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                                                                                                                                                         परिचर्चा


                                                                                                                                              -रघुवेन्द्र सिंह

उच्च शिक्षा विधेयक यानी उधार का सिंदूर

भारत के नेतृत्व वाली यू.पी.ए. सरकार की कैबिनेट ने देश में विदेशी शिक्षणसंस्थानों को प्रवेश कराने संबंधी विधेयक नेशनल कमीशन फार हायर एजूकेशन एण्ड रिसर्च (एन.सी.एच.ई.आर.) को मंजूरी दे दी। जिसे संसद के सत्र में पेश किया जाना है। मानव संसाधन मंत्री श्री कपिल सिब्बल सहित केन्द्र की सरकार उक्त विधेयक के संदर्भ में अति उत्साह में नजर आ रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानो विदेशी शिक्षण संस्थान अपने साथ कोई जादू की छड़ी लेकर भारत आएँगे और एक ही झटके में सम्पूर्ण राष्ट्रीय उच्च शिक्षा के क्षेत्र का कायाकल्प कर देंगे। गौर करने की बात यह है कि पिछले 20 वर्षों से सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) का 4 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा के क्षेत्र में खर्च हो रहा था। लेकिन इसे घटाकर 3.5 प्रतिशत कर दिया गया। हमें इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि देश की सरकार के सामने मौजूदा हालात में करीब 18 हजार कालेज तथा 500 विश्वविद्यालयों की स्थिति सुधारने का कोई विशेष एजेन्डा सामने नहीं है। जो उनकी उच्च शिक्षा सुधार विषय की गम्भीरता को दर्शाता है।
अभी लगभग दो वर्षों पहले हमारी सरकार द्वारा एक विशेषज्ञ संमिति के माध्यम से ‘‘ज्ञान आयोग रिपोर्ट’’ नाम का एक दस्तावेज जारी हुआ था। जिसके अनुसार अगर भारत में सही शिक्षा प्रबंधन करना तथा वैश्विक दौड़ में रहना है तो उसे अगले 10 वर्षों में 500 विश्वविद्यालयों को बढ़ाकर 1000 करना होगा तथा उन्हें अंतर्राष्ट्रीय मानकों पर भी खरा उतरना होगा। हमारे देश की सरकार सिर्फ 20 नई आई.आई.टी. तथा आई.आई.एम. खोलने में पसीने छोड़ रही है। उक्त विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ाने तथा उनकी शैक्षिक गुणवत्ता को सुधारना उनके बूते की बात नहीं। सो उधार के सिंदूर से सुहागिन बनने का मन बना लिया हमारी सरकार ने तथा अपनी जिम्मेदारी से बचने का खूबसूरत माध्यम भी ढूँढ़ लिया, विदेशी संस्थानों के लिए भारत के दरवाजे खोलकर। एक तरफ शिक्षा के क्षेत्र में कम धन आवंटन तथा दूसरी तरफ अपने संसाधनों की कमी का रोना रोकर हमारी सरकार हर क्षेत्र को धीरे-धीरे निजी तथा विदेशी व्यवस्था के हवाले करती जा रही है। अन्य क्षेत्रों में इसका परिणाम क्या होगा यह शोध का विषय है। परन्तु शिक्षा के क्षेत्र में इसके परिणाम अशुभ ही रहने वाले हैं।
