" तुम कौन! हृदय की परवशता? सारी स्वतंत्रता छीन रही, स्वच्छंद सुमन जो खिले रहे जीवन-वन से हो बीन रही!"
- जयशंकर प्रसाद
(लेखनी-वर्ष-4-अँक-40)
' Beyond the 'Self'
कविता धरोहरः भवानी प्रसाद मिश्र। गीत और गजलः देवी नागरानी, कमलकिशोर भावुक, ज़तिन्दर परवाज़, अनिल वर्मा। कविता आज और अभीः पंकज मिश्र 'अटल ', शैल अग्रवाल, सुदर्शन 'प्रियदर्शिनी', दीपक भट्ट, पूनम बत्रा, सुमीता केशवा। माह के कविः लीलाधर जगूड़ी । बाल कविताः ठाकुर श्रीनाथ सिंह।
मंथनः मैक्सिम गोर्की-अनुवाद नरोत्तम नागर। कहानी समकालीनः रूपसिंह चन्देल। कहानी समकालीनः शैल अग्रवाल। लघुकथाः अनीता रश्मि। परिचर्चाः डॉ. नलिनी कुमार नायक । हास्य व्यंग्यः अजय पराशार। रागरंगः सीताराम गुप्ता। सरोकारः वेदप्रताप वैदिक। चौपालः अजय पराशार। चाँद परियाँ और तितलीः हितोपदेश। देश-विदेश की मासिक खबरों के साथ विविधा।
Inspirational: Osho. Poetry Here & Now: Kunwar Narayan. Favourite Forever: Rudyard Kipling. Story: Shamoil Ahmad. Kids'Corner: Folk tale -Narration -Shail Agrawal, kids' poem-Laura E. Richard.
कुंठाओं को ओढ़-बिछाकर अवसाद की कोठरी में छुप जाना, और अकर्मण्य बैठे-बैठे अलग-थलग जीवन निकाल देना , या फिर आक्रोश की चरस पर इतना बहकना कि सही-गलत का विवेक ही न रहे, सारी दुनिया ही दुश्मन लगे, हर व्यक्ति ही साज़िश करता सा लगे। और फिर सारी दुनिया से जंग का बिगुल बजा, अपने अस्तित्व और अस्मिता को भी तहस-नहस कर लेना..समाज से निष्कासित और विद्रोही, अपराधी जीवन व्यतीत करना, स्थितियाँ असहज और असंतुलित हैं; विशेषतः समाज और उसकी सदियों से चली आ रही पारंपरिक व्यवस्थाओं के लिए। विश्वास और मान्यताएं दोनों सूखे पत्तों सी झर रही हैं चारो तरफ। फूल खिलने से पहले ही चमन पर मानो पाला पड़ जाए, कुछ ऐसे ही घूमते जान पड़ते हैं प्रायः कई। खुद से, समाज से लड़ते... सफलता और असफलता की दुरूह परिस्थितियों के बीच त्रिशंकु से लटके, आधारहीन और भ्रमित। अखबार, टी.वी., घर परिवार कोने -कोने से आती आवाजें और अक्षर-अक्षर प्रायः अन्यायी, स्वार्थी, रुग्ण और असंतुष्ट कहानियाँ ही कहते दिखते हैं। कैसे ला सकते हैं खुद से बाहर इन्हें हम? बदलाव कहाँ से शुरु हो...भीतर से या बाहर से ? किसकी जिम्मेदारी है यह...व्यक्ति की या समाज की ? क्या है साहित्य का उद्देश्य और क्या होना चाहिए इसका योगदान-कई-कई अनुत्तरित सवाल हैं, जो बारबार पूछे जाते हैं और निरुत्तर मूक दम तोड़ देते हैं। पहेली की अगली कड़ी केन्द्र में लाने का छोटा -सा प्रयास है लेखनी का जून का अंक।
बाह्य परिस्थितियों का दबाव, अन्धी महत्वाकांक्षा ...जो खुद से बाहर निकलने ही नहीं देती, इन सभी का हाथ होता है इन संक्रामक परिस्थितियों में। आज की इस बदलती पीढ़ी की कुंठा ग्रस्त जीवन-शैली के इन यक्ष प्रश्नों का हल तो दूर, यदि मात्र इन्हें समझना भी चाहें हम, तो खुद से बाहर आना ही होगा , और खुद को परिवार और समाज की एक कड़ी समझकर सबकुछ परखना और जांचना होगा। व्यक्तिगत स्वतंत्रता की विरोधी नहीं हूँ, परन्तु स्वतंत्रता कितनी बड़ी जिमेमेदारी है...बिना इसका अर्थ और उत्तरदायित्व जाने-समझे यह निर्वाह आसान नहीं। कथनी और करनी में फर्क के साथ विश्वास नहीं जीता जा सकता, अपना नहीं बनाया जा सकता। गांधी जी को याद करें तो जैसे शेर बने बिना अहिंसा व्रत पूरा नहीं हो सकता क्योंकि चूहे के बस की नहीं यह। यही बात हर प्रसंग में लागू है। समझना होगा कि हर रिश्ते हर व्यवहार की एक संतुलित सीमा रेखा होती है, जिसका उल्लंघन असंतोष ही देगा। समझनी होगी, महाभारत कालीन राजा पुरु की वह पितृभक्त मानसिकता और मजबूरी, जो अपने पिता ययाति को अपना यौवन दे उनका बुढ़ापा ओढ़ लेता है। या फिर धृतराष्ट्र की अन्धी ममता और दुर्योधन की महत्वांकांक्षाओं की दिन दूनी रात चौगुनी बढती जहर बेल, जो आसपास का सबकुछ घोटती-ढकती दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ती ही जाती है... उसे खुद से बाहर निकलने ही नहीं देती है। हर आज को गुजरे कल ने ही बनाया है यह मानना ही पड़ेगा। पुरु और दुर्योधन दोनों की ही परिस्थितियाँ असाधारण भी थीं और खतरनाक भी ।
आज के समाज में भी आम है यह, यह बात दूसरी है कि आज पुरु नहीं के बराबर ही दिखेंगे और ययाति बहुत ज्यादा, क्योंकि आज के समाज की सोच से त्याग और संयम जैसे शब्द लुप्तप्राय से ही हैं और इच्छाएं मानो बेलगाम घोड़े । यही वजह है कि उदासी की बीमारी आज कैंसर और एड्स से भी ज्यादा घातक रूप ले चुकी है और वजह एक ही समझ में आती है कि कोई खुद से बाहर नहीं निकल पाता , न युवा न वयस्क। आंखों पर बंधी ‘मैं’ की पट्टी कुछ देखने और समझने ही नहीं देती। किसी से जुड़ने ही नहीं देती , न अपनों से, न बाहर वालों से!
अभिलाषाओं की करवट फिर सुप्त व्यथा का जगना सुख का सपना हो जाना भींगी पलकों का लगना।
जयशंकर प्रसाद विलक्षण कवियों में से एक हैं, सोजभरे मन की उद्दाम हलचल और सुकुमार अहसासों की तीव्रता जो इनके कालजयी काव्य में बिम्ब-प्रतिबिम्ब परिलक्षित होती है, अन्यत्र दुर्लभ-सी ही है। भावानुरूप शब्द अपने अर्थ और ध्वनियों के साथ मन और मस्तिष्क दोनों में ही धंसते जाते हैं।
झंझा झकोर गर्जन था बिजली थी सी नीरदमाला, पाकर इस शून्य हृदय को सबने आ डेरा डाला।
कविता हो या जीवन यह बेचैनी और परवशता ही तो उसे धार देती है...यही तो हार की दो लड़ियाँ हैं और यह हार असमर्थता या निराशा का पर्याय। माना दुख और पीर सुन्दर है...कवि और कलाकारों की नजरों में तो बहुत ज्यादा। क्योंकि एक ऐसी कोमल और करुण भावना है, जो मानव को अपनी क्षुद्रता का अहसास दिलाकर, पल भर में ही विराट से जोड़ देती है। प्रीत और पीर आती-जाती सांसों-सी साथ चलती दो सहेलियाँ हैं, जो जीवन की विलोम और अनुलोम दोनों हैं। अहसास की हथेलियों पर ये बारीबारी से अपनी-अपनी मेंहदी रचाती . और मनमाने बेल-बूटे काढ़ती हैं, जीवन को नए-नए रंग देती रहती हैं ।
पर जिन्दगी मात्र एक रंगरूप का गुलदस्ता तो नहीं , जहाँ सब सुन्दर ही सुन्दर हो, उचित ही हो और यहीं पर उदासी का जन्म होता है। कवि, चित्रकार और कलाकार सभी ने इस पीड़ा या इस उदासी को, मन की इस अनमयस्कता और उन्मनता को भांति-भांति से और मनमोहक रूपों में उकेरा है। कुंवर बेचैन जी ने तो अपनी एक वन्दना में , जहां मां शारदे से अपनी प्रीत की गोद सदा हरी रहने की प्रार्थना की है वहीं कहीं उनकी पीर बांझ न रह जाए-इसपर मां दृष्टि रखें, यह तक मांग कर डाली है। क्योंकि यह पीर ही तो है जो हमें थमना और परखना सिखाती है, आसपास से कटना ही नहीं, जुड़ना भी सिखाती है। पीर ही करुणा और प्रीत से लबालब होकर, साहित्य ही नहीं सृष्टि तक का सृजन करती है। यही तो सृजन प्रसूता है, बात चाहे हम कीट्स की कर रहे हों या तुलसी की, शेक्सपियर की कर रहे हों या शैली की। विरह की पीड़ा से पीड़ित कोयल ही मीठा गा पाती है और हंस का भी अंतिम गान ही सबसे सुन्दर और हृदयविदारक होता है। यह पीर ही तो है जो उसके पैरों की कुरूपता के यथार्थ से परिचय कराकर मोर के भावविभोर नृत्य का चरमोत्कर्ष आंसुओं में करती है ।
अक्सर सोचती हूँ कि कौन ज्यादा ताकतवर है मस्तिष्क या मन...और अधिकांशतः मन का ही पलड़ा भारी पाती हूँ। यह मन ही तो है जो मानव को रेशे-रेशे उलझा और बिखरा सकता है। और यह मन ही तो है जिसके दृढ़ संकल्प पर मानव असाध्य को भी साध ले जाता है। पर क्या मनुष्य जो एक सामाजिक प्राणी है, मन के एकान्त टापू पर बैठा मनमाना जीवन यापन कर सकता है?
आज जब आकांक्षा और लिप्सा दोनों ही असीम होती जा रही हैं और प्यार व परिवार जैसे मीठे शब्द अपनी मधुरता खोते जा रहे हैं, यह मन ही तो है जो हर पीड़ा , हर ग्रन्थि को सहने और सुलझाने के प्रयास में व्याधियों का गढ़ बनता जा रहा है। यह मन ही तो है जो पहले उलझता और टूटता है फिर शरीर ही नहीं आत्मा तक को हरा व थका देता है। अभावों से अवगत करा देता है। ताकत ही नहीं, अपने अधूरेपन अपनी कुरूपता को भी पहचानता है यह। अपनी पीड़ा से अवगत है यह। पीणा, जो कण-कण में व्याप्त है , आश्चर्य नहीं इसे सृजन का सबसे सुन्दर पल कहा गया है। रोमान्टिसिज्म और छायावाद जैसी स्वप्निल, रहस्यमय. और भटकती संज्ञाएं दी गईं हैं। भुलावा पीर के लिए जरूरी है तो दिशा और दृष्टि सृजन व जीवन के लिए। कड़ी धूप और भटकती बदली दोनों का ही अपना अपना...एक सार्थक प्रयोजन है।
वैसे भी, खुली आंखों से देखें या बन्द से, डूब कर देखें या दूर किनारे की सुरक्षा से , असफलता , अतृप्ति और असमर्थता अक्सर एक द्वन्द्व फिर क्रोध, ग्लानि और हीन भावना या गहन उदासी को ही जन्म देती है। यही वजह है कि आज जब महत्वाकांक्षा और स्पर्धा द्रौपदी का चीर बन गई है आज के समाज में, तो उदासी एक बड़ी महामारी बनकर सामने आ रही है । आजका मानव स्वस्थ रहने के लिए तरह तरह के प्रयास और प्रयोग कर रहा है। मनोरंजन व्यापार दुनिया का सबसे लाभप्रद व्यापार है आज। हंसना भी वह योग की तरह ही करने लगा है क्योंकि सच कहा जाए तो हंसना भूल चुका है वह। उसे पता नहीं है कि उसकी जटिल दिनचर्या में पुनः दिनभर हँसने का मौका मिलेगा भी या नहीं ?
जैसे खुशबू का बिखरना तो अच्छा लगता है पर उसे वापस समेटा नहीं जा सकता , वैसे ही टूटे और उदास मन को पुनः स्वस्थ कर पाना इतना आसान नहीं। कुंठा बनकर यह शरीर को व्याधिग्रस्त करे उससे तो अच्छा है कि शब्दों रंगों और सुरों के माध्यम से सबकुछ बह जाए...पलकों की अटारी चढ़कर एक-एक क्रुद्ध और हताश आंसू आत्महत्या कर लें और आदमी धुनने व बिखरने से बच जाए...
..चयन, निर्वाह और समझौता पीर के भी अंतिम सोपान हैं और जीवन के भी और साहित्य जीवन की ही तो प्रतिछाया है,....
कैथारसिस कहिए या कला ...प्रस्तुत है लेखनी का पीर या व्यथा से ओतप्रोत जून माह का अंक...पीर जो असहाय मानव को उसकी निर्बलता का एहसास दिलाकर विनम्र बनाती है । विषमताओं और दुःखों को ललकार कर उनकी आँखों में घूरने का साहस देती है। ग्लानि, पश्चाताप और लज्जा से मन को निर्मल करती है और क्रोध व आवेश में बदल जाए तो बगावत करने तक में नहीं हिचकिचाती। पीर या पीड़ा, जो जीवन बगिया को तहस-नहस करने की सामर्थ रखती है, और सबसे नाजुक, सबसे खूबसूरत रंग भरने का भी। क्या यही लक्ष्य और उद्देश्य नहीं साहित्य और कला के भी...मानव को खुद से बाहर लाना, उसकी खुद से और उसके आसपास से पहचान कराना, उसके नियम और परिस्थितियों से अवगत् कराना ?
जून के महीने में यहां पिता दिवस मनाने का रिवाज है। जिन परम्पराओं और कड़ियों का दिन –प्रतिदिन ह्रास होता जा रहा है उन्हें त्योहार और उत्सव की तरह मनाकर समाज उन्हें जिन्दा रखने का प्रयास करता है। उम्मीद ही नहीं विश्वास है कि अभी हमारी चेतना का इतना अधोपतन नहीं हुआ है कि हम माता-पिता जैसे शब्दों को ही भूल जाएँ और जानवरों की तरह पूर्णतः बन्धन हीन रहने लगें।
खैर....हैप्पी फादर्स डे !!
माँ, बाप, बच्चे परिवार की यह सुखद परम्परा अपनी सभी मानवीय संवेदनाओं के साथ सदैव जीवित रहे। इन्ही शुभकामनाओं के साथ,
उदय-अस्त में सुख की दुःख की कभी कमल ने बात नहीं की कभी पतिंगे ने रो-रोकर पूरी अपनी रात नहीं की कभी सूर्य के आ जाने पर तारों ने क्या आंसू ढाले वज्राहत होकर क्या बादल ने सुख की बरसात नहीं की
फिर ऐसा क्यों हुआ कि पगले तू अपना परिहास करेगा तू अपने सुख का या दुःख का शब्दों में इतिहास कहेगा ?
मैं क्या करूंगा
हवा वैसाख की राशि राशि पत्ते पेडो के नीचे के राशि राशि झरे बिखरे सूखे फूल लेकर चलेगी चल देगी
मुझको तो यह भी मयस्सर नही है मैं क्या करूंगा वैसाख की दुपहरिया में झरिया खनाती हुयी कोई बेटी भी नही दिखेगी जब नदिया के तीर पर
मैं क्या लेकर उडूँगा प्राणो में देय क्या भरूंगा मैं शब्दो के दोने में अकर्मठ बुढापे सा दुबका रहूँगा क्या कोने में
तन के मन के विस्तृत गगन के ओर छोर ढांकने की इच्छा मेरी आषाढ के मेघ की तरह नही
तो क्या वैसाख जेठ की धूल की तरह भी पूरी नही होगी राशि राशि झरे बिखरे सूखे फूल लेकर बहेगी हवा वैसाख की
मैं क्या करूंगा।
सन्नाटा
तो पहले अपना नाम बता दूँ तुमको, फिर चुपके चुपके धाम बता दूँ तुमको तुम चौंक नहीं पड़ना, यदि धीमे धीमे मैं अपना कोई काम बता दूँ तुमको।
कुछ लोग भ्रान्तिवश मुझे शान्ति कहते हैं, निस्तब्ध बताते हैं, कुछ चुप रहते हैं मैं शांत नहीं निस्तब्ध नहीं, फिर क्या हूँ मैं मौन नहीं हूँ, मुझमें स्वर बहते हैं।
कभी कभी कुछ मुझमें चल जाता है, कभी कभी कुछ मुझमें जल जाता है जो चलता है, वह शायद है मेंढक हो, वह जुगनू है, जो तुमको छल जाता है।
मैं सन्नाटा हूँ, फिर भी बोल रहा हूँ, मैं शान्त बहुत हूँ, फिर भी डोल रहा हूँ यह सर सर यह खड़ खड़ सब मेरी है है यह रहस्य मैं इसको खोल रहा हूँ।
घाटी में था तो शिखर सुन्दर दिखता था शिखर पर पहुंचा तो बहुत सुन्दर दिख रही घाटी।
अपने से बाहर जहां से भी देखो दूसरा ही सुन्दर दिखता है।
अधःपतन
इतने बड़े अध:पतन की ख़ुशी उन आँखों में देखी जा सकती है जो टंगी हुई हैं झरने पर ऊँचाई हासिल करके झरने की तरह गिरना हो सके तो हो जाए गिरना और मरना भी नदी हो जाए जीवन फिर चल पड़े मज़ा आ जाए
जितना मैं निम्नगा होऊंगा और और नीचे वालों की ओर चलता चला जाऊंगा उतना मैं अन्त में समुद्र के पास होऊंगा जनसमुद्र के पास
एक दिन मैं अपार समुद्र से उठता बादल होऊंगा बरसता पहाड़ों पर, मैदानों में तब मैं अपनी कोई ऊँचाई पा सकूंगा उजली गिरावट वाली दुर्लभ ऊँचाई
कोई गिरना, गिरने को भी इतना उज्ज्वल बना दे जैसे झरना पानी को दूधिया बना देता है।
अपने अन्दर से बाहर आ जाओ
हर चीज़ यहां किसी न किसी के अन्दर है हर भीतर जैसे बाहर के अन्दर है फैल कर भी सारा का सारा बाहर ब्रह्मांड के अन्दर है बाहर सुन्दर है क्योंकि वह किसी के अन्दर है
मैं सारे अन्दर - बाहर का एक छोटा सा मॉडल हूं दिखते - अदिखते प्रतिबिम्बों से बना अबिम्बित जिस में किसी नए बिम्ब की संभावना सा ज़्यादा सुन्दर है भीतर से ज़्यादा बाहर सुन्दर है क्योंकि वह ब्रह्मांड के अन्दर है
भविष्य के भीतर हूं मैं जिसका प्रसार बाहर है बाहर देखने की मेरी इच्छा की यह बड़ी इच्छा है कि जो भी बाहर है वह किसी के अन्दर है तभी वह संभला हुआ तभी वह सुन्दर है
तुम अपने बाहर को अन्दर जानकर अपने अन्दर से बाहर आ जाओ।
शायद मेरी बात से तुम सहमत होगे, अगर मैं कहूँ कि साहित्य का उद्देश्य है - खुद अपने को जानने में इंसान की मदद करना, उसके आत्मविश्वास को दृढ़ बनाना और उसकी सच की खोज को सहारा देना, लोगों की अच्छाइयों का उद्घाटन करना और बुराइयों का उन्मूलन करना, लोगों के हृदय में हयादारी, गुस्सा और साहस पैदा करना, ऊँचे उद्देश्यों के लिए शक्ति बटोरने में उनकी मदद करना और सौंदर्य की पवित्र भावना से उनके जीवन को शुभ्र बनाना। तो यह है मेरी व्याख्या। जाहिर है कि यह व्याख्या एक खाका भर है और अधूरी है। तुम इसमें जीवन को परिष्कृत करने वाली दूसरी चीजें भी जोड़ सकते हो। लेकिन मुझे यह बताओ – क्या तुम इसे मानते हो?
