शिमला के गेयटी थियेटर में डॉ. फॉस्टस की सफल प्रस्तुति एस.आर.हरनोट
गत 17,18 व 19 जुलाई को शिमला के ऐतिहासिक गेयटी थियेटर में हिमाचल प्रदेश भाषा, कला एवं संस्कृति विभाग तथा उत्तर क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्र पटियाला के सहयोग से शिमला की रंग संस्था ‘संकल्प’ द्वारा सुप्रसिद्ध नाटककार क्रिस्टोफर मॉरलो की प्रसिद्ध कृति ‘द ट्रैजिक हिस्ट्री ऑफ डॉक्टर फॉस्टस (फाउस्ट्स)’ का सफल मंचन किया गया। नाटक का अनुवाद कहानीकार श्री बद्री सिंह भाटिया तथा निर्देशन रंगकर्मी श्री केदार ठाकुर ने किया। डॉक्टर फॉस्टस वास्तव में एक दन्त कथा पर आधारित नाटक है। नाटक का नायक डॉ. फॉस्टस जीवन की दौड़ में एकाएक तान्त्रिक विद्याओं के चक्कर में पड़कर सांसारिक सुखभोग की कामना में अपनी आत्मा को नरक के सम्राट लुसीफर के पास बन्धक रख देता है जो बदले में अपने श्रेष्ठ सेवक मेफिस्टोफिलिस को उसकी हर इच्छापूर्ति के लिए दे देता है। परिणामतः उस पर काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार की सांसारिक वृत्तियां हावी हो जाती है। वह जो भी कामना करता है, मेफिस्टोफिलिस उसे तत्काल पूरा कर देता है। यहां तक कि वह ट्राय युद्ध की कारक हेलन से भी मिल कर उसका सौन्दर्यपान करता है। वह अपनी प्राप्तियों से प्रसन्न हो अभिमान को प्राप्त होता है।
सब कुछ जानने वाला डॉ. फॉस्टस सांसारिक सुखों के भोग में अपने आपको भूल जाता है। उसकी इस महत्वाकांक्षा को समझ इस लोक की अच्छी आत्माएं उसे सजग करती रहती हैं कि वह गलत रास्ते पर जा रहा है परन्तु बुरी आत्माएं उसे पुनः प्रलोभित करती है कि नहीं सर्वसुख चाहने वाले के लिए वहां कोई जगह नहीं है। केवल नरक ही एक ऐसी जगह है जहां सब सुख है। एक बार वह नरक के बारे में अपनी सेवा में रत आत्मा से भी पूछता है कि नरक कहां है? और जब वह बताता है कि यहीं तुम्हारे सामने, तो वह खुश होता है कि यदि यह नरक है तो फिर सब ठीक है।
डॉ. फॉस्टस ऊम्र के अगले पड़ाव में यदा-कदा ठोकर खाकर महसूसता है कि उसने अपनी आत्मा नरक सम्राट के पास बन्धक रख गलती की है। वह उसे सुधारने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता है परन्तु उसके द्वारा सिद्ध आत्माएं और मेफिस्टोफिलिस उसे रोकते है। और वह असफल हो जाता है।
सांसारिक दुर्लभ सुख भोगने के बाद एक समय आता है जब डॉ. फॉस्टस महसूस करता है कि समय ठहर गया है। वे 24 वर्ष पूरे हो गये हैं जो उसने असीम आनन्द में बिताये और अब प्रयाण की बारी है। अब कभी भी नरकदूत उसकी आत्मा उससे छीन कर ले जा सकता है। मृत्युबोध उसे डराता है और वह आखिरी दिन को लम्बा हो जाने की प्रार्थना करता है। वह तारों से भी आग्रह करता है कि वे अपनी गति रोक लें। परन्तु मृत्यु तो निश्चित थी। अर्द्धरात्रि का गज़र बजते ही नरक सम्राट लुसीफर उसके शरीर से नारकीय दण्ड हेतु उसकी आत्मा ले जाता है।
कुल मिलाकर नाटक मानव के भीतर के उसके राक्षस की ओर इंगित करता है जो उसे भौतिक चीजों की ओर लालायित करता रहता है। वह भूल जाता है कि वास्तव में वह कौन है? उसका क्या कर्र्तव्य है। कि जिन सुखों के भोग में वह लिप्त है वे सब क्षणिक हैं। मगर वह एक अपराध के बाद दूसरा करता रहता है। वह एक झूठ को छिपाने के लिए दूसरा झूठ बोलता जाता है।
डॉ. फॉस्टस बेशक एक दन्त कथा है। परन्तु यह अपने समय की नीति कथा भी है जिसे घर और बाहर बार-बार सुनाया जाता रहा है। सम्भवतः नैतिक मूल्यों की स्थापना के दृष्टिगत क्रिस्टोफर मारलो के मन में यह बात आई हो कि इसे लिपिबद्ध किया जाये। सोलहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में लिखा यह नाटक अपने यथार्थ के साथ आज भी प्रासंगिक है। मानवीय महत्वकांक्षाएं, एषणाएं और उनकी परिणति वैसी की वैसी ही है। फर्क है तो उसे देखने समझने का।
तीन दिन तक चले इस नाट्य उत्सव में दर्शकों ने भरपूर भागीदारी निभाई। भाषा एवं संस्कृति विभाग के निदेशक श्री प्रेम शर्मा और सहायक निदेशक श्री प्रवीण शर्मा भी इस समारोह में उपस्थित रहे।
नाटक की प्रस्तुति में डॉ. फॉस्टस की भूमिका में सौरभ अग्निहोत्री का अभिनय सराहनीय था। उन्होने डॉ. फॉस्टस की छवि को आत्मसात कर उसे पूरी भावभूमि के साथ प्रस्तुत किया। हालांकि अच्छी आत्मा के प्रस्तुतिकरण में आशीश भागडा की भूमिका अपनी आवाज के कारण थोड़ी ढीली रही। वह अच्छी आत्मा के स्थान पर डॉ. फॉस्टस के अन्तस बनकर ज्यादा उभरे। जो ताकत सौरभ अग्निहोत्री की आवाज में थी ठीक वैसी ही अच्छी आत्मा की होनी चाहिए थी। इसके साथ बूरी आत्मा के रूप में राजीव शर्मा का अभिनय आद्योपान्त सजीव रहा और नाटक की प्रभावान्विति को बढ़ाता रहा। मेफिस्टोफिलिस के रूप में कृष का अभिनय भी सराहनीय था। लुसीफर के रूप में धीरेन्द्र रावत की भूमिका अत्यन्त प्रशंसनीय रही। उनकी आवाज में वह ताकत थी जो वास्तव में एक सम्राट की होनी चाहिए। उन्होने सूत्रधार के रूप में भी अच्छी भागीदारी निभाई। शेष पात्रों ने भी अपने किरदार को बाखूबी निभाया। हां वाग्नर की भूमिका में सुभाष थोड़े कमजोर रहे। क्योंकि इस नाटक के प्रस्तावित तीन मंचन गेयटी में हुए, इसलिए आखरी मंचन में जिन किरदारों की कुछ कमजोर भूमिकाएं रहीं उन्होंने उसमें आशातीत सुधार किया जिससे गेयटी की यह तीसरी प्रस्तुति यादगार बन गई।
