अब हम पर अपना राज्य कायम करने के लिए किसी सिकंदर को युद्ध करने की जरूरत नहीं हमने खुद आगे बढ़कर, घुटनों के बल आत्म-समर्पण कर दिया है दुनिया के सबसे शक्तिशाली समाज के सामने अपनी मातृभाषा को दफना दिया है, बुजुर्ग पीढ़ी की बगल में एक गहरी कब्र खोदकर।
अब हमारी दो दर्जन मातृ भाषाओं में सिर्फ शालीन शिलालेख लिखे जाएंगे, श्मशान घाटों पर। अब हमारी मातृभाषाएँ, नई पीढ़ी के पढ़े-लिखे लोग नहीं बोलेंगे वे या तो, अनपढ़ों की भाषाएँ रहेगीं, उनके पढ़े-लिखे होने तक या रेगिस्तानी गरम हवाओं की तरह प्रेत बनकर घूमेंगीइतिहास की गलियों में और देववाणी की तरह यदा-कदा पूजी जाएँगी धार्मिक, सांस्कृतिक और सरकारी समारोहों आयोजनों आदि में।
अब सोलह आने सही लगती है जॉन स्टूअर्ट मिल की उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यांतर की वह अवधारणा कि सांस्कृतिक रूप से हम भारतीय, नहीं हैं लोकतंत्र के लायक़ लोकतंत्र के लायक़ होने के लिए हमें उबरना ही होगा, मैकाले की क्लर्क पैदा करने वाली भ्रामक शिक्षा प्रणाली से लोकतंत्र के लायक़ होने के लिए हमें याद करना होगा, आज़ाद होने के बाद दिया गया गांधी का वह वक्तव्य कि बता दो दुनिया को, गांधी अँग्रेज़ी भूल गया है, बता दो दुनिया को, गांधी अब हिंदी या गुजराती में ही बोलेगा...लिखेगा।
कैसी विडंबना है हमारे समय की कोई बाहर से नहीं तोड़-फोड़ रहा हमारी मातृभाषा का आत्म-सम्मान हमने खुद ही घर से निकालकर , सर्वेंट-क्वाटर्स में बिठा दिया है अपनी संस्कारी मातृभाषाओं को। मुख्य घर में वर्जित है उनका प्रवेश बड़े स्कूलों में उनके घुसने पर कड़ा प्रतिबंध है हमें नफ़रत है उनके चेहरों से, उनके आसपास फटकने से भी होने लगती है, बेचैनी हमें, हम नहीं चाहते कि उनका साया भी पड़े अंग्रेजी के क्रिसमस ट्री की छाँव में पलते, हमारे नौनिहालों के दिलो-दिमाग पर।
-आर. के. पालीवाल
हिन्दी
भाषा तुम मां हो, शिशु हैं जिज्ञासाएं, तुम्हारे अस्वस्ति बोध से, भूखी जिज्ञासाएं दम तोड़ती रहेंगी।
उंची होती रहेंगी इमारतें, लंबी होती जाएंगी परछाइयां, एक दिन सूरज की जड़ें काट देंगी।
सुतलियों में बंधी हिन्दी की अनपढ़ी किताबें कार्यालय के किसी कोने में धूल खाती रहेंगी।
हम राजभाषा नीति की पोथियां छापते रहेंगे। खोजते रहेंगे उपयुक्त पदों के लिए उचित अधिकारी।
कुरसियां भरी होंगी, पर पद रिक्त रहेंगे, एक दिन निरस्त हो जाएंगे।
हम जो प्रवीण हैं, अंग्रेज़ी प्रमाण-पत्रों से अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने में व्यस्त हो जाएंगे।
लोग शायद हम पर हंसेंगे, कि हम हिंदी में हंसते हैं।
-मधुप मोहता
मैं, हिन्दी !
अच्छा नही लगता जब अपने ही घर में हाशिए पर रखकर मुझे चिंतित होते हो तुम मेरे भविष्य के बारे में विचार विमर्श करते हो मेरे उत्थान और पतन पर जलती बुझती चिनगारियों सा तुम्हारा यह उत्साह मन के अँगार को कुछ और हवा दे जाता है।
जैसे जीती आई हूँ वैसे ही जी लूँगी मैं आगे भी आंसुओं की स्याही में डूबी तो किलकारियों में अनुगुंजित कहीं तुम्हारे आस पास ही यादों की धरोहर बनी अपने प्रेमियों के ह्मदय में जिह्वा पर. कलम से ... प्रेरणा का अदम्य स्त्रोत बनी बहती ही रहूँगी गंगा-सीं भूलो मत, मुझसे ही है तुम्हारी यह संस्कृति आचार संहिता वांगमय तुम्हारा गौरवमय अतीत मेरे सहारे है पहचान तुम्हारी तुम्हारे सहारे जिन्दा मैं नहीं।...
