भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है एक देश का नहीं, शील यह भूमंडल भर का है जहाँ कहीं एकता अखंडित, जहाँ प्रेम का स्वर है देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्कर है निखिल विश्व को जन्मभूमि-वंदन को नमन करूँ मैं !"
-रामधारी सिंह 'दिनकर'
लेखनी-अगस्त-2010
वर्ष 4-अँक-42
' मेरा भारत'
इस अंक में-
माह की कवियत्रीः स्नेह ठाकुर। माह विशेषः देवी नागरानी, सोहन राही, रेणु राजवंशी गुप्ता, प्राण शर्मा, शैल अग्रवाल। कविता धरोहरः अय़ोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध। कविता आज औऱ अभीः डंडा लखनवी, रश्मि सरन, प्रहलाद नरायण खन्ना, दिनेश ध्यानी, संजीव निगम, कवि कुलवंत, श्याम कुमारी। बाल कविताः निर्मला सिंह।
मंथनः शैल अग्रवाल। कहानी धरोहरः जयशंकर प्रसाद। कहानी समकालीनः शैल अग्रवाल। कहानी समकालीनः स्नेह ठाकुर। लघुकथाः इब्ने इंशा, शैल अग्रवाल। हास्य व्यंग्यः अजय पाराशर। परिचर्चाः रघुवेन्द्र सिंह। संस्मरणः शैल अग्रवाल। परिदृश्यः अजय पाराशर। मुद्दाः दिनेश ध्यानी। चौपालः वेद प्रताप वैदिक। बाल कहानीःओमप्रकाश कश्यप। माह की साहित्यिक व अन्य खबरों से भरपूर विविधा।
त्योहारों और तिथियों की हर वर्ष पुनरावृत्ति होती है, फिर भी कुछ तिथियाँ, कुछ त्योहार ऐसे होते हैं जिनकी याद मात्र से मन पुलक उठता है, इन्तजार करने लगता है। 15 अगस्त, रक्षाबंधन और जन्माष्टमी भी कुछ ऐसे ही त्योहार और तिथियाँ हैं। शायद अपनों से दूरी ने इन तिथियों में, इन त्योहारों में कई-कई कल्पना और यादों के रंग भर दिए हैं और उन्हें और भी अधिक प्रिय बना दिया है, या फिर इनके पीछे की भावनाएँ हैं, जो मन के ज्यादा करीब हैं और एक अनूठे कर्तव्य बोध को, उस गौरव भाव को बढ़ावा देती हैं। कहते हैं दूरियाँ अहसास की कशिश को तीव्र कर देती है, फिर जननी और जन्मभूमि तो स्वर्ग से भी ज्यादा प्रिय और गरिमामय होती है। उसी स्वर्ग या सोने की चिड़िया को बाहरवाले ललचाई नजरों से देखें तो सावधान होना भी स्वाभाविक है। डरता है मन कि कहीं फिरसे कोई गलती न हो जाए। लदे पेड़ पर फल देखकर हर हाथ में पत्थर होते हैं। फिर ज्यादा फरक भी तो नहीं, पहले भी तो सोने की चिड़िया को ऐसे ही जाल में फंसाकर पिंजरे में बन्द कर लिया गया था, अब लोग फिर व्यापार करना चाहते हैं। सतर्क होना स्वाभाविक है। क्योंकि चाहे माली बेचे या खुद जाल में फंसे, भुगतना तो चिड़िया को ही है।
लोकमान्य तिलक ने कहीं कहा था कि स्वाधीनता हर मानव का जन्मसिद्ध अधिकार है और गांधी जी ने कहा था कि स्वाधीनता सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। अधिकार और निर्वाह दोनों की ही समझ और सूझबूझ होनी चाहिए । अधिकार की बात तो याद रह जाती है पर जिम्मेदारी और कर्तव्य को सब भूल जाते हैं। भारतवासियों के साथ तो लगता है बहुत तेजी से यह हो रहा है। गरीब किसान आत्महत्या कर रहे हैं, हजारों भूखे मर रहे हैं और अनाज सड़ रहा है, क्योंकि उसे रखना या तो आता नहीं, या फुरसत नहीं। नन्हे बच्चे बूंद-बूंद को तरसते रहें पर अब भारत में भी कीमत सुनिश्चित रखने के लिए लाखों टन दूध सड़कों पर बहा दिया जाता है। स्कूल, अस्पताल, सरकार, गद्दी सब एक धंधा है और करोड़ों इधर-उधर करने का जरिया। भ्रष्टाचार जडें खोखली कर चुका है, तो लालच शील और सदाचार के छप्पर को भारतवासियों के सिर पर से ले उड़ा है। और सबकी आँखें बन्द हैं। बिल्ली जो मलाई खा रही है उसकी भी और चूहे जिन्हें वह दबोचे हुए है, उनकी भी। भष्टाचार समाज के तानेबाने में दीमक की तरह लग चुका है और हम सब कुछ सामान्य मानकर लापरवाह हैं। बोट-बैंक समझी जाने वाली जनता सिर्फ बोट-बैंक ही है, जिसका ध्यान नेताओं को बस चुनाव के समय ही आता है। जहाँ जननायक स्वार्थी हों और रक्षक, शिक्षक सभी बिके हुए, उस देश की आंधियों और अवसरवादियों से कौन रक्षा कर पाएगा? बारबार हम क्यों उपहासात्मक परिस्थितियों में ही पहुँच जाते हैं। कौमन वेल्थ गेम अभी हुए भी नहीं हैं और देश की भ्रष्ट कीचड़ और फिसलन की खबरें चारो तरफ गूंज रही हैं। क्षुब्ध कर रही हैं। शिवमंगल सिंह सुमन जी की कविता की पंक्तियाँ याद आती हैं ‘ मेरा देश जल रहा है , कोई नहीं बुझाने वाला। ‘
बड़प्पन के गौरव में नहाना अच्छी बात है, हम अंतरिक्ष में चाहे जितने रौकेट भेजें; पर क्या देश की बुनियादी जरूरतों को, भूख, आवास और शिक्षा की जरूरतों को पूरा करना जरूरी नहीं? देश के भविष्य का आज भी एक बड़ा हिस्सा जो भूखा-नंगा सड़कों पर भटक रहा है, उसका पेट भरना, तन ढकना जरूरी नहीं ? देश का गौरव और प्रगति (और संतोष भी) मुठ्ठी भर लोगों के वैभव से नहीं, आम आदमी की खुशहाली से नापा जाता है। कहीं बढ़ते भ्रष्टाचार और अपराधों में देश का यह आंख बंद करके अपना ही घड़ा भरने वाला रवैया तो जिम्मेदार नहीं, कब हमारा और हमारी सरकार का ध्यान इन बातों पर जाएगा और बाहर की चमक-दमक को भूल भारतवासी और भारतवंशी इस दिशा में अग्रसर होंगे! कहते हैं सच्चा प्यार वही होता है जो खामियों के प्रति भी सजग रहे- लेखनी ने इस अंक में देश पर नाज करने के साथ-साथ देश की तृणमूल जरूरतों और कमियों को भी रेखांकित करने की कोशिश की है। अगर एक मन में भी सार्थक संकल्प उठे तो प्रयास सफल है। पुनः महीने के सभी त्योहारों की शुभकामनाओं के साथ-साथ आगामी स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई।
जहाँ आँचल में मातृत्व समेटे बाट तक रहे दो ज्योतिहीन नयन गीले क्षीण होती जर्जर काया से बदन पिता का ढहे
उन जीवनदान देने वाले माँ-पिता के चरणों में बनना था जिसका तुम्हें सम्बल बहुत पहले.
बीते दिन बहुतेरे चल अब लौट चलें
जहाँ बुलाया हर राखी पर बहन ने बाँधने सूनी कलाई पर प्यार के धागे पर रख न पाया कभी उसका मान
अपनी सीमाओं में बंधा प्रवासी विवश मन करता रहा उसे हरदम त्योहार पर उदास उसकी कातर आँखें सजा हुआ अल्पना द्वार हल्दी, कुमकुम, चावल का थाल कर रहा अब तलक तेरा इंतज़ार.
बीते दिन बहुतेरे चल अब लौट चलें
जहाँ पाया था कल प्यार और आज भी प्यार मिलेगा भर पेट होने पर भी कुछ और खा लो का मनुहार मिलेगा
सावन की बौछारों पर झूले की पींगों पर त्योहारों की मधुरिम रागों पर ढोलक की थापों पर एक सरल संसार मिलेगा.
बीते दिन बहुतेरे चल अब लौट चलें
जहाँ दशरथ की तरह सिधारे तात गगन पार झेल न सके विरह की काली रात रोती रही माँ यशोदा की तरह
न आए पलट कर श्याम आँखों में लिए विवशता हो गई चिता पर राख माँ की ममता.
बीते दिन बहुतेरे चल अब लौट चलें
जहाँ अब भी घर के चौबारे से हर झरोखे से झर-झर झरती स्नेहिल स्मृतियों की छवि
ठंडी राख में भी रह-रह कौंधती ममता की चिंगारी भस्म कर देगी पीड़ा प्रवासी मन की
और देगी आलौकिक शांति
चल अब लौट चलें उस धरती की मिट्टी गले लगाने सर माथे चढ़ाने.
बीते दिन बहुतेरे चल अब लौट चलें उस पावन पुनीत अपनी धरती पर.
फिर भी आती है वतन की याद बार-बार
रहते हैं हम कैनेडा के इस ख़ूबसूरत शहर टोरोंटो में हैं जिसकी ढेर सारी विशेषताएँ अर्धवृत्ताकार सिटी हाल और स्काई डोम और न जाने कितने छोटे-बड़े नयनाभिराम फिर भी आती है वतन की याद बार-बार.
है यहाँ दुनिया की सबसे बड़ी इमारत सी.एन.टावर और उसमें परिक्रमा करता भोजन और मदिरा भंडार तुलना में बहुत-ही छोटी पड़ती है कुतुब मीनार फिर भी आती है वतन की याद बार-बार.
क्या ही शान का है ईटन सेन्टर भाँति-भाँति की दुकानें हैं उसके अंदर समा जाए जिसमें पूरा चौक बाज़ार फिर भी आती है वतन की याद बार-बार.
थी अपनी छोटी-सी एम्बेस्डर हिचकोले खाती पहुँचाती ठिकानों पर है यहाँ फर्राटे से चलने वाली आठ सिलिंडर फिर भी आती है वतन की याद बार-बार.
बिजली का चले जाना, और पानी का न आना थी रोज़मर्रा की बात वहाँ यहाँ इंसां क्या, घास के लिए भी फव्वारे चलते हैं सदा
है तत्पर बिजली करने को सेवा दिन-रात फिर भी आती है वतन की याद बार-बार.
दूध में पानी और धनिया में बुरादा मिलाना था बायें हाथ का काम पपीते के बीजों को काली मिर्च बताना करते हैं बिन देखे ही लेबलों पर इतमिनान यहाँ फिर भी आती है वतन की याद बार-बार.
रहते हैं महलों जैसे घर में पति-पत्नी और मुन्ना मुन्नी पृथक-पृथक रूम क्या, है ढेर सारा स्थान खाली थी कहाँ मेरे तेरे कमरों की बात वहाँ
थे ठसाठस भरे आँगन, छत और दालन सभी फिर भी आती है वतन की याद बार-बार. चचेरे ममेरे भाई बहन, कहलाने लगे कज़िन यहाँ और उनके बच्चे once removed
भूल गए हम अपनी संस्कृति संस्कार जहाँ ताया-चाचा के जाए, कहलाता एक परिवार रहता बड़ों का आशीर्वाद सदा सब पर समव्यस्कों का दुलार और छोटों का आदर-सत्कार;
थमा हमने बच्चों को माखन-रोटी और ऐशो-आराम छीना नानी-दादी का ममता-भरा प्यार समझ आया, सब कुछ पाकर भी, कुछ न पाने का सार
इसीलिए आती है वतन की याद बार-बार इसीलिए आती है........
हम भारतवासी, हम भारतवंशी
कदमों से कदम मिला कंधे से कंधा मिला चलते हैं हम ऐसे जब दुश्मन के दिल हिलते हैं तब.
रोकें चाहे आँधियाँ, ज़मीं या आसमां हमे पाना है लक्ष्य हमें हर हाल में हिम्मत से चलें, धरती हिले कदमों तले क्या दूरियाँ, क्या फ़ासले, मंज़िल लग जाएगी गले.
चलना है हमें सुबह-शाम रुकना, झुकना नहीं हमारा काम अब तो यही रास्ता है अपना पहचान ले, यही सपना है अपना.
आगे ही आगे बढ़ते जाना है विध्वंस-बादल बन संहार करना है शोला बन आग उगलना है दुश्मन के छक्के छुड़ाना है.
आए हैं रण-प्रांगण में, लिए जान हथेली पे मोड़े कलाई मौत की, है हिम्मत हममें रण-बांकुरे, हम पहुँचेंगे मंज़िल पे हो जा होशियार, हम हैं आसमाँ की बुलन्दी पे.
हम अपनी सरहदों की लौह दीवार हैं दुश्मनों को हरदम खदेड़ने को तैयार हैं पछताओगे ताक़त हमारी आज़मा के तुम ऐ गीदड़, सियारों, न डालो हमारी माँ पे बुरी नज़र तुम.
माँ के दूध का कर्ज़ चुकाना हमें आता है माँ के चरणों की कसम खा, सर काटना तुम्हारा हमें आता है भारत-माँ की संतान हम, तुम्हें समझाना हमें आता है अपनी माँ के चरणों में शीश तुम्हारा झुकाना हमें आता है.
पुरुखों का शौर्य, बन लहू बहता हमारी रगों में झुकता नहीं यह शीश कभी किसी के आगे हम भारतवासी हैं, राणा प्रताप, वीर छत्रपति शिवाजी हर नारी यहाँ की है, रण-बांकुरी झाँसी रानी लक्ष्मी बाई.
भरा पड़ा है इतिहास हमारा वीर प्रतापों से हम हैं गर कोमल सुमन-से, तो सशक्त लौह-तार-से तोड़ देंगे दुश्मन की ग्रीवा कमल-नाल-सी, फोड़ देंगे कपाल उसका हम हैं दोस्तों के दोस्त, पर बरपाते दुश्मनों पर क़हर बड़ा.
ऐ आक्रमणकारियों भाग जाओ दुम दबा के यहाँ से क्यों शेर की मांद में आते हो जान-बूझ के! माँ की सुरक्षा का भार निभाना जानते हैं हम सभी जन-जन भारत का चने चबवाएगा तुम्हें हर क्षण ही.
हम भारतवासी, हम भारतवंशी कदमों से कदम मिला कंधे से कंधा मिला चलते हैं हम ऐसे जब दुश्मन के दिल हिलते हैं तब; हम भारतवासी, हम भारतवंशी जय हिन्द, जय भारती.
जुदाई से नयन है नम, वतन की याद आती है बहे काजल न क्यों हरदम, वतन की याद आती है
समय बीता बहुत लंबा हमें परदेस में रहते न उसको भूल पाए हम, वतन की याद आती है
तड़पते हैं, सिसकते हैं, जिगर के ज़ख़्म सीते हैं ज़ियादा तो कभी कुछ कम, वतन की याद आती है
चढ़ा है इतना गहरा रंग कुछ उसकी मुहब्बत का हुए गुलज़ार जैसे हम, वतन की याद आती है
यहाँ परदेस में भी फ़िक्र रहती है हमें उसकी हुए हैं गम से हम बेदम, वतन की याद आती है
हमारा दिल तो होता है बहुत मिलने मिलाने का रुलाते फ़ासले हमदम, वतन की याद आती है
वही है देश इक ‘देवी’ अहिंसा धर्म है जिसका लुटाता प्यार की शबनम, वतन की याद आती है
-देवी नागरानी यू.एस.ए.
कोयल कूक पपीहा बानी...
कोयल कूक, पपीहा बानी, न पीपल की छाँव सात समन्दर पार बसाया हमने ऐसा गांव हमरा ऐसा गांव ऐसा हमरा गांव !
ऐसा गांव जिसमें ठंडी आग से तन जलता है सांस सांस में पवन नहीं विष पुरवइया चलता है फिर भी उस गांव की हद से बाहर न निकले पांव हमरा ऐसा गांव ऐसा हमरा गांव!
धूप खिले तो कलियों की सुगंध न उड़ने पाए बरखा ऋतु की लहर बहर से हर मुखड़ा मुरझाए कोहरे की बर्फीली चादर बिछी है चार दिशाओं हमरा ऐसा गांव ऐसा हमरा गांव!
रंग बिरंगे लोग यहां पर बोलें अपनी बोली तन सोना माटी ही करके भरें पेट की खोली खून पसीना एक करें तो पल दो पल बिसराएं हमरा ऐसा गांव ऐसा हमरा गांव!
-सोहन राही ( यू. के.)
सेतुबंध
हम सेतुबंध, वाम हस्त मिसीसिपी नदी का तट, दांए हस्त गंगाजी का तट, संगम पर अवस्थित, एकाकार होने को कटिबद्ध, हम सेतुबंध।
वाम हस्त है, पानी नीला, दिन में उजला, रात में रँगीला। चौड़ा है पाट, पानी है उथला।
लहरों का यहाँ उठता ज्वार, अशांत रहना है इसका स्वभाव। हवचल है इसके उपवन में, उथल-पुथल है इसके प्रांगड़ में। पुष्प-लताओं से लदा सावन, पतझड़ में भी गहराता यौवन। हरियाली को यहाँ सदा निमंत्रण,
संगीत है इसका तार सप्तक, श्वेतवर्णी तीव्रगामी उत्कट। अंतःतल में मरघट-सा नीरव है य कूल, हम सेतुबंध।
दाएँ हस्त है, पानी उजला, दिन में नीला, रात में काला। सँकरा है पाट, पानी है गहरा।
लहरों का मनोभाव है संतुलित, पड़ोसी हवा से होती रहती विचलित। संघर्षों के यहाँ सदा घूमते भँवर, कूल की धूल उड़ती यहाँ आठों पहर। स्वेद-युक्त चेहरों पर रहती मुस्कान, मानव-मन की यहाँ होती पहचान।
भीड़ में नहीं मानव खोता, अपनों का साथ पकड़ चल लेता। सावन, शीत, ग्रीष्म मानो ठहरे दिवस हैं, जीवन की चाल संगीतमय मदमस्त है। किनारे काटता-जोड़ता कर्मरत है यह कूल, हम सेतुबंध।
हम सेतुबंध, कर्मशील, बुद्धिशील, संस्कारबद्ध। कुछ जोड़ने को साध्य, कुछ छोड़ने को बाध्य। काली-पीली मिट्टी से, बना रहे हैं बंध।
नीला-उजला पानी डाल, जमा रहे हैं नीव। कभी ढहते, कभी बह जाते, गिर-गिरकर खड़े हो जाते। हम सेतुबंध।
-रेणु राजवंशी गुप्ता ( यू.एस.ए.)
मेरे वतन के लोगो ....
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ क्यों करते हो आज तुम उलटे तमाम काम अपने दिलों की तख्तियों पे लिख लो ये कलाम तुम बोओगे बबूल तो होंगे कहाँ से आम
कहलाओगे जहान में तब तक फकीर तुम बन पाओगे कभी नहीं जग में अमीर तुम जब तक करोगे साफ़ न अपना ज़मीर मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ
ये प्रण करो कि खाओगे रिश्वत कभी नहीं गिरवी रखोगे देश की किस्मत कभी नहीं बेचोगे अपने देश की इज्ज़त कभी नहीं
जो कौमे एक देश की आपस में लडती हैं कुछ स्वार्थों के वास्ते नित ही झगडती हैं वे कौमी घास - फूस के जैसे ही सडती हैं मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ
देखो , तुम्हारे जीने का कुछ ऐसा ढंग हो अपने वतन के वास्ते सच्ची उमंग हो मकसद तुम्हारा सिर्फ बुराई से जंग हो
उनसे बचो सदा कि जो भटकाते हैं तुम्हे जो उल्टी - सीधी चाल से फुसलाते हैं तुम्हे नागिन की तरह चुपके से दस जाते तुम्हे मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ
चलने न पायें देश में नफरत की गोलियां फिरकापरस्ती की बनें हरगिज़ न टोलियाँ सब शख्स बोलें प्यार की आपस में बोलियाँ
जग में गँवार कौन बना सकता है तुम्हे बन्दर का नाच कौन नचा सकता है तुम्हे तुम एक हो तो कौन मिटा सकता है तुम्हे मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ
सोचो जरा, विचारो कि तुमसे ही देश है हर गंदगी बुहारो कि तुमसे ही देश है तुम देश को सँवारो कि तुमसे ही देश है
मिलकर बजे तुम्हारे यूँ हाथों की तालियाँ जैसे कि झूमती हैं हवाओं में डालियाँ जैसे कि लहलहाती हैं खेतों में बालियाँ मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ
-प्राण शर्मा (यू. के.)
तिरंग फहरा लो।
तारा है वो, सितारा है वो झिलमिल आँखों में चंदामामा सा प्यारा है वो जागती आँखों का सपना देश वो हमारा है
तस्बीर यह आँखों में सजा लो, तिरंग फहरा लो।
दूर हैं तो क्या मजबूर हैं तो क्या मन में कुछ यादे हैं वादे और इरादे हैं
इरादों को आजमा लो, तिरंग फहरा लो।
मिट्टी वह पुरखों के खून सनी मिट्टी वह जिससे यह देह बनी मिट्टी वह अपनी पहचान है मिट्टी वह पूज्यनीय
माथे से लगा लो तिरंग फहरा लो।
सूखा कहीं, बाढ कहीं भूखे कई, नंगे कई लालच और गुर्बत के मारे हैं अपने पर सारे हैं
अपनों को बचा लो तिरंग फहरा लो।
तन मन धन सब अर्पण यही तो पूर्वजों का तर्पण मां का आवाहन है वादों का जल दो कर्मों की आहुति
देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं। रह भरोसे भाग के दुख भोग पछताते नहीं काम कितना ही कठिन हो किन्तु उबताते नही भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं।। हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले।।
आज करना है जिसे करते उसे हैं आज ही सोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वही मानते जो भी है सुनते हैं सदा सबकी कही जो मदद करते हैं अपनी इस जगत में आप ही भूल कर वे दूसरों का मुँह कभी तकते नहीं कौन ऐसा काम है वे कर जिसे सकते नहीं।।
जो कभी अपने समय को यों बिताते है नहीं काम करने की जगह बातें बनाते हैं नहीं आज कल करते हुए जो दिन गँवाते है नहीं यत्न करने से कभी जो जी चुराते हैं नहीं बात है वह कौन जो होती नहीं उनके लिये वे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिये।।
व्योम को छूते हुए दुर्गम पहाड़ों के शिखर वे घने जंगल जहां रहता है तम आठों पहर गर्जते जल राशि की उठती हुई ऊँची लहर आग की भयदायिनी फैली दिशाओं में लपट ये कंपा सकती कभी जिसके कलेजे को नहीं भूलकर भी वह नहीं नाकाम रहता है कहीं।
जन्मभूमि
सुरसरि सी सरि है कहा मेरू सुमेर समान। जन्मभूमि सी भू नहीं भूमंडल में आन।।
प्रतिदिन पूजें भाव से चढ़ा भक्ति के फूल। नहीं जन्म भर हम सके जन्मभूमि को भूल।।
पग सेवा है जननि की जनजीवन का सार। मिले राजपद भी रहे जन्मभूमि रज प्यार।।
आजीवन उसको गिनें सकल अवनि सिंह मौर। जन्मभूमि जलजात के बने रहे जन भौंर।।
कौन नहीं है पूजता कर गौरव गुण गान। जननी जननी जनक की जन्मभूमि को जान।।
उपजाती है फूल फल जन्मभूमि की खेह। सुख संचन रत छवि सदन ये कंचन सी देह।।
उसके हित में ही लगे हैं जिससे वह जात। जन्म सफल हो वार कर जन्मभूमि पर गात।।
योगी बन उसके लिये हम साधे सब योग। सब भोगों से हैं भले जन्मभूमि के भोग।।
फलद कल्पतरू तुल्य है सारे विटप बबूल। हरि पद रज सी पूत है जन्म धरा की धूल।।
जन्मभूमि में हैं सकल सुख सुषमा समवेत। अनुपम रत्न समेत हैं मानव रत्न निकेत।।
देश की आवाज़ रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ और शिक्षा हमारी मूलभूत आवश्यकताएं हैं। शिक्षा के सहारे अन्य आवश्यकताओं की पूर्ती हो सकती है परन्तु उस पर भी माफियाओं का कब्ज़ा होता जा रहा है। शिक्षा से वंचित रख कर किसी नागरिक को आजाद होने का सपना दिखाना बेइमानी है। इस सत्य को एक अनपढ़ औरत भी समझती है...उसका दर्द प्रस्तुत लोकगीत में फूटा है।
शिक्षा से जन देव बनत है, बिन शिक्षा चौपाया, शिक्षा से सब चकाचौंध है, शिक्षा की सब माया, शिक्षा होइगै है बिरवा खजूर, हमार लल्ला कैसे पढ़ी ??
विद्यालन मा बने माफिया विद्या के व्यापारी, अविभावक का खूब निचोड़ै, जेब काट लें सारी, बहिनी! मर्ज़ यु बना है नासूर, हमार लल्ला कैसे पढ़ी ??
विद्यालय जब बना तो बलमू ढ़ोइन ईटा - गारा, अब वहिके भीतर कौंधत है महलन केर नजारा, बैठे पहिरे पे मोटके लंगूर, हमार लल्ला कैसे पढ़ी ??
बस्ता और किताबै लाएन बेचि कै चूड़ी - लच्छा, बरतन-भांडा बेचि के लायेन, दुइ कमीज़ दुइ कच्छा, फिरहूं शिक्षा का छींका बड़ी दूर, हमार लल्ला कैसे पढ़ी ??
सरकारी दफ्तर के समहे खड़े - खड़े गोहराई, हमरे बच्चन के बचपन का काटै परे कसाई, कोऊ उनका सिखाय दे शुऊर, हमार लल्ला कैसे पढ़ी ??
- डॉ. डंडा लखनवी
घर का आँगन
घर का आँगन बचपन का आँगन। कुछ कच्चा, कुछ पक्का, कुछ उखड़ा, कुछ सुथरा।
उस में रोज़ झाड़ू लगती, पेड़ों से गिरे पत्ते बटोरते।
एक तुलसी का पौधा, एक आम का पेड़ । कुछ घास, नीबू की झाड़ के तले बिछी एक चारपाई । उस पर कभी गेहूँ सूखता, कभी मिर्च, कभी हल्दी, कभी पापड़, कभी मंगौड़ी, कभी अचार । और कभी मैं अपनी किताबें लेकर उस पर चढ़ कर बैठ जाती ।
घर की साँस था वह आँगन ।
स्वच्छ हवा, जीवन की घुटन, घर के कोने में बसी सीलन, मन का गीलापन, सभी दूर करता था वह आँगन ।
कमरों की छत के ऊपर चढ़ आता जब सूरज, हमारे आँगन में ख़ूब उजली सी धूप फैला देता । तब घर के रजाई गद्दे बाहर सूखते । बच्चे उनपर कूदते, छिपते, हँसते, खिलखिलाते ।
एक बूढी दाई थी जो बीच आँगन में अपना हक़ जमा, खल मूसल ले हल्दी कूटने बैठ जाती ।
सर्दी की धूप हो, या गर्मी की तपन, आँगन में सूखते अचार और कांजी, मूंगफली के चटकारे और किस्से कहानी घर की चहल पहल को समेटे होते ।
सावन की पहली बरसात में भीगा आँगन, मिटटी की सोंधी खुशबू , गरम पकौड़ी । माँ की साड़ी से पोछे गीले हाथ तो पड़ी फटकार भी कितनी मीठी लगती ।
पिता जी अख़बार पढ़ते, सुबह का नाश्ता होता, बच्चों की धमा चौकड़ी और दोपहर की पढाई सभी कुछ सर्दियों में उसी आँगन में होता ।
गर्मी में घड़ों पानी डलता । तपते आँगन को ठंडा कर चारपाइयाँ बिछ्तीं, पंखे लगते, और शाम की चाय पर आये महमानों के साथ घंटों गपशप होती ।
त्यौहारों की रौनक, होलिका का जलना, गोबर्धन पूजना, गेरू रंगों की सांझी, और सजती झांकी ।
शादियों में मंडप सजते बन्ना बन्नी गाते और पीछे चावल फ़ेंक, इसी आँगन से बिटिया बिदा होती ।
कहाँ गए वह आँगन ? हमारे घरों की रौनक ? हमारी साँसें ? माँ के आँचल ?
बंद घरों की खिड़की में जाम ए सी के डब्बे धूप भी नहीं आने देते । दिन में भी अँधेरे कमरों में सी एफ एल बल्ब जलते हैं ।
नीबू की झाड़ तले पके नीबू अब नहीं गिरते । और बच्चे चिड़ियों की चहचहाहट नहीं सुनते । गुनगुनी धूप में अब देह नहीं सेकते । फ़ुरसत के वे पाँव पसारे पल, फुदकती गिलहरी को दोनों पंजों से, अमरुद कुतरते, अब घंटों नहीं निहारते ।
छत की टूटी खपरैल में अटके कोई गौरैये के घोंसले से नन्हे चूजे अब नहीं झांकते ।
कोमलता और प्यार के एहसास से अनछुए, हमारे बच्चे अब सीलन भरे ठन्डे कमरों में, हीटर, ब्लोवर चला घंटो टीवी ताकते हैं । रीऐल्टी शो में प्रतियोगियों को आपस में देने वाली भद्दी गालियों को सुन कर, खुश होते हैं ।
प्रकृति से दूर, उस की ऊर्जा से विहीन, अब हमारे शरीर ही नहीं मन भी, मस्तिष्क भी, बीमार हो गए हैं । घर के खुले आँगन जब से बंद डिब्बों में तब्दील हुए हैं, हमने अपने अन्दर झांकना भी बंद कर दिया है ।।
गली और मोहल्ले तोड़, खुले मैदान बेच, बच्चों से पतंग गिल्ली डंडा छीन, जिन्होंने वहां भीमकाय दुकानों, और मॉलों को जन्म दिलवाया है, क्या उनके लिए कोई कानून नहीं?
आज की और आने वाली पीढ़ी के इन अपराधियों के लिए क्या कोई सज़ा नहीं?
अपने बच्चों के कल के साथ ये सौदा हम कब तक होने देंगे ?