किसी भी नाटक के सफल मंचन में नाटक निदेशक की भूमिका अहम रहती है। इस नाटक के निदेशक श्री केदार ठाकुर ने नाटक को आत्मसात कर प्रत्येक पात्र को तराश कर उनके किरदार को सजीव बनाया। ऐसा लग रहा था कि जो अभिनीत हो रहा है वह वास्तव में हो रहा है। संवादों की सुघड़ता और उनका सहज सम्प्रेषित होना भाषा का कमाल होता है। अंग्रेजी से इस नाटक का भाषान्तर कथाकार श्री बद्री सिंह भाटिया ने किया है।
नाटक में अनेक कठिन दृश्य भी थे जिन्हे निदेशक केदार ठाकुर में अपने निर्देशन कौशल बाखूबी दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया। ये दृश्य कभी सांकेतिक अभिनय तो कभी सूत्रधार के माध्यम से अभिव्यक्ति को प्राप्त हुए।
नाटक के सफल मंचन में आज रोशनी एंव संगीत व्यवस्था की भी अहम भूमिका होती है। यह पर्दे के पीछे के कलाकारों का काम था। इसमें स्वयं श्री केदार ठाकुर, पुष्प राज, अभिषेक शर्मा, नीरज पराशर, रूपेश बाली तथा रजनीश कश्यप अपना योगदान दे रहे थे।
पात्रों के परिधान और मंच सज्जा ने नाटक की प्रस्तुति में अभिवृद्धि की है।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि एक लम्बे समय के बाद गेयटी थियेटर में फुल लेन्थ का अच्छा नाटक प्रस्तुत हुआ जो काफी समय तक याद किया जाता रहेगा। गत वर्ष शिमला की संस्था डिजाइन इंडिया ने गेयटी थियेटर के जीर्णोद्धार के तत्तकाल बाद बिना किसी सरकारी विभाग के सहयोग से देवदास की दो सफल प्रस्तुतियां दी थीं जिसके लिए संस्था को लाइट एण्ड साउण्ड तक बाहर से किराए पर लेना पड़ा था। इस प्रस्तुति के लिए मुम्बई से गिरीश हरनोट और अभिमन्यु पांडे विशेषकर शिमला आए थे, लेकिन विभाग की उदासीनता और असहयोग के कारण वे बेहद निराश हुए थे, हालांकि दर्शकों की प्रशंसा और मीडिया की कवरेज ने इस निराशा को अवश्य थोड़ा उत्साह में बदल दिया था। उसके बाद हालांकि बहुज सी प्रस्तुतियां भाषा विभाग के सहयोग से होती रही लेकिन उनमें अधिक नयापन देखने को नहीं मिला। कई तो ऐसी प्रस्तुतियां थीं जिनके अनगिनत मंचन बरसों से यहां होते आए हैं। इसलिए दर्शकों और नाटक के जानकारों के अनुसार यदि देवदास के बाद डॉ. फॉस्टस की प्रस्तुति उन्हें नई और स्तरीय लगी तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए।
यहां यह लिखना भी असंगत न होगा कि जबसे श्रीमती मनीषा नंदा, प्रधान सचिव(पर्यटन) के पास भाषा एवं संस्कृति विभाग का अतिरिक्त कार्यभार आया है, उन्होंने गेयटी की गरिमा के मुताबिक न केवल नाटकों के मंचन बल्कि अन्य सांस्कृतिक आयोजन भी अति कुशलता से करवाए हैं। यह उन्हीं की सोच का नतीजा है कि गेयटी जैसे ऐतिहासिक थियेटर धरोहर को पर्यटन के साथ भी जोड़ा गया है क्योंकि शिमला भ्रमण पर आने वाले पर्यटकों के लिए बोनस में अच्छे सांस्कृतिक आयोजन देखने को मिल रहे हैं।
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सामाजिक संदर्भों को उकेरते दो नाटक
शमशेर अहमद खान
शिल्पायन प्रकाशन द्वारा हाल ही में प्रकाशित वरिष्ठ पत्रकार परवेज़ अहमद के दो नाटकों का संग्रह ये धुआं कहां से उठता है और छोटी ड्योढ़ीवालियां वर्तमान सामाजिक संदर्भों को इस प्रकार रेखांकित करते हैं कि पाठक इन नाटकों के सारे घटनाक्रम अपने आस-पास घूमता महसूस करता है .भाई परवेज़ वर्षों तक नवभारत टाइम्स के संपादकीय विभाग से जुड़े रहे इसलिए उनके इन नाटकों में भाषा में कहीं शिथिलता या लिजलिजापन नहीं बल्कि भाषा ठोस और सटीक पात्रों के माध्यम से व्यक्त की गई है,यह उनका संपादकीय कौशल है जो नाटक के कथ्य को तार्किक और भाषा की दृष्टि से सटीक बना देता है जिसे केवल साहित्यिक रचनाकार द्वारा कर संभव नहीं हो पाता क्योंकि साहित्यिक रचनाकार मात्र भावनाओं के साथ ऐसा तादात्म्य स्थापित करता है जिसके दायरे से उसका बाहर निकलना मुमकिन नहीं हो पाता.
दोनों नाटकों के कथ्य का सार पुस्तक के रैपर पर दिया हुआ है.ये धुआं कहां से उठता है,इस संबंध में लेखक कहता है….ऐसे इंसान के दर्द की दास्तान है जो आज भी मुल्क के बंटवारे के थपेड़ों में झूल रहे हैं……अपने बुजुर्गों की रूहों के दरम्यानवो आज भी अपनी मिट्टी से चिपके हुए हैं और उसके सौंधेपन में डूबे हुए हैं….जब जज्बात पुकारते हैं तो उनके कदम सरहद पार रह रहे अपने रिश्तेदारों की तरफ खिंचने लगते हैं लेकिने दिल में ख्वाहिश यही होती है,वहां मौत होने पर भी दफनाया अपने मुल्क में ही जाए और यही पेचीदा हालात उनके दिमाग में सवाल पैदा करते हैं- बंटवारा हुआ तो बंटा कौन?...ख्वाब बंटे, ज़िंदगियां बंटी, जज्बात बंटे. इन्हीं मुद्दों को आधार बनाकर यह नाटक बुना गया है जो आज भी कहीं न कहीं इस प्रायद्वीप के कुछ लोगों के लिए टीस बना हुआ है जोइस विभाजन के शिकार हुए हैं.
