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                                                                                                                                          कहानी समकालीन


                                                                                                                                          -नीलिमा सिंन्हा

                                           शेम शेम

पिछली बेंच पर हड़बोंग की स्थिति तो बहुत देर से थी, किंतु अब उसकी अनदेखी असंभव हुई। दीवार पर लगे ब्लैकबोर्ड से जूझ रही टीचर वहीं से, अपने स्थान पर खड़ी-खड़ी चिल्लाई- “ व्हाट्स दि मैटर?”… “आप लोग चिल्ला क्यों रहे हैं चिल्डरेन? “ टीचर ने बच्चों के उस हड़बोंगी समूह की ओर उँगली उठाकर पूछा- “ ऋतज ! शादां ! टेल मी व्हाट‘ स दि मैटर ? “ ...और अब हाथों में रूलर थामे टीचर उस ओर चल पड़ी थी।

पिछली बेंच का माहौल काफी मस्ती भरा था। जैसे टोपरे में नए-नए रोपे गए धान के तमाम पौधे हवा के झोंकों के दबाव की वजह से एक के ऊपर ढेर होते हुए खुशनुमा अंदाज में लहरा रहे हों, तमाम बच्चे हंस-हंसकर एक-दूसरे पर ढेर हुए जा रहे थे। उल्लास के उस टोपरे के बीच किसी क्रोधी सांड के-से रूप में अनधिकृत प्रवेश कर चुकी टीचर ने शादां की कमीज उसकी पीठ से पकड़ी- “ व्हाट इज गोइंग आन ब्वाय?...आप लोग इस तरह बदतमीजी से क्यों हंसे जा रहे हैं ?...डू यू नो, दिस इज योर क्लासरूम एंड डिसिप्लीन मस्ट बी मेंटेंड हियर ! “

बच्चे टीचर की इस बोली को ठीक-ठीक तो नहीं समझ पाए किंतु टीचर के स्वर में उतर आए चाबुक की चोट उन्होंने स्पष्ट महसूस की। पलक झपकते ही यह भोला उत्सव चकनाचूर हो उठा। अब ‘ क्लासरूम डिसिप्लिन ‘ में बंधे थे। नन्हे-नन्हे पौधे बंजर में खड़े ठूठों की तरह अपनी-अपनी कमर सीधे किए अपनी-अपनी बेंचों पर जड़ हो चुके थे।

‘विधि व्यवस्था‘ स्थापित कर अपने स्थान पर लौट रही टीचर ने अपनी सनसनीखेज निगाह क्लासरूम में चौतरफा दौड़ाई। बीच की बेंचों का ‘ डिसिप्लीन ‘ भी टीचर को अब कुछ टूटता हुआ-सा नजर आया। किसी मध्ययुगीन शहंशाह की चिंता को अपने भीतर धारण किए टीचर अब अपने साम्राज्य में उभरने की फिराक में लगे उस विद्रोह को दबाने के लिए अपने हाथ में रूलर को संभाले उस तरफ चल पड़ी।

पूरी क्लास पर ‘डिसिप्लीन‘ अब पूरी तरह तारी था। टीचर तन्मय-भाव में पढ़ा रही थी- “ चिड़िया ने गाय से क्या कहा? “

उधर से आने वाले जबाव की प्रतीक्षा किए बगैर टीचर ने जबाव भी खुद ही लगाया- “ चिड़िया ने गाय से कहा कि...“

टीचर का वाक्य अधूरा ही रह गया क्योंकि अभी-अभी जिन पिछली बेंच पर टीचर ‘  विधि-व्यवस्था ‘ कायम कर लौटी थी उन्ही बेंचों का ऋतज अपने स्थान पर फिर खड़ा था। ‘ क्लासरूम डिसिप्लीन‘ फिर खतरे में था। टीचर, जो उस ‘ डिसिप्लीन ‘ को लेकर अभी-अभी थोढ़ी चिंता मुक्त हुई थी, फिर चिंतित हो उठी। टीचर ने क्रोध में भरकर पूछा- “ व्हाट्स दि मैटर व्वाय ? व्हाय आर यू स्टैंडिंग?“