-रश्मि सरन
तन्हा-तन्हा मुझे हयात मिली
शहर में दिन न घर में रात मिली तन्हा-तन्हा मुझे हयात मिली
घर में सूरज भी चांद भी हैं मगर तीरगी से कहां निजात मिली
बीज बोये थे अम्न के लेकिन खेत में फ़स्ले-हादसात मिली
लोग कहते थे मेरे जैसा उसे कोई लहजा मिला न बात मिली
अपना-अपना नसीब है 'खन्ना' किसको कितनी ये कायनात मिली
-खन्ना मुजफ़्फ़रपुरी
बबण्डर
दफ्तर की फाईलों में कमेटियों की रिर्पोटों में जनता की अर्जियों में समय-समय की कार्यवाहियों में दफ्तर की आलमारियों में छुपा हुआ है बबण्डर ।
संसद से सड़क तक ठेकेदारी प्रथा की फाईलों को ठेके की रंगदारी को कार्यों की गणना को अपनों की मंत्रणा को बाहर मत निकालो आलमारियों से।
सुनो अगर निकालोगे बाहर समझ लेना भारी पड़ेगा जानते नही सब मिले हुए हैं जितनी फाईलें हैं उतने घोटाले हैं जितनी योजनायें हैं उतने चेहरे काले हैं।
देख लो अगर हिमाकत करोगे उनकी भौंहे तन जायेंगी म्यानें खिंच जायेंगी और तुम्हारी जान पर बन आयेगी।
इसलिए तुम भी मिल जाओ उनके साथ, उनके कारनामों में अच्छा रहेगा, घर का नून तेल चलेगा और चोरों की बारात में कोई घात नही करेगा।
उसूलों की बात करोगे तो मारो जाओगे बे मौत मीड़िया नोटों की गरमी की खबर देगा थानेदार तुम्हारी लाश को लावारिस घोषित कर देगा।
इसीलिए बच्चू समय की नजाकत को समझो या तो उनसे मिलो या अपनी ताकत बढ़ने तक चुप रहो।।
-दिनेश ध्यानी
अब तुम्हारी बारी है
तुम मुझे देख कर मुस्कराए और मैं डर गया. तुमने मुझे नज़र भर कर देखा और अनिष्ट की आशंका से मैं चीख पड़ा. मेरी चीख डर से शुरू हुई और गुस्से को छूती हुई , बदल गयी नफरत में. पर तुम बिना कुछ सुने , मुस्कराते बैठे , धूप का आनंद लेते , उँगलियों से उठा कर चबाते रहे मूंगफलियाँ, जैसे कोई घाघ कुत्ता मुफ्त पड़ी हड्डियों को मस्ती से चिंचोड़ रहा हो. मेरा डर, मेरा गुस्सा, मेरी नफरत मेरी हांफती चीख की पीठ पर से गिर पड़े घायल सवारों की तरह . और मेरा मन , किसी सुनसान मकबरे के ऊंचे अँधेरे गुम्बद में, चक्कर मारता छटपटाता पंछी हो गया . मैंने चाहा कि तुम मेरे शरीर पर पड़े ज़ख्मों के निशानों की तरफ भी निगाह भर कर देखो तो, चीख के पीछे छिपी कराहट के स्वर को पहचानो तो . पर तुम, उसी तरह से बैठे , बिना कुछ देखे चबाते रहे मूंगफलियाँ , जैसे कई दिनों का भूखा कुत्ता , सूखी रोटियाँ चपर चपर कर खा रहा हो. मैं जानता हूँ कि तुम न बहरे हो, न अंधे, और वह जो तुम्हारी लपलपाती जीभ है न, वह बतलाती है कि तुम गूंगे भी नहीं हो . पर तुम्हारी दुखी व पीड़ितों की परिभाषा में आते हैं वे लोग , जिनके रसीले -आरती -मंगलाचरण सुनकर तुम्हारी रोयेंदार दुम हिलती है. बाकियों के लिए तुम हो भूखे शिकारी कुत्ते , हड्डियां निचोड़ते, रोटियाँ चपरते . मेरे खुरदरे हाथों में नहीं है कोई वंदन-प्रणाम तुम्हारे लिए, इसलिए तुम्हारी नज़रों में है मेरा मूल्य हड्डियों और ग़ोश्त जितना. पर यदि डर से परे , मेरी चीख का गुस्सा सच्चा है, और गुस्से में नफरत की धार है , मेरे ज़ख्मों में अभी भी कराहट बाकी है तो, सतर्क रहने की अब बारी तुम्हारी है.
-संजीव निगम
यह विद्रोह नहीं
वर्षों से दबा हुआ ज्वालामुखी जब धरती की कठोर चादर को फाड़ कर , विस्फोट कर उठता है , और गरम लावा मिटा देता है , मजबूत जड़ों वाले पेड़ों को , ठोस पत्थर की चट्टानों को , तो देखने वाले , अपनी जीभ पर दाँत रखकर कहते हैं, यह विद्रोह है. परन्तु क्या कभी सोचा है कि यह आग किसी एक दिन की पैदाइश नहीं , न जाने कितने समय की संचित ऊर्जा है , जो सालों अपना अस्तित्व छुपाये पड़ी रही चुपचाप धरती की गहराइयों में, और तुमको देती रही अवसर , फलने का, फूलने का. मगर तुमने अपने विकास के क्षणों में, यह भी न देखना चाहा कि तुम्हारे पैर तले की ज़मीन , कितना भार डाल रही है उन सहारों पर, जो रोक रहे हैं उसे रसातल में जाने से. और अब , जब दबे हुए आश्रयों ने , तुम्हारे निरंतर बढ़ते बोझ को उतार फेंका है, और अपनी मुक्ति के लिए विस्फोट किया है, तो तुम व तुम्हारे साथी, पीठ दिखा कर भागते हुए , यह कह रहे हैं- " यह विद्रोह है. यह विद्रोह है."
-संजीव निगम
कवि अपना कर्तव्य निभा तू
छा रहे निराशा के बादल, अंधियारा बढ़ रहा प्रतिपल । घुट-घुट कर जी रहा आदमी आदमी नचा रहा आदमी । आशा के कुछ गीत सजा तू, कवि अपना कर्तव्य निभा तू।
मानवता लहू लुहान पड़ी, बुद्धि चेतना से बनी बड़ी । रक्त पिपाशा है पशु समान, हेय मनुज अन्य, निज अभिमान । सुन धरती का यह रोना तू, कवि अपना कर्तव्य निभा तू।
कर्म क्रूर, पाखण्ड, धूर्तता, विध्वंस, वासना, दानवता । लुप्त मानव का जन से प्यार, निज स्वार्थ वश करता संहार । जागरण के अब गीत गा तू, कवि अपना कर्तव्य निभा तू।
भोग में है खॊया इंसान, भूल गया है स्नेह, बलिदान । उन्माद, शोषण, कुमति विचार, बना यही मानव व्यवहार । पथ मानव को उचित बता तू, कवि अपना कर्तव्य निभा तू।
है जेबें भर रहे कुशासक, जनता पिस रही क्यों नाहक । सुविधाओं की खस्ता हालत, पग-पग, पल-पल जीवन आहत। उनींदी आँखे खोल अब तू, कवि अपना कर्तव्य निभा तू ।
अर्थ सभी कृत्यों का तल है, ज्ञान, तेज, तप सब निर्बल है । विस्मित सभ्यता, मौन आघात, कैसे मिटे यह काली रात ? ज्योति पुंज कोई बिखरा तू, कवि अपना कर्तव्य निभा तू ।
वाणी - अमृत, अंतर - विष है, जीवन बना छल साजिश है । धमनी रक्त श्वेत हुआ है, प्रस्तर मानव हृदय हुआ है । प्राणों में नव रुधिर बहा तू, कवि अपना कर्तव्य निभा तू।
-कवि कुलवंत सिंह
गौरव गाथा
गंगा की धारा, यमुना का पानी, भारत की सुनो यह अनुपम कहानी।
छोड़े सुंदर भवन, ले धनुष निषंग, सीता के संग, वन चले राम चंद्र, अँसुवन से भीगीं कौशल्या रानी। सुनो साकेत की यह करुण कहानी। गंगा की धारा, यमुना का पानी, भारत की सुनो यह अनुपम कहानी।
वृंदावन कदंब, रास का आनंद, छोड़ तात-मात, सखि राधा का संग, कंस-हनन, मथुरा चले कृष्ण चंद, सुनो गोकुल की यह अद्भुत कहानी। गंगा की धारा, यमुना का पानी, भारत की सुनो यह अनुपम कहानी।
सोई यशोधरा को राहुल के संग, छोड़ माता-पिता और सब राग-रंग, बन ले सिद्धार्थ सत्य-संधानी। सुनो कपिलवस्तु की दिव्य कहानी। गंगा की धारा, यमुना का पानी, भारत की सुनो, यह अनुपम कहानी।
उसने बहुत ही सहज शब्दों में पूछा था, तो तुम घर जा रही हो, और मन सोच में पड़ गया था। बाज़ारों में घूमते, सड़कों पर चलते एक पहचान स्वतः: ही मेरा परिचय देती है, कि मैं भारतीय हूँ, मुझे कुछ बताने या कहने की ज़रूरत नहीं पड़ती। पर भारत जाने के पहले काग़ज़ी कार्यवाही से गुज़रना पड़ता है, अनुमति लेनी पड़ती है कि मैं भारत में कितने दिन तक रह सकती हूँ क्योंकि मैं अब भारतीय नहीं रही, दूसरे देश में जाकर बस गई हूँ। क्या है फिर मेरी पहचान, कौन सा है मेरा देश--या फिर अब कोई नहीं? जड़ से उखड़े पेड़ों की तरह बस अंत ही अंत है? कहीं यह सिर्फ़ वही असुरक्षित प्रवासी मानसिकता तो नहीं, पाने खोने और जुड़ने व टूटने का दर्द ही तो नहीं? पिछले तीन दशक से यहीं पर रह रही हूँ। वह किशोरी जो कभी भारत छोड़कर आई थी आज भारत की तरह ही, बस यादों में ही रहती है। भारत की तरह ही उसके पास भी पलट पलट कर लौटती हूँ और दूर नहीं हो पाती उससे, परंतु मैं अब वह नहीं। जैसे कि भारत में अब कोई मेरा अपना घर नहीं, बस पूरा भारत ही मेरा अपना है। कौन सा है फिर मेरा देश और मेरा घर? ब्रिटेन में बसा यह घर जिसमें बैठकर रोज़ ही सोचती हूँ कि एक दिन अपने घर अपने देश ज़रूर ही लौट पाऊँगी या फिर भारत जिसे शारीरिक रूप से पीछे छोड़ आई हूँ और जो मुझे अब अपना नहीं मानता या मानता भी है तो एक दूरी, एक ठंडेपन के साथ।...मेरा अपना देश, जो अब मेरी आस्था और पहचान पर सवाल जवाब करता रहेगा, मुझे पूरी तरह से अपना नहीं समझेगा, जैसे कि यह मेरा अपनाया हुआ देश भी एक फ़र्क़, एक दूरी के साथ ही मुझे अपना कह पाएगा? मन को बार बार ही टटोला है, पर हर बार ही उत्तर हाथ में आ-आकर फिसल जाते हैं। कभी एक का पलड़ा भारी हो जाता है तो कभी दूसरे का। और तब हारकर यही सोचना पड़ता है क्यों करनी पड़ती है हमें यह भावनात्मक और नैतिक काट छाँट---- क्यों हम आज भी, इस इक्कीसवीं सदी में आकर भी, शांति और सौहाद्र के साथ अपनी वेश भूषा और सांस्कृतिक विभिन्नता के साथ भी, हर तरह की भिन्नता और वैमनस्य को भुलाकर, इस धरती के वासी होकर नहीं रह सकते? भारत में तो पूरे भारतीय और इंग्लैंड में तो पूरे ब्रिटिश-- दोनों देश ही पूरे अपने, बिना किसी प्रमाण या रोक टोक के--दो देश ही क्यों, पूरा विश्व हमारा अपना और हम उसके?
आज संचार की आधुनिकतम तकनीकों ने दुनिया को बहुत नज़दीक कर दिया है। एक जगह की ख़बर तुरंत ही दूसरी जगह पहुँचती है। मिनट भी नहीं लगते सब कुछ आँखों से तुरंत ही देखा जा सकता है, उसका हिस्सा बना जा सकता है, चाहे वह कोई महोत्सव हो या आपदा या फिर कोई ज़रूरी या सूचनात्मक सम्मेलन ही। ऐसे में छोटे से छोटे कोने में बैठे आदमी का भी खुद को विश्व से जुड़ा महसूस करना, उसका हिस्सा समझना स्वाभाविक ही है। आज वह सुदूर बसे देशों के भी कोने कोने से भली भाँति वाक़िफ़ हैं। फिर यह प्रवास की परंपरा तो पुरानी है, मानव ही नहीं, पक्षियों तक में नैसर्गिक है। मौसम अनुसार पक्षी ठंडी जगहों को छोड़ गर्म जगहों में जाते हैं, गर्म ज़्यादा हो तो ठंडी जगहों पर आवास बनाते हैं। वैसे ही लोग गाँव छोड़कर शहर और शहर छोड़कर दूसरे देश, इसका अर्थ यह नहीं कि जो पीछे छूटा उसे त्याग दिया या भूल गए। बारबार लौटना भी, पशु पक्षी हों या मानव, घर या अपनी पहचानी जगहों की तरफ़ स्वाभाविक है। यह आवागमन तो चलता ही रहेगा, जीवन की तरह। और हर नया वातावरण समझ और सामंजस्य माँगता है जैसे कि नया रिश्ता। बात बस इतनी है कि यदि हम इसे सफल और सुव्यवस्थित देखना चाहते हैं तो रास्ते की कठिनाइयों को कम कर पाएँ तो ही अच्छा---परिवर्तन जितना सहज और पीड़ा हीन होगा उतना ही आरामदेह व सफल। यदि अनावश्यक तकलीफ़ें कम या समाप्त नहीं कर सकते तो कम से कम बढ़ानी तो हर्गिज़ ही नहीं चाहिए, चाहे वो ब्यूरोक्रेसी हो या होस्ट कम्यूनिटी। बात सन अस्सी की है---जुलाई का महीना और उत्तरी भारत की वह चिलचिलाती धूप। उस पर से हवाई अड्डे की एक लंबी औपचारिक जाँच पड़ताल। अजनबी और विदेशियों के साथ उस लंबी कतार में खड़ी, कभी गर्मी से परेशान रोते बच्चों के आँसू पोंछती, तो कभी माथे का पसीना। भारत में रहते हुए भी अक्सर प्रार्थना किया करते थे कि वे गर्मी की छुट्टियाँ अगस्त तक रहनी ही चाहिए जिससे कि जुलाई का यह चिपचिप महीना पहाड़ों पर ही बिताया जा सके---और आज यूँ परेशान होना---ख़ैर यह बात तो लाल फ़ीते और सरकारी काग़ज़ों की जाँच पड़ताल की है और हम जैसे साधारण व्यक्ति को तो इससे गुज़रना ही पड़ेगा और मजबूरी यह है कि इंग्लैंड में बच्चों की स्कूल से लंबी छुट्टी भी तो बस इन्हीं महीनों में होती है! ले देकर यह जुलाई, अगस्त ही ऐसे दो महीने होते हैं जब भारत आया-ज़ाया जा सकता है, बेफ़िक्र होकर चार- छह हफ़्ते रहा जा सकता है। और तब मन में एक सवाल पहली बार उमड़ा-घुमड़ा था--क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम भारत से निकले या निकाले गए लोगों के पास एक ऐसा प्राविधान हो --एक कम्फर्ट ब्लैंकेट हो जिसके तहत हम दोनों देशों के नागरिक बनकर रह पाएँ, भारत लौटें तो विदेशियों की कतार में न खड़े हों --लगे कि घर लौट रहे हैं--जैसे कि ब्रिटेन के प्रवासी बिना किसी रोकटोक, इंतज़ार या परेशानी के इंग्लैंड से बाहर आते-जाते हैं । आख़िर अपने मूल या मातृ देश में और दुनिया के अन्य देशों में कुछ तो फ़र्क़ होना ही चाहिए ? काश हम भारत वंशी भी बिना किसी रोक-टोक के अपने देश आ-जा सकते ! क्यों हमें अपने ही घर आने के लिए अनुमति या बीसा चाहिए, क्यों हमें भी इन विदेशियों की तरह एक लंबी कतार में खड़े होकर इंतज़ार करना पड़ता है--हम मात्र पर्यटक तो नहीं, घर लौट रहे हैं फिर यह भेदभाव क्यों ? कुंडली मारे बैठे आक्रोश ने एक बार फिर अपने सारे शिकायत और दंश से भरे फ़न उठा लिए थे। हर साल का यही सिलसिला था। हर जुलाई किसी औफिसर या अधिकारी से भारत के हवाई अड्डे पर परेशान होकर पूछती, कि क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हमारे पास दोनों देशों के पासपोर्ट हों? क्यों नहीं, आप जैसे लोग कोशिश करेंगे तो ज़रूर हो जाएगा-- एक औफिसर ने यूँ गर्मी से परेशान उबले टमाटर जैसे चेहरे को देखकर आधे मज़ाक और आधी सच्चाई के साथ जवाब दे ही दिया था, आखिर। बात चाहे कैसे भी कही गई हो और कितनी भी अविश्वनीय हो परंतु एक राहत और आस का बीज उसी पल मन के उत्साही कोने में रोपित हो चुका था। निश्चय ही ऐसा दिन ज़रूर आएगा जब हम भटके प्रवासियों को अपने अपनाए देशों के अलावा, पीछे छूटी भारत की भी नागरिकता, यानी कि दोहरी नागरिकता का गौरव मिल पाएगा--ऐसे ही कितने संभव असंभव सपने और आश्वासनों से मन बार बार खुद को आज भी सांत्वना दे ही लेता है। विवश हूँ पर अक्सर ही सोचने पर कि आज के इस असुरक्षित और अराजक समाज में यह कैसे संभव हो पाएगा--सात जुलाई को लंदन में हुए धमाकों की गूँज गई नहीं है और वह तहस-नहस आज भी असुरक्षा का भाव मन में जगाती है । 11 सितंबर की वह तारीख़ पूरी अमेरिका ही क्या, विश्व को भी सावधान करती है कि इतना आसान नहीं यह सब? फिर भारत के पास तो विकसित देशों जैसी सुविधाएँ भी नहीं---सोच को सावधान करना चाहता है मन। मुँह पर ठंडे पानी के छींटे दे शांत होने की कोशिश करती हूँ, जब तक हम समझदार नहीं होंगे, हिंसा और अराजकता है, छुपी साज़िशें और स्वार्थ है, ऐसे प्रावधानों में सुख-सुविधा के साथ-साथ हज़ार ख़तरे भी हैं। क्या है परंतु यह दुहरी नागरिकता-- मात्र एक जुड़े रहने का भावात्मक कवच या फिर वाक़ई में वापस की, अपने देश, अपनी मिट्टी में पुनः: स्थापन की एक सुखद प्रक्रिया? शायद दोनों ही--परंतु बस भावात्मक और रागात्मक स्तर पर ही। शायद और भी दर्द और चुभन हो, जब हम भारत जाएँ और हमें भारतीयों से भिन्न समझा जाए-- क्या बर्दाश्त कर पाएँगे हम अपनों का ही यह भेदभाव---क्योंकि यथार्थ कभी भी सपनों की रूपरेखा में तो नहीं ही सिमट पाता है-- हम तो उसे अपना समझें परंतु वे हम पर पूरी तरह से विश्वास न कर पाए--अपना न पाएँ? बाहर वालों की तरह उसके हित में लिए गए किसी भी निर्णय में हमारी कोई राय नहीं होगी, आज भारत सरकार ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया है यह, बोट का अधिकार हमें न देकर। एक मेहमान की तरह आओ और चुपचाप सारा दर्द, सारी अराजकता देखते-सहते, मन और आँखों में समेटे वापस लौट जाओ--पर यह तो हम पहले भी करते आए हैं या कर सकते थे? तो क्या बस यह दोहरी नागरिकता हमें हवाई अड्डों की उन लंबी कतारों से बचाने के लिए, मात्र वीसा के आवेदन पत्र से मुक्ति देने के लिए ही है? ब्रिटेन में अपनी एक भारतीय मूल की सहेली से उत्साहित होकर पूछ ही डाला - क्या तुम अब दोहरी नागरिकता लोगी? नही जी, क्या करना है ? अपना काम तो पंद्रह साल वाले इस कार्ड से आराम से चल रहा है। वह सभी सुविधाएँ हैं जो दोहरी नागरिकता की हैं, हमारे पास हैं, बस बंधन नहीं हैं। बंधन---? मुँह आश्चर्य से खुला रह गया----कैसा बंधन-- जिज्ञासा खुद को रोक नहीं पाई? जी हाँ, अगर आप दो देशों के नागरिक बनते हो ब्रिटिश नागरिकता की कुछ सुरक्षा और सुविधाएँ छोड़नी भी तो पड़ेंगी, क्योंकि वह ज़िम्मेदारी आप जहाँ हो उस देश की हो जाती हैं। दुनिया के हर अन्य देश में ब्रिटेन आपको अपनी सुविधा देगा सिवाय भारत के। अब उदास होने की मेरी बारी थी--फिर दोहरी नागरिकता का क्या मतलब---मैने तो सोचा था कि आपको हर वक्त दोनों देशों की सभी सुविधाएँ मिलेंगी, क्योंकि आप दोनों देशों के नागरिक की गौरान्वित स्थिति में हो ? अमेरिका में बसे श्री वीरेन्द्र गुप्ता जी ने यह बात कुछ और स्पष्ट शब्दों में कही---मान लो कि आप किसी दंगे फ़साद या लफ़ड़े में भारत में फँस जाओ तो अमरीकी सरकार आपके बचाव के लिए कोई हस्तक्षेप नहीं दे पाएगी जो अभी तक तुरंत ही देती है और यह एक बड़ा सुरक्षा कवच है। पर क्या भारत की सरकार कोई मदद नहीं करेगी--सवाल मुँह में ही अटका रह जाता है और मस्तिष्क यादों की कैबिनेट से पुनः एक धूल भरी फ़ाइल झाड़ लाता है। सन 86-87 की बात है। 11 साल के बेटे की परीक्षा होने वाली है। बग़ल में बैठी एक एशियन अभिभाविका आवेदन पत्र को भरने में मदद चाहती है। मदद उपरांत बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए पूछ बैठती है--- " तुस्सी पंजाब के तो नहीं लगते---कहीं होर से हो---गुजराती हो (इन्हीं दो प्रांतों के लोगों का बाहुल्य है यहाँ इस शहर में।) ?" " नहीं, उत्तर प्रदेश, से।" हांलाकि उसकी वेशभूषा, भाषा, लहज़ा सब स्पष्ट बता रहे थे फिर भी स्वभावतः सहज होकर बात को आगे बढ़ाने के लिए मैं भी पूछ ही बैठती हूँ " और आप पंजाब से? "
" नहीं, उत्तर प्रदेश, से।"
"नहीं जी, देहली से। ...उसके पहले लाहौर से थे पर अब बस यहीं से हैं...बरमिंघम से। पिछले दंगों में सब कुछ पीछे छोड़ आए। हमारा वीरा घर के दरवाज़े पर मारा गया और किसी ने कुछ नहीं किया--सरकार ने भी नहीं। बस पच्चीस हज़ार रुपये दे दिए। आप ही बताओ बहन, पच्चीस हज़ार रुपयों में कहाँ वीरा मिलता है?"
उसके सवाल की गूँज आज भी विचलित करती है। अपने देश और उसकी व्यवस्था में, शांति और मानवता में आस्था भंग करती है। माना, गुज़रा तो किसी भी क़ीमत पर वापस नहीं आ सकता पर हाँ सरकार को कुछ और संवेदन शीलता के साथ वे आँसू पोंछने चाहिए थे। जब तक हम एक दूसरे की भावनाओं की क़द्र नहीं करेंगे, दूसरों के दुखदर्द को अपना सा महसूस नहीं करेंगे , कोई भी कानून या नागरिकता हमें एक दूसरे से नहीं जोड़ पाएगी। जहाँ स्पेन के उस पांचतारा होटल में जब इंदिरा गांधी के आकस्मिक निधन पर हर देश का नागरिक भारतीय जानकर शोक संदेश दे रहा था, भारत की ज़मीन से जोड़ रहा था---दुख में भी एक गौरव और मान दे रहा था, तो विदेशी भूमि पर भी, अपनेपन का--- मानवता का अहसास हुआ था मुझे। परंतु वहीं दूसरी तरफ ब्रिटेन की सड़कों पर माहौल विद्रूप और शर्मनाक था। कहीं पटाके छूट रहे थे, तो कहीं मिठाइयाँ बट रही थी। कहीं-कहीं तो शैम्पेन की बोतलें तक खोली जा रही थी। अब किसके दुख में रोया जाए और किसके साथ हँसा जाए--हर हालत में भारतीय होने के नाते एक कठिन और शर्मनाक स्थिति थी। अत्याचारी और दुखी दोनों ही, अपने थे, देशवासी थे। और तब पहली बार भारतीय होने पर शर्मिंदगी महसूस हुई थी। और एक बार फिर वही शर्मिंदगी उस शरणार्थी औरत से बात करके हुई। उसके सामने निरुत्तर सर झुकाए बैठी रह गई--किस मुँह से कहूँ ---माफ़ कर दे वह इस अत्याचार को, इस लापरवाही को---अपनों के बीच तो ऐसी बातें होती ही रहती हैं... ? आज के आधुनिक संदर्भ में यह वैश्विक सपना एक ज़रूरत सा बनता दिखलाई दे रहा है. परंतु यदि वाक़ई में हमें सौहाद्र और समझ के यूटोपिया--या रामराज्य को वापस लाना है तो समझ के साथ-साथ मन के भी रास्ते खोलने ही होंगे --अपने स्वार्थ और ज़रूरतों से ऊपर उठकर, ताक़त और अहं की सकरी गलियों से निकलकर। बस काग़ज़ी नियमों या दस्तावेज़ों से ही नागरिकता नहीं मिलती। भाईचारा नहीं आता। यह बंधन तो मनके होते हैं। हर आहत के घावों का उपचार करना होगा। कम-से-कम कोशिश तो अवश्य करनी ही होगी कि ऐसी स्थितियाँ ही न आएँ कि हमारे देश या समाज में ये घाव किसी को मिल पाएँ और अगर कभी किसी भूलचूक या दुर्घटनावश लग भी जाएँ तो नासूर तो हर्गिज़ ही न बन पाएँ। यह एक ज़िम्मेदारी है जिसे निभाकर ही हम वास्तव में सुखी और समृद्ध भारत को पा सकते हैं। दोहरी नागरिकता यानीकि ससुराल जाती बेटी की तरह दुहरी ज़िम्मेदारी का बोझ, जिसे दोनों कुल---मायके और ससुराल (दोनों देशों की) लाज निभानी है। क्या हमारे कंधे इतने चौड़े हैं कि हम यह बोझ बखूबी उठा सकें--क्या हममें इतनी समझ और उदारता है कि हम अपने स्नेह और वक्त को न सिर्फ़ बाँट सकें अपितु यह भी जान सकें कि " प्रेम न बाड़ी उपजे प्रेम न हाट बिकाय/राजा प्रजा जेहि रुचे सीस देह ले जाय।" पर यह तो कोरी भावुकता की बातें हैं, जब पूरी दुनिया में आज कहीं भी यह संभव नहीं दिखता, सही शब्दों के ग़लत अर्थ और नेक इरादों के ग़लत परिणाम निकल आते हैं (अमेरिका का इराक में हस्तक्षेप एक उदाहरण है जहाँ ठीक होने के बजाय स्थिति पूरी तरह से अराजक होती जा रही है।) क्या संभव है इतनी सहजता से ऐसा कर पाना, या बन पाना? माना कि दोहरी नागरिकता--हम प्रवासी भारतीयों का एक सपना आज सच होने जा रहा है परंतु डर लगता है कि क्या हम अपनी निष्ठा और प्रतिबद्धता की इस दोहरी ज़िम्मेदारी को ईमानदारी के साथ बाँट और निभा पाएँगे--- क्या वाक़ई में हम दो देशों के पूरी तरह से होकर रह पाएँगे ? या फिर आज जब भारत एक आर्थिक ताक़त के रूप में उभर रहा है तो बस बहती गंगा में हाथ धोना चाहते हैं हम और आज जब हर एथिनिक वस्तु फ़ैशन में है तो हम भी भारतीय होकर बस "ट्रेन्डी" ही हो रहे हैं ? माना दो देशों की शक्ति और संस्कृति के मिलन से अनगिनित सुविधाओं और सुखद संभावनाओं का जन्म हो सकता है--सफलताएँ पनप सकती हैं परंतु इन सबके बावजूद भी हमें निश्चय ही अपने मन को भली-भाँती टटोलना चाहिए--क्योंकि ऐसे संबंधों के बंधन पूर्ण समर्पण और निष्ठा माँगते है--निश्चय ही व्यक्तिगत समय और स्वतंत्रता का अतिक्रमण भी करते ही हैं। शायद जल्दी ही एक ऐसा वक्त भी आए जब हम सिर्फ़ विश्व के ही नागरिक हों--- यह देश और समाज की सीमाएँ और भेदभाव वाकई में रह ही न जाएँ---और सोचने की बात यह है कि अगर वाक़ई में ऐसा हुआ तो वह वक्त बुरा नहीं होगा? सीमा से उपजे सारे झगड़े और विवाद ख़त्म हो जाएँगे, हम छोटे छोटे देश और समाज के दायरों से निकलकर विश्व कैनवस पर रहेंगे और इस तरह से बचाई संपदा और ऊर्जा मानव के हित के लिए इस्तेमाल की जाएगी, बजाय सब कुछ बारूद बनकर धुँआ-धुँआ होने के। कोई एक दूसरे को बस इसलिए नहीं मारेगा कि वह किसी और देश का वासी है---- इन सवालों का जबाव तो ख़ैर वक्त ही बतला पाएगा परंतु अगर हमने और हमारी सरकार ने हर ज़िम्मेदारी सोच और समझ के साथ सहृदयता से न निभाई तो, वाक़ई में सँभलने की बात है - अगर यह दोहरी नागरिकता, वाक़ई में दोहरी नागरिकता न बन पाई--दो पासपोर्ट, हमें दो देशों के ज़िम्मेदार और पूर्ण नागरिक न बना पाए, तो बस चंद काग़ज़ी समझौते और सुविधाएँ ले-देकर --एक ग्लोरिफाइड पी.आई.ओ कार्ड जेट-एज एन.आर.ई के लिए, जिसे ले और देकर ही सब ख़ुश हो गए तो कहीं ऐसा तो नहीं कि धोबी का कुत्ता, घर का, न घाट का- हम कहीं के न रह जाए --- अवांछनीय तत्वों की अराजकता से त्रस्त पूरा विश्व ही त्राहि त्राहि कर उठे और जिसकी लाठी हो चारों तरफ़ बस उसी की भैंसें नज़र आएँ----वैसे भी तो दो नावों पर पैर रखकर नदिया पार करना इतना आसान भी नहीं? नवंबर---2005
बंदी!'' ''क्या है? सोने दो।'' ''मुक्त होना चाहते हो?'' ''अभी नहीं, निद्रा खुलने पर, चुप रहो।'' ''फिर अवसर न मिलेगा।'' ''बडा शीत है, कहीं से एक कंबल डालकर कोई शीत से मुक्त करता।'' ''आंधी की संभावना है। यही एक अवसर है। आज मेरे बंधन शिथिल हैं।'' ''तो क्या तुम भी बंदी हो?'' ''हां, धीरे बोलो, इस नाव पर केवल दस नाविक और प्रहरी है।'' ''शस्त्र मिलेगा?'' ''मिल जाएगा। पोत से संबद्ध रज्जु काट सकोगे?'' ''हां।'' समुद्र में हिलोरें उठने लगीं। दोनों बंदी आपस में टकराने लगे। पहले बंदी ने अपने को स्वतंत्र कर लिया। दूसरे का बंधन खोलने का प्रयत्न करने लगा। लहरों के धक्के एक-दूसरे को स्पर्श से पुलकित कर रहे थे। मुक्ति की आशा-स्नेह का असंभावित आलिंगन। दोनों ही अंधकार में मुक्त हो गए। दूसरे बंदी ने हर्षातिरेक से उसको गले से लगा लिया। सहसा उस बंदी ने कहा-''यह क्या? तुम स्त्री हो?''
''क्या स्त्री होना कोई पाप है?'' - अपने को अलग करते हुए स्त्री ने कहा। ''शस्त्र कहां है - तुम्हारा नाम?'' ''चंपा।''
तारक-खचित नील अंबर और समुद्र के अवकाश में पवन ऊधम मचा रहा था। अंधकार से मिलकर पवन दुष्ट हो रहा था। समुद्र में आंदोलन था। नौका लहरों में विकल थी। स्त्री सतर्कता से लुढक़ने लगी। एक मतवाले नाविक के शरीर से टकराती हुई सावधानी से उसका कृपाण निकालकर, फिर लुढक़ते हुए, बन्दी के समीप पहुंच गई। सहसा पोत से पथ-प्रदर्शक ने चिल्लाकर कहा - ''आंधी!''
आपत्ति-सूचक तूर्य बजने लगा। सब सावधान होने लगे। बंदी युवक उसी तरह पडा रहा। किसी ने रस्सी पकडी, क़ोई पाल खोल रहा था। पर युवक बंदी ढुलककर उस रज्जु के पास पहुंचा, जो पोत से संलग्न थी। तारे ढंक गए। तरंगे उद्वेलित हुई, समुद्र गरजने लगा। भीषण आंधी, पिशाचिनी के समान नाव को अपने हाथों में लेकर कंदुक-क्रीडा और अट्टहास करने लगी।
एक झटके के साथ ही नाव स्वतंत्र थी। उस संकट में भी दोनों बंदी खिलखिला कर हंस पडे। आंधी के हाहाकार में उसे कोई न सुन सका।
अनंत जलनिधि में उषा का मधुर आलोक फूट उठा। सुनहली किरणों और लहरों की कोमल सृष्टि मुस्कराने लगी। सागर शांत था। नाविकों ने देखा, पोत का पता नहीं। बंदी मुक्त हैं।
नायक ने कहा - ''बुधगुप्त! तुमको मुक्त किसने किया?''