छोटी ड्योढ़ीवालियां इसपुस्तक का दूसरा नाटक है जिसमें पेचीदा इंसानी संबंधों और उनके पारस्परिक जज्बातों को इसके माध्यम से व्यक्त किया गया है. नाटक की भाषा और कथ्य दोनों में इस प्रकार संतुलन बना हुआ है कि इनके किरदार बिना संवाद के ही बोलने से लगते हैं. मुस्लिम समाज के पात्रों का चयन नाटककार ने किया है, वे अपने सामाजिक सरोकारों से इतने जुड़े हुए हैं कि रिश्तों को निभाने के लिए वे उदात्ता के चरम तक पहुंच जाते हैं.बड़ी नानी नाम की पात्र इसकी जीती-जागती मिसाल हैं और वे सभी पात्र भी जो इस खानदान से ताल्लुक रखते हैं अपने-अपने चरित्रों को बखूबी अंजाम देते हुए समाज के आदर्श स्थिति को रूपायित करते हैं. भाषा शुद्ध सोने जैसी खरी है जो मुस्लिम परिवेश को स्वतः परिलक्षित कर देती है.
लेखक ने इसकी कथावस्तु का चयन मध्य प्रदेश की मालवा भूमि के मुस्लिम तबके का किया है जो कभी अपने सांस्कृतिक उरूज पर हुआ करता था किंतु राजनीतिक दृष्टि से जैसे-जैसे यह क्षेत्र छोटा होता गया वैसे- वैसे यहां सामाजिक बदलाव भी होते गए, और इन्हीं बदलाओं के दौरान समाजिक टूतन का निरूपण नाटक में किया गया है किंतु कर्तव्य और नैतिकता मानवीयता के चरम बिंदुओं का संस्पर्श कराती है.यही इस नाटक की सबसे बड़ी विशेषता है.
शमशेर अहमद खान,
2-सी,प्रैस ब्लॉक, पुराना सचिवालय, सिविल लाइंस, दिल्ली-110054.
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महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को बाल साहित्य की प्रथम प्रति समर्पित
मुनिश परवेज़ राणा
63वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को एट होम समारोह में वरिष्ठ बाल साहित्यकार श्री शमशेर अहमद खान द्वारा रचित और मीरा पब्लिकेशंस,49-बी/37,न्याय मार्ग, इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित संतोष का फल मीठा तथाचांद पर पलाट ले लो की प्रतियां भेंट की गईं. इस अवसर पर पद्मश्री डॉ. श्याम सिंह शशि के अलावा सांसद, वरिष्ठ अधिकारी, गणमान्य अतिथि उपस्थित थे.
शिक्षाविद् वेद मोहला (एम.बी.ई.) की दो पुस्तकों का लंदन में विमोचन
कथा यू.के.एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स
ने 23 अगस्त 2010 की शाम 6:30 बजे वरिष्ठ शिक्षाविद् वेद मित्र मोहला, (एम.बी.ई.) की दो पुस्तकों आई जी सी एस ई हिन्दी एवं इक्कीसवीं सदी का बाल साहित्य का लोकार्पण समारोह लंदन के नेहरू केन्द्र में आयोजित किया। पुस्तकों का लोकार्पण श्री कैलाश बुधवार (भूतपूर्व अध्यक्ष बीबीसी हिन्दी विभाग) एवं ब्रिटेन में हिन्दी परीक्षक डा. अरुणा अजितसरिया के हाथों सम्पन्न हुआ।
(बाएं से बैठे हुएः श्री कैलाश बुधवार, श्री वेद मोहला (एम.बी.ई.), डा. अरुणा अजितसरिया (एम.बी.ई.)। खड़े हुए – उषा राजे सक्सेना, तेजेन्द्र शर्मा, माइकल वार्ड एवं आनंद कुमार)
यूके हिन्दी समिति की उपाध्यक्षा श्रीमती उषा राजे सक्सेना ने वेद जी के व्यक्तित्व के अनछुए पहलुओं से श्रोताओं का परिचय करवाया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार तीस वर्षों से भी अधिक समय से वेद जी अपना समय और पैसा ख़र्च करके ब्रिटेन के बच्चों को हिन्दी पढ़ा रहे हैं। उन्होंने मोहला जी की प्रकाशित कृतियों एवं उनको मिले अलग अलग सम्मानों की भी चर्चा की।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए कथाकार तेजेन्द्र शर्मा (महासचिव, कथा यूके) ने कहा कि एक सिविल इंजीनियर की तरह कैलाश जी ने ब्रिटेन में हिन्दी भाषा सिखाने की नींव रखी है। पैंतीस साल से बिना किसी लाभ की आशा के हिन्दी के भवन को सुदृढ़ बना रहे हैं और साथ ही साथ भारत और ब्रिटेन के बीच एक भाषाई पुल का निर्माण भी कर रहे हैं।
श्री कैलाश बुधवार ने वेद मोहला जी को एक ऐसा मातृभाषा प्रेमी बताया जिसने विदेशी कंक्रीट के जंगल में एकलव्य की तरह हिन्दी की अराधना की है और एक सिविल इन्जीनियर होने के कारण हिन्दी पढ़ाने वाले पंडितनुमा अंगोछे वाली छवि को बदला।
श्रीमती अरुणा अजितसरिया के अनुसार इस पुस्तक में आई जी सी एस ई के पाठ्यक्रम के साथ- साथ मारिशस एवं सिंगापुर के विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में निर्धारित 'अनुवाद' तथा 'शब्दों के समुचित प्रयोग' के पाठ भी सम्मिलित किए गए हैं। पुस्तक के अंतिम भाग में हिंदी का लघु शब्दकोष, जिसमें लगभग 2400 शब्दों के अर्थ दिए गए हैं, विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी होगा। इसके अतिरिक्त प्रश्नपत्रों का नियोजन परीक्षा के लिए अपेक्षित जानकारी की तैयारी करने में सहायक होगा। इस प्रकार से इस एक पुस्तक में उन्हें परीक्षा की तैयारी करने की समस्त सामग्री उपलब्ध हो सकेगी। अपने प्रस्तुत रूप में यह पुस्तक अहिंदी- भाषी विद्यार्थियों को हिंदी सीखने में सहायक होगी।
