हमारे खुद के अनुभवों के आधार पर जो भी मूल्यवान है चाहे वह योग्यता हो , कौशल हो , या फिर अनुभव और आचरण, शिक्षा संचय और संरक्षण की एक नायाब विधा है...संचय और संरक्षण हमारी प्रजाति का , हमारी सोच और संस्कृति का ...हमारे खुद के अनुभवों के आधार पर जो भी मूल्यवान है, उस सबका। फिर वे चाहे मात्र सुखद व दुखद स्मृतियां या मानचित्र ही क्यों नहीं हों , सभी कुछ मानव इसी आस में सदियों से लिपिबद्ध करता आ रहा है। पहले यह प्रक्रिया मुख्यतः मौखिक ही रही होगी और गुर या मंत्र विश्वस्त और योग्य उत्तराधिकारियों के कान में फूँक या कह दिए जाते होंगे। फिर धीरे-धीरे भित्ति चित्रों के साथ संकेतों यानी वर्णों का उद्भव हुआ होगा जो बाद में उस वर्ण विशेष की भाषा बनी या कहलाई होगी। और इस तरह से बढती खोजों और जरूरतों ...ज्ञान और विज्ञान के इसी संचय और संरक्षण प्रवृत्ति के दबाव के तहत ही तो कभी शिक्षा पद्धति का जन्म हुआ होगा । यदि शिक्षा की वाहक और संरक्षक संग्रहणीय और सार गर्भित इन विविध किताबों को मानव संस्कृति का आज डी.एन.ए. कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यही वजह है कि आज भी जब भी कोई आक्रमक किसी देश या उसकी संस्कृति को , उस प्रजाति को खत्म करना चाहता है तो सबसे पहले उसके ग्रन्थ ,पुष्तकालय, और विद्वानों और विचारकों को नष्ट करता है। हाल ही में ईराक और उससे पहले तिब्बत में भी ऐसा ही हुआ और कई लाख मूल्यवान धरोहर पुष्तकें लूटी और जला दी गईं।
शिक्षा का महत्व हम सभी जानते हैं, 'अनपढ़-गंवार' शब्द में कितना असंतोष, कितना सामाजिक तिरस्कार है, किसी से छुपा नहीं, फिर भी अक्सर बस एक बहाव , एक ढांचे में बंधे , कभी मां-बाप की महत्वाकांक्षा पूरी करते, तो कभी खुद अपनी ही आंखों में टिमटिमाते सपनों का पीछा करते, तो कभी बस् यूँ ही बिना किसी लक्ष्य या उद्देश्य के ही जीवन के इस पड़ाव को हम पार कर लेते हैं, बिना ध्यान दिए कि हम क्या पढ़ रहे हैं, किसलिए पढ़ रहे हैं....क्या यह शिक्षा सार्थक है और हमें सक्षम बना पाएगी , हमारी मानसिक व बौद्धिक दरिद्रता दूर कर पाएगी , यह सोचने , थमने का वक्त अक्सर न तो अभिवावक और शिक्षकों के पास ही रहता है, न खुद विद्यार्थी के । आज भी मानव सभ्यता के विकास के हजारों साल बाद भी हमारा शिक्षा के प्रति रवैया उतना जिम्मेदाराना नहीं है जितना कि होना चाहिए। आज भी क्योंकि- ’सभी ऐसा करते हैं, और खाने-पीने व खेलने की तरह यह भी एक आवश्यक प्रक्रिया है और पैदा हुए हैं व आज के इस सभ्य समाज में जीना है तो हमें भी इस प्रक्रिया से (कुछ और आए या न आए, कम-से-कम अंग्रेजी में बातचीत करना तो आना ही चाहिए। मानो आज सभ्य और सुसंस्कृत दिखने की यही पहली शर्त है । कोने-कोने में नित नए खुलते अंग्रेजी बाल शिक्षण प्रतिष्ठान गवाह हैं इसके। ) गुजरना ही होगा। यही सामाजिक प्रचलन है , वरना हेय समझा जाएगा हमें और जीवन की दौड़ में पीछे रहना पड़ेगा। ’ प्रायः कई पढ़े-लिखे अनपढ़ गुजर लेते हैं इस प्रकरण से ।