कृपाण दिखाकर बुधगुप्त ने कहा - ''इसने।''
नायक ने कहा - ''तो तुम्हें फिर बंदी बनाऊँगा।''
''किसके लिए? पोताध्यक्ष मणिभद्र अतल जल में होगा - नायक! अब इस नौका का स्वामी मैं हूँ।''
''तुम? जलदस्यु बुधगुप्त? कदापि नहीं।'' - चौंककर नायक ने कहा और अपना कृपाण टटोलने लगा! चंपा ने इसके पहले उस पर अधिकार कर लिया था। वह क्रोध से उछल पडा।
''तो तुम द्वंद्वयुद्ध के लिए प्रस्तुत हो जाओ; जो विजयी होगा, वह स्वामी होगा।'' - इतना कहकर बुधगुप्त ने कृपाण देने का संकेत किया। चंपा ने कृपाण नायक के हाथ में दे दिया। भीषण घात-प्रतिघात आरंभ हुआ। दोनों कुशल, दोनों त्वरित गतिवाले थे। बडी निपुणता से बुधगुप्त ने अपना कृपाण दाँतों से पकडक़र अपने दोनों हाथ स्वतंत्र कर लिए। चंपा भय और विस्मय से देखने लगी। नाविक प्रसन्न हो गए। परंतु बुधगुप्त ने लाघव से नायक का कृपाणवाला हाथ पकड लिया और विकट हुंकार से दूसरा हाथ कटि में डाल, उसे गिरा दिया। दूसरे ही क्षण प्रभात की किरणों में बुधगुप्त का विजयी कृपाण उसके हाथों में चमक उठा। नायक की कातर आँखें प्राण-भिक्षा माँगने लगीं।
बुधगुप्त ने कहा - ''बोलो, अब स्वीकार है कि नहीं?''
''मैं अनुचर हूं, वरूणदेव की शपथ। मैं विश्वासघात नहीं करूँगा।'' बुधगुप्त ने उसे छोड दिया।
चंपा ने युवक जलदस्यु के समीप आकर उसके क्षतों को अपनी स्निग्ध दृष्टि और कोमल करों से वेदना-विहीन कर दिया। बुधगुप्त के सुगठित शरीर पर रक्त-बिंदु विजय-तिलक कर रहे थे।
विश्राम लेकर बुधगुप्त ने पूछा,''हम लोग कहाँ होंगे?''
''बालीद्वीप सें बहुत दूर, संभवतः एक नवीन द्वीप के पास, जिसमें अभी हम लोगों का बहुत कम आना-जाना होता है। सिंहल के वणिकों का वहाँ प्राधान्य है।''
''कितने दिनों में हम लोग वहाँ पहुँचेंगे?''
''अनुकूल पवन मिलने पर दो दिन में। तब तक के लिए खाद्य का अभाव न होगा।''
सहसा नायक ने नाविकों को डाँड लगाने की आज्ञा दी, और स्वयं पतवार पकडक़र बैठ गया। बुधगुप्त के पूछने पर उसने कहा - ''यहाँ एक जलमग्न शैलखंड है। सावधान न रहने से नाव टकराने का भय है।''
''तुम्हें इन लोगों ने बंदी क्यों बनाया?''
''वाणिक् मणिभद्र की पाप-वासना ने।''
''तुम्हारा घर कहाँ है?''
''जाह्नवी के तट पर। चंपा-नगरी की एक क्षत्रिय बालिका हूँ। पिता इसी मणिभद्र के यहाँ प्रहरी का काम करते थे। माता का देहावसान हो जाने पर मैं भी पिता के साथ नाव पर ही रहने लगी। आठ बरस से समुद्र ही मेरा घर है। तुम्हारे आक्रमण के समय मेरे पिता ने ही सात दस्युओं को मारकर जल-समाधि ली। एक मास हुआ, मैं इस नील नभ के नीचे, नील जलनिधि के ऊपर, एक भयानक अनंतता में निस्सहाय हूँ -अनाथ हूँ। मणिभद्र ने मुझसे एक दिन घृणित प्रस्ताव किया। मैंने उसे गालियाँ सुनाई। उसी दिन से बंदी बना दी गई।'' - चंपा रोष से जल रही थी।
''मैं भी ताम्रलिप्ति का एक क्षत्रिय हूँ, चंपा! परंतु दुर्भाग्य से जलदस्यु बनकर जीवन बिताता हूँ। अब तुम क्या करोगी?''
''मैं अपने अदृष्ट को अनिर्दिष्ट ही रहने दूँगी। वह जहाँ ले जाए।'' - चंपा की आँखें निस्सीम प्रदेश में निरूद्देश्य थीं। किसी आकांक्षा के लाल डोरे न थे। धवल अपांगों में बालकों के सदृश विश्वास था। हत्या-व्यवसायी दस्यु भी उसे देखकर काँप गया। उसके मन में एक संभ्रमपूर्ण श्रध्दा यौवन की पहली लहरों को जगाने लगी। समुद्र-वृक्ष पर विलंबमयी राग-रंजित संध्या थिरकने लगी। चंपा के असंयत कुंतल उसकी पीठ पर बिखरे थे। दुद्रांत दस्यु ने देखा, अपनी महिमा में अलौकिक एक तरूण बालिका! वह विस्मय से अपने हृदय को टटोलने लगा। उसे एक नई वस्तु का पता चला। वह थी - कोमलता!
उसी समय नायक ने कहा - ''हम लोग द्वीप के पास पहुँच गए।''
बेला से नाव टकराई। चंपा निर्भीकता से कूद पडी। माँझी भी उतरे। बुधगुप्त ने कहा - ''जब इसका कोई नाम नहीं है, तो हम लोग इसे चंपा-द्वीप कहेंगे।''
चंपा हँस पडी।
पाँच बरस बाद -
शरद के धवल नक्षत्र नील गगन में झलमला रहे थे। चंद्र की उज्ज्वल विजय पर अंतरिक्ष में शरदलक्ष्मी ने आशीर्वाद के फूलों और खीलों को बिखेर दिया।
चंपा के एक उच्चसौध पर बैठी हुई तरूणी चंपा दीपक जला रही थी।
बडे यत्न से अभ्र्रक की मंजुषा में दीप धर कर उसने अपनी सुकुमार ऊँगलियों से डोरी खींची। वह दीपाधार ऊपर चढने लगा। भोली-भोली आँखें उसे ऊपर चढते हर्ष से देख रही थीं। डोरी धीरे-धीरे खींची गई। चंपा की कामना थी कि उसका आकाशदीप नक्षत्रों से हिलमिल जाए; किंतु वैसा होना असंभव था। उसने आशाभरी आँखें फिरा लीं।
सामने जल-राशी का रजत श्रृंगार था। वरूण बालिकाओं के लिए लहरों से हीरे और नीलम की क्रीडा शैल-मालाएँ बन रही थीं - और वे मायाविनी छलनाएँ - अपनी हँसी का कलनाद छोडक़र छिप जाती थीं। दूर-दूर से धीवरों का वंशी-झनकार उनके संगीत-सा मुखरित होता था। चंपा ने देखा कि तरल संकुल जलराशि में उसके कंदील का प्रतिबिंब अस्तव्यस्त था! वह अपनी पूर्णता के लिए सैंकडों चक्कर काटता था। वह अनमनी होकर उठ खडी हुई। किसी को पास न देखकर पुकारा - ''जया!'' एक श्यामा युवती सामने आकर खडी हुई। वह जंगली थी। नील नभोमंडल - से मुख में शुद्ध नक्षत्रों की पंक्ति के समान उसके दाँत हँसते ही रहते। वह चंपा को रानी कहती; बुधगुप्त की आज्ञा थी।
''महानाविक कब तक आयेंगे, बाहर पूछो तो।'' चंपा ने कहा। जया चली गई।
दूरागत पवन चंपा के अंचल में विश्राम लेना चाहता था। उसके हृदय में गुदगुदी हो रही थी। आज न जाने क्यों वह बेसुध थी। एक दीर्घकाय दृढ पुरूष ने उसकी पीठ पर हाथ रख चमत्कृत कर दिया। उसने फिर कर कहा - ''बुधगुप्त!''
''बावली हो क्या? यहाँ बैठी हुई अभी तक दीप जला रही हो, तुम्हें यह काम करना है?''
''क्षीरनिधिशायी अनंत की प्रसन्नता के लिए क्या दासियों से आकाशदीप जलवाऊँ?''
''हँसी आती है। तुम किसको दीप जलाकर पथ दिखलाना चाहती हो? उसको, जिसको तुमने भगवान मान लिया है?''
''हाँ, वह भी कभी भटकते हैं, भूलते हैं; नहीं तो, बुधगुप्त को इतना ऐश्वर्य क्यों देते?''
''तो बुरा क्या हुआ, इस द्वीप की अधीश्वरी चंपारानी!''
''मुझे इस बंदीगृह से मुक्त करो। अब तो बाली, जावा और सुमात्रा का वाणिज्य केवल तुम्हारे ही अधिकार में है महानाविक! परंतु मुझे उन दिनों की स्मृति सुहावनी लगती है, जब तुम्हारे पास एक ही नाव थी और चंपा के उपकूल में पण्य लाद कर हम लोग सुखी जीवन बिताते थे - इस जल में अगणित बार हम लोगों की तरी आलोकमय प्रभात में तारिकाओं की मधुर ज्योति में - थिरकती थी। बुधगुप्त! उस विजन अनंत में जब माँझी सो जाते थे, दीपक बुझ जाते थे, हम-तुम परिश्रम से थककर पालों में शरीर लपेटकर एक-दूसरे का मुँह क्यों देखते थे? वह नक्षत्रों की मधुर छाया ... ''
''तो चंपा! अब उससे भी अच्छे ढंग से हम लोग विचर सकते हैं। तुम मेरी प्राणदात्री हो, मेरी सर्वस्व हो।''
''नहीं - नहीं, तुमने दस्युवृत्ति छोड दी परंतु हृदय वैसा ही अकरूण, सतृष्ण और ज्वलनशील है। तुम भगवान के नाम पर हँसी उडाते हो। मेरे आकाशदीप पर व्यंग कर रहे हो। नाविक! उस प्रचंड आँधी में प्रकाश की एक-एक किरण के लिए हम लोग कितने व्याकुल थे। मुझे स्मरण है, जब मैं छोटी थी, मेरे पिता नौकरी पर समुद्र में जाते थे - मेरी माता, मिट्टी का दीपक बाँस की पिटारी में भागीरथी के तट पर बाँस के साथ ऊँचे टाँग देती थी। उस समय वह प्रार्थना करती - ''भगवान्! मेरे पथ-भ्रष्ट नाविक को अंधकार में ठीक पथ पर ले चलना।'' और जब मेरे पिता बरसों पर लौटते तो कहते - ''साध्वी! तेरी प्रार्थना से भगवान् ने संकटों में मेरी रक्षा की है।'' वह गद्गद हो जाती। मेरी माँ? आह नाविक! यह उसी की पुण्य-स्मृति है। मेरे पिता, वीर पिता की मृत्यु के निष्ठुर कारण, जल-दस्यु! हट जाओ।'' - सहसा चंपा का मुख क्रोध से भीषण होकर रंग बदलने लगा।महानाविक ने कभी यह रूप न देखा था। वह ठठाकर हँस पडा।
''यह क्या, चंपा? तुम अस्वस्थ हो जाओगी, सो रहो।'' - कहता हुआ चला गया। चंपा मुठ्ठी बाँधे उन्मादिनी-सी घूमती रही।
निर्जन समुद्र के उपकूल में वेला से टकरा कर लहरें बिखर जाती थीं। पश्चिम का पथिक थक गया था। उसका मुख पीला पड ग़या। अपनी शांत गंभीर हलचल में जलनिधि विचार में निमग्न था। वह जैसे प्रकाश की उन्मलिन किरणों से विरक्त था।
चंपा और जया धीरे-धीरे उस तट पर आकर खडी हो गई। तरंग से उठते हुए पवन ने उनके वसन को अस्त-व्यस्त कर दिया। जया के संकेत से एक छोटी-सी नौका आई। दोनों के उस पर बैठते ही नाविक उतर गया। जया नाव खेने लगी। चंपा मुग्ध-सी समुद्र के उदास वातावरण में अपने को मिश्रित कर देना चाहती थी।
''इतना जल! इतनी शीतलता! हृदय की प्यास न बुझी। पी सकूँगी? नहीं! तो जैसे वेला में चोट खाकर सिंधु चिल्ला उठता है, उसी के समान रोदन करूँ?
या जलते हुए स्वर्ण-गोलक सदृश अनंत जल में डूबकर बुझ जाऊँ?'' - चंपा के देखते-देखते पीडा और ज्वलन से आरक्त बिंब धीरे-धीरे सिंधु में चौथाई-आधा, फिर संपूर्ण विलीन हो गया। एक दीर्घ निश्वास लेकर चंपा ने मुँह फेर लिया। देखा, तो महानाविक का बजरा उसके पास है। बुधगुप्त ने झुककर हाथ बढाया। चंपा उसके सहारे बजरे पर चढ ग़ई।दोनों पास-पास बैठ गए।
''इतनी छोटी नाव पर इधर घूमना ठीक नहीं। पास ही वह जलमग्न शैलखंड है। कहीं नाव टकरा जाती या ऊपर चढ ज़ाती, चंपा तो?''
''अच्छा होता, बुधगुप्त! जल में बंदी होना कठोर प्राचीरों से तो अच्छा है।''
''आह चंपा, तुम कितनी निर्दय हो! बुधगुप्त को आज्ञा देकर देखो तो, वह क्या नहीं कर सकता। जो तुम्हारे लिए नए द्वीप की सृष्टि कर सकता है, नई प्रजा खोज सकता है, नए राज्य बना सकता है, उसकी परीक्षा लेकर देखो तो...। क़हो, चंपा! वह कृपाण से अपना हृदय-पिंड निकाल अपने हाथों अतल जल में विसर्जन कर दे।'' - महानाविक - जिसके नाम से बाली, जावा और चंपा का आकाश गूँजता था, पवन थर्राता था - घुटनों के बल चंपा के सामने छलछलाई आँखों से बैठा था।
सामने शैलमाला की चोटी पर हरियाली में विस्तृत जल-देश में नील पिंगल संध्या, प्रकृति की सहृदय कल्पना, विश्राम की शीतल छाया, स्वप्नलोक का सृजन करने लगी।उस मोहिनी के रहस्यपूर्ण नीलजाल का कुहक स्फुट हो उठा। जैसे मदिरा से सारा अंतरिक्ष सिक्त हो गया। सृष्टि नील कमलों में भर उठी। उस सौरभ से पागल चंपा ने बुधगुप्त के दोनों हाथ पकड लिए। वहाँ एक आलिंगन हुआ, जैसे क्षितिज में आकाश और सिंधु का। किंतु उस परिरंभ में सहसा चैतन्य होकर चंपा ने अपनी कंचुकी से एक कृपाण निकाल लिया।
''बुधगुप्त! आज मैं अपने प्रतिशोध का कृपाण अतल जल में डुबा देती हूँ। हृदय ने छल किया, बार-बार धोखा दिया!'' - चमककर वह कृपाण समुद्र का हृदय वेधता हुआ विलीन हो गया।
''तो आज से मैं विश्वास करूँ, क्षमा कर दिया गया?'' - आश्चर्य-कंपित कंठ से महानाविक ने पूछा।
''विश्वास? कदापि नहीं, बुधगुप्त! जब मैं अपने हृदय पर विश्वास नहीं कर सकी, उसी ने धोखा दिया, तब मैं कैसे कहूँ? मैं तुम्हें घृणा करती हूँ फिर भी तुम्हारे लिए मर सकती हूँ। अंधेर है जलदस्यु। तुम्हें प्यार करती हूँ।'' - चंपा रो पडी।
वह स्वप्नों की रंगीन संध्या, तम से अपनी आँखें बंद करने लगी थी। दीर्घ निश्वास लेकर महानाविक ने कहा - ''इस जीवन की पुण्यतम घडी क़ी स्मृति में एक प्रकाश-गृह बनाऊंगा, चंपा! यहीं उस पहाडी पर। संभव है कि मेरे जीवन की धुँधली संध्या उससे आलोकपूर्ण हो जाए!''
चंपा के दूसरे भाग में एक मनोरम शैलमाला थी। वह बहुत दूर तक सिंधु-जल में निमग्न थी। सागर का चंचल जल उस पर उछलता हुआ उसे छिपाए था। आज उसी शैलमाला पर चंपा के आदि-निवासियों का समारोह था। उन सबों ने चंपा को वनदेवी-सा सजाया था। ताम्रलिप्ति के बहुत-से सैनिक नाविकों की श्रेणी में वन-कुसुम-विभूषिता चंपा शिविकारूढ होकर जा रही थी।
शैल के एक ऊँचे शिखर पर चंपा के नाविकों को सावधान करने के लिए सुदृढ दीप-स्तंभ बनवाया गया था। आज उसी का महोत्सव है। बुधगुप्त स्तंभ के द्वार पर खडा था। शिविका से सहायता देकर चंपा को उसने उतारा। दोनों ने भीतर पदार्पण किया था कि बाँसुरी और ढोल बजने लगे। पंक्तियों में कुसुम-भूषण से सजी वन-बालाएँ फूल उछालती हुई नाचने लगी।
दीप-स्तंभ की ऊपरी खिडक़ी से यह देखती हुई चंपा ने जया से पूछा - ''यह क्या है जया? इतनी बालिकाएँ कहाँ से बटोर लाई?''
''आज रानी का ब्याह है न?'' - कहकर जया ने हँस दिया।
बुधगुप्त विस्तृत जलनिधि की ओर देख रहा था। उसे झकझोर कर चंपा ने पूछा - ''क्या यह सच है?''
''यदि तुम्हारी इच्छा हो, तो यह सच भी हो सकता है, चंपा! कितने वर्षों से मैं ज्वालामुखी को अपनी छाती में दबाए हूँ।''
''चुप रहो, महानाविक! क्या मुझे निस्सहाय और कंगाल जानकर तुमने आज सब प्रतिशोध लेना चाहा?''
''मैं तुम्हारे पिता का घातक नहीं हूँ, चंपा! वह एक दूसरे दस्यु के शस्त्र से मरे!''
''यदि मैं इसका विश्वास कर सकती। बुधगुप्त, वह दिन कितना सुंदर होता, वह क्षण कितना स्पृहणीय! आह! तुम इस निष्ठुरता में भी कितने महान् होते!''
जया नीचे चली गई थी। स्तंभ के संकीर्ण प्रकोष्ठ में बुधगुप्त और चंपा एकांत में एक-दूसरे के सामने बैठे थे।
बुधगुप्त ने चंपा के पैर पकड लिए। उच्छ्वसित शब्दों में वह कहने लगा - ''चंपा, हम लोग जन्मभूमि- भारतवर्ष से कितनी दूर इन निरीह प्राणियों में इंद्र और शची के समान पूजित हैं। स्मरण होता है वह दार्शनिकों का देश! वह महिमा की प्रतिमा! मुझे वह स्मृति नित्य आकर्षित करती है; परंतु मैं क्यों नहीं जाता? जानती हो, इतना महत्व प्राप्त करने पर भी मैं कंगाल हूँ! मेरा पत्थर-सा हृदय एक दिन सहसा तुम्हारे स्पर्श से चंद्रकांत मणि ही तरह द्रवित हुआ।
''चंपा! मैं ईश्वर को नहीं मानता, मैं पाप को नहीं मानता, मैं दया को नहीं समझ सकता, मैं उस लोक में विश्वास नहीं करता। पर मुझे अपने हृदय के एक दुर्बल अंश पर श्रध्दा हो चली है। तुम न जाने कैसे एक बहकी हुई तारिका के समान मेरे शून्य में उदित हो गई हो। आलोक की एक कोमल रेखा इस निविडतम में मुस्कुराने लगी। पशु-बल और धन के उपासक के मन में किसी शांत और एकांत कामना की हँसी खिलखिलाने लगी; पर मैं न हँस सका!
''चलोगी चंपा? पोतवाहिनी पर असंख्य धनराशि लादकर राजरानी-सी जन्मभूमि के अंक में? आज हमारा परिणय हो, कल ही हम लोग भारत के लिए प्रस्थान करें। महानाविक बुधगुप्त की आज्ञा सिंधु की लहरें मानती हैं। वे स्वयं उस पोत-पुंज को दक्षिण पवन के समान भारत में पहुँचा देंगी। आह चंपा! चलो।''चंपा ने उसके हाथ पकड लिए। किसी आकस्मिक झटके ने पलभर के लिए दोनों के अधरों को मिला दिया। सहसा चैतन्य होकर चंपा ने कहा - ''बुधगुप्त! मेरे लिए सब भूमि मिट्टी है; सब जल तरल है; सब पवन शीतल है। कोई विशेष आकांक्षा हृदय में अग्नि के समान प्रज्वलित नहीं। सब मिलाकर मेरे लिए एक शून्य है। प्रिय नाविक! तुम स्वदेश लौट जाओ, विभवों का सुख भोगने के लिए, और मुझे, छोड दो इन निरीह भोले-भाले प्रणियों के दुख की सहानुभूति और सेवा के लिए।''
''तब मैं अवश्य चला जाऊँगा, चंपा! यहाँ रहकर मैं अपने हृदय पर अधिकार रख सकूँ - इसमें संदेह है। आह! उन लहरों में मेरा विनाश हो जाए।'' - महानाविक के उच्छ्वास में विकलता थी। फिर उसने पूछा - ''तुम अकेली यहाँ क्या करोगी?''
''पहले विचार था कि कभी-कभी इस दीप-स्तंभ पर से आलोक जलाकर अपने पिता की समाधि का इस जल से अन्वेषण करूँगी। किन्तु देखती हूँ , मुझे भी इसी में जलना होगा, जैसे आकाशदीप।''
एक दिन स्वर्ण-रहस्य के प्रभात में चंपा ने अपने दीप-स्तंभ पर से देखा - सामुद्रिक नावों की एक श्रेणी चम्पा का उपकूल छोडक़र पश्चिम-उत्तर की ओर महाजल-व्याल के समान संतरण कर रही है। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
यह कितनी ही शताब्दियों पहले की कथा है। चंपा आजीवन उस दीप-स्तंभ में आलोक जलाती रही। किंतु उसके बाद भी बहुत दिन, द्वीपनिवासी, उस माया-ममता और स्नेह-सेवा की देवी की समाधि-सदृश पूजा करते थे।
एक दिन काल के कठोर हाथों ने उसे भी अपनी चंचलता से गिरा दिया।
कहते हैं जब अहसास मिट जाते हैं तो सुबह दुपहर शाम सब एक से ही लगने लगते हैं...बेरंग और फीके-फीके। पत्नी की मृत्यु के बाद बुढ्ढा भी अकेला रह गया था। शायद उसके दिनरात भी कहीं अटक गए थे...खो गए थे रिश्तों की दौडती-भागती इस भीड़ में। रोज-रोज ही खांसता-कराहता, हर बूढा दिन बडी मुश्किल से एक और रात को निगल पाता और गले में फंसे कफ से सारे सपने अक्सर खुली आंखों में ही जमे रह जाते । अकडी-झुकी कमर और दुखते घुटनों के संग बिस्तर से निकल पाना, घूमना-फिरना अब उसके लिए आसान नहीं था। थोडी भी हलचल और खुशी उसके बूढे बीमार दिल में तब होती, जब बच्चे स्कूल जाते या फिर स्कूल से वापस घर आते।
पर किसी के भी पास तो समय नहीं था कि पल भर रुक कर उसके पास बैठता, उससे दो बातें करता। बस उनके पैरों की आवाजें और घिसटते बस्तों का शोर...यही सब सुनकर बुढ्ढा खुश और तृप्त हो लिया करता था। अक्सर कमरे की डयोढी पर आ बैठता और उसके बाद फिर एक लंबा इंतजार करता शाम होने का... जब बच्चे फिरसे घर लौटेंगे... दौडेंग़े-भागेंगे--- आपस मे लडे-झगडेंग़े...वैसे ही हंसें और चहकेंगे। बुढ्ढा अब आवाजों की परछाइयों से मन बहलाना सीख चुका था। वह खूब अच्छी तरह से जानता था कि यदि इस सन्नाटे से नहीं जूझा तो एकदिन बस यही खामोशी उसे ले डूबेगी।
उस दिन अँधेरे को पी-पीकर रात और भी उद्दंड और डरावनी हो चली थी। बेतरतीबी से उड़ती हवाएँ सीटी पर सीटी मारे जा रही थीं और दर्द किसी शरारती बच्चे सा बारबार उसकी छाती के इर्द-गिर्द घूम रहा था। अधजली लालटेन के अँधेरे में बाप को कसकर छाती से लगाए पगली गौर से उसकी हर उठती-गिरती सांस को गिने जा रही थी। एक, दो, तीन, चार... उखड़ती साँसों की इस उधेड़बुन में न तो पगली ही पंप दे पाई और न बुढ्ढा ही मांग पाया। बिजली को भी अक्सर ऐसे ही मौकों पर जाना होता है। अचानक पलकों पर आए आँसू सा बुढ्ढे का सर एक ओर ढुलका और वह चला गया...चुपचाप, जैसे जीता था वैसे ही... बिना किसी धमाके के या चीख पुकार के...किसी को कोई तकलीफ दिए बगैर ही।
उसने तो किसी से एक गिलास पानी तक का नहीं मांगा था। जीवन की तरह आज उसकी मौत भी इतनी साधारण और महत्वहीन थी कि यदि शव की अन्तिम क्रिया की जिम्मेदारी ना होती तो शायद घर में किसी को पता तक न चल पाता।
जल्दी जल्दी सब काम निपटाए गए। लाश को ज्यादा देर तक रखना ठीक भी तो नहीं और ज्यादा रोनेधोने से भी क्या फायदा? भरी पूरी उमर में गया है बुढ्ढा। वैसे भी साठ-सत्तर की उमर कोई कम तो नहीं होती ! साधू-सन्त था जो हाथ पैरों से चला गया-- कम से कम किसी से सेवा तो नहीं करवाई। घर में चारो-तरफ जितने मुँह उतनी ही बातें थीं।
दूर खडा वह नहीं सोच पा रहा था कि ऐसे में आखिर उसे अब और क्या करना या कहना चाहिए ? वैसे तो वह यह सब सुनते ही दौडा चला आया था पर शब्द कोई तीतरबटेर तो नहीं जो हाथ लपकाकर पकड़े और पका-सजाकर चांदी की तश्तरी में पेश कर दे। आज तो वैसे भी वे पकड में ही नहीं आ रहे थे। होठों तक आ-आकर फुर्र हो जा रहे थे। उसके कान और सर के अन्दर-अन्दर ही भिनभिनाए जा रहे थे। पहले वह अपने अन्दर के इन सायों से तो लड ले, फिर दूसरों के बारे में सोच पाएगा। वैसे तो उसे भी यह पता है कि हम सभी अपने अन्दर कई-कई साए लिए घूमते हैं, फिर उसमें और इस सामने बैठी पगली में इतना फर्क क्यों है? इस पगली को तो कभी उसने अपने सायों से डरते नहीं देखा। शायद उसने गठरी में कहीं एक जादूई आइना छुपा रखा है और जब जी चाहे, वह इन सायों को देख लेती है, पहचान लेती है- बातें करलेती है। यह तो शायद उन्हें दुलार और धिक्कार तक सकती है !
चेहरा ज्यादा डरावना हो तो पगली रोती, चीखती-चिल्लाती या फिर कभी कभी तो बिल्कुल ही खामोश तक हो जाती। झट बाप की गोदी में छुप कर सो जाती। पर अगर कभी साया जाना-पहचाना या प्यारा निकल आए, तो पगली का लाड़ आकाश छू लेता... घंटों का चूमा-चाटी का सिलसिला शुरु हो जाता। ढेर सारी बातें होतीं। यहां तक कि गीत संगीत सब होता और होते जी भरकर शिकवे-शिकायत-- मानो दो पुरानी सहेलिया मिल बैठी हों। पर इस पगली के बारे में वह क्यों इतना सब सोचता और जानता है? क्या इसलिए कि कभी वह भी इसके बहुत पास था--आखिर बहन है उसकी। पर अब उसके दुख से कलेजा मुँह को क्यों नहीं आता...समझ में नहीं आ रहा कि मुँह में आई इस कडवाहट को कैसे और कहां थूके? चुपचाप ही वह सब कुछ पी गया-- सबसे अलग-थलग, दूर दूर, वहीं खडे-ख़डे ही...
अपनी ही दुनिया में कैद पगली का यूँ रोना-चिल्लाना, हंसना-गाना पूरे घर के लिए एक सर-दर्द बनता जा रहा था। कैसे उठना है-- कहां बैठना है? कब क्या करना चाहिए-- किसी भी बात का मानो कोई शऊर ही नहीं रह गया था उसे। पर अब सेठ विश्वंभर दयाल की लाडली, इकलौती बेटी को घर के बाहर भी तो नहीं फेंका जा सकता—विशेषकर तब, जब पूरा परिवार ही सेठ जी के रहमो-करम पर ही पलता था !