एक समय था जब, यह धरती लेखनकला-विशारदों, जीवन और मानव-हृदय के अध्येताओं और ऐसे लोगों से आबाद थी, जो दुनिया को अच्छा बनाने की सर्वप्रथम आकांक्षा और मानव प्रकृति में गहरे विश्वास से अनुप्राणित थे। उन्होंने पुष्तकें लिखीं, जो कभी विस्मृति के गर्भ में विलीन नहीं होंगी, क्योंकि वे अमर सच्चाइयों को अंकित करती हैं और उनके पन्नों से कभी न मलिन होने वाला सौंदर्य प्रष्फुटित होता है। उनमें चित्रित पात्र जीवन के सच्चे पात्र हैं, क्योंकि प्रेरणा ने उनमें जान फूंकी है। इन पुष्तकों में साहस है, दहकता हुआ गुस्सा है और उन्मुक्त तथा सच्चा प्रेम है। उनमें एक भी शब्द भर्ती का नहीं है। तुमने मैं जानता हूँ, ऐसी ही पुष्तकों से अपनी आत्मा के लिए पोषण गृहण किया है। फिर भी तुम्हारी आत्मा उसे पचा नहीं सकी। इसलिए सत्य और प्रेम के बारे में तुम जो लिखते हो, वह झूठा और अनुभूतिशून्य प्रतीत होता है। लगता है, जैसे शब्द जबर्दस्ती मुँह से निकाले जा रहे हों। चांद की तरह तुम दूसरे की रोशनी से चमकते हो, और वह रोशनी भी बुरी तरह मलिन है- वह परछाइयाँ तो खूब डालती हैं, लेकिन आलोक कम देती है, और गर्मी तो उसमें जरा भी नहीं है। तुम खुद इतने गरीब हो कि दूसरों को कोई ऐसी चीज नहीं दे सकते, जो वस्तुतः मूल्यवान हो। और जब तुम देते भी हो, तो सर्वोच्च संतोष की इस सजग अनुभूति के शाथ नहीं कि तुमने सुंदर विचारों और शब्दों की निधि में वृद्धि करके जीवन के सांयोगिक सत्य को अत्यंत आवश्यक घटना मानकर उसे ऊँचे सिंहासन पर बैठाने के लिए। तुम केवल इस लिए देते हो कि जीवन और लोगों से अधिकाधिक ले सकते। तुम इतने गरीब हो कि उपहार नहीं दे सकते। तुम सूदखोर हो और अनुभव के टुकड़ों का लेनदेन करते हो, ताकि तुम ख्याति के रूप में सूद बटोर सको। तुम्हारी लेखनी चीजों की सतह को ही खरोंचती है। जीवन की तुच्छ परिस्थियों को तुम बेकार ही कुरेदते कोंचते हो। और चूँकि तुम साधारण लोगों के साधारण भावों का वर्णन करते हो, इसलिए हो सकता है कि तुम उन्हें अनेक साधारण-महत्वहीन-सच्चाइयाँ सिखाते हो। लेकिन क्या तुम, नाम मात्र को ही सही, ऐसे भरम की भी रचना कर सकते हो, जो मानव की आत्मा को ऊँचा उठाने की क्षमता रखता हो ? नहीं, तो क्या तुम सचमुच इस बात को इतना महत्वपूर्ण समझते हो कि सभी जगह छितरे पड़े कूड़े के ढेरों को कुरेदा जाये, जहाँ सत्य के काले टुकड़ों के सिवा और कुछ नहीं मिलता, और सिद्ध किया जाये कि इंसान बुरा, मूर्ख और सम्मान कीभावना से बेखबर है? या यह कि वह पूर्णतया और हमेशा के लिए बाह्य परिस्थितियों का गुलाम है और यह कि वह कमजोर, दयनीय और एकदम अकेला है? अगर तुम मुझसे पूछो, तो वे इंसान के दिल में यह विश्वास जमाने में सफल भी हो चुके हैं कि वास्तव में ऐसा ही है। तुम्ही देखो कि इंसान का दिमाग आज कितना ठस हो गया है और उसकी आत्मा के तार कितने बेआवाज हो गए हैं। यह कोई अचरज की बात नहीं है। वह अपने-आपको उसी रूप में देखता है, जैसा कि वह पुष्तकों में पेश किया जाता है...और पुष्तकें खास तौर से प्रतिभा का भ्रम पैदा करने वाली वाक् चपलता से लिखी हुई पुष्तकें फाठकों को हत्बुद्धि कर एक हद तक उन्हें अपने वश में कर लेती है। पुष्तक में अपने को देखते समय- जैसा कि तुम उसे पेश करते हो- उसे अपना भौंडापन तो नजर आता है, लेकिन यह नजर नहीं आता कि उसके सुधार की भी कोई संभावना हो सकती है। क्या तुम में इस संभावना को उभार कर सामने लाने की क्षमता है? लेकिन यह तुम कैसे कर सकते हो, जबकि खुद तुम... जाने दो, मैं तुम्हारी भावनाओं को चोट नहीं पहुँचाऊँगा, क्योंकि मेरी बात को काटने या अपने-आपको सही ठहराने की कोशिश किए बिना तुम मेरी बात सुन रहे हो। यह अच्छा भी है, क्योंकि एक शिक्षक में अगर ईमानदारी है, तो वह हमेशा एक अच्छा- ध्यान से सुनने वाला छात्र होगा। आजकल तुम सब शिक्षक, लोगों को सीख देने वाले लोग, जनता को उतना देते नहीं, जितना उनसे लेते हो। कारण कि तुम केवल उनकी कमजोरियों का ही जिक्र करते हो। कमजोरियों के सिवा और कुछ उनमें नहीं देखते। लेकिन निश्चय ही आदमी में गुण भी होते हैं। खुद तुममें नहीं हैं क्या? तुम? सच पूछो, तो क्या तुम खुद उन बेरंग लोगों से किसी माने में भिन्न हो, जिनका तुम इतना कुरेद-कुरेद कर और इतनी निर्ममता से चित्रण करते हो ? तुम अपने-आपको मसीहा के रूप में देखते हो। समझते हो कि ईश्वर ने तुम्हें इस दुनिया में भेजा है, ताकि अच्छाइयों की विजय हो। लेकिन बुराइयों को अच्छाइयों से छाँटते समय क्या तुमने यह नहीं देखा कि ये दोनों चीजें काले और सफेद धागों की तरह एक-दूसरे से उलझी हुई हैं, इसलिए काली और सफेद न रहकर धूसर बन गई हैं। दोनों ने एक-दूसरे के रंग पर अपना असर डाला है। अगर ऐसा होता, तो इसके लिए वह तुमसे कहीं ज्यादा मजबूत इंसानों को चुनता। उनके हृदयों में जीवन, सद्य और लोगों के प्रति गहरे प्रेम की जोत जगाता, ताकि वे अंधकार में उसके गौरव और शक्ति का उद्घोष करने वाली मशालों की तरह आलोक फैलायें। शैतान की मोहर दागने वाली छड़ की तरह धुआँ लोगों के दिल और दिमागों में सरसराता हुआ उन्हें आत्मविश्वासहीनता के भावों से भर देता है। मुझे यह बताओ, तुम क्या सीख देते हो ?
इसलिए तुमने और तुम्हारी जाति के अन्य लोगों ने जो कुछ भी लिखा है, उस सबका एक सचेत पाठक, मैं तुमसे पूछता हूँ- तुम क्यों लिखते हो ? संयोगवश तुमने काफी लिखा है। क्या इसलिए कि लोगों के हृदयों में अच्छी भावनाएँ जागृत हों? लेकिन अपने ठंडे और खोए शब्दों से तुम कभी सा नहीं कर सकोगे। केवल इतना ही नहीं कि तुम जीवन में की नी वृद्धि करने में असमर्थ हो, बल्कि पुराने को भी तुम इतनी मुड़ी-तुड़ी शक्ल में पेश करते हो कि सुस्पष्ट चित्र कहीं उभर कर नहीं आते। तुम्हारी कृतियाँ कुछ नहीं सिखातीं और पाठक सिवाय तुम्हारे और किसी चीज पर शर्म महसूस नहीं करता। तुम्हारी कृतियों की हर चीज आम साधारण है- आम-साधारण लोग, आम-साधारण विचार, आम साधारण घटनाएँ। आत्मा के विद्रोह और आत्मा के पुनर्जागरण की आवश्यकता के बारे में लोग कब बोलना शुरु करेंगे? रचनात्मक जीवन की वह ललकार कहाँ है, वीरता के दृष्टाँत और प्रोत्साहन के वे शब्द कहाँ हैं, जिन्हें सुनकर आत्मा आकाश की ऊँचाइयों को छूती है?
शायद तुम कहो- जो कुछ हम पेश करते हैं, उसके सिवा जीवन में अन्य नमूने मिलते कहाँ हैं? न, ऐसी बात मुँह से न निकालना। यह सजा और अपमान की बात है कि वह, जिसे भगवान ने लिखने की शक्ति प्रदान की है , जीवन के सम्मुख अपनी पंगुता और उससे ऊपर उठने में अपनी असमर्थता को स्वीकार करे। अगर तुम्हारा स्तर भी वही है, जो जीवन का, अगर तुम्हारी कल्पना ऐसे नमूनों की रचना नहीं कर सकती, जो जीवन में मौजूद न रहते हुए भी उसे सुधारने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, तब तुम्हारा कृतित्व किस मर्ज की दवा है? और तुम्हारे धँधे की क्या सार्थकता रह जाती है? लोगों के दिमागों को उनके घटनाविहीन जीवन के फोटोग्राफिक चित्रों का गोदाम बनाते समय अपने दिल पर हाथ रखकर पूछो कि ऐसा करके क्या तुम नुकसान नहीं पहुँचा रहे हो? कारण – और तुम्हें अब यह तुरंत स्वीकार कर लेना चाहिए – कि तुम जीवन का ऐसा चित्र पेश करने का ढंग नहीं जानते, जो लज्जा की एक प्रतिशोधपूर्ण चेतना को जन्म दे, जीवन के नये रूपों की रचना करने की प्रज्वलित आकांक्षा को उजागर करे। क्या तुम जीवन की नब्ज को तेज और उसमें स्फूर्ति का संचार करना जानते हो, जैसा कि अन्य लोग कर चुके हैं?
एक बात और। क्या तुम ऐसे आल्हादपूर्ण हास्य की रचना कर सकते हो, जो आत्मा का सारा मैल धो डाले? देखो न, लोग एकदम भूल गए हैं कि ठीक ढंग से कैसे हँसा जाता है । वे कुत्सा से हँसते हैं, वे कमीनेपन से हँसते हैं, वे अक्सर अपने आँसुओं को बेधकर हँसते हैं। वे हृदय के उस समूचे उल्लास से कभी नहीं हँसते, जिससे वयस्कों के पेट में बल पड़ जाते हैं और पसलियाँ बोलने लगती हैं। अच्छी हँसी एक स्वास्थप्रद चीज है। यह अत्यंत आवश्यक है कि लोग हँसें। आखिर हँसने की क्षमता उन गिनी-चुनी चीजों में से एक है, जो मनुष्य को पशु से अलग करती है। यह समझने की कोशिश करो कि सीख देने का तुम्हारा अघिकार उन सच्चे भावों को जागृत करने की तुम्हारी क्षमता पर निर्भर करता है, जो – हथौड़ों की चोटों की तरह – जीवन को सीमित करने वाले पुराने रूपों को चकनाचूर और नष्ट कर दें, ताकि अधिक प्रशस्त रूपों को चकनाचूर और नष्ट कर दें, ताकि अधिक प्रशस्त रूपों का निर्माण किया जा सके। गुस्सा, घृणा, साहस, लज्जा, चिढ़ और, सबसे अंत में विक्षुब्ध निराशा – ये ऐसे अस्त्र हैं, जिनके द्वारा इस धरती पर कोई भी चीज नष्ट की जा सकती है। क्या तुम ऐसे अस्त्रों की रचना कर सकते हो? क्या तुम उनसे काम लेना जानते हो? तुम्हें अपने हृदय में मनुष्य की कमजोरियों के लिए महान घृणा का या साधारण मनुष्य के लिए महान प्रेम का – उसके दुखों की आग में जनमें प्रेम का – पोषण करना चाहिए। तभी तुम लोगों को संबोधित करने के अधिकारी बन सकोगे। अगर तुम इन दोनों में से न इसका अनुभव करते हो और न उसका, तो सिर नीचा रखो और कुछ कहने से पहले सौ बार सोचो।
सब कुछ के बावजूद जीवन पहले से अधिक प्रशस्त और अधिक गहरा होता जा रहा है, लेकिन यह बढ़त धीमी गति से हो रही है। कारण कि इस गति को तेज बनाने योग्य न तो तुम्हारे पास शक्ति है, न ज्ञान है। जीव बढ़ रहा है और लोग दिन-प्रतिदिन अधिक और अधिक जानना चाहते हैं। अधिक और अधिक पूछताछ करना चाहते हैं। उनके सवालों के जवाब कौन दे? यह तुम्हारा काम है – तुम्हारे जैसे लोगों का, जो अपने-आप मसीहा बन बैठे हैं। लेकिन क्या तुम जीवन में इतने गहरे पैठे हो कि उसे दूसरों के सामने खोल कर रख सको ? क्या तुम जानते हो कि समय की माँग क्या है? क्या तुम्हें भविष्य की जानकारी है और क्या तुम अपने शब्दों से उस आदमी में नयी जान फूँक सकते हो, जिसे जीवन की नीचता ने भ्रष्ट और निराश कर दिया है? उसका हृदय पस्त है, जीवन की कोई उमंग उसमें नहीं है। भला जीवन बिताने की आकांक्षा तक को उसने बिदा कर दिया है और अब वह सिर्फ सूअर की तरह जीवन बिताना चाहता है। ह्रासग्रस्त वह हड्डियों का एक पुंज बन गया है, जो मांस और मोटी चमड़ी से ढँका है। और हड्डियों का वह पुंज आत्मा से नहीं, बल्कि लालसा से – वासना से – हिलता-डुलता है। उसे तुम्हारी बेहद जरूरत है। जल्दी करो और इससे पहले कि उसका मानवीय रूप अंतिम रूप से उससे विदा हो जाये, उसे जीने का ढंग बताओ। लेकिन तुम किस प्रकार उसमें जीवन की चाह जगा सकते हो, जबकि तुम खुद बुदबुदाने और भुनभुनाने और रोने-झींकने या उसके पतन की एक निष्क्रीय तस्बीर खींचने के सिवा और कुछ नहीं करते ? ह्रास की गंध धरती को घेरे है, लोगों के हृदयों में कायरता और दासता समा गयी है, काहिलों की नरम जंजीरों ने उनके दिमागों और हाथों को जकड़ लिया है। इस घिनौने जंजाल को तोड़ने के लिए तुम क्या करते हो? तुम कितने छिछले और कितने नगण्य हो, और कितनी बड़ी संख्या है तुम जैसे लोगों की। काश कि एक भी ऐसी आत्मा का उदय हुआ होता – कठोर और प्रेम में पगी आत्मा का उदय – जो मशाल की तरह प्रकाश देने वाले हृदय और सर्वव्यापी महान मस्तिष्क से सज्जित होती। तब भविष्यवाणी शब्द घंटे की ध्वनि की भांति इस शर्मनाक खामोशी में गूंज उठते और शायद इन जीवित मुर्दों की घिनौनी आत्माओं में भी कुछ स्पंदन पैदा हो जाता...।
(कथन में प्रकाशित अनुदित कहानी के संपादित अंश से साभार)
साहित्य के क्षेत्र में कहानी का जन्म कब और कैसे हुआ, कुछ भी सठीक प्रमाण नहीं है। परन्तु साधारणतः आदि मानव के गोष्ठीबद्ध जीवन यापन के समय से ही कहानी का उद्भव हुआ, यह बात समालोचकों ने कही है। गोष्ठी-जीवन यापन में चित्तविनोद के लिए आदिमानव ने कुछ कहना शुरू किया होगा। हो सकता है कि कहीं इकट्ठे होकर आग जलाकर ठंड से अपने को बचाने के लिए बैठे हुए अपने बीच कथा का स्त्रोत फूट पड़ा होगा। अथवा राह पर चलते चलते पथ क्लांति को दूर करने के लिए कहानियाँ कही हुई होंगी। ये कहानियां कल्पना प्रसूत, हास्योद्दीपक या विस्मय घटनाओं को लेकर जन्मी होंगी साथ ही कल्पित कथाओं का जन्म इस तरह हो गया होगा। इसमें वास्तवता के बदले केवल झूठी जादूगरी कल्पना रही होगी। कहानी या कथा का उद्भव ऐसे होने पर भी समयानुसार सभ्यता के विकास के कारण कहानी की एक गुरुत्वपूर्ण भूमिका प्रत्यक्ष हुई है। सारी पृथ्वी में मानव समाज में विभिन्न रूप रंगों को लेकर कहानी का विस्तार हुआ होगा। इसका कोई निर्दिष्ट प्रमाण नहीं है। पर गण माध्यम से इसकी सृष्टि हुई है। गण इसका रसिक भोक्ता व स्त्रोता है, गण-समाज में इसकी प्रतिष्ठा है।
कथा से कथक गल्प से गल्पसागर की सृष्टि हुई। जब मानव समाज ने अनुभव किया कि हर व्यक्ति कहानी कह नहीं सकता, इसलिए चाहिए स्वतंत्र कला और स्वतंत्र शैली जिससे कई कहानीकारों ने यह भूमिका निभाई और यह भी उनकी जीविका बनी। लोक मुख से लोक कान तक कहानी की यात्रा होने लगी। और उस यात्रा की गति में भी इस के मूल रूप में परिवर्तन होता रहा। तब की कहानी में अधिक कल्पना और अधिक कथन रहते थे। इसकी विषयवस्तु भी यथार्थता हीन, अद्बुत और घटना प्रवाह होती थी। ऐसे में भी इससे आनन्द मिलता था। बच्चों से बूढ़ों तक सभी को आनन्द मिलता, इसलिए तो चित्तविनोदन ही इसका मूल लक्ष्य रहा है। इसके साथ इसमें प्रत्यक्ष रहे हैं नीति, उपदेश, धर्मभावना और जीवन की विभिन्न समस्याओं का समाधान। और इसमें भूत प्रेतों की कथा से लेकर विभिन्न पशु, पक्षी, साँप, मगर, राक्षस, देवता, अप्सरा, गन्धर्व आदि को लेकर कहानी का कलेवर पुष्ट होता था और इसमें वर्णित किसी भी विषय में असंभव का स्थान न था। ऐसी कहानी को लेकर सृष्टि हुई अप्सरी कथाएँ, परी कथाएँ, पशुपक्षी की कथाएँ, नीति मूलक कथाएँ आदि। इन कहानियों का नामकरण हुआ लोक कथा या लोक कहानी यानी Folk Tales।
मानव सभ्यता की जब उन्नति हुई, मानव ने उस समय लिपि का उद्भावन किया और लेखन शुरु किया जिसके द्वारा कहानी का रूप विकसित होने लगा। कब गद्य में तो कब पद्य में। वेद–वेदान्त की कहानी, बौद्ध जातक की कहानी, प्राकृत भाषा में गुणाढ्य की वृहतकथा, सस्कृत में पंचतंत्र, बेताल पंचविंशति, हितोपदेश, कादम्बरी आदि ग्रन्थ प्राचीन काल की कथा का परिचय देते आ रहे हैं। केवल भारत में नहीं, पृथ्वी के दूसरे देशों में भी कथा परंपरा देखने को मिलती है। बाइवल, एशप कहानी, पारस्य लोक-कथा, अरवरजनी की कहानी से उन सब देशों की प्राचीन कथा परंपरा का परिचय मिलता है। अंग्रेजी साहित्य में चौदहवीं शदी के चरस के द्वारा रचित क्यान्टरवरी टेल्स और इटाली साहित्य के बोकासिओ के द्वारा रचित डेकामेरन ने पाश्चात्य कथा परंपरा को छोड़कर नूतन कथा परंपरा की सृष्टि की। भारत में गद्य के साथ पद्य में अनेक कहानियाँ देखने को मिलती हैं। रामायण, महाभारत आदि विभिन्न पुराण इसके उदाहरण हैं।
ओड़िआ साहित्य का आद्य उन्मेष पन्द्रहवीं शदी के सारला युग में हुआ। सारला साहित्य कहानी का पद्यात्मक रूप है। बाद में अनेक पुराण लिखे गये। सोमनाथ व्रत कथा, रुद्र सुधानिधि, चतुरविनोद, प्रस्तावसिन्धु आदि कथा ग्रन्थ से कहानी का परिचय मिलता है। परन्तु ये सब क्षुद्र गल्प नहीं। कहानी या कथा आधुनिक क्षुद्र गल्प के लिए प्रयोग किया जाता है। कहानी का कला धर्म, स्वतंत्र; क्षुद्रगल्प का कलाधर्म भी स्वतंत्र है। कहानी प्राचीनयुग की संपत्ति। सरल जीवन की अभिव्यक्ति विश्वास का परिप्रकाश है। क्षुद्रगल्प जटिल जीवन का भाष्य – आधुनिक युग की संपत्ति है। इसलिए क्षुद्रगल्प कहानी की क्रम परिणति नहीं या कहानी का विवर्तित रूप भी नहीं। हो सकता है, क्षुद्रगल्प के अन्तराल में कहानी हो।
मध्य दिसम्बर का एक दिन . सुबह की खिली-खिली धूप और लॉन में पड़ी बेंचें . बेंचों पर बैठे कई चेहरे ..... धूप में नहाये चेहरे .... धूप सेकते चेहरे . खिड़की का पर्दा उन्होंने थोड़ा-सा खिसका दिया था , जिससे लॉन का दृश्य स्पष्ट दिख रहा था . उनकी नजर एक चेहरे पर टिक गयी और वह गौर से उसे देखते रहे . चेहरे पर उम्र की लकीरें स्पष्ट थीं . उन्होंने कुर्सी एक ओर खिसकाई और खिड़की पर जा खड़े हुए .... निर्निमेष उस चेहरे को देखते हुए .
