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                                         सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर
                                                        लेखनी-अप्रैल-2010  

 


 


                               

                             मेरी दास्ताँ का उरूज था तेरी नर्म पलकों की छाँव में  

                                  मेरे साथ था तुझे जागना तेरी आँख कैसे झपक गई 

                                                                            -बशीर बद्र                                          


                                                                          


                                                                  तारे दूर के


                                                              ( वंचना विशेषांक)                                                            


                                                           (लेखनी-वर्ष-4-अँक-38)  


इस अंक में- कविता धरोहरः महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, रामकुमार वर्मा। माह विशेषः निदा फाजली। माह के कविःअखतर अली। कविता आज और अभीः महेन्द्र भटनागर, सुदर्शन प्रियदर्शिनी, रचना श्रीवास्तव, अजय पराशार, सुरेश पण्डा। बाल- गीतः शैल अग्रवाल।   


मंथनः अमृता प्रीतम। सरोकारः प्रभु जोशी। कहानी धरोहरः आचार्य चतुरसेन शात्री। कहानी समकालीनः शमोएल अहमद। कहानी समकालीनः शैल अग्रवाल।  लघुकथाः निर्मला सिंह। आकलनः वीरेन्द्र यादव। हास्य व्यंग्यः अजय पाराशर। परिचर्चाः भोलानाथ गोयल। चौपालः वेदप्रताप वैदिक। बालकहानीःओमप्रकाश कश्यप।

                                                          संरचना व संपादनः शैल अग्रवाल

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                                                                                                                                                           अपनी बात

दूर होते हुए भी तारे जीवन में बचपन से ही झिलमिलाने लग जाते हैं ...आकाश में ही नहीं, बालगीतों और परी कथाओं में ही नही, आँखों में भी आ बसते है ये, कभी सपना बनकर तो कभी आंसू बनकर। बात आंख के तारे की हो या फिर टूटते तारे की, इनकी हर बात सीधी मन से ही तो जुड़ी  है।

कहते हैं हर तारा अपने में एक सूरज होता है। बस अपने सूरज से दूर, इसीलिए बिना गर्मी बिना रौशनी के टिमटिमाता सा दिखता है। यह सूरज और इसका सारा सौर मंडल ( गृह-उपगृह) बूढ़े होकर नष्ट भी होते हैं और नए  पैदा भी होते रहते हैं,  उसी एक बड़ी काली सुरंग से, जिसे ‘ब्लैक होल’के नाम से जाना जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह एक बड़ी गहरी मैगनेटिक फील्ड है, जो आसपास गुजरती हर चीज को अपने गुरुत्वाकर्षण के बल पर खुद में खींचकर तिरोहित कर लेती है। बिल्कुल जीवन-सा ही तो दर्शन है यह भी...।


अपने ही भ्रम और अज्ञान में फंसा , इच्छाओं के ब्लैक होल की तरफ स्वतः ही खिंचता आदमी; एक मिथ्या जीवन जीता...दिन-प्रतिदिन विनाश की ओर अग्रसर। पहले तो इन नक्षत्र और गृह उपगृहों की तरह सब कुछ बेहद आकर्षक, रहस्यमय और चमकीला, अपनी ओर खींचता हुआ-सा, फिर इच्छाओं के काले गढ्ढे में स्वाहा और समाप्त...जीवन और मृत्यु-सा ही, एक लगातार  रोज का सिलसिला।


पर यह मिलना और बिछुड़ना ही तो जीवन-क्रम है। जीवन का सुख-दुःख हैं। कितना ही हम इनपर आँख लगाकर बैठे रहें , मन कभी नहीं ऊबेगा। हटना नहीं चाहेगा। इनके नए-नए रहस्यों में डूबता ही चला जाएगा। इनके प्रति मानव के आकर्षण की दीवानगी तो इस हद तक है कि इनकी गति और स्थिति के सहारे  वह खुद ही अपने भाग्य तक को जोड़ लेता है( ज्योतिष विज्ञान)। पूरे जीवन की योजना न सिर्फ रेखांकित कर लेता है अपितु पढ-समझकर विश्वास भी कर बैठता है। क्यों न करे ,  सूरज, चाँद , तारों का प्रभाव भूमंडल पर उसका देखा और जाना-पहचाना है।


" देखा है बौने जलधर का शशि छूने को ललकना, वो हाहाकार मचाना, फिर उठ-उठकर यूँ गिरना।" जयशंकर प्रसाद।     


साहित्याकाश का  ऐसा ही एक जगमग सितारा गत वर्ष तीस दिसंबर को देहली, भारत में जीवन-मृत्यु के जाने किस सागर  में जा डूबा और हमारी आँखों के आगे से विलीन हो गया। लेखनी परिवार की तरफ से दिवगंत आत्मा को  भावभीनी श्रद्धांजली।राजेन्द्र अवस्थी जी  की दार्शनिक सोच सदा ही सारगर्भित थी और तर्कसंगत भी। कादम्बिनी का कालचिंतन नामक स्तंभ अक्सर ही न सिर्फ स्तंभित करता था अपितु सोचने पर भी मजबूर करता था। आज जब हमारी बाह्य और आंतरिक संरचना कुछ ऐसे सांचे में ढलती जा रही है कि- "सूरज को चोंच में लिए मुरगा खड़ा रहा/खिड़की के पर्दे खींच दिए, रात हो गई "      -निदा फाजली । 


तो उनकी ये पंक्तियां हमारी सोच को  एक और आयाम देती हैं---


"--अज्ञान का पोषण, ज्ञान का सबसे बड़ा क्षय है ।
--यह होते हुए भी अज्ञान सार्थक भी है । अज्ञान तो कर्मों को बल मिलेगा ।
--ज्ञानी बनने के लिये कार्मिक-क्षमता को संघर्ष के शतरंज से गुजरना होगा ।
--शतरंज के मायाजाल में फँसकर बुद्धिबल का यज्ञ करना जरूरी है । यज्ञ से ही शक्तियाँ मिलती हैं । यज्ञ से ही वयुमण्डल का प्रदूषण निर्मल होता है ।
--यज्ञ तत्वों का क्षार नहीं है, वह क्षार होते तत्वों से पवित्रता के महामंत्र निर्मित करता है ।"......

-राजेन्द्र अवस्थी। 


तारों में ध्रुवतारा भी है, अँधेरी-से-अँधेरी रात में भी डगमग न  होने वाला। तारों के लिए अँधेरा वही काम करता है, जो जिज्ञासु की पिपासा के लिए अज्ञान करता है...और अधिक निखारने व चमकाने का।   क्या स्थान है आखिर  इन तारों का हमारे जीवन में ? किस रूप में देखते हैं हम इन्हें...प्रेरक और मार्ग निर्देशक, सपने और आकांक्षाएँ...जैसा कि कथा-कहानियों और साहित्य या कला में चित्रित किया जाता है या फिर अतृप्त और टूटे सपने , बिछुड़े मीत  ...हमसे दूर कहीं अज्ञात लोक में जा छिटके। कल्पना का अद्भुत संसार रचते हैं ये तारे भी। बचपन से ही जब-जब इन टिमटिमाते तारों को देखा है कल्पना का मानो एक सागर-सा उमड़ा है आँखों के आगे। परीलोक, स्वर्ग, भगवान का घर, या फिर योगियों जैसी अटूट साधना करता कोई सिद्धपुरुष-जाने कैसी–कैसी अद्भुत उड़ानें ली हैं कल्पना ने इनके आगे। कभी-कभी तो मानव समाज इनके दर्शन मात्र से भयभीत तक हुआ है और उन्हें आगामी विनाश का ध्योतक तक मान बैठा है ( पुच्छल तारा)।


आज जब पता चल चुका है कि ये चंदा-तारे, सूरज...(काफी हद तक खुद हम भी) कुछ और नहीं...बस गैस और गंधक के सोते मात्र हैं...एक रसायनिक प्रक्रिया हैं। जानते हुए भी कि यह मात्र एक छलना ही है ...उसी छलना में ही क्यों डूबे रहना चाहता है मन ? क्योंकि छलना ही तो भरमाती है, जितना दुःख देती है, उतना ही सुख भी तो देती है यह।...

अप्रैल के महीने की पहली तारीख ( मूर्ख दिवस) पर प्रस्तुत है लेखनी का यह अंक इन्ही जीवन की मनभावन इन्द्रधुनषी छलनाओं पर ...मानव मन के अनगिनत जाने-अनजाने भ्रमों पर..किसी भी वजह से, और चाहे कितने ही दूर क्यों न हों, झिलमिलाते इन लाखों जाने-अनजाने तारों पर।...   

                                                                                                                   -शैल अग्रवाल

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                                                                                                                                                  कविता धरोहर

यह व्यथा की रात का कैसा सबेरा है ?










ज्योति-शर से पूर्व का
रीता अभी तूणीर भी है,
कुहर-पंखों से क्षितिज
रूँधे विभा का तीर भी है,
क्यों लिया फिर श्रांत तारों ने बसेरा है ?

छंद-रचना-सी गगन की
रंगमय उमड़े नहीं घन,
विहग-सरगम में न सुन
पड़ता दिवस के यान का स्वन,
पंक-सा रथचक्र से लिपटा अँधेरा है ।

रोकती पथ में पगों को
साँस की जंजीर दुहरी,
जागरण के द्वार पर
सपने बने निस्तंद्र प्रहरी,
नयन पर सूने क्षणों का अचल घेरा है ।

दीप को अब दूँ विदा, या
आज इसमें स्नेह ढालूँ ?
दूँ बुझा, या ओट में रख
दग्ध बाती को सँभालूँ ?
किरण-पथ पर क्यों अकेला दीप मेरा है ?

यह व्यथा की रात का कैसा सबेरा है ।


                         -महादेवी वर्मा











झिलमिल तारे








कर रहे प्रतीक्षा किसकी हैं
झिलमिल-झिलमिल तारे?
धीमे प्रकाश में कैसे तुम
चमक रहे मन मारे।।

अपलक आँखों से कह दो
किस ओर निहारा करते?
किस प्रेयसि पर तुम अपनी
मुक्तावलि वारा करते?

करते हो अमिट प्रतीक्षा,
तुम कभी न विचलित होते।
नीरव रजनी अंचल में
तुम कभी न छिप कर सोते।।

जब निशा प्रिया से मिलने,
दिनकर निवेश में जाते।
नभ के सूने आँगन में
तुम धीरे-धीरे आते।।

विधुरा से कह दो मन की,
लज्जा की जाली खोलो।
क्या तुम भी विरह विकल हो,
हे तारे कुछ तो बोलो।

मैं भी वियोगिनी मुझसे
फिर कैसी लज्जा प्यारे?
कह दो अपनी बीती को
हे झिलमिल-झिलमिल तारे!  


     -सुभद्रा कुमारी चौहान





      





रजनीबाला










इस सोते संसार बीच जग कर सज कर रजनीबाले
कहाँ बेचने ले जाती हो ये गजरे तारों वाले

मोल करेगा कौन सो रही है उत्सुक आँखे सारी
मत कुम्हलाने दो सूनेपन में अपनी निधियां न्यारी

निर्झर के निर्मल जल में ये गजरे हिला हिला धोना
लहर लहर कर यदि चूमे तो किंचित विचलित मत होना

होने दो प्रतिबिम्ब विचुम्बित लहरों ही में लहराना
लो मेरे तारों के गजरे - निर्झर स्वर में ये गाना

यदि प्रभात तक कोई आकर तुमसे हाय न मोल करें
तो फूलों पर ओस रूप में बिखरा देना सब गजरे

                         -रामकुमार वर्मा

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                                                                                                                                                               माह विशेष

                                                                                                                                                           -निदा फ़ाजली

     दूर का सितारा










मैं बरसों बाद
अपने घर को तलाशता हुआ
अपने घर पहुँचा

लेकिन मेरे घर में
अब मेरा घर कहीं नहीं था
अब मेरे भाई
अजनबी औरतों के शौहर बन चुके थे

मेरे घर में
अब मेरी बहनें
अनजान मर्दों के साथ मुझसे मिलने आती थीं

अपने अपने दायरों में तक़सीम
मेरे भाई बहन का प्यार
अब सिर्फ तोहफों का लेन देने बन चुका था

मैं जब तक वहाँ रहा
शेव करने के बाद
ब्रश, क्रीम, सेफ्टी रेजर
खुद धोकर अटैची में रखता रहा

अब मेरे घर में
वह नहीं थे
जो बहुत सों में बंटकर भी
पूरे के पूरे मेरे थे
जिन्हें हर खोई चीज का पता था

मुझे काफी देर हो गई थी
देर हो जाने पर हर खोया हुआ घर
आस्मां का सितारा बन जाता है
जो दूर से बुलाता है
लेकिन पास नहीं आता है।









बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी मां











बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी मां
याद आती है चौका बासन, चिमटा फुकनी जैसी मां

चिड़ियों की चहकार में गूंजे राधामोहन अली अली
मुर्ग़े की आवाज़ से खुलती घर की कुंडी जैसी मां

बान की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी भरी दोपहरी जैसी मां

बीवी, बेटी, बहिन, पड़ोसन थोड़ी-थोड़ी सी सबमें
दिन भर इक रस्सी के ऊपर चलती नटनी जैसी मां

बांट के अपना चेहरा, माथा, आँखें जाने कहाँ गयी
फटे पुराने इक एलबम में चंचल लड़की जैसी मां


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                                                                                                                                                         माह के कवि

                                                                                                                                                          अख्तर अली


      कविता








"ज़रा सुनिये "
पढ़ने से पहले ज़रा सुनिये-
मै कविता हूँ
जन्म स्थान और तारीख
तो याद नही
लेकिन उम्र कई सालो से
सोलह है और सदा                                                                          
सोलह की ही
रहूँगी, क्योकि मै
कविता हूँ और कविता
कभी बूढ़ी नही
होती ।
मेरे पास लम्बाई नही है
लम्बाई चाहिये तो कहानी
निबंध और उपन्यास के
पास जाईये
मेरे पास केवल गहराई है ।
अगर आपके मन की चक्की मे
लाभ हानि की पिसाई
चल रही है तो
आपके लिये राशिफल
पढ़ना ही ठीक
रहेगा ।
यदि केवल टाईम पास
ही करना है तो
पढ़िये व्यंजन बनाने की
विधि और खाईये
खीर ।
आपके पास अतिरिक्त विवेक हो
तो ही मुझे पढ़िये
क्योकि मेरे यहां वह भी
पढ़ना होगा जो लिखा
नही है ।
केवल ही ही फी फी
ही करना है तो
कृपया पृष्ठ पलटिये
आगे चुटकुले भी
तो है । 





                  


          पेट








शरीर का सबसे हरामी अंग
एक दम जिद्धी
रोटी होना तो बस होना
चाहे जैसे ।
सारी चालाकी, होशियारी , और
चंटपन धरा रह जाता है  जब पेट अपनीवाली पर आता है                                                                                                                                                                                           सारी ईमानदारी वही घुस जाती है निकली थी जहां से
कितने भी जुगाडू हो  नेता , अभिनेता , पुलिस
और साहूकार को पटा सकने की क्षमता भले हो
पर कोई माई का लाल ऐसा नही है जो पेट को पटा सके
पेट जिस्म का वह पार्ट है जो न पटता है और न ही
मिट्टी से पाटा जा सकता है
शरीर वह संसद है जिसमे पेट विपक्ष की भूमिका
अदा करता है
नाक के पास पेट नही लेकिन
पेट के पास नाक है
कुत्ते की नाक
पेट वह युद्धभूमि है जिसमें मस्तिश्क
भूख से युद्ध करते हुए रोटी के हाथो
मारा जाता है
सोच अगर गांधी है तो पेट है
नाथूराम गोड़से
जिस्म की बस्ती में
पेट की स्थति बहुसंख्यको की तरह है
और बुद्धि उपेक्षित है अल्पसंख्यको की
भांति
जां निसार अखतर बुद्धि से लिखते थे
सो अमर हुए
जावेद अखतर पेट से लिखते है
सो अमीर हुए
किसी पेट में पकवानो का सम्मेलन
चल रहा होता है
तो किसी पेट में लगा रहता है
अन्न का करफ्यू
किसी शरीर मे कुछ नही दिखता सिवाय
पेट के और
कुछ शरीर मे सब कुछ दिखता है सिवाय
पेट के
किस पेट में क्या पल रहा है
यह समय की कोई दाई नही
बता सकती
शिकायत नही कि उपर वाले ने
पेट क्यो दिया ?
बल्कि आभार कि हाथ पैर कान आंख की तरह
दो नही दिया ।



                   






            प्रेम







 

प्रेम किसी कम्पनी का प्रोड़क्ट नही है
लेकिन फिर भी इसका मूल्य है।
अपना बाज़ार भाव है।
अपने उपभोक्ता है।
मांग है। पूर्ति है।
इसमे कभी मंदी नही आती,
प्रेम के सेंसेक्स मे कभी
गिरावट दर्ज नही हुई।
प्रेम निर्माण की जानकारी
देते हुए विशेशज्ञ
बताते है -
प्रेम के उत्पादन के लिये
हृदय के प्लांट को
आंखो की माईंन्स से
कच्चे माल की सप्लाई
होती है।
मन की मशीनरी उसे
प्रेम के सांचे मे ढ़ालती है।
सांसे तराशती हैं।
और होठ उसमे
रंग भरते है।

गालो के शो रूम में
उमंग इसे लॉच करती है।
इशारे करते है विज्ञापन।
और परिवहन,
मुस्कान करती है।

चाहत के गोदाम में
प्रेम मौजूद है
लेकिन कोई उड़नदस्ता
इसे जप्त नही कर सकता
क्योकि मन के कम्प्यूटर मे प्रेम
एक हीडन फाईल की
तरह है ।

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                                                                                                                                            कविता आज और अभी


                                                                                                                                                         दो कविताएँ


        


          कचनार








पहली बार
मेरे द्वार
रह-रह
गह-गह
कुछ ऐसा फूला कचनार
गदराई हर डार! 


इतना लहका
इतना दहका
अन्तर की गहराई तक
पैठ गया कचनार! 


जामुन रंग नहाया
मेरे गैरिक मन पर छाया
छ्ज्जों और मुँडेरों पर
जम कर बैठ गया कचनार! 


पहली बार
मेरे द्वार
कुछ ऐसा झूमा कचनार
रोम-रोम से जैसे उमड़ा प्यार!
अनगिन इच्छाओं का संसार!

पहली बार
ऐसा अद्‌भुत उपहार!


     -महेन्द्र भटनागर








    वंचना








जिसको समझा था वरदान
वही अभिशाप बन गया !

चमका ही था अभिनव चाँद
गगन में मेघ छा गये,
महका ही था मेरा बाग
कि सिर पर वज्र आ गये,

जिसको समझा था शुभ पुण्य

वही कटु पाप बन गया !

जिसको पा जीवन में स्वप्न
सँजोये ; व्यंग्य अब बने,
जगमग करता जिन पर स्वर्ण
वही अब क्षार से सने,

जिसको समझा था सुख-सार

वही संताप बन गया !


  –महेन्द्र भटनागर




***






अनहद नाद









एक धुंध भरी 
उदास सी शाम    
झुटपुटे में
तिरोहित होती
अपनी अपनी
विवशताओं के साथ
कहीं मेरे अन्दर
सृष्टि कर जाती है
ए़क अतीन्द्रिय 
गहन मन प्राण का राग
इस कोहरे से ढके
तन में अन्दर ही अन्दर
बजता है
सुरों की तरह
ब़िखर जाता है
बैराग  
मन की आंखो में
एक अलमस्त सा
बुरॉस   
अपनी पूरी लाली के साथ
खिल कर
संगीत के सातों स्वरों सा
छेङ देता है
एक अहनद राग।


   - सुदर्शन प्रियदर्शिनी








      प्रतीक्षा








मोहाविष्ट हो                        
    निरन्तर                                                                                                                                                                     तुम्हारे रूप                                                                                                                                                                          सौन्दर्य से अभिभूत                      
     प्रेम से परे                               
    किसी कूची का      
     रंग भर कर                              
    एक कल्पना को संजोने
     उम्र भर
     केवल प्रतीक्षा में                                ।
     मोहाविष्ट सी  
     तुम्हारी आतुर पुकार की
     व्याकुल
     शव्द श्रवण को
     मधु म़िश्रित                             
     ओष्ठों की तृषा 
     आकुलता को द्वृटिगत करने                   
     कई ऋतु की
     प्रतीक्षा से


       -सुदर्शन प्रियदर्शिनी





***








      बाबूजी








अमरईया की छाँव से
पूरब के एक गाँव से
सोन्धे शीतल बाबूजी
जेठ में लूह की धार से
सावन की पड़ती फुहार से
नरम गरम  बाबूजी
दरवाजे पर लटके ताले से
आँगन में लगे जाल से
सुरक्षा की मजबूत कड़ी बाबूजी
गीतों में लोक गीत से
सदियों से चली आ रही रीत से
कभी न बदले बाबूजी
परीक्षा के प्रश्न पत्र से 
विद्यालय के नए सत्र से
सदा डराते बाबूजी
उबलते पानी पर रखे ढक्कन से
भाड़ में भुनते मकई के दानो से
बड बड करते बाबूजी
गर्म तावे पर मक्खन से
मुट्ठी में बर्फ के टुकड़े से
पिघल जाते बाबूजी
जर जर पात से 
अपनों की घात से
टूट गए बाबूजी
बेटे की उपेक्षा से  
बटवारे की समस्या से
बिखर गए बाबू जी
वृधा आश्रम की गलिओं में
गुजर गए बाबूजी


-रचना श्रीवास्तव











       रिश्ते








अक्सर ही  टूटते हैं
कुछ नए कुछ पुराने रिश्ते
बिखरते हैं
बनादेते हैं राह कटीली पथरीली
चुभती हैं  किरचें पांव में
दर्द घुटता है
बेवा की सिसिकियों की तरह
अपने मुस्कुराते हुए गुजरते हैं 
तानों के दंश से
उलझ जाता है दामन मेरा 
उनकी हसीं से फूट जाते हैं छाले
एक चीख
 सन्नाटों को चीरती हुई 
मुझ को सुनाई देती हैं
चले  जाते है 
लम्हे ,मौसम और वो
पर रिश्तों के ठेकेदार
कब पूछते हैं हाल
धरते हें दावा का फाहा
रक्त रंजित पैरों से
मै फिर भी चलती जाती हूँ


-रचना श्रीवास्तव





***





  पांच मिनट







बड़ा आदमी बनने पर,
अपने बधाई संदेश में
मैंने आग्रह किया था उससे,
बहुआयामी दृष्टिकोण
विकसित करने का।

उसने भी
मुस्कुराते हुए कहा था 
वह कभी 'मायोपिक' नहीं होगा। 

पर बड़ा आदमी ही नहीं
हो गया है वह अब उस्ताद भी।
जब भी फोन लगाता हूँ,

किसी तरह
दो-चार बातें कर
व्यस्तता का बहाना बनाकर
वह अचानक बोल पड़ता है

''भाई साहिब, मैं आपको पांच मिनट बाद करता हूँ कॉल बैक''
मैं हंसता हूँ
हर बार की तरह

और वह भी करता है कोशिश
अपनी मक्कारी को छुपाने की
एक अज़ीब सी हंसी में।
बरसों पुरानी आत्मीयता पाने के लिए
दिनों-महीनों तक


      -अजय पराशर











          क्या...







क्या शास्त्री जी के आदर्श
ताशकन्द में उन्हीं के साथ घुट गए थे?
खेत तो अब क्यारियों तक सिमटे जा रहे हैं,
दूर तक फैलते जा रहे हैं मकान और दुकान,
देश पर काबिज़ हो रहे हैं एमएनसी और अन्य प्रतिष्ठान।
मोबाइल, टीवी, इलेक्ट्रॉनिक गजे़ट्‌स या नैनो
खाक भरेंगे हम पेट
या फिर उन नोटों से
जो चंद लोग भर रहे हैं
अपने गद्दों, टॉयलेट्‌स या टंकियों में।
लेकिन यहां भी
वह अपने आपको असहाय ही पाता है।
उसके पास तब भी नहीं होंगे नोट
और खाद्यान्न तो पहले ही
पहुंच से बाहर हुए जा रहे हैं।
वह भविष्य की कल्पना से ही सिहर उठता है,
उसके दिलो-दिमाग का दर्द
अब शरीर के हर अंग में दिखता है।


अजय पाराशर





***








जयकारा






 




कथनी और
करनी के अंतर में
विशाल अट्टालिकायें,
मरुथल की दम्भी जुबान,
सागर की उद्दाम लहरें,
और
आकाश की गहराई में
उतरता नीलापन

असम्भव है
स्वयं को साबित करना ।

कब बंधेगा
अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा
अशक्त, भयभीत और निरीह जन शंकुल

जो हाथ
भूख की ज्वाला से झुलसे हैं
जयकारा के लिये  उठते हैं

और

भावहीन चेहरे पर
खुशी का इजहार करता
पोस्टर टाँगे घूम रहा हुजूम

उन्ही के पीछे
जिनको कथनी और करनी में
अंतर रखना आता है ।


   -सुरेश पण्डा











अहंकार का अंतर्वस्त्र






 




सूरज अब टुकड़ों में बँटकर
रात में भी जागने के लिये
किया जा चुका है विवश

अंधेरा कामकाजी होकर
लग गया है धंधे से

अब डर किस बात का
जो हो सकता था अंधेरे में
रात के उजाले में भी हो जाता है

होने न होने में प्रभेद है
अंधेरे उजाले में नहीं ।

कितनी ही बार

दीपक जलाकर
अंधेरे को ढ़ूढ़ने की
असफल चेष्टा करते पाकर

ठठाकर हँसा है भीतर कोई

अहंकार का अंतर्वस्त्र उतारकर
मन के चमकीले आँगन में
कब से नंगा पड़ा है

खिलखिलाते ।


-सुरेश पण्डा

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                                                                                                                                                                      मंथन


                                                                                                                                                           -अमृता प्रीतम


एक प्राचीन घटना का साया

कविता और कवि के मस्तक पर कर्ण और कुन्ती की तकदीर कब लिखी गई थी, यह मैं नहीं जानती, लेकिन उनके मस्तक की लकीरों को मैंने अपनी कांपती उंगलियों से छूकर देखा है,  और उनकी बौराई हुई साँस मैंने अपनी साँसों में से सुनी है...


इसलिए कुन्ती की बात करते समय मैं इतिहास के कुछ बरक देख रही हूं...


सिद्धि एक अलौकिक शक्ति होती है, जिसका अर्थ बुद्धि भी होता है , और मुक्ति भी। उसके आठ पहलू अष्ठसिद्धि हो जाते हैं। एक अणिमा जो बहुत सूक्ष्म हो जाए। एक महिमा ज विस्तारमय हो जाए। एक गरिमा जो बहुत भारी हो जाए। एक लघिमा जो बहुत हलकी हो जाए। एक प्राप्ति,  जो मनचाही वस्तु हासिल कर ले। एक प्राकाम्य जो सबके मन की जान ले। एक  दीशिता जो सबकी प्रेरणा बन जाए। और एक वशिता जो सबको वश में कर ले...


सिद्धि ने जिस सुन्दरी की सूरत में जन्म लिया, उसका नाम पृथा था। वह मथुरा के राजा शूरसेन की पुत्री थी। राजा कुंतिभोज को औलाद नहीं थी, इसलिए उसने राजा शूरसेन से उसकी पुत्री मांग ली। और इसलिए पृथा का नाम कुंती हुआ,  अपने दूसरे पिता के नाम पर।'


यह गाथा कुंती के जन्म की है,  पर इस गाथा ने कवि और कविता के जन्म का सारा ब्यौरा अपनी छाती में संभाल लिया है...


