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                                   सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर
                                              लेखनी-जनवरी-2010 

                                   






                                                " नव चेतना   के नए पंख ले,
                                               नव विहान हो, उन्मुक्त उड़ान हो! 
                                                खग, तुम थकना ना जीवन भर!!"
                                                                -  शैल अग्रवाल

                                                          -बाल विशेषांक-              


                                                            (वर्ष-3-अँक-35) 


इस अंक में-  कविता धरोहरः गोपाल सिंह नेपाली। कविता आज और अभीः निर्मला सिंह, हेमंत देवलेकर आत्मीय, डॉ. कमलेश द्विवेदी, सुधा भार्गव, सिद्धेश्वर। माह विशेषः श्याम कुमारी। माह के कविः बाल कवि शिवांक। बाल कविताः दिविक रमेश, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी।


परिदृश्यः शैल अग्रवाल। मन्थनः रोहिताश्व अस्थाना। परिचर्चाः प्रकाश मनु। कहानी समकालीनः शैल अग्रवाल। कहानी धरोहरः मुंशी प्रेमचंद। कहानी विशेषः श्री मां। रोचक प्रसंग टैगोर और बर्नार्ड शॉ के जीवन से। ज्ञान विज्ञानः डी बाल सुब्रमण्यम। पर्यटनः सीताराम गुप्त। बाल कहानीः सुधा भार्गव। चौपालः डॉ.वेदप्रताप वैदिक व खबरों से भरपूर विविधा।

                                                             संरचना व संपादनः शैल अग्रवाल
                                                   
                                  संपर्क सूत्रः editor@lekhni.net; shailagrawal@hotmail.com 

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                                                                                                                                                              अपनी बात

नववर्ष आते ही, जाने-अनजाने  ध्यान भविष्य की तरफ जाने लगता है, नए-नए संकल्प और योजनाएं बनाने लगता है। सजाने संवारने लग जाता है और अगली पीढ़ी को देखने और आंकने लग जाता है। इनके हित में क्या नया और सार्थक किया जा सकता है सोचने लग जाता है क्योंकि ये ही तो हमारे आज को कल से जोड़ने वाली कड़ी हैं। माली-सा हंसता-खेलता जीवन उपवन इन्हें ही, और इन्ही की देखरेख में ही तो सौंप कर जाना होगा। वर्ड्सवर्थ ने कहा था कि चाइल्ड इज द फादर औफ द मैन अर्थात आज का बच्चा ही कल के भविष्य का जनक और निर्माता है। आश्चर्य नहीं कि लेखनी का नए वर्ष का पहला यह अंक बाल-विशेषांक के रूप में सज-संवरकर आपके सम्मुख है। व्यक्तिगत मजबूरियों के रहते अंक में विलंब हुआ , उम्मीद है त्रुटि को  नजरंदाज करते हुए अंक का  अपने-अपने नवनिहालों के साथ न सिर्फ भरपूर आनंद लेंगे, बल्कि उनकी और अपनी जरूरतों व इच्छाओं से हमें अवगत भी कराएंगे।  


मानवता के  स्वस्थ और सुनहरे भविष्य के लिए बच्चों का  शारीरिक व मानसिक  रूप से पोषित रहना आवश्यक है और अच्छे खान-पान व शिक्षा के साथ-साथ  बच्चों के मानसिक विकास में बाल सहित्य का योगदान आज भी नकारा नहीं जा सकता। यदि बचपन से ही पढ़ने लिखने की आदत पड़ जाए तो अपरोक्ष रूप से ही सही, आदर्शों और विचारों को...कल्पना को, नया आकाश और नयी उड़ान दी जा सकती है  ...चरित्र के नींव का पत्थर तक बनने की संभावनाएँ रखता है यह...नित नए और रोचक और सही आदर्श व सफल प्रतिमानों को गढ़-संवारकर। 

स्वाभाविक था कि आजादी के बाद देश में नव जागृति और नव चेतना की क्रांति  के साथ बाल साहित्य में भी बदलाव की प्रक्रिया आई। परियों की और पंचतंत्र की कहानियों से आगे बढ़ते हुए कवि, लेखक व विचारक बाल साहित्य की नयी-नयी संभावनाएं और जरूरतों की तलाश और समस्या पूर्ति के प्रति सजग होते दिखे। देश ज्यों-ज्यों विकासोन्मुख हुआ, त्यों-त्यों लोगों के जीवन-स्तर, मानसिकता में भी बदलाव आया। इसका असर बच्चों पर भी स्पष्टतः पड़ा। दासता से उबरते लोगों के मन में अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर, उन्हें भी डॉक्टर, वकील, वैज्ञानिक और इंजिनीयर बनाने की लालसा जन्म लेने लगी। बाल विकास में बाल साहित्य के महत्व को देखते हुए पहले तो बाल साहित्य के अनेक लेखकों ने पुरानी लोककथाएं, परीकथाएं, राजारानी और पौराणिक किस्सों आदि की भरमार लगा दी, परन्तु छठे दशक के बाद से इस प्रवृत्ति में भी बदलाव आया और नए व मौलिक बालसाहित्य का सृजन आरंभ हुआ। धर्मयुग और पराग जैसी पत्रिकाओं ने मौलिक साहित्य के प्रकाशन को महत्व देकर विशेष प्रोत्साहन दिया और आधुनिक व नई सोच के बाल साहित्य को रेखांकित किया। साथ ही बाल साहित्य संबंधी लेखों को प्रकाशित किया गया और कई विश्वविद्यालयों ने बालसाहित्य को शोध-विषय की तरह भी मान्यता दे दी। फलतः बाल साहित्य में बदलाव आता चला गया। नए तरह के शिशु गीत लिखे गए। मौलिक नाटक, बाल उपन्यास लिखे गए। विज्ञान कथाएं और मनोवैज्ञानिक और साहसिक, हास्यकथाएं व विविध अन्य विषयों पर कहानियां लिखी गईं।

युग-परिवेश और समसामयिक परिस्थितियों से प्रभावित होकर ही हर युग में साहित्य विकसित हुआ है। बच्चों के साथ भी यही है- जैसा संगसाथ वैसी ही मानसिकता। कवि सोहनलाल द्विवेदी अपनी कविता बड़ों के संग में लिखते हैं-


''खेलोगे तुम अगर फूल से तो सुगंध फैलाओगे।
खेलोगे तुम अगर धूल से तो गन्दे हो जाओगे।

कौवे से यदि साथ करोगे, तो बोलोगे कडुए बोल
कोयल से यदि साथ करोगे, तो दोगे तुम मिश्री घोल

जैसा भी रंग रंगना चाहो, घोलो वैसा ही ले रंग
अगर बडे़ तुम बनना चाहो, तो फिर रहो बड़ों के संग।''

                            -सोहनलाल द्विवेदी


 परन्तु हो सकता है आज बड़ों का (दादा-दादी, नाना-नानी, शिक्षक और अभिवावक आदि का)  साथ ही बच्चों को रुचिकर न लगे।  आज के विश्वीकरण के इस युग में बच्चों के परिवेश और ज्ञान-मनोविज्ञान में तेजी से परिवर्तन आया है। इसलिए आज ऐसे बाल साहित्य की जरूरत है जो बांध सके। मनोरंजन के साथ-साथ प्रेरित करे...स्थिति और विषयों का ज्ञान दे। वर्तमान परिस्थितियों और जरूरतों से अवगत कराता चले।


ऐसी सजग और रुचिकर सामग्री का मिलना उतना भी आसान नहीं। फिर भी भांति-भांति के स्रोतों से हमने जो सामग्री संजोई है, उम्मीद है बाल साहित्य के लेखक और कवियों के साथ-साथ नन्हे पाठकों के लिए भी रुचिकर और प्रेरक रहेगी। नववर्ष के लेखनी के प्रथम अंक के लिए बाल-साहित्य से अच्छा और कोई विषय हो ही नहीं सकता था। माना कि विषय गागर में सागर के समान है परन्तु लेखनी का यह बाल विशेषांक इस दिशा में एक लघु प्रयास है। आपका साथ और सहयोग व स्नेह रहा तो सोच और सार्थक चेष्टां की सीमाएं अपरिमित है। पुनः  नववर्ष व माह में पड़ने वाले अन्य विषिष्ट त्योहार मकर संक्रांति, पोंगल, गणतंत्र दिवस आदि  की अशेष शुभकामनाओं के साथ,
                                                                                                                                               -शैल अग्रवाल 


पुनश्चः कवि व लेखक मित्रों से निवेदनः आपकी लेखनी मार्च में तीन वर्ष पूरे कर रही है। लेखनी अव्यवसायिक पत्रिका है और एक-सी सोच वाले कवि लेखकों को एक सम्मिलित मंच पर मिलीजुली आवाज देने की आकांक्षा लेकर आगे बढ़ रही है। आप सभी मनीषी और सहृदय कवि लेखक व विचारक इसकी धमनियां और शिराएं हैं।  लेखनी का फरवरी-मार्च संयुक्तांक (फागुन) विशेषांक बनाने का मन बनाया है। विशेषतः रिश्तों और निकटता की रेशमी, गुदगुदाती और कसक भरी उलझनों पर केन्द्रित यह अंक वसंत के आगमन के साथ नेह का उत्सव है । आपकी विविध मौलिक रचनाओं का  लेखनी के दोनों ही  भाषा अंक; हिन्दी व इंगलिश में स्वागत है। रचना भेजने की अंतिम तिथि  10  फरवरी है । जितनी जल्दी भेजेंगे, उतनी ही चयन आदि में सुविधा होगी।        


                                                                                                                                           साभार।  

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                                                                                                                                               शुभ कामनाएँ


                                                                                                                                           शुभ नूतन वर्ष—2010


वर्ष नव, हर्ष नव
जीवन उत्कर्ष नव


         -बच्चन   




सदी बीसवीं का ये दूजा दशक
भर जाए खुशियों से जीवन चषक।


                        -अशोक चक्रधर







पग पग पर सम्मान हो, घड़ी-घड़ी उत्कर्ष,
उत्सव सा आकर मिले आगत नूतन वर्ष।

 
रागरंग आंगन रहे, सुखमय हो परिवार,
नए वर्ष से आपको अमित प्यार।

 
सपने सच हों आपके, पूरे हों अभियान,
नया वर्ष पुष्पित करे जीवन का उद्यान।

 
निर्भय सारा विश्व हो , रहे प्रीति से युक्त,
नया वर्ष जग को करे उग्रवाद से मुक्त।

 
नए वर्ष में हर तरफ फैले केवल प्यार,
अपनों से हो भरा वसुधा का परिवार। 


          -नरेश कात्यायन


                      

बधाई नव वर्ष की
हांसिल हुए हर्ष की
निरंतर उत्कर्ष की
सफलतम संघर्ष की


          राजीव वत्स



    






नववर्ष नव विहान लाए ,
सबका जीवन गुनगुनाए !

बरस बाद
घाटियों में विगत की
छोड़ दिये
सब अँधेरे।

तभी आए
बरस बाद
मुस्कान ले सवेरे।

नए बरस के दरस
के लिए
घाटियाँ कसमसाई।

चहक उठे पखेरू
हर तरु की
डाल– डाल पर ;

सूरज की बिन्दया
खिल गई
धरा –भाल पर।

भोर की शिशु–किरन
ले उजास
धरा पर उतर आई़।


रामेश्वर काम्बोज हिमांशु                                                                                                                                   





आँगन बहे ,कुसमित बयार 
ऋतुयें करें तेरे गीत से श्रृंगार 
सूर्य किरण चौखट पर 
आशा के दीप जलाएं 
नूतन वर्ष की मंगल कामनाएं 
मिलन सुर से सजा गीत हो 
पास सभी के उनका मीत हो 
स्नेह जल हर दिल बरसायें 
नूतन वर्ष की मंगल कामनाएं 
मात पिता का आशीष फले 
डाली  डाली उम्मीद खिले 
खुशियाँ आयें मन हर्षायें 
नूतन वर्ष की मंगल कामनाएं 
बुराइयों से बनी रहे दूरी
तेरी हर अभिलाषा हो पूरी 
सफलता की बूंदें बदल बरसायें 
नूतन वर्ष की मंगल कामनाएं

               -रचना श्रीवास्तव










यूँ  आपके लिए शुभ,  सन् दो  हजार दस हो।
है  कामना हमारी,  जीवन  में  भरा रस  हो।।

जब सायकिल की सोचें मिल जाए  हीरोहोंडा-
हो  कार की  तमन्ना  गैरिज में खड़ी बस हो।

कंजूम  न  कर  पाएं   फ्री-पास  मिलें  इतने-
मेला हो कि ठेला हो, फिल्में हो कि सरकस हो।

झाँसे  में  नहीं  आवें  दे  कोई   अगर झाँसा-
हाँ,  आपकी  बातों में झाँसे की जगह झस हो।

जो भेजी गई  ग्रीटिंग  को पा  के न दे उत्तर-
बीवी तो मिले उसको  लेकिन  बड़ी सर्कस हो।

इसको  हृदय के लॉकर में ही संजो के रखना-
शुभकामना  का चेक ये हरगिज नही वापस हो।

मिलती है  कामियाबी इक  दिन जरूर उनको-
जिसमें विवेक-बल हो, संकल्प  हो, साहस हो।

                            -(डॉ० डंडा लखनवी)




बीते हुए वर्ष की , दिल में उठे हर्ष की,
चिर-पुराने बंधुओं की , खट्टे -मीठे अनुभवों की,
अविस्मरनीय यादों की , नव मिले आगंतुकों की,
पूरे वर्ष मन में न जाने, जन्मीं कितनी भावनाएं ?
आपको नव -वर्ष की शुभकामनाएं ।

गत सर्दियों की ठिठुरन की,
शर्माते सूरज औ ठंढी हवाओं की,
नीड़ों में दुबके पंछी औ छोटे -छोटे पिल्लों की,
गर्म -गर्म चाय और कॉफी की बुलबुलों की ,
धूप और बादलों में मची होड़ की ,
खिचड़ी में पतंगों के आपस के दौड़ की,
सुनसान सड़कों औ खामोश रातों की ,
कितनी ऐसी यादें है जो भूलीं न जाए ।
आपको नव -वर्ष की शुभकामनाएं ।

जाड़े के संग -संग आए ऋतुराज की ,
मदमाते मंजर औ सुलगते पलाश की ,
मलयांचल से मदमाती बहती बहती हवाओं की ,
मदहोश नव-यौवना औ होली के रंगों की ,
यौवन के दिन औ अंगराई के शाम की ,
मत्त हुए महुओं औ पीपल के पल्लव की ,
कोयल की कूकों और कौवों के वाचन की ,
कवियों की , जिन्होंने रची ऐसी कविताएँ ।
आपको नव -वर्ष की शुभकामनाएं ।

रंगों को करके फीका आये ग्रीष्म की ,
क्रोधित हुए सूरज औ गरमाती हवाओं की ,
दहकते हुए शहर औ तपते हुए गाँव की ,
पिघलता हुआ आसमान औ पेड़ों के छाँव की ,
बढ़ते हुए दिन औ छोटी हुई रातों की ,
झुलसती हुई धरती औ सूखते हुए तालों की ,
ठंडे कोल्ड्रिंक्स औ लस्सी के मिठास की ,
ग्रीष्म अवकाश की , जिसमें जहाँ चाहे घूम आएँ।
                                    -नवनीत नीरव










ऐ नये साल बता, तुझ में नयापन क्या है
हर तरफ ख़ल्क ने क्यों शोर मचा रखा है

 रौशनी दिन की वही,  तारों भरी रात वही
आज हमको नज़र आती है हर बात वही

 आसमां बढ़ा है अफसोस, ना बढ़ी है जमीं
एक हिन्दसे का बढ़ना कोई जिद्दत तो नहीं

 अगले बरसों की तरह होंगे करीने तेरे
किसे मालूम नहीं बारह महीने तेरे

जनवरी, फरवरी और मार्च में पड़ दे सर्दी
और अप्रैल, मई, जून में होवेगी गर्मी

 तेरे मान-दहार में कुछ खोएगा कुछ पाएगा
अपनी मय्यत बसर करके चला जाएगा

 तू नयी है तो दिखा सुबह नयी, शाम नई
वरना इन आंखों ने देखे हैं नए साल कई

 बेसबब देते हैं क्यों लोग मुबारक बादें
गालिबन भूल गए वक्त की कडवी यादें

तेरी आमद से घटी उमर जहां में सभी की
फैज नयी लिखी है यह नज्म निराले ढब की।

             -फैज अहमद फैज




गुज़रे  हुये  कल पे न यूँ आँसू बहाइये,
बस  वर्तमान  को ही   गले से लगाइये,
गर चाहते हो तुम भविष्य खुशनुमा बने
दिल  के  क़रीब आके दूरियाँ मिटाइये॥

                  -डा. विष्णु सक्सैना










नव वर्ष


नव सृजन, नव हर्ष की,
कामना उत्कर्ष की,
सत्य का संकल्प ले
प्रात है नव वर्ष की .

कल्पना साकर कर,
नम्रता आधार कर,
भोर नव, नव रश्मियां
शक्ति का संचार कर .

ज्ञान का सम्मान कर,
आचरण निर्माण कर,
प्रेम का प्रतिदान दे
मनुज का सत्कार कर .

त्याग कर संघर्ष का,
आगमन नव वर्ष का,
खिल रही उद्यान में
ज्यों नव कली स्पर्श का .

प्रेम की धारा बहे,
लोचन न आंसू रहे,
नवल वर्ष अभिनंदन
प्रकृति का कण कण कहे ।

- कवि कुलवंत




नववर्ष
    नया  चाँद
          चंदन  समान ।

नव  वर्ष
     सुमन सुरभि
            संगीत  सुन्दरी  ।

नव  वर्ष
    विराट  गगन
            विजय  गान ।

नव  वर्ष
     नई  मंजिलें
           नव  निर्माण ।


              -सुधा अरोड़ा






नूतन वर्ष






समय का अविरल यतन, नव वर्ष तुझको नमन .
फैला कर बाहें कर रहे,हम सभी स्वागत तेरा,


दे खुशी शाश्वत सभी को,बस यही अभीष्ट मेरा .
अपने अपनों से न बिछुड़ें, शुरु कर दो यह प्रथा,


इसी मांग में मगन, नव वर्ष तुझको नमन .
किसान को अनाज हो, मृत्यु का न हो वरण,


पुष्प में सुवास हो, तितलियों का हो भ्रमण,
खुशी के गीत हर अधर, हो न जीवन में व्यथा,


पवन हो सुरभित चमन, नव वर्ष तुझको नमन .
पेट की भूख से अब, प्रज्ज्वलित ज्वाला न हो,


आतंक और नक्सलों का, देश पर साया न हो,
नव वर्ष सब को दिखाओ सुखमय जीवन की कथा,


विश्व में बस हो अमन, नव वर्ष तुझको नमन .

                                -कवि कुलवंत सिंह

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                                                                                                                                        गणतंत्र दिवस विशेष


                                                                                                                                           -गोपाल सिंह नेपाली

विगत वर्ष 2009  असहयोग और अनहोनी के लिए भी याद रखा जाएगा , शायद इसलिए  कि अन्य दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों के साथ-साथ साहस और शौर्य ही नहीं , समझ तक की कमी आ चुकी है आज के समाज में। सचेत और निर्भीक कलम तक भटक गई हैं अति व्यावसायिकता और भौतिकता के रहते ! भारत के 61 वें गणतंत्र दिवस पर कविता धरोहर में लेखनी सगर्व प्रस्तुत करती है अराजकता और दुर्व्यवस्था से त्रस्त भारतवासियों के लिए  सुगढ़ शब्दशिल्पी और साहसी कवि का सिंहनाद;





मेरा धन है स्वाधीन कलम








राजा बैठे सिंहासन पर, यह ताजों पर आसीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम
जिसने तलवार शिवा को दी
रोशनी उधार दिवा को दी
पतवार थमा दी लहरों को
खंजर की धार हवा को दी
अग-जग के उसी विधाता ने, कर दी मेरे आधीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम


रस-गंगा लहरा देती है
मस्ती-ध्वज फहरा देती है
चालीस करोड़ों की भोली
किस्मत पर पहरा देती है
संग्राम-क्रांति का बिगुल यही है, यही प्यार की बीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम


कोई जनता को क्या लूटे
कोई दुखियों पर क्या टूटे
कोई भी लाख प्रचार करे
सच्चा बनकर झूठे-झूठे
अनमोल सत्य का रत्‍नहार, लाती चोरों से छीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम


बस मेरे पास हृदय-भर है
यह भी जग को न्योछावर है
लिखता हूँ तो मेरे आगे
सारा ब्रह्मांड विषय-भर है
रँगती चलती संसार-पटी, यह सपनों की रंगीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम


लिखता हूँ अपनी मर्ज़ी से
बचता हूँ कैंची-दर्ज़ी से
आदत न रही कुछ लिखने की
निंदा-वंदन खुदगर्ज़ी से
कोई छेड़े तो तन जाती, बन जाती है संगीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम


तुझ-सा लहरों में बह लेता
तो मैं भी सत्ता गह लेता
ईमान बेचता चलता तो
मैं भी महलों में रह लेता
हर दिल पर झुकती चली मगर, आँसू वाली नमकीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम!







कुछ ऐसा खेल रचो साथी










कुछ ऐसा खेल रचो साथी
कुछ जीने का आनंद मिले
कुछ मरने का आनंद मिले
दुनिया के सूने आंगन में, कुछ ऐसा खेल रचो साथी

वह मरघट का सन्नाटा तो रह रह कर काटे जाता है
दुख दर्द तबाही से दबकर, मुफलिस का दिल चिल्लाता है
यह झूठा सन्नाटा टूटे
पापों का भरा घड़ा फूटे
तुम जंजीरों की झनझन में, कुछ ऐसा खेल रचो साथी

यह उपदेशों का संचित रस तो फीका-फीका लगता है
सुन धर्म-कर्म की ये बातें दिल में अंगार सुलगता है

चाहे यह दुनिया जल जाए
मानव का रूप बदल जाए
तुम आज जवानी के क्षण में कुछ ऐसा खेल रचो साथी

यह दुनिया सिर्फ सफलता का उत्साहित क्रीडा कलरव है
यह जीवन केवल जीतों का मोहक मतवाला उत्सव है
तुम भी चेतो मेरे साथी
तुम भी जीतो मेरे साथी
संघर्ष के निष्ठुर रण में, कुछ ऐसा खेल रचो साथी

जीवन की चंचल धारा में, जो धर्म बहे, बह जाने दो
मरघट की राखों में लिपटी , जो लाश रहे रह जाने दो
कुछ अंधड़ आने दो
कुछ और बवंडर लाने दो
नव जीवन में नव यौवन में, कुछ ऐसा खेल रचो साथी

जीवन तो वैसे सबका है, तुम नव जीवन श्रंगार बनो
इतिहास तुम्हारा राख बना, तुम राखों में अंगार बनो
अय्याश जवानी होती है
गत वयस कहानी होती है
तुम अपने सहज लड़कपन में, कुछ ऐसा खेल करो साथी।

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                                                                                                                                        कविता आज और अभी


एक गुलाब











हरी हरी डाली पर देखो,
खिला है एक गुलाब।
कितना सुन्दर रूप रंग है,
इसका नहीं जवाब।

ज्यूं कोई दुल्हन मुस्काती,
देखो यह मुस्काए।
ता-ता धिन्ना ताल हवा दे,
झूम-झूम इतराए।

काना फूसी करता है यह,
मस्त हवा के संग।
खेल-खेल में करता है यह,
कभी-कभी हुड़दंग।

हंसते-हंसते झरता है,
देखो यह गुलाब।
झरते-झरते कहता जाए,
सबसे यही गुलाब।


जीना मरना हंस हँस कर,
है जीवन-संगीत।
धूप-चांदनी, रिमझिम बरखा
अपने सब हैं मीत


           -निर्मला सिंह








सौंधा कटाक्ष
( नन्ही मुन्नी के प्रति)










मजा तो तब आया
जब एक तितली
मंडराते-मंडराते
तुझ पर आ बैठी

 और तब ...
गुलाब, गेंदा, शेवंती, चंपा
सब
खूब जोर-जोर से हंसे थे
कि –लो, तितली
उल्लू बन गई !
मजा तो तब आया...

पर तू है न
रंग-गंध से बुना
इतना सुंदर
भ्रमजाल रखती है, री
कि कोई भी तितली
उसमें सहज ही आ फंसे

 तेरी
इसी सुकुमार प्रतिमा का
उसने सम्मान किया है
कि तितली ने यों बैठकर
तुझे
‘फूल’ का उपमान दिया है

तब
गुलाब, गेंदा, शेवंती, चंपा
सब
जल कुढ़ कर मौन रहे थे

...मजा तो तब आया !


