शैल जी , लेखनी का यह अंक माँ के नाम देख कर बहुत अच्छा लगा . साधुवाद !आप हमेशा अछूते विषय उठाती हैं , एक बार मृत्यु पर उठाया था .... बावरी चिड़िया पढ़ ली ! आँखें नम हो आयीं ! यह सच है कि माँ और बेटी का रिश्ता सब रिश्तों से बड़ा है -- माँ बेटे से भी ज्यादा क्योंकि संवेदनाएं यहाँ ज्यादा जुडती हैं. आपकी कहानी भी कहानी कम और संस्मरण अधिक लग रही है . इस तरह की टेलीपैथी अक्सर होती है , इसमें भी कोई संदेह नहीं ! इतनी भीगी हुई कहानी लिखने के लिए आपको बधाई !
bitch"bahut hee acchee kahanee hai.Rabiya aur Neha charitron ko aapne jis drishti se ghada hai, striivimarash kee aik behtrrn kahanee siddh hotee hai.in chatiron ke madhyam se aap ne do sanskritiyon kee sajeev abhivyakti hee naheen dee apitu man ke jariye saguniya aur nirguniya lokkatha aur uske charitron ke rakhane ke sath aaj kee sthiti men use aprasangik bataya hai.Jaisa ke NeHA ne nirnaya lya hai ki vah apnee betiyon ko yah kahanee naheen sunayegee.Yahee kahanee ke sabase badee uplabdhi hai.yanfemale swatantrata kee bat kee gayee hai. kahanee ke ant men Neha ka jhuunth bhee prsangik hai jo kahanee ko aur bada banata hai unke kathan ke sath...bahut-bahut badhai.Aapne is kahanee ke katha charitron madhyam se do sanskrtiyon kee visngtiyon ko bakhuubee bunna hai.aur yah bhee prtishthit karne ka pyas kiya hai ki kaunsa muulya kab aprasangik ho jaye;sandarabh -nirguniya- saguniya katha...aik bar phir se bahai.
आदरयोग्य शैल जी, आपको नमन! आपका हिंदी के साथ साथ विरासत और प्रासंगिकता के बेजोड मेल से जो लाभ समाज को हो रहा है वो अदभुत है आपका जीवन मंगलमय हो सुशील कुमार (प्राध्यापक) केंद्रीय विद्यालय पटियाला (पंजाब) भारत
बहुत समय बाद आपको मेल भेज रहा हूँ. " लेखनी " के अंक मिल रहे हैं. यों तो हर अंक की सामग्री की कुछ न कुछ विशेषता होती ही है, पर इस पत्रिका में जिस चीज़ की मुझे बहुत उत्सुकता से प्रतीक्षा रहती है वह है इसका " कविता धरोहर " स्तम्भ . वस्तुतः यह इस पत्रिका का ऐसा स्तम्भ है जो इसे अन्य पत्रिकाओं की भीड़ में विशेष बना देता है . इस स्तम्भ की कविताएँ हमें अतीत में तो ले ही जाती हैं , पर साथ ही वर्तमान सन्दर्भ में उनकी प्रासंगिकता देखकर सुखद आश्चर्य होता है . इस अंक में आपने ' दिनकर ' की " सिंहासन खाली करो कि जनता आती है " कविता भी दी है. समर्थ लोगों द्वारा अब तक जारी देश को लूटने के कामों के विरोध में पिछले दिनों देश में हुए स्वामी रामदेव और अन्ना हजारे के आन्दोलनों और उन पर सरकारी प्रतिक्रिया के सन्दर्भ में इस कविता का महत्व और भी बढ़ गया . इसलिए इस समय इसे पढ़कर अलग ही आनंद मिला. " लेखनी " के इस स्तम्भ के लिए और इसमें चयनित कविताओं के लिए मैं आपका विशेष अभिनन्दन करता हूँ.