'वही हैं ......लेकिन यहां क्यों ? ' मस्तिष्क में तंरगें दौड़ने लगीं . कुछ क्षण खिड़की पर खड़े रहकर वह कमरे में टहलने लगे सोचते हुए , 'मैं कैसे भूल सकता हूं उस चेहरे को . ढल गया है .... ढलना ही था . पचास से अधिक सालों की लंबी यात्रा .... पचीस साल जैसा कौन रहता है ! शरीर में स्थूलता भी है ....अपने को देखो तपिश .... तुम क्या उतने ही स्लिम-ट्रिम हो .... बढ़ती उम्र में सभी के आकार-प्रकार - चेहरे बदलते ही हैं ........'
वह एक बार पुन: खिड़की के पास जा खड़े हुए और देखने लगे. इस समय वह चेहरा किसी युवती से बातें कर रहा था . ...युवती , जो पचीस -छब्बीस के आसपास थी ....उस चेहरे से मिलता -सांवला चेहरा , नाक नोकीली , होंठ पतले और आंखें छोटीं . लंबाई भी उतनी ही .....वह भी तो उस युवती जितनी लंबी थीं , लेकिन तब उनके नितंब छूते बाल थे , जैसे कि उस युवती के हैं , लेकिन अब वह बॉब्ड थीं .
'निश्श्चित ही यह वही हैं .....' वह अपनी टेबल के चारों ओर कमरे में कुछ क्षण तक टहलते रहे , ' क्या उन्हें मेरे बारे में जानकारी नहीं ? या उनकी स्मृतिपटल से मेरा नाम सदा के लिए मिट चुका है . लेकिन ऐसा संभव नहीं . हम दो बार मिले थे .... कितने ही पत्र लिखे थे एक-दूसरे को .' वह पुन: खिड़की के पास जा खड़े हुए , 'यह मेरा भ्रम नहीं....यह वही हैं .'
दरवाजे पर दस्तक हुई .
''कम इन '' वह तेजी से पलटे और कुर्सी की ओर ऐसे बढ़े मानो चोरी करते हुए पकड़े जाने का भय था .
कॉलेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ0 प्रवीण राय ने आहिस्ता से प्रवेश किया .
''यस प्रवीण .... इज एवरीथिंग फाइन !''
''जी सर . एक्सपर्ट्स डॉ0 श्रेयांष तिवारी और डॉ0 निकिता सिंह आ गए हैं . ''
''और हेड साहब....डॉ0 सच्चिदानंद पाण्डे ?''
डॉ0 सच्चिदानंद पाण्डे विश्वविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष थे और विश्वविद्यालय या विश्वविद्यालय के किसी भी कॉलेज में शिक्षक के किसी भी पद के साक्षात्कार में उनका होना अनिवार्य था . यह विश्वविद्यालय का नियम था .
'' उनके पी.ए. का फोन आया था सर कि वह कुछ देर पहले ही कार्यालय से निकले हैं ......उन्हें पहुंचने में कम से कम आध घण्टा का समय लगेगा .''
''हुंह......'' कुछ सोचने के बाद वह बोले , '' हेड साहब के आने तक प्रतीक्षा करना होगा .... डॉ. तिवारी और डॉ. निकिता सिंह को मेरे यहां ले आओ.......''
''सर मैंने पहले ही उन्हें आपके यहां के लिए कहा था लेकिन दोनों सीधे गेस्ट रूम में जाते हुए बोले कि वहां उन्हें कोई कष्ट नहीं.....''
''ओ. के. ...'' प्रवीण राय को सामने कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए वह बैठ गए और बोले , ''इन दोनों की जोड़ी जहां भी जाती है अपने कंडीडेट के लिए दबाव बनाते है ....''क्षणभर चुप रहे , '' दरअसल हेड साहब सीधे व्यक्ति हैं ..... वह सब कुछ जानते हैं , लेकिन नहीं मालूम किन कारणों से प्राय: इन दोनों को एक साथ विशेषज्ञ के रूप में रिकमेण्ड कर देते हैं .''
''सर , मुझे जहां तक जानकारी है .... जब भी डॉ. तिवारी से पूछा जाता है विशेषज्ञ के रूप में किसी कॉलेज में जाने के लिए उनकी शर्त होती है कि उनके साथ दूसरा विशेषज्ञ डॉ. निकिता सिंह होंगी तभी.... विश्वविद्यालय में उनके खिलाफ जाने की शक्ति किसी में नहीं है . हिन्दी के प्रतिष्ठित आलोचक हैं ... . सत्ता में पैठ है और वी.सी. भी उन्हें मानते हैं .''
वह मुस्कराते रहे .
''सर , निकिता सिंह का कोई छात्र है ....सुना है .... उनके अडंर में पी-एच.डी. कर रहा है और 'नेट' भी उत्तीर्ण है .....हो सकता है .....''
उन्होंने प्रवीण की बात आधी-अधूरी सुनी . उस क्षण उनकी नजरें खिड़की से बाहर बेंच पर अखबार में झुके उस चेहरे पर टिकी हुई थीं . युवती अब वहां नहीं थी .
'युवती भी शायद अभ्यर्थी है .' उन्होंने सोचा .
''सर , फिर.....'' प्रवीण के टोकने से वह अचकचा गए .
''हुंह.....यह हो सकता है . लेकिन डॉ. तिवारी दो अपने रखते हैं तब कहीं एक वेकेंसी निकिता सिंह को देते हैं . ''
''सर ''.
''प्राय: महिला अभ्यर्थी ही उनकी कंडीडेट होती हैं . उनके अंडर में पी-एच.डी करने वाली सभी लड़कियां ही हैं ..... एकदम समाजवादी हैं डॉ. तिवारी . निकिता ने भी उनके अधीन पी-एच.डी की थी ..... उनके आलोचक इसे उनकी कमजारी मानते हैं तो मानते रहें . '' चुप होकर प्रवीण की ओर देखने के बाद वह खिड़की से बाहर लॉन की ओर देखने लगे . वह चेहरा उन्हें वहां नजर नहीं आया . 'कहां गई ? ' क्षणांश के लिए वह विचलित हुए , लेकिन तभी सामने बैठे उनकी ओर ताकते प्रवीण पर दृष्टि डाली और बोले , ''लेकिन हम क्या करें प्रवीण ?''
'' क्या सर ?''
''आपको बताया था .... मिनिस्ट्र्री से आए फोन के बारे में .... मंत्री जी किसी निरंजन प्रसाद में इंटरेस्टेड हैं .... मंत्री जी के मुंह लगे ज्वाइण्ट सेक्रेटरी का फोन था . दोनों ही बिहार के हैं . जे.एस. ने संकेत में यह भी कहा था कि निरंजन मंत्री जी का दूर का रिश्तेदार है .......''
''सर , हमें डॉ. तिवारी से पहले ही बात कर लेनी चाहिए और अपनी समस्या डॉ. पाण्डे को भी बता देना चाहिए .''
''प्रवीण , आप जानते हैं कि डॉ. तिवारी का कंडीडेट नहीं तो किसी का नहीं ......उन पर मंत्री-संत्री का प्रभाव नहीं पड़ने वाला ....... ''
''सर , वेकेंसी भी एक ही है....एडहॉक भी नहीं ....वर्ना डॉ. तिवारी के लिए एडहॉक का ऑफर दे सकते थे .''
''प्रवीण, '' वह कुछ गंभीर हो उठे , ''आपको नहीं लगता कि यह सब कितना अनफेयर है .... मंत्री के कंडीडेट की बात हो या डॉ. तिवारी या डा. निकिता की या किसी अन्य के कंडीडेट की .... जो अभ्यर्र्थी दूर से आते हैं और कितनी ही बार उन्हें दूर शहरों में असफल साक्षात्कार के लिए जाना होता है....... उनके विषय में सोचो . अधिकांश बेकार और साधारण हैसियत के युवक .... ये तिवारी या मंत्री जैसे घड़ियाल उनकी नौकरियां निगल जाते हैं .....'' उनका चेहरा लाल हो उठा .
''सर '' प्रवीण ने चुप रहना ही उचित समझा क्योंकि वह स्वयं भी सिफारिश से नियुक्त हुआ था . लेकिन वह जानता था कि उसके सामने बैठे डॉ0 तपिश .... उसके प्राचार्य एक मेरीटोरियस व्यक्ति थे और उन्होंने सिफारिश से नहीं अपनी योग्यता से प्राध्यापकी पायी थी और विश्वविद्यालय - कॉलेज की राजनीति के बावजूद वह इस पद पर पंहुचे थे ... अपनी योग्यता के बल पर ही .
'' डॉ. तिवारी और डॉ. निकिता सिंह के लिए जलपान की व्यवस्था .....'' अपनी बात अधूरी छोड़ दी उन्होंने .
''डॉ0 अनिरुध्द शुक्ल उनकी सेवा में हैं .'' प्रवीण बोले .
''ओ.के. ....'' उन्होंने पुन: लॉन की ओर देखा . बेंचों पर बैठे अन्य लोग भी इधर'उधर जा चुके थे .... केवल एक वृध्द पुरुष को छोड़कर .
''डॉ0 पाण्डे के आते ही मुझे सूचित करना . उनके आते ही इंटरव्यू प्रारंभ कर देना है..... तब तक आप डॉ0 तिवारी और डॉ0 निकिता सिंह का खयाल रखें ..... '' वह पुन: कुर्सी से उठ खड़े हुए और कमरे में टहलने लगे .
'लोग रिसेप्शन में बैठे होंगे ....धूप में गर्मी बढ़ गयी होगी . मुझे रिसेप्शन की ओर जाना चाहिए .'
'लेकिन क्यों ?'
'शायद वह वहां मिल जांए . '
'मिल भी जाती हैं तो क्या तुम उनसे बात कर सकते हो इस समय . वह लड़की उनकी बेटी होगी .... यह तो अनुमान लग ही गया है . एक अभ्यर्थी की मां से बात करना....तपिश तुम प्राचार्य हो इस कॉलेज के.....'
'प्राचार्य क्या इंसान नहीं ! उसके परिचितों के बच्चे साक्षात्कार में नहीं बैठ सकते ? बात कर लेने से ही मैं उनकी लड़की का फेवर करने लगूंगा ? मुझे उस लड़की का नाम भी मालूम नहीं .... जबकि मंत्री जी की तोप इन्हीं बच्चों के बीच कहीं समायी होगी .... तिवारी और निकिता सिंह की गन भी होगी कहीं ...... इण्टरव्यू करने उधर से जाते हुए मैं उन्हें भलीभांति देख सकूंगा ..... जरूरी नहीं कि वह मानसी ही हों .... हों भी तो वह मुझे पहचान लेंगी यह आवश्यक नहीं है .'
'फिर तुम उधर से जाना ही क्यों चाहते हो ?' अंदर से आवाज आयी . 'पहचान लिए जाने के लिए ही न ! लेकिन क्या बात मात्र इतनी ही है ! क्या यह सच नहीं कि उनके पहचानने से तुम्हारा आहत स्वाभिमान संतुष्ट होगा . तुम उन्हें यह अहसास नहीं करवाना चाहते कि तुम इस कॉलेज के प्रिसिंपल हो ?'
'नहीं , ऐसा नहीं है .....इतनी पुरानी बात ....तीस साल पुरानी ....मैं तो भूल ही गया था ..'
'नहीं तपिश....तुम उसे एक दिन ...बल्कि एक पल के लिए भी नहीं भूले....भूल सकते भी नहीं थे .... वह पुन: खिड़की पर खड़े हो गए और बाहर देखने लगे . लॉन की एक बेंच पर वही अकेला वृध्द व्यक्ति बैठा था और बेंच से कुछ हटकर एक कुत्ता अपना पेट , टांगें और मुंह ऊपर उठाये पीठ के बल निश्चल लेटा हुआ था . तभी दरवाजे पर नॉक हुआ .
''यस !'' वह पलटे .
'सर , हेड साहब आ गए हैं ....सीधे कांफ्रेंस रूम में .....आप भी......''
''ओ.के.'' अभ्यर्थियों के नामों का फोल्डर टेबल से उठा वह डॉ0 प्रवीण के पीछे हो लिए थे .
*******
उन दिनों वह दिल्ली में विदेश मंत्रालय में अनुवादक थे . अपने को पी-एच.डी. के लिए पंजीकृत करवाने में दो बार असफल हो चुके थे . यह उन दिनों की बात है जब दूसरी बार विश्वविद्यालय ने उनके शोध विषय को खारिज किया था . वह परेशान थे और यह बात मानसी को बताना चाहते थे . बताना इसलिए चाहते थे क्योंकि पिछली मुलाकात में मानसी ने पहले विषय के खारिज होने के कारणों पर गहरी रुचि प्रदर्शित की थी और उसके हर प्रश्न के उत्तर में उन्होंने एक ही बात कही थी कि विश्वविद्यालय ने विषय के खारिज होने का कोई कारण उन्हें नहीं बताया ....केवल सूचना भेजी थी . मानसी उद्विग्न थी और तब उन्होंने अनुभव किया था उनके शोध से शायद उसकी भविष्य की आकांक्षाएं जुड़ी हुई थीं . लेकिन ' संभव है यह मेरी अपनी सोच हो.... वह ऐसा न सोचती हो .' उन्होंने सोचा था . ' यदि शोध नहीं कर सके और प्राध्यापक नहीं बन पाए तो क्या . जो नौकरी वह कर रहे हैं .... उसका भविष्य प्राध्यापक जितना आकर्षक न सही लेकिन बुरा भी नहीं . डिप्टी डायरेक्टर तो वह बन ही जाएगें .'
'लेकिन मानसी को बताना आवयक है . पिछले एक वर्ष से कभी एक बहाने तो कभी दूसरे वह शादी टालती जा रही थी . वह दूरदर्शन में प्रोग्राम एक्ज्यूक्यूटिव थी और प्रारंभ में उसका बहाना था कि वह दिल्ली में थे और दिल्ली में उसका स्थानांतरण कठिन था क्योंकि वहां पहले से ही अतिरिक्त प्रोग्राम एक्ज्यूक्यूटिव्स बैठे हुए थे , जबकि उनका लखनऊ स्थानांतरण संभव नहीं था . मानसी के स्थानांतरण के विषय में वह कमलेश्वर जी से मिले थे . कमलेश्वर जी उन्हीं दिनों दूरदर्शन में अतिरिक्त महानिदेशक के पद पर नियुक्त हुए थे . मुस्कराते हुए कमलेश्वर जी ने कहा था , ''तपिश जी ..... यह बड़ा काम नहीं है . शादी करो....स्थानांतरण की जिम्मेदारी मेरी .'' कमलेश्वर जी ने उनकी आंखों में देखा , फिर मुस्कराये ....एक मीठी मुस्कान और बोले थे , ''भाई , पता कर लो ....आपकी मंगेतर की कोई दूसरी समस्या तो नहीं ....''
''ऐसा नहीं लगता सर....उसे दोनों के अलग-अलग शहरों मे रहने का भय ही सता रहा लगता है .''
''उन्हें बता दो कि मैंने आश्वस्त किया है ....''
कमलेश्वर जी की बात बताने के बाद मानसी ने खत में लिखा , ''तपिश , आपने पहले यह क्यों नहीं बताया था ... अब एक साल के लिए मैं बंध गई हूं . मैंने यहां विश्वविद्याालय में मार्निंग शिफ्ट में उर्दू सार्टीफिकेट कोर्स में प्रवेश ले लिया है . एक जमाने से मैं उर्दू सीखना चाहती रही हूं .... एक वर्ष की ही बात है .....कमलेश्वर जी तो अभी आए ही हैं .... अभी रहेगें ही ..... भले ही आई.ए.एस . लॉबी उनके खिलाफ है.......तो क्या आप एक वर्ष रुक नहीं सकते ?''
''मैं तो रुका हुआ हूं ही..... लेकिन मेरे घरवाले....उनका धैर्य चुका जा रहा है .'' उन्होंने मानसी को लिखा था .
''मैंने अपने डैडी से बात की है. वह आपके डैडी को मेरी समस्या से अवगत करवा देंगे .'' मानसी ने इस पत्र में आगे लिखा , ''समय निकालकर आकर मिल लें ......पत्रों में बातें हो नहीं पातीं .''
''कोशिश करूंगा .'' उन्होंने उसे लिख तो दिया था लेकिन लखनऊ जाने का प्रयास नहीं किया और न ही मानसी का उसके बाद कोई पत्र आया . शोध के अपने नये विषय की तैयारी और रूपरेखा प्रस्तुत करने की चिन्ता में वह इतना डूबे कि वह उसे पुन: पत्र लिख नहीं पाए . इस बार विषय प्रस्तुत करते ही निर्णायक समिति की बैठक हुई और उनका विषय पुन: खारिज कर दिया गया . विश्वविद्यालय का पत्र थामें वह कितनी ही देर तक यह सोचते रहे थे कि उन्हें मानसी को यह सूचना देना ही चाहिए . और उन्होंने उसे अंतर्देशीय पत्र लिख दिया था .
पन्द्रह दिन के अंदर ही उत्तर आया , ''आपका मिलना आवश्यक है . जितनी जल्दी संभव हो ....''
उन्होंने उसके ऑफिस के पते पर पत्र लिख दिया कि वह अमुक तिथि को अमुक ट्रेन से लखनऊ पहुंचेंगे....सुबह दस बजे उसके कार्यालय में मिलेंगे .''
''कार्यालय नहीं.....इंडियन कॉफी हाउस ....ग्यारह बजे .... मेरे कार्यालय के निकट ही है ....सुबह ग्यारह बजे ....मिस नहीं करेंगे .'' मानसी ने तुरंत लिख भेजा था .
******
निश्चित तिथि को ठीक ग्यारह बजे सुबह वह कॉफी हाउस में थे . पांच मिनट ही हुए थे उन्हें वहां पहुंचे कि उन्होंने एक युवक के साथ सड़क पार करते हुए मानसी को देखा . टेबल पर बैठने के लिए उन्होंने कुर्सी को हाथ लगाया ही था कि रुक गए और बाहर निकल आए . उनकी दृष्टि युवक पर टिकी हुई थी , मानसी जिससे हंसकर कुछ कह रही थी . युवक लंबा....पांच फीट आठ इंच के लगभग.....स्लिम ...गोरा ....एक वाक्य में ... सुन्दर था .
'ऑफिस का कोई कलीग होगा .' उन्होंने सोचा , 'कहीं जा रहा होगा .'
लेकिन युवक कहीं नहीं गया . मानसी के साथ रहा . मानसी ने दूर से ही उन्हें देख लिया था और उनकी ओर हाथ का इशारा कर कुछ कहा . उन्होंने मानसी के संकेत के बाद युवक को हंसते देखा था .
''सॉरी....मैं दस मिनट लेट हूं .'' उनके निकट पहुच मानसी बोली .
वह चुप रहे . उनकी नजरें युवक पर गड़ी थीं .
''ओह ! '' मानसी ने उनके भाव पढ़ लिए , ''यह हैं मनीष तिवारी ....आकाशवाणी में हैं ....प्रोग्रैम....''
''एक्ज्यूक्यूटिव....'' मानसी से शेष शब्द मनीष तिवारी ने झटक लिया और उनकी ओर हाथ बढ़ा बोला , ''आपसे मिलकर प्रसन्नता हुई .''
''थेैंक्स .'' मंद स्वर में वह बोले थे .
''मैं चलता हूं मानसी.....आफ्टरनून आकर केस डिस्कस कर लूंगा....नो हरी.....''
''अरे यार.....ऐसी भी क्या जल्दी है ! तपिश जी क्या सोचेगें ? एक कप कॉफी पीकर चले जाना '' मनीष की ओर देख मुस्कराती हुई मानसी बोली , ''अरे हम लोग यहीं खड़े रहेगें या बैठेगें भी .....'
''हां.....हां....क्यों नहीं ......'' और वह अंदर की ओर मुड़ गए तो मानसी और मनीष भी उनके पीछे हो लिए थे . जिस मेज पर वह बैठने जा रहे थे .... वह अभी भी खाली थी .
बैठने के बाद उनके बीच देर तक चुप्पी पसरी रही . चुप्पी को ताड़ती हुई मानसी ने पूछा ,
''कॉफी लेंगें ?''
''कॉफी हाउस में बैठे हैं तो वह तो लेना ही है........इस मुलाकात को यादगार भी तो बनाना है .'' उन्हें अपनी बात अटपटी लगी , लेकिन बात जुबान से रपट चुकी थी . संभालने का प्रयत्न करते हुए उन्होंने तत्काल जोड़ा , '' मनीष जी का साथ होने से इसे यादगार मुलाकात ही कहूंगा ....''
मनीष के चेहरे पर मुस्कान तिर गयी .
''हां , यह है . मनीष बहुत व्यस्त रहते हैं ....कभी पकड़ में नहीं आते . आकाशवाणी की नौकरी......नाटक लिखते हैं ....इनकी कई स्क्रिप्ट पर दूरदर्शन और आकाशवाणी ने नाटक तैयार किए हैं .''