         हेमंत देवलेकर ‘आत्मीय ’








मैं जल्दी पापा बन जाऊँ










मेरे मन में आता है यह –मैं जल्दी पापा बन जाऊं।
पापा बनकर जैसे चाहूं वैसे अपना समय बिताऊं।।

 
रोज सबेरे मुझे जगाकर,
पापा बहुत सताते हैं।
 मुझसे कहते करो पढ़ाई,
लेकिन खुद सो जाते हैं।

 
मेरे मन में आता है यह- मैं भी यों ही मौज उड़ाऊं।
मेरे मन में आता है यह- मैं जल्दी पापा बन जाऊं।।

 
आफिस से घर आते पापा,
मम्मी चाय पिलाती हैं।
मैं विद्यालय से घर आता,
होमवर्क करवाती हैं।

 
मेरे मन में आता है यह- मैं भी चाय पियूं-सुस्ताऊं।।
मेरे मन में आता है यह-मैं जल्दी पापा बन जाऊं।।

 
पापा की गलती पर क्या-
कोई कुछ कर पाता है।
मुझसे गलती होती है तो-
मुझको पीटा जाता है।

 
मेरे मन में आता है यह- गलती हो पर मार न खाऊँ।
मेरे मन में आता है यह- मैं जल्दी पापा बन जाऊँ।।

                             -डॉ. कमलेश द्विवेदी








बचपन  बीत गया  !







 



क्या  बचपन  मेरा  बीत  गया 
 नहीं ! नहीं !
ठहर -ठहर कर यह  आता है
ममतामई की याद दिलाकर
शैशव्    मन के भाव जगाता है !

बड़ा कहो न मुझको 
मैं तो अनजान अबोध 
 बालपन की मस्ती से 
 पुलकित है मेरा मन !

सुखा  न  दे इस बगिया को
शुष्क हवा का झोंका
अधर धरा! में प्राण लटकते
प्रतिपल कम्पित होता उर 

  नीली -पीली आँखें करके                                                                                                                                        भयभीत करो न मुझको 
वही तो नैसर्गिक सुख है मेरा 
छीनो मत मुझसे इसको !

सुनो .सुनो पगों की आहट
वह खुद चलकर आया है
कभी न कहना बचपन बीता मेरा
वह तो घुमड़ -घुमड़ कर आया है !


           -सुधा  भार्गव






भगवान का दूसरा रूप










बच्चा सीखकर नहीं आता भाषा-ज्ञान
नहीं लेकर आता मां के गर्भ से
शब्दों का विशाल खजाना

 
चाहे सही, चाहे गलत
पढ़ाया जाता है नित नया पाठ
‘अ’ से ‘अनार’, तो कहीं ‘अ’ से ‘अमरूद’
‘ब’ से ‘बत्तख’ तो कहीं ‘ब’ से ‘बन्दूक’
‘ई’ से ‘ईख’, तो कहीं ‘ई’ से ‘ईश्वर’
‘ध’ से धन तो कहीं ‘ध’ से धर्म...

 बच्चा नहीं जानता
धन और धर्म का अंतर
‘ईख’ और ‘ईश्वर’
जात-पात / ऊँच-नीच
और अच्छे-बुरे के बीच भेद...

 पढ़ाया-सिखाया जाता है
इसी धरती पर उसे
स्वार्थ की खातिर
अपने-अपने रंग-ढंग से...

 
पढ़ाया जाता है ऐसा पाठ
जो धर्म को जोड़ सके नैतिकता से
ईश्वर को तौल सके मानवता से...
और धीरे-धीरे सीख ले वह
पूरी अच्छाई-पूरी बुराई...

 
मगर यह भी जान लो तुम
कि बच्चा सिर्फ ‘भगवान’ नहीं होता
भावी शैतान भी होता है वह
आखिर किस रूप में देखना चाहते हो तुम
बच्चे को?

भगवान के रूप में
या शैतान के रूप में?
पशु के रूप में या
इन्सान के रूप में!

   -सिद्धेश्वर

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                                                                                                                                                      माह विशेष


                                                                                                                                                  -श्याम कुमारी 


     तीन प्रश्न


अम्मां, मुझे बताओ तुम
सपने कैसे आते हैं?
परी देश को पल भर में,
हम सब को ले जाते हैं।

 
अम्मा मुझे बताओ तुम
बादल कैसे आते हैं?
घुमड़-घुमड़ जो पल भर में
अंबर में छा जाते हैं।

 
अम्मां जरा बताओ तुम,
प्रभुजी कैसे मिलते हैं-
एक अकेले होकर भी
कैसे सब में बसते हैं?




पूजा की बेला






ऊषा की बेला,
किरणों का मेला,                                                                                                                                                          सूरज जगाए हमें
पूजा की बेला।






रूप









जगमग-जगमग दूध कटोरा,
मुन्ना चंदा से भी गोरा।
जगमग माखन भरी कटोरी,
मुन्नी चांदनी सी गोरी।




 

 

मेरी लाडली








सोने की कली
सूरज सी खिली,
मेरी लाडली।

 मिसरी की डली,
तन-मन में घुली,
मेरी लाडली।




सपने








चांदी की किरणें,
सोने के सपने,
परियां सुलाएँ हमें
झुका के पलकें।

 




 कहानी









चंदा मुस्काए
मां कहे कहानी।
धीरे से आए
निंदिया की रानी।
चंदा मुस्काए
मां कहे कहानी।

 




परी देश









अम्मा मुझको ले चल तू
एक बार परियों के देश।
एक बार बस मुझे दिखा दे
है कैसा सपनों का देश।




 


सोना-जागना









रात रुपहली
लोरी गाए,
हमें सुलाए।

सुबह सुनहली
धूप सजाए,
हमें जगाए।

 



दूध-मलाई








मजेदार थी दूध-मलाई
पाकर खुशबू बिल्ली आई।
झट कुछ खाई, कुछ बिखराई,
मूछों में भी कुछ लिपटाई।                                         

 बरतन खनका, सुनकर आहट
अम्मा झटपट दौड़ी आई।
हाय बिलैया ने चट कर दी
सारी रबड़ी और मलाई।




 
टनटन









स्कूल की घंटी,
मंदिर का घंटा,
टन-टन  बजता,
अच्छा लगता।




 

पंछी









नन्हे कोमल पर फैला कर
उड़ते जब तुम नील गगन पर,
लगता फूल खिले हों नभ में
या नौका तैरती गंगा में।

 



बुलबुल









नन्ही-नन्ही बुलबुल आ जा,
फुदक-फुदक कर नीचे आ जा।
थोड़ा सा दाना तो खा जा,
मीठे-मीठे गीत सुना जा ।

 
चारा-चुग्गा हर दिन दूंगी,
पिंजरे में मैं नहीं रखूंगी।
प्यारी चिड़िया नीचे आ जा,
गाना गाकर मन बहला जा।







बलवान









मैं भीम के समान
बन जाऊँ बलवान।
राक्षसों को मारूँ
श्री राम के समान।

पूरा ज्ञान पाऊँ,
पर्वत को उठाऊँ
हनुमान के समान।

 

 

वर्षा








कलकल-कलकल नदिया बहती
झरझर-झरझर झरना झरता,
उमड़-घुमड़कर बादल गरजे,
रिमझिम-रिमजिम पानी बरसा।

 



जन्म-दिन









मां, रमिया ने बरतन मांजे,
सारे घर की करी सफाई,
आज जनम दिन पर मेरे तुम
उसको दो भरपेट मिठाई।

उसके बच्चों को भी दे दो
तुम कुछ टॉफ़ी और मिठाई।
नहीं जानते वे बेचारे
लगती कैसी केक मलाई।

आज जनम दिन पर मेरे तुम
सबको दो भरपेट मिठाई।


साभार 'बाल रंग-तरंग 24 शिशु गीत' से

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                                                                                                                                                            माह के कवि


                                                                                                                                                   -बाल कवि शिवांक

एक परी आए


एक परी आए
गरमी को दूर भगाए
परी हमारी दोस्त बन जाए


साथ हमारे खेले
साथ हमारे गाए

एक परी आए
दुनिया की सैर कराए
परी हमें कहानी सुनाए
सबसे अच्छी नींद सुलाए
सबका मन बहलाए

एक परी आए
होमवर्क कर जाए!






फुर्र चिड़िया फुर्र









फुर्र चिड़िया फुर्र
दाना खा के फुर्र
पानी पी के फुर्र
गाना गा के फुर्र !






चांदनी रात








रात होती है
तो चांद निकलता है
चांदनी रात में
हम खेल भी सकते हैं

जब हमारी लाइट जाती है
तभी तो चांदनी रात आती है!


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                                                                                                                                                               परिदृश्य


                                                                                                                                                          -शैल अग्रवाल

बाल-साहित्य में चंदा मामा  


कहते हैं कि मा को दो बार दोहराओ तब जाकर मामा बनते हैं; यानी कि मां से भी दुगना लाड-दुलार करने वाले मामा  ...शायद यही वजह है कि चांद की असलियत जान लेने के बाद भी चंदा मामा बच्चों के आज भी बेहद पास और प्रिय है और किसी न किसी रूप में बच्चों की कहानियों और कविताओं में आ ही जाते हैं। और शायद यही वजह है कि रात के अंधेरे में चंदा मामा का गोरा, दमकता, खिला-खिला चेहरा देखते ही बच्चे उनके पास जाने की या उन्हें अपने पास बुलाने की जिद करने लग जाते हैं;








झांक रहा बादल से चंदा, अम्मा उसे बुला ले तू
तुझको ही वह देख रहा है, अपने पास बुला ले तू।
सुबह उठेंगे एक साथ, फिर मिलकर दोनों खेलेंगे,
जो कुछ भी खाने को दोगी, बांट-बांटकर ले लेंगे।


                       -शकुन्तला सिरोठिया


पर चंदा मामा तो दूर के  हैं;


चंदा मामा दूर के


चंदा मामा दूर के
भरे थाल में कितने अच्छे
लड्डू मोती चूर के।
रख थाली में जला रहे क्यों
तुम ये दिए कपूर के
चंदा मामा दूर के !


         -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी



परन्तु बच्चा यह नहीं मानता है उसे तो चंदा चाहिए और तुरंत ही चाहिए-क्योकि कभी तो वह उसे मामा सा लगता है तो कभी रात की  कड़ाही में तैरता  गरम-गरम पूरी-सा-

पूरी-सा चंदा








रात की कड़ाही में
पूरी-सा चंदा
कितने पास आ बैठा, मां
देखो  अब दूरी-का चंदा


प्लेट में दे दे तू  मुझको
मैं  भी  तो अब देखूँ  ज़रा
ठंडा है, या गरम  बहुत है   
छत पर मेरी आ लटका  
जाने किस मजबूरी में चंदा !


                        -शैल अग्रवाल


दिनकर जी की चांद पर लिखी कविता चाँद का कुर्ता तो आज भी बच्चे-बच्चे को सर चढ़े जादू की तरह मोहती है। चांद के घटने-बढ़ने को ही नहीं, सन-सन हवाओं और ठिठुरती सर्दियों में चंदा के एकाकी सफर को मानो इस कविता ने आंखों के आगे साकार कर दिया हो। चांद की फरमाइश और बेबसी दोनों ही मन मोहक हैं-


चाँद का कुर्ता



हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला,
" सिलवा दो मां, मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।

 
सन-सन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूं,
ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूं।

 
आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का,
न हो अगर तो ला दो, कुर्ता ही कोई भाड़े का।"

 
बच्चे की सुन बात कहा माता ने, " अरे सलोने,
कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने।

 
जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूं,
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूं।

 
कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,
बड़ा किसी दिन हो जाता है और किसी दिन छोटा।

 
घटता बढ़ता रोज, किसी दिन ऐसा भी करता है,
नहीं किसी की आंखों को दिखलाई पड़ता है।

 
अब तू ही तो बता, नाप तेरा किस रोज लिवायें,
सीं दें एक झिंगोला जो हर दिन बदन में आये।  



इसी तरह रामनरेश त्रिपाठी जी की चंदा मामा कविता भी बड़ी ही लुभावनी और रोचक कविता है। कविता क्या है, एक मनभावन सा बेजोड़ किस्सा है। चंदामामा कचहरी गए , तो मामी निशा भला कब तक घर में अकेली सोई रहतीं! वह अकेली घूमने चल दीं और अग-जग की सुंदरता देख उनके पैर खुद ही नाच उठे।


पहले वह सागर पर नाचीं, फिर नाचीं जंगल में
नदियों पर नालों पर नाचीं, पेड़ों की ओझल में
फिर पहाड़ पर चढ़ चुपके से वह चोटी पर नाचीं
चोटी से उस बड़े महल की छत पर चढ़ वह नाचीं।

और बच्चों, मामी निशा इतना नाचीं कि उनका नौलखा हार ही टूट गया। मोती चारो तरफ बिखर गए। मामी बेचारी  रोती-रोती वहीं खड़ी रह गईं। और तब,

पाकर हाल दूसरे दिन ही चंदा मामा आए,
कुछ शर्माकर खड़ी हो गई मामी मुंह लटकाए।
चंदा मामा बहुत भले हैं, बोले क्यों है रोती,
दीया लेकर घर से निकले चले बीनने मोती।


कभी-कभी चंदा मामा के उतरे चेहरे और उधार की चमक दमक ने भी बच्चों के मन में कई सवाल उठाए हैं जिसे बालस्वरूप राही जी ने अपनी कविता उधार की चमक-दमक में बड़े ही सहज और बाल सुलभ ढंग से उठाया हैः


चंदा मामा कहो तुम्हारी
शान पुरानी कहां गई
कात रही थी बैठी चरखा
बुढ़िया नानी कहां गई


सूरज से रोशनी चुराकर
चाहे जितनी भी लाओ,
है उधार की चमक-दमक यह
नकली शान निराली है,


समझ गए हम चंदा मामा
रूप तुम्हारा जाली है।



पर बच्चों कोई कुछ भी कहे ये चंदा मामा की चरखा बुनती नानी और चदामामा ही तो है जिनकी वजह से बच्चों की यह लगातार कहानी और कविताओं का सिलसिला आज तक चला आ रहा है। आओ चलते-चलते चंदामामा की एक विशेष कहानी के साथ यह राज भी जान ही लेते हैं;  


कहानी की कहानी


बच्चों की फरमाइश पूरी करना चंदामामा के लिए असंभव सा होता जा रहा था और यह बात उन्हें बहुत दुख दे रही थी। ठीक भी तो था, वे बच्चों को प्यार भी तो बहुत करते थे, परन्तु कभी राजा-रानी की, तो कभी परियों वाली, कभी शेर-भालू की, तो कभी पिंजरे में बन्द तोते की, रोज-रोज नई कहानियां वे लाते तो लाते भी कहां से, और बच्चों की तो हमेशा बस यही एक जिद थी कि नई कहानी ही सुनेंगे! हारकर पूरे ही चन्द्रलोक में ढिंढोरा पिटवा दिया गया कि जो भी बच्चों को रोज नई कहानी सुनाएगा, उसे न सिर्फ पूरा राजपाट दे दिया जाएगा, बल्कि अपने हृदय से लगाकर...बेहद करीब रखेंगे चंदामामा। 

अगले दिन ही कहानी सुनाने वालों की लाइन लग गई, अब भला प्यारे-प्यारे से चंदामामा के पास चंद्र्लोक में कौन नही रहना चाहेगा, जहां चारो तरफ टिमटिम करते सुनहरे-रुपहले तारे हों और परियों का भी साथ हो! 

पर चंदामामा की तो एक और शर्त भी थी, जिसका पता चलते ही सभी कहानी सुनाने वालों के पसीने छूटने लगे। अब भगवान के अलावा ऐसी कहानी कौन कह सकता है जो कभी खतम ही न हो--या जहां से खतम हो फिर वहीं से शुरु भी हो जाए! फिर भी कहानी तो सुनानी ही थी, सबसे पहले वह जादूगर आया जिसका चारो तरफ बहुत नाम था और जिसे अपने जादू पर बहुत ज्यादा विश्वास भी था।

चंदामामा के आगे आते ही उसने अपनी कहानियों का पिटारा खोल दिया और सब कहानियां उछलकर तुरंत ही बाहर भी आ गईं। चारो तरफ बिखर गईं। चंदा के सिंहासन पर, रात की छतपर, तारों की खूंटी पर... अब चारो तरफ कहानियां ही कहानियां लटक रही थीं पर उन्हें क्रम से बांचने वाला  वहां कोई  नही था। कहानियां खुद अपनी-अपनी कहानी कह रही थीं और जादूगर चंदा के पास बैठा-बैठा इस अनहोनी जादूगरी पर खुश हो-होकर मुस्कुरा रहा था। अनियंत्रित इस शोर से चंदा के सर में ही नहीं, वहां उपस्थित सभी प्यारे-प्यारे बच्चों के सर में भी दर्द होने लगा और खुश हो कर सो जाने के बजाय वे सब जोर-जोर से रोने लग गये। अब तो सारे बच्चों की मांएं भी घबरा गईं। किसी ने अपने बच्चे को कंधे से लगाकर थपकी देनी शुरु कर दी तो कोई लोरी गा रही थी। कइयों ने तो झुंझला-झुंझलाकर बच्चों को पीट तक डाला और बच्चों को कभी चंदामामा के पास न भेजने की तुरंत ही धमकी तक दे डाली। अब भला चंदामामा बच्चों से कैसे दूर रह पाते, उसी वक्त जादूगर को आकाश-महल से बाहर भेजने  का हुक्म  दे दिया गया।

अब आई सुन्दर सी नन्ही परी की बारी, जो जाने कबसे लाइन में खड़ी इन्तजार कर रही थी। जब उसने चंदामामा के महल में घुसते ही अपने जुही की पंखुरियों-से कोमल और सुन्दर पंखों को फड़फड़ाया, तो झरती सुनहरी उस धूल के संग कई-कई कहानियां झिलमिल करती चांदनी में तैरने लगीं, मानो चारो तरफ कहानियों का एक रंग-बिरंगा इन्द्रधनुष निकल आया हो। अब तो खुश-खुश दौड़ते भागते बच्चे मन में आता जिस कहानी को पकड़ते और सुनने लग जाते, औरफिर सुनकर छोड़ भी देते यूँ ही तैरने और इन्द्रधनुष बनाने के लिए। इस तरह से उस हँसी-खुशी के माहौल में आराम से बीसियों साल निकल गए। बच्चे इतने खुश थे कि उन्हें अंधेरी रातों में भी कहानी ढूंढने में आनन्द आता---कहानी मिलती या नहीं, कितनी मिलती, इसतक की परवाह नहीं रह गई थी उन्हें अब तो। फिर एक दिन जब वे छोटे-छोटे बच्चे बड़े हो गए और खुद उनके अपने भी बच्चे हो गए, तो उन्होंने जाना कि उनके बच्चे अभी तक वही कहानियां सुन और सुना रहे हैं जो खुद उन्होंने भी कभी परी से सुनी और सुनाई थीं । असल में परी के पंख में जितनी भी कहानियां थीं, वे पृथ्वी के साथ-साथ ही घूमती रहती थीं और पूरे साल में जाकर चक्कर पूरा कर पाती थीं ---हां तुम लोगों ने ठीक समझा परी के पास बस तीन सौ पैंसठ ही कहानियां थीं, साल के हर दिन की  एक नई कहानी। पर चन्दा तो हमेशा ही, लगातार एक नई कहानी चाहता था इसलिए यह बात फैलते ही उसकी खोज फिरसे जारी हो गई।

इसबार उसने चंद्गलोक पर ही नहीं, सूर्यलोक, पृथ्वी और नौ ग्रह, सब जगह ही डुगडुगी बजवा दी। 

' लगातार कहानी कहो और चंद्रलोक के सिंहासन पर बैठो।'

पर लगातार कहानी तो किसी के पास नही थी। कोई भी आगे नही आया। चंदा अब सचमें ही बेहद उदास हो गया ---इतना उदास कि उसका पूरा मुंह कुम्हला गया, सारी चमक गायब हो गई। आंखों के नीचे बड़े-बड़े गढ्ढे बन गए...वही गढ्ढे जिन्हें आजकल एस्ट्रोनौट्स ने मून-क्रेटर का नाम दिया हैं। चंदामामा दिन-रात दुबला होता जा रहा था। किसी काम में उसका मन नहीं लग रहा था। उसका यह दुख उसकी मां से, जो अब बेहद बुढ़िया हो चली थी, देखा न गया। अपना सूत कातने का चरखा लेकर वह चांद के पास जा बैठी। चंदा का सर अपनी गोदी में ऱखकर बोली, मेरे चंदा, तू इतना उदास क्यों है, आ मैं सुनाऊंगी तुझे लगातार एक नई कहानी। चंदा को उस सफेद रूखे बालों वाली बुढ़िया मां की बात सुनकर हंसी आ गई। बोला, जाओ मां! यह सब तुम्हारे बस का नहीं। क्यों नहीं?  हंसकर बुढ़िया मां फिरसे बोली, आखिर मां हूं तेरी। बचपन से ही तेरी देखभाल करती आई हूँ...और तेरी हर जरूरत, पसंद-नापसंद को भलीभांति से जानती भी हूं। लगातार यह चरखा बुन सकती हूं तो क्या लगातार एक नई कहानी नहीं कह सकती--- और फिर तुम और तुम्हारे ये संगी-साथी, ये तारे भी तो हैं ही मेरी मदद के लिए। देखना मिलजुलकर सब काम हो ही जाएगा, परिवार और सहयोग की ताकत बहुत होती है और आपस में प्रेम हो, तो यह ताकत कई-कई गुना बढ़ जाती है। 

उस दिन से आजतक चंदा के साथ बैठी बुढ़िया नानी सूत की तरह ही कहानियां बुनती जा रही है। चरखा चलता रहता है, कहानियां निकलती रहती हैं। न चरखे का सूत टूटता है और ना ही कहानियों का क्रम। और अगर कभी सूत टूट भी जाए तो नानी इतनी सफाई से जोड़ देती है कि पास बैठे चंदा तक को पता नही चल पाता। उसकी ये कहानियां कभी-कभी तो चंदामामा को इतना खुश कर देती है कि वह फूलकर कुप्पा हो जाता है तो कभी इतना डरा देती है कि सूखकर कांटा। यही वजह है बच्चों कि तुम रोज ही चंदामामा को घटते बढ़ते देखा करते हो। चरखा बुनती नानी के पास हर रात एक नन्हा तारा अपनी नई कहानी लेकर आता है और रातभर खेलता रह जाता है। एक नए आत्म विश्वास के साथ जगमग- जगमग, जब वह अपनी नयी कहानी कहता है तो नानी उसे बेहद प्यार से देखती है और पृथ्वी पर बैठे बच्चों की तरह ही, कहानी को बहुत ध्यान से सुनती भी है । विश्वास नही तो आज ही रात को देखना, चंदा में बैठी वह बुढ़िया नानी, अभी भी वहीं बैठी दिखाई देगी वैसे ही चरखा चलाती और अगर ध्यान से सुनोगे तो रात के सन्नाटे में नन्हे-नन्हे तारों की नई-नई कहानियां भी चलते चरखे की आवाज के साथ किलक-किलककर गूंज रही होंगीं!

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                                                                                                                                                                  मंथन


                                                                                                                                                      - रोहिताश्व अस्थाना

बाल कविताः दशा, दिशा और संभावनाएं

बालक के सर्वांगणीय विकास में अनौपचारिक शिक्षा के रूप में बाल साहित्य का विशेष योगदान है। बाल साहित्य के सच्चे एवं प्रखर समीक्षक भी बाल पाठक ही होते हैं। बाल साहित्य की अनेक विधाएँ हैं यथा-बाल काव्य, बाल कथा, बाल उपन्यास, बाल नाटक, बाल एकांकी, बाल जीवनी, बाल यात्रा, ज्ञान-विज्ञान संबंधी लेख एवं आख्यायिका आदि। इनमें बाल काव्य की लोकप्रियता सर्वाधिक है। अपनी गेयता, लयात्मकता, संगीत्माकता एवं भाषा की सरलता के कारण बाल कविता बच्चों को सहज रूप में प्रभावित करके उनके मन एवं कंठ में उतर जाती है।

हिन्दी साहित्य में बाल कविता की एक विशाल एवं प्राचीन परंपरा विद्यमान है। हिंदी के सर्वप्रथम बाल काव्यकार महाकवि सूरदास हुए जो अपनी अंतदृष्टि से बात्सल्य रस का कोना-कोना झांक आए हैं। उन्होंने कृष्ण की बाल लीलाओं का जिस मनोवैज्ञानिक ढंग से निरूपण किया है, वह आज भी हमारे बाल काव्यकारों को लेखन की नई दिशा प्रदान करने में सक्षम है।

तभी से बाल काव्य लेखन की एक स्फुट परंपरा चल निकली। अनेक रचनाएं तो ऐसी हैं जिनके रचयिताओं का कहीं नाम ही नहीं मिलता। जैसेः सूख-सूख पट्टी, चंदन घट्टी/ बाबा के बाग में झंडा गड़ा / झंडा गया सूख, पट्टी गई सूख।

इन अलिखित एवं लोक प्रचिलित बाल कविताओं से प्रेरणा लेकर बाल साहित्यकारों ने लेखन प्रारंभ किया। आरंभिक प्रयासों में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र एवं महाबीर प्रसाद द्विवेदी की बाल कविताएं मिलती हैं। इस परंपरा को आगे बढ़ाने में पं.श्रीधर पाठक ने महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य किया। उन्होंने बच्चों के प्रिय पशु-पक्षियों पर छोटी-छोटी बाल कविताएँ लिखीं।

स्वतंत्रता के पूर्व के बाल रचनाकारों में इन कवियों के अतिरिक्त, कामता प्रसाद गुप्त, डॉ. विभु, मन्नन द्विवेदी गजपुरी, रामनरेश त्रिपाठी, भूपतनरायण दीक्षित, श्रीनाथ सिंह, सोहनलाल द्विवेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान, आरसी प्रसाद सिंह, शंभुनाथ सक्सेना, रमापति शुक्ल आदि का सर्जनात्मक योगदान रहा है।

स्वातंत्र्योत्तर काल के बाल कवियों में स्वर्ण सहोदर, निरंकार देव सेवक, विष्णुकांत पांडेय, चंद्रपाल सिंह यादव मयंक, राष्ट्रबंधु, रामवचन सिंह आनंद, विनोद चंद्र पांडेय, चिरंजीत, श्रीप्रसाद, धर्मपाल शास्त्री, देवेन्द्र दत्त तिवारी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, नर्मदा प्रसाद खरे, बालस्वरूप राही, शेरजंग गर्ग, चक्रधर नलिन, शिक्षार्थी, अशोक एम.ए., सीताराम गुप्त, कृष्णकांत तैलंग, सरस्वती कुमार दीपक, नारायण लाल परमार, हरिकृष्ण देवसरे, सूर्यकुमार पांडेय, शकुन्तला सिरोठिया, सरोजनी कुलश्रेष्ठ, जगदीश चंद्र शर्मा, सावित्री परमार, पूरन सरमा, राम निरंजन शर्मा ठिमाऊ, भैरूंलाल गर्ग, तारादत्त निर्विरोध, शंभुनाथ तिवारी आदि का योगदान रहा है।

  साठोत्तरी हिन्दी बाल काव्यकारों में सुरेन्द्र विक्रम, अजय, प्रसून, नागेश पांडेय ‘संजय’, अजय शर्मा यात्री, उषा यादव, विमला रस्तोगी, धीरेन्द्र कुमार यादव, शिवचरण चौहान, श्याम सुन्दर श्रीवास्तव कोमल, बालकृष्ण गर्ग, जहीर कुरेशी, राजा चौरसिया, राजनरायण चौधरी, पी. आर. शुक्ल, विभा शुक्ल, रंजना वर्मा, सुलेखा पांडेय आदि की लेखन–यात्रा जारी है!