यह एक कान्वेंट स्कूल के पहले वर्ग की कक्षा थी और टीचर बच्चों को हिंदी पढ़ा रही थी।

टीचर की क्रुद्ध आवाज से बच्चा तनिक सकपकाया। वह जो अपना स्थान छोड़कर बाहर आने की फिराक में था, फिर वहीं जड़ हुआ। उसने अपने स्थान पर खड़े-खड़े तुतलाती जुबान में कहा- “ मिस! मिस टॉयलट! “

अनायास टीचर का हास्यबोध कहीं से जग आया। टीचर ने मुस्कुराकर कहा, गोया हिटलर मुस्कराया हो- “ आय एम नॉट ‘ मिस टॉयलयट ‘, ... मेरा नाम तो ‘ मिस टॉयलट‘ नहीं है। “

पता नहीं, बच्चे, टीचर के इस चुटकुले को समझ पाए अथवा नहीं, किंतु टीचर के इस हास्य ने पूरी कक्षा के हास्य को जागृत किया। क्षणमात्र में कक्षा का परिदृश्य बदला। अब बच्चे ‘ ही-ही‘ की आवाज के साथ हंस-हंसकर एक-दूसरे पर ढेर हुए जा रहे थे।

बच्चों के इस हास्य ने ‘ हिटलर‘ को सचेत किया। ‘ क्लासरूम डिसिप्लीन ‘ फिर खतरे में था। टीचर ने अपने हाथ में थमे लकड़ी के रूलर को अपने सामने की मेज पर पटका- “ कीप क्वायट! कीप क्वायट ! “ गोया न्यायमूर्ति न्यायालय में ‘ आर्डर-आर्डर ‘ की व्यवस्था जारी कर रहे हों। टीचर के भीतर का क्रूर शहंशाह अब पूर्णतः जागृत था। साम्राज्य की विधि-व्यवस्था पूर्णतः खतरे में थी। चिंताग्रस्त टीचर ने अपने हाथों के रूलर को नादिरशाह की तलवार की तरह लहराया। ...और यह, पलक झपकते ही कक्षा में विधि व्यवस्था कायम हो उठी। 

“ सीट डाउन! सीट डाउन ऋतज! “ टीचर ने वहीं से कहा। टीचर की आवाज में हिटलर, नादिरशाह और न जाने ऐसे ही कितने शासकों की आत्माओं का रुआब भरा थी। बच्चा यद्यपि टीचर की इस व्यवस्था से असंतुष्ट हुआ, किंतु वह निर्विरोध अपनी जगह पर बैठ गया।नादिर की शमशीर का खौफ तो एक समय पूरे हिन्दुस्तान पर तारी हुआ था, यह तो महज एक नन्हा-सा बच्चा था।

बच्चों की तरफ पीठ किए टीचर श्यामपट्ट पर लिखने के साथ बोलने में भी व्यस्त थी- ‘च‘ में ‘आ‘ की मात्रा , ऊपर चंद्रबिंदु- ‘चां‘ और ‘ द‘ - ‘ चांद‘।

“ मिस! मे आइ गो टु टौयलेट प्लीज!“ पीठ के पीछे से उभर आई आवाज ने टीचर की एकाग्रता भंग की। टीचर झल्लाकर पीछे मुड़ी। यह फिर ऋतज ही था, टीचर की मेज के सामने खड़ा।

“ मिस शू शू आई है! “ बच्चे ने टीचर के आग्नेय नेत्रों की परवाह न करते हुए कहा और दाएं हाथ की छोटी उंगली ऊपर उठा दी।

“  ओह नो!“ बच्चे की आवाज में भरे अनुनय से असंतप्त टीचर खीझ गई- “नॉटी ब्वाय! यू आर दि मोस्ट डिस्टर्बिंग एलीमेंट आफ दि क्लासरूम!...गो बैक टु योर सीट! “ टीचर ने बच्चे को धमकाया। टीचर के हाथों की नादिरशाही छड़ी इस वक्त फिर लहलहा उठी थी।

इस अकारण फटकार ने बच्चे के तमाम साहस को बिखेर दिया। सहमा बच्चा वापस अपनी जगह पर जाने को मुड़ गया। टीचर उसे तब तक आग्नेय नेत्रों से तकती रहीं जबतक कि वह दुबारा अपने स्थान पर पहुँच नहीं गया।