''हुंह .'' उन्होंने मनीष की ओर पुन: हाथ बढ़ाया .''मेरा सौभाग्य . आप जैेसे कलाकार से मुलाकात का श्रेय मानसी जी को .... इनका भी आभार .''
''मानसी कुछ अधिक ही प्रशंसा कर रही हैं सर ! बस यूं ही कुछ उल्टा-सीधा लिख लेता हूें .''
''तपिश जी ......ये संकोच करते हैं .....''
''हर बड़ा कलाकार अपने बारे में बताने या बताए जाने पर संकोच प्रकट करता है . बड़प्पन की यही निशानी है . '' वह अब पूरी तरह खुल चुके थे .
''यू आर राइट तपिश जी .... मनीष जीनियस हैं , लेकिन मेैं जब कहती हूं तो यह चिड़चिड़ा जाते हैं .''
उन्होंने देखा अपने को 'जीनियस' कहे जाने पर मनीष का चेहरा खिल उठा था . वह चुप रहे . कुछ देर बाद मनीष बोला , ''मानसी की ज़र्रानवाजी सर .....लेकिन आप मुझे लेकर कोई गलतफहमी नहीं पालेंगे ..... मुझ जैसे कलाकार-लेखक गली-कूंचों में एक खोजेंगे -- अनेक मिल जाएगें ....''
''आपने देखा इनकी विनम्रता .'' तपिश की ओर देखते हुई मानसी बोली .
वह तब भी चुप रहे .
''यार मनीष , कुछ और तारीफ तभी करूंगी .... जब कुछ पी लूंगी .'' मानसी बोली .
''बेयरे को आवाज दो .....दो चक्कर काट गया और हम लोग बातों में लगे रहे .''
''जाकर आर्डर कर आता हूं .'' मनीष जाने के लिए उठा , दो कदम बेयरे की ओर बढ़ा , फिर रुककर उनसे पूछा ,'' तपिश जी कुछ और लेगें .''
''नो थैंक्स .''
******
कॉफी पीकर मनीष तिवारी चला गया .
''तपिश जी , आपको कहीं कोई दूसरा काम है ?'' मानसी ने पूछा .
वह अचकचा गए . सोचने लगे ,''इसने मुझे बुलाया और अब पूछ रही है कि.....''
कोई उत्तर दिए बिना वह मानसी की ओर देखने लगे थे .
''सॉरी ,मैंने यूं ही पूछा . कभी-कभी ऐसा होता है ... लेकिन ....'' आगे कुछ न बोल वह कभी बेयरे की ओर देखती ओैर कभी गेट की ओर .
तपिश को लगा कि शायद उसने किसी और को भी बुलाया हुआ है . कुछ देर की चुप्पी के बाद उन्होंने पूछ लिया ,''किसी को आना है ?''
''नहीं....कौन आएगा ? '' मानसी फिर चुप थी और लगातार गेट कर ओर देखती जा रही थी . तपिश भी उधर ही देखने लगे . तभी बेयरा आ गया .
मानसी का ध्यान गेट की ओर होने का लाभ उठा तपिश ने कॉफी के पैसे बेयरे को दे दिए .
''आपने क्यों दिए ?''
''मुझे नहीं देना चाहिए था ?''
''मेरा यह मतलब नहीं ....''
''अगर आपको किसी की प्रतीक्षा नहीं तो हम उठें ....डेढ़ घण्टा हो चुका है .... ''
''हां.....लेकिन यहां तो लोग सुबह आकर शाम तक बैठे रहते हैं ....''
''हां.....आं....लेकिन हमें अभी बूढ़ा होने में बहुत वक्त है .''
मानसी मुस्करा दी . उन्होंने ध्यान दिया , उसकी मुस्कराहट में उत्साह -प्रफुल्लता नहीं थी .
उठ खड़े होते हुए उन्होंने पूछा , ''आपके पास अभी ओैर कितना वक्त है ....?''
''लंच तक आपके साथ रह सकती हूं ... ''
बाहर फुटपाथ पर पहुंच वह बोले ,''फिर हम क्यों न हजरतगंज में चहल-कदमी करते हुए बातें करें ....''
''जी...श्योर ...''
*****
दो बजे तक मानसी उनके साथ हजरतगंज में एक छोर से दूसरे छोर तक उलट- फेर कर टहलती रही . उन्हें आश्चर्य था कि जिस उद्देश्य से उसने उन्हें तुरंत आ जाने का आग्रह किया था उस पर चर्चा करने से वह बचती रही . उन्होंने जब अपने शोध विषय के निरस्त होने की चर्चा छेड़ी... उसने केवल ,''ऐसा होता है ... वह कोई मुद्दा नहीं .''
''फिर मुद्दा क्या है ?''
''मुद्दा ....... कुछ है ही नहीं .''
''फिर....?''
''आपको लिखा था कि मैंने उर्दू कोर्स ज्वायन किया है .... उसे पूरा कर लेना चाहती हूं .''
''यह कोई आई.ए.एस. , पी.सी.एस. जैसी तैयारी तो नहीं . '' वह बोले . उनका स्वर कुछ ऊंचा था .
''आप इतनी उतावली क्यों दिखा रहे हैं ?'' मानसी के स्वर में चिड़चिड़ाहट थी .
वह हत्प्रभ थे . कारण वह पहले ही बता चुके थे . चुप रहे .
''मैं समझती हूं ... रुकना हमारे हित में है . आपको शोध के लिए पंजीकृत होने में सुविधा रहेगी .... तब तक कुछ काम भी कर डालेगें ... मैं भी उर्दू में कुछ कर लेना चाहती हूं....''
''हुह....'' सामने से आ रहे व्यक्ति से उन्होंने अपने को बचाया .
''क्या आप नहीं चाहते कि आप जैसे प्रतिभाशाली युवक का स्थान किसी डिग्री कॉलेज या विश्वविद्यालय में है .... बुरा नहीं मानेगें .... आपने बताया था कि अच्छे अंको से आपने प्रथम श्रेणी पायी थी एम.ए. में .''
''जी .''
''फिर अनुवाद में प्रतिभा का क्षरण क्यों ...?''
वह निरुत्तर रहे .
''अरे दो बज रहे हैं ? ढाई से मेरे एक कार्य का लाइव टेलीकॉस्ट है ....मैं चलूं ?''
''श्योर .'' उदासीन स्वर में वह बोले थे .
मानसी ने बॉय किया और तेजी से दूरदर्शन केन्द्र की ओर लपक गयी . वह देर तक खड़े उसे जाता देखते रहे थे . मानसी तो चली गई थी लेकिन उनके अंदर एक उद्वेलन छोड़ गयी थी ....
उन्होंने रिक्शा पकड़ा और होटल लौट गए थे .
*****
उनके पिता पारंपरिक सोच के थे और अपनी बढ़ती उम्र से चिन्तित . एक दिन वह दिल्ली आ पहुंचे और उन्हें धमकाने के अंदाज में बोले , ''तपिश , मैं उस रिश्ते को तोड़ने जा रहा हूं.... हद ही हो गयी . तय हुए डेढ़ साल से ऊपर हो चुका है .... उनके बहानों का अंत ही नहीं .... मुझे तो दाल में कुछ काला नजर आ रहा है .''
''क्या ?'' धीमे स्वर में उन्होंने पूछा .
''यही कि वे लोग किसी आई.ए.एस. -पी.सी.एस. के चक्कर में हैं . वहां से उन्हें स्पष्ट उत्तर नहीं मिल रहा होगा .... और तुम्हें उन्होंने स्थानापन्न के रूप में रखा हुआ है .''
''मैं भी जल्दी में नहीं हूँ. '' उन्होंने उत्तर दिया था .
''तुम्हें जल्दी क्यो होगी ? तुम्हारी छोटी बहन छब्बीस की हो रही है ... तुम्हें यह पता नहीं होगा....? लेकिन मुझे उसकी चिन्ता भी करनी है .''
''डैडी ...आप विपाशा की शादी की चिन्ता करें .... मैं फिलहाल शोध की चिन्ता करूंगा....''
'' शोध-बोध...शादी के बाद भी होता रहेगा .''
'' रजिस्ट्रेशन होने तक मेरे मामले को स्थगिेत कर देंगे तो मेरे हित में होगा .'' उनके स्वर की निरीहता ने शायद पिता को सोचने के लिए विवश किया था . हथियार डालते हुए वह मरे-से स्वर में बोले थे ,''तपिश , शादी की भी एक उम्र होती है ... उसके बाद फिर समझौते ही होते हैं .''
वह चुप रहे थे .
पिता गए तो वह शोध के लिए नये विषय के पंजीकरण की तैयारी में लग गए थे .
*****
तीसरी बार शोध निर्णायक मंडल की बैठक छ: माह बाद हुई . उस बार उनका विषय पंजीकरण के लिए स्वीकृत हो गया था . जिस दिन यह बताने के लिए दफ्तर में उनके गाइड का फोन आया उसी दिन शाम घर पहुंचने पर डाक से आया उन्हें एक निमंत्रण पत्र मिला , जिसपर नजर पड़ते ही वह चौंके थे . उस पर 'मानसी और मनीष के नाम लिखे थे . कार्ड खोलने का मन न होते हुए भी उन्होंने उसे खोला .... पढ़ा और एक ओर खिसका दिया . उसके दसवें दिन उन दोनों का विवाह होना था . देर तक वह किंकर्तव्यविमूढ़-सा सोफे पर अधलेटे से बैठे रहे थे . पिछली मुलाकात के दृश्य तेजी से उनकी आंखों के सामने घूमते रहे थे .
'मानसी ने उन्हें केवल मनीष से मिलवाने के लिए बुलाया था .... वह शायद इस विषय में बताना चाहती थी ...फिर कहा कयों नहीं... ' वह सोच रहे थे - 'कहना आवश्यक था ? यदि तुममें समझने की क्षमता ही नहीं तब कहकर भी क्या समझ लेते ? उसके परिवार वालों को भी इस बारे में जानकारी रही होगी . वे मनीष और उसके प्रेम संबधों के कारण उलझन में रहे होंगे . लेकिन मानसी ने उचित ही किया . यदि अपने परिवार के दबाव में वह उनसे विवाह कर भी लेती तो भी क्या वह मनीष को भूल जाती ! तब क्या स्थिति बनती.... नहीं उसने उचित कदम उठाया ....'' मुझे उसे बधाई देनी चाहिए .
और अगले दिन उन्होंने मानसी को बधाई का टेलीग्राम भेज दिया था .
******
उसके बाद जीवन कुछ यूं बदला कि उन्हें पता ही नहीं चला . वह निरंतर सफलताओं के सोपान चढ़ते रहे ... पी-एच.डी. सम्पन्न होने से पहले ही उस कॉलेज में प्राध्यापक नियुक्त हुए....और आज वह उस कॉलेज में ही प्राचार्य थे . उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा .... क्क्त भी नहीं था देखने का ...वक्त शादी करने के लिए भी नहीं निकाल सके....काम-शोध...और उसी दौरान दो वर्षों के लिए वह हिमाचल विश्वविद्यालय के वी.सी. भी रहे .... केवल दो वर्षों के लिए... दो वर्षों बाद पुन: अपने पद पर वापस लौटे . उन्हें कभी किसी की कमी खटकी भी नहीं . अपने अधीनस्थों और विद्यार्थियों को अपना परिवार समझा और सभी के लिए दरवाजे खुले रखे . आज वह दिल्ली के सर्वाधिक प्रतिष्ठित प्राचार्य के रूप में जाने जाते हैं .
लेकिन मानसी उन्हें कभी याद नहीं आयी ऐसा नहीं था . काम के बीच कभी अचानक खाली होते तो सोच लेते....मानसी उनके जीवन में आयी पहली और अंतिम लड़की थी .... भले ही उसके पिता ने उसे खोजा था और बाकायदा उनकी 'रिंग' सेरेमनी हुई थी . उसके बाद वह उससे दो बार ही मिले थे.... कुछ पत्राचार हुआ था .... तब वह उसके विषय में ही सोचते रहते थे .... सपने बुनते रहते थे . अकेले रहते थे ... दफ्तर के बाद मानसी उनके साथ हाती थी ... लेकिन जब सब समाप्त हुआ उन्होंने अपने को इतना समेटा कि मानसी भूले-भटके कभी उनके मानस पटल पर विचरण कर जाती और तब वह - ''आपने उचित निर्णय लिया था मानसी '' अपने को उसकी स्मृति से मुक्त कर लेते , 'लेकिन उसके जाते-जाते यह भी कहते , ''यदि आपने वह निर्णय न किया हेता मानसी तो मैं आज जो कुछ हूं वह नहीं होता .''
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साक्षात्कार प्रारंभ होने से पूर्व उन्होंने अभ्यर्थियों के नामों पर दृष्टि डाली और अभीप्सा तिवारी , लखनऊ पर अटक गए . सब कुछ उलटता-पलटता नजर आया . 'हर अभ्यर्थी को जानकारी होती है कि जिस कॉलेज में वह साक्षात्कार के लिए जा रहा है वहां का प्राचार्य , विभागाध्यक्ष और विश्वविद्यालय का विभागाध्यक्ष कौन है . अभीप्सा यदि मानसी की बेटी है तब मानसी को भी ज्ञात होगा ,फिर उसने मुझे एप्रोच क्यों नहीं किया ? करती तो क्या तुम उसके लिए कुछ कर देते ! डॉ0 तिवारी और डॉ0 निकिता और मंत्रालय..... क्या वह इतना आसान होता .' उन्होंने सोचा 'आवश्यक नहीं मानसी को पता ही हो .... मेरे नाम के कितने ही लोग हो सकते हैं . फिर उसने तो यही सोचा होगा कि मैं सरकारी बाबू था .... आज भी कुछ पदोन्नतियों के बाद वहीं होऊंगा .... ' क्षणांश के लिए रुककर पुन: सोचा , ''यह भी संभव हेै वह मानसी हो ही न.... '
वह कुछ और सोचते कि अभ्यर्थियों को बुलाये जाने के लिए प्रवीण ने पूछा और उनसे पहले डॉ0 पाण्डे ने सिर हिलाकर अनुमति दे दी .
अभीप्सा तिवारी को जब बुलाया गया तब वह कुछ विचलित हुए . एक बार उनके मन में आया कि वह उससे कुछ न पूछकर केवल उसके पेरेण्ट्स के विषय में पूछें , लेकिन तत्काल अंदर से आवाज आयी ,'' डॉ0 तपिश ....क्या मूर्खतापूर्ण बात सोचने लगे .... इतना भावुक होकर अपने पद की गरिमा क्यों घटाने पर तुले हुए हो ?''
अभीप्सा ने चयन बोर्ड के सभी सदस्यों के प्रश्नों के उत्तर दिए और सही -बेहिचक . लखनऊ विश्वविद्यालय से उसने प्रथम श्रेणी में एम.ए. किया था , नेट उत्तीर्ण थी और पी-एच.डी. कर रही थी . अभीप्सा एक हलचल थी उनके अंदर . उसके अतिरिक्त दो अभ्यर्थी और भी थे जिन्होंने सभी के प्रश्नों के सही उत्तर दिए थे . लेकिन उन दोनों के बजाय घूमफिर कर उनके दिमाग में अभीप्सा की नियुक्ति घूम रही थी . 'अभीप्सा ही क्यों ?' मन के एक कोने से प्रश्न उठा ,'दूसरे अभ्यर्थी इसी विश्वविद्यालय के छात्र हैं ..... उनमें कोई कमी भी नहीं है .... फिर तपिश तुम अभीप्सा के बारे में ही क्यों सोच रहे हो ! मानसी से जुड़ा अतीत तुम्हें परेशान कर रहा है ?'
उन्होंने विश्वविद्यालय के विभागाध्यसक्ष और डॉ0 तिवारी की ओर दृष्टि डाली . डॉ0 तिवारी साक्षकार समाप्त हो जाने के बाद डॉ0 निकिता सिंह से फुसफुसाकर कुछ कह रहे थे और वह स्वीकृति में सिर हिला रही थी . कांफ्रेंसरूम में सन्नाटा देर तक चहलकदमी करता रहा . बीच-बीच में कुछ कागजों की सरसराहट की आवाज हो जाती . तभी उन्होंने धण्टी बजायी . वह सन्नाटे को तोड़ना चाहते थे . गेट पर तैनात चपरासी दौड़ता हुआ आया .
''चाय ''
''जी सर .'' चपरासी के मुड़ते ही वह बोले , ''किसके नाम पर विचार किया डॉ0 तिवारी ? '' उन्होंने विभागाध्यक्ष और डॉ0 निकिता सिंह की ओर देखा .
'' रंजना श्रीवास्तव .....''
''डा0 साहब रंजना आधे प्रश्नों के उत्तर ही नहीं दे पायी थी.....'' डॉ0 प्रवीण राय विनम्रतापूर्वक बोले .
उन्होंने पुन: विश्वविद्यालय विभागाध्यक्ष की ओर देखा . वह चुप थे .
''सर.... डॉ0 प्रवीण ठीक कह रहे हैं .'' डॉ0 शुक्ल की आवाज थी . डॉ. शुक्ल ने कुछ अधिक ही प्रश्न किए थे रंजना श्रीवास्तव से . उन्होंने उससे यह भी पूछा था कि पी-एच.डी. के उसके निर्देशक कौन थे ! प्रश्न सुनकर पहले तो रंजना अचकचाई थी , फिर डॉ0 तिवारी की ओर देखती रही थी . वे यह देखकर उलझन में थे कि वह उनकी ओर क्यों देख रही थी . जब डॉ0 शुक्ल ने अपना प्रश्न दोहराते हुए कहा , ''रंजना श्रीवास्तव , आप डाक्टर साहब की ओर क्यों देख रही हैं ? मेरे प्रश्न का उत्तर दें .''
''जी , डाक्टर साहब मेरे निर्देशक थे .'' डॉ0 तिवारी की ओर इशारा करती हुई रंजना बोली थी .
अब वह समझ पा रहे थे कि डॉ0 शुक्ल ने सोच-समझकर उस लड़की से वह प्रश्न किया था . शुक्ल को पहले से ही जानकारी रही होगी और बोर्ड के सभी सदस्यों को इस प्रकार वह इस बात से अवगत करवाना चाहते होगें . शायद उन्हें यह भी जानकारी रही होगी कि डॉ0 तिवारी रंजना श्रीवास्तव का ही चयन करना चाहेगें .
अभीप्सा के नाम का प्रस्ताव करने का विचार उन्हें त्यागना पड़ा था , क्योंकि डॉ. तिवारी डॉ. शुक्ल पर बरस पड़े थे . प्रवीण शुक्ल के पक्ष में बोल रहे थे और उनके तर्क थे कि जब रंजना श्रीवास्तव से अच्छे और उससे अधिक योग्य अभ्यर्थी हैं तब उसका चयन क्यो किया जाए !
डॉ0 तिवारी और निकिता सिंह रंजना के पक्ष में अड़ गये . लगभग दो घण्टे तक बहस चलती रही . चाय के दो दौर समाप्त हो चुके थे . निष्कर्ष के लिए शुक्ल और प्रवीण उनकी और हेड की ओर देखने लगे थे . हेड ने पूरी तरह मौन धारण किया हुआ था . शायद उन्हें पहले से ही यह ज्ञात था कि तिवारी अपने कंडीडेट के लिए सदैव की भांति अड़ेंगे . तिवारी के आड़े आना उन्हें उचित नहीं लगा . उन्होंने चुप का विकल्प चुन लिया था . तपिश बहुत देर तक अपने प्राध्यापकों और डॉ0 तिवारी के बीच छिड़ी बहस को सुनते रहे थे . उन्होंने विभागाध्यक्ष की ओर पुन: देखा . वह स्थितप्रज्ञ थे . अंतत: उन्होंने कहा , ''डॉ0 तिवारी , रंजना इस कॉलेज के लिए उपयुक्त नहीं रहेगी .... उसके बजाय आप किसी अन्य के नाम पर विचार करें तो अच्छा होगा .''
''मैं किसी और के नाम की संस्तुति नहीं करूंगा . यदि आप लोग करना भी चाहेगें तो मैं हस्ताक्षर नहीं करूंगा . ''डॉ0 तिवारी ने उबलते हुए कहा .
''मैं भी नहीं करूंगा .'' डॉ0 निकिता सिंह के स्वर में भी उत्तेजना थी .
और बोर्ड निरस्त कर दिया गया था .
*****
जब कांफ्रेंस रूम से वह बाहर निकले अंधेरा हो चुका था . चपरासी , सेक्शन अफसर , दो क्लर्कों के अतिरिक्त चौकीदार ही वहां थे . टयूबलाइट्स और पीले बल्बों की रोशनी कॉलेज परिसर में फैली हुई थी . किसी से बिना कुछ कहे वह रिशेप्शन की ओर बढ़ गए . प्रवीण उनके पीछे लपके , लेकिन दूर से ही सूना पड़े रिशेप्शन को देख वह उल्टे पांव लौट पड़े थे अपने चैप्बर की ओर .
''सर , मैंने आपसे पहले ही कहा था .... हमें दोबारा उसी प्रक्रिया से गुजरना होगा सर ..... छ: महीने लग जाएगें ... लेकिन.....''
