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                                                                                                                                                        विचार


गाँधी बच्चों को लिखने के पहले पढ़ना सिखाने के पक्ष में थे। वह चाहते थे कि बच्चों के अक्षर बहुत सुंदर बनें। उनकी अपनी लिखावट बहुत खराब थी, इस पर उनको बड़ी शर्म लगती थी। गाँधी कहते थे कि बच्चों को पहले सरल रेखा,  वक्र रेखा और त्रिभुज खींचना और पक्षी, फूल पत्ते आदि बनाना सिखाना चाहिए। इससे उन्हें अक्षरों पर कलम फेरने की जरूरत नहीं पड़ेगी और वे सीधे सुडौल अक्षर बनाना ही सीखेंगे।

प्रचलित शिक्षा–पद्दति उनकी दृष्टि में केवल तमाशा भर थी। इस शिक्षा से गाँव के बच्चों की आवश्यकताएँ पूरी नहीं होती। गाँधी चाहते थे कि बच्चों की शारीरिक और मानसिक शक्ति का विकास हो और वे किताबी कीड़ा न बनें। करीब तीस वर्ष के चिंतन के बाद गाँधी जी ने दस्तकारी के जरिए शिक्षा देने की ‘बुनियादी तालीम’ पद्दति निकाली। 63 वर्ष की अवस्था में, कारावास के समय उन्होंने जिस शिक्षा प्रणाली की परिकल्पना की थी, वही बाद में नई तालीम
या बुनियादी शिक्षा पद्दति के नाम से प्रचलित हुई।

गाँधी विद्यार्थियों को मारने–पीटने या शारीरिक दंड देने के विरोधी थे। एक बार क्रोध में आकर वह एक शरारती विद्यार्थी को रूलर से मार बैठे, किंतु इस प्रकार क्रोध आ जाने पर उन्हें बहुत दुख हुआ। उस विद्यार्थी को भी प्रहार से उतना दुख नहीं हुआ जितना इस बात से कि उसके कारण बापू को मानसिक कष्ट हुआ। उसने बापू से माफ़ी माँगी। शारीरिक दंड देने का गाँधी जी के जीवन में यही पहला और अंतिम अवसर था।

वह विद्यार्थियों को खेलकूद में एक–दूसरे से होड़ करने के लिए खूब बढ़ावा देते थे किंतु पढ़ाई में दूसरों को हराने के लिए वह कभी उत्साहित नहीं करते थे। उनका नंबर देने का तरीका भी विचित्र था। वह सबसे अच्छे लड़के के काम से अन्य लड़कों की तुलना नहीं करते थे। अगर विद्यार्थी ने अपनी पढ़ाई–लिखाई में तरक्की की तो उसे अधिक नंबर देते थे। गाँधी विद्यार्थियों पर पूरा विश्वास करते थे और परीक्षा के समय उनकी निगरानी के लिए वहाँ किसी को नियुक्त नहीं करते थे। आश्रमिक शिक्षा का मूल उद्देश्य था बच्चे में स्वतंत्रता का भाव जगाना। गाँधी जी कहते थे कि छोटे–से–छोटा बच्चा भी समझ ले कि मैं भी कुछ हूँ। गाँधी भारत के हर गाँव में बुनियादी विद्यालय खोलना चाहते थे। किंतु उन्होंने इस बात को समझ लिया था कि शिक्षक अगर स्वावलंबी नहीं होंगे तो इस गरीब मुल्क के गाँव–गाँव में विद्यालय खोलना संभव नहीं है। इसलिए बुनियादी विद्यालय के विद्यार्थियों को कोई दस्तकारी– साधारणतः कताई सीखनी पड़ती थी।

गाँधी जरूरी मानते थे कि समाज में समानता और सच्ची शांति स्थापित करने का काम बच्चों से शुरु करना  चाहिए। वह कहते थे कि यदि विद्यार्थी पढ़–लिखकर हाथ से काम करना भूल जाएँ या हाथ से काम करने में शर्माएँ तो ऐसी शिक्षा से अनपढ़ रहकर पत्थर तोड़ना अच्छा है।गाँधी अपने नाती को कपास की खेती कैसे की जाती है, तकली की चकती कैसे बनाई जातीहै, सूत से कपड़ा कैसे बुना जाता है और तार गिनकर सूत कैसे अटेरा जाता है, यह बताते हुए उसे भूगोल, सामान्य विज्ञान, गणित, ज्यामिति और सभ्यता और इतिहास की बातें भी सिखाते
थे। वह कहते थे कि कताई के साथ–साथ चर्खे की बनावट, चक्के एवं नली को देखकर विद्यार्थियों को ज्यामितिक वर्ग, वृत्त, रेखाओं आदि का ज्ञान हो जाएगा और लकड़ी तथा कपास पैदावार की जानकारी के साथ ही वे विभिन्न देशों की जलवायु से परिचित हो जाएँगे और उन्हें इस प्रकार भूगोल का भी ज्ञान हो जाएगा। इस प्रकार उनके मन में जानने की उत्सुकता और कोई नई चीज बनाने का आनंद पैदा होगा।

गाँधी जी ने अनेक बार छात्रा-छात्राओं से बातचीत में तथा गुजरात विद्यापीठ के अपने दीक्षांत भाषण में कहा था कि मैं अच्छी नौकरी प्राप्त कर कुर्सी तोड़ने के लिए शिक्षा नहीं देना चाहता। वह चाहते थे कि शिक्षार्थी राष्ट्रीय जीवन को शक्तिशाली बनाएँ तथा देश के वीर योद्धा बनें। विद्यार्थियों का कर्तव्य है कि वे गाँव के किसान के सुख–दुख को
समझें और उसके दुखों को दूर करने का प्रयास करें। तभी सर्वसाधारण के मन से असहायता, निराशा और कुसंस्कारों को दूर किया जा सकेगा ।

रस्किन, टालस्टाय तथा रवींद्रनाथ के शिक्षा–सम्बन्धी विचारों का प्रभाव गाँधी पर पड़ा था। संसार के जिन प्रसिद्ध व्यक्तियों ने शिक्षा की समस्या का अध्ययन किया है, गाँधी भी उनमें से एक हैं। उन्होंने बिहार में कई प्राथमिक विद्यालय स्थापित किए तथा बंगाल में राष्ट्रीय विद्यालय और अहमदाबाद में राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।   

                                                                                                        (साभार-सम्पूर्ण गाँधी वांगऽमय)