हीर्दिक स्नेह और सम्मान सहित - रवीन्द्र अग्निहोत्री
प्रिय शैल,नमस्कार बाद में पहले जयहिंद. लेखनी में तुम्हारा सम्पादकीय पढ़ा. सचमुच भारत देश भयंकर दुर्गति के दौर से गुज़र रहा है. राजनीति में, नौकरशाही में, सेना में यहाँ तक कि शिक्षा संस्थानों तक में देश प्रेम की भावना का गहरा अकाल है. नैतिकता का जितना घोर संकट है, उसकी उतनी ही ज्यादा छद्म नुमायश है. कई बार तुमसे हिस्सा बाँट करने का मन हुआ लेकिन लगा कि तुम ऐसे परदेस मैं बैठी हो जहाँ से हमने आज़ादी छीनी या पाई.. अब उनके सामने ही हमारी छीछालेदर खुले, इस से ज्यादा हंसी की क्या बात होगी... लेकिन इस विश्वग्राम में किसके चूल्हे का धुंआ किसको नहीं दिखता... खैर, बस आँख की शर्म है. लेकिन तुमने यह वर्क खोल ही दिया तो उसकी इबारत क्या छिपाना...
........हमारे दोस्त काफी खुश हैं. इसकी वजह शायद बनारस के साथ उनका खिचाव हो सकता है, वो यादें हो सकतीं हैं जो उन्होंने बचपन में वहां कि घाटों पर गुजारी थीं. जहाँ तक मैंने नोटिस किया, आपके लेख पढने के बाद वें काफी भावुक हो गएँ थें. वजह जो भी रहा हो, मगर उस दिन ये पता जरुर चला कि हम कंही भी रहें, अपनी जन्मभूमि में एक अलग ही तरह का खिचाव होता है और हम जाने अनजाने उससे जुड़े रहतें हैं. भावनाओं का ये ज्वार उस शहर का नाम आते ही फूट ही पढता है. इस बात से कोई इत्तेफाक नहीं होता है कि तत्कालीन समय में उसकी हालत कैसी है.
शैल जी,लेखनी का जुलाई2011 माह का अंक विहंगम रूप से अवलोकित किया। आपकी प्रतिभा और लगन की सराहना करनी पड़ती है। बहुत करीने से यह अंक सँजोया है, आपने। मेरी बधाई स्वीकार करें। खास तौर पर बनारस को जिस तरह जिया है आपने और उसकी यादों को अपने अंत:करणमे इतने दिनों से सँजो कर रखा है,यह इस बात का परिचायक है कि जिस आबोहवा में कोई सॉंस लेता है, परवरिश पाता है, उॅगलियॉं थाम कर चलना सीखता है,उसे कोई कैसे भूल सकता हे। बनारस की आबोहवा आपकी अंतश्चेतना में विद्यमान है। देवमणि पांडेय की पहली कविता शहर के लिए शुक्रिया व्यक्त करती हुई गॉंव की अनिंद्य भावभूमि पर खींच ले जाती है। शेष सामग्री पढ़ कर राय व्यक्त करूँगा। लेखनी से जैसे भारतीय मन और पारिस्थितिकी की खुशबू आती है। साधुवाद। सानुराग--डॉ.ओम निश्चल, वाराणसी
लेखनी को जब पढ़्ता हूँ तो ’धर्मयुग’( सं. डॉ.धर्मवीर भारती) और ’दिनमान’ को पढ़्ने की सी राहत मिलती है। बहुत स्तरीय-उच्चकोटि की रचनाओं के बीच मेरी रचनाओं को स्थान देकर आप मुझे प्रोत्साहित करतीं रहीं है । आपकी इस भावना को मेरा सादर प्रणाम ।साभार and also pl. take care. रमेश
Respected Shail ji lekhni ka ank padha bahut achchha laga aapne jo banaras ki holi aur shiv parvati ke vivah aur fir vidai ke bare me likha hai padh kar achchha laga bahut sahi aur achchha likha hai .sabhi kavitayen ati sunder hain.kahaniyan to aapne chun chun kar dali hain punha ek sunder ank nikalne ke liye badhai. Saader Rachana
प्रिय बहन शैल जी, सस्नेह नमस्ते एक लम्बी प्रतीक्षा के बाद ' लेखनी ' का नया अंक पाकर विशेष प्रसन्नता हुई . जनवरी में अंक न पाकर मैंने आपको एक मेल भेजी भी थी क्योंकि मुझे लगा कि कोई न कोई विशेष बात अवश्य होगी. वह बात तो पता नहीं चली, पर अब संयुक्तांक पाकर यह तो निश्चित हो ही गया कि जो भी ' विशेष बात ' रही होगी वह अब नहीं रही. आपके उत्तम स्वास्थ्य और साहित्यिक गतिविधियों में सक्रियता की निरंतरता के लिए हार्दिक शुभकामनाओं सहित, रवीन्द्र अग्निहोत्री .
लेखनी का अंक पाकर सुख और संतोष का सांस लिया है विदेशों में लिखे जा रहे हिंदी साहित्य के लिए " प्रवासी " शब्द का उपयोग आजकल धड़ल्ले से हो रहा है . हिंदी गीत , हिंदी कविता हिंदी ग़ज़ल और हिंदी कहानी पर प्रवासी शब्द थोपा जा रहा है . भाषा कभी प्रवासी नहीं होती है और न ही साहित्य प्रवासी होता है . www.vaatayan .blogspot.com पर इस विषय के बारे में चर्चा पढ़िएगा . सभी हिंदी साहित्य के साथ जुड़े प्रवासी शब्द के विरोध में हैं , तेजेंद्र शर्मा को छोड़कर .आपके विचार भी हम सब जानना चाहेंगे
आदरणीया शैल जी'लेखनी' के अंक मैं स्वयं ही हर माह क्लिक करके देखता-पढ़ता रहता हूँ। मेरे हर ब्लॉग पर इसका लिंक है। अपने साहित्यिक मित्रों से भी 'लेखनी' पढ़ने के लिए कहता रहता हूँ। जनवरी-फरवरी 2011 अंक विशिष्ट बन पड़ा है। सभी सामग्री पठनीय है। समकालीन कहानी के अन्तर्गत आपकी कहानी और सुहैल की कहानी ने प्रभावित किया। 'तुषार' की ग़ज़लें अच्छी लगीं। अन्तर्जाल पर हिन्दी की दो चार ही वेब पत्रिकाएं ऐसी हैं जो संतुष्ट करती हैं उनमें लेखनी एक अहम पत्रिका है। इसके पीछे आपकी मेहनत और लगन भी साफ़ झलकती है। मेरी शुभकामनाएं स्वीकार करें। सादरसुभाष नीरव
To day, I went into your website and found out the latest issue with all the pomp and show and new flavors. It is always a great deal of mental feast with the opening of your magazine. You are a very good writer . I enjoy reading your articles in all different versions. Keep it up. With all the good wishes for the coming new year
अपनी रचना ब्राह्मण यहाँ देखकर बहुत प्रसन्नता हुई। कृपया कर के मेरे इस ब्लाग पर बच्चों के लिए बहुत सारी सामग्री है आप चाहें तो इसे अपने इस साइट पर पब्लिस कर सकते हैं। http://nanihal.blogspot.com
प्रिय शैल जी ,बधाई और धन्यवाद .साल का आखिरी महीना -- मृत्यु पर बेहतरीन अंक निकाला है आपने . अभी पूरा तो नहीं पढ़ पायी पर दीप्ति गुप्ता की कवितायेँ अद्भुत हैं -- बेहद संवेदनशीलता से लिखी हुई । --'' मृत्यु भय - मौत के आने से ज्यादा ज़िन्दगी के छूटने का भय है .''परिचर्चा में जो दो घटनाएँ हैं -- वे क्या आपके अपने अनुभव हैं ? भयानक हैं पर अविश्वसनीय नहीं . इन पर विश्वास करना मुश्किल नहीं क्योंकि ऐसा होता है कई बार . कृपया उस पर अपना नाम अवश्य दें और एक शीर्षक भी . -सुधा अरोड़ा