'हुंह....'' विचारमग्न स्वर में वह बोले , ''तो सभी चले गए ?''
मेरी जिज्जी हँसती हैं तो बहुत अच्छी लगती हैं, वैसे एक राज़ की बात बताऊँ मेरी जिज्जी जब रोती हैं तब भी बहुत अच्छी लगती हैं क्योंकि जिज्जी जब रोती हैं तो निःशब्द आँसू एक शांत नदी के बहाव की तरह चुपचाप बहते चले जाते हैं, बिना कोई आवाज़ किए...बिना कोई लहर उठाए। उनकी गुनगुनी गर्मी में भीगते हुए मन को एक अजीब-सी शांति मिलती है, मानो गरम पानी के सोते में डुबकी मार ली हो। मेरी जिज्जी का तो पूरा अस्तित्व ही ऐसा है... कोमल, सुखद और समझदार। वैसे आश्चर्य नहीं, अगर आपने जिज्जी को कभी रोते न देखा हो क्योंकि जिज्जी ने तो अपने चारों तरफ़ हँसी और मुसकुराहटों का एक अभेद्य किला बना रखा है। यह जिज्जी की पुरानी आदत है। कितनी भी तकलीफ़ हो, दर्द हो, पर उनके लिए तो मानो इन शारीरिक तकलीफ़ों का कोई अर्थ ही नहीं होता। जब बचपन में माँ छोटी-सी शरारत पर मारते-मारते थक जातीं और जिज्जी उसके बाद भी बिना कुछ कहे-बताए, चुपचाप होमवर्क करने बैठ जातीं, तो मैंने अक्सर ही माँ को बड़बड़ाते हुए सुना था... "भगवान ने बड़ी ही ढीठ लड़की पैदा की है। परन्तु जिज्जी तो मोम-सी नरम थीं।
शाम को जब मैं उनके दूध के गिलास में चुटकी भर हल्दी और सौंठ मिलाकर ले जाता और उन्हें बहला फुसलाकर, पूरा गिलास खाली करवाकर ही वहाँ से हटता तो जिज्जी प्यार से मेरा हाथ सहलातीं और उनके वह खामोशी से बहते आँसू मेरी अंतरात्मा तक में उतर जाते।
शरारत भी क्या... हम भाइयों से भरे परिवार में चारों तरफ़ लड़के ही लड़के तो थे। ले देकर एक बस रामसखी की बेटी जानकी ही थी जिसके साथ जिज्जी खेल सकती थीं, ख़ास करके गुड़ियों से। हम भाइयों को रोज़-रोज़ बैठकर उन गुड़ियों के तरह-तरह के कपड़े बदलना, रोज़-रोज़ बस वही खाना पकाने वाला खेल, बिल्कुल ही अच्छा नहीं लगता था और माँ को जिज्जी का जानकी के साथ खेलना। जिज्जी और जानकी में करीब-करीब बहनों जैसा रिश्ता जुड़ गया था। बिना कुछ बोले भी वह घंटों एक दूसरे के साथ खेल सकती थीं। कभी-कभी तो रामसखी भी लग जाती थी उनके खेल में। गुड़ियों के बिछौने, रंग-बिरंगी फ्राकें, सब उसी की तो सिली हुई हैं। माँ कितना भी डाटें मारें, इतवार की दुपहर को बाल सुखाने के बहाने जिज्जी अपनी गुड़िया लेकर चुपचाप बगीचे में निकल ही जाती थीं और जानकी भी तुरन्त वहाँ पहुँच जाती थी, मानो सुबह से इंतज़ार कर रही हो।
वहीं पीछे, अपने बगीचे के सर्वैंट-क्वार्टर में ही तो रहती थीं जानकी और उसकी माँ। बस इतना छोटा-सा ही, दो जनों का परिवार था उसका। उसके बापू को मरे तो आज तीन साल होने को आए। सुनते हैं उसके पहले उसका बाबा भी यहीं रहता था और बगीचे में माली का काम करता था जैसे जानकी का बाप करता था और उसकी दादी घर का, जैसे अब जानकी की माँ करती है। आज जिज्जी, जानकी , मैं खुद, सब कितने बड़े हो गए हैं।
जिज्जी पहली बार गोलू को लेकर घर आई हैं। गोल-मटोल गोलू बहुत ही प्यारा है। हम सब दिन-रात उसी की सेवा में लगे रहते हैं। पापा भी हँसकर छेड़ते रहते हैं, "आखिर मामा यों ही तो नहीं बन जाते।" कल सुबह-सुबह पापा को गोलू की पॉटी साफ़ करते देख माँ ने पापा को भी तो छेड़ ही दिया था, "आखिर नाना भी तो यों ही नहीं बन जाते।" बगल में नैपी पकड़कर खड़ा हरभजन भी मुसकुराता हुआ मम्मी से बोल पड़ा था, "यह सुख तो किस्मत वालों को ही मिलता है, बहू जी। देखो हम चुपचाप बगल में खड़े हैं और बाबू जी आधी-रात में भी भाग-भागकर भैया का काम कर रहे हैं... यह ममता चीज़ ही कुछ ऐसी है।" गोलू क्या मानो पूरे घर में जैसे एक खुशी की लहर आ गई थी। अभी बस आँख लगी ही थी कि मम्मी की आवाज़ के शोर ने पूरे घर को जगा दिया।
"क्या काँय-काँय लगा रक्खी है? आइंदा इस पिल्ले को तो तू घर ही छोड़कर आया कर। ऐसा हेज भी किस काम का...? न खुद चैन ले... न दूसरे को लेने दे। दो घंटे में मर नहीं जाएगा यह।" हाथ के बर्तन को ज़मीन पर रखकर जानकी ने गीले राख-सने हाथों से ही सर्वेश्वर सिंह को गोदी में उठा लिया और थकी काया को चूसता सर्वेश्वर माँ की गोदी की राहत से पल भर को चुप भी हुआ था, पर शायद छोटी-सी काया का दर्द बड़ा था और वह फिर से वैसे ही ज़ोर-ज़ोर से वापस रोने लगा था।
अचानक ही सबको चकित करती जिज्जी आईं और जानकी के राख सने हाथों से... 'ला मुझे दे' कहतीं, बिना जवाब सुने ही जानकी की गोदी से बच्चे को उठाकर कमरे में वापस चली गईं। उसी सहजता और सुगमता से जैसे बरसों पहले उसके हाथ से गुड़िया ले जाया करती थीं। सर्वेश भी बिल्कुल चुप हो गया, जाने उनके हाथों में क्या जादू था? गोलू के लम्बे चौड़े साफ़-सुथरे कपड़े पहनकर, खा पीकर सर्वेश आराम से सो गया। उसने गोदी की भी माँग नहीं की। यहाँ तो बिस्तर ही माँ की गोद से भी ज़्यादा गरम और गुदगुदा था।
घंटे भर बाद जब सब काम निबटाकर अपने गीले हाथों को धोती के पल्लू से पोंछती जानकी आई तो जिज्जी ने मुँह पर उँगली रखकर, दूर से ही इशारे में फुसफुसाकर कहा, 'बाद में ले जाना। बस अभी-अभी सोया है।' जानकी भी चुपचाप जैसे आई थी, चली गई। उसे अपनी सहेली पर पूरा विश्वास जो था। उनकी सह्रदयता को वह भली-भाँति जानती थी। जानती थी माजी कुछ भी कहें, समझें, जिज्जी की गोद में सर्वेश पूरी तरह से संतुष्ट और सुरक्षित रहेगा, बल्कि उससे भी ज़्यादा अच्छी तरह से रखेंगी वह तो उसे। इससे ज़्यादा और क्या चाहिए किसी माँ को। जानकी के होठों पर संतोष की मुस्कान थी और हाथ-पैरों में उमंग।
चार घंटे कैसे बीत गए जानकी को पता ही नहीं चला। आज उसने अपनी बीमार माँ को सर धोकर नहलाया। उनका बिस्तर भी बदला। और खिचड़ी भी खूब मन से बनाकर माँ को खिलाई बिना जलाए, जैसी माँ को अच्छी लगती है वरना सर्वेश्वर दयाल सिंह जी की फरमाइश पर तो हाथ का हर काम अधूरा ही छोड़ना पड़ता है उसे। माँ भी तो उसकी तरफ़दारी लेकर डँटियाने लग जाती हैं, "हमार नाती को जिच ना किया करो... हमार किसन कन्हाई पहले, अऊर कमवा पाछे-पाछे।" "आज तो किसन-कन्हाई माँ और नानी को भूलकर मौसी के पास सो रहे थे। अरे एही तो दिन हैं ओके तनिक लड़ियाने के फिर तो बड़ा होके तोहरे लग्गे भी ना बैठ पइहँ। पहले पढ़ाई फिर आपन नौकरी-चाकरी।" माँ-बेटी दोनों ही नन्हे सर्वेश के सुनहरे भविष्य में डूबी बैठी थीं। आज जानकी के पास वक्त ही वक्त था क्योंकि उसकी सहेली, उसकी बहना उसके जिगर के टुकड़े को सँभाले हुई थी। माँ के बाल काढ़ती जानकी सुनाए जा रही थी कैसे ससुराल में रोज़ सर्वेश्वर का बापू, चाहे कितना ही थका हो, जबतक सर्वेश्वर के साथ खेल न ले, सोता नहीं। असल में उसी ने तो बचवा की सब आदत बिगाड़ी हैं... जानकी के मुख पर गर्व और प्यार की चमक थी। "क्यों हमारे जीजा जी की बुराई कर रही हो जानकी? आने दो उन्हें, हम और सुरू मिलकर शिकायत करेंगे तुम्हारी। क्यों बेटू ठीक है न?" और छोटे-से बेटू ने चैन की अंगड़ाई लेकर मौसी को अपनी स्वीकृति दे दी। जिज्जी ने प्यार से उसका माथा चूम लिया। जिज्जी कब आईं, माँ बेटी को बातों ही बातों में पता ही नहीं चल पाया था। माँ की खटिया के कोने को जानकी ठीक से झाड़ भी पाए इसके पहले ही जिज्जी और सुरू उस पर विराजमान थे। जिज्जी के हल्के से गुदगुदाने पर वह खिलखिलाकर हँस रहा था। "मौसी को पहचानते हो क्या सर्वेश्वर दयाल सिंह?" जानकी ने खुशी और आभार में आए आँसुओं को धोती से पोंछते हुए बेटे से पूछा? नन्हा सर्वेश माँ की आवाज तुरन्त पहचान कर और कसकर हाथ पैर फेंकने लगा। इधर-उधर गरदन घुमाकर उसे ढूँढ़ने लगा। लगता था मानो उसके बीमार हाथ-पैरों में नई जान आ गई थी। पर साँस अभी भी खड़खड़ की आवाज़ के साथ ही चल रही थी। "बस यों ही इसे लम्बे चौड़े नाम के साथ ही बुलाती रहेगी, या इसका थोड़ा बहुत ध्यान भी रक्खेगी। ठंड के मारे पूरा सीना जकड़ा हुआ है। विक्स लगाकर खूब मालिश की है मैंने तब जाकर सो पाया था कहीं।" विक्स की शीशी जानकी को पकड़ाते हुए जिज्जी ने प्यार भरी शिकायत की।
अचानक जानकी की उदास आँखें अंगूठे से ज़मीन कुरेदती आभार के दो शब्द ढूँढ़ने लगीं पर जिज्जी की आँखों में तो बस प्यार ही प्यार था। मन की बातें खुद ही बाहर आने लगीं। अपनों से कैसी शरम? कैसा आडंबर? "असल में जिज्जी दो ही स्वेटर हैं न इसके पास और इतनी जल्दी गीला कर देता है उन्हें। फिर जाड़े में सूखने में भी तो टाइम लगता है।" एक ही साँस में जानकी ने हिम्मत जुटाकर पूरी बात कह डाली। जिज्जी सब समझ गईं। "तू आना शाम को। गोलू के दो-तीन स्वेटर जो छोटे हो गए हैं इसको बिल्कुल सही आएँगे। ऐसे तो बिचारा कभी ठीक ही नहीं हो पाएगा।" जिज्जी ने बच्चे की सेहत पर चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा। जानकी के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। "एक बात कहूँ जिज्जी, प्रणव बाबू को गोलू मत कहा करिए। सबसे पहले नाम से ही आदमी का पहचान होता है। आदर इज़्ज़त होता है। नाम हमेशा दमदार होना चाहिए।" "अच्छा अब समझ में आया क्यों तू छोटू को सर्वेश्वर दयाल सिंह जी कहकर ही बुलाती है।" आदत से मजबूर जिज्जी एक के बाद एक प्यार के नाम दिए जा रही थीं उसे। "अच्छा चलती हूँ मैं। गोलू नानी को परेशान कर रहा होगा।" "चाय नहीं पिएँगी जिज्जी आप?" जानकी ने जाती हुई सहेली से पूछा। "आज नहीं," मुसकुराती जिज्जी ने मुड़कर जवाब दिया, "और हाँ शाम को स्वेटर लेने आना मत भूलना।"
ठीक साढ़े पाँच जब जानकी आई तो जिज्जी की आँख उसकी आहट से ही खुलीं। दोनों बच्चों से थकी जिज्जी ऐसा सोईं कि वक्त का पता ही नहीं चला। माँ अलग आवाज़ पर आवाज़ दिए जा रही थीं, "शाम को प्रभा के यहाँ खाने पर चलना है। कब उठोगी, कब तैयार होगी? यह आजकल के बच्चे? सोने से ही फुरसत नहीं इन्हें।" इसके पहले गोलू उठकर माँ के सुर में सुर मिलाए और माँ कोई और नया तूफान उठाएँ, जिज्जी घबराकर फँसे गले से बोलीं, "सुन जानकी तू अभी जा। कल फिर आ जाना। सुबह ले जाना। मैं स्वेटर निकालकर तैयार रक्खूँगी। अभी ज़रा जल्दी में हूँ।"
जानकी जैसे आई थी वैसे ही चुपचाप चली गई। गुमसुम और उदास। जिज्जी की आँखों में उसका उदास और छोटू का बीमार चेहरा बार-बार घूमता रहा। जब सोना बिल्कुल ही नामुमकिन हो गया तो अपने आलस को धिक्कारती जिज्जी उठीं और गोलू के दर्जनों स्वेटरों में से चार छोटू के लिए निकाल लिए। वैसे भी जाड़ा तो खतम ही समझो और जिस रफ्तार से छोटू बढ़ रहा है इनमें से एक भी उसे अगले साल तो नहीं ही आने का। बल्कि जाते समय एक दो और जानकी को दे जाऊँगी। कितनी खुश होगी वह इतने सारे स्वेटर देखकर। अब कम से कम उसके बेटे को ठंड तो नहीं ही लगेगी और जिज्जी सुबह के इंतज़ार में, जानकी की मुस्कुराहट के इंतज़ार में कब सो गईं, कुछ पता ही नहीं चला।
आँख खुलीं तो सुबह के साढ़े पाँच बजे थे। दिन तो अच्छी तरह से चढ़ आया है वैसे भी जानकी के यहाँ तो सब चार बजे ही उठ जाते हैं। अब और इन्तज़ार नहीं कर पाईं जिज्जी। स्वैटरों का पुलंदा लिफ़ाफ़े में रखते समय थोड़े से रुपए भी डाल दिए। वक्त-बेवक्त काम आएँगे जानकी के और सर्वेन्ट क्वार्टर की तरफ़ चल पड़ीं वह। पर यह क्या? वहाँ से तो दबी-दबी रोने-सुबकने की आवाज़ें आ रही थीं। क्या हो गया-कहीं जानकी की माँ भी तो नहीं... कलेजा मुँह को आने लगा। कहीं सर्वेश को तो कुछ नहीं... नहीं ऐसा हरगिज़ नहीं हो सकता। जिज्जी सर्वेंट क्वाटर की तरफ़ दौड़ीं।
सामने जानकी छोटू को गोद में लिए बैठी, बुत-सी लग रही थी। बार-बार बेटे को चूमे जा रही थी। कसकर छाती से लगा रही थी जैसे डर गई हो कि कोई उसे उससे छीनकर ले जाएगा। बिल्कुल वैसे ही जैसे गाय मरे बछड़े को चाटती है... चिपकाए रखती है। यह क्या सोच रही हूँ मैं? भगवान सर्वेश्वर को खूब लंबी उमर दे, जीजी ने अपनी सोच को धिक्कारा। कसकर पकड़े बच्चे को उससे छुड़ाने में असमर्थ रामसखी खड़ी-खड़ी रोए जा रही थी। कभी अपनी बीमारी को कोसती तो कभी जानकी को डाँटने लग जाती, "अब इसे क्यों लड़िया रही हो। यह तो छलिया था...छलिया। मोह माया में हमें डालकर, मुँह मोड़ गया। छोड़ गया हमें यों ही रोने और बिलखने को। आप ही समझाइए जिज्जी इसे। अब तो बस पिंजरा रह गया है। पंछी तो कब का जाने कहाँ उड़ गया।" हवा में हाथ नचाती रामसखी पूरी पागल-सी लग रही थी । मन-ही-मन में जाने क्या-क्या लगातार बुदबुदाए जा रही थी वह।
जिज्जी क्या समझातीं जानकी को, उनकी समझ में तो खुद ही कुछ नहीं आ रहा था अब। अभी कल ही तो उन्होंने उसे गोदी में लेकर जी भर खिलाया था। माना कि थोड़े से आलस में स्वेटर नहीं निकाल पाईं थीं वह कल, पर इतनी छोटी-सी भूल की इतनी बड़ी सजा तो कोई भी नहीं दे सकता... भगवान भी नहीं। जिज्जी ने अविश्वास में हाथ बढ़ाए तो जानकी ने चुपचाप बेटे को उनकी गोद में दे दिया। उसे उन पर पूरा भरोसा जो था। शायद जिज्जी की गोद में ही सर्वेश ठीक हो जाए, फिर से मुसकुराने लग जाए। उसकी गोदी में तो दूध के लिए भी नहीं रोता।
किंकर्तव्य-विमूढ़ जिज्जी को छोटू गुड़िया जैसा लगा। शिथिल, ठंडा और बेजान। पश्चाताप और ग्लानि में डूबी जिज्जी के हाथ से पैकेट छूटकर ज़मीन पर गिर गया। अब इसे कभी किसी स्वेटर की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। कोई पैसे इसके कभी काम नहीं आएँगे। हाँ, उनके दिए पैसे जानकी के बुरे वक्त में ही काम आएँगे। यही तो सोचा था ना उन्होंने रुपए डालते समय। काश घड़ी की सूई पीछे जा पाती और उनके मन में आता यह रुपए छोटू की पढ़ाई के काम आएँगे। शादी में काम आएँगे।
बुत-सी खड़ी जिज्जी के हाथ से सर्वेश को जब कोई नहीं छुड़ा पाया तो जानकी की माँ मुझे बुलाकर ले गईं। कैसे मैं जिज्जी को वहाँ से ला पाया, मुझे खुद याद नहीं। बस इतना मालूम है कि सात आठ घंटे हो गए हैं जिज्जी को यों ही चुपचाप यहीं बैठे-बैठे। अंगूठे से ज़मीन को कुरेदते और बारबार कुछ लिख-लिख कर बिगाड़ते हुए। रह रहकर एक गहरी काली दर्द की लपट उनके चेहरे को झुलसा जाती है। आज तो उनका वह खामोश आँसुओं का झरना भी नहीं बह रहा है जिसके नीचे बैठकर जिज्जी अपना बड़े से बड़ा घाव तक को धो लेती थीं। मानो सब चुक गया हो। आत्म-संताप में जलकर भस्म हो चुका हो। चारों तरफ़ एक बर्फ़-सी सिहरा देने वाली खामोशी छाई हुई है। मानो हर तरह की आवाज़ों ने इस दमघोटू सन्नाटे से घबराकर आत्महत्या कर ली है।
माँ आती हैं और गोलू को जिज्जी की गोदी में डाल देती हैं, "ले संभाल अपने बेटे को, ऐसी छोटी-छोटी बातों को मन से लगाएगी तो कैसे जी पाएगी तू। यह तो दुनिया है दुनिया... यहाँ तो यह सब चलता ही रहता है। इन छोटे-छोटे लोगों के यहाँ तो हर साल ही बच्चे पैदा होते हैं और हर साल ही..." इसके पहले माँ अपना वाक्य पूरा कर पाएँ...एक भयानक विस्फोट होता है। खामोश गुनगुने पानी के सोतों की तरह आँसू बहाने वाली जिज्जी एक लंबी अनियंत्रित दहाड़ के साथ, बिफर-बिफर कर रोने लग जाती हैं। मानो बरसों का दबा ज्वालामुखी फट पड़ा हो।
दर्द दरिया बनकर बह रहा था और उनके काँपते शरीर में एक जलजला-सा आ गया था। कसाई-खाने की तरफ़ घसीटे जाने वाली गाय की तरह मैं चुपचाप सब देख रहा था।
ले, तू ही सँभाल अपनी बहन को। तेरे से ही सँभलेगी अब तो यह," कहती माँ तो चली गईं पर गोलू को गोदी में लिए खड़ा-खड़ा मैं सोच रहा हूँ कैसे चुप कराऊँ अपनी जिज्जी को अब, कैसे रोकूँ, दर्द की इस उमड़ती बाढ़ को? बाढ़ें कब भला रोके रुकती हैं? आज तो मुझे अच्छी तरह से पता है वह हल्दी और सोंठ वाला दूध भी काम नहीं आएगा। वैसे भी वक्त उन दिनों से बहुत आगे आ चुका है। हम बदल गए हैं। पर ऐसे बिलखता भी तो नहीं छोड़ सकता अब इन्हें। शायद समय ही दवा हो इनकी दुखती रगों की। जिज्जी के चेहरे को खरोंचती वह दर्द की लकीरें मेरी आत्मा तक को खुरेचती, रग-रग में धँसती चली जा रही हैं।
एक बात बताऊँ... आज मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा... यह घर, माँ, जानकी, मेरी अपनी जिज्जी, कुछ भी नहीं।
अपने-अपने दुख और ग्लानि के टीलों में दबे हम सब कितने दूर-दूर और अजनबी से नज़र आ रहे हैं। किसी के लिए कोई कुछ भी तो नहीं कर पा रहा। इस आज और अभी की रिसती सरहदों में मेरा दम घुटने लगा है। नन्हीं बच्ची-सी असहाय और कमज़ोर जिज्जी को मैं कहीं छुपा लेना चाहता हूँ। हरदम बचाना जो चाहता था उन्हें हर दुख से। पर आज... कुछ भी तो नहीं कर पा रहा... न सर्वेश को ज़िंदा कर सकता हूँ, न वक्त की घड़ी में कल को वापस ला सकता हूँ। वैसे भी तो अपने-अपने दुखों की गठरी सर पर उठाए हम सभी कभी न कभी तो, ज़रूर ही, उबर ही आते हैं... दुख की इस नदी के दूसरे किनारे...। शायद मेरी जिज्जी भी कभी जल्दी ही, फिर से ठीक हो ही जाएँ, क्योंकि वह तो बचपन से ही सिर्फ़ एक फाइटर ही नहीं, सरवाइवर भी हैं।...
