ' बनाया  गया  जो ईस्ट इंडिया कम्पनी के डाइरेक्टरों पर नियंत्रण रखने  के लिए  था.

वे  इस  बोर्ड में  18 महीने  रहे  और  इसी  दौरान उन्होंने  इंडिया  के  बारे में वह  जानकारी  प्राप्त  कर ली जो आगे  चलकर उनके  बहुत  काम   आई  . जैसे,     यहाँ    की     जाति  -   प्रथा,      विभिन्न         परम्पराएं  -मान्यताएं,   यहाँ  के  धर्म,   तत्कालीन  समाज  में  प्रचलित   यहाँ  के  अंध - विश्वास  (  इन्हें  वे  विशेष  महत्त्व  देते  थे ;  कहा  ही गया  है , " दूसरे की आंख  का   तिनका  भी   शहतीर   नज़र   आता   है "  )    आदि  .    साथ ही   इंडिया को  इन  बुराइयों  से  मुक्त   करने  के   लिए   अर्थात   ईसाई   धर्म  का  प्रचार  करने  के  लिए   ईसाई   मिशनरियों ने  जो  काम  किए थे ,  उनकी  भी  ऐसी   जानकारी    प्राप्त    कर   ली          जिसके आधार पर   उनके  मन  में   इंडिया    से  संबंधित   हर  चीज़  के प्रति  -- फिर  चाहे  वह  कला हो,    धर्म हो,   विज्ञान  हो,  या साहित्य  हो,     एक    स्थायी      " नकारात्मक     दृष्टिकोण "   बन गया . इस  दृष्टिकोण  का  ही यह सुफल  था  कि  इंडिया  आने  पर   उनका   अमूल्य समय ढेर सारी बेकार की बातों में  बरबाद  होने  से  बच  गया .

हमारे  मानस पिता के  जीवन  का  यह समय  थोड़ी  कठिनाई  का  था . राजनीति में  अधिक  घुसपैठ  हो  नहीं  पा रही थी  और वे  आर्थिक  तंगी से जूझ रहे थे . अपनी इस स्थिति का वर्णन करते हुए उन्होंने  अपनी  बहन को पत्र में लिखा कि  मुझे   राजनीतिक जीवन अंधकारमय दिखाई  दे  रहा है . पार्टी में मतभेद  बहुत  बढ़  गए  हैं  और  पार्टी   विखंडित हो रही है (  वे व्हिग  पार्टी में थे जो  बाद में  लिबरल  पार्टी  बनी ).  आने वाले समय  में इंग्लैंड में मुझे अपना जीवन  गरीबी से  भरा दिखाई दे रहा है .  मैं  अभी  दो सौ  पौंड  से अधिक  नहीं  कमा   पा रहा  हूँ जबकि  जिस तरह  का  जीवन मैं  जीना चाहता   हूँ उसके लिए  कम से कम  पांच सौ   पौंड  तो  चाहिए ही.     In England I see nothing before me, for some time to come, but poverty, unpopularity, and the breaking of old connections .

तभी  एक  ऐसी  घटना  घटी  जिससे  सारा  परिदृश्य  बदल गया.   ब्रिटिश पार्लियामेंट  ने  जो  नया  इंडिया बिल  बनाया ,   उसमें  सुप्रीम  काउन्सिल ऑफ़  इंडिया    में " Law  Member "  का  एक नया  पद बनाया गया जिस पर    ऐसे   ही    व्यक्ति   की     नियुक्ति    की    जानी    थी      जो ईस्ट  इंडिया  कंपनी  का   कर्मचारी या उस से संबंधित  न हो . उस ज़माने में  इंग्लैंड के  सरकारी   क्षेत्र में ऐसे  लोगों का मिलना  कठिन  था  जो ईस्ट  इंडिया  कंपनी  से  संबंधित  न हों. पर हमारे  मानस - पिता  ऐसे  ही व्यक्ति  थे.  अतः  इस  पद  का प्रस्ताव उन्हें  दिया  गया .  इस पद के लाभ  बताते  हुए  उन्होंने   अपनी  बहन को फिर  लिखा  कि  इससे मुझे   इज्ज़त  तो  मिलेगी  ही,   उससे  भी अधिक पैसा मिलेगा -  पूरे दस हज़ार  पौंड  प्रति  वर्ष. मैंने  सारी बात पता  कर  ली है. कलकत्ता में   पांच हज़ार पौंड में  बड़ी शान से रहा जा सकता है  इसलिए  बाकी सारा पैसा बचेगा. उस  पर ब्याज मिलेगा. मैं  जब 39  वर्ष  की  जवान   उम्र  में ही  वापस  आऊँगा  तो मेरे  पास  तीस हज़ार पौंड होंगे .  मैं  सारी ज़िंदगी ऐसी शान  से रहूँगा जैसे कोई  राजकुमार  रहता  है ;  और  मजेदार बात यह  कि इंडिया में मुझे  कोई  मेहनत  का काम भी  नहीं  करना  है. आराम से बैठे - बैठे शाही काम  करने  हैं.  ऊपर से  उस  देश में  जितनी भी सुविधाएं  मिल  सकती   हैं,   वे सब  भी  मुझे   मिलेंगी.   इन्हीं  आकर्षणों ने हमारे मानस - पिता को  यह पद स्वीकार करने  और  इंडिया  आने  के लिए प्रेरित  किया . 

