सुना तो था यही कि लोग जिसको मौत कहते हैं वो पैदा होने के कुछ दिन या कि कुछ अर्सा गुजर जाने पै आती हैं। मगर बरअक्स इसके एक कविता को यहां तो लील डाला मौत ने मौत पहली पहली सांस ले लेने से पहले ही या कि उसने कोख में ही खुदकशी कर ली थी शायद,जैसे उसको हो गया हो इल्म कि तखलीख उसकी नाम औ रोटी कमाने के लिये थी। जो भी हो मुर्दा ही तो पैदा हुई थी वो कौन जाने दर्द उसका जो न जाने कितनी आहों सिसकियों का दर्द कह देती जुबानी शब्द जो कि देने आये थे बधाई जन्म दिन पे ताकते ही जा रहे थे मूक पथराई निगाहों से । घोर सदमा था उन्हें और क्यों भला सदमा ना होता ,अपने घर में मौत हो जाये किसी की लाश आंगन में पड़ी हो शोक और स्यापा नहीं हो तो ? जैसे वो जन्मी न जन्मी मर गयी जन्म ले लेने से पहले ही अन्तत: ये शब्द ही मैयत कविता की उठाकर चल पड़े थे बेकफन ही दफ्न करने को बिचारे थरथराहट उनके होठों पर सुपुर्दे खाक करते वक्त देखी थी सभी ने फातेहा वो पढ़ रहे थे शर्तिया लेकिन अज़ब थी ये पहेली था वो कविता के लिए या फिर कवि के वास्ते कौन जाने ??
पुरुषोत्तम विश्वकर्मा
प्यार के धागे से...
प्यार के धागे से दिल के जख्म सीकर देखना जी सको तो जिंदगी को यूं भी जीकर देखना
लेखनी तेरी रहेगी तू रहे या ना रहे खुद को मीरा, सूर, तुलसी, जायसी कर देखना
जब सताए खूब तपती दोपहर जो जेठ की घोलकर सत्तू चने का आप पीकर देखना
लौट जायेंगी बलायें चूमकर दर को तिरे हौसलों की मन में चट्टानें खड़ी कर देखना
रोशनी घर में तुम्हारे खुद ब खुद हो जाएगी तुम घरों में दूसरों के रोशनी कर देखना
रास्ते में फिर सताएंगी नहीं तनहाइयां दर्दे-दिल से तुम सफ़र में दोसती कर देखना
-रविकांत पाण्डेय
वो एक अच्छी सी लड़की
वो एक अच्छी सी लड़की, भला सा था नाम लोग कहते हैं उसे यूं नहीं होना था बदनाम
रिवाज़ों को चाहिए ही था बार-बार ‘गंगा-स्नान’ ध्रुविय बर्फ़ बनी लड़की- पिघलती ही नहीं..... पानी बनती ही नहीं फिर कैसे हो पांडित्य भरा धार्मिक नाम ओ ”गंगोत्री“...... बोलो तो, कैसे हो तुझमें पुण्य के लिए स्नान और महान कन्यादान, बोलो तो..... कैसे हो उस लड़की का कल्याण?