बच्चों के आयु वर्ग के आधार पर बाल कविताओं के तीन प्रमुख भेद माने गए हैं। ये हैं –शिशु कविता, बाल कविता, किशोर कविता।

शिशु कविता के अंतर्गत तीन से पांच वर्ष तक के बच्चों के लिए लिखी गई चार से आठ पंक्तियों वाली वे कविताएँ आती हैं जो नन्हे-मुन्नों के प्रिय विषयों पर सरल भाषा में तुकबन्दी, ध्वन्यात्मकता एवं लयात्मकता को आधार बनाकर लिखी जाती हैं। शिशु कविता के प्रचार-प्रसार में पराग पत्रिका का विशेष योगदान सदैव स्वीकारा जाएगा।

शिशु कविताओं के दो संकलन तीन-तीन खंडों में हिन्दी प्रचारक संस्थान, वाराणसी द्वारा नन्ही कविताएँ एवं रिमझिम नाम से प्रकाशित किए गए। ये संकलन अपने आप में शिशु कविता के इतिहास को भी रेखांकित करते हैं। इनके अतिरिक्त निरंकार देव सेवक की शिशु कविताओं का एक संग्रह बिल्लो के गीत नाम से उपयुक्त प्रकाशन से प्रकाशित और चर्चित हुआ था। सेवक जी की एक शिशु रचना देखेः बाबा पढ़ते हैं अखबार/ अपनी आंखें करके चार/ एनक दिखा रही है शान/ चढ़ी नाक पर पकड़े कान।

वास्तव में ये शिशु कविताएँ ही हैं, जिन्हें बहुत-से लोग शिशु गीत कहते हैं। कविता और गीत के शिल्प विधान में मौलिक अंतर है। शिशु कविताएं बड़ो द्वारा बच्चों को सुनाकर याद करा दी जाती हैं, क्योंकि उस आयु वर्ग में बच्चे उन्हें पढ़ नहीं सकते। हां, चित्रों को देखकर और पंक्तियों को सुनकर वे उनका भाव अवश्य समझ लेते हैं।

बाल कविताएं वे हैं जो पांच वर्ष से बारह वर्ष तक के बच्चों के मनोविज्ञान, उनकी ग्राह्य क्षमता एवं उनके परिवेश को ध्यान में रखकर लिखी जाती हैं। बाल कविताओं और बाल गीतों के कई संपादित संकलन इधर काफी लोकप्रिय हुए हैं। इनमें नवीन रश्मि द्वारा संपादित हिन्दी के श्रेष्ठ बालगीत, हरिकृष्ण देवसरे द्वारा संपादित हिंदी की सौ बाल कविताएँ, रोहिताश्व अस्थाना द्वारा संपादित चुने हुए बाल गीत, अनिल चेतन द्वारा संपादित हिन्दी के सौ बालगीत प्रमुख हैं।

किशोर कविता के अंतर्गत बारह से सोलह वर्ष की आयु को ध्यान में रखते हुए लिखी गई कविताएं आती हैं। इन कविताओं की भाषा अपेक्षाकृत स्तरीय तथा विषयवस्तु किशोरों की आशाओं, आकांक्षाओं, उमंगों एवं अपेक्षाओं के अनुरूप और प्रेरक होती हैं। किशोर लेखनी का संपादन देवेन्द्र कुमार ‘देवेश‘ करते रहे हैं।

किशोर कविता का एक उदाहरण देखेः

तुझको या तेरे नदीश, गिरि वन को नमन करूं मैं
मेरे प्यारे देश ! देह या मन को नमन करूं मैं

किसको नमन करूं मैं, भारत, किसको नमन करूं मैं !        

विषयवस्तु के आधार पर बाल कविताओं के निम्न भेद हो सकते हैं। इनके अंतर्गत विपुल मात्रा में बाल-काव्य सृजन हुआ है। ये हैं-लोरयां, प्रभाती, प्रयाण गीत, खेल-कूद संबंधी गीत, राष्ट्रीय गीत, लोकशैली पर आधारित बालगीत, वैज्ञानिक एवं पर्यावरण विषयों पर आधारित गीत, विविध बाल गीत, गीत कथाएं आदि!

माताएं सामान्यतः लोरी गाकर अपने बच्चों को थपकी देते हुए सुलाती हैं। उनमें रात, चांद, परी, नींद आदि का चित्रण होता है। लोरी का नाम आते ही शकुंतला सिरोठिया और सरोजिनी कुलश्रेष्ठ के नाम अनायास ही स्मरण हो आते हैं और लगता है कि माताएं ही सर्वोत्तम लोरियां लिख सकती हैं। ये दोनों ही लोरी लेखन में सिद्ध और प्रसिद्ध हैं। शकुंतला सिरोठिया की लोरियों के संकलन आ री निंदिया और सोओ सुख निंदिया के नाम से छपे हैं। इसी प्रकार सरोजिनी कुलश्रेष्ठ की लोरियां आ जा री निंदिया नामक कृति में संकलित हैं। सरोजिनी जी ने बालकों के लिए ही नहीं, अपितु बालिकाओं के लिए भी समान रूप से लोरियां लिखी हैं।

प्रभातियों की चर्चा आते ही महाकवि सूरदास की जागिए, ब्रज राज कुंअर पंछी बन बोले तथा हरिऔध जी की उठो लाल अब आंखें खोलो नामक पंक्तियां सहज ही स्मरण हो आती हैं। इधर सरोजिनी कुलश्रेष्ठ का प्रभाती संग्रह भोर भई अब जागो प्यारे विशेष चर्चा में रहा है। ये प्रभातियां माताएं बच्चों को जगाने के लिए गाती-गुनगुनाती हैं। इनमें प्रभात का प्राकृतिक वर्णन सहज रूप में मिलता है। सरोजिनी कुलश्रेष्ठ की कुछ पंक्तियां देखेः

फूलों ने पांखें खोली हैं / तुम भी अपनी आंखें खोलो।
ये धुल गई ओस के जल से/ तुम भी अपनी आंखें खोलो।

प्रयाण गीतों में बच्चों को देश की आन-बान, शान की रक्षा करने के लिए आगे बढ़ने का उद्बोधन संन्निहित होता है। एक उदाहरण देखेः

वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो !
सामने पहाड़ हो, सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर हटो नहीं, तुम निडर डटो वहीं ! 

(द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी)

बच्चों में खेलकूद के प्रति रुचि जागृत करना तथा इस क्षेत्र में अनुकरणीय व्यक्तिओं से प्रेरणा दिलाना ही खेल-कूद संबंधी बाल गीतों की रचना का मूल उद्देश्य होता है। उदाहरणार्थः

चलो अखाड़े, पेलो दंड/ बनना तुमको बज्र प्रचंड। (राष्ट्रबंधु)

बच्चों में राष्ट्रीय भावना भरना तथा उन्हें सच्चा देशभक्त बनकर देश की रक्षा के लिए हंसते-हंसते अपने को बलिदान करने के लिए प्रेरित करना आज की अनिवार्यता बन गया है। बाल साहित्यकारों ने इस दायित्व का कुशलतापूर्वक निर्वाह किया हैः

जननी की जय-जय बोलेंगे/ अपनी ताकत को तोलेंगे।
हम धीर-वीर कहलाएंगे/ भारत की ध्वजा उड़ाएंगे।

                          ( सोहनलाल द्विवेदी)

लोक शैली पर आधारित रचनाएं राष्ट्रबंधु व श्री प्रसाद ने विशेष रूप से लिखी हैं। राष्ट्रबंधु की ये पंक्तियां तो बच्चे उनके साथ ही गुनगुना उठते हैः

रे लो, रे लो/ चाई-माई खेलो/ परेशानियां झेलो।

ऋतुओं और पर्वों पर भी पर्याप्त संख्या में बाल गीत लिखे गए हैं। होली, दीवाली आदि पर तो प्रति वर्ष बहुत-से बाल गीत लिखे जाते हैं परन्तु ईद, क्रिसमस आदि पर बहुत कम बाल गीत लिखे गए हैं।

बापू, नेहरू, शास्त्री, इंदिरा, सुभाष आदि पर बाल काव्य ही नहीं, अपितु बाल खंडकाव्य भी लिखे गए हैं। विनोद चंद्र पांडेय का जय सुभाष तथा रोहिताश्व अस्थाना का जय इंदिरा उपयोगी बाल खंड हैं।

बच्चों को हंसाने और गुदगुदाने वाली कविताएँ भी लिखी गईं, जिनमें राष्ट्रबंधु की मामा जी तथा सुंदरलाल अरुणेश की चांदी का चूहा शीर्षक रचनाएँ चर्चित रही हैं!

आज का युग विज्ञान का युग है। नई सदी विज्ञान की सदी होगी। अतः विज्ञान और पर्यावरण संबंधी बाल गीत भी लिखे गए हैं। विनोद चंद्र पांडेय के संपादन में बाल-कविता वार्षिक पत्रिका के विज्ञान एवं पर्यावरण विशेषांक इस दिशा में विशेष चर्चित रहे हैं। घमंडीलाल अग्रवाल ने भी अच्छे बाल विज्ञान गीत लिखे हैं।

वर्तमान में नागेस पांडेय ‘संजय‘, श्याम सुन्दर श्रीवास्तव ‘कोमल‘ महेश चंद्र त्रिपाठी आदि अच्छी बाल पहेलियां लिख रहे हैं। अजय शर्मा यात्री की बाल पहेलियों के दो संकलन भी हाल ही में प्रकाशित और चर्चित हुए हैं।

विविध विषयक बाल गीतों के अंतर्गत समस्त बाल परिदृश्य को रचनाकारों ने वाणी दी है। निरंकार देव सेवक, चंद्रपाल सिंह मयंक, विष्णुकांत पांडेय, रामवचन सिंह आनंद आदि ने उत्कृष्ट गीत कथाएं लिखी हैं।

बाल कविता लेखन में शिल्प और शैलीगत प्रयोग भी हुए हैं। सूर्यकुमार पांडेय ने हाइकू शैली में कुछ प्रयोग किए हैं। एक उदाहरण देखेः

बंदर बोला भेड़ से/ मामा अगर कहा मुझको/ कूद पड़ूंगा पेड़ से।।

मुनिलाल उपाध्याय सरस ने हाइकू से मिलती-जुलती शैली में तीन-तीन पंक्तियों की बाल रचनाएं लिखकर उनका प्रवर्तन ‘ बाल त्रिशूल ‘ के नाम से किया है। ये बाल त्रिशूल बाल प्रयाण नामक संग्रह में छपे हैं। एक उदाहरण देखेः

मेरा बाल त्रिशूल/ हंसी खुशी दे सब बच्चों को/ बिछा सुपथ पर फूल।।

बच्चों के लिए कई रचनाकारों ने बाल दोहे भी लिखे हैं। सूर्यकुमार पांडेय व दिनेश रस्तोगी के बाल दोहे काफी चर्चित रहे हैं।

बच्चों के लिए ब़ाल ग़ज़लें लिखने की शुरुआत निरंकार देव सेवक द्वारा की गई। बाद में लाला जगदलपुरी, सरस्वती कुमार दीपक, अजय प्रसून, सुरेन्द्र विक्रम आदि ने बच्चों के कर्यकलापों को ग़ज़ल के रूप में प्रस्तुत किया।

उस दिशा में सरस्वती कुमार दीपक की कृति नन्ही मुन्नी ग़ज़लें तथा रोहिताश्व अस्थाना की कृति नन्ही ग़ज़लें तथा रोहिताश्व अस्थाना की कृति नन्ही गजलें विशेष उल्लेखनीय हैं।

इधर नए प्रतीकों और बिंबों के माध्यम से बाल कविताएं लिखी जा रही हैं जिनका नयापन बालमन को प्रभावित करता है। नए ढंग से लिखने वालों में हरीश निगम, दामोदर अग्रवाल, दिविक रमेश, जयप्रकाश भारती, सूर्यभानु गुप्त, जहीर कुरेशी आदि के नाम लिए जा सकते हैं। यहां हरीश निगम की नई धुन  शीर्षक रचना उद्धरणीय है।

तितली रानी/ बड़ी सयानी/ बोली-भौंरे सुन
ओ अज्ञानी/ बड़ी पुरानी/ तेरी ये गुनगुन।
कालू राजा/ खा के खाजा/ छेड़ नई-सी धुन।।

कुल मिलाकर बाल साहित्य लेखन में कविताओं की दशा अच्छी है। हमारे पास बाल काव्य की जो उपलब्ध परंपरा है, उसे निरंतर नए पन के साथ आगे बढ़ाते रहने की आवश्यकता है। हमारे कवियों को नई सदी की मांग के अनुरूप बाल काव्य रचना होगा। चूंकि मीडिया ने बच्चों की बुद्धिमत्ता को एकदम बढ़ा दिया है, अतः अब वे पुराने ढंग की सीधी-सपाट और उपदेशात्मक बाल कविता पसंद नहीं करते हैं। आज का बच्चा चांद पर कविता पढ़ता हुआ, उस पर सूत कातती हुई बुढ़िया की परिकल्पना से सहमत न होकर राकेट द्वारा वहां जाने के अभियान को अधिक पसंद करेगा। नई सदी का बाल पाठक यह जानना चाहेगा कि आखिर चूहे, बिल्ली के अत्याचार को कब तक सहेंगे और क्या किसी परिस्थिति में वे बिल्ली के गले में घंटी बांधकर निर्भय हो सकेंगे  ! 

आज की परिस्थिति में बच्चों की मनोभावनाओं को रेखांकित करने वाली बाल कविताएं अधिक पसंद की जाएंगी। इस दृष्टि से सुरेन्द्र विक्रम की ‘कम्प्यूटर भैया‘ , ‘पार्क हाथ से निकल गया‘,‘जेब खर्च अब चार गुना हो‘ जैसी बाल कविताएं सचमुच सोद्देश्य और सराहनीय बन पड़ी हैं।

बाल कविता लेखन को सही दिशा में ले जाने के लिए जहां बाल साहित्यकार प्रसाररत हैं, वहां बाल कविताएं अधिक संख्या में छापनी चाहिए। बाल पत्रिकाओं में श्रेष्ठ व पठनीय बाल काव्य कृतियों का समीक्षात्मक परिचय प्रकाशन वर्ग सहित निरंतर छपना चाहिए ताकि बाल पाठक उन्हें पढ़ने का मन बना सकें।

बाल साहित्यकरों को बच्चों में बच्चा बनकर उनके मानसिक धरातल से सोचकर अपनी भावनाओं को काव्यबद्ध करना होगा। बस्ते का बढ़ता हुआ बोझ, अंतरिक्ष में शहर बसाना और यातायात की कल्पना करना, वैज्ञानिक विषयों पर नए ढंग से सोचना, नई सदी के भारत की कल्पना, पर्यावरण प्रदूषण, शांति अहिंसा का महत्व, राष्ट्रीय भावना आदि विषयों पर बच्चे बाल कविता अधिक पसंद करेंगे। आज गांवों में रहने वाले बच्चों के परिवेश तथा बालिकाओं को केन्द्र में रखकर बाल कविताएं और बालगीत लिखने की आवश्यकता है। बाल कविताएं ऐसी हों जिनसे बच्चे स्वयं प्रेरणा गृहण कर सकें।

बाल कविताओं में भाषा की सरलता, तुकबंदी एवं छंदज्ञान का भी बड़ा महत्व है। बाल कविता में यदि किंचित भी छंद दोष होगा तो लय टूट जाएगी और बच्चा उसे धाराप्रवाह न तो गुनगुना सकेगा और न ही कंठस्थ कर सकेगा।

बहुत-से लोग बाल कविता और बाल गीत में शैल्पिक अंतर नहीं कर पाते। सफल बाल काव्य लेखन के लिए तत्संबंधी साहित्य का निरंतर अध्ययन और मनन भी आवस्यक है।

सारांशतः हिन्दी में बाल काव्य लेखन की समृद्ध परंपरा विद्यमान है. हिन्दी में बाल कविता के लिए समीक्षात्मक मानदंड भी शोध अधइकारियों ने स्थापित किए हैं। हमारे बाल साहित्यकार भी सजग होकर सृजन में समृद्ध हैं। प्रतिभासंपन्न बच्चों को भी बाल कविता लेखन के प्रति आकर्षित किया जाना चाहिए। नई सदी में जाते हुए निःसंदेह आज बाल कविता लेखन की नई दिशाएं खुल रही हैं। बाल कविता की यह अजस्र धारा नई दिशाओं में प्रभावित होकर उपलब्धियों और संभावनाओं के नए-नए तीर्थ तलाश करेगी-ऐसा मेरा मत है।     

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                                                                                                                                                           परिचर्चा


                                                                                                                                                  -प्रकाश मनु

बच्चों की दुनिया का हर रंग है आज की बाल कहानियों में

बाल कहानियों के बारे में जब भी सोचना शुरु करता हूं तो बचपन की सपनीली दुनिया में पहुंचे बगैर नहीं रह पाता। वह दुनिया जिसमें मां और नानी द्वारा सुनाई गई एक-से-एक खूबसूरत और अचरज भरी कहानियों का अकूत खजाना था। उन्ही में ’अधकू की कहानी’ भी थी। एक हाथ, एक पैर वाला दुबला-पतला सीकिया अधकू, जो अपने कद्दावर, बलशाली भाइयों से लगातार तिरस्कृत होता है। उसे बे-काम का समझकर मारने की कोशिशें भी होती हैं। तब एक मां है, जो उसे हर बार बचाती है। वही सीकिया अधकू बड़ा होता है तो इतना समझदार बनता है कि राजकारा में बंदी अपने भाइयों का ’मुक्तिदाता ’ साबित होता है। कहानी का अंत होते-होते अधकू राजदरबार में भरपूर सम्मान पाता है और अपने भाइयों को भी ढंग का काम-काज दिला देता है।

मां जब यह कहानी सुना रही होती थी तो लगता था , वह दुबला-पतला सीकिया अधकू मैं ही हूं। और फिर कहानी के आगे बढ़ने के साथ-साथ एक तेज झंझावत की तरह अधकू का दर्द मेरे भीतर बहने लगता था। आंखों के आगे भविष्य के सपने और उजली कामनाओं के चिराग जलने लगते थे।

बचपन में सुनी ऐसी ही एक और कहानी थी उस राजकुमार की, जिसे चेतावनी दी जाती है कि वह महल की छह कोठरियां देख सकता है, पर सातवीं कोठरी में जाने की उसे मनाही है। वह राजकुमार भी पगला है, धुनी है। वह मन ही मन तय करता है कि चाहे जो हो, वह सातवीं कोठरी भी देखेगा कि आखिर इसमें क्या है?...और फिर एकाएक कहानी में तेज गति, बल्कि एक भूचाल-सा आ जाता है। राजकुमार के सिर पर एक के बाद एक मुसीबतें खौफनाक बिजलियों की तरह टूटने लगती हैं। ...इधर कहानी सुनने वाला नन्हा बालक – जो कि मैं हूं – लगभग सम्मोहन की हालत में है। छाती में धड़-धड़, धड़-धड़ शुरू हो जाती है। अजब-सा खौफ भरा मंजर ! लेकिन बड़ा मजा आता है।...कहानी भागती हुई आगे बढ़ती जा रही है और एक के बाद एक तिलस्मी दरवाजे खुलते जाते हैं। राजकुमार बड़े से बड़े दुख उठाता है, लेकिन हारता नहीं है, उफ तक नहीं करता। ...और अंत में वह विजयी भाव से सामने आता दिखाई पड़ता है। उसका माथा दमक रहा है...आंखों में चमक है!