 

उन  दिनों इंग्लैंड से  इंडिया  आने के  लिए  समुद्र  यात्रा करनी  पड़ती थी . जहाज़  पर  सुविधाओं  के  सारे  सामान के  बावजूद  चारों  तरफ  पानी ही पानी.  पता  नहीं   किसने  कह  दिया  कि  '  जलं जीवनं  ' .    चौबीसों  घंटे जल  में रहना पड़े तो    पता चले कि  जीवन  क्या है.  अरे,  जीवन   का आनंद  तो   पृथ्वी पर  है,     हमारे  मानस पिता   को जब  तीन महीने की लम्बी  समुद्री यात्रा के बाद  इंडिया की धरती  दिखाई दी, तो जान  में  जान आई .  मन  -  मयूर   ख़ुशी से   नाचने  लगा .  और   यह    खुशी     कई गुनी  तब और बढ़ गई जब  वे  मद्रास    तट  पर   10 जून 1834  को उतरे जहाँ  उनका गरमजोशी  से स्वागत   किया गया ,   और  दी गई  15 तोपों की सलामी . पर यह क्या ? वे जिधर देखते,  काले - काले  लोग,  सिर पर झक सफ़ेद  पगड़ी,  ढीले  -  ढाले  झूलते  हुए  से  कपड़े ; पेड़ों पर निगाह गई तो अपने यहाँ का  एक भी पेड़  नहीं  मिला.  और  गर्मी  के   कारण    सारा वातावारण ऐसा  जैसे किसी भट्टी  में  आ गए हों.  बेतुकी   बिल्डिंगें  और न जाने  कैसे - कैसे  पेड़ - पौधे .  उन्हें  कुछ भी  अच्छा नहीं  लगा .  तोपों की सलामी  की सारी   ख़ुशी  काफूर हो गई.  इंडिया के बारे में कोई  अच्छी राय  तो उनकी पहले भी  नहीं थी,   पर अब तो ....... उन्हें  दृढ़  विश्वास  हो गया कि मैं ही क्या,  मेरे देश  का कोई  भी  व्यक्ति  इस देश में केवल,  और केवल   शासक एवं   योद्धा के  रूप  में  ही  रह  पाएगा. ( he was in a region where his countrymen  could exist only on the condition of their being  warriors and  rulers ) .   वैसे  भी  वे  तो  इसी काम के  लिए आए थे.  अब  वे  इसकी   योजनाओं  पर  विचार  करने  लगे.              

मद्रास में  एक हफ्ते आराम  करने के  बाद  हमारा यह पिता  उटकमंड के लिए रवाना हो गया  क्योंकि गवर्नर जनरल  विलियम  बेंटिंक गर्मी के कारण वहां आराम  फरमा रहे थे.  चार  सौ  मील  की  यह  यात्रा  वह  पहली चीज़   थी जो उन्हें  इंडिया में  इसलिए  पसंद  आई  क्योंकि उनकी पालकी कहारों  ने  अपने " कन्धों "   पर  ढोई .  शायद  अब  उन्हें यह  विश्वास हो  गया  होगा  कि  ये काले  रंग  वाले,  ढीले -  ढाले  हवा  में झूलते  कपड़ों वाले  इंडिया  के  लोग उन्हें  हमेशा अपने  कन्धों  पर  ही ढोएंगे   और   हमेशा  अपने  सिर  पर बिठाकर  रखेंगे .

अंधविश्वासों  में  जकड़े  इस जंगली असभ्य देश  को विश्व के   भले आदमियों के बीच  उठने- बैठने  लायक सभ्य देश  बनाने  के  लिए  हमारे मानस  पिता ने  जो उपकार किए, उनकी गिनती  नहीं  की जा सकती.  फिर भी  कुछ   बातों की चर्चा इस  अवसर  पर  करनी बहुत  आवश्यक  है . वे पहले  व्यक्ति थे  जिन्होंने  हमें ' आज़ादी '  का  सही  अर्थ   समझाया . उन्हें इंडिया में आकर सबसे  पहले  इसी समस्या  से  जूझना  पड़ा   था क्योंकि  जिस  स्वतंत्र  '  प्रेस ' की   शुरुआत उनके " स्वर्ग " जैसे देश  में हुई थी ,   लोग  उसी की नक़ल  करने  का दुस्साहस  " नरक "  जैसे इंडिया  में  करने  लगे  थे . इंडिया वालों  की  जुर्रत तो  देखिए  कि " गुलाम " लोग  अपने  को  विशेषाधिकार  प्राप्त   " आजाद "   लोगों   के   बराबर समझने  लगे थे ( recognize them as a priveleged  order of freemen in the middst of slaves ) ! हमारे  पिता  तो विद्वान व्यक्ति  थे.  वे    स्वर्ग - नरक का  अंतर   अच्छी तरह जानते थे .  उन्हें  पता था कि  प्रतिनिधि सरकार  केवल स्वर्ग  में  बन  सकती  है,  नरक  में  नहीं.  इसीलिए उन्होंने  इंडिया आने से  पहले  इंग्लैंड के  हॉउस ऑफ़ कामंस में  10 जुलाई 1833 को कहा था' " If   the question were , what is the best mode of securing good government  in Europe ? The   merest  smatterer  in politics   would answer ,     representative     institutions.  In      India  you  cannot have  representative  institutions. "    हमारे  मानस पिता ने   साफ़ शब्दों में  बताया ,"We know that India cannot have a free Government. But she may have the next best thing  -  a  firm  and  impartial   despotism."   उन्होंने हमें अच्छी तरह  समझा दिया  कि  आज़ादी  और  तानाशाही  एक  ही  सिक्के के दो  पहलू   होते  हैं . तब  तो  हम  अज्ञानी थे , पर अब  उनके  प्रताप से  हम समझ  गए  हैं कि  स्वर्ग में  जिसे  आज़ादी  कहते  हैं, उसी  को नरक  में तानाशाही  कहते  है .  कानून  सबके  लिए  बराबर  होता  है - स्वर्ग वालों के लिए  स्वर्ग  का  कानून,  और   नरक वालों  के लिए  नरक का कानून .  उनकी इस शिक्षा को हमने  अपने  मन में उतार लिया है और  अब हम आज़ादी और तानाशाही को एक दूसरे  का पर्याय ही मानते  हैं. 