दि फ़ार पैवेलियन (वेस्टेण्ड नाटक) के लेखक, निर्माता एवं निर्देशक माइकल वार्ड ने अपने हिन्दी प्रेम के बारे में साफ़ हिन्दी में बोलते हुए कहा, "मैं एक लेखक और प्रोड्यूसर हूं और मुझे इतनी ख़ुशी है कि मुझे भारतीय फ़िल्मकारों की अगली पीढ़ी के साथ काम करने को मिल रहा है। ये नये फ़िल्म निर्माता युवा पीढ़ी के हैं, उनमें टेलेण्ट है और ये ज़्यादा से ज़्यादा अपना समय फ़िल्म निर्माण एवं कहानी दिखाने एवं स्क्रीनप्ले की कला को समझने में मेहनत लगा रहे हैं।"
(बाएं से श्री कैलाश बुधवार, श्री वेद मोहला एमबीई, श्रीमती मोहला, डा. अरुणा अजितसरिया, एमबीई)।
श्री कैलाश बुधवार द्वारा लिये गये साक्षात्कार के दौरान वेद मोहला जी ने कहा, "मैं 1979 में एक सामाजिक कार्यक्रम में सपरिवार गया। मेरे पांच वर्षीय पुत्र ने एक महिला रेणुका बहादुर के पूछने पर बताया कि वह हिन्दी बोल तो सकता है, परन्तु लिख-पढ़ नहीं सकता। उन्होंने आगे पूछा कि क्या लिखना-पढ़ना भी चाहोगे, तो बच्चे ने उत्साहपूर्वक कहा: 'हां, अवश्य, यदि मेरे पिताजी आज्ञा दें।' आज्ञा लेने जब रेणुका बहादुर मेरे पास आईं, तो न जाने क्यों मेरे मुंह से निकल गया, "हिन्दी सिखाने के लिए इसे साथ लाना तो क्या, मैं स्वयं भी पढ़ाने के लिए आ सकता हूं।" उस वाक्य ने मेरे जीवन की दिशा ही बदल डाली। न केवल तब हिन्दी विद्यालय की नींव पड़ी, बल्कि तब से जीवन का प्रत्येक रविवार हिन्दी अध्यापन के लिए समर्पित हो गया और मैं एक अध्यापक बन गया। "
वेद मोहला जी के दो विद्यार्थियों ने चिल्ड्रन्स लिटरेचर इन दि टवैण्टी फ़र्स्ट सेंचुरी पुस्तक के अंशपाठ किये।
कार्यक्रम में वेद मोहला जी के छात्र एवं चाहने वालों के साथ साथ भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी श्री आनंद कुमार, डा. श्याम मनोहर पांडेय, डा. गौतम सचदेव, सोहन राही, दिव्या माथुर, डा. पद्मेश गुप्त, इंदर स्याल, के.बी.एल. सक्सेना, मंजी पटेल वेखारिया, गुरप्रीत कौर, यादव चन्द्र शर्मा आदि उपस्थित थे।
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दो प्रतिनिधी कविता संग्रह का लोकार्पण
रमणिका फाउण्डेशन द्वारा साहित्य अकादमी सभागार में आयोजित डॉ. सुधीर सागर का कविता संग्रह 'बस! एक बार सोचो` तथा श्रीमती कुन्ती की 'अंधेरे में कंदील` का लोकार्पण रमणिका फाउंडेशन की अध्यक्ष सुश्री रमणिका गुप्ता, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के उपाध्यक्ष श्री एस. एस.नूर एवं वरिष्ट कवयित्री सुश्री अनामिका के मुख्य आतिथ्य में सम्पन्न हुआ।
मुख्य अतिथी श्री एस.एस.नूर ने अपने वक्तव्य में कहा काव्य भाषा दोनों कवियों के पास है। काव्यशास्त्रा की गहरी पहचान है। इस कविता-संग्रह में यथार्थ से उपजी नई काव्य-भाषा देखने को मिलती है। 'बस! एक बार सोचो` की कविताओं के लिए अनामिका जी ने 'मेरे अंदर एक और आदमी` शीर्षक कविता का जिक्र खासतौर पर किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार एक शरीर में अनेक व्यक्ति निवास करते हैं। कुन्ती की कविता 'उजाले की किरण` में सकारात्मक उर्जा को बदलने की शक्ति है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं सुश्री रमणिका गुप्ता ने कहा 'ठाकुर का कुआं` कविता छोटी जरूर है लेकिन ये गहरी तथा लम्बी बात कहती है। अंधेरे में कंदील कविता के आरंभ में खरपतवार` शब्द का प्रयोग सहज और सही है जो खेतिहर मजदूरों से जुड़ा है। प्रेम वही करता है जो क्रांतिकारी होता है। कविताओं में कुछ न कुछ करने की भूख है। इस कार्यक्रम में दोनों कवियों ने अपनी चुनी हुई कविताओं का पाठ किया। तत्पश्चात् श्री रमेश प्रजापति में कविता पर आलेख पाठ प्रस्तुत करते हुए कहा कि 'बस! एक बार सोचो` की कविता उत्पीड़ितों और शोषितों का प्रकाशपुन्ज है। अजय नावरिया ने कहा डॉ. सागर की कविताओं में चित्राात्मक अभिव्यक्ति है। जबकि कुन्ती की कविताओं में स्त्री है। विशिष्ट अतिथि श्री योगेन्द्र कुमार शर्मा 'निधि मेल` के संपादक ने कहा दोनों ही बुन्देली भाषा के अच्छे साहित्यकार हैं। दोनों की कविताओं में स्त्री एवं दलित विमर्श दिखाई देता है। कवि विवेक मिश्र ने कहा कि दोनों की पुस्तकों में शोषितों एवं उत्पीड़ितों की पीड़ा को मार्मिक ढंग से रखा। कार्यक्रम का संचालन छत्तीसगढ के दलित साहित्यकार संजीव खुदशाह ने किया। अंत में साहित्यकार श्री रूपनारायण सोनकर ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। कार्यक्रम में मैत्रोयी पुष्पा, असगर वजाहत, सुधा अरोड़ा, अनिता भारती, मदन कश्यप सहित अनेक साहित्यकारों ने शिरकत की।
प्रस्तुति : रमणिका फाउंडेशन
डिफेंस कालोनी
नयी दिल्ली
-- संजीव खुदशाह My New Mobile No:- 07869774873 Sanjeev Khudshah.
