LEKHNI
APNI BAAT
KAVITA DHAROHAR
GEET AUR GAZAL
DOHE
MAAH VISHESH
KAVITA AAJ AUR ABHI
MAAH KE KAVI
KAVITA ME IN DINO
MANTHAN
KAHANI DHAROHAR
KAHANI SAMKALEEN
KAHANI SAMKALEEN
DHARAWAHIK
LAGHU KATHA
PARIDRISHYA
HASYA VYANGYA
CHAAND PARIYAN AUR TITLI
LEKHNI SANIDHYA 2014
VIVIDHA
MY COLUMN
FAVOURITE FOREVER
POETRY HERE & NOW
CLASSIC
STORY
KIDS' CORNER
VEETHIKA
SADA SAATH
KAVI-SAMKALEEN
KIRTI STAMBH
LEKHAK SAMKALEEN
OLD MASTERS
WRITERS
SCANNING THE FAVOURITES
POETS
LEKHNI SANIDHYA
PARYATAN
OLD ISSUES
YOUR MAILS & E.MAILS
GUEST BOOK
ABOUT US
   
 


                            सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर
                                       लेखनी-फऱवरी-2010  

                                   





                                        

                                        खोया स्वर्ग- एक तलाश                                           


                        स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा,
                          स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था,
                            ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को
                           एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है ?
                                 है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है ? 


                                                - हरिवंश राय बच्चन  


                                                          (वर्ष-3-अँक-36)                                           


इस अंक में- कविता धरोहरः हरिवंशराय बच्चन। माह विशेषः मोहन अम्बर, धर्मवीर भारती।कविता आज और अभीः  जयन्ती अग्रवाल, केशव शरण, किशोर जैन, राजीव मतवाला। माह के कविः दीक्षित दनकौरी। बाल गीतः निर्मला सिंह।


मंथनः अज्ञेय। कहानी समकालीनः शैल अग्रवाल। कहानी विशेषः मीरा कान्त। कहानी समकालीनः दिनेश ध्यानी। लघुकथाः देवी नागरानी।  हास्य व्यग्यः कनछेदी राम। रागरंगः कवि कुलवंत। सरोकारः वीरेन्द्र सिंह यादव। चौपालः वेदप्रताप वैदिक । परिचर्चाः मनोज मिश्रा। बाल कहानीः निर्मला सिंह।



                                              संरचना व संपादनः शैल अग्रवाल


                                                   
                                  संपर्क सूत्रः editor@lekhni.net; shailagrawal@hotmail.com 

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                     अपनी बात

यदि मन एक यंत्र है और जीवन यंत्रवत् चलता है तो आज इसकी गति का...इसकी अंतर्रचना का नित नया ज्ञान हमारे लिए नित नए संकट और उलझनें भी तो खड़े किए जा रहा है। जितना अधिक हम अंतर्मन को उलीच कर सतह पर लाने का प्रयास करते हैं, उतनी ही आंखों के आगे भीड़ लगती चली जाती है.और सतह का विस्तार होता चला जाता है- प्रिय अप्रिय हर तरह की उलीच से और इस सबके नीचे  दबा अंतर्मन दूर होता चला जाता है...अनचीन्हा और अनजान हो जाता है। बिल्कुल वैसा ही विरोधाभास है यह जैसे कि कोई जीने के लिए रोटी कमाने निकलें और कमाई की भागदौड़ में रोटी खाना ही भूल जाए ;               



हम बार-बार गहरे उतरे---  
कितना गहरे!-- पर--
जब-जब जो कुछ भी लाये
उस से बस 
 और सतह पर भीड़ बढ़ गयी ।


सतहें--सतहें--
सब फेंक रही हैं लौट-लौट
वह काँच
जिसे हम भर न रख सके
प्याले में।


छिछली, उथली, घनी चौंध के साथ 
घूमते हैं हम
अपने रचे हुये
मायावी जाल में


    -अज्ञेय


कवि या साहित्यकार के लिये इस परिस्थिति को अनदेखा कर पाना संभव नहीं है और देखकर स्वीकार कर पाना और भी असंभव। जितना ही वह दिखता है, उतना ही उसे भेद कर और गहराई में जाने का प्रयत्न करने लग जाता है वह। और तब उसकी संवेदना और चेतना दोनों ही दो भागों में बट जाती हैं। आहत और विभाजित हो जाता है। गहराई के विरोध को हल करता वह अंतर्मन के ताने-बाने में उलझ जाता है और बाहर सतह पर अपने इस प्रयत्न को कैसे व्यवस्थित करे...बिना भीड़ लगाए और बिना भटके, यह रचनाशीलता की समस्या उससे कठिन समर्पण और संयम मांगने लग जाती है । पर क्या निषिद्ध से दूर रह पाना, वांछित को छोड़ पाना....सपनों को समाज के सांचे में ढाल कर,  यथार्थ की कूंचि से रंग पाना हमेशा  ही संभव  है? शायद नहीं...न तो एडम और ईव के समय में था जो निषिद्ध फल को चखने की सजा में स्वर्ग से निष्काषित हुए थे और ना ही उनके उत्तराधिकारियों के लिए आज भी। आज के इस समाज में भी तो वे, अपना वही खोया-स्वर्ग तलाशते, आदर्श और लालच की पगडंडियों पर लहूलुहान, वैसे ही भ्रमित हैं। आज भी तो ये उत्तराधिकारी,  वर्जनाओं के दुरूह जंगल में भटकते उन्ही अपराधों की सजा भुगते जा रहे  हैं।


पर आश्चर्य तो यह है कि कभी शेखी बघारते तो कभी ग्लानि की अतुल गहरायों में डूबते भ्रमित-मन का यह असंतोष ; कुंठा का कारण बनती ये इच्छाएँ  और ये सपने ही वास्तव में जीवन का सबसे बड़ा संबल भी हैं और गति व प्रेरणा भी। जीवन के कुरुक्षेत्र में कभी यह अर्जुन बनी हमें हताश् हथियार डालने को मजबूर करती हैं तो कभी कृष्ण-सी खुद ही  रास्ता भी  दिखलाती हैं। बिना इनके तो हम मात्र एक पंखहीन पक्षी है, जिसने खुला आकाश कभी देखा ही नहीं। इसका मतलब यह नहीं कि अराजकता और भ़ष्टता को, मानव-मन की कमजोरियों को गरिमा-मंडित करना चाह रही हूँ , अर्थ बस इतना ही है कि कोई भी निर्णय लेने से पहले, भला या बुरा घोषित करने से पहले...स्वर्ग से निष्कासित करने से पहले, परिस्थितियों और उनके दबाव, जाल व षडयंत्र ...तत्कालीन मजबूरियों को जरूर समझ लेना चाहिए।...क्या आज भी हम कई शतक पहले के उसी समाज में जीएंगे या जीना चाहेंगे जब आदमी सब कुछ घोट कर अंदर रख लेता था क्योंकि इसी में उसकी भलाई थी, यही समाज का चलन था..अकेले-अकेले ही सब  सहने पर मजबूर था वह, क्योंकि-


रहिमन मन की व्यथा, मन ही राखो गोय / सुन इठलहियैं लोग सब, बांट सके न कोय   ।


पर आज तो हमें कहना-सुनना ही नहीं, समझना और बांटना तक आ गया है। हम सभ्य और शिक्षित हो चले हैं... सहज होना  आ गया है हमें, क्योंकि इस पृथ्वी के ही नहीं चांद सूरज, पूरे बृह्मांड के रहस्यों को जान चुके हैं हम! जब जीवन और इसके आसपास की जटिलता व कृतिमता दोनों का ही आभास ले लिया है हमने.और.इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं हम जहां दूरियों का कोई अर्थ ही नहीं , तब फिर यह तलाश....यह दूरियां और भटकन क्यों? 


शायद आज भी हमें अपने उसी खोए स्वर्ग की तलाश है...स्वर्ग जो हमारे अपने अंदर है और आज भी जिस पर ताला लगा है; हमारी खोखली मान्यताओं का, भ्रान्तियों का, हमारे देखने और समझने के जटिल अन्दाज का। और ताली को भी तो खुद हमने ही कहीं दूर फेंक दिया है , या फिर इतना डरते हैं इसकी हिफाजत को लेकर कि बहुत ही सावधानी से रखकर भूल गये हैं । 


कैसे भी समझना चाहें, कैसे भी देखें, एक बात तो निश्चित है कि यदि सपने देखना मानव-मन की कमजोरी है तो तलाश मजबूरी। किसी को नाम की तलाश है तो किसी को काम की, कोई शान्ति ढूँढ रहा है तो कोई मनमीत। जो है वह नहीं चाहिए, जो नहीं है , उसी की चाह...उसी के सपने और असाध्य की साधना शायद मानव स्वभाव की सबसे बड़ी कमजोरी है.। इसीलिए जीवन एक अनंत तलाश भी है और अनंत प्यास भी। हर जीवन में किसी न किसी चीज की कमी है। कोई पूर्णतः संतुष्ट नहीं, हर जीवन में एक भटकन है, चाहे वह खुशी के उपवन में सैर कर रहा हो या दुख की नदी में डूबता, पार करने की कोशिश में हो। जब संतुष्ट न रह पाना ही  मानव का स्वभाव है तो फिर ऐसे विचलित और अस्थिर मन को कैसे थिर किया जा सकता है , वह भी मात्र चन्द सपनों या शब्दों के सहारे?  क्या जिम्मेदारी है एक कवि या कलाकार की...वह भी तो अन्य की तरह इन्ही कमजोरियों से गढ़ा-रचा गया है? अज्ञेय जी ने बड़े ही मर्म भरे शब्दों में कवि की इस द्वन्द्वात्मक स्थिति का वर्णन किया है ;

“ मुझे तीन दो शब्द

कि मैं कविता कह पाऊँ।

एक शब्द वहः

जो न कभी जिह्वा पर लाऊँ।

दूसराः जिसे कह सकूँ

किंतु दर्द मेरे से जो ओछा पड़ता हो।

और तीसरा खरा धातु

जिसको पाकर पूछूँ

न बिना इसके भी काम चलेगा?

और मौन रह जाऊँ

मुझे तीन दो शब्द

कि मैं कविता कह पाऊँ।“

शब्द, जो साक्षात बृह्म हैं,  सामाजिक, नैतिक और वैयक्तिक सवेदना के कटु यथार्थ को जीत-भोगते कवि या साहित्यकार की सबसे बड़ी कमजोरी भी तो हैं। ये उसकी छलना या  प्रवंचना ही नहीं, उपलब्धि  और साधना है। वह अपने शब्दों में  संधि व संतुलन ढूंढते ही  सारी उम्र निकाल देता है। हर पीड़ा, हर परेशानी को भूल, कच्ची मिट्टी सा गुंथता-तिरकता उसका अंतस खुद को भी गढ़ता-संवारता रह जाता है और अपने आसपास को भी। 


प्रस्तुत है लेखनी का यह अंक -मानव मन के कुछ ऐसे ही हठी सपने ...अदम्य आकांक्षाओं और जीत-हार भरी, सच्ची-झूठी अनगिनित तलाशों पर। ...संक्षेप में कहूँ तो जीवन के उन सभी विश्वास और मान्यताओं पर, जो आजीवन बांधे रखती हैं, सच से भी ज्यादा सच हो जती हैं...  इतना बड़ा सच कि उसके लिए व्यक्ति अपना सब कुछ दांव पर लगा देता है। स्वर्ग छोड़ आता है। फिर जिसे वापस ढूंढते रहने में , उस कसक या दर्द को  जीते बाकी सारी उम्र निकाल देता है।


प्यार, नफरत, लगन , विश्वास कोई भी नाम दें हम इनका, यही तो अंतर्मन के वे स्तंभ हैं जिनके सहारे बड़े-बड़े पुल तैयार किये जाते हैं और अदना-सा  आदमी  भी दुनिया जीत आता है या जीतने के ख्वाब देखता है...इतना विश्वास रहता है उसे इनपर, इनकी सच्चाई पर कि खुद तक को कुर्बान कर देता है। इतिहास भरा पड़ा है ऐसे उदाहरणों सेः हिटलर, नैपोलियन, गांधी, राम, कृष्ण... वास्तव में वे सब, बाद में जिन्हें बेइन्तिहां नफरत या प्यार और कभी-कभी तो पूजा और देवत्व तक मिला, इसी दीवानगी, इसी साधना के परिणाम हैं। नकरात्मक परिस्थितियों में तो ऐसी दीवानगी  प्रायः क्षणिक उत्तेजना या विशेष दबाव या मानसिक और अवचेतन ग्रन्थियों का परिणाम हो सकती है, परन्तु सामाजिक संदर्भ में यह सृजन की वह  सकारात्मक चेतना है जो गीता और कुरान बनाती है, राम और कृष्ण को जन्म देती है। संयम व श्रम...अप्रतिम साहस और विश्वास  बिना यह संभव नहीं।  ऐसा बस उन्ही के साथ संभव हुआ है जो  जीवन में या अपनी धुन में अति का भी अतिक्रमण कर गये हैं., बात फिर चाहे आत्म संयम की हो या आत्मपतन की; सच कहें तो इस दीवानगी...इस लगन, इन सपनों के बिना कुछ विशेष कर पाना या  हो पाना संभव ही  नहीं; देव-दैत्य....नायक-खलनायक ...प्रेमी-पापी कुछ भी नहीं।


                                                                                                                                  -शैल अग्रवाल  

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                माह विशेश


                                                                                                                              मोहन अम्बर , धर्मवीर भारती 

शताब्दी का वक्तव्य








तुम जानते हो ? नहीं तुम नहीं जानते हो
तुम जानते हुए भी नहीं जानते हो,
इसीलिए दर्द से हार मानते हो।



यह जो तुम्हारे द्वार पर खड़ा है,
और जिद्दी साधू-सा अड़ा है
इसे पहचानते हो ?  नहीं, नहीं पहचानते हो
इसीलिए दर्द से हार मानते हो।


तुम जानते हुए भी नहीं जानते हो।


यह साधू, साधू नहीं, एक भरम है
इस भरम में भी एक बड़ा भरम है
यह भरम एक बड़ा जहर है
इस जहर की एक बड़ी नहर है।
या सीधा मान लो कि यह एक षडयंत्र है,
जिससे पिट रहा आज का प्रजातंत्र है।
क्योंकि इसके पीछे भी एक अर्थतंत्र है।

आतंक और तस्करी के तंत्र को मानते हो?
नहीं, नहीं मानते हो,
इसीलिए दर्द से हार मानते हो
तुम जानते हुए भी नहीं जानते हो।
इसीलिए दर्द से हार मानते हो।



यह साधू हमें आगे नहीं जाने देगा
पीछे की ओर खींचेगा,
हमें आकर्षणों के जाल में बाँधेगा
बड़े प्यार से शोषण की बांहों में भींचेगा।

ये बड़ों की श्रद्धा और बच्चों का प्यार खाएगा,
और नया रास्ता बनाने का नारा लगाएगा
ये हमारी जेबों में शंकाएँ भरेगा
अफवाहें फैलाने में नहीं डरेगा
ये धर्म के नाम पर आदमी से आदमी लड़वाएगा
मोहब्बत के नाम पर सेक्स के गाने सुनवाएगा


तुम इसकी ताकत पहचानते हो?
नहीं, नहीं पहचानते हो
इसीलिए दर्द से हार मानते हो।


लेकिन अब तुम डरो नहीं यारों
इसकी असलियत की पोल खुल रही है
हमारे मुंह पर लगी कालिख धुल रही है।
नई पीढ़ी अब बहुत सोच रही है,
नई दिशायें नए रास्ते खोज रही है,


पीढ़ी का कहना है कि अपने पसीने पर जियो,
झूठ जहाँ भी मिले उसके ओठ सियो,
सुविधाएँ कभी संस्कार नहीं बनाती हैं
सुविधाएँ तैराती नहीं डुबाती हैं।


अपने कपड़े फाड़ना और सीना
यह भी क्या जीने में है जीना
देखते नहीं हो बचपन बूढ़ा हो रहा है
अपना सपना चौराहे पर सो रहा है


स्वार्थ उलटी गंगा बहाने लगा है,
बहरों को सुनाने लगा है,
अंधों को दिखाने लगा है
यों कहो कि भरम सारी
दुनिया को भटकाने लगा है।


मेरे इस सच को मानते हो?
नहीं,  नहीं मानते हो
इसीलिए दर्द से हार मानते हो


अब सुनो मेरे प्रगतिशील यारों,
अपनी सुविधाभोगिता सुधारो
फिर से अपने मजदूर और किसानों को पुकारो
उठो नये सूरजों को आवाज दो
अंधेरा भागता फिरे ऐसे राज दो
जब नयी और ताजी हवाएँ आयेंगी
गंदगी अपने आप मर जायेगी


एक गाड़ी के पहिये होंगे जब श्रम और व्यवस्था
आदमी नहीं बिकेगा सस्ता,
हर बच्चे के हाथ में होगा बस्ता
झूठ फरेबी की हालत होगी खस्ता
ऐसा तुम्हें करना पड़ेगा
वरना तुम्हारे भीतर का आदमी तुमसे लड़ेगा


और कहेगा क्यों छाती तानते हो? 
नहीं, नहीं तानते हो तो दर्द से हार मानते हो।  










क्योंकि सपना है अभी भी








.

..क्योंकि सपना है अभी भी
इसलिए तलवार टूटी अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धुंध धूमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
...क्योंकि सपना है अभी भी!
तोड़ कर अपने चतुर्दिक का छलावा
जब कि घर छोड़ा, गली छोड़ी, नगर छोड़ा
कुछ नहीं था पास बस इसके अलावा
विदा बेला, यही सपना भाल पर तुमने तिलक की तरह आँका था
(एक युग के बाद अब तुमको कहां याद होगा?)
किन्तु मुझको तो इसी के लिए जीना और लड़ना
है धधकती आग में तपना अभी भी
....क्योंकि सपना है अभी भी!
तुम नहीं हो, मैं अकेला हूँ मगर
वह तुम्ही हो जो
टूटती तलवार की झंकार में
या भीड़ की जयकार में
या मौत के सुनसान हाहाकार में
फिर गूंज जाती हो
और मुझको
ढाल छूटे, कवच टूटे हुए मुझको
फिर तड़प कर याद आता है कि
सब कुछ खो गया है - दिशाएं, पहचान, कुंडल,कवच
लेकिन शेष हूँ मैं, युद्धरत् मैं, तुम्हारा मैं
तुम्हारा अपना अभी भी
इसलिए, तलवार टूटी, अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धूंध धुमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
... क्योंकि सपना है अभी भी!

------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                         कविता आज और अभी
आओ दो-दो बातें कर लें








बैठ किनारे आओ दो-दो बातें कर लें
सागर के उस पार अभी मुझको जाना है।


नगर विराना होगा डगर अजानी होगी
कोलाहल भंवरों का शायद मुझे सुला दे।


मुझे विदा करने पर आंसू नहीं गिराना
तेरा भीगा आंचल शायद मुझे रुला दे।


तिम मेरी चलती सांसों का वेग देख लो
मुझको जाकर अभी मौत से टकराना है।


बैठ किनारे आओ दो दो बातें कर लें
सागर के उस पार .....


किसने कितना दर्द दिया यह प्रश्न नहीं है                                                                                                                        

भूल गया वे गीत कि जो भाए थे मन को।


तुम अब भी अपने हो इससे मन की कह दूँ
कुछ भी पास नहीं है अब तेरे अर्पण को।


किंतु किनारों से मुझको कुछ मोह नहीं है
मुझे सिंधु को चीर अभी मोती लाना है।


बैठ किनारे आओ दो दो बातें कर लें।
सागर के उस पार.....



मुझे धर्म के अधिकारों पर नहीं भरोसा
अगर दे सको मुझे कर्म का दान चाहिए।


मंजिल की परवशता पर विश्वाश न मेरा
कदमों में ताकत बाहों में जान चाहिए।।


तुम मेरी नज़रों में अपना प्यार घोल दो।
नज़र बन्द होने पर दुनिया अफसाना है।।


बैठ किनारे आओ दो-दो बातें कर लें
सागर के उस पार.....


         -जयन्ती अग्रवाल











बता भी दे








तू महल रेत का बना भी दे
उसको रहने लहर, हवा भी दे

एक रुत ने जला दिया पौधा
देख ले कोई रुत खिला भी दे

जिसके वादे पे उड़ रहा है तू
क्या जरूरी है वो निभा भी दे

खेल में देर है अभी काफी
कोई परदा अगर उठा भी दे

चाहिए जोग का वो दर्शन जो
साथ में भोग का मजा भी दे

वो मसीहा है या सियासत दाँ
दर्द भी दे नये, दवा भी दे

मुझे बख्शा गया या सूली दी
फैसला क्या हुआ बता भी दे।

 -केशव शरण 








अनाहूत सपने








आजकल नए-नए सपने
खड़ी करते है परेशानी
दौड़ने लगते है अविराम
कल्पना के घोडे
ब्रह्ममुहरत के सपने
सुना था होते है सच
जाने की कितनी कोशिस
लेकिन था सब निरर्थक
डूबे जा रहा हूँ अन्धकार कुँए की
असीम गहराई में
न ही कोई धरातल
न ही कोई सहारा
फ़िर भी नहीं कोई अंत
सुख भोगता है मन
कल्पना की उड़ान में
सच मानता है मन सपनों को ही
देखता है जिन्हें जागती आँखों से
लिखता हूँ कविताएँ एक
वजूदहीन ब्यक्ति की तरह
सपनों को ही सच मानकर
वजूद खोजता हूँ अपना


         -किशोर जैन









खाली गाँठ हाट मेले में








तन माटी की बात कर रहे, मन का ही कंचन खो बैठा
खाली गाँठ हाट मेले में सौदा नहीं किया जाता है।


जब घर में बसंत था बंदी, कितनी बार कहा घर आना
सारा चमन तुम्हें दे दूंगा, फुलबगिया अपनी बतलाना।


तब तो मेरी बात न मानी, समय गये कैसी अगवानी
सच तो यह है कभी उमर को, धोखा नहीं दिया जाता है।


खाली गाँठ हाट मेले में.....

मैने तुम्हें पुकारा था तब प्यास नयी थी, दर्द नया था
मुझे याद है इस पर तुमने मुझसे केवल यही कहा था।


अगर बहकने का डर हो,  दुनिया की यदि बुरी नजर हो
कितना भी आग्रह हो, उस दिन ज्यादा नहीं पिया जाता है।


खाली गाँठ हाट मेले में.....


उमर कैद करने से पहले साँसों को नीलाम किया है
दोष न चेहरे का पहचाना दर्पण को बदनाम किया है।


चलते-चलते शाम हो गई, गति मन की निष्काम हो गई
झूठे आश्वासन पर आखिर ज्यादा नहीं जिया जाता है।


खाली गाँठ हाट मेले में.....


                -जयन्ती अग्रवाल 









स्वप्न के गाँव में








हाय क्या हो रहा, स्वप्न के गाँव में।।
हम जले जा रहे, नीम की छाँव में।


रात ढलने लगी, हर बशर सो गया।
आँख जलने लगी, शोर कम हो गया।


धुंध की ज़द में परछांइयाँ खो गईं
सिसकियां पी के सरगोशियां सो गईं।


सो गई थक के पायल पड़ी पांव में।
हाय क्या हो रहा, स्वप्न के गाँव में।।


टूट लहरों की अंगड़ाइयाँ खो गईं।
यूँ मधुर स्वर की शहनाइयाँ सो गईं।


होंठ पर होंठ रखकर कहीं खो गये।
ओढ़ सपनों की चादर को हम सो गये।


दिल पराजित हुआ एक ही दाँव में।
हाय क्या हो रहा, स्वप्न के गाँव में।


इश्क इजहार करने को जब-जब गये।
लफ़्ज  खुद अपनी आवाज में दब गये।


सिर्फ आँखों ने आँखों की भाषा पढ़ी।
दिल ने फिर खूबसूरत कहानी गढ़ी।


प्यास अब तक न बुझी किसी ठांव में।
हाय क्या हो रहा, स्वप्न के गाँव में।

आओ नीले गगन के तले हम चलें।
छाँव में भी पलें, धूप में भी ढलें।


वो बिछड़ गये, स्वप्न ही मर गये।
मन के  उपवन में पतझड़ की  ऋतु दे गये।


कोकिला सुर दबा काग की काँव में।
हाय क्या हो रहा, स्वप्न के गाँव में।


                  -राजीव मतवाला   

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                        माह के कवि
                                                                                                                                                    दीक्षित दनकौरी








अपनों को अपना कर देख
जीवन  भर पछता कर देख

साहिल चल कर आएगा
तूफां से टकरा कर देख

जलता है वो सूरज सा
उससे आंख मिला कर देख

औरों का भी दर्द समझ
खुद से बाहर आ कर देख

तू मुझको बिसरा देगा
अच्छा चल बिसरा कर देख















गलत मैं भी नहीं तू भी सही है
मुझे अपनी तुझे अपनी पड़ी है

न जाने क्या सहा है रौशनी ने
चराग़ों से बग़ावत कर रही है

अना बेची, वफ़ा की लौ बुझा दी
उसे धुन कामयाबी की लगी है


कमी अपनी इबादत में न देखी
समझ बैठा खुदा में ही कमी है

शराफ़त का घुटा जाता है दम ही
हवा आजकल कुछ ऐसी चली है















मरते दम मुस्काया बस
और न कुछ कह पाया बस

सब ही उसके अपने थे
मैं था एक पराया बस

वो मजबूर रहा होगा
दिल को यूँ समझाया बस

आखिर किस किस से लड़ता
मैं खुद से लड़ आया बस
















हरगिज मत समझौता कर
हमलावर पर हमला कर

दस्तक से पहचाना कर
तब दरवाजा खोला कर

रिश्ते-नाते, प्यार, वफा
तू इनमें मत उलझाकर

मुझ तक आने से पहले
खुद से मत टकराया कर

एक नई उम्मीद जगा
जख़्म को फिर से ताजा कर















फूलों पर निगरानी  है
तितली खूब सयानी है

देखा, चाहा, पछताए 
सबकी एक कहानी है

आग लगी मेरे घर को
तू क्यों पानी पानी है

पुरवाई  में उभरेगी
आखिर चोट पुरानी है

सब्रो-सुकूँ है चेहरे पर
ये तस्बीर पुरानी है















यूँ कमी तेरी खलती रही
जिन्दगी हाथ मलती रही

दिल झमेलों में कटता रहा
रात अश्कों में छलती रही

मोम तिल-तिल जला रात भर
शम्अ पल-पल पिघलती रही

मेरे हिस्से में आई खुशी
कल के वादे पर टलती रही

जिन्दगी लड़खड़ाई बहुत
शुक्र है जो सँभलती रही

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                          कविता धरोहर
                                                                                                                                                      हरिवंशराय बच्चन

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है







दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !

हो जाय न पथ में रात कहीं,
मंज़िल भी तो है दूर नहीं
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है !
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !

बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगॆ
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है !
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !

मुझसे मिलने को कौन विकल ?
मैं होऊँ किसके हित चंचल ?
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है !
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !









निर्माण







नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!

वह उठी आँधी कि नभ में
छा गया सहसा अँधेरा,
धूलि धूसर बादलों ने
भूमि को इस भाँति घेरा,

रात-सा दिन हो गया, फिर
रात आ‌ई और काली,
लग रहा था अब न होगा
इस निशा का फिर सवेरा,

रात के उत्पात-भय से
भीत जन-जन, भीत कण-कण
किंतु प्राची से उषा की
मोहिनी मुस्कान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!

वह चले झोंके कि काँपे
भीम कायावान भूधर,
जड़ समेत उखड़-पुखड़कर
गिर पड़े, टूटे विटप वर,

हाय, तिनकों से विनिर्मित
घोंसलो पर क्या न बीती,
डगमगा‌ए जबकि कंकड़,
ईंट, पत्थर के महल-घर;

बोल आशा के विहंगम,
किस जगह पर तू छिपा था,
जो गगन पर चढ़ उठाता
गर्व से निज तान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!

क्रुद्ध नभ के वज्र दंतों
में उषा है मुसकराती,
घोर गर्जनमय गगन के
कंठ में खग पंक्ति गाती;

एक चिड़िया चोंच में तिनका
लि‌ए जो जा रही है,
वह सहज में ही पवन
उंचास को नीचा दिखाती!

नाश के दुख से कभी
दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्तब्धता से
सृष्टि का नव गान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!








तुम तूफान समझ पाओगे ?







तुम तूफान समझ पाओगे ?

गीले बादल, पीले रजकण,
सूखे पत्ते, रूखे तृण घन
लेकर चलता करता 'हरहर'--इसका गान समझ पाओगे?
तुम तूफान समझ पाओगे ?

गंध-भरा यह मंद पवन था,
लहराता इससे मधुवन था,
सहसा इसका टूट गया जो स्वप्न महान, समझ पाओगे?
तुम तूफान समझ पाओगे ?

तोड़-मरोड़ विटप-लतिकाएँ,
नोच-खसोट कुसुम-कलिकाएँ,
जाता है अज्ञात दिशा को ! हटो विहंगम, उड़ जाओगे !
तुम तूफान समझ पाओगे ?
  








