अनवर ने देखा उसका लगाया नीम का पौधा उसके क़द से सिर्फ चार अंगुल भर ही छोटा है. राकेश,रवि,रिंकी,जोजफ,पल्टू और श्यामू के पौधे भी उतने ही बड़े हो गए हैं. कल ही तो उन सबके विद्यालयों के परीक्षा परिणाम घोषित हुए हैं. सभी तो पास होकर नई-नई कक्षाओं में जा चुके हैं.लेकिन आज का रिजल्ट और चौंकाने वाला होगा क्योंकि जिस बच्चे का पौधा सबसे अच्छा और बडा होगा, उस बच्चे को बघेल अंकल पुरस्कार देंगे. बघेल अंकल हर साल हर कालोनी के बच्चों को इस तरह के कामों के लिए पुरस्कार देते हैं.वे कहते हैं कि जो बच्चा पढाई के साथ-साथ ऐसा काम करता है, वह आगे चलकर बहुत नेक इंसान बनता है. शहर की हर कालोनी के बच्चों को वे ऐसी ही प्रेरणा देते हैं और आज शहर का हर बच्चा और उनके मां-बाप उन्हें जानते हैं. वे पर्यावरण के शांता क्लाज माने जाते हैं.
अनवर सोचने लगा कि इस नई कालोनी में उसे आए हुए अभी दो ही वर्ष तो हुए हैं.कालोनी में अभी पूरी बसावट ही कहां हुई है? जब वह इसी उपनगर की एक विकसित कालोनी से यहां आया था तब नई कालोनी के मकानों के बीच उगी पार्थीनियम घास के सिवा यहां था ही क्या? सामने कुछ सरकारी भवन थे जिनमें कुछ बन रहे थे और कुछ में काम हो रहा था. इंसानों की आवाजाही न के बराबर थी. यहां परिंदे भी नहीं दिखाई देते थे.जबकि जिस किराए के मकान को छोड़्कर वह यहां आया था. वहां कम से कम एक गौरैया का जोडा, उसका हमसफर था.गौरैया साल भर अंडे देती,बच्चे निकलते और बड़े होने पर फुर्र हो जाते और फिर गौरैया का यह काम शुरू हो जाता. उसका साल भर यह क्रम चलता रहता.कई वर्षों तक वह गौरैया का जोडा उसकी दिनचर्या का सहभागी रहा था.
इस नई कालोनी में उसका जब अपने जैसे हमउम्र साथियों से परिचय हुआ तो उन सबकी भी लगभग मिलती-जुलती ऐसी ही कहानी थी और वे भी कुछ ऐसा ही करना चाहते थे जिससे उस कालोनी का पर्यावरण उनके अनुकूल बन जाए और इसी दौरान पर्यावरण के मसीहा बघेल अंकल की उनसे भेंट हो गई थी और जिसका यह परिणाम हुआ था उन्होंने कालोनी में बच्चों का एक क्लब बना रखा था. इस क्लब के बच्चों ने अपने-अपने घरों के सामने हरित पट्टी और पार्कों में क्लब के सदस्यों ने नीम, बकायन, पीपल,जामुन,शाल,एलेस्टोनिया जैसी प्रजातियों के वृक्षों की पौध लगा रखी थी और इनके संरक्षण का दायित्व क्लब के सदस्यों की थी. वैसे इस क्लब का सदस्य नरसरी कक्षा की आयु का बच्चा भी हो सकता था लेकिन इनका रख-रखाव सीनियर बच्चे ही करते थे.
अपने लगाए गए पौधे की सिंचाई भी वे खुद करते. गर्मियों में जब उनकी नलों में पानी कम हो जाता तो वे अपने-अपने स्कूलों से अपनी-अपनी बोतलों से पानी लाते. किसका पौधा जल्दी पेंड़ बनेगा इसकी होड़ उनमें लगी थी. और दो वर्ष के उपरांत ये अर्ध विकसित नीम के पेंड़ आज बच्चों की मेहनत का फल देने वाले थे.धीरे-धीरे राकेश,रवि,सूरज,रतिन,सलमा,रिंकी,जोजफ और पल्टू उस जगह इकट्ठा हो गए जहां बघेल अंकल का कार्यक्रम होना था. सभी बच्चों ने टोली बनाकरहर नीम के उन अर्धविकसित पेंड़ों का जायजा लिया. सभी उनको देखकर संतुष्ट हुए. उनमें से हर कोई सोच रहा थाकि इस साल वही ही सम्मान का पात्र होगा.टोली से एकाएक जोजफ बोला,” अनवर भैया, श्यामू भैया नहीं दिखाई दे रहे हैं?” सबने एक-दूसरे पर निगाहें दौडाईं और सवाल उछाला लेकिन सारे सवाल हवा में तैरते रहे. श्यामू क्लब की हर गतिविधि में बढ़-चढ़्कर भाग लेता था. और आज इस सुनहरे अवसर पर उसकी गैर हाजिरी सबको खटक रही थी. सबने सोचा कि कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं है. सबने एक सुर में कहा,” चलो, देखते हैं.” और पूरी टोली श्यामू के घर की तरफ हो ली.