मुझे याद है, बचपन में यह कहानी सुनते हुए लगता था, सातवीं कोठरी में जाने वाला वह अधपगला दुस्साहसी राजकुमार मैं हूं। बड़ा हुआ तो मैं भी उस सातवीं कोठरी में जाकर देखूंगा कि उसमें क्या कुछ रहस्य छिपा है। जो भी मुसीबतें आएंगी, झेलूंगा। लेकिन रुकूंगा नहीं, हारूंगा नहीं।

आज लगता है मेरी कलम को बचपन में सुनी उन्ही कहानियों का ’वरदान ’ मिला है। हृदय में करुणा, सहृदयता और परदुखकातरता शायद उन्ही कहानियों से आई हो, जो जाने-अनजाने मुझे इंसानियत का गहरा पाठ पढ़ा रही थीं।...जाने क्या बात है कि उसके बाद सुनी-पढ़ी सैकड़ों कहानियां फीकी पड़ीं, मुरझा गईं, पर बचपन में सुनी कहानियों का असर आज तक कम नहीं हुआ।

यह है बाल कहानियों की अदम्य शक्ति या ताकत जिस पर अक्सर कम ही गौर किया जाता है। वरना आज के ज्यादातर बड़े लेखक बाल कहानियों से इस कदर उदासीन न होते। और न दोयम दर्जे के तमाम लेखकों द्वारा बाल कहानी के नाम पर रद्दी भाषा में कुछ भी लिख देने का सिलसिला चल पाता। कुछ लोग तो बाल कहानी को उपदेश देने का बहाना भर ही मानते हैं और अपनी हर कहानी पर भारी-भरकम उपदेशों की ऐसी गठरियां लाद देते हैं कि कहानी उसके नीचे कलपती-कराहती और दीर्घ निश्वास लेती नजर आती है। इन कहानियों को पढ़ने वाले बच्चों की जो हालत होगी, उसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है।

फिर एक बात हमें यह भी नहीं भूलनी चाहिए कि ’कल की कहानी’ से ’आज की कहानी’ का मिजाज एकदम बदला हुआ है- बल्कि सच तो यह है कि वह लगातार बदलता गया है और बदल रहा है। आज की बाल कहानी पर आज के समय और हालात का तथा निरंतर बदलती हुई दुनिया की सच्चाइयों का इतना सीधा असर पड़ा है कि उसे नजरअंदाज करना मुमकिन नहीं है। आज के बच्चों को तिलिस्म उतना नहीं भाता, जितना अपने आसपास की दुनिया की छोटी से छोटी हलचल। या कि अपनी नन्ही-मुन्नी दुनिया की नन्ही-नन्ही मुश्किलें, सुख-दुख, सपने, आकांक्षाएं , यहां तक कि शिकवे-शिकायतें भी। यह दीगर बात है कि यहीं एक ’अच्छे ’ और ’बुरे’ कहानीकार की परख भी अच्छी तरह हो जाती है। एक बुरा कहानीकार किसी चीज को उपदेशात्मक ढांचे में, मुर्दा भाषा में कहेगा और झट से एक तीसरे दर्जे की फार्मूला कहानी लिख मारेगा, जिसका आदि और अंत एकदम तय है, जिसके चरित्र बेजान हैं और संवाद फीके, नीरस। लेकिन बढ़िया कहानीकार भाषा की जिंदादिली और किस्सागोई में ढालकर यही सब कहेगा तो उसमें जीवन का रस छलछला रहा होगा। औऱ ये ऐसी कहानियां होंगी, जिन्हें एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद बच्चे छोड़ नहीं पाएंगे, बल्कि बार-बार उनकी ओर खिंचेंगे। इन्हें पढ़ते हुए उनकी कल्पनाशीलता और ’क्रिएटिव उर्जा’-दोनों का खुद-ब-खुद विकास होगा।

अलबत्ता अच्छी कहानी क्या होती है और बच्चों पर उसका असर कितना गहरा और रचनात्मक किस्म का होता है, इस पर खूब बिस्तार से ढेरों बातें कही जा सकती हैं। पर मुझे लगता है कि इससे कहीं बेहतर है जो बढ़िया कहानियां मैंने गुजरे कुछ बरसों में पढ़ी हैं और जिनकी गूंजें-अनुगूंजें आज भी मैं लगातार अपने भीतर महसूस करता हूं, उनकी यहां चर्चा हो जाए. क्योंकि कोई अच्छी कहानी शायद खुद-ब-खुद यह बता देती है कि वह अच्छी क्यों है या कि उसमें दूसरी कहानियों से अलग और असरदार चीज क्या है।

गुजरे कुछ बरसों में पढ़ी कहानियों में जिस कहानी की याद सबसे पहले आती है, वह बैजयन्ती टोणपे की कहानी है। दीवाली के माहौल पर लिखी गई एक बहुत सादा-सी कहानी। दीवाली आई तो अपने साथ बहुत-सी चहल-पहल लेकर आई, बहुत-सी उमंगें और सपनों के रंग। दीवाली की यह रौनक एक छोटे से बच्चे के मन में भी हलचल मचा रही है। वह अपनी मां से पूछता है- “ मां, यदि मैं आज के दिन अपने दोस्तों को दावत पर बुला लूं, तो कैसा लगेगा!“ मां खुशी-खुशी दावत की तैयारी में लग जाती है।

मगर जब बालक के दोस्त दावत खाने के लिए आते हैं तो एक क्षण के लिए उसे झटका लगता है। वे झुग्गी-झोपड़ियों के मैले कपड़ों वाले गरीब बच्चे थे। अगले ही क्षण मां के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है और वह प्यार से उनका स्वागत करती है, प्यार से उन्हें खिलाती-पिलाती है। उस समय उन गरीब बच्चों के चेहरे पर जो दमकती हुई खुशी थी, उसने मानों दीपों के त्योहार में ऐसे अद्भुत रंग भर दिए थे, जैसे पहले कभी नजर ही नहीं आए थे। एक सादा, बहुत सादा कहानी भी कैसी पुरअसर हो सकती है, इसे वैजयंती टोणपे की यह कहानी पढ़कर समझा जा सकता है।

ऐसे ही एक अलग-सी कहानी है मोहम्मद अरशद खान की ’किराए का मकान’। एक बहुत छोटी-सी कहानी। लगभग घटनाहीन। लेकिन जब से मैंने इसे पढ़ा है, इसका असर और गूंजें-अनुगूंजें लगातार बढ़ती ही गई हैं। हुआ यह कि एक किराए के मकान में पुराने किरादार गए और उनकी जगह नए आ गए। इन नए किराएदारों में एक छोटा-सा बच्चा भी है, जिसका ध्यान पुराने किराएदारों की छूटी हुई  छोटी-छोटी चीजों पर जाता है। तब उसे मालूम पड़ता है, इस मकान में उस जैसा ही एक छोटा-सा बच्चा भी रहता था। उसकी एक बहन थी। वे कैसे-कैसे मजेदार खेल खेलते थे, क्या-क्या उनके शौक थे, छूटी हुई चीजें मानो उनकी कहानी बता रही हैं। और अब इस बच्चे के मन में उन दो छोटे बच्चों के लिए, जो यह मकानछोड़कर जा चुके हैं, जैसा गहरा लगाव पैदा होता है, उसे कह पाना निश्चित रूप से एक मुश्किल काम था। लेकिन मोहम्मद अशरद ख़ान ने बड़े कमाल के ढंग से एक छोटी-सी कहानी में वह सब कुछ इस ढंग-से गूंथ दिया है कि यह कहानी भुलाए भूलती ही नहीं।

इसी से मिलती-जुलती कहानी है मोहम्मद साजिद ख़ान की ’ट्रांसफर’। इसमें एक छोटी-सी प्यारी बच्ची निकी का बड़ा ही कोमल मन है, जिसकी पीड़ा शब्दों के पीछे से बार-बार उचकती-झांकती है। निकी को सहेली नेहा को घर छोड़कर जाना होता है, क्योंकि उसके पिता यानी राहुल अंकल का ट्रांसफर हो गया है। नेहा के जाने के बाद भी निकी उसे भूली नहीं और उसके साथ बीते क्षणों के साथ-साथ छोटी एक-एक चीज उसे याद आती रही। फिर एक दिन नेहा का पत्र आया, जिसमें उसका नया पता था। निकी ने झट नेहा को पत्र लिखा और उसका जवाब भी आया। पत्रों का सिलसिला चल पड़ा। लेकिन पढ़ाई की व्यस्तता के कारण पत्र-व्यवहार का यह सिलसिला बीच-बीच में धीमा भी पड़ जाता। कुछ अंतराल के बाद निकी ने एक-एक कर चार पत्र डाले, लेकिन एक का भी जवाब नहीं आया। हां, उस मकान में रहने वाले एक अंकल का छोटा-सा पत्र उसे मिला, जिसमें लिखा था कि अब यहां नेहा नाम की कोई लड़की नहीं रहती। पिंकी समझ गई कि नेहा के पापा का फिर कहीं ट्रांसफर हो गया है। अब फिर कभी मिलना हो न हो, सोचते ही निकी की आंखों की कोरों से दो बूंद आंसू ढुलक पड़े।...

एक मामूली चरित्र पर लिखी गई ऐसी ही अद्भुत कहानी है-देवेन्द्र कुमार की ’ रिक्शा डॉक्टर’। यह एक मामूली रिक्शा चालक रामदास की कहानी है जो मरीजों को, रात हो या दिन, डॉ. राय के क्लीनिक पर पहुंचाता है और इसमें उसे अजानी खुशी मिलती है। खराब से खराब मौसम में भी वह अपना काम करने से हिचकता नहीं था। और धीरे-धीरे हालत यह हुई कि लोग रामदास रिक्सेवाले का नाम ही भूल गए और उसका नाम पड़ गया ’रिक्शा डाक्टर’। इसी नाम से लोग उसे जानते और पुकारते थे। फिर एक दिन यही रिक्शा डाक्टर बीमार पड़ा तो डॉ.राय कैसे उसका घर तलाशते हुए उसके पास पहुंचे और उसे प्यार के साथ क्लीनिक ले गए। कहानी के अंत में इसका वर्णन मन पर बहुत गहरा असर छोड़ता है।

एक और यादगार कहानी है ओमप्रकाश कश्यप की ’नन्ही का बटुआ’। यह नन्ही कितनी समझदार है, कैसे एक-एक पैसा जोड़कर बटुए में रखती है और कैसे सावधानी से अपने बटुए की संभाल करती है, इसका वर्णन मैं करने नहीं जा रहा। कहानी पढ़कर ही इसे अच्छी तरह से समझा जा सकता है। लेकिन इसी नन्ही को एक दिन पता चलता है कि मित्ती –जो कि एक नौकरानी की बेटी है, सिर्फ इसलिए परीक्षा में नहीं बैठ पाएगी, क्योंकि उसके पास फीस देने के लिए पैसे नहीं हैं। यह पता चलते ही नन्ही के भीतर जैसे हलचल मचती है और एकाएक मानो वह बहुत बड़ी होकर अपना बटुआ लेकर मित्ती के स्कूल में उसकी फीस चुकाने पहुंच जाती है, इसका वर्णन ओमप्रकाश कश्यप ने बहुत अच्छे और प्रभावशाली ढंग से किया है। बाल कहानी में बच्चे के मनको टटोलने की जैसी कोशिश इस कहानी में है, वैसी कम ही नजर आती है।बच्चे के मन को पढ़ने की ऐसी ही कुछ उम्दा कोशिशें ससि बिष्ट की ’ बब्बू जी की तीर्थयात्रा’, मनोहर वर्मा की ’शक्कर आंदोलन’, ऊषा रानी की ’ चीं-चीं चूं-चूं’, क्षमा शर्मा की ’पेड़ पर स्कूल’, उषा यादव की ’ डायरी ’, मेधाविनी मोहन की ’ हंसती कली’ तथा मुकेश नौटियाल की ’स्कूल में अन्ना’ जैसी कहानियों में नजर आती है। ये कहानियां आश्चर्यजनक ढंग से एक-दूसरे से अलग हैं। लेकिन अपने जुदा तरीकों से वे बच्चे के मन को टोहने-टटोलने में कामयाब होती है। इसी से समझा जा सकता है कि अब बाल कहानियों में ’ टाइप्ड ’ चरित्रों और निश्चित अंत वाले बने-बनाए कथानकों का जमाना चला गया। जब तक हर कहानी अपने बिल्कुल अलग अन्दाज में बच्चे तक नहीं पहुंचती, तो उसे बाल कहानी या कोई ’ क्रिएटिव’ रचना कहना मुश्किल है। मगर इतना तय है कि कहानियां याद वहीं रहती हैं जिनमें चरित्रों और कथानक का अपना अलग गठन ही नहीं, कथा भाषा का भी अपना एक अलग रंग और अंदाज होता है।

ये कहानियां सिर्फ बानगी के तौर पर पेश की गई हैं। यह बताने के लिए कि आज की कहानी कया है या उसका बदला हुआ मिजाज कैसा है। निस्संदेह आज की बाल कहानियां इस यकीन के साथ लिखी जा रही हैं कि आज के बच्चे न सिर्फ ज्यादा ’ सयाने ’ हैं बल्कि वे संवेदनशील भी अधिक हैं और वे कहानी सिर्फ सुनने के लिए ही नहीं सुनते, बल्कि कुछ कर गुजरना भी चाहते हैं। चाहे वे एक छोटी-सी थाप ही दे पाएं, लेकिन सच्चाई और सच्चाई के पक्ष में वे अपनी छोटी-सी भूमिका निभाने में हिचकते नहीं हैं। इस लिहाज से कहानी उनके लिए सिर्फ ’ रस ’ या मनोरंजन का खजाना ही नहीं, बल्कि जीवन का निर्माण करने वाली किसी जिंदा शख्सियत या उत्फुल्ल प्रेरणा की तरह भी है।

दूसरी खास बात यह है कि आज की बाल कहानी जीवन के एक छोटे हिस्से नहीं, बल्कि बालक के संपूर्ण जीवन को अपने समूचेपन से चाहने की जिद पर आ गई लगती है। लिहाजा आज की बाल कहानी सिर्फ कल्पना की दुनिया की फंतासी कथा नहीं है जो जीवन से भागकर बच्चे को किसी तिलिस्म में शरणइ लेने को मजबूर करे। इसके बजाय आज का बच्चा उन कहानियों को कहीं ज्यादा पसंद करता है जो उस की दुनिया को कुछ इतने कल्पनापूर्ण तथा असरदार ढंग से उनके सामने रखें कि बच्चा चकित होकर उस खिलंदड़ी में न केवल खुद-ब-खुद शामिल हो जाए बल्कि खुद को उसका एक हिस्सा महसूस करे। यही वजह है कि आज की बाल कहानियों में न सिर्फ बच्चों की सक्रिय उपस्थिति बढ़ी है, बल्कि यहां वे अपनी पूरी रचनात्मक शक्ति, उर्जा और खिलंदड़पन के साथ मौजूद नजर आते हैं। जैसे इन बाल कहानियों से उन्हें जो शक्ति और रचनात्मक प्रेरणा मिलेगी, उससे वे अपनी पढ़ाई, खेलकूद और दूसरे तमाम कामों को बेहतर ढंग से कर पाएंगे।

आज की बाल कहानियों में तीसरी बड़ी खासियत दुखी और कमजोर लोगों के साथ कहानीकार ही नहीं, बल्कि बच्चे का भी सच्चा प्यार और गहरी हमदर्दी का होना है। इन बाल कहानियों में कमजोर और गरीब लोगों के लिए बच्चे का यह प्यार या हमदर्दी कोरा हवाई या दिखावटी नहीं है, बल्कि बच्चे उस दर्द को महसूस करके अपने आप को बदलने और कुछ कर दिखाने को विकल होते हैं। आज की बाल कहानियों में ऐसे उदाहरण कदम-कदम पर नजर आते हैं और यह, मैं समझता हूं, , एक बड़ी चीज है। क्योंकि आज के बच्चे के नजरिए में जो बदलाव आया है, उससे कल की दुनियी बदल जाने वाली है।

इस तरह की कहानियों में ओमप्रकाश कश्यप की बेहद संवेदनशील कहानी ’ नन्ही का बटुआ’ का हम जिक्र कर चुके हैं। गोपीचंद श्रीनागर की ’पानी वाली लड़की’, सरोजनी कुलश्रेष्ठ की ’ बबीता’, और देवेन्द्र कुमार की

ईमानदार रौशनी ’

जैसी कहानियां इसी संवेदना को अपने-अपने ढंग से विस्तार देती हैं। गोपीचंद श्रीनागर की ’पानी वाली लड़की’ एक गरीब लड़की है जिसने फटा-पुराना फ्राक पहना हुआ है और वह पानी बेचकर दो पैसे कमा लेने के लिए घर से निकलती है। पूछने पर पता चला, ट्रेन में लोटा भरकर स्वच्छ पानी बेचने वाली इस लड़की का नाम मीना है और फिर उसकी कहानी भी पता चली कि वह यात्रियों को जो मीठा पानी पिलाकर पैसे इकठ्ठे करती है, ये पैसे उसके पढ़ने के काम आएंगे। यह लड़की पानी जरूर बेचती है, लेकिन बेइमानी से पैसे कमाने में उसका यकीन नहीं है, इसले जैसे ही ट्रेन रेंगती है, वह बाकी पैसे लौटाती हुई सुरीली आवाज में कहती है-“बाबू जी, यह लीजिए अपने पचास पैसे।“ और तब उन यात्रियों के चेहरे उतर जाते हैं जो उसे बेईमान कहकर मजाक उड़ा रहे थे।

सरोजनी कुलश्रेष्ठ की ’बबीता ’ भी ऐसी ही गरीब लड़की की कहानी है जो दूसरों के घर काम करके भी हर हाल में पढ़ लेना चाहती है।

देवेन्द्र कुमार की कहानी ’ईमानदार रोशनी’ एक सनकी-से बाबा रंगी बाबा की कहानी है जो खाली मोमबत्तियां बेचते हैं। जब कभी रात को बिजली चली जाती है, तो वह झट छोटी-सी चौकी दरवाजे के पास रख लेते हैं और मोमबत्तियां बेचना शुरू कर देते हैं। लेकिन रंगी बाबा मोमबत्तियां बेचते क्यों हैं? जब यह राज समझ में आता है, तब उनके आगे पाठकों का सिर खुद-ब-खुद झुक जाता है। क्योंकि तब समझ में आता है कि रंगी बाबा उन लोगों में से हैं जो घुप्प अंधेरे में भी रोशनी की उजास को खत्म नहीं होने देना चाहते, भले ही उन्हें इसके लिए जीवन भर क्यों न खपना पड़े।

जगजीत सिंह की खूबसूरत कहानी ’नन्ही शिक्षिका’ की नायिका एक नन्ही बच्ची है जो अड़ोस-पड़ोस के धोबियों को पढ़ाना शुरू करती है और इस काम में उसे इतना आनंद आता है कि अपनी अद्भुत लगन के कारण सब ओर इस भली-भली-सी नन्ही शिक्षिका की कीर्ति फैल जाती है।

इधर की कहानियां निस्संदेह आदर्श की बात करती हैं पर ये आदर्श हवाई आदर्श नहीं हैं और जीवन के रोजमर्रा के व्यवहार और सुख-दुख से उनका गहरा रिश्ता है। इसीलिए दामोदर अग्रवाल की कहानी के ’मास्टर जी’ आदर्श होकर भी हमें इतने प्यारे और अपने लगते हैं। उनका अभिमानी छात्र भले ही साधारण वस्त्रों के कारण उनका मजाक उड़ाए, पर जब वह अपने पिता को आदर से मास्टर जी के आगे झुकते देखता है और जब यह राज उसके आगे खुलता है कि मास्टर जी ने बहुत से विद्यार्थियों को धन से मदद करके उन्हें पढ़ाया और जीवन में आगे बढ़ने में मदद की है, तो इस गर्वीले छात्र का अभिमान खुद-ब-खुद चूर-चूर हो जाता है।...यानी आज की कहानियों के आदर्शवाद में यथार्थ जीवन की चमक मौजूद है।

एक दौर था जबकि हिन्दी में बड़े-से बड़े सेखकों ने बच्चों के लिए बेहतरीन कहानियां लिखीं। कृश्न चंदर, इस्मत चुगताई, भीष्म साहनी, मन्मथनाथ गुप्त, रघुपति सहाय ’फिराक ’ , मैथलीशरण गुप्त, श्यामू सन्यासी, निर्मल वर्मा, शैलेश मटियानी, नागार्जुन, कमलेश्वर, मोहन राकेश, मन्नू भंडारी, सावित्री देवी वर्मा, दिलीप कौर टिवाड़ा, अभिमन्यु अनंत, यादवेन्द्र शर्मा ’चन्द्र ’, राजेन्द्र अवस्थी, गोविन्द मिश्र, शशिप्रभा शास्त्री, शकुंतला सिरोठिया और यहां तक कि पूर्व राष्ट्रपति तथा शिक्षामंत्री डॉ. ज़ाकिर हुसैन की लिखी ऐसी खूबसूरत कहानियां भी पढ़ने को मिलती हैं जिनमें बब्चे का मन और इच्छा-संसार शामिल है और बच्चे बिना पूरा पढ़े उन्हें छोड़ नहीं पाते।

इस लिहाज से ज़ाकिर हुसैन की ’ अब्बू खां की बकरी’ तो पहाड़ के परिवेश पर लिखी गई लाजवाब कहानी है, जो बच्चों का मन मोह लेती है। यह पहाड़ पर रहने वाले एक बहुत प्यारे और खूबसूरत इन्सान अब्बू खां की कहानी है जिन्हें बकरियां पालने का शौक है। वह कितने प्यार से बकरियों को पालते थे और उनका इतना ख्याल रखते थे कि क्या कहना ! मगर इसके बाद भी अब्बू खां की बकरियां रस्सी तुड़ाकर पहाड़ के उंचे शिखर पर चली जाती थीं। वहां एक भेड़िया रहता था जो उन्हें खा जाता था। अब्बू खां इससे परेशान थे। वह बकरियों को और कसकर बांधते और ज्यादा ख्याल रखते, मगर बकरियां थीं कि उन्हें पहाड़ पर जाए बगैर चैन न पड़ता। वहां वे पूरी आजादी के साथ सांस लेती थीं, भले ही भेड़िया उन्हें क्यों न खा जाए। ऐसे ही अब्बू खां की एक बहुत प्यारी खूबसूरत बकरी थी चांदनी, जिस पर वह बहुत प्यार लुटाते थे और उन्हें लगता था, यह बकरी उन्हें कभी छोड़कर नहीं जाएगी। मगर चांदनी भी उसी तरह रस्सी तुड़ाकर पहाड़ की चोटी पर गई। वहां उसने पूरी आजादी के साथ सांस ली और भेड़िए का शिकार हो गई। उसकी सफेद काया रक्तरंजित होकर पहाड़ के शिखर पर गिर पड़ी और भेड़िया उसे खा गया।

लेकिन कहानी का असली मर्मांतक बिंदु यह है कि मरने से पहले अपने दो सींगों के बल पर उस नाजुक-सी बकरी ने रात भर उस दुष्ट भेड़िए का मुकाबला किया और उसे बार-बार पचाड़ा। सुबह जब मस्जिद से अजान की आवाज आई, चांदनी ने मन में कहा- “ अल्लाह तेरा शुक्र है। मैने अपने बस भर तेरा मुकाबला किया, अब तेरी मर्जी। “ यों उस खूबसूरत बकरी चांदनी की साहस कथा खत्म हो गई। मगर पेड़ पर बैठी एक बूढ़ी-सी चिड़िया इस बात को जरूर जानती है कि चांदनी खत्म जरूर हो गई, मगर आखिरकार तो भेड़िया नहीं, चांदनी ही जीती।

श्यामू सन्यासी की ’ खरहा भाई और भेड़िया दादा’ भी खासी रोमांचक कथा है। हर बार भेड़िया खरहा के बच्चों पर घात लगाकर हमला करता है और खा-पीकर डकार लेता है। खरहा भाई-भौजाई रोते-धोते हैं और उनका रोना-कलपना देख, पेड़-पौधे तक के आंसू आ जाते हैं, आसमान की छाती फटने लगती है। मगर बार-बार यह कहानी दोहराई जाती है तो खरहा भाई-भौजाई के आंसू आखिर सूख गए और फिर उन्हें लगा कि कुछ तो रास्ता निकालना चाहिए। अंततः वे कारीगरों को बुलाकर शीशण के तख्तों से एक पक्का मकान बनवाते हैं और फिर भेड़िया दादा और खरहा भाई की कहानी एकाएक उलट जाती है। भेड़िया दादा संदूक में बंद हुए और आखिर ’ परमधाम ’ पहुंच गए। कहानी के अंत में खरहा भाई-भौजाई और उनके बाल-बच्चों की खुशी का बड़ा प्यारा-सा चित्र है।

कृश्न चंदर की कहानी ’गंडक का भूत’ यों तो परंपरागत परी कथाओं जैसी है, लेकिन लिखने का अंदाज और भाषा जिंदादिली से ऐसी भरपूर है कि समज में आता है कि एक बड़े कहानीकार की कलम का स्पर्श कहानी को क्या से क्या बना देता है। ’ गंडक का भूत ’ में राजा उदास है क्योंकि उसके खजाने पर एक भूत ने कब्जा कर लिया है और इस भूत का कोई मुकाबला नहीं कर पाता। मजे की बात यह है कि इस जबर्दस्त ताकतवर भूत को एक छोटा, बहुत छोटा बच्चा ही काबू करता है और उससे माफी मंगवाता है।

कृष्ण बलदेव वैद की ’ जादू का चोगा ’ और भीष्म साहनी की ’ अनोखी हड्डी ’ भी राजाओं के परिवेश पर लिखी गई कहानियां हैं। मगर उन्हें इस बात के उदाहरण के रूप में देखा जाना चाहिए कि किसी राजा की कहानी में भी आज के जीवन का सत्य कितने पुरजोर ठंग से आ सकता है।

खास बात यह है कि इन बड़े लेखकों की लिखी हुई कहानियों में जीवन का सुख-दुख और करुणा सहज ही समा गई लगती है। शैलेश मटियानी की ’रुनझुना दीदी रुनझुना’ में छोटे भाई का दर्द कहानी का अंत आते-आते अगर उसकी अमीर और क्रूर हृदय वाली बहन की संपन्नता की खिल्ली उड़ाता है, तो निर्मल वर्मा की कहानी ’ बाज और सांप ’ में आकाश में उड़ने वाला साहसी बाज मरकर भी डरे हुए घर-घुसरे सांप से मानो जीत जाता है। इस्मत चुगताई की बच्चों के लिए लिखी गई अलमस्त कहानी ’ कामचोर’ इस लिहाज से इन सब कहानियों से अलग है कि यहां बच्चे अपने पूरे नटखट अंदाज, शरारतीपन और क्रिएटिव उर्जा के साथ मौजूद हैं।

मैथलीशरण गुप्त की ’ जगतदेव ’ सावित्री देवी वर्मा की ’बर्फ का दूल्हा’ मन्मथनाथ गुप्त की ’ जैसी करनी वैसी भरनी’, रघुपति सहाय ’ फिराक’ की ’ बेताल का भूत’, अभिमन्यु अनंत की ’ मायापुर की अगमजानी ’, दिलीप कौर टिवाड़ा की ’ सेमल ’ भी बच्चों के लिए लिखी गई दिलचस्प कहानियां हैं। यादवेन्द्र शर्मा ’चन्द्र’ की’ टिड्डी पुराण ’, गोविन्द मिश्र की ’ कवि के घर में चोर’ और शकुन्तला सिरोठिया की ’गुलमोहर ’ भी बच्चों के लिए लिखी गई यादगार कहानियां हैं।

वरिष्ठ कथाकारों में देवेन्द्र सत्यार्थी और विष्णु प्रभाकर की बाल कहानियों की अलग ही सजधज है। इनमें कथा-कौशल के साथ-साथ भाषा का जादुई सम्मोहन भी बांधता है।

देवेन्द्र सत्यार्थी की ’ अदारंग सदारंग ’, ’मौसी पपीते वाली’, ’ चिड़िया की आंख ’ और ’ बस एक फूल’ इस लिहाज से लाजवाब कहानियां हैं। खासकर ’ अदारंग सदारंग’ नाम के दो बड़े कद और बड़े दिल वाले खासे लहीम-शहीम भाई राजा के दरबार में जाकर जादू जैसा जो दृश्य उपस्थित करते हैं, उसे भूल पाना नामुमकिन है। इसी तरह ’ मौसी पपीते वाली ’ बड़ी भावात्मक कहानी है और अपने मीठे सम्मोहक प्रभाव तथा सच्ची खुरदरी आत्मीयता के लिहाज से यह कहानी कुछ-कुछ रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ’ काबुली वाला’ की याद दिलाती है।