विदेशी विश्वविद्यालयों हेतु प्रावधान किया जा रहा है कि वे भारत के अपने शिक्षण संस्थानों के लाभांश को अपने देश नहीं ले जा सकेंगे। उसे भारत में ही निवेश करना होगा। कोई विदेशी संस्था भारत में सिर्फ सेवा के उद्देश्य से इतनी बड़ी पूँजी लगायेगी बात कुछ समझ में नहीं आती। वैसे तो सरकार का मानना है कि देश के पब्लिक स्कूल कोई लाभांश नहीं कमाते अतः उन्हें टैक्स देने की आवश्यकता भी नहीं। सरकार का मानना या न मानना यह उनका अलग विषय है। परन्तु वास्तविकता सभी जानते हैं। देश के सभी पब्लिक स्कूल एक दुधारू गाय की भूमिका में हैं। यह बात सत्य है कि विदेशी शिक्षण संस्थान हमारे देश में शिक्षा व्यापार के लिए आएँगे तथा किस प्रकार उस संस्थान के माध्यम से अधिक से अधिक लाभ लिया जाय। इस पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करेंगे।
हमारे देश का सामान्य वर्ग अभी भी विदेश तथा उनकी शिक्षा को श्रेष्ठ मानता है। उनका विदेशी व्यवस्था, उनके सामाजिक एवं व्यापारिक माहौल तथा उनकी संस्कृति को अपनाने की व्याकुलता प्रायः उनमें देखी जा सकती है। एक बड़ा प्रबुद्ध वर्ग जिसने अपनी राष्ट्रीय भावना तथा कठिन परिस्थितियों में कार्य कर देश में अपना अलग मुकाम हासिल किया। दूसरी तरफ सिर्फ धन एवं विदेशी सुविधा तथा सम्पन्नता प्राप्त करने गये व्यक्ति के लिये  ब्रेन-गेन या ऐसे अति योग्यता युक्त शब्दों का बेहिचक प्रयोग किया जाता है। जो प्रथम देशी व्यक्तियों के लिए अपमानजनक सा लगता है।
माननीय कपिल सिब्बल जी बार-बार गुणवत्ता की बात करते हैं। वे विदेशी शिक्षण संस्थानों की कौन सी गुणवत्ता की बात बताना चाहते हैं। जिसे विकसित देश अमेरिका के राष्ट्रपति श्री बराक हुसैन ओबामा भी समझ नहीं सके। उल्टे वे भारत के बच्चों की योग्यता व गुणवत्ता की बात विभिन्न प्रचार माध्यमों द्वारा बेहिचक कई बार कर चुके हैं। हमारे मंत्री महोदय को पता होना चाहिए कि शिक्षण संस्थानों से कहीं अधिक आवश्यकता है बच्चों की गुणवत्ता की जिसमें वैश्विक स्तर पर भारत कहीं अधिक आगे है।
बाजारीकरण की अंधी दौड़ का अंत कहां जाकर होगा अनुमान लगाना कठिन है। परन्तु कुछ नतीजे सामने हैं। जिस भारत की कल्पना हमारे नीति निर्धारकों ने की थी वह कब का पीछे छूट गया। हाथ आया धन की लिप्सा पाले आधुनिक समाज जो सिर्फ शिक्षा के लिए धन तथा धन के लिए शिक्षा की व्यवस्था करते-करते अपने जीवन का अधिकांश भाग जी रहा है। उसके जीवन में मानवीय संवेदनाओं तथा नैतिक मूल्यों की कीमत समाप्त हो चुकी है। उसका लक्ष्य सिर्फ धन से धनार्जन तक ही सीमित रह गया है। देश का प्रबुद्ध वर्ग यह भी कहता है कि उक्त विदेशी शिक्षण संस्थानों के भारत आगमन के बाद देश में शिक्षण प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी तथा हमारे देशी संस्थानों की गुणवत्ता में सुधार आयेगा। हो सकता है ऐसा हो परन्तु बड़ी संभावना यह है कि क्या वे गुणवत्ता युक्त शिक्षा लेकर ही आयेंगे। यदि लेकर आयेंगे तो क्या उससे हमारे देश में प्रतिस्पर्धात्मक माहौल बनेगा। क्या आज हमारे देश में सभी गैर स्तरीय शिक्षण संस्थान हैं। देश में आई.आई.टी. तथा आई.आई.आई.