दिल्ली की एक शाम,कहानीकार क्षितिज शर्मा के नाम
नई दिल्ली।
13 अगस्त 2010 को पीपुल्स विजन, दिल्ली, हिन्द-युग्म और गांधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में 'एक शाम एक कथाकार' कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ कथाकार क्षितिज शर्मा ने कहानीपाठ किया। अध्यक्षता हंस के संपादक राजेन्द्र यादव ने की। क्षितिज शर्मा के कृतित्व पर समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट और कथाकार महेश दर्पण ने अपने विचार रखे। संयोजन हिन्द-युग्म के संपादक शैलेश भारतवासी तथा युवा कवि व लेखक रामजी यादव ने किया। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ आलोचक आनंद प्रकाश ने किया।
पीपुल्स विजन निकट भविष्य में हर महीने एक ऐसी गोष्ठी के आयोजन को लेकर कटिबद्ध है जिसमें एक कथाकार अपनी कहानियों का पाठ करे और कहानी के जानकार और आम पाठक उपसर अपनी ईमानदार टिप्पणियाँ करें। कथाकार की प्रशस्ति करना ही मात्र इस गोष्ठी का उद्देश्य नहीं हो, बल्कि कहानीकार को तल्ख और वास्तविक प्रतिक्रियाएँ तत्काल मिलें। इस आयोजन में पीपुल्स विजन को हिन्द-युग्म डॉट कॉम और गांधी शांति प्रतिष्ठान का सहयोग प्राप्त है।
इसी शृंखला की पहली कड़ी के तौर पर वरिष्ठ कथाकार क्षितिज शर्मा ने अपनी कहानी 'अनुत्तरित' का पाठ किया। क्षितिज ने इस कहानी का बहुत ही धीमा और नीरस पाठ किया। यह बात वहाँ उपस्थित श्रोताओं और विशेषज्ञों ने भी रेखांकित की। लेकिन गोष्ठी की सफलता इस बात में भी थी कि कोई भी श्रोता कथापाठ के दौरान टस से मस नहीं हुआ। संचालक आनंद प्रकाश ने क्षितिज शर्मा के कथापाठ से पहले ही वहाँ मौज़ूद सभी रचनाकारों से यह सवाल पूछा कि आज के रचनाक्षेत्र में सभी अच्छी बातें, ग्राह्य बातें या पक्ष की बातें किसी सेट फॉर्मुले के तौर पर आती हैं, समकालीन रचनाओं में शत्रु पक्ष की विशेषताओं और क्रूरताओं की ओर स्पष्ट संकेत नहीं मिलता। तो क्या शत्रु पक्ष के आवश्यक मूल्यांकन के बिना इन रचनाओं की सार्थकता एक निश्चित बिंदु के आगे सम्भव है? क्षितिज शर्मा ने इस सवाल का उत्तर देते हुए कहा कि वो अपनी रचनाओं में दोनों पक्षों का एक बराबर उल्लेख इसलिए भी नहीं करते कि कहीं पाठक दोनों में उलझ ने जाये, उसे दो रास्ते न मिल जायें और वह उनमें कहीं भटक न जाये। इसलिए वे शत्रु पक्ष का वर्णन इशारों में करते हैं।
महेश दर्पण ने अपने वक्तव्य में कहा कि मैं यह तो नहीं कहूँगा कि 'अनुत्तरित' क्षितिज शर्मा की प्रतिनिधि कहानी है, लेकिन इनकी लगभग सभी कहानियों में अपने समय के बड़े प्रश्न मौज़ूद हैं। इस समाज में, इस व्यवस्था में या इस समाज में जीने को विवश व्यक्ति के पास इन सवालों के जवाब मौज़ूद हैं या नहीं यह एक अलग बात है। महेश ने श्रोताओं को बताया कि आलोचकों और पाठकों का क्षितिज शर्मा की ओर ध्यान तब गया जब इनके उपन्यास 'उकाव' को एक ऐसे प्रकाशन ने पुरस्कृत किया, जिसने उसे छापा नहीं था। महेश ने कहा कि यदि किसी को क्षितिज के कहानियो के केन्द्र-बिन्दु की तलाश करनी हो तो पहले उसे पर्वतीय स्त्रियों के संघर्षों को बहुत करीब से देखना होगा।
महेश दर्पण ने क्षितिज शर्मा को शैलेश मटियानी और शेखर जोशी की परम्परा का कथाकार कहा और कहा कि इन कथाकारों को मालूम है कि पहाड़ी स्त्रियों के दुःख-दर्द क्या हैं, कैसे वो अपने पीठ पर वो पहाड़ लादे हैं, जिन्हें पहाडी जीवन कहते हैं। क्षितिज शर्मा अपनी कहानियों में बहुत कम बोलते हैं, वे अपने आपको बहुत पीछे रखते हैं। यदि आप शैलेश मटियानी की केवल 'अर्धांगिनी' को याद रखें, तो क्षितिज की कहानियों के स्त्री-पात्रों की तुलना आप कर सकते हैं। क्षितिज शर्मा बहुत धीमी गति से चलने वाले कथाकार हैं। अपनी कहानियों को पढ़ते वक्त वे उन्हें दुश्मन की कहानी जैसा भी स्नेह नहीं देते। बिलकुल भी इन्वाल्व नहीं होते। अपनी कहानियों का इतना नीरस पाठ क्षितिज शर्मा ही कर सकते हैं।
महेश ने आगे कहा- "क्षितिज शर्मा की कहानियों को अमरकांत की कहानियों की तरह एकबार पढ़कर नहीं समझा जा सकता। मैं समझता हूँ कि क्षितिज 'ताला बंद है' से आगे बढ़े हैं। इधर की कुछ कहानियों में क्षितिज ने नये कथ्यों की खोज की है, जिसमें आज के समाज और व्यक्ति की चिंताएँ हैं और उनके समाधान का संकेत है।"
पंकज बिष्ट ने कहा कि मुझे क्षितिज शर्मा की पहली कहानी 'रोटी' को प्रकाशित करने का सौभाग्य प्राप्त है। क्षितिज शर्मा पहाड़ी जीवन और उसकी संवेदना जिस इंटीमेसी, जिस समझ के साथ देखते हैं, मेरा ख्याल है कि आज के समय के और किसी दूसरे पहाड़ी कहानीकार में वह नही मिलती। इसमें कोई शक नहीं है कि जब क्षितिज पहाड़ पर लिखते हैं तो वे शैलेश मटियानी के करीब होते हैं। लेकिन शैलेश मटियानी और क्षितिज शर्मा में यह फर्क है कि शैलेश मानवीय-संवेदना की कहानियाँ लिखते हैं, लेकिन क्षितिज शर्मा पहाड़ी जीवन के टूटते-बिखरते जाने की व्यथा लिखते हैं, पहाड़ी जीवन में पैदा होने वाली विकृतियों और उसके दुष्परिणाम की कहानियाँ लिखते हैं। क्षितिज शर्मा की कहानी में शैलेश मटियानी की शैली का प्रभाव देखना हो तो क्षितिज शर्मा की 'जागर' कहानी पढ़ी जा सकती है।
पंकज बिष्ट ने क्षितिज शर्मा की कहानी 'ताला बंद है' को हिन्दी की उल्लेखनीय कहानी कहा। पंकज ने आगे कहा कि ऐसा नहीं है कि क्षितिज शर्मा ने केवल पहाड़ी जीवन की कहानियाँ लिखी हैं, इनकी यहाँ की भी कहानियाँ भी उल्लेखनीय हैं। क्षितिज शर्मा की कहानियाँ निम्न मध्यवर्ग का बहुत गहराई से वर्णन करती हैं।