दीपावली की शुभकामनाओं, लेखनी के नए अंक और आपकी मेल के लिए आभारी हूँ. दीपावली के अवसर पर लेखनी के इस अंक में दीपमाला के अंतर्गत दीपक के सन्दर्भ वाली पुराने - नये कवियों की रचनाएँ पढ़कर बहुत अच्छा लगा.बहुत दिनों बाद नीरज की ' अंधियार ढलकर ही रहेगा' पढ़ने का एक अलग ही आनंद मिला. अपनी बात में आपने वैश्वीकरण के सन्दर्भ में अनेक महत्वपूर्ण बातें कही हैं. नियामक की भूमिका छोड़कर " बिचौलिया " बन जाना इस नई व्यवस्था में सरकार की सोची समझी रणनीति है . इसे भले ही " विश्व गाँव " का नाम दिया गया हो, पर आत्मीयता के नाम पर न यह गाँव है न मोहल्ला . " वसुधैव कुटुम्बकम " की वैदिक भावना हमारी संस्कृति को हमेशा अनुप्राणित करती रही है, पर यह भावना तभी सार्थक हो सकती है जब वेद के आदेश " कृण्वन्तो विश्वमार्यम " ( संसार को आर्य अर्थात श्रेष्ठ बनाओ ) का भी पालन किया जाए, वरना लुटेरों, चोरों, डकैतों , हत्यारों के साथ तो ऐसा ही कुटुंब बनेगा .आपने एक नया शब्द भी दिया है " विश्वीकरण " , व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध न होते हुए भी यदि लोगों ने इसे पसंद किया और यह यह प्रचलन में आया तो हिंदी और समृद्ध होगी. लोक में प्रयोग पहली चीज़ होती है, व्याकरण तो उसका अनुगामी है. सरोकार में सुप्रसिद्ध विद्वान डा. वेद प्रताप वैदिक ने बहुत पते की बातें कही हैं . कामन वेल्थ के सन्दर्भ में भी उनका यह कहना बहुत महत्वपूर्ण है कि अगर यह " कामन " है तो ब्रिटेन उसका स्थायी स्वामी क्यों है ? परिचर्चा में ओबामा की चिंता के केंद्र में भारतीय और चौपाल में मोटे अनाज से संभव है भूख और स्वास्थ्य अच्छे गंभीर लेख हैं . प्रेम जन्मेजय के " तुम ऐसे क्यों आईं लक्ष्मी " ने खूब गुदगुदाया. . मंथन में " समंदर पर पुल बांधने का वक्त आया' , कहानी समकालीन में दिए की लौ , चिड़िया और चील , कहानी धरोहर में " अमृतसर आ गया है " माह के कवि में प्राण शर्मा की दोनों कविताएँ अच्छी लगीं . ऐसी सामग्री जुटाने के लिए आपको बधाई।
lekhni se mai bahut prabhavit hoon, apni rachnaaen bhejna chahata hoon, kya koi email address bhi hai jis par rachnaen bhej sakoon,dhanyvaad Ntyanand Tushar
लेखनी को तो आपने महालेखनी बना दिया है . उसमें आपका दिन - रात का परिश्रम लगता है . आप नए - नए आयाम स्थापित करें , मेरी हार्दिक शुभ कामना है .नवम्बर अंक अनुपम है , दीवाली के प्रकाश की तरह . स्तरीय रचनाओं को पढ़ कर पूरा मास आनंद में गुजरेगा . प्राण शर्मा
आज ही लेखनी पत्रिका देखी. अपनी बात के अंतर्गत आपने बहुत ही सार्थक और ज्वलंत मुद्दा उठाया है. जब तक स्वयं नारी अपने को आज़ाद नहीं मानेगी , संस्कारों के जाल से नहीं निकलेगी, गुलामी से मुक्त नहीं हो पाएगी . अभी पूरा अंक नहीं देख पाई हूँ,पर जितना भी देखा है ,काबिले तारीफ़ पाया है.