बच्चा अब अपने स्थान पर था। अब तक बच्चे की पीठ टीचर की ओर थी, अब दुबारा अपने स्थान पर पहुँचकर बच्चे का चेहरा स्वभावतः टीचर की ओर मुड़ गया। अपनी नन्ही कुर्सी के पास खड़े होकर बच्चे ने एकबार फिर अनुनय के स्वर में कहा-“ मिस! बहुत जोर की आई है।“ निश्चय ही उसकी बेचैनी ही उसे बारबार साहसी बना रही थी।

“नो!“ बच्चे की इस ढिढाई ने टीचर को खासा क्रुद्ध किया- “ चुप बैठिए, वर्ना मैं आपको पनिश करूँगी।“  टीचर की आवाज में धमकी से अधिक जिद थी।

निरुपाय बच्चा अपने दोनों जाघों के बीच की जगह को अपने दोनों नन्हे हाथों से जोर से दबाकर अपनी जगह पर बैठ गया। बेचैनी इस वक्त उसकी समस्त जैविक संरचना पर हावी थी।

कक्षा समाप्त होने की घंटी सुनकर बच्चे के साथ-साथ टीचर ने भी चैन की सांस ली। छड़ी हाथ में उठाकर बाहर निकली टीचर ने छुटकारे की मुस्कान के साथ नियमतः बच्चों से कहा-“ बाय बाय चिल्ड्रेन।“

पीछे से बच्चों का कोरस गूंजा-“बाय बाय मिस!“ और टीचर के कक्षा से बाहर निकलने की प्रतीक्षा किए बगैर बच्चे दरबे का दरवाजा खुल आए मुर्गियों की तरह अपनी जगह से उठ भागने को बेताब हो उठे।

माजरा भांपकर बाहर जा रही टीचर ठिठक पड़ी-“कोई भी बच्चा क्लासरूम के बाहर नहीं जाएगा। ओ.के. ? “ टीचर ने बच्चों को कठोर स्वर में चेताया। जब तक कि कोई दूसरी टीचर कक्षा में नहीं आ जाती, अंततः यह क्लास इसी टीचर की जिम्मेदारी थी।

उस नादिरशाही हुक्मनामे से बच्चे आशंकित होकर अपनी-अपनी जगहों पर पुनः बैठ गए। ‘क्लासरूम डिसिप्लीन‘ की ओर से निश्चिंत होकर अब टीचर कक्षा से बाहर निकल गई।

कक्षा में ‘ अराजकता‘ क्षण-मात्र में पूरे जोर से उभरी ! कुछ बच्चे आपसी ‘ फैटा-फैटी‘ में व्यस्त हुए तो कुछ गप-शप में। किंतु ऋतज इस सबसे बेखबर ताबड़-तोड़ अपनी सीट से उठकर बाहर की ओर भाग चला। उसका पैंट अब गीला हुआ चाहता था। उसे शौचालय पहुँचने की जल्दी थी।

‘ओ गाड! ‘ दरवाजे पर पहुंचकर ऋतज ने किसी बड़े व्यक्ति की तरह हताशा में अपना सिर पीट लिया-दरवाजे से चार कदम दूर मिस सुमन अर्थात ‘ मैथ्स टीचर‘ चली आ रही थीं। ‘नो चांस! ‘ ऋतज ने झल्लाहट में भरकर सोचा और साथ में यह भी चाहा कि टीचर की नजर बचाकर किसी तरह शौचालय तक पहुँच जाए।

अब तक पास आ चुकी मिस सुमन ने कन्नी काटकर भागने की फिराक में लगे ऋतज की बांह थाम ली, “ ओ नॉटी ब्वाय! व्हेयर आर यू गोईंग?“ टीचर की आवाज नरम और मुस्कान भरी थी।

इस नरम मुस्कान-भरी आवाज ने बच्चे की हौसला अफजाई की।

“ मिस् शू-शू आई है ! “   बच्चे ने मनुहार भरी आवाज से अपने दाएं हाथ की छोटी उंगली ऊपर उठा दी। बच्चा खासा बेचैन और जल्दबाजी में था।