उनके  गुणों   का   बखान  कितना   भी  करें ,  कम  ही  रहेगा  . अब जैसे   उनकी ईमानदारी  देखिए  कि  बिलकुल  साफ़  -  साफ़  कहा कि मुझे  संस्कृत  या अरबी  की कोई  जानकारी  नहीं है  (  I have no knowledge of either Sanscrit or Arabic ) .   दूसरी  तरफ  विद्वत्ता देखिए कि  साहित्य तो दूर,  भाषाओं तक  की जानकारी  न  होने  के  बावजूद पता लगा लिया   कि इंडिया और अरब का  सारा साहित्य एक  तरफ  रख  दीजिए,   और   यूरोप की किसी भी  अच्छी लाइब्रेरी  के  एक  खाने  का  साहित्य  दूसरी  तरफ रख   लीजिए , फिर  भी बराबरी नहीं  हो  पाएगी  ( a single shelf of a good European library was worth the whole native literature of India and Arabia )  .  यह साहित्य  " Native "   है,  " आदिवासियों  "  का है ,  " कूपमंडूक "  लोगों का  है ,  उन  लोगों  का  है  जो  अपने  ही  छोटे - से  इलाके  में    रहते रहे, जिन्होंने  दुनिया  देखी  ही  नहीं इसलिए  जिन्हें  कभी  कोई  समझ आई  ही  नहीं,  जो कभी  सभ्य  बने  ही नहीं . तो  फिर  ऐसे  लोगों  की भाषा और  साहित्य की बराबरी   सुसभ्य ,  सुसंस्कृत ,  ज्ञानी ,  अंधविश्वासों से   मुक्त  लोगों   की   भाषा   और  साहित्य से   कैसे  की   जा   सकती है ?  इतना ही  नहीं,   अगर   ऐतिहासिक  जानकारी की  बात की जाए  तो संस्कृत  में लिखे   सारे  ग्रंथों  से  उतनी  भी  जानकारी नहीं  मिल  सकती जितनी  जानकारी  इंग्लैंड  के नर्सरी  स्कूलों  के   बच्चों की छोटी  से छोटी   पुस्तक से  मिल  सकती   है . यही  हाल  दोनों देशों  के लोगों  की नैतिकता में  है   ( It is, I believe, no exaggeration to say that all the historical information which has been collected from all the books written in the Sanscrit language is less valuable than what may be found in the most paltry abridgments used at preparatory schools in England. In every branch of physical or moral philosophy, the relative position of the two nations is nearly  the same . )  

" अंग्रेजी देवी " से  हमारा परिचय  कराकर तो उन्होंने  हमारी  तकदीर  ही बदल डाली .  भगवान  ने  हमारे  साथ  जो  अन्याय  किया  था,  उसे हमारे मानस -  पिता ने ठीक  कर  दिया .  अब  जाकर   हमें पता चला कि जब से  दुनिया बनी तब  से हम  लोग  इतने  पिछड़े हुए  क्यों हैं.  अब हमने  उनकी सारी  बातों को सहेज कर  रख लिया  है .   उसे अपने  जीवन में  उतार लिया है  . जब पता  चल  गया  कि  हमारे  पिछड़ेपन का  कारण यह   संस्कृत भाषा और उसका साहित्य है तो हमने  सबसे  पहले  तो इस बेकार की भाषा  को  अपनी शिक्षा में से निकाल कर  बाहर किया ;  और फिर  अपने  जीवन  से इतनी दूर कर  दिया कि अब तो  हम  उसके  छोटे - मोटे  शब्दों  तक से परहेज़  करते हैं.  जो  भाषा और   साहित्य  इंग्लैंड के नर्सरी स्कूलों के बच्चों  तक के  बराबर  का  ज्ञान  न  दे सके , उसके  पीछे भागने  से  क्या फायदा ? हमारी  जहालत  हजारों सालों  की है इसलिए  उसे दूर   करने  में  समय  लग  रहा  है . इतना  तो  हमने  कर  ही लिया है कि   We have  discarded  our old ' rustic '   ' native '  forms of  salutations  like ' Namaste ' , 'Pranaam ' etc. and have adopted  salutations of civilised society  such as Hello, Hi, Bye, Good Morning,  Good  Evening , Good Night  etc.     हम   कोशिश  करते  हैं  कि  जहाँ तक हो सके,  अंग्रेजी के ही  words  use   करें . कुछ लोग  इसे  ' Hinglish '  कहने  लगे हैं , पर  हम  पूरी  अंग्रेजी  की तरफ जा रहे  हैं. जैसे ही  बच्चा  थोड़ी  सी भी  भाषा समझने  लायक  होता है तो सबसे  पहले हम उसे  Eyes ,  Nose ,  Ear ,  Hand , Finger     आदि  सिखाना शुरू कर देते हैं  और  कोशिश यह  कर रहे हैं कि  आगे से बच्चे  माँ के  पेट से ही अंग्रेजी  सीख  कर आएं.   इस तरह  हम  अपने  मानस  पिता - के अधूरे  रह  गए  काम को  पूरा कर  रहे  हैं.  हमें  पूरी  उम्मीद है कि  इस से  उनकी आत्मा को  परम  शांति  मिलेगी.वैसे  तो   अभी  तक  हम  लोग  अपने   हर   अच्छे   काम   के  अंत  में शांति - पाठ   करते थे ,       " ओम   द्यौ   शांतिः   अन्तरिक्षं   शांतिः पृथ्वी शांतिः ......... "   वेद का  पूरा  मन्त्र पढ़ते  थे , या  कम से कम   केवल   " ओम   शांतिः ,  शांतिः  ,  शांतिः  "    तो   कहते     ही थे ;  पर     अब   जाहिलों  की  भाषा  संस्कृत  से मुक्ति पाने  के  बाद  हम  अपने मानस - पिता की   धर्मपुस्तक  से लेकर "  Amen  "   ( आमेन )     को अपना  रहे हैं .  हमें  विश्वास   है   कि      " अंग्रेजी  देवी "    की  मूर्ति के हाथों  में  जो Book  है , उसमें  " Amen "  ही    लिखा होगा .