लेखनी के अक्तूबर अंक के लिए आभारी हूँ . नारी विमर्श पर केन्द्रित इस अंक के प्रेषण - पत्र की पंक्तियों में ही जैसे पूरे अंक का सार समा गया है और अपनी बात में सम्पादकीय सूझ बूझ सराहनीय है. महादेवी वर्मा की पंक्तियाँ , मंथन में तीन अलग - अलग लेखकों के विचार, कविता धरोहर में सुभद्रा कुमारी चौहान की दोनों कविताएँ , माह की कवयित्री में ' बटवारे ' शीर्षक कविता , तमिल कहानी ' अरविन्दन नाम से एक सखा ', सरोकार में माँ को संबोधित अजन्मी बेटी का पत्र, विचार में ' बेटी का आनंद ' , चाँद, परियाँ और तितली में ' मूर्ख पत्नी ' की कहानी -- सभी सामग्री प्रभावशाली लगी. परिचर्चा में " देवी से वस्तु होती स्त्री की खुशफहमी " के लेखक मुझे बहुत भाग्यशाली लगे जिन्हें अधिकांश भारतीय परिवारों में लोग महर्षि मनु के उपदेश " यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता " का पालन करते मिले ; वरना मैं तो अब तक अपने कम अनुभव के कारण यही समझता था कि जैसे सरकारी दफतरों में " शो पीस " के रूप में महात्मा गाँधी का चित्र टंगा रहता है , वैसे ही हमने मनु का यह श्लोक हाथी के दिखाने वाले दांतों की तरह औरों को सुनाने के लिए याद कर रखा है. अच्छा है, इस बहाने मेरा अनुभव बढ़ गया. एक बात की ओर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा. ' लेखनी' जैसी स्तरीय पत्रिका में वर्तनी की भूलें खटकती हैं . स्वत्व छिन (छीन ) कर ले गए, चारों और (ओर ), जड़ से विहिन (विहीन ), काराग्रह (कारागृह ), परिणिति (परिणति ), स्तोत्र (स्रोत) , पूज्यनीय (पूजनीय ) जैसे शब्दों को तो थोड़ी अधिक सावधानी से ठीक किया जा सकता था . कुछ लेखक वह / वे , यह / ये का अंतर हटाकर " वो " " ये " का प्रयोग करने लगे हैं . ऐसे प्रयोगों के सम्बन्ध में बेहतर होगा कि पत्रिका अपनी एक नीति निश्चित कर ले और इस क्षेत्र में स्वच्छंदता न पनपने दे .