एम. हल्के स्तर के संस्थान हैं। यदि नहीं तो उनसे ऐसा माहौल क्यों नहीं बना इसी प्रकार के अनेक प्रश्न हैं जिनका उत्तर ईमानदारी से तलाशना है। उक्त कुछ प्रश्नों का उत्तर स्पष्ट है। कुछ भारतीय उक्त संस्थान गुणवत्ता पर ध्यान देते हैं तथा अन्य धनार्जन पर। दोनों को अपने-अपने लक्ष्यों की प्राप्ति होती है। हो सकता है कुछ एक विदेशी संस्थान अपनी गुणवत्ता के साथ भारत आएँ पर यह बात निश्चित है अधिकांश का लक्ष्य भारत के शिक्षा बाजार का आर्थिक दोहन ही होगा, न कि यहां के छात्र वर्ग को ईमानदारी से शिक्षा देना। इसी व्यवसायीकरण के युग ने देश के किसी समय एक जाने-माने शोध संस्थान ‘‘एम्स’’ की हालत खराब कर दी। यहां के बड़े-बड़े शोधकर्ताओं को निजी अस्पतालों ने ऊँची कीमत दे अपने यहाँ ले लिया। क्या इसी प्रकार का कुछ हमारे देश में आई. आई. टी. या आईआई. एम. आदि के साथ नहीं होगा ? क्या वे विदेशी संस्थान उनको आर्थिक प्रलोभन द्वारा खरीदने का प्रयास नहीं करेंगे ? ऐसे में हमारे स्तरीय शिक्षण संस्थानों की हालत क्या होगी, सोचने का विषय है। एक तरफ हमारी केन्द्र सरकार शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 के तहत 6 से 12 वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था की बात कह रही है। दूसरी तरफ उच्च शिक्षा के लिए वह अपनी जिम्मेदारी से मुँह फेर रही है। शिक्षा को बिकाऊ माल की तरह वैश्विक बाजार में बेचने की तैयारी की जा रही है। समाज का अंग होने के कारण गरीब को भी शिक्षा प्राप्त करने का उतना ही अधिकार है जितना धनाड्य को। आजादी के बाद आज तक देश की जनता इंतजार कर रही थी कि कब सार्वजनिक धन पर टिकी समान शिक्षा व्यवस्था की स्थापना की जाय। जिससे हमारे बच्चों को कम धन में प्राथमिक विद्यालय से लेकर हर स्तर की उच्च शिक्षा प्राप्त हो सके। आज गरीब भारत तथा अमीर इण्डिया का अन्तर स्पष्ट देखने को मिल रहा है। जो खाई निश्चित ही दिनो दिन चौड़ी होती जायेगी। वर्तमान में हमारी उच्च शिक्षा की सबसे बड़ी समस्या गुणवत्ताहीन संस्थान हैं। जिसे निजी क्षेत्र ने तो अपने व्यापार का साधन बना ही लिया है। विदेशी संस्थान आने से स्थिति और भी भयावह होने की आशंका है। सरकार को शिक्षा के क्षेत्र में विदेशी दरवाजे खोलने से पहले उनपर नियंत्रण हेतु कड़े कानून बनाने चाहिए। जिससे वे भारत में अपनी मनमानी न कर सकें।
एन.सी.एच.ई.आर. के अध्यक्ष प्रो0 यशपाल ने पिछले वर्ष मानव संसाधन विकास मंत्रालय को अपनी कमेटी की रिपोर्ट सौंपी। जिसके अनुसार विदेशी संस्थानों को भारत आने की अनुमति देते वक्त यह बात खासकर ध्यान देनी होगी कि कहीं अपने देश में गुमनाम तथा भारत में पैसा कमाने के उद्देश्य से वे यहाँ तो नहीं आना चाहते। उक्त रिपोर्ट के अनुसार विश्व के बेहतर 200 विश्वविद्यालयों को ही यहां शाखा खोलने की अनुमति देनी चाहिए। इसी तरह की कई ईमानदार शिफारिशें की गई हैं उक्त रिपोर्ट में। जिसका कड़ाई से पालन होना चाहिए। अन्यथा उक्त विदेशी संस्थान भारत में एक उद्योग के रूप में कार्य करेंगे। जिनका मुख्य उद्देश्य धनार्जन ही होगा।?
हमारे देश में शिक्षा के निजीकरण के द्वारा स्तरहीन उच्च शिक्षा की जो खरपतवार फैली उससे सम्पूर्ण भारतीय शिक्षा जगत प्रभावित हुआ। यदि इसी प्रकार का कुछ विदेशी संस्थानों के आने के बाद हुआ तो भारतीय शिक्षा की स्थिति और चिंताजनक होना स्वाभाविक है। अतः प्रो0 यशपाल की रिपोर्ट एवं अन्य व्यवस्थाओं के अनुसार आने वाली विदेशी शिक्षण संस्थाओं पर लगाम लगाना अति आवश्क होगा। अन्यथा सम्पूर्ण भारतीय शिक्षा जगत को विभिन्न आयामों में प्रदूषित होने से रोकना असम्भव ही रहेगा।