This  is  the   most  civilised   word  used  at  the  end  of    Prayers .
After all    we   have   to  pray  in   the  temple of  English  Goddess .

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                                                                                                                                                             हास्य-व्यंग्य





                                                                                                                                                            

                                                                                                                                                         - श्री गविन्द शर्मा

सेक्स सिम्बल का इंटरव्यूः 

टी.वी. खोला तो सेक्स सिम्बल का इंटर्व्यू चल रहा था। सेक्ससिम्बल जानबूझकर, बेखबर चहचहा रही थी। वात्स्यायन, कोणार्क, खजुराहो, मदनोत्सव, विश्वामित्र, मेनका, उर्वशी, रम्भा, विषकन्य, गीत-गोविन्द, कुमार संभवम् यौन शिक्षा, कोकशास्त्र, रेड लाइट जैसे शब्द इंटरव्यू को रोचक बना रहे थे, इंटरव्यू कर्ता की चोर-नजर झेंपती सजग होती साफ दिख रही थी, लेकिन अलमस्त गुरूर से लबरेज सेक्स सिम्बल के चेहरे से आत्मविश्वास और नूर जैसे चू रहा था।


इ.क.-अभी आपने कहा कि आप अपने शरीर को पूंजी मानती हैं, इसे अधिक स्पष्ट करेंगी।


सै. सिं.- देखिए, जिस तरह आप अपने धन और बुद्धि के मालिक हैं, वे आपकी 'पूंजी' हैं, उन्हें आप जैसा चाहें यूज करते हैं, उसी तरह हम भी अपने शरीर के मालिक होने के नाते, उसका मनचाहा यूज करते हैं। अपने अपने रास्ते हैं...(शरारती नजर से मुस्कराहट में कटाक्ष करती आगे बोली) हमारे अंग प्रदर्शन वाले रास्ते से तो यथार्थ के साथ परमार्थ भी सजता है, हमें धन और प्रसिद्धि मिलती है और देखने वाले को खुशी, नयन सुख एवं सभी दुखों से छुटकारा मिल जाता है।


इ.क. -(चौंकते हुए) दुखों से छुटकारे से आपका क्या अभिप्राय है? 


से. सि.- सीधा-साधा मतलब है, हमारी खूबसूरती और अदायें देखने वाले के दिलोदिमाग पर छा जाती है, तन मन की सुधि बिसर जाती है, पहाण सा दुख क्षण भर में छू मन्तर हो जाता है।


इ.क.- लेकिन यह तो क्षणिक सुख हुआ?


से.सि.- तो आप मुझे किसी स्थाई सुख का नाम बता दीजिए?  सुनिए जीवन क्षण भंगुर होता है। इसमें कोई सुख स्थाई नहीं है, बस जो लम्हा खुशी खुशी गुजर जाए वही असली सुख है। चार्वाक का श्लोक आपने अवश्य सुना होगा-भस्मीभूतय देहस्य पुनरागमनो कुतः


ऋणं कृत्वा घृतम् पिवेत्, यावज्जीवेत सुखम जीवेत।


इ.क.- आपका मतलब है सुख पाने का साधन केवल शरीर है?


से.सि.- शरीर के अलावा और क्या हो सकता है, क्या बिना शरीर के सुख का अनुभव संभव है?


इ.क.- अपनी बात, और खुल कर बता सकती हैं?


से.सि.-क्या खुल के बताना है, जीवन में सारा तामझाम भागादौड़ी इसी शरीर के लिए ही तो है, तन सुखी तो मन सुखी। किसी ने शेर कहा है-


सैर कर दुनिया की गाफिल जिन्दगानी फिर कहां


जिन्दगानी भी रही तो ये नौजवानी फिर कहां?


मुझे पढ़ने का शौक है। संस्कृत और हिन्दी साहित्य तो स्त्री-देह के नख-शिख चित्रण से भरा पड़ा है। आदमी की बात तो छोड़िए, तन-सुख की कामना में शिव-मोहिनी, ब्रह्मा-सरस्वती, नारद-विश्वमोहिनी, इन्द्र-अहिल्या, जैसे देवताओं के प्रसंग शरीर के महत्व को खुलकर बताते हैं। कालीदास और जयदेव जैसे महाकवियों के साहित्य से शरीर निकाल दीजिए तो क्या बचेगा, उदाहरण के लिए गीत गोविन्द और श्रंगार शतक के श्लोक सुनाती हूँ


किसलयशयननिवेशितया चिरमुरसिममैवशयानम्


कृतपरिरम्भणचुम्बनया परिरम्भकृताधरपानम् ।।


(हे सखि, मैं कुंज कुटीर के मध्य कोमल पत्तों की शय्या


बनाकर शयन करूंगी तब श्यामसुन्दर श्री कृष्ण मेरे


साथ विराजमान होकर मेरे ही वक्षस्थल पर चिरकाल


तक शयन करते हुए आलिंगन कर मेरा अधरामृत पान करेंगे


ऐसे श्री कृष्ण चन्द्र जी से हमें मिला दो।)


इ.क.- मैडम आपने इतना पढ़ा है, अच्छी बात है। काश आपने उसे सही समझा होता, जिस लौकिक शरीर की आप चर्चा कर रही हैं वह तो वहां है ही नहीं। कला और नंगई, अध्यात्म और रतिसुख के अन्तर को समझने के लिए गहरी समझ व पारखी नजर की जरूरत है। देहधर्मी मानसिकता और वासना भरी दृष्टि की वहां पहुंच नहीं। शरीर की भर्त्सना का साहित्य भी भरा पड़ा है। जिन भर्तहरि के श्रृंगार शतक का उदाहरण आपने दिया , उन्ही ने आगे विषय भोगी की कितनी निंदा की है, मालूम है आपको?