“ नो-नो! दिस इज नाट दि मैनर! “ टीचर ने गलत शब्दों के इस्तेमाल के लिए बच्चे को लताड़ा-“से, मे आई गो टु दि टॉयलेट प्लीज! “

शरीर में उठ रही सुरसुरी से बेचैन बच्चे ने बेसब्री से दुहराया- “ मे आई गो टु टॉयलेट प्लीज? “  और अपने दायें हाथ की छोटी उँगली ऊपर उठा दी।

“ नो! कम विथ मी!“ टीचर बच्चे की मजबूरी को समझे बगैर उसे कक्षा की ओर घसीट ले चली। बच्चा यूँ छटपटाया जैसे कसाई के हाथोंपड़ गया बकरा हो-

 “ मिस! बड़ी देर से शू-शू आई है, बड़ी जोर से। ...पैंट में हो जाएगी मिस!“ बच्चा रँआसी आवाज में गिड़गिड़ाया। दरअसल पैंट में हो जाने वाली ‘शू-शू‘ से अधिक उस ‘शू-शू‘ के दुष्परिणाम उसे बेचैन किए हुए थे।

टीचर ने आवाज की उस बेबसी को लक्ष्य किया और बच्चे की आंखों में झांका। वे भोली आंखें पनिया उठी थीं।

टीचर ने बच्चे की कलाई छोड़ दी, “ओ.के. ब्वाय! गो, बट प्लीज कम सून! खूब जल्दी वापस आइयेगा और कम्पाउंड में इधर-उधर घूमना नहीं होगा।“ टीचर ने बच्चे को चेताया।

दरअसल बच्चे के क्लास से बाहर जाने के साथ बात अब ‘क्लासरूम डिसिप्लीन‘ से ऊपर उठकर ‘ कैंपस डिसिप्लीन ‘ तक जा रही थी, जिसकी चिंता स्कूल के स्वभाव और अपनी नौकरी के मद्देनजर टीचर के लिए निहायत वाजिब हुई।

पकड़ से आजाद होते ही बच्चा शौचालय की ओर तेजी से पलटा। तभी टीचर ने लपककर बच्चे की कलाई दुबारा थामी-“ सी ब्वाय! अगर आने में देर की, या झूले के पास गए तो मैं तुम्हें ‘ पनिश ‘ करूँगी और सिस्टर से कहकर तुम्हें टी.सी. भी दिलवा दूँगी।“ टीचर कोई खतरा मोल लेना नहीं चाहती थी अतः उसने बच्चे को जरा जोरदार धमकाने की कोशिश की।

“ मैं खूब जल्दी आऊँगा मिस, प्रामिस!...गॉड प्रामिस!“ बच्चे ने भी अपनी तरफ से टीचर को भरपूर आश्वस्त करने की कोशिश की और हड़बड़ी में टीचर की ढीली पकड़ से अपनी कलाई को छुड़ाकर शौचालय की ओर यूँ भागा जैसे खूँटे से छूटा बछड़ा हो।

लेकिन शौचालय अभी बच्चे के लिए दिल्ली जितनी दूर था। अभी बच्चा सीढ़ियाँ उतरकर नीचे की गैलरी में पहुँचा ही था कि उसकी कलाई फिर थाम ली गई।

जैसे पटरी पर दौड़ रही रेल ब्रेक के झटके से रुक गई हो, बच्चा अचानक झटका खाकर रुका। इस बार उसकी कलाई ‘ सिस्टर ‘ अर्थात् स्कूल की प्रधानाचार्य की जद में थी।

“ व्हेयर आर यू गोइंग ब्वाय ? “ सिस्टर का सवाल वही था लेकिन स्वर अपेक्षाकृत अधिक कठोर था।

बच्चा सकपकाया, जैसे उसने भूत देख लिया हो। कुछ तो तेज दौड़ने और कुछ दहशतकी वजह से उसका गला खुश्क हो आया। उसने मुँह के थूक से अपना गला तर करने की कोशिश करते हुए कहा-“ ट़ॉयलेट सिस्टर!“   