वरिष्ठ कथाकार राजेन्द्र यादव ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि मुझे हमेशा इस जगह से शिकायत है क्योंकि यहाँ कभी बात सुनाई देती हैं और कभी सुनाई ही नहीं देतीं। मैं क्षितिज शर्मा की कहानी सुन नहीं पाया, इसलिए मैं भी उस कहानी पर कुछ कहने का अधिकारी नहीं हूँ। क्षितिज शर्मा एक लो-लाइन व्यक्ति हैं। न वे अधिकारी हैं, न कोई संपादक और न कोई हाई प्रोफाइल व्यक्ति। मतलब कि हम उनकी कहानियों को बिना किसी दबाव के पढ़ सकते हैं। मैंने क्षितिज की 4-5 कहानियों को पढ़ा हैं, लेकिन 'उकाव' उपन्यास को पढ़ने से पहले मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि क्षितिज पहाड़ी जीवन के संघर्षों को इतने निकट से जानते हैं। आजादी के बाद की हिन्दी कहानियाँ वैक्यिक्तिक थीं। उनके केन्द्र में व्यक्ति था। वह समाज को स्वीकारता था। वह स्त्री-पुरुष के संबंधों की कहानियाँ थीं। आज की कहानियों के केन्द्र में भी व्यक्ति है, लेकिन वह व्यक्ति के आस-पास, उसकी समस्त यात्रा की कहानियाँ हैं, जिनमें समाज में रहते हुए भी समाज का अस्वीकार है। मैं समझता हूँ कि क्षितिज की कहानियाँ भी इसी अस्वीकार की कहानियाँ हैं, जिनमें व्यवस्था की बात करते हुए व्यवस्था का अस्वीकार है।
राजेन्द्र ने आगे कहा कि क्षितिज शर्मा एक ठंडे कहानीकार हैं, जिनके पात्रों को पढ़कर, जानकर हम किसी तरह की उत्तेजना, उद्विग्नता, उदग्रता का अनुभव नहीं करते। वे सामान्य तरह की कहानियाँ है। मुझे लगता है कि इस तरह की सामान्यता को भी समझने के लिए हमें व्यक्ति में जाना होता है, भीड़ को समझने के लिए भी कुछ व्यक्तियों की ही तस्वीरें बनानी पड़ती हैं। इस व्यक्ति को सामाजिक संदर्भों में समझे बिना कहानी अपने आप को नहीं पढ़वा सकती। कई बार ये कहानियाँ लगभग समाजशास्त्रीय अध्ययन लगती हैं। और मुझे इस तरह की कहानियों से थोड़ी सी शिकायत है। मैं समझता हूँ कि क्षितिज शर्मा की कहानियाँ इस बात के लिए आश्वस्त करती हैं कि कहानी एक समाजशास्त्रीय अध्ययन नहीं है, किसी व्यक्ति का निजी और एकांतिक अनुभव नहीं हैं।
इस संगोष्ठी में दिल्ली के कई नामचीन लेखक-पत्रकार-समीक्षक और सुधी पाठक भी मौजूद थे.
क्षितिज शर्मा का कहानी पाठ कार्यक्रम यद्दपि एक सर्जनात्मक कार्य था किंतु उनका किया गया स्वयं पाठ न तो मंचासीन वक्ताओं को और न ही श्रोताओं के पल्ले पडा.जब वक्ताओं ने उनकी कहानी की प्रोफाइल पर अपनी-अपनी टिप्पणियां दीं, तब श्रोता ठगे से महसूस करने लगे क्योंकि कहानी पाठ के समय किसी भी श्रोता के पल्ले कहानी नहीं पड़ी थी. यद्दपि कई बार श्रोताओं द्वारा कसमसाहट भी महसूस की गई किंतु उनकी सुधि लेने वाला कोई भी नहीं था. क्षितिज शर्मा के कहानी पाठ की शैली पर तो एक वक्ता ने कह भी दिया कि लगता है शर्मा जी ने दुश्मन की कहानी पढ़ी है. आशय यह है कि आगे के कार्यक्रमों में रोचकता और प्रवाह बनाए रखने के लिए जरूरी है कि बुलंद आवाज में कहानी पाठ कराया जए और यह बंदिश भी खत्म हो कि केवल कहानीकार ही अपनी कहानी का पाठ करे.
संयुक्त तत्वाधान में किया गया यह कार्यक्रम तपते रेगिस्तान में बादल के साए के मानिंद था. जो कभी गालिब-मीर की सर-सब्ज दिल्ली की साहित्यिक गतिविधियों से गलियां गूंजी करती थीं आज वीरान दिल्ली की यह शाम सर-सब्ज कराने की दिशा में इनका पहला कदम था. अंत में रामजी यादव ने आभार व्यक्त किया।
मधुरेश, ज्योतिष जोशी और डॉ.शोभाकांत झा को प्रमोद वर्मा सम्मान
वाणी परमार को प्रथम शोध वृति
अज्ञेय और शमशेर पर राष्ट्रीय संगोष्ष्ठी
रायपुर । प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा हिन्दी आलोचना में उल्लेखनीय योगदान के लिए 2010 का प्रमोद वर्मा सम्मान प्रख्यात कथा-आलोचक मधुरेश और युवा आलोचक ज्योतिष जोशी को प्रदान किया गया । इसके अलावा प्रमोद वर्मा रचना सम्मान से वरिष्ठ ललित निबंधकार डॉ. शोभाकांत झा को अंलकृत किया गया तथा वाणी परमार को एक वर्ष की शोधवृत्ति प्रदान की गई । प्रेमंचद जयंती के अवसर पर आयोजित समारोह में प्रतिष्ठित रचनाकार-आलोचक द्वय डॉ. धनंजय वर्मा और नंदकिशोर आचार्य ने क्रमश- 21, 11 व 7 हज़ार रुपये की नगद राशि, स्मृति चिन्ह, अलंकरण पत्र प्रदान कर रचनाकारों का सम्मान किया । इस प्रतिष्ठित सम्मान के चयन समिति के सदस्य थे – केदार नाथ सिंह, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, विजय बहादुर सिंह, डॉ. धनंजय वर्मा व विश्वरंजन । इसके पूर्व यह सम्मान श्रीभगवान सिंह और कृष्ण मोहन को मिल चुका है । 1965 से आलोचना कर्म में सक्रिय श्री मधुरेश ने कहा कि उनकी सोच साहित्य में सकारात्मकता से है । रचना और आलोचना में ईमानदारी पर बल दिये बग़ैर जो कार्य होता है वह स्थायी नहीं होता । समय उसका नोटिस नहीं लेता । युवा आलोचक श्री जोशी ने अपने वक्तव्य में कहा कि संस्कृति आलोचना साहित्य तक ही सीमित नहीं होती । रचना की समीक्षा भावप्रक्रिया की उपज है । आलोचना पाठक को मार्ग दिखाता है । आज हम बाज़ारवाद की राजनीतिक समस्या से घिरे हुए हैं, इसीलिए भाषा की गति बुरी हो रही है । मुख्य अतिथि श्री आचार्य ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि साहित्य ज्ञानार्जन है । साहित्य, कला में अनुभूति की अहमियत होती है । साहित्य को जानने के लिए अनुभूति के साथ विचार भी आवश्यक है ।