दरअसल श्यामू इस कालोनी के काफी पीछे वाले हिस्से में रहता था, जहां अधिकांश मकान अभी खाली थे. प्राधिकरण द्वारा आबंटित आबंटियों के अलावा अनाधिकृत लोगों का उन खाली मकानों पर कब्जा था और उन मकानों का शोषण ये अनाधिकृत घुसपैठिए इस तरह कर लेना चाहते थे कि मकानों की ईंट और गारे तक को नहीं छोड़्ना चाहते थे.
श्यामू के मकान के सामने एक त्रिकोणीय छोटा सा पार्क था जिसमें उसने नीम का पौधा लगा रखा था. रोज वह पौधों को देखता और उसकी वृद्धि पर उसकी आशाएं बढ़ जातीं. वह सोचता नीम बडा होगा,तब घनी छाया होगी और इसके नीचे लोग इसकी छांव में आराम करेंगे और इसके ऊपर पक्षियों का कलरव होगा.
बच्चों की टोली जब श्यामू के मकान के पास पहुंची तो देखा पार्क में न तो नीम है और न ही उसका कोई निशान. हां वहां एक भैंस जरूर बंधी है. और सामने एक मकान पर पुलिसवाले का बोर्ड लगा है. बच्चों को समझते देर न लगी कि यह कारस्तानी उस पुलिसवाले की है जिसने मकान पर बोर्ड लगा रखा है. उन्होंने श्यामू को आवाज़ दी.श्यामू की मां ने दरवाजा खोला. सलमा बोली,” आंटी, श्यामू कहां है?” हतप्रभ सी श्यामू की मम्मी को कोई जवाब नहीं सूझ रहा था. अनवर बोला,” आंटी, हमें सब मालूम हो गया है.कृपया श्यामू को भेज दें. हम सब उसके साथ हैं. श्यामू की आंखें रो-रोकर लाल हो गई थीं.
श्यामू के पिता चुंगी में क्लर्क थे और बड़ी मेहनत तथा पेट काट-काटकर कुछ पैसों की बचत करके प्राधिकरण से यह ठिकाना खरीदा था. उनकी हालत यह नहीं थी कि वह किसी से भी झगडा मोल लेते. श्यामू को बच्चों ने आश्वस्त किया और उसे अपने साथ ले गए.
बघेल अंकल के आने से पहले बच्चों ने आपस में तय किया कि श्यामू के नीम के पौधे को उसी पुलिस वाले ने काटा है,जिसने उस खाली मकान में प्रविष्ठ किया है और सामने पार्क में भैंस बांध रखी है. बच्चों ने सोचा कि अगर पेंड़ काटने का आरोप पुलिसवाले पर लगाते हैं तो पुलिसवाले इसकी शिकायत सुनें या न सुनें. वे अपने विभाग के आदमी की तरफदारी भी तो कर सकते हैं.दूसरे उनके मां-बाप को भी परेशान कर सकते हैं. एकाएक रवि कुछ सोचते हुए बोला, क्यों न हम दिनेश भैया कि राय ही ले लें.” बच्चों की टोली दिनेश भैया के घर की तरफ मुड़ गई. यह महज संयोग ही था कि वे घर पर मिल गए. वे निकलने ही वाले थे.बच्चों की टोली देख्कर वे रुक गए और उन्होंने उनकी समस्याएं बड़े ध्यान से सुनीं. उन्होंने सुझाव दिया कि पुलिसवालों से उलझना ठीक नहीं है इसलिए आप लोग यह देखो कि वह जिस मकान में रह रहा है, वह आबंटी है या नहीं. और इसकी जानकारी मिलेगी सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 से. सीनियर बच्चों की समझ में बात आ गई. उन्होंने अपने सिशल साइंस में इसी साल सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 पढा था.