“ इन व्हिच क्लास डू यू रीड? “ सिस्टर ने सवाल किया, यद्यपि क्लास ‘ वन बी ‘ के इस बच्चे को वह बखूबी पहचानती थीं।

बच्चा शारीरिक अथवा मानसिक किसी भी रूप रूप में इस वक्त किसी भी सवाल के जवाब के लिए तैयार नहीं था क्योंकि इस वक्त उसकी समस्त चेतना पर उसकी शारीरिक जरूरत हावी थी, फिर भी बच्चे ने बल पूर्वक सवाल का जवाब दिया, “ वन बी , सिस्टर “। बच्चा पूरी तरह हकला रहा था।

सिस्टर ने बच्चे की घबड़ाहट को लक्ष्य करते हुए गौर से उसे देखा। बच्चे ने अपने आजाद हाथ से अपनी जांघ के बीच के हिस्से को जोर से दबा रखा था। वक्त की इस तंगी को बखूबी भांपते हुए सिस्टर ने बच्चे को अपनी पकड़ से आजाद किया-“ गो! बी क्विक! और जल्दी आइये!  मैं यहीं आपका इन्तजार कर रही हूँ।“

बच्चा वकटूट भागा।

 “ पुअर चाइल्ड!“ सिस्टर ने शौचालय की तरफ भाग रहे उस बच्चे को देखकर कहा और फिर होठों ही होठों में मुस्कुरा पड़ी।

बच्चा अब शौचालय में था। उसने पैंट की बेल्ट खोली, कमर के बटन खोले, जिप खोली, अंदर पहना नन्हा जांघिया नीचे सरकाया और यथास्थान पहुंचकर उसने आँखें मूंदकर मुंह से सीटी की-सी आवाज निकाली-“सी।“ अम्मा ऐसे ही शू-शू कराती है अतः बच्चे ने आदतन वैसा ही किया।

एक पतली धार पौट में गिर चली। बच्चे ने आंखें मूंदे मूंदे परम सुख की लंबी सांस ली और मन ही मन गिनती शुरू की, किंतु जरा ज्यादा ही जल्दी-जल्दी- ‘ वन, टू, थ्री...नाइन, टेन...गॉड!  ‘ बच्चे के सिर पर चिंता सवार हुई- ‘ अभी तक ‘शू-शू‘ खत्म क्यों नहीं हुई? ‘ अब बच्चे ने लक्ष्य किया कि ‘ शू-शू‘ उतनी तेज नहीं निकल रही थी, जितनी तेज अमूमन होती है, बल्कि धीरे-धीरे बहुत धीरे...। बच्चे ने इस धीमी रफ्तार को तेज करने की नीयत से अपने शरीर का पूरा जोर लगाते हुए ‘ शू-शू ‘ को अपने मन के भय से वाकिफ कराया-‘ अबे ओ शू-शू ! जल्दी कर यार !...क्लास में देर से पहुंचने पर पनिशमेंट मिलेगी।...सामने गैलरी में सिस्टर इन्तजार में खड़ी हैं, देर करने पर स्कूल की टी.सी. सीधी हाथ में दे देंगी।...क्लास में जल्दी लौटने को मिस को ‘गॉड प्रामिस‘ भी तो बोला है, देर करने से पाप चढ़ेगा...। ‘ बच्चे ने इहलोक-परलोक के सारे भय शू-शू को दिखलाए, किंतु ‘ शू-शू‘ तेज होने की बजाय क्रमशः और धीमी होती-होती अब बूंद-बूंद टपकने की स्थिति में आ गई थी। बच्चा ‘ जल्दी करने ‘ के लिए पूरी तरह प्रयासरत था किंतु ‘ शू-शू‘ को कोई जल्दी नहीं थी।

अब ‘शू-शू‘ की उस बेरुखी से बच्चा खासा परेशान हो उठा। मजबूरन उसने प्रयास उल्टी दिशा में प्रारंभ किए-‘ रुक जा! रुक जा ओ शू-शू! ‘ मुझे क्लास में जल्दी पहुंचना है...’ किंतु बूंदों का टपकना कम नहीं हो रहा था।