से.सि.- हां मालूम है, हमें। वह  भृतहरि की कुंठा है, अवसरवादिता है, यह क्या बात हुई कि जब उन्हें प्रेम मिला तो नारी स्वर्ग थी, जब वह वंचित हुए तो नारी नर्क हो गयी।


जानती हूं पोथियांदेह-निन्दा से भरी पड़ी हैं, लेकिन उसके पीछे की सचाई आपको नहीं मालूम है, ये सभी देह-निंदक कुंठित लोग हैं। जो प्रत्यक्ष की कद्र न कर सकेगा वह परोक्ष की कद्र क्या करेगा, जो देह को न जान सका, वह आत्मा को क्या जानेगा ? 


इ.क.- स्त्री देह पर समाज की वर्जनाओं पर कुछ कहेंगी?


से.सिं- हम वर्जनाओं से दो-दो हाथ करके निकल पड़े हैं, पुरुषों की गुलामी अब और बर्दश्त नहीं होगी। हमारी पीढ़ी समाज की लगाई हर बंदिश को कुचल कर रख देगी। हमें जो अच्छा लगेगा, वो करेंगी। मां बाप, बुजुर्ग, धर्म समाज को अब हमारी सोच के पीछे-पीछे चलना होगा, वर्जनाएं, बन्दिशें...माई फुट।


इ.क.- आप यह तो मानेंगी कि अंग प्रदर्शन का  नई पीढ़ी पर दूषित प्रभाव पड़ता है।


से सिं- (खिलखिलाते हुए) ज्यादातर यह प्रश्न इंटरव्यू के शुरु में ही पूछ लिया जाता है, आपने काफी देर से पूछा , देखिए हमारे अंग प्रदर्शन का समाज के सभी वर्गों  पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है।  पहले बच्चों को लेते हैं- बच्चे पेड़ पर नहीं उगाए जाते, फैक्ट्री में नहीं ढाले जाते, बिस्तर पर बनाए जाते हैं, भोले बच्चों में स्वाभाविक जिज्ञासाएं होती हैं, वे छोटे क्यों हैं, बड़े बड़े क्यों हैं, वे इस दुनिया में कहां से आए, मां बाप , कुटुम्बी, टीचर उन्हें सही उत्तर देना गन्दी बात समझते हैं-हमारे अंग प्रदर्शन से उन्हें काफी जानकारी मिल जाती है, जो उनके मानसिक विकास में बहुत काम आती है। जहां तक यंग लड़के लड़कियों का प्रश्न है तो उनके लिए हमारा अंग प्रदर्शन एक वरदान है। इससे उनमें साहस और आत्मविश्वास, खासतौर से लड़कियों को तो अपनी बाडी की ताकत और कीमत का अन्दाज लग जाता है।


अब लीजिए काम धंधे में फंसे और पिसते वर्ग को हमारा अंग प्रदर्शन पल-दोपल चैन देता है प्रदर्शन उनके घुटन भरे जीवन में ठंडी हवा का झोंका है, तपते रेगिस्तान में शीतल छांव है। मैं एक ट्रेड सीक्रेट बताती हूं, खर्च करने की पावर के चलते यह वर्ग हमारी इंडस्ट्री का मेन टारगेट है।


अब बात करें स्त्री की, हम उन्हें पुरुष की गुलामी से छुटकारा पाने का मंत्र दे रहे हैं, शरीर के सटीक प्रयोग से, वे जो चाहें जहां चाहें, हर चीज़ हासिल कर सकती हैं। आसिकी से लेकर नौकरी तक , ग्लैमर की दुनिया से लेकर पालिटिक्स हर जगह यह सिक्का अमोघ बाण का काम करता है।


रही बात बुजुर्ग पीढ़ी की, उनकी छोड़िए। जब से दुनिया बनी है तभी से नई पीढ़ी के रहन-सहन, पहनने-ओढ़ने, उठने-बैठने, चलने-फिरने हर बात में माथा पीटते हैं। खुद अपने टाइम में मजे मार लिए और हमें उस मजे से रोकते हैं। हम जानते हैं कि उम्र के चलते अंगूर खट्टे हैं वरना क्या-क्या नहीं करते। गलिब ने इनकी अन्दर-बाहर की सोच का बड़ा अच्छा नक्शा खींचा है।


गो हाथ में जुंबिश नहीं, आखों में तो दम है,


रहने दो अभी सागरो मीना मेरे आगे


दरअसल यह जनरेशन गैप है, इसलिए हम उनकी बातों पर ध्यान नहीं देते। पिटी औन देम।


इ.क.- लेकिन आप यह जरूर मानेंगी कि सेक्स के भौंडे प्रदर्शन से समाज में सांस्कृतिक, धार्मिक और नैतिक मूल्यों में गिरावट आ रही है।


से.सि.- प्लीज माइंड योर लैंगवेज। अंग प्रदर्शन एक कला है, भौंडा वह होता है जिसके मूल में मूर्खता हो, फूहड़ता हो, अव्यवस्था हो। हमारा हर मिलीमीटर प्रदर्शन योजनानुसार आकर्षक और शानदार होता है। उसको भौंडा कहना अपनी नासमझी ज़ाहिर करना है। मैने अभी आपको अँग प्रदर्शन के लाभ गिनाए हैं।


जहां तक आपके इन सोकाल्ड मूल्यों का प्रश्न है तो मेरी राय है कि आप लोग पहले अपने इन मूल्यों को मजबूत बनाइये। एक आँख मिचकाने या जरा सा बाडी हिला देने से जो मूल्य भरभरा कर गिर पड़ें, उन्हें कोई नहीं बचा सकता। आप धर्म की बात कर रहे हैं, मुझे बताइये कि शिवलिंग क्या है, किस पर टिका है, कामाख्या मंदिर में किसकी पूजा होती है, लाखों की भीड़ के बीच से नागा साधु त्रिवेणी नहाने जाते हैं। नैतिकता का दोहरापन देखिए, खजुराहो और कोणार्क की मिथुनरत मूर्तियां और पैरिस के चित्रों की तारीफ में जिनकी जुबान नहीं थकती, वही हमारी अर्धनग्नता पर नाक भौं सिकोड़ते हैं। पतन-पतन कर छाती पीटते हैं। अरे नग्नता तो नग्नता है, चाहे पत्थर में हो, कागज पर हो या सशरीर सामने हो! यदि उन्हें आपने कला का दर्जा दिया है तो आपको हमारे अंग प्रदर्शन को कला मानना ही होगा।