अलंकरण समारोह में 20 से अधिक किताबों का विमोचन भी विभिन्न विद्वान साहित्यकारों के हाथों संपन्न हुआ जिसमें नई त्रैमासिकी पांडुलिपि, अज्ञेय पर केंद्रित कृति ‘कठिन प्रस्तर में अगिन सुराख’ (विश्वरंजन), शमशेर पर केंद्रित कृति ‘ठंडी धुली सुनहरी धूप’ (विश्वरंजन), ‘शिलाओं पर तराशे मज़मून’ (डॉ. धनंजय वर्मा पर एकाग्र), मीडिया : नये दौर,नयी चुनौतियाँ (संजय द्विवेदी, भोपाल),‘पक्षी-वास’ (अनुवादक-दिनेश माली, उड़ीसा), झरोखा (पंकज त्रिवेदी, अहमदाबाद),विष्णु की पाती – राम के नाम (विष्णु प्रभाकर के पत्र- जयप्रकाश मानस), ‘कहानी जो मैं नहीं लिख पायी’ (कुमुद अधिकारी, नेपाल), डॉ. के. के. झा, बस्तर की 11 किताबें और लघु पत्रिका ‘देशज’ (अरुण शीतांश, आरा) प्रमुख हैं ।
अंलकरण समारोह के पश्चात अज्ञेय और शमशेर की जन्मशताब्दी वर्ष के परिप्रेक्ष्य में ‘अज्ञेय की शास्त्रीयता’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में डॉ. कमल कुमार,दिल्ली डॉ. आनंदप्रकाश त्रिपाठी-सागर, डॉ.देवेन्द्र दीपक-भोपाल, डॉ. रति सक्सेना-त्रिवेंन्द्रम, डॉ. सुशील त्रिवेदी-रायपुर, बुद्धिनाथ मिश्र-देहरादून, महेन्द्र गगन-भोपाल श्री प्रकाश मिश्र-इलाहाबाद, माताचरण मिश्र-भोपाल,श्री संतोष श्रेयांस-आरा आदि ने अपने आलेखों का पाठ किया । संगोष्ठी के अध्यक्ष मंडल में थे नंदकिशोर आचार्य, डॉ. धंनजय वर्मा व श्री मधुरेश । द्वितीय सत्र केंद्रित था–‘शमशेर का कविता-संसार’ विषय पर । वक्ता थे डॉ. रोहिताश्व-गोवा, प्रभुनाथ आजमी-भोपाल, ज्योतिष जोशी-दिल्ली, नरेन्द्र पुंडरीक-बांदा, बक्सर, संतोष श्रीवास्तव-मुंबई, दिवाकर भट्ट-हलद्वानी, मुकेश वर्मा-भोपाल, कुमार नयन-बक्सर, डॉ. सुधीर सक्सेना-दिल्ली । सत्र को अपनी अध्यक्षीय गरिमा प्रदान की दिविक रमेश, डॉ. त्रिभुवन नाथ शुक्ल, डॉ. धनंजय वर्मा ने ।
अलंकरण समारोह की पूर्व संध्या 30 जुलाई को कविता पाठ से दो दिवसीय राष्ट्रीय समारोह का प्रारंभ हुआ जिसमें देश के प्रतिष्ठित कवि- सर्वश्री नंदकिशोर आचार्य, दिविक रमेश, बुद्धिनाथ मिश्र, श्रीप्रकाश मिश्र, नरेंद्र पुंडरीक, अनिल विभाकर, रति सक्सेना सुधीर सक्सेना अरुण शीतांश, संतोष श्रेयांश, शशांक शेखर, कुमुद अधिकारी(नेपाल), कुमार नयन, जयशंकर बाबु आदि ने अपनी श्रेष्ठ कविताओं का पाठ किया । इसभी सत्रों का संचालन क्रमशः अशोक सिंघई, संजय द्विवेदी, मिर्जा मसूद और गिरीश पंकज ने किया । इस अवसर पर टैगोर, शमशेर, अज्ञेय, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ एवं प्रमोद वर्मा की कविताओं की प्रदर्शनी भी आयोजित की गई । आयोजन में देश एवं राज्य के लगभग 500 साहित्यकारों, लेखकों, पत्रकारों एवं शिक्षाविदों ने अपनी भागीदारी रेखांकित की । -राम पटवा
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राष्ट्र कवि मैथलीशरण गुप्त जयंती एवं पुरस्कार वितरण समारोह संपन्न
3 अगस्त 2010, नई दिल्ली स्थित भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद,आजाद भवन के आडिटोरियम में राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त मेमोरियल ट्र्स्ट एवं गहोई वैश्य एसोसिएशन द्वारा राष्ट्र कवि मैथलीशरण गुप्त जयंती एवं पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन किया गया. इस अवसर पर स्मारिका का विमोचन भी किया गया.
इस वर्ष राष्ट्र कवि मैथलीशरण गुप्त शिरोमणि पुरस्कार श्री मानिक बच्छावत द्वारा रचित इस शहर के लोग, राष्ट्र कवि मैथलीशरण गुप्त प्रवासी भारतीय पुरस्कार सुश्री दिव्या माथुर द्वारा रचित झूठ, झूठ और झूठ राष्ट्र कवि मैथलीशरण गुप्त गरिमा पुरस्कार डा. योगेंद्रनाथ शर्मा अरुण द्वारा रचित वैदुष्मणि विद्दोत्तमा गरिमा, राष्ट्र कवि गहोई साहित्य सम्मान डा. अनुपमा गुप्त द्वारा रचित कुरुक्षेत्र बनाम कलि क्षेत्र तथा विशेष सम्मान श्री गोविंद गुप्त समाज सेवी शिक्षाविद, कवि तथा साहित्यकार को दिया गया.
इस समारोह की अध्यक्षता पूर्व सांसद डॉ. रत्नाकर पांडेय ने की. उन्होंने अपने उद्बोधन भाषण में राष्ट्र कवि मैथली शरण गुप्त के जीवन का संक्षिप्त परिचय देते हुए वर्तमान भारतीयता की संकल्पना का जनक और उन भारतीय मूल्यों की ओर इंगित किया जिसे आज लोग त्याज्य कर चाटुकारिता और मान मर्दन की ओर उन्मुख हो गए हैं.बातों ही बातों में उन्होंने वर्तमान राजनीतिक पतन की ओर संकेत भी कर दिया और सुझा भी दिया कि भारत की महानता तभी आस्तित्व में रह सकती है जब हम अपने महापुरुषों के पग चिह्नों का अनुसरण करें.
इस अवसर पर विशिष्ट अतिथियों में श्री प्रदीप कुमार जैन,श्री टी.मनैया,श्रीमती दमयंती गोयल,श्री संदीप दीक्षित,श्री दिनेश मिश्र,श्री राधेश्याम कुचिया, श्री नसीब सिंह,डॉ. कंवर सेन,डॉ. एस.सी.एल.गुप्ता,श्री राजेश गौड़ के साथ मुख्य अतिथि के रूप में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के महानिदेशक श्री सुरेश कुमार गोयल उपस्थित थे. इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में संभ्रांत वर्ग के लोग उपस्थित थे. सभागार का हाल खचाखच भरा हुआ था.
इस कार्यक्रम का मंचीय संचालन डॉ. विवेक गौतम और प्रबंधन डॉ. अजय गुप्त निदेशक (कार्यक्रम),भा.सा.सं परि. तथा सहयोग श्री अशोक जाजोरिया ने किया.