हो सकता है कि ’इस’ भय में भी कुछ सच्चाई हो , परन्तु क्या हमने कभी सोचा है कि शिक्षा पा कर भी क्यों आज भी हजारों क्या लाखों अशिक्षित और असभ्य चारो तरफ घूम रहे हैं, जिनके मन में न अपनों की गरिमा बची है , न खुद का आत्म गौरव। हो भी कैसे , उन्हें तो बताया ही नहीं गया कभी कि उनकी अपनी संस्कृति क्या है, मानवता क्या है, भाईचारा और संवेदना क्या है? आदमी सबसे अच्छा सीखता और सोचता अपनी मां बोली में ही है, फिर क्यों आज अपने ही देश में और खुद हमारी अपनी ही सोच में इसकी इतनी उपेक्षा है ? क्यों आज हिन्दी अपने ही देश में पिछड़ेपन की निशानी बन चुकी है...गरीब और अनपढ़ों की भाषा है। शायद इस परिणाम का पूर्वाभाष गांधी जी को हो गया था तभी तो उन्होंने भारत के स्वतंत्र होते ही कहा था कि दुनिया से कह दो कि गांधी अंग्रेजी भूल गया है। आज अपने देश में मातृभाषा का उपेक्षा का ही यह नतीजा है कि न तो प्रगतिशील समाज और विश्व की लड़ी के सुगढ़ मनके हम बन पाते हैं , और ना ही धुरी या पुली...। धुरी या पुली तो दूर की बात है हम तो जुड़ना तक नहीं जानते। और अनजाने ढेरों में व्यर्थ हो जाते हैं। हमें सोचना और जानना ही होगा कि विदेशी भाषा के शिक्षण में बुराई नहीं पर नींव का पत्थर मात्रभाषा का ही होना चाहिए, तभी हमारे आत्मविश्वास की इमारत सुदृढ़ रह पाएगी। जब तक गंगा मात्र एक नदी है, उससे दैवीय चमत्कार की अपेक्षा करना, पतित-तारिणी मानना संभव नहीं। गंगा को समझने के लिए उसके अवतरण की कहानी जानना जरूरी है, भगीरथ की भावनाओं को, उनके तप के महत्व, क्षम और प्रयास को समझना व महसूस करना जरूरी है।
माना हमारा देश प्रथा और परंपराओं में गर्व लेता है और अधिकांश को अंधविश्वास की तरह निभाता भी है। बिना बात की गहराई में जाए , मुद्दों को समझे बगैर मेला तो लगाया जा सकता है परन्तु उनसे जुड़ा नहीं जा सकता...भावात्मक राग-रंग नहीं हो सकता, चाहे वह 14 सितंबर का हिन्दी दिवस हो या फिर 15 अगस्त का स्वाधीनता दिवस।
भाषा के अलावा शिक्षा के संदर्भ में कई अन्य पहलू भी हैं , जिनपर ध्यान देना बेहद जरूरी है। सही और सुगढ़ शिक्षा के महत्व को समझना जरूरी है। आज भी विश्व के हर कोने में अरबों ऐसे हैं (विशेशतः गरीब , या जिन्हें थर्ड वर्ड देश कहा जाता है , उनमें) जो किसी-न-किसी वजह से अशिक्षित ही रह जाते हैं; किसी के पास धन का अभाव है तो कहीं शिक्षा संस्थान का। कहीं विषय या शिक्षा सुविधा की कमी है, तो कभी-कभी जीविका और पारिवारिक विषमताएँ और कठिनाइयाँ ही आड़े आ जाती हैं। अमीर देशों में तो रुचि की कमी ही मुख्य कारण है अशिक्षा और ट्रूयेंसी का, परन्तु यहां तो पेट की भूख में ही शिक्षा और बचपन सब झुँक जाते हैं। बिना जाने समझे कि यह जीवन के प्रभात में बस्ता लगाने वाला वक्त वह वक्त है जो न सिर्फ हमें जीवन के मूल्यों , तौर-तरीकों, सौंदर्य और कुरूपता आदि से परिचित कराता है। चयन करना भी सिखलाता है। विवेक दे सकता है कि हम भले-बुरे का भेद समझें, साथ में जीने के लिए ऐसी कोई विलक्षण योग्यता भी जो हमें जीवोपार्जन और सुख दे सके। और बचपन मजदूरी करने के लिए, जीवकोपार्जन के लिए भटकने को मजबूर न होने पाएँ ।
अब अगला सवाल उठता है कि शिक्षा कैसी हो-व्यक्ति की रुचि के अनुसार , उसकी अपनी भूख और जरूरत माफ़िक, वैयक्तिक रुझान और योग्यता के अनुरूप या फिर समाज के नियम और जरूरतों को ध्यान में रखकर वक्त और समाज की मांगें पूरी करने वाली। विद्यार्थी को सफल जीवन और मोटी धनराशि, समस्त सुख-सुविधा देने वाली या फिर आत्म प्रकाश से संस्कृत व परिष्कृत करने वाली। ये चन्द सवाल बारबार ही पूछे जाते हैं और बारबार ही इनके उत्तर आपस में उलझकर गडमड हो जाते हैं। न तो भूखे का पेट चाट से भरा जा सकता है और ना ही भरे पेट के साथ मौज-तफरीह के लिए निकले व्यक्ति के आगे छप्पन भोग से सजी थाली का ही कोई अर्थ होता है। जाहिर है अगर व्यक्तिगत् रुचि के अनुकूल शिक्षा होगी तो ग्राह्यता भी अधिक होगी। चीजें आसानी से समझ में आएंगी , मेहनत, मेहनत नहीं लगेगी और आदमी अपनी ग्राह्यता के अनुरूप विषय को सोखता अपनी क्षमता और प्रतिभा की पराकाष्ठा पर पहुंचेगा। परन्तु एक सुचारु समाज को चलाने के लिए हर तरह के प्रशिक्षित व्यक्तियों की जरूरत पड़ती है-कुछ सैनिक या रक्षक-न्यायाधीश , पुलिस आदि। कुछ डाक्टर, इंजीनियर, पादरी , शिक्षक, तो कुछ मैदान में काम करने वाले , कुछ सफाई करने वाले आदि-आदि। तो फिर कुछ ऐसे अभागे अवश्य होंगे जिन्हें अपनी रुचि के नुरूप व्यवसाय की जिन्दगी या परिस्थितियां नुमति न दें। कहीं बाह्य कारण जैसे आर्थिक और सामाजिक हो सकते हैं। प्रशिक्षण का अभाव हो सकता है। आर्थिक अक्षमता या फिर योग्यता की कमी भी हो सकती है और कहीं-कहीं तो योग्यता और प्रशिक्षण सब होने के बावजूद अवसर की कमी भी व्यक्ति को आगे बढ़ने से रोक सकती है। यह भी स्पष्ट है कि रुचि हो या न हो अधिकांशतः व्यक्ति का बस चले तो वही काम वह करना चाहेगा जिसमें इज्जत, पैसा, सुविधा सभी कुछ हो और कम-से-कम मेहनत हो। कम-से-कम आमदनी तो जरूरतों के अनुसार पूरी हो ही। कुछ काम सब करना चाहेंगे, क्योंकि उनमें मेहनत कम है या आमदनी ज्यादा है , या इज्जत ज्यादा है। फिर सही और सुचारु बटवारा कैसे हो। क्या कार्ल मार्क्स का कम्यूनिस्म इसका एक जवाब है जहाँ अमीर गरीब