कहते हैं, तारे गाते हैं







कहते हैं, तारे गाते हैं ।
सन्नाटा वसुधा पर छाया,
नभ में हमने कान लगाया,
फिर भी अगणित कंठों का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं ।
कहते हैं, तारे गाते हैं ।

स्वर्ग सुना करता यह गाना,
पृथ्वी ने तो बस यह जाना,
अगणित ओस-कणों में तारों के नीरव आँसू आते हैँ ।
कहते हैं, तारे गाते हैं ।

ऊपर देव, तले मानवगण,
नभ में दोनों गायन-रोदन,
राग सदा ऊपर को उठता, आँसू नीचे झर जाते हैं ।
कहते हैं, तारे गाते हैं ।

------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                                     मंथन





                                                                                                                                                                                            

                                                                                                                                                                    -अज्ञेय



साहित्यकार और सामाजिक प्रतिबद्धता

साहित्यकार की सामाजिक प्रतिबद्धता का सवाल, मुझे लगता है, पुराना पड़ गया है। मैं सोचना चाहता था कि यह उन सनातन प्रश्नों में से एक है जो कभी पुराने नहीं पड़ते और जिसका जवाब हर साहित्यकार को अपने जीवनानुभव में बल्कि अपने-आप में और अपने ज्ञान के आधार पर खोजना पड़ता है; लेकिन जिस रूप में और जिस अर्थ में यह प्रश्न सनतन होता वह पह रूप और वह अर्थ आज इस प्रश्न का नहीं रहा है। आज अधिकतर लोग इस सवाल के दो अधूरे उत्तर पा चुके हैं, जो दोनों ही अपने अधूरेपन के कारण और उस अधूरेपन में मिल जाने वाली निर्भ्रान्तता के आभास के कारण खतरनाक हैं।

एक उत्तर यह है कि क्यों कि मेरी निष्ठा अपने प्रति है और साहित्य के प्रति है, और यह निष्ठा साधना का एक रूप होने के कारण दूसरे किसी का उस में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है, इस लिए सामाजिक प्रतिबद्धता का कोई मतलब नहीं है, कोई प्रासंगिकता नहीं है। निःसन्देह एक अर्थ में और एक परिधि में ( या यों भी कह सकते हैं कि एक परिधि के बाहर व्यापक क्षेत्र में ) यह बात सही है; लेकिन कहां सही है, इस की ठीक पहचान न होने से यह निष्कर्ष साहित्यकार को एक अँधेरी सुरंग के मुँह पर लाकर खड़ा कर देता है जिसके आगे केवल बढ़ता हुआ अँधेरा है। उस अँधेरे में हाथ-पैर पटकने का (या चीखने का भी) एक उपयोग हो सकता है और व्यक्ति के विकास में योग भी हो सकता है। लेकिन वह रास्ता साहित्यकार का रास्ता नहीं है। जो लेखक इस उत्तर से संतुष्ट है उस ने सम्प्रेषण के अनिवार्य लक्ष्य से अपने को काट लिया है। साहित्यकार के लिए दूसरे तक पहुँचना जरूरी है, बल्कि दूसरे तक पहुँचना ही उस का लक्ष्य है और वही उस के कर्म को अर्थ और संगति देता है; और वह दूसरा उस सुरंग के भीतर नहीं है।

दूसरा उत्तर यह है कि साहित्यकार समाज की उपज है, समाज में होता है और इस अर्थ में समाज का देनदार है। उसे समाज के लक्ष्यों में योग देना चाहिए और समाज की प्रगति के साथ प्रतिबद्ध होना चाहिए। यह उत्तर भी अपनी सीमा में ठीक है; लेकिन इस में विकृति वहां है जहाँ यह मान लिया जाता है कि जो सामाजिक लक्ष्य है और प्रगति की जो दिशा है उस का निर्धारण साहित्यकार को अपने विवेक से नहीं करना है बल्कि उसका संकेत, उस का आदेश उस को दूसरों से मिलने वाला है—ऐसे दूसरों से जो अपने को ही समाज मानते हैं, कम-से-कम इस अर्थ में कि सामाजिक प्रगति का निर्धारण करने का अधिकार वह अपना मानते हैं और साहित्यकार के विवेक को इस मामले में स्वतंत्र मानने को तैयार नहीं हैं। अर्धात् सामाजिक प्रतिबद्धता वहाँ उन निर्धारकों के लक्ष्यों के साथ प्रतिबद्द हो जाती है। अँधेरी गुफा का रूपक यहाँ लागू नहीं होता। लेकिन दूसरों के लक्ष्यों के साथ प्रतिबद्धता साहित्यकार के लिए एक मानसिक गुलामी का स्वीकरण है जो इस लिए और भी घातक है कि लक्ष्य निर्धारण करने वाले इन दूसरों का उद्देश्य साहित्यिक नहीं है, सांस्कृतिक भी नहीं है, आर्थिक अथवा प्रशासनिक व्यवस्था को छोड़ कर किसी दूसरे अर्थ में ’ सामाजिक ’ भी नहीं है। यह हो सकता है कि उन के आर्थिक लक्ष्य अच्छे हों और देश की आर्थिक समृद्धि के लिए उपयुक्त हों ; यह भी हो सकता है कि उन के प्रशासनिक उद्देश्य देश में शान्ति-व्यवस्था और स्थायित्व लाने वाले अथवा अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को सुधारने वाले हों। लेकिन दो सच्चाइयों को किसी तरह अनदेखा नहीं किया जा सकताः पहली यह कि जो प्रतिबद्धता चाही गयी है वह सामाजिक नहीं है बल्कि चाहने वाले दल अथवा समुदाय अथवा समाज के साथ बँधी हुई है (यानी इसी अत्यंत सीमित अर्थ में ’ सामाजिक है), और उसी की सत्ता को बनाए रखने के लिए है। यानी अगर वह दल या समाज सत्ताधीन है तो वह प्रतिबद्धता यथास्थिति के पक्ष में है, और अगर वह बाहर है और सत्ताकामी है तो वह प्रतिबद्धता यथास्थिति के विरुद्ध है और ’ क्रान्तिकारी’ है। लेकिन दोनों स्थितियों में है वह सत्ता के लक्ष्य की अधीनता ही।

दूसरी सच्चाई यह है कि प्रतिबद्धता की इस अवधारणा में साहित्यकार के विवेक के लिए कोई गुंजाइश नहीं रखी गई है। साधारण नागरिक के , अथवा नागरिक होने के नाते साहित्यकार के लिए यह अनिवार्य हो कि वह सत्ता से अपने सम्बंध के बारे में निर्णय करे, लेकिन क्या साहित्यकार की हैसियत से साहित्यकार के लिए ऐसी प्रतिबद्धता अनिवार्य है। और अगर है भी तो इस परिणाम पर साहित्यकार को अपने स्वाधीन विवेक से पहुँचना है या कि कोई दूसरा ( चाहे अपने को समाज कह कर ही) उस से वह माँग करने का अधिकार रखता है कि तुम्हें हमारे साथ प्रतिबद्ध होना होगा ?

मैं जब साहित्यकार हूँ तब सँप्रेषण का तो एक व्रत ही मैने ले लिया है। यह मेरा उत्तराधिकार है कि मैं दूसरे तक पहुँचूँ , दूसरे तक वह मूल्यबोध पहुँचाऊँ जिन के बारे में मेरा सहज विवेक मुझे आश्वस्त करता है कि ये मूल्य उस पूरे समाज के जीवन को अधिक गहरा, समर्थ, समृद्ध और अर्थवान बना सकते हैं। इन मूल्यों के सम्प्रेषण का, उन की चेतना जगाने का, मेरा अक्षुण्ण अधिकार और अपरिहार्य कर्तव्य ही मेरी सामाजिक प्रतिबद्धता है; और यह प्रतिबद्धता किसी भी वर्ग, दल, समूह अथवा प्रतिष्ठान के हित अथवा सत्ता से निरपेक्ष है।

इस बात को मैं यों भी कह सकता हूँ कि साहित्यकार के नाते मेरी सामाजिक प्रतिबद्धता जिस समाज के साथ है वह मुझ में है और मेरी अपेक्षा में ही अस्तित्व रखता है, ठीक वैसे ही जैसे कि मैं उस समाज में हूँ और उस की अपेक्षा में ही बना रह सकता हूँ।

इस बात का संदर्भ शायद स्पष्ट करने की आवश्यकता हो। साहित्य एक सम्प्रेषण है तो वह सम्प्रेषण की प्रक्रिया का एक माध्यम भी है। इस वाक्य को लोग आसानी से इस लिए स्वीकार कर लेंगे कि वे सोचेंगे कि भाषा की बात हो रही है, क्यों कि यही तो सम्प्रेषण का माध्यम है। लेकिन असल में बात भाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि साहित्यिक सम्प्रेषण की बात मुख्यतया भाषा के बारे में है ही नहीं। साहित्यिक सम्प्रेषण का माध्यम वह समाज है जिस में सम्प्रेषण की यह प्रक्रिया सम्पन्न होती है।

इस माध्यम की ओर आज किसी का ध्यान नहीं है। समाज, सामाजिक परिवेश, सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक प्रतिबद्धता की इतनी चर्चा के बीच यह बात अनदेखी रह जाती है कि समाज सम्प्रेषण का माध्यम हैऔर समाज को इस माध्यम के रूप में देखे-समझे बिना न साहित्य को समझा जा सकता है, न साहित्यिक रचना प्रक्रिया को, न समाज में साहित्यकार की स्थि को। स्वयं भाषा का और साहित्य विधाओं का विकास भी बहुत दूर तक इस पर निर्भर करता है कि सम्प्रेषण के माध्यम के रूप में समाज कहाँ और कैसे बदल रहा है। समाज केवल आर्थिक सम्बन्धों के एक जाल का नाम नहीं है। आर्थिक सम्बन्ध जितना महत्व रखते हैं, कम-से-कम उतना ही महत्व संवेदना के जाल का भी है और इस बात का भी महत्व है कि विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न संवेदन अतिरिक्त सजग हो उठते हैं या कि उनकी सजगता सीमित हो जाती है। हिन्दी का आलोचक ही नहीं, प्रतिबद्धता की बहस में लगा साहित्यकार भी मानो इस बात को भूल जाता है कि , रचना क्यों कि सम्प्रेषण से अलग नहीं है, इस लिए लगातार इस सम्प्रेषण माध्यम (अर्थात् समाज) की स्थिति के बारे में सजग रहना और उसी के अनुरूप अपनी भाषा को ढालना, विधाओं के अपने उपयोग को परिवर्तित करना और इस या उस संवेदन या संवेदन-पुंज को उभारना या अधिक संयमित करना साहित्यकार का सहज और स्वाभाविक कर्म है। रचना परिस्थिति में से उपजती है; और परिस्थिति सब से पहले उस सम्प्रेषण माध्यम की स्थिति है जिस में रचना हुई है और जिस के बीच तथा जिसके द्वारा वह दूसरे तक पहुँचेगी। संप्रेषण का यह देश-कालगत सन्दर्भ समाज का संवेद्य रूप है। अगर इस अर्थ में समाज साहित्यकार में और साहित्यकार समाज में नहीं है तो उस के चिन्तन के आर्थिक अथवा ऐतिहासिक आधार अर्थशास्त्री अथवा इतिहासकार की दृष्टि में कितने भी सही हों, वह समाज के साथ जुड़ा नहीं है।यह तो हो सकता है कि उस समाज की मेरी अर्थात् किसी भी लेखक की पहचान अचूक न हो या अधूरी हो। जिस हद तक ऐसा होगा उस हद तक मेरा ( अर्थात् किसी भी लेखक का) साहित्य भी निर्बल, कम प्रभावशाली और कम टिकाऊ होगा। यह भी हो सकता है कि मेरी प्रत्यभिज्ञा को अधिक विशद करने में दूसरों का सहयोग भी हो सके, दूसरों के मार्ग-निर्देश में मैं अपना रास्ता अधिक अच्छी तरह पहचान सकूं। लेकिन यह मेरा रास्ता तभी होगा जब मेरी पहचान में यह मेरा रास्ता हो। अगर वह मुझे स्वयं अपना रास्ता नहीं दीखता तो केवल प्रतिबद्धता के नाम पर उस पर बढ़े चलना, जहां तक सर्जना का प्रश्न है, अन्धेन नीयमाना इव अन्धाः वाली स्थिति स्वीकार करना होगा। और मैं समझता हूँ कि इस मामले में उपनिषद् की बात एकदम सही है कि अविध्या जिस अंधकार-लोक में गिराती है, विध्या उससे भी अधिक दुर्भेध्य अन्धकार में गिरा सकती है। समाज की सही पहचान के बिना, और अपने विवेक की आग में उसे शोधे बिना, तो तथाकथित सामाजिक प्रतिबद्धता होगी। वह साहित्यकार के साथ समाज को भी अँधेरे गर्त की ओर खींच ले जाएगी। सारे संसार का और स्वयं हमारे देश का भी, अधिक लम्बा नहीं, पिछले दशक का ही इतिहास इस बात का ज्वलंत प्रमाण है कि प्रतिबद्धता सत्तासीन दल के साथ हो अथवा सत्ताकामी दल के साथ, वह एक विशेष प्रकार की अवसरवादिता का ही दूसरा नाम है;वह सामाजिक प्रतिबद्धता तो नहीं ही है। और साहित्यकार अवसरवादी नहीं है, वह मूल्यनिष्ठ हो कर समाज के साथ प्रगाढ़ रूप से प्रतिबद्ध है।                  

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                     कहानी समकालीन


                                                                                                                                                                                    -शैल अग्रवाल

                   ध्रुवतारा

 राघवन् गाँव के हर आदमी से कतराता है; अप्पा, अन्ना से भी। अप्पा की सोच अब उन्ही की तरह बूढ़ी और बेकार हो चली थी। जब डाँटते-डाँटते थक जाते तो तो वही पुराना दार्शनिक फलसफा चालू कर देते। भला अब इन्हे कौन समझाए समझाये कि कहानी के राजकुमार के पर जल गए थे क्योंकि वह सिर्फ पँखों के सहारे उड़कर सूरज छूने गया था। आजकल तो जहाज और अँतरिक्ष-यान का युग है। कुछ कर गुजरने का युग है, जलने, झुलसने का तो सवाल ही नहीं उठता। अक्सर ही वह सोचता और सोचता रहजाता --आखिर इस धरती और आकाश की बन्द डिबिया के भीतर ही क्यों, बाहर भी क्यों नहीं ? वहाँ भी तो जरूर कुछ और ज्यादा सुखद और रोमाँचक हो सकता है ?

घर से बाहर निकलता तो उसे लगता कि उसी एक छोटी-सी डिबिया से निकल कर फिर एक बड़े डिब्बे में बन्द हो गया । फिर वही सब  जाना-पहचाना चारो तरफ। वही अप्पा-अन्ना। वही अप्पा की पुरानी लकड़ियों की टाल। वही अन्ना की आटे-दाल की काँयकाँय और वही पुराने-जाने-पहचाने, पीले-दाँत वाले किशन और माधवन्। उसका मन हर पल एक नयी दुनिया में जाने को तरसता। दूर--आकाश के ऊपर और उससे भी परे। वहाँ जहाँ चिकनी ग्लौसी मैगजीनों सी अमीरों की दुनिया है। एक साफ-सुथरी और चमकदार दुनिया है। ऐ·श्वर्य रॉय सी सँजी-सँवरी, सुन्दर वह दुनिया आखिर उसकी भी क्यों नहीं ?

राघवन् बाहर आते ही रौशनी से बचने के लिए आँखों पर धूप का काला चश्मा चढ़ा लेता। अब ठीक है, कम-से-कम जैसा चाहो वैसा तो दिखता है। ऐसी कड़ी धूप से क्या फायदा कि आँखें ही चुँधिया जाएँ ? कभी-कभी तो घर के अँदर भी चश्मा उतारना भूल जाता और अप्पा देखते ही बरसने लगते, " क्यों चमगादड़ बना घूमता है हरदम ? आखिर इन आँखों को कभी तो ताजी हवा लगने दिया कर।"

यह असीम और दुर्लभ को छूने की, मनमानी करने की ललक, अब राघवन् को दिन-रात परेशान करती। अन्ना ज्यादा परेशान हो जातीं तो अप्पा को समझाने बैठ जातीं, " इतनी फिकर मत किया करो तुम राघवन् की। चढ़ती उमर में सबके साथ ऐसा ही होता है। बड़ा होगा तो खुद ही समझ जाएगा--सम्भाल लेगा खुद को भी, और तुम्हारे घर-बार को भी। जरा काम-धँधे में लगने दो, सब ठीक हो जाएगा। तुम कहो तो शादी कर दें, इसकी। बहू खुद ही सँभाल लेगी सब कुछ। याद नहीं तुम्हें, तुम भी तो पहले ऐसे ही थे--बागड़-बिल्ले से। यार दोस्तों से ही फुरसत नहीं मिलती थी तुम्हें भी तो। "

" यही तो परेशानी है, बावली। तेरे बेटे का तो कोई यार-दोस्त ही नहीं। " सर खुजाते अप्पा, हमेशा की तरह गहरी ठँडी साँस लेकर चुप हो जाते।

राघवन् की घुटन और बेचैनी उम्र के साथ और भी बढ़ती ही जा रही थी। अपनी बेचैन सोच के कारण वह कहीं भी तो नहीं ठहर पा रहा था। शादी हुई। मुँबई भी रहा--पर बस चार-पाँच साल ही। खुदको एक व्यवस्था--एक परँपरा-- एक साँचे में नहीं ढाल पा रहा था वह। -ढाँचा- तो मानो शब्द से ही नफरत थी उसे। पर कैसे बना होगा वह भी बिना किसी साँचे-ढाँचे के ? भगवान कोई बस एक राघवन् तो बनाता नहीं ? मास प्रोडक्शन में लगा रहता है हर दम। जाने कितनी तरह के पेड़-पौधे, जीव-जन्तु बनाता है? काफी खुरापाती जीव लगता है यह भगवान भी। --सोचते-सोचते राघवन का सूनापन तक मुस्कुरा उठता।

आँवे से लुढ़के, अधपके खिलौने की तरह अधूरा ही तो था वह। बिना आँख-कान का, खिंचा-खिंचा, गुमसुम और अटपटा-सा। एक आधा-अधूरा अँतस लिए हुए। बाप की लकड़ियों की टाल पर बैठता तो गाहकों से पैसे लेने भूल जाता। मा के कहने पर मछलियाँ पकड़ने जाता तो दिन भर समुन्दर की लहरें गिन कर, रातको खाली हाथ ही वापस लौट आता---सूखे जाल को कँधे पर डाले, रास्ते से समेटे जँगली फूलों को सूँघता-सहलाता।

राका, पत्नी उसे देखती और परेशान हो जाती। वक्त-बेवक्त समझाने की कोशिश भी करती-

" यूँ अपने आप में हमेशा अधूरे क्यों रहते हो राघवन् ? जरा ठहर कर, सँपूर्ण होकर देखो। अपने मुरलीधर का बाप बनकर देखो। यह जीवन, ये सारे रहस्य जिनके पीछे तुम इस तरह भटकते रहते हो, खुद ही समझ में आ जाएँगे। " पर जीवन तो रस्सी के बल-सा राघवन् के लिए और भी उलझता ही चला गया।

अक्सर वह थकी-फटी आँखों से आकाश में उड़ते पक्षी देखता और खुद को धिक्कारता, जब यह इतने छोटे और असमर्थ होकर भी मनचाही उड़ान ले सकते हैं, क्षितिज छूकर आ सकते हैं तो वह क्यों नहीं ? आखिर ये भी तो अपने पेट लायक खाना जुटा ही लेते हैं। एक घोंसला बना ही लेते हें। धिक्कार है इस छह फुटे जवाँ मर्द को। इस ह्मष्ट-पुष्ट शरीर और इन हाथ-पैरों को। गाँव की सीमा तक लाँघने का साधन नहीं जुटा पाते यह तो-!

पर जाने क्यों मन के इस दुस्साही कोने पर राघवन् को वि·श्वास हो चला था। जान गया था वह कि इस गाँव में-- गाँव की इस धरती में कितनी भी घुटन क्यों न हो, पर वह यहाँ सिर्फ अपनी मर्जी से ही है, किसी मजबूरी में नहीं और एक दिन वह भी इन्ही आजाद पक्षियों-सा आकाश में जरूर ही उड़ेगा-- अनन्त छूकर आएगा। अब तो राका भी समझ गई थी कि वह रोज अपने पति से नहीं, एक ऊँची ईंट की जड़ दीवार से बातें करती है। जान गई थी कि इस छोटे से बेकुल गांव में, इस घर में, उसके पति का मन बिल्कुल नहीं लगता।

वैसे बेकुल आज भी उत्तरी केरला के समुन्द्र तट पर बसा एक बेहद सुन्दर-सा गाँव है और इन साफ-सुथरे मन लुभाते तटों की खबर अब तो विदेशियों को भी लग चुकी है। तभी तो रोज ही जहाज भर-भरकर आजाते हैं -- गिटपिट-गिटपिट करते हुए। ध्यान देकर सुने तो राघवन भी उनकी बातें समझ लेता है। वैसे मतलब तो वह चेहरा पढ़कर ही निकाल सकता है। आखिर बारहवीं क्लास तक पढ़ा है और यही नहीं हमेशा स्कूल में अव्वल से अव्वल नम्बर भी लाया है। अकल की तो कोई कमी नहीं है उसके पास। मास्टरजी कहते थे अँग्रेजों जैसी अँग्रेजी बोलता है वह। पिछले जनम में जरूर अँग्रेज ही रहा होगा शायद। इनके साथ रहे तो शायद थोड़ी बहुत फ्रेंच और जर्मन भी आ जाए उसे ? वो तो अप्पा ने स्कूल छुड़वाकर घर में बिठा लिया, वरना जरूर लँडन या पैरिस जाकर ही अपना घर बनाता। आखिर यह फिरँगी भी तो आए थे --- पूरे-के-पूरे वतन को घर बना लिया। सुनते हैं इस बेकुल के किले को भी ईस्ट-इँडिया कम्पनी वालों ने मिनटों में ही हथिया लिया था और अपना वह राजा कुछ भी नहीं कर पाया था, उलटा तोहफा लेकर ही पहुँचा होगा उन साहब लोगों के पास। मुबारकें दी होगी उन्हें, ‘जी बड़ी दया की आपने जो हमें अपना गुलाम बना लिया, वरना हम गरीब तो खाने-पीने लायक भी नहीं थे। ’

राघवन् सोचता और सुलगता रह जाता। जब वह मरियल, बेवकूफ वीरप्पा लँडन पहुँचकर घर बना सकता है तो वह क्यों नही ? वीरप्पा तो आज भी सिवाय अपने नाम के, कुछ नहीं लिख सकता। वह तो हिन्दी, अँग्रेजी सब फर्राटे से जानता है। मलयालम के साथ फ्राँसीसी में भी नाम लिख सकता है। उसकी बोंज्यो मौंशियर सुनकर ही तो उस दिन वह इटैलियन इतना चहका था --" बौंज्यो मौंशियर---मी नो फ्राँसिसी, मी इटैलियानो। " कह कर हाथ मिलाया था उससे। और उसके बाद तो वह हर साल ही जुलाई में आ जाता था वहाँ पर, बात-बातपर ग्रात्सिया-ग्रात्सिया करता हुआ। और फिर आते ही, उसे ही ढूँढने लगता था मानो बेकुल के समुन्द्र की ताजी हवा के साथ राघवन् की भी बेहद जरूरत थी उसके पीले सड़े फेफड़ों को। अप्पा की नाव भी तो अब मछली पकड़ने में कम, इन टूरिस्टों को घुमाने के ही ज्यादा काम आती थी।

गाँव के और लड़कों की तरह उसे भी समुन्दर की पूरी जानकारी थी। आखिर लहरों का सीना चीरकर तैरना सीखा था उसने-- इन्ही तूफानों से जूझता बड़ा हुआ था वह भी। तभी तो उस दिन, उस डर-से डुबकी मारते फिरँगी को बीच समुन्दर से खींचकर वापस ला पाया था वह, वरना तैरता-तैरता बह जाता स्साला, उसी दिन अपनी रँग-बिरँगी इटली में वापस। हम हिन्दुस्तानियों की तरह हमारे समुन्दर की भी तो थाह नहीं इन फिरँगियों को।

अगले दिन बस हजार लीरा देकर टरका रहा था राघवन् को --मानो बस इतनी-सी ही कीमत हो इसकी दो कौड़ी की जान की। पर राघवन् ने भी तो आखिर बेशरम होकर सबकुछ उगल ही डाला था कि उसे रुपयों की नहीं, बाहर की--एक नयी दुनिया की जरूरत है। जहाँ से वह रोज ही क्या, हर साल आता है वह। मौजमस्ती करता है। जेब भरकर बिना गिने पैसे खर्च करता है। उसके जैसे बड़े साहब के लिए कोई बड़ी बात नहीं है यह सब। कोई मुश्किल भी नहीं। भीख नहीं माँग रहा वह। बस जरा-सी मदद चाहिए। एक पासपोर्ट और बीसा चाहिए उसे। पेट तो वह खुद भी भर सकता है अपना---भर ही लेगा। गाड़ी चलानी आती है। खाना बनाना आता है। और जो कहो, वही काम सीखने की क्षमता है उसमें। कहीं भी नौकरी कर लेगा, कुछ भी कर लेगा शुरु में तो वह। हाँ एक दिन जब उसके पास थोड़े-से पैसे हो जाएँगे तो शायद गाँव के वीरप्पा की तरह एक होटल खोलेगा -' राघवन्स डिलाइट्स ', यहाँ नहीं, वस वहीं पैरिस में या फिर लँडन जाकर।

और तब पैर के अँगूठे से जमीन कुरेदते, खुद में डूबे राघवन से एँटोनी ने बस इतना ही कहा था-" ठीक है-ठीक है--- हम कोशिश करेगा कि तुमको इँगलैंड या फ्राँस में सैटल करा सके। पर इतना आसान मत समझो। कमसे कम पचास हजार रुपए का बन्दोबस्त तुम्हें भी करना होगा। हम तुम्हें फ्लोरेंस जाकर चिठ्ठी लिख पाएगा कि क्या सँभव है, क्या नहीं।"

मिनटों में ही, बाहर जाने के उत्साह में राघवन ने अप्पा की आँख बचाकर, शादी में मिली घड़ी, अँगूठी, चेन सब बेच डालीं—वह भी उसी अनजान एँटनी को ही। चमकती लालची हरी-नीली आँखों से घूरते हुए उसने पूछा था, "--क्या असली है-- आई मीन ट्वेंटी फोर कैरेट गोल्ड ?"