यूँ तो सेठ विश्वम्भर दयाल, सेठजी से बुढ्ढा कब बने, उसे भी याद नहीं-- पर अब कोई फरक भी नहीं पडता-- हाँ शायद उस दिन, जब उन्होंने गल्ले की चाभी पहली बार अपने भाई दीनदयाल को पकड़ाई थी---या फिर शायद उस दिन जब उनकी बीमार लाडली बेटी को पहला दौरा पडा था और परेशान बाप सारे काम-धंधे भूलकर बस डॉक्टरों और हकीमों की चौखट से ही बंधा रह गया था। मंदिरों में सर पटकता दिन-रात उसके लिए दुआ मांगता फिर रहा था और उसकी हर नामुराद प्रार्थना उसकी पगली बेटी-सी गले लगी यूं ही उसके कांधे पे सर रख, सुबक-सुबककर सो जाया करती थी।
पर आज तो हद ही कर दी थी इस पगली ने। अर्थी के लिए आई सारी मालाओं को तोड ड़ाला था उसने। चिन्नी-चिन्नीकर कुछ फूल बाप पर डाले, कुछ खुदपर और फिर एक एक पंखुड़ी चुनकर बडे ध्यान और धैर्य से बाप के ऊपर सजाने लगी। इतनी आहिस्ता और हिफाजत से मानो जरा भी आहट पर बुढ्ढा उठ बैठेगा-- हमेशा की तरह ही पूछेगा ' सोई नहीं बेटा ? ' और फिर गोदी में सर खींच कर उसका माथा चूमेगा-- बाल सहलाएगा। पर ऐसा आज कुछ भी नहीं हुआ। बूढ़े बाप में कोई हरकत नहीं थी। थककर पगली ने खुद ही मुरदे बाप की गोदी में सर रख दिया। यही नहीं उसे नर्सरी राइम्स तक सुना डालीं। जाने क्या क्या गाने भी गाए। कभी बाप की आँखें खोलने की कोशिश करती तो कभी अपनी तरफ उसका मृत चेहरा घुमाना चाहती। यहाँ तक कि तैयार शव की बन्द आँखों पर दौड़ क़र चश्मा तक लगा आई वह तो, शायद बाप को ठीक से दिख नहीं रहा है कि उसके पास कौन बैठा है और उसे पहचान नहीं पा रहा हो? फिर अचानक खुद ही पूरे होश में भी आ गई। सर हिलाती-डुलाती कहने लगी, देखना, मैं रोउँगी तो कतई ही नहीं। पापा कहते थे न कि ' बेटा जब मैं मरूँ, तो तू बिल्कुल ही मत रोना, चाहे पूरा घर कितना ही क्यों न रोए-- मैं सबका रोना-धोना तो बर्दाश्त कर लूंगा, पर तेरे आँसू नहीं देख पाउँगा। वचन दे, मेरी गुडिया तू नहीं रोएगी, वरना मेरी आत्मा तो बहुत ही तकलीफ पाएगी।‘ और जहां तक बाप की तकलीफ का सवाल था पगली पूरे होश में थी। और वह सच में नहीं रोई। बस फटी फटी आँखों से सब देखती रही। समझने की कोशिश करती रही।
‘ धूप चढ रही है देर करने से क्या फायदा ? ‘कह कर घरवालों ने पगली को शव से अलग कर दिया और अर्थी लेकर चल पडे।‘मैं भी जाउँगी पापा के साथ। मुझे भी शमशान जाना है।‘-- पगली को अब एक नई रट लग गई थी पर मरघटे पर औरतें तो नहीं जातीं... सबको ही यह बात पता थी। किसी ने पीछे आती पगली को बांहों में जकडा तो किसी ने धूल में लिथडता आँचल सँभाला पर जाने कहां से पगली में गजब के बल और हठ आ गए थे' कहा—‘ कहां ले जा रहे हो मेरे पापाको आखिर तुमलोग--मुँह खोलो इनका '-- आहत पगली करीब-करीब रोती-सी गुर्रा रही थी ' हटो सबमुँह पर से हटाओ यह कपडा -- साँस लेने दो पापाको। ' फिर यकायक खुदही आग-आग-पानी-पानी चिल्लाने लगी वह। ' पानी लाओ-- आग बुझाओ। देखो मेरे पापा जल रहे हैं--' पगली रोती रही। हँसती और गाती रही और तीन घंटों में वहां मरघटे में उसका सबकुछ जलकर भस्म हो गया।
चुपचाप खडा वह बस दूर से देखे जा रहा था इस पगली को। एकबार तो उसका भी मन किया कि आगे बढक़र पगली को समझाए, सान्त्वना दे। आखिर बहन है उसकी, मुँहबोली ही सही। बचपन में भैया-भैया कहकर आगे पीछे घूमी है--सुख-दुख बाँटे हैं उसके। पर अँत में ऐसा कुछ भी नहीं किया उसने... क्योंकि सिर्फ कह देने भर से, मुँहबोला बेटा या भाई बना लेने से ही तो कोई बेटा या भाई नहीं बन जाता। बाप की भी तो कुछ जिम्मेदारियां होती हैं-- जैसे बेटे से अपेक्षा की जाती है। एक ही झटके में उसे दूध में पड़ी मक्खी-सा बाहर निकाल फेंका --वह भी इन घरवालों के कहने पर। कैसी मक्खन-सी चिकनी आवाज मे कहा था बुढ्ढे ने-- ' जाओ बेटा, अपनी जिम्मेदारी खुद उठाओ। अच्छा ही है अगर तुम मेरे आगे अपने पैरों पर खडे हो जाओगे। और फिर तुम्हें इस पगली को भी तो संभालना है?' क्यों संभाले वह इस पगली को-- क्यों निभाए यह फालतू की जिम्मेदारी-- जिम्मेदारी पर उसे याद आया कि शमशान में आग शायद उसे ही देनी हो। वह दौड पड़ा--कहीं खामखव्वाह देर न हो जाए।
शमशान में चिता धू-धू जल रही थी। दूर से ही प्रणाम करके वह चुपचाप घर लौट आया, पत्नी और बच्चों के पास। वहां घाट पर किसी को उसकी उपस्थिति या अनुस्पतिथि का एहसास तक न था। अगले दिन फूल बीनने में उसने भी परिवार की मदद की। कलश में बन्द फूलों को कहीं पगली तितर-बितर न कर दे इसलिए सब कुछ ढक-छुपाकर, संभालकर रख दिया गया था। मन तो उसका भी बहुत किया कि एकबार, बस एक बार बेटी को बाप से मिला दे। कम-से-कम भाई होने का एक फर्ज तो निभा ही दे। पर बरसों से मन पर चढे फ़ालिज ने उसे कुछ भी करने से रोक दिया। अनाथ होने का दर्द पगली के मुंह पर जाने क्यों उसे अच्छा लग रहा था। उसकी दुखती रग को सहला रहा था।
बहुत लाडली थी न बापकी, भुगते अब। क्यों करे वह कुछ। उसके लिए क्या किया था किसीने? पलने को तो कुत्ते और बिल्लीके बच्चे भी पल ही जाते हैं। सिर्फ खिलाने-पिलाने-पढाने-लिखाने से ही तो मा-बाप का फर्ज पूरा नहीं हो जाता। शादी ब्याह कराके काम धंधे में झोंककर ही तो बाप का हक नहीं मिल जाता। इस पगली जैसा प्यार तो कभी नहीं मिला उसे। देखता हूँ कौन अब इसके नाज-नखरे उठाने आता है? यदि बुढ्ढा समझदार होता तो उसके भी हर छोटे-बड़े दुख पर ऐसे ही हंसता और रोता। बेटी की तरह उसके भी सपनों की किताब के हर पन्ने पर चांद-सितारे चिपकाता। यह बरसात का मौसम भी कितना अजीब है अपनी ही बूंदों की रेल-पेल में पानी भीगता जाता है। मौसम की इस चिपचिपाहट से बचने के लिए, माथे का पसीना पोंछ वह मुंडेर के नीचे जा खडा हुआ।
अगले दिन घाट पर बाल मुंड रहे थे। वह भी बैठ गया लाइन में--सबके बीच। मानो या न मानो---प्यार तो बुढ्ढे ने बाप जैसा ही दिया था-भले ही थोडा कुछ कम था- या फिर शायद असली बाप कैसा होता है-- वह यह जानता ही नहीं था। वह तो यह तक भूल चुका था कि उसके जरा बीमार होने पर भी वे मौसी-मौसा सोते तक नहीं थे और नन्ही बहन पानी का गिलास लिए भरी गरमी में बगल में ही रात भर खडी रह जाती थी। चलो जो भी हो इतना फर्ज तो गैर का भी बनता ही है कि मृतात्मा को अन्तिम सम्मान दिया जाए और फिर इन बालों के मुंडाने में क्या जाता है? घर की खेती है--चार दिन में फिर उग आएँगे। घर-बाहर चार जनों में ठीक लगेगा।
पर दीनदयाल को छोटा-सा यह अनचाहा हस्तक्षेप भी कतई पसन्द नहीं आया- 'नहीं इसकी जरूरत नहीं। तुम उठो। सिर्फ जिसने दाग दिया है उसीके बाल उतरते हैं।' झुंझला कर वे बोले और वह तुरन्त ही उठ खडा हुआ। पहले जब दो साल पहले, मौसी गई थीं तब तो सबके ही बाल उतरे थे -सिवाय उसके। मानो एक षड्यंत्र चल रहा था-- उसे जैसे दूर-दूर रखा जा रहा था। एक जलता आंसू उसकी हथेली पे गिर कर चुपचाप सूख गया।
मौसी ने तो निश्चय ही उसे बहुत प्यार किया था। पंद्रह दिन की उमर से पाला था उस अनाथ को। उसकी हर जरूरत का ध्यान रक्खा था उन्होंने। वह उनके लिए अपनी तरफ से जरूर ही कुछ करना चाहता था। कुछ ऐसा जिससे उसके इस बेटे वाले एहसास को तसल्ली मिल पाए। पर हमेशा की तरह आज फिर रोक दिया गया था उसे और लाचार वह आंख में आंसू लेकर उठ आया था।
आजतक याद है उसे-- परिवार का छोटा बडा हर सर मुडा लड़क़ा। क्यों ये छोटी-छोटी बातें इतना दुख देती हैं, क्यों इन्सान इन्हें कभी नहीं भूल पाता? पर क्यों दूर खड़े, सब देखते मौसा तब भी कुछ बोल नहीं पाए थे-- क्यों वह इतने मजबूर थे आखिर? क्यों उसपर विश्वास नहीं कर पाते थे वे? शायद यह सब अच्छा ही लगा था उन्हें भी कि उनकी पत्नी को इतना सम्मान दिया जा रहा था। या फिर शायद उसके दर्द को उनके हृदय तक पहुंचाने के लिए उन दोनों की धमनियों में एक रक्त ही नहीं बह रहा था।
अब तो किसी दिखावे या आडम्बर की भी जरूरत नहीं रही। मरा बुढ्ढा वसीयत नहीं बदल सकता। इस बार एक भी सर नहीं मुड़ा। आखिर क्या जरूरत है बेवकूफ बनकर घूमने की? पर तभी, न जाने कहां से पगली वहां आ पहुंची और उसने बडी सहज़ता से वह सब कर डाला जो वह घंटों से मन ही मन में बिलखकर भी नहीं कर पा रहा था।
पगली ने पास पडा नाऊ का उस्तरा उठाया और खुद ही अपना सर मूंड डाला। फिर मंदिर की सीढियों की तरफ हाथ नचा-नचाकर बोली- ' आती हूं, पापा आती हूं। ' जल्दीजल्दी घाट की सब सीढियां उतर गई वह। पूजा की थाली में रखी सबसे बडी माला हाथों में उठा ली और गंगा की तरफ दौड़ पड़ी। वैसे भी वहां घाट पर ज्यादा सीढियां नहीं थीं। पगली मंत्र-मुग्धा सी खुद में खोई आंखों से अनवरत् अश्रुधारा बहाती बढ़ी चली जा रही थी--परवाह किए वगैर, बिना जाने कि पानी उसकी कमर से बढक़र, छाती क्या गरदन तक आ पहुंचा था। अब तो उसके लडख़डाते पैर भी जबाव दे रहे थे। पानी के बहाव से उखड़ रहे थे। पर पगली को तो बस गंगा के बीच में खड़े पापा ही दिखाई दे रहे थे जो हमेशा की तरह बारबार कहे जा रहे थे, ‘ क्या तू मेरे लिए कभी कुछ नहीं कर पाएगी?’
रोज ही तो पापा पगली को सुनाते थे-‘ जानती है तू, अब तो लड़कियां भी वही सब कर सकती हैं जो लडक़े करते थे। बाप के मरने पर रामशरण की बेटी ने भाइयों को अलग खडा कर दिया था। बोली थी- नहीं, अपने बाप का क्रिया-करम तो मैं ही करेगी।’ क्यों सुनाते थे पगली को पापा यह सब। इतनी बहादुर नहीं है वह--और इतनी पागल भी नहीं। बहुत प्यार करती है अपने पापा से--कैसे झोंक पाती उन्हें जलती आग में। और फिर खड़े-ख़ड़े सब कुछ राख होते देखना--नहीं कर सकती थी वह यह सब, कभी नहीं। फिर क्यों पापा यही चाहते थे?
अब इस पगली को कौन और कैसे समझाए? वैसे भी रामशरण का केस तो बडा ही सीधा था। आम मौत थी उसकी और चार-चार बेटे थे उसके। सेठजी के पास तो ले-देकर बस यही एक पगली ही थी रोने और हंसने के लिए। फिर बात सिर्फ क्रिया-कर्म की ही तो नहीं, और भी तो जाल जुडे हैं साथ-साथ। कबसे सब उन्हें और इस पगली को झेल रहे थे, अब बेटे के काम भी इस पगली ने किए तो दुनिया वाले क्या कहेंगे? पर पगली को तो मानो आज परवाह ही नहीं थी। यह श्रध्दांजली तो देनी ही थी, और उसी को देनी थी। ' हां पापा मैने तुम्हारा संस्कार नहीं किया पर मैं तुम्हें मुक्ति अवश्य दिलवाउंगी।' पगली बारबार खुद से ही कहे जा रही थी।
हाथ से बहाई माला गर्व से लहराती, खुशी-खुशी सामने खडे पापा तक जा रही थी और संतुष्ट पगली आंसुओं की लड़ी से ढकी पानी में बढती चली गई-- माला के पीछे-पीछे। मानो पापा के पास जाकर ही यह अंतिम नमस्कार करना था उसे। अचानक दो सशक्त हाथों ने पगली को रोक लिया-
‘आगे मत बढो बहन। यह क्या कर रही हो ? जीवन बहुमूल्य होता है।’ नवागन्तुक ने पगली को खींचकर जल के बाहर खडा कर दिया। रुआंसी पगली कुछ भी तो नहीं कह पाई।
' क्या कर रहीं थीं तुम---आत्महत्या? ' नवयुवक ने अब कुछ कड़े स्वर में पूछा ?
पगली सहम गई-
‘नहीं, वह असल में मेरे पापा मुझे वहां खड़े बुला रहे थे--बारबार कह रहे थे मेरे लिए कुछ करो और मेरा भी मन यही चाह रहा था कि मैं कुछ करूं अपने पापा के लिए तभी तो उनकी आत्मा को शान्ति मिल पाएगी।'
' अच्छा तो तुम तर्पण करना चाहती थीं अपने दिवगंत पितर का--आओ मैं करवाता हूं। '
और वह संभ्रांत व्यक्ति फिर से उसे नदी में ले गया पर वहीं किनारे के पास, उथले पानी में उसके हाथ पे एक फूल रखकर मंत्र पढने लगा ' प्रेतात्माया: शुध्दिनाम्--अब पिता का नाम लो--'
पिता के लिए प्रेत शब्द सुनना अच्छा नहीं लगा फिर भी पगली स्थिति की गंभीरता समझ रही थी। शायद यह क्रिया-कर्म ही उसके पापा को स्वर्ग के सिंहासन तक ले जाए और उसने झुके सर से सब कुछ साफ-साफ दुहरा दिया।
ढूंढते-ढूंढते परिवार के अन्य सभी सदस्य उस तक पहुंच गए। इसके पहले कि कोई कुछ कहे वह पंडित पलटकर बोला--
' ऐसे नाजुक क्षणों में आपलोगों को इन्हें अकेला नहीं छोड़ना चाहिए था। वह तो प्रभु-कृपा से मैने सही वक्त पर देख लिया वरना आज न जाने कैसा अनर्थ हो जाता। इनके डूबने में तो कोई कसर ही नहीं रह गई थी। लगता है मृतात्मा को बहुत स्नेह करती थी यह बच्ची। '
भाई बडबडाया-' समस्या है यह लडक़ी हमारी जान के लिए '-- डांटकर बोला- ' चलो घर चलो।'
पगली चुपचाप पीछे-पीछे चल पड़ी। दूसरा भाई पंडित को स्पष्टीकरण दे रहा था-' असल में दिमाग से कुछ विक्षिप्त है बिचारी। बाप की अकेली बेटी थी-वह भी बहुत ही लाडली- इसीलिए कुछ ज्यादा ही धक्का लगा है। आपने आज इसे डूबने से बचाकर परिवार का नाम डूबने से बचा लिया वरना समाज तो यही कहता कि बाप के मरने के बाद चार दिन भी संभाल नहीं पाए भाई इस पगली को। आभार में यह पान-फूल स्वीकार कीजिए।’ जेब से एक सौ का कडक़ नोट निकालकर उसने क्षुब्ध पंडित को देना चाहा।
' नहीं-नहीं, आप मुझे व्यर्थ ही पाप का भागीदार मत बनाइये।' वह पेशेवर कर्मकांडी ब्राह्मण भी आर्त और द्रवित हो चुका था-
' इसने तो असली तर्पण किया है, वह भी अश्रु और रक्तजल के साथ। सब काम इसने खुद ही किया है। मेरा क्या--मैं तो मात्र एक दर्शक था।'
घर आकर पगली को तख्त के पावों से बांध दिया गया। अब इस तरह से खुला छोड़ना ठीक नहीं। न जाने कौन सी मुसीबत खड़ी क़र दे। अब तो आंख रखने को बुढ्ढा भी नहीं है आसपास। फिर घर में किसे इतनी फुरसत है जो चौबीस-घंटे इस पर निगरानी रखे। इसे देखे निहारे।
सर मुंडी पगली और भी ज्यादा विचित्र और विक्षिप्त लग रही थी अपने उन मैले और अस्तव्यस्त कपडों में। सर पर उलटी सीधी खिंची उस्तरे की लकीरें दूर से ही नजर आती थीं। कहीं-कहीं तो बीच-बीच में बेतरतीबी से खड़े बाल तक रह गए थे। शायद नाऊ को बुलाकर फिर से उस्तरा फिरवाना होगा या शायद जरूरत ही नही इस सबकी। क्या फरक पडता है अब कि यह कैसी लगती है। कौन है जो इसे इतने ध्यान से देखेगा ?
पगली वहीं जमीन पर फसट्टा मारकर बैठ गई और बैठी-बैठी झट से बच्चों की तरह सो भी गई। न चाहते हुए भी उन थके हाथ-पैरों का भारीपन वह अपने मन पर महसूस कर रहा था और उसे लग रहा था यह पगली नहीं, उसकी खाल में डरी-सहमी एक हिरणी सो रही है--हर आहट और खतरे से पूरी तरह से चौकस और चौकन्नी। चाहकर भी हट नहीं पाया वह वहां से। पैर मानो वहीं उस जमीन से जुड़ गए थे।
आज घर में किसी की भी आंखों में नींद नहीं थी। अब गन्तव्य पर आकर कैसे हार मान ली जाए। पगली दाग नहीं दे सकी, क्योंकि जो दाग देता है, समाज की नजरों में वही वारिस होता है। वैसे तो पगली की तरफ से कभी कोई खतरा था ही नहीं और सेठजी के होशहवास में ही सब रजिस्ट्री-पेपर वगैरह साइन करवा लिए गए थे। पूरी लिखा-पढी हो चुकी थी। पर जाने क्यों मन डरता था--क्या पता यह कभी ठीक ही हो जाए और अपने हक का दावा कर बैठे-- किसी से शादी-व्याह ही कर ले? दुनिया वाले तो बस इसी का साथ देंगे। एक वचन ही तो चाहता था बुढ्ढा बदले में कि इस पगली की आजीवन देखभाल हो--अकेली और लावारिश न भटके यह उसके बाद? तो सडक़ पर कौन आने देगा इसे।
इस पगली का क्या किया जाए? न सिर्फ यह समस्या जटिल हो चली थी बल्कि अब तो परिवार के सम्मान से भी जुड ग़ई थी। कमरा बन्द करके पूरा परिवार चल पड़ा बुढ्ढे का सामान सिलटाने--पगली के बारे में चलो फुरसत से सोचा जाएगा।
सिवाय चन्द किताबों और पुराने कपड़ों के वहां और कुछ भी नहीं था। जो कुछ कीमती और रखने लायक था, सब पहले ही बांट चुका था वह। उस कचरे को नौकरों के हाथों जलवा दिया गया। सोच से भी ज्यादा बेवकूफ निकला यह बुढ्ढा तो। अपनी इस पगली के लिए कुछ भी सम्भालकर नहीं रक्खा उसने तो--
अगली सुबह लुटी-बिखरी पगली पूरी तरह से शान्त थी। सिर्फ बाप के हाथों से खाने वाली पगली ने चुपचाप तेरहवीं के ब्राह्मणों के साथ बैठकर खाना खाया। उसके बाद बाप की चौकी के दाहिने पाए को उनका चश्मा पहनाकर, भरी गरमी में बाप का ऊनी मफलर गले में लपेटे, बातें करने बैठ गई वह अपने पापा से. वहीं, उसी नंगे, तपते फर्श पर। बाप के सिवाय शायद ही कोई आजतक उसकी बात समझ पाया था। इसके पहले कि ज्यादा कुछ तमाशा हो, बातें बनें, पगली उठी और कमरे के खिडक़ी-दरवाजे, सब उसने अन्दर से बन्द कर लिए।
' कब तक बैठकर निहारे इसे कोई-- ये खेल-तमाशे तो रोज के ही हैं--' गाल पर भरपूर तमाचे की तिलमिलाहट लिए हुए दीनदयाल अपने कमरे में सोने चले गए। ' इतनी हिमाकत कि मुंह पर दरवाजा बन्द करती है--पगली कहीं की।' उन्होंने उसकी धृष्टता को पागलपन समझ कर माफ करने की कोशिश की। पर पगली का तो अब एक नया दिन शुरु हो चुका था और उसे अभी बहुत से जरूरी काम निपटाने थे। बडे धैर्य के साथ उसने पिता के फूल चुने फिर गरम धरती पर अंजुली भर-भरकर गंगाजल छिडक़ने लगी।
सुना है पगली को किसी अस्पताल में भेजे जाने की सलाह बन रही है, पर इस शहर और जान-पहचान वालों से दूर। ज्यादा बात न फैले तो ही अच्छा है। बुढ्ढे के आगे बात और थी --अब भला इस मुसीबत को कौन झेलेगा? और आज पहली बार वह भी घरवालों के निर्णय से पूर्णत: सहमत था। अपने घर जाने को आखिर उसके पैर मुड़ ही गए।
पगली के कमरे से अब जोरजोर से गाने की आवाज आ रही थी, ' अच्छा तो अब भजन-कीर्तन और प्रवचन होगा।' उसने सोचा। गीत तेज होता चला गया। हवा के साथ चारो तरफ बिखर गया ' सूरदास की उलटी बानी, बरसे कंबल भीगे पानी।'
बाहर बरामदे के नीचे जमा पानी हर छोटी-बड़ी ग़िरती बूंद के संग कांपे जा रहा था। मानो भीगने से डर रहा हो या फिर शायद भीगते-भीगते थक गया हो। सुरीली आवाज की लय पर बूंदें एकबार फिर थिरकीं 'भगुआ बसन पहिन जोगनिया बनली रानी, बरसे कम्बल भीगे पानी।' बेमतलब ही सही पगली गाती बडा सुरीला थी। कमल सी जीवन से जुडी वह उसकी आवाज, स्वार्थ और षडयंत्र के दलदल से अलग और दूर थी-- शायद इसीलिए गहरे कोहरे सी मन पर जमती चली जा रही थी।
सोच की परतें खुल रही थीं। सब साफ-साफ समझ में आने लगा। कम्बलों के नीचे भी आदतन् भीगता पानी-- भीगेगा ही। डरेगा ही, जब अपने लिए एक अकेला कोना चुनेगा। जैसे फलने-फूलने के लिए पत्तियों को पेड से, पेडक़ो जड़ों से और जड़ों को मिट्टीसे जुड़ना पड़ता है वैसे ही हमें भी तो जुड़ना पड़ता है। आश्रय लेना पडता है। तभी सबकुछ बढ़ और पनप पाता है। छांव और फल दे पाए इस लायक बन पाता है। शिकायतों के जंगल में दबी मन की घास तो हमेशा सूखी ही रहेगी--ताजी हवा चाहिए इसे भी। राम शायद इसलिए राम बने क्योंकि वह किसीके बेटे, भाई और पति थे। जरूरी नहीं कि इन्सान खुद बोले और मांगे तभी उसे समझा जाए। उसका परिवेश, उसकी खामोशी तक बोलती है, सवाल करती है। पलपल जवाब चाहती है अगर हम सुनना चाहें तो, समझना चाहें तो। डूबने के लिए नदी और नाले की ही जरूरत नहीं, खुद में भी डूबा जा सकता है और यही नहीं, अपने साथ दूसरों को भी डुबोया जा सकता है: उसके मुडते पैर थम गए-- न अपनाओ, न समझो तो, सभी कुछ कितना उलटा और बेगाना सा लगता है--इन अनगिनित इन्सानों की तरह---उसकी अपनी बेसहारा पगली इस बहन की तरह।
दुर्घटना कभी भी और कहीं भी हो सकती है, पर जब दुर्घटना अपने देश में हो तो दिल कुछ सहम-सा, विरक्त-सा हो जाता है - पता नहीं क्यों! - शायद इसलिये की अपने देश से दूर, बहुत दूर रहते हुए प्रवासी भारतीयों के पास देश की मुट्ठी-भर सुखद अनुभूतियाँ ही साथ रह जाती हैं और इन्सान उसे अपनी भींची मुट्ठी से खिसकने नहीं देना चाहता.
पर क्या यह दुर्घटना ही थी - या भाग्य, प्रारब्ध! क्या कहूँ इस घटना को! - कुछ समझ नहीं आता.
पिता की बीमारी का पता चला और आनन-फानन में तैयारी कर, टोरोंटो, कैनेडा से चल पड़ी थी.
थकी देह और चिन्ताओं, दुर्भावनाओं, आशंकाओं से भरा मस्तिष्क लिए, एअर इंडिया के, रात्रि नौ-पचपन पर चलने वाले विमान पर अंतत: सवार हो गई.
सीट खिड़की के बगल में थी, सिर स्वत: ही उससे टिक गया और एक अधूरा-सा उच्छ्वास खूँटा तुड़ाए नवजात बछड़े की तरह बिचक कर मुँह के बंधन से छूट भागा. उच्छवास में राहत की साँस भी थी. वीज़ा, टिकट, सीट, स्वास्थ्य सम्बन्धी औपचारिकताओं आदि के झमेले से छुटकारे का आभास था पर चिंता का भार हृदय पर पड़ी किसी प्रस्तर शिला से कम न था. यद्दपि चिंता एक अनुभूति है, पर अनुभूति भी वास्तविकता में कितनी वज़नी, भारी होती है इसका अंदाज़ तभी मालूम पड़ता है जब इन्सान इसके शिकंजे में कसा हो.
हालाँकि बड़े भइया ने कहा भी कि, 'घबराने की बात नहीं है पर तुम आ जाओ तो अच्छा है' - और इस छोटे से दो अक्षर के 'पर' ने आशंकाओं को पर लगा दिए. मन द्रुत गति से बेलगाम घोड़े जैसा हर जानी-अनजानी चिन्ताओं की नाद में मुँह मारने लगा. सम्भव है कि स्वजनों के बीच बैठ बड़ी से बड़ी आपदा झेल जाना भी उतना दुष्कर नहीं जितना विदेश में आपदा तो दूर रही उसकी आशंका से भी पार पाना.
पति मेरी मनोस्थिति से अनभिज्ञ न थे. हालाँकि वो नहीं चाहते थे कि इस मनोदशा में मैं अकेले सफ़र करूँ, पर नौकरी से अचानक लंबा अवकाश मिलना यहाँ सहज नहीं है जब तक कि कोई गमगीन, बड़ा आपातकाल न हो. बड़े भइया ने यही कहा कि, 'ऐसी घबराने कि कोई बात नहीं है, बाऊ जी अब ख़तरे से बाहर हैं, आ सको तो अच्छा है. पिता जी का बस तुम्हें देखने का मन है.'
पर नारी प्रकृति को क्या करूँ! दुश्चिंताओं को परे ढकेल नहीं पा रही थी. सबके समझाने के बावजूद एक प्रश्न सर्प-सा फन उठा ही लेता था कि कहीं भइया सिर्फ़ आश्वासन देने के लिए ही तो ऐसा नहीं कह रहे हैं. मेरी इस मन:स्थिति से अवगत मेरे पति मुझे एक तरह से जबरदस्ती ही पारिवारिक डॉक्टर के पास ले गए और उसके द्वारा दी गई 'सेडेटिव' औषधि, नींद की गोली का नुस्खा भरवा लाए व गोलियों की शीशी मेरे पर्स में ठूँस दी.
क्षण-क्षण छलछलाई आँखों के आक्रमण से बचने के लिए पर्स से शीशी निकाली व एक गोली खा ली. शायद उनींदी अवस्था में इस जागृत अवस्था से कुछ ज़्यादा आश्वस्त हो सकूँ. मस्तिष्क का मंथन सहने की शक्ति नहीं थी. पति ने ठीक ही कहा था कि जब दिल्ली पहुँच कर बाऊ जी को अच्छा-ख़ासा देख लोगी तभी तुम्हें शांति मिलेगी.
टोरोंटो से सबसे जल्दी पहुँचने वाली फ्लाइट ली थी. बस टोरोंटो से लंदन और लंदन से सिर्फ़ दो घण्टे के अंतराल के बाद दिल्ली. पर इतना समय काटना भी आसान न था. नींद की दवाई की गोली रात्रि के कुछ घण्टे सुषुप्तावस्था में निकाल देगी, इस अभिप्राय से शरीर को ढीला छोड़, सीट की 'बैक-रेस्ट' पर सिर टिका, टाँगों पर कम्बल डाल लिया और खिड़की से काले शून्य आकाश में ताकते-ताकते न जाने कब सुप्तावस्था में पहुँच गई.
आँख तो तब खुली जब किरणों ने हल्के-से खिड़की थपथपाई. रात खिड़की का पर्दा तो बन्द किया नहीं था अत: ऊषा बिना बाधा वहाँ से झाँकने लगी. नींद से कुछ स्वस्थ शरीर, मन व मस्तिष्क व थोड़ी-थोड़ी नींद की ख़ुमारी और सूर्योदय के समय का प्राकृतिक सौन्दर्य, सबने मिल कर एक समाँ-सा बाँध दिया. कुछ समय के लिए अपनी अवस्था से बेखबर टुकुर-टुकुर बाहर झाँकने लगी. ऐसा लगा मानों भोर ने आहिस्ता से अपना घूँघट सरका कर झाँका. मौसम साफ़ देख कर सूर्य ने अपनी कोमल किरणों को धीरे-धीरे उतारा. एक-दूसरे की उँगली थामे हुए किरणें विमान की खिड़की के शीशों से अन्दर झाँकने लगीं. भोर उजाले का आँचल थाम कर एक-एक पग आगे बढ़ रही थी. खिड़की से परे क्षितिज पर उभरी लालिमा की गहराइयों में मैं डूब गई. साथ ही विचारों की नागिन कभी इस करवट कभी उस करवट डसती रही.
लंदन हवाई अड्डे पर दो घण्टे का विराम दे विमान पुन: अपनी उड़ान पर उड़ चुका था. समय की रेत मुट्ठी से शनै:-शनै: फिसल रही थी. समय के पंख लगा, हवाई जहाज़ अपनी ही गति से हवा में तैरता-सा चला जा रहा था. सुबह से दोपहर हुई और दोपहर से साँझ. दिन-भर का लम्बा सफ़र तय करने के बाद थकी हुई सूरज की पलकें झुकने लगीं, झपझपाने लगीं. संध्या ने कसमसाकर, अल्हड़ता-भरी अँगड़ाई ली और अधखुले नयनों से सूर्य को उसके सप्त घोड़ों के रथ पर सवार अस्ताचल की ओर प्रस्थान करते देखा. धुंधलका अपनी बाहें फैला कर सुनहरी धूप का आलिंगन करने के लिए उमड़ पड़ा; शर्माई, लजाई वह आरक्त कपोल स्वामिनी आहिस्ता-आहिस्ता किसी पहाड़ की ओट में मुँह छिपाने के लिए पीछे ही पीछे सरकने लगी. दिन थक कर संध्या के आगोश में विश्राम हेतु सिमटने लगा. पश्चिम का नभ-मंडल केसर के रंगों से भीग-सा गया था. पीलिमा ने नारंगी, लाल चुनरी ओढ़ ली थी. ऐसा लगा जैसे निशा के स्वागत हेतु प्रकृति ने पलाश पुष्पों का कालीन बिछा दिया हो.
पुरुष और प्रकृति का मिलन - सूर्यास्त हो गया. अचानक, इस सूर्यास्त ने झील के किनारे देखे एक और सूर्यास्त की याद ताज़ी कर दी. झील में डोल रहे कमल ने अपनी खुली पंखुड़ियों को समेट लिया किन्तु मिलन की माधुरी में अलमस्त भौंरा कमलिनी की गोद से अपने को विलग न कर पाया, उसी में समाहित रहा. प्राण गँवाने का भय होते हुए भी भ्रमर अपनी प्रियतमा के आगोश को त्याग कर बाहर निकलने के लिए तैयार नहीं. मज़बूत काठ को काट कर भेद देने की सामर्थ्य रखने वाला भ्रमर कमलिनी की कोमलतम पंखुड़ियों को भेदने के लिए तत्पर नहीं.
रात अपने डैने फैलाये बढ़ती चली आ रही थी. आकाश पर काली चादर फैल रही थी. चारों ओर अन्धकार का साम्राज्य छा गया - गहरे स्याह समुंदर-सा अन्तहीन. जिस मन को दिन के कार्यकलापों व प्रकृति के बदलते रंगों की चाबुक लगा-लगा दुर्भावनाओं के जंगल में भटकने से रोके हुए थी, रात की कालिमा में सक्रियता के बोझ से भारी वह अंकुश निष्क्रियता के आँचल में लिपट, फूल-सा हल्का हो, हाथ से दूर छिटक गया. अभी तो दिल्ली पहुँचने के लिए सारी रात काटनी थी. मन को भटकने से बचाने के लिए पुन: दवाई का सहारा लिया.
हवाई अड्डे पर बड़े भइया का खिला चेहरा देख क्लान्त शरीर, मन और मस्तिष्क सब तरो-ताज़ा हो गए. सारी दुश्चिंताएं कपूर की तरह उड़ गईं. प्राणों में नव-जीवन, नवस्फूर्ति का संचार हुआ. जीवन में अनुभूतियाँ कितना बड़ा खेल खेलती हैं; अब तो शरीर और मन दोनों में ही थकान का लेश-मात्र भी न महसूस हुआ. राहत कि अनुभूति ने थकान को कोसों दूर खदेड़ दिया.
हालाँकि बाऊ जी काफी कमज़ोर हो गए थे, पर बेटी के मिलन की सुखद अनुभूति ने उनके मुखमंडल पर आनन्द की आभा बिखेर दी. न जाने कितने पलों तक हम दोनों आनन्द के उस स्रोत में आकंठ डूबे रहे. उनकी गोद में समाई मैं चारों ओर के वातावरण से बेखबर, केवल पिता के अपने सिर पर फिरते प्यार-भरे हाथ से ही भिज्ञ रही; जैसे सारी इंद्रियाँ उस स्पर्श से अभिभूत हों और कुछ जानने-समझने की क्षमता खो चुकी हों.
