आज का दौर तरह-तरह के तनाव को जन्म देने वाला है , घर-परिवार, कार्यालय, सामाजिक परिवेश का वातावरण निरन्तर जटिल एवं तनावपूर्ण होता जा रहा है ,इसका सबसे पहले शिकार बनते हैं निरीह बच्चे ।घर हो या स्कूल , बच्चे, समझ ही नहीं पाते कि आखिरकार उन्हें माता-पिता या शिक्षकों के मानसिक तनाव का दण्ड क्यों भुगतना पड़ता है। घर में अपने पति /पत्नी या बच्चों से परेशान शिक्षक छात्रों पर गुस्सा निकालकर पूरे वातावरण को असहज एवं दूषित कर देते हैं। विद्यालय से लौटकर घर जाने पर फिर घर को भी नरक में तब्दील करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते ।यह प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण बच्चों के मन पर गहरा घाव छोड़ जाता है । कोरे ज्ञान की तलवार बच्चों को काट सकती है ,उन्हें संवेदनशील इंसान नहीं बना सकती है ।शिक्षक की नौकरी किसी जुझारू पुलिसवाले की नौकरी नहीं है,जिसे डाकू या चोरों से दो-चार होना पड़ता है ।शिक्षक का व्यवसाय बहुत ज़िम्मेदार, संवेदनशील ,सहज जीवन जीने वाले व्यक्ति का कार्य है ; मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति का कार्य- क्षेत्र नहीं है । आज नहीं तो कल ऐसे दायित्वहीन,असंवेदनशील लोगों को इस क्षेत्र से हटना पड़ेगा या हटाना पड़ेगा।प्रशासन को भीयह देखना होगा कि कहीं इस तनाव के निर्माण में उसकी कोई भूमिका तो नहीं है ?बच्चों पर बढ़ता निरन्तर पढ़ाई का दबाव ,अच्छा परीक्षा-परिणाम देने की गलाकाट प्रतियोगिता कहीं उनका बचपन ,उनका सहज जीवन तो नहीं छीन ले रही है ?घर,विद्यालय ,कोचिंग सैण्टर सब मिलकर एक दमघोंटू वातावरण का सर्जन कर रहे हैं । बच्चे मशीन नहीं हैं ।बच्चे चिड़ियों की तरह चहकना क्यों भूल गए हैं? खुलकर खिलखिलाना क्यों छोड़ चुके हैं ?माता-पिता या शिक्षकों से क्यों दूर होते जा रहे हैं ? उनसे अपने मन की बात क्यों नही कहते ? यह दूरी निरन्तर क्यों बढ़ती जा रही है ?अपनापन बेगानेपन में क्यों बदलता जा रहा है? यह यक्ष –प्रश्न हम सबके सामने खड़ा है। हमें इसका उत्तर तुरन्त खोजना है ।मानसिक सुरक्षा का अभाव नन्हें-मुन्नों के अनेक कष्टों एवं उपेक्षा का कारण बनता जा रहा है ।क्रूर और मानसिक रोगियों के लिए शिक्षा का क्षेत्र नहीं है ।जिनके पास हज़ारों माओं का हृदय नहीं है ,वे शिक्षा के क्षेत्र को केवल दूषित कर सकते हैं ,बच्चों को प्रताड़ित करके उनके मन में शिक्षा के प्रति केवल अरुचि ही पैदा कर सकते हैं।हम सब मिलकर इसका सकारात्मक समाधान खोजने के लिए तैयार हो जाएँ ।
अभिभावकों के पास सबके लिए समय है ,घण्टों विवाद के लिए समय है ,विश्व की राजनीति पर बहस करने के लिए समय है;अगर समय नहीं है तो सिर्फ़ बच्चों के लिए ।उन बच्चों के लिए ;जो उनका वर्तमान तो हैं ही साथ ही उनका भविष्य भी हैं ।बच्चों से आत्मीयता से बात करें तो उनके मन का एक पूरा संसार अपने व्यापक रूप के साथ ‘खुल जा सिम-सिम’ की तरह खुल जाएगा ।अभिभावकों को लगेगा कि उनके छोटे-से घर में एक अबूझ संसार विद्यमान है ।
अध्यापक किताबें पढ़ते–पढ़ाते हैं । कभी बच्चों का चेहरा पढ़ें ,मन पढें तो पता चलेगा कि अभी बहुत कुछ पढ़ना बाकी है ।पढ़ाने की तो बात ही छोड़िए। अगर पढ़ने वाला तैयार न हो तो कोई भी तुरर्म खाँ कुछ नहीं पढ़ा सकेगा ।यदि पढ़ने वाला तैयार है तो कम से कम समय में उसे पढ़ाया जा सकता है ।विद्यालय अच्छा परीक्षा-परिणाम दे सकते हैं ,क्या वे विद्यालय बच्चों के चेहरे पर मधुर मुस्कान बिखेर सकते हैं ? यदि नहीं तो उनका वह परीक्षा-परिणाम किसी मतलब का नहीं।मशीनीकरण के इस युग में शिक्षा का भी मशीनीकरण हो गया है ।बच्चे को क्या पढ़ना है ,इसका निर्धारण वे करते हैं ;जिनको छोटे बच्चों के शिक्षण एवं उनके मनोविज्ञान का व्यावहारिक अनुभव नहीं है ।
जिनका जीवन बच्चों के निकटतम सान्निध्य में बीता है ,वे ही बच्चों के लिए रोचक, तनाव रहित शिक्षा का सूत्रपात कर सकते हैं । देर –सवेर यह करना ही पड़ेगा ।इसी में नन्हें –मुन्नों का तनावरहित भविष्य निहित है।