घर के बगल में मार-पीट हुइ, पड़ोसी ने ऑंखें बंद कर लीं। चीख- पुकार मची, उसने कानों में रुई ठूंस ली। भगदड़ मची, उसने घर के दरवाजे पर ताला जड़ दिया। हत्या हुई, वह धृतराष्ट्र बन गया । वह आज का समझदार व्यति था। किसी के झमेले में पड़ अपनी जान जोखिम में कभी नहीं डालता था । एक अव्यक्त समझौता उसने आज के समय के साथ कर लिया था। समय ही बेईमान था। कोई करे तो क्या करे। बूढ़े-बुजुर्गों की चिन्ताओं में घुल रहा था - आज किसी को किसी से मतलब नहीं...... हमारे जमाने में तो पूरा गॉंव-कस्बा अपना रिश्तेदार.....हारी-बीमारी, के समय सब साथ खड़े। किसी के घर मौत होने पर सब के घर चूल्हा उपास .....
हॉं, तो क्या कह रही थी यह कथा?...घर के बगल में मार-पीट हुइ, उसने ऑंखें बंद कर लीं। चीख- पुकार मची, उसने कान में रुई ठूंस ली। भगदड़ मची तो दरवाजे पर ताला भी जड़ दिया। हत्या हुई तो....।
एक दिन उसके घर से थोड़ी दूर की दुकान में आग लगी। आग की लपटें ताला का कहा तो मानतीं नहीं, लांघकर उसके घर तक आ पहुँचीं. वह बहुत चीखा- चिल्लाया। लेकिन .......
लोकतंत्र
-साहब, स्थिति हमारे फेवर में एकदम नहीं है. एक घबराई आवाज तेजी से कॉरीडोर से गुजरते हुए अंदर तक साथ चली आई। - तो? -इस बार हार निश्चत है। हमारे जीतने का जरा भी चांस नहीं है। आवाज की घबराहट और बढ़ी. - क्यो? दूसरी गुप्त बैठक में व्यस्त आवाज को जरा फर्क नहीं पड़ा। - राघव सिंह के भाषणों-वक्तव्यों से... प्रभावित होकर सब उधर ही मुड़ गए..... लाखों की भीड़ जुटी. पहली आवाज अस्त-व्यस्त पहले से थी. अब पस्त भी होने लगी। - जरुरी तो नहीं भीड़ जीत की पहचान हो। इस आवाज की बेफिक्री काबिले-गौर! - नहीं साहब, पक्की खबर है कि हम हार रहे हैं. हर हाल में हार रहे हैं। अब जीतना असंभव! -तुम्हारी डिक्शनरी में यह असंभव लफ्ज़ कहॉं से आ गया रवि? तुरंत वे बगल की कुर्सी पर जमे महोदय की ओर मुखातिब हुए। मुस्कुरा कर उन्हें देखा... यह वही मुस्कान थी, जिसे सयाने लोग शातिर मुस्कान कहते हैं. - रविया बहुत जल्दी घबरा जाता है, हमारी देश की जनता को अभी नहीं पहचानता न, इसीलिए...लोकतंत्र को एकदम नहीं समझता है पट्ठा! नौसिखिया...... जाइए, बंटवा दीजिए अंगूर की बेटी की पेटी को......आखिर इन्हें सालों-साल अनपढ़- बुड़बक बनाकर क्यों रखा जाता है, आप तो जानते ही हैं। और उन्होंने आगत जीत के स्वागत में शैंपेन की बोतल खोल ली। झागदार शैंपेन बोतल से बाहर जन सैलाब की तरह बह आया। दारु ने ऐसा रंग दिखलाया कि वे हारते- हारते रातों-रात चुनाव जीतने की स्थिति में आ गए। इस लोकतांत्रिक व्यवस्था से नौसिखिया रविया एकबारगी राजनीति का भयंकर पंडित बनकर उभरा।
बस अड्डे पर पंजाब का गौरव पर नज़र पड़ते ही बरबस हंसी फूट पड़ी। गौरव को हांकने वाला अपनी सीट पर बैठा बीड़ी फूंक रहा था और कडंक्टर घर में अपनी बीबी से हुए झगड़े की खुन्नस किसी सवारी से बेवज़ह उलझ कर निकाल रहा था। सचमुच बड़ा ही गंदा गौरव था, उल्टियों और धूल-मिट्टी से सना हुआ। उसकी हालत देखकर, कहीं से भी किसी भी आदमी को उसके ‘पंजाब का गौरव’ होने का आभास नहीं हो सकता था। उसकी शक्ल से ही पता चल रहा था कि इसमें हमारे जैसे बेचारे ही सफर कर सकते हैं। टूटी, कटी-फटी सीटें, गायब शीशे, धूल-मिट्टी, उल्टियां, मूंगफली, संतरे तथा केले आदि के छिलके, पानी की खाली बोतलें, सिग्रेट-बीड़ी के टोटे, खैनी-पान मसाले, चिप्स आदि के रैपर, कुल मिलाकर बस के अन्दर टिपिकल भारत की जीती-जागती साक्षात तस्वीर। ऐसे गौरव में कोई आम आदमी ही सफर कर सकता है, कोई शशी थुरूर तो नहीं। वैसे शशी थुरूर को तो हवाई जहाज की इकॉनमी क्लास में सफर करने वाले भी भेड़-बकरियां ही नज़र आजे हैं, जबकि बेचारा आम आदमी तो अब बढ़ हुए किरायों के चलते बस में भी सफर करने से कतरा रहा है। भारतीय जन सेवकों के लिए जब हवाई जहाज की इकॉनमी क्लास में सफर करने वाले भी भेड़-बकरियां हो सकते हैं, तो फिर बस में सफर करने वाले तो कीड़े-मकौड़े ही होंगे। ऐसे में पैदल चलने वालों को हमारे जनसेवक क्या समझते होंगे, इसकी घोषणा करना कतई आवश्यक नहीं। पर लोगों को पंजाब रोड़वेज़ वाले ही ‘पंजाब का गौरव’ के बारे में नहीं बताना चाहते बल्कि अन्य राज्यों के परिवहन निगम भी इस नेक कार्य में पीछे नहीं। प्राय: सभी राज्यों की बसों के आगे-पीछे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है, ‘आम आदमी की खास बस’, ‘अमुक राज्य का गौरव’ आदि। साथ ही आम आदमी इस गौरव से डरे नहीं, इसीलिए उसे लुभाने के लिए लिखा होता है—‘साधारण किराया’। वैसे सभी रोड़वेज़ के लिए यह लिखना अनिवार्य भी हो गया है क्योंकि मुद्रा-स्फीति के कम होने के तमाम सरकारी वायदों के बावज़ूद मंहगाई भारतीय अभिनेत्रियों और सत्ताधारी नेताओं के नखरों की तरह आसमान छू रही है, ऐसे में रूठी हुई महबूबा को मनाने वाली कसरत की तरह, किसी तरह पेट भरने वाले आम आदमी को इस मंहगे शौक के लिए लुभाने हेतु विभिन्न निगमों द्वारा यह सारे हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। वैसे अब बसों में सफर करना भी सचमुच ‘सफर’ हो गया है। कृषि मंत्री द्वारा अपने मंत्रालय को अघोषित रूप से मूत्रालय बनाने तथा क्रिकेट से ब्याह रचाने के बाद आए दिन अर्धनग्र बालाओं (अघोषित बार बालाएं) के डांस को देखकर भूखे भारतीयों की तो बांछें खिल जाती हैं। भले ही आदमी बस में सफर करने वाली हालत में न हो, कम से कम बस अड्डे पर बैठकर सरकारी टीवी पर आईपीएल के मैचों का मजा तो ले ही सकता है (अगर ये टीवी काम कर रहें तो)। वैसे आम भारतीय कम से कम इब्रे बतूता तो बन ही सकता है। इन हज़रत ने भी पैदल चलकर ही सारी दुनिया नापी थी। लेकिन तब ट्रैफिक की टैंशन नहीं थी। अब तो मोटर-साईकिल पर हवा में उड़ते पप्पू फुटपाथ पर भी न जाने आपको कहां ठोक जाएं, सलमान या एडमिरल के बेटे की तरह आपकी बोटियों की लंबाई-चौड़ाई नाप जाएं। लेकिन अब इब्रे बतूता बनना भी आसान नहीं, भई सारा चक्कर जूतों का है। एक गीत के पांच लाख कमाने वाले गुलज़ार साहब तो इब्रे बतूता के जूते से चुर्र-चुर्र करवा सकते हैं, पर दिन में मुश्किल से पांच रुपये कमाने वाला आम आदमी क्या करे। उसके तो खाली पेट से भी चुर्र-चुर्र की आवाज़ नहीं निकल पाती, ऐसे में वो जूते से आवाज़ निकालने की कहां से सोचे। भले ही मार्केट में चाईनीज़ जूते उपलब्ध हों, पर आम आदमी के लिए उनकी कीमत सितारों जड़ी जूती से कम नहीं। वैसे सन्तों ने भी कहा है, भूखे पेट भजन नहीं होए गोपाला, पर उन्होंने भी कभी जूतों की बात नहीं की। उस वक्त के संत भी आम आदमी थे, अत: वे भी पैदल ही चलते थे और पब्लिक ट्रांसपोर्ट तो उस वक्त थी नहीं। अत: सन्त कभी पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर नहीं बोल पाए और आधुनिक संत तो कभी बोल ही नहीं सकते। नेताओं के लिए आम आदमी कीड़े-मकौड़ों से कम नहीं और सन्तों के लिए तो सारा ही खेल माया का है। हर युग में ठगिनी के नाम से जाने वाली माया, आज यूपी में लोगों को ठगते हुए खुद भी अरबों में खेल रही है। वैसे माया का ही तो सारा खेल है जो विभिन्न राज्यों के परिवहन निगम अपनी छकड़ा बसों पर भी आम आदमी को बेवकूफ बनाने के लिए ‘आम आदमी की खास बस’, ‘अमुक राज्य का गौरव’ तथा साथ ही ‘साधारण किराया’ लिखने से बाज नहीं आते।
आम आदमी इन बसों में बैठकर अपने आपको सचमुच ही गौरवान्वित महसूस करता है क्योंकि उसकी जेब में किराया चुकाने के पैसे तो कभी-कभार ही होते हैं।
हिन्दी में एक मुहावरा है 'श्रीगणेश करना` जिसका अर्थ है किसी कार्य का शुभारंभ करना। इस मुहावरे से जनजीवन में गणेश की सर्वव्यापकता का ही पता चलता है। उर्दूवाले या कहें कि अहले-इस्लाम भी इसी के समकक्ष एक मुहावरे का प्रयोग करते हैं और वह है 'बिस्मिलाह करना`। इसका अर्थ भी ठीक वही है जो श्रीगणेश करने का है। गौ़र करें तो हम पाते हैं कि इस्लाम में 'अल्लाह` एक ओर केवल एक सर्वोच्च शक्ति है। हिंदुओं में ईश्वर के अतिरिक्त अनेक देवी-देवता हैं तो फिर किसी भी कार्य की शुरूआत पर श्रीगणेश करना ही क्यों कहा जाता है? वस्तुत: किसी भी कार्य के प्रारंभ में सबसे पहले गणेशपूजा या गणेश को स्मरण करने का ही विधान है और वो इसलिए कि गणेश को गणाधिपति या गणाध्यक्ष माना जाता है। गणेश का एक नाम है गणपति जिसका अर्थ होता है समूह का नेता और गणेश में देवताओं का नेतृत्व करने के सभी गुण उपस्थित हैं। इन्ही गुणों के कारण गणेश सबसे पहले पूजे जाते हैं।
पुराणों में वर्णन मिलता है कि जब शिव ने गल़ती से अपने ही पुत्र गणेश का सिर काट दिया तो पार्वती बहुत दुखी हो गई और शोक में डूब गई। पार्वती का शोक दूर करने और अपनी भूल का सुधार करने के लिए शिव ने अपने गणों को दौड़ाया और कहा कि ऐसे प्राणी का सिर काटकर ले आओ जो उत्तर दिशा की ओर सिर करके सोया हो। गण इस अवस्था में सोए हुए एक हाथी का सिर काट कर ले आए। शिव ने उसी हस्तिमुख को गणेश के धड़ पर लगा कर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया और साथ ही उनकों सेना का नायक भी बना दिया। तभी से गणेश गणपति कहलाए। गणपति के इस रूप की पूजा या स्मरण का मंत्र है : ओउम् गणं गणपत्यै नम:। इसका एक दूसरा रूप ''ओउम् गं गणपत्यै नम:`` भी मिलता है।
ऋद्धि-सिद्धि प्रदायक गणेश केवल सुख-समृद्धि, वैभव एवं आनंद के ही अधिष्ठाता नहीं हैं अपितु हर प्रकार के विघ्न और कष्टों को हरने वाले तथा बुद्धि देने वाले भी हैं इसीलिए चाहे कोई सामान्य व्यक्ति हो अथवा विद्वान, विद्यार्थी हो अथवा कलाकार, व्यवसायी हो अथवा उद्योगपति, स्त्री हो या पुरूष, मांगलिक कार्य हो अथवा कार्य को निर्विघ्न सम्पन्न करने की इच्छा, हर प्रकार की सपफलता के लिए सबसे पहले गणेश का ही स्मरण अथवा पूजा की जाती है। पुस्तक का पहला पृष्ठ हो अथवा किसी मांगलिक अवसर का निमंत्रण पत्र सबसे पहले लिखा जाता है: ''श्री गणेशाय नम:``। बच्चे को वर्णमाला के वर्णों का ज्ञान कराने से पहले उससे उच्चरित कराया जाता है ''श्री गणेशाय नम:``। इस प्रकार ''श्री गणेशाय नम:`` मांगलिक कार्य के प्रारंभ होने का ही प्रतीक है और कार्य को सुचारू रूप से सम्पन्न कराने वाले हैं श्री गणेश। कार्य निर्विघ्न रूप से संपन्न हो जाए इसके लिए गणेश की निम्न स्तुति ही सबसे पहले की जाती है: वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसम प्रभ। निर्विघ्नं कुरू मे देव! सर्वकार्येषु सर्वदा।। एक विद्यार्थी भी बुद्धिप्रदाता गणेश की स्तुति ही सर्वप्रथम करता है ताकि उसे बुद्धि की प्राप्ति हो और साथ ही इस प्राप्ति में कोई विघ्न भी पैदा न हो: विद्यादाता गणाधीश सूर्यकोटिसम प्रभ। निर्विघ्नं कुरू मे देव! सर्वकार्येषु सर्वदा।। विद्या की देवी हैं सरस्वती। पूजा या प्रार्थना या स्मरण पहले गणपति का तत्पश्चात सरस्वती का। सरस्वतीपूजा हो तो भी गणेश पहले और लक्ष्मीपूजा हो तो भी गणेश पहले। ''राचरितमानस`` का प्रारंभ करते हुए बालकाण्ड के प्रथम सोपान में पहले श्लोक में तुलसीदास लिखते हैं: वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ।। अर्थात अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों छंदों और मंगलों की करने वाली सरस्वती जी और गणेश जी की मैं वंदना करता हूँ। ''विनयपत्रिका`` में तुलसीदास अपनी विनय सीता के माध्यम से राम तक पहुँचाने की प्रार्थना करते हैं लेकिन 'विनयपत्रिका` में जो सबसे पहला पद है वह है 'श्रीगणेश-स्तुति` जो निम्न प्रकार से है: गाइये गनपति जगबदंन। संकर-सुवन भवानी-नंदन।। सिद्धि-सदन, गज-बदन, बिनायक। कृपा-सिंधु, सुंदर सब-लायक।। मोदक-प्रिय, मुद-मंगल-दाता। बिद्या-बारिधि, बुद्धि-बिधता।। माँगत तुलसिदास कर जोरे। बसहिं रामसिय मानस मोरे।। तुलसीदास राम के अनन्य भक्त हैं इसलिए हृदय में राम और सीता को ही बसाए रखना चहते हैं लेकिन इसकी प्राप्ति के लिए सबसे पहले गणपति से ही याचना करते हैं। गणेश की अनुकंपा के अभाव में किसी अन्य ईष्ट की कृपा भी संभव नहीं। कोई भी कार्य हो, अनुष्ठान हो अग्रपूज्य हैं गणेश।
तुलसीदास द्वारा रचित 'श्रीगणेश-स्तुति` में गणेश का न केवल परिचय मिलता है अपितु उनकी अनेक विशेषताओं की भी जानकारी प्राप्त होती है। 'स्तुति` में एक पंक्ति है 'संकर-सुवन, भवानी-नंदन`। 'संकर-सुवन` अर्थात् शंकर के पुत्र । इस प्रकार गणेश के पिता हैं भगवान शंकर ;शिव तथा माता हैं पार्वती ;उमा। गणेश शंकर और पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र हैं तथा उनसे छोटे पुत्र हैं कार्तिकेय। इस प्रकार कार्तिकेय गणेश के अनुज हैं। गणेश की एक बहन भी है जिसका नाम मनसा है। असंख्य नाम हैं गणेश के लेकिन कहा जाता है कि गणेश के निम्नलिखित बारह नाम प्रात: दोपहर और सांयकाल लेने मात्र से व्यक्ति के सब कष्ट दूर होकर सफलता मिलती है: वक्रतुंड, एकदंत, कृष्णपिंगाक्ष, गजवक्त्र, लंबोदर, विकट, विघ्नराज, धूम्रवर्ण, भालचंद्र, विनायक, गणपति और गजानन। इस सूची में कहीं-कहीं अंतर भी मिलता है लेकिन श्रद्धापूर्वक स्मरण करने से कार्य में सफलता अवश्यक मिलती है। कहीं पर गणेश के एक सौ आठ नामों की सूची भी मिलती है लेकिन गणेश के नामों की कोई सीमा नहीं। नामावली ही नहीं उनके स्वरूपों को भी सीमा में बाँधना मुश्किल है। गणेश नेतृत्व, शौर्य और साहस के प्रतीक है। कहीं उनके विनायक रूप में विकरालता, कहीं हेरंब रूप में युद्ध प्रियता तथा कहीं विघ्नेश्वर रूप में लोकरंजक व परोपकारी स्वरूप के दर्शन होते हैं।
गणेश ऐसे देवता हैं जो सम्पूर्ण भारत में ही नहीं अपितु विश्व के अन्य अनेक देशों में भी किसी न किसी रूप में प्रतिष्ठित हैं। पड़ोसी देश नेपाल में गणेश को सूर्य विनायक, सूर्यगणपति अथवा हेरंब के नाम से जाना जाता है। यहाँ हेरंब गणेश के पाँच सिर और दस हाथ मिलते हैं। यूनान के प्राचीन ग्रथों में बुद्धि के देवता के रूप में 'जानस` का ज़िक्र मिलता है वह गणेश का ही एक रूप है जिसके सात सिर और एक सूंड है। अन्य पड़ोसी देशों और दूसरे महाद्वीपों में भी गणेश से मिलती-जुलती अनेक प्रतिमाएँ मिलती हैं जिहें गणेश की तरह ही पूजा जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि वैदिक काल से लेकर आज तक संपूर्ण विश्व की संस्कृति में गणेश किसी न किसी रूप में अवश्य ही विद्यमान हैं।