पिता के स्पर्श में एक और स्पर्श जुड़ा. माँ के ममता-भरे स्पर्श ने अभिभूतता की अतल गहराइयों से हौले-हौले अपनी ओर खींचा. इतने दिनों के तनाव के क्षण पिता को देख आँखों की राह बह गए. मन सुस्थिर हुआ. माँ के ममता-भरे स्पर्श ने भावनाओं के दरिया से निकाल स्वजनो की उपस्थिति का भान कराया. झिलमिलाती आंखों से देखा भाभी व गुड़िया-सी, सलोनी-सी आकांक्षा मुस्कुरा रही थीं.
बाऊ जी दिन-प्रति-दिन ठीक हो रहे थे. समय हवा के पंख लगा उड़ चला. अब तो वापिस जाने में भी बहुत ज़्यादा समय नहीं बचा था. आनंददायी क्षणों में समय की रेत कितनी जल्दी इन्सान की मुट्ठी से फिसल जाती है; पता ही नहीं चलता कब दिन हुआ कब रात.
आजकल माँ व भाभी दोनों ही बारी-बारी से मेरे बहुत मना करने पर भी मेरे लिए ख़रीदारी में व्यस्त रही; कभी दामाद के लिए तो कभी मेरे दोनों बेटों के लिए बाज़ार के चक्कर लगते रहे. माँ या भाभी में से एक बाऊ जी के पास घर रहतीं. हाँ, आकांक्षा सारे समय साथ रहती, चिड़िया-सी चहकती, फुदकती हुई.
ऐसे ही एक दिन शॉपिंग के लिफ़ाफ़ों से लदे-फदे हम घर पहुँचे ही थे कि दूरभाष की घण्टी टनटना उठी. स्वभावानुकूल आकांक्षा ही थैलों को धड़ाम से वहीं पटक टेलीफोन उठाने दौड़ी. उसकी इस हबड़ा-तबड़ी पर भाभी और मैं दोनों ही अनायास हँस पड़े. बचपन की अल्हड़ता का सानी नहीं.
आकांक्षा बैठक से ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रही थी, 'बुआ, हँसियेगा बाद में, पहले यहाँ आकर फोन ले लीजिये. टोरोंटो से फूफा जी का फोन है. आपके बिना उनका दिल नहीं लगता' - और जैसे ही मैं फोन लेने पहुँची वो अपनी आँखें मटका-मटका कर बोली, 'लीजिये फूफा जी, बुआ जी से बात कर लीजिये.' - मैं अभी भी उसके हाव-भाव पर मंद-मंद मुस्कुरा रही थी कि दूरभाष पर इनकी आवाज़ आई. कुशल-क्षेम के बाद कहने लगे, 'सुधीर की मम्मी जी की तबीयत बहुत खराब है. शायद किडनी फेल हो गईं हैं. सुधीर बहुत चिंतित है. वो तो वहाँ जाने के लिए तैयार बैठा है पर उसे पीलिया रोग 'ज्वाइंडिस' हो गया है. बीमारी की इस हालत में न ही उसका सफ़र करना उचित है, और न ही माँ की इस हालत में उसे माँ के पास जाना चाहिए. क्या तुम एक-दो दिन के लिए लखनऊ जा सकती हो? तुम्हारे जाने से उसे बहुत तसल्ली हो जाएगी. हालाँकि डॉक्टर के इजाज़त देते ही वो इंडिया जाने के लिए तैयार बैठा है. पर तनाव और फ़िक्र से उसकी बीमारी और लम्बी खिंच रही है.'
न का सवाल ही नहीं उठता था. मैंने उन्हें हाँ कर दी. सुधीर हमसे ख़ून के रिश्ते से तो नहीं पर भावनाओं के रिश्ते से जुड़ा हुआ है. वो इन्हें भइया और मुझे भाभी न केवल कहता है वरन् तहे-दिल से मानता भी है. उसकी मम्मी टोरोंटो दो बार आ चुकी हैं और हर बार हमारा एक-दूसरे के प्रति स्नेह गहराता गया. मम्मी की बीमारी से वह कितना परेशान होगा इसका अंदाज़ा मैं सहज ही लगा सकती हूँ. हाथ कंगन को आरसी क्या? कुछ समय पहले ही तो मैं भी चिन्ताओं के इस तनाव की भुक्त-भोगी रही हूँ.
चाची के पास जाना तो निश्चित था पर परेशानी तो तब पड़ी जब उस दिन बड़े भइया बुखार कि हालत में दफ़्तर से वापिस आए. सभी को इस बात की उलझन थी कि मैं अकेले न सफ़र करूँ.
हालाँकि भइया का बुखार कोई चिंता वाली बात नहीं थी, आम खाँसी, ज़ुकाम, बुखार था, फ़्लू था, पर ऐसी हालत में वो सफ़र तो नहीं कर सकते थे और मैं समयाभाव के कारण उनका इंतज़ार नहीं कर सकती थी. और फिर दिल्ली से लखनऊ ही तो जाना था. अकेले जाने में कुछ भी अनुचित न लगा. अभी पिछले साल ही तो मैं अकेले ही ‘वियाना-आस्ट्रिया गई थी और फिर वहाँ से ‘बुडापेस्ट-हंगरी'. यहाँ आने से कुछ महीने पहले ही मुझे एक कॉन्फ्रेंस में अमेरिका जाना पड़ा था. अत: सबको इतना फिक्रमंद होते देख कुछ हँसी भी आई. मेरे बहुत आश्वासन के बावजूद कम से कम माँ आश्वस्त नहीं हुईं, और उन्होंने जाने से पहले गले की सोने की चेन व कानों के बुन्दे उतरवा ही लिए. गाड़ी चलने से पहले दुनिया भर की हिदायतें मिलती रहीं और मैं भी यद्दपि उन हिदायतों के प्रति गंभीर नहीं थी फिर भी चुपचाप उन्हें सुन हाँ - हूँ करती रही. माँ बार-बार कहती रहीं कि, ‘तुम इतने सालों से देश के बाहर हो अत: आजकल के सफ़र के खतरों से अनजान हो. खिड़की के शीशे गिराये रखना, सिर अंदर रखना, हाथ अंदर रखना, लोग सिर बाहर होने पर बाहर से गले की चेन खींच लेते हैं, घड़ी, अँगूठी उतार लेते हैं, पर्स पास दबा कर रखना, दरवाज़ा बंद रखना, आदि-आदि. और मैं हिदायतों को माँ का अतिरिक्त स्नेह मान, यद्दपि मन में भयभीत नहीं थी, पर फिर भी उन्हें तसल्ली देती रही कि उनकी बातों की अवज्ञा नहीं करूँगी जिससे वो बेफिकर रहें.
रात्रि के साढ़े नौ बजे ट्रेन रवाना हो गई और मैं खिड़की से हाथ निकाले जब तक वो दिखते रहे, हाथ हिलाती रही और जब अंधकार ने उन्हें समेट लिया तो अपने को सफ़र के लिए स्थापित करने के प्रयत्न में जुट गई.
प्रथम श्रेणी के कूपे में एक और यात्री बैठे हुए थे. शांत, सौम्य व्यक्तित्व वाले सज्जन-से दिख रहे उस यात्री पर नज़र मार खिड़की से बाहर की ओर देखा. रिमझिम बारिश की बौछारें तेज़ हो रही थीं. बारिश थमने का नाम लेने कि जगह मूसलाधार होने लगी थी. लगा जैसे किसी ने बादलों के दरीचे खोल दिये हों.
अपनी प्रिय पत्रिका‘सरिता’ हाथ में थामे बैठ तो गई, पर आँखों के कटोरे चुम्बक की भाँति बाहर कड़कने-चमकने वाली बिजली से खिंचते रहे. न चाहने पर भी ध्यान उधर जाता रहा. किसी जवान विधवा के समान आसमां बिलख कर रो पड़ा. टपकते हुए आँसू धरती की प्यास बुझा रहे थे. बादलों की इस व्यथा को पवन देव भी नज़र-अंदाज़ न कर सके, स्वयं पर संयम न रख सके. उनकी श्वासों का उतार-चढ़ाव इतना ज़्यादा बढ़ गया कि वह काली रात तूफ़ानी रात बन बैठी. ट्रेन की गतिशीलता से पिछड़ गए पेड़, तेज़ हवा के झोंकों से उखड़ने की सीमा तक झूमते वृक्ष बड़े भयावह लग रहे थे. अंधकार के सीने को चीरती हुई ट्रेन की खिड़कियों के झीने प्रकाश में वो ऐसे लग रहे थे मानों वो पेड़ न होकर काले-कलूटे, बड़े-बड़े दानव अपने हाथ-पैर हिला रहे हों, और दैत्यों के भयानक अट्टहास के समान ही बादलों की गर्जना गाड़ी के पहियों की आवाज़ में मिल और भी क्रूर बन जाती. रह-रह कर आकाश में प्रकाश की आड़ी-टेढ़ी लकीर उभरती और सारा वातावरण कुछ पलों के लिए तीक्ष्ण प्रकाश में नहा जाता किन्तु अगले ही क्षण घटघोप अंधकार पुन: वातावरण को अपनी काली चादर में लपेट लेता.
बाहर की विद्दुत-रेखा की तरह यादों के बादलों में भी बिजली की एक लकीर कौंध गई और अनायास ही अधरों के दोनों कोने स्मित हास्य के छिटकने से विपरीत दिशाओं में हल्के-से खिंच गए. बहुत साल पहले रेल यात्रा के दौरान हुई घटना अतीत के ताने-बाने को काट ऊपर उभर आई थी. स्टेशन तो अब याद नहीं बस वाक्या ही याद है. स्टेशन पर चढ़े एक तात्कालिक यात्री ने डिब्बे में चारों ओर नज़र घुमा कर जब कहीं स्थान नहीं देखा तो सीट पर पसरी हुई स्थूलकाय महिला से अनुरोध किया कि कृपया वो अपने पैर थोड़े-से समेत लें जिससे उन्हें बैठने की जगह हो जाए. अपने अनुरोध पर उन महिला के कान में जूं भी न रेंगती देख, उनके दोबारा दोहराने पर महिला तमक कर अपनी गाँव की भाषा में बोली, ‘गोड़ (पैर) ही तो हैं काट देई का?’
सफ़र की तैयारी का तनाव छँट गया था. सोने से पहले मुझे पढ़ने की आदत है अत: आराम से बर्थ की दीवार पर सिर टिका‘सरिता’ की कहानियों में खोने जा ही रही थी कि शायद घटनाचक्र के धुंध से निकले उस स्मित हास्य, व मुझे सोने की जल्दी में न देख सहयात्री सज्जन ने वार्तालाप के तारों को खींचने का प्रयत्न करते हुए पूछा, ‘आप कहाँ तक जा रही हैं?
मैंने संक्षेप में पर आदरयुक्त स्वर में कहा, ‘लखनऊ’.
कुछ क्षण तो वो मौन रहे फिर जैसे अपने को न रोक सके हों, बोले, ‘लगता है कि आप विदेश में रहती हैं?’
उनके इस प्रश्न से कुछ अचकचा गई मैं. स्वदेश तो छोड़ ही दीजिये, मैं तो विदेश में भी भारतीय परिधान साड़ी ही पहनती हूँ. अपने देश, अपनी भाषा, अपने परिधान, अपने भारतीय होने पर मुझे गर्व है, तो इन्होंने मुझमें ऐसी क्या असंगति देखी जिससे ऐसा प्रश्न कर बैठे! मैंने अपने सामान की तरफ़ नज़र घुमाई, शायद इससे ही उन्हें कुछ ऐसा सुराग लगा हो......
शायद मेरे उन मनोंभावों को उन सज्जन ने ताड़ लिया था, हँस कर बोले, ‘आपके हाव-भाव ही कुछ ऐसे हैं. जब से आप आई हैं ऐसा लगता है कि आप हर दृश्य-परिदृश्य को स्याही-सोख्त-पेपर, ब्लाटिंग-पेपर की तरह अपने में सोख लेना चाहती हैं. जिन चीज़ों को हम रोज़मर्रा की जान उन पर एक निगाह भी नहीं फेंकते, आप उनको भी भरपूर ललक से देख रही हैं.’
इस बार मेरे हँसने की बारी थी. ‘जी हाँ, अपने ठीक ही अनुमान लगाया. सालों विदेश में रहने पर हालाँकि अतीत के घेरे सिमटने लगते हैं, पर साथ-ही-साथ वो कपूर की तरह उड़ते नहीं हैं बल्कि ‘कौन्सनट्रेटेड़ फ़ॉर्म, सत्व रूप अणु में संकलित हो जाते हैं; और यही अतीत के बिखरे टुकड़े, अतीत के घेरे में सिमटी स्मृतियाँ, जब कभी वर्तमान किसी बोझ से भारी हो उठता है, सतह पर उभर आती हैं और जीवन की जिजीविषा से जूझने की प्रेरणा देती हैं. स्मृति-कोष की हर छोटी-बड़ी, अच्छी-बुरी, सुखद-दु:खद स्मृतियाँ अपने में महत्वपूर्ण हैं. अत: जब कभी स्वदेश वापस आने का मौका मिलता है तो हर छोटी-बड़ी याद को दिमागी कंप्यूटर चिप में सहेजने का मन हो आता है. और इस तरह अतीत के बिखरे टुकड़ों से विदेश का वर्तमान गुलज़ार रखने की कोशिश करती हूँ.’
कुछ क्षण मौन रहने के उपरांत पुन: वो पितातुल्य सज्जन कुछ संकोच से भरे बोले, ‘शायद मैं सीमा का अतिक्रमण कर रहा हूँ, पर कहने से स्वयं को रोक भी नहीं पा रहा हूँ. मेरे विचार से यदि आप अपना कूपे बदल लें तो बेहतर होगा. मैं मेरठ तक ही जा रहा हूँ, उसके बाद सारी रात अकेले आपका सफ़र मेरी सलाह में उचित नहीं है.’
मैं उनकी सहृदयता से अभिभूत हुए बिना न रह पाई. जब कभी कोई पूर्णत: अपरिचित बिन माँगी सलाह को थाली में परोस कर देता है तो या तो हम उसे पूर्णत: बे-सिर-पैर की समझ कर कचरे की टोकरी में फेंक देते हैं या फिर उसे बहुत गंभीरता से लेते हैं. अकेले सफ़र के निर्णय से चिंतित पिता का चेहरा सहयात्री के उस सौम्य चेहरे से रह-रहकर झाँकने लगा. बाहर अभी भी इस तरह मूसलाधार वर्षा हो रही थी मानों किसी ने बादलों के दरीचे खोल दिये हों. रात की कालिमा में हितचिंतकों की सलाह कभी चाँदी के तार सदृश और कभी वर्षा ऋतु की गीली धरती पर रेंगने वाले केंचुओं के रूप में मस्तिष्क में उथल-पुथल मचाती रही. मैं उन सज्जन के मशविरे को नज़र-अंदाज़ न कर सकी और उठते हुए बोली, ‘देखती हूँ, शायद कहीं जगह मिल जाए.’
मैं ट्रेन के कारीडोर में एक ओर से दूसरे अंत तक चक्कर काट आई पर एस सब कूपों के दरवाज़े बंद थे. रात्रि के उस पहर में आचार-संहिता की सीमाओं का उल्लंघन कर दरवाज़ों पर दस्तक देने का औचित्य पाशोपेश में डाल रहा था. निराश हो कर पलट ही रही थी कि एक कूपे का द्वार खुला. शशोपंज से उभर आई शिथिलता प्रकाश- किरण के घुसते ही अंधकार की तरह तिरोहित हो गई और मैं बिजली की चपलता से उस द्वार के सामने जा खड़ी हुई. चार के उस कूपे में छ: यात्री समाये हुए थे - चार पुरुष और दो स्त्रियाँ.
मैंने उन्हें अपनी द्विधापूर्ण परिस्थिति से अवगत कराते हुए उनसे अनुरोध किया कि कृपया वो मुझे इस कूपे में रात व्यतीत करने कि अनुमति दे दें और यहाँ से कोई पुरुष यात्री मेरी आरक्षित बर्थ का उपयोग कर ले.
अपना अनुरोध स्वयं को बड़ा यथासंगत लगा, पर ज़रूरी नहीं कि आपकी सोच दूसरे की सोच भी हो. ज़रूरी नहीं कि शाम की शफ़क़, साँझ की लालिमा संसार के सब प्राणियों को एक जैसी ही लगे. उसकी सुर्खी सबमें एक ही रंग घोले. आकाश में विचरते बादल-खण्डों के मिलन और बिछड़न से बनी आकृतियाँ हर मानव अपने अंतरतम की अनुभूतियों के अनुरूप ही देखता है. हर लम्हा हर इन्सान अपनी तरह खोल कर देखता है. मेरी परिस्थिति ने मेरे अंदर जो भय अंकुरित किया था, वह या तो वो देख न सके या फिर उनके मेरे ध्येय के प्रति संशय ने उन्हें सशंकित किया - ‘आप तो स्वयं देख ही रही हैं कि हम लोग खुद ही संख्या से ज़्यादा हैं - हाँ, यदि आप चाहें तो इन महानुभाव से पूँछ लें, ये हमारे साथ नहीं हैं’ कहते हुए एक सज्जन ने एक ओर बैठे हुए एक यात्री की ओर तर्जनी से इंगित किया.
पर वह आशा की किरण चमकने से पहले ही विलुप्त हो गई. उन महाशय ने सपाट शब्दों में कह दिया, ‘मेरे पास यहाँ का आरक्षण है. जब तक टिकट कलेक्टर स्वयं मुझे दूसरी जगह नहीं देता मैं कहीं नहीं जाऊँगा.’
अभी तक तो उस कंपार्टमेंट में किसी भी अधिकारी का चेहरा नहीं दिखा था. रात्रि के इस प्रहर में शायद अब दिखने की उम्मीद भी नहीं थी. अत: आशाओं की किरणों को वहीं बुझा थके पावों से अपने कूपे की ओर लौट आई. मन को इस दलील से आश्वस्त किया कि अनेक बार पूर्वाग्रह का बंधन मनुष्य को बिला-वज़ह भ्रम में डाल देता है. अपने हितचिंतक को सीट न मिलने की स्थिति से अवगत करा ‘सरिता’ पत्रिका के पन्नों में स्वयं को खोने हेतु, निढाल, बर्थ पर पैर फैला दिये.
वर्तमान अपना भार समय के पंखों पर तौलता हुआ कभी न लौटने के लिए किसी अज्ञात दिशा में उड़ चला.
गाड़ी की गति धीमी हुई. पहियों के घर्षण का शोर कम होते हुए एक धक्के के साथ ख़त्म हो गया और गाज़ियाबाद के स्टेशन का शोर व यात्रियों के चढ़ने-उतरने की हबड़ा-तबड़ी बढ़ गई. सोच ही रही थी कि इस समय चाय पीऊँ कि नहीं कि कूपे के दरवाज़े पर खड़े व्यक्ति पर नज़र गई और अनायास ही शरीर में एक विद्दुत्-रेखा की सिहरन दौड़ गई. एक ही नज़र में ऐसा क्या दिखा, स्वयं को ही समझ नहीं आया. शायद मन के कोने में दबी भयाकृति ने झरोखे से झाँका था.
उन महाशय के साथ उनके पिछलग्गू चमचे जैसे व्यक्ति पर न चाहते हुए भी नज़र फुदक कर चली जाती. पहियों के घर्षण की आवाज़ क्रमश: तीक्ष्ण से तीक्ष्णतर होने लगी. अब तक चमचे जैसे महानुभाव ने शराब की लालपरी बोतल व ग्लास व्यवस्थित ढंग से रख दिये थे. बंद परी को बोतल से मुक्ति देते हुए ग्लास में डाल कर, खींसे निपोरते हुए, उन महानुभाव ने अपने आराध्य को पेश की जो अभी तक बड़े कुत्सित भाव से, सहयात्री पर एक नज़र फेंक, मुझे सिर से पैर तक परख रहे थे.
यद्दपि मैं उनकी नज़रों को नज़र-अंदाज़ कर अनभिज्ञ-सी बनी प्रस्तर-मूर्ति की भाँति बैठी रही पर मेरा रोम -रोम बलि के बकरे की तरह उनकी हर नज़र से वाकिफ़ रहा.
पहले वाले सज्जन सहयात्री की बेबस, दारुण नज़रें, मानसिक तनाव, एकदम बदला हुआ परिवेश, क्रूर और आतंक-भरा, किसी भी पल कुछ भी त्रासक भयावह घटने की बनैली आशंका, कूपे की परिधि को और भी छोटा करने लगी; दीवारें सिमटने लगीं और उनके दुर्भेद्द से दुर्भेद्दतर होने का एहसास गहराता गया.
नये सहयात्रियों के चेहरे के भाव सिर्फ़ मेरी कल्पना के भयांकुरों से उपजे वृक्ष नहीं हैं, यह विश्वास अब तक मुझमें जड़े जमा चुका था. मदिरा के घूंटो के बीच पहले ने हाथ को चिलम का आकार दे कर सिगरेट का एक लंबा कश भरा. उनके नकलची ने भी हाथों की कुप्पीनुमा चिलम में फँसे सिगरेट का एक लंबा कश खींचा और खाँसी के लंबे धक्के तले आ गए. दोनों ही बेशरम, बेढंगे ढंग से हँस पड़े.
बाहर बादलों ने अपने पट बंद कर दिये थे अत: बूँदों का झरना बंद हो गया था, पर दूर-दूर तक कहीं भी चाँद न था. तारे बहुत ही मद्धिम, हल्के-हल्के टिमटिमा रहे थे जैसे उनका बोल्टेज़ डाउन हो गया हो, उनकी बैटरी ख़त्म होने पर हो.
सोच का घोड़ा पूरी गति से दौड़ रहा था. विवेक मन पर इस तरह सवालों के तीर फेंक रहा था जैसे ढोली ढोल के दोनों सीने पर सटाक से चाबुक जैसी संटी मार रहा हो.
इस एहसास ने कि मेरठ के बाद इन यात्रियों के साथ शायद अकेले ही यात्रा करनी पड़े, निष्क्रिय सोच के घोड़े की लगाम खींची और चिंता से शिथिल शरीर की शिराओं को चुनौती के प्रसव ने क्रियान्वित कर उन्हें गति दी.
मन-ही-मन प्रार्थना करते हुए कि भगवान करे कोई न कोई कूपे का द्वार खुला मिल जाए, बिना कुछ सामान साथ लिए, उठ कर ऐसे चल पड़ी मानो शौचालय जा रही हूँ.
भाग्यवश पहले वाले कूपे का दरवाज़ा खुला हुआ था. इस बार के अनुरोध में शायद चेहरे कि असहजता व असहायता टपक रही थी या था पूरी बर्थ का लालच - उन महाशय ने टिकट कलेक्टर का और इंतज़ार न कर मुझसे सीट बदलना स्वीकार कर लिया.
बंद होठों के कपाट खोल उस छोटी-सी दरार से एक उच्छ्वास चुपचाप बाहर सरक गया और एक ओर से दूसरी ओर, बँधी डोर में हुए हल्के-से खिंचाव के स्पंदन से खिंच गई एक स्मित-रेखा.
गाड़ी की धीमी पड़ती गति से अंदाज़ लगा कि मेरठ आ गया है और अनजान शक्ति के प्रति नास्तिक-आस्तिक की परिभाषाएं भुला मस्तक स्वयं ही नतमस्तक हो गया कि समय रहते हुए मुझे भय व आशंकाओं से छुटकारा मिल दूसरे डिब्बे में पनाह मिल गई.
उस यात्री का शुक्रियादा करते हुए, उसे साथ ले जैसे ही अपने कूपे में पहुँची, पितातुल्य सज्जन सहयात्री की आँखों में आश्वस्तता चमक उठी. परिचय जितना मन से होता है उतना वाणी से नहीं होता. उनकी सौहार्दयता पर मन पसीज उठा. कुछ मिलन हर्ष के आँसुओं के पुष्पों से समृद्ध बनते हैं और कुछ मिलन जीवन के लिए अभिशाप सिद्ध होते हैं. आज एक साथ दोनों ही मिलन अपने विभिन्न रूपों में आ खड़े हुए और स्मृति के मानस-पटल में अपने विरोधाभाषी रूपों में अंकित हो गए.
उन बुजुर्ग ने अपना सामान संभाला और मैंने अपना. कूपे से निकलते ऐसा आभास हुआ मानों कोई अभिशप्त देहरी लाँघी हो. हम दोनों ने ही एक-दूसरे को मंगलकामनाएं दी और स्टेशन पर उतर हाथ हिला वो अपनी राह चल दिये और मैं दूसरे कूपे में.
सामान उठा कर कूपे से निकलते वक्त उन दो यात्रियों कि आँखों में देखा आश्चर्य का भाव क्या मेरी कल्पना की उपज थी या कटु सत्य - ऐसे विचारों की ऊहा-पोह, शारीरिक और मानसिक रूप से थका शरीर और मस्तिष्क ज़्यादा देर झेल न सका और उन्हें झाड़-पोंछ , झटक कर, अपनी सीट देने वाले उस यात्री को पुन: मूक धन्यवाद दे, नये साथियों के सहयोग को सराह, नई पाई निश्चिंतता की उँगली थामे निद्रा देवी के आगोश में कब सिमट गई, पता ही न चला.
गाड़ी के पहियों के संगीत की लय-ताल दो बार टूटी. बरेली और शाहजहांपुर, रात की काली तारों टकी चादर के चंदोवे तले आए और चले गए पर अभिवादन-स्वरूप न तो वाणी ही मुखर हुई और न ही आँखें खुलीं. बस पलकें कुछ झप-झपाकर झपकीं और उन्हें मौन विदा दी.
गाड़ी के झटके से पुन: स्वप्न-लोक के विचरण में बाधा उपस्थित हुई. जब तक पूर्णरूपेण सुप्तावस्था से जाग्रतावस्था में आती, रेलगाड़ी छोटे-से ग्रामीण ‘हरदोई’ स्टेशन से सरक अपनी तीव्र गति के लिए बेताब चल पड़ी थी.
नींद दूर छिटक गई थी पर ख़ुमारी अभी भी पलकों पर विराजमान थी.
बाहर दिवस के आगमन हेतु लोग-बाग अपने को तैयार कर रहे थे. इतने समय के अंतराल के बाद आज रेलवे-लाइन के पास ग्रामीणों को लोटा लिए निवृत्ति के लिए बैठे देख अनायास ही एक स्मित-रेखा एक छोर से दूसरे छोर तक छिटक गई.
सुबह, बाँहें पसारे, रात्रि को विदा दे रही थी. ऊषा की असंख्य किरणें निशा की काली चुनरी को भेद, उसे जहाँ-तहाँ से झीनी, पारदर्शी बना रही थीं और उनसे बचने की कोशिश में पीछे-ही-पीछे सरकती निशा अकस्मात् व्योम का साम्राज्य छोड़, जाने किन कन्दराओं में छुप, नज़रों से ओझल हो गई.
अब तक चाय की तलब लग आई थी. कुल्हड़ों की सोंधी महक को मन लालायित हो उठा था, पर अब कुल्हड़ की चाय तो अतीत का इतिहास बन चुकी है. पता चला कि बहुत छोटे-छोटे स्टेशनों पर अभी भी कभी-कभार कुल्हड़ों में चाय मिलती है, अन्यथा प्रगति की दौड़ में तेजी से बढ़ते हुए भारत में अब पेपर-कप्स या प्लास्टिक-कप्स में ही स्टेशनों पर चाय मिलती है. पर कागज या प्लास्टिक में मिट्टी का वो सोंधापन, उसकी ख़ुशबू कहाँ! हाइजीनिक रूप से भी कुल्हड़ श्रेष्ठ थे. पीओ और फेंक दो, चीनी-मिट्टी, शीशे-काँच के कपों की तरह बार-बार तो उनका प्रयोग होता नहीं और फिर एनवायरलमेंटल प्वाइंट से भी तो वो बढ़िया थे. मिट्टी के बर्तन मिट्टी में ही समा गए जैसे पंचतत्व शरीर अग्नि की भेंट हो पंचतत्त्वों में समा जाता है.
इन अजीबोगरीब विचारों में डूबे हुए पता ही नहीं चला कब संडीला आ गया; वहाँ के मशहूर मोतीचूर लड्डू की हाँकों से स्टेशन गूँज रहा था. बेचने वाले लड्डू की हांडियाँ लिए इधर-उधर दौड़ रहे थे. मैंने भी हाथ बढ़ाकर चाची व उनके परिवार के लिए दो हांडियाँ ले लीं. अभी पैसे दिये ही थे कि गाड़ी के पहिये गतिशील हो गए और शनै:-शनै: लय-ताल में घूमने लगे. समय का चक्र पहियों के साथ-साथ आगे बढ़ने लगा. पहियों से बजती धुन वक्त के साज़ पर बजती हुई धुन की आवाज़ में अपनी आवाज़ मिलाने लगी.
मैंने एक लंबी साँस खींची और नथुनों से ढेर सारी ताज़ी हवा फेफड़ों में भर ली. उकड़ूँ-सी बैठ दोनों हाथ घुटनों पर टिका उस पर ठुड्डी रख गुज़रते हुए दृश्यों को आँखों के माध्यम से अंतरतम में उतारने लगी. एक पोखर जैसा तालाब आया जिसके बीचों-बीच चमक ही चमक थी. लगता था कि सारी किरणें पोखर में ही उतर आई हैं.
ऐश-बाग स्टेशन पहुँचते-न-पहुँचते कंपार्टमेंट में हड़बड़ी मच गई. यद्दपि कि यहाँ गाड़ी रुकती नहीं पर लखनऊ का प्रमुख स्टेशन चार-बाग यहाँ से कुछ मिनटों का ही सफर है अत: सब अपने सामानों को व्यवस्थित करने में जुट गए.
आख़िरकार ट्रेन नंबर वन प्लेटफार्म पर आ ही गई. सफर के अंत में सही-सलामत गंतव्य पर पहुँच, न जाने किस आस्था से मन कृतज्ञता से कृतज्ञ हो उठा. दूसरे ही क्षण यह समस्या सिर उठा कर पूछने लगी कि चाची ने अपने जिन संबंधी को मुझे लेने भेजा है उन्हें मैं पहचानुंगी कैसे? मैं तो उनसे परिचित हूँ नहीं, बस नाम ही जानती हूँ. और यकायक उन महानुभाव के नाम और चाची के मोहल्ले के नाम ने गुदगुदी पैदा कर दी. दोनों नामों को यदि मिला दिया जाए तो क्या सटीक हैं! चाची के मोहल्ले का नाम है‘बारूद खाना’और उन सज्जन का‘जंग बहादुर’- बारूद खाना वाले श्री जंग बहादुर जी.
इस हल्के-फुल्के मूड में गाड़ी से उतर अपने लेने आने वाले सज्जन के लिए इधर-उधर नज़रें घुमा रही थी कि पीछे से आवाज़ ने मेरे कंधे का स्पर्श किया. घूम के देखा कि जिन महोदय से सीट का आदान-प्रदान किया था वो बड़े अस्त-व्यस्त से, क्रोध से भभके हुए खड़े थे. परेशान-से, वो मुझे संबोधित कर बोले, ‘आपने मुझे कहाँ भेज दिया? मेरा सब सामान और पैसा चोरी हो गया है.’
मैं स्तंभित रह गई. जहाँ एक ओर उन महानुभाव के साथ हुए वाकये से दु:खी थी, वहीं यह विचार कि मेरी अशांति की चेतनायुक्त धारणा निर्मूल नहीं थी; सामान की तो ऐसी-तैसी, यदि कहीं मेरी इज्ज़त पर हाथ डाला जाता.....यह आशंका-मात्र ही बदन को पत्ते की तरह कंपकपा गई. सोच का घोड़ा यहीं नहीं रुका, आँखों के आगे से अख़बार की सुर्ख़ी गुज़र गई - ‘एक अपरिचित, अप्रमाणित महिला का शव रेल ट्रैक के पास पाया गया.’