-शैल अग्रवाल
हिन्दी महिमा
हिन्दी मे गुण बहुत है, सम्यक देती अर्थ। भाव प्रवण अति शुद्ध यह, संस्कृति सहित समर्थ।।
वैयाकरणिक रूप में, जानी गयी है सिद्ध। जिसका व्यापक कोश है, है सर्वज्ञ प्रसिद्ध।।
निज भाषा के ज्ञान से, भाव भरे मन मोद। एका लाये राष्ट्र में, दे बहु मन आमोद।।
बिन हिन्दी के ज्ञान से, लगें लोग अल्पज्ञ। भाव व्यक्त नहि कर सकें, लगे नही मर्मज्ञ।।
शाखा हिन्दी की महत्, व्यापक रूचिर महान। हिन्दी भाषा जन दिखें, सबका सबल सुजान।।
हिन्दी संस्कृति रक्षिणी, जिसमे बहु विज्ञान। जन-जन गण मन की बनी, सदियों से है प्राण।।
हिन्दी के प्रति राखिये, सदा ही मन में मोह। त्यागे परभाषा सभी, मन से करें विछोह।।
निज भाषा निज धर्म पर, अर्पित मन का सार। हर जन भाषा का करे, सम्यक सबल प्रसार।।
देश प्रेम अनुरक्ति का, हिन्दी सबल आधार। हिन्दी तन मन में बसे, आओ करें प्रचार।।
हिन्दी हिन्दी सब जपैं, हिन्दी मय आकाश। हिन्दी ही नाशक तिमिर, करती दिव्य प्रकाश।।
हिन्दी ने हमको दिया, स्वतंत्रता का दान। हिन्दी साधक बन गये, अद्भुत दिव्य प्रकाश।।
नही मिटा सकता कोई, हिन्दी का साम्राज्य। सुखी समृद्धिरत रहें, हिन्दी भाषी राज्य।।
हिन्दी में ही सब करें, नित प्रति अपने कर्म। हिन्दी हिन्दुस्थान हित, जानेंगे यह मर्म।।
ज्ञान भले लें और भी, पर हिन्दी हो मूल। हिन्दी से ही मिटेगी, दुविधाओं का शूल।।
हिन्दी में ही लिखी है, सुखद शुभद बहु नीति। सत्य सिद्ध संकल्प की, होती है परतीति।।
-डॉ.महेन्द्र प्रताप पाण्डे ' नन्द '
हिन्दी
खुसरो के हृदय का उद्गार है हिन्दी । कबीर के दोहों का संसार है हिन्दी ।।
मीरा के मन की पीर बन गूँजती घर-घर । सूर के सागर - सा विस्तार है हिन्दी ।।
जन-जन के मानस में, बस गई जो गहरे तक । तुलसी के 'मानस' का विस्तार है हिन्दी ।।
दादू और रैदास ने गाया है झूमकर । छू गई है मन के सभी तार है हिन्दी ।।
'सत्यार्थप्रकाश' बन अँधेरा मिटा दिया । टंकारा के दयानन्द की टंकार है हिन्दी ।।
गाँधी की वाणी बन भारत जगा दिया । आज़ादी के गीतों की ललकार है हिन्दी ।।
'कामायनी' का 'उर्वशी’ का रूप है इसमें । 'आँसू’ की करुण, सहज जलधार है हिन्दी ।।
प्रसाद ने हिमाद्रि से ऊँचा उठा दिया। निराला की वीणा वादिनी झंकार है हिन्दी।।
पीड़ित की पीर घुलकर यह 'गोदान' बन गई । भारत का है गौरव, श्रृंगार है हिन्दी ।।
'मधुशाला' की मधुरता है इसमें घुली हुई । दिनकर के 'द्वापर' की हुंकार है हिन्दी ।।
भारत को समझना है तो जानिए इसको । दुनिया भर में पा रही विस्तार है हिन्दी ।।
सबके दिलों को जोड़ने का काम कर रही । देश का स्वाभिमान है, आधार है हिन्दी ।।