इ.क.- मैडम बुरा न मानें आप लोगों पर नंगई इतना हाबी है कि कला जैसे पवित्र शब्द को गन्दगी में घसीट रही हैं।


से.सिं.-(टोकते हुए) ...मैं कला में गन्दगी नहीं घसीट रही हूं, थोथी कूपमंडूकता को झिंझोड़ रही हूं। दोहरेपन की नकाब उघाड़ रही हूं जो औरत को देखते ही बिस्तर पर बिछाने की कल्पना में डूबने उतराने लगते हैं। और ऊपर से कला पारखी, समाज सुधारक जैसे मुखौटे लगा लेते हैं। यह लोगों को मूर्ख बनाना है, जिसे हमारी पीढ़ी ने समझ लिया है। मेरी सलाह है आप लोगों को मांस के लोथड़े से हटकर देखना चाहिए और हम पर कीचड़ उछालने से बाज आइये।


इ.क.- यानी अंग प्रदर्शन ही आपके जीवन का लक्ष हो गया है! अच्छा बताइये इसे आप किस सीमातक जायज समझती हैं।


से.सिं.- जिस सीमा तक लोगों को अच्छा लगे...


इ,क. -यानी लोगों के चाहने पर आप और छोटी... 


से.सिं.-(बीच में ही टोकते हुए) मैं समझ गयी आप अंग प्रदर्शन की सीमा को क्वांटिफाई करना चाहते हैं। देखिए यह तो आप जानते ही होंगे कि वेश्या की नग्नता कौड़ियों में बिक जाती है, जबकि हमारी अर्धनग्नता हमें लाखों-करोड़ों दिला देती है। लुकाछिपी के इस खेल में कपड़ों की सीमा जरूरत के हिसाब से घटती-बढ़ती रहती है। दरअसल यह प्रश्न अर्थशास्त्र का प्रश्न है, आप जितना इसको समझने की कोशिश करेंगे उतना उलझते जाएंगे। चलिए एक सूत्र देती हूं विश्व भर की वित्रापन-दुनिया का बजट करोड़ों नहीं अरबों में है और वह समूची दुनिया औरत के कपड़े पहनने, उतारने की बैसाखी पर टिकी है, ड्रेस का साइज उसी के मुताबिक तय होता है।


इ.क.- लोग आपकी आलोचना करते हैं आपको इसका बुरा नहीं लगता।


से.सिं.- (हल्की मुस्कुराहट) बुरा लगने का तो प्रश्न ही नहीं होता, बल्कि यह तो हमारी सफलता की निशानी है। जितनी अधिक चर्चा होगी, उतनी पब्लिसिटी मिलेगी। पब्लिसिटी आगे बड़े बड़े काम दिलाती है और फिर तरक्की की राह में रोड़े अटकाना, बढ़ते की टांग खींचना लोगों की आदत है, इसमें उन्हें मजा मिलता है। हम तो इनके इस मजे का मजा लेते हैं।


रही बात कठमुल्लों की तो उनकी न पूछिए, हर चेंज और तरक्की पर हाय-तौबा मचाना उनकी प्रकृति है, उनका बस चलता तो इन्सान को गुफा-युग से बाहर नहीं निकलने देते, उनकी बकवास का हम कतई परवाह नहीं करते।


इ.क. भविष्य में आपकी क्या योजनाएं हैं।


से.सि.- फिल्म, सीरियल, माडलिंग सभी जगह से अच्छा रिसपांस मिल रहा ह, एक फिल्म रिलीज होने वाली है, बाथरूम और बेडरूम के काफी बोल्ड सीन हैं, उम्मीद है इस फिल्म से मुझे काफी बड़ा ब्रेक मिलेगा।


इ.क.-इस लाइन में आने वाली लड़कियों को क्या पैगाम देना चाहेंगी।


से.सि.-यही कहूंगी कि अपने शरीर की ताकत को पहचानो, इसके समझदारी भरे इस्तेमाल से-कर लो दुनिया मुठ्ठी में।


इ.क.-समय समाप्त हो रहा है, चलते-चलते एक पूर्णतः व्यक्तिगत प्रश्न पूछना चाहता हूं अन्यथा न लीजिएगा। क्या आप अपनी बेटी को 'सेक्स बम' बनाना चाहेंगी।


से.सि.- मैं एक अच्छी मां का रोल निभाऊंगी, लालन-पालन,पढ़ाई-लिखाई में कोई कमी नहीं रखूंगी, लेकिन उसके व्यक्ति-स्वातंत्र्य में कोई दखल नहीं दूंगी, वह जो भी बनना चाहेगी उसे खुशी-खुशी मंजूर करूंगी।


(धन्यवाद की औपचारिकता से इंटरव्यू समाप्त हुआ, मैने टी.वी. बंद किया और एक गहरी सांस ली।) 

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                                                                                                                                                     स्मृति शेष