और फिर खुद ही अपने बेतुके सवाल पर हँस भी पड़ा था वह, मानो खुदसे ही पूछ रहा हो इस गुदड़ी में लाल कैसे? भिखारी के घर में इतने मँहगे जेवरात् कहाँ से ? राघवन सब समझता था पर चुपचाप बिना कुछ कहे सारा अपमान सह लिया उसने। चालीस हजार रुपए कसकर पकड़े और भागता-भागता उस विÏल्डग से बाहर निकल आया, मानो उस विदेशी ने घडी अँगूठी ही नहीं, उस तक को खरीद लिया था--सब कपड़े, पैंट तक उतार ली थी उसकी। वैसे भी इतने सारे रुपए राघवन ने एकसाथ कभी नहीं देखे थे।

दौड़ते हाँफते राघवन् ने बारबार खुदको धिक्कारा था, ' क्यों नहीं खुश रह पाता वह, जो है उसी में---क्यों भागता फिरता है बेमतलब और बेकार---आवारा गली के इन बच्चों की तरह। दिनभर जैसे ये आपस में ही नहीं, खुद से भी जूझते रहते हैं--क्यों लड़ता रहता है वह भी खुद से? अगर उसकी किस्मत में यूँ योरोप में ही रहना लिखा था, तो क्या वह भी इसकी तरह वहीं पैदा नहीं होता ? पर किस्मत बदली भी तो जा सकती है ' और सामने कूड़े के ढेर पर चैन से सो रहे पिल्ले को कसकर एक लात जमा दी राघवन् ने।

" देखना यहीं पड़ा-पड़ा सड़ जाएगा एक दिन तू, अब भी यहाँ से हिला-डुला नहीं तो। " और अधमरा पिल्ला हलकी सी कूँ-कूँ करके फिरसे सो गया-- बिना आँख खोले ही, बिना रा़घवन् की तरफ देखे ही, बिना उसका फलसफा और शिकायत सुने बगैर ही।

राघवन अँदर ही अँदर भभक उठा ' मरने दो स्सालों को-- आदमियों की कौन कहे इस देश  के तो जानवर तक आलसी हो चुके हैं। सबको बस आराम चाहिए। कुछ नहीं हो सकता इनका, इनके देश का। बड़ा देवताओं का देश है न यह--- बस देवताओं की तरह ही आराम से अपने पुराने मँदिर में धरे रहो, बिना जरा भी हिले-डुले--बाहर की दुनिया देखे बगैर। ' गुस्से में बड़ी सी पिच्च् अपने ही पैर पर मारकर राघवन् आगे बढ़ गया। वक्त नहीं था उसके पास कि ज्यादा रुके और  ज्यादा सोचे। अभी दस हजार रुपए का और इँतजाम करना है और जल्दी ही करना है। इस शहर में अब और ज्यादा नहीं ठहर सकता वह।

अचानक राघवन का मन बाप की टाल में, उसकी लकड़ियों में रमने लगा। अब तो वह किसीसे कुछ भी नहीं पूछता था, लकड़ियाँ क्यों और कितनी चाहिएँ, घर में चूल्हा जलाने के लिए या मुर्दा फूँकने के लिए--कोई फरक नहीं पड़ता था उसे।-किसी में उसकी रुचि नहीं थी। बस एक ही लगन थी उसकी, बिकती रहनी चाहिएँ। गाहकों से कहता--ज्यादा से ज्यादा खरीदो, सस्ती पड़ेंगी, बची तो अगली बार काम आ जाएँगी। दुबारा लेने नहीं आना पड़ेगा। अपनी धुन में उस दिन तो उस बूढ़े बाप के आँसू तक नहीं दिखाई दिए थे उसे जो अपने जवान बेटे की मौत पर लकड़ियाँ खरीदने आया था। और तब अप्पा ने अलग ले जाकर डाँटा और टोका था उसकी उस अँधी एकाग्रता को।

' धन्धा ऐसे तो नहीं किया जाता, राघवन्। कुछ उसूल होते हैं इसके भी। वक्त की नाजुकता देख-समझकर बात किया करो।'

वही तो देख रहा था राघवन्। यह वक्त की नाजुकता ही तो थी जिसके चलते वह इन सूखी लकड़ियों के बीच बैठा सूख रहा था।

एक-एक रुपए को छह-छह बार गिन रहा था-- अपनी ही आग में सुलगता और जलता-सा। बारह महीने कब निकल गए राघवन को पता ही नहीं चला। पर दस की जगह अब बीस हजार रुपए थे उसके पास। अन्ना और राका तो तिरुपति जाकर प्रसाद तक चढा आए थे। बेटे को होश जो आ गया था। काम-धँधे में मन लगने लगा था अब उसका।

राघवन् का मन धरती-आकाश के बीच झूलता लम्बी पेंगे ले रहा था। पँख फुलाई चिड़िया सा लम्बी उड़ान भरने को तैयार था।

उस दिन टोनी साहब को देखते ही लपक कर सामान उठा लिया उसने और नाव में घुमाने के पैसे भी नहीं लिए। वहीं होटल के कमरे में पहला मौका मिलते ही दस हजार रुपए चुपचाप उसकी हथेली पर रख दिए। कबूतर-सी आतुर आँखों से उसे देखता वह बस बचैनी से हिलता ही रह गया।

"यू कलर्ड बास्टर्ड।  तुम लोगों को हर काम का ही जल्दी होता है। शादी करेगा तो बहुत जल्दी। बच्चे पैदा करेगा तो जल्दी। मरेगा तो वह भी बहुत ही जल्दी। पेसेंस माई बॉय पेसेंस । वैसे यह वर्ड सुना है क्या कभी तुमने ?"

राघवन् अब काबू के बाहर था--" क्यों नहीं साहब खूब सुना है --बारबार ही सुना है। हमारे पास बस एक यही चीज तो इफरात में होती है। जहाँ तक बात रही कलर्ड बास्टर्ड की तो वह तो आप लोग हमसे भी ज्यादा हैं। हमारा बस एक बाप होता है जिसका हमारी माँओं को ही नहीं सबको पता होता है।  आप लोगों की तरह हमारी माएँ --" मा शब्द के साथ चाहकर भी वह कुछ उलटा सीधा नहीं जोड़ पाया वह और गुस्से में भी वाक्य अधूरा ही छोड़कर आगे बढ़ गया दूसरे मुद्दे की ओर--

" देखा है मैने आपलोगों को भी, और आपके इस रँग-बिरँगे चरित्र को भी - रोज देखा है तुम्हें गिरगिट की तरह पल-पल रँग बदलते और साँप की तरह केंचुल पलटते। पैदा होते हो तो तुम साले लाल-गुलाबी। गुस्से में नीले-पीले --दर्द-चोट में हरे बैंगनी। डर के मारे मरे जैसे नीले-पीले। सड़े चूहे से, पीले--चितकबरे तुम, हमें कलर्ड कैसे कहते हो? हम तो काले हैं बस काले। रँग नहीं बदलते तुम्हारी तरह। सुना नहीं तुमने ' सूरदास प्रभु कारी कमरिया चढ़े न दूजो रँग। 'ब्लैक इज ओनली ब्लैक। इट कैन नॉट बी कलर्ड--डू यू अँडरस्टैंड मी।"

एँटनी समझ नहीं पाया कि गुस्से और आवेश में हाँफता राघवन् क्या कुछ कह गया पर इतना जरूर जान गया था कि सामने खड़ा यह हिन्दुस्तानी खतरनाक था। इसके अँदर की धधकती आग में आज जो वह हाथ-पैर सेंक रहा है--कल जल भी सकता है। आम हिन्दुस्तानियों की तरह ठँडा बुझा नहीं है यह। इसके साथ खेला गया हर खेल पेचीदा और खतरनाक मोड़ ले सकता है। थोड़ा और सुयोजित होना होगा उसे--शतरंज के खेल की तरह अगले दस हमलों से बचने के लिए सावधान।

" ठीक है-- ठीक है। सुबह-सुबह जल्दी आ जाना। क्या करना है, समझा दिया जाएगा। "

टेबल पर पड़े रुपए गिन सँवारकर जेब में रख लिए फिरँगी ने। खिड़की के पास खड़ा-खड़ा बिना मुड़े ही बोला " बादल घिर आए हैं। आज बोटिंग पर जल्दी चलेंगे। चार बजे आ जाना-- समोसे और फिश-पकौड़ों के साथ। अच्छा कुक है तुम्हारा वाइफ। "

' तेरे बाप के नौकर हैं न हम सब।' राघवन का मन किया डुबो दे स्साले को। पर नहीं, अभी नहीं। अभी इसी के सहारे यूरोप पहुँचना है।

राघवन ने औपचारिक मुस्कुराहट के पीछे सारा गुस्सा सँभाल कर समेट लिया और चुपचाप जुड़े हाथों सँग बाहर निकल आया। दूर छत पर बैठी वह कबूतरी अब भी जाने किसका इँतजार कर रही थी--राघवन् जान नहीं पाया कि यूँ सुबह से एक अँधी आस में अटकी कमबख्त जिन्दा भी थी या नहीं। पर उसके सपने और सच में तो अब बस मात्र एक रात की ही दूरी रह गई थी और वह इस दूरी को और बढ़ाना नहीं चाहता था। राघवन् समझदार हो गया था --जान गया था कि सपनों के रँगीन कालीन चाहे जितनी हिफाजत और सँलग्नता से बुने जाएँ, आहिस्ता से बिछाए जाएँ, उन्हें पैरों के नीचे आना ही पड़ता है और उनपर धब्बे भी पड़ते ही हैं। फिर कच्चे धब्बे तो छूट जाते हैं पर कइयों को सहने की आदत डालनी पड़ती है, आँखों से भी और मन से भी। क्योंकि ताने-बानों में रिसे ये धब्बे भी मन के घावों जैसे ही तो होते हैं।

बगावत नहीं सँयम की रस्सी से बाँध लिया राघवन् ने खुद को अपने सामान की तरह ही। तैयारी का नहीं यह तो चलने का समय था। अन्ना ने भीगी-आँखें छुपाते हुए बाँह पर बालाजी की ताबीज बाँधी। अप्पा ने गले की तड़कती नस में फँसी आवाज को खँखार कर साफ करते हुए हर तरह के खतरे से सावधान रहने की हिदायत दी और चुपचाप गनपति को हथेली पर रखकर राका ने सुबह-सुबह उदास आँखों से दही-मझली खिलायी, जैसे वह हमेशा तूफानी रात में समुन्दर में मझुआरों के सँग जाते वक्त खिलाती थी। राघवन् जानता था इन औरतों के टोने-टोटकों में भी बहते आँसुओं-सी ही शक्ति होती है तभी तो एक खरोंच तक नहीं आई थी उसे कभी। फिर आज तो वह पुरानी नाव में नहीं, एक चमकते नए जहाज में जा रहा था, वह भी साहब बनकर। साहब के साथ। इस पगली को पर कौन समझाए-?

सुबह टोनी साहब के सामान के साथ ही राघवन का भी सामान बुक हुआ, उन्ही के नाम और उन्ही की टिकट पर। राघवन् कृत्-कृत् था।

कितना अपना समझता है , वरना कहाँ उसकी टूटी सँदूकची और दरी में लिपटा कनस्तर और कहाँ चमचमाचती सैम्सोनाइट की अटैची ? आखिर इतने खराब तो नहीं होते यह फिरँगी भी।

शायद यही वजह थी कि हवाई अड्डे के कर्मचारियों के एक इशारे पर वह उनकी मदद के लिए दौड़ पड़ा। आखिर उसके बेकुल की तरह यह हवाई अड्डा भी तो छोटा-सा ही है। क्या पता काम-करने वालों की कमी पड़ गई हो ? लपक कर सारा सामान उठा लिया उसने। होल्डर में चढ़ कर फुर्ती से सरियाने लगा। पर इसके पहले कि वहाँ से वह उतर पाए, कैंची से नुकीले वे दरवाजे, पल भर में ही एक डरावने षडयँत्र-से बँद हो गए। आश्चर्य और डर से खुली आँखों से बस वह देखता ही रह गया। होश आने पर केकड़ों जैसे पँजों में जकड़ा पाया था उसने खुद को।

डरा-सहमा राघवन् झटपटाता रहा, दरवाजे पीटता रहा और सब आवाजें, चीख-पुकार अनसुनी कर जहाज आकाश में उड़ चला। राघवन् भी आखिर आज उड़ ही रहा था पर एक आजाद पक्षी की तरह नहीं, कैद और लाचार होकर।

पर उसकी सपने देखती आँखों ने अभी हिम्मत नहीं हारी थी- कोई बात नहीं कुछ ही घँटों की तो बात है ये भी कट ही जाएँगे। मशीन ही तो है आखिर। कहीं कुछ गलत बटन दब गया होगा, कोई खराबी आ गई होगी ? अंधेरा है , कुछ दिखाई नहीं देता तो सोया भी तो जा सकता है। जरूरी तो नहीं जगकर सब कुछ देखा ही जाए? अगले कुछ ही घँटों में वह लँडन या पैरिस में होगा। बस यही तो चाहा था उसने सारी जिन्दगी। इसी पल का तो इन्तजार किया था उसने। फिर अब फिकर किस बातकी ? पता नहीं राघवन का ठँड से ठिठुरता शरीर पहले हारा या पैरिस और लँडन के सपने देखती आँखें। थका-लस्त राघवन उन्ही अटैचियों के बीच लुढ़क गया। ठँडे-नीले पड़ते शरीर को अब तो चोट भी नहीं लग रही थी। सब कुछ शान्त और सुन्न हो चुका था। बस चारो तरफ के अँधेरे ने खुली और बन्द आँखों के सारे भेद मिटा दिए थे।

और तब पहली बार राघवन ने अपनी बन्द आँखों से सब कुछ साफ-साफ देखा- कैसे उसने चलते समय कोने में सहमे खड़े अपने मुरलीधरन को गोद में भी नहीं उठाया था। पूछा तक नहीं था कि वहाँ से क्या-क्या भेजे-- कौन-कौन से खिलौने लाए। सायरन बजाती गाड़ी या रँग-बिरँगी बत्तियों के सँग उड़ने वाला जहाज ? अचेत होते राघवन को अब इस भयावह अँधेरे में भी अन्ना और अप्पा के आँसू न सिर्फ साफ-साफ दिखाई ही दे रहे थे बल्कि उसके बेजान शरीर को थोड़ी बहुत गरमाहट भी दे रहे थे। आज तो राका की कोयले की अँगीठी का धुँआ तक उसे बुरा नहीं लग रहा था, आँखों में नहीं चुभरहा था। अँधेरे ने वह सब कर दिया जो सत्ताइस साल का उजाला नहीं कर पाया था। राघवन के तन और मन दोनों अब मष्तिष्क से अलग होकर बेकुल बापस दौड़ जाना चाहते थे, अपनी राका के पास, अप्पा-अन्ना के पास, उनके उसी पुराने मकाने में, लकड़ी की उसी गन्दी टाल पर।

कुछ ही घँटों बाद वहाँ रोम के बर्फीले टारमैक पर एक और अवैध रूप से आए इन्सान का शव सबके लिए समस्या और उलझन बना पड़ा था। सामान निकलने वाले कर्मचारियों में हलचल थी। आखिर यह चढ़ा तो, चढ़ा कैसे-- जरूर मौत ही खींच लाई होगी, वरना सबजीरो में मरने कौन पहुँचता है, आखिर सबको ही अपनी जान प्यारी होती है ?

जेब में रखे जेवरात और रुपयों को सहलाते एँटनी ने मुँहपर रूमाल रख लिय। खुशी और नफरत सब ढक चुके थे।

" स्मार्ट बनता था बास्टर्ड--योरोप जाएगा---नकल करेगा उसकी। " राघवन् को पहचानने से साफ इनकार कर चुका था वह।

" क्या-क्या नहीं करते ये थर्ड-वर्ड के थर्ड-क्लास लोग भी ? बेवकूफों को अपनी जान तककी परवाह नहीं। नेक्स्ट-टाइम कार्गो लोडिंग फैसिलिटी थोड़ी और टाइट करनी होगी आपलोगों को भी। पता नहीं कौन था यह बेवकूफ? कहाँसे आया --कब और कैसे घुसा बदनाम करने को हमें ? जाने किस-किससे मिला होगा यह क्रिमिनल? किस-किसको घूस दी होगी इसने ? "

चालाक एँटोनी हर बातसे मुकर गया और उसके मँहगे सूट को, हैसियत को देखकर किसी ने कुछ और पूछने की, जानने की जरूरत नहीं समझी। एयरपोर्ट औथोरिटी भी अब घबरा रही थी, " कोई इन्टर नैशनल स्कैंडल न बन जाए। हटाओ जल्दी से इस लावारिश लाश को। किसी मैडिकल स्कूल में भेज दो। पढ़ने और रिसर्च के काम आएगी, परफेक्ट यन्ग स्केल्टन है। हमें भी घर जाकर आराम करना है आखिर। "

रोम में उस जहाज को उतरे पूरा साल हो चुका है पर केरला से दूर, दिल्ली की कहीं एक चमकीली बस्ती में बूढ़े अन्ना-अप्पा आजभी ब्रिटिश एम्बैसी के बाहर बैठे राघवन् का इँतजार कर रहे हैं। आराम शब्द का तो मानो मतलब तक याद नहीं उन्हें अब। चमचम काँच के शहर की धुँध और कोहरा सब कुछ अपने शरीर पर कम्बल की तरह ओढ़े-समेटे, ठँड से जमे-ढिढुरे वे वहीं बैठे रहते हैं, उसी एक जगह पर। यूँ तो वे भी जानते हैं कि सात-समँदर पार जाने वाले, साल भर के बाद मुश्किल से ही लौट पाते हैं, पर बेटे की कोई खोज-खबर तो आनी ही चाहिए थी!---

' शुभ-शुभ सोच मन--शुभ-शुभ। शिवहरी, शिवहरी।' तरह-तरहकी आशँकाओं के बावजूद भी उनकी बूढ़ी आस अब और कुछ बुरा सोचना तक नहीं चाहती थी। आस और निराश की इस उधेड़बुन में उलझे वे दोनों समय से पहले ही बूढ़े और दयनीय लगने लगे थे। लोगों ने तो अब उनकी तरफ सिक्के तक फेंकने शुरु कर दिए हैं। उन्हें भी कोई एतराज नहीं। बेटे के मोह ने सुख-चैन, मान-सम्मान सब छीन लिया है उनका। पैसे-लत्ते, आनाज शक्कर--- कनस्तरों में भरकर जो कुछ लाए थे, सब हवन और स्वाहा हो चुका है अब तक, राघवन का भटक-भटककर पता पूछने में। अब तो बस मुठ्ठी भर चने ही पेटके गढ्ढे की इस आग का सहारा हैं। सबकुछ खप जाता है, सब भस्म कर लेती है यह आग। कोई हारी-बीमारी या दुख भी नहीं लगता अब तो उन्हें,  जाने कहाँ से एक अजीब-सी जीवटता आ गई है उनके बूढे शरीर में। वैसे भी दिल्ली भरी पड़ी है उनके जैसे टूटे-बिखरे लोगों से, टूटी-बिखरी उम्मीदों से। लँदे-फँदे दो गरीब लावारिस और सही।

बस वह एक एम्बैसीके दरवाजे पर तैनात गोरखा ही हर दिन उनकी सूनी आँख की आँच में जलता रह जाता है। पलकों पर जमे सूखे आँसुओं में अक्सर डूब तक जाता है वह तो। अपनी तरफ से भरसक समझाने की कोशिश की है उसने कई बार। कहा है, " जाओ बाबा, लौट जाओ। अपने देश को जाओ। तिल-तिल क्यों जान देते हो यहाँ पर? जहाँ तुम बैठे हो, अब तो उस जमीन की घास तक सूख चुकी है इँतजार करते-करते। फिर तुम्हारी यह आस क्यों नहीं मरती ? क्यों चमगादड़-से उलटे लटके हो इस भ्रम में, क्यों तुम्हें भी बेटे के मोह में कुछ दिखाई नहीं देता? जिन्दा या मुर्दा हम जैसे गरीब भला कब लौट पाते हैं घर से बाहर निकलकर? और हमारी खबरों का आ पाना तो हम से भी ज्यादा दुर्लभ है। मत भटको, इन उँची इमारतों की लम्बी-काली परछाँइयों में। ये डरावने-साये तो सब कुछ ही निगल जाते हैं। कुछ पता नहीं चलता यहाँ पर। इन चमचमाती इमारतों में हम जैसों की कोई फाइल नहीं होती। "

पर अप्पा-अन्ना को तो राघवन् जाते-जाते कुछ और ही सिखा गया है--अपने सारे सपने दे गया है वह। अप्पा को भी राघवन् के रँगीन चश्मे की आदत पड़ चुकी है। खुद-बखुद जाने कहाँसे राहत ढूँढ ही लाते हैं।

" ना बेटा ऐसा नहीं कहते, हौसला रखो। भगवान के यहाँ देर है अँधेर नहीं। एक-न-एकदिन देखना, जरूर आएगा हमारा राघवन्। आखिर सब ही तो आते हैं लौटकर--तीतर बटेर, पँछी, चौपाहे, सभी अपने घर का रास्ता जानते हैं। देखना खूब बड़ा आदमी बनकर ही लौटेगा वह अपने घर। यह बात दूसरी है कि बदली में छुप जाए, पर ध्रुवतारा कभी डूबता तो नहीं। "

सूनी रात के सन्नाटे में तीनों को ही अपनी फसफसी आवाज हर दिन की तरह, आज भी अजनबी और अनजान ही लग रही थी। अँधेरी परछाइयों से अभ्यस्त, पास पड़ा बीमार पिल्ला तक पीठ घुमाकर सोना सीख चुका था, पर अप्पा-अन्ना नहीं। फिर एकबार खुली आँखें कोहनी से दबाकर बन्द कर लीं उन्होंने ।

ठँडे-पथरीले फुटपाथ पर आखिर अब नींद का इन्तजार तो करना ही होगा, जैसे साल भर से राघवन् का कर रहे हैं। सोए नही तो उठ कैसे पाएँगे, और उठे नहीं तो, भला एम्बैसी कैसे पहुँचेंगे ?


अप्पा ने घड़ी देखी-अभी तो बस रात के दो ही बजे हैं। एम्बैसी अब भी रोज सुबह साढ़े नौ बजे ही खुलती है । और हर रोज सुबह सात बजे से लाइन में खड़े अप्पा-अन्ना बस एक बात ही सोच पाते हैं, " क्या पता कल का दिन ही वह दिन हो, जो राघवन् को या उसकी खोज-खबर ले ही आए!...

---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                         कहानी विशेष


                                                                                                                                                  -मीरा कांत

  गली दुल्हनवाली ( भाग-1)

अक्सर गलियों के नाम होते हैं या कम से कम वो बदनाम होती हैं। कभी इस वजह से तो कभी उस वजह से। पर नाम के नाम पर खामोश गलियां जब कोई नाम पा जाती हैं तो बहुत जल्द ही वो खामोशी लोगों के ज़हन से ऐसी पुंछती हैं जैसे आधी रात को गाड़ी से कुचली कुत्ते की लाश वाली सड़क का सुबह जमादार के आने के बाद बेदाग और बेनिशान होना।                                                                        


जिस दिन नगीना का निकाह रज़्ज़ाक से हुआ और वो कस्साबपुर के कसाई छत्ते के तीन मकानों वाली इस पतली अन्धी गली के दूसरे यानी बीच वाले मकान में आयी, कोई सोच भी नहीं सकता था कि ये बेनाम गली इतनी जल्दी कोई नाम पा जाएगी।

रज़्ज़ाक कुरैशी के मां-बाप थे नहीं। अपनों के नाम पर एक बड़ा भाई रमज़ानी था। मां-बाप ने और तो कुछ नहीं पर सिर छिपाने के लिए इस कसाई छत्ते में उनके लिए एक कमरे और दालान पर एक और छोटे कमरे व सामने छोटी खुली छतवाला मकान ज़रूर छोड़ा था। दोनों भाइयों की बचपन से न कभी पटी थी और न पटने की उम्मीद थी। शादी के बाद रमज़ानी ने फौरन ऊपर के कमरे और छत पर अपना हक जताया क्योंकि ऊपर वाले कमरे में एक अदद दरवाजा था जिसे जरूरत पड़ने पर बन्द किया जा सकता था। नीचे का कमरा तीन दीवारोंवाला कमरा था जिसे सामने तिरपाल लगाकर मुकम्मल कमरे की शक्ल दी जा सकती थी। इस तीन दीवारोंवाले कमरे में एक कोलकी थी जिसमें घर में रखने लायक सामान होने पर रखा जा सकता था। ऐसी ही तीन दीवारोंवाली रसोई दालान में थी। रमजानी के कमरे में ऊपर जाने की सीढ़ी दालान से न होकर बाहर से जाती थी। इसलिए शादी के बाद रमजानी और उसकी दुल्हन का रज़्ज़ाक से कोई लेन-देन नहीं था। हां आते-जाते रज़्ज़ाक कभी-कभी दालान में झांक ज़रूर लेता था।

साल-डेढ़ साल जब तक रमज़ानी की बीबी रही, रोज़ शाम को बाआवाज़ बुलंद ऐसी गाली-गलौज और कोसने होते कि गली अपने कानों में उँगलियाँ डालकर बैठने को मजबूर होती। बहुत जल्द रमज़ानी की बीबी ने उसे कोसना बन्द किया और एक दिन चुपचाप सब्जीवाले जुगनू के साथ मेरठ रवाना हो गयी। रमज़ानी की बद्मिज़ाजी और रज़्ज़ाक के तैश में आने वाले स्वभाव की वजह से दोनों भाइयों में बातचीत तक बन्द थी। दोनों के घरों की तरह जिन्दगियां भी अलहदा-अलहदा थीं। यहां तक कि जिन दिनों रमज़ानी अपनी बीबी को खोज रहा था और पुलिस थाने के चक्कर लगा रहा था रज़्ज़ाक ने मालूम होते हुए भी उसे जुगनू का नाम नहीं बताया।

रज़्ज़ाक के निकाह में रमज़ानी नयी तहमद बांधकर बारात में गया जरूर था पर बुलावा उसे रज़्ज़ाक ने नहीं पूरे कसाई छत्ते की तरह नाई ने ही दिया था। सारे छत्ते के मर्द बारात में शामिल हुए थे। दुल्हन आने के बाद वलीमा के तौर पर पूरे छत्ते ने रोटी और कोरमा जी भर कर छका था। अपने घर में न मर्द ज़ात बची थी न औरत ज़ात। बच्चे मीठे पुलाव पर ऐसे टूट पड़े थे जैसे छीछड़ों पर कौवे।

जिन बड़ी-बूढ़ियों ने निकाह के बाद नगीना का उस पतली अन्धी गली के एक कमरे और दालान वाले घर में इस्तिकबाल किया था, कुछ रोज़ उन्होंने कसाई छत्ते की बुजुर्ग होने का फर्ज़ निभाया और सूरज चढ़ते ही गिलौरी मुँह में डाल रज़्ज़ाक के घर आ जातीं। शाम तक वहीं खाट पर बैठी-बैठी सरौते से बारीक सुपारी काटतीं और यहाँ-वहाँ के किस्से कहतीं। दोपहर में दो-दो, तीन-तीन करके अपना सफेद बुर्का सिर पर डाल खाना खाने जातीं और घंटे भर में लौट आतीं। नगीना उन सबके लिए ‘ दुल्हन‘ थी। सो सुबह कहीं छत से, कहीं खिड़की से तो कहीं अपनी-अपनी गली में खड़ी हो एक-दूसरे आवाज़ लगातीं, ‘‘  ए बी, चलना नई है? ‘‘

‘‘ कहाँ? “

‘‘  ए वहीं...दुल्हन के ‘‘

नगीना सारे छत्ते में दुल्हन कहलाने लगी थी। उसका नाम नगीना और लोग तो क्या वह खुद भी भूल गयी थी। कोई नहीं जान पाया कि कब, कैसे और पहली बार किसके कहने पर नगीना के मकान वाली पतली अन्धी बेनाम गली ‘ दुल्हनवाली गली‘  बन गयी या यूँ कहें ‘ गली दुल्हनवाली।‘

कुछ ही महीने हुए थे कि पीर के रोज़ दोपहर में अचानक दुल्हन का भाई आया। उस दिन दो बड़ी बूढ़ियां आयी थीं जो साथ-साथ खाना खाने गयी थीं। भाई ने ऐसा कुछ कहा कि दुल्हन ने खाना खाने गयी उन बड़ी-बूढ़ियों का भी इन्तज़ार न किया। झट दरवाज़े पर ताला डाल भाई के साथ मायके चल दीं। रास्ते में भाई ने दुल्हन के घर की चाबी अपने एक दोस्त को थमाकर इसे कमेले जाकर रज़्ज़ाक को देने को कहा। दुल्हन को पूरी उम्मीद थी कि वह रात से पहले लौट आएगी। फिर भी एहतियान चाबी रज़्ज़ाक को भिजवा दी गयी थी। उस रात तो क्या वो कई रातों तक लौट न पायी। लगभग हफ्ते भर बाद लौटी तो मंगल का दिन था। कमेले की छुट्टी थी। रज़्ज़ाक घर में ही था।

सुबह के नौ बजे थे। उसने गली दुल्हनवाली में कदम रखा तो दिल ज़ोर से धक-धक बोला। रज़्ज़ाक से बात किये बिना गयी थी। जाने क्या होगा? पहला मकान पारकर वह दूसरे मकान के दरवाज़े पर पल भर ठिठकी। दरवाज़ा पूरा खुला था। उस पर मैले टाट का एक पर्दा टंगा था जो समय के साथ-साथ नीचे से फट-फट कर ऊँचा-नीचा हो गया था। पर्दा हटाकर घर में दाखिल हुई तो सामने दालान के एक कोने में बने चूल्हे पर रज़्ज़ाक चाय बना रहा था। चेहरे से लग रहा था कि कुछ समय पहले ही उठा है। उसने फौरन अपना बुर्का खोलना शुरू किया, ‘‘ चाय बना रहा है? हट मैं बना दूँगी।‘‘


रज़्ज़ाक ने कोई तवज्जो न दी। बुर्का खूँटी पर टाँगकर वह रज़्ज़ाक के पास आयी, “ ला मैं बना दूँ। “  रज़्ज़ाक खड़ा हुआ। उसने दुल्हन की चोटी पकड़कर पीछे खींची जिससे दुल्हन का सिर ऊपर हो गया, “ मिल आयी अपनी माँ के नए खसम से? “  दुल्हन दर्द से कराह उठी। चोटी से घसीटता हुआ वो उसे कमरे में ले गया और खाट पर ऐसा पटका कि उसका सिर पाये की मूठ पर लगा और भन्ना गया। “ ये मत सोचियो कि तू भी दूसरा खसम कर लेगी तो मैं तेरे नामर्द बाप की तरह तहमद की गाँठ संभालता फिरूँगा, “ कहते हुए रज़्ज़ाक खाट पर चढ़ गया। दुल्हन बेहोश थी।


कुछ समय बाद दुल्हन को होश आया तो उसने अपनी ही आह सुनी। अचानक उसे महसूस हुआ कि उसकी टाँगें उघड़ी हुई हैं। सिर को हाथ का सहारा दे वह एक झटके से उठ बैठी। टाँगों को समेटा। शलवार खाट के नीचे पड़ी थी। जाँघों पर नमी का अहसास हुआ। सारे घर में जलाँध भरी हुई थी । शलवार उठाकर दालान में झाँका तो अँगीठी की चाय उफन-उफनकर कोयले पर जल चुकी थी। दरवाजा बन्द था। घर में वो अकेली थी। दरवाजे के पास पहुँची और उसे खोलना चाहा तो पता चला दरवाजा बाहर से बन्द है।


वो फर्श पर बैठ गयी। सिर को जरा सहलाकर देखना चाहा तो दर्द की कराह निकली ‘ उई माँ ‘ । माँ फिर याद आ गयी। वो माँ जो अपने नए मर्द के साथ जाने कहाँ होगी!