विष्णु प्रभाकर की ’ पहाड़ चढ़े गजानन लाल’, ’ दक्खन गए गजानन लाल’ , ’ कहीं कुछ नहीं बदला ’, ’ सबसे सुन्दर लड़की ’, ’ धन्य है आपकी परख ’ भी सुन्दर कहानियां हैं जिनमें ’ पहाड़ चढ़े गजानन लाल’ तो कहानी की भाषा और गजानन लाल की जिंदादिली के कारण कभी भुलाई नहीं जा सकती।

हिन्दी में पशु-पक्षियों को लेकर लिखी गई कहानियों के बड़े स्पष्ट ढांचे बन चुके हैं। और इस तरह की ज्यादातर कहानियां सांचों में ढली कहानियां हैं। एक सांचा तो पंचतंत्र ढली कहानियों का ही है, जिन्हें निर्लज्जता से ज्यों का त्यों अपने नाम से छपवाने में बहुत-से तथा कथित बड़े कहानीकारों को झिझक नहीं होती। फिर पशु-पक्षियों का बेतुके ढंग से मानवीकरण करके उन पर बेतुके करतब लाद देने वाली हड़बड़िया कहानियों का भी एक अलग सांचा बन गया है। इन कहानियों में हल्का-सा मजा भले ही हो, लेकिन ये बच्चे के अनंत संसार में उतरकर उन्हें गहराई से छू नहीं पातीं।

तो भी हिंदी में ऐसी बाल कहानियों की कमी नहीं है जो नायक के रूप में पशु-पक्षियों को लेकर उन्हें सचमुच बालक के मन और कल्पना की मनोरम दुनिया से जोड़ देती हैं। देवेन्द्र कुमार, अमर गोस्वामी, हरिकृष्ण देवसरे, शोभनाथ लाल, क्षमा शर्मा, अजामिल आदि कहानीकारों की पशु-पक्षियों के इर्द-गिर्द घूमती कुछ ऐसी दिलचस्प कहानियां पढ़ने को मिलती हैं जो मानो यह प्रकट कर देती हैं कि इस दिशा में काम करने की अभी बहुत गुंजाइश है। देवेन्द्र कुमार की ’ चिड़िया का सच’ और ’ कौन जाने’ कहानियों में चिड़िया का होना हमें मनुष्य से कहीं ज्यादा बड़े सच के होने जैसा लगता है। इसलिए कि ’ चिड़िया का सच’ में खुशामद पसंद राजा को साधारण जनता के दुख-दर्द की कथा कोई और नहीं, महज एक नन्ही चिड़िया ही सुना पाती है। कहानी का अंत दुख भरा है, क्योंकि सच्चाई कहने के बदले चिड़िया की जान भी जा सकती थी। लेकिन चिड़िया उदास फिर भी नहीं है, क्योंकि जितनी उसकी सामर्थ्य थी, उतनी कोशिश करके उसने एक बड़ा और असुविधाजनक सच राजा तक पहुंचाया तो।

क्षमा शर्मा की ’ तितली की खुशी ’ कहानी में एक नन्ही-सी तितली की नन्ही-सी खुशी बस इतनी है कि उसने एक रोते हुए बच्चे को थोड़ी रंग भरी उड़ान देकर चुप करा दिया। ’ पप्पू चला ढूँढने शेर ’ भी क्षमा शर्मा की बड़ी खूबसूरत कहानी है जिसमें शेर की कहानी पढ़ते-पढ़ते पप्पू एकाएक जंगल में जा पहुंचता है। अब पप्पू जंगल में शेर ढूंढ रहा है और वहां शेर तो नहीं मिलता, मगर एक के बाद एक ऐसे मंजर नजर आते हैं, जो बच्चे के मन को मोह लेते हैं।

अमर गोस्वामी की ’ शेरसिंह का चश्मा ’, ’ खुशबू की ताकत ’ जैसी कहानियां भी शेर, हाथी बगैरह को लेकर लिखी गई बड़ी दिलचस्प कहानियां हैं। उनकी कहानी ’ नन्ही दोस्त ’ में एक नन्हे बालक मनोज और गौरैया की दोस्ती है। यह दोस्ती इतनी गहरी और सच्ची है कि मनोज जब बीमार पड़ता है, तो गौरैया भी उदास हो जाती है। फिर जब वह अच्छा हो जाता है, तो गौरैया अपनी चोंच में एक नन्हा-सा रंग-बिरंगा फूल दबाए लौटती है और उसे मनोज की गोदी में गिरा देती है। अपनी चूं-चूं की बोली में मानो वह गा रही है- ’ तुम जिओ हजारों साल!’

रामगोपाल वर्मा के बृहद संग्रह एक सौ एक बाल कहानियां में भी पशु-पक्षियों को लेकर लिखी गई कई नन्ही-मुन्नी कहानियां हैं। इनमें ’ तितली और फूल ’ में तितली और फूल की दोस्ती बहुत भली-भली-सी है। तितली फूल से रस लेती है और उड़ जाती है। लेकिन वही फूल जब मुरझाने लगा तो तितली को देखकर रो पड़ा। बोला- ’ तितली बहन मैं मर रहा हूं।’ सुनकर तितली उदास हो गई। सोचने लगी, भले ही जीवन छोटा हो, पर फूल जैसा सुन्दर होना चाहिए। रामगोपाल वर्मा की ’ कुट-कुट’ एक चूहे को लेकर लिखी गई नन्ही मजेदार कहानी है। लेकिन उनकी इससे भी दिलचस्प कहानियां वे हैं, जिनमें ’ चूहे सिंह ’ के चुहिया रानी के नाम लिखे गए अलग-अलग पत्र हैं और वे पत्र चूहे सिंह और चुहिया रानी के दाम्पत्य के सचमुच बड़े मनोहर चित्र आंखों के आगे उपस्थित कर देते हैं।

प्रसिद्ध कथाकार मन्मथनाथ गुप्त की कहानी ’ ज्ञानी चूहा ’ भी खासी चर्चित हुई है।

अजामिल की ’ एक थी गिल्लू’, गिल्लू मौसी की कहानी है। पेड़ पर चढ़कर चूहे और तोताराम को सड़े-गले फल देने वाली गिलहरी-गिल्लू मौसी की कहानी। लेकिन ऐसी गिल्लू मौसी को भी एक दिन अक्ल आ ही गई। और जब अक्ल आई तो वह मन की सारी कड़वाहट भूल गई।

शोबानाथ लाल की ’ कछुआ और पाजी खरगोश ’ भी कुछ लीक से हटकर अलग कहानी है। राजा को खुजली है और उसे राजवैद्य ने तालाब के साफ पानी में नहाने की सलाह दी है. मगर सारे दरबानों की आंख में धूल झोंककर न जाने कौन उस तालाब का पानी गंदला कर जाता है। तब कछुए ने उसे पकड़ने की जिम्मेदारी उठाई और पीठ पर चारकोल चिपकाकर जैसे नाटकीय ढंग से उसने पाजी खरगोश को पकड़ा, उससे कहानी खुद-ब-खुद एक मजेदार शक्ल लेती चली गई।

लेकिन हरिकृष्ण देवसरे ने ’ खरबूजे ने बदला रंग ’ और ’ तोता मैना का नया संवाद’ में पशु-पक्षियों को लेकर लिखी गई कहानियों का एक अलग विन्यास ही नहीं दिया, बल्कि एक अलग राह भी खोज निकाली है। इनमें ’ खरबूजे ने बदला रंग ’ की खासियत यह है कि इस पुष्तक की कथाओं में हरिकृष्ण देवसरे ने पंचतंत्र के कथाशिल्प को एक आदुनिक कलेवर में पेश किया है। इनमें कई कहानियां ऐसी हैं जिनकी पृष्ठभूमि में पंचतंत्र की कोई न कोई कथा है। बल्कि पंचतंत्र की कथा जहां खत्म होती है, ’ खरबूजे ने बदला रंग’ की बहुतेरी कथाएं वहां से शुरू होती हैं। हरिकृष्ण देवसरे पुराने चरित्रों को आधुनिक संदर्भों की रोशनी में ऐसा रूप देने चलते हैं कि आज वे कहीं ज्यादा हमें अपने आसपास के लगते हैं।

नागार्जुन, आनंद कुमार, प्रेमलता वात्स्यायन और उषा रानी की भी पशु-पक्षियों को नायक बनाकर लिखी गई कहानियां पढ़ने को मिलती हैं। बाबा नागार्जुन की कथा मंजरी के दो खंडों में पंचतंत्र वाले शिल्प को अपनाकर पशु-पक्षियों की बड़ी रोचक और जानदार कहानियां बुनी गई हैं, जो आज के जीवन से भी जुड़ती हैं और खेल-खेल में नए पाठ सिखाती चलती हैं। आनंद कुमार की ’ कपटी-बिलाव ’ ’ चतुर सियारिन ’ जैसी कहानियां खासी मशहूर हुई हैं। प्रेमलता वात्स्यायन की ’ काना गीदड़’ कहानी भी खासी मजेदार है। पशु-पक्षियों को लेकर लिखी गई कहानियों में उषा रानी की ’ चूं-चूं-चीं-चीं’जैसी कहानियां इसलिए एकदम अलग नजर ती हैं क्योंकि  यहां बच्चा कहानी के एकदम केन्द्र में है और बच्चे तथा पशु-पक्षियों की नैसर्गिक दोस्ती खुद-ब-खुद कहानी की शक्ल लेती, आगे बढ़ती है।

और अब जरा हास्य प्रधान कहानियों की चर्चा की जाए, जो निस्संदेह अलग से चर्चा की हकदार भी हैं।

हिन्दी में हास्य की कमी की अक्सर शिकायत की जाती है और इसे तो लगभग तय ही मान लिया गया है कि बड़ों के कथा साहित्य में भी ज्यादा बढ़िया हास्य कथाएँ नहीं हैं। इस लिहाज से हिन्दी का बालकथा साहित्य थोड़ा सौभाग्यशाली है। यहां बहुत अधिक मात्रा में तो नहीं, लेकिन ऐसी चुस्त, खिलंदड़ी बाल कथाएं हर दौर पर लिखी गईँ, जो बच्चों के मन को गुदगुदाएँ और उदासी के कोहरे को चीरकर उन्हें हंसना हंसाना सिखाएँ। हिंदी के वरिष्ठ कथाकारों में शैलेश मटियानी, द्रोणवीर कोहली, हरीश तिवारी, नारायण प्रसाद, मुबारक अली, विद्याधर शुक्ल आदि की जोरदार बाल कहानियां पढ़ने को मिलती हैं। इनमें कुछ कथाकार श्रुति परंपरा से चली आती पारंपरिक हास्य कथाओं को ही नए अंदाज में छालकर पेश करते हैं, तो कुछ के यहां हास्य की एकदम मौलिक उद्भावना है।

शैलेष मटियानी की ’ धनुषभंग’ इस लिहाज से बड़ी मजेदार बालकहानी है, जिसमें रामलीला के मैनेजर ख्यालीराम और बांकेराम साह जी के घराने की पुश्तैनी दुश्मनी रामलीला में नाटक के अंदर एक और रसीले नाटक को जन्म देती है। इधर जनता रामचंद्र की जय बोलने को उतावली है और उधर राम जी का धनुष टूटने को ही नहीं आ रहा।

विश्वनाथ मुखर्जी की कहानी ’झबरा की मुसीबत ’ में एक बाल न कटवाने वाले बच्चे का किस्सा है, जिसे बचाने के चक्कर में अपने एक सहपाठी दोस्त के अनाड़ी हाथों से उल्टे-सीधे बाल कटवाकर चला आता है। और उसे देखने वाले हैरान हैं कि ’ अरे, यह क्या ! झबरा के बालों को बकरी खा गई!’

हरीश तिवारी की ’ उधार की वसूली’ और ’ अरे मैं लम्बा हो गया’ में दूसरों को बेवकूफ बनाकर उधार सामान ले जाने औसे मजे से डकारने वाले कज्जन बाबू की बड़ी चुहल भरी कथा है।

मगर विद्याधर शुक्ल की  ’ चोर से मुठभेड़’ शायद इससे भी दो कदम आगे है, जिसमें सारा घर चोर का मुकाबला करने के लिए लाठियां-डंडे लेकर निकल आता है। बड़ी सावधानी से उसे पकड़नेकी रणनीति बनती है। पग-पग पर भय, रहस्य और रोमांच, लेकिन कहानी के अंत में छत का दरवाजा खोलकर, टीन पर चढ़कर देखा गया तो एक उल्लू जोर से फड़फड़ाता हुआ उड़ गया। और उस वक्त चोर को पकड़ने वालों का जो हाल था, वह शायद बयान से बाहर है।

कुंदनलाल की कहानी ’ कल्लू चाचा जागे ’ और हसन जमाल छीपा की ’कल्लू चाचा ने सिनेमा देखा’ में भी शुद्ध हास्य की बड़ी अजब-गजब छटाएँ हैं।

विष्णु प्रभाकर की ’ पहाड़ चढ़े गजानन लाल’ में हास्य का एक अलग मोहक अन्दाज है। गजनंदन लाल के भारी शरीर को देखकर किसी को यकीन नहीं था कि वह पहाड़ की दुर्गम चढ़ाई चढ़ पाएंगे। मगर गजनंदन लाल बाकायदा पहाड़ पर चढ़े और अपने सहयात्रियों के दिलों के साथ-सात सारे वातावरण में उन्होंने ऐसी जिंदादिली घोल दी कि वह सहयात्रा सभी के लिए एक यादगार घटना बन गई।

बाद की पीढ़ी के कथाकारों में सरोजनी प्रीतम, अमर गोस्वामी, भगवती चरण मिश्र और ओमप्रकाश कश्यप की कुछ बढ़िया हास्य कथाएं पढ़ने को मिली हैं। इसमें अआमर गोस्वामी का ’शेरसिंह का चश्मा’ , ’ खुशबू की ताकत’ , ’ हड़पराम गड़प’ जैसी कहानियों में शिष्ट हास्य के बड़े सुन्दर नमूने हैं।

ओमप्रकाश कश्यप की ’ अकली बकली की पाठशाला’ और ’ बेद चाचा और उनके करामाती लट्टू’ कहानियां भी ग्रामीण परिवेश में हास्य की बड़ी अजब-अनोखी झांकियां पेश करती हैं। अकली-बकली चाहे खुद पढ़े न हों और उन्हें ’अ ’ से ’ अनार’ भी याद न हो, मगर जब वे जोश में आकर पूरे गांव को पढ़ाने की ठान लेते हैं, तो उनके पढ़ाई के नायाब ढंग में ऐसी-ऐसी मौलिक उद्भावनाएं निकलकर आती हैं कि पढ़ते-पढ़ते बरबस नन्हे पाठकों के चेहरे पर मुस्कान खिंच जाती है। मगर बेद चाचा और उनके करामाती लट्टुओं की कथा तो ऐसी अचरज भरी है कि उसे पढ़ते हुए अतिशयोक्ति अलंकार के सारे पुराने उदाहरण फीके पड़ जाते हैं और बेद चाचा एक ऐसे किस्सागो के रूप में उभरकर सामने आते हैं कि उनका जादू सचमुच पाठकों पर हाबी हो जाता है।

हास्य कथा के फलक को विस्तार देने वाली कहानियों में यादवेन्द्र शर्मा ’ चन्द्र’ की ’ टिड्डी पुराण ’ और सरोजनी प्रीतम की गिनती लाल की छींक ’ का जिक्र भी जरूरी लगता है जिनमें हास्य की सहज बानगी देखने को मिलती है।समय और परिवर्तनों की तेज उथल-पुथल के बावजूद यह एक अजीब-सी सच्चाई है कि हिन्दी में अब भी ज्यादातर बाल कहानियां पारिवारिक ढंग की ही लिखी जा रही हैं। इधर बाल कहानियों की छोटी-बड़ी सौ से ज्यादा किताबों से गुजरने पर पता चला कि उनमें लगभग तीन-चौथाई पारंपरिक परिवेश की ही थीं। दुख तो इस बात का है कि इनमें से ज्यादातर कहानीकार बगैर यह जाने कि समय कितना बदल चुका है और दुनिया कहां से कहां पहुंच चुकी है, या कि इधर बच्चों की रुचियां कितनी तेजी से बदली हैं- उससे निहायत बेपरवाह रहकर पिटे-पिटाए ढंग से बासी कहानियां लिख रहे हैं। ऐसी कहानियां जिनमें न भाषा नई है, न कथन। यहां तक कि पुरानी लोककथाओं को ही उठा-उठाकर टीपा जा रहा है और उन्हें बहुतेरे लोग बड़े मूर्खतापूर्ण दंभ के साथ अपने नाम से छपा भी डालते हैं। मगर ये बाल कहानियां नहीं हैं। हिन्दी बाल कहानी के शुरुआती दौर में भले ही उनका महत्व रहा हो, लेकिन मौजूदा कथा परिदृश्य में तो इनका कोई योगदान हो नहीं सकता। यह दीगर बात है कि हिन्दी बाल कहानी के नाम पर ज्यादातर ऐसी लोककथाएँ ही चारों ओर बिखरी पड़ी हैं और और उससे बाल कहानियां और बाल कहानीकार दोनों ही उपहास की वस्तु बनते जा रहे हैं।

हां, बेशक कुछ ऐसे समर्थ बाल-कहानीकार भी हैं जो पारंपरिक कथा-परिवेश का सहारा तो लेते हैं, पर उन्हें एक बिल्कुल नया सर्जनात्मक विन्यास देकर बिल्कुल नए ढंग की कहानियां गढ़कर दिखाते हैं। इस लिहाज से वरिष्ठ कथाकार देवेन्द्र कुमार की कुछ कहानियां अद्वितीय हैं, जो उन्हें उस्ताद कहानीकारों की पांत में बिठाती हैं। देवेन्द्र कुमार की ’ सोने का जूता’ , ’ एक बूढ़ा आदमी’, ’ देवरा का तूफान’ , ’ पशु सेना’ जैसी कहानियां इस लिहाज से बार-बार पढ़े जाने की मांग करती हैं। इनसे पता लगता है कि कोई बड़ा और समर्थ कथाकार परंपरागत कथा-परिवेश का इस्तेमाल करके भी कैसी ताजगी भरी कहानियां गढ़ सकता है, जो आज के नए युग सत्य और जीवन की चिंताओं को प्रकट करती हैं। इस लिहाज से ’ सोने का जूता’ देवेन्द्र कुमार की लाजवाब कहानी है। एक राजा युद्ध जीतकर आया, तो उसने पराजित राजा के द्वार पर अपना जूता टांग दिया कि हर कोई उसे प्रणाम करके निकले और तब विद्रोह किसी और ने नहीं, उसके सेनापति ने ही किया, जिसने उसे बताया कि असली युद्ध तो मन की वीरता से जीते जाते हैं और जो हारता है, वह जरूरी नहीं कि कायर हो।...कि युद्ध जीतने के बाद जूता टांगकर किसी का अपमान करने का हक हमें नहीं है!

वरिष्ठ कथाकार तथा नंदन पत्रिका के संपादक जयप्रकाश भारती ने पारंपरिक कथा शिल्प को लेकर इधऱ कई सुंदर कहानियां लिखी हैं। इनमें ’ दीप जले शंख बजे’ बड़ी भावपूर्ण कहानी है। यह वेल्दी नामक एक विदेशी लड़की की कहानी है जिसने दीपों के त्योहार के बारे में अपनी नानी से सुना था और तभी से उसने तय कर लिया था कि वह भारत जाएगी और स्वयं अपनी आंखों से उस त्यौहार की जगर-मगर देखेगी। आखिर वेल्दी नारायणपुर में आई, स्वामी सदानंद से मिली और भारत में आकर कुछ इस कदर ’ भारतीय ’ हो गई कि गांव की औरतें कहने लगीं- ’यह औरत तो लक्ष्मी है। इसने हमारे गांव को बदल दिया। हमें नई रोशनी में जीना सिखा दिया।’

भगवतीशरण मिश्र की ’जब राजा हंस पड़ा’, ’ असली कौन ’, ’ कंजूस सेठ ’ जैसी कहानियां भी पारंपरिक कथा-परिवेश से निकलकर दूर जाने वाली कहानियां हैं। उमा पंत, मधुमालती जैन, रेखा रस्तोगी, मालती शर्मा, सत्यप्रभा पाल, शकुन्तला कालरा, राज बुद्धिराजा, नगेश पांडेय ’संजय ’, जगदीश चंद्रिकेश, सूर्यनाथ सिंह, साबिर हुसैन, भैरूंलाल गर्ग, सुनील शर्मा, नीरू तिवारी, योगेश चन्द्र शर्मा, श्रीनिवास वत्स, सत्येन्द्र वर्मा, चारुदत्त ’ इंदु’ , विमला रस्तोगी, शशि गोयल, श्याम सिंह शशि, मला मेहता, यादवेन्द्र शर्मा ’ चंद्र’ आदि कथाकारों ने भी पुरानी कथा तकनीकों का सहारा लेकर पारपरिक परिवेश की कहानियों में आज की किसी नई बात या नए सत्य को प्रकट करने की कोशिश की है। लेकिन इनमें से संभवतः किसी को वह सफलता नहीं मिली जो ओमप्रकाश कश्यप जैसे एक अपेक्षाकृत नए और युवा कथाकार की ’ एक राजा था ऐसा’ , ’ गुट्टी काका’ और लालटेन वाली बुढ़िया’ जैसी अद्भुत शक्तिशाली कहानियों में नजर आती है। ’ एक राजा था ऐसा’ का झक्की और शक्की तो है ही, घमंडी भी इतना है कि जरा-सी बात पर पूरी झील को सुखा देना चाहता है। मगर इस अभिमानी राजा से भिड़ गया कच्ची उम्र का एक लड़का, जिसने राजा से हल चलवा लिया और यों राजा ने जाना कि मेहनत की खुशी क्या होती है। उसकी उदासी खत्म हो गई और झील पर जो बेवजह आपद आई थी, वह भी उड़न –छू हो गई।


ओमप्रकाश कश्यप की ’ गुट्टी काका’ कहानी के गुट्टी काका तो इतने प्यारे और लाजवाब हैं और बच्चों पर उनका प्यार कुछ इस कदर निसार होता है कि एक बार इस कहानी को पढ़ने के बाद इसे भूल पाना किसी के बस की बात नहीं।इसी तरह उनकी ’ लालटेन वाली बुढ़िया ’ कहानी की रहस्यमय बुढ़िया शुरू से ही बांध लेती है। शाम होते ही वह अपनी झोपड़ी के दरवाजे पर लालटेन जलाकर क्यों रखती थी और फिर ऊँघती-सी किसकी प्रतीक्षा करती थी? ...बुढ़िया की यह प्रतीक्षा किसी को पागलपन भी लग सकती है। लेकिन ओमप्रकाश कश्यप ने ’ लालटेन वाली बुढ़िया ’ कहानी को जैसा करुण और मर्मस्पर्शी अंत दिया है, उसे पढ़ते हुए सचमुच आंखों में आंसू आ जाते हैं। 

इधर हिन्दी में परी कथाओं के खिलाफ बड़ा तूमार बांधा जा रहा है, मानो परी कथाएं बच्चों को बिगाड़ रही हों और उनसे बुरी और अस्पृश्य चीज तो आज की दुनिया में कुछ हो ही नहीं सकती। मैं समझता हूं यह दृष्टिकोण भी बड़ा अतिरंजना पूर्ण है। सवाल परी कथा के उतने होने या न होने का उतना नहीं है, जितना अच्छी कहानी होने या न होने का है। बुरी परी-कथाएं यदि बहुतायत से लिखी जा रही हैं तो अच्छी परी कथाएं बिल्कुल नहीं लिखी जा रही हैं-ऐसी बात नहीं है। अमर गोस्वामी, उषा महाजन, सविता चड्ढा , मनहर चौहान, रत्नप्रकाश शील और कई अन्य कथाकारों की भी ऐसी परी कथाएं मुझे याद आ रही हैं , जिनमें एकदम नई सूझ है।और मुझे लगता है वे किसी न किसी तरह से आज के बाल कहानी के फलक को नया विस्तार भी देती हैं। उषा महाजन की ऐसी ही एक जोरदार परी कथा है जिसमें गांव के लोग परी के आगे अपनी यह इच्छा प्रकट करते हैं कि गांव की सब लड़कियों को पालना उनके लिए मुश्किल काम है। और फिर लड़के तो किसी काम आते हैं, जबकि लड़कियां किसी काम की नहीं हैं। परी खुशी-खुशी गांव की सब लड़कियों को अपने साथ लेकर चली जाती है। और उसके बाद गांव कितना रूखा-सूखा, उदास और निरानंद हो जाता है , गांव के लोग किस तरह हाथ जोड़कर और गिड़गिड़ाकर उन लड़कियों से मिलने की इजाजत मांगते हैं, उनके चेहरे पर कैसा अपराध-बोध खुदा हुआ है, यह सब कहानी पढ़कर ही जाना जा सकता है।