बघेल अंकल आए और वे भी इस घटना से बहुत आहत हुए. बच्चों की भावी योजना सुनकर वे बहुत खुश हुए. क्लब की पुरस्कार योजना उन्होंने इस घटना से स्थगित कर दी.
कुछ ही दिनों बाद सूचना का अधिकार अधिनियम द्वारा मांगी गई अपेक्षित सूचना बच्चा क्लब को प्राप्त हो गई. इसमें लिखा था कि वह मकान किसी को आबंटित नहीं किया गया है जिसपर पुलिसवाले का बोर्ड लगा हुआ था.
बच्चों के क्लब ने प्राधिकरण पर दबाव बनाया और उस अनाधिकृत रूप से रह रहे पुलिसवाले से न केवल मकान खाली करवा लिया बल्कि उससे काटे गई एक नीम के पौध के स्थान पर सभी पार्कों में कई नीम की पौध भी लगवाई और भविष्य में कभी भी हरी-भरी पौध या पेंड़ न काटने का लिखित आश्वासन भी ले लिया.
इस वर्ष का पर्यावरण संरक्षण सम्मान श्यामू को मिला.
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रंग-तरंग
“खाओ पीओ और मौज करो”
“खाओ पीओ और मौज करो” किसी ने ठीक ही कहा है कि ‘यावत् जीवेत सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पीवेत्।‘ अर्थात् जब तक जीओ सुख आनंद अर्थात् मस्ती में जीओ। कल का क्या भरोसा हम-आप हों न हों। यदि हम रहे तो भी मौज-मस्ती रहे-न-रहे। यह भी होसकता है कि हम ही मौज-मस्ती के लायक न रहें। यह सब फालतू लगता है कि यह न खाओ, यह करो वह करो, यहां जाओ वहां मत जाओ। क्योंकि यह अनमोल जीवन परमात्मा ने यूं ही गंवाने को नहीं दिया । परमात्मा ने इंसान को यह सुन्दर स्वरूप एवं बुद्धि इसलिए दिया कि संसार के मजे कर सके। यदि हमने कोई कार्य ( जिसको करने से हमारे पिताजी मना करते हैं) छोड़ दिया या नहीं किया और ऊपर गये तो भगवान पूछ सकते हैं कि तुमने ये क्यों नहीं किया वह क्यों नहीं किया ? और हो सकता है कि उन सभी कार्यों को फिर करके आओ बोल के ऊपर से लात मार कर फिर से यहीं भेज दें।
इसलिए जो चाहे खाओ जैसे पिज़ा, बर्गर चिप्स आदि जो चाहे पिओ जैसे दूध, जूस या गिलासी ! क्या फरक पड़ता है। मेरे पिताजी कहते हैं कि ‘ मेहनत करो और नाम रौशन करो।‘ परन्तु मेहनत और नाम के चक्कर में जिन्दगी का सारा मजा किरकिरा हो जाता है। किसी ने ठीक ही कहा है कि ‘ जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है मुर्दादिल क्या खाक जिया करते हैं? ‘ इसलिए मेरा तो यह मानना है कि चार दिन की चांदनी है फिर तो अंधेरी रात ने आना ही है तो खूब खाओ पीओ और मौज करो। मन मारकर बचा-बचाकर जोड़ना भी बेकार है क्योकि कल किसने देखा है? आप सब समझ गये न !
-युवराज पांडे
कबूतर
भोले-भाले बहुत कबूतर मैंने पाले बहुत कबूतर ढंग ढंग के बहुत कबूतर रंग रंग के बहुत कबूतर कुछ उजले कुछ लाल कबूतर चलते छम छम चाल कबूतर कुछ नीले बैंजनी कबूतर पहने हैं पैंजनी कबूतर करते मुझको प्यार कबूतर करते बड़ा दुलार कबूतर आ उंगली पर झूम कबूतर लेते हैं मुंह चूम कबूतर रखते रेशम बाल कबूतर चलते रुनझुन चाल कबूतर गुटर गुटर गूँ बोल कबूतर देते मिश्री घोल कबूतर।