अच्छा हुआ अब्बा कुछ साल पहले ही अपना कुन्बा लेकर कसाई छ्ते से दूर मंगोलपुरी में जाकर बस गये थे। वर्ना आज सारा कसाई छत्ता उसकी माँ पर थू-थू करता। अचानक दुल्हन के ज़हन में कौंधा कि रज्जाक को खबर कैसे हुई ? अगर रज़्ज़ाक तक खबर पहुँची है तो कसाई छत्ते से भी बात छिपी न होगी। अब जो होगा देखा जाएगा। वैसे भी दूसरा मर्द उसने थोड़ी उसकी माँ ने किया है। रंडी कहीं की। खुद तो दूसरे मर्द के साथ गुलछर्रे उड़ा रही होगी और अब्बा की जान को चार छोटे-छोटे बच्चे छोड़ गयी। अच्छा हुआ मेरा निकाह हो चुका था। वर्ना मैं भी अब्बा के लिए अज़ाब हो जाती। जाने कहाँ होगी कलमुँही करमजली  !


दुल्हन ने मन ही मन मां को कोसा। जितनी गालियाँ याद आयीं सभी दे डालीं पर जाने क्यों उन गालियों में वो आग और शिद्दत नहीं थी। उसके मन का एक गोशा ऐसा भी था जहाँ इस वाकये की वजह से अचानक आबशार फूट पड़ा था। शायद उसी के छींटे इस आग पर भी पड़ रहे थे।


कलमुँही कहते ही नगीना की आँखों के सामने रायबरेली के पास अकबरगंज गांव में नंगे पैर बकरयों को हरे पत्ते चराती छह-सात बरस की एक लड़की आ गयी जिसे उसने इस उम्र में कभी देखा ही नहीं था बल्कि सुनकर महसूस किया था। ये बच्ची कटोरी थी जिसे नगीना ने होश सँभालने से लेकर आज तक माँ कहा था। कितने सितम सहे हैं माँ ने बचपन से आज तक ! सारी जिन्दगी औरों के हिसाब से जीती रही। पहले दादा, फिर बाप और फिर खसम। आज जब पहली बार उसने अपने जी की की तो दुनिया को तकलीफ हुई, दर्द हुआ। अरे ये दर्द तब कहाँ गया था जब वो छह बरस की बच्ची महीनों भूख से छिपती फिर रही थी और डायन भूख अपने खुले जमे धूल भरे बालों और बड़े-बड़े दाँतोंवाला खौफनाक चेहरा लिए उसका पीछा कर रही थी। उसे पुकार रही थी "कटोरी...कटोरी... "


माँ बताती थी, एक बरस रायबरेली में इतना पानी बरसा कि सारे गाँवों में बाढ़ आ गयी। सब तहस-नहस हो गया। जमा-बटोरा बह निकला। गेहूँ और धान की फसल मारी गयी। दूर-दूर तक अनाज नहीं। भुखमरी का माहौल। तभी सरकारी खबर मिली कि कहीं दूर एक कस्बे में सरकार मुसीबतज़दा गाँववालों को राशन देगी। कटोरी के दादा ने अपने चारों बेटों को बुलाया और तय किया कि बेटों के साथ उनकी बीबीयाँ भी राशन लेने चलेंगी। जो औरतें कभी गाँव की सरहद से बाहर नहीं गयी थीं अब अपने-अपने मर्दों के पीछे-पीछे घर के खाली कनस्तर और डोल लेकर चल पड़ीं। घर में इकलौती साइकिल भी थी। उसपर भी टायर से कुछ कनस्तर बाँधे गये। गाँव वालों ने सोचा था सारे खाली बड़े बर्तनों में गेहूँ और चावल भरलाएंगे पर वहाँ नफरी के हिसाब से एकखास मिकदार में ही अनाज मिला। वापस घर आकर दादा ने बेटों और बहुओं को फिर बुलाया और फैसला सुनाया कि गेहूँ की रोटी और चावल घऱ के सिर्फ मर्द और लड़के खाएँगे। औरतें उनके थाल में बचे-खुचे टुकड़े खाएँगी और चावल का माँड पिएँगी। घऱ की बच्चियों को चने और महुआ के फूलों को भूनकर चना-चबैना दिया जाए। माँ ने यह भी बताया था कि अगर कभी गलती से किसी लड़के की रोटियाँ बच जाती थीं या वो कहीं गया होता तो उसके इन्तजार में रोटियाँ छत की कड़ियों से लटके छींके में रख दी जातीं कि कहीं लड़कियाँ न खा जाएँ।

छह बरस की कटोरी घर के ठेर काम करके पेट की भूख मिटाने के लिए सिर्फ चने और महुआ केफूलों का चबैन पाती थी जिसे वो घंटों चबा-चबा कर मुँह में जमा भूखी लार के साथ निगल जाती।

बाढ़ ने कटोरी के कुन्बे की ऐसी कमर तोड़ी कि वो सँभल न सका। कुछ बरस बाद पहले कटोरी की बड़ी बहन और फिर कटोरी का निकाह करवा दिया गया। तब कटोरी सिर्फ तेरह बरस की थी और उसका दूल्हा अन्दाजन पैंतीस बरस का। शादी होकर जब कटोरी दिल्ली के कसाई छत्ते में पहुँची तो उसे पता चला कि उस मर्दुए की तीन औलादें हैं जो कटोरी से उम्र में बड़ी हैं। साथ ही घर में पचास बरस की एक सास भी मौजूद है। सारा दिन घर के कामों में खटने के बाद यहाँ उसे पेट भर रोटी तो मिलती थी पर साथ में खाविन्द की लातें और घूँसे भी खाने होते थे।

ये सब नगीना ने खुद अपनी आँखों से भी देखा था। एक रात माँ का होंठ ऐसा कटा कि रूई पर मलहम लगाये उसने घंटों रखा पर खून ने रुकने का नाम न लिया। अब्बा के काम पर जाने के बाद वह माँ के साथ इरविन हॉस्पिटल गई थी, जहाँ माँ के होंठ पर डॉक्टर ने दो टाँके लगाए थे। ऐसे जहन्नुम से अगर वह भाग गई तो क्या बुरा हुआ?

दुल्हन इन्ही खयालों में गुम थी कि दरवाजे की कुंडी खुली और रज़्ज़ाक अन्दर दाखिल हुआ। फर्श पर दुल्हन को बैठा देख उसके सिर पर भूत उतर आया और उसने जूतेवाली एक ज़ोरदार लात उसकी पीठ पर जमा दी, “रंडी की बेटी, जैसी छोड़ गया था वैसी ही बैठी है बिना शलवार के...हरामज़ादी  अपनी नंगी टांगें क्या रमजानी के लिए खोलकर बैठी है इन्तजार कर रही है इसका कि वो सीढ़ियों से ऊपर आए और नीचे देखे ?“


दुल्हन के मुँह से दर्द भरे ‘ अल्लाह ‘ के सिवा कोई शब्द न निकल पाया। जैसे-तैसे उसने खुद को समेटा और उठकर खाट की ओर चली। शलवार उठा रही थी तो रज़्ज़ाक ने उकड़ू बैठकर बीड़ी जलाते हुए खास ठंडे ठहरे लहजे में पूछा- “ वैसे तेरी माँ को ये सूझी क्या? क्या बुढ्ढा खाने को नहीं देता था ? “


दुल्हन ने कोई जवाब न दिया और खाट पर बैठकर दाहिनी टांग शलवार में डालने लगी।


 “ अरी तेरी ज़बान भी अपने साथ ले गई क्या तेरी बद्जात माँ । जवाब क्यों नहीं देती? ”


दुल्हन ने अब दूसरी टांग शलवार में डाली “ जिद्दन जवाब दे रही है कि उठूँ फिर से...तेरे हाथ पैर तोड़ने के लिए?“    


शलवार का नाड़ा हाथ में लेकर जाने कहां से चीखी दुल्हन, “ कसाई था वो कसाई...तेरी तरह...इसलिए। “


रज़्ज़ाक ने आव देखा न ताव। वह उठा और दुल्हन का कन्धा जोर से पकड़कर बीड़ी उसकी कमर से बुझा दी।‘ अरी मेरी माँ ‘ कहती हुई दुल्हन  छटपटा उठी। 


कमर और मर-मर कर जीते मन के फफोले सहलाते-सहलाते दुल्हन के रात दिन एक खासी सुस्त रफ्तार से गुज़र रहे थे। अब वहाँ मोहल्ले की बुजुर्ग औरतों का ताँता नहीं लगता था। उन बुजुर्गों के ज़हन में बसे कस्बापुर के कसाई छत्ते के नक्शे से गली दुल्हनवाली की पतली लकीर सबसे ताज़ा होने के बावजूद मिट चुकी थी। एक-आध बार हिम्मत कर अपना बुर्का पहनकर दुल्हन खुद उनके दर पर पहुँची थी पर उन्होंने दुल्हन से उसकी माँ के बारे में इतने सवाल किये कि दुल्हन को अपने घर की दीवारों पर पुती ऊब, आलस के ढेर-सा ऊँघता दिन और धीमे कदमों से चलती कूबड़वाली शामें ही अपनी लगने लगी थीं। शाम ढलने के बाद रज़्जाक आता तो वो चूल्हे पर तवा चढ़ाती। सालन और प्याज के साथ गर्म-गर्म रोटी पेश करती। खाना खाते ही रज़्ज़ाक में जान आ जाती और वह इतना बेसब्रा हो जाता कि बिखरी रसोई से दुल्हन को खाट की तरफ घसीट ले जाता।


“ क्या करता है रे...चूल्हा तो ठंडा होने दे।“


“ चूल्हे को छोड़ पहले मुझे ठंडा कर।“


दुल्हन का रोम-रोम सिहर उठता। ऐसे में उसने एक दिन लजाते हुए पूछा,“ इत्ता प्यार करता है मुझे?” 


“ अरी जा! बड़ी आई!”


“तो फिर ? “ दुल्हन की आँखों की खुमारी ने कहा। 


“ आदत पड़ गयी है मुझे, “ कांच की मीनेवाली चूड़ियों से भरी उसकी कलाई को पीछे करते हुए कहा रज्जाक ने।


 “ जैसे माँ-बहन की गाली देना ? “ रज्जाक के पास दुल्हन की बातें सुनने का वक्त नहीं होता था। सो उसने अपना ध्यान हटाकर कोई जवाब देना भी ठीक नहीं समझा। अपने जी की पूरी करने में लगा रहा।


गली दुल्हनवाली के आखिरी अन्धे कोने से किसी साज़ पर बजायी जाने वाली मातमी धुन गली के रास्ते दुल्हन के घर में शामिल हो चुकी थी। 


“ कौन बजाता है ये ? “ एक लम्बी सांस छोड़कर थकान भरे स्वर में पूछा दुल्हन ने।


 “ तुझे क्या! अपने काम से काम रख। इधर-उधर का सोचा तो दाँत तोड़ दूँगा। समझी ?“ कहते हुए रज़्ज़ाक ने पसीना पोंछा और सीधा लेटकर छत की कड़ियां देखने लगा।


दुल्हनने सवाल करने तो बन्द कर दिए थे पर इस मातमी धुन से उसका नाता जुड़ गया था। रोज रात को वो मायके से आने वाली किसी खबर या सगे की तरह मन ही मन उसका इन्तजार करती थी।


करवट बदलकर रज़्ज़ाक ने दुल्हन को एक बार फिर अपनी तरफ खींचा। “ सबर तो कर “ , निकला दुल्हन के मुँह से। 


“ सारे दिन का भूखा -प्यासा सबर करने आता हूँ क्या घर ? “ रज़्ज़ाक उस पर बैठ चुका था। दुल्हन के मुँह से एक आह निकल पायी थी बस। मरे को नासूर हो। कहा उसने मन ही मन। जाने कैसा कसाई है। अरे कसाई भी दूसरी बार हलाल करने से पहले छुरा साफ करता है। अल्लाह-ओ-अकबर पढ़ता है। ये नामुराद तो सांस लेने की भी मोहलत नहीं देता। बस हलाल के बाद हलाल के बाद हलाल !     


थोड़ी देर बाद ढेर हुए रज़्ज़ाक के खर्राटे सुनते ही दुल्हन उठी। उसने अपने जिस्म को हलाल के बाद बिना साफ किए हुए छुरे की तरह छुआ तो भीतर एक उबकाई-सी उठी। अँधेरी रात में रज्जाक का मैला तहमद ओढ़ वह नहाने चल दी।


जाने कितनी थकी-थकी सुबहों, बासी अंगड़ाई लेती दोपहरों और हाँफती रातों के बाद एक रोज रज़्ज़ाक जब कमेले से लौटा तो अकेला न था। उसके साथ था छह दिन का एक बकरी का बच्चा। भूखा मिमियाता। 


"ये ले सँभाल इस कटरे को...भूखा है," कहते हुए रज़्ज़ाक ने उसे गोद से उतारा था। दुल्हन ने कटरे की पीठ पर प्यार से हाथ फेरा तो उसकी खाल में कँपकँपी-सी दौड़ गयी जो दुल्हन की बाँहों के जरिए कलेजे तक पहुँची।


 " कल एक चुसनी ले आइयो...इसे बोतल से दूध पिलाएँगे, " कहा दुल्हन ने और रूई ले आयी। फिर रज़्ज़ाक के साथ मिलकर उसने बकरी के बच्चे को दूध पिलाया। रूई के फाहे से उसके मुँह में कभी दुल्हन दूध डालती तो कभी रज़्ज़ाक। उकड़ूँ बैठा रज़्ज़ाक ज़रा कोहनी ऊपर कर रूई का फाहा बकरी के ऊपर उठे हुए मुँह की ओर ले गया तो दुल्हन ने ठहरकर देखा। शायद पहली बार रज़्ज़ाक उसे भला लगा था। उसका अपना जी चाहा था कि उसे दिल खोलकर प्यार करे।      


" इसे हम पालेंगे," नम आवाज में दुल्हन ने कहा।  


"तेरे खेलने के लिए  नहीं है ये...क्या समझी...खिला-पिलाकर तगड़ा कर इसे जिससे कुछ दाम मिले। "


" क्या! " दुल्हन ने हैरानी से पूछा  " तू इसे बेचेगा ? "


 " नहीं! " फाहा दूध के कटोरे में छोड़ उठते हुए रज़्ज़ाक ने कहा,  " तेरे दूसर निकाह  पर डेग में चढ़ाऊँगा। "  फिर बहन की गाली देते हुए चीखा,  " चल उठ तवा चढ़ा। " 


दुल्हन का दिल ज़रूर टूटा पर ऐसे तारे तो रोज ही उसके आसमान में टूटा करते थे जिन्हें ठहरकर देखना उसने कबका छोड़ दिया था।


"इसे हम भूरी कहेंगे " उस सफेद बकरी के भूरे चिकत्तों पर हाथ फेरते हुए कहा दुल्हन ने और फिर चूल्हे की तरफ बढ़ गयी।


भूरी दुल्हन की ज़िन्दगी का एक हिस्सा बन गयी थी। सारा दिन खिला-पिलाकर उसे गली में दरवाजे के पास एक रस्सी से बाँध देती और खुद दरवाजा बन्द कर सो जाती। एक दोपहर में उसके दरवाज़े पर दस्तक हुई। क्या रज़्ज़ाक जल्दी आ गया? वह हैरान थी। तो फिर कौन?  वह उठी और दरवाज़े के पास आकर ज़ोर से पूछा " ऐ कौन है? "


" मैं हूँ गौरी...  ।" माँ ने कहा है अपनी बकरी हटा लो...हमारे दरवाज़े पर गन्दा करती है।" इस आवाज़ पर दरवाज़ा खोलकर देखा तो छह-सात बरस की एक लड़की खड़ी थी जो गली के पहले मकान में रहती थी। दुल्हन ने इसे और इसकी माँ को एक-आध बार देखा था पर इन कुछ महीनों में कोई बात नहीं हुई थी।


" गन्दा करती है ? " बच्ची के भोलेपन से खेलते हुए पूछा दुल्हन ने।


 " हाँ बाहर निकलकर देखो। हमारे यहाँ शाम को मेहमान आने वाले हैं। " 


दुल्हन मुस्करायी। दुपट्टा सिर पर सम्भालते हुए बाहर आयी और भूरी को अन्दर ले गयी। फिर झाड़ू लेकर आयी और सारी गली से कटरे की मेंगनी बटोरकर बाहर नाली में फेंकी। झाड़ू लिए लौट रही थी तो गौरी को गली के पहले दरवाजे पर पाया।


"ये बकरी नहीं है। " हा दुल्हन ने। 


" तो? " गौरी ने हैरानी से पूछा।


 " भूरी है भूरी....जैसे तू गोरी है।"


"मैं गोरी नहीं। "


" तो क्या काली है ? "


" नहीं मैं गौरी हूँ। "  कहते हुए गौरी अपना कन्धा झटककर अन्दर चली गयी और दुल्हन भी अपने दरवाज़े का टाट हटाकर अन्दर दाखिल हुई।


अगले दिन दुल्हन दरवाज़े की तरफ कान लगाए बैठी थी। जैसे ही गली के पहले दरवाज़े पर हल्का-सा खटका हुआ, उसने अपने टाट में से झाँका। गौरी थी।  


"ओ गौरी !" दुल्हन ने पुकारा तो गौरी ने पलट कर देखा। " तुम्हारे मेहमान आ चुके ? "


 " हाँ, मेरे मामा आए थे। नयी  फ्रॉक भीलाए हैं। " गौरी ने पेट पर अपनी फ्रॉक को छूकर कहा।


 " अरे वाह! ये तो बड़ी खूबसूरत है। सुन...तेरे घर में कौन-कौन है ?"


"माँ हैं, पापा हैं, मैं हूँ, भैया हैं। " 


" तेरे भैया कितने बड़े हैं ? " 


" बहुत बड़े हैं। दसवीं में पहुँच गए हैं।"


" अभी घर में कौन है ? "


" माँ हैं और कौन ? " 


" और तेरे...वो तेरे पापा ? "


" पापा तो ऑफिस जाते हैं ।" 


" माँ क्या  सो रही है ? " 


" नहीं मेथी तोड़ रही है। " 


अब दुल्हन अपने दरवाज़े से बाहर आयी और गौरी के दरवाज़े पर पहुँची। दरवाज़ा खुला था। आँगन में गौरी की माँ एक पटरे पर बैठी मेथी साफ कर रही थी। दुल्हन उनके दरवाज़े की पत्थर वाली चौड़ी चौखट पर बैठ गयी।  


" अरे आओ आओ...अन्दर चली आओ,  " गौरी की माँ ने कहा। 


" यहीं ठीक है...यहाँ से अपने दरवाज़े को भी देखती रहूँगी। " 


" तुम्हें तोबस पहले ही दिन देखा था...जब दुल्हन बनकर आयी थीं तुम...मैं अनीसा की माँ के साथ आयी थी। " गौरी की माँ ने कहा। 


" हाँ विसने तुम्हारा नेग देते हुए बताया था कि तुम गली में ही रहती हो।" दुल्हन ने कहा। 


" मगर फिर तुम कभी दिखी ही नहीं। "


" हाँ मेरा मर्द... " कहते हुए, दुल्हन रुक गयी। 


" बहुत गुस्से वाला है, " गौरी की माँ ने वाक्य पूरा किया।  "गुस्सा तो इन मर्दों की नाक पर धरा होता है। "  


दुल्हन सिर का दुपट्टा सँभालते हुए मुस्करायी।  


" अरे दोपहर में आ जाया कर कभी-कभी...तब तो मर्द लोग होते नहीं...और गली में तेरे-मेरे सिवा  भी कोई नहीं होता । "  गौरी की माँ की बेतकल्लुफी से दुल्हन की हिम्मत बढ़ी। 


"वो एक मकान और है ना आगे ? " दुल्हन ने पूछा। 


" हाँ मगर वो दोनों तो मास्टर-मास्टरनी हैं। किसी दूर के स्कूल में जाते हैं। शाम को लौटते हैं दोनों। उनके बच्चे भी उसके साथ ही आते हैं। " 


" मास्टर-मास्टरनी हैं ! फिर रात को वो क्या बजाते हैं ? " 


" वो...अच्छा...वो जो ग्रीन साहब हैं ना, ईसाई जात हैं। जो उनके चरच में गाना-भजन होता है वही बजाते रहते हैं। "


रज़्ज़ाक से जिन सवालों के जवाबों की उम्मीद नहीं थी वो गौरी की माँ से मिल रहे थे। एक नहीं अनेक दिन, बल्कि रोज़ दुल्हन यहाँ  आकर बैठती। गौरी की माँ कभी कपड़े धोती मिलती तो कभी चावल फटकती। और दोनों दोपहर में घंटों बातें करती। इस बीच गौरी अपनी तख्ती पर आँगन में बैठी खड़िया मिट्टी पोतती तो कभी अन्दर भैया से पढ़ती। दुल्हन अगर गौरी की माँ के लिए दुल्हन थी तो गौरी और उसके भाई के लिए भी दुल्हन ही थी। दुल्हन गौरी की माँ से अपना अकेलापन बाँटती थी। फिर गौरी की माँ न अपने कुन्बे की थी न जात-बिरादरी की इसलिए वो बेखटके उससे अपने जी की कह लेती थी।


" गौरी की माँ तुम भी मेरी तरह अकेली ही हो। मैं कम से कम छतों से आती इसकी-विसकी आवाज़ें, लड़ाई- झगड़े तो सुन लेती हूँ पर तुम तो अपनी जात-बिरादरी में भी नहीं हो। तुम इस कस्साबपुरे में आयीं कैसे?"


" अब तो दस साल हो गये। गौरी तो यहीं पैदा हुयी थी। अरे दिल्ली में सस्ता मकान मिलता कहाँ है ? इनके दोस्त हैं अशफाक साहब। उन्होंने ही दिला दिया। मकान की छत का कसीदी झगड़ा है इसलिए ज़रा सस्ता मिल गया। फिर दुल्हन मोहल्ले से क्या होता है! अपना दरवाज़ा बन्द करो तो दुनिया उतनी ही रहती है।" 


दुल्हन इस पर खामोश रही तो गौरी की माँ ने भाँपते हुए बात आगे बढ़ायी,  " अरे कुछ दिनों की बात है तेरी भी गोद भर जाएगी तो अपने काम धन्धे से लगेगी। " दुल्हन ने मन ही मन इंशा अल्लाह कहते हुए हल्का सा मुस्करा दिया।


और कुछ ही दिनों में जब दुल्हन के पाँव भारी हुए तो ये खबर उसने सबसे पहले गौरी की माँ को ही सुनायी।  " तुमने ही दुआ दी थी इसलिए सबसे पहले तुम्हें ही बता रही हूँ ...मेरे अपने लोग पास होते तो... " कहते हुये दुल्हन की आँखें भर आयी थीं।                                                                            

" अरी जो दुख-दर्द में काम आएँ वही अपने। अपने घरवाले से पूछकर मोहल्ले की किसी बड़ी बी से बात कर ले । डॉक्टर के हो आ मुझे कहेगी तो मैं तेरे साथ अस्पताल चल सकती हूँ। पर पहले घर में पूछ ले। "

                                                                                                                                                                                                                    

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

गली दुल्हनवाली ( भाग-2)

गौरी की मां की चौखट पर बैठकर दुल्हन ने जैसे पहले और दूसरे बच्चे के लिए छोटे-छोटे स्वैटर , मोजे, और टोपे बुने थे वैसे ही अब तीसरे के लिए बुन रही थी। पहली बेटी नरगिस तीन साल की थी और दूसरी मुबीना सवा साल की।

“ गौरी की मां मैं चलती हूं ...रज़्जाक आता होगा।

“ क्यों आज जल्दी आएगा ?”

 “ हां आज कमेला बन्द है। इश्ट्राइक है। किसी की बकरियां बिकाने गया है। कभी भी आ सकता है। “ ऊन समेटते हुए दुल्हन उठ खड़ी हुई।

“ तभी तूने आज गरारा पहना है। “ आंखों में चमक भरकर कहा गौरी की मां ने।इस पर दुल्हन अपनी झेंप छिपाने के लिए ज़ोर से हंस दी।

 “ तुझे गरारा काटना आता हो तो मैं कपड़ा दूंगी...सिल मैं खुद लूंगी।“

“हाय-हाय क्या गरारा पहनोगी?”

दोनों तरफ एक निश्छल हँसी गूँज उठी। फिर हँसी को सँभालते हुये कहा गौरी की माँ ने “ नहीं री...हमारे यहां तो शादी के बाद सिर्फ साड़ी ही रहती है। गौरी के लिये कह रही थी। अभी बच्ची है...उसे चाव भी बहुत है।“

“ हाँ हाँ भेज देना ...मैं सिल भी दूंगी, “ कहते हुए दुल्हन लहराती चाल से अपने दरवाज़े की ओर चली। रज़्ज़ाक ने कहा था आज जामा मस्जिद से बच्चों के लिए कुछ मीठा लेता आएगा और क्या पता आज उसकी बात मानकर उसे कहीं घुमाने ले ही जाए। अन्दर आकर उसने खाट पर सो रही नरगिस और मुबीना की चद्दरें ठीक कीं और पालक धोने बैठ गयी। सालन में डाल दूंगी तो मज़ा बदल जाएगा। चूल्हा सुलगाया और सालन के लिए बघार तैयार किया। चूल्हे से निपटी तो रज़्ज़ाक के इन्तज़ार में दालान की सफाई कर डाली। बार बार अपना गरारा समेटती और यहाँ वहाँ चलती। दालानमें टंगे रोटी के टुकड़ों के छींके को झाड़ा। तभी कुछ याद आया तो रसोई की तरफ बढ़ी। रोटीकी डलिया से निकालकर कल की बची रोटियों के टुकड़े किये और छींके में डाल दिये। पड़े-पड़े धूप में तैयार हो जाएँगे तो किसी आड़े दिन काम आएँगे। सोचा दुल्हन ने। नरगिस और मुबीना इस बीच उठकर गली से बाहर भी घूम आयी थीं। तीन साल की नरगिस अक्सर मुबीना को अपनी बायीं ओर कूल्हे के ऊपर की कमर पर बैठाकर मोहल्ले भर में चक्कर लगा आती थी।

रात घिर आयी थी। वही रोज़ का समय मगर रज़्ज़ाक का अता-पता नहीं था। बच्चियों को एक रकाबी में सुबह की रोटी पर ज़रा-सा पालक और सालन देकर उसने कपड़े बदलने शुरु किये। नरगिस ने गस्से तोड़कर खाना शुरु किया और मुबीना सालन के शोरबे को बीच-बीच में उंगली से चाट रही थी। आज ट्रंक से जामुनी गरारा निकालकर पहना था हल्के गोटेवाला। सोचा था रज़्ज़ाक उसे सजा-सँवरा देख शायद घुमाने ले जाने के लिए हामी भर ही दे। पर अब कोई उम्मीद बाकी न थी। उसकी मेहनत और ख्वाब सब बेकार हो गये। वो तो घर लौटा ही नहीं। चाहे गाली-गलौज ही करता पर वक्त से आ तो जाता। सवाब न अज़ाब कमर टूटी मुफ्त में!

तभी अचानक रज्जाक घर में दाखिल हुआ। उसने अखबार के कागज़ में लिपटा कुछ दुल्हन को पकड़ाया, “ ये ले गोश्त...पाव भर है। जरा अच्छा गलाइयो ।“

“ बड़े का है? “

“ तेरे बाप ने पूरा कमेला मेरे नाम कर रखा है ना कि तुझे रोज बकरे का गोश्त खिलाऊँ!”
ब्चियां सहम हुयी थीं। नरगिस ने रकाबी खिसकायी और कोने को हो गयी। मुबीना भी खुद को घसीटकर रकाबी की तरफ ले गयी।

“ गरम क्यों हो रहा है...पूछा ही तो था बस, “ दुल्हन ने जवाब दिया।

“ चल-चल रोटी खिला।“

रज़्ज़ाक रोटी खा रहा था तो दुल्हन ने मुबीना को उठाया और छाती से लगाकर दूध पिलाने लगी। अब उसका दूध उतरता नहीं था पर इसके बिना मुबीना सोती भी नहीं थी। नरगिस खुद ही रकाबी नल के नीचे ऱख चद्दर ओढ़ सो गयी थी। दुल्हन ने सोती मुबीना से अपना दूध छुड़वाया और उसे भी नरगिस की चद्दर में सुला दिया।

आसमान में टहलता पूरा चांद दुल्हन के दालान में झाँक रहा था जिसकी चाँदनी छिटककर बिना दरवाज़े के कमरे को रोशन कर रही थी।         

”मैने आज गरारा पहना था...जामुनी गरारा। “ कहा दुल्हन ने।

“ क्यों? कहीं गयी थीं क्या ?“

“ नहीं तेरा इन्तज़ार कर रही थी,“ गिलास में पानी थमाते हुए दुल्हन ने जवाब दिया। रज़्ज़ाक ने मुड़कर जाती दुल्हन की कलाई पकड़ ली थी “ तो जा कहां रही है?”

