वो ज़माना गया जब अध्यापकों को सौंप दिया जाता था बच्चों को और कहा जाता था- ‘‘गुरूजी, इन बच्चों के लिए आप कुम्हार हैं जैसा चाहें जिस आकार में चाहें इन्हें ढाल दें बड़ी कृपा होगी चाहे इसके लिए करनी हो कान-खिंचाई या ठुकाई कोई हरज नहीं!’’
वो ज़माना गया जब अध्यापक अपनी वेशभूषा और चाल-ढाल में लोगों के लिए एक मिसाल हुआ करते थे
वो ज़माना गया जब अध्यापन था धर्म नहीं था पेशा या व्यवसाय!
वो ज़माना गया जब अध्यापक को अनायास सामने देख मारे डर के बंध जाती थी घिग्घी झुक जाती थीं आंखें या बच निकलने के रास्ता तलाशते थे छात्र
वो ज़माना गया जब अध्यापक अपने कम वेतनमान से नहीं रहते थे खिन्न बल्कि उतना ही पैर पसारते थे जितनी लम्बी होती थी चादर और दिखा करते थे परम-संतोषी, परम-उदार इतना जैसे हों किसी सल्तनत के सुल्तान!
वो ज़माना गया जब छात्र अध्यापकों का रूतबा देख स्वयं भी बनना चाहते थे अध्यापक
आज अध्यापक डरते हैं छात्रों से अभिभावकों से शाला-प्रबंधकों से उन्हें रहती है चिन्ता बच्चों के अच्छे रिजल्ट की बच्चे कैसे भी करें अंक अर्जित इससे उन्हे नहीं मतलब होता
आज अध्यापक करते हैं संघर्ष वेतन-वृद्धि और अन्य सुविधाओं के लिए आज अध्यापकों की नज़र रहती अभिभावकों की जेब पर
शायद इसीलिए आज नहीं सोचता कोई छात्र बनना एक अध्यापक...
पिता
तुम बुड्ढे हो गए पिता अब तुम्हें मान लेना चाहिए
तुम बुड्ढे हो गए पिता कि तुम्हारा इस रंगमंच में बचा बहुत थोड़ा सा रोल ज़रूरी नहीं कि फिल्म पूरी होने तक तुम्हारे हिस्से की रील जोड़ी ही जाए
इसलिए क्यों इतनी तेज़ी दिखाते हो चलो बैठो एक तरफ बच्चों को करने दो काम-धाम...
तुम बुड्ढे हो गए पिता अब कहां चलेगी तुम्हारी खामखां हुक्म देते फिरते हो जबकि तुम्हारे पास कोई फटकता भी नहीं चाहता
तुम बुड्ढे हो गए पिता रिटायर हो चुके नौकरी से अब तुम्हें ले लेना चाहिए रिटायरमेंट सक्रिय जीवन से भी... तुम्हें अब करना चाहिए सत्संग, भजन-पूजन गली-मुहल्ले के बुड्ढों के संग निकालते रहना चाहिए बुढ़भस
तुम बुड्ढे हो गए पिता भूल जाओ वे दिन जब तुम्हारी मौजूदगी में कांपते थे बच्चे और अम्मा डरते थे जाने किस बात नाराज़ हो जाएं देवता जाने कब बरस पड़े तुम्हारी दहशत के बादल...
तुम बुड्ढे हो गए पिता अब क्यों खोजते हो साफ धुले कपड़े कपड़ों पर क्रीज़ कौन करेगा ये सब तुम्हारे लिए किसके पास है फालतू समय इतना कि तुमसे गप्प करे सुने तुम्हारी लनतरानियां तुम इतना जो सोचो-फ़िक्र करते हो इसीलिए तो बढ़ा रहता है तुम्हारा ब्लड-प्रेशर... अस्थमा का बढ़ता असर सायटिका का दर्द सुन्न होते हाथ-पैर मोतियाबिंद आंखें लेकर अब तुमसे कुछ नहीं हो सकता पिता तुम्हें अब आराम करना चाहिए सिर्फ आरा....म!
अम्मा
अच्छा हुआ अम्मा तुमने ली आंखें मूंद वरना बुजुर्गों के प्रति बढ़ती लापरवाही से तुम्हें कितनी तकलीफ़ होती
अच्छा हुआ अम्मा तुमने आंखें मूंद लीं वरना बीवी के गुलाम और बाल-बच्चों में मगन अपने बेटों का हश्र देख तुम बहुत दुखी होतीं
अच्छा हुआ अम्मा तुमने ली आंखें मूंद धर्म-ग्रंथों में छपे शब्द अब कोई नहीं बांचता कि मां के पैरों के नीचे होती है जन्नत कि जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है
अच्छा हुआ अम्मा तुमने ली आंखें मूंद वरना तुम्हें अक्सर सोना पड़ता भूखे पेट क्योंकि सुन्न हुए हाथों से तुम बना नहीं पाती रोटियां या घड़ी-घड़ी चाय
अच्छा हुआ अम्मा तुमने ली आंखें मूंद वरना बुजुर्गों की देखभाल के लिए सरकारों को बनाना पड़ रहा कानून कि उनकी एक शिकायत पर बच्चों को हो सकती है जेल क्या तुम बच्चों की लापरवाहियों की शिकायत थाना-कचहरी में करतीं अम्मा? नहीं न! अच्छा हुआ अम्मा तुमने ली आंखें मूंद...