का फर्क ही नहीं रह जाता। कुछ भी काम करो पैसे बराबर हों सबके लिए। पर अगर ऐसा हुआ तो फिर मेहनत और वक्त प्रमुख मुद्दा बन जाएगा। अधिक श्रम और अधिक वक्त लेने वाले कामों से लोग कतराने लगेंगे और एक नए तरह के आलसी समाज का जन्म हो जाएगा। जहाँ योग्यता का वाकई में कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा। वेतन और समाज में स्थान भी तो असलियत में एक प्रोत्साहन, एक पुरष्कार ही है। पर इस जोड़-तोड़ की सामाजिक व्यवस्था में जहाँ सबकुछ पैसे और ताकत के बल पर खरीदा और हासिल किया जा सकता है –क्या इन बातों का कोई अर्थ है? कैसे छांटा जाए कि किस बच्चे के लिए क्या पढ़ना उचित है ? अगला सवाल उटता है कि शिक्षा का उद्देश्य क्या हैः मात्र जीविकोपार्जन या फिर मानव समाज और राष्ट्र के लिए बेहतर इन्सान पैदा करना?...आखिर समाज ही तो हमें सबकुछ देता है...जन्मदेनेवाले मां-बाप की तरह ही भरण-पोषण करने वाले समाज के प्रति भी तो हमारी वैयक्तिक जिम्मेदारी ...कृतज्ञता बनती है !
तो बात फिर नैतिकता और चरित्र उत्थान की तरफ स्वतः ही मुड़ जाती है। गरीब के बच्चे पढ़ सकें इसके लिए टौल्सटॉय और चाणक्य से लेकर अम्बेदकर, दयानन्द सरस्वती आदि ने बहुत कुछ किया । कबीर तो यहां तक कह गए कि पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित हुआ न कोय , ढाई आखर प्रेम का पढ़े तो पंडित होय । यहां प्रेम का वास्तविक अर्थ पारस्परिक संवेदना और सहानुभूति , सामाजिक चेतना व कर्तव्य बोध से भी लिया जा सकता है। वैसे भी अगर प्रेमभाव हो तो यह सब चीजें खुद ही आ मिलती हैं व्यवहार में। गांधी जी ने भी समाज को किताबों से हटाकर एक संपूर्ण शिक्षा की तरफ खींचना चाहा था। जहां व्यक्ति का सर्वांगणीय विकास हो सके। मन, मष्तिष्क और हाथ-पैर मिलजुलकर सहयोग के साथ काम कर पाएँ। जबकि टैगोर ,विवेकानन्द और महर्षि अरविंद जैसे विचारकों ने ज्ञान और व्यक्ति की आत्मतृप्ति या स्वविकास पर अधिक जोर दिया था। शिक्षा हमें शिक्षित ही नहीं, परिष्कृत भी करती है, बताया। सुसंस्कृत बनाती है, बताया।
विषय गागर में सागर भरने जैसा गहन और अपरिमित है। हां इतना अवश्य है कि किसी भी अन्य चीज की तरह शिक्षा भी एक निरंतर प्रक्रिया है। जो जीवन में लगातार चलती रहती है। हर दिन, हर पल हमें कुछ नया सिखाता है। हर गुजरा दिन थोड़ा और परिपक्व , थोड़ा और बुद्धिमान कर जाता है। हम मानें या न मानें, उस अनुभव को जीवन में उतारें या न उतारें। उस सीख को गांठ बांधकर सिराहने रखें न रखें यह भी तो हमपर खुद ही निर्भर है। विकास तभी संभव है जब सर्वागणीय हो ..उसमें कितनी भौतिकता, कितनी आध्यात्मिकता व आर्थिक व सांस्कृतिक पहलू और सामाजिकता की मिलावट की जाए यह व्यक्ति, परिस्थिति और समाज पर निर्भर करता है और इसी क्रम में।