“ रोटी खाने।”


 “ बाद में खा लीजियो...पहले इधर... “

“कहते हुए उसने दुल्हन को इतने झटके से अपनी ओर खींचा कि वो उसकी गोद में आ गिरी। “ उई माँ...क्या करता है बच्चे जग जाएँगे।“

“अभी तो सोए हैं...नहीं जगेंगे...उनके मुँह पर चद्दर ढक दे,“  कहते हुए रज़्ज़ाक ने दुल्हन को ज़मीन पर लिटा दिया था। फिर बच्चों का मुंह ढकने का होश किसे रहा। पसीना-पसीना होकर जब रज़्ज़ाक उठा तो दुल्हन ने खुद को समेटकर उठना चाहा। रज़्ज़ाक ने उसकी टाँग पकड़ ली, “ लेटी रह।“

“बहुत हुआ...मेरे पेट का तो खयाल कर। “ दुल्हन बोली।

 “ ऐसा क्या है...अभी तो पाँचवा ही लगा है, “ दुल्हन के पेट पर हाथ फेरते हुए कहा उसने, “थक गयी तो साँस ले ले...मैं एक बीड़ी पीता हूँ।“

हाथ लम्बा कर उसने आले में से बीड़ी का बंडल और माचिस ली और अपनी बीड़ी सुलगायी। बीड़ी का कश भरते-भरते उसके हाथ पास लेटी दुल्हन की जांघों के आस-पास भटक रहे थे। तभी उसके मुँह से निकला,  “ नरम घास!“ जाने किस खुमारी से दुल्हन की आँखें मुँद चुकी थी मगर ये शब्द उसके कानों तक पहुँचे थे। रज़्ज़ाक ने दुल्हन के चेहरे की ओर देखा तो उसकी आँखें बन्द थीं। हो गया ससुरी को नशा। सोचा रज़्ज़ाक ने। पहले तो हाथ नहीं लगाने देती फिर आँखें बन्द कर पड़ जाती है। यही तो हरामीपन है इन औरतों का। जाने रज़्ज़ाक के मन में क्या आया कि उसने दुल्हन से हाथ हटाकर माचिस उठा ली। माचिस की तीली जलाने की आवाज सुनी तो दुल्हन ने आँखें खोलीं। क्या दूसरी बीड़ी पीएगा? पर वह समझ न पायी क्योंकि जलती बीड़ी रज़्ज़ाक ने दाँतों में दबा रखी थी और सुलगती तीली की लौ को एकटक देखते हुए वो उसे बहुत धीरे-धीरे दुल्हन की जाँघों की ओर ला रहा था। दुल्हन चौंकी, “ हट...क्या करता है? “ उसने उठने की कोशिश की मज़बूत हाथ से रज़्ज़ाक ने उसकी दाँयी टाँग खींचीं, “ लेटी रह।“

सुलगती तीली वाला हाथ धीरे-धीरे नज़दीक आ रहा था। “ छोड़ दाढ़ीजार... छोड़,“ दुल्हन ने सारा दम बटोरकर ज़ोर लगाते हुए खुद को खींचा तो रज़्ज़ाक ने और मजबूती से उसकी टाँग अपनी ओर खींची। सुलगती तीली और पास लाते हुए वो ठंडे लहजे में बोला, “ कुछ नहीं होगा तुझे...देखने तो दे...अरी फट बुझा भी दूंगा मैं।“

“छोड़ कजरी के...तेरे कोढ़ हो...। “ रज़्ज़ाक की पकड़ और मज़बूत हुई थी। सुलगती तीली की लौ उसकी पुतलियों में हँस रही थी। अचानक दुल्हन को जाँघों के पास आँच महसूस हुई तो वो ज़ोर से चीखी, “ या खुदा...। “ ज़िबह होने से पहले जैसी यह चीख कमरे और दालान में गूंज उठी। उसने झटके से बाँयी टांग उठाकर रज़्ज़ाक की छाती पर धक्का मारा। रज़्ज़ाक की सुलगती तीली उसकी उँगली को हल्का-सा जलाती हुई दूर जा गिरी और रज़्ज़ाक का सिर दीवार से टकराया। दुल्हन फौरन उठी। नीचे पड़ी शलवार उठायी और दरवाजा खोल घर से बाहर गली में आकर दम लिया। गली के अँधेरे में हाँफते-हाँफते उसने झट शलवार पहनी। तभी अचानक घर का दरवाजा उसके मुँह पर बन्द हो गया, “ हरामजादी रह अब तू बाहर ही।“

“ अरे खोल...नासपीटे खोल, “ दरवाजा ठोकते हुए वह बोली। पर भीतर खामोशी छा चुकी थी। अँधेरे का सहारा ले दुल्हन ने गली की दीवार से टेक लगायी और फूट-फूटकर रोने लगी। गली में पहली बार बिना दुपट्टे के बैठी थी। “ हैवान कहीं का...वो तो अच्छा हुआ कि मैने कमीज़ पहन रखी थी वर्ना...“ रज़्ज़ाक को जन्म भर की सीखी-सुनी गालियाँ मन ही मन देते हुए वो उस उठते नवंबर की रात में अँधेरा ओढ़कर वहीं घुटनों में सिर टिकाकर रोती-सोती रही।

रात के तीन बजे थे। मुबीना ने अम्मी को पास न पाया तो रोने लगी। उसका रोना सुन नरगिस भी जाग गयी और अम्मी को ढूँढ़ा। रज़्जाक ने जोर से डपटते हुए सुलाना चाहा पर इसपर वो दोनों डरकर और ज़ोर से रोने लगीं। बाहर से दुल्हन ने आवाज़ लगायी, “ अरे दरवाजा खोल...बच्चे रो रहे हैं।“

नरगिस रो रही थी, “ अम्मी ... “ तो रज़्ज़ाक ने कहा “ तेरी अम्मी को जिन्न ले गया जिन्न...सो जा वर्ना तुझे भी ले जाएगा।“ जिन्न का नाम सुन नरगिस दहाड़कर रोने लगी। रज़्ज़ाक को नींद में खलल तो पड़ ही चुका था। वो उठा उसने दरवाज़ा खोला, “ चल अन्दर...सम्भाल अपने गुर्दे-कपूरों को। मरे रात-रात भर रोते रहते हैं।“ वह लौटा और पड़कर सो गया। दुल्हन दौड़ी हुई आयी तो बच्चियां उससे चिपट गयीं। दोनों को बांहों में लिए वो कब सो गयी उसे पता न चला। सुबह वह रज़्ज़ाक की आवाज़ से ही जगी। “चल उठ पानी चढ़ा मैं दूध ले के आता हूँ, “ कहता हुआ वो दरवाज़े से बाहर चला गया।

दोपहर में गौरी की माँ ने रात की लड़ाई का हाल पूछा तो दुल्हन टाल गयी। क्या बताती? बस इतना कहा कि कल रज़्ज़ाक के सिर पर ऐसा भूत सवार हुआ कि उसने मुझे रात में घर से निकाल दिया। गौरी की माँ हैरान थी, ” तब तूने क्या किया  ?“

“ क्या करती गौरी की माँ ? उसी दर पर बैठी रही...ठिठुरती वहीं सो गयी बैठे-बैठे। “

“ कैसी मौत है ! मैं तो तुझसे ये भी नहीं कह सकती कि हमारे यहां क्यों न आ गयी। तब तो तेरा घरवाला तुझे जान से ही मार डालता।“

” छोड़ो वो सब तो बीत गया...दिल खुश करने की कोई बात करो। “

“ बता, क्या बात करें। “

“अपने भगवान से दुआ करो कि इस बार मेरे बेटा हो। “

” होगा, होगा...जरूर होगा, “ कहा गौरी की मां ने।

“ गौरी की माँ एक बात कहूँ..“ दुल्हन ने हिचकते हुए कहा।

 ” बोल ना, “ उसे जवाब मिला।

 ” मेरा जी चाहता है मेरा बेटा हो और अपने बच्चों को मैं तुम्हारे बच्चों की तरह पढ़ाऊँ। “

” ज़रूर पढ़ाना...कहेगी तो मैं इस्कूल में भर्ती करवा दूँगी। “ गौरी की माँ ने भरोसा दिया।

“ वो ले लेंगे मेरे बच्चों को ? “

“ हाँ, क्यों नहीं...थोड़ा-सा इन्हें गौरी और उसका भैया घर में भी पढ़ा देंगे।“   


दुल्हन के मन में इस्कूल के सपने की नन्ही हरी कोपलें लहरा उठीं। इस बार उसे बेटा हुआ-मुकीम। उसके बाद  सलीम। रज़्ज़ाक से बच्चियों को स्कूल भेजने की बात की तो रज़्ज़ाक पर हैवान उतर आया और उसने दुल्हन को पीटकर घर से बाहर निकाल दिया। गौरी की मां ने दुल्हन की दो बेटियों की पढ़ाई की इब्तिदा अपने घर में की। दुल्हन बांचवी बार पेट से थी तो नरगिस और मुबीना तख्ती लेकर गौरी के घर जाते थे। वो सारा दिन गिनती और ‘क ख ग’ की मशक्कत करते थे। रात में तख्तियां कोलकी में छिपा दी जाती थीं।

मुकीम पांच साल का हुआ तो दुल्हन ने रज़्जाक से उसे स्कूल भेजने की बात की। इस बार रज़्ज़ाक ने उसे बच्चों समेत घर क्या धक्के देकर गली से भी निकाल दिया। पांच बच्चे लिए वो सड़क पर खड़ी थी। घर से निकलते हुए नरगिस ने उसका सफेद बुर्का उठा लिया था जिसे सिर से पहनकर सड़क पार कर दफ्तरों की बिल्डिंग के साये में बैठ गयी थी। ये बिल्डिंग का पिछवाड़ा था जहाँ दफ्तरों की खिड़कियाँ खुलती थीं पर उनमें अन्दर की हवा बाहर फेंकने के लिए उल्टे पंखे लगे थे। वहाँ एक मुंडेर पर आते-जाते लोगों से अपना चेहरा छिपा वो लगभग तीन घंटे बैठी और जब रज़्ज़ाक का हैवान सिर से उतर गया तो घर लौट आयी।

इन तीन घंटों में वह तय कर चुकी थी कि चाहे जो कुछ हो जाए, मुकीम को इस्कूल में दाखिल कराकर रहेगी। अगले दिन वो बुर्का उठा नरगिस और मुकीम को लेकर पास के स्कूल में गयी और मुकीम का दाखिला कराकर लौटी। इसपर गौरी की माँ ने हैरान होकर पूछा, “ रज़्ज़ाक मान गया?“

“उस हरामी के हाथ-पाँव फडकते ही रहते हैं, तो क्या करें? जीना तो नहीं छोड़ देंगे ना। पीटेगा तो पीटे। वैसे हम उसे बताएँगे ही क्यों! दीन का न दुनिया का। सुबह निकल जाता है तो रात को शक्ल दिखाता है। ऐसे ही रहेंगे हम चुप।“

गौरी की माँ खामोश रही। आज उसका मन बातों में खास था नहीं।“ अब कुछ दिन हम शायद दोपहर में बातें न कर पाएँ,“ कहा उसने। “ क्यों? कहीं जा रही हो।“   

“ नहीं मेरी ननद का ससुर बीमार है। अस्पताल में दिखाने दिल्ली ला रहे हैं। इसलिए चार लोग कुछ दिन अपने यहाँ ही ठहरेंगे।“   

“ अच्छा इसीलिए कल शाम भाईसाहब तुम्हारा हाथ बँटा रहे थे। देखा था मैंने झाँककर तुम कपड़े धो-धोकर पकड़ा रही थीं और वो झाड-झाड़कर सुखा रहे थे। कित्ता खयाल रखते हैं तुम्हारा!“ 

“ अपनी गरज तो बावली होती है। अभी तो एक टाँग पर भी कहोगे तो खड़े हो जाएँगे दिन भर। अपनी बहन के ससुराल का जो मामला है।“ 

“ अरे क्या कहती हो...वो तो अक्सर...“

“मतलब से दुल्हन...सब मतलब से। मेरे जीजा का एक्सीडेंट हुआ तो उनके दिमाग का ऑपरेशन किया गया। तब साफ कह दिया था इन्होंने कि अपनी बहन से कहना अस्पताल के आस-पास ही कोई कमरा ले ले। यहाँ से दूर भी पड़ेगा और अपने पास इतनी जगह भी नहीं है। अब कोई पूछे कि जब वो एक अकेली नहीं खप सकती थी तो तुम्हारी बहन के चार-चार कैसे खपेंगे?“  गौरी की माँ ने मन का गुबार निकाला।

“ अब भाई साहब कहाँ हैं?“

“ उन्हें लेने गये हैं इश्टेशन।

“अरे छोड़ो ना गौरी की माँ,“ दुल्हन ने कहा। “मुझे तो लगता है कि हम औरतों का दर्द खत्म तो क्या कम होने का भी नहीं। सोने के भाव की तरह बढ़ता ही जाता है।“ गौरी की माँ को दुल्हन की बात अजब लगीतो उसे एक टक देखा। दुल्हन उसका जी हलका करना चाह रही थी,“सोचो गौरी की माँ अगर हमारा दर्द सोने का भाव न होकर आलू-प्याज का भाव होता तो? मरा कभी तो कम होता।“ और दोनों औरतें ठहाका मारकर हँस दीं।

एक दूसरे के दुःख-दर्द बाँटते जिन्दगियाँ कटती रहीं। दुल्हन दिन में गौरी की माँ से बातें करती तो रात के साँय-साँय अँधेरे में ग्रीन साहब की सरसराती आती धुनें सुनती। जाने उन्हें मातमी धुनों से इतना लगाव क्यों था? गौरी की माँ ने बताया था कि वो अपने ईसा मसीह के दुखों का सोग मनाते हैं। शायद हमारे मोहर्रम की तरह। सोचा दुल्हन ने। दूसरों के दर्द में हम क्यों शरीक होना चाहते हैं? यहाँ तक कि कभी-कभी उस दर्द को गाकर सुकून मिलता है। क्यो?  दूसरों का दर्द गाकर-सुनकर कहीं हम अपने दर्द पर ही फाहा तो नहीं रख रहे होते? दुल्हन ये सब नहीं जानती थी पर हाँ इतना तो समझने लगी थी कि इन अँधेरी रातों में ये धुनें उसकी जलती-रोती रूह पर मुल्तानी मिट्टी का ठंडा लेप लगाती है। उसके कलेजे को तुख्मे बलंग की ठंडक दे जाती हैं।

मुकीम का स्कूल जाना न रज़ज़ाक से छुप सकता था और न छुपा। घर में कोहराम मचा। दुल्हन मय बच्चों के सड़क पर पहुँची पर मुकीम स्कूल जाता रहा। कुछ साल बाद सलीम भी उसके साथ-साथ स्कूल जाने लगा। गली दुल्हनवाली कभी गर्म दोपहरों में तो कभी सर्द रातों में दुल्हन से महरूम होती रही पर ज़िन्दगियों का चक्का चलता रहा। चलता ही रहता है।

ऐसा ही एक चक्का कुछ दिनों के लिए मस्जिद के सामने रैन बसेरे के आँगन में ठोककर लगाया गया तो बच्चे झूम उठे। अपनी अम्मी से कहने पर बात पूरी हो, कितनी हो या क्या पता न हो, सोचकर बच्चों ने नरगिस बाजी से ज़िद की कि उन्हे रैन बसेरे में हिंडोला झुलाने ले चलें। नरगिस बाजी ने ज़िम्मेदारी निभाने की ठान तो ली पर इतने पैसे कहाँ से आते? अम्मी से कहने की हिम्मत न थी। आजकल घर की हालत भी गली की तरह पतली और अन्धी थी। रज़्ज़ाक के पास कोई बँधा काम न था। जिस दिन दिहाड़ी मिल जाती थोड़ी-बहुत तरकारी या कभी-कभार गोश्त ले आता। तभी शाम को एक किलो आटा और सौ ग्राम घी मँगवाया जाता। चूल्हे में जान पड़ती। वर्ना खुदा के फ़ज़ल से चने तो घर में रहते ही थे।

दुल्हन ने कल के पाव भर गोश्त में से क्चे तीन टुकड़े चुपके से बचा लिये थे। उन्ही में आज छींके से रोटी के ढेरों सूखे सख्त टुकड़े निकालकर डाले और डेगची में हल्की आँच पर रख दिया था। नरगिस ने पूछा,“ आज टुकड़े बनाएँगे? “ तो उसे जवाब मिला था,“ पराए घर जाएगी सँभलकर बोलना सीख...बच्चोंसे कह हलीम बना रहे हैं...पकने में ज़रा देर लगेगी।“ ऐसे में हिंडोले के लिए पैसे मांगने वाली सूरत नरगिस कहाँ से लाती?

मुबीना को उसने मना लिया था कि वो खुद और मुबीना क्योंकि बड़े हैं इसलिए हिंडोल पर नहीं चढ़ेंगे। छोटी बहन नन्ही क्योंकि बहुत छोटी है इसलिए उसके डरने और रोने का खतरा था सो तय हुआ कि सिर्फ मुकीम और सलीम को हिंडोले पर झुलाया जाए। नरगिस ने दिल कड़ा किया। छोटी खाला से मिले पैसों में से जो बचे थे वो उसने कोलकी में ट्रंक के नीचे छिपा रखे थे। सो उन्हें निकालकर दुपट्टे के कोने में बाँधा और अम्मी से इजाज़त ले बच्चों के साथ दोपहर में रैन बसेरे की ओर चली। दुल्हन ने हाथ उठाकर दुआ की थी कि ऐसी बाजी अल्लाह सभी को दे।

जून की दोपहर थी। बिना दरवाज़े के कमरे में लू के भँवर कोनों-दरारों तक में घर किये बैठे थे। दुल्हन ने कमरे के बाहर लगा तिरपाल खोलकर पर्दे की तरह लटका दिया। शायद कुछ फर्क पड़े। आकर खाट पर लेट गई। गर्मी है कि तौबा! और इसी लू में नरगिस बच्चों को हिंडोला झुलाने ले गयी है। उसका कहना था ऐसी लू में हिंडोले वाला खाली बैठा रहता है शायद सस्ते में मान जाए। ज़रा सी जान है पर अभी से इतनी जिम्मेदार और समझदार हो गयी है। अच्छी लगती है। शक्ल-सूरत तो ऊपर वाले का करम है ही पर माशा अल्लाह उठान भी अच्छी ली है। पर हाँ, ज़रा छातियाँ अभी बच्ची-सी हैं। सोचा दुल्हन ने। फिक्र की क्या बात है। शादी होते ही मर्द का हाथ लगेगा तो सब ठीक हो जाएगा। अभी तो महज़ चौदह की है।

तभी अचानक दरवाजा खुला और तिरपाल हटाकर रज़्ज़ाक अन्दर आया। दुल्हन झट उठ बैठी। रज़्ज़ाक ने उसे अखबार में लिपटा लगभग तीन पाव गोश्त पकड़ाया। दुल्हन ने उसे लिया और एक नन्ही बड़ी रकाबी में रख ताक पर रखने से पहले ज़रा-सा अखबार हटा कर देखा,“ बकरे का है! “ उसके चेहरे पर हैरानी थी। “आज लगता है अच्छा काम मिला।“

रज़्ज़ाक ने कुर्ता उतारकर कील पर टाँगा,“ नहीं आज भी नहीं मिला।“

“तो? ये गोश्त?“

“अकबर की दुकान पर गया था। उसी ने पकड़ा दिया।“

“क्या ज़रूरत थी उधार लेने की? “

“ उधार नहीं है।“

“ तो?“ 

“वैसे ही।“

“ वैसे ही! “ हैरानी से दुल्हन का मुँह खुला का खुला रह गया। उसने रकाबी से अखबार में लिपटा गोश्त वापस उठाया और दाहिने हाथ में लेकर उनका वज़न जाँचा,“ तीन पाव बकरे का गोश्त कोई वैसे ही दे देगा ? “

“तेरा दिमाग कुछ ज्यादा चलता है। चल जा पानी पिला।“ रज़्ज़ाक उसे झिड़कते हुए खाट पर बैठ गया। दुल्हन पानी लेकर आयी तो उसने एक ही सांस में सारा गिलास खाली कर दिया। “ शोरबे की तरह क्यों दे रही है? और ला।“

तीन गिलास पानी पीनेके बाद रज़्ज़ाक को अचानक ख्याल आया कि दुल्हन घर में अकेली है। “बच्चे कहाँ हैं?“ पूछा उसने।  

“ अभी आ जाएँगे।“ दुल्हन ने टालना चाहा।

“तू उल्टी पैदा हुई है क्या? सीधा जवाब नहीं दे सकती क्या? मैं पूछता हूँ बच्चे कहाँ हैं? “ रज़्ज़ाक ने कड़ककर पूछा।

“मस्जिद के सामने हिंडोला लगा है। वहीं गये हैं।“

“मंदिर के सामने? कहाँ? वो रैन बसेरे में?“

“ हाँ।“

“ नरगिस और मुबीना कहाँ हैं? “

“ वो ही तो लेकर गयी हैं। आती होंगी? “

“नरगिस रैनबसेरे ले गयी है। तेरा दिमाग तो नहीं खराब हो गया? अरी इतनी साँड-सी तू घर में बैठी है और जवान लड़की को बाहर भेज दिया।“

“ बच्चे ज़िद कर रहे थे। ले गयी वो। कौन-सा दूर है।“

“ हरामज़ादी ज़बान लड़ाती है,“ रज़्ज़ाक ने अपनी चप्पल को दुल्हन के गाल पर तमाचे की तरह मारा तो दुल्हन चकरा गयी।

“मैं अकबर से उसके निकाह की बात चला रहा हूँ और वो बाज़ार में हिंडोले झूल रही है।“

अकबर से नरगिस के निकाह की बात सुन दुल्हन होश में आयी, “अकबर! उस रंडुए की तो दो बेटियाँ भी हैं।“ “ यहाँ तेरे चार-चार पालती है तो वहाँ दो नहीं पाल पाएगी! “

“ नहीं! “ गाल पर हाथ रखे चीखी दुल्हन,“ मैं ऐसा नहीं होने दूँगी।“

“ तू? तू रोकेगी मुझे?“

“ तू बाप है कि जल्लाद!“ 

“ होश में आ बावली,“ रज़्ज़ाक ने आवाज़ को दबाकर समझाने की कोशिश की।“अकबर की दोनों बेटियाँ तो कुछ ही सालों में अपने-अपने घर की हो जाएँगी। फिर उसकी अपनी दुकान है। मकान-दुकान सब नरगिस का और...वो मुझे अपनी दुकान पर काम भी दे रहा है।“

“ बेच के खाएगा बेटी को,“ अचानक दुल्हन कोहैवान का साया छू गया। वह उठी औररकाबी में रखा गोश्त उसने तिरपाल के बाहर दरवाज़े की तरफ उछाल फेंका,“ ये हराम है इस घर के लिए।“

रज़्ज़ाक ने उसे चोटी से खींचकर अपनी तरफ किया और घूँसे-लातें बरसाने लगा। दुल्हन ने हिम्मतकर उसे पीछे को धक्का दिया,“इससे तो अच्छा है कि उस मासूम को कमेले ले जाकर ज़िबह कर दे।“

“ पहले तो तुझे करूँगा ज़िबह,“ रज़्ज़ाक संभलकर फिर दुल्हन की ओर लपका और दीवार से सटाकर उसका गला दबाने लगा। दुल्हन ने जैसे-तैसे अपना घुटना उठाकर उसकी जाँघ पर मारा तो रज़्ज़ाक की पकड़ छूट गयी। शादी के पन्द्रह-सोलह सालों में दुल्हन ने रज़्ज़ाक को निशाना साधकर पहली बार मारा था। रज़्ज़ाक बिलबिलाकर सकते में आ गया। फिर उसकी तरफ बढ़ा तो दुल्हन ने सख्त लहजे में कहा,“ बाज़ आजा...ये रिश्ता नहीं होगा।“

रज़्ज़ाक पर खून सवार था। उसने दुल्हन की बाँह पकड़कर उसे घसीटते हुए दरवाजे से बाहर किया,“ निकल यहाँ से रंडी की औलाद...जा सड़क पे बैठ।“ माँ-बहन की गालियाँ देते हुए उसने दुल्हन को गली के बाहर धकेल दिया ओर खुद अन्दर चला गया।

कुछ पल वहीं खड़ी हो हाँफती दुल्हन ने साँसों को सँभाला। उसकी आती साँस कह रही थी, ये रिश्ता नहीं होगा तो जाती जवाब दे रही थी, हरगिज नहीं। लगातार ऐसे ही साँसें खींचते-छोड़ते उसने बिखरे बालों को पीछे कर दुपट्टा ठीक से सिर पर बैठाया। इधर-उधर नज़र दौड़ायी। चारों ओर जून की दोपहर वाली वीरानी नज़र आयी। चाय की दुकान पर जमाल बेंच पर बाँह का तकिया लगाये सो रहा था। मोटर मैकेनिक सिराज की दुकान खाली पड़ी अलसा रही थी। धीमे कदमों से वह सड़क की तरफ बढ़ी। सड़क पार की और बिल्डिंगों के पिछवाड़े बनी मुंडेर पर बैठ गयी। लू के थपेड़े उसे हर तरफ से तमाचे मारने पर उतारू थे पर दुल्हन उनसे बेखबर सूखे गले में थूक सटकते हुए बहुत तेजी से कुछ सोच रही थी। सोचती चली जा रही थी।

घर से बेघर हुई दुल्हन के भीतर जाने क्या-क्या घर करता जा रहा था आज! क्या नहीं किया और सहा उसने रज़्ज़ाक के लिए! खुद को निचोड़कर रख दिया। और रज़्ज़ाक ने उसे बकरे की खाल की तरह खींच नोंचकर घर से अलग कर दिया। जून की लू के थपेड़ों ने दुल्हन को अचानक अधेड़ कर दिया। आज वो उसकी बेटी की ज़िन्दगी के साथ भी ज्यादती करने पर उतारू है। बड़े अब्बू कहते थे बकरा जब तक ज़िन्दा रहता है हर बात पर कहता है-मैं मैं मैं। पर वही जब मर जाता है उसकी खाल रूई धुनने के काम आती है तो धुनिए की ऊँगली के हर इशारे पर एक ही बात कहता है-तू तू तू। बकरों के साथ रह-रहकर रज़्ज़ाक भी बस मैं मैं मैं करता है हर वक्त। दूसरे का कभी नहीं सोचता खुदगर्ज। दुल्हन के भीतर कुछ खौल-सा गया। आह! अपनी बेटी को भी ये पराया करेगा तो अपने फायदे के लिए! गाल पर चप्पल की छाप को छुपाने के लिए उसने सिर पर लू से इधर-उधर होता दुपट्टा ठीक किया। उसकी जिन्दगी मुकीम का गत्ते वाला साँप-सीढ़ी का खेल हो गयी थी जिसमें रात और दिन आमने-सामने बैठे मानो दाव पर दाव लगा रहे हों। कभी दिन को साँप डस जाता है तो कभी रात सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते साँप का शिकार हो जाती। या फिर कोई सीढ़ी से लुढ़कता हुआ नीचे चला आता है। आज उसकी दोपहर सीढ़ी से लुढ़की थी और वह सड़क पर आ गयी थी। लानत है इस छीछड़ों सी जिन्दगी पर कि जब चाहा निकाल बाहर किया। दुल्हन ने गर्दन कुछ इस तरह मोड़ी मानो ज़िन्दगी से मुँह मोड़ रही हो जबकि उसका मन जानता था कि लौटकर उसे वहीं जाना होगा। उसी ओजड़ी में।

तभी  सामने से सोती नन्ही को गोद में लिये नरगिस आती दिखाई दी। नरगिस ने जैसे ही अपनी अम्मी को वहाँ देखा, कदम तेजी से बढ़ाते हुए उसकी ओर लपकी।

“ अम्मी, तुम यहाँ? क्या अब्बू आ गये? “ बेसाख्ता उसके मुँह से निकला। दुल्हन खामोश रही।“नन्ही सो गयी...सोचा घर छोड़ आऊँ।“ दुल्हन ने कोई जवाब न दिया। वो एकटक नरगिस की मासूम सूरत को देख रही थी। भीतर उगे रेत के टीलों का अँधड़ गहरा रहा था। नरगिस को कुछ समझ में न आया तो वह नन्ही को थपथपाते हुए चुपचाप वहीं खड़ी रही।

गली से बाहर सड़क पर होने के बावजूद वो दोनों गली के अन्दरवाली घर की दुनिया में थीं कि अचानक उन्होंने एक आवाज़ सुनी,“ ये गली दुल्हनवाली कहाँ होगी बहन जी? “ नरगिस से नज़र हटाकर दुल्हन ने सड़क की ओर देखा तो साइकिल थामे एक अधेड़ व्यक्ति खड़ा था। नरगिस ने भी पलटकर उस अधेड़ व्यक्ति को देखा और फिर अम्मी को।


“ अरे भई ये गली दुल्हनवाली...,“ अधेड़ ने फिर अपनी बात स्पष्ट करनी चाही थी कि गली से बाहर बैठी दुल्हन ने हाथ के इशारे के साथ कहा,“वो वहाँ...सड़क के पार।“ फिर दुल्हन उठी और नरगिस की गोद में सोती नन्ही को लेकर दोबारा सड़क की मुंडेर पर बैठ गयी। जाने नरगिस को ये सब क्यों अजब लगा? वो पास बैठी और अपने दुपट्टे से दुल्हन की पेशानी पर उभरी पसीने की बूँदे पोंछने लगी। दुल्हन की हाँफती साँसें कुछ थमी थीं पर भीतर उनकी अनुगूँज एक लय में चक्कर काट रही थीं। अब उनमें एक ही आवाज़ थी,“हरगिज़ नहीं...हरगिज़ नहीं।“

दुल्हन और उसकी बेटी ने मिलकर गली दुल्हनवाली की ओर जाते अधेड़ व्यक्ति और उसकी साइकिल की ओर देखा। बिना बोर्डवाली बस नाम भर की गली दुल्हनवाली!