यदि धर्म की बात करें तो गणेश मात्र हिंदुओं के ही नहीं बल्कि जैन और बौद्धों के भी आराध्य देव हैं। जैन संप्रदाय में ज्ञान का संकलन करने वाले गणाध्यक्ष हैं गणेश। महाभारत के लेखक के रूप में तो गणेश जाने ही जाते हैं। ऋषि वेद व्यास ने महाभारत की रचना की लेकिन उनके सहायक हुए गणेश। वेदव्यास बोलते गए और गणेश अपने हाथों से लिखते गए। गणेश के हस्तिमुख पर स्थित दंतद्वय में से एक टूटा हुआ है। कहा जाता है कि इसी टूटे हुए दांत से गणेश ने महाभारत की कथा को लिपिबद्ध किया था। बौद्ध धर्म की अनेक शाखाओं में मान्यता है कि गणेश वंदना के बिना मंत्रासिद्धि असंभव है। नेपाल एवं तिब्बत के अनेक मंदिरों में बुद्ध की प्रतिमाओं के साथ-साथ गणेश की प्रतिमाएँ भी स्थापित हैं। गणेश किसी धर्म या मत विषेश के नहीं अपितु धर्म का जो मूल तत्त्व है उसके प्रतीक हैं।
गणेश की रूपाकृति की प्रतीकात्मकता: गणेश की बाह्य रूपाकृति कुछ विचित्र सी ही प्रतीत होती है। धड़ मनुष्य का तथा सिर हाथी का। पैर मनुष्य की तरह दो लेकिन हाथ चार या कभी-कभी छ:, आठ या दस भी । शरीर के विभिन्न अंगों में भी संतुलन का अभाव तथा अत्यंत स्थूलकाय। स्वयं स्थूलकाय पर वाहन के रूप में मूषक महाशय। ऊपर से देखने पर तो यह विचित्र सा लगता है परन्तु यदि हम गणेश के शरीर के विभिन्न अंगों की प्रतीकात्मकता पर विचार करें तो प्रत्येक अंग एकाधिक आध्यात्मिक संदेश प्रदान करता है। संतुलन बाह्य नहीं आंतरिक होना भी अनिवार्य है। शरीर, मन और बुद्धि में उचित संतुलन और तालमेल होगा तभी व्यक्ति आध्यात्मिक क्षेत्र में पदापर्ण कर आत्मज्ञान प्राप्त कर सकेगा। सुकरात अथवा लिंकन की बाह्य कुरूपता उनके विकास और उन्नति में बाधक नहीं बनी। उनके विचार आज भी प्रेरणास्पद हैं। गणेश अपने संपूर्ण शरीर और परिवेश में प्रेरणादायक हैं।
सबसे पहले गणेश के हस्तिमुख पर विचार करते हैं। शिव द्वारा पहले तो गणेश का सिर काटना और फिर उस पर मानवमुख की बजाय हाथी का सिर आरोपित करना वास्तव मे प्रतीकात्मक ही है। मनुष्य सकारात्मक और नकारात्मक भावों अथवा वृत्तियों का समुच्चय ही तो है लेकिन यदि नकारात्मकता बढ़ जाती है तो उसका उन्मूलन अनिवार्य है। सिर या मस्तिष्क अहंकार का प्रतीक है। जब तक सिर रूपी अहंकार को उतार कर नहीं फेंका जाता तब तक आध्यात्मिक उन्नति संभव ही नहीं। आध्यात्मिक उन्नति के अभाव में भौतिक उन्नति भी असंभव है और यदि आध्यात्मिक उन्नति के बिना भौतिक उन्नति प्राप्त कर भी ली जाती है तो जीवन में संतुलन संभव नहीं। शरीर, मन और आत्मा का एक धरातल पर आना ही वास्तविक उन्नति है। जीवन में संतुलन के लिए अहंकार की समाप्ति अथवा शिरोच्छेदन अनिवार्य है। प्रेम भी जीवन का अनिवार्य तत्त्व है। अहंकार के साथ प्रेम भी असंभव है। तभी कबीर भी कहते है: यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहिं। सीस उतारे भुइं धरै तब पैठे घर माहिं।।
अहंकार के रहते आपको महत्त्व नहीं मिल सकता। अंहकार का समापन ही किसी को नायक, गणपति अथवा अग्रपूज्य बना सकता है। हाथी बुद्धिमत्ता का प्रतीक है। हाथी का सिर पुनर्स्थापित होने का अर्थ है ज्ञान की प्राप्ति का प्रारंभ । अहंकार गया तो आत्मज्ञान होते देर नहीं लगती। आत्मज्ञान के प्राप्त होने पर अहंकार का विसर्जन स्वाभाविक है। अहंकार के साथ अन्य नकारात्मक वृत्तियाँ भी चली जाती हैं। पुनर्जन्म की स्थिति है ये। एक सिर को काट कर दूसरा सिर लगाना या दूषित रक्त को निकालकर स्वस्थ रक्त चढ़ाना पुनर्जन्म नहीं तो और क्या है? पुनर्जन्म से तात्पर्य शारीरिक मृत्यु नहीं अपितु दूषित मनोभावों से मुक्ति है। जब व्यक्ति के दूषित मनोभाव तिरोहित हो जाते हैं तभी वह सही अर्थों में जीना प्रारंभ करता है। गणेश का हस्तिमुख आपको लगातार स्मरण कराता रहता है कि आपको हर हाल में अपनी जड़ता और दूषित मनोभावों अथवा विकारों से मुक्त होना है। हाथी शक्ति, साहस और धैर्य का प्रतीक है। हाथी में अनुशासन भी है और स्वामिभक्ति। हाथी के पैर मज़बूत तथा सूंड लचीली होती है। जीवन में स्थायित्व भी हो अर्थात् इरादों में फौलाद-सी मज़बूती तथा समय के साथ परिवर्तित होने का गुण भी। जिसके विचारों में जड़ता न हो वही सबको साथ लेकर चल सकता है। लोकतंत्र में राष्ट्रपति का पद सर्वोच्च माना गया है क्योंकि राष्ट्रपति किसी भी प्रकार की दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर, पूर्वाग्रह से मुक्त होकर निरपेक्ष भाव से कार्य करता है। वह सबकी भावना को समझकर सही निर्णय लेने में सक्षम है। निर्णय के समय उसमें लचीलापन है लेकिन निर्णय के कार्यान्वयन में दृढ़ता भी। जब तक किसी व्यक्ति में पूर्वाग्रह तथा अहंकार है, दृढ़ता तथा लोच का अभाव है वह सर्वोच्च पद के लायक नहीं है।
हाथी के कान होते हैं सूप के समान बडे-बड़े। सूप सार तत्त्व को रखकर बेकार की थोथी अथवा महत्त्वहीन वस्तु को उड़ा देता है। सिर्फ काम की बातें ग्रहण करो शेष छोड़ दो तभी मानव जीवन की सार्थकता है, तभी सफलता है। उपयोगी का चुनाव हमें आगे ले जाता है। सही जनप्रतिनिधियों का चुनाव राष्ट्र और समाज की उन्नति में सहायक है। गणेश के बड़े-बड़े हस्तिकर्ण सारग्राह्यता के ही प्रतीक हैं। हाथी का मुँह छोटा है पर कान बड़े-बड़े। यहाँ गणेश संदेश देते हैं कि कम बोलो और सुनो ज्यादा तथा ध्यानपूर्वक। जब ज़रूरत हो तभी बोलो। इसके लिए चिंतनशील होना अनिवार्य है। हाथी का शरीर विशाल होता है लेकिन आँखे छोटी-छोटी। गणेश की छोटी-छोटी आँखें सूक्ष्म दृष्टि तथा एकाग्रता का प्रतीक हैं जो उनकी चिंतनशीलता का ही प्रमाण है।
हाथी की सूंड दूर तक सूंघने में सक्षम होती है अत: यह दूरदर्शिता के महत्त्व को प्रतिपादित करती है। आज मनुष्य अपने थोड़े से लाभ के लिए प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर पर्यावरण में अंसतुलन पैदा कर रहा है। ओज़ोन परत का विनाश कर खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है। उसे जीवन के हर क्षेत्र में दूरदर्शी होना चाहिए और हर क़दम फूँक-फ़ूँक कर रखना चाहिए। गणेश के दो दाँत हैं जिनमें से एक पूरा है तथा दूसरा अपूर्ण। पूरा दाँत श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है तो अपूर्ण या भग्न दाँत बुद्धि और ज्ञान का। बुद्धि अथवा ज्ञान कभी पूर्ण नहीं हो सकता लेकिन पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से हम निरंतर ज्ञानार्जन और आत्मज्ञान के क्षेत्र में प्रगति कर सकते हैं। महत्त्व ज्ञान का उतना नहीं है जितना ज्ञान का जीवन में सही और सार्थक उपयोग करने में हैं। विश्वास भी मात्र ज्ञान प्राप्ति के लिए ही अनिवार्य नहीं है अपितु सामाजिक जीवन में संबंधों के विकास के लिए भी इसका अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। श्रद्धा में पूर्ण समर्पण होता है और समर्पण में अहंकार और द्वैत का विसर्जन। इस प्रकार गणेश का हस्तिमुख एक वृहद आध्यात्मिक और सामाजिक प्रतीकात्मक अर्थ प्रस्तुत करता है। गणेश के मानवेतर अंग अर्थात् हस्तिमुख या गजशिर के अतिरिक्त उनके शरीर के मानव अंग भी कम प्रतीकात्मक नहीं हैं। छोटी-छोटी मगर मज़बूत दो टाँगें और भारी भरकम उदर। भारी-भरकम उदर के कारण ही लंबोदर कहलाए लेकिन लंबोदर का गुण है सब कुछ उदरस्थ कर लेना। सब कुछ स्वीकार कर लेना। सह लेना। गणेश सब कुछ स्वीकार कर लेते हैं, सह लेते हैं और पचा जाते हैं। बुराइयों को फैलने से रोक देते हैं। शिव ने विष को कंठ में धारण किया था, गणेश नकारात्मकता को उदर में धारण कर लेते हैं। गोपनीयता बनाए रखते हैं। समाज को विकृति से बचाए रखते हैं। ये इस बात का प्रतीक है कि नकारात्मक भावों को मन-मस्तिष्क से निकाल कर उदरस्थ कर लो। मल का स्थान मन नहीं आँतें हैं।
गणेश के पैर छोटे-छोटे हैं इसलिए वे तेज़ नहीं दौड़ सकते। मज़बूत पैरों से धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हैं। उनमें उतावलापन नहीं है। आगे बढ़ो लेकिन सहजता से यही संदेश देते हैं गणेश के नन्हें-नन्हें पैर। गणेश के चारों हाथों में से एक में अंकुश है, दूसरे में पाश, तीसरे में मोदक तथा चौथा आशीर्वाद की मुद्रा में। अंकुश प्रतीक है विषय-वासनाओं पर नियंत्रण का तथा पाश प्रतीक है मन तथा इंद्रियों पर नियंत्रण का। इंद्रियों को वश में रख कर मन को नियंत्रित करो उसमें विषय-वासनाओं और विकारों के उत्पन्न होने पर रोक लगाओ। इच्छाओं पर नियंत्राण कर संयमित जीवन जीओ। मनुष्य के जीवन में रूपांतरण तभी संभव है जब भावनाओं को परिष्कृत किया जाए। तभी नए मनुष्य का जन्म संभव है। मोदक प्रतीक है आनंद का, सात्त्विक आहार का। मोदक तत्त्वज्ञान का भी प्रतीक है। निष्काम कर्म द्वारा व्यक्ति कर्म के बंधन से मुक्त होकर आनंद की प्राप्ति करने में सक्षम है। अभय मुद्रा जीवन में निडरता के साथ आगे बढ़ने का संदेश देती है। जब तक किसी भी प्रकार का भय है हम आगे नहीं बढ़ सकते। मृत्यु का भय ठीक से जीने नहीं देता, रोग का भय स्वस्थ नहीं रहने देता, निर्धनता का भय समृद्धि से दूर ले जाता है। निर्भय होकर ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति संभव है।
गणेश का वाहन है नन्हा चूहा जो एक अत्यंत क्षुद्र जीव है। गणेश समता के प्रतीक हैं। उनका सिर पृथ्वी पर सबसे बड़े प्राणी हाथी का तथा वाहन अत्यंत छोटा प्राणी चूहा। समाज के विकास के लिए न केवल सभी वर्गों के लोगों का मिल-जुलकर रहना और कार्य करना अनिवार्य है अपितु धरती पर भी सभी जीवों का अस्तित्व महत्त्वपूर्ण है। इस शृंखला में यदि एक प्राणी की भी उपेक्षा हुई अथवा उसका लोप हो गया तो मानव जीवन संकट में पड़ जाएगा। सामाजिक विकास के साथ-साथ जीव-जंतुओं और प्रकृति के संरक्षण की भी अत्यंत आवश्यकता है। गणेश की प्रतीकात्मकता की प्रासंगिकता मात्र धर्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं अपितु व्यक्ति के स्वयं के विकास, सामाजिक जीवन तथा राष्ट्र की उन्नति के संबंध में भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। गणेश की प्रतीकात्मकता अत्यंत व्यापक है और इसी व्यापकता के कारण गणेशोत्सव मनाने की परंपरा का शुभारंभ और विकास हुआ।
गणेश चतुर्थी अर्थात् गणेश जन्मोत्सव भारत के प्रसिद्ध पर्वों में से एक है। महाराष्ट्र और देश के दूसरे भागों में जहाँ महाराष्ट्र के मूल निवासी रहते हैं वहाँ यह पर्व ग्यारह दिन तक मनाया जाता है। पहले दिन बड़ी धूम-धम से गणेश की सुंदर-सुंदर प्रतिमाएँ स्थापित की जाती हैं और ग्यारह दिन तक पूजा-पाठ करने के उपरान्त अनन्त चतुर्दशी के दिन मूर्तियों को जुलूस के रूप में नाचते-गाते हुए ले जाकर नदी, तालाब या समुद्र के किनारे जल में विसर्जित कर दिया जाता है। गणेश प्रतिमाओं की स्थापना, पूजा-पाठ और विसर्जन घरों में व्यक्तिगत रूप से, गणेश मंडलों अथवा अन्य सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा सामूहिक रूप से, दोनों तरह किया जाता है। महाराष्ट्र में सार्वजनिक रूप से गणेशोत्सव मनाने की परंपरा की शुरूआत उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में लोकमान्य तिलक ने पुणे से की।
वैसे सामूहिक गणेशोत्सव की स्थापना का प्रारंभ १८८५ में शोलापुर के आजोबा गणपति मंदिर में हो चुका था। जब तिलक यहाँ आए तो उन्होंने इस सार्वजनिक गणेशोत्सव से प्रेरणा लेकर १८९३ में पूरे महाराष्ट्र में सामूहिक गणेशोत्सव मनाने की पंरपरा शुरू की जो आज भी विद्यमान है और जिमसें लगातार नये आयाम जुड़ते जा रहे हैं। लोकमान्य तिलक ने धर्म के माध्यम से राजनीतिक व सामाजिक चेतना के विकास के लिए सामूहिक गणेशोत्सव को एक आन्दोलन के रूप में स्थापित किया। उस समय देश को स्वतंत्र कराना एक अहम मुद्दा था। सामूहिक गणेशोत्सव आयोजन के माध्यम से इसकी चेतना का विकास खूब किया गया। आज भी गणेश की पूजा-अर्चना के साथ-साथ समसामयिक समस्याओं को इन आयोजनों के माध्यम से बखूबी प्रस्तुत किया जा रहा है। कई सरकारी और गै़र सरकारी संगठन भी इसमें बढ़-चढ़ कर भाग लेते हैं और इसके ज़रिये अपना संदेश प्रसारित करते हैं। गणेशोत्सव सादगी से मनाने और इसके द्वारा होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए लोगों में जागृति उत्पन्न करने के लिए भी इसी मंच का सहारा लिया जा रहा है। इससे गणेश और गणेशोत्सव दोनों ही आधुनिक संदर्भ में अधिकाधिक प्रासंगिक हो जाते हैं।
तर्क यह दिया जाता है कि अगर हम दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को आरक्षण देते रहना चाहते हैं तो जन-गणना में जाति का हिसाब तो रखना ही होगा| उसके बिना सही आरक्षण की व्यवस्था कैसे बनेगी ? हॉं, यह हो सकता है कि जिन्हें आरक्षण नहीं देना है, उन सवर्णों से उनकी जात न पूछी जाए| लेकिन इस देश में मेरे जैसे भी कई लोग हैं, जो कहते हैं कि मेरी जात सिर्फ हिंदुस्तानी है और जो जन्म के आधार पर दिए जानेवाले हर आरक्षण के घोर विरोधी हैं| उनकी मान्यता है कि जन्म याने जाति के आधार पर दिया जानेवाला आरक्षण न केवल राष्ट्र-विरोधी है बल्कि जिन्हें वह दिया जाता है, उन व्यक्तियों और जातियों के लिए भी विनाशकारी है| इसीलिए जन-गणना में से जाति को बिल्कुल उड़ा दिया जाना चाहिए| यदि 2010 की इस जनगणना में जाति को जोड़ा जाएगा तो वह बिल्कुल निरर्थक होगा क्योंकि आरक्षण की सीमा उच्चतम न्यायालय ने पहले ही बांध रखी है| 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण किसी भी हालत में नहीं दिया जा सकता| यदि आरक्षितों की संख्या 1931 के मुकाबले अब बढ़ गई हो तो भी उनको कोई फायदा नहीं मिलेगा और कुल जनसंख्या के अनुपात में अगर वह घट गई हो तो हमारे देश के नेताओं में इतनी हिम्मत नहीं कि आरक्षण के प्रतिशत को वे घटवा सकें| इसलिए प्रश्न उठता है कि जनगणना में जाति को घसीट कर लाने से किसको क्या फायदा होनेवाला है ?