....हां, चलते-चलते दो बचपन में सुनी-पढ़ी कहानियां अवश्य याद आ रही हैं जो इस सारी व्यवस्था में आज भी शिक्षक के सही महत्व को सही तरह से और ठीक ठीक उजागर करती हैं। एकलव्य की कहानी हम सभी की सुनी जानी है इसलिए उस स्वशिक्षित और अंत में भावुकता और कर्तव्यबोध से अपाहिज किए गए, उस वीर बालक की कहानी नहीं दोहराऊंगी क्योंकि वह कहानी बेहद क्षुब्ध करती है मुझे। पर दूसरी अवश्य सुनाऊंगी शायद आपकी भी वक्त -बेवक्त सहारा बन पाए यह कहानी।
कहानी इस प्रकार है कि –गुरुकुल का सबसे होनहार, सबसे बुद्धिमान छात्र हर साल दीक्षित होने से रह जाता था। जैसे ही वह दीक्षा लेने के लिए निकलता , रास्ते में पड़ते एक मकान की छत से उसके ऊपर कूड़े की टोकरी उलट दी जाती । पहली साल वह बहुत गरम हुआ और कूड़े फेंकने वाली को खूब भला बुरा कहा फिर वापस जाकर नहाया, कपड़े बदले तब दीक्षांत समारोह में वापस पहुंच पाया। परन्तु तबतक समारोह खतम हो चुका था। दूसरी बार, अगली साल फिर वैसा ही हुआ। जैसे-तैसे, इसबार उसने अपने क्रोध पर तो काबू पा लिया, पर बिना नहाए-धोए न पहुंच सका। गुरूजी ने अगले साल बेहतर तैयारी के साथ आना, कहकर उसे फिर वापस लौटा दिया। भ्रमित शिष्य फिर लौट आया। अगली साल उसने फिर और मन लगाकर तैयारी की। फिर वैसा ही हुआ , यानी कूड़ा गिरा उसके ऊपर परन्तु इसबार न तो उसे क्रोध आया, ना ही नहाने का ख्याल । वह तो बस अपने विषय क बारे में ही सोच रहा था और दीक्षा लेकर उसे अपने ज्ञान को कैसे दूसरों के साथ बांटना है...उनके भले के लिए वह क्या-क्या कर सकता है- यही सब गुनता-मनता वह दौड़ता ही चला गया। वैसे ही बहुत देर हो चुकी थी। अपने को झाड़ पोंछकर , अंततः आंखों में खुशी के आंसू भरे वह दूर , गुरू जी के आगे नत्-मस्तक खड़ा था। गुरूजी ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया । उन्हें पता था कि शिष्य अब मात्र दीक्षा लेने के लिए ही नहीं , जग के आगे जाने के लिए भी तैयार है...यह परीक्षा भी तो वही ले रहे थे। माना अर्जुन की तरह लक्ष्य पर आंख सफलता के लिए जरूरी है, परन्तु इतनी एकाग्रता, मेहनत और योग्यता के बाद भी उसकी शिक्षा अभी तक अपूर्ण थी। एकाग्रता के बिना हम मार्ग की बाधाओं को अनदेखा नहीं कर सकते परन्तु बिना विनम्रता के हम गलती करने वालों को माफ भी नहीं कर सकते और हम सभी जानते हैं कि हर काम में कितने अत्याचारी और कितनी बाधाओं का सामना करना पड़ता है। अब उसके पास विनम्रता भी थी, जो एक सशक्त सामाजिक जोड़ने वाली कड़ी भी है और दुर्गंध व दुर्व्यवहार को झाड़ने वाली झाड़ू भी । उनका कर्मठ व प्रतिभासंपन्न शिष्य दीक्षा के लिए गर्वित और प्रफुल्ल गुरुजी की आंखों में अब पूर्णतः तैयार था। शिक्षित व सुसंस्कृत व्यक्ति की यही सही पहचान भी है-' विद्या ददाति विनयं'..