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                                            कहानी समकालीन


                                                                                                                                                                             -दिनेश ध्यानी


अपना-अपना दर्द

हैलो!
हां.
कैसे हो?
ठीक हूँ, अपना सुनाओ कैसी हो?
मैं ठीक हूँ। तुम सुनाओं?
बस चल रहा है।
बस चल रहा है? ये सुबह सुबह मुंह लटकाये क्यों हो?
कुछ नही, बस ऐसे ही।
तुम भी ना कुछ कहो तो मुंह लटकाकर बात करते हो और पूछो तो कहते हो कि कुछ नही।
कहा ना कुछ भी नही।
ठीक है तुम जानो और तुम्हारा काम जाने मैं क्यों परेशान होने लगी तुम्हारी उदासी देखकर।
अरे बाबा मैं उदास नही हूँ, बस यू ही जरा आज सुबह मूड़ खराब हो गया था।
क्यों कुछ कहा किसी ने?
नही किसी ने कुछ नही कहा।
मत बताओं, मैं जानती हूँ तुम्हारा वही पुराना राग। उसके साथ अभी तक बनाकर नही चले, उसे समझा नही पाये और अपने आप फुकते रहते हो। सच कहूँ कभी-कभी मुझे लगता है कि तुम शायद सनकी इंसान हो। जानते हो क्यों? क्यों कि तुम अपनी परेशानी को किसी को बताना नही चाहते हो और अपने आपस में बैठकर कभी भी तुमने उससे सुलह की कोशिश की नही फिर कैसे होगा तुम्हारी समस्या का समाधान?
जानती हो दुनियां में कई ऐसी समस्यायें हैं जिनका अभी तक भी कोई समाधान नही निकला है। कई ऐसी बीमारियां हैं कि उनका इलाज नही खोजा जा सका है। इसमें अगर मेरी समस्या भी एक शामिल कर ली जाए तो फिर अचरच नही होना चाहिए।
तुम कोई फैसला क्यों नही ले लेते?
कैसा फैसला?
अरे कि तुम्हें क्या करना है? कैसे रहना है? ऐसे में तो तुम्हारा जीना मुहाल  लगता है।
जानती हो जब मुझे फैसला लेना था तब मेरे अपनों ने मुझे फैसला लेने नही दिया और आज मैं चाहकर भी कुछ फैसला नही कर सकता हूँ। कैसी बिड़ंबना है जब फैसला लेने के हक में था तब अपनों की बंदिशें और आज किसी की बंदिशें नही हैं तो अब फैसला नही ले सकता हूँ। वाह! री जिन्दगी तेरे रंग भी अजब-गजब हैं। छोड़ो मेरी तुम अपनी सुनाओं, काफी दिनों बाद मिलना हो रहा है। कैसी हो?
मिलना? मिलना हो रहा है कि फोन पर बातें हो रही हैं? सब ठीक चल रहा है।
घर में सब ठीक हैं?
हां फिलहाल सब ठीक हैं।
अरे तुम्हारे उसका क्या हुआ, वो जिस प्रोजेक्ट पर तुम बात कर रही थीं ना।
हां उसकी बात हो चुकी है मैंने प्रोजेक्ट सम्मिट कर दिया है। शायद अगले सप्ताह देहरादून जाना होगा।
वेरी गुड़।
थेंक्स। अच्छा एक बात कहूँ?
हॉं कहां।
तुम ऐसा क्यों नही कर लेते हो कि एक दिन उससे सीधी बात करों कि अब ऐसा कब तक चलेगा?
अरे छोड़ो भी उन बातों को। जिन बातों का कोई हल नही हो सकता है, जो बातें हमारे बस से बाहर हो चुकी हैं उनको कुरेदकर क्या फायदा? जानती हो मैंने क्या क्या नही किया लेकिन हारकर अब मन को मना पाया हूँ कि दुनियां में कुछ चीजें ऐसी होती हैं कि उन्हें हम बदल नही सकते हैं। अब तो एक ही बहाना है कि किसी तरह से बच्चों का बुरा न हो। सच कहूँ तो बच्चों के भविष्य और उनकी सलामती के लिए एक छत के नीचे रह रहे हैं।
हूं। लेकिन क्या तुम्हें नही लगता कि इस तरह अजनबियों की तरह रहना ठीक होगा?
अजनबियों की तरह? इसमें बुरा क्या है? लोग भी तो एक ही बस में, एक ही रेल में घंटों तक अजनबियों की तरह यात्रा करते हैं। मैं तो इसे इतना ही समझता हूँ कि रात को सोने के लिए घर आ जाता हूँ खाना मिल जाता है कपड़े धुले मिल जाते हैं और क्या करना है?
अरे बस यही चाहिए?
और?
और भावनायें और इमोसन्स का क्या?
सच कहना, आज के जमाने में कोई किसी की भावनाओं और इमोसन्स की परवाह करता है?
अरे मैं औरों की बात नही कर रही हूँ। जब हम एक ही परिवार में रहते हैं तो फिर पति-पत्नी के बीच भावनात्मक संबंध तो होने ही चाहिए नां
भावनात्मक संबंध? अरे जब रिश्ता ही भावनाओं को  दबाकर हुआ हो तो उसमें भावनात्मक संबध और इमोशन्स कहां से रहेंगे?
तो उस समय विरोध क्यों नही किया तुमने?
विरोध? सब कसाई की तरह खेड़े थे नाते रिश्तेदार। सबके सब इस तरह कर रहे थे कि जैसे इसके बराबर लड़की पूरे ब्रह्माण्ड में न हो या मुझे इसके अलाव कोई लड़की मिलने वाली नही है। वास्ता दिया गया था तब परिवार, नाते रिश्तों और खून का। तब मैं असहाय था और हां कहने के सिवाय कुछ नही कर पाया था।
तो अब क्यों रोते रहते हो?
रो नही रहा हूँ।
इसे रोना ही कहते हैं। सुनों अब भलाई इसी में है कि चुपचाप अपनी गृहस्थी में जमे रहो और किसी प्रकार का दंश मत पालों। यह किसी के लिए भी उचित नही है। जितना हो सके जीवन को आराम और आनन्द से जियो।
हां तुम कह तो सही रही हो। कहोगी भी क्यों नही समाजशास्त्र की प्रवक्ता हो ना, तुम प्रैक्टीकल से अधिक थ्योरी पर जोर देती हो।
मैं तुम्हें पढ़ा नही रही हूँ।मैं तो कह रही थी कि हो सके तो सुलह करलो।
सुलह? क्या मैंने कोई कारिगिल छेड़ा है? या शिमला समझौंते का उलंघन किया है? इतने साल से मैं सुलह के अलाव क्र ही क्या रहा हूँ? तुम सोचती हो कि मैंने अपनी तरफ से किसी तरह की कमी रखी होगी? नही ऐसा नही है मैंने हर वो प्रयास किया है जो कोई नही करता है। जानती हो मैंने हर तरह से समझौता किया लेकिन जानती हो न कि जिसने नही सुधरना है उसके लिए तुम अपनी जान भी दे दो ना तो कम ही है। इसलिए अब इसे अपनी नियति मानकर चल रहा हूँ। हॉं एक तुम हो जिससे मैं अपना दर्द बता देता हूँ, नही तो आज के जमाने में दूसरों के दर्द सुनने और समझने की फुरसत किसे हैं? अब जीवन में दर्द के सिवाय रह ही क्या गया है?
तुम कैसे इंसान हो इतनी बातें की दर्द से शुरू की और फिर दर्द पर आकल अटक गये?
क्या करूं? दर्द ही है जो अब मेरे जीवन का संगी साथी हैं। जानती हो ये दर्द ही है जो अपना फर्ज सिद्दत के साथ निभाता है और कभी भी दगा नही करता है। इसके अलाव  आदमी का क्या भरोसा कब धोखा दे जाए। आज तो अपना साया ही जब साथ नही देता तो दूसरों से क्या कामना की जा सकती है।
कभी कभी तुम बहुत ही दार्शनिक बातें करते हो और कभी-कभी छोट बच्चों की तरह उदास हो जाते हो ऐसा क्यों?
मुझे खुद पता होता तो फिर बात ही क्या थी लेकिन मैं तो इतना जानता हूँ कि जब दर्द उठता है तो एक तड़प उठती है जो मुझे अन्दर तक हिला देती है और जब अपने दर्द को थोड़ा राहत देता हूँ तो लगता है कि आराम है। बस यही दर्द है जो कम ज्यादा होता रहता है लेकिन सदा ही मेरे साथ बना रहता है। जानती हो दुनियां में सब का अपना अपना दर्द होता है। किसी का कुछ न मिलने का दर्द, किसी का कुछ होने के बाद भी दर्द और किसी का दर्द न होने का दर्द। लेकिन मैं मानता हूँ कि दर्द हर किसी को है। कुछ सहा जाता है कुछ नही सहा जाता है। लेकिन यही दर्द है जो हमारे साथ है  हमेशा से ही हमेशा के लिए।

हां तुमसे कौन जीत पाया है। दर्द तो है लेकिन अलग-अलग।

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                                            दो लघु कथाएं


                                                                                                                                                                                  - देवी नगरानी

समय की दरकार

समय  की कद्र वो ही जानते हैं जो समय की पाबंदिओं का पालन करते हैं और उस दौर में अपना लक्ष्य भी हासिल करते हैं. समय के सैलाब में बहते हुए हम कभी दो पल रुककर ये नहीं सोचते की यह समय भी रेत की तरह हमारी बंद मुठियों से निकला जा रहा है. जाना कहाँ है, जा कहाँ रहे हैं? शायद वक्त की धाराओं के साथ बेमकसद ही रवां हो रहे हैं.

      इस समय के सिलसिले में एक सुना हुआ किस्सा याद आया- एक बच्चे  ने एक दिन अपने पिता से, जो काम से थका हारा लौटा था पूछा-" पिताजी आपको घंटे के काम के लिए कितने डालर मिलते हैं?" अजीब सवाल में न उलझ कर पिता ने कहा " २५ डालर."

बेटे ने पिता से जिद की कि वह उसे १० डालर दे. पिता ने दे तो दिए पर वह सोचने लगा - "कभी न मांगने वाला बेटा ये कैसी फरमाइश कर बैठा है?"  कुछ सोचकर वह बेटे के कमरे में गया तो देखा वह कुछ डालर उन दिए हुए पैसों में जोड़ रहा था.

"क्या कर रहे हो? क्यों चाहिए तुम्हें इतने पैसे." पिता ने जानना चाहा. बेटे ने २५ डालर पिता कि ओर बढ़ाते हुए कहा " पिताजी क्या कल आप ऑफिस से जल्दी आकर मेरे साथ खाना खा सकते हैं, ताकि हम एक घंटा साथ-साथ बिताएं, यह $२५ मैंने उसीके लिए जमा किये हैं."

समय का मूल्यांकन तो उस मासूमियत ने लगाया जिसे समय कि दरकार थी, दौलत कि नहीं!!!


॰॰.






दो गज़ ज़मीन चाहिए

 सुधा अपनी सहेलियों के साथ कार के हिचकोलों का आनंद लेती हुई खुशनुमा माहौल का भरपूर आनंद लुटा रही थी. अक्टूबर का महीना, कार के शीशे बंद, दायें बाएँ शिकागो की हरियाली अपने आप को जैसे इन्द्रधनुषी रंगों का पैरहन पहना रही हो.

       जान लेवा सुन्दरता में असुंदर कोई भी वस्तु खटक जाती है; इसका अहसास उसे तब हुआ जब उसकी सहेली ने रास्ते में एक ढाबे पर चाय के लिए कार रोकी. चाय की चुस्की लेते हुए उसी सहेली ने जिसकी कर थी, अपने बालों को हवा में खुला छोड़ते हुए चाय के ज़ायके में कुछ घोलकर कहा -

‘सुधा, अपनी कार का होना कितना जरूरी है, जब चाहो, जहाँ चाहो, आनंद बटोरने चले जाओ. यह एक जरूरत सी बन गई है. बिना उसके कहाँ बेपर परिंदे उड़ पते हैं?’

सुधा नज़र-अंदाज़ न कर पाई. तीर निशाने पर बैठा था. अपनी औकात वह जानती थी और उसीका परिचय सभी सहेलियों से बिना किसी मिलावट के अपनी मुस्कान के साथ कराते हुए कहा, “मैं ज्यादा पैसे वाली तो नहीं, पर मुझे अपनी ज़रूरतों और दायरों का अहसास है. उन्हीं कम ज़रूरतों ने मुझे सिखाया है कि मुझे फ़क़त दो गज़ ज़मीन चाहिए.”

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                                                     सरोकार


                                                                                                                                                                         डॉ० वीरेन्द्र सिंह यादव

वर्तमान परिपेक्ष्य में बलात्कारों में वृद्धि के कारण एवम समाधान 

सत्य अहिंसा परमोधर्मा की नीति पर चलने वाले देश में जहाँ वर्ग भेद के आधार पर हिंसा की जाये, इससे दु:खद एवं जघन्य अपराध कुछ नहीं हो सकता! जहाँ अर्द्ध नारीश्वर के रूप में पूजी जाने वाली महिलाओं पर जब अर्द्धमानव हिंसक व्यवहार करता है, तब अन्य समाजों से हम श्रेश्ठ होने का दावा एवं दम्भ भरने का नाटक क्यों करते हैं, डब्ल्यू यंग का मानना है कि बलात्कार एक ऐसा अनुभव है, जो पीड़िता के जीवन की बुनियाद को हिला देता है। बहुत सी स्त्रियों के लिए इसका दुश्परिणाम लम्बे समय तक बना रहता है, व्यक्तिगत सम्बधों की क्षमता को बुरी तरह प्रभावित करता है, व्यवहार और मूल्यों को बदल आंतक पैदा करता है।आज सम्पूर्ण विश्व में महिलाओं के विरूद्ध हिंसा (बलात्कार) की घटनाओं में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जा रही है। अध्ययन एवं सर्वेक्षण इस बात के प्रबल साक्षी हैं कि भारत में महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं अन्य देशों की अपेक्षा अधिक संख्या में तेजी के साथ बढ़ रही हैं। हमारी सामाजिक संरचना की कमजोरी कहें या बाहरी डर जिसके कारण महिलाएं अपने ऊपर होने वाले हिंसक व्यवहार (बलात्कार) या अपराधों को पारिवारिक और सामाजिक मर्यादा के कारण चुपचाप सह लेती हैं और इसे सगे सम्बन्धियों तक से छिपा जाती हैं इसके साथ ही झिझक, लाज- शर्म, भय के कारण, महिला-उत्पीड़न की कुछ घटनाऐं थाने में दर्ज नहीं की जातीं , कोर्ट में न्याय की देरी, संरक्षकों की बदनामी के वजह से आपस में समझा बुझाकर या ले-देकर मामला रफा-दफा कर दिया जाता है। धर्म युग १ दिसम्बर १९९२ में सुदर्शना द्विवेदी ने ठीक ही लिखा है कि यदि सूरज पर राहु ग्रहण लगाता है तो कुछ देर बाद वे मुक्त हो जाते हैं पर बलात्कार का राहु यदि किसी नारी के जीवन पर ग्रहण लगा ले तो ऐसी लंबी काली अंधकार की त्रासद चादर उसे घेरती है जिससे ता उम्र वह निकल नहीं पाती । उसका तन लुटता है, उसका मन छटपटाता है, मगर समाज के किसी कोने से उसके लिए सहानुभूति, सम्मान और प्यार के दो बोल नहीं निकलते। बात फुसफुसाहटों और चेमेगोइयों का केन्द्र बन जाती है। कसूर किसी का और सजा कोई भुगते, ऐसा अन्याय बलात्कार के अलावा किसी अपराध में नहीं होता और सबसे अजीब बात यह है कि कालिख बलात्कारी के बजाय उस नारी के माथे पर लग जाती है। उसकी ही नहीं उसमें पूरे परिवार की प्रतिश्ठा इस जघन्य दुश्कृत्य के परिणाम स्वरूप धूलधूसरित हो जाती है, इतनी कि उसके अपने भी क्षुब्ध होकर बोल उठते है; कलमुँही तू मर क्यों नहीं गई; मौत तो सिर्फ शरीर की होती है, बलात्कार तो अस्मिता को भी चूर-चूर कर देता है और आत्मसम्मान को भी!
बलात्कारों में वृद्धि के कारण- वर्तमान परिप्रेक्ष्य की बात करें तो बलात्कारों में वृद्धि की घटनाओं के पीछे हमारी उपभोक्तावादी संस्कृति, संस्कार के साथ-साथ पाशविक मनोवृत्ति और लगातार बढ़ रहे नगरीकरण, औद्योगीकरण तथा भूमण्डलीकरण प्रमुख रूप से उत्तरदायी हैं। इसके साथ ही संचार माध्यमों में बढ़ते सेक्स और हिंसा का प्रदर्शन, अश्लील यौन साहित्य, फिल्म, वीडियो आदि का प्रदर्शन बलात्कार की घटनाओं को अंजाम देने में प्रमुख भूमिका एवं उत्प्रेरक का कार्य करते हैं। जब हमारा समाज स्वदेशी-विदेशी फिल्मों में पुरूश-महिला के अंतरंग प्रेम सम्बधों को पर्दे पर देखता है तब उसी का अनुसरण करने में ऐसे लोग अपने जीवन में उतारने में जरा भी संकोच नहीं करते अर्थात् कुछ हद तक मीडिया ने बलात्कार को अर्थात् नारी देह को मुक्त रूप से भोगने को व्यापक सामाजिक स्वीकृति दे दी है। इसे एक मनोवैज्ञानिक एवं मानवोचित कमजोरी कहें तो जायज है कि जिसे फिल्मों में देखने में ऐतराज नहीं है, उसे यथार्थ में भी उतारने में झिझक नहीं रह जाती है। जहाँ एक ओर फिल्मों में उत्तेजक यौन हरकतें, विज्ञापनों में नारी केवल मौज-मस्ती का साधन, उत्तेजित करने वाली और कामुक अदाओं से लुभाने वाली नजर आती हैं वहीं दूसरी ओर अक्षत योनि की आदिम आकाँक्षा और विक्षिप्त यौन कुण्ठाएं भी बलात्कार को बढ़ावा देती हैं।
महिलाओं के विरूद्ध बलात्कार की प्रमुख मनोवैज्ञानिक प्रकृति एवं उद्दे य निम्न हैं-कामवासना, आपराधिक मानसिकता, पुरूशों के झूठे अहम का वहम, हीनभावना का शिकार एवं अवसाद ग्रस्तता मानसिक रूप से कमजोर अथवा मनोरोगी, शंकालु स्वभाव के व्यक्ति ऐसी घटनाओं को अंजाम देते हैं। इन बलात्कार की घटनाओं को अंजाम देने वाले अक्सर पंडित, पुरोहित, पुजारी, नजदीकी रिश्तेदार, दोस्त या परिचित होते हैं। वकील, मालिक, अड़ोसी-पड़ोसी, सौतेले  पिता,  भाई, चाचा, मामा, नाना, ताऊ वगैरह के द्वारा भी बलात्कारों की संख्या में निंरतर वृद्धि हो रही है। खुले समाजों में भी ऐसे बलात्कार बढ़ रहें हैं, जो स्त्री पर तरह-तरह के अप्रत्यक्ष दबाव डालकर किए जाते हैं। पद, पैसे और कैरियर का प्रलोभन अक्सर स्त्रियों की सहमति पाना आसान कर देता है। अर्थात् अपना ही घर आज बहू- बेटियों के लिए हिंसा और वध स्थल बनता जा रहा है।
बलात्कार की इन घटनाओं के पीछे हमारे सामाजिक ढ़ांचे में कुछ मर्यादित कमजोरियों के साथ-साथ, पुलिस कार्यवाही में ढीला-ढाली एवं राजनीतिक दबाव, न्याय व्यवस्था का दोशी, विशेशकर न्यायालय में पीड़ित महिला से उल्टे सीधे सवाल-जबाव क्योंकि जिस अभागिन के साथ बलात्कार होता है, वह कौमार्य अथवा सतीत्व भंग की क्षति ही नहीं सहती, गहन भावनात्मक दंश, मानसिक वेदना, भय, असुरक्षा और अविश्वास प्राय: आजीवन उसका पिण्ड नहीं छोड़ते। ऐसी महिलाएं अपना दु:खड़ा अंतरंग-से-अंतरंग के समक्ष भी रो नहीं पातीं! वक्त के साथ उनका एकांकीपन भी बढ.ता जाता है और जीवन का बोझ भी, जबकि बलात्कारी पीड़ित महिला के साथ अक्सर न्याय व्यवस्था भी उसका शीलभंग करने में सफल हो जाता है। और कोई भी उसका बाल तक बांका नहीं कर पाता। शायद इसके पीछे मुख्य कारण यह रहता है कि बलात्कार के मुकदमों में अधिकाँश अभियुक्त पैसे के बल पर योग्य वकील ढूढ़ता है, जो उसे कानूनी शिकंजे से निकाल ले जाने का कोई-न-कोई रास्ता खोज ही निकालता है क्योंकि न्याय और कानून में बच निकलने के तमाम रास्ते वाकायदा मौजूद हैं। न्याय और कानून की इस प्रक्रिया में महिलाओं को अपने साथ हुए बलात्कार की इन घटनाओं को छुपा लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं छोड़ती। यही कारण है कि सरकारी आंकड़ों में वह तस्वीर (बलात्कार) ही नहीं आ पा रही है जो आनी चाहिए क्योंकि बलात्कार की शिकार हुई महिला चुप्पी साधने में ही अपना हित समझती है और शायद यही कारण है कि बलात्कार की शिकार हुई महिलाओं की यही चुप्पी बलात्कारियों के दुस्साहस को दिन-प्रतिदिन बढ़ा रही है। अरविन्द्र जैन का मानना है इधर पिछले कुछ सालों में छोटी उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार के मामले लगातार बढ़े हैं जो निश्चत रूप से भयावह और चिंताजनक हैं। समाचार पत्रों में आये दिन ऐसे समाचार; समाज में बढ़ रही भयंकर मानसिक बीमारी का प्रमाण हैं। गुड़ियों के संग खेलने की उम्र में बच्चों के साथ बलात्कार जैसे घृणित और संगीन अपराध बढ़ रहे हैं। बच्चों से बलात्कार घृणित  जघन्यतम अपराध है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वयस्क महिलाओं से बलात्कार कम घृणित है। बच्चों से बलात्कार में बढोत्तरी का एक कारण यह भी है कि युवा लड़कियाँ, बच्चियों की अपेक्षा अधिक विरोध कर सकती हैं, चीख सकती हैं और शिकायत कर सकती हैं। बलात्कारी पुरूश सोचता है बच्चे बेचारे क्या कर लेगें?  विशेशकर जब बलात्कार घर में पिता, भाई, चाचा, ताऊ या अन्य रिश्तेदारों द्वारा किया गया हो। निर्धन परिवारों की कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएं अधिक होती हैं लेकिन अब मध्यम और उच्चवर्ग में भी बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं। सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि नाबालिग बच्चों द्वारा कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार के मामले भी लगातार बढ रहे हैं। फिल्मों, टी०वी० और पत्र-पत्रिकाओं में बढती नग्नता और सेक्स व हिंसा का अस्त्र किशोरों में तेजी से बढ़ रहा हैं। दूसरी तरफ एक सर्वेक्षण के अनुसार अधिकांश बलात्कारी कानून के किसी-न-किसी चोर-दरवाजे से भाग निकलते हैं। अक्सर देखा गया है कि अभियुक्त सारा अपराध पीड़िता के सिर मढ़ देता है और कहता है कि जो कुछ हुआ उसकी मर्जी अथवा सहमति से हुआ। अपने बचाव के लिए वह प्रत्यारोप तक लगा देता है कि पीड़ित संभोग की आदी थी या बदचलन थी। परिणाम यह होता है कि तर्क हर बार  जीत जाता है और पीड़ा हार जाती है।
    उबाऊ, थकाऊ और घर-बिकाऊ न्याय व्यवस्था में गरीब आदमी को महसूस होने लगा है कि इतनी इज्जत तो तब भी खराब नहीं हुई थी जब उसकी बहू-बेटी के साथ बलात्कार हुआ जितनी अब यहाँ इन कोर्ट-कचहरियों में उसकी हो जाती है। वास्तव में बलात्कार से अधिक बलात्कार होने का एहसास तब होता है जब मुकदमों के दौरान भरी कचहरी में विरोधी वकीलों के तर्कों का जबाब देना पड़ता है। ऐसी हालत में खुद बलात्कार की शिकार महिला हो या गवाह; दोनों टूट जाते हैं।बलात्कारी रिहा होने के बाद मूछों पर ताव देकर शान से घूमता है और आंतकित बूढ़े गरीब बाप को डूब मरने के लिए कुआं-बावड़ी तक नहीं, क्योंकि डर लगता है कि कहीं बच गया तो आत्महत्या करने के प्रयास के अपराध में उसे ही जेल भेज दिया जाएगा ।
वर्तमान की बात करें तो आज सामाजिक-आर्थिक विशमता के परिवेश में साधन सम्पन्न व्यक्तियों द्वारा भी कमजोर वर्ग की महिलाओं पर बलात्कार के मामले निरन्तर बढ़ रहे हैं। ऐसे व्यक्तियों द्वारा किये जाने वाले अपराधों में पुलिस की भूमिका कम संदिग्ध नहीं होती क्योंकि उन पर हाथ डालने पर पुलिस पर राजनीतिक दबाव भी पड़ सकता है।
बलात्कार रोकने के समाधन-सुसन बाउन मिलर (अगेंस्ट आवर बिल: मैन, विमेन एण्ड रेप, १९७५) का यह कहना सही है कि बलात्कार अपराध नहीं है; बल्कि पुरूशों द्वारा औरतों को इस खतरे का हौआ दिखाकर लगातार भयभीत रखना-भर प्रतीत होता है। कुछ व्यक्तियों ने बलात्कार करके समस्त स्त्री समाज को निरन्तर मुट्ठी में रखने का मानो  षडयंत्र भर रचा हुआ है क्योंकि बलात्कार शारीरिक अथवा मानसिक रूप से नारी को लगातार एहसास कराता रहता है कि गलती उसी की है। जबकि बलात्कार उस पर जबरन लादा जाता है। जब तक बलात्कार के संदर्भ में कानून और समाज का दृश्टिकोण और परिपे्रक्ष्य नहीं बदलता, तब तक बलात्कार से पीड़ित नारी स्वयं समाज के कठघरे में अभियुक्त बनकर खड़ी रहेगी।
बलात्कार जैसे जघन्य एवं अमानवीय घटनाओं को रोकने के लिए भारतीय दंड सहिता में अनेक कानूनी प्रावधान हैं परन्तु भारतीय न्याय व्यवस्था में इसका अनुपालन अन्य विधियों की अपेक्षा मंद एवं शिथिल दिखता है। हालांकि आई० पी० सी०, न्याय व्यवस्था के तहत बलात्कार को संज्ञेय और गैर जमानती अपराध मानता है। सन् १९८३ के अपराधिक कानून (संशोधन अधिनियम) के तहत महिलाओं को बलात्कार के शिकार होने से बचाने में संशोधन किया गया। भारतीय दण्ड संहिता की धारा ३७६ में दोशी को कठिन दंड का प्रावधान किया गया। विशेशतया कर्मचारियों, जेल निरीक्षकों के लिए। वहीं धारा २८६ बलात्कार के शिकार का नाम प्रकाशित करने पर रोक लगाती है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा १११(अ) दोशी पर आरोपों को सिद्ध करने की जिम्मेदारी को व्यक्त करती है। जहाँ एक ओर सर्वोच्च न्यायलय ने अपने निर्णय में स्पश्ट किया है कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध में परिपुश्टि की आव श्यकता नहीं है, वहीं दूसरी ओर राजनेताओं द्वारा बलात्कारी को मृत्यु दण्ड दिए जाने की मांगे भी उठने लगी हैं और मलिमथ कमेटी भी गठित होने के बाद  भी बलात्कारी  को फाँसी तक पहुचाँने का प्रावधान अधर में लटक गया। आखिरकार कहाँ और किससे चूक हो जाती है? १९८३ में एक मुकदमें का फैसला देते हुए न्यायमूर्ति ए०पी० सेन और ए०पी० ठक्कर ने कहा कि वर्तमान भारतीय परिवेश में जब भी कोई महिला या लड़की बलात्कार के मामलें को सामने लाती है तो वह निश्चित रूप से अपने परिवार, मित्रों, सम्बंधियों, पति, भावी पति आदि की नजरों में गिरने, घृणा की पात्र बनने जैसे खतरे उठाकर ही अदालत का दरवाजा खटखटाती है। ऐसे में संभावना अधिकतर इस बात की होती है कि यह मामला सच है, झूठा नहीं ।
   ऐसे कानूनों के रहते हुए भी बलात्कार पीड़ितों के लिए न्याय पाना मुश्किल ही नहीं वरन् (जुम्मनखान १९९१ को ही केवल फांसी के बदले आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई) असम्भव प्रतीत होता है। इस परिप्रेक्ष्य में अरविन्द जैन का मानना है कि वयस्क और विवाहित महिलाओं के मामले में अधिकतर अपराधी इस आधार पर छोड़ दिये जाते हैं कि संभोग सहमति से हुआ क्योंकि महिला के वक्ष, नितंब या योनि पर कोई चोट के निशान नहीं हैं और महिला संभोग की आदी है। पुलिस द्वारा खोजबीन और गवाहियों में दस घपले, अदालत में बहस के दौरान कानूनी नुक्ते और अनेक खामियों से भरे मौजूदा कानूनों की वजह से ज्यादातर अभियुक्त बरी कर दिए जाते हैं।वास्तव में देखा जाए तो अदालत की ओर ले जाया जाता हुआ बलात्कारी वह अभिशप्त आदमी है, जिसकी पीठ पर पूरी सभ्यता का कूबड़ है।
बलात्कार के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कुछ भी कारण हों परन्तु मूल कारण यही लगता है कि हमारा परम्परावादी समाज बलात्कार की शिकार महिला के साथ वास्तविक सहानुभूति नहीं रख पाता। इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारी परम्पराएं पितृसत्तात्मक होने के कारण स्त्री की अपेक्षा पुरूश को महत्व देती है।पत्रकार गणेश मंत्री का मानना है कि आर्थिक विशमताओं के साथ ही हमारी समूची सामाजिक सोच, प्रत्यक्ष जीवन में व्याप्त स्त्री सम्बन्धी धारणाएं, उनको पुरूश से हीन मानने की सदियों से चली आ रही परम्पराएं स्त्री पर अधिकार और कब्जे को अपनी शक्ति का घोतक मानने की प्रवृत्ति भी स्त्रियों पर अत्याचार के मूल में है। बलात्कार भी उसी की एक परिणति है। आज इसके लिए आवश्यक हैं कि पुरूश और महिला के दृश्टिकोण में बदलाव के साथ-साथ सामाजिक प्रतिश्ठा की नींव कौमार्य से हटाकर उसकी उपलब्धियों एवं सफलता को आगे रखने की परम्परा को आगे बढाया जाए। इससे मनौवैज्ञानिक रूप से बलात्कारियों को दंडित करने में अधिक सुविधा होगी।
 महिलाओं के प्रति पुरूश सदस्यों के मनोभावों और सोच में बदलाव सर्वोपरि है, इसके साथ ही महिलाओं में जागरूकता के साथ अपने नैसर्गिक और कानूनी अधिकारों की जानकारी भी आवश्यक है। दूसरे स्तर पर आत्मरक्षार्थ हेतु महिलाओं को एन०सी०सी० और ताइक्वाडों भी सीखने पर बल देना होगा। आत्मरक्षा की यह शिक्षा सरकारी, गैर सरकारी संगठनों के अलावा घर के सदस्यों के द्वारा भी दी जा सकती है। इसके अलावा स्कूल कालेज की लड़कियों, कामकाजी महिलाओं , स्वयंसेवी  संस्थाओं के प्रतिनिधियों, डाक्टरो, वकीलों और महिला पुलिस को इस तरह के प्रशिक्षण दिए जा सकते हैं।
 सरकारी स्तर पर बलात्कार की घटनाओं को रोकने के लिए पुलिस प्रशासन में महिलाओं की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि की आवश्यकता होनी चाहिए। अपराधों को रोकने के लिए क्राइम अगेंस्ट वुमेन सेल का गठन अनिवार्य होने चाहिए। साथ ही अधिकाधिक महिलाओं की पुलिस बल में बहाली के साथ-साथ महिलाओं पर होने वाले बलात्कार जैसे अपराधों को निपटाने हेतु महिला पुलिस की ही व्यवस्था होनी चाहिए। इन घटनाओं को रोकने के लिए जरूरी है न्याय व्यवस्था में सुधार ताकि मामलों का निपटारा शीघ्र हो सके। महिलाओं पर होने वाले न्यायिक प्रकरणों को विशेश अदालतों के माध्यम से तुरन्त न्याय हेतु महिला जांच ब्यूरो जैसे विभागों की स्थापना में महिलाओं की भूमिका सुनिश्चित कर आवश्यक कदम उठाए जाएं।
   अश्लील साहित्य पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ अश्लील विज्ञापनों, टेलीविजन पर दिखाये जाने वाले कार्यक्रम सीरियल फिल्मों के साथ-साथ महिलाओं की छवि बिगाड़ने वाली ऐसी सामग्री जिससे मनोविकार पैदा होते  हों, सरकारी स्तर पर उसे प्रतिबंधित किया जाए। बलात्कार से पीड़ित महिलाओं के प्रति गैर सरकारी स्तर पर भी स्वयं सेवी संस्थाए भी महत्वपूर्ण भूमिका का निवर्हन कर सकती हैं जो व्यक्तिगत तौर पर पीड़ित परिवार एवं महिला के प्रति सहानुभूति दिखाकर पुलिस एवं अदालत में न्याय दिलवाने का सुरक्षा के साथ इन्तजाम कर सकें। ऐसी संस्थाएं जो पीड़ित महिलाओं को निशुल्क कानूनी सहायता पहुचाएं उसका सरकारी स्तर एवं सामाजिक चिन्तकों के द्वारा विस्तार एवं प्रचार अवश्य होना चाहिए। इन सबका प्रचार-प्रसार पत्र-पत्रिकाओं, पर्चों, संचार माध्यमों आदि के द्वारा भी किया जा सकता है।
   निश्कर्श रूप में यह कहा जा सकता है कि बलात्कार सिर्फ एक स्त्री के विरूद्ध ही अपराध नहीं बल्कि समस्त समाज के विरूद्ध अपराध है। यह स्त्री की सम्पूर्ण मनोभावना को ध्वस्त कर देता है और उसे भयंकर भावनात्मक संकट में धकेलता है, इसलिए बलात्कार सबसे घृणित अपराध है। यह मूल मानवाधिकारों के विरूद्ध अपराध है और पीड़िता के सबसे अधिक प्रिय अधिकार का उल्लंघन है: उदाहरण के लिए जीने का अधिकार जिसमें सम्मान से जीने का अधिकार शामिल है।वर्तमान का कानून भारतीय महिलाओं को कानूनी सुरक्षा कम देता है, आंतकित, भयभीत और पीड़ित अधिक करता है। कानून में संशोधन के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि समाज और न्यायधीशों का दृश्टिकोण भी बदले। स्वतंत्रता के बाद सत्ताधारी वर्ग ने संसद में बैठकर अपने वर्ग हितों की रक्षा के लिए राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर जितने नये कानून बनाए हैं उसकी तुलना में समाज, नारी, किसान, मजदूर और बाल कल्याण के मामलों पर बनाए गए कानून बहुत ही कम हैं और जो कानून बनाए भी गये  हैं वे बेहद अधूरे और दोशपूर्ण हैं। न जाने सरकार, अदालत, कानूनविद्, महिला संगठन और स्वयंसेवी महिलाएं आखिर कब तक गूंगी, बहरी और अंधी बनी रहेंगी? सब चुप क्यों हैं? कोई भी कुछ बोलता क्यों नहीं? आज आवश्यकता इस बात की है कि कानून व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन के साथ-साथ जरूरी है सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक सोच में बदलाव। बलात्कारियों को मृत्यु दंड की हवाई घोशणाओं से क्या होना है? बलात्कार के ये आंकड़े और आंकड़ों की तुलनात्मक जमा-घटा सिर्फ संकेत मात्र है। स्त्री के विरूद्ध पुरूश द्वारा की जा रही यौन-हिंसा की वास्तविक स्थिति सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक विस्फोटक, भयावह  और खतरनाक है। आखिर बापू के तीनों बंदर कब तक मुँह, कान और आँखों पर हाथ धरे बैठे रहेगें?