26 ता. की सुबह -पहली ई.मेल खोलते ही पता चल गया  कि वर्तमान युग का एक और सशक्त काव्य स्तंभ गत 25 सितंबर को  ढह गया। फिर तो यादों में बहुत कुछ खुद-ब-खुद ही चरमराने लगा। नंदन जी जिनके साथ हुई एकमात्र चन्द घंटों की गोष्ठी वह भी आठ साल पहले , जीवन की आपाधापी में जो धुंधली हो चली थी पुनः सजीव और प्रखर हो गई। यादों के दर्पण में चलचित्र की परछांइयों सा सब एकबार फिर से  स्पष्ट दिखाई और सुनाई देने लगा ...गोल चश्मा और मुस्कुराता हुआ चेहरा । साथ में सोजभरी ओजस्वी वाणी जिसने मन को पूर्णतः रसाप्लावित कर दिया था उस मात्र एक काव्य संध्या में। अब उन्हें साक्षात सुनने का मौका फिर कभी नहीं मिलेगा, विश्वास ही नहीं हुआ.या मन करना नहीं चाहता था, अभी तो बहुत कुछ सुनना था उनकी अपनी जुबान में।... कैसे क्षणमात्र में आदमी 'है 'से 'था.' बन जाता है...एक पल आता है और विभाजन रेखा खींच आंखों से सब ओझल   कर देता है।

विश्वास करने के अलावा और कोई रास्ता भी तो  नहीं था। एक नहीं पांच-पांच मित्रों से आई मेल खबर की पुष्टि कर रही थीं।


जब  कोई विद्वान और सरस विचारक जाता है तो एक उदास रीतेपन से भरा मन खुद ही न सिर्फ स्मृतियों से जुड़ना चाहता है अपितु बांटने को भी बेचैन हो उठता है।


प्रस्तुत हैं नन्दन जी के साथ हुई गोष्ठी के चंद संस्मरण दिवंगत आत्मा को भावभीनी श्रद्धांजली स्वरूप, मेरी अपनी पुष्तक 'लंदन पाती' से; 


'' क्या होता है जब सुगन्ध को प्यास लगती है – ?
हवा के झोकों पे सवार पहुँच ही जाती है वह कोने–कोने, कन–कन, हरमन में रमने–बसने, राज करने के लिए। अपनी बेचैन समग्रता से सबकुछ महकाती–पुलकाती, मन के अछोह आकाश में एक धनक उजियारा करती . . . 
 

यहाँ हम बरमिंघम वासियों के लिए भी ऐसा ही गमकता और प्रेरक दिन आया 23 जून 2002 बनकर। हमें एक नहीं अपितु दो–दो सु–मनों से मिलने का सौभाग्य मिला। दोपहर के दो–तीन बजे का समय और गीतांजली बहुभाषीय समुदाय द्वारा आयोजित गोष्ठी . . . सामने सपत्नी बैठे हुए श्री कन्हैया लाल नन्दनजी . . . और अब कविता हमें खुद समझा रही थी कि कविता क्या होती है? कभी फूल बनकर तो कभी महक . . . कभी इन्द्रधनुष के रंग तो कभी एक अटूट दिग्विजयी चाह जो किसी फिसलन या टूटन से नहीं डरती। 

स्वप्न जैसी ही स्थिति थी वह . . . कभी कुछ पकड़ में आ रहा था . . . तो कभी सब चेतना की पकड़ से फिसलता जा रहा था . . . बस काव्य–रस में डुबोता–भिगोता सा। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में संतुष्ट और पूर्णतः तल्लीन दिख रहा था। हर व्यक्ति पुलकित सा था, रूप की उजास से भी और खुशबू की प्यास से भी . . .

1.–


'रूप को जब उजास लगती है् जिन्दगी आसपास लगती है।
तुमसे मिलने की चाह्र कुछ ऐसे और जैसे खुशबू को प्यास लगती है।'

2. –


'गन्ध गुथी बाँहों का फेरा और जैसे मुस्कान का सबेरा
फूलों की भाषा में देह बोलने लगी और पूजा का और एक जतन हो गया।'

श्रृंगार–रस में सूफियों जैसे उद्गार – । कोमल, भावभीना समर्पण पर एक तीव्र आँच लिए हुए . . . शायद यही सुकुमार समग्रता थी नन्दन जी के व्यक्तित्व की और काव्य की, जिसने प्रभावित किया . . . वह बस कोमल शब्दों के रचयिता ही नहीं अपने काव्य से जागृति की भी अपेक्षा रखते हैं, वरना नंदन जी आगे कुछ और यूँ न कहते . . .
'पानी पर खींचकर लकीरें
काट नहीं सकते  जंजीरें . . .' ''


      (  धनक उजेरा- लंदन पाती)


क्षण भंगुर आदमी रहे या न रहे , ऐसी कर्मठ और ओजस्वी वाणी सदैव हमारे साथ  प्रेरणा स्रोत बनकर रहेगी। लेखनी परिवार शोकाकुल परिवार व प्रियजनों के लिए गहरी संवेदना रखता है और  दिवंगत आत्मा की शान्ति और सद्गति की भगवान से प्रार्थना करता है।

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                                                                                                                                          चांद परियां और तितली





    

         मूर्ख पत्नी

एक बनिया था। जब वह व्यापार के लिए परदेस जाने लगा तो जाते-जाते अपनी पत्नी को बुलाकर कहा, ‘‘मैं परदेस जा रहा हूं। तुम अच्छी तरह रहना। बच्चों को भी संभालना। और, मेरी मां को भी अपने बच्चों की तरह ही सम्भाल कर करना। याद रखना, मां से कोई काम मत करवाना।’’
पत्नी ने कहा, ‘‘अच्छी बात है। जैसा आप कह रहे हैं, मैं वैसा ही करुंगी। आप निश्चिंत होकर जाइए।’’
पत्नी ने बात ध्यान में रखी। बनिया तो चला गया। बहू ने दूसरे ही दिन मांजी से कह दिया, ‘‘मांजी! आपके बेटे मुझसे कह गए है कि मां को अपने बच्चों की तरह संभालना, और उनको कोई काम मत करने देना। अब आप घर का कोई काम मत कीजिएगा। आप तो इन बच्चों के साथ खेलिए, खाइए और मौज करिये।’’
मांजी गहरे सोच में पड़ गईं, फिर बोलीं, ‘‘बहू, ठीक है। अब मैं ऐसा ही करुंगी।’’
कुछ दिनों के बाद बहू ने अपनी बेटी के कान छिदवाये। उस समय बहू को अपने पति की यह बात याद आई कि मां को बच्चों की तरह ही संभालना। इसलिए बहू ने मांजी के कान भी छिदवाने की बात सोची। उसने मांजी से कहा, ‘‘मांजी, चलिए, आपके कान छिदवाने हैं।’’
सुनकर मांजी घबरा उठीं। उन्होंने बहू से कहा, ‘‘बहू, मुझे अपने कान नहीं छिदवाने हैं। क्या अब इस बुढ़ापे में मैं कान छिदवाऊं?’’
बहू बोली, ‘‘नहीं, मांजी। यह तो नहीं होगा। कान तो छिदवाने ही होंगे। आपके बेटे मुझसे कह गए हैं कि मैं आपको अपने बच्चों को तरह ही रखूं। मेरे लिए तो दोनों आंखें बराबर हैं। जेसी यह लड़की है वैसी ही आप भी हैं।’’