आँखें अपने जबड़े खोले भौंक रही थीं और होंठ प्रार्थना-भरे स्वर में बुदबुदाए.यह वाकया शीशे की किरच की तरह अंदर धँस कर टीस रहा था. मस्तिष्क विचारों की रूई धुन रहा था. मानव हर घटित हुए के लिए आत्मसंतोष के वास्ते एक कारण खोज लेता है, भले ही वह कारण सही न हो; क्योंकि कारण खोजने से वह, कुछ खो जाने के बाद कुछ पा जाने जैसा महसूस करने लगता है. सबसे बड़ा प्रश्न मुँह बाये खड़ा था कि किसके सितारे ज़्यादा प्रबल थे? मेरे बचाव के या उसकी दुर्घटना के? हम दोनों ही मुँह बाये, एक-दूसरे को देखते, हतप्रभ खड़े थे.
हवाई अड्डे पर यात्रियों की चहलकदमी तेजी पर थी। लोगबाग जल्दी-जल्दी इधर से उधर दौड़ रहे थे। कोई सामान तुलवाता तो कोई टिकट कटवाता। वो दोनों निगरानी के लिए ड्यूटी पर तैनात थीं।
अचानक वह आई। गोरी-चिट्टी यूरोपियन, खूबसूरत आसमानी चंदेरी साड़ी पहने। सलीके से बालों का जूड़ा बना हुआ। कलाई भरकर चूड़ियाँ। अपने भारी सूटकोस को पहियों के बल घसीटती, साड़ी में भी लपक-लपक तेजी से भागी जा रही थी, वह। देखकर लग रहा था कि उसके कपड़े उसके किसी भी काम में बाधा नहीं।
पहली ने दूसरी को कोहनी मारी-' देख-देख, उधर देख। कैसी इतरा रही है। खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। साड़ी, चूड़ी, बिन्दी, झुमके, तो इसपर भी चढ़ ही गया हमारा रंग!'
' हाँ, हाँ- क्यों नहीं, पूरा । पर, इसपर चढ़ा यह रंग कच्चा है। शौकिया पहने हैं इसने ये कपड़े। अपने देश में लौटते ही उतार देगी, यह।... पर हम? अपने देश में हमारे कपड़े, हमारी भाषा, संस्कार, सब पिछड़ेपन और पिछड़ी पीढ़ी के प्रतीक बन गए हैं। 'वास्तव में तो अब हमारा कोई रंग ही नहीं रहा, पहचान ही नहीं। दूसरों की अंधी होड़ में अपना सब कुछ ही तो भूलते जा रहे हैं हम...खाना-पीना, पहनावा सब।
.. पैंट,कोट के यूनिफौर्म में लैस हवाई अड्डे की वह कर्मचारी, सोच की ग्लानि में डूबी, सहकर्मी को सही जबाव देने के लिए शब्द ढूँढती, उसके अवाक् चेहरे को देख रही थी।...
पिछले दिनों समाचार आया कि कुल्लू में अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिए लोग घास खाते हैं और देवता भी उन्हें तुरन्त माफ कर देते हैं। यहां लोग इसे प्रायश्चित करने का सबसे बढिय़ा तरीका मानते हैं। पर हमारे लालूजी तो कई सालों तक पाप करने के लिए केवल घास ही खाते रहे। सबने मिलकर गाय-भैंसों, यहां तक कि मुर्गियों की ऐसी बाट लगाई कि लोग आज भी उनके नाम की माला जपते हैं। कागजों में स्कूटरों पर चारे के अलावा गाय-भेंसे तक ढोई गईं। बजाज, वेस्पा तथा अन्य दुपहिया वाहन निर्माता लालू एंड कंपनी से दुपहियों पर उनके द्वारा दुधारू चौपाओं को ढोने की विकसित तकनीक पूछते रहे, पर सीबीआई वाले भी उनसे कुछ नहीं उगलवा सके तो बजाज-वेस्पा वाले क्या चीज हैं। उधर लालू एंड कंपनी तो पाप करने के लिए केवल घास ही खाती रही, इधर हमारे नेताओं तथा हुक्कामों ने पाप करने के जो नए-नए तरीके ईजाद किये हैं, उससे देवराज इन्द्र ने भी कायल होकर इन नेताओं तथा हुक्कामों के सारे गुनाह माफ कर दिए हैं। कबूतरबाजी का जो नया तरीका एक सांसद भाई ने ढूंढा था, उस पर तो दाऊद भाई भी उनका मुरीद हो गया। पराई बीबियों को अपनी बताकर धड़ल्ले से भाई कईंयों को विदेश छोड़ आए और हमसे अभी तक अपनी भी नहीं छोड़ी गई। शहीदों के कफन निकालकर उन्हें नग्र करने वाले अमेरिका में जामा-तलाशी के दौरान खुद नंगे हो गए। कागजों में अनाज से भरी रेलगाडिय़ां सुदूर पूर्वी क्षेत्रों तक चलती तो हैं, पर रास्ते में कहीं गायब हो जाती हैं। सरकार ने नरहेगा तथा अब मरेगा (नेरगा तथा मनरेगा) योजनाओं में धांधली को रोकने के लिए चैक सिस्टम आरंभ किया तो जनप्रतिनिधियों ने फर्जी मस्ट्रोल भरकर बैंक के बाहर ही कमीशन वसूलना आरंभ कर दी। इसके अलावा दफ्तरों में किसी चीज की रिपेयर करवाने के नाम पर लिए गए बिलों से साहिबों के घरों के लिए डीटीएच, फ्रिज़ जैसी बड़ी चीजों के अलावा बाबा लोग के चाकलेट-कुरकरे और साहिबों के गंजी-बनियान तथा अंडरवियर तक ऐसे बिलों में एडजस्ट किए जाते हैं। कुशा खाकर गुनाह माफ करवाने का तरीका नया ज़रूर है, पर हमारे यहां तो सारी उम्र पाप करने के बाद लंगर खिलाने, गंगा स्नान या मरते वक्त हरि नाम का तरीका हिन्दू सभ्यता के आरंभ से ही मौज़ूद है। मज़े की बात है कि लोगों ने इसका भरपूर लाभ भी उठाया है। सालभर जमाखोरी करने वाले वर्ष में एक बार पेटुओं को लंगर खिलाने के बाद अपने गुनाहों से छुटकारा पा लेते हैं। इसी तरह सारी उम्र लोगों के लहू से स्नान करने वाले गंगा माई में डुबकी लगाकर अपने सारे पुराने पाप बहाकर, पापों की नई बुआई आरंभ कर देते हैं। उम्रभर ऐश्वर्या राय के नाम की माला जपने वाले अजामल की तरह एक ही बार विष्णु का नाम लेकर तर जाते हैं। घास खाता, लंगर खिलाता, गंगा नहाता या अंतिम समय एक बार ही हरि नाम लेता देखकर देवता सब भूल-चूक माफ कर देते हैं और हमें स्वर्ग प्राप्ति होती है। पर ऐसा भारतीय सदियों से करते आ रहे हैं, नया कुछ नहीं। अगर नया है तो केवल देवताओं को प्रसन्न करने का तरीका, घास के बाद अब क्या? हम अभी भी यही सोच रहे हैं।
दिल्ली से बहादुर शाह जफर, कानपुर से नाना राव पेशवा तथा तात्या टोपे, लखनऊ से बेगम हजरत महल, झॉसी से रानी लक्ष्मी बाई, इलाहाबाद से लियाकत अली, जगदीशपुर से कुवर सिंह, बरेली से खान बहादुर खॉ, फैजाबाद से मौलवी अहमद उल्ला तथा फतेहपुर से अजीमुल्ला। ये है भारत मॉ के वे राष्ट्र भक्त जिन्होंने जाति-धर्म-लिंग से परे जाकर वर्ष 1857 के क्रान्तिकारी उद्घोष में फिरंगियों के छक्के छुड़ा दिये। उक्त स्वतन्त्रता समर को अंग्रेजों ने बहुत गम्भीरता से लेते हुए अपना चिन्तन प्रारम्भ किया। उन्हे समझते देर न लगी यदि हिन्दू-मुस्लिम एकता को न तोड़ा गया तो निश्चित ही आगे आने वाला समय उनके लिए मुश्किलों भरा होगा। बॉटो और राज करों की नीति के तहत वायसराय लार्ड मेयो ने एक समिति बनायी जिसका कार्य उस समय के भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक अधिकारी सर विलियम विल्सन हंटर को सौपा। जिसकी रिपोर्ट ‘‘द इंडियन मुस्लिम’’ के नाम से वर्ष 1871 में प्रकाशित हुई। बड़ी चालाकी से अंग्रेजो की पूर्व योजना के अनुरूप हंटर ने उनको बदतर हालात में पहुँचाने की जिम्मेदारी साम्राज्यवादी शासन तथा हिन्दुओं दोनों पर डाल दी तथा शैक्षिक रूप से मुसलमानों के पिछडने की जिम्मेदारी सीधे हिन्दुओं पर डाल वे भारतीय मुस्लिम तुष्टीकरण के जनक बन गये। इसके बाद सन् 1888 में सर सैय्यद अहमद खॉ ने ‘‘एग्लों-मुस्लिम डिफेंस एशोसिएशन’’ की स्थापना की जो अंग्रेजों की योजना का हिस्सा था। जिसके द्वारा उन्हे हिन्दू-मुस्लिम एकता के स्पष्ट विभाजन की पहली राजनैतिक सफलता प्राप्त हुई। लार्ड एल्गिन द्वितीय (1894-99) ने भारत को तलवार के बल पर विजित किया गया है। और तलवार के बल पर ही इसकी रक्षा की जायेगी कहकर मुस्लिम समाज को भारत के शासक के रूप में इंगित कर उपरोक्त दरार को बढ़ाने का कार्य किया। धीरे-धीरे उक्त दरार 30 दिसम्बर, 1906 को एक चौड़ी खाई के रूप में नजर आई जब अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना तथा 22 मार्च, 1940 को अपने लाहौर अधिवेशन में मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की मॉग रखी। वर्तमान में 2005 में गठित सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में भी काफी कुछ हंटर कमेटी की ही तरह है। सच्चर कमेटी में भी हिन्दू तथा मुसलमानों को प्रतिस्पर्धी समाज के रूप में चित्रित किया गया। उक्त रिपोर्ट में न्यायपालिका सेना, संसद, बैंक व्यापार, रोटी तथा रोजगार के साधनों को भी हिन्दू तथा मुस्लिम खेमों में बॉट दिया। आज भले ही दिखाई न पड़ रहा हो पर निश्चित ही आगे आने वाले समय में हंटर कमेटी की ही तरह यह हिन्दू तथा मुसलमानों की बीच की खाई को और चौड़ा करेगी तथा देश के उन सत्ता प्रतिष्ठानों को और अधिक सशक्त करेगी जो देश में मुसलमानों के शुभचिन्तक बताते है तथा झूठे ही धर्म निरपेक्षता के ठेकेदार बनते है, जिन्होने अपने स्वार्थों के चलते देश को कई नाम दिये तथा उन्होने राष्ट्र को खण्ड-खण्ड करने में किंचित मात्र भी हिचक का अनुभव नहीं किया, जिन्होने हिन्दू तथा मुस्लिम समाज को विभक्त कर अल्पसंख्यक तथा बहुसंख्यक की पहचान दी। इनके ही द्वारा मजहबी तुष्टीकरण का जन्म हुआ, इन्ही तथाकथित सेकुलरवादियों के चक्कर में देश तथा समाज में कुन्ठा, क्षोभ, भय, घुटन आदि का भयावह वातावरण तैयार हुआ। प्रश्न यह उठता है आज देश ऐसे मार्ग पर कैसे खड़ा हुआ जहॉ से उसके लोकतान्त्रिक धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर प्रश्न चिन्ह लग गया। भारत की आजादी के बाद देश पर शासन की बागडोर आयी कांग्रेस पार्टी के पास जिन्होने बड़ी ईमानदारी से अंग्रेजो की परम्परा बॉटो और राज करो की नीति को आगे बढ़ाया। उन्होने धर्म निरपेक्षता की आड़ में मुसलमानों के गम्भीर अपराधों पर पर्दा डाला, उनके मजहबी कानून अलग रखे, यहॉ तक कि उनसे परिवार नियोजन तक के लिए भी नहीं कहा गया, उनको आधुनिक शिक्षा व्यवस्था से जुड़ने के लिये नहीं कहा सिर्फ इस भय से कहीं उनका मुस्लिम वोट बैंक प्रभावित न हो जाये। उन्होने राष्ट्रवादी मुसलमानों को दबा कट्टर मजहबी मुसलमानों को बढ़ावा दिया। काग्रेस पार्टी ने अपने स्वार्थ सिद्ध के कारण मुस्लिम समाज को धीर-धीरे इतने गहरे अंधेरे कूए में डाल दिया कि उन्हे लगने लगा इसी घुटन भरे अंधेरे में हमारा तथा हमारे समाज का भविष्य सुरक्षित है उन्हे सच्चाई की किरण से भय लगने लगा वे समझने लगे यह किरण हमें तथा हमारे समाज को जला कर राख कर देगी। उन्हे राष्ट्र तथा राष्ट्रवादी बातों से डर लगने लगा। उन्हे लगने लगा उनका हित बहुपत्नी विवाह, मजहबी तालीम तथा देश में जनसंख्या बढ़ोत्तरी में ही सुरक्षित है। यदि हम शैक्षिक स्तर पर इनका विश्लेषण करे तो पायेगे देश के प्रमुख कालेजो में अन्डर ग्रेजुएटस् 4 प्रतिशत, पोस्ट ग्रेजूएट्स 2 प्रतिशत, आई0आई0टी0 में 3.3 प्रतिशत तथा आई0आई0एम0 में 1.3 प्रतिशत यदि सरकारी नौकरी में देखे वहॉ भी इनकी स्थिति संतोषजनक नहीं है, भारतीय विदेश सेवा में 1.8 प्रतिशत, भारतीय पुलिस सेवा में 4 प्रतिशत, भारतीय प्रशासनिक सेवा में 3 प्रतिशत सहित शिक्षा, गृह, स्वास्थ विभागों सहित कही भी इनकी स्थिति अनुपातिक दृष्टि से ठीक नहीं है उपरोक्त कुछ ऑकड़े प्रदर्शित कर रहे है मुस्लिम समाज अन्य की अपेक्षा अधिक पिछड़ा है। यदि हम कारावास को छोड़ दे तो हर स्थान पर उनकी उपस्थित काफी कम है। वे शैक्षिक स्तर पर अन्य की अपेक्षा काफी पीछे है। इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि बेरोजगारी में भी उनकी बढ़त है। उपरोक्त परेशानियों की मुख्य वजह राजनीति क्षेत्र का वह वर्ग है जो बताता तो है वे उनके शुभचिन्तक है परन्तु वास्तव में वे सिर्फ उन्हे वोट बैंक के रूप मे ही देखते है। उसके अलावा उनके मजहबी धर्म गुरूओं ने भी उनका काफी नुकसान किया जिन्होने अपने समाज को आधुनिक विकास की सुनहरी किरण से वंचित रखा। अन्त में वे स्वयं जिन्होने कभी अपने आप राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़ने का प्रयास ही नहीं किया यदि वे उपरोक्त से जुडे़ होते तो उसके हर प्रकार के लाभ में भी उनकी प्राकृतिक हिस्सेदारी होती। कुछ भी हो यदि हम देखे तो पायेंगे राष्ट्र का सत्ता प्रतिष्ठान कभी भी मुस्लिम समस्याओं के प्रति ईमानदार नहीं रहा। हमेशा उनकी समस्याओं को वोटो के तराजू में रख तौला गया जहॉ वोटो का पलड़ा समस्याओं से भारी पड़ा अतः देश के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनेताओ ने उनकी वृक्ष रूपी समस्याओं के मूल में न जाना बेहतर समझा तथा शाखाओं तथा पत्तों को रंग रोगन लगा बनावटी हरा भरा बनाये रहे। हंटर समिति से हमें आशा भी नहीं थी कि वे मुसलमानों के उत्थान हेतु कोई प्रभावी कदम उठायेंगे परन्तु देश का एक प्रमुख राजनैतिक दल अपनी सत्ता को आगे सुनिश्चित करने करने के लिए ऐसा कुछ करेगा जिससे देश की राजव्यवस्था का भविष्य ही दॉव पर लग जायेगा तथा आगे आने वाले समय में लोकतान्त्रिक राजव्यवस्था का आधार सेकुलर न होकर मजहबी होने का तर्क पैदा हो। कुछ इसी प्रकार की नींव पड़ी है इस सच्चर समिति की रिपोर्ट से। हंटर समिति तथा सच्चर समिति में तीन तरह की समानतायें दिख रही है। प्रथम तो यह दोनो में बॉटों और राज करो की दूरगामी योजना द्वितीय दोनों में धार्मिक विद्वेश बढ़ाने का प्रयास तथा तृतीय दोनों समितियों में मुस्लिमों के प्रति ईमानदार सोच का अभाव। देश की आबादी का लगभग 14 प्रतिशत मुस्लिम है। जिनको दर किनार कर राष्ट्र के चहुमुखी विकास एवं भारत को परम वैभव प्राप्त कराना बेमानी है। भ्रष्ट तथाकथित सेकुलरवादी राजनैतिक सत्ता प्रतिष्ठानों में उनके प्रति ईमानदारी का अभाव स्पष्ट दिखता है ‘‘कर बहियां बल आपने छाड़ बिरानी आस’’ उन्हे पहचानना होगा ‘‘स्व’’ को, एक ईमानदार प्रयास करना होगा मजहबी व्यवस्था से ऊपर उठ विकास की धारा से जुड़ने का, उन्हे सच्चे मायने में स्वीकार करना होगा राष्ट्रीय धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को तथा विश्वास करना होगा भारतीय गणतन्त्र पर। अन्यथा वे बने रहेगे मजहब के आधार पर स्वार्थ युक्त राजनीति के केन्द्र बिन्दु।
दो किनारे दो देश . . .दो घर, और बीच में तरल व उद्वेलित, तटों से जुड़े रहने की अदम्य चाह लिए निरंतर पिघलता बहता मन . . प्यार और आवाहन के शीशे में अक्स सा उतरा, मातृभूमि पर खड़ा, खुद से पूछता 'कौन है तू . . .भारतीय या बस एक भारतवंशी?' जवाब उलझते हैं और अंतस किनारे झाग बन-बनकर बिफर जाते हैं। आसान तो नहीं अस्मिता से जुड़ना, टूटना और एक ही जन्म में भारतवासी से भारत–वंशी मात्र रह जाना। इतना अकेला और अनाथ तो पहले कभी नहीं महसूस किया था। सड़कों पर घूमते, अपनों से मिलते–जुलते, कम से कम वह एक भारतीय होने का भ्रम तो बना ही रहता था पर आज इस प्रवासी खेमें ने सबकुछ बदल दिया था। बिल्कुल ही अलग खड़ा कर दिया था . . .अपने ही घर में मेहमान–सा बनाकर। दूर हरे पीले नीले रंगों की लाइनों के पीछे खड़ी मन की सारी असुरक्षा, सारा भय चन्द पंक्तियों में फूट पड़ा . . .
एक सड़क तो बना रहे हो तुम मेरे घर से घर तक ध्यान रहे पर खुद न जाएं मगर ज़हन की वो वादियां
वादियाँ जहाँ बहती नेह भरी नदियाँ और झूमती हरी भरी यादों की मीठी सघन अमराइयाँ...
पिछले महीने के चन्द चलचित्र से दिन बारबार घूम रहे हैं, आंखों के आगे अपना टेक और रि–टेक देते हुए . . .बड़ी–बड़ी हस्तियां, बड़े–बड़े नाम . . .पहुंच से दूर . . .बहुत दूर . . .बड़ी और चर्चित हस्तियां। लालकृष्ण अडवानी, मुकेश अम्बानी, अरूण शौरी, यशवन्त सिन्हा, ज्योतिर् आदित्य सिन्धिया, रूबी भाटिया और विनोद खन्ना भी . . .हीरो विलेन सब . . .विश्वसनीय अविश्वसनीय से चन्द नाम . . .एहसास दिलाते, भले ही परदेसी खेमें से ही सही, पर ये चन्द दिन विशिष्ट हैं। हंसी और कहकहों के बीच, मेल–मिलाप के बीच, लोग नाम व पते बदलते। मंच नहीं तो आपस में ही लम्बे–लम्बे चिठ्ठे खोलते–पढ़ते। जनवरी की गुनगुनी धूप में सब कुछ बहुत ही आरामदेह और बेपरवाह सा था। चारो तरफ बस फुरसत ही फुरसत। लोग बिना दुल्हे–दुल्हन के ह्यखास मकसद या मुद्दे केहृ बारातियों की तरह खातिर करते और कराते . . .दो सौ डॉलर की पाई–पाई वसूलते . . .मस्त और बेझिझक . . .मानो इस आज का कोई कल ही नहीं। मानो पूरे भारत का आतिथ्य यहां चन्द दिनों के लिए सिमट आया हो . . .खाने पीने और मनोरंजन के इतने वृहद और रंगारंग आयोजन . . .खुद को रोक पाना असंभव ही था। भागदौड़ का एक व्यस्त पहलू और भी था . . .इस सबके साथ व्यापार, पौंड और डॉलर के मुद्दे भी तो जुड़े हुए थे . . .दुनिया भर के देशों में बिखरे भारतीयों का एक काल्पनिक घर जिसकी छत और दीवारें विदेशी मुद्रा से चुनी जानी हैं। अतिथि मेजबान सभी गागर में सागर भर रहे थे।
बस एक वह सरल और छोटी सी राष्ट्रपति से मुलाकात ही मन नहीं भूल पा रहा था, गहरी सफेद भवों के नीचे बच्चों सी मन को भेदती जिज्ञासु आंखें और सरल सा दर्शन . . .एक आवाज़ भीड़भाड़ में भी प्रेरणा स्त्रोत . . .'भारतीय हो तो भारतीयता में गर्व करो। ध्येय और जीवन दोनों को ही पूरी ईमानदारी और काबिलियत से जिओ। फिर देखना तुम अपने देश का गौरव कहलाओगे। क्योंकि तुम सभी तो उन दूर–दराज किनारों पर भारत के बेताज राजदूत हो।'
शाम का सुरमई धुंधलका धूप को अगले दिन के लिए समेट चुका था और नियोन लाइट्स की झिलमिल में माहौल और भी उल्लासमय व रंगीन लग रहा था। पंडाल के बीचोबीच, ठीक मंच के सामने गद्देदार कुरसियों पर सुरूचिपूर्ण सफेद आवरण चढ़े हुए थे। नेता, अभिनेता, रिश्वतखोर, मुफ्तखोर सब विराजमान थे उनपर, सिवाय प्रवासी अतिथियों के। प्रवासी दिवस के इस रंगारंग कार्यक्रम में एकबार फिर भेदभाव हुआ था। छोटी–छोटी प्लास्टिक की कुरसियों पर हरी, लाल लाइनों के पीछे पंक्तिबद्ध बैठे वह चुपचाप सब सह गए। दो सौ डॉलर की चुभन हर आंख से टपक रही थी। जो भारत को, देश को जानते थे चुप थे, पर जोशीलों का ह्यएकाध पीढ़ी के बाद पहली बार भारत आएहृ दिस इज नॉट फेयर वाला धीमे–धीमे उभरता असंतोष ठंडी हवा में जाने कहां जमता चला जा रहा था, संचालकों के कानों पर जूं रेंगे बगैर ही . . .मचाने दो शोर इन्हें, यहीं ठीक हैं ये . . .क्या पता कोई आतंकवादी ही हो इनमें से, सुरक्षा तो पूरी होनी ही चाहिए . . .अनजान बुजुर्गों और प्रौढ़ों की तरफ अफसराना अन्दाज़ में देखते हुए, खुदको, अपनी सोच को तसल्ली दे ली थी उन्होंने। बढ़ते रंगारंग कार्यक्रमों के साथ–साथ वक्त और बातें दोनों ही बढ़ते चले गए।
थोड़ी देर बाद ही छोटी बड़ी कुरसियां, उम्र, वक्त सबको भूलकर लोगों ने एकबार फिर खालिस स्कॉच में गंगाजल का मजा लेना शुरू कर दिया। फिजी और सूरीनामी कलाकारों का नृत्य–संगीत मादक ही इतना था। इतनी फड़कती धुनें कि लगा ए आर रहमान के बाद भारतीय फिल्मी संगीत का अगला दशक बस इन्हीं का ही होना चाहिए। लुभाने को तो सोनू निगम और सुनिधि चौहान भी आए पर मानस पर कोबरे सी लिपटी और थिरकती रहीं वहीं कैरेबियन धुने। विश्वास नहीं हो पाया कि यह सब सीधे–साधे हनुमान चालीसा और रामचरितमानस पढ़ने वाले बिहारियों के वंशज हैं। भारतीय लोकगीतों का रम सा मादक कॉकटेल . . .पता नहीं उन नीले टापुओं की नशीली धूप का असर था या मात्र रिमिक्स युग का तकनीकी जादू। फिर प्रवासी दिवस के जोशीले माहौल का भी तो कुछ असर होना ही था . . .हर पैर ताल दे रहे थे और गंभीर से गंभीर सर उन तालों पर झूम रहे थे। बेहद धूम–धड़ाके के बाद अगली रात मुज़फ्फर अली का प्रोग्राम बेहद सुरूचिपूर्ण और कलात्मक था, पर एक लंबे विलंब की वजह से कितने जगे और देख पाए कहना असंभव ही है।
मेल–मिलाप की समापन शाम कवि–सम्मेलन बनकर आई। आयोजन अक्षरम् का था और मेला अपनों का। कुछ मुस्कुराते चेहरे कुछ फैली बांहें और ढेर सारे तेवर व रंग बिरंगी कविताएं। जोशीली आह और वाह–वाह के बीच कई ऐसे भी थे जो सुन और समझ रहे थे। माहौल वाकई में चटपटी चाट जैसा ही था पर भूखी काव्य आत्माओं के लिए छप्पन भोग व्यवस्था के साथ।
ऐसा भी नहीं कि वे तीन चार दिन बस मौज–मस्ती के लिए ही याद रहेंगे, बहुत कुछ था जो चुपचाप साथ हो लिया . . .अंतरंग हो गया जैसे कि भाई कुंवर बेचैन जी की प्यार से दी हुई किताब 'आंगन की अलगनी'।
उद्वेलित और उत्साही भावुक मानसिकता और ढेर सारी अपेक्षाएं . . .खुद–ब–खुद यादों की गठरी में आ सिमटती हैं जब भी कोई प्रवासी या निवासी घर की ओर कदम उठाता है . . .दूर बसा वह घर मां–बाप, भाई–बहन, मित्र–रिश्तेदारों, किसी का भी हो सकता है या फिर मात्र यादों की गलियों में बसा एक ढहता खंड़हर। जैसे–जैसे बाहर के रिश्ते छूटते हैं, आदमी अंतर्मुखी होता चला जाता है। प्रकृति, जड़, चेतन सब उसके रिश्तेदार बन जाते हैं। गांव की सरहद पर खड़ा पेड़ मित्रों सा चहककर स्वागत करता है और घर के बाहर खड़ा बिजली का खंभा जिसके नीचे कभी बेचैन मां–बाप इन्तज़ार करते थे, ललक के साथ कन्धे पर हाथ रखकर पूछता है 'आ गई बेटा'। मन्दिरों में खड़ी मूर्तियों से बैठकर, दो मिनट बात करने को, अपना दुख–दर्द कहने को मन करता है। ऐसी उद्वेलित मानसिकता और यादों के दलदल में फंसा प्रवासी जब भारत की भूमि पर पैर रखता है तो हर्षातिरेक और चुभन दोनों का ही अहसास होना स्वाभाविक ही तो है। जब अपने से दिखते अजनबी हाथ बढ़ाकर मुस्कुराकर स्वागत करते हैं तो स्वर्ग मिल जाता है और हरे पीले अलग–अलग रंगों में अस्तित्व बांट दे तो मन रो पड़ता है।
माना परछाइयों से नाता तोड़ना आसान नहीं पर हमें याद रखना चाहिए कि परछाइयां साथ तो जरूर चलती हैं पर उन्हें भी मूर्त होने के लिए एक दूरी की जरूरत होती है। तभी ये साथ–साथ चल पाती हैं। आधुनिक और सामायिकी संदर्भ में हम इस दूरी को एडजस्टमेंट या समन्वय का नाम दे सकते हैं। एक दूसरे को समझते हुए, एक दूसरे की जरूरत जानते हुए साथ–साथ चलना . . .यही सफलता की कुंजी है। मात्र कोरी भावुकता भीगे कम्बल सी भारी है और कोरा यथार्थ पैरों की बेड़ी। अगली पीढ़ी तक शायद कोरी मिट्टी सी कच्ची देश के प्रति हमारी यह मानसिकता यथार्थ की धूप में सूखकर, व्यावहारिकता की आंच में तपकर एक ठोस ईंट का रूप ले ले . . .ईंटें जिनसे इमारत खड़ी की जाती हैं . . .इमारतें जिनमें इन्सान, उनकी जरूरतें, सामान सबकुछ सहेजा और रखा जा सकता है। ईंटें जिन्हें नेह या अवहेलना की सीलन तेजी से नम नहीं कर पाती, ना ही दुव्र्यवहार के कीड़े इनका अंतस खोखला कर पाते हैं।
नई पीढ़ी तटस्थ है, दोनों तटों पर बहती भारतीय संस्कृति और वंशागत परम्पराओं की नदी उन्हें कैसे जोड़े रख सकती है . . .अर्थार्जन के साथ–साथ जीवन के विविध रत्नों को कैसे अपनी मिट्टी के साथ उन वादियों तक बहाकर ला सकती है, शायद यही हर दूरदर्शी राजनीतिज्ञ और सहृदय प्रवासी व निवासी भारतीयों का संकल्प हैं जो आज प्रवासी–दिवस के रूप में प्रस्फुटित हुआ है और एक सराहनीय कदम है। भीड़ की इस रेलचेल में हमें बस इस बात का ध्यान रखना होगा कि हम एक दूसरे की सीमा का अतिक्रमण न करें . . .पैरों को न कुचलें।
क्या है जो हमें जोड़े रख सकता है . . .स्नेह निश्चय ही पहली शर्त हो सकती है और स्नेह के लिए परिचय जरूरी है . . .परिचय अपनों से . . .अपनेपन से। जब तक हम यह याद न रखें कि चप्पल चौके के बाहर उतारी जाती हैं मां नेह की थाली कैसे परोस पाएगी। और जब तक मां यह न जाने कि बरसों से बाहर भटका बेटा तीन वक्त की रसोई नहीं खा सकता . . .उसका पानी फरक होगा . . .वह स्वस्थ कैसे रह पाएगा और यदि स्वस्थ नहीं होगा तो मां से मुस्कुराकर गले कैसे मिल पाएगा। सारांश यह है कि हमें एक दूसरे की बदलती जरूरतों को ध्यान में रखकर ही आगे बढ़ना होगा।
हर भाषा की अपनी एक संस्कृति होती है और हर संस्कृति का अपना एक इतिहास। और संस्कृति व इतिहास जानने के लिए भाषा जानना जरूरी है। यदि हम भारतीय संस्कृति के अनुसार अपने अतिथि का स्वागत करना चाहते हैं तो 'अतिथि देवो भव' से पहले हमें देव शब्द को समझना पड़ेगा। और उसके लिए मनु स्मृति को खोलना पड़ेगा जहां लिखा है कि माता पिता गुरू और पति पत्नी एक दूसरे के लिए देव होते हैं। शब्दकोष को खोलना होगा जहां सृजन और सज्जन का साथ देनेवाले को देव कहा गया है। जो दे वही देव है। यानि कि सत्कार करवाने के लिए भी देव बनना पड़ता है। कुछ भी ठीक–ठीक और बारीकी से जानने के लिए भाषा के महत्व को नहीं नकारा जा सकता क्योंकि यही तो संस्कृति और विचार–वाहिनी है। नदी सा अगला–पिछला सब लेकर चलती है . . .नींव के पत्थर, सोच की मिट्टी सभी कुछ। पगडंडियां क्या यह तो बहते–बहते टापू और वादियां तक बना जाती है। वादियां जहां नए पंखों वाले परिन्दों का जन्म होता है . . .परिन्दे जो अपने नए पंखों से नई उड़ान की सामथ्र्य रखते हैं।
समय के प्रवाह से आए बदलाव को हम रोक नहीं सकते पर जरूरतों के हिसाब से उन्हें मनचाहा मोड़ देना, अपनी व्यक्तिगत जरूरत, पसंद–नापसंद के हिसाब से एक दूसरे का हाथ पकड़कर चलना ही आज के इस विश्वीकरण के युग में सफलता की कुंजी हैं। पर हर समन्वय में बराबर की साझेदारी ही ठीक से काम कर पाती है।
भारत की विस्तृत जनसंख्या जहां भारत के लिए एक अभिशाप है वहीं आज उसकी शक्ति भी बन सकती है। चीन यह बात साबित कर चुका है। सोचिए विदेशों में गया हर भारतीय आज यदि अपनी मातृभूमि से जुड़ा रह पाए तो भारत की और साथ में खुद की भी कितनी मदद कर सकता है। माना कि नए घरों की जरूरतें नई होती हैं। नए पर्यावरण को, नई संस्कृति को अपनाने के लिए पुराना कुछ छूटना स्वाभाविक है। बदलने में बुराई नहीं पर जड़ों से उखड़ना मूर्खता है। बस अर्थ की ही ज़रूरत नहीं होती जीवन में। जरूरतों के कई और भी अर्थ हैं जैसे कि आगे बढ़ने के लिए मात्र एक लकड़ी की लाठी ही सहारा नहीं। इन बदलती परिस्थितियों में यदि हम अतीत के गौरव को, वर्तमान के यथार्थ को और भविष्य के विश्वास को बचाकर रख पाएंगे तो रास्ते खुद–ब–खुद आसान होते चले जाएंगे। अब सवाल यह उठता है कि यह सब संभव कैसे हो? ज्ञान, सहृदयता और समझ। आज के इस बिखरते परिवेश में यह जरूरी है कि सबको साथ लेकर आगे बढ़ा जाए। कोई भी पीछे छूटा न महसूस करे। आहत या घायल न हो। क्योंकि आहत शक्ति निरर्थक और नाशकारक है। शायद यही वजह है कि हमारे यहां क्षत प्रतिमा की पूजा नहीं की जाती।
जब हमारे पास ज्ञान और व्यवहारिकता का इतना बड़ा भंडार है, एक सशक्त और मार्गदर्शक दर्शन हैं तो हमें भटकने की क्या जरूरत? ज़रूरतों की ज़रूरत तेज़ हो तो समझ भी खुद ही आ ही जाती है। और तैयारी समझ व धैर्य के साथ की गई हो तो ध्येय खुद–ब–खुद साध्य हो जाता है। आज के इस संचार युग में ज्ञान और अर्थ का आदान–प्रदान इतना सहज हो चुका है कि जरा से ध्यान और समय से सबकुछ संभव है। विश्वीकरण अब मात्र एक सपना नहीं यथार्थ बन चुका है और अपनी मेहनत व लगन से हम भारतवंशी और भारतवासी इस यथार्थ को अपने भौतिक और आत्मिक विकास के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। सहयोग संस्था और व्यक्तिगत रूप दोनों तरह से मिल सकता है।
आज दुनिया के हर देश, हर कोने में युवा भारतीय अपनी मेहनत और लगन से उत्कृष्ट से उत्कृष्ट संस्थानों और विभागों में ऊंचे से ऊंचे पद पर हैं। अमेरिका की पूरी सिलिकॉन वैली भारतीय रत्नों से जगमग हैं। इन सबका मात्र तकनीकी सहयोग ही भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि हो सकता है। स्वेच्छा से अगर साल में चार दिन भी वे भारत के लिए समर्पित कर सकें तो संभावनाएं असीमित हैं। प्रवासी दिवस यानी कि विश्व में फैले भारतीयों की एक अटूट कड़ी . . .निश्चय ही यह एक बहुत सोचा, सुलझा और सफल कदम है। अब बस सोचना यह है कि हम आपस में जुड़ मिलकर कैसे सफलता को एक मूर्त रूप दे सकते हैं। आधुनिक संचार तकनीकियों और सिमटते विश्व के साथ वास्तव में संभावनाएं असीमित हैं। कृषि, विज्ञान, शिक्षा व स्वास्थ्य . . .हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान का लेन देन हो सकता हैं पर यह व्यावहारिक, सामाजिक और आर्थिक उन्नति तभी संभव है जब हर भारतीय आत्मा और विचारों से भारत से जुड़ा रह पाए . . .अपने को भारतीय समझे, भारतीय कहलाने में गौरवान्वित हो। पर इसके लिए हम सभी को अपनी स्वार्थी और छोटी सोच से ऊपर उठना होगा।
जरूरी है कि देश विदेश ही नहीं गांवों और शहरों को भी जोड़ा जाए। सड़कों और गांवों तक सहज यातायात और आधुनिक संचार तकनीकियों का क्रियात्मक उपयोग किया जाए। हर बच्चे के लिए पढ़ाई की सुविधा हो और वह आधुनिक तकनीकियों से पूरी तरह से अवगत हो पाए। तकनीकी जानकारी और ज्ञान–विज्ञान के साथ–साथ छोटी–छोटी स्थानीय भाषा और ज्ञान प्रतियोगिताएं होनी चाहिए जो बच्चों को लिपि से अवगत कराएंगी पर सस्ंकृति और दर्शन से जोड़ेगा साहित्य जिसके लिए भांति–भांति की किताबों की सहज उपलब्धि एक नितांत जरूरत है। एक्सचेन्ज और कम्यूनिकेशन के ब्यूरो बनाए जाएं जो चौबीस घंटे इंटरनेट आदि की साइट पर उपलब्ध हों। ऐसे डे सेन्टर बनाएं जाएं जहां बच्चे और बड़े अपनी इच्छा और सुविधानुसार आ–जा सकें, अलग अलग विषयों का अध्ययन कर सकें और ज़रूरत पड़े तो सलाह मशवरा भी ले सकें। ये जगहें तभी सफल होंगी जब वातावरण स्वाभाविक और आम जनता के अनुकूल होगा।
हर शहर में एक मोबाइल लाइब्रेरी दूसरा अच्छा जरिया है। यदि जनसाधारण रोटी–रोजी की मारामारी में हम तक नहीं आ सकते तो हम उनके पास जाएं। जरूरत बस सक्रिय और स्वार्थहीन नियोजित प्रोग्रामों की है . . .जिम्मेदारी हर भारतीय के थोड़े–थोड़े वक्त की है। भारतीय और भारतीयता में गर्व लेने की है। ज्ञान के साथ–साथ भाषाओं का प्रचार प्रसार भी उतना ही जरूरी है क्योंकि जब तक किसी को पूरी तरह से जानो नहीं, उसके प्रति अपनापन नहीं महसूस कर सकते। स्पष्ट इरादे और इरादों का स्पष्टीकरण ही विश्वास जीतता है। हमें अपनी अविश्वास करने की भावनाओं से भी ऊपर उठना होगा।
यूरो की तरह एशियाई देशों के संघटन और एक कॉमन करेंसी के बारे में हमारी सरकार ने भी सोचना शुरू कर ही दिया है। निश्चय ही विश्वीकरण की तरह यह एक सहज और स्वाभाविक कदम होगा। तभी 21 वी सदी भारत की सदी हो पाएगी। पूंजीवाद समाज में जिन्दा रहने के लिए हमें भी पूंजीवाद को अपनाना ही पड़ेगा पर भारतीय मान्यताओं के साथ–साथ। अगर हम अपनी दान और मिल बांटकर खाने और रहने की परंपरा को दूर रहकर भी जीवित रख पाए तो गरीबी भारत से ही नहीं, विश्व से भी खुद–ब–खुद दूर हो जाएगी। कई योग्य और दूरदर्शी राजनीतिज्ञ इस महत्व को पहचान चुके हैं। पहले जब गांधी जी आए थे, उन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी थी, आज भी हमारे सामने एक ऐसी ही लड़ाई है, विचारों की मुक्ति की। हम सब मिलकर भारत को ही क्या हर भारतीय को आर्थिक और सामाजिक सफलता की ओर ले जा सकते हैं। प्रवासी दिवस या मेला इसी महायज्ञ की शुरूवात है पर किसी भी बड़े काम के लिए एक सच्चा और ईमानदार सहयोग दोनों तरफ से ही जरूरी है। एक दूसरे पर विश्वास करके, यथार्थ की धरती पर खड़े होकर ही हम विश्व कुनबे में पहुंच पाएंगे और मेरे ख्याल से विश्व के कोने–कोने में बिखरे भारतीयों के लिए इससे अच्छा और कोई नए साल का संकल्प हो ही नहीं सकता। हर नए काम में मुश्किलें तो आती ही है। गौर करने की बात बस इतनी है कि आज हर चीज भारतीय और खुद भारत पूरे विश्व की नजर में हैं।
प्रस्तुत हैं चन्द विचारों के अनमोल मोती जो चार दिन के उस सतत् मानसिक मंथन से हाथ लगे . . .