सिद्धि का आकारमय होना,  कविता का जन्म है, जिससे पैदा होनेवाली कविता के सारे वसफ़ अष्टसिद्धि के अर्थों में समाए हुए हैं...


राजा शूरसेन सदियों का ज्ञान हैं,  जिससे उसकी पुत्री की सूरत में,  उसका कुछ अंश मांग लेना,  उस कुंतिभोज की तलब है,  जिससे एक रवायत को चलना है, एक तकदीर को चलना है,  और तलब के वंश को चलना है...


कुन्ती का पालन एक मासूम तैयारी है, जिसके माध्यम से कवि होने की किस्मत को जागृत होना है...कुंति ऋषि का स्वागत करती है,  तो दुर्वासा का दिया हुआ वरदान, उसके मस्तक की पहली रेखा खींच देता है...


दुर्वासा ऋषि कुन्ती को एक मंत्र देते हैं, एक कला,  जिससे वह किसी भी देवता को अपने पास धरती पर बुला सकती है...


देवता नाम तत्व का होता है। खलाई शक्तियों के तत्व देवता कहे जाते हैं। जिस सिद्धि ने कुन्ती का जन्म लिया,  उसके मन में ब्रह्माण्ड के शक्ति-कणों के लिए कशिश पैदा हो जाना एक बहुत मासूम  घटना थी,  लेकिन इस घटना ने कुन्ती की तकदीर लिख दी, कवि की तकदीर लिख दी,  जिसे कर्ण जैसी कविता को जन्म देना है...


सूर्य देवता के मिलन से जब एक शक्ति-कण कुन्ती की कोख में आ गया,  तो उसकी हैरानी एक ऐसी हैरानी थी,  जिसे सिर्फ एक कवि जान सकता है, जिसकी आत्मा में किसी तकलीफ का बीज उगने लगता है...


कुन्ती की रातें एक कवि की तरह सितारों को हाथ से छू सकती थीं,  लेकिन उसके दिन समाज की दीवारों से अपने बदन को छिपाते थे...


कर्ण के जन्म के समय कुन्ती की जो चीख निकली थी,  और जो चीख उसने अपने होठों में पी ली थी, उस चीख ने क्वारी मां की जो तकदीर उसके मस्तक पर अंकित कर दी,  वह सारी जिन्दगी तकदीर की उस लकीर को हैरानी से भी देखती रही और सहमकर  भी और कवि ने अपने मस्तक की रेखा के सामने अपना  मस्तक नवा दिया...


अचेत मन ने युग-युग के अहसास अपने में लिपटाए होते हैं पर किसी गांठ को वह कब अपने कोरों से खोलकर रख देता है,  इसका घड़ी-पल कोई नहीं जानता, एक बार कुन्ती की तकदीर का एक बड़ा सूक्ष्म-सा ब्यौरा मेरी कविता में उतर आया थाः 


कविता, कभी कागज को देखे,
और कभी नजर को चुरा ले
जैसे कागज पराया मर्द होता है...  


यहां कवि कुन्ती के नक्शों में समाया हुआ है। कुन्ती को कोख में लिये हुए कर्ण अपना लगता है। और अंतर्मन से उठता हुआ जो कविता का अहसास है,  वह कवि का अपना है, पर उस अहसास को जिस कागज के हवाले करना है, वह कागज पराया है,  कुन्ती के आसपास की दुनिया की तरह, जो कर्ण के लिए बिलकुल बेगाना है।


कुन्ती जानती है कि उसका समाज उसके कर्ण का समाज नहीं हो सकता। कवि जानता है कि उसके अन्तर्मन का एक टुकड़ा,  उससे टूटकर,  बिलकुल गैर आंखों के हवाले हो जाएगा...


दुर्वासा का जिस तरह का वरदान कुन्ती के पास है,  उसी तरह का वरदान कवि के पास होता है,  और किसी शक्ति-कण का समागम दोनों की तकदीर बन जाता है...


एक क्वाँरी जब करवा का व्रत रखती है और उस रात उसे सपना-सा आता है -- अचानक कोई मर्द-अंग उसे छू जाता है और सपने में भी उसका बदन काँप जाता है...


कविता का बीज किसी के भीतर अचानक उसी तरह पनप जाता है, जिस तरह सूर्य ने अपनी किरण का टुकड़ा कुन्ती की कोख में रख दिया थाः

वह आग का स्पर्श करती,  चौंक जाती,
जाग उठती,  भरे-भरे बदन को  छूती
चोली के बटन खोलती
अँजुली-भर चाँदनी बदन पर छिड़कती
और बदन को सुखाते हुए--
उसका हाथ खिसक जाता है...
बदन का अँधेरा चटाई की तरह बिछता
वह औंधी-सी चटाई पर लेटती
उसके तिनके तोड़ती
और उसका अंग-अंग सुलग जाता है...
उसे लगता-
उसके बदन का अँधेरा
किसी की बाँहों में टूटना चाहता है...    


अहसास की शिद्दत, एक ख़ामोशी की ग़ार से किस तरह ग़ुजरती है, और उसका कम्पन कैसे रगों में उतपरता है, यह कविता उसी का कुछ अनुमान-सा देती है।


और फिर वक़्त आ जाता है,  जब न कर्ण को कोख की ओट में रखा जा सकता है, न कविता को।


अचानक -एक कागज़ आगे सरकता है
उसके कांपते हुए हाथों को देखता है
एक अंग जलता है, एक अंग पिघलता है
उसे एक अजनबी गन्ध आती है
और उसका हाथ--
बदन में उतर आई लकीरों को छूता है...
हाथ रुकता है,  बदन सिसकता है
एक लम्बी लकीर टूटती-सी लगती है...
फिर जन्म और मौत की
दोहरी-सी  गन्ध में वह भीग जाती है...
सब काली और पतली लकीरें-
एक  लम्बी चीख के कुछ टुकड़े-से दिखते हैं
खामोश और हैरान वह निचुड़ी-सी खड़ी
देखती-सोचती --


शायद एक क्वाँरी का गर्भपात इसी तरह होता है...
यह कर्ण और कविता  का जन्म है...
यह लफ्ज़ ' गर्भपात ' जन्म के अर्थों में है, जिसमें हर कविता पूर्णता से एक कदम दूर खड़ी रह जाती है...
यह कवि के अहसास की किस्मत है, कुन्ती को भी कि वह अकेली है। उसने एक सपने की तरह सूर्य को देखा था, पर अब सपने से आई हुई जाग की तरह वह अकेली है...


दुर्वासा के जिस वरदान ने कुन्ती की तकदीर लिख दी थी, उसी क्षण कर्ण की तकदीर भी लिख दी थी... 

कर्ण एक बहती हुई नदी के हवाले हो गया, माँ के आँचल से गिरा हुआ,  सूर्य के साए से टूटा हुआ,  और उसी की तरह जब कविता कागज़ पर उतर जाती है, तो पवन के हवाले हो जाती है...

गैरों के होंठ हर तरफ हंसते हैं...

कर्ण भी अपने मस्तक की रेखाओं से कुछ पूछता है,  और कविता भी... पर तकदीर की लकीरें न कुछ सुनती हैं, न कुछ कहती हैं, वह बस घटित होती हैं...


ऋषि लफ्ज का फूल सात रंगों में खिलता है। इसीलिए ऋषि सात तरह के माने गए हैं-


एक सत ऋषि, जो वेद मन्त्रों के रचयिता थे। एक कांड ऋषि, जो वेद के किसी एक काण्ड की व्याख्या में उतर सके। एक परम ऋषि, जो पूरी तरह से उदासीन हो जाएँ। एक राज ऋषि, जो राज-काज के भीतर रहकर भी ऋषि अवस्था को पा लें। एक बृह्म ऋषि, जो बृह्म ज्ञान की अवस्था तक पहुंच जाए। एक देव ऋषि, जो देव जाति में पैदा होकर ऋषि मन को प्राप्त हो जाए। और एक मह ऋषि जो शास्त्र भी रच सके, और साधना विधि भी बना सके।


दुर्वासा ऋषि,  अत्रि ऋषि और अनसूया का बेटा था। और लगता है-उनके अन्तर का फूल मह ऋषि की ज़मीन पर खिला था, जिस जमीन में विधि-विधान की साधना भी होती है, और शास्त्र लिखने वाली रचनात्मक शक्ति की भी।


दुर्वासा का क्रोध पूरे इतिहास में फैला हुआ है। विष्णु-पुराण में दर्ज है कि इस ऋषि ने इन्द्र को एक माला दी थी, पर इन्द्र के हाथी एरावत ने जब इस माला का निरादर कर दिया, तो दुर्वासा ने इन्द्र को शाप दे दिया था...


कृष्ण ने दुर्वासा का प्यार से स्वागत किया था, पर रोटी के जो कण ज़मीन पर गिर गए थे,  कृष्ण ने उन्हें उठाया नहीं था,  इसलिए दुर्वासा ने कृष्ण को किसी शिकारी के तीर से मरने का  श्राप दे दिया था...


इसी तरह कृष्ण के पुत्र सांब को स्त्री वेश पहनाकर, और एक हामला की सूरत में दिखा कर जब उसके गर्भ से पैदा होने वाले बच्चे की बाबत पूछा गया,  तो दुर्वासा ने एक भयानक श्राप दे दिया था कि इस गर्भ से यादव कुल को नाश करने वाला एक मूसल पैदा होगा...


और शकुन्तला जब दुष्यंत के ध्यान में थी,  उसने दुर्वासा के आगमन को देखा नहीं  था,  तो दुर्वासा ने  श्राप दे दिया था कि जिसके कारण तूने मेरे आगमन को नहीं देखा, वह तुझे पहचानेगा नहीं...


दुर्वासा के ऐसे श्राप इतिहास में जगह जगह दर्ज हैं,  सिर्फ एक ही हवाला मिलाता है,  जब दुर्वासा ने किसी को वरदान दिया था- और वह वरदान सिर्फ कुन्ती को मिला था...कुन्ती,  जो सिद्धि का जन्म है। और सिद्धि, जो एक शक्ति है,  बुद्धि है,  और कवि की आत्मा है...


किसी वरदान को धारण करने के लिए कुन्ती की काया चाहिए,  कवि की काया...


दोनों के पास अपार तलब है- सूर्य के वस्ल की...


कुन्ती की तलब ने मंत्र उच्चारण किया था, और कवि की तलब ने कविता का...


राजमहल की परम्परागत और ठंडी जिंदगी कुंती के लिए नहीं थी,  न समाज की परम्परावादी जिन्दगी कवि के लिए होती है। इन दोनों को हजारों तोहमतों का दरिया सामने बहता दिखाई देता है। वे जानते हैं कि उन्हें अपने-अपने  अकेलेपन का श्राप झेलना है।


यह श्राप- जो वरदान के कण-कण में समाया हुआ है...


यह वरदान उन दोनों ने पहचाना है। वे जानते हैं कि दरवेश के इस काले कम्बल में वरदान और श्राप दोनों बुने हुए हैं,  लेकिन यह उनकी तलब का तकाज़ा है कि वे कह सकते हैं - ' भाड़  में जाए तेरी चिठ्ठी चदरिया...  '


 कुन्ती ने क्या खोया और क्या पाया,  यह सिर्फ कवि जानता है। वह जानता है कि किस्मत का नियंत्रण क्या होता है:


प्राचीन समय में जो मन्दिर बनाए जाते थे, वे जमीनदोज़-पानी, गंधक और चांदी जैसी धातुओं की शक्ति को देख-परखकर बनाए जाते थे। वे शक्तियां इस जमीन को तरंगित कर देती थीं। ठीक यही विज्ञान किसी के जन्म का होता है कि पूर्वजन्म की शक्तियां, इस जन्म की जमीन को किस तरह तरंगित कर रही हैं...

जमीन को जगह-जगह से परखने वालों ने जो इल्म हासिल कर लिया है, वह इल्म अभी जन्म-जन्म की परख-पहचान के लिए किसी को हासिल नहीं हुआ। इतिहास में ऋषियों-मुनियों की ज़बानी इस इल्म का कुछ अता-पता जरूर मिलता है, पर बाकी इन्सानी जात को अभी यह नसीब नहीं हुआ। इसलिए कह सकती हूँ कि सिद्धि ने जब कुन्ती की सूरत में जन्म लिया, तो हो सकता है कि कुन्ती की याददाश्त में उसकी कोई परछाई उसे दिखाई देती रही हो, लेकिन मेरे भीतर के कवि को इस बात का कोई इल्म नहीं कि वह कौन-से जन्मों की कोशिश थी जो मुझे हमेशा अक्षरों की ओर खींचती थी।

दूर, जहां तक दिखाई देता है, सिर्फ इतना-सा दिखता है कि मेरे पिता की रातें प्राचीन ग्रन्थों के जिन पृष्ठों में सोती थीं, उन्ही पृष्ठों में जागती थीं। वे शायद एक कुन्तिभोज थे, जो सदियों के ज्ञान से उसका एक अंश ले रहे थे। और लगता है कि उसी का कोई कण मुझे विरासत में मिला होगा...

मेरे भीतर से एक कवि कैसे जाग गया, यह मैं नहीं जानती, लेकिन जब जाग गया, तो अपनी पहचान अक्षरों में उतरी...

कुन्ती के युग में दुर्वासा ऋषि का आकर कोई वरदान देना, सिर्फ कुन्ती के युग में हो सकता था। लेकिन कवि हर युग में होता है, दुर्वासा हर युग में नहीं होता, फिर भी कुछ इसी तरह का कवि के साथ घटता है। लगता है, काया बदल जाती है, आत्मा नहीं बदलती। मेरे अन्तर में से कवि जाग गया, वारिस की जानशीन होने का संकल्प जाग गया,...

सूरज तो एक अग्नि-कण कुन्ती को देकर आसमान पर जा बैठा, लेकिन वह अग्नि-कण जब कर्ण बन गया, तो उस कर्ण का दर्द कौन जान सकता है...

मुहब्बत का अग्नि-कण कवि को मिलता है, पर वह अग्नि-कण जब कविता बन जाता है, अपनी किस्मत का प्याला, उसे भी अपने होठों से पीना होता है...

कुन्ती के पास जो मन्त्र था, वह घड़ी-पल के लिए सूर्य को धरती पर उतार सकता था, पर कवि के पास अहसास की शिद्दत का जो मन्त्र होता है, वह अपने प्रिय को धरती पर नहीं उतार सकता। वह सिर्फ उसे अपनी कल्पना की जमीन पर उतार सकता है...

कल्पना की कोख भी कुन्ती की कोख जैसी होती है, और दोनों के अग्निकोणों को एक खामोशी में से जन्म लेना होता है। और फिर कर्ण को बहते हुए पानी के हवाले हो जाना होता है, और कविता को बहती हई पवन के हवाले...

किसी इलाही-शक्ति का कण जिसकी झोली में पड़ता है, फिर शायद रवायती ज़िन्दगी का कोई भी सुख उसकी झोली में नहीं पड़ सकता।

कुन्ती राजा पाण्डु को ब्याही गयी। पर राजा को श्राप था कि पानी की सेज पर उसकी मौत हो जायेगी। राजा सेज से वंचित रह सकता था, लेकिन वंश की वीरानी से नहीं। इसलिए कुन्ती ने उसी दुर्वासा बरदान के सहारे तीन देवताओं से तीन पुत्र पैदा किए--धर्म से युधिष्ठिर, वायु से भीम, और इन्द्र से अर्जुन। और कुन्ती ने वे पुत्र राजा पांडू की गोद में रख दिए। उन तीनों पुत्रों पर राजा पांडु की छत्र-छाया थी, इसलिए वे किसी रवायत से अपमानित नहीं हुए। वह राज्य के हक़दार भी हुए।

देख रही हूं- तकदीरों के नक्श किस तरह एक जैसे होते हैं। कवि जब वतनपरस्ती की कविताएँ लिखता है, अगरचे वे भी उसने मिट्टी के इश्क में से लिखी होती हैं, और अम्बर से कोई शक्ति कण लेकर वह लोगों की पीड़ा में उतरता है, लेकिन वे कविताएँ, अफ़वाहों के घेरे में नहीं आतीं।

गर्म अफ़वाहें सिर्फ कर्ण के बदन को जलाने के लिए होती हैं, और दिल के खून में भीगी हर कविता के लिए।

कुन्ती का कर्ण को बहती हुई नदी के हवाले कर देना, कुन्ती को सारी उम्र के लिए एक ऐसा दर्द दे गया था, कि उस दर्द की पहचान के लिए, सूर्य की परिक्रमा करती हुई धरती भी एक क्षण के लिए खड़ी हो गई थी। पर कवि का, अपनी आत्मा के एक टुकड़े को बहती हुई पवन के हवाले कर देना, अपने हाथों, अपने अक्षरों को बहा देना एक ऐसा कर्म होता है, जिसे शक्ति कण भीगी हुई आँखों से देखते हैः

आँखों पर धुंध को लपेटकर
सूर्य की परिक्रमा करते हुए
किसके कदमों की रेत चूमती हुई
आज यह धरती खड़ी रह गई...

कुन्ती सूर्य का पता जानती है, पर कर्ण को नहीं बता सकती। कवि अपने प्रिय का पता जानता है, पर कविता को नहीं बता सकता। इश्क का यह मौन-व्रत इलाही-क्षणों का तकाजा होता है।

इन मन्सूरी तकदीरों को सिर्फ कुन्ती झेल पाती है या कवि का दिल। इसलिए अम्बर की मटकी से किसी बादल का ढकना उतारकर, एक घूँट चाँदनी पी सकने का वक़्त भी सिर्फ कुत्तों को और कवि को नसीब होता है।...        

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                                                                                                                                                                  सरोकार


                                                                                                                                                           -प्रभु जोशी


इसलिए बिदा करना चाहते हैं, हिन्दी को हिन्दी के कुछ अखब़ार

दुनिया की हर भाषा की ज़िंदगी में एक बार कोई निहायत ही निष्करुण वक्त दबे पांव आता है और `उसको बोलने वालों` के हलक़ में हाथ डालकर उनकी ज़ुबान पर रचे-बसे शब्दों को दबोचता है और धीरे-धीरे उनके कोमल गर्भ में सांस ले रहे अर्थों का गला घोंट देता है। एक तरफ वह `पवित्र को ध्वंस` में धकेलता है तो दूसरी तरफ वह `अतीत में आग` लगाता हुआ, चौतरफा भय और निराशा फैला देता है। ऐसे ही वक्त़ के खिल़ाफ अंतत: मंगल पाण्डे की बंदूक से गोली निकलती है और १८५७ का गदर (?) मच जाता है। ........आज हम फिर १८५७ के ही निकट पहुँच गये हैं। वे तब ये कहते हुए आए थे : `हम, तुम असभ्यों को सभ्य बनाने के लिए तुम्हारे देश में घुस रहे हैं।` मगर इस बार वे कह रहे   हैं : 'हम, तुम कंगलों को सम्पन्न बनाने के लिए तुम्हारे यहाँ आ रहे हैं।` .......सुनो, हम जिस `पूंजी का प्रवाह` शुरू कर रहे हैं, वह तुम्हारे यहाँ समृद्धि लायेगी। .......लेकिन, हक़ीक़त में यह देश को समृद्ध नहीं बल्कि, एक किस्म के `सांस्कृतिक-अनाथालय` में बदलने की युक्ति है। वे धीरे-धीरे आपसे आपकी बोलियाँ और भाषा छीन रहे हैं-तिस पर विडम्बना यह है कि उनके इस काम में हमारे कुछ अखब़ार भी तन-मन-धन से जुट गये हैं।
    बहरहाल, प्रस्तुत है इसी मुद्दे को लेकर जिरह छेड़ते कुछ ज्वलंत सवाल :


भारत इन दिनों दुनिया के ऐसे समाजों की सूची के शीर्ष पर हैं, जिस पर बहुराष्ट्रीय निगमों की आसक्त और अपलक आंख निरन्तर लगी हुई है । यह उसी का परिणाम है कि चिकने और चमकीले पन्नों के साथ लगातार मोटे होते जा रहे हिन्दी के लगभग सभी दैनिक समाचार पत्रों के पृष्ठों पर, एकाएक भविष्यवादी चिन्तकों की एक नई नस्ल अंग्रेजी की मांद से निकलकर, बिला नागा, अपने साप्ताहिक स्तम्भों में आशावादी मुस्कान से भरे अपने छायाचित्रों के साथ आती है - और हिन्दी के मूढ़ पाठकों को गरेबान पकड़कर समझाती है कि तुम्हारे यहाँ हिन्दी में अतीतजीवी अंधों की बूढ़ी आबादी इतनी अधिक हो चुकी है कि उनकी बौद्धिक-अंत्येष्टि कर देने में ही तुम्हारी बिरादरी का मोक्ष है । दरअस्ल कारण यह कि वह बिरादरी अपने `आप्तवाक्यों` में हर समय `इतिहास` का जाप करती रहती है और इसी के कारण तुम आगे नहीं बढ़ पा रहे हो। इतिहास ठिठककर तुम्हें पीछे मुड़कर देखना सिखाता है, इसलिए वह गति-अवरोधक है । जबकि भविष्यातुर रहनेवाले लोगों के लिए गरदन मोड़कर पीछे देखना तक वर्ज्य है । एकदम निषिद्ध है। ऐसे में बार-बार इतिहास के पन्नों में रामशलाका की तरह आज के प्रश्नों के भविष्यवादी उत्तर बरामद कर सकना असम्भव है । हमारी सुनो, और जान लो कि इतिहास एक रतौंध है, तुमको उससे बचना है । हिस्ट्री इज बंक । वह बकवास है । उसे भूल जाओ ।
बहरहाल-- 'अगर मगर मत कर । इधर उधर मत तक । बस सरपट चल।` भविष्यवाद का यह नया सार्थक और अग्रगामी पाठ है।
जबकि इस वक्त की हकीकत यह है कि हमारे भविष्य में हमारा इतिहास एक घुसपैठिये की तरह हरदम मौजूद रहता है । उससे विलग, असंपृक्त और मुक्त होकर रहा ही नहीं जा सकता । इतिहास से मुक्त होने का अर्थ स्मृति-विहीन हो जाना है-- सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अनाथ हो जाना है ।
लेकिन वे हैं कि बार-बार बताये चले जा रहे हैं कि तुम्हारे पास तुम्हारा इतिहास-बोध तो कभी रहा ही नहीं है । और जो है, वह तो इतिहास का बोझ है । तुम लदे हुए हो। तुम अतीत के कुली हो और फटे-पुराने कपड़ों में लिपटे हुए अपना पेट भर पालने की जद्दोजहद में हो, जबकि ग्लोबलाइजेशन की फ्यूचर एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर खड़ी है और सीटी बजा चुकी है । इसलिए तुम इतिहास के बोझ को अविलम्ब फेंको और इस ट्रेन पर लगे हाथ चढ़ जाओ ।
जी हाँ, अधीरता पैदा करने वाली नव उपनिवेशवाद की यही वह मोहक और मारक ललकार है, जो कहती है कि अब `आगे` और `पीछे` सोचने का समय नहीं है । अलबत्ता, हम तो कहते हैं कि अब तो `सोचने` का काम तुम्हारा है ही नहीं। वह तो हमारा है । हम ही सोचेंगे तुम्हारे बारे में । अब हमें ही तो सब कुछ तय करना है तुम्हारे बारे में। याद रखो हमारे पास वह छैनी है, जिस के सामने पत्थर को भी तय करना पड़ता कि वह क्या होना चाहता है -- घोड़ा या कि सांड । उस छैनी से यदि हम तुम्हें घोड़ा बनायेंगे तो निश्चय ही रेस का घोड़ा बनायेंगे । यदि हमें सांड बनाना होगा तो तुम्हें वो सांड बनायेंगे जो अर्थव्यवस्था को सींग पर उछालता हुआ सेंसेक्स के ग्राफ में सबसे ऊपर डुंकारता हुआ दिखाई पड़ेगा ।
इन्हीं चिन्तकों की इसी नई नस्ल ने हिन्दी के तमाम दैनिक अखब़ारों के पन्नों पर रोज़-रोज़ लिख लिखकर सारे देश की आंख उस तरफ लगा दी है, जहाँ विकास दर का ग्राफ बना हुआ है और उसमें दर-दर की ठोंकरे खाता आम आदमी देख रहा है कि येल्लो, उसने छ:, सात, आठ और अब तो नौ के अंक को छू लिया है । इसी दर के लिए ही तमाम दरों-दीवारों को तोड़कर महाद्वार बनाया जा रहा है । इसे ही ओपन-डोअर-पॉलिसी कहते हैं । और, कहने की ज़रूरत नहीं कि चिन्तकों की ये फौज, इसी ओपन-डोअर से दाखिल हुई है । यही उसकी द्वारपाल है, जो घोषणा कर रही है कि तुम्हारे यहाँ मही (पृथ्वी) पाल आ रहे हैं । तुम्हारे यहाँ विश्वेश्वर आ रहे हैं। दौड़ो और उनका स्वागत करो। तुमने तो आपातकाल का भी स्वागत किया था, तो इसका `स्वागत` करने में क्या हर्ज है ? मज़ेदार बात यह कि इसके स्वागत में, इसकी अगवानी में, सबसे पहले शामिल है, हिन्दी के अखब़ार । वे बाजा फूंक रहे हैं और फूंकते-फूंकते बाजारवाद का बाजा बन गये हैं । ये अखब़ार पहले विचार देते थे। विचार की पूंजी देते थे, लेकिन अब पूंजी का विचार देने में जुट गये हैं । एक अल्प उपभोगवादी भारतीय प्रवृत्ति को पूरी तरह उपभोक्तावादी बनाने की व्यग्रता से भरने में जी-जान से जुट गये हैं, ताकि भूमण्डलीकरण के कर्णधारों तथा अर्थव्यवस्था के महाबलीश्वरों के आगमन में आने वाली अड़चनें ही खत्म हो जाये और इन अड़चनों की फेहरिस्त में वे तमाम चीजें आती है, जिनसे राष्ट्रीयता की गंध आती हो ।