इस तनाव में बच्चे के पेट में दर्द होने लगा, किंतु ‘ शू-शू‘ बच्चे के समस्त प्रयासों को धता बतलाती यथापूर्वक बूंद-बूंद टपक रही थी। अब बच्चा पेट के दर्द से बेहाल हो चुका था। अंततः जल्दबाजी से त्रस्त उस बच्चे ने टपक रही बूंदों की परवाह किए बगैर अपना नन्हा-सा जांघिया ऊपर सरकाया, ताबड़तोड़ पैंट के बटन लगाए, बेल्ट को कसा और जिप को ऊपर की ओर खींचता हुआ शौचालय से बाहर निकल आया। इस समस्त अफरा-तफरी में उसकी कमीज का बांया भाग पैंट के बाहर निकलकर छूलने लगा था।

अस्त-व्यस्त हुलिए में बच्चा अब कक्षा में जल्दी से जल्दी पहुंचने के लिए सीढ़ियों की ओर भागा। उसने दौडकर गैलरी पार की और अपने नन्हे कदमों से भरपूर डग भरता हुआ वह क्लासरूम तक जानेवाली सीढ़ियां चढ़ने लगा।

बीच सीढ़ी पर पहुंचकर बच्चे ने महसूस किया, उसका पेट बेतरह दुख रहा है और ‘शू-शू‘ बूंद-बूंद टपककर उसका जांघिया गीला करती जा रही है। बच्चा बेतरह परेशान हो उठा। ‘ इस तरह तो क्लासरूम में पहुंचते-पहुंचते पूरा जांघिया गीला हो जाएगा, फिर सारे बच्चे मुझे चिढ़ाएंगे। तन्मय, रेणु , शादां...सारे के सारे दोस्त ‘कट्टीस ‘ हो जाएंगे।‘ बच्चे पर अब सिस्टर, टीचर और ईश्वर के भय से अधिक सामाजिक बहिष्कार का भय हुआ।

‘...तो? वापस दुबारा टॉयलट चलूं।‘ बच्चे ने निर्णय करना चाहा और तत्क्षण निर्णय लेकर दुबारा टॉयलट की ओर पलट चला।

बमुश्किल वह चार सीढ़ियां उतर पाया होगा वह फिर ठिठका। अब के सामाजिक बहिष्कार के भय पर सिस्टर की टी. सी. और ‘ गॉड प्रामिस‘ टूटने का भय फिर हावी हुआ। ‘ तो वापस ही चला जाए?‘ बच्चे ने सोचा और भागता हुआ-सा सीढ़ियों के ऊपर चढ़ने लगा।

लेकिन चार सीढ़ियां तय कर बच्चा फिर शौचालय की ओर नीचे वापस लौट पड़ा। बच्चा द्वन्द्व में था। एक ओर दुनिया के तमाम दबाव और ईश्वर के सारे भय थे तो दूसरी ओर यह शारीरिक असाहयता। एक जटिल निर्णयहीनता की स्थिति में बच्चा चूहेदानी में फंसे चूहे-सा कभी सीढ़ियों के ऊपर भागता तो कभी नीचे।

अचानक बच्चे की कलाई फिर थाम ली गई। ...हां, यह स्कूल की प्रधानाचार्या ‘ सिस्टर ‘ ही थीं।

“ स्टॉप ! स्टॉप ब्वाय ! व्हाय आर यू वंडरिंग हियर एंड देयर ? आप इस तरह सीढ़ियों पर धमाचौकड़ी क्यों मचाए हुए हैं ? “ ... सिस्टर का स्वर कठोर था।

बच्चा क्षण भर को निरुत्तरित हुआ। सिस्टर उस निरुत्तरित बच्चे को सीढ़ियों के ऊपर क्लासरूम की तरफ खींच ले चली।

सीढ़ियों के ऊपर, क्लासरूम में पहुंचने के पहले ही, अंततः बच्चे ने अपना साहस बटोर ही लिया-“ सिस्टर! मे आई गो टू टॉयलेट? “ ...बच्चा घिघियाया।

“ नो! यू नॉटी ब्वाय। ...आप अभी-अभी टॉयलेट से लौटे हैं।...हैं न?“ सिस्टर ने बच्चे से उसका ‘ अपराध‘ कबूल करवाना चाहा।