aap ki kahani aur kavitayen padh ke man bhig gaya .bahut sunder shbdon se pare .aap ko bahut bahut badhai. aap ke bare me kuchh kahana mere bas me nahi .aap sahitya ki har vidha me parangat hain anviksha ki kahani lene ka shukriya. - Rachna Srivastava
लेखनी का सितम्बर अंक प्रेषण पत्र पर जिस सन्देश के साथ मिला, वह स्वयं ही बहुत कुछ कह रहा है. आपकी इस सूझ - बूझ के लिए आपको बधाई. इस अंक को विशेषांक बनाने के लिए आपने जो परिश्रम किया है , उसकी जितनी भी सराहना की जाए, कम है. माह के कवि में अनवर सुहैल की अध्यापक , पिता और माँ से संबंधित कविताओं ने जो समाँ बांधा तो वह उत्तरोत्तर और भी दृढ़ होता गया . धरोहर में भवानी भाई की " गुलाब" कविता आज के " इंडिया बनाम भारत " का दृश्य उपस्थित कर देती है . मुद्दा में वेदमित्र जी का लेख " हिंदी पकवान में कितनी अंग्रेजी " , परिचर्चा में रघुवेंद्र सिंह जी का " उच्च शिक्षा : उधार का सिन्दूर ", सरोकार में वैद्यनाथ झा जी का " दो पाटन के बीच में ", चौपाल में रामेश्वर काम्बोज ' हिमांशु' जी का "कभी बच्चों का चेहरा पढ़ें, मन पढ़ें " और "My Column " में आपके द्वारा की गई शिक्षा की विवेचना - जैसी सामग्री मेरी दृष्टि में स्थायी महत्त्व की है. भरपूर विचारोत्तेजक सामग्री देकर आपने तो जैसे इतिहास ही रच दिया है . इसके लिए मैं आपका हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ . बहुत - बहुत बधाई . इश्वर से प्रार्थना है कि उस की कृपा आप पर बनी रहे और आप इसी प्रकार सरस्वती की आराधना करती रहें . आशा है आप सपरिवार सानंद होंगी . दोनों नवजात शिशु और उनकी माँ - हम लोगों की बेटी - भी स्वस्थ होगी. उन्हें हम लोगों का आशीर्वाद. हार्दिक स्नेह सहित - रवीन्द्र अग्निहोत्री.
Respected Aunty, Thank you for publishing my story 'The Magic Mug.'This is my first time getting my story publish and I am very exited about it. Also I loved your picture,that you put with my story. thank you again
maf kijiyega ki me der se likh rahi aap ka bahut bahut dhnyavad ki aap ne anviksha ki kahani chhapi Abhi us ka test tha to us ko bataya nahi hai aaj bataungi . aap ki kavita manju ji ki aur himanshu ji ki kavitayen bahut achchhi lagin .laghukatha me jis tarah se bal man ki baten likhin gain hai dil ko chhu gain . lekhni ke punah ek achchhe ank ke liye aap ko badhai. aur mujhe lekhni bhejne ka shukriya saader rachana
Shail jiaapki anoothi patrika samay ki pabandion ko sanwarti hui mili..kahani aur kavitayein bahut achi lagi. Sukesh ji ki laghukathayein padna ek siksha ki pathshala mein baithkar kuch seekhne jaisa hai..aapka sampadakeey apni baat kahne ka ek sashakt mudda hai jo pathneey evam sangrahaneey hai.
लेखनी का नया अंदाज और ज्यादा पसंद आया.कविताएँ बहुत पसंद आई .सुक्ष सहनी कि लघुकथाएँ दिल छु लेती है.किसी मुद्दों को लेकर निकाला गया अंक में काफी तकलीफ उठानी पड़ती है. क्रपया अगला अंक किस बिषय पर होगा उसकी सूचना इसी अंक में मिलती तो ज्यादा अच्छा रहता . शुभकामनाओं सहित आपका,किशोर कुमार जैन गुवाहाटी असम .
लेखनी के अगस्त अंक में अपनी कवितायें देखीं . बहुत अच्छा लगा. अच्छा इसलिए क्यूंकि हिंदी वेब पत्रिकाओं में लेखनी ने बहुत ही अग्रणी स्थान बना लिया है इसलिए उसमे कवितायें छपना किसे अच्छा नहीं लगेगा. शेष कवितायें भी बहुत अच्छी लगीं.