और विनय से ही पात्रता आती है। सब सुख-साधन मिलते हैं । जितनी डाली फली-फूली होगी उतनी ही झुकी भी। पर सही गुरु का मिलना हमेशा इतना आसान भी तो नहीं, तंभी तो गुरु नानक ने गुरु का दर्जा गविंद से बड़ा कहा...क्योंकि गुरु ही तो दिशा और निर्देश देते हैं..'.बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो मिलाय।' भारत में बुद्धि और योग्यता की कभी कमी नहीं रही, परन्तु अक्सर बिल्ली की तरह गुरू शेर जैसे शिष्यों से पेड़ पर चढ़ना; अपना असली गुर छुपा जाते हैं। सिखाते ही नहीं। ढाके की मलमल बुनने वालों के अंगूठे काट देने वाली यह प्रवृत्ति ही हमारे देश को आगे नहीं बढ़ने दे रही है और भारतीयों की प्रतिभा का प्रशिक्षण व प्रदर्शन...सही मूल्यांकन और उपयोग , दोनों ही आज भी विदेश में ही जाकर हो पा रहा है। फिर क्यों हम राष्ट्र के ‘ ब्रेन-ड्रेन‘ का रोना रोते हैं ?
यह भी एक सुखद संयोग ही है कि आज कर्मवीर और योगेश्वर , चौंसठ कलाओं में निपुण कृष्ण के जन्मदिन पर यह अंक आप तक पहुँच रहा है। क्या गीता से बढ़कर समाजशास्त्र और दर्शन पर, जीवन-मृत्यु से निपटने की व्यहारिक शिक्षा पर अभिन्न मित्र-सी ढाढस देती कोई अन्य व बेहतर पुष्तक है ? कहते हैं कि पांच हजार वर्ष उपरान्त इस बार फिर 2 और तीन सितंबर की मध्यरात्रि को फिर वही संयोग पड़ रहे हैं , जो कृष्ण के जन्म के समय पांच हजार वर्ष पूर्व थे। यानी कि भाद्रपद् की अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र। स्थूल रूप में न सही , क्या पता हमारी चेतना में ही कृष्ण ज्ञान का इंगित हो यह संयोग।....सच्चाई जो भी हो, पर इन्ही त्योहारों के बहाने ही सही , वे युगपुरुष आज भी हमारी चेतना में जीवित तो हैं और यदि वे हैं तो उनके आदर्श और सिद्धांत भी रहेंगे ही। लेखनी के पाठकों को...मित्रों को जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई।
हाँ , चलते-चलते इतना अवश्य जानना चाहूँगी कि क्या आज के युवा समाज का भी इन सारगर्भित पुष्तकों से...हमारी सनातन सोच और संस्कृति से कोई परिचय और जुड़ाव शेष रहा है? इस सबमें क्या उनके साथ-साथ हमारी भी कोई गलती नहीं? कहते हैं बच्चे प्रायः बड़ों का ही अनुसरण करते हैं। आज जिस समाज में हमारे प्राथमिक शिक्षक माता-पिता गुरु, खुद उनका व्यवहार और आदर बदलता जा रहा है ... गुरु और शिष्यों का स्वभाव बदलता जा रहा है, व्यक्ति की सोच और महत्वाकांक्षा , खुद सफलता की परिभाषा बदलती जा रही है, वहां बुनियादी सुधारों को भूलकर, शिक्षा में बुनियादी सुधार की अपेक्षा करना शायद समाज की एक और भूल ही कही जाएगी...!
प्रस्तुत है लेखनी का सितंबर अंक- शिक्षा विशेषांक- समाज के एक और प्रमुख व ज्वलंत मुद्दे के साथ....