बच्चे ने अपराधी भाव से स्वीकृति में सिर हिलाया।

अब सिस्टर और बच्चा दोनों क्लासरूम के सामने थे। सिस्टर ने रूम का उढ़काया दरवाजा ठेल कर खोला। उस वक्त टीचर वहां बच्चों का होमवर्क देख रही थी। कल टीचर ने बच्चों को चार का पहाड़ा सिखलाया था और आज वह पहाड़ा बच्चों से पूछा जा रहा था। सिस्टर ने इशारे से टीचर को अपने पास बुलाया और बच्चे को उसके हवाले करते हुए कहा- “ इज इट योर चाइल्ड?...बी सिंसियर एंड टेक केयर ऑफ योर क्लास!“ सिस्टर का स्वर मालिकाना हिकारत से सराबोर था।

टीचर ने स्वयं को अपमानित महसूस किया। सिस्टर के वाक्य सरासर टीचर की कर्यक्षमता पर एक सवालिया निशान थे जिसे टीचर सहजता से ग्रहण नहीं कर पाई।

टीचर ने बच्चे की कलाई थामी। सिस्टर अब क्लासरूम से बाहर थी। टीचर कठोरता पूर्वक, लगभग घसीटते हुए बच्चे को उसके स्थान तक ले गई और लगभग ढकेलते हुए बच्चे को उसकी नन्ही कुर्सी पर पटक-सा दिया।

बच्चा अब पूर्णतः आतंकित था और टीचर अपमानित। फर्क यह था कि बच्चे का आतंक निरुपाय था जबकि टीचर क्रोध और प्रतिहिंसा में दहक रही थी, जिसका निशाना इस वक्त बच्चा था।

“ स्टैंड अप!“ टीचर ने बिना वक्त दिए बच्चे को रपेटा।

बच्चा निरंतर के कष्ट, भय और अपमान से क्रमशः काठ में तब्दील होता जा रहा था। टीचर का वाक्य समझने में उसे कठिनाई हुई।

टीचर ने बच्चे को कंधे से दुबारा पकड़ा और खींचकर उसे खड़ा किया-“ आई हैव सेड, स्टैंड अप! “  टीचर की आवाज शेर की गुर्राहट और सांप की फुंकार का मिलाजुला रूप थी।

बच्चे की सिट्टी-पिट्टी गुम थी। उसके पैर बेतरह थरथरा रहे थे, किंतु वह खड़ा था।

“ टेल मी, फोर एट्ज आर...?“ टीचर ने अपनी समझ से ऐसा कठिन सवाल पूछा था जिसका उत्तर बच्चा कतई न दे सके।

बच्चा आतंक में भरकर शुरु हुआ- “फोर वन्ज आर फोर, फोर टूज आर...“

...और जैसे द्रोपदी का चीर हरण हुआ हो, बच्चे के पैंट के नीचे से निकलकर उसकी टांगों और जूतों-मोजों को भिगोती एक पतली जलरेखा जमीन तक पहुंचकर फैलने लगी।

जो हो चुका था, उसे टीचर और बच्चे ने एक साथ लक्ष्य किया। टीचर अपना आपा खोकर जोर से चीखी, “ व्हाट हैव यू डन ब्वाय? “

बच्चा घबरा उठा। इतनी देर से जो आंसू उसकी आंखों में और जो रुलाई उसके कंठ में अटके पड़े थे, सब जैसे बुक्का फाड़कर बाहर आ गये।

गैलरी में राउंड लगाती सिस्टर ने टीचर की गुर्राहट और बच्चे की चीख भरी रुलाई को एक साथ सुना। वे लगभग दौड़ती हुई कक्षा में प्रविष्ट हुईं।

इस बीच कक्षा का पूरा परिदृश्य बदल चुका था। पूरे क्लास में हड़बोंग की स्थिति अपनी चरम सीमा पर थी। कुछ बच्चे ऋतज की ओर इशारा करके ‘खी-खी-खी... ‘ की हंसी के साथ एक-दूसरे पर लोट-पोट हुए जा रहे थे, कुछ तमाशा देखने के लिहाज से ऋतज की कुर्सी के इर्द-गिर्द जमा हो आए थे, तो दूसरी ओर ऋतज के आस-पास बैठने वाले कुछ बच्चे जुगुप्सा भाव से अपनी जगह छोड़कर भरभरा कर भाग निकलना चाह रहे थे।