-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                                                       रागरंग


                                                                                                                                                                                     - कवि कुलवंत

काले धन एवं नकली नोटों से छुटकारा-भ्रष्टाचार पूर्णतः खत्म

प्राय: सभी देशों की सरकारों का एक रोना साझा है. और वो भी अति भयंकर रोना! देश की अर्थ व्यवस्था में कला धन. यह काला धन बहुत से देशों को, बहुत सी सरकारों को बहुत रुलाता है. और बुद्धिजीवी वर्ग को अत्यंत चिंतित करता है. अर्थशास्त्रियों की नाक में दम करके रखता है. रोज नए नए सुझाव दिए जाते हैं, विचार किए जाते हैं कि किस तरह इस काले धन पर रोक लगाई जाए. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट तो छापों में विश्वास रखता है, जहाँ कहीं सुंघनी मिली नहीं कि पहुँच गए दस्ता लेकर. अजी! काले धन की बात तो छोड़िए! नोटों को लेकर इससे भी बड़ी समस्या का सामना कई देशों को करना पड़ता है, और वो है नकली नोटों की समस्या. दूसरे देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करना हो याँ बेहाल करना हो, प्रिंटिंग प्रेस में दूसरे देश के नोट हूबहू छापिए और पार्सल कर दीजिए उस देश में. बस फ़िर क्या है - बिना पैसों के तमाशा देखिए उस देश का. अब तो उस देश की पुलिस भी परेशान. गुप्तचर संस्थाएं भी परेशान और सरकार भी परेशान! नकली नोट कहां कहाँ से ढ़ूंढ़े और किस जतन से? बड़ी मुश्किल में सरकार.
बचपन से छ्लाँग लगाकर जब हमने भी होश सँभाला तो आए दिन काले धन की बातें पढ़कर, सुनकर, और नकली नोटों की बातें अखबारों में पढ़कर और टी.वी. में देख सुनकर, सरकारों की, अर्थशास्त्रियों की चिंता देख सुनकर हमें भी चिंता सताने लगी. लेकिन हमारे हाथ में तो कुछ है नही जो कुछ कर सकें. बस कुछ बुद्धिजीवियों के बीच बैठकर चाय-पानी या खाने के समय लोगों से चर्चा कर ली. अपनी बात कह दी और दूसरे की सुन ली और हो गई अपने कर्तव्य की इतिश्री. लेकिन नहीं यार! अपने में देश-भक्ति का कुछ बडा़ ही कीडा़ है. सो लग गए चिंता में. भले सरकार को हो या ना हो, देशभक्त को ज़रूर चिंता करनी चाहिए और वो भी जरूरत से ज़्यादा. भले अर्थशास्त्री बेफ़िकर हो गए हों! लेकिन नहीं, अपन को तो देश की चिंता है, काले धन की भी और नकली नोटों की भी. लेकिन किया तो किया क्या जाए. दिन रात इसी चिंता में रहते. चिंता में रहते रहते रात में स्वप्न भी इसी विषय पर आने लगे. कल तो हद ही हो गई. एक ऐसा स्वप्न आया कि क्या बताऊँ! पूरे विश्व से कालेधन और नकली नोटों की समस्या जैसे जड़ से ही खत्म हो गई और साथ में भ्रष्टाचार भी समाप्त. आप आश्चर्य करेंगे ऐसा कैसे? आइये विस्तार से बताता हूँ क्या स्वप्न देखा मैने -
मैने देखा कि विश्व की सभी सरकारें इस विषय पर एकमत हो गईं हैं. और सबने मिलकर एक बड़ा महत्वपूर्ण निर्णय लिया है और निर्णय यह कि सभी सरकारें ’करेंसी’ को - सभी छोटे, बड़े नोटों को, सभी पैसों को पूरी तरह से अपने सभी देशवासियों / नागरिकों से वापिस लेकर पूरी तरह से नष्ट कर देंगी. और किसी प्रकार के कोई नोट यां करेंसी छापने की भी बिलकुल जरूरत ही नही है. जिसने जितनी भी रकम सरकार को सौंपी है उसके बदले - एक ऐसा सरकारी मनी कार्ड उनको दिया जायेगा जिसमें उनकी रकम अंकित कर दी जायेगी. सभी नागरिकों को इस मनी कार्ड के साथ साथ एक ऐसा ’डिस्प्ले’ भी दिया जायेगा जिसमें कोई भी जब चाहे अपनी उपलब्ध रकम (धनराशि) देख सकता है एवं अपनी रकम का जितना हिस्सा जिसको चाहे ट्रांसफर कर सकता है. भविष्य में सभी नागरिकों का भले वह व्यवसायी हो, नौकर हो, कर्मचारी हो, अधिकारी हो, मजदूर हो, सर्विस करता हो, बिल्डर हो, कांट्रैक्टर हो, कारीगर हो, सब्जी बेचने वाल हो, माली हो, धोबी हो, दुकानदार हो, यां जो कुछ भी करता हो, यां भले ही बेरोजगार हो, सभी प्रकार का लेन देन उस एक कार्ड के द्वारा ही होगा. पैसों का, नोटों का लेन देन बिलकुल बंद! नोट बाजार में हैं ही नहीं! बस सबके पास एक सरकारी मनी कार्ड!!
भारत सरकार जो अमूनान चुप्पी साध लेती है यां जो कई काम भगवान के भरोसे छोड़ देती है यां जो सबसे बाद में किसी भी चीज को, नियम को यां कानून को कार्यान्वित करती है. लेकिन, इस मामले में तो भारत सरकार ने इतनी मुस्तैदी दिखाई कि पूछिये मत! पता नही कि काले धन से सरकार खूब ज्यादा ही परेशान थी, यां नकली नोटों के भयंकर दैत्याकार खौफ से यां फिर उन राज्नीतिज्ञों से जिन्होंने स्विस बैंकों में अरबों करोड़ रुपये काले धन के रूप में जमा कर रखे हैं. खैर बात जो भी हो, भारत सरकार ने तुरंत आनन फानन में कैबिनेट की मीटिंग की! निर्णय लिया. और संसद में पेश कर दिया! और पास भी करा लिया. कानून बना दिया. निलेकर्णी को बुलाया और निर्देश किया कि जो पहचान पत्र आप देश के सभी नागरिकों को बनाकर देने वाले हो - जिसमें व्यक्तिगत पहचान होगी, घर का, आफिस का पता होगा, फोटो होगी, बर्थ डेट, ब्लडग्रुप एवं अन्य सभी जरूरी जानकारी होगी उसी में यह सरकारी मनी कार्ड भी हो. अब यह नागरिकों के लिये सरकारी पहचान पत्र ही नही बल्कि ’सरकारी पहचान पत्र कम मनी कार्ड’ होना चाहिये. सभी की धनराशि सिर्फ अंकों में (यां रुपयों में) दिखाई जायेगी और देश भर में सभी ट्रांजैक्शन और लेन देन - चाहे वह एक रुपये का हो यां करोड़ों का! प्रत्येक नागरिक द्वारा इसी के द्वारा किया जायेगा. हर एक नागरिक को इस कार्ड के साथ साथ एक डिस्प्ले भी दिया जायेगा. जिसमें वह जब चाहे अपनी जमा धन राशि देख सकता है और इसके द्वारा जमा धनराशि में से जिसके नाम पर, जब चाहे, जितनी भी चाहे धनराशि ट्रांसफर कर सकता है. निलेकर्णी जी तो अपनी टीम के साथ पहले ही तैयार बैठे थे. यह एजेंडा भी उसमें जोड़ दिया गया. अगले तीन वर्षों में यह प्रोजेक्ट पूरी तरह से तैयार हो गया. सरकार ने नोटिस निकाल दिये. सभी अखबारों में, टी वी चैनलों में, हर जगह. लोग अपनी सारी धनराशि/ कैश अपने बैंक अकाउंट में जमा कर दें - भले ही देश भर में आपके कितने ही अकाउंट हों सभी की धनराशि जोड़कर उस सरकारी क्रेडिट कार्ड में इंगित कर दी जायेगी. तीन महीनों के अंदर देश भर में यह व्यवस्था लागू हो गई. सभी को ’सरकारी पहचान पत्र कम मनी कार्ड’ दे दिये गये.
सुबह धोबी मेरे पास आया और मैने क्रेडिट कार्ड से डिस्प्ले में डालकर दस रुपये उसके नाम पर ट्रांसफर कर दिये. थोड़ी देर में दूधवाला आया मैने अपने कार्ड से उसके कार्ड में 24 रुपये ट्रांसफर कर दिये. मेरी पत्नी हाउसवाइफ (ग्रहणी) है. उसने कहा मार्केट जाना है कुछ पैसे दो! मैने अपने कार्ड से उसके कार्ड में 2 हजार रुपये ट्रांसफर कर दिये. मार्केट जाकर उसने सब्जी खरीदी और सब्जी वाले के कार्ड में 240 रुपये ट्रांसफर कर दिये. कुछ मिठाइयां हलवाई के यहां से खरीदीं और 430 रुपये उस दुकान वाले के कार्ड में ट्रांसफर कर दिये. मार्केट में उसने कुछ कपड़े बच्चों के लिये खरीदे और 615 रुपये उसने दुकान के कार्ड में ट्रांसफर कर दिये. ’किराने’ की दुकान से उसने कुछ राशन खरीदा और 315 रुपये उसने उस राशन वाली दुकान के कार्ड में ट्रांसफर कर दिये. कहीं कोई कैश / नकदी का लेन देन नही हुआ. जरूरत ही नही पड़ी. कैश में लेने देन हो ही नही सकता था, अब किसी के हाथ में कोई कैश, रुपया, नोट यां पैसा हो, तब ना! सब तो सरकार ने लेकर नष्ट कर दिये. करेंसी की प्रिंटिंग बिलकुल बंद जो कर दी. मेरा दस वर्ष का बेटा मेरे पास आया और कुछ पैसे मांगे मैने अपने कार्ड से 100 रुपये उसके कार्ड में ट्रांसफर कर दिये.
महीने के अंत में मेरी गाड़ी धोने वाला आया, बर्तन मांजने वाली बाई आयी, घर का काम करने वाली बाई आयी. सबके कार्ड में मैने अपने कार्ड से जरूरत के हिसाब से धनराशि ट्रांसफर कर दी. महीने की शुरुआत होते ही मेरे कार्ड में अपने बैंक में दिये निर्देश के अनुसार मेरी तनख्वाह (सेलरी) में से आवश्यक धनराशि मेरे कार्ड में ट्रांसफर हो गई. बैंक में जाकर पैसे निकलवाने की जरुरत ही नही पड़ी. सारे कार्य यह पहचान पत्र कम मनी कार्ड कर रहा है. और आप चाहें तो भी कैश आप निकलवा ही नही सकते, धनराशि को सिर्फ ट्रांसफर करवा सकते हैं क्योंकि बैंक वालों के पास भी रुपये, नोट हैं ही नहीं. उनके पास भी केवल अंकों में रुपये हैं. आप जितने चाहें फिक्स्ड डिपोजिट करवायें जितने चाहें कार्ड में ट्रांसफर करवायें. हर व्यक्ति को एक ही कार्ड. कार्ड यां डिस्प्ले में कोई तकनीकी खराबी आई तो बस एक फोन किया और आपको दूसरा कार्ड यां डिस्प्ले मुफ्त में दे दिया जायेया.
मुझे घर खरीदना था. बिल्डर से देख कर घर पसंद किया 20 लाख का था. मेरे पास बैंक में जमा धनराशि 5 लाख थी 15 लाख बैंक से लोन लेना है. सारे काम बस उसी पुराने तरी के से हुये, पेपर वगैरह तैयार हुये और बैंक से लोन मिल गया. बिल्डर के कार्ड में 15 लाख बैंक से और मेरे कार्ड/अकांउट से 5 लाख ट्रांसफर हो गये. स्टैंप ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन और अन्य ट्रांसफर चार्जेस सभी कुछ कार्ड से कार्ड के द्वारा ट्रांसफर हुआ. कहीं कोई बलैक मनी न उपजी, न बिखरी, न फैली. अरे यह क्या मुझे तो कोई अंडर टेबल, यां चाय पानी के लिये भी कहीं कुछ पैसा देना नही पड़ा. न ही किसी ने कुछ मांगा. अरे कोई मांगे तो भला कैसे? कैश तो है नही किसी के पास. कार्ड में ट्रांसफर करवायेगा तो मरेगा. संभव ही नही है. क्या बात है! लगता है भ्रष्टाचार भी खत्म होने को है.
प्राइवेट एवं सरकारी कंपनियों एवं उद्यमों को भी इसी प्रकार कार्ड जारी किये गये. जो काम जैसा चल रहा था, वैसा ही चलने दिया गया. बस सभी ट्रांसैक्शन (पैसे का लेन देन) एक कार्ड से दूसरे कार्ड पर होने लगा. शाम को आफिस से बाहर आया तो देखा कांट्रैक्टर मजदूरों को उनकी दिहाड़ी का पैसा उनके कार्ड में ट्रांसफर कर रहा था और बिना कम किये यां गलती के. अरे एक गलती भी भारी पड़ सकती है.
मुझे विदेश जाना था, पासपोर्ट वीजा से लेकर धन परिवर्तन (मनी एक्स्चेंज) सभी कुछ कार्ड में धनराशि के ट्रांसफर द्वारा ही किया गया. विदेश जाने पर वहां की जितनी करेंसी मुझे चाहिये थी अपने कार्ड पर ही मुझे परिवर्तित कर दी गई. वहां पर भी हर जगह बस कार्ड पर ही ट्रांसफर हो रहा था. कहीं कोई परेशानी नही हुई.
किसानों को उनके उत्पाद की पूरी धनराशि बिना किसी कटौती के मिलनी शुरू हो गई. किसान भाई बहुत खुश हुये. सरकारी आफिसों से भी लोग बहुत खुश हो गये, कहीं कोई अपना हिस्सा ही नही मांग रहा. मांगे तो कार्ड में ट्रांसफर करवाना पड़े और करवाये तो तुरंत रिकार्ड में आ जाये, पकड़ा जाये. संभव ही नही है.
सारे काले धन की समस्या! सारे नकली नोटों की समस्या, सब की सब एक झटके में तो ख्त्म हुई हीं. भ्रष्टाचार का भी नामों निशान न रहा. मैने चैन की सांस ली. चलो इस देश-भक्त की चिंता तो खत्म हुई. रुपयों से संबंधित सारी समस्याएं किस तरह एक झटके में हमेशा के लिये समाप्त हो गयीं. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की सरदर्दी तो बिलकुल ही खत्म हो गई. सारे ट्रांसैक्शन वह बहुत ही आसानी से ट्रेस कर पा रहे थे. यहां तक कि उनके अपने लोग गऊ बन गये थे. पुलिस की हजारों हजार दिक्कतें एक झटके में सुलझ गई थीं. हर केस को अब वह आसानी से सुलझा पा रहे थे. हर ट्रांसैक्शन अब उनकी नजर में था. अपराधियों को पकड़ना बहुत ही सरल हो गया था. अपराध अपने आप कम से कम होते गये और न के बराबर रह गये. पुलिस के अपने लोग किसी प्रकार की गलत ट्रांसैक्शन कर ही नही सकते थे, कर ही नही पा रहे थे. सबके सब दूध के धुले हो गये. यां कहिये होना पड़ा. आदमी खुद साफ हो तो उसे लगता है सारी दुनिया साफ होनी चाहिये. जब वह खुद कुछ गलत नही कर सकते थे, तो साफ हो गये, जब खुद साफ हो गये तो समाज को साफ करने लग गये. बहुत जल्द परिणाम सामने थे. ट्रैफिक पुलिस वाले अब अपनी जेबें गरम करने के बजाय सिर्फ कानून यां सरकार की जेब ही गरम कर सकते थे. 
देश में भ्रष्टाचार पूरी तरह से बंद हो चुका था. न्याय व्यवस्था जोकि पूरी तरह से चरमरा गई थी! पुनर्जीवित हो उठी. सभी अधिकारी, पुलिस, नेता, जज, सरकारी कर्मचारी, सबके अकांउट्स क्रिस्टल क्लियर हो गये. रह गई तो बस केवल सुशासन व्यवस्था. यह तो सच ही अपने आप में राम राज्य हो गया. गांधी का सपना सच हो गया.
मैं बहुत खुश हुआ. हंसते हंसते नींद खुली! अखबार में नोटिस ढ़ूंढ़ने लगा. कहीं नहीं मिला. फिर याद आया कि अरे यह तो तीन साल बाद होने वाला है. तो आइये, हम सभी मिल कर तीन साल बाद भारत सरकार द्वारा आने वाले इस नोटिस का इंतजार करें.

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                                                    हास्य-व्यंग्य


                                                                                                                                                                                        कनछेदी राम

मिलना सरकारी कवि से एक दिन

सरकारी कवि या साहित्यकार होने के अपने फायदे हैं। पहला सुख तो यही है कि सरकार समय-समय पर पुरस्कार-पुरस्कार देती रहती है। कभी-कभार लालबत्ती वाली कर भी मिल जाती है।

सरकारी कवि होने की पहली शर्त यह है कि वह चुटकुलों को कविता में पिरोने की मंचीय कला में माहिर हो । चुटकुले सुनाने पर व्यवस्था हँसती है। उसका मनोरंजन होता है। दरअसल व्यवस्था घोटालों में, तिकड़मों में और इसी किस्म के अनेक खटरागों में व्यस्त रहने के कारण अक्सर टेंशन में रहती है। इसलिए उसके लिए वही महाकवि होता है जो उसे खुलकर हंसा सके। सरकार विरोधी रचनाएँ करने वाले तो सत्ता का खून सुखाते हैं। ऐसे लोगों की जगह तो जेल होती है। या फिर कॉफी हाउस वाली कोटे की टेबल, जहाँ बैठ कर वे बड़बड़ करते रहते हैं। कॉफी हाउस का जन्म ही शायद कुछ न कर पाने वाले लोगों के लिए हुआ है। यहाँ बैठो कॉफी पिओ, भँड़ास निकालो और फुस्स् होकर घर चले जाओ।

एक सरकारी कवि के बारे में दूसरे असरकारी कवि ने कुछ इस तरह से एक कविता बनाई कि वे पहले काँग्रेस में थे, अब भाजपा में फिट हैं। दरअसल चमचे हर दौर में हिट हैं। काहे का स्वाभिमान और काहे की खुद्दारी, इन सबसे तो छत्तीस का नाता है। कभी अटलबिहारी इनके काका तो कभी सोनिया माता है।

एक सरकारी कवि मिल गए। हमें देखा तो खिल गए। बोले- लोग मुझे अब महान कवि कहने लगे हैं। देखिए मेरी तकदीर कि पिछली सरकार में खा रहा था मालपुआ और इस सरकार में खा रहा हूँ खीर।

मैने पूछा-बताइये अपनी साधने की कला के बारे में कुछ बताइये न।

वह बोले-देखो भाई, हम कवि नहीं, भाँड हैं। साहित्य की राँड हैं। हमारा न तो दीन है, न ईमान है। बस पैसा ही भगवान है। व्यंग्य आपकी विधा है तो हमारी भी एक विधा है। वह है सु-विधा। हम किसी लफड़े में नहीं पड़ते। न हम सरकार की बुराई करते हैं और न उसपर व्यंग्य कसते हैं। हम तो सबको चुटकुले सुनाते हैं। इसलिए हमारी बातों पर छोटे-बड़े हर नेता हंसते हैं। सारा चक्कर हँसने का ही है। जो जितना अधिक हँसाएगा , उतना पैसा पाएगा। आजकल भ्रष्टाचारियों को हंसी की तलाश है। वे हर घड़ी टेंशनाए घूमते रहते हैं। इसलिए इधर-उधर भाव-विलास और हँसी ठ्ट्टा ढूँढते रहते हैं। मैं पिछली सरकार में भी मसखरा था , इस सरकार में भी मसखरा हूँ । इसलिए सिर से पैर तक सुख-सुविधाओं से भरा हूँ। मैंने यही निष्कर्ष निकाला है कि कविता लिखने में खतरा है जबकि चुटकुले सुनाकर हिट होने की गुंजाइश ज्यादा है। जनता भी पसंद करती है और लरकार भी गले लगाती है। सरकार विरोधी कविताएँ लिखने में भला कौन-सी समझदारी है। देश जब पूरी तरह आजाद हो जाएगा, अभिव्यक्ति पर आईबी, सीबीआई , एऩआईबी और पुलिस के पहरे हट जाएंगे तो अपुन भी अत्याचार के विरुद्ध डट जाएंगे लेकिन अभी तो चाटुकारिता ही महाकाव्य है।

मैंने पूछा-चुटकुलों को साहित्य बनाने और सरकार को हँसाने के लिए क्या करना पड़ता है ?