कहना न होगा कि इसमें इतिहास, संस्कृति और सभी भारतीय भाषाएँ शीर्ष पर हैं। फिर हिन्दी से तो `राष्ट्रीयता` की सबसे तीखी गंध आती है । नतीजतन भूमण्डलीकरण की विश्व-विजय में सबसे पहले निशाने पर हिन्दी ही है । इसका एक कारण तो यह भी है कि यह हिन्दुस्तान में संवाद, संचार और व्यापार की सबसे बड़ी भाषा बन चुकी है। दूसरे इसको राजभाषा या राष्ट्रभाषा का पर्याय बना डालने की संवैधानिक भूल गांधी की उस पीढ़ी ने कर दी, जो यह सोचती थी कि कोई भी मुल्क अपनी राष्ट्रभाषा के अभाव में स्वाधीन बना नहीं रह सकता । चूंकि भाषा सम्प्रेषण का माध्यम भर नहीं, बल्कि चिन्तन प्रक्रिया एवं ज्ञान के विकास और विस्तार का भी हिस्सा होती है । उसके नष्ट होने का अर्थ एक समाज, एक संस्कृति और एक राष्ट्र का नष्ट हो जाना है । वह प्रकारान्तर से राष्ट्रीय एवं जातीय-अस्मिता का प्रतिरूप भी है । इस अर्थ में, भाषा उस देश और समाज की एक विराट ऐतिहासिक धरोहर भी है । अत: उसका संवर्द्धन और संरक्षण एक अनिवार्य दायित्व है ।
जब देश में सबसे पहले मध्यप्रदेश के एक स्थानीय अखब़ार ने विज्ञापनों को हड़पने की होड़ में बाकायदा सुनिश्चित व्यावसायिक रणनीति के तहत अपने अखब़ार के कर्मचारियों को हिन्दी में ४० प्रतिशत अंग्रेजी के शब्दों को मिलाकर ही किसी खबर के छापे जाने के आदेश दिये और इस प्रकार हिन्दी को समाचार पत्र में हिंग्लिश के रूप में चलाने की शुरूआत की तो मैंने अपने पर लगने वाले सम्भव आरोप मसलन प्रतिगामी, अतीतजीवी अंधे, राष्ट्रवादी और फासिस्ट आदि जैसे लांछनों से डरे बिना एक पत्र लिखा । जिसमें मैंने हिन्दी को हिंग्लिश बना कर दैनिक अखबार में छापे जाने से खड़े होने वाले भावी खतरों की तरफ इशारा करते हुए लिखा -- 'प्रिय भाई, हमने अपनी नई पीढ़ी को बार-बार बताया और पूरी तरह उसके गले भी उतारा कि अंग्रजों की साम्राज्यवादी नीति ने ही हमें ढाई सौ साल तक गुलाम बनाये रक्खा । दरअसल ऐसा कहकर हमने एक धूर्त - चतुराई के साथ अपनी कौम के दोगलेपन को इस झूठ के पीछे छुपा लिया । जबकि, इतिहास की सचाई तो यही है कि गुलामी के विरूद्ध आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले नायकों को, अंग्रेजों ने नहीं, बल्कि हमीं ने मारा था । आज़ादी के लिए 'आग्रह` या 'सत्याग्रह` करने वाले भारतीयों पर कू्ररता के साथ लाठियाँ बरसाने वाले बर्बर हाथ, अंग्रेजों के नहीं, हम हिन्दुस्तानी दारोगाओं के ही होते थे । अपने ही देश के वासियों के ललाटों को लाठियों से लहू-लुहान करते हुए हमारे हाथ ज़रा भी नहीं कांपते थे । कारण यह कि हम चाकरी बहुत वफादारी से करते हैं और यदि वह गोरी चमड़ी वालों की हुई तो फिर कहने ही क्या ?
पूछा जा सकता है कि इतने निर्मम और निष्करूण साहस की वजह क्या थी ? तो कहना न होगा कि दुनिया भर के मुल्कों के दरमियान 'सारे जहाँ से अच्छा` ये हमारा ही वो मुल्क है, जिसके वाशिन्दों को बहुत आसानी से और सस्ते में खरीदा जा सकता है । देश में जगह-जगह घटती आतंकवादी गतिविधियों की घटनाएँ, हमारे ऐसे चरित्र का असंदिग्ध प्रमाणीकरण करती हैं । दूसरे शब्दों में हम आत्म स्वीकृति कर लें कि 'भारतीय`, सबसे पहले 'बिकने` और 'बेचने` के लिए तैयार हो जाता है और, यदि वह संयोग से व्यवसायी और व्यापारी हुआ तो सबसे पहले जिस चीज़ का सौदा वह करता है, वह होता है उसका ज़मीर । बाद इस सौदे के, उसमें किसी भी किस्म की नैतिक-दुविधा शेष नहीं रह जाती है और 'भाषा, संस्कृति और अस्मिता` आदि चीजों को तो वह खरीददार को यों ही मुफ्त में बतौर भेंट के दे देता है । ऐसे में यदि कोई हिंसा के लिए भी सौदा करे तो उसे कोई अड़चन अनुभव नहीं होती है । फिर वह हिंसा अपने ही 'शहर`, 'समाज`, या 'राष्ट्र` के खिलाफ ही क्यों न होने जा रही हो ।
बहरहाल, मेरे प्यारे भाई अब ऐसी हिंसा सुनियोजित और तेजगति के साथ हिन्दी के खिलाफ शुरू हो चुकी है । इस हिंसा के जरिए भाषा की हत्या की सुपारी आपके अखबार ने ले ली है । वह भाषा के खामोश हत्यारे की भूमिका में बिना किसी तरह का नैतिक-संकोच अनुभव किए खासी अच्छी उतावली के साथ उतर चुका हैं । उसे इस बात की कोई चिंता नहीं कि एक भाषा अपने को विकसित करने में कितने युग लेती है । (डेविड क्रिस्टल तो एक शब्द की मृत्यु को एक व्यक्ति की मृत्यु के समान मानते हैं । अंग्रेज़ी कवि ऑडेन तो बोली के शब्दों को इरादतन अपनी कविता में शामिल करते थे कि कहीं वे शब्द मर न जायें- और महाकवि टी.एस. एलियट प्राचीन शब्द, जो शब्दकोष में निश्चेष्ट पड़े रहते थे, को उठाकर समकालीन बनाते थे कि वे फिर से सांस लेकर हमारे साथ जीने लगे।) आपको शब्द की तो छोड़िये, भाषा तक की परवाह नहीं है, लगता है आप हिन्दी के लिए हिन्दी का अखबार नहीं चला रहे हैं, बल्कि अंगेजी के पाठकों की नर्सरी का काम कर रहे हैं । आप हिन्दी के डेढ़ करोड़ पाठकों का समुदाय बनाने का नहीं, बल्कि हिन्दी के होकर हिन्दी को खत्म करने का इतिहास रचने जा रहे हैं । आप `धन्धे में धुत्त` होकर जो करने जा रहे हैं, उसके लिए आपको आने वाली पीढ़ी कभी माफ नहीं करेगी । आपका अखबार उस सर्प की तरह है, जो बड़ा होकर अपनी ही पूंछ अपने मुंह में ले लेता है और खुद को ही निगलने लगता है । आपका अखबार हिन्दी का अखबार होकर हिन्दी को निगलने का काम करने जा रहा है, जो कारण जिलाने के थे वे ही कारण मारने के बन जाएँ इससे बड़ी विडम्बना भला क्या हो सकती है । यह आशीर्वाद देने वाले हाथों द्वारा बढ़कर गरदन दबा दिये जाने वाली जैसी कार्यवाही है । कारण कि हिन्दी के पालने-पोसने और या कहें कि उसकी पूरी परवरिश करने में हिन्दी पत्रकारिता की बहुत बड़ी भूमिका रही आई है ।
जबकि, आपको याद होना चाहिए कि सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि से उपजी 'भाषा-चेतना` ने इतिहास में कई-कई लम्बी लड़ाइयाँ लड़ी हैं । इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो आप पायेंगे कि आयरिश लोगों ने अंग्रेजी के खिलाफ बाकायदा एक निर्णायक लड़ाई लड़ी, जबकि उनकी तो लिपि में भी भिन्नता नहीं थी । फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश आदि भाषाएँ अंग्रेजी के साम्राज्यवादी वर्चस्व के विरूद्ध न केवल इतिहास में अपितु इस 'इंटरनेट युग` में भी फिर नए सिरे से लड़ना शुरू कर चुकी हैं । इन्होंने कभी अंग्रेजी के सामने समर्पण नहीं किया ।
बहरहाल मेरे इस पत्र का उत्तर अखबार मालिक ने तो नहीं ही दिया, और वे भला देते क्या ? और देते भी क्यों ? सिर्फ उनके सम्पादक और मेरे अग्रज ने कहा कि हिन्दी में कुछ जनेऊधारी तालिबान पैदा हो गये हैं, जिससे हिन्दी के विकास को बहुत बड़ा खतरा हो गया है । यह सम्पादकीय चिंतन नहीं अखबार के कर्मचारी की विवश टिप्पणी थी । क्योंकि उनसे तुरंत कहा जायेगा कि श्रीमान् आप अपने हिंदी प्रेम और नौकरी में से कोई एक को चुन लीजिए।
बहरहाल, अखबार ने इस अभियान को एक निर्लज्ज अनसुनी के साथ जारी रखा और पिछले सालों से वे निरंतर अपने संकल्प में जुटे हुए हैं । और अब तो हिन्दी में अंग्रेजी की अपराजेयता का बिगुल बजाते बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के दलालों ने, विदेशी पूंजी को पचा कर मोटे होते जा रहे हिन्दी के लगभग सभी अखबारों को यह स्वीकारने के लिए राजी कर लिया है कि इसकी नागरी-लिपि को बदल कर, रोमन करने का अभियान छेड़ दीजिए और वे अब इस तरफ कूच कर रहे हैं । उन्होंने इस अभियान को अपना प्राथमिक एजेण्डा बना लिया है । क्योंकि बहुराष्ट्रीय निगमों की महाविजय इस सायबर युग में रोमन लिपि की पीठ पर सवार होकर ही बहुत जल्दी संभव हो सकती है । यह विजय अश्वों नहीं, चूहों की पीठ पर चढ़कर की जानी है । जी हाँ कम्प्यूटर माऊस की पीठ पर चढ़कर ।
अंग्रेजों की बौद्धिक चालाकियों का बखान करते हुए एक लेखक ने लिखा था - 'अंग्रेजों की विशेषता ही यही होती है कि वे आपको बहुत अच्छी तरह से यह बात गले उतार सकते हैं कि आपके हित में आप स्वयं का मरना बहुत जरूरी है । और, वे धीरे-धीरे आपको मौत की तरफ ढकेल देते हैं । ठीक इसी युक्ति से हिन्दी के अखबारों के चिकने और चमकीले पन्नों पर नई नस्ल के ये चिंतक यही बता रहे हैं कि हिन्दी का मरना, हिन्दुस्तान के सामाजिक-आर्थिक हित में बहुत ज़रूरी हो गया है। यह काम देश सेवा समझकर जितना जल्दी हो सके करो, वर्ना, तुम्हारा देश ऊपर उठ ही नहीं पाएगा । परिणाम स्वरूप वे हिन्दी को बिदा कर देश को ऊपर उठाने के लिए कटिबद्ध हो गये हैं ।
ये हत्या की अचूक युक्तियाँ भी बताते हैं, जिससे भाषा का बिना किसी हल्ला-गुल्ला किए 'बाआसानी संहार` किया जा सकता है ।
वे कहते हैं कि हिन्दी का हमेशा-हमेशा के लिए खात्मा करने के लिए आप अपनाइये। 'प्रॉसेस ऑफ कॉण्ट्रा-ग्रेज्युअलिज़म` । अर्थात्, बाहर पता ही नहीं चले कि भाषा को 'सायास` बदला जा रहा है । बल्कि, 'बोलने वालों` को लगे कि यह तो एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है और म.प्र. के कुछ अखबारों की भाषा में, यह परिवर्तन उसी प्रक्रिया के तहत हो रहा है । बहरहाल, इसका एक ही तरीका है कि अपने अखबार की भाषा में आप हिन्दी के मूल दैनंदिन शब्दों को हटाकर, उनकी जगह अंग्रेजी के उन शब्दों को छापना शुरू कर दो, जो बोलचाल की भाषा में शेयर्ड - वकैब्युलरी की श्रेणी में आते हैं । जैसे कि रेल, पोस्ट कार्ड, मोटर, टेलिविजन, रेडियो, आदि-आदि ।

इसके पश्चात धीरे-धीरे इस शेयर्ड वकैब्युलरि में रोज-रोज अंग्रेजी के नये शब्दों को शामिल करते जाइये । जैसे माता-पिता की जगह छापिये पेरेंट्स/छात्र-छात्राओं की जगह स्टूडेंट्स/विश्वविद्यालय की जगह युनिवर्सिटी/रविवार की जगह संडे/यातायात की जगह ट्रेफिक आदि-आदि । अंतत: उनकी तादाद इतनी बढ़ा दीजिए कि मूल भाषा के केवल कारक भर रह जायें ।
यह चरण, 'प्रोसेस ऑव डिसलोकेशन` कहा जाता है । यानी की हिन्दी के शब्दों को धीरे-धीरे बोलचाल के जीवन से उखाड़ते जाने का काम ।
ऐसा करने से इसके बाद भाषा के भीतर धीरे-धीरे 'स्नोबॉल थियरी` काम करना शुरू कर देगी - अर्थात्् बर्फ के दो गोलों को एक दूसरे के निकट रख दीजिए, कुछ देर बाद वे घुलमिलकर इतने जुड़ जाएंगे कि उनको एक दूसरे से अलग करना संभव नहीं हो सकेगा । यह थियरी (रणनीति) भाषा में सफलता के साथ काम करेगी और अंग्रेजी के शब्द हिन्दी से ऐसे जुड़ जायेंगे कि उनको अलग करना मुश्किल होगा ।
इसके पश्चात शब्दों के बजाय पूरे के पूरे अंग्रेजी के वाक्यांश छापना शुरू कर दीजिए। अर्थात्् इनक्रीज द चंक ऑफ इंग्लिश फ्रेज़ेज़ । मसलन 'आऊट ऑफ रीच/बियाण्ड डाउट/नन अदर देन/ आदि आदि । कुछ समय के बाद लोग हिन्दी के उन शब्दों को बोलना ही भूल जायेंगे । उदाहरण के लिए हिन्दी में गिनती स्कूल में बंद किये जाने से हुआ यह है कि यदि आप बच्चे को कहें कि अड़सठ रूपये दे दो, तो वह अड़सठ का अर्थ ही नहीं समझ पायेगा, जब तक कि उसे अंगे्रजी में सिक्सटी एट नहीं कहा जायेगा । इस रणनीति के तहत बनते भाषा रूप का उदाहरण एक स्थानीय अखबार से उठाकर दे रहा हूं ।
`मार्निंग अवर्स के ट्रेफिक को देखते हुए, डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन ने जो ट्रेफिक रूल्स अपने ढंग से इम्प्लीमेंट करने के लिए जो जेनुइन एफर्ट्स किये हैं, वो रोड को प्रोन टू एक्सीडेंट बना रहे हैं । क्योंकि, सारे व्हीकल्स लेफ्ट टर्न लेकर यूनिवर्सिटी की रोड को ब्लॉक कर देते हैं । इन प्रॉब्लम का इमीडिएट सोल्यूशन मस्ट है ।`
इस तरह की भाषा को लगातार पाँच-दस वर्ष तक प्रिंट माध्यम से पढ़ते रहने के बाद अखबार के ख्ा़ासकर युवा पाठक की यह स्थिति होगी कि उसे कहा जाय कि वह हिन्दी में बोले तो वह गूंगा हो जायेगा । उनकी इस युक्ति को वे कहते हैं 'इल्यूज़न ऑफ स्मूथ ट्रांजिशन`। अर्थात् हिन्दी की जगह अंग्रेजी को निर्विघ्न ढंग से स्थापित करने का सफल छद्म ।
हिन्दी को इसी तरीके से हिन्दी के अखबारों में 'हिंग्लिश` बनाया जा रहा है। समझ के अभाव में लोग इस सारे सुनियोजित एजेण्डे को भाषा के परिवर्तन की ऐतिहासिक प्रकिया ही मानने लगे हैं और हिन्दी में यह होने लगा है । गाहे-ब-गाहे लोग बाकायदा इस तरह इसकी व्याख्या भी करते हैं । अपनी दर्पस्फीत मुद्रा में वे बताते हैं जैसे कि वे अपनी एक गहरी सार्वभौम प्रज्ञा के सहारे ही इस सचाई को सामने रख रहे हों कि हिन्दी को हिंग्लिश बनना अनिवार्य है। उनको तो पहले से ही इसका इल्हाम हो चुका है और ये तो होना ही है । यह टेक्नोलॉजिकल-डिटरमिनिज्म की तरह बनाया और बताया जा रहा है कि इन्टरनेट के सामने तुम्हारी वही स्थिति है, जो शेर के सामने बकली की । अब साहित्य को कसाईखाना कहने और बताने के दिन लद गए । अब तो इण्टरनेटी पुत्र ही कसाईखाना है । तुम केवल हलाक होने की विधि ज़रूर चुन सकते हो । या तो 'हलाल` या फिर 'झटका` । 'झटका` विधि यही है कि पहली कक्षा से अंग्रजी शुरू कर दो ।
आप को यह याद ही होगा कि एक भली चंगी भाषा से उसके रोजमर्रा के सांस लेते शब्दों को हटाने और उसके व्याकरण को छीन कर उसे बोली में बदल दिये जाने की क्रियोल कहते हैं । अर्थात् हिन्दी का हिंग्लिश बनाना एक तरह से उसका क्रियोलीकरण करना है । और कांट्रा-ग्रेजुअलिज्म के हथकंडों से बाद में उसे डि-क्रियोल किया जायेगा । डिक्रियोल करने का अर्थ उसे पूरी तरह अंग्रेजी के द्वारा विस्थापित कर देना ।
भाषा की हत्या के एक योजनाकार ने अगले और अंतिम चरण को कहा है कि फायनल असाल्ट ऑन हिन्दी । बनाम हिन्दी को नागरी लिपि के बजाय रोमन लिपि में छापने की शुरूआत करना । अर्थात् हिन्दी पर अंतिम प्राणघातक प्रहार । बस हिन्दी की हो गई अन्त्येष्टि । चूंकि हिन्दी को रोमन में लिख पढ़कर बड़ी होने वाली पीढ़ी के लिए वह नितांत अपठनीय हो जायेगी । इसी युक्ति से गुयाना में जहाँ ४३ प्रतिशत लोग हिन्दी बोलते थे को फ्रेंच द्वारा डि-क्रियोल कर दिया गया और अब वहाँ देवनागरी की जगह रोमन लिपि को चला दिया गया है । यही काम त्रिनिदाद में इस षड्यंत्र के जरिए किया गया है । नतीजतन, वहाँ नागरी लिपि अपाठ्य हो जाने वाली है ।
जबकि, विडम्बना यह है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के धूर्त दलालों के दिशा निर्देश में संसार की इस दूसरी बड़ी बोले जाने वाली भाषा से उसकी लिपि छीन कर, उसे रोमन लिपि थमाने की दिशा में हिन्दी के ही सभी अखबार जुट गए हैं । वे हिन्दी का क्रियोलीकरण कर रहे हैं। उन्होंने यह स्पष्ट धारणा बना ली है कि वे अब हिन्दी के लिए हिन्दी का अखबार नहीं निकाल रहे हैं, बल्कि अंग्रेजी के अखबार की नर्सरी का काम कर रहे हैं । क्योंकि, देर सबेर इसी को ही तो भारत की राष्ट्रभाषा बनाना है । प्राथमिक शिक्षा के लिए विश्व बैंक द्वारा प्राप्त धन का यही तो आखरी सुफल है, क्योंकि आगे जाकर समूची आरंभिक शिक्षा के कायान्तरण के कर्मकाण्ड को पूरा किया जाना एक अघोषित शर्त है, जिसमें हिन्दी के कई अखबार मिल-जुलकर आहुतियाँ दे रहे हैं । वे स्वाहा-स्वाहा करते हुए हिन्दी की आहुति चढ़ा रहे हैं ।
वे आजादी मिलने के साथ ही गांधी-नेहरू की पीढ़ी द्वारा कर दी गयी महाभूल को वे दुरूस्त करने में लगे हैं, जिसके चलते अंधराष्ट्रवादी उन्माद में हिन्दी को राष्ट्रभाषा की जगह बिठा दिया था - जबकि, यह तो सत्ता की भाषा बनने के लायक ही नहीं थी। यह तो अपढ़ गुलामों और मातहतों और अज्ञानियों की भाषा थी और उसे वैसा ही बने रहना चाहिए । इसी किस्म की इच्छा और संकल्प की अनुगूंज गुरूचरणदास जैसे लोगों के प्रायोजित लेखों से सुनाई देती है, जो इन अखबारों के सम्पादकीय पृष्ठों पर छपते रहते हैं । वे बार-बार कहते हैं कि जल्द ही हिन्दुस्तान दुनिया की आने वाले दो सौ वर्षों के लिए 'भाषाशक्ति` बनने वाला है - जबकि वे जानते हैं कि इससे बड़ा धोखा और कोई हो ही नहीं सकता । वास्तव में वे भारत को २००० बरस के लिए गुलाम बनाने के लिए ठेके का काम ले चुके हैं। वे उसे उस दिशा में घेरने की निविदा हाथिया चुके हैं। इस घेरने के काम में अखबार सबसे सुंदर और सुविधाजनक लाठी है।
पिछले दिनों अमेरिका में गरीब मुल्कों की आंखें खोल देने वाली एक पुस्तक छप कर आयी है, जिसे न लिखने के लिए सी.आई.ए. ने एक मिलियन डॉलर रिश्वत देने की पेश की थी - लेकिन, लेखक ने उनके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और साहस जुटा कर प्रायश्चित के रूप में लिख ही डाली यह पुस्तक : कन्फेशन ऑव एन इकोनोमिक हिटमैन` । नोम चोमस्की और डेविड सी. कोर्टन जैसे बुद्धिजीवियों ने लेखक को उत्साहित करते हुए कहा कि इसका प्रकाशन शेष संसार का तो हित करेगा ही, बल्कि, इससे अमेरिका का भी हित ही होगा । इसलिए इसका छपना जरूरी है ।
बहरहाल, पुस्तक के लेखक जॉन पार्किन्स ने उसमें विस्तार से बताया कि किस तरह बहुराष्ट्रीय निगमों के जरिए अमेरिका ने तीसरी दुनिया के गरीब मुल्कों के आर्थिक ढांचे को तहस-नहस कर दिया कि नतीजतन वे सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर भी विपन्न हो गए । कहने की जरूरत नहीं कि ऐसे ही बहुराष्ट्रीय निगमों और विश्व बैंक के पूर्व कर्मचारी हिन्दी के अखबारों के 'तथाकथित-सम्पादकीय पृष्ठों` पर कब्जा करते जा रहे हैं । वे इन दिनों हमारे हिन्दी के समाचार पत्रों द्वारा इस भूमण्डलीय युग के चिंतक और राष्ट्र निर्माता बन गये हैं। भारत में अंग्रेजी के अश्वमेध में भिड़े ये लोग अंग्रेजी की अपराजेयता का इतना बखान करते हैं कि सामान्यजन ही नहीं कई राजनेताओं और शिक्षाविदों को लगता है, जैसे आर्थिक प्रलय की घड़ी सामने है और उसमें अब केवल अंग्रेजी ही मत्स्यावतार हैं। अत: हमें लगे हाथ उसकी पीठ पर इस आर्यभूमि को चढ़ा देना चाहिए, वर्ना यह रसातल में डूब जायेगी । ये सब देश को बचाने वाले लोग हैं । वे कहते हैं एक ईस्ट इंडिया कम्पनी ने तुम्हें सभ्य बनाया । अब जो आ रही हैं वे तुम्हें सम्पन्न बनायेगी। माँ तो मांगने पर ही रोटी देती है, ये तुम्हें बिना मांगे माल देंगे । तुम्हें मालामाल कर देंगी । फिर भी तुम मांगोगे मोर । इसलिए हिन्दी को छोड़ो और अंग्रेजी का दामन थामो ।
अंग्रेजी की विरुदावली गा-गाकर गला फाड़ते ये किराये के कोरस गायक, यह क्यों भूल जाते हैं कि चीनी (जिसमें ढाई हजार चिन्हनुमा अक्षर हैं)- और जापानी जैसी चित्रात्मक लिपियों वाली भाषाओं ने अंग्रेजी की वैसाखी के बगैर ही बीसवीं सदी के सारे ज्ञान-विज्ञान को अपनी उन्हीं चित्रात्मक लिपियों वाली भाषा में ही विकसित किया और आज जब संसार में व्यापार, तकनॉलाजी या आर्थिक क्षेत्रों के संदर्भ खुलते हैं तो कहा जाता है, लिंचपिन ऑव वर्ल्ड-इकोनॉमी एण्ड टेकनोलॉजी हेज शिफ्टेड फ्रॉम अमेरिका टू जापान । हालांकि कुछ लोग अब जापान के साथ चीन का भी नाम लेने लगे हैं और यह किसी से छुपा नहीं है कि अब अमेरिका चीन से भी चमकने लगा है । क्योंकि वह शीघ्र ही सूचना प्रौद्योगिकी पर कब्जा करने वाला है । क्योंकि, अमेरिका में पढ़ रहा एक चीनी छात्र, यदि वहाँ रहकर कोई कम्प्यूटर सॉफ्टवेअर विकसित करता है तो साथ ही साथ उसे वह अपनी चीनी भाषा में विकसित करता है और अपने देश में पहुँचते ही वह उसे स्थापित कर देता है । जबकि, हिन्दी की नागरी लिपि, जो संसार भर की तमाम भाषाओं की लिपियों में श्रेष्ठ और वैज्ञानिक है, को अंग्रेजी का रास्ता साफ करने के लिए निर्दयता के साथ मारा जा रहा है । वे अपने धूर्त मुहावरे में बताते हैं कि अखबार इस तरह हिन्दी को नष्ट नहीं कर रहे हैं, बल्कि ग्लोबल बना रहे हैं । वे हिन्दी को एक फ्रेश-लिंग्विस्टिक लाइफ दे रहे हैं । हम जानना चाहते हैं कि भैया आप किसे मूर्ख बना रहे हैं - जिस हिन्दी को राष्ट्र संघ की भाषा सूची में शामिल नहीं करवा सके, उसे 'हिंग्लिश` बनाकर ग्लोबल बनायेंगे ? और हिंग्लिश बन कर, हिन्दी ग्लोबल होगी कि वह अंग्रेजी के 'महामत्स्य` के पेट में पहुँच जाएगी । यह भाषा के विकास के नाम पर खेला जाने वाला शताब्दी का सबसे बड़ा छल है।
दरअस्ल, श्रीमान जी, आप आग लगा कर उस पर आग के आगे पर्दा खींच रहे हैं और हमें समझा रहे हैं कि 'बेवकूफो ! हिन्दी सकुशल है और वह जिंदा बची रहेगी ।` अंग्रेजी की लपट में स्वाहा नहीं होगी । यदि हो भी गई तो बाद उसके वह राख के रूप में रहेगी, पर रहेगी जरूर । भाषा की भस्म को कपाल पर पोत कर तुम प्रसन्न रहना । ठीक है, हिन्दी तुम्हारी जबान पर रहे न रहे पर वह तुम्हारे ललाट पर तो रहेगी ही । पहले हिन्दी 'ललाट की बिंदी` भर थी, अब तो तुम उससे पूरा ललाट लीप लेना । फिर तुम तो आत्मावादी हो । वासांसि जीर्णानि यथा विहाय वाले हो इसलिए भलीभांति जानते हो कि आत्मा अमर होती है । हिन्दी की आत्मा अमर है और रहेगी । वो सिर्फ पुराने कपड़े बदल रही है । उसके पुराने कपड़ों की हालत नौ गज साड़ी फिर भी जांघ उघाड़ी वाली उक्ति की तरह हो चुकी थी (शब्द का बहुत बड़ा जखीरा अर्थात् मोटे-मोटे शब्दकोश, लेकिन फिर भी लफ्जों के लाले।) हिन्दुस्तान की एक बुकराई हुई एक अंग्रेजी लेखिका ने कहा -'बताइये हिन्दी के पास एटम के लिए कोई शब्द ही नहीं है फिर भला उसमें विज्ञान की शिक्षा कैसे संभव है।` बहरहाल तुम्हारी हिन्दी जींस पहन रही है । उसे स्मार्टनेस की तरफ जाना है । वह फिलहाल ग्रीन रूम में  है । लद्धड़ता छोड़कर एक फ्रेश लिंग्विटक लाइफ को हासिल करने की तरफ बढ़ रही है ।
डेविड सी कार्टन ने वैश्वीकरण की हकीकत उजागर करते हुए ठीक ही कहा है कि ग्लोबलाइजेशन का अर्थ सरकारों और बहुराष्ट्रीय निगमों का पारस्परिक संबंध भर है । वह कहता है कि इसीलिए ग्लोबलाइजेशन की प्राथमिक कार्रवाई यही होती है कि जिस किसी चीज से भी 'राष्ट्रीयता` की बू आये, उसे अविलम्ब हटाइये । इस 'सैद्धान्तिकी` के मुताबिक निश्चय ही 'हिन्दी` ग्लोबलाइजेशन के पहले निशाने पर है, चूंकि इससे राष्ट्रीयता की बहुत तीखी और बरदाश्त बाहर गंध आती है । वजह यह कि हिन्दी का रिश्ता राष्ट्रभाषा के रूप में नाथ देने से यह भारत के कुछ प्रदेशों की जनता की नजर में राष्ट्रीय अस्मिता का पर्याय बन गयी है । नतीजतन इस पर चढ़े राष्ट्रीयता के इस कवच को हटाना जरूरी है, वर्ना यह मारे जाने में काफी समय  लेगी । बहुत मुमकिन है कि लोग इसकी हत्या के प्रकट पैंतरों को देख कर हो-हल्ला करते हुए एकमत होने लगें । लेकिन भूमण्डलीकरण की सफलता तभी है जब लोग भाषा और भूगोल को लेकर एकमत होना छोड़ दें । राष्ट्र राज्य की बात करने वाले को लगे हाथ मूर्ख बताने के लिए अविलम्ब आगे आयें ।
इसी संभावित संकट को भांप कर दलाल लोग यह कहते फिरते हैं कि हिन्दी को राजभाषा या राष्ट्रभाषा के पाखण्ड से मुक्त करके 'जनता की गाढ़ी कमाई से खींचे गए` पैसों का बहाया जाना अविलम्ब रोका जाये । क्योंकि इससे उसे अकारण ही ऑक्सीजन मिलती रहती है । जबकि उसकी ब्रेन डेथ हो चुकी है । उसमें सोचने समझने की क्षमता ही नहीं है । राजभाषा के नाम पर धन उड़ेलने से एक और समस्या पैदा हो जाती है, वह यह कि एक ओर, भाषा के जिस पुराने रूप को अखबार नष्ट करने में मेहनत करते हैं, दूसरी ओर राजभाषा के नाम पर धन उड़ेलने से, भाषा का वह पुराना रूप एक मानक के रूप में जिंदा बना रहता है ।
अंग्रेजी इस बात में तो आरंभ से सतर्क रही और उसने हिन्दी का अन्य भारतीय भाषाओं से सहोदरा संबंध बनाने ही नहीं दिया, उलटे वैमनस्य और अदम्य वैरभाव को बढ़ाये रखा- लेकिन, हिन्दी की, अपनी बोलियों से जड़ें इतनी गहरी बनी और रही आयीं कि उसको वहाँ से उखाड़ना मुश्किल रहा । बहरहाल, ये काम अब मीडिया ने अपने हाथ में ले लिया है । बोलियों का संहार करने में जो काम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कर रहा है, उसे दस कदम आगे जाकर हिन्दी के अखबार कर रहे हैं । जो अखबार साढ़े तीन रूपये में बिकते हुए जानलेवा आर्थिक कठिनाई का रोना रो रहे थे, वे अब एक या डेढ़ रूपये में चौबीस पृष्ठों के साथ अपनी चिकनाई और रंगीनी बेच रहे हैं । स्पष्ट है, यह विदेशी चंचला धनलक्ष्मी है । क्या ये लोग नहीं जानते कि यह पूंजी 'अस्मिताओं` का 'विनिमय` नहीं, बल्कि अस्मिताओं का सीधा-सीधा 'अपहरण` करती हैं । यह अखबारों को अपनी 'हवाई सेना` बनाकर, 'विचारों का विस्फोट` करती है, और विस्फोट वाली जगह पर थल-सेना कब्जा कर लेती है । इसी के चलते अखबार 'बाजारवाद` के लिए जगह बनाने का काम कर रहे हैं । वे पहले 'विचार` परोसते थे, अब 'वस्तु` परोस रहे हैं - अलबत्ता, खुद 'वस्तु` बन गये हैं । इसी के चलते अखबारों में संपादक नहीं, ब्राण्ड मैनेजर बरामद होते हैं । अखबारों की इस नई प्रथा ने, 'मच्छरदानी` की 'सैद्धान्तिकी` का वरण कर लिया है । कहने को वह 'मच्छर-दानी` होती है परन्तु उसमें मच्छर नहीं होता । वह बाहर ही बाहर रहता है । ठीक इसी तरह अखबार में अखबारनवीस को छोड़कर सारे विभागों के भीतर सब वाजिब लोग होते हैं। बस सम्पादकीय विभाग में सम्पादक नहीं होता । इसीलिए आपस में पत्रकार बिरादरी एडिटोरियल को एडव्हरटोरियल विभाग कहती है । अब इस मार्केट ड्राइवन प्त्रकारिता में सम्पादकीय विभाग विज्ञापन विभाग का मातहत है । यहाँ तक कि प्रकाशन योग्य सामग्री भी वही तय करता है । योंं भी सम्पादकीय पृष्ठ दैनिक अखबारों में अब बुद्धिजीवियों के वैचारिक अभिव्यक्ति के लिए नहीं, राजनीतिक दलों के 'व्यू-पाइण्ट` (?) के लिए आरक्षित होते जा रहे हैं । वे राजनीतिक जनसंपर्क हेतु सुरक्षित पृष्ठ हैं । यह उसी पूंजी के प्रताप का प्रपात है, जो बाहर से आ रही है ।