'आजादी का अर्थ है जिम्मेदारी और विश्वसनीयता . . .कर्मों की जिम्मेदारी जिससे लोग हमारी बातों पर भरोसा कर सकें।' – यशवन्त सिन्हा
'जब भी तुम कोई काम या आन्दोलन शुरू करोगे तो पहले लोग तुम्हारी अवहेलना करेंगे फिर तुमपर हंसेंगे और फिर तुमसे लड़ेंगे भी और जब लोग लड़ना शुरू कर दें तो जान लो कि जीत तुम्हारी ही है।' – महात्मा गांधी
अन्त में 'भारतीयता – एक वैश्विक सपना – प्यार और विचारों की एक सांझी धरोहर' . . .लक्ष्मीमल सिंघवी।
स्वार्थों की आग में आम आदमी के विकास की हांडी नहीं चढ़ सकती। संविधान में 73वें तथा 74वें संशोधन के बाद, देव भूमि कहे जाने वाले राज्य हिमाचल प्रदेश में भले ही राज्य सरकार ने पंचायती राज संस्थाओं को सशक्त बनाने के लिए हि. प्र. पंचायती राज अधिनियम, 1994 लागू कर स्थानीय निकायों के माध्यम से प्रदेश में सुनियोजित तथा संतुलित विकास की यात्रा में सभी वर्गों को शामिल करने का प्रयास किया हो, पर लोकतंत्र का आधार माने जाने वाली पंचायती राज प्रणाली में लोगों की सहभागिता के बिना आज भ्रष्टाचार का बोलबाला है। जिन लोगों को जनता अपने विकास के लिए चुनती है, वही लोग भ्रष्टाचार के प्रणेता बन जाते हैं। ऐसे में लोगों का विश्वास न केवल उनसे बल्कि त्रिस्तरीय पंचायती राज से भी उठना स्वाभाविक है। हिमाचल 17,495 गांवों तथा 56 शहरों एवं नगरों में बसता है और राज्य में ग्राम पंचायतों की कुल संख्या 3,243 है। इनमें से 50 प्रतिशत सीटें महिलाओं के नाम हैं। भ्रष्टाचार के मामलों में महिलाएं भी पुरूषों से पीछे नहीं है। ग्राम पंचायतों से जुड़े भ्रष्टाचार के अब तक सामने आए 81 मामलों में महिलाओं की संलप्तिता करीब 37 फीसदी है, जो चिंताजनक है। पिछले दो माह में ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार से जुड़े 65 मामले सामने आए हैं। इन मामलों में प्रधान के पुलिस हिरासत में होने, सरकारी धन का दुरूपयोग, कार्यों में पारदर्शिता न होने, पद का दुरूपयोग, कार्यों में अनियमितता, मनरेगा में धन का दुरूपयोग, जाली राशन कार्ड बनाने, सरकारी ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा, रिश्वत लेने तथा पंचायत के धन का दुरूपयोग आदि शामिल हैं। साल 2007 में ग्राम पंचायत प्रधानों के भ्रष्टाचार में संलप्तिता के कुल सात मामले पकड़ में आए, जिनमें दो-दो चंबा तथा मंडी और एक-एक हमीरपुर, किन्नौर तथा शिमला के थे। वर्ष 2008 से लेकर फरवरी माह तक उपलब्ध आंकडों के अनुसार कुल प्राप्त 74 मामलों में से दो-दो मामले कुल्लू, किन्नौर, सोलन, बिलासपुर तथा चंबा, ऊना में पांच, शिमला में छह, हमीरपुर में सात, सिरमौर में नौ, कांगड़ा में 18 तथा मंडी में 19 जि़लों से संबधित हैं। इतिहास में झांकने पर हम पाएंगे कि भारतीय सभ्यता में ग्रामीण स्वशासन की पद्धति प्राचीन काल से चली आ रही है। पंचायती राज पद्धति तथा न्याय व्यवस्था पर अटूट विश्वास के कारण ही ‘पंच परमेश्वर’ का मुहावरा हमारे जीवन का अंग बना। आधुनिक भारत में पंचायतों की स्थापना का श्रेय राष्ट्रपिता महात्मा गंाधी को जाता है। उनकी पहल पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 40 में पंचायती राज को शामिल किया गया, जो राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों का एक भाग बना। आचार्य बिनाबा ने तो पंचों को प्रेम, निर्भयता, ज्ञान तथा स्वच्छता की प्रतिमूर्ति मानते हुए प्रत्येक गांव को स्वावलंबी, आरोग्य, सम्पन्न, उद्योगशील और निर्मल बनाने की परिकल्पना की थी। इसके बाद वर्ष 1952 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम के माध्यम से इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया, पर प्रयास असफल रहे। इसके बाद 1957 में बलवन्तराय अध्ययन दल, अशोक मैहता समिति तथा सरकारिया आयोग आदि ने स्थानीय निकायों के सुदृढ़ीकरण पर महत्वपूर्ण सिफारिशें की। हिमाचल प्रदेश में ग्रामीण विकास में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए 1952 में हिप्र पंचायती राज अधिनियम तथा 1970 में नये हिप्र पंचायती राज अधिनियम के बाद सन् 1978 में हिप्र पंचायती राज अधिनियम, 1968 में विस्तृत संशोधन किए गए। वर्ष 1988 में पीके थुंगन संसदीय सलाहकार समिति की उप समिति ने इस प्रणाली को मजबूत बनाने की सिफारिश के बाद संविधान के 73 वें संशोधन के बाद नया हिप्र पंचायती राज अधिनियम, 1994 लागू किया गया। आदर्श पंचायत के स्वरूप में इसे स्वशासन का महत्वपूर्ण ज़रिया मानते हुए संवदेनशीलता से स्थानीय आवश्यकताओं को समझने, सबको बराबर समझने तथा आमदनी एवं प्राप्त विकास राशि के सदुपयोग पर बल दिया गया है। पंचायत प्रधान को सबको एक साथ लेकर चलने, सबके हितों का ध्यान रखने तथा गांव की आवाज़ को राज्य सरकार तक पहुंचाने वाला माना गया है। राज्य सरकार भले ही विभिन्न पंचायती राज संस्थाओं को स्थानीय स्वशासन की प्रभावी ईकाई बनाने के लिए प्रतिबद्ध हो तथा उसने पंचायती राज संस्थाओं को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण भी दिया है, पर लोगों की सहभागिता के बिना इसे सफल बनाना सरकार के लिए दुरूह कार्य है। निलंबित प्रधानों पर जो आरोप लगे हैं, उनसे स्पष्ट है कि लोग सरकार को स्थापित पुनीत ध्येय के लिए आवश्यक सहयोग नहीं दे रहे हैं। काली भेड़ों से निपटने के लिए जनता को सामने आना होगा, अन्यथा लोकतंत्र का आधार कहे जाने वाली पंचायती राज प्रणाली की सफलता पर मंडराते भ्रष्टाचार के बादल इसे पूरी तरह आच्छादित कर विकास की रोशनी लोगों तक पहुंचने नहीं देंगे।
कल ही की तो बात है अल सुबह चलती बस में कण्डैक्टर के साथ मिलकर लुटैरों ने बस में एक वृद्ध को सरेराह लूट लिया। हाल ही में पिछले दिनों दिल्ली के सुखदेव विहार में तीन लुटेरों ने एक घर में जबरन घुसकर वृद्ध दंपति पर जानलेवा हमला किया घर के मालिक की चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी तथा उसकी पत्नी को गंभीर रूप से घायल कर दिया जो कि जिन्दगी और मौत से जूझ रही है। वहीं हरियाणा के भिवानी में पुलिस ने एक बेगुनाह युवक को पीछे से गोली मारकर हत्या कर दी। उसी दिन तीसरी वारदात में दिल्ली के महाराष्ट्र भवन में कुछ युवकों ने तोड़फोड़ कर दी। आये दिन इस तरह की घटनायें आम हो चली हैं। यह हाल दिल्ली तथा उसके आसपास का हैं जो कि देश की राजधानी है। सवाल उठता है कि जब देश की राजधानी में आम आदमी सुरक्षित नही है अन्य नगरों या राज्यों का क्या होगा? आये दिन लूट और हत्या की घटनायें हमारे समाज के ताने-बाने पर एक प्रश्न चिन्ह लगा देती हैं। आज हालात यह हो चुकी है कि आम आदमी के साथ कब क्या हो जाए किसी का पता नही है। लोग अपने घरों में सुरक्षित नही हैं तथा घर से बाहर गया आदमी जब तक घर वापस नही आ जाता तब तक घर वालों को बाहर गये आदमी की चिन्ता और बाहर गये को घरवालों की फिकर बराबर सताती रहती है। हाल ही के कुछ वर्षों में दिल्ली जैसे महानगर की जीवनशैली तथा रहन-सहन में जो परिर्वतन आया है तथा जिस प्रकार से लोगों के बीच पैसा कमाने की भूख तथा नशे का व्यापार बढ़ा है उसने सामाजिक सौहार्द तथा आपसी विश्वास को तोड़ दिया है। दो दशक पहले दिल्ली में न तो इतनी भीड़ थी न यहां का आदमी इतना स्वार्थी और खुदगर्ज था। तब आपसी सामंजस्य तथा आपसी सहयोग की भावना लोगों में थी लेकिन हाल के वर्षों में यहां के लोग मात्र एक मशीनी पुर्जा बनकर रह गये हैं। आज हालात यह हैं कि आपके सामने आपके पड़ोसी को लूटा और पीटा जा रहा होता है लेकिन कोई उसके बचाव में नही आता है। किसी के घर कुछ हो जाये लेकिन आम आदमी को उससे कोई सरोकार नही है। सड़क हादसे में पीड़ित सड़क पर तड़पता रहता है लेकिन महानगर की गाड़ियों की रफ्तार उसे देखकर और तेज हो जाती हैं। शायद ही कोई भला मानुष होगा जो सड़क पर तड़पते पीड़ित को देखकर पसीजता हो अन्यथा आम शहरी ऐसा मुंह मोड़कर भागता है जैसे उसे कुछ न तो दिखा और न कुछ हुआ। असल में यह हमारी संज्ञाशून्यता की परिणीति है। इसके मूल में जहां हमारी आत्मकेन्द्रित स्वार्थपरता अधिक जिम्मेदार है वहीं पुलिस के लफड़े तथा समय के अभाव से भयभीत शहरी अपने रोजमर्रा के कामों में कोई व्यवधान नही चाहता है। आज के आदमी की सोच यह हो गई है कि इस शहर में तो यह रोज की बात है आखिर हम एड़जस्ट करें तो कहां तक करें? घरों में कभी आपसी संबध तथा अपने-परायों पर हमारा अपने से अधिक विश्वास होता था। सामाजिक तथा पारिवारिक रिश्तेदारी की इतनी मजबूत कड़ी थी कि किसी प्रकार की असुरक्षा तथा अपनों पर किसी प्रकार का शक करने की गुंजाईश ही नही रहती थी लेकिन आज सबसे अधिक जो छल तथा ठगी हो रही है वह अपनों के द्वारा ही अधिक हो रही है। परिवारों में चाहे महिलाओं का शोषण हो या अपनों द्वारा लूटा जाना या चोरी आदि की वारदातें हो उनमें अपने ही परिवारों के लोगों का शामिल होना आम बात हो गई है। इसमें दूर के रिश्तेदार हो या चाहे अपने खून के रिश्ते सब आज तार-तार होते नजर आते हैं। सवाल उठता है कि जब हमारे घर में चोर तथा ठग भरे हुए हैं तथा समाज में किसी प्रकार की सुरक्षा नही है तो फिर विश्वास किस पर करें? भाजपा नेता प्रमोद महाजन की हत्या का आरोप उनके अपने छोटे भाई पर लगा है। इसी तरह आये दिन अखबारों व खबरों में देखने सुनने में आता है कि कई मामलों में मॉं ही अपने बच्चों की हत्या करा देती है, पत्नी अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या करा देती है। पैसे तथा सम्पति हड़पने के लिए बेटे अपने मां-बाप की हत्या कर देत हैं तथा उन्हें घर से बाहर निकाल देते हैं। इस तरह की घटनायें हमारे समाज में आम हो चली हैं। जो कि इस बात का प्रमाण है कि हमारे समाज में सबकुछ ठीकठाक नही चल रहा है। यही हालात रही तो आने वाले समय में अपराध इस कदर बढ़ जायेंगे कि समाज की जो संरचना बनी है वह चूर-चूर हो जायेगी। जरा सोचिये जिन मां-बाप ने हमें पैदा किया लालन-पालन किया, पढ़ाया-लिखाया तथा हमें अपने पैरों पर खड़ा किया उन्हें बुढ़ापे में दर-दर की ठोकरें खाने को छोड़ देना क्या यही इंसानियत है? क्या उनका बुढ़ापे में तिरस्कार करना उचित है। अभी हाल ही में दिल्ली के रोहिणी इलाके में एक वृद्ध को उसका बेटा बस स्टेण्ड पर अभी आता हूँ कह कर छोड़ गया और आज तक वापस नही लौटा बेचार बूढा वहीं स्टैण्ड पर भीख मांगकर तथा लोगों की दया पर अपने दिन काट रहा है। क्या यही मानवता है? यह किसी एक परिवार तथा समाज की घटना हो सकती है कोई कह सकता है कि हमारे पारिवारिक मामले में किसी को बोलने की दखल नही लेकिन जो संज्ञाशून्यता हमारे समाज और संस्कारों में आ चुकी है क्या उसका प्रभाव हमारे समाज पर नही पड़ेगा? क्या इससे यह जाहिर नही होता है कि हमारी पौराणिक संस्कृति तथा हमारे रीति-रिवाजों तथा अपने से बड़ों के सम्मान की सीख कहीं न कहीं समाप्त होती जा रही है। क्या इससे यह जाहिर नही हो जाता है कि हम आज सिर्फ अपने स्वार्थ तथा कुंठा से इस तरह से पीड़ित हो चुके हैं कि अपनो के लिए भी हमारे मन में न तो मान है और न मानवीय संवेदनायें ही शेष बची हैं। हमारे समाज में इस तरह की आत्म केन्द्रित मनोधारणा, हर आदमी की अपना निजी जीवन, परिवार से अलग अपनी पहचान की लालसा हमारे सामाजिक तथा पारिवारिक जीवन पर हावी हो रहा है। इससे जहां परिवारों में आपसी सामंजस्य समाप्त हो रहा है वहीं एक दूसरे के पास एक ही छत के नीचे रहने के बावजूद अपनों के लिए न तो समय है और न किसी प्रकार की सहानुभूति या अपनी समस्या को परिवार के साथ बांटने की सोच। इसका परिणाम यह है कि हर कोई अपने सुख और अपने दुःख को अपने आप ही बांटने का प्रयास कर रहा है और इस आपाधापी में हम कुंठा तथा अविश्वास की भावना से ग्रस्त होते जा रहे हैं। दूसरी बात एकाकी परिवार की धारणा ने हमें अपनों से दूर कर दिया है व हमारी पारिवारिक सुरक्षा पर भी एक प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। महानगरीय जीवनशैली में एकाकी परिवारों के पति-पत्नी का नौकरी पेशा होना तथा घर में बच्चों का अकेलापन उन्हें सालता रहता है तथा चोरों व अपराधियों को आसान शिकार मुहैया कराने में भी सहायक सिद्ध होता है। यह भी अपराध बढ़ने का एक कारण है। दूसरी ओर दिनभर अकेले घरों में व्यस्क होते अकेले बच्चे आधुनिक संचार सुविधाओं के चक्कर में जाने अनजाने में अपराध के शिकंजे में आ जाते हैं। नोएड़ा का चर्चित अरूषी हत्याकांड़ भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। कहीं न कहीं आधुनिक संचार माध्यमों चाहे वह मोबाईल है या कम्प्यूटर,नेट आदि का भी हमारी जीवनशैली पर गहरा प्रभाव पड़ा है। आज हमारे देश में अराजकता और अलगाव इस हद तक बढ़ गया है कि वह आतंकवाद का संगठित रूप लेकर हमारे सामने चुनौती बनकर खड़ा है और हम उसे समाप्त करने की बजाय हर दुर्घटना या बम धमाके के बाद बयानबाजी करके अगले बम धमाके की प्रतीक्षा करते नजर आते हैं। आतंकवाद अब कश्मीर और पंजाब या असम व पूर्वोत्तर की सीमाओं से बाहर निकलकर समूचे भारतीय उपमहाद्वीप की एक गंभीर समस्या बन गया है। इससे न तो दिल्ली सुरक्षित है और न देहात। यह अलगाव भी संगठित अपराध का एक घिनौना रूप है जिसे अगर समय रहते न कुचला गया तो आने वाले समय में धर्म व सम्प्रदायों के आधार पर बंटता हमारे समाज का आतंक की जद से बाहर निकलना मुश्किल हो जायेगा। समाज में संचार माध्यमों तथा सिनेमा में जो नग्नता एकाएक अभरकर आई है उसने भी हमारे बच्चों के कोमल मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा है। नासमझ बच्चों को लगता है कि शायद जीवन की सच्चाई यही है और यह आम बात है। अभी हाल के वर्षों में भारतीय सिनेमें में मुम्बईया स्टाइल में जो नग्नता आई है लगता है फिल्मों की हीरोईनें तथा फैशनपरस्त महिलायें अपने सारे कपड़े उतारने पर आमादा हैं तथा हीरों भी अपने नंगे शरीर का उभार दिखाकर पैसा कमा तो रहे हैं लेकिन हमारे समाज को नकारात्मक तथा अपराध के प्रवृत्ति की ओर धकेल रहे हैं। आये दिन अश्लील सीड़ी तथा मोबाईल पर बन रहे स्कूली छात्र-छात्राओं के नग्न व अश्लील वीड़ियो फुटेज इस बात को समझने के लिए पर्याप्त हैं कि भारतीय जनजीवन को समझने तथा वर्तमान में हो रहे सामाजिक, पारिवारिक परिवर्तनों को समझ व परखकर हमें अपने समाज की मनोदशा तथा संरचना को समझना होगा। हमारे नीतिनियंताओं को इस प्रकार की फूहड़ता तथा मानव का मशीनी पुर्जा मात्र बनने की मानसिकता को झकझोरना होगा, अपनों के प्रति होते हमारे संज्ञाशून्य सरोकारों को पुनः स्थापित करना होगा, अपराधियों के प्रति कठार कदम उठाने होगें अन्यथा कहीं ऐसा न हो कि पश्चिम की नग्नता तथा फूहड़ता की नकल करने वाला हमारा समाज अपराध और अराजकता की ऐसी जद में फंस जाये कि उसका फिर से उबरना मुश्किल हो जाये। समय रहते ही किसी भी रोग को नासूर बनने से पहले उसका कारगर तथा स्थाई इलाज किया जाना समाज व देश के हित में है। समय रहते उसका समाधान सही दिशा में किया जाना लाजमी है यही समय और परस्थितियों का तकाजा है। अन्यथा फूहड़ता तथा साधन जुटाने की होड़ व पैसे के चक्कर में अन्धें हो रहे आदमी की हसरत समाज के ताने बाने की हत्या न कर दें तथा समाज में मानवीय संबध की ड़ोर तार-तार न हो जाए।
जाति की जनगणना के लिए तर्क यह दिया जाता है कि अगर हम दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को आरक्षण देते रहना चाहते हैं तो जन-गणना में जाति का हिसाब तो रखना ही होगा। उसके बिना सही आरक्षण की व्यवस्था कैसे बनेगी ? हॉं, यह हो सकता है कि जिन्हें आरक्षण नहीं देना है, उन सवर्णों से उनकी जात न पूछी जाए। लेकिन इस देश में मेरे जैसे भी कई लोग हैं, जो कहते हैं कि मेरी जात सिर्फ हिंदुस्तानी है और जो जन्म के आधार पर दिए जानेवाले हर आरक्षण के घोर विरोधी हैं।
ऐसे लोगों की मान्यता है कि जन्म याने जाति के आधार पर दिया जानेवाला आरक्षण न केवल राष्ट्र-विरोधी है बल्कि जिन्हें वह दिया जाता है, उन व्यक्तियों और जातियों के लिए भी विनाशकारी है। इसीलिए जन-गणना में से जाति को बिल्कुल उड़ा दिया जाना चाहिए। यदि 2010 की इस जनगणना में जाति को जोड़ा जाएगा तो वह बिल्कुल निरर्थक होगा क्योंकि आरक्षण की सीमा उच्चतम न्यायालय ने पहले ही बांध रखी है। 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण किसी भी हालत में नहीं दिया जा सकता। यदि आरक्षितों की संख्या 1931 के मुकाबले अब बढ़ गई हो तो भी उनको कोई फायदा नहीं मिलेगा और कुल जनसंख्या के अनुपात में अगर वह घट गई हो तो हमारे देश के नेताओं में इतनी हिम्मत नहीं कि आरक्षण के प्रतिशत को वे घटवा सकें। इसलिए प्रश्न उठता है कि जनगणना में जाति को घसीट कर लाने से किसको क्या फायदा होनेवाला है ?