दरवाजे से भीतर आती सिस्टर ने इस अराजकता को पूरी तरह से देखा, साथ ही कपड़ा गीला करते ऋतज को भी। बच्चों की गोलबंद भीड़ को चीरती सिस्टर घेरे में कसे ऋतज के पास पहुंची।

...और जैसे आसमान सिर पर आ गिरा हो, और उस बोझ से त्रस्त नन्हा-सा बच्चा ठीक-ठीक सांस भी नहीं ले पा रहा हो। जो नन्हा बच्चा अब तक कंठ फाड़कर चीख रहा था, सिस्टर की उपस्थिति को भांपकर अचानक चुप हो गया। उसकी आंखों से आंसू बदस्तूर जारी थे, हिचकियों के आवेग से पूरा शरीर हिल रहा था; किंतु कंठ स्वर जैसे मन के अचेतन गह्वर में कहीं सटक गए थे। बच्चा वहां से भाग जाना चाह रहा था, किंतु हत्यारों के गोल में घिर गए निहत्थे पशु की तरह वह निरुपाय शिशु उस घेर को तोड़ने में अपने आप को सर्वथा असमर्थ पा रहा था। उसके पास कोई विकल्प नहीं था, सिवा कट जाने के।

‘ ऐसे समय में बाल-मनोविज्ञान क्या कहता है?‘-सिस्टर ने अपने मनोविज्ञान के ज्ञान को खंगालने की कोशिश की जिसमें उन्हें जरा भी वक्त नहीं लगा- ‘ बच्चे को यह एहसास दिलाना चाहिए कि उसने एक गलत काम किया है ; ताकि वह दुबारा इसे करने से बचे।‘

“ व्हाट हैव यू डन डर्टी ब्वाय?“ सिस्टर ने अपने ‘मनोविज्ञान ज्ञान‘ के आधार अपनी आवाज में भरपूर हिकारत भरकर बच्चे को झिड़का और एक कठोर दृष्टि टीचर पर डाली। प्रत्युत्तर में टीचर सकपकाई। इसके अतिरिक्त और कर भी क्या सकती थी? हां ! उसका ऴश चलता तो इस वक्त इस  गंदे बच्चे  की भरपूर धुलाई जरूर कर डालती। बच्चा टांगें खींचकर वधस्थल पर रख दिए गए मेमने की तरह बेबस और बेचैन था।

अब सिस्टर उस हत्यारी भीड़ का एक हिस्सा हो चुकी थी। एक दक्ष सेनापति की भांति कमान संभालते हुए सिस्टर ने क्लासरूम में दूर-दूर तक छितराए तमाम बच्चों को इशारे से अपने आस-पास समेटा और उपहास के स्वर में निर्देश जारी किया-“ सभी मेरे साथ गाएंगे-शेम! शेम! ऋतज शेम!...डर्टी ब्वाय ऋतज शेमऩ! . ! “

क्षण मात्र में कक्षा में कोरस गूंज उठा-“ शेम!  शेम! ... “


भीड़ की गोलबंद नजरों की सामूहिक घृणा का पात्र हो उठे उस बच्चे की स्थिति इस वक्त गू में रेंग रहे कीड़े जितनी घृणास्पद और दयनीय थी, जिसे बच्चे ने स्वयं भी अनुभव किया। उस निरुपाय बच्चे को अंतिम सहारे के तौर पर इस वक्त बेतहाश अपनी अम्मा याद आई, जो उस वक्त वहां नहीं थी। ‘ धरती फटे और मैं उसमें समा जाऊँ‘ –यदि वह नन्हा बच्चा इस वक्त यह बड़ी बात सोच पाता तो जरूर सोचता, किंतु तत्क्षण उसने यही सोचा-‘अब कल से स्कूल मैं कभी नहीं आऊंगा, कभी नहीं...कब्भी नहीं! ‘

बच्चे से बेखबर, बच्चे की खबर लेता कोरस जारी था- ‘ शेम ! शेम!... ‘