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                                                                                                                                                            हास्य-व्यंग्य


                                                                                                                                                             -अजय पराशार

एक गरीबी, सौ सुख 

अगर आप भारत में भूख, गरीबी या मंहगाई और ऑस्ट्रेलिया में नस्ली हमलों से बचना चाहते हैं तो भारत के कृषि मंत्री और विक्टोरिया पुलिस के नायाब नुस्खे अपनाएं। दोनों नसीहतों में एक बात कॉमन है। दोनों ही देशों में गलती नेता या हुक्काम की नहीं, आम जनता की है। अगर भारत में भूख, गरीबी या मंहगाई बढ़ रही है तो इसमें सरकार का क्या दोष, बेचारे कृषि मंत्री तो बिल्कुल बेकसूर हैं। गठबंधन कर भ्रष्टाचारियों को सीएम बनाने, भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने, हथियारों में कमीशन गटकने, फर्जी मुठभेड़ों में मासूमों को मारने, राष्ट्रीय पुरस्कारों के चयन के लिए चहेतों का चयन करने या उन्हें ऊँची कुरसियों पर बिठाने जैसे बड़े-बड़े काम नेताओं और हुक्कामों ने पहले ही थाम रखे हैं।  ऐसे में जमाखोरी या कालाबाज़ारी रोकने जैसे छोटे-मोटे काम भी अब अगर उन्हें दिए जाएंगे तो कैसे काम चलेगा। भूख, गरीबी, मंहगाई या भ्रष्टाचार रोकने जैसे काम तो जनता को अपने हाथ ही लेने पडेंगे। वैसे भूख से निपटने का एक तरीका तो चार्ली  चैपलिन ने अपनी एक पिक्चर में भी दिखाया था, जूता उबाल कर खाने का। खैर आपके पास जूता न हो तो आप हिन्दी फिल्मों के तरीके भी अपना सकते हैं। खाली पेट में मरोड़ पडऩे पर पानी पी सकते हैं, पर सरकारी नल में पानी न हो तो आपकी किस्मत।  आप चाहें तो भूखे पेट पर कपड़ा बांध सकते हैं, पर आपका तन नंगा हो तो नेताओं या हुक्कामों का कोई दोष नहीं। वैसे कफन तो शहीदों को भी नसीब नहीं।  हीरो की तरह रोटी चोरी कर सकते हैं और चुस्त पुलसियों द्वारा पकड़े जाने पर जेल में आराम से रोटी खाते हुए जेलर की बेटी से इश्क फरमा सकते हैं। भारतीय परंपरा में उपवास पर विशेष बल दिया गया है और आप धार्मिक नियमों का पालन करते हुए मोक्ष पा सकते हैं। वैसे भारत है तो धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र, पर सरकार अघोषित तौर पर हिन्दू धर्म को बढ़ावा दे रही है।  कबीर ने सर्वकालिक होकर पहले ही जनता को 'कर गुज़रान गरीबी में' की नसीहत देकर सभी नेताओं तथा हुक्काम को उनके दायित्व से छुटकारा दिला दिया था। अगर भूख नहीं तो फिर गरीबी कहां और गरीबी नहीं तो मंहगाई का प्रश्र्न ही नहीं उठता है। सब बातों की एक दवा।

बाबा शरदानंद भी तो यही कह रहे हैं। आप चीनी खाना छोड़ दें क्योंकि आज तक कोई भी चीनी खाने से नहीं मरा, हां चीनी खाकर मधुमेह से अवश्य मरा है। उनके मातोश्री में ठाकरे वंदना करने तथा आईपीएल के लिए पेपर टाईगर को मानने पर आपका एतराज़ करना बिल्कुल अनुचित है।

                उधर विक्टोरिया पुलिस ने भी भारतीयों को हमलों से बचने के लिए गरीब दिखने और सादगी से रहने .की सलाह दी है। उन्हें चमक-दमक से दूर रहते हुए ज्यादा से ज्यादा गरीब दिखना चाहिए।  यही बात हमारे कृषि मंत्री भी कह रहे हैं। अगर अपने ही देश में गरीब बनने की आदत नहीं डाली तो दूसरे देश में कैसे गरीब बनकर रहेंगे।  गरीब बनकर रहने से आपके ऊपर कोई हमला नहीं करेगा, न भूख, न गरीबी, न मंहगाई और न कोई ऑस्ट्रेलियन। यह बात अलग है कि शरद पवार के शक्ल से गरीब दिखने के बावज़ूद भारत में ही आईसीसी ट्रॉफी जीतने के बाद रिकी पॉन्टिग भी फोटो खिंचवाने के लिए उन्हें धकिया चुके हैं। यहां पवार साहब की गरीबी तो किसी काम नहीं आई।