जाति पर आधारित आरक्षण ने गरीबों और वंचितों का सबसे अधिक नुकसान किया है। आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों को आरक्षण से क्या मिलता है ? सिर्फ नौकरियाँ ! 5-7 हजार लोगों के मुंह में सरकारी नौकरियों की चूसनी (लॉलीपॉप) रखकर देश के 60 करोड़ से ज्यादा वंचितों के मुंह पर ताले जड़ दिए गए हैं| उनके विशेष अवसर, विशेष सुविधा और विशेष सहायता के द्वार बंद कर दिए गए हैं। उन्हें खोलना बहुत जरूरी है। क्या 5 हजार रेवडि़याँ बांट देने से 60-70 करोड़ वंचितों के पेट भर जाएंगे? आरक्षण न सिर्फ उनके पेट पर लात मारता है बल्कि उनके सम्मान को भी चोट पहुंचाता है। जो अपनी योग्यता से भी चुनकर आते हैं, उनके बारे में भी मान लिया जाता है कि वे आरक्षण (कोटे) के चोर दरवाज़े से घुस आए हैं। हमारे नेताओं ने जाति को आरक्षण का सबसे सरल आधार मान लिया था लेकिन अब वह सबसे जटिल आधार बन गया है| अभी आरक्षण का आधार बहुत संकरा है, उसे बहुत चौड़ा करना जरूरी है| जाति का आधार सिर्फ हिन्दुओं पर लागू होता है। इसके कारण हमारे देश के मुसलमानों और ईसाइयों में जो वंचित लोग हैं, उनको भी बड़ा नुकसान हुआ है। जिसे जरूरत थी, उसे रोटी नहीं मिली और जिसके पास जात थी, वह मलाई ले उड़ा।
जन-गणना में जाति का समावेश किसने किया, कब से किया, क्यों किया, क्या यह हमें पता है ? यह अंग्रेज ने किया, 1871 में किया और इसलिए किया कि हिंदुस्तान को लगातार तोड़े रखा जा सके| 1857 की क्रांति ने भारत में जो राष्ट्रवादी एकता पैदा की थी, उसकी काट का यह सर्वश्रेष्ठ उपाय था कि भारत के लोगों को जातियों, मजहबों और भाषाओं में बांट दो। मज़हबों और भाषाओं की बात कभी और करेंगे, फिलहाल जाति की बात लें| अंग्रेज के आने के पहले भारत में जाति का कितना महत्व था ? क्या जाति का निर्णय जन्म से होता था ? यदि ऐसा होता तो दो सौ साल पहले तक के नामों में कोई जातिसूचक उपनाम या 'सरनेम' क्यों नहीं मिलते ? राम, कृष्ण, शिव, विष्णु, महेश, बुद्घ, महावीर किसी के भी नाम के बाद शर्मा, वर्मा, सिंह या गुप्ता क्यों नहीं लगता ? कालिदास, कौटिल्य, बाणभट्रट, भवभूति और सूर, तुलसी, केशव, कबीर, बिहारी, भूषण आदि सिर्फ अपना नाम क्यों लिखते रहे ? इनके जातिगत उपनामों का क्या हुआ ? वर्णाश्रम धर्म का भ्रष्ट होना कुछ सदियों पहले शुरू जरूर हो गया था लेकिन उसमें जातियों की सामूहिक राजनीतिक चेतना का ज़हर अंग्रेजों ने ही घोला| अंग्रेजों के इस ज़हर को हम अब भी क्यों पीते रहना चाहते हैं ? मज़हब के ज़हर ने 1947 में देश तोड़ा, भाषाओं का जहर 1964-65 में कंठ तक आ पहुंचा था और अब जातियों का ज़हर 21 वीं सदी के भारत को नष्ट करके रहेगा। जन-गणना में जाति की गिनती इस दिशा में बढ़नेवाला पहला कदम है। इसीलिए हमारे संविधान निर्माताओं और आजाद भारत की पहली सरकार ने जनगणना में से जाति को बिल्कुल हटा दिया था।
1931 में आखिर अंग्रेज 'सेंसस कमिश्नर' जे.एच. हट्टन ने जनगणना में जाति को घसीटने का विरोध क्यों किया था ? वे कोरे अफसर नहीं थे। वे प्रसिद्घ नृतत्वशास्त्री भी थे। उन्होंने बताया कि हर प्रांत में हजारों-लाखों लोग अपनी फर्जी जातियॉं लिखवा देते हैं ताकि उनकी जातीय हैसियत ऊँची हो जाए| कुछ जातियों के बारे में ऐसा भी है कि एक प्रांत में वे वैश्य है तो दूसरे प्रांत में शूद्र| एक प्रांत में वे स्पृश्य हैं तो दूसरे प्रांत में अस्पृश्य ! हर जाति में दर्जनों से लेकर सैकड़ों उप-जातियॉं हैं और उनमें भी ऊँच-नीच का झमेला है। 58 प्रतिशत जातियॉ तो ऐसी हैं, जिनमें 1000 से ज्यादा लोग ही नहीं हैं। उन्हें ब्राह्रमण कहें कि शूद्र, अगड़ा कहें कि पिछड़ा, स्पृश्य कहें कि अस्पृश्य - कुछ पता नहीं| आज यह स्थिति पहले से भी बदतर हो गई है, क्योंकि अब जाति के नाम पर नौकरियॉं, संसदीय सीटें, मंत्री और मुख्यमंत्री पद, नेतागीरी और सामाजिक वर्चस्व आदि आसानी से हथियाएं जा सकते हैं। लालच बुरी बलाय ! लोग लालच में फंसकर अपनी जात बदलने में भी संकोच नहीं करते| सिर्फ गूजर ही नहीं हैं, जो 'अति पिछड़े' से 'अनुसूचित' बनने के लिए लार टपका रहे हैं, उनके पहले 1921 और 1931 की जन-गणना में अनेक राजपूतों ने खुद को ब्राह्रमण, वैश्यों ने राजपूत और कुछ शूद्रों ने अपने आप को वैश्य और ब्राह्रमण लिखवा दिया। जिन स्त्री और पुरूषों ने अंतरजातीय विवाह किया है, उनकी संतानें अपनी जात क्या लिखेगी ? जनगणना करने वाले कर्मचारियों के पास किसी की भी जात की जाँच-परख करने का कोई पैमाना नहीं है| हर व्यक्ति अपनी जात जो भी लिखाएगा, उसे वही लिखनी पड़ेगी। वह कानूनी प्रमाण भी बनेगी। कोई आश्चर्य नहीं कि जब आरक्षणवाले आज़ाद भारत में कुछ ब्राह्रमण अपने आप को दलित लिखवाना पसंद करें बिल्कुल वैसे ही जैसे कि जिन दलितों ने अपने आप को बौद्ध लिखवाया था, आरक्षण से वंचित हो जाने के डर से उन्होंने अपने आप को दुबारा दलित लिखवा दिया। यह बीमारी अब मुसलमानों और ईसाइयों में भी फैल सकती है| आरक्षण के लालच में फंसकर वे इस्लाम और ईसाइयत के सिद्घांतों की धज्जियां उड़ाने पर उतारू हो सकते हैं। जाति की शराब राष्ट्र और मज़हब से भी ज्यादा नशीली सिद्घ हो सकती है।
आश्चर्य है कि जिस कांग्रेस के विरोध के कारण 1931 के बाद अंग्रेजों ने जन-गणना से जाति को हटा दिया था और जिस सिद्घांत पर आज़ाद भारत में अभी तक अमल हो रहा था, उसी सिद्घांत को कांग्रेस ने सिर के बल खड़ा कर दिया है। कांग्रेस जैसी महान पार्टी का कैसा दुर्भाग्य है कि आज उसके पास न तो इतना सक्षम नेतृत्व है और न ही इतनी शक्ति कि वह इस राष्ट्रभंजक मांग को रद्द कर दे| उसे अपनी सरकार चलाने के लिए तरह-तरह के समझौते करने पड़ते हैं। भाजपा ने अपने बौद्घिक दिग्भ्रम के ऐसे अकाट्य प्रमाण पिछले दिनों पेश किए हैं कि जाति के सवाल पर वह कोई राष्ट्रवादी स्वर कैसे उठाएगी। आश्चर्य तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मौन पर है, जो हिंदुत्व की ध्वजा उठाए हुए है लेकिन हिंदुत्व को ध्वस्त करनेवाले जातिवाद के विरूद्घ वह खड़गहस्त होने को तैयार नहीं है। समझ मे नहीं आता कि वर्ग चेतना की अलमबरदार कम्युनिस्ट पार्टियों को हुआ क्या है? उन्हें लकवा क्यों मार गया है ? सबसे बड़ी विडंबना हमारे तथाकथित समाजवादियों की है। कार्ल मार्क्स कहा करते थे कि मेरा गुरू हीगल सिर के बल खड़ा था। मैंने उसे पाव के बल खड़ा कर दिया है लेकिन जातिवाद का सहारा लेकर लोहिया के चेलों ने लोहियाजी को सिर के बल खड़ा कर दिया है। लोहियाजी कहते थे, जात तोड़ो। उनके चेले कहते हैं, जात जोड़ो| नहीं जोड़ेंगे तो कुर्सी कैसे जुड़ेगी ? लोहिया ने पिछड़ों को आगे बढ़ाने की बात इसीलिए कही थी कि समता लाओ और समता से जात तोड़ो। रोटी-बेटी के संबंध खोलो। जन-गणना में जात गिनाने से जात टूटेगी या मजबूत होगी ? जो अभी अपनी जात गिनाएंगे, वे फिर अपनी जात दिखाएंगे। कुर्सियों की नई बंदर-बांट का महाभारत शुरू हो जाएगा। जातीय ईर्ष्या का समुद्र फट पड़ेगा। आजाद भारत के इतिहास में यह पहला मौका है कि जब सारे राजनीतिक दल एक तरफ हैं और भारत की जनता दूसरी तरफ ! इस मुद्दे पर भारत के करोड़ों नागरिक जब तक बगावत की मुद्रा धारण नहीं करेंगे, हमारे नेता निहित स्वार्थों में डूबे रहेंगे। जो लोग अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में जाति के जाल में फंसे रहना चाहते हैं, फंसे रहें लेकिन राष्ट्र के राजनीतिक जीवन में से जाति का पूर्ण बहिष्कार होना चाहिए।
दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, ग्रामीणों, गरीबों को आगे बढ़ाने का अब एक ही तरीका है। सिर्फ शिक्षा में आरक्षण हो, पहली से 10 वीं कक्षा तक। आरक्षण का आधार सिर्फ आर्थिक हो। जन्म नहीं, कर्म ! आरक्षण याने सिर्फ शिक्षा ही नहीं, भोजन, वस्त्र्, आवास और चिकित्सा भी मुफ्त हो। प्रत्येक व्यक्ति शिक्षा के माध्यम से सक्षम बने और जीवन में जो कुछ भी प्राप्त करे, वह अपने दम-खम से प्राप्त करे। यह विशेष अवसर के सिद्घांत का सर्वश्रेष्ठ अमल है। इस व्यवस्था में जिसको जरूरत है, वह छूटेगा नहीं और जिसको जरूरत नहीं है, वह घुस नहीं पाएगा, उसकी जात चाहे जो हो| जात पर आधरित नौकरियों का आरक्षण चाहे तो अभी कुछ साल और चला लें लेकिन उसे समाप्त तो करना ही है। जात घटेगी तो देश बढ़ेगा। वोट-बैंक की राजनीति को बेअसर करने का एक महत्वपूर्ण तरीका यह भी है कि देश में मतदान को अनिवार्य बना दिया जाए। जन-गणना से जाति को हटाना काफी नहीं है, जातिसूचक नामों और उपनामों को हटाना भी जरूरी है| जातिसूचक नाम लिखनेवालों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध होना चाहिए। उन्हें सरकारी पदों और नौकरियों से वंचित किया जाना चाहिए। यदि मजबूर सरकार के गणक लोगों से उनकी जाति पूछें तो वे या तो मौन रहें या लिखवाऍं – ‘मैं हिंदुस्तानी हूं’। हिंदुस्तानी के अलावा मेरी कोई जात नहीं है।
लेखक महोदय कहानी की तलाश में थे. एक नन्ही मासूम-सी कहानी. जिसे सुनते ही मन-कमल खिल उठे. सांसों में सारंगी बजने लगे. पर वाहनों के शोर, चिमनियों से निकलते धुंए के बीच ऐसी कहानी आए कहां से! इधर सुबह की ओस उतरी नहीं कि हवा में काले झकोरे घुसपैठ करने लगे. लेखक का मन पहले ही उदास था. उन्हें देख वह और भी खिन्न हो उठे.
‘जैसी कहानी मैं चाहता हूं, वह इस वातावरण में तो जी नहीं सकती...धुंए के बवंडर में जब बड़े-बड़े दरख्त नहीं टिक पाते तो कोमल कली-सी कहानी का क्या?’
लेखक महोदय ने अपने आप से कहा. कहानी की तलाश में वे आगे बढ़ते चले गए. चलते-चलते पांव थके, पर मन की उमंग ने रुकने न दिया. फिर जब हल्की हवा की गुनगुनाहट कान में पड़ी. पंछियों की चहचहाट ने मन को छुआ तो रो
म-रोम प्रफुल्लित हो गया...सारी थकान उडनछू. उन्होंने मग्न मन गर्दन उठाकर देखा, चारों ओर हरियाली की कनातें तनी थीं. ऊपर दूर तक फैला हुआ नीलांबर. वृक्षों-लताओं की कोमल पंखुड़ियों पर झूला झूलती ओस की बूंदें. और उनसे टकराकर वापस लौटतीं, स्वर्ण- आभा बिखेरतीं चंचल सूर्य-रश्मियां. सब कुछ जीवन की नई उमंगों से भरा था. मगर लेखक के मन में तो उदासी पसरी हुई थी. इतना कुछ था, पर कहानी नहीं थी.
कहानी नहीं तो कुछ नहीं—लेखक ने सोचा.
‘मुझे इतनी जल्दी निराश नहीं होना चाहिए. कहानी जब हर जगह है तो यहां भी जरूर होगी.’ मन के दूसरे कोने से तत्काल आवाज आई. उसी की प्रेरणा पर वह आगे बढ़ने लगे. पांवों के नीचे मानो कालीन बिछा हुआ था. हरियाली का कालीन. घास इतनी कोमल और मासूम कि लेखक उसपर पांव रखते हुए सकुचा रहे थे. अचानक एक फुनगी उनके पांव में फंसी. उसको मुक्त करने के लिएवे जमीन की ओर झुके. तभी उनकी निगाह घास के नन्हे-नन्हे फूलों पर पड़ी.
उसी समय दूर जंगली जानवरों का एक काफिला दौड़ लगाते हुए वहां से गुजरा. उनके कदमों की आहट से दिशाएं धमक उठीं.लेखक ने बड़ी कठिनाई से खुद को बचाया. थोड़ी देर पहले जहां शांति थी, वहां अव्यवस्था छा गई. घास की नन्ही फुनगियां जो कुछ देर पहले तक शान से सिर उठाए थीं, जमीन पर बिछकर अपने हालात पर आंसू बहाने लगीं. फिर भी कुछ फूल थे, जो अब भी ज्योंकी त्यों मुस्करा रहे थे. उनकी देखा-देखी घास जो थोड़ी देर पहले बिछ-सी गई थी, दुबारा गर्दन उठाने का प्रयास करने लगीं. थोड़ी देर बाद सब कुछ पहले जैसा हो गया. यह देख लेखक दंग रह गए.
‘जो भी यहां से गुजरता है, वही तुम्हें कुचलकर चला जाता है. क्या तुम अपनी हालत से खुश हो?’ उन्होंने फुनगी से पूछा.
‘कर्तव्यपालन में भला और बुरा क्या?’ जवाब मिला. लेखक कुछ समझे, कुछ नहीं, बस अगला प्रश्न दाग दिया—
‘लोग तुम्हें कुचलें नहीं तो और भी सुंदर खिल सकोगी?’
‘वैसा हो तो भी बुरा नहीं है, पर जो है उतना भी काफी है.’
‘क्या तुम्हें पहेलियां बूझने की आदत है?’
‘इसमें पहेली कैसी. घास न हो तो भी धरती सहती ही हैं. बिना किसी शिकायत, बगैर उफ् किए. मैं जिस मिट्टी से अन्न-जल लेती हूं. जिसके पोषक तत्वों से मेरा शरीर बना है. उसके और प्राणियों के पैरों के बीच आकर यदि मैं धरती का थोड़ा-सा भी बोझ बांट लेती हूं, तो इसमें कैसा बड़प्पन. बल्कि मुझे तो इसी में अपने जीवन की सार्थकता नजर आती है.’ घास की बात सुन लेखक को अपना अस्तित्व छोटा नजर आने लगा. मामूली फुनगी का अपनी मातृभूमि के प्रति प्यार और समर्पण देखकर वह निरुत्तर हो गए. वहां से चलते हुए वे नदी किनारे पहुंचे. वहां एक कछुआ अपने सात बच्चों के साथ रेत में बैठा हुआ था.
‘आज तो सबकुछ बदला हुआ-सा है. लगता है कि अब मेरी कहानी मुझसे दूर नहीं है.’ लेखक के मुंह से बरबस निकला.
‘क्या तुम इन्हें पढ़ा रहे हो?’ उन्होंने पूछा.
‘मैं तो केवल अपने अनुभव बांट रहा हूं. उसमें कुछ भी दुनियादारी से अलग नहीं है.’ कछुआ बोला, फिर अपने बच्चों को संबोधित करके बोला, ‘मेरा समय पूरा हो चुका है. बहुत जल्दी जंगल के राजा का चुनाव होगा. तुम मेरे अपने बच्चे हो. चुनाव के समय जो भी फैसला करो, खूब सोच-समझकर करना.’
‘कैसा चुनाव...’ बड़ा बेटा उग्र स्वर में बोला, ‘ पुत्र अपने पिता की विरासत का स्वामी होता है. आपका बेटा होने के नाते नदी के प्राणियों का राजा बनना मेरा अधिकार है. आपकी बात कोई टालेगा भी नहीं. परंपरा-अनुसार नए राजा को ताज आप ही पहनाएंगे. इसलिए आपको चाहिए कि पिता होने के नाते मेरे अधिकारों की रक्षा करें.’
‘राजा की जिम्मेदारी तो इस नदी के प्राणियों ने ही मुझे सौंपी है. वह साधारण विरासत नहीं. राजा वही बनेगा जो सुशासन करसके. आजादी को संभालकर रख सके.’
‘उपदेश देकर आप हमारा अधिकार नहीं छीन सकते. जंगल में देखो, हमेशा शेर ही वहां का राजा बनता है.’
‘यह नदी है, यहां किसी की मनमानी नहीं चलती. हम सब मिल-बैठकर अपना राजा चुनते आए हैं.’ बूढ़े कछुए ने बच्चों को समझाने की लाख कोशिश की. पर उनमें से एक भी समझने को तैयार न था.
‘ठीक है. मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं. उसके बाद तुम जो फैसला करो, वही मुझे मंजूर होगा.’ बच्चे शांत हुए तो कछुए ने कहानी आरंभ कर दी—
‘वर्षों पहले की बात है. उन दिनों आदमी भी अंधकार में था. ताकत का राज चलता था. जिसके हाथों में ताकत आ जाती, वही दुनिया पर सवारी गांठने लगता. तो जिन दिनों की यह कहानी है, उसके ठीक पहले दुनिया में खुशहाली थी. लेकिन लोग सुख में इतने डूबे कि धीरे-धीरे अपना कर्तव्य और सारी नैतिकताएं बिसराने लगे थे. समाज में अनुशासन बनाए रखने के लिए लोकसंसद थी. स्वार्थ में डूबे लोग उसकी भी उपेक्षा करने लगे. ऐसे में उसको मौका मिला. लोकसंसद को भंग कर वह खुद राजा बन बैठा.’
‘वह कौन?’ बच्चों में से एक ने पूछा.
‘डयारू था उसका नाम....एक ताकतवर, घमंडी और क्रूर व्यक्ति. राजा बनते ही डयारू ने देश के लोगों का वह हाल किया किसब त्राहि-त्राहि कर उठे—‘आज के बाद वही होगा, जैसा मैं चाहंूगा. लोग वही सोचेंगे जो मैं कहूंगा. हटकर सोचने, हुक्म न मानने वाले का सिर कलम कर दिया जाएगा.’
डरे हुए लोग डयारू के आगे नतमस्तक होने लगे. दरबार में चापलूसों का जमाबड़ा बढ़ता ही गया. उनके लिए डयारू दिन कहे तो दिन, रात कहे तो रात. इससे डयारू का दुस्साहस और भी बढ़ने लगा—
‘मैं यहां का एकक्षत्र सम्राट हूं. धरती-चांद-सितारे-सूरज सब मेरा आदेश मानते हैं.’
‘महाराज, जंगल के गुस्ताख जानवर अब भी आपके आदेश के बिना चैकड़ी भरते हैं. उदंड नदी आपकी अनुमति के बगैर कल-कल बहती है और जब चाहे तब, किनारों को तोड़ मनमाने ढंग से इधर-उधर चली जाती है.’
‘अच्छा!’ डयारू गरजा. अगर ऐसा है तो जगल को जला डालो. नदी का रास्ता रोक दो.’ आदेश सुनाया गया. तानाशाह का हुक्म. सैनिक जंगल को साफ करने में जुट गए. नदी को रोकने की तैयारियां की जाने लगीं.
आम जनता अभी तक शांत थीं. डयारू और उसके मुंह लगे दरबारी अपनी सीमा में रहकर कुछ भी करें, इतना वह सह सकतीथी, ‘कोउ नृप होय हमें का हानि! के नकारात्मक भाव से सहती भी आई थी. लेकिन जंगल को साफ करना, नदी का बहाव रोकना, इससे तो जनजीवन पूरी तरह नष्ट हो जाएगा. पेड़े-पौधे हैं तो जीवन है. पानी है तो जिंदगानी है. राजा का आदेश सुनकर लोगों में खलबली मच गई. कुछ लोग हिम्मत करके डयारू के दरबार में भी गए. आदेश वापसे लेने की प्रार्थना की. तानाशाह उन्हें देखते ही उबल पड़ा—
‘ये भी जंगल के जानवरों जितने गुस्ताख हैं, नदी जितने ही उदंड हंै. इन्हें कैद कर लिया जाए.’ फरियादी कैद कर लिए गए. कहते-कहते कछुआ रुका. बच्चे सांस रोककर कहानी सुन रहे थे.
‘आगे क्या हुआ?’ एक ने पूछा. बाकी भी उसके स्वर में स्वर मिलाने लगे.
नदी किनारे काष्ठकारों का एक गांव था. वहां के शिल्पकार लकड़ी की सुंदर-नक्काशीदार चीजें बनाते. नाव बनाने में तो उनकादूर-दूर तक सानी न था. बड़े-बड़े समुद्रों, महानदियों में उनकी बनाई नौकाएं रात-दिन तैरतीं. एक दिन डयारू के सैनिकों का एक जत्था उस गांव में पहुंचा—
‘नदी सम्राट डयारू का अनुशासन नहीं मानती. उसको रोकना है. सम्राट का आदेश है कि बड़ी-बड़ी नावें बनाई जाएं. उनमें रेतभरकर उदंड नदी के बहाव को रोका जाएगा. उसके बाद महाराज डयारू जिस ओर चाहेंगे, नदी को उसी दिशा में बहना पड़ेगा. इसके लिए महाराज ने गांव के सभी काष्ठकारों और मजदूरों को राजधानी पहुंचने का आदेश सुनाया है.’ लोग चुप. किसी के मुंह से बोल न फूटा. उसके बाद तो जब तक सैनिक रहे, वातावरण में चुप्पी छाई रही.
उसी शाम सैनिकों के कूंच करते ही गांव में एक सभा हुई. वहां के मुखिया का नाम था, विद्यानंद. वह बहुत ही अनुभवी. बुद्धिमान और व्यवहार-कुशल आदमी था.
‘सैकड़ों नाव बनाने में तो महीनों लगेंगे. इतने समय तक राजा की बेगार करनी पड़ी तो हमारे परिवारों का क्या होगा?’ शाम की सभा में काष्ठ-शिल्पियों ने चिंता व्यक्त की.
‘डयारू जिद्दी, क्रूर और तानाशाह है. समझदारी की कोई बात उसके गले नहीं उतरती. उसको समझाने भेजे नागरिकों का हाल तो तुम देख ही चुके हो. आज तक वे उसकी कैद में चक्की पीस रहे हैं.’
‘आपके अनुसार हमें डयारू का आदेश मानना ही होगा?’ विद्यानंद को हिम्मत हारते देख एक ने पूछा.
‘फिलहाल तो दूसरा रास्ता नजर नहीं आता. इतना भरोसा रखो कि युक्ति में ही मुक्ति है.’ अगले दिन काष्ठकारों का दल डयारू के दरबार में उपस्थित हुआ. मुखिया विद्यानंद ने कहा—‘हमें अपने राजा का आदेश स्वीकार है. मगर राजधानी तक सारे औजार लाना संभव नहीं है. आज्ञा हो तो यह काम हम अपने गांव में रहकर करना चाहते हैं.’
‘मेरे सैनिक तुम सब पर नजर रखेंगे. जो भी काम में लापरवाही बरतेगा, उसका सिर कलम कर दिया जाएगा.’ डयारू गरजा.
‘महाराज सैकड़ों नावों के लिए ढेर सारी लकड़ी की जरूरत पड़ेगी.’
‘मुझे जंगल को भी सबक सिखाना है, इसलिए मेरे सैनिक उसे साफ करने पर तुले हैं.’
‘नाव बनाने के लिए कपड़ा, रस्सी, मोम जैसी चीजें भी जरूरी हैं.’
‘राज के जितने भी जुलाहे, रंगरेज, रस्सी बटने वाले भील और मजदूर हैं, सभी को काष्ठकारों के गांव भेज दिया जाए.’ डयारू ने आदेश दिया.
‘महाराज की दया हो. गांव में हजारों की संख्या में लोग जुटेंगे...उन्हें खाने-पीने के अलावा....’
‘हम समझते हैं. सब समझते हैं.’ डयारू ने गर्दन हिलाई, फिर सैनिकों को संबोधित कर बोला, ‘किसानों से कहो, अनाज की कमी नहीं पड़नी चाहिए. दुकानदार मजदूरों और कारीगरों के लिए बाकी चीजों का बंदोबस्त करें, जिसने भी चूक की, उसका सिर कलम कर दिया जाएगा.’
‘आपकी दयालुता के क्या कहने! महाराज काम जल्दी से जल्दी का पूरा हो, इसके लिए आदमी-औरत सबको एकजुट होकर काम करना पड़ेगा. बच्चों के मनोरंजन के लिए यदि एक-दो किस्सागो और गायक भी गांव भेज दिए जाएं तो....’
डयारू किस्सागो, गायकों और यहां तक शिक्षकों को भी नापसंद करता था. उसकी नजर में ये लोग लोगों को गलत पाठ पढ़ातेथे. इसलिए राजा बनते ही राज्य की सारी पाठशालाओं को बंद करा दिया गया था. परंतु उस समय उसका सारा ध्यान नदी को ‘सबक सिखाने’ पर केंद्रित था. इसलिए उसने विद्यानंद की बात मान ली. वे लोग वापस गांव लौट आए. अगले दिन से ही वहां कारीगरों का जमाबड़ा होने लगा. जंगल से लाए गए वृक्ष वहां जमा होने लगे. डयारू ने सैनिकों की एक टुकड़ी लोगों पर नजर रखने के लिए रख छोड़ीथी. पर कारीगरों को अपने-अपने काम में जुटा देख सैनिक निश्चिंत हो गए. नाव बनाने का काम आगे बढ़ता गया. शिल्पकार काम में जुटे थे. लेकिन उसमें मन किसी का नहीं था. सब भीतर से व्यथित थे.
‘मैं लोगों के तन ढकने के लिए कपड़ा बुनता था. अपने पेशे को पवित्र मानता आया हूं. परंतु अब मुझे एक तानाशाह के लिएकाम करना पड़ रहा है. मुझे अपने ऊपर शर्म आ रही है.’ एक जुलाहा बराबर में काम कर रहे रंगरेज से बोला. वह कोई उत्तर दे उससे पहले ही उसके साथ काम कर रहा युवक काष्ठकार कहने लगा—
‘मेरी बनाई गई नावें समुद्र का सीना चीरकर आगे बढ़ती जाती हैं. जाने कितने यात्रियों को रोज उनके गंतव्य तक ले जाती हैं.सैकड़ों व्यापारी मेरी बनाई नावों से व्यापार करते हैं. लेकिन अब तानाशाह के लिए काम करते हुए जी दुःखता है. इससे तो अच्छा है कि मैं अपने हाथ ही कटवा लूं.’
मुखिया विद्यानंद खुद भी अच्छे काष्ठकार थे. लकड़ी को छू देते तो उसमें मानो जान आ जाती. बाकी कारीगरों के साथ वे भी काम पर जुटे थे. चेहरे पर गंभीरता थी. युवक काष्ठकार ने उन्हें विचलित कर दिया—
‘तुम्हारा क्या कहना है?’ विद्यानंद ने बराबर में बैठे किस्सागो से पूछा.
‘अपने जीवन में मैंने लंबा समय देखा है. हजारों लोगों से मिला हूं. मगर इस विपत्ति में कुछ याद नहीं आता, लेकिन वर्षों पहले एक कहानी मैंने सुनी थी. न जाने क्यों, वह भुलाए नहीं भूलती!’
‘तुम तो खुद बड़े किस्सागो हो, फिर ऐसी कौन-सी कहानी है जो तुमसे भुलाए नहीं भूलती?’ विद्यानंद ने आश्चर्य-मिश्रित स्वर में पूछा.
फ्रांस के दार्शनिक की लिखी छोटी-सी कहानी है. पर कहानी से ज्यादा तो यह पहेली है?’
‘पहेली! डयारू के राज में क्या यह पहेली बूझने का समय है....’ रंगरेज ने बुझे मन से कहा.
‘कोई बात नहीं, कहानी समझकर ही सुन लीजिए....’ विद्यानंद ने कहा तो किस्सागो ने कहना आरंभ कर दिया—
‘कहानी इस तरह है—मान लीजिए फ्रांस में इस समय दो हजार डॉक्टर, वकील, अध्यापक, दो लाख किसान, दो लाख मजदूर, दो हजार छोटे व्यापारी तथा इतने ही शिल्पकार हैं. अब कल्पना कीजिए, हालांकि यह बहुत बुरी कल्पना होगी, लेकिन बुरे सपने की भांति भुला देने के लिए ही सही, कल्पना कीजिए कि इस एक बड़े हादसे में वे सबके सब एक साथ मारे जाते हैं. तब फ्रांस का क्या होगा?’
‘जब जनता ही न रहेगी तो देश कैसा...कोरी बंजर धरती, जिसपर सांप-बिच्छु और चमगादड़ ही बसेरा करेंगे. शिल्पकारों में से एक ने बिना एक भी पल गंवाए उत्तर दिया. विद्यानंद ने देखा, सब कथा का में डूबे हुए थे.
‘ठीक कहा आपने, जनता है, तो देश है, आदमी के बिना धरती तो बंजर बनेगी ही, अब एक ओर कल्पना कीजिए...उसी फ्रांस में सौ नेता और मंत्री, दो सौ अधिकारी, प्रशासक, और कुछ दर्जन धर्माचार्य हैं. यदि एक हादसे में ये सब के सब चल बसें, तब उस देशका क्या होगा?’
‘च..च्च...च्च्च! बहुत बुरा होगा. इस झटके से उबरने में तो उस देश को वर्षों लग जाएंगे.’ शिल्पकारों की ओर से तत्काल जवाब आया.
‘समय लगेगा, मगर उबर जाएंगे.....दार्शनिक ने भी यही लिखा था. उसका नाम था संत साइमन. जानते हैं उसके बाद फ्रांस में क्या हुआ था? किस्सा महज डेढ़ सौ वर्ष पुराना है.’
‘आप ही बताइए....!’ सबकी आंखें किस्सागो पर टिकी थीं.
‘फ्रांस की जनता समझ गई कि देश राजा से नहीं, जनता से बनता है. उसके बाद उसने गजब की हुंकार भरी, जिससे राजसत्ता एक ही झटके में जमीन पर आ गिरी.’
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इतनी कहानी सुनाने के बाद कछुआ रुक गया. शिलाखंड पर बैठे लेखक की सांस भी धौंकनी की तरह चल रही थी. कछुआ के बच्चे सांस थामे उसकी ओर देख रहे थे.
‘आपने हमें यह कहानी क्यों सुनाई. क्या आपको लगता है कि डयारू और फ्रांस के राजा की तरह हम भी आततायी और तानाशाह सिद्ध होंगे?’ बड़े बेटे ने शिकायत-भरे स्वर में पूछा.
‘हरगिज नहीं, पिता होने के नाते मुझे तुमपर पूरा भरोसा है. तुममें राजा बनने के सभी आवश्यक गुण हैं. इसलिए मैं कामना करता हूं कि तुम यहां के राजा बनो.’
‘यह क्या बात हुई.’ कछुआ के बच्चों के साथ-साथ लेखक महोदय भी उसकी पहेली में उलझ गए.
‘तुम नदी के राजा बनो, इसमें कुछ भी गलत नहीं है. गलत होगा राजसत्ता को विरासत मानकर तुम्हें सौंप देना. ऐसी परंपराओं से ही डयारू जैसे तानाशाह पैदा होते हैं, जो एक न एक दिन जनता के आक्रोश का शिकार बनते हैं. क्या अब भी तुम....?’ कछुआ ने अपनी नजरें बडे़ बेटे पर गढ़ा दीं.
‘नहीं, परंतु मैं चुनाव में हिस्सा जरूर लूंगा; और चाहूंगा कि आप मुझे आशीर्वाद दें.’
‘बिलकुल.’ कछुआ के चेहरे पर अचानक चमक छा गई. मानो छाती पर रखा मनो बोझ हट गया हो. आशीर्वाद ही क्यों? चुनाव में खड़े उम्मीदारों में से यदि मुझे लगा कि तुम उन सबसे योग्य हो तो मैं तुम्हारे पक्ष में मतदान भी करूंगा.’
उसके बाद कछुआ ने नदी में डुबकी लगा दी. पीछे-पीछे उसके बच्चे भी चलते बने. लेखक महोदय शिला पर जड़वत बैठे रहे. तंद्रा टूटी तो उठे, चारों ओर देखा. प्रकृति वहां अपना वैभव लुटा रही थी.
इस प्रकृति ने आज तक किसी को निराश नहीं किया, पर आज मुझे जो दिया है, वह पूरी मनुष्यता के लिए बहुमूल्य उपहार है.
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हम हैं हिन्दुस्तानी
बड़े गर्व से कहते, हम हैं हिन्दुस्तानी जब भी पड़े जरूरत, दी हमने कुर्बानी। हम ही नभ की ज्योति, हम ही हीरे-मोती।
देश हमारा अपना, हम हैं इसका सपना। यही धर्म –यही कर्म, यही है जिन्दगानी बड़े गर्व से कहते, हम हैं हिन्दुस्तानी।
कोई इसको बाँटे, कोई इसको काटे। हमें नहीं गंवारा, यह है अपना नारा।
अपनी माँ की इज्जत, हर पल हमें बचानी, बड़े गर्व से कहते, हम हैं हिन्दुस्तानी। यह हमारी जान है, मान औ सम्मान है।
इसे नहीं झुकना है, इसे नहीं रुकना है। जब भी यह हंसती है दुनिया लगे सुहानी, बड़े गर्व से कहते, हम हैं हिन्दुस्तानी।