शमशेर अहमद खान
2-सी,प्रैस ब्लॉक, पुराना सचिवालय, सिविल लाइंस, दिल्ली-110054.
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और अंत में एक सवाल ...एक मुद्दा जिसने हाल ही में काफी आक्रोश पैदा किया है विशेषतः नारी चेतना में;
जो तटस्थ हैं , समय लिखेगा उनका भी अपराध -- सार्थक संवाद ( मुंबई में महिला रचनाकारों , प्राध्यापकों और छात्रों का विरोध प्रदर्शन ) (जनसत्ता ब्यूरो )
मुंबई: 17 अगस्त 2010 - अपसंस्कृति और सांस्कृतिक मूल्यहीनता के खिलाफ ‘‘ सार्थक संवाद’’ संस्था का गठन 1994 में मुंबई की महिला रचनाकारों ने मिलकर किया था । 17 अगस्त 2010 को सार्थक संवाद ने हिन्दुस्तानी प्रचार सभा के सभागार में महात्मा गांधी अन्तर्राश्ट्रीय हिन्दी विष्वविद्यालय के कुलपति विभूतिनारायण राय द्वारा हिन्दी लेखिकाओं पर की गई अभद्र टिप्पणी तथा भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाषित ‘नया ज्ञानोदय‘ पत्रिका के संपादक रवीन्द्र कालिया के संपादकीय अविवेक के खिलाफ एक निशेध प्रस्ताव पारित किया । मुंबई महानगर की रचनाकारों , प्राध्यापिकाओं और वि.वि. की छात्राओं ने बड़ी संख्या में उपस्थित होकर तथा चर्चा में भाग लेकर सर्वसम्मति से स्वीकार किया कि कुलपति की जिम्मेदार कुर्सी को षर्मसार करने वाले और संपादक के गंभीर दायित्व की उपेक्षा करने वाले व्यक्तियों को इन पदों पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है । गरिमापूर्ण पद को कलंकित करने के कारण इन्हें अविलंब इस्तीफा देने के लिए विवष किया जाना चाहिए । हिन्दुस्तानी प्रचार सभा की मानद निदेषक डॉ. सुषीला गुप्ता ने आयोजन के संदर्भ की भूमिका प्रस्तुत की । कुतुबनुमा की संपादक डॉ. राजम नटराजन ने कहा कि महात्मा गांधी अन्तर्राश्ट्रीय हिन्दी विष्वविद्यालय केंद्र सरकार की अधीनस्थ संस्था है जिसकी स्थापना भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए की गई है । आज जब देष के सर्वोच्च नागरिक पद पर महिला राश्ट्रपति हों , इस तरह के वक्तव्य असंवैधानिक हो जाते हैं। ‘नया ज्ञानोदय‘ की प्रबंधन समिति की भी जिम्मेदारी बनती है कि हल्के स्तर की सामग्री के प्रकाषन पर रोक लगाएं । ‘नया ज्ञानोदय‘ किसी गली कूचे में छपने वाला पीत पत्र नहीं है । क्या भारतीय भाशाओं को गरिमा देने के लिए बनाए गए संस्थान के प्रबंधकों को भी बाजारीकरण ( टी.आर.पी.) का खेल भाने लग गया है ? वरिश्ठ कथाकार सुधा अरोड़ा ने कहा कि इस पूरे प्रकरण ने संपादकीय नैतिकता और दायित्व पर सवाल खड़े किए हैं । इससे भारतीय ज्ञानपीठ जैसे संस्थान की प्रतिश्ठा धूमिल हुई है । उन्होंने कहा कि हिन्दी साहित्य की सबसे बड़ी विडम्बना है कि जिन लेखकों ने अपने जीवन में स्त्रियों को कभी उनका अपेक्षित सम्मान नहीं दिया और जो हर स्त्री को ‘वस्तु’ की तरह देखते हैं , वे ही स्त्रियों के मुद्दों पर तफरीह से साक्षात्कार देते और विमर्ष करते दिखाई देते हैं । षायद वे अपनी करनी के गुनाहों को कथनी की चादर से ढक लेना चाहते हैं । ऐसी मानसिकता वाले पुरुशों का शाब्दिक विचलन स्वाभाविक है पर इस वक्तव्य को शाब्दिक विचलन कहकर माफ नहीं किया जाना चाहिए । डॉ. शशि मिश्रा ने ‘‘बेवफाई के विराट उत्सव’’ पर गहरा क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा कि बेवफाई का उत्सव ही अपने आप में षर्मनाक है फिर उसका विराट होना तो संस्कृति को रौंदने जैसा है । पद के मद में चूर हमारे ये पुरोधा अपनी पारंपरिक संस्कृति , अपनी सहकर्मी के सम्मान की रक्षा नहीं कर सकते तो उन्हें सार्वजनिक दायित्वों से बर्खास्त करने की मांग प्रबल होनी चाहिए । कथाकार संतोश श्रीवास्तव ने कहा - इन कुलपति महोदय के मनचले स्वभाव के बारे में मैं कई सालों से सुनती आ रही हूं । अब यह मानसिकता खुलकर सामने आ गई है । उन्होंने कुलपति के ‘अभद्र बयान को ‘बेबाक बयान’ कहने वाले रवींद्र कालिया को समान रूप से जिम्मेदार माना । डॉ. सुनीता साखरे ने महिला वि.वि. का प्रतिनिधित्व करते हुए संपूर्ण समुदाय की अस्मिता की बात की । सभा में उपस्थित सभी महिलाओं ने जोरदार षब्दों में , एक जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से कुलाधिपति नामवर सिंह से यह निवेदन किया कि वे अपनी मारक चुप्पी को तोड़ें । वे मात्र एक अकादमिक व्यक्तित्व नहीं है , हिन्दी साहित्य की समीक्षा के षलाका पुरुश हैं । इस प्रकरण से हिन्दी साहित्य और हिन्दी भाशा को एक गर्त में धकेल दिया गया है ।
इस अवसर पर वरिश्ठ कथाकार श्रीमती कमलेष बख्षी , गुजराती लेखिका डॉ. हंसा प्रदीप ,युवा कवयित्री कविता गुप्ता , डॉ. नगमा जावेद , डॉ. उशा मिश्रा , डॉ. किरण सिंह , डॉ. विनीता सहाय , डॉ. मंजुला देसाई , डॉ. संगीता सहजवानी , सुश्री संज्योति सानप तथा समस्त स्नातकोत्तर छात्राओं ने विभूतिनारायण राय और रवीन्द्र कालिया के इस्तीफे की मांग पर एकजुट होकर हस्ताक्षर किए । सांस्कृतिक और साहित्यिक अवमूल्यन को अपदस्थ कर हिन्दी साहित्य और संस्कृति की गरिमा को लौटा लाने की विकलता को क्या ये सभी पदाधिकारी और संस्थानों के मालिक और उच्चाधिकारी महसूस करेंगे ?