वह बोले- कुछ नहीं, रीढ़ की हड्डी निकालनी पड़ेगी। आत्मा को कुछ सालों तक गिरवी रखना पड़ेगा। जगह-जगह सरकार की तारीफ में कसीदे पढ़ने पड़ेंगे। बीच-बीच में चुटकुले सुनाकर लोगों को हंसाना पड़ता है। हँसाने की कला में माहिर होने के लिए वर्षों तक अभ्यास करना पड़ता है। आप यह काम शुरू करें। फिर देख तमाशा।

---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                                                          चौपाल


                                                                                                                                                                                 वेद प्रताप वैदिक

अनिवार्य मतदान है लोकशक्ति का शंखनाद

गुजरात विधानसभा ने अनिवार्य मतदान का विधेयक क्या पास किया, सारे देश में हंगामा मच रहा है| सारे देश से इस विधेयक का कोई संबंध नहीं है| यह सिर्फ गुजरात के लिए है| वह भी स्थानीय चुनावों के लिए ! विधानसभा और लोकसभा के चुनाव तो जैसे अब तक होते हैं, वैसे ही होते रहेंगे| यदि उनमें कोई मतदान न करना चाहे तो न करे| सारे देश में अनिवार्य मतदान लागू करना तब तक संभव नहीं है जब तक कि लोकसभा संसद उसकी अनुमति न दे|

             फिर भी सारे देश में प्रकंप क्यों हो रहा है ? शायद इसलिए कि इस क्रांतिकारी पहल का श्रेय नरेंद्र मोदी को न मिल जाए| यह पहल इतनी अच्छी है कि इसके विरोध में कोई तर्क ज़रा भी नहीं टिक सकता| आज नही तो कल, सभी दलों को इस पहल का स्वागत करना होगा, क्योंकि भारतीय लोकतंत्र् में यह नई जान फूंक सकती है| अब तक दुनिया के 32 देशों में अनिवार्य मतदान की व्यवस्था है लेकिन यही व्यवस्था अगर भारत में लागू हो गई तो उसकी बात ही कुछ और है| यदि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र् में मतदान करना अनिवार्य हो गया तो अमेरिका और बि्रटेन जैसे पुराने और संशक्त लोकतंत्र को भी भारत का अनुसरण करना पड़ सकता है, हालांकि भारत और उनकी समस्या एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत है| भारत में अमीर लोग वोट नहीं डालते और इन देशों में गरीब लोग वोट नहीं डालते|

            भारत इस तथ्य पर गर्व कर सकता है कि जितने मतदाता भारत में हैं, दुनिया के किसी भी देश में नहीं हैं और लगभग हर साल भारत में कोई न कोई ऐसा चुनाव अवश्य होता है, जिसमें करोड़ों लोग वोट डालते हैं लेकिन अगर हम थोड़ा गहरे उतरें तो हमें बड़ी निराशा भी हो सकती है| क्या हमें यह तथ्य पता है कि पिछले 62 साल में हमारे यहां एक भी सरकार ऐसी नहीं बनी, जिसे कभी 50 प्रतिशत वोट मिले हों| कुल वोटों के 50 प्रतिशत नहीं| जितने वोट पड़े, उनका भी 50 प्रतिशत नहीं| मान लें कि भारत में कुल वोटर 60 करोड़ हैं| 60 करोड़ में से मानों 40 करोड़ ने वोट डाले| यदि किसी पार्टी को 40 में से 10-12 करोड़ वोट मिल गए तो भी वह सरकार बना लेती है| दूसरे शब्दों में 115 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में सिर्फ 10-12 करोड़ लोगों के समर्थनवाली सरकार क्या वास्तव में लोकतांत्रिक सरकार है ? क्या वह वैध सरकार है ? क्या वह बहुमत का प्रतिनिधित्व करती है ? आज तक हम ऐसी सरकारों के आधीन ही रहे हैं|

          लोकतंत्र् के नाम पर चल रहे इस छलावे से बाहर निकलने का रास्ता क्या है ? रास्ते तो कई हैं लेकिन सबसे पहला रास्ता वही है, जो गुजरात ने दिखाया है| देश के प्रत्येक वयस्क को बाध्य किया जाना चाहिए कि वह मतदान करे| बाध्यता का अर्थ यह नहीं है कि वह इस या उस उम्मीदवार को वोट दे ही| अगर वह सारे उम्मीदवारों को अयोग्य समझता है तो किसी को वोट न दे| परिवर्जन (एब्सटेन) करे, जैसा कि संयुक्तराष्ट्र संघ में सदस्य-राष्ट्र करते हैं| दूसरे शब्दों में यह वोट देने की बाध्यता नहीं है बल्कि मतदान केंद्र पर जाकर अपनी हाजिरी लगाने की बाध्यता है| यह बताने की बाध्यता है कि इस भारत के मालिक आप हैं और आप जागे हुए हैं| आप सो नहीं रहे हैं| आप धोखा नहीं खा रहे हैं| आप यह नहीं कह रहे हैं कि 'को नृप होई, हमें का हानि|' यदि आप वोट देने नहीं जाते तो माना जाएगा कि आप यही कह रहे हैं और ऐसा कहना लोकतंत्र् की धज्जियाँ उड़ाना नही तो क्या है ?

               वोट देने के लिए बाध्य करने का वास्तविक उद्देश्य है, वोट देने के लिए प्रेरित करना| कोई वोट देने न जाए तो उसे अपराधी घोषित नहीं किया जाता और उसे जेल में नहीं डाला जाता लेकिन उसके साथ वैसा ही किया जा सकता है जैसा कि बेल्जियम, आस्ट्रेलिया, ग्रीस, बोलिनिया और इटली जैसे देशों में किया जाता है याने मामूली जुर्माना किया जाएगा या पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस नहीं बनाया जाएगा, सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी, बैंक खाता नहीं खोलने देंगे या चार-पाँच बार लगातार मतदान न करने पर मताधिकार ही छिन जाएगा| इस तरह के दबावों का ही परिणाम है कि अनेक देशों में 98 प्रतिशत मतदाता वोट डालने जाते हैं| इटली में तो अनिवार्यता हटा लेने पर भी 90 प्रतिशत से अधिक मतदान होता है, क्योंकि मतदान करना अब लोगों की आदत बन गया है| मतदान न करना वास्तव में अपने मौलिक अधिकार की उपेक्षा करना है|

            यदि भारत में मतदान अनिवार्य हो जाए तो चुनावी भ्रष्टाचार बहुत घट जाएगा| वोटरों को मतदान-केंद्र तक ठेलने में अरबों रूप्या खर्च होता है, शराब की नदियॉं बहती हैं, जात और मज़हब की ओट ली जाती है तथा असंख्य अवैध हथकंडे अपनाए जाते हैं| इन सबसे मुक्ति मिलेगी| लोगों में जागरूकता बढ़ेगी| वोट-बैंक की राजनीति थोड़ी पतली पड़ेगी| जो लोग अपने मतदान-केंद्र से काफी दूर होंगे, वे डाक या इंटरनेट या मोबाइल फोन से वोट कर सकते हैं| जो लोग बीमारी, यात्र, दुर्घटना या किसी अन्य अपरिहार्य कारण से वोट नहीं डाल पाएँगें, उन्हें कानूनी सुविधा अवश्य मिलेगी| यों भी सारी दुनिया में मतदान के दिन छुट्टी ही होती है| इसीलिए यह तर्क अपने आप रद्द हो जाता है कि गरीब आदमी वोट की लाइन में लगेगा या अपनी रोज़ की रोटी कमाएगा ?

               जिस दिन भारत के 90 प्रतिशत से अधिक नागरिक वोट डालने लगेंगे, राजनीतिक जागरूकता इतनी बढ़ जाएगी कि लोग जनमत-संग्रह, जन-प्रतिनिधियों की वापसी, सानुपातिक प्रतिनिधित्व और सुनिश्चित अवधि की विधानपालिका और कार्यपालिका की मांग भी मनवा कर रहेंगे| जिस दिन भारत की संसद और विधानसभाओं में केवल ऐसे सदस्य होंगे, जिन्हें अपने क्षेत्र्  के 50 प्रतिशत से ज्यादा मतदाताओं ने चुना है, आप कल्पना कीजिए कि हमारा लोकतंत्र् कितना मज़बूत हो उठेगा| लोकतंत्र् को मजबूत बनाने के लिए यह जरूरी है कि 'तंत्र्' के साथ-साथ 'लोक' भी मजबूत हो| अनिवार्य मतदान लोकशक्ति का प्रथम शंखनाद है| 

 
dr.vaidik@gmail.com

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                                                  परिचर्चा


                                                                                                                                                                            डॉ. मनोज मिश्रा


पर्यावरण का नॉलेज नेटवर्क: शोषण से निजात


अभी हाल ही में जयराम रमेश तथा आर० के० पचौरी का विवाद अखबारों की सुर्खिया रहा है। आई०पी०सी०सी० की रिपोर्ट के अनुसार सन् २०३५ तक हिमालयी ग्लेशियर पिघल जायेंगे परन्तु दूसरी अन्य रिपोर्ट के अनुसार आई०पी०सी०सी० की रिपोर्ट असत्य एवं तथ्यों से परे है। बाद में आई०पी०सी०सी० ने अपनी रिपोर्ट के बारे में कहा कि यह वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं है तथा इसके लिये उसने अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से क्षमा याचना भी की। उधर राज्य सभा में अरूण जेटली ने कहा कि अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण एजेन्सियॉ ऑकड़ों में छेड़ छाड़ कर रहीं हैं। यह सब विकसित/औद्योगिक राष्ट्रो को लाभ पहुँचाने की दृष्टि से किया जाता है। विकसित या औद्योगिक राष्ट्र आर्थिक तौर पर सम्पन्न तथा उच्चस्तरीय टेक्नोलॉजी से लैस है, परन्तु विकासशील एवं गरीब देशों के पास इन दोनों चीजो का अभाव है। विकसित देश इन दोने अभावों का लाभ उठाकर अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया का उपयोग विकासशील देशों पर दबाब बनाने को कर रहे हैं। ये सम्पन्न राष्ट्र अपने विस्तृत पर्यावरणीय 'डाटा नेटवर्क` के सहारे तरह-तरह की आँकड़ेबाजी कर अन्य अपेक्षाकृत कमजोर देशों का पर्यावरण के कारण भविष्य में होने वाले नुकसान की जिम्मेदारी इन्ही देशों पर डालना चाहते हैं, जबकि विकसित राष्ट्र अपने द्वारा किये पर्यावरण के नुकसान की जिम्मेदारी लेने या भरपाई करने से बचते फिर रहे हैं। इस समय यही विकसित देश अपने शोधों एवं निष्कर्षों के सहारे यह साबित करने की कोशिश में जुटे है कि ज्यादा आबादी के कारण भारत और चीन को इस पर्यावरणीय नुकसान का भय दिखाकर तथा जिम्मेदार ठहराकर घेरा जाये। विकसित राष्ट्र अपने 'डाटा नेटवर्क`, शोध एवं शोध निष्कर्षों के सहारे इन दो बढ़ती एशियाई ताकतों को घेरने का काम करते हैं। यहॉ पर इन दो देशों द्वारा पर्यावरण का नुकसान ही एकमात्र विषय नहीं है अपितु इनकी बढ़ती आर्थिक शक्ति पर इस बहाने लगाम लगाने की मंशा भी है। इन सम्पन्न देशों द्वारा भारत एवं चीन के पर्यावरणीय शोध, डाटा तथा उनके निष्कर्षो को निम्न स्तरीय तथा उपयोग की जाने वाली टेक्नोलॉजी को समय के सापेक्ष अव्यवहारिक बताया जाता है। भारत तथा चीन तथ्यों तथा टेक्नोलॉजी के अभाव में इन देशों के दुष्प्रचार का प्रतिकार नहीं कर पाते हैं।
विकसित देश इस तरह का कुप्रचार कई वर्षों से करते आ रहे हैं इसी प्रकार की रणनीति के चलते पहले भी संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (न्छम्च्) की 'ब्राउन क्लाउड` या 'भूरा बादल` सम्बन्धी एक रिपोर्ट में भारत और चीन को जिम्मेदार ठहराया गया था। सन् २००२ में जारी इसी रिपोर्ट में कहा गया था कि दक्षिण एशिया का आकाश प्रदूषण के कारण एक भूरे रंग की धुन्ध से आच्छादित हो गया हैं तथा लगभग तीन किमी० मोटी इस प्रदूषण की चादर के कारण धरती पर पड़ने वाले सूर्य के प्रकाश में १०-१५: तक की कमी आ गई, मानसून, कृषि तथा मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। उस समय बंगलौर स्थित 'इन्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ साइन्स` के दो पर्यावरण वैज्ञानिकों जे० श्री निवासन एवं सुलोचना गाडगिल ने तर्को और तथ्यों के आधार पर अपने शोध पत्र में इस रिपोर्ट को बेबुनियाद बताया था। यह शोध पक्ष प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका 'कान्ट साइन्स` में छपा था। हास्यास्पद तथ्य यह है कि इस तथाकथित धुन्ध से ज्यादा मोटी धुन्ध की चादर उसी समय उत्तरी अमेरिका तथा यूरोप के कई हिस्सांे में छाई हुई थी। इसी तरह की एक अन्य रिपोर्ट मे कहा गया है कि यदि भारत और चीन की औद्योगिक विकास की यही रफ्तार रही तो सन् २०३० तक विनाशकारी गैसांे की प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति औसत उत्सर्जन की दर वैश्विक औसत उत्सर्जन दर से ज्यादा हो जायेगी। अत: ये दोनो देश पर्यावरण का नुकसान करने देशों की श्रेणी में नेतृत्व करेगें। इस रिपोर्ट के सन्दर्भ में भारत की पॉच संस्थाओ ने अलग-अलग शोध निष्कर्ष निकालकर भारत का पक्ष प्रस्तुत किया। ये पॉचों संस्थाये टी०ई०आर०आई०(ज्म्त्प्), आई०आर०ए०डी०सी, जाधवपुर विवि, एन०सी०ए०ई०आर० तथा मैकेन्जी हंै। जिनके निष्कर्षो के आधार पर यह साबित किया जा सकता है कि भारत के द्वारा ग्रीन हाउस गैसों का प्रतिवर्ष प्रतिव्यक्ति औसत उत्सर्जन ४ से ५ टन के आस पास होने का अनुमान है जबकि विकसित देशों के निष्कर्षों को यदि हम आधार माने तो यह दर लगभग दो गुनी (८ टन) के आस पास होगी। ग्रीन हाउस गैसों के ज्यादा उत्सर्जन के मायने ज्यादा जिम्मेदारी का निवर्हन तथा भविष्य में वैश्विक प्रतिबन्धों की पृष्ठ भूमि का तैयार होना है।
एक अन्य शोध में बताया गया कि भारत ने सन् १९९० में धान की खेती के कारण प्रतिवर्ष लगभग ३८ मिलियन टन पर्यावरण को नुकसान पहुॅचाने वाली मीथेन गैस का उत्सर्जन किया। भारतीय कृषि वैज्ञानिक ए०पी० मित्रा ने इसका प्रतिकार करते हुए अपने शोध निष्कर्ष में बताया कि भारत में धान की खेती के कारण मीथेन का उत्सर्जन ३८ मिलियन टन प्रतिवर्ष न होकर मात्र ४ मिलियन टन प्रति वर्ष है। इसी तरह ग्लेशियर के पिघलने का विवाद भी चर्चा में है। विवाद की जड़ में यह तथ्य है कि इन ग्लेशियरों के पिघलने के लिए 'ब्लैक कार्बन` जिम्मेदार है या 'ग्रीन हाउस गैसें`। परन्तु इतना तय है कि इस विषय पर अभी तक किसी भी राष्ट्र के पास शोध निष्कर्ष या 'डाटा` उपलब्ध नहीं, फिर भी भारतीय ग्लेशियर विज्ञानी प्रो० सैयद इकबाल हसनैन के शोध निष्कर्ष को नकार दिया गया। जबकि आई०पी०सी०सी० के अनुसार ग्लेशियर के पिघलने के अध्ययन के सन्दर्भ में शोध कार्य अभी आरम्भिक चरण में ही है।
इन उपर्युक्त उदाहरणों से एक बात साफ तौर पर समझ में आती है कि भारत सहित तमाम विकासशील देशों को विनाशकारी गैसों का ज्यादा उत्सर्जक देश सिद्ध करना है। भविष्य में जो देश ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करते पाये जायेंगे उन्हे तरह-तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। भविष्य की इन मुश्किलों में आर्थिक प्रतिबन्ध, मंहगीदर पर उच्चस्तरीय टेक्नोलाजी की खरीद, वैज्ञानिक ऑकड़ों की अनुपलब्धता की कीमत तथा विभिन्न विकसित देशों द्वारा आयात पर टैक्स का लगाना तथा भारत को प्रताड़ित करना भी शामिल है। विकसित देश भविष्य में पर्यावरण का उपयोग अपने-अपने आर्थिक हित साधने में करेंगे। उदाहरण के तौर पर अमेरिकी सीनेट में लम्बित बैकसमान मार्के बिल के तहत उन देशों के आयात पर टैक्स लगाया जायेगा जो अपने यहॉ कार्बन उत्सर्जन को कम नहीं कर रहे है, जबकि कार्बन उत्सर्जन की यह दर विकसित देश अपने यहॉ उपलब्ध संसाधन और डाटा के आधार पर तय करंेगे। फ्रान्स के राष्ट्रपति सरकोजी तथा जर्मन चान्सलर मार्केल भी इसी तरह के आयात टैक्स का सुझाव दे चुके है। अत: यह स्पष्ट है कि विकसित देश अपने शोधों, संसाधनो, निष्कर्षों, टेक्नोलॉजी तथा विस्तृत डाटा बेस का इस्तेमाल अपनी सुविधानुसार किसी भी देश को ज्यादा कार्बन उत्सर्जक देश बताकर कुछ देशों को बदनाम करने में तथा अपने आर्थिक हितों को साधनें में करेंगे।
भारत को भविष्य में आने वाली इस समस्या का सामना करने की तैयारी अभी से ही करनी होगी। देश को पर्यावरण के अध्ययन के लिए उच्चस्तरीय शोध संस्थान, संसाधनों का विकास, नई टेक्नोलॉजी का उपयोग, डाटा नेटवर्क का विकास तथा मीडिया तन्त्र विकसित करना पड़ेगा। पर्यावरण को समर्पित अध्ययन के लिए सेटेलाइट विकसित करनी होगी जिसे विश्वसनीय एवं विश्वस्तरीय डाटा नेटवर्क तैयार किया जा सके। अभी तक ज्यादातर शोध एवं डाटा, विकसित देशों द्वारा तैयार किये गये हैं। भारत को एक ऐसा पर्यावरणीय तन्त्र विकसित करना पड़ेगा जिसमें पर्यावरण को नुकसान करने वाले कारकों को नापना, देखभाल करना तथा उनका उपचार करना शामिल है। देश को पर्यावरण के सन्दर्भ में व्यापक, विश्वसनीय तथा उच्चस्तरीय वैज्ञानिकता से लैस 'नॉलेज नेटवर्क` विकसित करना पडेग़ा। 

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                                                                                                                  चाँद परियाँ और तितली


                                                                                                                                                                                   -निर्मला सिंह   

                                                                                                                                                    

कुछ काम करो



कुछ काम करो, कुछ नाम करो


मत व्यर्थ समय बर्बाद करो।


जो देखें आखें, वह सच है,


बीते कल को मत याद करो।


 


मत सोचो यह जग दुश्मन है,


हम जग के हैं, जग अपना है।


जैसे हो तुम वैसे दीखो,


अब नहीं सत्य ढकना है।





नहीं भूलो अपना कर्म पथ,


तुमको तो मेहनत करना है।


जीवन के बीते हर पल से,


जीवन को उन्नत करना है।





यह गैरों का, यह वैरों का,


इन बातों को तुम मत सोचो।


यह सारा जग सच ही सच है,


मन के अंदर ईश्वर खोजो।





दुनिया क्या कहती है तुमको,


तुम इसकी मत परवाह करो।


तुमको तो मंजिल पानी है,


बस इतनी ही तुम चाह धरो।


 





सही रास्ता

लतिका ने अपने पुत्र पल्लव को बाथरूम में पानी से खेलते हुये और पानी बहाते हुए देखा, वह अपना गुस्सा रोक न पाई। तड़ातड़-तड़ातड़ बेटे की पीठ पर कई थप्पड़ जड़ दिए, थप्पड़ खाकर पल्लव रोने लगा। रोते-रोते बोला- क्यों मार रही हो मम्मी, मैं दूध तो नहीं बहा रहा, पानी ही फेंक रहा हूं। आप मुझे पानी से खेलने के लिए क्यों मना करती हो?                                                                                                                                        न...न... मैं खेलने को मना नहीं करती, बेवकूफ पानी फेंकने के लिए मना करती हूँ और तुम जब नहाते हो बहुत पानी बर्बाद करते हो।-पानी से अलग करते हुए लतिका ने कहा। तपाक से पल्लव ने मम्मी को जवाब दिया...पानी ही बहाता हूं ... कोई कीमती चीज तो नहीं। बस मम्मी आप तो बेवजह नाराज होती हो। गुस्से से पल्लव ने भी उत्तर दिया। और चुपचाप शरीर पोंछकर कपड़े पहनने लगा, फिर पढ़ाई करने लगा। पल्लव का गुस्सा देखकर लतिका उसके कमरे में आई। पहले पल्लव को प्यार से मनाकर खाना खिलाया फिर उसे अपने सामने कुर्सी पर बिठाकर एक मेज रखी, उसके ऊपर एक एटलस खोल कर रखी। पल्लव अपनी मम्मी की गतविधियों को खूब ध्यान से देख रहा था। उसके समझ के बाहर की बात थी कि पानी को बर्बाद करने का ऐटलस से भी संबंध है?  बच्चे की जिज्ञासा ज्यादा देर तक इन्तजार नहीं करती है और ऐसा ही हुआ। पल्लव ने अपनी मम्मी को झकझोर कर पूछा-यह अब क्या कर रही हैं?  मुझे कुछ भी नहीं समझना। मैं जब भी पानी बहाता हूं, या फेंकता हूं आप गुस्सा होती हैं और आपने आज तो मुझे बिना मूल्य के पानी के पीछे मारा है। मैं आपसे कुछ भी नहीं लीखूंगा। गुस्से में पल्लव को लतिका ने अपने पास बिठाकर कहा-देखो बेटा, तुम उस दिन कह रहे थे कि टीचर जी ने कहा है कि ब्रह्मांड के दो तिहाई भाग में पानी है। इसलिए मैं खूब पानी फेंकूंगा, लेकिन यह बात ऐसी नहीं है जो तुम समझ रहे हो। बेटा, ये सब तो महासागर हैं जैसे प्रशांत महासागर, अंध महासागर,  हिन्द महासागर, और यह उत्तरी ध्रुवों पर पर आर्कटिक महासागर एवं दक्षिणी द्रुवों पर एन्टार्टिक महासागर, लेकिन बेटा यह पानी हम लोग नहीं पीते हैं और हम लोगों के रोज़ाना इस्तेमाल में भी नहीं आता।


पल्लव को अपनी मम्मी के ऊपर  फिर गुस्सा आने लगा और ऊँचे स्वर में बोला-क्यों मुझे आप बहलाती हो? क्यों नहीं पी सकते हम लोग यह पानी ?


बेटा, समुद्र का पानी खारा होता है यह अब तक तो पीने नहीं दिया जाता है, हां कहते हैं कुछ वैज्ञानिक इसे पीने के काबिल बना रहे हैं। हो सकता है भविष्य में यह पीने के काबिल हो जाये।


तो फिर क्या समस्या है मम्मी,  जब यह पानी भी पीने के काबिल बन जायेगा तब तो कमी नहीं रहेगी। आह! तब मैं पानी से खूब खेलूंगा।


हां बेटा,  तब कमी नहीं रहेगी, लेकिन अभी तो हमें एक-एक बूंद पानी बचाना चाहिए। जिसमें हम पेड़-पौधों को पानी दे सकें। जानवरों को पिला सकें और अपने सारे काम कर सकें।


ओह! मम्मी इतनी सारी नदियां हैं, उनका पानी तो हम लोग पीते हैं फिर भी आप हमेशा पानी-पानी चिल्लाती रहती हो। हंस पड़ी लतिका, फिर पल्लव को प्यार करते हुए बोली- बेटे इन नदियों में पानी बहुत ऊंचे पहाड़ों पर जमें ग्लेशियरों के पिघलने से आता है या बरसात का आता है।


क्या कहा ग्लेशियर? यह ग्लेशियर कहां होता है?


बेटा , यह खूब बड़ी-बड़ी बर्फ की नदियां होती हैं और इनके पिघलने से पानी नदियों एवं झरनों में आता है बस यही पानी हम लोग इस्तेमाल करते हैं। कहीं-कहीं ट्यूबवैल का पानी भी इस्तेमाल होता है।


ट्यूबवैल क्या होता है मम्मी?


अरे हां, हमारे गांव में लगा तो है ट्यूबवैल बेटा। जमीन के अंदर गढ्ढा खोदा जाता है और जब पानी जमीन में मिल जाता है रुक जाते हैं और उस गड्ढे में पम्प एवं पाइप लगा देते हैं, जिसको चलाकर जमीन के अंदर का पानी ऊपर आने लगता है। ऐसे ही कहीं-कहीं हैंडपम्प भी लगाए जाते हैं, उन्हें हाथों से चलाकर जमीन का पानी बाहर निकाला जाता है।


ओह तो यह बात है। अच्छा यह बताईये ग्लेशियर पिघलते कैसे हैं और कहां होते हैं?


बहुत ही ज्यादा ऊँचे पहाड़ों पर, यानि के हिमालय की बहुत ही अधिक ऊंचाई पर यह पाये जाते हैं। और बेटा यह ग्लेशियर सूरज की गर्मी से पिघलते हैं। हां, बेटा अब वैज्ञानिक कह रहे हैं कि विश्व में सूर्य की गर्मी अधिक बढ़ रही है, ग्लेशियर ज्यादा पिघल रहे हैं तब धीरे-धीरे पानी भी कम हो जायेगा तो बेटा हम सब लोगों को यानि के दुनिया के सभी लोगों को पानी बर्बाद नहीं करना चाहिए।


अपनी मम्मी की बातें सुनकर पल्लव थोड़ी देर शांत रहा, फिर बोला-मम्मी जी, आप मुझे क्यों बुद्धू बना रही हो? अरे, आपने ही तो कहा है कि ट्यूबवैल का पानी भी हम लोग इस्तेमाल करते हैं तो फिर जमीनके अंदर पानी बहुत है और हां वह तो कभी भी कम नहीं पड़ेगा।


बेटा, मेरे प्यारे बच्चे, जमीन के अंदर भी तो ग्लेशियर का पिघला पानी और बरसात का पानी जाता है और अब तो पानी जमीन के अंदर भी पहले से काफी नीचे चला गया है। बेटा जी, इसका मतलब है ग्लोबल वार्मिंग इस तरह होती रही तो पानी की कमी हो जायेगी।


माथे को पीटते हुये, हाथ जोड़कर पल्लव ने कहा-ठीक है मम्मी आप जीतीं मैं हारा। आपका कहना मानूंगा, अब कभी भी पानी बर्बाद नहीं करूंगा, और तो और होली भी सूखे गुलाब से  खेलूंगा।                                                                                          

अपने  बेटे की बात पर लतिका ने बेटे पल्लव को खूब प्यार किया, फिर हंस कर बोली- बेटा, मुझे बहुत खुशी है कि तुम्हारी समझ में मेरी बात आ गई और बेटा अच्छा बालक वही होता है जो बड़ों का कहना माने, अपनी गल्तियों को छोड़कर सही रास्ता अपनाये। एक बात और अपने दोस्तों को भी पानी बर्बाद नहीं करने के लिये कह दो।                                                                                                                        ओ.के. मम्मी, ऐसा ही होगा।