जाति पर आधारित आरक्षण ने गरीबों और वंचितों का सबसे अधिक नुकसान किया है| आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों को आरक्षण से क्या मिलता है ? सिर्फ नौकरियाँ ! 5-7 हजार लोगों के मुंह में सरकारी नौकरियों की चूसनी (लॉलीपॉप) रखकर देश के 60 करोड़ से ज्यादा वंचितों के मुंह पर ताले जड़ दिए गए हैं| उनके विशेष अवसर, विशेष सुविधा और विशेष सहायता के द्वार बंद कर दिए गए हैं| उन्हें खोलना बहुत जरूरी है| क्या 5 हजार रेवडि़याँ बांट देने से 60-70 करोड़ वंचितों के पेट भर जाएंगे? आरक्षण न सिर्फ उनके पेट पर लात मारता है बल्कि उनके सम्मान को भी चोट पहुंचाता है| जो अपनी योग्यता से भी चुनकर आते हैं, उनके बारे में भी मान लिया जाता है कि वे आरक्षण (कोटे) के चोर दरवाज़े से घुस आए हैं| हमारे नेताओं ने जाति को आरक्षण का सबसे सरल आधार मान लिया था लेकिन अब वह सबसे जटिल आधार बन गया है| अभीआरक्षणकाआधारबहुतसंकराहै, उसेबहुतचौड़ाकरनाजरूरीहै| जाति का आधार सिर्फ हिन्दुओं पर लागू होता है| इसके कारण हमारे देश के मुसलमानों और ईसाइयों में जो वंचित लोग हैं, उनको भी बड़ा नुकसान हुआ है| जिसे जरूरत थी, उसे रोटी नहीं मिली और जिसके पास जात थी, वह मलाई ले उड़ा|
जन-गणना में जाति का समावेश किसने किया, कब से किया, क्यों किया, क्या यह हमें पता है ? यह अंग्रेज ने किया, 1871 में किया और इसलिए किया कि हिंदुस्तान को लगातार तोड़े रखा जा सके| 1857 की क्रांति ने भारत में जो राष्ट्रवादी एकता पैदा की थी, उसकी काट का यह सर्वश्रेष्ठ उपाय था कि भारत के लोगों को जातियों, मजहबों और भाषाओं में बांट दो| मज़हबों और भाषाओं की बात कभी और करेंगे, फिलहाल जाति की बात लें| अंग्रेज के आने के पहले भारत में जाति का कितना महत्व था ? क्या जाति का निर्णय जन्म से होता था ? यदि ऐसा होता तो दो सौ साल पहले तक के नामों में कोई जातिसूचक उपनाम या 'सरनेम' क्यों नहीं मिलते ? राम, कृष्ण, शिव, विष्णु, महेश, बुद्घ, महावीर किसी के भी नाम के बाद शर्मा, वर्मा, सिंह या गुप्ता क्यों नहीं लगता ? कालिदास, कौटिल्य, बाणभट्रट, भवभूति और सूर, तुलसी, केशव, कबीर, बिहारी, भूषण आदि सिर्फ अपना नाम क्यों लिखते रहे ? इनके जातिगत उपनामों का क्या हुआ ? वर्णाश्रम धर्म का भ्रष्ट होना कुछ सदियों पहले शुरू जरूर हो गया था लेकिन उसमें जातियों की सामूहिक राजनीतिक चेतना का ज़हर अंग्रेजों ने ही घोला| अंग्रेजों के इस ज़हर को हम अब भी क्यों पीते रहना चाहते हैं ? मज़हब के ज़हर ने 1947 में देश तोड़ा, भाषाओं का जहर 1964-65 में कंठ तक आ पहुंचा था और अब जातियों का ज़हर 21 वीं सदी के भारत को नष्ट करके रहेगा| जन-गणना में जाति की गिनती इस दिशा में बढ़नेवाला पहला कदम है| इसीलिए हमारे संविधान निर्माताओं और आजाद भारत की पहली सरकार ने जनगणना में से जाति को बिल्कुल हटा दिया था|
1931 में आखिर अंग्रेज 'सेंसस कमिश्नर' जे.एच. हट्टन ने जनगणना में जाति को घसीटने का विरोध क्यों किया था ? वे कोरे अफसर नहीं थे| वे प्रसिद्घ नृतत्वशास्त्री भी थे| उन्होंने बताया कि हर प्रांत में हजारों-लाखों लोग अपनी फर्जी जातियॉं लिखवा देते हैं ताकि उनकी जातीय हैसियत ऊँची हो जाए| कुछ जातियों के बारे में ऐसा भी है कि एक प्रांत में वे वैश्य है तो दूसरे प्रांत में शूद्र| एक प्रांत में वे स्पृश्य हैं तो दूसरे प्रांत में अस्पृश्य ! हर जाति में दर्जनों से लेकर सैकड़ों उप-जातियॉं हैं और उनमें भी ऊँच-नीच का झमेला है| 58 प्रतिशत जातियॉ तो ऐसी हैं, जिनमें 1000 से ज्यादा लोग ही नहीं हैं| उन्हें ब्राह्रमण कहें कि शूद्र, अगड़ा कहें कि पिछड़ा, स्पृश्य कहें कि अस्पृश्य - कुछ पता नहीं| आज यह स्थिति पहले से भी बदतर हो गई है, क्योंकि अब जाति के नाम पर नौकरियॉं, संसदीय सीटें, मंत्री और मुख्यमंत्री पद, नेतागीरी और सामाजिक वर्चस्व आदि आसानी से हथियाएं जा सकते हैं| लालच बुरी बलाय ! लोग लालच में फंसकर अपनी जात बदलने में भी संकोच नहीं करते| सिर्फ गूजर ही नहीं हैं, जो 'अति पिछड़े' से 'अनुसूचित' बनने के लिए लार टपका रहे हैं, उनके पहले 1921 और 1931 की जन-गणना में अनेक राजपूतों ने खुद को ब्राह्रमण, वैश्यों ने राजपूत और कुछ शूद्रों ने अपने आप को वैश्य और ब्राह्रमण लिखवा दिया| जिन स्त्री और पुरूषों ने अंतरजातीय विवाह किया है, उनकी संतानें अपनी जात क्या लिखेगी ? जनगणनाकरनेवालेकर्मचारियोंकेपासकिसीकीभीजातकीजाँच-परखकरनेकाकोईपैमानानहींहै| हरव्यक्तिअपनीजातजोभीलिखाएगा, उसेवहीलिखनीपड़ेगी| वहकानूनीप्रमाणभीबनेगी| कोई आश्चर्य नहीं कि जब आरक्षणवाले आज़ाद भारत में कुछ ब्राह्रमण अपने आप को दलित लिखवाना पसंद करें बिल्कुल वैसे ही जैसे कि जिन दलितों ने अपने आप को बौद्घ लिखवाया था, आरक्षण से वंचित हो जाने के डर से उन्होंने अपने आप को दुबारा दलित लिखवा दिया| यह बीमारी अब मुसलमानों और ईसाइयों में भी फैल सकती है| आरक्षण के लालच में फंसकर वे इस्लाम और ईसाइयत के सिद्घांतों की धज्जियां उड़ाने पर उतारू हो सकते हैं | जाति की शराब राष्ट्र और मज़हब से भी ज्यादा नशीली सिद्घ हो सकती है|
आश्चर्य है कि जिस कांग्रेस के विरोध के कारण 1931 के बाद अंग्रेजों ने जन-गणना से जाति को हटा दिया था और जिस सिद्घांत पर आज़ाद भारत में अभी तक अमल हो रहा था, उसी सिद्घांत को कांग्रेस ने सिर के बल खड़ा कर दिया है| कांग्रेस जैसी महान पार्टी का कैसा दुर्भाग्य है कि आज उसके पास न तो इतना सक्षम नेतृत्व है और न ही इतनी शक्ति कि वह इस राष्ट्रभंजक मांग को रद्द कर दे| उसे अपनी सरकार चलाने के लिए तरह-तरह के समझौते करने पड़ते हैं| भाजपा ने अपने बौद्घिक दिग्भ्रम के ऐसे अकाट्य प्रमाण पिछले दिनों पेश किए हैं कि जाति के सवाल पर वह कोई राष्ट्रवादी स्वर कैसे उठाएगी| आश्चर्य तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मौन पर है, जो हिंदुत्व की ध्वजा उठाए हुए है लेकिन हिंदुत्व को ध्वस्त करनेवाले जातिवाद के विरूद्घ वह खड़गहस्त होने को तैयार नहीं है| समझ मे नहीं आता कि वर्ग चेतना की अलमबरदार कम्युनिस्ट पार्टियों को हुआ क्या है ? उन्हें लकवा क्यों मार गया है ? सबसे बड़ी विडंबना हमारे तथाकथित समाजवादियों की है| कार्ल मार्क्स कहा करते थे कि मेरा गुरू हीगल सिर के बल खड़ा था| मैंने उसे पाव के बल खड़ा कर दिया है लेकिन जातिवाद का सहारा लेकर लोहिया के चेलों ने लोहियाजी को सिर के बल खड़ा कर दिया है| लोहियाजी कहते थे, जात तोड़ो| उनके चेले कहते हैं, जात जोड़ो| नहीं जोड़ेंगे तो कुर्सी कैसे जुड़ेगी ? लोहिया ने पिछड़ों को आगे बढ़ाने की बात इसीलिए कही थी कि समता लाओ और समता से जात तोड़ो| रोटी-बेटी के संबंध खोलो| जन-गणना में जात गिनाने से जात टूटेगी या मजबूत होगी ? जो अभी अपनी जात गिनाएंगे, वे फिर अपनी जात दिखाएंगे| कुर्सियों की नई बंदर-बांट का महाभारत शुरू हो जाएगा| जातीय ईर्ष्या का समुद्र फट पड़ेगा| आजाद भारत के इतिहास में यह पहला मौका है कि जब सारे राजनीतिक दल एक तरफ हैं और भारत की जनता दूसरी तरफ ! इस मुद्दे पर भारत के करोड़ों नागरिक जब तक बगावत की मुद्रा धारण नहीं करेंगे, हमारे नेता निहित स्वार्थों में डूबे रहेंगे| जो लोग अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में जाति के जाल में फंसे रहना चाहते हैं, फंसे रहें लेकिन राष्ट्र के राजनीतिक जीवन में से जाति का पूर्ण बहिष्कार होना चाहिए|
दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, ग्रामीणों, गरीबों को आगे बढ़ाने का अब एक ही तरीका है| सिर्फ शिक्षा में आरक्षण हो, पहली से 10 वीं कक्षा तक| आरक्षण का आधार सिर्फ आर्थिक हो| जन्म नहीं, कर्म ! आरक्षण याने सिर्फ शिक्षा ही नहीं, भोजन, वस्त्र्, आवास और चिकित्सा भी मुफ्त हो| प्रत्येक व्यक्ति शिक्षा के माध्यम से सक्षम बने और जीवन में जो कुछ भी प्राप्त करे, वह अपने दम-खम से प्राप्त करे| यहविशेषअवसरकेसिद्घांतकासर्वश्रेष्ठअमलहै| इस व्यवस्था में जिसको जरूरत है, वह छूटेगा नहीं और जिसको जरूरत नहीं है, वह घुस नहीं पाएगा, उसकी जात चाहे जो हो| जातपरआधरितनौकरियोंकाआरक्षणचाहेतोअभीकुछसालऔरचलालेंलेकिनउसेसमाप्ततोकरनाहीहै| जात घटेगी तो देश बढ़ेगा| वोट-बैंक की राजनीति को बेअसर करने का एक महत्वपूर्ण तरीका यह भी है कि देश में मतदान को अनिवार्य बना दिया जाए| जन-गणना से जाति को हटाना काफी नहीं है, जातिसूचक नामों और उपनामों को हटाना भी जरूरी है| जातिसूचक नाम लिखनेवालों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध होना चाहिए| उन्हें सरकारी पदों और नौकरियों से वंचित किया जाना चाहिए| यदि मजबूर सरकार के गणक लोगों से उनकी जाति पूछें तो वे या तो मौन रहें या लिखवाऍं – ‘मैं हिंदुस्तानी हूं’| हिंदुस्तानी के अलावा मेरी कोई जात नहीं है|
एक दिन में तीन खेल समाचार। पहला विश्वनाथन आनन्द के विश्व चैस चैम्पयिन बनने, अजलान शाह हॉकी कप में अब तक के शानदार भारतीय प्रदर्शन तथा श्रीलंका के हाथों हार कर भारत के वैस्ट इंडीज़ में चल रही विश्व टी-20 प्रतियोगिता से बाहर होने का। हर बार की तरह आनन्द तो विश्व चैंपयिन बनने के बाद भी समाचार-पत्रों या खबरिया चैनलों में हाशिए पर ही सिमटे रहे, हॉकी में भी कमोबेश यह हाल रहा, पर क्रिकेट टीम हारने के बाद भी सुर्खियों में बनी हुई है। खबरिया चैनलों में उसके हारने का पोस्टमार्टम हो रहा है। भारतीय टीम के हारने की मुख्य वज़ह आईपीएल प्रतियोगिता का आयोजन बताया जा रहा है। महीने भर से अधिक चली आईपीएल प्रतियोगिता में भले ही बीसीसीआई, आईपीएल टीमों से जुड़े महानुभावों तथा खिलाडिय़ों ने करोड़ों कूट डालें हो, पर कुल मिलाकर देश में घाटे में रहा। पिछली टी-20 विश्व प्रतियोगिता की तरह इस मर्तबा भी हम बड़े बेआबरू होकर क्रिकेट के कूचे से बाहर निकल आए। लगातार तीन हार देखने का अर्थ है, अब आत्मविश£ेषण तथा आत्मविवेचन का समय आ चुका है। बतौर राष्ट्र हमें देखना होगा कि हमें क्या चाहिए, आईपीएल का तमाशा या फिर भारत का सम्मान। फिलहाल तो बस एक ही सुकून की बात है कि हम प्रथम टी-20 विश्व प्रतियोगिता के विजेता हैं। अब तो शेष आईपीएल ही बचता है। पिछली बार की तरह इस बार भी हमारे मुख्य खिलाड़ी चोटिल होने की वज़ह से टीम से बाहर रहे और जो इन-फॉर्म बैट्समैन या बॉलर नहीं थे, उन्हें उनके हालिया प्रदर्शन के बूते पर नहीं विगत में उनकी उपलब्धियों के आधार पर टीम में स्थान दिया गया। शायद कि पुन: कोई चमत्कार होगा और एक ओवर में छह छक्के मारने या प्रतियोगिता में सर्वाधिक स्कोर बनाने का रिकॉर्ड प्रभु कृपा से पुन: बन जाए। लेकिन खुद डूबने वालों को तो भगवान भी नहीं बचाते। आईपीएल प्रतियोगिता को यदि टी-20 विश्व कप प्रतियोगिता में चयन का आधार नहीं बनाया जाना था तो उसके आयोजन के मायने क्या थे? आईपीएल में अधिकतर पिटे हुए खिलाडिय़ों को ही इस राष्ट्रीय टीम में जगह मिली और सौरभ तिवारी, रायडु सरीखे मेधावी खिलाड़ी अब शायद अगले आईपीएल में ही दिखें। कप्तान धोनी की आईपीएल टीम ने भले ही इस साल की आईपीएल प्रतियोगिता जीती हो, पर बतौर राष्ट्र हमें केवल शर्मिंदगी ही उठानी पड़ी। पहले चक्र में अफगानिस्तान की बेहद कमज़ोर तथा ऑऊट ऑव फार्म चल रही दक्षिण अफ्रीका की टीमों को हराने के बाद हम अपनी टीम का स्तुति गान करते रहे, पर सुपर एट में आस्ट्रेलिया, वेस्ट इंडीज़ तथा श्रीलंका ने हमें औकात बता दी। कुछ खबरिया चैनल तो श्रीलंका के साथ होने वाले भारत के अंतिम मैच आरंभ होने तक घोर आशावादी बने रहे तथा क्रिकेट विशेषज्ञों के साथ केवल यही चर्चा करते दिखे कि किस तरह भारतीय टीम सेमी फाईनल में पहुंच सकती है। कौन सी टीम के हारने पर हमें लाभ मिलेगा और श्रीलंका भारत से कितने रन से पिटे या कितनी विकेट से हारे कि भारत अंतिम चार में जगह बना सके। मानो शेष टीमें भारत को अंतिम चार में पहुंचाने के लिए हारने को तैयार बैठी हैं और आईपीएल में अपने पिटे हुए खिलाडिय़ों को खिलाने के फलस्वरूप भारत का धन्यवाद करना चाहती हैं। बतौर राष्ट्र हम यह भूल रहे हैं कि दूसरे की लाशों पर अपने महल नहीं बनते, उसके लिए अपनी ज़मीन पुख्ता करनी होगी, योजनाएं बनानी होंंगी और पसीना बहाना होगा। पर क्रिकेट ही क्यों देश में तमाम खेलों से चलने वाला खिलवाड़ तब तक नहीं रुक सकता, जब तक हम खेल संगठनों में कथित मठाधीशों को बाहर नहीं निकालते। भारतीय खेल मंत्रालय द्वारा हाल ही में खेल प्रबंधन को पेशेवर, पारदर्शी तथा उत्तरदाई बनाने के लिए खेल महासंघों के पदाधिकारियों पर कार्यकाल और उम्र सीमा को दोबारा लागू करने के निर्णय से कुछ आस बंधी है। खेल मंत्री एमएस गिल इसके लिए बधाई के पात्र हैं। खेल की दुनिया में उनके इस कदम को भले ही लाख क्रान्तिकारी कहा जाए पर एक करोड़ टके का सवाल है कि क्या खेल महासंघों के तथाकथित मठाधीश ऐसा होने देंगे। काबिलेगौर है कि भारत में इस समय विभिन्न खेल स्पर्धाओं के 37 संघ या परिसंघ है। इनमें से अधिकांश पर वही लोग काबिज हैं जो राजनीति के धुरंधर हैं, जिन्हें खेल का तो अलिफ, बे तक पता नहीं, पर जो लोग इन संघों की कुर्सियों को बपौती समझ उनके खजाने पर एनाकोंडा की भांति चिपके हुए हैं और तकरीबन हर अच्छे खिलाड़ी को अपना शिकार बनाने से गुरेज नहीं करते। काफी समय से विभिन्न खेल स्पर्धाओं के संघों या परिसंघों के कामकाज में मनमर्जी और धांधलियों के किस्से अक्सर सामने आते रहे हैं। क्रिकेट में मोहिन्दर अमरनाथ, मनन्दिर सिंह सरीखे खिलाड़ी तो हॉकी में पिल्ले, परगट सिंह सहित अन्य खेलों में अभिनव ब्रिंदा, सुनीता आदि ऐसे कुछ नाम हैं। शायद इसी वज़ह से सालों से इन संघों में कुंडली मारे राजनेताओं, व्यापारियों और अधिकारियों को ‘मठाधीश’ या ‘नाग’ जैसी संज्ञाओं से परिभाषित किया जाने लगा। खेलों को सभी संघों में बैठे इन अर्थ-पिशाचों के चंगुल से छुड़ाने के लिए ही खेल मंत्रालय ने 1975 के नियम में संशोधन का निर्णय लिया है। अब कोई भी व्यक्ति खेल संघों या परिसंघों के सचिव तथा कोषाध्यक्ष के पद पर चार-चार साल के दो कार्यकाल से अधिक बना नहीं रह सकेगा। अध्यक्ष पद के लिए अधिकतम सीमा 12 साल तय की गई है। संघों या परिसंघों के पदाधिकारियों के लिए रिटायरमैंट की उम्र सत्तर साल निर्धारित की गई है। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने अपने शासनकाल में नियमों में बदलाव कर नई शुरूआत की थी, पर कालान्तर में उनके फैसलों को धत्ता बता दिया गया। कारण है दशकों से इन संघों या परिसंघों पर काबिज यह लोग इतने बलशाली हैं कि उनके सामने सभी नतमस्तक हो जाते हैं। विभिन्न क्षेत्रों तथा पृष्ठभूमियों से संबधित यह लोग भले ही मु$खतलिफ विचारधाराओं या नीतियों का ढोल बजाते हों, पर ये लोग भ्रष्टाचार एवं स्वार्थों के समन्दर के ऐसे ऑक्टोपस हैं जो अपने हितों के लिए एकजुट हैं और उनकी पकड़ से इन संघों या परिसंघों को छुड़ाना टेढ़ी खीर है। कई लोग तो पिछले तीन दशकों से इन खेल संगठनों के पदों पर सुशोभित हैं। अपने कब्जों को जायज़ बताने वाले इन सभी महानुभावों के तर्क भी अज़ीबोगरीब हैं। कुछ सरकार के इस फैसले को गलत करार दे रहे हैं तो कुछ कह रहे हैं कि सभी संघ या परिसंघ ओलपिंक चार्टर से बंधे हैं और खेल संघों की स्वायत्ता की बात करता है। ऐसी परिस्थितियों में खेल संगठनों को इन अजदहों के चंगुल से निकालना किसी भी सरकार के लिए चंबल के बीहड़ों में घुसने जैसा है। यह पदाधिकारी अपने महासंघों की मोटी रकम खेल तथा खिलाडिय़ों के भले के स्थान पर अपने विदेशी दौरों तथा मनोरंजन के लिए करते हैं और भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देते हैं। साथ ही खेलों की आड़ में राजनीतिक तथा व्यापार अलग से चलता है। दिल्लीहाई कोर्ट के हस्तक्षेप से ही इन कथित मठाधीशों के सिंहासन डोले हैं, पर आशंका अभी यही है कि इनके द्वारा कहीं सरकार के इस निर्णय को अदालती दाव-पेचों में उलझाकर उद्देश्यहीन न बना दिया जाए। ऐसे में सभी देशवासियों के साथ खेलों से जुड़े तमाम विवादों की निष्पक्ष रिपोर्टिंग तथा विवेचन से मीडिया भारतीय खेल जगत की प्रतिष्ठा को बचाने के पुनीत कार्य का जिम्मा तो उठा ही सकता है।
यूँ तो मेंढक राजा बहुत खुश थे अपनी कुँए की राजधानी में, राजकाज भी अच्छा ही चल रहा था, बस अपने रिश्तेदारों से परेशान रहते थे, जो कि आदतों से मजबूर थे। वे उनके हर काम में दखल देने की कोशिश करते और उनके खिलाफ तरह-तरह की साजिशें रचते रहते।
एक दिन परेशान और क्रुद्ध मेढक राजा ने योजना बनायी कि कैसे इनसे छुटकारा पाया जाए और वे चल दिए पास में ही रहते क्रूर सांप के पास। सांप बूढ़ा हो चला था और उससे अब शिकार विकार होता नहीं था , उसने झट से खाने के लिए एक मेढक रोज वाला सौदा स्वीकार लिया और मेढक राजा की राजधानी में आकर उन्हीके पास रहने लगा चालाक साँप। मेढक राजा भी बहुत खुश थे । धीरे -धीरे उनके शत्रु कम होते जा रहे थे और साँप का दैनिक आहार थे। सबकुछ अच्छा और मेढक राजा के मन माफिक चल रहा था उसदिन तक, जब सारे शत्रु मेढक के पेट में पहुँच गए और सांप उनके सामने ही उनके बेटे को भी निगल गया।
क्रुद्ध मेढक ने साँप को तुरंत ही कुँए से बाहर जाने का हुक्म दिया। सुनकर साँप ठठाकर हँस पड़ा। बोला, मूर्ख अब मैं कहाँ जाऊंगा। जबतक कि यहाँ एक भी मेढक है, यही मेरा घर है और तुम सभी मेरा आहार हो। सुनकर मेढक तो लगा थरथर कांपने। पर करता भी तो क्या करता, बलवान शत्रु को अपने घर में दावत का आमंत्रण भी तो खुद उसी का ही था।
(हितोपदेश की कहानी पर आधारित ) वर्णन -शैल अग्रवाल
एक सवाल
आओ, पूछें एक सवाल मेरे सिर में कितने बाल ? कितने आसमान में तारे ? बतलाओ या कह दो हारे नदिया क्यों बहती दिन रात ? चिड़ियाँ क्या करती हैं बात ? क्यों कुत्ता बिल्ली पर धाए ? बिल्ली क्यों चूहे को खाए ? फूल कहाँ से पाते रंग ? रहते क्यों न जीव सब संग ? बादल क्यों बरसाते पानी ? लड़के क्यों करते शैतानी ? नानी की क्यों सिकुड़ी खाल ? अजी, न ऐसा करो सवाल यह सब ईश्वर की है माया इसको कौन जान है पाया !