युगों-युगों से पाथियों की मालाऐं ‘मंगल-सूत्रा’ के मनकों में, नकेल सी दिए डाल फिर भी नहीं बुझी आदिम समाज की- हरकारे शिकारियों की सी प्यास,
सील-बंद लिफाफे सा जहाँ लिखा जाता हो- नारी का भाग्य.... मार सर पर लाल-पत्थर या मुहर रिवाज़ों की बली पे फिर कोई छोड़ा गया हो जैसे- असंख्य मुनादी-सांड...., या काले बुरके में घेर लाई गई हो असंख्य मोटी भेड़ें बार-बार... लगातार हॉ थी वो, एक अच्छी सी लड़की, था भला सा नाम ये सच है कि लोग कहते हैं- ”उसे यूं नहीं होना था बदनाम।“
-मंजू मल्लिक मनु
एक बच्चे की हंसी
खो गई है एक बच्चे की हँसी यहीं कहीं इस भीड़ में। कलियों से होंठों पर जड़ दी गई हज़ारों कीलें कँटीले विज्ञापनों की - जिनमें प्रतिनायक के टेढ़े-मेढ़े चेहरे हैं और हैं उधार ली गई आवाज़ें मकड़जाल में लिपटीं - बेहुदी आकृतियाँ खोखली हँसी आपाधापी मचाती दृष्टिहीन भगदड़ - इसी में चिथ गए हैं अंकुर - से नन्हें पाँव। बुझ गई है दृष्टि गले में फँसकर रह गई है चीख यहीं इसी अंधी भीड़ में गुम हो गई एक बच्चे की दूधिया हँसी हो सके तो ढूँढकर ला दीजिए।
-रामेश्वर कम्बोज हिमांशु
इक्कसवीं सदी बनाम ‘डॉट कॉम’
खोज कहॉ तक की जाए.......? खोज....... खोई हुई सदी की, खोज....... निर्वासित मानवीय प्रेम की- खोज ये भी है कि... किस द्वारे अब जाऊं ”प्रभु“ अब खोई है पनघट की रानी, सोये हैं पत्ते सारे जुगनूओं के पंख तले जलबुझ रही दिशाएं-तारें चलते-चलते मोरे पग हारे किस द्वारे अब जाऊं ”प्रभु“ अब
जलडमरूमध्य सरीखे कई हरे भरे जंगलों के लुप्त होने के बाद महानगरों के फ्लाईओवर से मेट्रो तक गोल-गोल- घूमती लड़की कहती है- किस द्वारे अब जाऊं ”प्रभु“ अब खोई है पनघट की रानी, सोये हैं पत्ते सारे जुगनूओं के पंख तले जलबुझ रही दिशाएं-तारें चलते-चलते मोरे पग हारे किस द्वारे अब जाऊं ”प्रभु“ अब खोई है पनघट की रानी, सोये हैं पत्ते सारे
कोई डाक, कोई ई-मेल किसी ‘की-बोर्ड’ के डेटॉज के सिक्रेट-फाईल सदृश लॉक है निरंतर ‘पासवर्ड-कोड’ ढूँढ़ती हूं अनेक मेगावॉट बटा तुम्हारे किसी रेडियो फ्रिक्वेंसी का किसी उपग्रह के क्षैतिज डिग्री अक्षांशों पर ध्वनि लहरों की हलचल सुनता मेरा मस्तिष्क जैसे कई ‘प्रकाश-वर्षों’ का खानाबदोश पथिक है ”ईश्वर“
कम्प्यूटरी-ग्राफिक्स सी जलती बूझती सारी आकाश गंगाए किसी भटके एस्ट्रोनॉट की भांति विशाल तारे लीलता ‘ब्लैक-होल’ के भीतर, खींचता चला जाता है मुझे अंतरिक्षिय-सूट की भांति उतारती हूं- अपने पैरों के फफोले जख्मों की खुरचन... निर्वासित भाव अंश महसूसता है मन नसों में फटती अंतरिक्षिय-दाव ऊष्मा की
वहीं धरा पर कहीं वर्तमान सदी ने ईजाद कर डाला है एक नया डॉट-कॉम... ‘भक्ति’ की, इक्किसवीं सदी का एक नया फलसफा नये ‘हार्ड-डिस्क’ में बंद कर कोई आसान कर रहा है- भविष्य के बच्चों के लिए निर्वासित मानवीय प्रेम की खोई हुई सदी शायद किसी साईबर-कैफे में, किसी डॉट-कॉम के जरिए खोज निकाले इन्टरनेट के माया जाल से खोई हुई एक मात्रा सत्य और प्रेम की मानवीय आकाशगंगाए ‘इक्किसवीं सदी बनाम डॉट-कॉम’ हॉ, शायद इन्टरनेट ही खोज निकाले?