.मैंने जब आपको पहली मेल भेजी थी तब ' लेखनी ' की कुछ ही रचनाएँ पढ़ी थीं . अब जब सारी रचनाएँ पढ़ीं तो आपकी योग्यता, प्रतिभा और लगन देखकर मन अभिभूत हो गया आप इतनी विधाओं में लिखती हैं और हर विधा में प्रभावी ढंग से लिखती हैं. इसके लिए मैं आपका हृदय से अभिनन्दन करता हूँ. आप इतनी बड़ी पत्रिका निकाल रही हैं, मासिक आधार पर निकाल रही हैं, अन्य लेखकों से स्तरीय रचनाएँ लिखवाती हैं, उनका सम्पादन करती हैं, स्वयं विपुल साहित्य रचती हैं , इस कार्य में इतना समय लगाती हैं तो निश्चित रूप से आपको अपने परिवार से भरपूर सहयोग मिल रहा है . अतः मैं आपके परिवार का भी अभिनन्दन करता हूँ . परमात्मा से प्रार्थना है कि उसकी कृपा बनी रहे , आप और आपके परिवार में सभी लोग स्वस्थ रहें, आपको इसी प्रकार सहयोग मिलता रहे, आपकी लेखनी अविराम चलती रहे और आप माँ सरस्वती की आराधना करती रहें.
लेखनी पत्रिका का परिचय अभी हुआ और अगस्त अंक पढ़ा. यह देखकर प्रसन्नता हुई कि पत्रिका देश की समस्याओं से चिंतित ही नहीं है, उनके समाधान के लिए भी यत्नशील है फिर चाहे वह दोहरी नागरिकता की बात हो या उस जाति प्रथा की जो दीमक बनकर भारतीय समाज को अन्दर से खोखला करती आ रही है. भारतीय समाज की जिस कमजोरी को समाप्त करने का प्रयास स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गाँधी जैसे अनेक महापुरुषों ने किया, उसी कमजोरी को जीवन प्रदान करने की कोशिश वर्तमान सरकार करने जा रही है. डा. वेद प्रताप वैदिक और श्री फ्रांसिस ने पाठकों को जागरूक करने का जो प्रयास किया है, और डा. वैदिक ने सरकार के षड़यंत्र को विफल करने का जो उपाय बताया है उसके लिए उनका अभिनन्दन. दोहरी नागरिकता की जिम्मेदारियों की ओर आपने भी बहुत ही सुन्दर ढंग से प्रकाश डाला है. इस अंक की अन्य सामग्री भी आकर्षित करने वाली है . ऐसी रोचक एवं उपयोगी सामग्री जुटाने और उसे पत्रिका के रूप में प्रस्तुत करने के लिए आपको बधाई .डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री
Date: Thu, 5 Aug 2010 13:20:13 +0530 From: sumitakeshwa
शैल जी,नमस्कार. लेखनी का अंक भेजने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया. यह अंक भी बहुत ही सुन्दर एवं पठनीय रहा. १५ अगस्त और रक्षाबन्धन के शुभअवसर से संबधित लेख अच्छे लगे.आपकी कहानी एक बहन समर्पित है जो बड़ी ही भावुक लगी . सुन्दर संपादन एवं लेखन के लिए बधाई एव शुभकामनाएं. संतोष जी की किताब 'टेम्स की सरगम' की समीक्षा प्रकाशित करने के लिए धन्यवाद. रक्षा बन्धन एवं २५ अगस्त की बहुत-बहुत शुभ कामनाएं!!
Date: Wed, 4 Aug 2010 06:14:04 -0700 From: Rachna Srivastava
Respected shail ji aap ka dhnyavad ki aap ne lekhni ka ank bheja .padh ke aanand aaya .kavitayen bahut sunder hain .sabhi kuchh pathniy hai .aap ki mehnat har kone me dikhai deti hai .ek aur achchhe ank ke liye badhai
Aapki Haiku bahut acchi lagi hai.Wese aapki Apani Baat mein niyamit rup se padhta hoon.Pandit Hazari Prasad Dwivedi jab tak Santiniketan mein rahe tab tak unhone Visva-Bharati Patrika Hindi ki Sampadakiya Apani Baat se likhte rahe.Aaj wahi Apani baat ka sankalan pustak ke rup mein aaye hai.Aasha hai bhavisya mein Lekhni ki Apani Baat bhi Pustak ke rup mein aayegi.