इसी तरह सविता चढ्ढा की एक कहानी में परियों की राजकुमारी नहीं, कुरूप है और उसके चेहरे पर कुछ-कुछ चेचक जैसे धब्बे हैं। परियों की राजकुमारी की शादी धरती के एक मेहनती युवकके साथ होती है, जो साफ-साफ परी रानी से यह कहता है कि दहेज उसे नहीं चाहिए, क्योंकि उसे अपनी मेहनत पर भरोसा है। परियों की राजकुमारी उसे बदसूरत नहीं, सुंदर इसलिए लगती है क्योंकि उसका मन बड़ा सरल और उदार है।

इसी तरह अमर गोस्वामी की एक मजेदार परी कथा में परी धरती पर आती है तो उसे एक शादी की दावत में जाने का सुयोग मिलता है। वहां वह खा-खाकर इतनी मोटी हो जाती है कि बेचारी के पंख काम नहीं करते। अब वह उड़े तो उड़े कैसे? लाचार होकर उसे कुछ रोज धरती पर ही रहना पड़ता है और धरती पर उसे जो प्यारे-प्यारे अनुभव हुए, उनका तो कहना ही क्या।

मैं नहीं समझता कि ये कहानियां किसी भी तरह से हेय कहानियां हैं, बल्कि सच तो यह है कि परी कथा के कड़वे से कड़वे यथार्थ को भी बड़े दमदार तरीके से पेश किया जा सकता है। हां, इस शिल्प का रचनात्मक ढंग से इस्तेमाल करने सकने वाले उस्ताद लेखक हमारे यहां सच ही कम हैं और नकलचियों की भीड़ और भभ्भड़ बहुत है।

यों इसमें कोई शक नहीं कि आज की बाल कहानियों में बालक के भीतर बाहर की दुनिया के साथ-साथ आज की तेजी से बदलती हुई दुनिया की बदली हुई सच्चाइयां आनी ही चाहिए- भले ही हम शिल्प या तकनीक कोई भी अपनाएँ। इस लिहाज से हरिकृष्ण देवसरे की पीपल वाला भूत तथा और बिल्ली रास्ता काट गई किताबों की कहानियां मानो फिजूल की रूढ़ियों और अंधविश्वासों के खिलाफ एक मुहिम-सा छेड़ देती हैं। इनमें ’सही रास्ता , ’भविष्यवाणी ’ तथा ’ और बिल्ली रास्ता काट गई ’ जैसी कहानियां तो अंधविश्वासों पर करारी चोट करने के साथ-साथ किस्सागोई का सुर भी बांधे रखती हैं। हालांकि ऐसी कहानियों में 'टाइप्ड' होने का खतरा बहुत है।


सुरेखा पाणंदीकर की तीसरी लड़की और कार्बन कापियों की करामात कथा संग्रहों की ज्यादातर कहानियां ऐसी हैं जिनमें नए जमाने की नई लड़की का आत्मविश्वास मानो शब्द-शब्द से झलक रहा है। सुरेखा पाणंदीकर की कहानियों की नायिकाएं ज्यादातर किसोर उम्र की लड़कियां ही हैं जो अपने को इस बात के लिए हेय मानने को कतई तैयार नहीं हैं कि वे लड़कियां हैं। वे अपने बुद्धिमत्तापूर्ण कार्यों, हौसले और दिलेरी से पग-पग साबित करती हैं कि आज की ’ नई लड़की ’ बदल चुकी है और उसे कृपया हीन न समझा जाए ! इसके अलावा उषा यादव, रमश आजाद, सुभाष अखिल, मो. अशरफ खान , अनुकृति संजय, गुडविन मसीह, उषा महाजन जैसे कथाकारों की कहानियां पढ़कर समझ में आता है कि आज की कहानी किस कदर बदल गई है। इनमें रमेश आजाद की ’ और कम्प्यूटर बैठ गया ’ तो सूचना माध्यमों के मौजूदा आतंक तक पहुंचती है।

आज की बाल कहानियों की एक बड़ी खासियत यह है कि उनमें बच्चे का उथल-पुथल भरा खदबदाता मन बार-बार उचक-उचककर सामने आता है। आज की कहानी एक छोटे-से-छोटे बच्चे के इच्छा-संसार को भी नजदीक से जाकर समझना चाहती है। भले ही बच्चे के मन में अनार खाने की इच्छा हो और यह ’ इच्छा बढ़ते-बढ़ते इतनी बड़ी हो गई हो कि उसे अपने आसपास की दुनिया, पढ़ाई-लिखाई और तमाम शौक भी अनार खा लेने की उस नन्ही-सी इच्छा के आगे छोटे लगने लगते हैं। दामोदर अग्रवाल की ’ आपके हिस्से का अनार ’ इस लिहाज से बेमिसाल है और मैने सचमुच इससे पहले किसी कहानी में बच्चे के मन में गूंजती किसी इच्छा का ऐसा चित्रण पहले कभी नहीं पढ़ा। इस कहानी का बच्चा मुरारी स्कूल जाते-आते रास्ते में दुकानदार से अनार का भाव पूछता है और चकराता है। बीमार होने का झूठा बहाना बनाता है, अनार की खीर खाने की इच्छा प्रकट करता है और जब सारे तीर बेकार हो जाते हैं तो वह रोते-रोते आकिर पिता के दफ्तर पहुंच जाता है और रोते-रोते ही कहता है-’  पिताजी, आप चाहे मुझे चाहे मारिए, पर मैं अभी, इसी समय, एक अनार खाऊंगा। साढ़े चार रुपए दीजिए। ’ कितनी सादा-सी कहानी, लेकिन उसमें बच्चे का मन जिस तरह से खिंचा चला आता है, उसका कोई जवाब नहीं है।

इसी तरह शकुन्तला वर्मा की ’ बस पांच मिनट ’ , हरदर्शन सहगल की ’ रंग-बिरंगे पत्र ’ , मुकेश नौटियाल की ’ स्कूल में अन्ना’ , दिनेश पाठक ’ शशि ’ की ’ सपने में सपना’ , यादराम रसेन्द्र की ’ फटीचर’ , नागेश पांडेय ’ संजय ’ की ’ खोया नहीं’ जैसी कहानियों में आज के बच्चे की उपस्थिति कहीं अधिक ठोस और यथार्थ रूप में नजर आती है।

हालांकि यह क्षेत्र इतना चुनौती भरा है कि अब भी यहां असीम संभावनाओं के द्वार कुले हुए हैं। बाल कहानी को अगर सचमुच बाल कहानी रहना है – आज के बच्चे की कहानी, तो उसमें बब्चे के सपने और आकांक्षाओं के साथ-साथ उस जीवन यथार्थ की भी सच्ची और प्रामाणिक शक्लें नी चाहिए, जिनमें आज का बच्चा चाहे अनचाहे जीने और सांस लेने को मजबूर है।

बीसवींसदी की बाल कहानियों का एक बड़ा प्रतिनिधि संग्रह सामने आए तो बाल कहानियों के मूल्यांकन की एक सही आधार पीठिका बन सकेगी। इस लिहाज से अभी तक चुनी हुई बाल कहानियों के जो संग्रह आए हैं, उन्हें नाकाफी ही कहा जाएगा। तो भी जाकिर अली ’ रजनीश ’ के संपादन में निकला इक्कीसवीं सदी की बाल कहानियां ( दो खंड), उषा यादव एवं राजकिशोर सिंह के संपादन में निकला हिन्दी की श्रेष्ठ बाल कहानियां , शमशेर अहमद खान के संपादन में निकला बयालिस बाल कहानियां और  रोहिताश्व अस्थाना के संपादन में अभी हाल में निकला चुनी हुई बाल कहानियां (दो खंड) संग्रह इस लिहाज से उल्लेखनीय कहे जा सकते हैं कि उनमें एक साथ बहुतेरे लेखकोंकी कहानियां पढ़ने को मिल जाती हैं। जहां तक सही प्रतिधिनित्व और दृष्टि-संपन्नता की बात है, इनमें कोई भी संग्रह इसलिए सफल नहीं कहा जा सकता, क्योंकि प्रायः इन सभी में भरती की कहानियों की भरमार है और अच्छी बाल कहानी का कोई ’ विजन ’ यहां मौजूद नहीं है। साथ ही प्रायः सभी में अच्छे, समर्थ रचनाकार छूट गए हैं और हर जगह फुदकते ऐसे रचनाकार बहुतायत में मौजूद हैं, जिनके लिए बाल कहानियां लिखना महज एक ’ धंधा ’ है।

तो भी ये नाकामयाबियां और सीमाएं निराश इसलिए नहीं करतीं क्योंकि किसी भी बड़ी सफलता का रास्ता आखिर नाकामयाबियों से ही गुजरता है। उम्मीद की जा सकती है, कभी हिन्दी बाल कहानियों के सचमुच प्रतिनिधि कहे जा सकने वाले बड़े संग्रह भी देखने में आएंगे और हिन्दी बाल कहानी के मूल्यांकन की कहीं अधिक गंभीर और ईमानदार कोशिश भी । मगर इतना तय है कि आज के बच्चे अपने लिए लिखी गई अच्छी कहानियां ढूंढ-ढूंढकर पढ़ते हैं- पढ़ना चाहते हैं और यह बात खुद में बाल कहानी के भविष्य और संभावनाओं के बारे में हमें पूरी तरह आश्वस्त करती है।     

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                                                                                                                                                   कहानी समकालीन


                                                                                                                                                        -शैल अग्रवाल


तब भी नहीं

दादी बार-बार सोमू को आवाज दिए जा रही थी--

' सोमू देख, दिन कितना चढ़ आया है-- आ अन्दर आकर नहा-धो ले--खा-पी ले--'

अपनी ही नन्ही दुनिया में मगन सोमू को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। धूप बिल्ली सी दबे पाँव आकर उसके पैरों पर पसर गई थी और सोमू गुनगुनी गरमाहट अपने पैरों और तलवों पर महसूस कर रहा था। आज फिर वह रोज की तरह लॉन में लेटे-लेटे बादलों के बनते बिगड़ते आकारों के बीच कुत्ते बिल्ली ढूँढेगा---हाथी घोड़े बनाएगा।

कभी बादलों की झील में हँस के सिंहासन पर बैठी राजकुमारी तैर जाती तो कभी गाल फुलाए मुँह से धुँआ फेंकता दैत्य बच्चों का पीछा करता हुआ इधर-उधर दौड़ता भागता नजर आने लगता। यह बात दूसरी थी कि आज उसे होमवर्क जरूर ही पूरा करना था वरना कल फिर पूरे क्लास के सामने डाँट खानी पड़ेगी और बेंच पर खड़ा भी होना पड़ेगा।


जबसे मा भगवान के यहाँ गई है सोमू को सबसे डाँट खाने की आदत सी पड़ती जा रही है। पहले तो जरा सी डाँट पर ही वह बहुत अपमानित और तिरस्कृत महसूस करने लगता था और मा को उसे घँटों समझाना और बहलाना पड़ता था। पर अब तो ऐसा कुछ भी नहीं होता-- शुरु-शुरु में उसकी हर गलती को, ' जाने दो बिना मा का बच्चा है' कहकर माफ कर दिया जाता था। पर अब बस डाँट ही डाँट पड़ती रहती है मानो सबलोग भूल ही गए हैं कि मां भगवान के घर जाकर वापिस आने का रास्ता भूल चुकी है। अब तो उसे ही कुछ करना होगा मां की मदद के लिए।

अब मां फिरसे उन बिखरते बादलों की डोली में बैठी उसकी तरफ प्यार से देख रही थी। हाथ हिला-हिलाकर विदा ले रही थी और फिर तुरंत ही  जाने कहाँ वापिस चली भी गई।

वह तुरँत ही फिर से अपनी मा को ढूँढने लगा। उन बिखरते रूई के फाँवों में कभी उसे झील-झरने पहाड़ नजर आते (शायद भगवान का घर ऐसा ही हो)—  कभी फिर वही हाथ फैलाए, अपने कमर तक लम्बे बालों को हवा में लहराती, मां उसकी तरफ दौड़ी चली आती। उसकी अपनी मां, सोमू को बहुत प्यार करने वाली मां--- उसकी हर जरूरत का ध्यान रखने वाली मां---कहानी सुनाने वाली मां---होमवर्क कराने वाली मां--- उसकी एक आवाज पर दौड़ी चली आनेवाली मां। बार-बार ही, एक क्षण में ही, उन तितर-बितर होते बादलों के सँग तितर-बितर भी तो हो जा रही थी वह।

सोमू तब एक आँख बन्दकर के माथे पर बल डालकर, माथे को बीचोबीच से दो उँगलियों से दबा लेता। ध्यान लगाने की कोशिश करता --जैसे दादी की किताब में ऋषि-मुनि भगवान को देखने के लिए ध्यान लगाते हैं--या फिर उसके गाँव की रामलीला में रामजी अपनी खोई हुई सीता को माथे पर हाथ रखकर ढूँढते फिरते हैं। उन हवा में उड़ती तस्बीरों को फिरसे अपने पास खींचकर लाने की कोशिश करता-- बिल्कुल वैसे ही जैसे वह धूप में छुपे हुए रँगों को, आँख बन्द कर वापस अपने पास खींचकर ला सकता है या फिर रात में चमकती बल्ब की तेज रौशनी की लाइन को चाहे जिधर घुमा-फिरा सकता है। उन्हें पीले-नीले, काले और गोल-चौकोर धब्बे बनाकर दीवार पर मनचाही जगहों पर चिपका तक सकता है वह तो।

पर लगता है मा को वापस लाना इतना आसान नहीं। बादल वैसे भी तो दीवार से बहुत ज्यादा उँचे होते हैं न, और दूर भी तो। पापा शायद सच ही कहते थे --- सच में उसकी मा थोड़ी बुद्धू ही थी। घर से इतनी दूर जाने की क्या जरूरत थी ? वह तो कभी खेलता हुआ भी इतनी दूर नहीं जाता। किशन के साथ अमरूद के बगीचे तक भी नहीं। पर मा को तो उसे  ढूँढना ही होगा। यह उसका, सिर्फ उसका राज था। बस प्रिय एक खेल ही नहीं, एक व्यक्तिगत् राज ...नितान्त जरूरत थी। अब उसे कोई भैया या बहिन नहीं चाहिए, बस मां आ जाएं-- इतना ही काफी है। वैसे भी
यही तो एक ऐसा राज था जिसे वह अब किसी और को बताना तक नहीं चाहता--किशन को भी नहीं। उसका मन करता है कि दिन-रात बस ऐसे ही मां को ढूँढता रहे-- तभी तो शायद मां मिल भी पाएंगी। दादी की डाँट और मास्टरजी की मार खाने से तो यह काम हर हालत में अच्छा था। पापा तो वैसे भी कभी कुछ बताते ही नहीं।

और दादी--यह दादी तो बस दिन भर सिर्फ डाँटने के लिए ही है -- ' मेरी बूढ़ी हड्डियों में बस यूं ही खटते रहना लिखा है तभी तो पहले तेरे बाप को पाला और अब तुझे पालूंगी।' जरा सा लेटने भी नहीं देती, सोमू ने दादी के ही शब्द दोहराए '---सोमू नहा ले--खा ले---अब बैठ कर पढ़ ले, दूध पी ले, अब सो जा।' दादी की फरमाइशों की तो लिस्ट ही कभी खतम नहीं होती। पर मां ऐसी नहीं थी। वह तो खुद ही नहलाती थी उसे। कपड़े भी तुरंत ही पहना देती थी और स्कूल भी छोड़ आती थी। दूध का भरा ग्लास ऐसे पिला जाती थी कि सोमू को पता तक नहीं चलता था कि उसने दूध पिया भी या नहीं। कई बार तो रात में फिर से दूध पीने की हुड़क उठने पर उठकर बिस्तर के नीचे झाँककर देखना पड़ता था उसे कि खाली दूध का ग्लास वहाँ है भी या नहीं। यह दादी तो बस शोर मचा-मचाकर ही पेट भर देती है-- वैसे भी पिओ या न पिओ, अब तो दूध अच्छा ही नहीं लगता। पता नहीं मां कैसे दूध बनाती थीं? दादी को तो कुछ भी नहीं आता, बस कहने को ही सबसे बड़ी हैं। पापा की भी मम्मी हैं। बेचारे पापा--ऐसी बेकार की मम्मी से काम चलाना पड़ा उन्हें। वैसे भी कितनी झूठी हैं यह दादी-- कहती थीं मां अस्पताल से भैया लेकर आएंगी। भैया वगैरह तो कोई नहीं आया-- बस सोती हुई मां को ही उठा लाए सब अस्पताल से और फिर रस्सी से बाँध कर जाने कहाँ ले भी गए-- एक लम्बी सी सीढी पर लिटाकर। दादी से पूछा तो कह दिया- भगवान के घर जा रही है। भगवान का घर दूर है न, इसलिए इतनी लम्बी सीढ़ी की जरूरत पड़ती है। और फिर बाँधेंगे नहीं तो रास्ते में गिर नहीं पड़ेगी -- आखिर सोई हुई जो है।

फिर झूठ-- सोमू जानता था मां ऐसे कभी नहीं सोती। धीरे से भी आवाज दो तो, आधी रात में भी, भरी नींद में ही, मां तुरँत उठ कर आ जाती थी और फिर क्या सोमू को नहीं पता कि रास्ते में बहुत शोर होता है-- तो क्या मां पूरे समय बस सोती ही रहेगी?

उसका मन किया कि इस झूठ बोलने वाली दादी को ही मा की जगह रस्सी से बाँध कर भगवान के घर पहुँचा आए। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ दादी के सँग उसे कमरे के अँदर भेज दिया गया --यह कहकर कि अभी वह बहुत छोटा है-- बर्दाश्त नहीं कर पाएगा।

कभी तो सब कहते हैं कि बहुत बड़ा हो गया है वह। उसे बच्चों की तरह बात-बात पर रोना नहीं चाहिए। और कभी कहते हैं कि बहुत छोटा है। कैसे बात नहीं समझ पाएगा -- -पूरे छह साल का है वह अब। कभी कोई ठीक से समझा कर तो देखे--कह कर तो देखे!

उसे भी पता है कि किसी के घर ऐसे ही नहीं जाया जाता। कोई बुलाए, तभी जाते हैं। तो फिर भगवान की दोस्ती तो दादी से ही ज्यादा थी, फिर उसकी मां को ही क्यों बुलाया उन्होंने--? क्या उन्हें किसी ने बता दिया था कि मा दादी से ज्यादा होशियार है--ज्यादा अच्छा खाना बनाती है--ज्यादा प्यार करती है? असल में सभी कुछ दादी से ज्यादा अच्छा जानती थी मां--कहानी भी। दादी के खिलाफ कुछ कहो तो कह देती-- दादी अब बहुत बूढ़ी हो गई हैं न इसलिए सब भूल जाती हैं। उन्हें बेकार में सताया और थकाया न करो। इज्जत और प्यार दिया करो-- जाने कबतक का साथ है --- भाग्यशालियों को ही दादी मिलती हैं --जाने कब भगवान के घर से बुलावा आ जाए ?

उसने भी अक्सर सोते-जागते दादी को कहते सुना है-- हे भगवान अब तो बुला लो। फिर भगवान ने दादी की जगह मां को ही क्यों बुलाया-?

सोमू की समझ में नहीं आ रहा था-- पापा से पूछो तो कह देते कि बड़े हो जाओगे तो सब खुद ही समझ जाओगे। और वह रोज ही इँतजार कर रहा है-- न तो भगवान ही बुलाते हैं- -ना ही वह बड़ा ही हो पा रहा है और ना ही कुछ जान पा रहा है।

ये बड़े लोग भी अजीब होते हैं-- ये क्यों नहीं निश्चय करके उसे साफ-साफ बता देते हैं कि वह अभी वाकई में बड़ा है या छोटा-- तो उसी हिसाब से सब काम करने सीख ले , शुरु कर दे वह। इनसे तो किशन अच्छा है जो कल कह रहा था-- देख सोमू, तू अब बड़ा हो गया है--साफ-साफ समझ ले, तेरी मा अब कभी नहीं आएगी वापस, क्योंकि वह मर गई है और मरे लोगों को घाट किनारे ले जा कर जला दिया जाता है। और जलकर जब सब खतम हो गया तो फिर तू ही बता, तेरी मा वापस कैसे आ सकती है? तू क्यों उलटी-सीधी जगहों पर उसे ढूँढता फिरता है।

पर यह किशन भी तो पूरा पागल है। रोहन की मा मर गई है, उसकी नहीं। रोहन की मा मर सकती है पर उसकी नहीं। क्योंकि उसकी मां ने तो प्रौमिस की है--' क्रौस यौर हार्ट एँड होप टु डाई' वाली, पक्की 'प्रौमिस'। उसे याद है जब एक दिन उसकी मा को बुखार आ गया था और खाँसते-खाँसते उसका पूरा चेहरा लाल हो गया था तो सोमू डर कर रोने लगा था। तब मां ने उसे अपनी गोदी में छुपा लिया था और कहा था---' डर मत मुझे कुछ नहीं होगा। मैं तुझे अकेला छोड़कर कहीं नहीं जाउँगी। कम से कम तब तक तो हरगिज ही नहीं, जब तक तू अपने पापा जितना बड़ा नहीं हो जाता। और तब उसने हाथ पर हाथ मारकर मां से पक्की प्रौमिस ली थी। दस साल का है तो क्या हुआ इस किशन को तो कुछ भी नहीं पता--- फिर अगर उसकी मां मर गई है तो उसे मां के कमरे में से हमेशा मां की महक क्यों आती रहती है--वह रात में जब सोता है और उसका सर खूब कस कर दुखता है, तो मां अक्सर आ कर सर कैसे दबाती है? करीब-करीब हर रात ही तो उसके साथ रहती है मां। बस जरा सा आँख खुलने पर ही तो दिखाई नहीं देती। भगवान भी तो नहीं दिखाई देता हमें और भगवान के लिए तो कोई नहीं कहता कि भगवान मर गया।

वैसे यह मरना होता क्या है? सोमू ने भी साँस खींच कर, दोनों आँखें बन्द कर के, चुपचाप लेट कर, कई बार मरने की कोशिश की है। पर यह किशन का बच्चा हमेशा ऐन वक्त पर आकर गुदगुदा देता है या फिर कभी जब वह बस मरने ही वाला होता है तो दादी आकर डाँट लगा देती हैं-- शोर मचा देती हैं--' चल उठ --पढ़ेगा भी अब या बस यूं ही पड़े- पड़े  उलटे-सीधे स्वाँग ही रचाता रहेगा। चल उठ जा मेरे लाल--देख, पूरा का पूरा चेहरा बिल्कुल लाल हो गया है--मरें तेरे दुश्मन।'

' यहाँ तो कोई चैन से मरने भी नहीं देता '--सोमू गहरी साँस लेते हुए कहता तब। दादी की नकल करने में, उसे परेशान करने में, उसे बहुत मजा आता है। सोमू उठ भी जाता है, यह सोचकर कि--चलो मां आएगी तो माँ से ही पूछूँगा कि ठीक से कैसे मरा जाता है और वह कैसे इतनी देर तक मरी पड़ी रही थीं उस दिन--- जरा भी हँसे और हिले-डुले बगैर। उसका तो थोड़ी सी देर में ही दम घुटने लगता है और खाँसी आ जाती है।

सोमू जानता है कि उसकी मा को जलाकर फेंका नहीं गया था बल्कि एक घड़े में बन्द कर के गँगा में बहा दिया गया था। पापा ने बताया था उसे--- और पापा कभी झूठ नहीं बोलते। वैसे यह काम उसने खुद तो नहीं किया था पर उसे पापा पर पूरा भरोसा है--जब एक जिन्द छोटे से लैम्प में आ सकता है तो मा घड़े में क्यों नहीं आ सकती और उसे यह भी पता है कि अल्लादीन के उस जादूई चिराग जैसे  वह भी एक दिन अपनी मां को ढूंढ ही लेगा। एक दिन वह घड़ा उसे भी जरूर ही वापिस मिल ही जाएगा। और फिर तीन बार मां को याद करके जब वह घड़ा सहलाएगा तो मां फिर से वापिस बाहर निकल आएंगी --हमेशा-हमेशा उसीके पास रहने के लिए-- बिल्कुल उस कहानी वाले जिन की तरह ही। आखिर यह कहानी मां ने ही तो सुनाई थी उसे।

बस, सोमू अब घाट-किनारे रोज ही जाएगा--इसके पहले कि वह घड़ा किसी और के हाथ लग जाए। आखिर मा को अपने घर भी तो वापिस लेकर आना है। उसने उसी रात चुपचाप दादी का बक्सा खोलकर घाट जाने से पहले अपने बेस्ट क्रेयौन से उस घड़े पर मां का नाम लिख दिया था-- घड़ा खोने का तो सवाल ही नहीं उठता? पर कल किशन को भी अपने साथ ले ही लेगा। वह चीजों को जल्दी जो ढूँढ लाता है। उसके सारे खोए कँचे भी तो किशन ने ही ढूँढे हैं और मा तो कँचों से बहुत बड़ी है।

अचानक सोमू डर गया यदि किशन को भी मां वाला घड़ा न मिल पाया तो--तो फिर क्या होगा...?