मांजी मन-ही-मन समझ गईं और सुनार के पास बैठकर उन्होंने अपने कान छिदवा लिए। सुनार ने कान छेदे और कान में धागा भी डाला। बहू जिस तरह रोज़-रोज़ लड़की के कान में तेल लगाती थी, उसी तरह मांजी के कान में भी लगाती रही।
कुछ दिन बीते। जब कान ठीक हो गए, तो बहू ने अपनी बेटी के कान में पहनाने के लिए बाली बनवाई। दूसरी बाली मांजी के लिए भी बनवाई। फिर मांजी के पास जाकर बहू ने कहा, ‘‘मांजी! आइए, आपको यह बाली पहना दूं।’’
मांजी ने कहा, ‘‘बहू, मुझको बाली क्यों पहनाती हो? मेरे जैसी बुढ़िया के लिए बाली की क्या जरुरत है? बाली तुम अपनी बेटी को पहनाओं। मुझको नहीं पहननी है।’’ लेकिन बहू नहीं मानी। जबरदस्ती करके मांजी को बाली पहना दी।
बाद में मांजी बाली पहनकर बच्चों के साथ घूमती, फिरती और खेलती रहीं। होते-होते आखा तीज आ गई। अच्छा दिन देखकर बहू ने अपने बेटे के सिर पर चोटी रखवाई। बहू को तुरन्त मांजी की याद आ गई। मांजी बच्चों के साथ खेल रही थीं। उन्हें वहां से बुलवा लिया और कहा, ‘‘मां जी, आइए। नाई के सामने बैठिए। अपने लड़के की तरह मुझे आपके सिर पर भी चोटी रखवानी है। जब गोविन्द के चोटी रखवाई है, तो आपके क्यों न रखवाऊं? उठिए, जल्दी कीजिए। बाद में गोविन्द को और आपको लपसी खिलानी है।’’
मांजी ने बहू को बहुत समझाया, पर बहू टस-से-मस न हुईं आखिर मांजी नाई के सामने बैठ गईं और उन्होंने अपने सिर पर चोटी रखवा ली। बहू ने गोविन्द के और मांजी के सिर पर स्वस्तिक बनाया, दोनों को दूध और शक्कर से नहलाया और फिर दोनों को लपसी खिलाई।
बाद में बहू रोज मांजी की चोटी में तेल डालती, चोटी गूंथती और सिर पर ओढ़नी डालकर मांजी को बच्चों के साथ खेलने के लिए भेजती। जब खाने का समय होता, तो बहू आवाज़ देकर बुलाती:
कान में बाली, सिर पर चोटी, छोटों में मोटी!
आओ, खाना खाने आ जाओ।
यह सिलसिला रोज़-रोज चलता रहा। होते-होते एक दिन मांजी का बेटा परदेस से वापस आया। घर में आने के बाद बेटे ने पत्नी से पूछा, ‘‘मां कहां हैं? मुझको मां के पैर छूने हैं।’’
पत्नी बोली, ‘‘’मांजी तो गली में खेलने गई हैं। अभी आ जायेगी।’’
बेटे पूछा, ‘‘क्या कहती हो! मां गली में खेलने गई हैं? गली में तो बच्चे खेलते हैं। क्या बूढ़ी मां गली में खेलने जाती हैं!’’
पत्नी ने कहा, ‘‘मैं तो मां को खेलने भेजती हूं। आपने कहा नहीं था कि मां को बच्चों की तरह ही रखना। मैंने तो लड़की की तरह ही मां के भी कान बिंधवाएं हैं और कानों में बालियां पहनाई हैं। जब लड़के की चोटी रखवाई, तो मैंने मां की भी चोटी रखवा दी। जब मैं सबो को खेलने भेजती हूं, तो मां को क्यों न भेजू? मुझको सबके साथ एक-सा व्यवहार करना चाहिए।

पति समझ गया कि उसकी मूर्ख स्त्री की अकल का दिवाला निकल गया है। बाद में पति के कहने पर उसने मां को पुकारा:
कान में बाली, सिर पर चोटी, छोटों में मोटी!
आओ, खाना खाने आ जाओ!

मांजी गली में से खेलती-खेलती आई और अपने बेटे को देखकर उनकी आंखों में आंसू छलछला आए। मां की हालत देखकर बेटा भी दुखी हो उठा। बहू की मूर्खता के लिए बेटे ने मां से माफी मांगी और मूर्ख पत्नी से भी मां के साथ किए दुर्व्यवहार को कभी न दुहराने का वादा लिया। 



बर्र और बालक ( दो शिशुगीत)







1.


हम तनक-मनक
तुम इतने बड़े
हम खेल किया
तुम रोय दिया।


      लोक गीत






2.








माता बोली, लाल मेरे, खलों का स्वभाव यही,
काटते हैं कोमल को, डरते कठोर से।
काटा बर्र ने कि तूने प्यार से छुआ था उसे,
काटता नहीं जो दबा देता जरा जोर से।
                                                                                                                                                                                              -रामधारी सिंह दिनकर