ऐसे में निश्चय ही वे हड़का कर पूछना चाहें कि बताइए भला यह कैसे हो सकता है कि आप पूंजी तो हमारी लें और 'भाषा और संस्कृति` आप अपनी विकसित करें ? यह नहीं हो सकता । हमें अपने साम्राज्य की सहूलियत के लिए 'एकरुपता` चाहिए । सब एक-सा खायें । एक-सा पीयें । एक-सा बोलें । एक-सा लिखें-लिखायें । एक-सा सोचें। एक-सा देखें। एक-सा दिखायें । तुम अच्छी तरह से जान लो कि यही संसार के एक ध्रुवीय होने का अटल सत्य है । हमारे पास महामिक्सर है - हम सबको फेंट कर 'एकरूप` कर देंगे । बहरहाल, उन्होंने भारत के प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को अपना महामिक्सर बना लिया । इसलिए, अब अखबार और अखबार के बीच की पहले वाली यह स्पर्धा जो धीरे-धीरे गला काट हो रही थी अब क्षीण हो गयी है । चूंकि अब वे सब एक ही अभियान में शामिल, सहयात्री हैं । उनका अभीष्ट भी एक है और वह है, 'वैश्वीकरण` के लिए बनाये जा रहे मार्ग का प्रशस्तीकरण । सो आपस में बैर कैसा ? हम तो आपस में कमर्शियल कजिन्स हैं । आओ हम सब मिलकर मारें हिन्दी को। अब भारत की असली हिन्दी पत्रकारिता हिन्दी की ऐसी ही आरती उतार रही है ।
यहाँ यह याद दिलाना जरूरी है कि आज जिस हिन्दी को हम देख रहे हैं - उसे 'पत्रकारिता` ने ही विकसित किया था । क्योंकि, तब की उस पत्रकारिता के खून में राष्ट्र का नमक और लौहतत्व था जो बोलता था । अब तो खून में लौह तत्व की तरह एफडीआई (फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेन्ट) बहने लगा है । अत: वही तो बोलेगा । उसी लौहतत्व की धार होगी जो हिन्दी की गर्दन उतारने के काम में आयेगी । हालांकि, अख्ा़बार जनता में मुगा़लता पैदा करने के लिए वे कहते हैं, पूंजी उनकी जरूर है, लेकिन चिन्तन की धार हमारी है । अर्थात्् सारा लोहा उनका, हमारी होगी धार । अर्थात्् भैया हमें भी पता है कि धार को निराधार बनाने में वक्त नहीं लगेगा । तुम्हीं बताओ उन टायगर इकनॉमियों का क्या हुआ, जिनसे डरकर लोग कहने लगे थे कि पिछली सदी यूरोप या पश्चिम की रही होगी, यह सदी तो इन टायगरों की होगी, कहाँ गये वे टायगर ? उनके तो तीखे दांत और मजबूत पंजे थे । नई नस्ल के ये कार्पोरेटी चिन्तक रोज-रोज बताते हैं - हिन्दुस्तान विल बी टायगर ऑफ टुमॉरो ।
भैया ये जुमले सुनते-सुनते हमारे कान पक गये । हमें टुमॉरो का कुछ नहीं बनना, बल्कि जो कुछ बनना है आज का बनना है। हम कल के टायगर होने के बजाय आज की गाय होने और बने रहने में संतुष्ट हो लेंगे । गाय घास खायेगी तथा दूध और गोबर देगी और उससे हमारी खेतियों की सेहत ठीकठाक बनी रहेगी । हमारे किसान आत्महत्या करने से बच जाएंगे। लेकिन तुम हो कि थोड़े से चमड़े के लिए पूरी की पूरी जिंदा गाय को मार रहे हो ।
तब की पत्रिकारिता में अपने देश और समाज को गढ़ने-रचने का साहस था, संकल्प था, समझ और स्वप्न भी था (बेशक उसमें राष्ट्रीय पूंजीवाद की एक बड़ी व ऐतिहासिक भूमिका भी थी।)। वह जख्मी कलम के साथ बारूद और बंदूक की बर्बरता के खिलाफ लड़ी थी । इस कारण वह भाषा के मसले को गहरे ऐतिहासिक विवेक के साथ देख रही थी । यहाँ गांधी का प्रसंग उल्लेखनीय लगता है । वे भी पत्रकार थे । आजादी की घोषणा के बाद जब बी.बी.सी. ने उन्हें बुलाया तो उन्होंने प्रस्ताव को ठुकराते हुए कहा था 'संसार को कह दो गांधी को अंग्रेजी नहीं आती । गांधी अंग्रेजी भूल गया है।` यह एक नवस्वतंत्र राष्ट्र के निर्माण के बड़े स्वप्न का उत्तर था । यह वाक्य नहीं, एक भावी महासमर के प्रारूप का खुलासा था । उन्हें यह अहसास था कि अपनी भाषा के अभाव में राष्ट्र फिर से गुलामी के नीचे चला जाएगा । उन्होंने स्वयं को वर्गच्युत करके, जिस तरह भारतीय समाज के आखिरी आदमी के बीच खुद को नाथ लिया था, उसने उन्हें इस बात के लिए और अधिक दृढ़ कर लिया था कि अंग्रेजी की औपनिवेशिक दासता से मुक्त नहीं हुए तो इतनी लम्बी लड़ाई के बाद हाँसिल की गई आजादी का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा । उन्होंने ये बात कई-कई जगह और अपनी चिटि्ठयों तथा पर्चों में भी बार-बार लिखी और छापी ।
मगर आज सबसे बड़ी त्रासदी तथा विसंगति यही है कि हमारी पत्रकारिता नई तथा कभी खत़्म न हो सकने वाली गुलामी खोलने का रास्ता सिर्फ अपनी धंधई बुद्धि की व्यावसायिक अधीरता के कारण कर रही है । इस पत्रकारिता में, अखब़ार जो 'माल` की तरह उत्पादित और वितरित हो रहा है । कहीं कहीं तो छापकर प्रेस से सीधे गोदामों में भरा जा रहा है । क्योंकि उन्हें अब सर्कुलेशन नहीं केवल प्रिंट आर्डर को देखना है । क्योंकि वह विज्ञापनों की दर तय करता है । उसमें न तो अतीत के आकलन का गहरा विवेक रहा है - और, न ही 'भविष्य में झांक सकने वाली दृष्टि`। एक किस्म का धंधई उन्माद है, जिसे पूंजी का प्रवाह पैदा कर रहा है । इसलिए, वह केवल अपने व्यावसायिक साम्राज्य के लिए अराजक होने की हद तक, भाषा, संस्कृति और समाज को विखण्डित करने से भी संकोच नहीं कर रहे हैं । यों भी उनके लिए अब समाज को मात्र एक उपभोक्तावर्ग की तरह देखने की लत पड़ गई है । अब उनके लिए देश की जनता राष्ट्र की नागरिक नहीं बल्कि उसके प्रॉडक्ट (?) की ग्राहक है । इसके साथ विडम्बना यह भी है कि सम्पूर्ण हिन्दी भाषाभाषी समाज भी, भाषा के साथ किए जा रहे ऐसे विराट छल को पाण्डु पुत्रों की मुद्रा में गूंगा बन कर देख रहा है ।

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                                                                                                                                                     कहानी धरोहर


                                                                                                                                       आचार्य चतुरसेन शास्त्री

ककड़ी की कीमत

आज तो दिल्ली का रंग-ढंग ही बिगड़ गया है। बाजार में, मकानों में, चाल-ढाल में, सड़कों में सब में विलायती पन आ गया है। जब से दिल्ली भारत की राजधानी बनी है और नई दिल्ली की चकाबू को मात करने वाली विचित्र नगरी बसी है,  तब से दिल्ली यद्यपि पंजाब से पृथक् अलग सूबा बन गया है, फिर भी उसमें बुरी तरह से पंजाबीपन भर गया है। नई दिल्ली जब बस रही थी तब ढेर के ढेर पंजाबी, सिक्ख और सभी उत्साही लोग- जिन्होंने पंजाब के गेहूँ,और उर्द एवं चना खाकर अपने शरीर-बल को खूब वृद्धि दी है-नई दिल्ली पर चढ़ दौड़े। ठेकेदार से लेकर साधारण मजदूर तक पंजाब के साहसी पुरुष भर गये। उन्होंने नई दिल्ली में प्रारम्भ में कोड़ियों के मोल जमीन ली और बस गये। अब दिल्ली में वे सरदार होकर मोटर में दौड़ते हैः वीरभोग्या वसुन्धरा। दिल्ली के महीन आदमी न जाने कहाँ खो गये। अब जगह-जगह होटल खुल गये हैं। लाइन की लाइन खालसा होटलों की दुकानें आप दिल्ली के बाजारों में देख सकते हैं जहाँ झटका पकने का साइनबोर्ड लगा होगा। और जहाँ अनगिनती सरदारगण बड़े-बड़े साफे बाँधे लम्बी डाढ़ी फटकारे, कोट, पैंट, बूट डाटे, खाट या टेबल पर रोटियाँ खाते दिख पड़ते हैं। छुआछूत को तो इन्होंने डंडे मारकर दिल्ली से उसकी नजाकत के साथ ही दूर कर दिया है। शाम को आप जरा चाँदनी चौक में एक चक्कर लगाइये पंजाबी युवतियाँ और प्रौढ़ाएँ बारीक दुपट्टा माथे पर डाले, सलवार डाटे, मुँह खोले बेफिकरी से कचालू वाले के इर्द-गिर्द बैठकर कचालू-आलू खाती नजर आयेंगी।

कभी-कभी ब्याह-शादी के जलूसों में जौहरियों की वह देहलवी नुक्केदार पगड़ियाँ कुछ पुराने सिरों पर नजर आ जाती थीं। परन्तु वह नीमास्तीन अँगरखे- वसली के जूते, दुपल्ली दो माशे की टोपी, बगल में महीन शर्बती का दुपट्टा, तो बिल्कुल हवा हो गये हैं। सरदे के दामन और सफेद शर्बती की चादरें लपेटे अब दिल्ली की ललनाएँ नहीं दीख पड़तीं । न अब वे जड़ाऊ जेवर ही उनके बदन पर दीख पड़ते हैं – जिनकी बदौलत दो हजार जड़िए और पाँच हजार सुनार दिल्ली में अपनी रोजी कमाते थे। अब तो बारीक क्रेप की फैशनेबिल साड़ियाँ- उन पर नफासत से कढ़ी हुई बेलें- बिना आस्तीन जम्फर, जिसमें से आधी छाती और समुची मृणाल भुजाएँ खुला खेल करती हैं साथ में ऊँची एड़ी के रंग-बिरंगे सैंडिल-जूते चाँदनी चौक में देखते-देखते आँखें थक जाती हैं। देश की इन पर्दाफाश बहनों में सुशिक्षिताएँ तो बहुत ही कम हैं, ज्यादातर मोर का पंख खोंसकर मोर बनने वाले कौए जैसी हैं। इसका पता उनके चेहरे पर पुते हुये फूहड़ ढंग के फाउडर से, होठों में खूब गहरे लगे गुलाबी रंग से, तीव्र सेंट से तारोबोर चटकीले रेशमी रूमाल से, बालों में चमचमाते नकली जड़ाऊ पिनों से अनायास ही लग जाता है। कभी-कभी तो इन अधकचरी मेम साहब की कोमल कलाइयों में दिल्ली फैशन के सोने के दस्तबन्दों और अनगिनत चूड़ियों के बीच फैंसी रिस्टवाच तथी पैरों के जेवरों पर ऊँची एड़ी का सैंडिल शू मन में अजीब हास्यरस उत्पन्न करता है। खास कर फस हालत में, जब कि उनके पालतू पति महाशय पतलून पर लापरवागी से सटर पटर कोट डाले उनके पीछे-पीछे उनकी खरीदी चीजों का बंडल लिए बड़े उल्लास से चलते-फिरते और मुसाहिबी करते नजर आते हैं।

38 वर्ष हुये। उस समय दिल्ली की चाँदनी चौक में अब जहाँ अगल-बगल पैदल चलने वालों के लिये पटरियाँ बनी हैं, वहाँ सड़कें थीं; सड़कें कंकड़ की थीं। उनमें बहली, मझोलियाँ, इक्के सरपट दौड़ा करते थे। दोनों समय उन सड़कों पर छिड़काव हुआ करता था। बीचों-बीच अब जहाँ चमकती सीमेंट की पुख्ता सड़क है, नहर पर पटरी बनी थी। उस पटरी पर बड़ी-बड़ी भीमकाय बेतों की छतरियाँ लगाये, खोंचेवाले अपनी-अपनी छोटी-छोटी दुकानें लिये बैठे हैं। उनमें विसायती, टोपीवाले, टुकड़ीवाले, घी के सौदेवाले, दही-बड़े वाले, चने की चाटवाले, कचालूवाले, मेवाफरोश तथा फलवाले सभी होते थे। उनमें भी छोटे दुकानदार अपनी छोटी-सी दुकान को किसी टोकरी में सजाये गले में लटकाये घूम-फिर कर सौदा बेचा करते थे। सैकड़ों आदमी उन वृक्षों की घनी छाया में पड़े हुए थकान उतारा करते थे। घंटाघर के सामने कमेटी की संगीन इमारत के आगे अब जहाँ महारानी विक्टोरिया की मूर्ति रक्खी है वहाँ काले पत्थर का एक विशालकाय हाथी खड़ा था- जिसे जयमाल फते का हाथी कहकर बूढ़े आदमी उस पटरी पर वृक्षों की ठंडी छाया में लेटे, उनीदी आँखों से खमीरी तम्बाकू का मद भरे भाँति-भाँति के किस्से-कहानी कहा करते थे। दिल्ली के निवासियों की बोली में एक अजीब लोच था, खोंचेवालों की आवाजें भी एक-से-एक बढ़कर होती थीं। सब्जी-तरकारियों में जो पहले चलतीं, वही दिल्ली के रईस खाते थे। भिंडी और करेले जबतक रुपये सेर बिकते थे, कच्चे आम की केरियाँ जबतक बारह आने सेर बिकती थीं, तभी तक वे दिल्ली वालों के खाने की चीज समझी जाती थीं, सस्ती होने पर उन्हें कोई नहीं पूछता था। बेर के मौसम में लोग बेरों को चाकू से छील कर उन पर चांदी का वर्क लपेट कर खाते थे। लताफत और नजाकत हर एक बात में थी, जैसे वे महीन आदमी थे वैसे ही उनके रहन-सहन भी थे।

फागुन लग गया था, वसंत पुज चुका था, सर्दी कम हो गई थी, वसन्ती हवा मन को हरा कर रही थी, बाजार में नर्म-नर्म पतली ककड़ियों के चूजे बिकने आने लगे थे। पर उनके दाम काफी मँहगे थे, इसलिए यह रईसों का ककड़ी खाने का मौसम था। एक जवान कुँजड़ा सिर पर नारंगी साफा बेपरवाही से बांधे, बदन पर तंजेब का ढीला कुरता पहने, गले में सोने की छोटी-सी ताबीज काले डोरे में लटकाये, आँखों में सुरमा और मुँह में पानों की गिलौरियाँ दबाये, कमर में चोखाने का तहमत और पैर में फूलदार सलमेशाही आधी छटाँक का जूता पहने ककड़ियाँ बेचता पटरी पर मस्तानी अदा से घूम रहा था। उसके हाथ में झाऊ की एक सूफियानी चौड़ी टोकरी थी। उस पर केले के हरे पत्तों पर गुलाब के फूलों के बीच ककड़ी के दो रवे रक्खे थे, टोकरी उसके दाहिने हाथ में अधर धरी थी। वह अपनी मस्त आँखों को इधर-उधर घुमाता झूमती-ललकती भाषा में आवाज लगाता जाता था- “ नाजुक ए ककड़ियाँ ले लो- लैला की उँगलियाँ ले लो-मजनूँ की पसलियाँ ले लो। नाजुक ए ककड़ियाँ ले लो। “

पीछे से आवाज आई-“ ककड़ी वाले जरा वरे को आना। “ उसी भाँति मस्तानी अदा से पुकारता हुआ ककड़ी वाला पीछे को फिरा। पुकारने वाला कहार था; वह एक बुड्ढा आदमी था, उसकी सफेद-सफेद बड़ी मूँछे, पक्का रँग, लट्ठे की मिर्जई, दुपल्ली टोपी और चौखाने का अंगोछा कन्धे पर पड़ा हुआ था। ककड़ियों को देखकर उसने कहा-“ सिर्फ दो ही रवे हैं ! “

“अभी ककड़ियाँ कहाँ? वह तो कहो, मैं चार रवे लाया था, दो बिक गये, दो ये हैं ; लेना हो तो लो, मोल भाव का काम नहीं, चवन्नी लूँगा।“

बूढ़ा कहार अभी नहीं बोला था, एक युवक ने तीव्र आवाज में कहा “ अठन्नी लो जी, ककड़ियाँ हमें दो।“ पहलवान युवक भी कहार था, उसकी मसें अभी भीगती थीं। भुजदंडों में मछलियाँ उबर रही थीं। उसने हँसती हुई आँखों से बूढ़े कहार की ओर देखा और अठन्नी टन से छावे में फेंक दी।

“ सौदा हमसे हुआ है जी, ककड़ियाँ हम लेंगे, यह लो एक रुपया, ककड़ियाँ हमें दो जवान।“

कुँजड़ा क्षण भऱ स्तंभित रहा, उसने प्रश्न-वाचक दृष्टि से युवक की ओर देखा। युवक ने कहा- “ कुछ परवाह नहीं, हम दो रुपये देंगे।“

“ हम पाँच रुपये देते हैं। “

“ हम दस देतो हैं।“

“ यह लो बीस रुपये- ककड़ी तो हम खरीद चुके।“

“ पच्चीस हैं, यह ककड़ी हमने ले ली।“

“ हमने तीस दिये।“

युवक के माथे पर बल पड़ गये, उसने कहा- “ हम पचास में खरीदते हैं, लाओ ककड़ियाँ इधर दो।“

बूढ़े कहार ने हँस दिया और आज्ञा की दृष्टि से युवक की ओर देखकर, सीधा खड़ा होकर उसने तेज स्वर में कहा-“ मैने सौ रुपये में दोनों ककड़ियाँ खरीदी हैं।“

युवक कहार क्षण भर घबराई दृष्टि से बूढ़े की ओर देखता रहा। बूढ़े ने विजय गर्वित दृष्टि से उसे घूरते हुए कहा-

“दम हो तो बढ़ो आगे। ककड़ियाँ पाँच हजार तक मेरे यहाँ जायेंगी।“

सैकड़ों आदमी इकट्ठे हो गए थे। युवक लज्जा और क्रोध से भरकर चुपचाप चल दिया। सैकड़ों कंठों से नारा बुलंद हुआ-“ वाह भाई महरा क्यों न हो, आखिर तू है किस घराने का नौकर जो इस समय दिल्ली की नाक है। शाबाश!“

बूढ़े ने कमर से रुपया खोलकर गिन दिये-ककड़ियां लीं और इस भाँति अपने मालिक के घर की ओर चला, जैसे वह एक राज्य विजय कर लाया हो।

***

बूढ़े ने अपने मालिक लाला जगतनारायण जी के सामने जाकर फूलों और केलों के पत्तों में लपेटी हुई ककड़ियाँ रख दीं। शाम हो चली थी। लाला ने पूछा-“ क्या दो ही मिलीं।“

“ जी हाँ बाजार भर में सिर्फ दो ही ककड़ियाँ थीं जिन्हें आपका सेवक 100 रुपये में खरीद लाया है।“ इसके बाद कहार ने जो घटना बाजार में घटी थी, सब कह सुनाई। लाला ने सब सुना, क्षण भर वे स्तंभित रहे, क्षण भर बाद उन्होंने अपने गले से सोने का तोड़ा उतारकर बूढ़े के गले में डाल दिया और उसके बदन को दुशाले से लपेटकर स्वयं भी उससे लिपट गये। उनकी आँखों से आँसुओं की धार बह निकली। उन्होने गदगद कंठ से कहा-“ शाबाश मेरे प्यारे रामदीन, तुमने बाजार में मेरी प्रतिष्ठा बचा ली।“ इसके बाद उन्होंने चाँदी की तश्तरी में ककड़ियों को उन्ही गुलाब के फूलों में रखकर, ऊपर कमख्वाब का एक रूमाल ढाँक कर कहा- “ जाओ लाला शिवप्रसाद जी से मेरा जै गोपाल कहना और कहना कि आपके सेवक ने यह प्रेम की सौगात भेजी है और हाथ जोड़कर अर्ज की है कि स्वीकार करके इज्जत अफजाई करें।“

***

युवक से सब घटना सुनकर लाला शिवप्रसाद जी चुपचाप मनसद पर लुढ़क गये। मुँह की गिलौरी उन्होंने थूक दी, नौकर-चाकर चिन्तित हुये। पर कोई कुछ नहीं कह सकता था। थोड़ी ही देर में बूढ़े रामदीन ने आकर अदब से आगे बढ़कर तश्तरी लाला शिवप्रसादजी के सामने रख दी और हाथ जोड़कर अपने मालिक का संदेश भी निवेदन कर दिया। लाला शिवप्रसादजी चुपचाप एकटक तश्तरी में रक्खी दोनों ककड़ियों को देखते रहे। कुछ देर बाद उन्होंने ककड़ियाँ भीतर भिजवा दीं और तश्तरी अशर्फियों से भरकर कहा-“ यह तुम्हारा इनाम है, लाला जगतनारायणजी से हमारा जैगोपाल कहना।“ बूढ़े रामदीन ने छुककर सलाम किया और चला आया।                                                                                               

 ***

दूसरे दिन सूर्योदय के साथ ही सारे शहर में खबर फैल गई कि नगर के प्रसिद्ध रईस लाला शिवप्रसादजी ने रात जहर खाकर जान दे दी। एक पुर्जे पर यह लिखकर रख गये कि बाजार में मेरी इज्जत किरकिरी हो गई। अब मैं दुनिया में मुँह नहीं दिखा सकता।