इतना डर तो उसे कभी अकेले सोने में भी नहीं लगा था। मां कहती थी कि अगर वह अपना पूरा होम वर्क करेगा, सबकी बात मानेगा-- तो वह कभी भी उसे अकेला छोड़कर नहीं जाएंगी। और अपने पास उन्ही के बिस्तर में, सोने भी देगी। यह सब याद आते ही, उस दिन से क्या, उसी वक्त से सोमू बहुत अच्छा बच्चा हो गया है। ठीक से ब्रश करने लगा है और दादी और पापा की सभी बातें भी मानता है।

दादी ने जब उससे कहा कि सोमू आज तेरी मा का श्राद्ध है--चल, जल्दी उठ, नहा ले और तैयार हो जा। पँडितानी को खाना खिलाने में मेरी मदद करना--तो बिना दादी से पूछे ही कि मा और पंडितानी का क्या सँबन्ध है-- वह झट से तैयार हो गया था। हाँ बस मन ही मन उसने यह जरूर सोच लिया था कि अगली बार जब भी वह बीमार पड़ेगा तो अपने हिस्से की सारी कड़वी दवा इसी मोटी पँडितानी को ही पिलाएगा, क्योंकि दादी भी  तो सब अच्छी-अच्छी मिठाइयाँ यह कहकर इस पँडितानी को खिला रही थीं कि सब सीधा उसकी मा के पेट में ही  जा रहा है। जरूर इस पँडितानी को कोई जादू आता होगा। शायद इसे तब तो यह भी पता होगा कि मां आखिर है कहाँ पर? पर यह खूसट कोई बताएगी थोड़े ही--वरना दादी से तरह -तरह की मिठाई कैसे खाने को मिलगी।


सोमू जानता था कि यह काम तो उसे खुद ही करना होगा। रात में चाहे कितना भी डर लगे, इसीलिए अब तो उसने रात में रोना तक छोड़ दिया है।

किसी को नहीं जगाता अब वह। बस कसकर आंखें मींचे लेटा ही रहता है---दादी की तरह मन ही मन जय रामजी की और जय हनुमानजी की करने लग जाता है। कल फिर जब रात में उसके अँधेरे कमरे में वही पीले दाँतों और लाल आँखों वाला राक्षस आया था। उसके बिस्तर पर रात भर कूदा था। उसने मां को बहुत याद किया था-- पचास की कौन कहे पूरे सौ तक की गिनती भी कह डाली थी। सही-सही सब बता दिया था उसने कि वह कितना भी थका हो, मन करे या ना करे, सबसे पहले पूरा होम-वर्क ही करता है वह अब। सुबह उठते ही दाँत साफ करता है और फिर तुरँत ही नहा भी लेता है। दादी को भी कतई परेशान नहीं करता--किसी भी चीज के लिए जिद  नहीं करता वह। इतने सारे होमवर्क की वजह से कभी-कभी तो खेलने तक नहीं जा पाता ।

सोमू रात भर रोता रहा--- गिड़गिड़ाता रहा-- अपनी सुधरी आदतें एक-एक करके मा को गिनवाता रहा-- पर मा तब भी नहीं आंईं।

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                                                                                                                                               कहानी धरोहर


                                                                                                                                                मुंशी प्रेमचन्द

मिट्ठू

बंदरों के तमाशे तो तुमने बहुत देखे होंगे। मदारी के इशारों पर बंदर कैसी-कैसी नकलें करता है, उसकी शरारतें भी तुमने देखी होंगी। तुमने उसे घरों से कपड़े उठाकर भागते देखा होगा। पर आज हम तुम्हें एक ऐसा हाल सुनाते हैं, जिससे मालूम होगा कि बंदर लड़कों से भी दोस्ती कर सकता है।

कुछ दिन हुए लखनऊ में एक सरकस-कंपनी आयी थी। उसके पास शेर, भालू, चीता और कई तरह के और भी जानवर थे। इनके सिवा एक बंदर मिट्ठू भी था। लड़कों के झुंड-के-झुंड रोज इन जानवरों को देखने आया करते थे। मिट्ठू ही उन्हें सबसे अच्छा लगता। उन्हीं लड़कों में गोपाल भी था। वह रोज आता और मिट्ठू के पास घंटों चुपचाप बैठा रहता। उसे शेर, भालू, चीते आदि से कोई प्रेम न था। वह मिट्ठू के लिए घर से चने, मटर, केले लाता और खिलाता। मिट्ठू भी उससे इतना हिल गया था कि बगैर उसके खिलाए कुछ न खाता। इस तरह दोनों में बड़ी दोस्ती हो गयी।

एक दिन गोपाल ने सुना कि सरकस कंपनी वहां से दूसरे शहर में जा रही है। यह सुनकर उसे बड़ा रंज हुआ। वह रोता हुआ अपनी मां के पास आया और बोला, ‘‘अम्मा, मुझे एक अठन्नी1 दो, मैं जाकर मिट्ठू को खरीद लाऊं। वह न जाने कहां चला जायेगा ! फिर मैं उसे कैसे देखूंगा ? वह भी मुझे न देखेगा तो रोयेगा।’’
मां ने समझाया, ‘‘बेटा बंदर किसी को प्यार नहीं करता। वह तो बड़ा शैतान होता है। यहां आकर सबको काटेगा, मुफ्त में उलाहने सुनने पड़ेंगे।’’
लेकिन लड़के पर मां के समझाने का कोई असर न हुआ। वह रोने लगा। आखिर मां ने मजबूर होकर उसे एक अठन्नी निकालकर दे दी।

अठन्नी पाकर गोपाल मारे खुशी के फूल उठा। उसने अठन्नी को मिट्टी से मलकर खूब चमकाया, फिर मिट्ठू को खरीदने चला।


लेकिन मिट्ठू वहां दिखाई न दिया। गोपाल का दिल भर आया—मिट्ठू कहीं भाग तो नहीं गया ? मालिक को अठन्नी दिखाकर गोपाल बोला, ‘‘क्यों साहब, मिट्टू को मेरे हाथ बेचेंगे ?’’

मालिक रोज उसे मिट्ठू से खेलते और खिलाते देखता था। हंसकर बोला, ‘‘अबकी बार आऊंगा तो मिट्ठू को तुम्हें दे दूंगा।’’

गोपाल निराश होकर चला आया और मिट्ठू को इधर-उधर ढूँढ़ने लगा। वह उसे ढूंढ़ने में इतना मगन था कि उसे किसी बात की खबर न थी। उसे बिलकुल न मालूम हुआ कि वह चीते के कठघरे के पास आ गया था। चीता भीतर चुपचाप लेटा था। गोपाल को कठघरे के पास देखकर उसने पंजा बाहर निकाला और उसे पकड़ने की कोशिश करने लगा। गोपाल तो दूसरी तरफ ताक रहा था। उसे क्या खबर थी कि चीते का पंजा उसके हाथ के पास पहुंच गया है ! करीब था कि चीता उसका हाथ पकड़कर खींच ले कि मिट्ठू न मालूम कहां से आकर उसके पंजे पर कूद पड़ा और पंजे को दांतों से काटने लगा। चीते ने दूसरा पंजा निकाला और उसे ऐसा घायल कर दिया कि वह वहीं गिर पड़ा और जोर-जोर से चीखने लगा।

मिट्ठू की यह हालत देखकर गोपाल भी रोने लगा। दोनों का रोना सुनकर लोग दौड़े, पर देखा कि मिट्ठू बेहोश पड़ा है और गोपाल रो रहा है। मिट्ठू का घाव तुरंत धोया गया और मरहम लगाया गया। थोड़ी देर में उसे होश आ गया। वह गोपाल की ओर प्यार की आंखों से देखने लगा, जैसे कह रहा हो कि अब क्यों रोते हो ? मैं तो अच्छा हो गया !

कई दिन मिट्ठू की मरहम-पट्टी होती रही और आखिर वह बिल्कुल अच्छा हो गया। गोपाल अब रोज आता और उसे रोटियां खिलाता।

आखिर कंपनी के चलने का दिन आया। गोपाल बहुत रंजीदा1 था। वह मिट्ठू के कठघरे के पास खड़ा आंसू-भरी आंखों से देख रहा था कि मालिक ने आकर कहा, ‘‘अगर तुम मिट्ठू को पा जाओ तो उसका क्या करोगे ?’’
गोपाल ने कहा, ‘‘मैं उसे अपने साथ ले जाऊंगा, उसके साथ-साथ खेलूंगा, उसे अपनी थाली में खिलाऊंगा, और क्या !’’
मालिक ने कहा, ‘‘अच्छी बात है, मैं बिना तुमसे अठन्नी लिए ही इसे तुम्हारे हाथ बेचता हूं।’’
गोपाल को जैसे कोई राज मिल गया। उसने मिट्ठू को गोद में उठा लिया, पर मिट्ठू नीचे कूद पड़ा और उसके पीछे-पीछे चलने लगा। दोनों खेलते-कूदते घर पहुंच गये।

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                                                                                                                                                       कहानी विशेष


                                                                                                                                श्री मां ( महर्षि अरविंद आश्रम)

आत्म-निर्भर

प्राचीन समय में गुस्तास्प नामक एक राजकुमार था। उसके पिता ने उसे राज सिंहासन का उत्तराधिकारी स्वीकार नहीं किया;  इससे वह बहुत दुःखी हुआ और अपनी जन्मभूमि छोड़कर पश्चिम की ओर चल पड़ा। अकेला और भूखा-प्यासा गुस्ताश्प समझ गया कि जीविका के लिए अब उसे केवल अपने परिश्रम पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। जिस देश में वह पहुंचा उसके मुखिया के पास जाकर उसने कहा , "मैं एक निपुण लेखक हूं, आप कृपा करके मुझे किसी मुंशी के पद पर नियुक्त कर दें। "


मुखिया को उस समय किसी लेखक की आवश्यकता नहीं थी,  इसलिए गुश्तास्प  से उसने कुछ दिन ठहरने के लिए कहा। पर वह इतना भूखा था कि प्रतीक्षा करना उसके लिए संभव नहीं था। वहां से चलकर वह कुछ ऊंटवालों के पास गया और उनसे कोई काम देने की प्रार्थना की। उन्हें भी किसी नये आदमी की जरूरत नहीं थी, पर उसे अत्यंत गरीब देखकर उन्होंने उसे कुछ खाने को दे दिया। 


थोड़ी दूर आगे चलकर गुस्तास्प एक लुहार की दुकान के सामने ठहर गया और लुहार से काम मांगा।


लुहार ने कहा,  " अच्छी बात है, तुम मुझे इस लोहे को पीटने में सहायता दे सकते हो।" और उसने एक हथौड़ा गुश्ताश्प के हाथ में थमा दिया।


राज कुमार में बड़ा बल था, उसने वह भारी हथौड़ा उठा लिया और ऐसा जमाया कि पहली  चोट में ही अहरन के दो टुकड़े हो गये। गुस्से में भरे हुए लुहार ने उसे उसी समय दरवाजे का रास्ता दिखा दिया।


राजा को गुश्तास्प की दरिद्रता के प्रति घृणा हुई, पर वह उससे अपनी लड़की के विवाह रोकने का साहस नहीं कर सकता था; परन्तु ज्यों ही विवाह हो चुका उसने उन्हें अपने महल से निकाल दिया। वे दोनों जंगल में रहने के लिए चल पड़े, वहां उन्होंने नदी के पास ही अपने लिए एक झोपड़ी बना ली।


गुश्तास्प बड़ा अच्छा शिकारी था। प्रतिदिन वह नाव द्वारा नदी पार जाता और वहां से कभी बारहसिंहा और कभी जंगली गधा पकड़ लाता। अपने शिकार में से वह आधा वह नाव वाले को देता और बाकी अपनी स्त्री के पास ले जाता।


एक दिन नाववाला मावरीन नाम के एक युवक को अपने साथ लाया। वह गुश्तास्प से मिलना चाहता था। मावरीन बोला, " मैं राजा की दूसरी लड़की, तुम्हारी स्त्री की छोटी बहन से विवाह करना चाहता हूं। राजा के देश में एक भेड़िया बहुत उपद्रव करता है. जबतक मैं उसे मार न दूं उस लड़की से मेरी शादी नहीं हो सकती और मुझे समझ में नहीं आता कि मैं यह काम कैसे करूं।"


शिकारी गुस्तास्प ने उत्तर दिया, "तुम्हारे लिए यह काम मैं कर दूंगा।"


वह जंगल की ओर चल पड़ा। भेड़िये को देखते ही उसने दो तीरों से उसे नीचे गिरा दिया और फिर अपने शिकारी चाकू से उसका सिर काट लिया।


राजा मृत  भेड़िए को देखने आया और उसने प्रसन्नतापूर्वक अपनी दूसरी लड़की माबरीन को दे दी।


कुछ दिन बाद नाववाला अहरून नामक एक और युवक को गुश्तास्प के पास ले आया। वह राजा की तीसरी लड़की को ब्याहना चाहता था, परन्तु उसके पहले उसे एक अजगर को मारना था। गुश्तास्प ने इस नए दुश्कर कार्य को करने के लिये उसे भी वचन दे दिया।


उसने चाकुओं की एक गेंद बनायी जिसके चारों ओर पैनी कीलें गड़ी थीं। अब वह अजगर की खोज में निकला। जंगल में जाकर गुश्तास्प ने देखा कि अजगर की सांसों से आग निकल रही है। उसने उसकी देह में बहुत से वार मारे जब कि वह स्वयं उसके पंजे से बचने के लिए इधर-उधर कूद जाता था। अब उसने एक बरछी के सिरेपर वह चाकुओं की गेंद लगाई और उसे अजगर के खुले मुख में घुसेड़ दिया। अजगर ने अपना मुंह बंद कर लिया और वह गिर पड़ा। तब राजकुमार ने अपनी तलवार से उसका काम तमाम कर दिया।


इस प्रकार अहरून को राजा की तीसरी लड़की मिल गयी।

तुम्हें यह जानकर आश्चर्य नहीं होगा कि शीघ्र ही वह वीर राजकुमार अपने पिता के बाद फारस का राजा बना। गुश्तास्प के राज्यकाल में ही संत जरदुश्त या जोरोस्टर ने फारसवासियों को अहुर्मज्द का धर्म सिखाया था.। अहुर्मज्द प्रकाश, सूर्य और अग्नि, सच्चाई और न्याय का देवता माना जाता है।   

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                                                                                                                                                          रोचक प्रसंग


चप्पल की कील

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर को कहीं भाषण देने जाना था, अतः जल्दी में उन्होंने वे चप्पलें पहन लीं, जिनकी कील निकली हुई थी। भाषण देकर जब गुरुदेव चलने लगे तो लोगों ने देखा कि उनका पैर खून से लथपख है। इतने कष्ट के बाद भी गुरुदेव ने अपने भाषण की रसधारा में क्षणभर को भी बाधा पैदा नहीं होने दी। तभी किसी ने पूछा, " जब कष्ट हो रहा था तो आप रुके क्यों नहीं ? " इस पर गुरुदेव ने कहा, " सब बंधु भाषण सुनकर आनंद का उफभोग करने आए थे। उन्हें अपना दुख परोसना मुझे अशोभन लगा, इसलिए उसे अपने में समेट आनंद परोसता रहा। "


.....






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टिकट के पैसे

बर्नार्ड शॉ जो अपने हास्य विनोद और तत्कालीन बुद्धि के बारे में मशहूर थे उनके जीवन का यह एक रोचक प्रसंग है। तब वे एक अखबार के संगीत-समालोचक थे। एक दिन सड़क पर एक भिखारी को मधुर कंठ से गाना गाते देखकर वह सुनने के लिए वे खड़े हो गए। गाना खत्म होने पर भिखारी ने शॉ  से भीख मांगी और जब उसे कुछ न मिला तो उसने ताना दिया, " वाह साहब संगीत सम्मेलन में तो आ गए पर टिकट के पैसे देना नहीं चाहते।" शॉ मुस्कुराये, " अरे भाई मैं तो पत्रकार हूं, प्रेस-पास से आया हूं। 

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                                                                                                                                                                ज्ञान-विज्ञान


                                                                                                                                                      डॉ.डी.बालसुब्रमण्यम

चीटियों में होता है बढ़िया ट्रैफिक सेन्स

पंचतंत्र जातक कथाओं और ईसप की कहानियों में इस बात का काफी गुणगान हुआ है कि कैसे हम नन्ही चीटियों से सबक सीख सकते हैं। हावर्ड के जीव वैज्ञानिक ई. ओ. विल्सन ने भी चीटियों की प्रशंसा में कहा है ,” वे 10-10 मीटर लम्बी कतारों में चलती हैं। यदि ऊंचाई से देखेंगे तो उनकी अनुशाषित फौज किसी हाइवे पर ट्रैफिक के समान नजर आएगी। “

सवाल उठता है कि चीटियां यह तालमेल बनाती कैसे हैं? दरअसल रास्ते पर आगे चलती चीटियां थोड़ा सा संकेतक रसायन छोड़ती हैं , जिसे फेरोमोन कहते हैं । शेष चीटियां इस संकेत को पकड़ती हैं और रास्ते पर चलती जाती हैं। दूसरा बड़ा सवाल यह है कि क्या चीटियों की इस आवाजाही में ट्रैफिक जाम भी होते हैं?  जवाब है, ’नहीं’। हमारे विपरीत चीटियां भीड़भाड़ की स्थिति में भी ट्रैफिक जाम नहीं होने देतीं।

किसी भी मार्ग पर कुछ चीटियां धीमी चाल से चलती हैं और कुछ तीव्र गति से चलती हैं। मगर जब ट्रैफिक का घनत्व बढ़ता है, तो धीमी चलने वाली चीटियां थोड़ी तेज चलने लगती हैं और तेज चीटियां थोड़ी धीमी हो जाती हैं। इस स्थिति में चीटियां टोलियां बना लेती हैं और कदम से कदम मिलाकर ऐसे चलती रहती हैं जिससे सामूहिक गति काफी अधिक बनी रहे।

शोधकर्ताओं ने चीटियों पर एक दिलचस्प प्रयोग भी किया है। यह प्रयोग उन चीटियों पर किया गया था जो पत्तियां कुतर-कुतरकर अपनी बांबी में ले जाती हैं। इन चीटियों का जीव वैज्ञानिक नाम एंट कोलंबिका है। ध्यान देने की बात यह है कि घर लौटती चींटियों के पास पत्तियों का बोझ होता है। ये धीमी चलती हैं जबकि घर से बाहर जाती चीटियां तेजी से चलती हैं। यदि इन चीटियों के मार्ग में अवरोध पैदा किया जाएगा तो क्या होगा?

इस प्रयोग के परिणाम के लिए उपयुक्त शब्द हैः अद्भुत। शोधकर्ताओं ने पाया कि पत्ती कुतरने वाली चीटियों में घर लौटती तथा वजन से लदी चीटियों को हमेशा पहले निकलने दिया जाता है। हमदर्दी और सौजन्य का इससे अच्छा उदाहरण कहां मिलेगा?

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                                                                                                                                                          पर्यटन


                                                                                                                                                     -सीताराम गुप्ता

श्री गणेशदर्शन संग्रहालय:
गणेश प्रतिमाओं का एक अनोखा संसार

मंबुई जहाँ भारत की आर्थिक राजधानी है वहीं पुणे देश में शिक्षा का एक बड़ा केंद्र। पुणे भारत का ऑक्सपफोर्ड ही नहीं मराठा संस्कृति का केंद्र भी है। मराठी भाषा, साहित्य, रंगमंच तथा विभिन्न कलाओं का केंद्र पुणे समृद्ध आध्यात्मिक, धार्मिक तथा सामाजिक चेतना का केंद्र भी है। महाराष्ट्र में गणेशोत्सव की बात करें तो भी सबसे पहले  ज़हन में जो नाम उभरता है वह पुणे ही है क्योंकि धर्म के माध्यम से राजनीतिक व सामाजिक चेतना के विकास के लिए लोकमान्य तिलक ने यहीं से गणेशोत्सव मनाने की परंपरा का शुभारंभ किया था। वैसे तो पूरा महाराष्ट्र ही गणेशमय है लेकिन पुणे की बात ही कुछ और है।

    पुणे में अनेक नये-पुराने व छोटे-बड़े गणेश मंदिर हैं जहाँ श्रद्धालुओं की हमेशा भीड़ लगी रहती है। पुणे के इन्हीं मंदिरों में एक पुराना लेकिन नवनिर्मित पेशवाकालीन गणेश मंदिर है जो सारस बाग स्थित श्री देवदेवेश्वर संस्थान में अवस्थित है। सारस बाग जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है एक बड़ा पार्क है जिसकी देखभाल और साज-सज्जा पुणे नगर पालिका द्वारा की जाती है और इसी पार्क के बीचों-बीच स्थित है श्री देवदेवेश्वर संस्थान और इसमें मंदिर के साथ ही स्थित है 'श्री गणेशदर्शन संग्रहालय` जिसमें विविध प्रकार की गणेश प्रतिमाओं को श्रद्धालुओं और अन्य आगंतुकों के लिए संजोया गया है।

 हजारों छोटी-बड़ी गणेश प्रतिमाओं से सुशोभित 'श्री गणेशदर्शन संग्रहालय` का उद्घाटन वैशाख शुदी दशमी, शक संवत् १९१८ तदनुसार २८ अप्रैल १९९६ को हुआ। आकार की दृष्टि से बहुत विशाल न होते हुए भी श्री गणेशदर्शन संग्रहालय अपने में अनेक विविधताओं को समेटे हुए है। यदि हम शिल्प की दृष्टि से देखें तो यहाँ हर माध्यम, विधा और शैली में गणेश प्रतिमाएँ उपस्थित हैं।

 

मूर्तिकला संबंधी साहित्य में प्रमुख रूप से चार प्रकार की प्रतिमाओं का वर्णन मिलता है :


आसन प्रतिमा अर्थात् आसन पर बैठी हुई प्रतिमा,

स्थानक प्रतिमा अर्थात् पादपीठ पर खड़ी हुई प्रतिमा,



शयन प्रतिमा अर्थात् शयनपीठ पर लेटी हुई प्रतिमा



तथा संतरणात्मक प्रतिमा अर्थात् वाहन पर बैठी हुई प्रतिमा।



इन चार प्रकार की प्रतिमाओं में भी अनेक विविधताएँ हो सकती हैं तथा ऐसी प्रतिमाएँ भी हो सकती हैं जो इनसे अलग किसी रूप में हों अथवा मिश्रित विधा में हों। जहाँ तक श्री गणेशदर्शन संग्रहालय का प्रश्न है यहाँ उपरोक्त सभी प्रकार की विविध शैलियों तथा माध्यमों में निर्मित प्रतिमाएँ देखी जा सकती हैं। स्थानक और आसन प्रतिमाओं के अनेक रूप जहाँ संग्रहालय में रखे हैं वहीं अनेकानेक शयन प्रतिमाएँ भी उपस्थित हैं। आसन प्रतिमाओं में पालथी मारकर बैठे गणेश तथा टाँगें फैलाकर बैठे गणेश देखने लायक हैं। झूले पर बैठे गणेश भी यहाँ देखे जा सकते हैं। बालकृष्ण की तरह घुटनों के बल सरकते शिशु गणेश की प्रतिमाएँ भी उल्लेखनीय हैं।

    शयन प्रतिमाओं में शयनावस्था के अतिरिक्त विश्रामावस्था में भी कई प्रतिमाएँ हैं जो देखने योग्य हैं। कुछ प्रतिमाएँ पूर्णरूप से लेटी हुई अवस्था में हैं तो कुछ अधलेटी स्थिति में। शेषनाग के साथ शयनमुद्रा में चार सिर वाले गणेश की विलक्षण प्रतिमा भी यहाँ प्रदर्शित है। गणेश का वाहन है मूषक। संग्रहालय में जहाँ तक संतरणात्मक प्रतिमाओं का प्रश्न है यहाँ अनेक मूषकारूढ़ प्रतिमाएँ हैं और जहाँ संतरणात्मक प्रतिमाएँ नहीं हैं वहाँ मूषक महाशय कहीं न कहीं पास ही विराजमान हैं। संतरणात्मक प्रतिमाओं में मूषकारूढ़ प्रतिमाओं के अतिरिक्त रथ में सवार, हाथी पर सवार तथा वराहारूढ़ प्रतिमाएँ विशेष रूप से आकर्षित करती हैं। एक प्रतिमा में गणेश शेषनाग के फन पर अवस्थित हैं। एक संयुक्त प्रतिमा में गणेश मूषकारूढ़ हैं तो दुर्गा सिंहारूढ़ लेकिन उत्तर भारत में प्रचलित गणेश-लक्ष्मी अथवा गणेश-लक्ष्मी-सरस्वती की संयुक्त प्रतिमाएँ यहाँ देखने को नहीं मिलतीं। युद्धरत तथा नृत्यरत गणेश की प्रतिमाएँ भी यहाँ कई माध्यमों और शैलियों में देखी जा सकती हैं। इसके अतिरिक्त एक प्रतिमा है 'लठवैया गणेश` अर्थात् कंधे पर लाठी उठाए हुए गणेश।