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ऊपर जिन दो प्रतिष्ठित रईसों के नाम दिये गये हैं, वे काल्पनिक हैं। आज भी ये दोनों घराने दिल्ली में उसी भाँति प्रतिष्ठित हैं। हाँ जिनका नाम जगतनारायाण कल्पित किया गया है उनके घर से लक्ष्मी रूठ गई है। आज उनकी वह विशाल हवेली टूट-फूटकर खंडहर हो गई है। उसमें जो एक-आध कमरा बचा है, उसमें उनके उत्तराधिकारी बड़े कष्ट से कालयापन करते हैं। नीचे के खंड के खंडहरों में छोटे दर्जे के किराएदार रहते हैं, जिनकी आमदनी पर ही उनका निर्वाह निर्भर है।

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                                                                                                                                          कहानी समकालीन


                                                                                                                                           -शमोएल अहमद

            बर्फ में आग    

सुलेमान को अपनी बीवी किसी बस्ते में लिपटे हुए धार्मिक ग्रंथ की तरह लगती थी जिसे हाथ लगाते वक्त सावधानी की जरूरत पडत़ी है । उसकी शादी को  दस साल हो गये थे लेकिन अभी तक वह सुलेमान से बहुत खुली नहीं थी । सुलेमान उसको पास बुलाता तो पहले इधर उधर झांककर इत्मिनान कर लेती कि कहीं कोई है तो नहीं....खासकर बच्चों की उपस्थिति का उसको बहुत ध्यान रहता था । जबतक यकीन नहीं हो जाता कि बच्चे गहरी नीन्द सो चुके हैं वह सुलेमान को पास फटकने भी नहीं देती थी ।
सुलेमान को शुरु शुरू में सुल्ताना के इस रवैये से बहुत उलझन महसूस हुई । उसको लगा उसके साथ सहवास करके वह किसी अनिवार्य पाप का भागीदार हो रहा है लेकिन उसकी जिंदगी में जब रजिय़ा दाखिल़ हुई तो उस पर भेद खुला कि बीवी और महबूबा में फर्क है और यह कि जिंदगी में दोनों की अपनी-अपनी अहमियत है ।
रजिय़ा सुलेमान की महबूबा थी और उसमें वही गुण थे जो महबूबा में होते हैं । वह बोसे का जवाब बोसे से देती थी । सुलेमान उसको अपनी बाहों में कसता तो वह उसी गर्मजोशी का प्रदर्शन करती । बल्कि अकसर आलिंगन में पहल कर बैठती और जब धीरे धीरे कानों में फुसफुसाती कि जानी....कहां रहे इतने दिन....? तो सुलेमान पर नशा सा छाने लगता था । आनन्द की ऐसी वर्षा सुल्ताना के साथ कभी मयस्सर नहीं हुई थी । सुल्ताना उसको बन्द गठरी की तरह लगती थी जिसकी गांठें ढीली तो हो जाती थीं लेकिन पूरी तह खुलती नहीं थीं । रजिय़ा इसके प्रतिकूल थी । वह बेडरूम में शेल्फ  पर रखी हुई उस किताब की तरह थी जिसके पन्ने वह अपने तौर पर उलट सकता था और जब भी उसने रजिय़ा की किताब उलटी पलटी थी प्रेम-रस का एक नया अध्याय ही उसपर खुला था । रजिय़ा कहती भी थी '' यही फर्क होता है मेरी जान....पत्नियां दाम्पत्य अधिकार निभाती हैं और महबूबा खजा़ने लुटाती है ।
रजिय़ा की धारणा थी कि औरत सिर्फ अपने महबूब की बाहों में ही खुद को पूरी तरह अनावृत करती है वरना वह फर्ज निभाती है । उसके प्रेम मे कर्त्तव्य की भावना हावी रहती है ।
उसकी इस बात पर सुलेमान ने उसको एकबार टोका था ।
'' इसका मतलब है कि तुम अपने पति से प्यार नहीं करती हो ।''
रजिय़ा अपनी बाहें उसके गले में डालती हुई बोली थी ।
'' मेरी जान...मैं पति से प्यार करना अपना फर्ज समझती हुं और प्रेम फर्ज नहीं है ।''
इसपर सुलेमान ने उसका तवील चुम्बन लिया था । '' फिर प्यार क्या है ? ''
''यह है प्यार....एक पुरूष  इस तरह अपनी बीवी को नहीं चूमता....प्यार बंधन नहीं है । प्यार का मतलब है मुक्ति....प्यार का मतलब है तमाम बंधनों से विमुक्त हो जाना !''
''वाह ! क्या बात है !'' सुलेमान हंसने लगा ।
देखो हम कितने फ्री हैं...कितने आजा़द...पति पत्नी का बंधन स्वामित्व का बंधन है जिसमें स्वामी कोई नहीं है दोनों ही दास हैं...दोनों का एक-दूसरे पर आधिपत्य है और प्यार आधिपत्य नहीं है । ''
सुलेमान लाजवाब हो गया ।
''एक बात बताऊं...? '' यकायक रजिय़ा मुस्कराई और फिर लजा गयी ।
''बताओ ।''
''नहीं बताती ।''
बताओ न मेरी जान ।'' सुलेमान ने उसके गालों में चुटकी ली ।
''जब मैं अपने पति की बाहों में होती हुं तो ध्यान तुम्हारा ही होता है । ''तुम्हारा ध्यान मेरे लिए उत्तेजक है....तब जाकर कहीं मैं.....!''
सुलेमान ने उसको बेइख्तियार पलिटा लिया । '' और मेरी बाहों में ....?''
''तुम्हारी बाहों में मैं अपने को पूर्णरूप से स्वतंत्र् महसूस करती हुं....कोई अवरोध नहीं रहता। मैं होती हुं....एक बहाव होता है....नदी की तेज  धार होती है...और फिर....और फिर....बहाव भी नहीं होता....नदी भी नहीं होती...मैं भी नहीं होती ''
सुलेमान रजिय़ा की इस बात पर अश-अश कर उठा ।
इन तमाम बातों के बावजूद सुल्ताना से उसके सम्बंध मधुर थे । बल्कि ज्यों ज्यों रजिय़ा से उसका लगाव बढत़ा गया सुल्ताना की कद्र-व-कीमत भी उसके दिल में बढत़ी गयी और वह महसूस करने लगा कि सुल्ताना लाज की मारी पति-परायणा स्त्री है जिसमें वही पवित्र्ता है जो एक पति अपनी पत्नी में देखना चाहता है । मसलन सुल्ताना का हमेशा नर्म लहजे में बातें करना...उसका हर हुक्म बजा लाना....सबको खिलाकर खुद आखिर में खाना ये सब एक पतिव्रता स्त्री के आवश्यक गुण थे जो सुल्ताना में कूट कूट कर भरे थे ।
सुलेमान को अकसर यह सोचकर हैरत हुई थी कि दस वर्षों के दामपत्य जीवन में सुल्ताना ने उससे कभी ऊंची आवाज में बात नहीं की थी ना ही अपने लिए ऐसी कोई मांग की थी जो सुलेमान को उलझन में डालती । शादी के बाद शुरू शुरू के दिनों में उसने पोशाक के मामले में उसको यह मशवरा जरूर दिया था कि वो अपने लिए प्रिंस सूट सिलवाए ।
सुलेमान ने महसूस किया था कि सुल्ताना की इच्छा थी कि वह उसको प्रिंस सूट में देखे लेकिन बंद गले का कोट उसको पसंद नहीं था । उसने उसकी इस बात पर कोई खास ध्यान नहीं दिया था और सुल्ताना ने भी जिद़ नहीं की थी । उन्हीं दिनों वो अकसर गुड  भर कर करेले की सब्जी़ भी बनाती थी । सुलेमान ने यह भी महसूस किया था कि सुल्ताना यह सब्जी बडे़ चाव से बनाती है लेकिन करेले का स्वाद उसको पसंद नहीं था । उसने सब्जी़ एक दो बार सिर्फ चखकर छोड  दी थी ।
सुलेमान अपने दामपत्य जीवन से संतुष्ट था । सुल्ताना ने उसको तीन खूबसूरत बच्चे दिये थे । वो घर-गृहस्थी में कुशल थी । घर का हर छोटा-बडा़ काम खुद ही अंजाम देती थी । सुलेमान गृहस्थी का खर्च उसके हाथों में देकर निश्चिंत हो जाता था ।
रजिया अकसर सुल्ताना के बारे में पूछती रहती थी लेकिन वह ज्य़ादा बातें करने से घबराता था । कभी कभी रजिय़ा कोई चुभती हुई बात बोल जाती और सुलेमान को लगता वह उसकी इमेज तोडऩे की कोशिश कर रही है । एक बार जब वह सुल्ताना की बडा़ई कर रहा था कि किस तरह घर के काम निपटाती है तो रजिय़ा तडा़क से बोल उठी थी '' उससे कहो हर वक्त दाई बनकर नहीं रहे....पत्नी को कभी औरत बनकर भी रहना चाहिए !''
सुलेमान को यह बात लग गयी थी । उसको एहसास हुआ था कि वाकई सुल्ताना हर वक्त काम में ही लगी रहती है । कभी फुर्सत के क्षणों में उसको पास बुलाता भी है तो काम का बहाना करके उठ जाती है । लेकिन फिर उसने अपने आप को यह कहकर समझाया था कि सुल्ताना दरअसल एक सुघड औरत है और सुघड औरतें इसी तरह घर के कामों में लगी रहती हैं ।
एक दिन कपडो़ की खरीदारी के लिए सुलेमान घर से निकला । साथ में सुल्ताना भी थी । एक दो दुकान झांकने के बाद वो रेमंड हाउस में घुसना ही चाह रहा था कि सुल्ताना के कदम रुक गये । वो ठिठककर खडी़ हो गयी । उसका मुंह हैरत से खुल गया ।
'' क्या हुआ ? '' सुलेमान ने पूछा ।
'' यह तो इलियास भाई हैं ! ''सुल्ताना का चेहरा तमतमा रहा था ।
सुलेमान ने सामने दुकान की ओर देखा । प्रिंस सूट में एक खूबसरूत आदमी काउंटर के करीब खडा़ था ।
'' यहां से चलिए....।'' सुल्ताना आगे बढत़ी हुई बोली ।
चलते चलते सुलेमान ने मुडक़र एक बार फिर उस आदमी की तरफ  देखा । सुल्ताना आगे सेन्ट्रल वस्त्रलय में घुस गयी ।
'' कौन थे ? ''
'' भाईजान के दोस्त थे ।''
''अगर जान-पहचान है तो मिलने में क्या हर्ज है ? ''
''मुझे शर्म आती है । ''
सुल्ताना के चेहरे पर पसीने की बूंदें फूट आई थीं । खरीदारी के बाद सुल्ताना ने दुकान से निकलते हुए एक दो बार गर्दन घुमाकर इधर उधर देखा । रेमंड हाउस से गुजऱते हुए सुलेमान ने एक बार उधर उचटती सी नजऱ डाली ।
रास्ते में सुल्ताना सब्जी़ की दुकान पर रुकी । सब्जिय़ाँ और फल खरीदते हुए वे घर लौटे तो शाम हो गयी थी । सुलेमान टी.वी. खोलकर बैठ गया और सुल्ताना खाना बनाने में लग गयी ।
समाचार सुनने के बाद सुलेमान खाने की मेज  पर बैठा तो करेले की सब्जी़ देखकर उसको हैरत हुई । बहुत दिनों बाद सुल्ताना ने फिर गुडद़ार करेले बनाए थे । इस बार सुलेमान ने पूरी सब्जी खाई । खाने के बाद भी वो कुछ देर टी.वी. देखता रहा । फिर बिस्तर पर आ कर लेटा तो सुल्ताना एक तरफ  चादर ओढक़र सोई हुई थी । सुलेमान को अजीब लगा । यह अंदाज  सुल्ताना का नहीं था । कुछ देर वह बगल़ में लेटा रहा फिर बत्ती बुझाई और सुल्ताना को धीरे से अपनी तरफ  खींचा...वह उसके सीने से लग गयी । सुलेमान को अपने सीने पर उसके  शरीर का स्पर्श रहस्यपूर्ण लगा । उसको हैरत हुई कि उसका बदन पहले इतना गुदाज  नहीं मालूम हुआ था । तब वह महसूसे बिना नहीं रह सका कि सुल्ताना की सांसें तेज  चल रही हैं ।कमरे के अंधेरे में उसने एकबार सुल्ताना के चेहरे को पढऩे की कोशिश की और फिर उसको अपने बाहुपाश में भर लिया । सहसा सुलेमान ने महसूस किया कि सुल्ताना की सांसें और तेज  होती जा रही हैं.....और मानो सांस के हर उतार चढा़व के साथ बंद गठरी की गांठें अपने आप खुलने लगी हैं....खुलती जा रही हैं ।


सुलेमान ने हैरत से उसकी तरफ  देखा । एक पल के लिए उसको रजिय़ा की याद आई और उसका चेहरा पसीने से भींग गया । सुल्ताना के बदन पर उसकी बाहों का शिकंजा ढीला पड गया ।
सुलेमान को लगा उसकी बाहों में सुल्ताना नहीं है.....कोई और है....!!!

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                                                                                                                                                      कहानी समकालीन


                                                                                                                                                          -शैल अग्रवाल

           सूखे पत्ते

आज फिर वह यादो का कटोरा लिए सुनयना के आगे खड़ा था।  झोली फैलाकर भीख मांग रहा था, वह सब-कुछ, जो उसके और आलोक के लिए असंभव ही नहीं असहनीय भी था।  विचलित सुनयना ने हारकर अपना पूरा सुख-चैन, यहां तक कि, खुदको भी उसकी झोली में डाल ही दिया - बहते आंसुओं से लड़े बगैर ही।  फिर तो यादें एक बरसाती  नदी-सी, अच्छा-बुरा सबकुछ अपने में समेटे, न सिर्फ उसके चारो तरफ बह निकली बल्कि उसे भी अपने साथ बहा ले चलीं।  अब आंसुओं और यादों में होड़ थी - देखें कौन जीतता है?  
पर यूँ टूटकर बिखरने का तो सुनयना का कोई भी इरादा न था, न जाने कैसे वह तो रास्ते में खड़े पेड़ सी यूँ ही इनकी चपेट में आ गई थी।  सुनयना बही जा रही थी और सामने खड़ा पलाश का पेड़, अपने लाल फूलों से लदा-फंदा, धीमे-धीमे मस्त हवा में झूम रहा था।  चुप-चुप -- कुछ गुनगुनाता और गाता-सा।  हवा उसकी हर पत्ती को छू-छूकर सरसर दौड़ रही थी, बिल्कुल उसके अपने पलाश की तरह - बिल्कुल वैसे ही हाथ ऊपर उठाए, मुँह से सीटी बजाती -- 'देखो मां चिड़िया ऐसे ही उड़ती है न' - आड़ी-तिरछी हो, होकर, मुड-मुड़कर, बार बार उससे  पूछती।


धुँधला आए शीशे से ठीक-ठीक, साफ-साफ देखने के लिए सुनयना ने बीस साल पुराने चश्मे को फिरसे कसकर पल्लू से रगड़ डाला।  सामने खड़ा माली कबसे पूछे जा रहा था - बीबीजी इन सूखे पत्तों को हटा दूँ - कहो तो थोड़ी छटनी भी कर दूँ - अगली साल और अच्छा खिलेगा -?  सुनयना कब कुछ सुन पा रही थी?  भारी मन से स्वीकृति दे दी थी उसने।  खुद में डूबी वह तो बस यही जानती थी कि उसे तो  बस इंतजार करना है - एक-एक पल का - हर उस अगले मौसम का - जब यह फिरसे नये पत्तों में खिलेगा।

नहीं, इससे दूर नहीं हो पाएगी वह।  इसकी तो एक-एक पत्ती को उसके पलाश ने बहुत प्यार से सींचा हैं।  अपने नन्हें हाथों से ही तो रोपा था इसे।  आए दिन पूछता था - क्या यह आपका सबसे प्रिय और खास पेड़ हैं, जो आपने इसे मेरा ही नाम दे दिया?  और तब वह उसे प्यार से, गोदी में बिठाकर समझाती थी -- प्रिय और खास तो है पर तुझ से कम।  और वह तुरंत ही समझ भी जाता था।  मां की हर बात जल्दी ही समझता था वह।  'अच्छा मां, अगली बार जब मैं मसूरी हॉस्टेल में रहने जाउंगा न, तो आप इसे ही पलाश कहकर बुला लिया करना,' मां को तसल्ली देते हुए, उसके आंचल से खेलते हुए, उसने कहा था। 
सुनयना की सूनी आंखों ने आवाज दी '-पलाश-' पर पेड़ से कोई जवाब नहीं आया।  हां, तपते रेगिस्तान में पड़ी बूंद सा, एक सूखा-पत्ता उड़कर जरूर उसके आंचल में आ गिरा।

आज उसके पलाश का जन्मदिन है।  आठवां नहीं अठ्ठाइसवां।  सुनयना तो अब भी अनाथालय में जाकर बच्चों को खाना खिलाती है, मिठाईयां बांटती हैं।  ठीक वैसे ही जैसे बीस साल पहले करती थी।  आजतक बस यही सिलसिला चल रहा है।  यही करती रही है वह हर छब्बीस अक्तूबर को।  वह तो उस दिन भी गई थी जब ठीक अपनी सत्ताइसवीं साल गिरह पर पलाश ने रोते हुए पहली बार मां से जिद की थी - 'मां, मुझे अब जाने दो, मुक्त करो इस कैद से।  अब और नहीं सहा जाता।'

कई दिन लग गए थे उसे, पर अन्त में दे ही दी थी उसने स्वीकृति।  मुक्त कर दिया था अपने पलाश को इस यातना से।  चले जाने दिया था चुपचाप उस परछाई को भी, जिसके सहारे वह पिछले बीस इक्कीस साल से जी रही थी -- यह जानते हुए भी कि वह और आलोक एक पल भी नहीं रह पाएंगे उसके बिना।  पर बर्दाश्त कर लेगी वह।  सह लेगी सबकुछ - अपना दुख, आलोक की उदासी, सभी कुछ।  पलाश की घुटन और उदासी कैसे सहती - मां है आखिर?

सुनयना ने आंखें पोंछी और कम्प्यूटर बन्द कर दिया।  सबकुछ एक गहरे काले अंधेरे में खो गया।  एक-एक मन के पैर को बारबार घसीटती, चुपचाप वह बगीचे में आकर गन्दी ही सीढ़ियों पर धम से बैठ गई - बिना धूल झाड़े, बिना कुछ सोचे समझे और बगल में रखी कुरसी खाली मुँह बिसूरती रह गई। 

 आज सुनयना का मन तो एक टूटी पत्ती-सा था -- अपने ही भंवर में भटका गोल-गोल घूमता हुआ।  शायद अब बचने का कोई रास्ता नहीं।  यूँ और न टूटने देगी वह खुद को।  वह टूट गई तो आलोक का क्या होगा?  याद नहीं कबसे, बस एक वही तो है जो संभाले हुए है इस सूने घर को, खुद को और अपने आलोक को।  पर कैसे बता पाएगी कि अब वाकई में सबकुछ खतम हो गया - आजाद कर दिया है उसने पलाश को, तोड़ डाली हैं रिश्तों और मोह की वे सारी जंजीरें - क्योंकि उसने पलाश के रिसते फफोले और घाव देख लिए हैं।  नहीं, और नहीं चल सकता था यह खेल।  वाकई में बस एक खेल ही तो था वह।   पिछले बीस साल से चल रहा खेल -- जिन्दगी के कम्प्यूटर में बन्द खेल - माना कि उसने मान लिया था, खुद को समझा भी लिया था, पर आलोक कब माना था कि उनका पलाश नहीं रहा।  रह गई थी तो बस चौबीस घंटों की भटकन, साधु-सन्यासिओं तक की भागदौड़।  इसी सबसे घबराकर तो उसने  खुद को कमरे  में बन्द किया था।  और एक बार फिर से जना था अपने पलाश को - आठ साल के पलाश को।  ज्यों  का त्यों -- उसकी सभी आदतें और पसंद और नापसंद के साथ।  प्यार और नफरत के साथ।  और फिर उदास  आलोक को आकर चुपचाप बेटा सौंप दिया था।  स्क्रीन पर- 'पापा आज आप मुझे जगाने क्यों नहीं आए'- लिखा देखकर पहले तो वह बहुत चौंका था, फिर आहत होकर पीछे हट गया था  - 'यह कैसा मज़ाक है सुनयना?'  आंसू भरी आंखों से उसने पूछा था और तब सुनयना की सूजी आंखें, दृढ़ चेहरा देखते ही तुरंत जान भी गया था कि आज यह कोई मजाक नहीं  -- बात सच से भी ज्यादा सच है।  पल्लु से आंखें पोंछती सुनयना बस इतना ही कह पाई थी --
'जवाब दो आलोक, पलाश तुमसे कुछ पूछ रहा है?'
और तब कांपते हाथों से आलोक ने लिखा था, -- 'सॉरी बेटा, अगली बार ऐसी भूल नहीं होगी' - और उसके बाद तो आलोक और सुनयना मुश्किल से ही कुछ और कह या कर पाते थे।  दोनों का पूरा वक्त बस पलाश के साथ ही निकल जाता था।  पलाश बड़ा हो रहा था।  हर दिन नयी खबरें और नई-नई बातें होती थीं।  सब कुछ सुनने और जानने को उत्सुक था वह।  अपना मनचाहा संगीत सुनते-सुनते अब तो उसे कई गाने तक याद हो गए थे।  होमवर्क करते हुए अक्सर सुनयना और आलोक ने उसे नयी धुनें गुनगुनाते हुए भी सुना था।  सीटी बजाते सुना था।  पुराने घाव भर रहे थे।  सुनयना और आलोक को लगने लगा था कि उनका पलाश कहीं नहीं गया, यहीं उनके पास हैं।  उनके साथ रहता है।  क्या हुआ जो बस कम्प्यूटर की दुनिया में सीमित हो गया है, पर है तो यहीं।  रोज ही तो उनसे बातें करता है - हंसता खेलता है -- रूठता और मनाता तक है वह तो।  क्या यह सब कुछ कम था उनके सूनेपन के लिए?  फिर कैसे इतनी आसानी से सबकुछ मिटा आई वह?  कोई आसान तो नहीं था उसके लिए -- वही दुबारा सीने पर पत्थर रखकर फिरसे सब कुछ दफन कर देना?

पर बात ही कुछ ऐसी थी - बीस साल की  नई पुरानी यादों का जीता-जागता वह नन्हा पुतला, उससे पूछे जा रहा था - 'बताओ मां, आखिर मेरे भविष्य के बारे में क्या सोचा है आप लोगों ने -- क्या मैं ऐसे ही, इस दुनिया में बस यूँ ही अकेला ही घूमता रहूंगा?  क्या मेरे कोई भी संगी-साथी नहीं होंगे?'  और तब आंसू पोंछते हुए आलोक ने भरे गले से तुरंत जवाब दिया था 'हम हैं ना बेटा तुम्हारे पास।  हम है ना।' 

और तब उसने वह असंभव बात भी पूछ ही डाली थी जिसे सोचने तक से सुनयना डरती थी, - 'क्या तुम्हारी इच्छा नहीं होती मां, कि तुम दादी बनो, पापा दादा बनें, हम हंसी-खुशी से जिएं।  और फिर कल जब तुम नहीं होगी तब - तब क्या होगा?  बोलो मां, कौन फिर मुझसे बातें करेगा?  मेरी देखभाल करेगा?  मेरे पास बैठकर मेरे दुख-दर्द सुने और समझेगा?'

सुनयना कुछ भी तो और आगे न सुन पाई थी?  एक कमजोर टूटी हुई मां थी वह, भाग्य-विधाता नहीं।  सवालों से जकड़ा एक असहाय भविष्य उसके सामने कराह रहा था।  क्या बस उनकी खुशी ही पलाश के अस्तित्व की एकमात्र शर्त है।  क्या उसका जन्म बस उनके मन बहलाने के लिए ही हुआ था?  यदि नहीं तो आज जब उसने अपने अंदर उठती हुई भावनाओं को व्यक्त किया है - एक स्वाभाविक-सा सवाल पूछा है तो वह सह  क्यों नहीं पा रही।  जो चाहता है - दे क्यों नहीं पा रही? 

जब बीस साल पहले उसने इस नए पलाश को जन्म दिया था, तब उसने यह सब कुछ नहीं सोचा था - ना ही किसी  भविष्य के बारे में - ना ही अपने  और आलोक के बारे में - और ना ही इस डबलू डबलू डबलू. पलाश डॉट कॉम के बारे में।  उसने तो बस अपने  पति का दुख बांटना चाहा था।  थोड़ी सी राहत और तसल्ली ढूँढ़ी थी।  आलोक जो किसी भी हालत में मानने को तैयार नहीं था कि उनका पलाश उनसे बहुत दूर जा चुका है, उसका बहलाने की बस एक ईमानदार कोशिश की थी।  वह तो तब भी खूब अच्छी तरह से जानती थी कि अब कोई वापिस नहीं ला सकता उनके पलाश को।  लाना तो दूर, उसकी खोज-खबर तक नहीं दे सकता।  उससे बातें या उनका संपर्क नहीं करवा सकता।  ये तरह-तरह के वादे और दावे करने वाले पंडित  और साधु भी नहीं।  भूत-प्रेतों की गोष्ठियों में लगातार बैठे रहने  का दावा करने वाले वो कर्ण-सिद्धी योगी भी नहीं।

पति की भटकन और तड़प से छटपटाती सुनयना उस दिन बस अपना दर्द सहने के लिए कमरा बन्द करके जा बैठी थी।   याद नहीं कब और कैसे, किस सोच की उंगली पकड़े, आंसुओं में लिपटा पलाश खुद-बखुद उसकी गोदी में आ बैठा था।  स्क्रीन पर बैठा उसकी उंगलियों से खेलने लग गया था।  और तब रोशनी की उस किरण को पकड़े-पकड़े, बहुत सोच-विचारकर - यादों के गर्भ से, बस सिर्फ अपने  आलोक के लिए एकबार फिरसे सुनयना ने बेटे को पुनर्जन्म दे दिया था।  कोखसे नहीं, हृदय को चीरकर।  धैर्य से बार बार याद करके उसकी छोटी बड़ी सभी आदतें, पसंद-नापसंद, चलने-फिरने, उठने-बैठने का तरीका, सभी कुछ हूबहू उस प्रोग्राम में उतारा था।  और फिर जब हफ्ते भर के काम के बाद कम्प्यूटर की स्क्रीन पर घूमते उस बालक ने कहा था कि, 'मां बहुत कसकर भूख लगी है आज खाना क्या खिलाओगी?'  तो सुनयना ने मारे खुशी के आदतन् अविश्वास में चश्मे को ठीकसे बार बार साफ करके देखा था।  हां सामने स्क्रीन से घूरता वह चेहरा पलाश का ही था।  कम्प्यूटर में से आती आवाज भी उसके अपने पलाश की ही थी।  यह बस फोटो या विडियो की रील नहीं थी जो सिर्फ बोलती ही जाए।  यह तो सुनता-समझता और जवाब तक देता था।  और फिर शुरू हो गया था उस दिन से  वह खुद को बहलाने और भूल जाने का एक नया सिलसिला।
भूल चुके थे सुनयना और आलोक कि यह पलाश नहीं बल्कि उसकी खुद की बनाई हुई पलाश की परछाई मात्र है।  पर - परछाइयों के बस में तो हंसना और बोलना नहीं होता?  वे तो बस पीछा करना जानती है।  यह जरूर उनका अपना पलाश ही है - क्या पता उन पर दया कर के भगवान ने पलाश की आत्मा को ही इस कम्प्यूटर मे भेज दिया हो?  सुनयना ने खुदको भी समझा लिया था।  दोनों ने ही पूरी तरह से  भरमा लिया था अपने आपको।
उस कम्प्यूटर के साथ - नहीं, अपने बेटे पलाश के संग वे चौबीसों घंटे बैठे रहते थे वे।  अक्सर वह थककर सो जाता, उबासियां लेने लगता, पर ये दोनों न थकते।  दीन-दुनिया से दूर, खो गए थे दोनों अपनी इस छोटी-सी काल्पनिक दुनिया में।  भूल गए थे कि अभी तीन महीने पहले ही उन्होंने अपने पलाश को धरती की गोद में सुलाया है।  उन्हें तो बस इतना याद रह गया था कि ऋषिकेश में एक पहुँचे हुए साधु ने बतलाया था कि पलाश की आत्मा आज भी उनके चारो तरफ ही घूम रही है और दोनों के चालीस के पेठे में होने के बावजूद भी वह उन्हींके यहां फिरसे वापस आएगा।  सो आ तो गया पलाश उनके पास।  वह उनके साथ रोज की खबरें सुनता।  दुनियाभर के विषयों पर बहस करता, फुटबॉल और ताश तक खेलता था वह तो।

दिन सालों  में बदलने  लगे।  बात अब चन्द उल्टी-सीधी तस्वीरों तक ही नहीं  रह गई थी।  धीरे-धीरे पलाश उन्हें स्क्रैंबल और चेस जैसे दिमागी खेलों  में भी हराने लगा था।  शेयर बजार के उठते-गिरते भावों की खबर रखने लगा था।  यही नहीं उनके कम्प्यूटर के हिसाब-किताब तक रखने शुरू कर दिए थे उसने तो।  सब कुछ कितना सुचारू और ठीक-ठीक चल रहा था, उस मनहूस दिन तक, उस विनाशकारी पल तक - जब आलोक ने बातों-बातों में पलाश को पड़ौस के विवेक  की शादी की खबर दी थी।

कभी बचपन में उसके साथ ही खेला-बड़ा था वह भी।  सुनयना को अच्छी तरह से याद है पहले दिन वही दोनों को नर्सरी से अपने  साथ घर लाई थी।  उसकी पड़ोसन कीर्ति, विवेक की मां को कहीं जाना पड़ गया था और उसने सुनयना से आग्रह किया था कि वह विवेक को भी अपने साथ घर ले आए।  दोनों बच्चे कितने खुश थे उस दिन।  बार बार गा-गाकर नई-नई सीखी कविता -- ' जिद कर बैठा चांद एक दिन माता से यूँ बोला' -सुनाए जा रहे थे।  आलोक ने मजाक भी किया था अगर चांद जिद कर सकता है तो हमारे पलाश और विवेक क्यों नहीं? 

उस दिन तो नहीं, पर हां आज पलाश जिद पे जिद ही  किए जा रहा था।  बात समझने की कोशिश ही नहीं कर रहा था।  सुनयना ने अपनी आंसुओं से गीली आंखें पोंछ डालीं।  यह विषय अन्य विषयों की तरह नहीं, बहुत ही भिन्न और खास था।  तुरंत निर्णय चाहता था।  उस तूफान-सा था जो शुरू तो एक छोटे-से पत्ते  के हिलने से होता है फिर पूरा-का पूरा जंगल ही हिलाकर रख देता है।
उसका वह रोज-रोज शादी के ऊपर नित नये सवाल करना।  बातों को समझना और फिर समझकर खुदही अपनी असमर्थता पर क्षुब्ध हो जाना।  यह एक नया और बेचैन करने वाला सिलसिला था।  जवाबों के साथ उसकी जिज्ञासा भी बढ़ती जा रही थी और फिर उसके अप्रत्याशित-विचलित प्रश्नों के साथ, पलाश की कौन कहे, अब तो खुद आलोक को भी संभालना मुश्किल हो चला था -- पलाश बार-बार पूछ रहा था - हठ कर रहा था -- 'अब मेरी शादी कब होगी?'

सुनयना पूरी तरह से सकते में आ चुकी थी।  काल्पनिक बहू की कल्पना तक उसके लिए असंभव थी।  यह रचना उसके बस के बाहर थी।  यह छलित संसार उसे छलनाओं के नए बीहड़ जंगल में खींच रहा था जहां वह जाने तक से डरती थी।  सुनयना जानती थी कि वहां कांटों के अलावा और कुछ भी नहीं।  जिन्दा शरीरधारी इन्सानों की भी अपनी कमजोरियां, अपनी सीमाएं होती हैं।  फिर ये परछाइयां - ये उजाले में चलती तो जरूर हैं पर इनका अस्तित्व तो सिर्फ अंधेरे से ही तो बनता है।  बेटे को तो उसने आठ साल तक पाला-पोसा था - नौ महीने कोख में रखा था।  उसके सुख-दुख सहे और बांटे थे - अपने हाड़-माँस से रचा और सींचा था उसने उसे।  अपनी आंखों के आगे, थोड़े समय के लिए ही सही, पलते-बढ़ते देखा भी था।  उसके अंधे भविष्य को वह टटोल सकती थी।  पर बहू - उस आंगन में छमछम घूमने वाली गुड़िया को तो वह बीस साल पहले ही बेटे  के साथ ही दफना आई थी।

पर आज यह सत्ताइस-अठ्ठाईस साल का बेटा पलाश नहीं मान रहा था।  कुछ नहीं समझ रहा था।  मां-बाप, दोनों से जिद किए जा रहा था -- मुझे जीवन-संगिनी चाहिए।  घर-गृहस्थी और बच्चों से भरा-पूरा, एक आम भविष्य चाहिए।  सुनयना के साफ-साफ मना करने पर भी नहीं।  'यह संभव नहीं-' जवाब सुनकर उदास हो गया था वह।  और तब अपनी असमर्थता पर कितना छोटा और गलत महसूस किया था सुनयना ने।  उसके दुख से अनभिज्ञ, वह फिर भी पूछे ही जा रहा था, 'बताओ मां क्यों, आखिर क्यों यह संभव नहीं हैं?'
सुनयना क्या जवाब देती - कैसी बताती कि झूठ के पांव नहीं होते?  चुपचाप आलोक से चुराकर, आंखें पोंछती, चौके में जा बैठी थी।  यही तो उसका पलायन-केन्द्र था -- अस्तित्वहीन शून्य था -- समाधि और शान्ति-स्थल था।  और आज यहीं पर उबलती हुई सब्जियों के संग सुनयना भी उबल रही थी -- तेज आंच पर चढ़ी। 

दो दिन बाद खुद ही पलाश ने अचानक फिरसे वह ठंडी-बुझी राख कुरेद डाली थी - यदि उसके अस्तित्व की, जीने की बस यही एक शर्त है कि वह आजीवन यूँ अकेला - इस प्रोग्राम में - इस कम्प्यूटर के अन्दर, इस कैद में घूमता रहे, बिना बूढ़ा और बड़ा हुए - हर दर्द और बेचैनी को महसूस  तो करे पर कुछ कर न पाए, तो इस जीवन से, इस अनुभव से, इस बिना स्पर्श और स्वाद की जिन्दगी से -- क्या फायदा?  नहीं चाहिए उसे यह बिना रूप और महक  की बेस्वाद जिन्दगी।  'देना हैं तो एक संपूर्ण जीवन दो, मां - मेरी अपनी आशाओं और असफलताओं से भरा हुआ।'  रोकर उसने कहा था  'आज भी सजीव और पुलक यादें मेरे पास बस उन पीछे छूटे आठ सालों की ही हैं।  बाकी सब तो किताबों से रटा-पढ़ा सा याद हैं।  रोने के लिए आंसू नहीं हैं - पोंछने के लिए हाथ नहीं हैं।  यह अथक जीवन अगर जीते-जीते थक भी जाऊं तो आम लोगों की तरह काल मृत्यु का विकल्प तक नहीं है मेरे पास तो।  कैसे जी पाउंगा यह प्रेत-सी भटकती जिन्दगी, मैं?  सबसे अलग और निष्कासित -- अपनी ही इस छोटी सी  सृष्टि में कैद -- कल जब किसी वजह से आप यह कम्प्यूटर खोल नहीं पाओगी, तो क्या होगा मेरा मां, कभी सोचा है, यह भी आपने?'

सुनयना को सब समझ में आने लगा - जो कहा वह भी और जो नहीं, वह भी।  अपने स्वार्थ के लिए वह बेटे  को यूँ और घुटता नहीं देख सकती।  और बहुत सोचने-समझने के बाद एक बार फिरसे उसने नियति से हार मान ली थी।  दे दी थी अपने पलाश को मुक्ति।  इरेज कर दीं थीं सारी यादें कम्प्यूटर से।  कर्सर का हर मूव स्क्रीन को ही नहीं उसे भी खरोंच रहा था।  और अंत में उस आखिरी टिक के साथ सामने स्क्रीन पर पलाश नहीं बस अंधेरा रह गया था।  आज फिर उसने अपने पलाश को कभी न खुलने वाली गहरी नींद में सुला दिया था।  अब कभी कम्प्यूटर के कर्सर के साथ कोई मुस्कुराता चेहरा नहीं आएगा - कमजोर और दुखी पलाश का तो हर्गिज़ ही नहीं ।  उसके लाख चाहने पर भी नहीं।  आप अभी तक सोए नहीं कहकर अब कभी  कोई आश्चर्य और चिन्ता प्रकट नहीं करेगा।  आज आपका आंख का एपौंइटमेंट हैं, भूलने पर भी अब कोई याद नहीं दिलाएगा।  पर क्या वास्तव में सुनयना यह चाहती  थी?  -क्या मशीन को पलाश नाम देने से  वह पलाश बन जाती है?  क्या उसका पलाश उसके मन के अन्दर नहीं?  पर अगर यह सच नहीं था तो वह और आलोक बीस साल तक उसमें उलझे कैसे रह गए?  वह उनके जीवन का केन्द्र कैसे बन गया?  


नहीं जानती वह कि कब और कैसे यह झूठ जिन्दगी का सबसे बड़ा सच बना -- अब तो वह यह तक नहीं जानती कि वह असल में चाहती भी क्या है- ?  बहुत थक गई हैं सुनयना।  बूढ़ी हो चुकी है वह।  बेटे को दफनाना आसान नहीं होता।  दो बार, वह भी  बीस साल बाद - हर्गिज ही नहीं। 

पर आलोक को तो अभी उसने कुछ बताया ही नहीं - सुनयना देख रही थी आज भी आदतन्, उठते ही सीधा कम्प्यूटर की तरफ ही पहुँच गया है वह।  शायद बेटे  से ताजे शेयर्स के भाव और बाजार पर बहस करनी है, या फिर कलका पढ़ा चुटकुला सुनाना है।  सुनयना हिम्मत समेट कर उठी और कांपते हाथ आलोक के कंधों पर रख दिए -- नहीं, अब वह उसे और ज्यादा अंधेरे में नहीं रख सकती।

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                                                                                                                                                            दो लघुकथाएँ


                                                                                                                                                       - निर्मला सिंह

            खेल

ग्रीन पार्क कालोनी में एक छोटा सा पार्क है, जहाँ सांय काल के समय कुछ महिलाएँ अक्सर आकर बैठ जाती हैं और अपने अपने दुख सुनाती हैं। उनके साथ रिटायर हुए प्रिंसिपल शर्मा की पत्नी भी बैठती हैं और बातें करती हैं।

उस दिन भी सरोज शर्मा पार्क में जाकर वृद्ध महिलाओं के पास बैठ गईं, लेकिन वह उस दिन शान्त रहीं, महिलाओं की बातें बड़ी ध्यान से सुनती रहीं—

सुनो बहिन ! मेरा बेटा तो इतना अच्छा है कि हर रात को दूध खुद गर्म करके मुझे देता है, जो कुछ भी कहूँ खाने के लिए लाता है “ राधा अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए बोली।

बहिन, सच कह रही हूँ, मेरा बेटा भी बहुत ख्याल रखता है मेरा। “ मैं जरा भी बीमार पड़ जाऊँ तुरंत दवाई ले आता है“  सीता ने कहा।

“अरे, तुम लोगों का तो बेटा ही अच्छा है मेरी तो बहू भी बहुत अच्छी है। सर्दियों में नहाने के लिए गर्म पानी देती है। और तो और वह... “  इससे पहिले कि कुसुम आगे कुछ बोलतीसरोज चीख पड़ी--“ बन्द करो तुम सब झूठी बकवास। किसी का बेटा अच्छा नहीं है, तुम सब मेरी तरह झूठ बोलती हो “ यह देखो मेरा मुँह देखो, आज मेरे उसी बेटे ने इतनी जोर से मारा है, जिसकी मैं हर रोज यहाँ बैठ कर तारीफें किया करती थी। मेरी तरह तुम सब कब तक फटे लिहाफ पर खोल चढ़ाती रहोगी ? “ ।

कहते ही फूट-फूट कर सरोज रोने लगी और उसकी बात सुनकर सब एक दूसरे को चोरों की तरह देखती हुई, चुपचाप एक-एक करके चल दीं।




 

गुरु दक्षिणा

सुबह से लेकर राततक दीपिका अपने ईमानदार, मेंहनती, सत्यवादी पति प्रेमप्रकाश पर ताने कसती रहती थी।

“क्यों बिना फीस लिए बच्चों को पढ़ाते हो ? “

कभी कहती “ क्यों स्कूल के गरीब बच्चों की फीस तुम जमा करते हो? क्या सब गरीबों का तुमने ठेका ले रखा है? “

“ क्या तुमने अपनी बेटी के दहेज के बारे में सोचा है? अगर यही हाल रहा तब क्वारी बैठी रहेगी। “

बहस, पत्नी की बातों का एक छोटा सा उत्तर प्रेम प्रकाश जी देते “ हमें दहेज की क्या ज़रूरत पड़ेगी ? हमारी बेटी सुंदर है, ऊँचे पद पर कार्यरत है। “

ज्वालामुखी सी फट पड़ती थी दीपिका “ अरे! आप किस दुनिया में रहते हो, हर लड़के वाला इन सब गुणों के साथ दहेज भी मांगता है। “

आए दिन ऐसी ही बातें होती रहती थीं। बेटी सुन-सुनकर तंग आ गई थी। खैर भला हो ईश्वर का कि लड़की का रिश्ता अचानक एक दिन एक इंजिनीयर लड़के के साथ तय हो गया, लेकिन लड़कों वालों ने नगद एक लाख रुपयों की मांग की।

एक तो रुपयों का अभाव दूसरे पत्नी के तानों से प्रेमप्रकाश जी बीमार पड़ गये। यह खबर कालेज के साथ-साथ पूरे शहर में फैल गयी।

अचनक एक दिन प्रेमप्रकाश जी के घर कालबैल बजी। दीपिका ने दरवाजा खोला-प्रेम प्रकाश जी के पुराने विद्यार्थियों को देखकर आश्चर्य में डूब गयी। विद्यार्थियों ने बैठते ही संग गुरूजी को पूछा- इतनी देर में गुरु जी कमरे में आये। सभी विद्यार्थियों ने, जो अच्छे पदों पर कार्यरत हो गए थे, अपनी-अपनी जेबों से लिफाफे निकाले और गुरू जी को देने के लिए खड़े हो गये-

इसके पहले कि प्रेम प्रकाश जी कुछ कहते, झट दीपिका ने लिफाफे पकड़ लिए। “ इनमें क्या है ?“ प्रेम प्रकाश जी ने पूछा।

“  सर आज हम जो कुछ भी हैं वह आपके ही कारण हैः इन लिफापों में आपकी बेटी की शादी के लिए रुपए हैं। सर, यह वापस मत कीजिएगा। गुरु –दक्षिणा के रूप में स्वीकार कर लें।“  कह कर सभी विद्यार्थी जो बड़े-बड़े अफसर थे वापस चले गए।

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                                                                                                                                                            आकलन


                                                                                                                                         - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव


स्त्री विमर्श की चिंतन परम्परा : महादेवी वर्मा की शृंखला की कड़ियों के विशेष सन्दर्भ में


साहित्य रचना के लिये आवश्यक सृजन और निर्माण शक्ति की विभूति ले नारी-पुरूष की तुलना में काव्य के अधिक समीप आती है क्योंकि भावनाओं की कोमलता और अभिव्यक्ति की कलात्मकता, दोनों ही नारी स्वभाव के प्रबल पक्ष हैं। एक ओर जहाँ शक्ति और शासन प्रिय पुरूष ने अधिकार, संघर्ष और भौतिक सफलताओं में ही जीवन का मूल्यांकन किया, वहाँ स्त्री ने समर्पण, सेवा और त्याग में अपने जीवन की सार्थकता मानी। सूक्ष्म भावना के प्रति जितनी पकड़ स्त्री लेखन में मिलती है उतनी पुरूष लेखन में नहीं, इतिहास इस तथ्य का साक्षी रहा है कि स्त्रियों के द्वारा रचित ऋग्वेद की ऋचाएं, पुरूषों द्वारा बनाई हुई कविताओं से किसी भी प्रकार कम नहीं है यह दु:ख के साथ कहना पड़ रहा है कि अनुभूति और भावनाओं की प्रतिमूर्ति होते हुये भी, सृजन की प्रतीक होते हुये भी भारतीय नारी साहित्य सृजन में प्रधान तो क्या यथेष्ठ भाग भी न ले सकी।
 अपनी व्यथा कथा को भारतीय महिलाओं को केन्द्र में स्थापित कर महादेवी वर्मा ने अपने अनुभवों का सहारा लेकर उसको जागृत करने का प्रयास किया है। महादेवी भारतीय नारी की सदियों से चली आ रही पुरातन परम्पराओं को तोड़कर आगे आने को प्रेरित करती थीं। आपका मानना था कि ''नारियां पुरूषों से प्रतिद्वन्दी के रूप में नहीं अपितु सहयोगी के रूप में प्रतिस्पर्धा करके आगे आयें।`` महादेवी वर्मा नारी देह के प्रदर्शन की वस्तु समझे जाने को निकृष्ट मानती थीं। वरिष्ठ और विख्यात आलोचक मैनेजर पाण्डेय ने अपनी नवीन पुस्तक अनभै सांचा में नारी चेतना की भारतीय परम्परा पर विचार करते हुये महादेवी वर्मा के संदर्भ में लिखा है - ''इस सदी के पूर्वार्द्ध में, जब भारत में तो क्या पश्चिम में भी साहित्य की स्वतंत्र स्त्री दृष्टि पर कोई खास बहस नहीं हो रही थी तब महादेवी वर्मा ने कहा था पुरूष के द्वारा नारी का चरित्र अधिक आदर्श बन सकता है परन्तु अधिक सत्य नहीं, विकृति के अधिक निकट पहुँच सकता है परन्तु यथार्थ के अधिक समीप नहीं।``
 वास्तव में देखा जाए तो बीसवीं सदी के अन्तिम दशक के केन्द्र में रहे 'स्त्री विमर्श` में विवाद का विषय रहा है कि स्त्री विमर्श का सुरक्षित क्षेत्र है या लेखक होने के नाते पुरूष की भागीदारी की संभावना भी वहाँ है। ''स्त्री के अनुभव की प्रामाणिकता की बात जहाँ महादेवी वर्मा शृंखला की कड़ियाँ में करती हंै।``(१) वहीं जान स्टुअर्ट मिल पुरूष के स्त्री विषयक ज्ञान को स्त्री अनुभवों के अभाव में अधूरा मानते हैं।``(२) जहाँ एक ओर पंकज विष्ट लेखन के सम्बन्ध में स्त्री-पुरूष भेद को खत्म करने वाली बात को पुरूष मानसिकता व वर्चस्व को बनाए रखने की साजिश से जोड़ते हैं।``(३) वहीं स्टीफन हीथ पुरूष के स्त्रीत्व वाद को अन्तत: एक मर्दाना काम ही मानते हैं।``(४) दूसरी ओर स्त्री का स्त्री के लिए लेखन आत्म कथाओं की आत्म प्रवंचनाओं से जुड़ता है।``(५) स्त्री का स्त्री विषय तक सीमित हो जाना तथा स्त्री लेखन को दोयम दर्जे का लेखन समझे जाने के खतरे भी कम नहीं हैं।``(६) राजशेखर भी काव्य मीमांसा में स्त्री और पुरूष के रचना संसार को अलग-अलग खांचों में बांटने से इंकार करते हैं -
    पुरूषवत योषितो पि कवी भवेयु:
    न स्त्रैणा पौरूष वा विभागमय पेक्ष में।।``(७)
 इण्डिया टुडे की साहित्य वार्षिकी १९९७ में स्त्री लेखन के अधिकार क्षेत्र के बारे में लम्बी बहस सुरक्षित है। जहाँ अधिकांश स्त्री रचनाकारों ने सिद्धात: स्वीकार किया था कि स्त्री विषय स्थिति पर फोकस्ड रचना को स्वीकारा जायेगा क्योंकि वह स्त्री के सोचने का नहीं स्त्री पर सोचने का विषय भी है।``(८) वहीं कालरिज का मानना है कि ज्ञान पुरूषवाची है और संवेदना स्त्रीवाची। इन दोनों तत्वों के मिश्रण से ही सर्जना के क्षण उत्पन्न होते हैं।``(९) स्त्री की स्थिति पर फोकस्ड समस्त लेखन में स्त्री-दृष्टि महत्वपूर्ण है जो दोनों स्त्री या पुरूष की भी हो सकती है क्योंकि स्त्री दृष्टि सहजात दशा न होकर अर्जित स्थिति है। स्त्रियां मानव पुरूष दृष्टि से अपने संसार को देख सकती हैं और पुरूष स्त्री की स्थिति का भोक्ता न भी बन सके उसका अधिवक्ता तो बन ही सकता है।``(१०) स्त्री की तरह पढ़ना, स्त्री की तरह अनुभव करना लेखक अपनी बारीक संवेदना शक्ति से संभव बना सकता है जिसे कई बार भोक्ता पकड़ नहीं पाता। चित्रकार अर्पिता सिंह रचना के मूल्यांकन के समय पुरूष और स्त्री रचनाकार की रचना के लिये भिन्न-भिन्न सौन्दर्यबोध की आवश्यकता से इंकार करती हैं।``(११) वास्तव में देखा जाये तो स्त्री साहित्य शक्ति के वरण की स्वतंत्रता और स्वायत्ता का साहित्य है। जहाँ प्रजातांत्रिक मूल्यों की स्थापना की गयी है। समता, स्वतंत्रता, सौहार्द, वर्गहीन मानवतावाद के सामाजिक मूल्यों की प्रतिष्ठा की गयी है। ''स्त्री साहित्य के मूल में ऐसे जीवन मूल्य हैं जो पूरी मानव जाति के हित में हैं। आज के इस अपसंस्कृति के समय में जब जीवन विरोधी अमानवीय स्पर्धा और हिंसा पंख पसार रही है। स्त्री साहित्य एक उदार भाव से संवेदनशीलता और संतुलन बुद्धि से युक्त होकर सम्बन्धों की उष्मा, साहचर्य, प्रेम और सद्भाव का साहित्य रच रही है। आज के चरित्रहीन समाज, भ्रष्ट राजनीति, लालच का अर्थनीतियों, हिंसा की विकृतियों के विरूद्ध पूरी मानव जाति के पक्ष में खड़ी स्त्री विहंगम दृष्टि से अपने समय और समाज को देख परख रही है। अपने मूल में नारी-विमर्श एक विचार धारा मात्र नहीं रह जाता व एक जीवन दृष्टि और पद्धति का संयोजन बन जाता है। विघटन की प्रक्रिया में मानवीय संवेदनाओं का हृास हो रहा है। मानव मन के जटिल ताने-बाने में सब कुछ सफेद या स्याह नहीं होता। स्त्री साहित्य आज उन्हीं जटिल मानवीय रिश्तों और स्थितियों की अपेक्षा जीवन को समग्रता में देखता-परखता है; इसलिए स्त्री साहित्य में आज के विखण्डित, मनुष्य की सही पहचान होती है। अपने गुणों से, धर्मपालन, सात्विक भावों, सदाशयता और आचरण की शुद्धता में स्त्री पुरूष से कहीं अधिक श्रेष्ठ है। वह अधिक सहृदय धैर्यवान, धर्मपरायण, त्यागमयी, ममतापूर्ण और नैतिक है जबकि पुरूष स्वार्थी, आत्मलिप्त भोग और लोभ में आसक्त, अधिक ऐन्द्रिय और स्थूल वृत्तियों वाला जड़ प्राणी है जो अपनी सत्ता के आधिपत्य के लिये नित नए षड़यंत्र रचता है। जड़ मूल्यों के कारण पुरूष वर्चस्व स्त्री को आहत करता रहा और अपनी श्रेष्ठता का दंभ भरता रहा।``(१२)
 महादेवी वर्मा का नारी चिंतन लेखन नारी की वेदना और आत्म पीड़ा की अभिव्यक्ति के साथ नारी स्वातंत्र्य पर भी जोर देता है। महादेवी जब स्त्री स्वतंत्रता की बात करती हैं तब सवाल यह उठता है कि वे कैसी स्वतंत्रता चाहती हैं स्त्री की ? स्त्री की स्वतंत्रता की चाह परिवार को तोड़ने की चाह नहीं हो सकती, उसे जोड़ने की होनी चाहिये। जोड़ने के इस कार्य में पुरूष की भागीदारी उतनी ही है जितनी स्त्री की है। संवैधानिक रूप में स्त्री बिल्कुल पुरूष के बराबर है। लेकिन वास्तविक जीवन में ? प्रश्न चिन्ह् लगा हुआ है। स्त्री-मुक्ति पर बात करने का, स्त्री की मुक्ति-कामना करने का मतलब परिवार से अलग होना या पति से अलग होना नहीं है। विवाह-संस्था को बनाये रखने में स्त्री-पुरूष दोनों का समान दायित्व है। माता-पिता के रूप में, पति-पत्नी के रूप में। जीवन की सार्थकता तभी सम्भव है, जहाँ स्त्री और पुरूष एक दूसरे के साथ मिलकर सहयोग दें, परस्पर आत्म सम्मान के साथ जिएं। वर्तमान परिवेश में ऐसा सहयोग कहीं-कहीं धूमिल सा हो गया है।``(१३) इस तथ्य को एक उदाहरण द्वारा महादेवी वर्मा लिखती हैं कि बचपन से ही भिक्षुणी बनने की कामना की थी, परन्तु जब सिलोन से आए प्रख्यात महास्थिवर ने काष्ठ पट आँखों के सामने रखकर उनसे बात की तो उनकी प्रतिक्रिया थी ''यह सब मुझे विचित्र तो लगा ही, क्रोध भी आया। जो गुरू अपने शिष्य को सीधे देख सकने की भी शक्ति नहीं रखता उसका शिष्यत्व स्वीकार करना हास्यास्पद ही नहीं, अपमानजनक भी है। मेरा मन विद्रोह कर उठा और मैं तुरन्त उठकर चली आयी।``(१४)
 महादेवी वर्मा के स्त्री चिंतन में वे सब आशंकायें बताई गई हैं जो भूमण्डलीकरण के इस दौर में घट रही है। स्त्री-श्रम को विश्व-स्तर पर लगातार मामूली सिद्ध किया जा रहा है। हायर एण्ड फायर वाला सिद्धान्त स्त्री-श्रमिकों पर सबसे पहले लागू किया जा रहा है। इस तरह के अस्थायी अर्थोपार्जन से उसकी जीवन-स्थितियां भी बद से बदतर हुई हैं। महादेवी वर्मा जी स्त्री मुक्त को अर्थ से जोड़ते हुये कहती हैं कि ''यदि उन्हें अर्थ-सम्बन्धी वे सुविधाएं प्राप्त हो सकें जो पुरूषों को मिलती आ रही हैं तो न उनका जीवन उनके निष्ठुर कुटुम्बियों के लिये भार बन सकेगा और न वे गलित अंग के समान समाज से निकालकर फेंकी जा सकेंगी, प्रत्युत वे अपने शून्य क्षणों को देश के सामाजिक तथा राजनीतिक उत्कर्ष के प्रयत्नों से भरकर सुखी रह सकेंगी।``(१५) स्त्री के अर्थ-स्वातन्त्र्य का प्रश्न नामक निबन्ध में महादेवी का कहना है कि ''आधुनिक परिस्थितियों में स्त्री की जीवन धारा ने जिस दिशा को अपना लक्ष्य बनाया है उनमें पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता ही सबसे गहरे रंगों मेें चित्रित है। स्त्री ने इतने युगों के अनुभवों से जान लिया है कि उसे सामाजिक प्रामाणिक प्राणी बने रहने के लिये केवल दान की ही आवश्यकता नहीं है, आदान की भी है, जिसके बिना उसका जीवन जीवन नहीं कहा जा सकता। वह आत्म-निवेदित वीतराग तपस्विनी ही नहीं, अनुरागमयी पत्नी और त्यागमयी माता के रूप में मानवी भी है और रहेगी। ऐसी स्थिति में उसे वे सभी सुविधाएं, वे सभी मधुर-कटु भावनाएं चाहिए जो जीवन को पूर्णता प्रदान कर सकती हैं।``(१६)
 नारी के सामाजिक अधिकारों की ओर पैरवी करते हुए महादेवी का मानना है कि जो बंधन पुरूषों की स्वेच्छा चारिता के लिए इतने शिथिल होते हैं कि उन्हें बंधन का अनुभव ही नहीं होता वे ही बंधन स्त्रियों को परावलम्बिनी दासता में इस प्रकार कस देते हैं कि उनकी सारी जीवनी-शक्ति शुष्क और जीवन नीरस हो जाता है। समस्त सामाजिक नियम मनुष्य की नैतिक उन्नति तथा उसके सर्वतोन्मुखी विकास के लिए आविष्कृत किये गये हैं। जब वे ही मनुष्य के विकास में बाधा डालने लगते हैं तब उनकी उपयोगिता ही नहीं रह जाती। ...... हमारी अनेक रूढ़ियां सामाजिक और वैयक्तिक विकास में सहायक न बनकर उनके मार्ग में नित्य नवीन बाधाएं खड़ी करती रहती हैं। अनेक व्यवस्थाएं जिन्हें हमने आपत्ति-धर्म मात्र समझकर स्वीकार कर लिया था, अब भी हमारे जीवन को छाया में अंकुरित और धूप से दूर रखे जाने वाले पौधे के समान शीर्ण बनाकर विकसित ही नहीं होने देती। अत: उसी शीत और विकास-शून्य छाया में पलकर हमारी सन्तान भी निस्तेज तथा उत्साहहीन बनती जा रही हैं। इस दशा में हमारा मिथ्या परम्परा की दुहाई देते रहना केवल व्यक्तियों के लिये नहीं वरन् समाज और राष्ट्र के लिये भी घातक सिद्ध होगा।``(१७) नारी अधिकारों पर अपनी बात को स्पष्ट करते हुए महादेवी वर्मा का कहना है कि ''हमें न किसी पर जय चाहिए, न किसी से पराजय; न किसी पर प्रभुता चाहिए, न किसी का प्रभुत्व। केवल अपना वह स्थान, वे स्वत्व चाहिए जिनका पुरूषों के निकट कोई उपयोग नहीं है, परन्तु जिनके बिना हम समाज का उपयोगी अंग नही बन सकेंगी। हमारी जागृत और साधन सम्पन्न बहनें इस दिशा में विशेष महत्वपूर्ण कार्य कर सकेंगी इसमें सन्देह नहीं।``(१८)
 नारी के आन्तरिक एवं बाह्य शक्ति पर बल देते हुए महादेवी इस तथ्य को स्वीकार करती हैं कि अब नारी ने सभी क्षेत्रों में अपना सम्मानजनक स्थान बना लिया है परन्तु अपनी कुछ स्वभावगत कमजोरियों के कारण वे पुरूषों से पीछे रह जाती हैं ....... ''नारी में परिस्थितियों के अनुसार अपने बाह्य जीवन को ढाल लेने की जितनी सहज प्रवृत्ति है, अपने स्वभावगत गुण न छोड़ने की आन्तरिक प्रेरणा उससे कम नहीं - इसी से भारतीय नारी, भारतीय पुरूष से अधिक सतर्कता के साथ अपनी विशेषताओं की रक्षा कर सकी है, पुरूष के समान अपनी व्यथा भूलने के लिए वह कादम्बिनी नहीं मांगती, उल्लास के स्पन्दन के लिए लालसा का ताण्डव नहीं चाहती क्योंकि दु:ख को वह जीवन की शक्ति-परीक्षा के रूप में ग्रहण कर सकती है और सुख को कर्तव्य में प्राप्त कर लेने की क्षमता रखती है। कोई ऐसा त्याग, कोई ऐसा बलिदान और कोई ऐसी साधना नहीं जिसे वह अपने साध्य तक पहुँचने के लिए सहज भाव से नहीं स्वीकार करती रही। हमारी राष्ट्रीय जागृति इसे प्रमाणित कर चुकी है कि अवसर मिलने पर गृह के कोने की दुर्बल बन्दिनी स्वच्छन्द वातावरण में बल-प्राप्त पुरूष से शक्ति में कम नहीं।"(१९)
 नारी को घर से बाहर आकर जगत के मर्म को समझने के प्रति महादेवी वर्मा का स्पष्ट मत है कि ''जब तक हम अपने यहाँ गृहणियों को बाहर आकर इस क्षेत्र में कुछ करने की स्वतंत्रता न देंगे तब तक हमारी शिक्षा में व्याप्त विष बढ़ता ही जायेगा। केवल गार्हस्थ-शास्त्र या सन्तान-पालन विषयक पुस्तकें पढ़कर कोई किशोरी गृह से प्रेम करना नहीं सीख जाती, इस संस्कार को दृढ़ करने के लिए ऐसी स्त्रियों के सजीव उदाहरण की आवश्यकता है, जो आकाश के मुक्त वातावरण में स्वच्छन्द भाव से अधिक ऊँचाई तक उड़ने की शक्ति रखकर भी बसेरे को प्यार करने वाले पक्षी के समान कार्य क्षेत्र में स्वतन्त्र परन्तु घर के आकर्षण से बंधी हो। (२०)
 पुरूष प्रधान समाज की जड़ मानसिकता पर प्रहार करते हुए महादेवी का मानना है कि ''प्राय: पुरूष यह कहते सुने जाते हैं कि बहुत पढ़ी-लिखी या कानून जानने वाली स्त्री से विवाह करते उन्हें भय लगता है। जब एक निरक्षर स्त्री बड़े से बड़े विद्वान से, कानून का एक शब्द न जानने वाली वकील या बैरिस्टर से और किसी रोग का नाम भी न बता सकने वाली बड़े से बड़े डाक्टर से विवाह करते भयभीत नहीं होती तो पुरूष ही अपने समान बुद्धिमान तथा विद्वान स्त्री से विवाह करने में क्यों भयभीत होता है। इस प्रश्न का उत्तर पुरूष के उस स्वार्थ में मिलेगा जो स्त्री से अन्ध भक्ति तथा मूक अनुशरण चाहता है। विद्या-बुद्धि में जो उसके समान होगी, वह अपने अधिकार के विषय में किसी दिन भी प्रश्न कर ही सकती है, सन्तोषजनक उत्तर न पाने पर विद्रोह भी कर सकती है। अत: पुरूष क्यों ऐसी स्त्री को संगिनी बनाकर अपने साम्राज्य की शांति भंग करे। जब कभी किसी कारण से वह ऐसी जीवन-संगिनी चुन भी लेता है तो सब प्रकार के कोमल कठोर साधनों से उसे अपनी छाया मात्र बनाकर रखना चाहता है, जो प्राय: सम्भव नहीं होता।``(२१)
 स्त्री स्वतंत्रता की वकालत करते हुए महादेवी वर्मा का स्पष्ट मानना है कि ''स्त्री को किसी भी क्षेत्र में कुछ करने की स्वतंत्रता देने के लिये पुरूष के विशेष त्याग की आवश्यकता होगी। पुरूष अब तक जिस वातावरण में साँस लेता रहा है वह स्त्री को ही दो रूपों में बढ़ने दे सकता है, माता और पत्नी। पत्नी जब घर से बाहर भी अपना कार्य-क्षेत्र रक्खेगी तो पुरूष को उसे और प्रकार की स्वतंत्रता देनी होगी, जिसकी घर में आवश्यकता नहीं पड़ती। उसे आने-जाने की, अन्य व्यक्तियों से मिलने-जुलने की तथा उसी क्षेत्र में कार्य करने वालों से सहयोग लेने-देने की आवश्यकताएं प्राय: पड़ती रहेगी। ऐसी दशा में पुरूष यदि उदार न हुआ और प्रत्येक कार्य को उसने संकीर्ण और संदिग्ध दृष्टि से देखा तो जीवन असहाय हो उठेगा। वास्तव में स्त्री की स्थिति के विषय में कुछ भी निश्चित होने के पहले पुरूष को अपनी स्थिति निश्चित कर लेनी होगी। समय अपनी परिवर्तनशील गति में उसके देवत्व और स्त्री के दासत्व को बहा ही ले गया है, अब या तो दोनों को विकासशील मनुष्य बनना होगा या केवल यंत्र।``(२२)
 निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि महादेवी जी की रचनाओं में स्त्री जीवन पर नारी लेखिका की सहानुभूति मात्र ही नहीं है वरन एक गम्भीर समाजशास्त्रीय विश्लेषण भी है। आपने लक्ष्य किया है कि आर्थिक स्वतंत्रता के बिना नारी स्वतंत्र नहीं हो सकती। अपनी वर्तमान स्थिति के विरूद्ध जब तक वह स्वयं विद्रोही तेवर के साथ खड़ी नहीं होती तब तक उसका उद्धार सम्भव नहीं है इसके पीछे महादेवी जी का मानना हैं कि भारत में ही नहीं सम्पूर्ण दुनिया में नारी आदिम काल से शोषित और उत्पीड़ित रही है। आपने सीता की अग्नि-परीक्षा के लिए राम को क्षमा नहीं किया। महादेवी जी ने नारी की वेदना उसकी आकुल छटपटाहट, उसकी पराधीनता को शब्दबद्ध करते हुये उसकी गरिमा को रेखांकित किया है। महादेवी जी ने न केवल नारी विद्रोह का समर्थन किया बल्कि स्वयं भी बाल-विवाह के बंधन को उस जमाने में तोड़ा था जब किसी भी लड़की का ऐसा निर्णय लेना एक अद्भुत साहस की बात थी। महादेवी जी को मात्र 'नीर-भरी दु:ख की बदली` की लेखिका नहीं मानना चाहिए। शृंखला की कड़ियाँ हिन्दी स्त्री वादी लेखन का अप्रतिम उदाहरण है क्योंकि शृंखला की प्रत्येक कड़ियाँ स्त्री गुलामी की कड़ियाँ हैं। प्रो. मैनेजर पाण्डेय ने शृंखला की कड़ियाँ का महत्व बताते हुए कहा है कि ऐसा लगता है कि नारीवादी और अन्य लेखिकाएं भी शृंखला की कड़ियाँ के महत्व से पूरी तरह परिचित नहीं हैं। वे सिमोन द बुआ की किताब पढ़ती हैं लेकिन महादेवी वर्मा की शृंखला की कड़ियाँ नहीं क्योंकि वह हिन्दी में लिखी गई हैं। फ्रेन्च या अंग्रेजी में नहीं।``(२३)
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
१. महादेवी वर्मा - शृंखला की कड़ियाँ, पृ. ६८
२. विद्रोही स्त्री - जॉन स्टुअर्ट मिल, जर्मेन ग्रीयर की पुस्तक में उद्घृत, पृ. १५
३. हंस - सम्पादकीय - पंकज विष्ट, जनवरी १९९९, पृ. ७
४. मेन इन फेमिनिज्म - स्त्री देह के विमर्श, सुधीश पचौरी, पृ. १८२
५. कथादेश - ओमा शर्मा द्वारा राजेन्द्र यादव से लिया गया साक्षात्कार, १९९९
६. अमर उजाला, १२ सितम्बर १९९९, डॉ. नामवर सिंह का वक्तव्य
७. काव्य मीमांसा - राजशेखर
८. इण्डिया टुडे साहित्य वार्षिकी, १९९७, स्त्री विमर्श पर परिचर्चा
९. कॉलरिज
१०. पुत्राधिकार बनाम उत्तराधिकार की भूमिका से - अरविन्द जैन
११. हंस, मार्च २००१, भूमण्डलीकरण विशेषांक - अर्पिता सिंह का साक्षात्कार
१२. हिन्दी अनुशीलन, जून २००४, पृ. ३८-३९
१३. स्त्री का यथार्थ - डॉ. के. एम. मालती - हिन्दुस्तानी जबान, अप्रैल-जून, २००७
१४. ज्ञानोदय-महीयसी महादेवी - गंगाप्रसाद पाण्डेय, अप्रैल १९६२, पृ. २५७
१५. महादेवी रचना संचयन - सं. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी - शृंखला की कड़ियाँ, पृ. ३४३
१६. महादेवी वर्मा का रचना संचयन - शृंखला की कड़ियाँ, पृ. २७२-२७३
१७. महादेवी वर्मा का रचना संचयन - शृंखला की कड़ियाँ, पृ. २४४
१८. महादेवी वर्मा का रचना संचयन - शृंखला की कड़ियाँ, पृ. २४६
१९. महादेवी वर्मा का रचना संचयन - शृंखला की कड़ियाँ, पृ. २४८
२०. महादेवी वर्मा का रचना संचयन - शृंखला की कड़ियाँ - निबन्ध - घर और बाहर, पृ. २५७
२१. महादेवी वर्मा का रचना संचयन - शृंखला की कड़ियाँ, घर और बाहर, पृ. २६०
२२. महादेवी वर्मा का रचना संचयन - शृंखला की कड़ियाँ, घर और बाहर, पृ. २६४

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                                                                                                                                                               परिचर्चा


                                                                                                                                                    -  बी एन गोयल


शब्द संभारे बोलिए    


उर्दू के प्रसिद्ध शायर ग़ालिब की फाकामस्ती की भी बहुत कहानियां हैं "क़र्ज़ की पीते थे मय" -  ग़ालिब ताउम्र क़र्ज़ में ही जिए और क़र्ज़ में ही मरे भी | उन के समकालीन शायर थे ज़ौक, जो दिल्ली दरबार में थे |ज़ौक की शायरी दरबार के अनुकूल थी | जौक दोस्ती  के नाते चाहते थे की गालिब  भी कुछ्  ऐसी शायरी लिखे जिस से  कुछ् आमदनी हो जाये और कर्ज से निजात मिले | लेकिन गालिब अपनी किस्म के  एक थे, उन्हें चाटुकारिता की शायरी से थी नफरत | जब जौक ने  बहुत जिद्द की तो गालिब ने शेर लिखा -  या रब न वोह समझे है ना समझेंगे मेरी बात दे उन को दिल और जो न दे मुझे जुबां और |कहते हैं कि गालिब का अंदाजे -बया और || बात सिर्फ जुबां अर्थात शब्द की थी | कबीर दास कहते है कि - शब्द हमारा कल्पतरु है जो चाहे सो दे -| कल्पतरु देवराज इन्द्र के नंदन कानन का एक वृक्ष है | यह समुद्र मंथन में निकले १४ रत्नों में से एक था | समुद्र मंथन भी कोई सामान्य घटना नहीं थी | यह  एक पौराणिक घटना है और इस का एक उद्देश्य था दो विपरीत समूहों की शक्तिओं की आज़माइश दिखाना | यह देवताओं और असुरों की शक्ति का परीक्षण था | इसमें नागराज वासुकी ने नेति का कार्य किया और मंदरांचल पर्वत की मथानी बनाई गयी |इस  पर्वत  को विष्णु जी ने कच्छप का अवतार लेकर  अपनी पीठ पर रखा | समुद्र से निकलने वाले १४ रत्नों में एक कल्पवृक्ष भी था | इसकी एक विशेषता यह थी की इस के पुष्प में अपनी इच्छा के अनुसार कोई भी सुगंध सूंघी जा सकती थी | इस वृक्ष की पहचान इच्छा पूर्ति के रूप में है | ऐसी मान्यता है की इस वृक्ष के नीचे बैठकर ऋषि दुर्वासा ने तपस्या की थी |  बात कर रहे थे कबीर की पंक्ति 'शब्द हमारा कल्पतरु है जो चाहे सो दे' की | इसमें मुख्य विषय है शब्द | शब्द के बारे में एक दोहा और अधिक उपयुक्त है =  

शब्द संभारे बोलिए शब्द के हाथ न पांव,

एक शब्द करे औषधि एक शब्द करे घाव ||

 अर्थात शब्द हमारी भाव अभिव्यक्ति का एक माध्यम है | हमारी बात या संवादों का संवाहक है | शब्द न होता तो कोई नहीं कह सकता था कि  क्या हमारी पहचान होती | शब्द की महिमा अनंत है | शब्द में इस संसार का अस्तित्व है | शब्द न होता तो भाषा नहीं होती और अगर भाषा नहीं होती तो कहीं कोई बात नहीं होती, कोई संवाद नहीं होता, कोई संस्कृति नहीं होती, सभ्यता नहीं होती, हम सब जानवरों की तरह रेंकते, ...... न जाने क्या क्या बोलते होते  | पंक्ति का अगला भाग है कि जो चाहे सो दें अर्थात आप शब्द का प्रयोग अपनी इच्छानुसार अथवा अपनी आवश्यकतानुसार कर सकते हैं| कहने का अर्थ है कि जहाँ इस के सकारात्मक पहलु हैं वही नकारात्मक पहलु भी हैं | इसी भाषा का आश्रय लेकर हम झगडा फसाद भी करते हैं, गाली गलौज भी देते हैं और मीठे प्रवचन भी सुनते हैं | अगर शब्द नहीं होते तो  न कहीं झगडे होते और न फसाद | इसी प्रकार अपने गुणात्मक भावों जैसे  मित्रता, सौहार्द, मातृत्व, भ्रातृत्व, बंधुत्व, स्नेह आदि की अभिव्यक्ति भी इन्ही शब्दों के द्वारा   करते हैं | शब्द का उद्गम  स्थान जिव्हा है | कवि रहीम कहते हैं:

 

रहिमन जिव्हा बावरी कर गयी सरग पताल

अपन तो कह भीतर गयी जूती खात कपाल ||

 

इसी जूती भाव को समाप्त करने के लिए, पारस्परिक प्रेम भाव बढ़ाने के लिए, समाज में सौहार्द पैदा करने के लिए कबीर दास ने अपनी वाणी का नाम सबद रखा | गुरु नानक ने शबद कहे,  सभी बड़े बड़े संतो ने शबद कि महिमा पर जोर दिया |

 हर शब्द का एक अर्थ होता है और वही महत्वपूर्ण है परन्तु  उस का अनर्थ भी हो सकता है | हाँ  निरर्थक शब्द निरर्थक ही होता है | जैसा मैंने पहले कहा हर शब्द का अपना अस्तित्व होता है |  यह भी एक वास्तविकता  है कि शब्द का अर्थ देश काल और परिस्थिति के अनुसार बदलता भी है |  हमारी अपनी सभी भाषाओँ में शब्दों का अंतर स्पष्ट दिखाई देता है | हिंदी, गुजराती,  मराठी, बंगला आदि भाषाओँ का उद्गम यद्यपि संस्कृत आधारित  ही  है फिर भी काफी समान शब्दों का अर्थ हर भाषा में भिन्न भिन्न है | यह विश्व कि सभी भाषाओँ में होता है - अंग्रेजी में भी | अंग्रेजी का एक साधारण सा शब्द है इडियट - आज इसका अर्थ है मूढ़मति - जब कि प्राचीन ग्रीस में इस का अर्थ था तीव्र या कुशाग्र बुद्धि का व्यक्ति | मैं अपने अनुभव  की एक बात कहता हूँ - यहाँ  अपने देश में रहते  हुए  मुझे किसी अफ्रीकॅन व्यक्ति के लिये  नीग्रो, नीगर, अफ्रीकन, काला, ब्लैक, अथवा हब्शी  जैसे  शब्द प्रयोग करने में संकोच होता था | मेरे विचार से ये शब्द अपमान जनक थे लेकिन इन के देशो में रहते हुये देखा कि ऐसा कुछ नहीं है | नीग्रो व्यक्ति स्वयं अपने लिए ये शब्द प्रयोग करते हैं | ये उन की पहचान के शब्द हैं | इसी प्रकार हमारी संस्कृति में कुछ शब्द त्याज्य अथवा अशोभनीय हैं जैस दोगला - यह उस समाज में मान्य है |

 

प्रकाशन में हुई अनजाने में हुई गलतियो को एक अनदेखे शैतान - प्रिंटर्स डेविल - का नाम दिया जाता  है परन्तु ये अनजानी भूले कभी कभी अप्रकट रूप से सच कह देती हैं - जैसे आप लिख रहे हैं प्रखर बुद्धि - छप जाता है खर बुद्धि ( खर का अर्थ आप जानते हैं)  आप लिखना चाहते हैं कविराज छप जाता है कपिराज | आप कह रहे हैं - बुद्धं शरणम  गच्छामी-  छप जाता है युद्धं शरणम गच्छामी | ये सब सामान्य भूले हैं लेकिन वास्तव में अनर्थ करने वाली हैं |

 

हम लोगो में अंग्रेजी भाषा के प्रति कुछ अत्यधिक मोह है - यह मोह समय के साथ साथ बढ़ता ही गया है क्योंकि हमारी दृष्टि में हमारी अपनी भाषा हेय है | हम हर वर्ष १४ सितम्बर को राज भाषा दिवस मनाते  हैं, उत्सव आयोजित करते हैं, सरकारी स्तर पर खूब पैसा खर्च करते हैं लेकिन वह  सब सिर्फ एक दिन के लिए होता है | मैं इस का औचित्य नहीं समझ पाया कि  यह दिखावा क्यों ?  जब हम वास्तव में कुछ करना ही नहीं चाहते तो यह सब क्यों ? |उत्तर भी हम सब जानते हैं  कि हम एक बनावटी वातावरण में जी रहे हैं | एक और मान्यता है की अंग्रेजी बोलने वाले अधिक सुसंस्कृत अथवा सभ्य होते हैं क्योंकि वे हर बात में एक्स्क्युझ मी, प्लीज़ अथवा सॉरी कहते हैं | लेकिन क्या कोई इस  बात का जवाब दे सकता है की अँगरेज़ इस देश पर २५० वर्ष राज्य कर गए |  उस अवधि में क्या उन्होंने  कभी किसी भारतीय के लिए इन  शब्दों  का प्रयोग किया  ? उलटे देसी नामों को बदल कर प्रदूषित कर दिया | अमेरिका की बोल चाल में कितना अक्खड़पन है जब वे टू दी पोईन्ट कहने के चक्कर में कहते है गो अवे या गेट अवे |

 

शब्दों की महिमा हमारे देश में राजनैतिक पटल   पर एक अलग अर्थ में  साफ़ दिखाई देती है | जब नेता लोग अपने दिए गये वक्तव्य से ही मुकर जाते हैं अथवा कहते हैं = हमारा कहने का अर्थ यह नहीं था |  राजनेताओं के लिए वास्तव में  एक अलग भाषा शास्त्र लिखा जाना चाहिए जिस में समान शब्दों की राजनैतिक व्युत्पती दी जानी चाहिए | इस  काम में कुछ  सहयोग  समाचार  संवाददाता भी देते हैं क्योंकि खबर जब तक चटपटी नहीं बनेगी तो बिकेगी कैसे |

 कुछ शब्द समय के प्रवाह में अपने अर्थ खो देते हैं | आज कल पत्र लिखने का रिवाज़ कम हो गया है| पहले हम लिखते थे आदरणीय या अन्य ऐसा ही कोई संबोधन | आजकल सब को हम डियर या प्रिय  लिखते हैं और इस प्रिय का कोई अर्थ नहीं  होता | यह बात लिखने वाला भी जानता है और पढने वाला भी | भाषणों में प्रायः नेता लोग बहुत से ऐसे शब्द प्रयोग करते हैं जो वास्तव में बहुत  भारी भरकम होते हैं लेकिन उन्हें  कितना कौन  गंभीरता से लेता है - हम सब जानते हैं | इस सन्दर्भ में महात्मा गाँधी की  चर्चा  करना  समीचीन होगा | महात्मा गाँधी ने इतना अधिक लिखा है की कभी कभी आश्चर्य होता है |   आप अकेले गाँधी वांग्मय के ७२  वोल्यूम  को ही देख ले | इस के अतिरिक्त और भी बहुत  है | केवल राजनैतिक ही नहीं वरन सामाजिक, पारिवारिक, सांस्कृतिक - जीवन का कौन सा पक्ष है जिस पर गाँधी जी ने अपने विचार व्यक्त न किये हों | लेकिन न तो कभी उन से  शब्द चयन में कोई गलती हुई और न ही कभी उन्होंने किसी अख़बार पर गलत रिपोर्टिंग या ना समझने का आरोप लगाया | उन के  सब से बड़े  अस्त्र सत्य और अहिंसा थे और उन्होंने इसी को अपने जीवन की कसौटी बना कर रखा |उन्होंने अपने जीवन को सत्य के प्रयोग कहा और उसी पर दृढ रहे | अपने सत्य प्रयोगों के माध्यम से प्रेम और सौहार्द का सन्देश ही दिया | उन के मन में किसी के भी प्रति कोई घृणा अथवा तिरस्कार की भावना नहीं रही | अपने शब्दों को उन्होंने एक सीमा दी और उस सीमा का पालन भी किया | अतः यदि हम एक सुन्दर, सौम्य और स्वच्छ  समाज  बनाना  चाहते  हैं तो हम सब को शब्द  की  सीमा को स्वीकार करना चाहिए | इस की सीमा  कबीर  के शब्दों में - 


पोथी पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय

ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय    

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                                                                                                                                                              हास्य व्यंग्य


                                                                                                                                                      -  अजय पाराशर

गोलियों पर ही जी रहे हैं

खबर आई है कि लंदन में वैज्ञानिक ऐसी गोली ईजाद कर रहे हैं, जो इन्सान को शतायु यानी सौ साल या उससे अधिक भी जीवित रखेगी। आने वाले वक्त में हो सकता है बड़े-बुजुर्ग आपको आशीष के साथ एक गोली भी दें और कहें -बेटा सौ बरस जीओ। वैसे भारतीयों को पहले से गोलियां खाने की आदत ही है। कभी नेता गोली देते हैं तो कभी हुक्काम, .कानून, धर्मगुरू, ज़मींदार, दुकानदार, ठेकेदार या कभी साहूकार। कुल मिला-जुलाकर आम आदमी की किस्मत में गोलियां ही लिखी हैं, न ईजाद करने का कोई झंझट और न ही इन्तज़ार का। आम भारतीय सदियों से बड़े प्रेम से यह गोलियां खा रहे हैं।

       इलैक्शन के वक्त नेता तोता राम लोगों को वायदों की गोलियां देते हैं, जीतने और मंत्री बनने के बाद आश्र्वासनों की। रोज़गार, ट्रांसफर, एडमीशन या ठेके दिलाने, मंहगाई कम कराने, अवैध कर्जों को रेगुलर करवाने .के अलावा उनके पिटारे में कई किस्म की गोलियां हैं। उनके दर से कभी कोई खाली नहीं जाता, पर उसका काम भी नहीं होता। भई काम करवाने के लिए दाम भी तो चुकाने पड़ते हैं।  इसके अलावा आम आदमी को अपने छोटे से काम के लिए भी पटवारी, तहसीलदार, बीडीओ, एसडीएम, डीसी या किसी और हाकिम के चक्कर काटते हुए गोलियां खानी पड़ती हैं।  सारे ईमानदारी से उसे गोलियां खिलाते रहते हैं, फिर भी बेचारे का काम तब तक नहीं होता, जब तक कोई माई-बाप उसके साथ न हो या फिर माया हाथ न हो। खाकी वाले तो सभी को गोलियां खिलाते रहते हैं। कभी थानों में तो कभी सार्वजनिक स्थानों में। वैसे उनके नज़रे-इनायत रहे तो वे कभी-कभी लोगों को उनके ही घरों में गोलियां खिलाने से नहीं चूकते। उनकी गोलियां रबर से लेकर बन्दूक वाली भी हो सकती हैं। एनकाउन्टर के नाम पर किसी को भी कहीं भी गोली दी जा सकती है। वकीलों की गोलियां तो सारी उम्र चलती रहती हैं, फिर भी मुक्कदमे खत्म नहीं होते।  अब तो मुनसिफ  भी गोलियां खिलाने से नहीं चूकते। आम किसान या मज़दूर भी उम्र भर अपने ज़मीनदार या साहूकार की गोलियां खाता रहता है, पर कभी उसका पेट नहीं भरता, उलटे ज़मीनदार या साहूकार ही मुटाते हैं। ठेकेदारों की गोलियां खाने वालों को तो कई बार विदेशी जेलों में भी सडऩा पड़ता है।  लोगों को दुकानदारों की गोलियों से बचाने के लिए तो सरकार ने उपभोक्त फोरम भी बना रखी है। धर्मगुरू तो आदिकाल से ही लोगों को सुख, शान्ति, आनन्द और मोक्ष की गोलियां खिला रहे हैं।

वैसे हमें पाकिस्तान, चीन या अमेरिका भी गोलियां देते रहते हैं। पाकिस्तान तो पूरी तरह ठोक-बजाकर पिछले 63 सालों से वार्ता, सौहार्द या आतंकवाद को रोकने के नाम पर गोलियां खिला रहा है।  चीन भी हिन्दी-चीनी भाई-भाई के कोटेड पिल्स खिलाकर ज़मीन हड़प चुका है और अब पुनः तैयार है।  अमेरिका तो गोलियां खिलाने में सिद्धहस्त है ही, कभी प्यार से तो कभी हड़काकर । वैसे भारत को तो बांग्लादेश और नेपाल जैसे देश भी गोलियां दे जाते हैं।

मैंने जो गोलियां अभी तक खाई हैं, उनसे मैं तो शतायु हुआ नहीं। शायद यह नई गोली सचमुच कारगर हो, पर खाली हाथ, इस मंहगाई के दौर में कौन गाफिल भूखे पेट 100 बरस जीना चाहेगा?

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                                                                                                                                                      चौपाल


                                                                                                                                                       -वेदप्रताप वैदिक

यह लोहिया की सदी हो

जन्म शताब्दियां तो कई नेताओं की मन रही हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि स्वतंत्र भारत में क्या राममनोहर लोहिया जैसा कोई और नेता हुआ है? इसमें शक नहीं कि पिछले 63 सालों में कई बड़े नेता हुए, कुछ बड़े प्रधानमंत्री भी हुए, लेकिन लोहिया ने जैसे देश हिलाया, किसी अन्य नेता ने नहीं हिलाया। 

उन्हें कुल 57 साल का जीवन मिला, लेकिन इतने छोटे से जीवन में उन्होंने जितने चमत्कारी काम किए, किसने किए? जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से लोहिया का अपने युवाकाल में कैसा आत्मीय संबंध था, यह सबको पता है। लेकिन यदि लोहिया नहीं होते तो क्या भारत का लोकतंत्र शुद्ध परिवारतंत्र में नहीं बदल जाता?

 

वे लोहिया ही थे, जो नेहरू की दो-टूक आलोचना करते थे। चीनी हमले के बाद लोहिया ने ही नेहरू सरकार को ‘राष्ट्रीय शर्म की सरकार’ कहा था। उन्होंने ही ‘तीन आने’ की बहस छेड़ी थी। यानी इस गरीब देश का प्रधानमंत्री खुद पर 25 हजार रुपए रोज खर्च करता है, जबकि आम आदमी ‘तीन आने रोज’ पर गुजारा करता है। लोहिया ने ही उस समय की अति प्रशंसित गुट-निरपेक्षता की विदेश नीति पर प्रश्नचिह्न् लगाए थे और नेहरूजी की ‘विश्वयारी’ पर तीखे व्यंग्य बाण चलाए थे।

 

उन्होंने सरकारी तंत्र के मुगलिया ठाठ-बाट की निंदा इतने कड़े शब्दों में की थी कि सारा तंत्र भर्राने लगा था। उन्होंने देश के हजारों नौजवानों में सरफरोशी का जोश भर दिया था। सारे देश में तरह-तरह के मुद्दों पर सिविल नाफरमानी के आंदोलन चला करते थे। राजनारायण, मधु लिमये, रवि राय, किशन पटनायक, एसएम जोशी, लाडली मोहन निगम, जॉर्ज फर्नाडीज जैसे कई छोटे-मोटे मसीहा लोहिया ने सारे देश में खड़े कर दिए थे। कहीं जेल भरो, कहीं रेल रोको, कहीं अंग्रेजी नामपट पोतो, कहीं जात तोड़ो, कहीं कच्छ बचाओ, कहीं भारत-पाक एका करो जैसे आंदोलन निरंतर चला करते थे।

 

लोहिया के आंदोलनों में अहिंसा का ऊंचा स्थान था, लेकिन वे वस्तु की हिंसा यानी तोड़-फोड़ को हिंसा नहीं मानते थे। उन्होंने प्राण की हिंसा करने वाली यानी प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने वाली अपनी ही केरल की सरकार को गिरवा दिया था। लोहिया ने भारत के नेताओं और राजनीतिक दलों को यह सिखाया कि सशक्त विपक्ष की भूमिका कैसे निभाई जाती है? लोकसभा में लोहियाजी की संसोपा के दर्जनभर सदस्य भी नहीं होते थे, लेकिन वहां बादशाहत संसोपा की ही चलती थी। जब लोहिया और मधु लिमये सदन में प्रवेश करते थे तो वह समां देखने लायक होता था। एक करंट-सा दौड़ जाता था। मंत्रिमंडल के सदस्य लगभग ‘अटेंशन’ की मुद्रा में आ जाते थे और स्वयं प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चेहरे पर बेचैनी छा जाती थी।

 

दर्शक दीर्घा में बैठे लोग कहते सुने जाते थे, वो लो, डॉक्टर साहब आ गए। डॉक्टर लोहिया ने अपनी उपस्थिति से लोकसभा को राष्ट्र का लोकमंच बना दिया। जिस दबे-पिसे इंसान की आवाज सुनने वाला कोई नहीं होता, उसकी आवाज को हजार गुना ताकतवर बनाकर सारे देश में गुंजाने का काम डॉ लोहिया करते। कोई मामूली मजदूर हो, कोई सफाई कामगार हो, कोई भिखारी या भिखारिन हो- डॉ लोहिया उसे न्याय दिलाने के लिए अकेले ही संसद को हिला देते थे। लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकुम सिंह कई बार बिल्कुल पस्त हो जाते थे। मई 1966 में जब डॉ लोहिया ने मेरा अंतरराष्ट्रीय राजनीति का पीएचडी का शोध-प्रबंध हिंदी में लिखने का मामला उठाया तो इतना जबर्दस्त हंगामा हुआ कि सदन में मार्शल को बुलाना पड़ा। डॉ लोहिया और उनके शिष्यों के तर्क इतने प्रबल थे कि सभी दलों के प्रमुख नेताओं ने मेरा समर्थन किया। इंदिराजी के हस्तक्षेप पर स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज ने अपना संविधान बदला और मुझे यानी प्रत्येक भारतीय को पहली बार स्वभाषा के माध्यम से ‘डॉक्टरेट’ करने का अधिकार मिला।

 

डॉ लोहिया के व्यक्तित्व में चुंबकीय आकर्षण था। वे देखने में सुंदर नहीं थे। उनका कद छोटा और रंग सांवला था। उनके खिचड़ी बाल प्राय: अस्त-व्यस्त रहते थे। उनके खादी के कपड़े साफ-सुथरे होते थे, लेकिन उनमें नेहरू या जगजीवनराम या सत्यनारायण सिंह जैसी चमक-दमक नहीं रहती थी। वे सादगी और सच्चई की प्रतिमूर्ति थे। वे जिस विषय पर भी बोलते थे, उसमें मौलिकता और निर्भीकता होती थी। वे सीता-सावित्री पर बोलें, शिव-पार्वती पर बोलें, हिंदू-मुसलमान या नर-नारी समता पर बोलें, अंग्रेजी हटाओ या जात तोड़ो पर बोलें- उनके तर्क प्राणलेवा होते थे। जो एक बार डॉ लोहिया को सुन ले या उनको पढ़ ले, वह उनका मुरीद हो जाता था।

 

डॉ लोहिया ने अपने भाषण और लेखन में जितने विविध विषयों पर बहस चलाई है, देश के किसी अन्य राजनेता ने नहीं चलाई। सिर्फ डॉ भीमराव आंबेडकर और विनायक दामोदर सावरकर ही ऐसे दो अन्य विचारशील नेता दिखाई पड़ते हैं, जो डॉ लोहिया की श्रेणी में रखे जा सकते हैं। डॉ लोहिया ने जर्मनी से डॉक्टरेट की थी। इस खोजी वृत्ति के कारण वे हर समस्या की जड़ में पहुंचने की कोशिश करते थे। सप्रू हाउस में उस समय रिसर्च कर रहे डॉ परिमल कुमार दास, प्रो कृष्णनाथ और मेरे जैसे कई नौजवान उनके अवैतनिक सिपाही थे। इसी का परिणाम था कि 1967 में डॉ लोहिया देश में गैर कांग्रेसवाद की लहर उठाने में सफल हुए। जनसंघियों और कम्युनिस्टों ने भी उनका साथ दिया और देश के अनेक प्रांतों में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं। यदि डॉक्टर लोहिया 10-15 साल और जीवित रहते तो उन्हें प्रधानमंत्री बनने से कौन रोक सकता था? अब से 30-35 साल पहले ही भारत का चमत्कारी रूपांतरण शुरू हो जाता और अब तक वह दुनिया की ऐसी अनूठी महाशक्ति बन जाता, जिसका जोड़ इतिहास में कहीं नहीं मिलता।

 

जो भी हो, डॉ लोहिया असमय चले गए हों, लेकिन उनके विचार इस इक्कीसवीं सदी के प्रकाश-स्तंभ की तरह हैं। सप्त-क्रांति का उनका सपना अभी भी अधूरा है। जाति-भेद, रंग-भेद, लिंग-भेद, वर्ग-भेद, भाषा-भेद और शस्त्र-भेद रहित समाज का निर्माण करने वाले नेता अब ढूंढ़ने से भी नहीं मिलते। इस समय सभी दल चुनाव की मशीन बन गए हैं। वे सत्ता और पत्ता के दीवाने हैं। यदि डॉ लोहिया का साहित्य व्यापक पैमाने पर पढ़ा जाए तो आशा बंधेगी कि शायद आदर्शवादी नौजवानों की कोई ऐसी लहर उठ जाए, जो इस भारत को नए भारत में और इस दुनिया को नई दुनिया में बदल दे। लोहिया को गए अभी सिर्फ 43 साल ही हुए हैं। उनका शरीर गया है, विचार नहीं, विचार अमर हैं। विचारों को परवान चढ़ने में कई बार सदियों का समय लगता है। अभी तो सिर्फ पहली सदी बीती है। हम अपना धैर्य क्यों खोएं? क्या मालूम आने वाली सदी लोहिया की सदी हो?

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                                                                                                                                            चांद परियाँ और तितली


              नन्हा बहादुर

आजकल हरे-भरे जंगल दिखते कहां हैं! पर वह सचमुच का हरा-भरा जंगल था. ऐसा ही जैसा उसको होना चाहिए था. शांत, शीतल और हरा-भरा. मगर शांत होने का मतलब यह नहीं कि शेर वहां दहाड़ते नहीं थे; या चिड़िया चोंच सिये रहती थीं. असल में वहां शेर भी दहाड़ते थे और चिड़िया मग्न-मन खूब फुदकती-चहचहाती थीं. वही क्यों, नदी भी वहां गाती-गुनगुनाती थी—कल-कल-कल-कल. पर वे सब अपने-अपने काम में मग्न रहते थे. पेट भरने को शेर यूं तो शिकार भी करता और लोमड़ी कभी न कभी धूर्तता दिखा ही जाती थी. लेकिन इतने-भर से उस हरे-भरे जंगल का जीवन बाधित नहीं होता था. वह हमेशा हरा-भरा और तरोताजा बना रहता. ठीक ऐसे ही जैसे किसी जंगल को होना चाहिए.

उस जंगल में एक नन्हा खरगोश रहता था. उसके थे बड़े-बड़े कान. अपने कानों पर खरगोश को था, ढेर-सा गुमान. वह जिससे भी मिलता यही कहता—

‘मेरे कान देखे, सफेदी में ये चांद को भी मात कर सकते हैं. और मुलायम इतने कि...’

‘कितने जी?’ कभी-कभी सामने वाला भी उसकी बातों में रस लेने लगता. पर उसके मजाक को पकड़ पाना नन्हे खरगोश की समझ से बाहर होता.

‘जैसे कि ढाक के फूल!’ नन्हा खरगोश झट से जवाब देता. दरअसल गरमी के दिनों में हवा में तैरते ढाक के फूल उसको बड़े ही लुभावने लगते थे. उनका पीछा करते हुए वह दूर तक चला जाता था. यहां तक कि आगा-पीछा, सुध-बुध सब बिसरा देता. ऐसे ही एक बार वह हवा में तैरते एक फूल से आंख-मिचैनी खेल रहा था. उसकी आंखों के ठीक सामने गेंद जितना बड़ा और गुबारे की तरह फूला हुए ढाक का फूल हवा में तैर रहा था. कभी वह ऊपर जाता, कभी नीचे. कभी-कभी तो इतना ऊपर चला जाता कि आंखों से ओझल ही हो जाता. उसके अगले ही पल वह नीचे उतर आता. उस समय नन्हे खरगोश को लगता कि बस पंजे में अब आया कि तब. लेकिन उसकी पकड़ में आने से पहले ही फूल हवा हो जाता था.

फूल का पीछा करते हुए नन्हा खरगोश खुद को पूरी तरह बिसरा चुका था. उसको यह भी ध्यान नहीं था कि शैतान भेड़िया जाने कब से उसके पीछे घात लगाए है. अवसर देख भेड़िया उसपर झपटने ही वाला था कि उसके कदमों की हल्की-सी आहट ने खरगोश को चौंका दिया. फिर तो समझते देर न लगी कि भेड़िया के रूप में मौत उसके पीछे पड़ी है. नन्हा खरगोश खूब तेज दौड़ता था. उसके साथी खरगोशों में इतना सामर्थ्य न था कि उसे दौड़ में पछाड़ सकें. मगर भेड़िया भी कम न था. उससे पीछा छुड़ाने की कोशिश में नन्हा खरगोश एक झाड़ी में ऐसा घुसा कि बात जान पर बन आई. झाड़ी के लंबे और नुकीले कांटे उसके बदन को चीरते हुए चले गए. दायें कान में एक कांटा तो ऐसा धंसा कि उसकी चीख ही निकल गई. बड़े जोर का दर्द हुआ. बहुत देर तक वह दर्द से कराहता रहा. आखिर जब लगा कि संकट टल चुका है तो झाड़ी से बाहर आया. रोता-बिलखता मां के पास पहुंचा. मां ने एक बेल के पत्तों का रस घाव पर लगाया. कुछ देर बाद पीड़ा घटने लगी.

मां के उपचार से घाव तो तीन-चार दिन में भर गए. लेकिन दाग रह गए. सबसे बुरा यह हुआ कि कान का सिरा थोड़ा-सा लटक गया. अपने शरीर में खरगोश को कान ही सबसे प्यारे थे. उनका यूं लटक जाना उसके लिए बहुत बड़ा धक्का था—

‘इससे तो अच्छा है कि भेड़िया मुझे खा ही जाता. सुंदर कान नहीं तो समझो जहान भी नहीं.’

उस घटना के बाद नन्हा खरगोश उदास रहने लगा. मां से बात भला कब तक छिपती. एक दिन मां ने पास बिठाकर नन्हे खरगोश को समझाया—

‘दुनिया में जो चीज जिसके लिए बनी है, यदि हादसे के बाद भी उस काम को वह ठीक-ठाक करती रहे, जो समझो कुछ नहीं बिगड़ा है.’ यह सीख उदासमना खरगोश के पल्ले न पड़ी.

‘तुम भी न जाने किस जमाने की बात करती हो, मां. आजकल तो जो दिखता है, दुनिया उसी को सच मान बैठती है.’

मां के जी में आया कि कहे कि जीवनमूल्यों की बेल सदाबहार होती है. मगर यह सोचकर कि अवसाद में डूबा हुआ बेटा उसे उपदेश समझकर नजरंदाज न कर दे, वह चुप्पी साधे रही.

उस घटना के बाद खरगोश का खेतों में चैकड़ी भरना, ढाक के फूल का पीछा करना, साथियों के साथ लुका-छिपी का खेल खेलना, सभी कुछ छूट गया. वह नदी किनारे बैठकर पानी में लटके हुए कान को देखता रहता. बेटे की हालत देख मां परेशान होती. इशारों-इशारों में समझाती, पर कोई परिणाम न देख निराश हो जाती.

‘प्रकृति हर हादसे का उपचार खोज लेती है. उसके आंचल में कोई न कोई तदबीर मेरे बच्चे के लिए भी जरूर होगी.’ मां के मन में छिपा विश्वास बोलने लगता. आस की लौ फिर से टिमटिमाने लगती.

कुछ दिन के बाद खरगोश ने नदी तट जाना भी छोड़ दिया. वह बिल से बाहर पैर न रखता. मां ने पूछा तो बोला—‘जब मुझे किसी में रुचि नहीं है तो दूसरों को मुझसे क्यों लगाव होगा.’

‘दूसरों से मिले बिना तुम यह कैसे जान सकते हो कि लोग तुम्हारे बारे में क्या सोचते हैं.’ मां ने समझाने का प्रयास किया. पर बेकार. नन्हा खरगोश मुंह लटकाकर लेट गया.

सर्दी का मौसम बीता. बसंत आया. कुहरे और ठंड से जिन वृक्षों के पत्ते झड़े थे, उनपर नई कोपलें उग आईं. लताएं फूलों से, फूल नई सुवास से भर गए. चारों और हरियाली ही हरियाली नजर आने लगी. पशु-पक्षी उमंग-भरे गीत गुनगुनाने लगे. प्रकृति का कण-कण उल्लास से भर गया. फिर भी नन्हे खरगोश की उदासी न छंटी.

बसंत का मौसम नई उमंगों का होता. जंगल के प्राणी उसको मिल-जुलकर उल्लास के साथ मनाते थे. नदी के पास एक फूलों की घाटी थी. हर वर्ष वसंतपंचमी के दिन वहां जोरदार उत्सव होता. जंगल के सभी प्राणी वहां जमा होते. तरह-तरह के खेल, करतब और नाच-गाने होते. पूरा जंगल खुशी से झूमने लगता.

नन्हे खरगोश और उसकी मां को भी उत्सव में सम्मिलित होने का निमंत्रण मिला. मां ने साथ चलने को कहा. मगर नन्हा खरगोश गर्दन झुकाए पड़ा रहा. उसकी मां के जाने के बाद पेड़ पर रहने वाले उसके पड़ोसी कौआ, कबूतर ने समझाया. रास्ते से गुजर रही चतुर लोमड़ी और कक्का ऊदबिलाव ने भी उससे साथ चलने को कहा. मेले में अच्छी दावत और मनोरंजन का प्रलोभन दिया, मगर नन्हे खरगोश पर कोई असर न पड़ा. आखिर वे सभी छोड़कर चले गए.

नन्हा खरगोश गर्दन जमीन पर टिका रोज की तरह शाम होने का इंतजार करने लगा. बहुत दिनों से उसका एक ही काम था, दिन निकलते ही उसके ढलने की प्रतीक्षा करना. रात आती तो सुबह के इंतजार में तारे गिनना.

वक्त के साथ चलो तो वक्त भागने लगता है, ठहर जाओ तो वक्त भी रेंगना आरंभ कर देता है. नन्हे खरगोश ने अपने लिए रेंगते हुए वक्त का साथ चुना था. जमीन पर गर्दन टिकाकर वह वक्त का रेंगना महूसस कर ही रहा था कि घाटी की बगल से धुएं के काले बादल-से उमड़ते हुए दिखाई पड़े. देखते ही देखते उन दैत्यों ने पूरा आसमान कब्जा लिया. हवा में बेचैनी बढ़ने लगी. अपने ठिकाने पर रह गए पशु-पक्षी फड़फड़ाने लगे. किंतु नन्हे खरगोश ने अपनी गर्दन जमीन पर टिकाए रखी.

थोड़ी ही देर में पूरा आसमान काला हो गया. लगा कि काले जहर की भयानक नदी चारों ओर से उमड़ी चली आ रही है. कि कोई भीषण बबंडर हो काली हवाओं का. नन्हे खरगोश की बेचैनी बढ़ने लगी. उसने अपनी गर्दन उठाई. तभी पैरों की धमक से आसपास की जमीन कांप गई. नन्हा खरगोश अपने स्थान पर खड़ा हो गया. सहसा युवा हाथी उसके सामने आकर खड़ा हो गया. उसकी सांस तेज-तेज चल रही थी. मानो दूर से दौड़ लगाकर आया हो.

‘देखो, तुम्हारा नाम जो भी हो, मेरी बात सुनो!’ उखड़ी हुई सांसों को काबू करता हुआ युवा हाथी बोला—‘जंगल में भयानक आग लगी है. वह तेजी से उस घाटी की ओर बढ़ रही है, जहां जंगल के समस्त प्राणी जमा हैं. यदि ऐसा हुआ तो वसंतोत्सव में भाग लेने गए हजारों प्राणी मारे जाएंगे. तुम अभी दौड़कर जाओ और उन सबको सावधान कर दो.’

‘तुम खुद क्यों नहीं चले जाते!’ नन्हे खरगोश ने पूछा.

‘मैं तो जा ही रहा हूं. तुम दिखे तो सोचा कि इस काम को तुम्हें सौंपकर अपने साथियों के दल में जा मिलूं. वे सब नदी के पानी से आग पर काबू पाने की कोशिश में लगे हैं.’ नन्हा खरगोश मना करने ही जा रहा था कि उसको अपनी मां की याद आ गई. फौरन उसका इरादा बदल गया—

‘ठीक है, मैं जाता हूं, पर आइंदा मुझसे किसी मदद की उम्मीद मत रखना.’ कहकर वह मुड़ा.

‘जल्दी करो, और हां रास्ते में सो मत जाना.’

‘वह कहानी मैंने भी सुनी है, मैं गलतियों से सबक लेना जानता हूं.’ कहते ही खरगोश ने कुलांच भरी और जंगल की ओर दौड़ पड़ा.

**

 
आग बहुत भीषण थी. एक ही झटके में हजारों पेड़-पौधे उसकी भेंट चढ़ गए. खूबसूरत जंगल का बड़ा हिस्सा तबाह हो चुका था. फिर भी सभी प्रसन्न थे. भीषण आग से सुरक्षित बच निकलने की खुशी मनाने के लिए ही उन्होंने एक सभा आयोजित की थी.

‘हमें हाथियों के दल को धन्यवाद देना चाहिए, जिन्होंने अपनी सूंड में पानी भर-भरकर बरसाया. उनके बिना आग पर काबू पाना असंभव था.’ जंगल के मंत्री शेर ने हादसे के बाद हाथियों के दल को सम्मानित करते हुए कहा था. इसपर सभी जंगलवासी खुश होकर तालियां बजाने लगे. तालियों का शोर थमा तो शेर ने कहना शुरू किया—

‘एक नन्हा-सा जीव और है. सही मायने में उसी ने जंगल के सैकड़ों प्राणियों की जान बचाई है. जब वह घर से चला उस समय तक आग जंगल के चप्पे-चप्पे पर फैल चुकी थी. पर वह नन्हा बहादुर अपने प्राणों की परवाह किए बिना घाटी तक पहुंचा और उत्सव में भाग ले रहे प्राणियों को सावधान कर दिया. वह यदि घाटी तक पहुंचने की हिम्मत न दिखाता तो न जाने कितने निर्दोषों की जान जाती.’

नन्हा खरगोश उस समय अपनी मां की गोद में बैठा हुआ था. अपना नाम सुनकर उसका दिल बल्लियों उछलने लगा. बाद में बुलावा आने पर वह मंच तक पहुंचा. शेर ने उसका स्वागत किया. नन्हा खरगोश वापस लौटने लगा तो शेर ने उसे वापस बुलाया. फिर उसके बराबर में खड़ा होकर ऐलान किया—

‘आज के बाद हम इसको नन्हा बहादुर कहकर पुकारेंगे. यह निडर होकर जंगल में कहीं भी आ-जा सकता है. अपने भोजन के लिए जंगल का कोई भी जानवर नन्हे बहादुर और उसकी मां पर हमला नहीं करेगा.’

शेर के ऐलान का सभी ने तालियां बजाकर स्वागत किया. नन्हे खरगोश के लिए तो यह सब जैसे एक सपना था.

‘मैं ठीक ही सोचती थी कि प्रकृति हर हादसे का उपचार खोज लेती है.’ घर लौटते समय खरगोश की मां ने कहा था. उस समय दोनों हर्ष और उल्लास से भरे हुए थे.

‘आज एक बात मैंने भी सीखी है, मां!’ नन्हा बहादुर बोला.

‘कौन-सी बात?’

‘जाने दो, उसमें नया कुछ नहीं है, तुम अकसर मुझे समझाया करती थीं.’

‘फिर भी, मैं सुनूं तो?’

‘तुमने न जाने कितनी बार दोहराया होगा. परंतु आज मैं समझा हूं कि यदि मन में कुछ करने का संकल्प हो तो शारीरिक कमियां बाधा नहीं बनतीं.’

मां बिना कुछ कहे, अपने ‘नन्हे बहादुर’ से सट गई.

 

ओमप्रकाश कश्यप










***





तारे





1.








झिलमिल झिलमिल                                                                                                                                                     और प्यारे -प्यारे
नभ पर फैले  हैं सारे
हीरे से जगमग  तारे

मुन्ने ने देखा और सोचा
रोज रात कहां से आते
नभ पर चढ़े हमें लुभाते

कैसे मैं भी झोली भर लाऊँ
सबको  मन चाहे जितना बांटूँ 
मम्मी की साड़ी पर कुछ 
कुछ पर्स पर, और  कुछ
अपने बालों पर भी टाकूँ।। 








2.








है कितना यह आश्चर्य  बड़ा
एक थाल जो  मोतियों भरा
सबके सिर पर उलटा धरा
मां बतलाओ किसकी माला टूटी
या हंसता भगवान रोज-रोज
देख शरारतें बच्चों की! 


                                                                                                                           -शैल अग्रवाल