    हम गणेश की पूजा करते हैं तो स्वयं गणेश भी पूजा-पाठ में किसी से कम नहीं हैं। शिवलिंग पूजा करते हुए गणेश की एक लघु प्रतिमा भी यहाँ प्रदर्शित है। एक अन्य प्रतिमा में गणेश को महाभारत लिखते हुए दिखाया गया है। गणेश को प्राय: चतुर्भुज रूप में देखा जाता है लेकिन यहाँ एक प्रतिमा ऐसी भी है जिसमें गणेश के दो हाथ ही हैं। एक हाथ में छाता सँभाले तथा दूसरे हाथ में कमण्डल लिए हुए वे तीर्थयात्रा पर जा रहे हैं। मोटे पेट वाली धातु से निर्मित यह मूर्ति अत्यंत अलंकृत है और कुछ-कुछ लॉफिंग बुद्धा जैसा आभास कराती है। एक मूर्ति में दो गणेश द्रष्टव्य हैं जो परस्पर गले मिल रहे हैं।

हनुमान गणेश` शीर्षक से एक ऐसी मूर्ति भी है जिसमें गणेश हनुमान जैसे लग रहे हैं। मूर्ति को देखने पर कभी गणेश का आभास होता है तो कभी हनुमान का।

   



एक गणेश ऐसे भी हैं जो घंटे के शीर्ष पर स्थित हैं तथा गणेश के शीर्ष पर जड़ी हुई है एक जंज़ीर जिसके सहारे घंटे पर निर्मित गणेश को छत आदि से लटकाया जा सकता है। एक काष्ठ विग्रह है लकड़ी में उकेरे गये दो मंजिला गणेश का। नीचे बने गणेश के शीर्ष पर कमल बना है तथा उस कमल में ऊपर वाले गणेश विराजमान हैं। नीचे वाले गणेश की एक विशेषता ये भी है कि उन्होंने एक हाथ में साँप या नाग को पकड़ा हुआ है। कहने का तात्पर्य ये है कि असंख्य प्रतीक रूपों में असंख्य गणेश मुद्राएँ यहाँ देखी जा सकती हैं। शिव के अर्र्द्धनारीश्वर रूप से तो आप भली-भाँति परिचित हैं।

यहाँ गणेश का अर्द्धर्नारीश्वर रूप तो नहीं है लेकिन एक काष्ठ प्रतिमा स्त्रीरूप गणेश की अवश्य है। मराठी में बोले तो 'लाकड़ी गणेशानी`। नवदुर्गाओं की तरह 'अष्ठविनायक` या आठ विभिन्न रूपों में गणेश की प्रतिमाओं के कई प्रकार के सैट यहाँ देखे जा सकते हैं।

   


गणेश की सबसे अनोखी विशेषता है उनका हस्तिमुख अर्थात् सूँड। गणेश की सूँड प्राय: बाएँ तरफ़ मुड़ी होती है लेकिन कई मूर्तियाँ हैं जिनमें सूँड दाएँ ओर मुड़ी है। जहाँ तक मुख का प्रश्न है कहीं एक सिर वाले गणेश हैं तो कहीं तीन, चार या पाँच सिर वाले गणेश। तीनमुखी गणेशों में एक मुख सामने तथा एक-एक मुख दाएँ और बाएँ। चतुर्मुखी गणेश में एक मुख सामने है तो एक पीछे तथा एक-एक दाएँ-बाएँ। पंचमुखी प्रतिमा में पाँचों मुख दशानन की तरह सामने। भुजाओं के मामले में भी गणेश प्रतिमाओं में पर्याप्त विविधता मिलती है। कहीं दो हाथों वाली मूर्तियाँ हैं तो कहीं चार, छ:, आठ अथवा दस हाथों वाली मूर्तियाँ भी। चतुर्भुज मूर्तियों में गणेश चारों हाथों में कुछ न कुछ धारण किये हुए हैं यथा त्रिशूल, तीर, धनुष तथा परशु आदि। एक चतुर्भुज प्रतिमा में दो हाथ नृत्यरत हैं तो अन्य दो हाथों में प्रत्येक में कुछ न कुछ धारण किया हुआ है।

वीणा सरस्वती का वाद्य है लेकिन यहाँ गणेश प्रतिमा का न केवल वीणावादक रूप मिलता है अपितु मृदंगवादक गणेश भी उल्लेखनीय हैं। संग्रहालय में जहाँ ज्य़ादातर सर्वांग विग्रह अथवा प्रतिमाएँ हैं वहीं कुछ केवल मुखाकृतियाँ ही टँगी हैं। 

    अब संग्रहालय में प्रदर्शित मूर्तियों के माध्यम पर भी थोड़ी चर्चा कर लें। यहाँ मिट्टी से लेकर क़ीमती धातुओं और बहुमूल्य पत्थरों तक सभी से निर्मित मूर्तियाँ रखी हैं। कागज़, मिट्टी, लुगदी, पीओपी, पत्थर, काँच, चीनी मिट्टी तथा और न जाने किन-किन चीज़ों से निर्मित मूर्तियाँ यहाँ प्रदर्शित हैं। कागज़, पेपरमेशी तथा मिट्टी से बने गणेश, पत्थरों में संगमरमर से लेकर बलुआ पत्थर तक विभिन्न प्रकार के पत्थरों और विभिन्न रंगों के पत्थरों से तराशे गए सफ़ेद, काले, भूरे तथा अन्य आकर्षक रंगों के गणेश, धातुओं में ताँबे, पीतल, लोहे, अष्टधातु तथा अन्य मिश्र धातुओं से ढले गणेश, धातुओं से ढालकर बनाए गए गणेश तथा धातुपत्रों पर उकेर कर बनाए गए गणेश, कहीं सोप स्टोन से निर्मित गणेश तो कहीं साबुन से निर्मित गणेश, साबुन में भी कहीं गिलिस्रीन सोप जैसे पारदर्शी साबुन से बने गणेश तो कहीं अपारदर्शी रंगीन साबुन के गणेश, कहीं चंदन से निर्मित सुवासित काष्ठ विग्रह तो कहीं हाथी दाँत से बनी उत्कृष्ट गणेश प्रतिमा, कहीं समुद्र से प्राप्त शंखों और सीपियों से तैयार गणपति तो कहीं इनसे सुसज्जित विनायक, कहीं नन्हीं सुपारी से निर्मित लम्बोदर तो कहीं ताज़ा नारियल से निर्मित वक्रतुण्ड, कहीं काँच से निर्मित भारी गजानन तो कहीं ब्लोविंग ग्लास तकनीक से बने हल्के-फुल्के विघ्नेश्वर, कहीं लकड़ी को काट-छाँट कर बनाए गए गणेश तो कहीं बेकार, टूटी-फूटी, बाढ़ में बहकर आई लकड़ी में स्वयं प्रकटव्य गणेश अर्थात् ड्रिफ्ट़वुड गणेश। 

जिन-जिन रूपों और माध्यमों में कला को प्रकट किया जा सकता है प्राय: उन सभी रूपों और माध्यमों में गणेश यहाँ अपनी नन्हीं-नन्हीं आँखों से विचारमग्न मुद्रा में हमें निहार रहे हैं। यूँ तो विभिन्न मांगलिक अवसरों पर सुपारी या मिट्टी की डली पर कलावा लपेट कर गणेश की प्रतीकात्मक प्रतिमा निर्मित करने का भी विधान है लेकिन धर्मिक और आध्यात्मिक अभ्युदय के साथ-साथ विभिन्न कला माध्यमों का विकास भी अनिवार्य है। मूर्तिकला, चित्रकला तथा अन्य ललित कलाओं व शिल्प माध्यमों में ध्यान, मेडिटेशन अथवा एकाग्रता विकसित करने के तत्त्व भी समाहित होते हैं अत: धर्म, दर्शन व अध्यात्म अथवा मनुष्य के आत्मिक विकास के साधन के रूप में इनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।

 और अंत में चर्चा करते हैं शैली की। यह कोई पुरातत्त्व की दृष्टि से निर्मित संग्रहालय नहीं है अपितु धार्मिक दृष्टि से गणेश प्रतिमाओं का संग्रह किया गया है फिर भी अनेक मूर्तियाँ हैं जो भारत के विभिन्न भागों से तथा कुछ पड़ोसी देशों से प्राप्त की गई हैं। यहाँ नेपाल से प्राप्त एक स्थानक प्रतिमा प्रदर्शित है। गणेशद्वय जो परस्पर गले मिल रहे हैं वो प्रतिमा भी नेपाल से है। एक काले रंग की गणेश प्रतिमा काबुल में निर्मित है। भारत में मैसूर शैली के रंगीन छत्रीधारी गणेश भी यहाँ हैं तो एक प्रतिमा इंदौर में निर्मित भी है। कई मूर्तियों पर आदिवासी कला की छाप दिखलाई पड़ती है। विशेष रूप से लकड़ी की गहरे रंग की मूर्तियों पर।

   

संग्रहालय की मूर्तियाँ विविधता समेटे  हुए तो हैं लेकिन ज्य़ादातर मूर्तियाँ पारंपरिक धार्मिक मूर्ति शिल्प में ही मिलती हैं और उनका पुरातत्त्व की दृष्टि से बहुत अधिक विश्लेषण नहीं किया जा सकता। हाँ यहाँ एक अत्यंत छोटी-सी प्रतिमा है जो हमें राष्ट्रीयता से सराबोर कर देती है और वह है केसरी, सफ़ेद और हरे रंग की गणेश प्रतिमा जिसका ऊपर का भाग चारों तरफ़ से केसरी रंग का है, बीच का सफ़ेद तथा नीचे का हरा। राष्ट्रीय ध्वज या राष्ट्रीयता का प्रतीक है यह गणेश प्रतिमा।



यहाँ गणेश न केवल महाराष्ट्र की सीमाओं से ऊपर उठ जाते हैं, अपितु मत विशेष से ऊपर उठ कर राष्ट्र के हो जाते हैं। कलाकार की भावना धर्म को उदात्त बना देती है।



संग्रहालय जहाँ धर्म को शिल्प से जोड़ देता है वहीं कलाकारों या शिल्पियों की भावना धर्म को राष्ट्रीयता से जोड़ने में पूर्णत: सक्षम है।

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                                                                                                                                                                 चौपाल


                                                                                                                                         डॉ. वेद प्रताप वैदिक

एक और हजार का फर्क

भारत में गरीब होने का अर्थ जैसा है, वैसा शायद दुनिया में कहीं नही है| भारत में जिसकी आय 20 रू. से कम है, सिर्फ वही गरीब है| बाकी सब ? यदि सरकार और हमारे अर्थशास्त्रियों की मानें तो बाकी सब अमीर हैं| 25 रू. रोज़ से 25 लाख रू. रोज तक कमानेवाले सभी एक श्रेणी में हैं| इससे बड़ा मज़ाक क्या हो सकता है ? ये लोग गरीबी की रेखा के उपर हैं| जो नीचे हैं, उनकी संख्या भी तेंदुलकर-कमेटी के अनुसार 37 करोड़ 20 लाख हैं| ये 37 करोड़ लोग, हम ज़रा सोचें, 20 रू. रोज़ में क्या-क्या कर सकते हैं ? अगर कोई इन्सान इन्सान की तरह नहीं, जानवर की तरह भी रहना चाहे तो उसे कम से कम क्या-क्या चाहिए? रोटी, कपड़ा और मकान तो चाहिए ही चाहिए| बीमार पड़ने पर दवा भी चाहिए| और अगर मिल सके तो अपने बच्चों के लिए शिक्षा भी चाहिए| क्या 20 रू. रोज में आज कोई व्यक्ति अपना पेट भी भर सकता है ? आजकल गाय और भैंस 20 रू. से ज्यादा की घास खा जाती हैं| क्या हमें पता है कि देश के करोड़ों वनवासी ऐसे भी हैं, जिन्हें गेहूं और चावल भी नसीब नहीं होते| इस देश के जानवर शायद भरपेट खाते हों लेकिन इन्सान तो भूखे ही सोते हैं| वे इसलिए भी भूखे सोते हैं कि वे इन्सान हैं| वे एक-दूसरे का भोजन छीनते-छपटते नहीं| गरीब परिवारों में कभी बाप भूखा सोता है तो कभी मॉं और कभी-कभी बच्चों को भी अपने पेट पर पट्रटी बांधनी होती है| जहां तक कपड़ों और मकान का सवाल है, भोजन के मुकाबले उनका महत्व नणण्य है| किसी तरह तन ढक जाए और रात को लेटने की जगह मिल जाए, इतना काफी है| ऐसे 37 करोड़ लोगों का देश दुनिया में कोई और नहीं है| दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब लोग अगर कहीं रहते हैं तो भारत में ही रहते हैं|

            यह तो सरकारी आंकड़ा है लेकिन असलियत क्या है ? असलियत का अंदाज तो सेनगुप्ता-कमेटी की रपट से मिलता है| उसके अनुसार भारत के लगभग 80 करोड़ लोग 20 रू. रोज़ पर गुजारा करते हैं| यहां तेंदुलकर-रपट सिर के बल खड़ी है| किसे सही माना जाए ? तेंदुलकर को या सेनगुप्ता को ? भारत का तथाकथित मध्यम-वर्ग यदि 25-30 करोड़ लोगों का है तो शेष 80 करोड़ लोग आखिर किस वर्ग में होंगे ? उन्हें निम्न या निम्न-मध्यम वर्ग ही तो कहेंगे| उनकी दशा क्या है ? क्या वे इंसानों की जिंदगी जी रहे हैं ? उनकी जिदंगी जानवरों से भी बदतर है| वे गरीबी नहीं, गुलामी का जीवन जी रहे हैं| वे लोग कौन हैं ?

                    ये वे लोग हैं, जो गांवों में रहते हैं, शारीरिक श्रम करते हैं, पिछड़ी और अस्पृश्य जातियों के हैं, शहरों में मजदूरी करते हैं, शिक्षा और चिकित्सा से वंचित हैं और जिन्हें सिर्फ पेट भरने, तन ढकने और सोने की सुविधा है| इन्हें वोट का अधिकार तो है लेकिन पेट का अधिकार नहीं है| यह भारत है| यह भूखा और नंगा है| और वह इंडिया है| उसमें वही 25-30 करोड़ लोग रहते हैं| ये नागरिक हैं, सभ्य हैं, स्वामी हैं| कौन हैं, ये लोग ? ये शहरी हैं, उॅंची जातियों के हैं, अंग्रेजीदां हैं| राजनीति, व्यापार और उंची नौकरियों पर इन्हीं का कब्जा है| इन्हीं के लिए चिकनी-चिकनी सड़कें, रेल, हवाई जहाज, कारें बनती हैं| बड़े-बड़े स्कूल, अस्पताल और कालोनियां खड़ी की जाती हैं| इनका संसार अपना है और अलग है| यही वर्ग तय करता है कि गरीबी क्या है और गरीबी कैसे हटाई जाए ? इसीलिए यह फतवा जारी कर देता है कि जो 20 रू. से ज्यादा कमाता है, वह गरीब नहीं है और जो गरीब नहीं है, वह चिल्लाए क्यों और उसके लिए कुछ खास क्यों किया जाए ? याने देश के 80 करोड़ लोगों के बारे में विशेष चिंता की कोई बात नहीं है, क्योंकि ये लोग गरीबी की रेखा के उपर हैं| जिन 37 करोड़ लोगों की चिंता है, उनकी गरीबी दूर करने के प्रयास जरूर होते हैं लेकिन वे सतही और तात्कालिक होते हैं और उनमें से ज्यादातर भ्रष्टाचार की बलि चढ़ जाते हैं| सस्ते राशन और 'नरेगा' (ग्रामीण रोजगार) से क्या वाकई गरीबी हटाई जा सकती है ? ये काम भी यदि ईमानदारी से किए जाएं तो थोड़ी देर के लिए गरीबी हटती जरूर है लेकिन वह मिटती बिल्कुल भी नहीं| उसकी जड़ पर प्रहार होना तो बहुत दूर की बात है| सरकारी प्रयास तो उसकी जड़ को छूते तक नहीं|

              हमारी सरकारों ने गरीबी की जड़ उखाड़ने की बात कभी सोची ही नहीं| हजारों बरस से चली आ रही हमारी गरीबी का मूल कारण जातिवाद है| कुछ जातियां दिमाग का काम करेंगी और कुछ हांथ-पांव का ! दिमागवाली जातियां मलाई खांएगी और हाथ-पांववाली जूठन ! इस तिकड़म को बरकरार रखने के लिए हमने सूत्र् यह चलाया कि दिमागी काम की क़ीमत ज्यादा और शारीरिक काम की क़ीमत कम ! कुर्सीतोड़ काम महत्वपूर्ण और हाथ-तोड़ काम महत्वहीन ! उंची जातियां, शहरी लोगों और अंग्रेजीदानों ने कुर्सीतोड़ काम पकड लिए और ग्रामीणों, पिछड़ी जातियों और गरीबों ने हाड़-तोड़ काम ! यहीं इंडिया और भारत की खाई खड़ी हो गई| यह खाई तभी पटेगी, जब दिमागी और जिस्मानी कामों में चला आ रहा जमीन-आसमान का अंतर खत्म होगा| आज तो एक और हजारों का अंतर है| मजदूर को 100 रू0 रोज मिलते हैं तो कंपनी बॉस को लाखों रू. रोज़ ! यह अंतर एक और 10 का करने की हिम्मत जिस सरकार की होगी, वह गरीबी की जड़ पर पहला प्रहार करेगी| इसी प्रकार देश में से दो प्रकार की शिक्षा और दो प्रकार की चिकित्सा का तुरंत खात्मा होना चाहिए| यदि अंग्रेजी की अनिवार्यता नौकरियों और शिक्षा से एक दम हट जाए तो गरीबों के बच्चों को अपना जौहर दिखाने का सच्चा मौका मिलेगा| आरक्षण, बेगारी भत्ता (ग्रामीण रोजगार), सस्ता अनाज आदि की अपमानजनक मेहरबानियां अपने आप अनावश्यक हो जाएंगी, अगर शिक्षा के बंद दरवाजे खोल दिए जाएं| किताबें रटाने की बजाय बच्चों को काम-धंधे सिखाए जाएं, छोटे-छोटे कर्जे़ देकर काम-धंधे खुलवाएं जाएं और अमीरों और नेताओं के अंधाधुंध खर्चों पर रोक लगाई जाए तो गरीबी कितने दिन टिकेगी ? हमारी सरकारें आमदनी पर तो टैक्स लगाती है, लेकिन खर्चों पर कोई सीधा टैक्स नहीं है| इसकी वजह से समाज में जबर्दस्त प्रतिस्पर्द्घा और भोगवाद को बढ़ावा मिलता है| लोग बचत करने की बजाय भ्रष्टाचार करने पर उतारू हो जाते है| यदि खर्च की सीमा बांधी जाए तो सामाजिक विषमता अपने आप घटेगी| गरीब को गरीबी उतनी नहीं चुभेगी| गरीबी अपने आप में ही अभिशाप है| जब तक उसे दूर नहीं किया जाता, लोकतंत्र् और आर्थिक प्रगति कोरे दिखावे से ज्यादा कुछ नहीं हैं| 

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                                                                                                                                          चांद परियां और तितली


छोटे  हैं तो क्या हुआ

 एक  लड्डू  था। उसकी  माँ  को  अपनी  माँ से  मिलने  जाना  था। जाने से  पहले   वह कह  गई -घर से  बाहर  नहीं  निकलना ! अभी  तुम  छोटे हो । तुममें  शक्ति  भी  कम  है। थोड़े  दिनों  की  ही  बात  है तुम बड़े हो जाओगे फिर खूब उछलना -कूदना। अभी थोडा  धीरज रखो। '
लड्डू  ने  बड़े ध्यान से  माँ की बातें सुनीं और हाँ में हाँ मिला दी --माँ जैसा तुम कहोगी  वैसा ही  करूँगा ।
'तुम मेरे बहुत अच्छे बच्चे हो ! मुझे अब तुम्हारी तरफ से कोई चिंता नहीं है। '
'माँ जल्दी आ जाना '!वह चिल्लाया ।
'जल्दी ही आऊंगी। तुम्हें छोड़ने  का मन नहीं कर रहा है । लेकिन जाना जरूरी है । मेरी माँ को पॉँच दिनों से बुखार  आ रहा है, बहुत कमजोर हो गई हैं । उनके लिए खिचडी   बना कर आऊंगी । वे तुम्हारी नानी हैं । तुम्हें  भी उनसे मिलना  चाहिए। पर बाद में ले जाऊंगी, अभी  बहुत धूप  है । तेज सूर्य  में घर से बाहर निकलने  में डर  लगता  है, कहीं तुम्हें  लू  न लग  जाए। '
लड्डू  की  माँ ने तेजी से उसकी नानी के घर की ओर कदम बढ़ाये। लौटने  में उनको देरी हो गई । लड्डू उदासी से घिरा खिड़की से झाँकने लगा । खिड़की  के नीचे चूहा बैठा था। लड्डू उसकी पीठ  पर कूद  पड़ा।
'चूहे राम ,मुझे  बाग़ की सैर कराओ। मेरा मन बहल जायेगा !'
'सैर तो करा  दूंगा ! पर एक शर्त है । मुझे  लड्डू खाने में बहुत अच्छा लगता है । थोडा कुतरकर तुम्हें खाऊँगा । भूख  भी लगी है । भूखे पेट  तुम्हें नहीं घुमा सकता । गणेश जी  को भी तभी सैर  कराता हूँ जब वे अपना लड्डू मुझे दे देते हैं। '
'ठीक है ,थोडा नीचे से कुतर लो !''
चूहे ने लड्डू को कुतरा!लड्डू  को लगा जैसे उसके शरीर में कोई  सुई चुभो रहा है। तब भी वह चुप रहा क्योंकि उसे उसे चूहे की पीठ  पर  बैठकर घूमना था।
गोलमटोल  लड्डू के  शरीर से गाय के घी और बेसन की खुशबू आ  रही थी । वह घी और बेसन  से मिलकर  बना था । चूहे का मन करता लड्डू को और कुतर लूँ ।
अगले दिन चूहा फिर लड्डू की खिड़की  के नीचे आकर खडा हो गया लड्डू भी  उसका इन्तजार कर रहा था ।
लड्डू माँ से छिपकर खिड़की से नीचे कूद पड़ा ! चूहा उसे देखकर पूंछ हिलाने लगा -'लड्डू ,आज  मैं तुम्हें कल से दुगुनी सैर कराऊँगा मगर उससे  पहले तुम्हें खाऊँगा। '
'मुझे तुम खा लोगे तो मैं सैर कैसे करूंगा ?'
'अच्छा ,थोडा  ही खाऊँगा । तुम  बहुत चिकने  और मीठे हो ! इच्छा होती है तुम्हें खाताही रहूँ ---खाता ही रहूं !'
लड्डू घबरा गया । उसे माँ  की याद आई । माँ ने ठीक ही कहा था --घर से नहीं निकलना .! चूहे से कैसे छुटकारा मिले !अब तो मेरी जान खतरे में है !'
'अपनी अक्ल  का इस्तेमाल  करते हुए लड्डू बोला --चूहे जी ,आज तो मैं मीठा  नहीं हूँ ,नमकीन हूँ । कल तुमने जहाँ -जहाँ से  मुझे कुतरा था ,बड़ा दर्द हो रहा था । माँ को लगा -चीटियों ने मुझे खा लिया है, मेरे चारों तरफ  नमक ही नमक लगा दिया ताकि कोई कीड़ा मुझे नुकसान न पहुंचाये। '
'फिर आज मैं क्या  खाऊँ ?'
कल खा लेना मुझे !मैं नहा कर आऊंगा। नमक सब धुल जायेगा। सैर भी कल करा देना। '
'सैर तो तुम्हें  करा देता हूँ ! तुम मेरा ध्यान रखते हो तो मुझे भीतो तुम्हारे लिए कुछ करना ही पड़ेगा !'
'लड्डू  का मन आज सैर में नहीं लग रहा था। जैसे ही चूहा खिड़की के नीचे से गुजरा वह उछलकर खिड़की पर बैठ गया । चूहे को उसकी इस चतुराई   का पता ही नहीं लगा।
चूहा  काफी थक चुका था । बोला -लड्डू ,नीचे उतरो ! कल ठीक समय खिड़की पर बैठे मिलना !'

लड्डू जोर से हंसा --चूहेराम ,खिड़की पर तो मैं पहले से ही बैठा हुआ   हूँ, पर तुम्हारी  पीठ पर कभी नहीं बैठूँगा !एक ही गलती  बार-बार  नहीं करूंगा । तुम छोटा  समझकर मुझे नुकसान पहुंचाना चाहते हो ! छोटा हूँ तो क्या हुआ ! बुद्धि में तो कम नहीं !                                                   ..सुधा भार्गव, बंगलोर  (भारत )








चीं -चीं चिड़िया








झगड़ा करना हो तो चीं-चीं
दाना चुगना हो तो चीं-चीं
प्यार जताना हो तो चीं-चीं
जब देखो तब चीं-चीं-चीं-चीं
चिड़िया तुम तो बस बुद्धू हो
बात-बात पर करती चीं-चीं।


      - दिविक रमेश







मुन्नी मुन्नी औढ़े चुन्नी,


मुन्नी-मुन्नी ओढ़े चुन्नी, गुड़िया खूब सजाई,
किस गुड्डे के साथ हुई है इसकी आज सगाई।
मुन्नी मुन्नी ओढ़े चुन्नी कौन खुशी की बात है,
आज तुम्हारी गुड़िया प्यारी की क्या चढ़ी बारात है!

      -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी