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                                    सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर





                                        

                                          "हल्की हल्की बारिशें होती रहें
                                        हम भी फूलों की तरह भीगा करें

                                            आँख मूँदे उस गुलाबी धूप में
                                              देर तक बैठे उसे सोचा करें

                                            दिल मुहब्बत दीन दुनिया शायरी
                                                हर दरीचे से तुझे देखा करें 
 "


                                                                 -कुंवर बेचैन


                                                       -सद्भावना विशेषांक-


                                                        लेखनी-दिसंबर-2009  


                                                           (वर्ष-3-अँक-34)   


इस अंक में- कविता विदेशः विचिस्लाव कुप्रियानफ़ (रूसी)-अनुवादः अनिल जनविजय ,ब्रतोल्त ब्रेख्त(जर्मन)-अनुवादःउज्ज्वल भट्टाचार्य। माह विशेषः दो जापानी लोकगीतः भावानुवाद-सुरेश ऋतुपर्ण। कविता भारतः बंगला-अरुण मित्र व जय गोस्वामी-अनुवादः कल्लोल चक्रवर्ती, ओड़िया-प्रवासिनी महाकुड़ु तिवारी-अनुवादःराजेन्द्र प्रसाद मिश्र, असमी- कुशल दत्त-अनुवादः किशोर कुमार जैन, मराठी -विंदा करंदीकर अनुवादः रामदास जोगेलकर, पंजाबी-शशि समुद्रा-अनुवादःराजेन्द्र तिवारी, उर्दू-हफीज़ जालंधरी-अनुवादः सीताराम गुप्त, सिंधी--विम्मी सदारंगाणी- अनुवादः सीताराम गुप्त, गुजराती-दिव्या रावल-अनुवादः चितरंजन रावल। माह के कविः शंभुनाथ अवधी।पारंपरिक बालगीतः ब्रिज और राजस्थान-भावानुवादःशैल अग्रवाल।


मंथनःअज्ञेय। परिचर्चाः डॉ. नरेन्द्र कोहली।  कहानी भारतः  रवीन्द्र नाथ टैगोर- बंगाली से अनुवादः आबिद रिजवी। कहानी विदेशः नादिया तेसिच -अनुवादःमृदुला गर्ग। दो लघुकथाएँ: पंजाबी से अनुवाद- सुभाष नीरव। संस्मरणः लियो तौल्सतौय का अंतरंग संसार- अनुवादःरूपसिंह चन्देल। स्मृति शेषः(विष्णु प्रभाकर को श्रद्धांजली)- गिरीश पंकज, सीताराम गुप्त। आकलनःसूर्यनाथ सिंह। संकल्पः सीताराम गुप्त। हास्य व्यंग्यः अशोक गौतम। बाल कहानीः नौर्वेजियन लोककथा-अनुवाद-शरद आलोक। चौपालः वेदप्रताप वैदिक ।  माह की साहित्यिक व सांस्कृतिक खबरों से भरपूर विविधा। 


                                                                   In the English Section:  : 


Hiaku : Snap Shots of Four Seasons-  Fino Sojo, Hino Sojo,Iida Dakotsa, Kawbata Bosha, Kobayashi Issa, Kato Koko, Masoka Sikki, Miura Yuzuru,Nishijima Bakunan, Naito Josho, Oshima Ryota, Yosa Buson, Translated by Yuzuru Miura . Poetry Here & Now: Shail Agrawal. Story- Divya Mathur- Translation-Gurpal Singh - Kids' Corner: Akbar-Birbal Story: narration-Shail Agrawal & a traditional nursery rhyme from Britain.                    


                                                          संरचना व संपादनः शैल अग्रवाल


                                                   
                                  संपर्क सूत्रः editor@lekhni.net; shailagrawal@hotmail.com 

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                                                                                                                                                              अपनी बात

भाषा के आधार पर विघटन और अलगाव की रणनीति;  उसपर आधारित राजनीति,  किसी भी देश या समाज को बेहद विष्फोटक और हानिकारक बिंदु पर लाकर खड़ा कर सकती है। सभ्यता के कई-कई युग पीछे धकेल सकती है।  ...किसी देश की आजादी और देश की अस्मिता का एक अनिवार्य संबंध होता है और अस्मिता में भावात्मक समन्वय निहित है; क्योंकि अगर देश अपने को एक नहीं मानता तो उस की अस्मिता का कोई सवाल ही नहीं उठता--- हाल ही में मुंबई सदन में हिन्दी और मराठी को लेकर हुए विवाद और आपत्तिजनक घटनाएँ स्वतंत्र भारत को  सोच की एक नई तरह की पराधीन मानसिकता में उलझाती-सी प्रतीत होती हैं। सत्ता मानव जीवन की चेतना को सत्तापेक्षी बनाती है, कला और साहित्य उसके ऐसा करने का विरोध करते हैं। साहित्य अपने मूल उद्देश्य में मानव के जीवन को और अंततः समाज को चेतनशील बनाने का काम करता आया है। कला और साहित्य हमेशा से ही, हर तरह के विरोध के बावजूद भी, समाज और उसकी चेतना को ढालने में सक्षम है, इसका उद्देश्य मात्र मनोरंजन कभी नहीं रहा। इसने न सिर्फ दर्पण की तरह समाज को प्रतिबिंबित किया है, अपितु नदी की तरह नई राहें भी बनाई है, नव-जीवन संचार किया है..चाहे वे ह्यूगो और चेखव हों या फिर तुलसी और कबीर।


‘ जाति न पूछो साधु की’ तरह ही मानवता की भी कोई भाषा नहीं होती , जाति नहीं होती...आपसी प्रेम, सद्भाव और करुणा के अलावा। समाज के ताने-बाने से रचा बुना साहित्य अपने को अलग-थलग कैसे रख सकता है। आंद्रे ब्रेंता ने लिखा है कि कोई कलाकृति तभी मूल्यवान होती है, जब भविष्य की आहटें उसमें मौजूद हों और भविष्य को पहचानने के लिए वर्तमान को जानना जरूरी है, अतीत को याद रखना जरूरी है, ताकि हम अपनी ही रौ में न बहते चले जाएं...अपने आसपास और सहजीवियों से भी जुड़े रहना जरूरी है । भाषा और संवाद का विकास भी शायद इसी जोड़ने और जुड़ने की चाह से ही हुआ था और आज भी हजारों आन्दोलनों और परिवर्तनों के बाद भी,भाषा की मुख्य जरूरत यही है...।


इसी संजो लेने, जान लेने की पिपासा से शुरू  होती है हमारी जानने-सीखने, पढ़ने-पढ़ाने और साहित्य व अनुवाद-साहित्य आदि की जरूरत और प्रतिक्रियाएँ । ये जरूरतें प्राकृतिक और आम हैं। आदमी को जब लिखना -पढ़ना नहीं आता था, भाषा और लीपियों का कोई नियमित और सुचारू ढांचा नहीं था उसके पास, तब भी उसने आड़ी-तिरझी लकीरों और निश्चित हाव-भावों के साथ अपने को अभिव्यक्त करना शुरू कर दिया था।.. अपने विचारों और अनुभवों की धरोहर भावी पीढ़ी के लिए सहेजना शुरू कर दिया था।  सोचिए यदि यह जानने-पहचानने और आदान-प्रदान व संवाद का सिलसिला विकसित नहीं हो  पाता, जिज्ञासा और जरूरतों के तहत अनुवाद और अनुसरण आदि न होते तो कैसे बिना मिले या देखे  दूसरी संस्कृतियों, दूसरे देशों और दूसरों के मन में झांकना संभव था...उन्हें जान और समझ कर निकट पहुंच पाना, अपनी बात कहना संभव था !  मानव का यायावरी मन सदैव से ही,  खुद को ही नहीं , आसपास परिचित-अपरिचित सभी को जानने की जिज्ञासा और पिपासा लिए रहता है...उपमा, तुलना और आकर्षण व विघटन....एक जानने और सीखने की प्रक्रिया जीवन में लगातार चलती ही रहती है ...हम सबके ही जीवन में और कला या व्यवहार; खुद हमारे अपने व्यक्तित्व और जीवन तक में अनुवादित और अभिव्यक्त भी होती रहती है...कभी प्रभावशाली  और अनुसरणीय प्रसंग बनी तो कभी एक चेतावनी...एक निषेध रेखा बनकर।

कला के उद्देश्य के संदर्भ में चर्नीशेव्स्की (१८२७-१८८९) की टिप्पणी कला को इतिहास से अलगाती है। वह कहता है कला का मूल उद्देश्य जीवन में मानव की दिलचस्पी की हर चीज को पुनः मूर्त करना है। बहुधा जीवन का स्पष्टीकरण और उसकी परिणतियों का गुण-दोष विवेचन भी काव्यात्मक कृतियों में प्रमुख स्थान ग्रहण कर लेता है। प्राकृतिक उष्मा हो या भावात्मक आलोड़न साहित्य हमें दैनिक जीवन से ऊपर ले जाता है। आम को अमर कर पाना सिर्फ कलाकार के ही बस की बात है।  


इन्द्रधनुष                                                                                                                                                                     जब जब देखूं इन्द्रधनुष नभ
मन झूम झूम जाता है |
ऐसा ही था जब बचपन था
आज युवा भी वह भाता है |

यह रहेगा ऐसा ही जब
अपने को बूढ़ा    पाउँगा |
या चुपके से एक दिन जब
दुनिया से उठ जाऊंगा |

बचपन है जनक जीवन का
यह सत्य सामने पाता हूं |
                                                         


रहे हमसे जुडी प्रकृति यह 
हर पल यही मनाता हू |


               विलियम वर्ड्सवर्थ ( अनुवाद डॉ. रामाश्रय सिंह)





दैनिक जीवन के अनुभव और रंग-रूप के अहसास सार्वभौमिक हैं और सबको ही होते हैं, पर उन अनुभूतियों और अनुभवों  को  अविस्मरणीय शब्दों की लड़ियों में पिरोना,  नया आकार, एक नया रूप देकर, यादगार कलाकृति और दस्तावेज में परिवर्तित कर पाना आसान नहीं। भावुक मन और साथ-साथ एक शिल्पकार की पैनी नजर और सक्षम औजार, कई चीजों का संगम हो, तब जाकर एक अमर रचना  जन्म ले पाती है।   शरद् चन्द्र ने कहीं लिखा  था कि नारी मन एक ऐसे स्वच्छ शीशे के समान है, जिसमें जो छाया पड़ती है, वही उसके अंतर्मन में जा बसती है। पर क्या हर मन के साथ ऐसा ही नहीं होता; विशेषतः कवि और लेखकों की तो यही अनुभूतियाँ और मूर्त-अमूर्त छवियां ही मुख्य सहेलियां हैं.. साधारण में असाधरण ढूँढ पाना और असाधारण को बहुत ही साधारण तरीके से कह जाना...।


हाल ही में बैकॉक जाने का अवसर मिला और लगा हर चीज के पीछे से छुपी एक भारतीयता झांक रही है। मन्दिरों के भित्ति चित्र और लोगों की विनम्रता, आतिथ्य ...सहजता और ठग-विद्या व चालाकी ...सबकुछ बहुत जानी-पहचानी और अपने देश जैसी ही लगी। अनायास ही वह सुन्दर व सौम्य युवती जो हमें दर्शनीय स्थल घुमा रही थी बेहद अपनी -सी लगने लगी  और अनायास ही कह बैठती हूँ- हमारे तुम्हारे अतीत और इतिहास के तार इतने मिले और उलझे हुए हैं कि मुझे तुम सब बिछुड़े संबंधी जैसे ही लग रहे हो। सही है जब तक जानो नहीं सब अजनबी है और जान लो तो अजनबी भी तो परिचित ही हो जाते हैं...। साहित्य भी यही काम करता है।  आज तो संचार युग है, कम्प्यूटर, दूरदर्शन और पर्यटन ने लोगों को बहुत पास ला दिया है। पर पहले जब ऐसा नहीं था तब भी  जाने अंतर्मन के किन सूत्रों से जुड़ी मानव मन की सोच...उसके सुख-दुख..रागरंग पूरे विश्व में और तत्कालीन विश्व साहित्य में एक से ही रहे थे। शायद वक्त की जरूरत ही आदमी की जरूरत होती है। जब आध्यात्म और भक्ति का युग आया तो  दान्ते प्लूटो और वाल्मीकि थे सूर और तुलसी थे और जब  विलासिता को तो प्री रैफेलाइट्स यूरोप में और केशव, विद्यापति और बिहारी  भारत में। वजह साफ है कवि या लेखक वक्त के साथ चलता है और हर वक्त की अपनी एक जरूरत होती है; उसे गढ़ने वाली परिस्थितियां विशेष होती हैं। इन्ही विशेष क्षणों के प्रतिबिंबन और संरक्षण का काम साहित्य करता है। एक दूसरा काम जोड़ने का भी यह करता हैः जितना हम दूसरों को जानेंगे, उनकी संस्कृति और सभ्यता को समझेंगे उतनी ही भ्रांतियां और आपसी वैमनस्य कम होगा। साहित्य और मनुष्य देनों का ही पहला कर्तव्य जोड़ना है तोड़ना कदापि नहीं।वर्षांत पर लेखनी ने भी एक ऐसा ही लघु प्रयास किया है। माना विषय गागर में सागर के समान है पर जितना सहेज पाएं वही ठीक। हर कदम मंजिल की ओर जाती यात्रा को कम तो अवश्य ही करता है। लेखनी के सभी पाठकों और मित्रों को नववर्ष की अशेष मंगल कामनाओं के साथ, प्रस्तुत है लेखनी का सद्भावना यानी देश-विदेश की विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों से अनुदित साहित्य विशेषांक।                                                                                         


                                                                                                                                                     -शैल अग्रवाल      

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                                                                                                                                                       कविता ( भारत)

कहा जो था


एक साड़ी पहननी थी
इंद्रधनुष से पूछा
कौन-सा रंग खूब फबेगा
गेहुंए रंग की नारी पर

इंद्रधनुष का मन खुश था शायद
नीला रंग निकाल दिया उसने अपने सात रंगों से
मकड़ी से कहा बुन दे
दुनिया का सबसे महीन रेशमी धागा

देखनेवालों की आँखों में लग जाएगा
तारों का मेला
ऋतुओं से मांग लायी शरद ऋतु को
मुझे चाहिए थी शेफाली और चांदनी

 
आकाश को बोली
असमय मेरे इस विश्वासभरे आकाश में
झरने न लगे
बाढ़, आंधी और अकाल के अभिशाप

उदार हो शायद और कुछ
झुक आया आसमान मेरे भीतर
रात से कहा
थोड़ी-सी गोपनीयता दे

रात ने पसार दी अपनी काली चादर
अब मैं आश्वस्त और निश्चिंत हूं



पृथ्वी से कहा
तेरी सहनशीलता के आगे झुक जाता है
ईश्वर का सिर
मेरी सारी गलतियों
बुराई-भलाई, पाप पुण्य को
माफ कर देना
जानती हूं
उदार है तू
हमेशा से।

      -प्रवासिनी महाकुड़ तिवारी ( उड़िया से अनुवादः डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र , मैदान गढ़ी, नई दिल्ली)








अंतिम बार तुम्हें










अंतिम बार तुम्हें
मंदिर के रास्ते पैदल जाते हुए देखा था

तुम मेरी सबसे ज्यादा अच्छी चद्दर पहन कर
चंदा सी यौवना बनकर पहाङ पर च़ढ गई थी
ठंडी हवा में उङ रही तुम्हारी
चद्दर के कोने में कौन सी गंध थी वो

मानों किसी सागर की गहराई से मेरे सीने की गहराई तक
एक उङने वाली जलपरी बनकर चली आई हो तुम
और मेरे सीने के एक-एक कर सभी
बंद दरवाजों को खोलकर आ रही हो तुम तुम्हारे उज्ज्वल रास्ते से.......

अंतिम बार तुम्हें
मंदिर के रास्ते से पैदल जाते देखा था
मंदिर के दीपक से तुम्हारे सिंदुर को रोशन कर
कानों-कान क्या कह गया ...


कुशल दत्त (असमी से अनुवादः किशोर कुमार जैन)









विवाहिता को








मैं तुम्हारे अंदर एक जंगल-सा देखता हूं
जब तुम मेरे पास आकर खड़ी होती हो
बहुत दिनों से इस जंगल में एक लाश ढकी पड़ी है
आश्चर्य है जल, वायु, धूप और जीवाणु भी
इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाते
यह लाश सड़ती नहीं,
जंगली जानवर इसके पास भी नहीं फटकते
रात को रोशनी फूटती है इस लाश से,

 
मुझे पता है यह लाश मैं हूँ
लेकिन इस रहस्य से अब परदा हटा देना होगा
ऐसा करूंगा भी,
जिस दिन चार पैरों से चलता हुआ
पांव पकड़कर उस लाश को
जंगल से खींचकर लाऊँगा मैं।

     जय गोस्वामी ( बंगला से अनुवादः कल्लोल चक्रवर्ती)











विलाप








ये कैसा षडयंत्र है जो प्रवाहित है पवन में
तेरी स्मृतियों के सारे दीपक बुझा के
मैं स्वप्नों में विचर रहा हूं
मुझे पीड़ा से तकता है तेरा प्यार
अभीप्साओं का वो बुलबुला हूँ
कि धीरे-धीरे पिघल रहा हूं
मेरी आंखों में
रेगिस्तान ये कैसा उभर रहा है
में नृत्यालयों में बुझ रहा हूं
मधुशालाओं में जल रहा हूं
जो मेरे अंदर स्पंदनरत था
वो मृत्युमुख में अग्रसार है।

      हफीज़ जालंधरी ( उर्दू से अनुवादः सीताराम गुप्त, पीतमपुरा देहली) 











ऊष्मा








इन गीतों में, कविताओं में
शब्दों में, विरामों में,
आश्चर्यों में, तुम ही हो।

तुम न होते तो
शायद ये शब्दों का समूह
आघातों के झंझावतों में कहीं
चिर गया होता।

तुम रवि की
प्रथम किरण की उष्मा बन
मेरे इर्द गिर्द लिपट जाओ
मेरे कवच बन

ताकि ये मध्यान्ह
मुझे गला न सके
और रजनी की गहराई
मुझे डुबा न सके।

 -दिव्या रावल (गुजराती से अनुवाद- चितरंजन रावल, कोंडागांव , छ.ग.)  











अवकाश की अभिलाषा में








यूं समय बीतता है
अवकाश की अभिलाषा में
जैसे किसलय कोई
प्रवाहित पयस्विनी में

तट के निकट आकर
चाहे कि ठहर जाऊं
तनिक दृष्टिपात कर लूं
विटपावली के प्रतिबिम्ब पर

जो अपगा के आंचल में
सौंदर्य है सरिता का

-विम्मी सदारंगाणी ( सिंधी से अनुवादः सीताराम गुप्त. पीतमपुरा. देहली) 











तेज कटार पर चलती औरत








तेज कटार पर चलती औरत
फिसल गई तो क्या होगा?
एक हादसा या जश्न का कारण?

खुद को वह कोई नायिका समझती है
पर दर्शकों के लिए
वह सौ में एक नौटंकी है

तेज कटार पर चलती औरत
घबराहट को छुपाती मुस्कुराती है



पर वे इसको
तमाशे का ही एक पार्ट समझते हैं
और जब वह सहमी लगती है तो भी



तेज कटार पर चलती औरत
क्या सोच रही है
अपने बच्चों को



खाबिंद को
अपने को
चौगिर्द जुड़ी भीड़ को

या भीड़ में एक चेहरे को

तेज कटार पर चलती औरत
सोचों में खो गई तो क्या होगा
वह फिसल जाएगी

वह हार जाएगी

तेज कटार पर चलती सखि
इस वेला

तेरी जान जुए में जुती है
तेरी आन जुए में जुती है

इसलिए

तू कदमों पर ध्यान धरना
कटार पर ध्यान धरना
कदमों पर ध्यान धरना
कटार पर ध्यान धरना।

-शशि समुद्रा (पंजाबी से अनुवाद-राजेन्द्र तिवारी- पूरे सलई कौड़िया, गोंडा)











सड़ियल अंडा








दधीचि,
है तुम्हें अहसास अपनी भूलों का,
दी अस्थियां अपनी, और शस्त्र बने जो,
कर सकें जो संहार असुरों का।
उन्ही शस्त्रों से आज मानव
संहार करता मानव का।

येशु,

तुम भी कुछ कम नहीं।
बहाया अपना खून
मानव कल्याण के लिए
पी रहा उसे आज मानव
अपनी वासना के लिए।

प्रकृति,

खोपड़ियों के प्यालों में भर कर
मानव आतुर अमृत पीने को
क्यों सहेजती हो फिर
बृह्मांड के इस सड़ियल अंडे को।

         विंदा करंदीकर ( मराठी से अनुवादः रामदास जोगेलकर, चौबे कॉलोनी, रायपुर)








ऱाख










इतनी राख क्यों उड़ रही है?
दिन नहीं, रात नहीं हर वक्त??
एक सैकेंड के लिए भी इसे रुकते नहीं देख रहा
मेरे लिए कुछ भी करने का उपाय नहीं है

कविता लिखूंगा, धीरे-धीरे सोचूंगा, छंद मिलाऊंगा
उसी वक्त आँखों पर आ गिरी राख

मुझे भूख लगी है
भात मुंह में डाला है,
राख से सन गया है कौर
यहां तक कि नींद में भी घुस आया है राख मिला
हुआ दुस्वप्न

थोड़ा सा जो सुख और प्यार के सपने देखूंगा
वह भी संभव नहीं है
निंद्रा में, जागरण में, आठों पहर यहीं
क्यों है इतनी राख?

ऐ लड़की तू ही बता,
क्या यह तेरे जले हुए शरीर की राख है ??

              अरुण मित्र ( बंगला से अनुवादः कल्लोल चक्रवर्ती)

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                                                                                                                                              कविता-अनुवाद(विदेश)
 

तीन कविताएं- 


                                                                                                                                         


                                                                                                                                        विचिस्लाव कुप्रियानफ़(रूस)
                                                                                                                                          अनुवादःअनिल जनविजय


गायन पाठ (1)










आदमी ने ईजाद किया पिंजरा
पंखों से पहले
और अब पिंजरों में गाते हैं पंख
गीत स्वतन्त्र उड़ान का

जबकि पिंजरों के सामने
गाते हैं पंखहीन
पिंजरों के न्याय के गीत

पक्षी और पिंजरा
गा सकते हैं एक साथ
लेकिन उड़ नहीं सकते

उड़ सकते हैं एक साथ
सिर्फ़ पंख और आकाश ही

       





गायन-पाठ (दो)


पक्षी गा रहे हैं
हम लोगों से डरते हैं
और हम गाते हैं
डर के मारे

मछलियाँ गा रही हैं
हम लोगों से डरती हैं
और हम चुप हैं
डर के मारे

जानवर गा रहे हैं
हम लोगों से डरते हैं
और हम गुर्रा रहे हैं
डर के मारे

लोग गा रहे हैं
हम जानवर नहीं हैं
डरिए नहीं

पर भाग गए सब
उड़ गए इधर-उधर
तैर गए इधर-उधर
डर के मारे
और लोग गा रहे हैं








ख़ून का रिश्ता









मैं कुछ देखना नहीं चाहता
मैं कुछ सुनना भी नहीं चाहता
और कुछ कहूंगा भी नहीं

होंठ काटता हूँ अपने
महसूस करता हूँ
ख़ून का स्वाद

आँखें बन्द करता हूँ
देखता हूँ रंग
ख़ून का

कान बन्द करता हूँ
सुनता हूँ ख़ून की आवाज़

नहीं, सम्भव नहीं है
ख़ुद में ही सिमट जाना
और तोड़ लेना इस दुनिया से
ख़ून का नाता

सिर्फ़ एक ही रास्ता है
हमेशा हम
बोलते और सुनते रहें
सुनते और बोलते रहें
शब्द बसे हैं हर किसी के ख़ून में











   

तीन कविताएं


                                                                                                                                               

                                                                                                                                              ब्रतोल्त ब्रेख्त ( जर्मन)
                                                                                                                                      अनुवादः उज्ज्वल भट्टाचार्य




द्वंदात्मकता की प्रशस्ति









बढ़ती जाती है नाइंसाफी
सधे कदमों के साथ
जालिमों की तैयारी है
दस हजार साल की
हिंसा ढाढंस देती है
जैसा है, रहेगा वैसा ही
सिवाय हुक्मरानों के
किसी की आवाज नहीं
और बाजार में लूट की चीख
शुरुआत तो अब होनी है
पर लूट के शिकारों में से बाज़ कहने लगे हैः
जो हम चाहते हैं, वो कभी होना नहीं
गर जिंदा हो अब तलक, कहो मतः कभी नहीं
निश्चित कतई निश्चित नहीं है
जैसा है, वैसा नहीं रहेगा
जब हुक्मरान बोल चुके होंगे
बारी आएगी हुक्म निभाने वालों की
किसकी हिम्मत है कहने कीः कभी नहीं?
जिम्मेदार कौन है, अगर लूट जारी है?
हम खुद
किसकी जिम्मेदारी है कि वह खत्म हो ?
खुद हमारी जिसे कुचला गया,
उसे उठ खड़े होना है
जो हारा, उसे लड़ते रहना है
अपनी हालत जिसने पहचानी
रोकेगा कौन उसे?
फिर आज जो पस्त हैं कल होगी उनकी जीत
और कभी नहीं के बजाय गूंजेगाः आज अभी !

 

 

 

बछड़ों का कूच









ढोलक के बोल पर
बछड़े हैं जाते
ढोलक की खाल वे
खुद ही हैं जुटाते

 

हांके कसाई
आंखों को मींच
बछड़े के कदम बड़े शांत
जिन बछड़ों के खून रहे
धरती को सींच
वे बनाते चले उसके संग पांत

 

हाथ तने ऊपर हैं
देखे हर कोई
उंगलियां है उन्होंने
खून ही से धोई

 

हांके कसाई
आंखों को मींच
बछड़े के कदम बड़े शांत
जिन बछड़ों के खून रहे
धरती को सींच
वे बनाते चले उसके संग पांत

 

खून सने परचम पे
मुड़ी है सलीब
फंदा ये कैसा है
जाने क्या गरीब

 

हांके कसाई
आंखों को मींच
बछड़े के कदम बड़े शांत
जिन बछड़ों के खून रहे
धरती को सींच
वे बनाते चले उसके संग पांत

 

 

दलदल









कुछ दोस्तों को देख मैंने,
और उनमें से सबसे प्यारों को
लाचार धंसा हुआ दलदल में,
जिसके बगल हो हर रोज मैं गुजरता हूं

 
और यूं नहीं कि हुआ हो ऐसा
अचानक किसी सुबह
अक्सर
कई-कई हफ्ते लग गए इसमेः
यह और खौफनाक था।
और फिर यादें हमारी
लंबी बातचीत की उस दलदल पर, जिसमें
कितने ही अब तक डूब चुके

 
लाचार मैंने देखा अब उन्हें पड़ा हुआ
खून चूसती जोकों से ढका हुआ
चमकती हुई
आहिस्ता से सरकती कीचड़ में धंसते हुए
चेहरे पर कुत्सित
कामना भरी मुस्कान !   

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                                                                                                                                                               माह के कवि


                                                                                                                                                          - शंभुनाथ अवधी








हमतव देखे पुरुब्वा के झोका बबुनी.

हमके रास्ते म देबू तू धोका बबुनी..

 

हमतव देखे पुरुववा के चाँद बबुवा.

हमके सेतय म देबेया बिसार बबुवा..

 

हमारे मनवा म नइखे ब पाप बबुनी.

जोदाब सातव जनाम्वा के तार बबुनी..

 

हमरा पत्थर करेजवा न आ बबुवा..

हमारी नेहिया से करा न खिद्वाद बबुवा..

 

हमारी आखिया के बातू तू ज्योति बबुनी..

तोहके विपदा से राखावे हम ओट बबुनी..












बादल कड़के बिजली चमके॥

मेघा तिव तिव बोले रे॥

आधी रात के सेज के उपरा ॥

पवन आय झकझोरे रे॥

धीरे धीरे कनवा म प्रेम रस घोले रे॥

पानी बरषे बादल बरषे ॥

नदिया हिलोरे रे॥

पापी  पपीहा जुएनव जूनी॥

पिव पिव बोले रे॥

धीरे धीरे कनवा म प्रेम रस घोले रे॥

अचरा उडे चदरा उडे॥

मौसम बोली बोले रे॥

रतिया म बदरा ॥

देहिया टटोले रे॥

धीरे धीरे कनवा म प्रेम रस घोले रे॥










 


महगाई से हाल बुरा ब  ॥

रोवय  पेटू बोटी का॥

चार दिना से नही ब खाए॥

सब्जी मिलय न छोटी का॥

 

बाप बेहाल विधाता कोशय॥

कैसे कर्मठ गांठी राम॥

लरिकन का कैसे समझायी॥

चौपट धंधा छूटा काम॥

नन्कौवा बनियानी का फाड़े॥

रूपया मांगे लंगोटी का...

 

यही झंझट म देही बोली गय ॥

पौरुष तन से भागत ब॥

कैसे चले अब घर कय खर्चा॥

रात बहेतू जागत बा॥

कहा से रूपया मांग के लायी ॥

आता नही बा रोटी का॥

 

चारव जूनी चाचर होत॥

ऊब गवा बा जान॥

तल्लुक्दारय उलटा बोलाय ॥

होत रोज अपमान॥

बोले महरिया छत के ऊपर॥

हठ  कर बैठी धोती का॥

 

महगाई से हाल बुरा ब  ॥
रोवय  पेटू बोटी का॥

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                                                                                                                                              दो   जापानी लोकगीत
                                                                                                                                         भावानुवादःसुरेश ऋतुपर्ण


 


         फुरुसातो (गृहनगर)











बहुत मुश्किल है भूल जाना


अपने गाँव की याद !





वे पहाड़ी ढलान


खेला था जहाँ


खरगोशों के साथ


वे नदियाँ


जिनमें पकड़ता था


सोन मछलियाँ





वे दिन


अब भी मेरे सपनों में आते हैं


सच !


बहुत मुश्किल है भुलाना


अपने गाँव की याद !





सोचता हूँ


अच्छी तरह से होंगे


मेरे मां -बाप


और मेरे वे सारे दोस्त


जो धीरे-धीरे मुझे भूल


अपने आप में


मस्त हो गये होंगे।





पर मुझे अब भी याद आते हैं


बारिशों के वे दिन


बहुत-बहुत याद आते हैं


झूमती हवाओं के दिन





हर रोज मेरी यादों में


घूम जाता है मेरा गाँव





सच ! 


बहुत मुश्किल है भूल जाना


अपने गँव की याद !





जब पूरे हो जायेंगे मेरे अरमान,


मेरे सपने


और लौटूँगा अपने गाव की ओर।





नहीं जानता लेकिन


कब पूरे होंगे मेरे अरमान,


मेरे सपने


और लौटूँगा कब


अपने गाँव की ओर


नहीं जानता।





मैं लौटूँ, या न लौटूँ


पर मुझे मालूम है


मेरे गाँव के पर्वतों पर


छा गई होगी हरियाली


और नदियों में


बह रहा होगा


अमृत जैसा पवित्र पानी !


सच !


बहुत मुश्किल है


भुला पाना


अपने गाँव की याद !














सुकीयाकी








कहीं झर न जाएँ आँसू आँख से


इस डर से सिर उठाए


चला जा रहा हूँ तनहा-तनहा


दिल में कसकती टीस लिए


आज की रात हुआ फिर, तनहा-तनहा





य़ादों में उमगते हैं


बसंत के मदभरे दिन


उनकी यादों के साथ


चला जा रहा हूँ तनहा-तनहा।


कहीं झर न जाएँ आँसू आँखों से


इस डर से सिर उठाए


चला जा रहा हूँ तनहा-तनहा





डबडबाई आँखों से


गिन रहा हूँ सितारे


और कर रहा हूँ याद


अलस भरे गर्मियों के दिन


उनकी अलस भरी यादों ने


फिर कर दिया मुझे तनहा-तनहा


दिल में कसकती टीम लिए


आज की रात हुआ फिर तनहा-तनहा





बादलों से भी ऊपर


चली गई हैं खुशियाँ मेरी


आसमां के उस पार जा बसी हैं मस्तियाँ मेरी


यादों में ठिठक रहे हैं


पतझर के सुहाने दिन


कानों में गूँजती है


झरती पत्तियों की मातमी धुन


ये कैसी उदास परछाइयाँ हैं


छिपी जा रही हैं सितारों के पीछे


ये कैसी अनमनी चाँदनी है


सिमटती जा रही है चाँद के पीछे





कहीं झर न जाए आँसू आँख से


इस डर से सिर उठाए


चला जा रहा हूँ तनहा-तनहा


दिल में कसकती टीस लिए


आज की रात हुआ फिर तनहा-तनहा।


                         ( जापानी गीत- उए ओ मुदतो अरुको का भावानुवाद)

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                                                                                                                                                                      मंथन


                                                                                                                                        हीरानंद वात्सायन  'अज्ञेय '

सांस्कृतिक समग्रताः भाषिक वैविध्य

निःसंदेह प्रत्येक जीवित भाषा एक भौगोलिक प्रदेश से भी बँधी हुई होती है, लेकिन जीवित भाषा के स्वास्थ्य और सामर्थ का एक लक्षण यह भी है कि वह अपने को उस भौगोलिक प्रदेश तक सीमित नहीं रखती, न रखना चाहती है। स्वास्थ्य का यह आग्रह नहीं होता कि वह केवल उसी मिट्टी से रस ग्रहण करे। और सांस लेने के लिए जिस हवा की आवश्यकता होती है वह तो न जाने कहाँ-कहाँ से बह कर आती है; जिस वृष्टि से वह भूमि उर्बरा और रसा होती है वह वृष्टि भी न जाने किन-किन सागरों की देन होती है। गान्धीजी ने यों ही नहीं कहा था कि वह अपने घर की खिड़कियाँ सब ओर खुली रखना चाहेंगे, सभी संस्कृतियों से हवा और रौशनी ग्रहण करना चाहेंगे।

लेकिन यह दोहरा बन्धन एक अत्यंत सूक्ष्म संतुलन की मांग करता है। कोई साहित्य, कोई संस्कृति न तो अपनी जमीन को छोड़कर पनप सकती है और न चारो ओर से बह कर आने वाली हवाओं के प्रति अपने को बन्द कर सकती है। अपनी जमीन से संबंध टूटने पर वह परोपजीवी और पर निर्भर हो जाएगी—और हम देख सकते हैं कि आज भारतीय समाज का एक अंग ऐसा भी है जो भारत से कटा हुआ है और परोपजीवी है—जो आज इस पर गर्व भी करता है और नहीं पहचानता कि वास्तव में वह निर्मूल हो चुका है। दूसरी ओर बाहर की ताजी हवा के प्रति खिड़कियां दृष्टि बन्द कर लेना भी धीरे-धीरे धुट कर मरना है। अपने समाज में और अपने साहित्यों में इस तरह की संकीर्णता के परिणाम भी हम देख सकते हैं।

लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि कोई इन व्यापक स्थापनाओं को तो स्वीकार कर ले, लेकिन अपने साहित्य की कसौटी उन को न बनाये—लेखक है तो अपनी रचना में, और पाठक या आलोचक है तो जो जान पड़ता है उस में, यह प्रश्न न उठाए कि इसमें कहाँ एक प्रादेशिक यथार्थ बोलता है और कहाँ एक समग्र चेतना बोलती है। और यही करना, यही प्रश्न उठाना, आवाश्यक है। भावात्मक या रागात्मक संबंध हम किसी पक्ष के साथ भी तोड़ नहीं सकते, लेकिन समग्र चेतना का आधार जो समग्र दृष्टि होगी वह इस बात को देख कर ही दोनों तरह के संबंध कायम रखेगी। और क्योंकि वह समग्र दृष्टि होगी और खुली आँखों से देख कर इन संबंधों का निर्बाह करेगी, इस लिए उस के संबंध चेतन होंगे, मूल्य अथवा आदर्श का रूप लेंगे, केवल स्थितिवश मिले हुए नहीं होंगे, वे सच्चे अर्थों में संबंध होंगे, बन्धन नहीं होंगे।

( प्रदेश और भारत को आमने-सामने रखते हुए एक प्रश्न और भी सामने आ जाता है और वह है अलग-अलग प्रदेश के रीति-रिवाजों का। यह नहीं कहा जा सकता कि रीति-रिवाज और रहन-सहन सामाजिक यथार्थ नहीं है; और अगर प्रदेशों के जीवन में ये चीजें इतनी भिन्न हैं तो समग्र दृष्टि उनका क्या करेगी ? मैं समझता हूँ कि जिस दोहरे दायित्व की बात मै ने कही उस में इस समस्या का निवारण भी है। सूर्मतम भेदों को भी देखा जा सकता है, लेकिन भेद को देखने का अभिप्राय विभाजित दृष्टि से देखना नहीं होता और यह तो है ही कि रहन-सहन और रीति-रिवाज का जहाँ एक पक्ष आभ्यन्तर मनःसंस्कार से जुड़ा हुआ है, वहाँ दूसरा और बहुत बजडा भाग केवल बाह्य आचरण का है। आधुनिक यांत्रिक विकास उसे बदल देगा और बड़ी तेजी से बदल ही रहा है। टेक्नॉलोजी सारे संसार में एकरूपता ला रही है जो कि स्वयं एक सांस्क-तिक समस्या बन गयी हैऔर जहाँ नहीं बनी है वहाँ बन जाने वाली है। तब हम सास्कृतिक समग्रता की चर्चा न कर के, सांस्कृतिक विशिष्टता की समस्याओं की चर्चा करने लगेंगे—बल्कि शहरों में तो यह चर्चा आवश्यक हो गई है क्यों कि यान्त्रिक एकरूपता से संस्कृत भाव को संकट पैदा हो गया है।)    

मैं नहीं जानता कि एक समग्र भावनात्मक चेतना के बारे में इस से अधिक या ज्यादा सही क्या कहा जा सकता है, इस से बड़ा या महत्वपूर्ण क्या काम किया जा सकता है। मैं हमेशा भारत की एक भाषा में लिखता हूँ, एक भारतीय भाषा में लिखता हूँ। यह संयोग की और मेरे सौभाग्य की बात है कि उस भाषा में हमेशा एक समग्र भारतीय चेतना व्याप्त रही और उसने हमेशा समग्र भारत का आदर्श अपने और दूसरों के सामने रखा। लेकिन मै ने कहा कि यह संयोग की और मेरे सौभाग्य की बात है; इस का श्रेय मुझको नहीं है। मेरा लक्ष्य यही रहा है—और श्रेय अगर कभी मुझे मिलेगा तो इतने ही का मिलना चाहिए—कि मैं जो लिखता रहा हूँ या लिखता हूँ या लिखूँगा, मैने हमेशा चाहा है कि उस के माध्यम से एक भारतीय चरित्र का रूप उभरे। मेरे पात्र चाहे भारतीय हों, चाहे अभारतीय, और भारतीय हो कर चाहे एक प्रदेश के हों, चाहे दूसरे—सम्प्रेष्य बात यह हो कि एक भारतीय उस तरह देखता, सोचता, भोगता और जीता है—कि इस तरह देखने, सोचने, भोगने और जीने वाले को भारत ने बनाया है—एक समग्र भारत ने।   


                                                                                                    लेखक की पुष्तक ' केन्द्र और परिधि  ' से साभार        

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                                                                                                                                                                   परिचर्चा


                                                                                                                                                    डॉ. नरेन्द्र कोहली


हिन्दी, अन्य भारतीय भाषाएँ और हमारी सांस्कृतिक एकता


भारतीय भाषाओं की लीपियाँ थोड़े से भेद के साथ देवनागरी के आस-पास स्थिर हो गईं। जिन भारतीय भाषाओं का देवनागरी से बहुत विरोध माना जाता है, उनके अक्षरों को यदि देवनागरी के अक्षरों से मिलाकर देखा जाए तो पर्याप्त समानता दिखाई पड़ी है। हिन्दी ने भारतीय भाषाओं की एकसूत्रता को ध्यान में रखते हुए इसी लिपि को अंगीकार किया, ताकि समान उत्तराधिकार को बिखरने न दिया जाए।

भारतीय भाषाओँ का शब्द-भंडार प्रायः संस्कृत से आया है। यदि अँतर खोजने पर आएँ तो हिन्दी की बोलियों में ही भेद दिखाकर उन्हें पृथक और स्वतंत्र भाषा का स्थान देने का आन्दोलन चलाया जा सकता हैः किंतु यदि यह देखा जाए कि उनमें यद्किचित् उच्चारण भेद ही है, किंतु शब्दावली प्रायः वही है, तो उस समान उत्तराधिकार और अपनी एकता को बनाए रखने के लिए हमें उस शब्द भंडार को बनाए रखना होगा। चाहे थोड़ा-सा उच्चारण भेद हो; किंतु वे शब्द सारे देश में समझे और पहचाने जा सकते हैं।

एक मराठी लेखिका ने अपनी एक कहानी का हिन्दी में स्वयं अनुवाद कर मुझे भिजवा दिया। मैंने उस परिवेश के अनुकूल भाषा निर्माण की दृष्टि से उनके अनेक शब्दों को बदल दिया। उस संशोधित कहानी की भाषा को देख कर उन्होंने कहा कि ये सारे शब्द तो मराठी के ही हैं। मैंने उन्हें बताया कि वे शब्द हिन्दी के भी हैं। उन्होंने कहा कि वे समझती थीं कि हिन्दी में उन शब्दों का प्रचलन नहीं है, इसलिए उन्होंने अरबी और फारसी शब्दों का प्रयोग किया ताकि वह भाषा मराठी न रह कर हिन्दी हो सके।

स्पष्टतः हिन्दी का जो अखिल भारतीय रूप होगा, वह संस्कृत निष्ठ ही होगा। क्योंकि वे ही शब्द कश्मीर से कन्याकुमारी तक और गुजरात से असम तक पहचाने समझे और बोले जाते हैं। वह शब्दावली हमारी समान सांस्कृतिक धरोहर है। यदि हम चाहते हैं कि भारतीय भाषाओं में यह एकसूत्रता बनी रहे, तो हमें उस समान शब्द-संपदा को प्रयत्नपूर्वक बनाए रखना होगा।

मैं यह नहीं कहता कि हमें अन्य भाषाओं के शब्द ग्रहण नहीं करने चाहिएँ, किंतु अन्य भाषाओं के शब्दों के अनावश्यक प्रयोगों का मैं विरोध करता हूँ। जो शब्द हमारे पास नहीं हैं , उन्हें ग्रहण करना हमारी आवश्यकता भी है और समझदारी भी। किंतु अपने शब्दों के स्थानापन्न के रूप में विदेशी शब्दों के प्रयोग का कोई औचित्य नहीं है। वे शब्द चाहे अंग्रेजी, फ्रांसिसी , पुर्तगाली, स्पेनी , अथवा डच भाषा के हों या फिर अरबी, फारसी और तुर्की के। ङम इन विदेशी भाषा के शब्दों का जितना अधिक प्रयोग करेंगे, अन्य भारतीय भाषाओं से हमारा संबंध उतना ही विछिन्न होता जाएगा।

अंग्रेजी क विरुद्ध हमारा अपना अधिकार मांगना, वस्तुतः हिन्दी के लिए ही नहीं, सारी भारतीय भाषाओं के लिए उन का अधिकार मांगना है। जब तक देश में अंग्रेजी का वर्चस्व रहेगा, तब तक किसी भारतीय भाषा का विकास नहीं हो सकता। कुछ लोगों की यह मान्यता है कि अंग्रेजी इस देश जीवन में इतनी दूर तक बैठ गई है कि उसका अस्तित्व अब समाप्त नहीं किया जा सकता। उनकी यह मान्यता भी है कि अंग्रेजी विश्व स्तर पर इतनी शक्तिशाली भाषा है कि यदि उस का अस्तित्व रहेगा तो उसका वर्चस्व भी बना रहेगा। मेरा इन दोनों ही मान्यताओं से न केवल मतभेद है, वरन् पूर्ण विरोध है। किसी समय फारसी भी इस देश के जनजीवन में इतनी गहरी पैठ गई थी कि कोई मान नहीं सकता था कि कभी उसका अस्तित्व समाप्त हो सकता है। अंग्रेजों के समय कौन कल्पना कर सकता था कि यह देश कभी ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्त हो सकेगा, किंतु प्रयत्नपूर्वक उस साम्राज्य से मुक्ति प्राप्त की गई। ठीक उसी प्रकार राजनीतिक और सास्कृतिक संकल्प क आधार पर अंग्रेजी भाषा से भी हम मुक्त हो सकते हैं। रहने को उस का अस्तित्व बना भी रहे तो भारतीय भाषाओं पर उस का वर्चस्व अनिवार्य नहीं है। फ्रांस, जर्मनी, पुर्तगाल, चीन, जापान इत्यादि देशों में अंग्रेजी का प्रचलन है, किंतु उसका वर्चस्व नहीं है। कल तक रूस में अंग्रेजी की स्थिति अत्यंत नगण्य थी, किंतु राजनीतिक तथा आर्थिक कारणों ने आज उसे वहाँ महत्वपूर्ण बना दिया है।

अपनी परंपरा से आए समान उत्तराधिकार को हम अपनी अमूल्य निधि और उपलब्धि मानते हैं। उसकी रक्षा और निर्माण हमारा धर्म है। हमारी पूरी आस्था उस परंपरा में है। अतः हम अपने साहित्य में उस परंपरा का जितना प्रचार-प्रसार और चित्रण करेंगे, उतनी ही सारे देश की एकसूत्रता दृढ़ हो सकती है। अपनी भौगोलिक, राजनीतिक और सामाजिक स्थिति के कारण हिन्दी को कुछ अतिरिक्त सुविधाएँ प्राप्त हैं। इसलिए उनके कुछ विशिष्ट दायित्व भी बनते हैं। हमारी भौगोलिक स्थिति यह है कि समान उत्तराधिकार के कारण हिमाचल, जम्मू, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और दिल्ली – सर्वथा हिन्दी भाषी प्रदेश हैं। पंजाब, बंगाल, असम और गुजरात हिन्दी भाषी प्रदेश न होते हुए भी हिन्दी शब्दावली से अवगत हैं। उनकी लीपियां भी बहुत भिन्न ननहीं हैं। महाराष्ट्र भी हिन्दी से पूर्णतः अपरिचित नहीं है। आंध्र, तामिलनाडु, केरल और कर्नाटक में उनकी अपनी भाषाओं में जितनी भी संस्कृत शब्दावली है, वह उन्हें हिन्दी के निकट ले आती है। इसलिए अपनी वर्तमान स्थिति के कारण हिन्दी का लेखक अपने साहित्य में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के जीवन का चित्रण करता है। हिन्दीतर भाषाओं का हिन्दी लेखक अपने प्रदेश के जीवन का चित्रण हिन्दी में करता है। यह तो भारत की बात हुई। अंतर्राष्ट्रीय धरातल पर प्रवासी भारतीयों का अपने-अपने क्षेत्रों का सामाजिक चित्रण भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इस दृष्टि से हमारी सांस्कृतिक एकता के सूत्र एशिया, अमेरिका तथा यूरोप के विभिन्न देशों तक जा पहुँचते हैं।

शाषकीय, व्यापारिक, धार्मिक अथवा सामाजिक कारणों से, अनेक भारतीय अपने प्रदेशों से बाहर, दूसरे प्रदेशों में रहकर, वहाँ की भाषा के संपर्क में आते हैं। हिन्दी प्रदेशों में रहने वाले अहिन्दी भाषी यदि अंग्रेजी का मोह छोड़ देते हैं, तो वे अच्छी हिन्दी सीख लेते हैं। अनेक बार तो उनके बच्चे हिन्दी माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर हिन्दी में निष्णात भी हो जाते हैं। ठीक उसी प्रकार हिन्दी भाषी लोग अहिन्दी भाषी प्रदेशों में रहने के कारण, उन प्रदेशों की भाषाओं और उनके साहित्य के संपर्क में आते हैं। उन लोगों में ऐसे अनेक लोग हो सकते हैं अथवा हैं, जिनकी रुचि भाषाएँ सीखने उनके साहित्य का परस्पर आदान-प्रदान करने में है। कुछ लोगों को भाषा का सहज ज्ञान हो जाता है, कुछ लोग प्रयत्नपूर्वक उन्हें सीखते हैं, कुछ लोग केवल अपनी रुचि के कारण अनुवाद करते हैं; और कुछ लोग उसे व्यवसाय के रूप में गृहण करते हैं। परिणाम हमारे सामने है। बंकिमचंद्र, रवीन्द्रनाथ ठाकुर और शरत् चंद्र चटोपाध्याय से लेकर आशापूर्ण देवी तथा विमल मित्र तक बंगला के प्रत्येक महत्वपूर्ण लेखक और ग्रंथ का हिन्दी में अनुवाद हुआ है। पंजाबी की अमृता प्रीतम के विषय में हिन्दी का पाठक यह जानता ही नहीं कि वे हिन्दी नहीं पंजाबी की लेखिका हैं। ठीक यही स्थिति उर्दू के कृष्णचंद्र और कुछ अन्य लेखकों को लेकर है। उनकी पुष्तकों पर यह भी लिखा नहीं होता कि मूल पुष्तक किसी अन्य भाषा में रची गई थी और हिन्दी में उसका अनुवाद हुआ है। जब मूल भाषा की ही चर्चा नहीं होती तो अनुवादक का नाम कहां से आएगा।

मराठी से खांडेकर, पु.ल. देशपांडे, शिवाजी सावंत, दुर्गा भागवत इत्यादि लेखकों को हिन्दी वालों ने अपने लेखकों के रूप में ही अपनाया है। क.मा. मुंशी और पन्नालाल पटेल जैसे लेखक हिन्दी वालों के लिए तनिक भी अपरिचित नहीं हैं। कन्नड के भैरप्पा और उड़िया की प्रतिभा राय हिन्दी में पूरी तरह से अनुदित हो चुके हैं। यदि हम खोज करेंगे तो पाएंगे कि प्रत्येक भाषा के क्षेत्र में कुछ ऐसे साधक हैं , जिन्होंने उस भाषा की प्रायः सारी महत्वपूर्ण पुष्तकोंको हिन्दी में उपलब्ध करा दिया है। एक अकेले शंकरलाल पुरोहित ने सारा उड़िया कथा-साहित्य और रवीन्द्र कुमार सेठ ने तामिल शैव भक्ति साहित्य हिन्दी में उपलब्ध करा दिया है।

हमारी रुचि केवल अनुवाद तक ही नहीं है। अमृतलाल नागर ने तो तामिल की मूल कृति से प्रेरणा पाकर ’ सुहाग के नूपुर’ की रचना की थी। इस प्रकार तामिल का मध्ययुगीन जीवन हिन्दी की मौलिक कृति के रूप में हमारे सामने आया।

अनुवाद तो विदेशी भाषाओं से भी होता है; किंतु उस साहित्य और जीवन से हमारा वैसा तादात्म्य नहीं होता, जैसा कि विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य से होता है। उसका कारण हमारी राजनीतिक एकता कम, हमारी सांस्कृतिक एकता ही अधिक है। आज तो प्रकाशन, प्रसारण, मुद्रण और यात्रा इत्यादि के उत्कृष्ट साधन उपलब्ध हैं, इसलिए आदान-प्रदान, प्रभावित होने और प्रभावित करने में, कोई कठिनाई ही नहीं है, किंतु जिस समय वे सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं, उस समय भी भारत के सारे प्रदेशोंके संत, कवि और साहित्यकार एक ही सुर में गा रहे थे। विद्यापति, सूर, कबीर तथा अन्य संत कवि, जो कुछ कह और लिख रहे थे, ठीक वैसी ही रचनाएँ अन्य प्रदेशों में भी हो रही थीं।

यदि हम प्रवृत्तियों पर विचार करें तो हम पाते हैं कि हमारी संस्कृति के केन्द्र में सदा से अध्यात्म ही रहा है। इसलिए संस्कृति-पुरुषों के जीवन चरित्र, उनसे संबंधित घटनाओं, उनके विचारों तथा उपदेशों के माध्यम से अपने सांस्कृतिक मूल्यों को जीवंत करने, समझने और उनका प्रचार-प्रसार करने का ही प्रयास किया गया है। उदाहरण के रूप में राम, कृष्ण, युधिष्ठिर, बुद्ध, महावीर इत्यादि के जीवन चरित हमारे सामने हैं। संभवतः कुछ लोगों को कालक्रम की दृष्टि से ये व्यक्तित्व कुछ दूर लगें; किंतु रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, गांधी, दयानंद सरस्वती और अरविंद तो, हमारे बहुत निकट के हैं। यही कारण है कि आदि काल और भक्ति काल के साहित्य में तो इन चरित्रों पर बल है ही, आधुनिक युग में भी हम भारतेन्दु, मैथलीशरण गुप्त, हरिऔध प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी, दिनकर, धर्मवीर भारती, कुँवर नारायण, भवानी प्रसाद मिश्र, बशीर अहमद मयूख, बलदेव वंशी, डॉ.विनय तथा सुनीता जैन तक को उन्ही सांस्कृतिक मूल्यों और उन्ही सांस्कृतिक पुरुषों से अभिभूत पाते हैं और उनकी रचनाओं में उन्हें चित्रित देखते हैं।  

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                                                                                                                                                                    आकलन


                                                                                                                                                         -सूर्यनाथ सिंह

 

  राष्ट्रीय एकीकरण में अनुवाद साहित्य का योगदान

अनुवाद एक ऐसी प्रक्रिया है, जो जहां भी द्विभाषिकता की स्थिति उत्पन्न होती है, वहां स्वतः प्रकट हो जाती है। पहला अनुवाद कब और किस भाषा में हुआ था, इसका ठीक-ठीक प्रमाण तो मौजूद नहीं है, लेकिन यह निश्चय तौर पर कहा जा सकता है कि जब भी दो भिन्न भाषा-भाषी परस्पर मिले होंगे और एक-दूसरे की संस्कृतियों एवं आचार-व्यवहार को जानने की कोशिश की होगी तब अनुवाद का सहारा लिया होगा। सबसे पहले इस काम की शुरुआत व्यापारियों एवं धर्म प्रचारकों ने की होगी और लिखित साहित्य के प्रचलन के बाद यह प्रक्रिया व्यवस्थित रूप से सामने आई होगी।

दुनिया के इतिहास पर नजर डालें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है। ईसा से लगभग तीन सौ वर्ष पहले जब ग्रीक लोगों के साथ रोमन लोगों का संपर्क हुआ तो ग्रीक से लैटिन में अनुवाद हुए। बारहवीं सदी में जब स्पेन के साथ इस्लाम का संपर्क हुआ तो अरबी से यूरोपीय भाषा में अनुवाद हुए।

जिन देशों में एक से अधिक भाषाएँ बोली और लिखी जाती हैं वहां अनुवाद साहित्य की गुंजाइश अधिक होती है क्योंकि जहां भी भाषिक विविधता होती है, वहां लोगों के बीच संवाद स्थापित करने का एकमात्र सशक्त साधन अनुवाद ही होता है।

यही कारण है कि भारत, पूर्व सोवियत संघ और स्विटजरलैंड जैसे कुछ भाषिक विविधता वाले देशों में अनुवाद की परंपरा अन्य देशों की अपेक्षा अधिक व्यापक है।

अनुवाद न सिर्फ दो भिन्न भाषा-भाषी लोगों के बीच संवाद का एक सशक्त माध्यम है, बल्कि यह सामाजिक-सांस्कृतिक एकीकरण में भी सहायक है। लेकिन मैं समझता हूं कि यहां पर राष्ट्रीय एकीकरण में अनुवाद साहित्य की भूमिका पर भारतीय संदर्भ में ही बातचीत की जाए तो ज्यादा प्रासंगिक होगा।

भारत में अनुवाद की परंपरा बहु प्राचीन है। उपनिषदों के भाष्य एक प्रकार के अनुवाद ही हैं, लेकिन आज अनुवाद का जो स्वरूप है उस दृष्टि से उन्हें ठीक-ठीक अनुवाद की कोटि में नहीं रखा जा सकता। आज जो अनुवाद का स्वरूप है, उस दृष्टि से भारत में अनुवाद साहित्य की परंपरा मुगल शासन के दौरान सुनियोजित ढंग से शुरू हुई। मुगल शासकों ने अनेक संस्कृत ग्रंथों के अरबी-फारसी में अनुवाद कराए और अनुवाद साहित्य को प्रोत्साहित किया। फिर अनुवाद साहित्य का एक व्यवस्थित परंपरा के रूप में विकास उन्नीसवीं सदी में हुआ।

उन्नीसवीं सदी, भारतीय इतिहास का वह काल खंड है जब समाज में मध्यवर्ग का उदय हुआ।

अंग्रेजी शासन की स्थापना के साथ-साथ भारतीय सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक ढांचे में तेजी से परिवर्तन शुरू हो गए। धीरे-धीरे ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का अंग बनती चली गई। धार्मिक सत्ता के स्थान पर भौतिक सत्ता स्थापित होने लगी। इसी तरह अंग्रेजी शिक्षा के कारण पारंपरिक अनुशासनें के स्थान पर ज्ञान-विज्ञान के कई नए अनुशासन प्रकाश में आए।

इन सबका प्रभाव भारतीय साहित्य की प्रवृत्तियों पर तो पड़ा ही, अनुवाद प्रक्रिया पर भी काफी गहरा पड़ा। लेकिन फिर भी उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दिनों तक अनुवाद का उद्देश्य धार्मिक प्रचार प्रसार तक ही सीमित था और यह कार्य ईसाई मिशनरियां ही अधिक किया करती थीं। डैनिश मिशन के कैरे या अलेक्जेंडर डफ ने ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए ही भारतीय भाषाओं में ईसा मसीह के उपदेशों के अधइख अनुवाद किए कराए।

इससे ईसाई मिशनरियों को  जितना लाभ मिलना था, मिला ही, लेकिन भारतीय बौद्धिक वर्ग को भी इन अनुवाद के माध्यम से पश्चिम के ज्ञान-विज्ञान और तर्क पद्धति को जानने समझने का पहली बार अवसर प्राप्त हुआ।

जब अंग्रेजी हुकूमत ने शिक्षा नीति बनाई और जगह-जगह स्कूल खोले तो लोग पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान से परिचित होने लगे। हालांकि अंग्रेजी शिक्षा नीति के पीछे अंग्रेजों की मंशा भारतीय जनमानस को परिष्कृत करने की बजाय अपने लिए पढ़े-लिखे सरकारी नौकरों की एक ऐसी जमात तैयार करना थी, जिसकी मदद से वे शासन चला सकें।

इस अंग्रेजी शिक्षा के कारण भारत में मध्यवर्ग का उदय हुआ। यह मध्यवर्ग अंग्रेजी हुकूमत में नौकरी करता था। अंग्रेजों के साथ रहकर उनके आचार-व्यवहार से परिचित हो रहा था। अपना भी रहा था। अंग्रेजी शिक्षा और अंग्रेजी हुकूमत में काम करते हुए इस वर्ग ने महसूस किया कि पारंपरिक भारतीय शिक्षा और धार्मिक पुष्तकों के अलावा भी दुनिया में ज्ञान-विज्ञान के कई ऐसे स्रोत हैं, जिनसे भारतीय समाज अभी तक अपरिचित है। तो उन्होंने इस पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान को अनुवाद के माध्यम से भारतीय जनमानस तक पहुंचाने का कार्य शुरू किया। यह काम दोहरा हुआ। अंग्रेजी से भारतीय भाषा में तो अनुवाद हुए ही, भारतीय भाषाओं से अंग्रेजी में भी अनुवाद पर्याप्त मात्रा में हुए।

अंग्रेजों के लिए भारत जैसे भाषिक विविधता वाले विशाल देश में सिर्फ हथियारों और कानून के बल पर शासन संभव नहीं था। उन्हें यहां की भाषा और संस्कृति को अपनाने की आवश्यकता महसूस हुई। लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी समस्या थी- भाषा की। जो भाषा वे जानते थे, वह आम भारतीय जनता के लिए नई थी। और अंग्रेजों के लिए इतनी सारी भारतीय भाषाओं को एक साथ सीख पाना मुश्किल काम था। इसलिए कलकत्ता में 1801 में फोर्ट विलियम कालेज की स्थापना की गई, जिसमें सिविल सर्वेयरों को भारतीय भाषाओं एवं संस्कृति की शिक्षा दी जाने लगी।

फोर्ट विलियम कालेज सही अर्थों में भारत का पहला अनुवाद-केन्द्र था। इस कालेज की स्थापना भले ही अंग्रेजों ने अपने अफसरों को भारतीय भाषाओं और संस्कृति से परिचित कराने के लिए की थी लेकिन अनजाने ही यह केन्द्र अनुवाद के माध्यम से भारतीय राष्ट्रीय एकीकरण का प्रेरणा स्रोत भी बन गया। इस केन्द्र की स्थापना के बाद भारतीय बौद्धिक वर्ग ने महसूस किया कि भाषाई आधार पर जो भारतीय जनता तितर-बितर है उसे अनुवाद के माध्यम से ही जोड़ा जा सकता है और एक सूत्र में पिरोया जा सकता है।

जब भारतीय जनता ने अपनी आजादी के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष तेज किया तो भारत का एक बड़ा बौद्धिक वर्ग अनुवाद के माध्यम से भारतीय जनता को एक सूत्र में पिरोने में जुट गया। प्रेस की स्थापना से इस प्रक्रिया को और बल मिला। इस बौद्धिक वर्ग ने न सिर्फ जनमानस को अपने अधिकारों और अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों से परिचित कराया, बल्कि भारत की विविध भाषिक संस्कृति से भी परिचित कराकर उन्हें एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया। आप देखें तो उन्नीसवीं सदी का पूरा भारतीय अनुवाद साहित्य राष्ट्रीय चेतना से प्रेरित है।

सवंत्रता संग्राम जहां एक स्तर पर जनशक्ति के बल पर लड़ा जा रहा था, वहीं दूसरी तरफ भाषिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक एकता स्थापित करने के लिए अनुवाद के स्तर पर लड़ा जा रहा था। जहां-जहां जिस-जिस भाषा में राष्ट्रीय चेतना से परिपूर्ण साहित्य दिखाई देता था, फौरन उसका अनुवाद दूसरी भारतीय भाषाओं में कर लिया जाता था। इस दौरान बंगला, हिन्दी, मराठी, गुजराती और दक्षिण भारत की सभी भारतीय भाषाओं में खूब अनुवाद हुए।  

गांधी जी ने तो अनुवाद को राष्ट्रीय एकता का प्रमुख माध्यम माना था। वह जानते थे कि भारतीय जनता को एकजुट करने के लिए सबसे पहले उनमें भाषिक एकता जरूरी है। उन्होने हिन्दी का खुद तो प्रचार प्रसार किया ही, दूसरे लोगों को भी इसके लिए प्रेरित किया। अगर कोई साहित्यिक रुचि का व्यक्ति उनके पास आता और पूछता कि स्वतंत्रता आंदोलन में मैं क्या कर सकता हूं तो वह कहते कि आप किसी अहिंदी भाषी क्षेत्र में चले जाइये और वहां हिन्दी का प्रचार कीजिए। उनके कहने पर अनेक ऐसे धुनी व्यक्ति अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में गए और हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया। विभिन्न प्रान्तों में हिन्दी प्रचारक समितियां बनाई गईं । और जाहिर सी बात है, जब इन समितियों ने हिंदी के लिए काम शुरू किया तो अनुवाद का सहारा लिया।

इस तरह हिन्दी से अन्य भारतीय भाषाओं में और अन्य भारतीय भाषाओं से हिन्दी में खूब अनुवाद हुए। इन अनुवादों से न सिर्फ भारतीय साहित्य में संवेदनाओं और प्रवृत्तियों का आदान प्रदान बढ़ा, बल्कि एक भाषा-भाषी दूसरे भाषा-भाषी के सामाजिक-सांस्कृतिक विशेषताओं से परिचित हुआ और उन्हें अपनाया। इससे एक-दूसरे के बीच के दुराग्रह भी काफी हद तक मिटे।

कहने का तात्पर्य यह है कि अनुवाद न सिर्फ दो भाषाओं को एक-दूसरे की संवेदनाओं और संस्कृति से परिचित कराता है, बल्कि दो भिन्न भाषा-भाषी लोगों को एक-दूसरे के निकट भी लाता है। देखा यह जाता है कि किसी अनजान जगह पर दो समान भाषा-भाषी लोगों में मेल आसानी से हो जाता है। किंतु दो ऐसे व्यक्ति, जो एक ही भाषा बोलने वाले नहीं हैं लेकिन एक दूसरे की संस्कृति से परिचित हैं-निकट हैं, तो उनमें भी निकटता आसानी से हो जाती है।

अनुवाद दो भिन्न भाषा-भाषी लोगों को एक-दूसरे की भाषा भले न सिखाता हो किंतु उन्हें एक दूसरे की संस्कृति, परिवेश और संवेदना से परिचित अवश्य करा देता है। और जब हम किसी संस्कृति और परिवेश से परिचित हो जाते हैं तो धीरे-धीरे उसका अंग बन जाते हैं। उस परिवेश को अपने आस-पास महसूस करने लगते हैं। यही नहीं, वह परिवेश भी हमें अपना बना लेता है।

दक्षिण भारत के एक मेरे मित्र ने बातचीत के एक क्रम में मुझे एक बार बताया था कि यार, ग्रेजुएशन तक मैं यही समझता रहा कि शरदचंद्र मलयालम के उपन्यासकार हैं। बाद में पता चला कि वह मलयालम नहीं, बंगला के उपन्यासकार हैं।

...तो अनुवाद साहित्य इस तरह से लोगों को एक दूसरे से जोड़ता है।लोग इसके माध्यम से भाषा-भेद भुलाकर एक भाषा की रचना को अपने परिवेश से जोड़ लेते हैं। क्योंकि एक रचना सिर्फ रचना नहीं होती, पूरा परिवेश होती है, जिसमें पाठक विचरण करता है।

हालांकि अनुवाद को लेकर कई विद्वान कटाक्ष भी करते हैं। कुछ तो खुल कर इस विधा का विरोध करते हैं। अगर वोल्तेयर जैसे कुछ विदेशी विद्वान अनुवाद को यह कहते हुए रद्दी की टोकरी में डालने वाली सामग्री बताते हैं कि अनुवाद गुणों को छिपाकर दोषों को उजागर करता है तो भारत में भी इसका विरोध करने वाले कम नहीं हैं। राजगोपालाचारी जैसे विद्वानों का मानना था कि कला की एक विधा के रूप में अनुवाद कभी सफल नहीं हो सकता। कुछ लोग इसे सिर्फ रोजी-रोटी का साधन मानते हैं । रमेशचंद्र शाह भी अनुवाद को लेकर काफी उत्तेजित दिखाई देते हैं।...लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या भारत जैसे इतने बड़े, भाषिक विविधता वाले देश में अनुवाद को सिर्फ इसलिए देश निकाला दे दिया जाना चाहिए कि वह शुद्ध कला की कसौटी पर खरा नहीं उतरता? 

हमारे देश में आज भी ऐसे असंख्य लोग हैं जो अपने भौगोलिक परिवेश से निकलकर बाहर नहीं गए। जिन्हें अपनी मातृभाषा के अलावा दूसरी भाषा का ज्ञान नहीं है। कुछ लोगों को इस बात से एतराज हो सकता है । वे कह सकते हैं कि जमाना काफी आगे निकल चुका है। दुनिया काफी सिमट चुकी है और लोग आसानी से एक-दूसरे से मिलने-जुलने लगे हैं। लेकिन सच्ई यही है कि हमारे देश की आधे से अधिक आबादी आज भी अपने परिवेश से बाहर नहीं निकल पाई है। ऐसे में अगर अनुवाद साहित्य न हो तो जरा उनकी स्थिति का अंदाजा लगाइये।

जो लोग दुनिया को रोज देखते हैं, उनकी ही बात कर लीजिए। हममें से कितने लोग हैं जिन्हें कम से कम पांच भी भाषाएं आती हैं ?  दो प्रतिशत लोग भी नहीं मिलेंगे। ऐसे में एक-दूसरे को जानने-समझने में अनुवाद एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित होता है। अनुवाद हमारे देश की धड़कन है। अगर यही रुक गई तो हम बाकी दुनिया में क्या, अपने ही देश में अजनबी बनकर रह जाएंगे।

अनुवाद साहित्य कई स्तरों पर राष्ट्रीय एकीकरण में अपनी भूमिका निभाता है। यह व्यक्ति से व्यक्ति को तो जोड़ता ही है, साहित्य को भी साहित्य से जोड़ता है। पूरे भारतीय साहित्य की तुलना करें तो कई प्रवृत्तियां ऐसी हैं, भाषा के स्तर पर कई प्रयोग ऐसे हैं जो अनुवाद के द्वारा ही संभव हुए। एक भाषा के कई शब्द और वाक्य विन्यास की कई शैलियां सहज रूप से दूसरी भाषा में उतर आईं। और आज के व्यावसायिक युग में तो अनुवाद पूरे राष्ट्र को एक लय में बांधे रखने में काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ है।

कई लोग यह भी आरोप लगाते हैं कि व्यवसायीकरण के चलते अनुवाद का स्वरूप भी व्यावसायिक हो गया है, लेकिन जहां तक साहित्यिक अनुवाद या अनुवाद साहित्य का प्रश्न है, तमाम व्यावसायिक हमलों के बावजूद इसकी चमक फीकी नहीं पड़ी है। यही एक विधा है, जो तमाम व्यावसायिक हमलों के बावजूद, राष्ट्रीय सांस्कृतिक-सामाजिक एकीकरण में सक्रिय भूमिका निभा रही है।  

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                                                                                                                                                  कहानी-भारत





                                                                                                                                          

                                                                                                                                        - रवीन्द्र नाथ टैगोर


                                                                                                                                 बंगला से अनुवादः आबिद रिजवी
क्षुधित पाषाण

मैं अपने संबंधी के साथ पूजा की छुट्टी में देश भ्रमण समाप्त करके कलकत्ता लौट रहा था, तभी रेलगाड़ी में उन बाबू से भेंट हुई। उनकी वेशभूषा देखकर शुरू में उन्हें पश्चिमी प्रान्त का मुसलमान समझने का सन्देह हुआ था। उनकी बातचीच सुनकर और भी सन्देह में पड़ गया। वे दुनिया भर के विषयों पर इस प्रकार बातें करने लगे मानो विधाता उनके साथ परामर्श करने के बाद ही सारा काम-काज करते हैं। संसार में अंदर-ही-अंदर भांति-भांति की जो अनेक अश्रुत-पूर्व गूढ़ घटनाएं घटित हो रही थीं—रूसी कितने आगे बढ़ गए हैं, अंग्रेजों का क्या -क्या गुप्त अभिप्राय है, देशी राजाओं में कैसी खिचड़ी पक रही है, इन सबसेबेखबर हम पूर्णतः निश्चिन्त थे। हमारे नवपरिचित वक्ता ने कुछ हंसकर कहा, There happen more things in heaven and earth , Horatio, than are reported in your news papers. होरोशियो, स्वर्ग और पृथ्वी पर तुम्हारे समाचार पत्रों में छपने वाली बातों की अपेक्षा कहीं अधिक घटनाएँ घटती हैं।“  हम पहली बार घर से बाहर निकले थे, अतएव इस सज्जन का रंग-ढंग देखकर अवाक् रह गए। वह जरा-जरा सी बात पर कभी विज्ञान की चर्चा करता, वेद की व्याख्या करता और कभी अचानक फारसी के बैंतों की आवृत्ति करता, विज्ञान, वेद और फारसी भाषा पर हमारा कोई अधिकार न होने के कारण उनके प्रति हमारी श्रद्धा बढ़ने लगी। यही नहीं मेरे थियोसोफिस्ट संबंधी के मन में यह दृढ़ विश्वास हो गया कि अपने इस सहयात्री से किसी ओलौकिक कार्य का कुछ-न-कुछ संबंध है, कोई अद्भुत मैगनेटिज्म या कोई देव-शक्ति, अथवा सूक्ष्म शरीर, या ऐसी ही कोई चीज। वे इस असामान्य व्यक्ति की साधारण-से-साधारण बात भी भक्ति विह्वल होकर मंत्र-मुग्ध भाव से सुन रहे थे और चुपचाप नोट भी करते जा रहे थे, मुझे उनके भाव से लगा कि वे असामान्य व्यक्ति भी मन-ही-मन यह समझ गए थे और कुछ खुश भी हुए थे।

जब गाड़ी जंक्शन पर पहुंचकर रुकी, तो हम दूसरी गाड़ी की प्रतीक्षा में वेटिंगरूम में इकट्ठे हुए। उस वक्त रात के साढ़े दस बज चुके थे। सुनने में आया कि रास्ते में कुछ बाधा आ जाने के कारण गाड़ी बहुत देर से पहुंचेगी। इस बीच मैंने टेबिल के ऊपर बिस्तर फैलाकर सोने का निश्चय किया, तभी उन असमान्य व्यक्ति ने निम्नलिखित कहानी छेड़ दी। उस रात मुझे नींद नहीं आई।

“ राज्य–संचालन के सिलसिले में दो-एक बातों में मतभेद होने के कारण मैं जूनागढ़ की नौकरी छोड़कर तब जब हैदराबाद के निजाम की सरकारी नौकरी में आया तब शुरू में मुझे उम्र में छोटा और मजबूत आदमी देखकर बरीच में रूई का महसूल वसूल करने पर नियुक्त किया गया।

बरीच बड़ी रमणीय जगह थी। निर्जन पहाड़ के नीचे बड़े-बड़े वनों के भीतर से होकर शुस्ता नदी (संस्कृत स्वच्छतोया का अपभ्रंश) निपुण नर्तकी के समान उपलमुखरित पथ में पग-पग पर लहराती बल खाती द्रुत गति से नाचती चली गई थी। उस नदी के ठीक किनारे पत्थर के बने डेढ़ सौ सीढ़ियों के अत्युच्च घाट पर सफेद पत्थर का एक एकाकी प्रासाद पर्वत की तराई में खड़ा था—आस-पास कहीं कोई बस्ती न थी। बरीच की रूई की हाट एवं ग्राम वहां से दूर थे।

प्रायः ढाई सौ वर्ष पूर्व द्वितीय शाह महमूद ने भोग-विलास के लिए इस निर्जन स्थान में प्रासाद का निर्माण कराया था। उस वक्त स्नानागार के फव्वारे के मुख से गुलाब-सुगंधित जल-धारा छूटती रहती और उस नितांत शीतल निभृत कक्ष में संगमरमर-जटित स्निग्ध शिलासन पर बैठकर अपने कोमल नग्न पदपल्लवों को जलाशय की निर्मल जलराशि में फैलाए फारस देश की तरुण रमणियां स्नान से पूर्व केश बिखेरे गोद में सितार लिए द्राक्षावन की गजलें गाती रहती थीं।

अब वह फव्वारा क्रीड़ा नहीं करता था, न वह गीत था। सफेद पत्थर पर शुभ्र चरणों का सुंदर आघात नहीं पड़ता था—अब तो वह हम जैसे निर्जनता-पीड़ित, संगिनीहीन महसूल-कलैक्टर का बहुत बड़ा एवं अति शून्य निवास-स्थान था। किंतु दफ्तर के वृद्ध क्लर्क करीम खां ने मुझे इस प्रासाद में रहने को बारबार मना किया था। कहा था, इच्छा हो तो दिन में रहें, पर यहां रात्रि न बिताएं। मैंने उसकी बात हँसी में उड़ा दी। नौकरों ने कहा कि वे शाम तक काम करेंगे, किंतु रात में यहां न रहेंगे। मैने कहा- “ ठीक है। इस घर की ऐसी बदनामी थी कि रत के समय चोर भी यहां आने का साहस नहीं करते थे।

पहले-पहल आने पर इस परित्यक्त-पाषाण-प्रासाद की जन-शून्यता मेरे हृदय को मानो किसी भयंकर भार के समान दबाए रहती। मैं शक्ति भर बाहर रहकर निरंतर काम-काज करने के बाद रात थका-हारा घर लौटकर सो जाता।

पर अभी एक सप्ताह भी न बीता था कि इस मकान का एक अपूर्व नशा बलात् आकर मुझे घेरने लगा। अपनी उस अवस्था का वर्णन करना भी कठिन है और लोगों को उसका विश्वास दिलाना भी मुश्किल है। सारा घर मानो एक सजीव पदार्थ की भांति मुझे अपने जठरस्थ मोह रस से कमजोर करने लगा।

शायद इस घर में पदार्पण करते ही इस प्रक्रिया का आरंभ हो गया था, किंतु मैने जिस दिन सचेत होकर पहली बार इसके सूत्रपात का अनुभव किया, उस दिन की बात मुझे अच्छी तरह याद है।

ग्रीष्मकाल के आरंभ में उस समय बाजार नरम था, हाथ में कोई काम न था। सूर्य डूबने के कुछ पहले मैं नदी-किनारे घाट की सबसे नीची सीढ़ी पर एक आरामकुर्सी पर बैठा था। शुस्ता नदी क्षीण हो गई थी, दूसरे किनारे पर विस्तृत बाटुका-तट अपराह्न की आभा से रंगीन हो उठा था, इस पार स्वच्छ जल में बटियां झिलमिला रही थीं। उस दिन कहीं भी हवा नहीं थी। नजदीक के पर्वत पर वनतुलसी, पोदीना और सौंफ के जंगल से उड़ती तीखी सुगंध ने शांत आकाश को प्रभावित कर रखा था।

सूर्य जब गिरि-शिखर के अंतराल में विलुप्त हो गए तब दिन की नाट्यशाला पर एक बड़ी छाया-यवनिका पड़ गई, पर्वत की छाया होने के कारण यहां सूर्यास्त के समय प्रकाश और अंधकार का सम्मिलन बहुत देर टिका नहीं रहता। घोड़े पर बैठकर जरा घूम-फिर आऊँ यह सोचकर अब उठूं, तब उठूं कर रहा था कि सीढ़ी पर पैरों की आहट सुनाई पड़ी। पीछे फिरकर देखा, कोई नहीं था।

इंद्रिय भ्रम समझकर लौटकर दुबारा बैठते ही एकाएक बहुत से पैरों का शब्द सुनाई पड़ा- जैसे बहुत से लोग मिलकर भाग-दौड़ करते हुए उतरते जा रहे हों। किंचित भय के साथ एक सनसनीभरे रोमांच से मेरा सर्वांग परिपूर्ण हो गया। यद्यपि मेरे सामने कोई मूर्ति न थी फिर भी प्रत्यक्ष के समान स्पष्ट जान पड़ा कि ग्रीष्म की उस संध्या में प्रमोद-चंचल नारियों का एक दल शुस्ता के जल में स्नान करने उतरा है। यद्यपि उस शाम निस्तब्ध गिरि-तट पर नदी के किनारे निर्जन प्रासाद में कहीं कोई आवाज न थी। फिर मैंने मानो स्पष्ट सुना कि निर्झर की शतधाराओं के समान क्रीड़ा मग्न कलहास्य करती हुई मिलकर तेजी से दौड़ती हुई स्नानार्थिनियां मेरे पास से निकल गई हों। मुझे मानो उन्होंने देखा भी न हो। जिस प्रकार वे मेरे निकट लुप्त थीं, मैं भी मानो उसी प्रकार उनके निकट अदृश्य था। नदी पहले की ही भांति स्थिर थी, किंतु मुझे साफ मालूम हुआ मानो स्वच्छतोया का उथला स्त्रोत अनेक वलय सिंचित बाहु विक्षेपों से विक्षुब्ध हो उठा हो, हँस-हँसकर सखियां एक-दूसरे पर जल के छींटे मार रही हैं तथा तैरती हुई रमणियों के पांव चाप से जलबिंदु-राशि मुट्ठी-भर मोतियों की भांति आकाश में बिखरी पड़ रही हों।

मेरे वक्ष में एक प्रकार का कंपन होने लगा, वह उत्तेजना भय की थी, या आनंद की, या कौतुहल की, ठीक नहीं कह सकता। बड़ी इच्छा होने लगी कि अच्छी तरह से देखूं, किंतु देखने के लिए सामने कुछ न था, लगता था, अच्छी तरह कान लगाने पर उनकी सारी बातचीत साफ सुनाई पड़ेगी—किंतु एकाग्र मन से कान लगाने पर केवल वन के झींगुरों का शब्द सुनाई देता। मुझे लगा, मानो ढाई सौ वर्ष की कृष्णवर्ण-यवनिका ठीक मेरे सामने झूल रही हो, डरते-डरते एक सिरा उठाकर भीतर नजर डालूँ—वहां एक विराट सभा लगी है, किंतु घने अंधकार में कुछ भी न दिखाई दिया।

अचानक उमस को चीरती हुई हू-हू करती हवा चलने लगी—देखते-देखते शुस्ता का स्थिर जलतल अप्सरा के केशपाश की भांति कुंचित हो उठा एवं संध्यछायाछन्न समस्त वनभूमि क्षण-भऱ में एक साथ चीखती ध्वनि करके मानो दुःस्वप्न से जाग उठी। चाहे स्वप्न कहो या सत्य कहो, ढाई सौ वर्ष के अतीत क्षेत्र से उभरकर मेरे सामने जो एक अदश्य मरीचिका अवतीर्ण हुई थी वह पल भर में अंतर्ध्यान हो गई। जो मायामयी मुझे लांघती हुई देह-हीन द्रुत-पदों से शब्दहीन उच्चकलहास्य से दौड़कर शुस्ता के जल में जाकर कूद पड़ी थीं, अपने सिक्त अंचला से बूंदें टपकातीं-टपकातीं फिर मेरी बगल से होकर नहीं निकलीं। जिस प्रकार वायु गंध को उड़ाकर ले जाती है, उसी प्रकार वे वसंत-सी एक ही सांस में उड़कर चली गईं।

उस समय मुझे बड़ी आशंका हुई कि हठात् निर्जन देखकर कहीं कविता देवी मेरे कंधे पर न आ बैठी हों, मैं बेचारा रूई का महसूल वसूल करके मेहनत करके खाता हूँ, सर्वनाशिनी शायद इस बार मेरे प्राण लेने ही न आई हो। मैने सोचा, अच्छी तरह भोजन करना होगा, खाली पेट होने पर ही सब तरह के कठिन रोग आकर घेर लेते हैं। अपने रसोईये को बुलाकर मैने खूब घी में पकाकर मसाला सुगंधित डालकर बाकायदा मुगलई खाना तैयार करने को कहा।

दूसरे दिन सबेरे यह सारा मामला बेहद हास्यास्पद प्रतीत हुआ। प्रसन्नचित्त से साहबों की भांति सोला हैट पहनकर अपने हाथों से गाड़ी हांककर गड़गड़ाहट करता तहकीकात के अपने काम परचला गया। उस दिन त्रैमासिक रिपोर्ट लिखने का दिन होने के कारण देर से घर लौटने की बात थी, किंतु संध्या होते-न-होते ही मैं घर की ओर खिंचने लगा। कौन खींचने लगा यह नहीं कह सकता, किंतु लगा, अब और देरी करना ठीक न होगा। मुझे लगा, सब बैठे हुए हैं। रिपोर्ट असमाप्त छोड़कर मैं सोला हैट लगाए, संध्या-धूसर पेड़ों की सघन छाया वाले निर्जन पथ को रथचक्र ध्वनि से चौंकाते हुए उस अंधकारपूर्ण शैलांतवर्ती प्रकांड प्रासाद में आ खड़ा हुआ।

सीढ़ियों के ऊपर वाला सामने का कमरा बहुत बड़ा था। बड़े-बड़े खम्बों की तीन पंक्तियों पर नक्काशीदार मेहराबों ने विस्तीर्ण छत को धारण कर रखा था। वह विशाल कमरा अपनी अपार शून्यता को लिए हुए अहर्निश ध्वनित होता रहता। उस दिन संध्या के कुछ पहले क समय था, अभी दीपक नहीं जलाए गए थे। दरवाजा ठेलकर मैने ज्यों ही उस बड़े कमरे में प्रवेश किया त्योंही मुझे लगा मानो कमरे में कोई भारी शोर मच गया हो—मानो सहसा सभा भंग करके चारों ओर के दरवाजों, खिड़कियों, कमरों, रास्तों , बरामदों से होकर न जाने कौन किस ओर भाग गया। कहीं भी कुछ न देख पाने के कारण मैं स्तब्ध होकर खड़ा रह गया। शरीर एक प्रकार के क्रोध से रोमांचित हो उठा। जैसे बहुत दिन के लुप्तप्रायः केशद्रव्य और इत्र की मृदु गंध मेरी नाक में प्रवेश करने लगी हो। उस दीपहीन जनहीन प्रकांड कक्ष की प्राचीन प्रस्तरस्तंभ-श्रेणी के बीच खड़े मुझे सुनाई पड़ा –झर-झर करता हुआ फव्वारे का पानी सफेद पत्थर पर आकर गिर रहा है, सितार में कौन-सा सुर बज रहा है समज नहीं पड़ता। कहीं स्वर्णाभूषणों की झंकार सुनाई पड़ रही है, तो कहीं नूपुरों की रुनझुन, कभी तांबे के बृहद् घंटे पर पहर बजने का शब्द, बहुत दूर पर बजती नौबत की धुन, वायु से दोलायमान झाड़ की स्फटिक लटकनों की ठन-ठन ध्वनि, बरामदे से पिंजरे में बंद बुलबुल का गीत, बगीचे से पालतू सारस का स्वर मेरे चारों ओर किसी प्रेतलोक की रागिनी रच रहे थे।

मुझे एक ऐसे मोह ने आ घेरा कि लगा मानो यह अस्पर्श्य, अगम्य, अवास्तव व्यापार ही जगत् में एकमात्र सत्य हो, बाकी सब मिथ्या मरीचिका हो। मैं जो मैं हूं—अर्थात् मैं जो श्रीयुक्त अमुक हूँ, अमुक का ज्येष्ठपुत्र हूं, रूई का महसूल वसूल करके साढ़े चार सौ रुपए वेतन पाता हूं, मैं जो सोला हैट और ऊंचा कुर्ता पहनकर टमटम हांककर दफ्तर जा रहा हूं ये सारी बातें मुझे ऐसी अद्भुत हास्यकर निर्मूल और मिथ्या-सी लगीं कि मैं उस विशाल निस्तब्ध अंधेरे कमरे के बीच खड़ा हा-हा करके हंस उठा।

उसी समय मेरे मुसलमान नौकर ने हाथ में कैरोसिन का जलता हुआ लैंप लिए घर में प्रवेश किया। मालूम नहीं, उसने मुझे पागल समझा या नहीं, लेकिन उसी क्षण मुझे याद आया कि मैं स्वर्गीय अमुकचंद्र का ज्येष्ठ पुत्र श्रीयुक्त अमुकनाथ ही हूं; यह भी सोचा कि जगत् के भीतर अथवा बाहर कोई अमूर्त फव्वारा सदा झरता है या नहीं और अदृश्य अंगुली के आघात से किसी माया सितार से कोई  अनंत रागिनी ध्वनित होती है या नहीं, यह हमारे महाकवि और कविवर ही बता सकते हैं, किंतु एक बात अवश्य सत्य है कि मैं बरीच के बाजार में बरीच के बाजार में रूई का महसूल वसूल करके महीने में साढ़े चार सौ रुपया वेतन प्राप्त करता हूं। तभी मैं फिर अपने थोड़ी देर पहले के अद्भुत मोह की याद करके केरोसिन से प्रकाशित लैंप-टेबल के पास समाचार-पत्र लिए विनोद से हँसने लगा।

समाचार पत्र पढ़कर और मुगलाई खाना खाकर मैं कोने के एक छोटे से कमरे में बत्ती बुझाकर बिस्तर पर जा लेटा। मेरे सामने वाले खुले जंगल में से अंधेरे वन-वेष्टित अरावली पर्वत के उर्ध्व देश का एक अत्युज्ज्वल नक्षत्र सहस्त्र कोटि योजना दूर आकाश से उस बेहद छोटे कैंप-खाट के ऊपर श्रीयुक्त कलेक्टर को एकटक देख रहा था—इस पर विस्मय और कौतुक अनुभव करते-करते मैं कब सो गया, कह नहीं सकता। कितनी देर सोया मैं नहीं जानता। एक बार सिहर कर जग पड़ा। कमरे में कोई आहट हुई हो सो नहीं, किसी आदमी ने प्रवेश किया हो यह भी नहीं देख सका। अंधकारपूर्ण पर्वत के ऊपर से निर्निमेष नक्षत्र लुप्त हो गया था और कृष्णपक्ष के क्षीण चंद्रालोक ने अनाधिकार संकुचित स्वभाव से मेरी खिड़की के रास्ते प्रवेश कर लिया था।

उस रात मैं बिना आहट किए पैर रकता हुआ सांस रोके उस अदृश्य आह्वान-कारिणी का अनुसरण करता किधर से होकर कहां जा रहा था, आज यह नहीं बता सकता। मैंने कितना संकरा अंधेरा रास्ता, कितना लम्बा बरामदा , कितना गंभीर निस्तब्ध विशाल सभागृह कितनी रुद्धवायु तंग छिपी कोठरियां पार कीं, इसका कोई ठिकाना नहीं।

अपनी अदृश्य दूती को यद्यपि मैं आंखों से नहीं देख पा रहा था तथापि उसकी मूर्ति मेरी आंखों से अदृश्य न थी। अरब रमणी जिसकी झलती आस्तीनों से संगमर्मर के-से कठिन सुडौल हाथ दिख रहे थे, टोपी से लेकर मुंह तक झीने कपड़े का पर्दा पड़ा था, कमरबंद में एक कटार बंधी थी।

तभी मुझे लगा, आज आरब्य उपन्यास की एकाधिक सहस्त्र रजनी में से एक रजनी उपन्यास-लोक से उड़कर आ गई है। मैंने मानो अँधकारपूर्ण अर्धरात्रि में निद्रामग्न बगदाद के आलोक-हीन संकरे रास्ते पर कोई-संकुल अभिसार यात्रा की हो।

आखिर में मेरी दूती अचानक एक घने नीले पर्दे के सामने चौंककर खड़ी हो गई और मानो उसने अंगुली से नीचे की ओर संकेत किया। नीचे कुछ भी न था, किंतु भय से मेरे हृदय का रक्त जम गया। मैंने अनुभव किया, उस पर्दे के सामने जमीन पर किमखाब की पोशाक पहने एक भीषण हब्शी खोजा गोद में नंगी तलवार लिए पैर फैलाए बैठा हुआ ऊंघ रहा था। दूती ने धीमी गति से उसके पैर लांघकर पर्दे का एक कोना पकड़कर उठाया।

भीतर के कमरे का थोड़ा-सा भाग दिखाई पड़ा, जिस पर फारसी गलीचा बिछा हुआ था। तख्त के ऊपर कौन बैठा था यह नहीं दिखाई पड़ा—केवल जाफरानी रंग के ढीले पायजामे के नीचे जरी की जूतियां पहने गुलाबी मखमल के आसन पर असल भाव से रखे दो सुंदर चरण दिखाई दिए। मेज पर एक ओर एक नीलाभ स्फटिक पात्र में कुछ सेव, नाशपाती, नारंगी और बहुत से अंगूरों के गुच्छे सजे हुए थे और उसकी बगल में दो प्याले और स्वर्णाभ मदिरा का एक कांच-पात्र अतिथि के लिए प्रतीक्षा रत था। कमरे के भीतर से किसी अपूर्व धूप के मादक-से सुगन्धित धूम्र ने आकर मुझे आनंदित कर डाला।

मैं जैसे ही कांपते हृदय से उस खोजे के फैले हुए पैरों को लांघने चला तभी वह चौंककर उठा, उसकी गोद से तलवार पत्थर के फर्श पर आवाज करती हुई गिर पड़ी।

अचानक एक विकट चीत्कार सुनकर चौंककर देखा, मैं अपनी उसी कैंपखाट पर पसीने में तर बैठा हुआ था—सुबह के उजाले में कृष्णपक्ष का खंडित चन्द्र जागरण से क्लांत रोगी के समान पीला हो गया था—एवं अपना पागल मेहरअली अपने हर दिन के नियमानुसार सुबह-सुबह जनशून्य रास्ते पर ‘ हट जाओ, हट जाओ,‘ चिल्लाता जा रहा था।

इस प्रकार आरब्य उपन्यास की मेरी एक रात अचानक समाप्त हो गई—किंतु अभी भी एक हजार रातें बाकी थीं।

मेरे दिन से मेरी रात का एक भारी विरोध ठन गया। दिन के समय में श्रांत-क्लांत देह से काम करने जाता और शून्य स्वप्नमयी मायाविनी रात को कोसता रहता—और फिर संध्या के बाद मुझे दिन के समय का अपना वह कर्मबद्ध अस्तित्व बहुत ही तुच्छ, मिथ्या एवं हास्यकर लगने लगता।

संध्या के पश्चात मैं विह्वलभाव से एक नशे के जाल में जकड़ जाता। मैं सैकड़ों वर्ष पहले के किसी अलिखित इतिहास का कोई दूसरा अपूर्व व्यक्ति हो जाता, फिर उस समय मुझे विलायती उंचा कुर्ता एवं चुस्त पतलून न फबती। उस समय मैं सिर पर लाल मखमल की एक फैज लगाकर, ढीला पायजामा, फूलदान काबा और रेशम का लंबा चोगा पहनकर रंगीन रूमाल से इत्र लगाकर बड़े चाव से साज एवं सिगरेट छोड़कर गुलाबजल से भरा बहुकुण्डलायित विशाल हुक्का लेकर एक उंची विशाल गद्दी वाले बड़े दीवान पर बैठ जाता। जैसे रात में होने वाले किसी अपूर्व प्रिय सम्मेलन के लिए बड़े आग्रह से तैयार हो जाता।

इसके बाद ज्यों-ज्यों अंधकार घनीभूत होता जाता त्यों-त्यों न जाने कैसी अद्भुत घटनाएँ घटती रहतीं कि मैं उनका वर्णन नहीं कर सकता। ठीक जैसे किसी चमत्कार कहानी के कुछ फटे हुए अंश वसंत की आरंभिक वायु से इस विशाल प्रासाद के विचित्र कमरों में उड़ते रहते थे। थोड़ी देर तक तो मिलते, फिर और दिखाई न देते थे। मैं भी न मंडराते विच्छिन्न अंशों का अनुशरण करता हुआ सारी रात एक-एक कमरे में चक्कर लगाता रहता।

स्वप्न-खंड के इस आवर्त्त में कभी हिना की सुगंधि, कभी सितार के शब्द, कभी सुरभि-जल-सीकर-मिश्रित वायु के झोंकों के बीच पल-पल में विद्युत-शिखा के समान एक नायिका श्रद्धा दिख जाती। जाफरानी रंग का उसका पायजामा, कोमल विमल लाल चरणों में पहनी घुंडीदार उठी हुई जरी की जूतियां, वक्ष पर कसकर बंधी जरी की फूलोंदार चोली, सिर पर लाल टोपी और उससे झूलती सोने की झालर ने उसके शुभ्र ललाट एवं कपोलों को घेर लिया था।

उसने मुझे पागल बना दिया। मैं उसी के अभिसार में नित्य रात को निद्रा के पाताल-लोक में जटिल पथ-संकुल स्वप्नों की मायापुरी की गली-गली कमरे-कमरे चक्कर काटता रहता था।

किसी-किसी दिन संध्या के समय बड़े आइने के दोनों ओर दो बत्तियां जलाकर यत्नपूर्वक शहजादे की भांति सजावट कर रहा होता कि तभी अचानक देखता –आइने में मेरी छाया के पास क्षण भर के लिए उसी ईरानी तरुणी की छाया आ पड़ी है—और पलक मारते गर्दन झुकाकर अपने गहरे काले विशाल नेत्रों के तारकों से सुगंभीर तीव्र आवेगमय, वेदनापूर्ण आग्रहयुक्त कटाक्ष-पात करके, सरस सुंदर बिंबाधरों पर धीमी भाषा का आभास मात्र देकर, लघु ललित नृत्य द्वारा अपनी यौवन-पुष्पित देह-लता को द्रुत गति से ऊपर की ओर लहराकर मुहूर्तभर में वेदना, वासना, विभ्रम, हास्य, कटाक्ष तथा भूषणों की चमक के स्फुलिंगों की वर्षा करके दर्पण में ही विलीन हो गई है। गिरी-कानन की सुगंधि लूटकर उद्दाम वायु का एक उच्छवास आकर मेरी बत्तियों को बुझा देता। मैं साज-सज्जा छोड़कर प्रसाधन कक्ष के पास शैया पर प्रसन्न तन से आंखें बन्द कर लेटा रहता- उस वायु की अरावली के उस पर्वत-कुंज के समस्त मिश्रित सौरभ में मानो मेरे चारो ओर प्रचुर प्रेम, अनेक चुंबन, अनेक कोमल कर-स्पर्श निभृत अंदकार को भरकर तैरते रहते, कानों के पास प्रचुर कलगुंजन सुनाई देता, और मेरे माथे पर सुगन्धि निःस्वास आकर टकराते। और कोई मृदु-सौरभ रमणीय अत्यंत कोमल ओढ़नी बारंबार उड़-उड़कर मेरे कपोलों को छूती रहती। धीरे-धीरे मानो कोई मोहिनी सर्पिणी अपने मादक वेष्टन में मेरा सबकुछ कस लेती। मैं गहरी सांस लेकर बेसुध तन से गहरी नींद में अभिभूत हो जाता।

एक दिन अपराह्न में मैने घोड़े पर चढ़कर बाहर जाने की ठानी न जाने कौन मुझे निषेध करने लगा। लेकिन उस दिन मैने निषेध नहीं माना। काठ की एक खूंटी पर मेरा साहबी हैट और ऊंचा कुर्ता लटक रहा था, उसको उतारकर मैं पहनने ही वाला था कि उसी समय शुस्ता नदी की बालू एवं अरावली पर्वत की सूखी पल्लव-राशि की ध्वजा फहराता एक प्रचंड बवंडर अचानक मेरे कुर्ते और टोपी को उड़ाकर घुमाता-घुमाता ले चला एवं एक अत्यंत सुमिष्ट कलहास्य उस हवा के साथ चक्कर काटता हुआ कौतूहल के एक-एक पर्दे पर आघात करता हुआ ऊंचे से ऊंचे सप्तक पर चढ़ता सूर्यास्त-लोक के पास पहुंचकर विलीन हो गया।

उस दिन फिर घोड़े की सवारी नहीं हुई और उसके दूसरे दिन से मैंने वह विचित्र ऊंचा कुर्ता और साहबी टोप पहनना एकदम छोड़ दिया।

उसी दिन आधी रात को बिस्तर पर उठकर बैठने पर सुनाई पड़ा जैसे कोई भीतर-ही-भीतर फूट-फूटकर रो रही हो –मानो मेरी खाट के नीचे, फर्श के नीचे इस बृहत् प्रासाद की पाषाणभित्ति के तले किसी आद्र अंधकारपूर्ण कब्र में से कोई रो-रो कर कह रही हो, ‘ तुम मेरा उद्धार करके ले चलो—कठिन माया-पाश गंभीर निद्रा, निष्फल स्वप्न के सभी दरवाजे चूर-चूर कर तुम मुझे घोड़े पर बिठाकर अपनी छाती से चिपकाकर, वन के बीच से, पहाड़ के ऊपर से, नदी पार करके अपने सूर्यालोकित कमरे में ले चलो ! मेरा उद्धार करो !‘

“ मैं कौन हूं? मैं कैसे उद्धार करूंगा। मैं इस घूर्ण्यमान परिवर्तनशील स्वप्न प्रवाह में डूबी हुई किस कामना- सुन्दरी को किनारे खींच लाऊंगा। हे दिव्यरूपिणी ! तुम कब हुई थीं?  कहां थीं? तुमने किस शीतल उत्स के किनारे खजूर-कुंज की छाया में किस गृह-हीना मरुवासिनी की गोद में जन्म गृहण किया था? कौन बेदुई दस्यु, वन की लताओं से पुष्पकोरक की भांति तुम्हें मातृकोड से वियुक्त करके विद्युत्गामी अश्व पर बैठाकर दुग्ध बालुका-राशि के पार किस राजपुरी की दासीहाट में बेचने ले गया था ?  वहां पर किस बादशाह के भृत्यु ने तुम्हारी नवविकसित सल्लजकातर यौवन-शोभा का निरीक्षण करके स्वर्ण मुद्राएं गिनकर समुद्र पार करके तुम्हें सोने की शिविका में बैठाकर प्रभुग्रह के अंतःपुर को तुम्हारा उपकार दिया था ? कैसा विचित्र इतिहास था वहां का! वही सारंगी का संगीत, नूपुरों की ध्वनि और शीराज की स्वर्णमदिरा के बीच कटार की झलक, विष की ज्वाला, कटाक्ष का आघात! कैसा असीम ऐश्वर्य, कैसा अनंत कारागार! दो दासियां इधर-उधर कंगनों के हीरों से बिजली चमकाती हुई चंवर डुलाती थीं। शहंशाह बादशाह शुभ्र चरणों की मणि मुक्ताजटित पादुकाओं पर लोटता था, बाहर दरवाजे पर हब्शी देवदूत की भांति सजकर हाथ में नंगी तलवार लिए यमदूत की तरह खड़ा रहता। उसके पश्चात् उस रक्त-कलुषित ईर्ष्या-फेनिल षड्यंत्र संकुल भीषणोज्ज्वल ऐश्वर्य की धारा में उतारती हुई तुम मरुभूमि की पुष्प मंजरी किस निष्ठुर मृत्यु में समा गईं अथवा किस निष्ठुरतर महिमा-तट पर जा पड़ीं?

 इसी समय वह पागल मेहरअली अकस्मात् चिल्ला उठा, “ हट जाओ, हट जाओ। सब झूठ है, सब झूठ है।“ मैने आंख खोलकर देखा, सबेरा हो गया था, चपरासी ने डाक की चिट्ठी-पत्री लाकर मेरे हाथ में रख दी और रसोइये ने आकर सलाम करके पूछा कि आज किस प्रकार का भोजन तैयार करना होगा।

मैंने कहा-- ‘ नहीं, अब इस घर में और नहीं रहा जा सकता।‘ मैं उस दिन अपना सामान उठाकर ऑफिस में जा ठहरा। ऑफिस का बूढ़ा क्लर्क करीम खां मुझे रोककर कुछ मुस्कराया। मैं उसकी हँसी से खीझकर कोई उत्तर दिए बगैर काम करने लग गया।

जैसे-जैसे शाम होने लगी वैसे-वैसे मैं अनमयस्क होने लगा—लगने लगा, बस अभी तुरंत कहीं जाना है—कई के हिसाब की जांच का काम बहुत ही जरूर मालूम होने लगा, निजाम की निजामत भी महत्वपूर्ण प्रतीत नहीं हुई—जो कुछ अब था, जो कुछ मेरे चारों ओर चल रहा था. फिर रहा था, कार्यरत था, खा रहा था, सबकुछ मेरे लिए अत्यंत दीन, अर्थहीन और तुच्छ लगने लगा।

मैं कलम पटककर बड़ी बही बंद करके उसी क्षण टमटम पर चढ़कर भागा ! देखा, टमटम ठीक गोधूलि-बेला में अपने-आप उस पाषाण-प्रासाद के द्वार के पास पहुंचकर रुक गई। जल्दी से सीढ़ियां चढ़कर कमरे में प्रवेश किया।

आज सबकुछ खामोश था। अँधेरे कमरे ने मारो नाराज होकर मुंह फुला लिया था। पश्चाताप से मेरा हृदय उद्वेलित हो उठा, किंतु किसे बताऊँ, किससे क्षमा चाहूँ, खोज नहीं पाया। मैं उदास चित्त से एक-एक कमरे में घूमने लगा। इच्छा होने लगी कि हाथ में कोई साज लेकर किसी को लक्ष्य करके गीत गाऊं। कहूं. ‘ हे बहि, जिस पतंग ने तुमको छोड़कर भागने की चेष्टा की थी, वह फिर मरने के लिए आया है। इस बार उसे क्षमा करो उसके पंख जला दो, उसे भस्मासात् कर डालो।‘ अचानक ऊपर से मेरे मस्तक पर आंसू की बूंदें आ पड़ीं। उस दिन अरावली पर्वत की चोटी पर घनघोर बादल छाए हुए थे। अंधकारपूर्ण अरण्य और शुस्ता का स्याह-वर्ण जल किस भीषण प्रतीक्षा में निश्चल हो गए थे। सहसा जल-स्थल-आकाश सिहर उठे; एवं अकस्मात् विद्युत्दंत विकसित आंधी श्रृंखलाछिन्न उन्माद के समान पथहीन सुदूर वन के भीतर से भयावह चीत्कार करती हुई झपट पड़ी। प्रासाद के बड़े-बड़े शून्य कमरों के सारे द्वार पछाड़ खाकर तीव्र वेदना से हू-हू करके चीखने लगे।

आज सारे नौकर लोग ऑफिस में थे, उस समय बत्ती जलाने वाला कोई न था। उस मेघाछन्न अमावस्या की रात में घर के भीतरी निकषकृष्ण अंधेरे में मैं साफ महसूस करने लगा –कोई रमणी पलंग के नीचे गलीचे के ऊपर मुंह के बल पड़ी कसकर बंधी मुट्ठियों से अपने बिखरे बालों को खींच-खींचकर नोंचे डाल रही है, उसके गौर वर्ण ललाट से रक्त बह रहा है, कभी वह शुष्क तीव्र अट्टाहासयुक्त हा-हा करके हँस पड़ती है, कभी फफक-फफक कर फऊट-फूट कर रोती है, दोनों हाथोंम में चोली फाड़कर खुली हुई छाती पीट रही है, खुली खिड़की से वायु गर्जन करती हुई आ रही है एवं मूसलाधार वर्षा ने आकर उसके सारे अंगों को अभिषिक्त कर दिया है।

सारी रात न तूफान थमा, न रोना बंद हुआ। मैं व्यर्थ के परिताप से अंधेरे में एक-एक कमरे में घूमता रहा। कहीं कोई न था; किसको सांत्वना देता! यह प्रचंड अभियान किसका था यह अशांत आक्षेप कहां से उठ रहा था ? पागल चीख उठा, ‘ हट जाओ, हट जाओ! सब झूठ है, सब झूठ है।‘

देखा, भोर हो गया था और मेहरअली इस घोर दुर्योग के दिन भी यथा-नियम प्रासाद की प्रदक्षिणा करके अपने अभ्यास के अनुसार चीख रहा था। अचानक मुझे लगा, शायद यह मेहरअली भी मेरी तरह कभी इस महल में निवास करता रहा हो, अब पागल होकर बाहर आने पर भी इस पाषाणराक्षस के मोह से आकर्षित होकर प्रतिदिन प्रातःकाल प्रदक्षिणा करने आता था।

मैंने उसी समय वर्षा में ही दौड़ते हुए पागल के पास जाकर उससे पूछा- ‘ मेहरअली, क्या झूठ है रे? ‘

वह मेरी बात का उत्तर दिए बिना मुझे धकेलकर अजगर के सामने चक्कर काटते हुए उसके पास मोहाविष्ट पक्षी के समान चीखता हुआ प्रासाद के चारों ओर घूमने लगा। प्राणप्रण से केवल खुद को सतर्क करने के लिए बार-बार कह उठता, ‘ हट जाओ, हट जाओ! यह झूठ है, सब झूठ है। ‘

उस वर्षा और आंधी में पागल की तरह ऑफिस में जाकर करीम खां को बुलाकर मैंने कहा- ‘ इसका क्या अर्थ है, मुझे साप-साप खोलकर बताओ! ‘        

वृद्ध ने जो कहा उसका स्पष्ट अर्थ यह है, किसी समय उस प्रासाद में अनेक अतृप्त वासनाएं, अनेक उन्मत्त संभोगों की शिखाएं आलोड़ित होती थीं—उस समस्त चित्तदाह से, उन सब व्यर्थ कामनाओं के अभिशाप से इस प्रासाद का प्रत्येक प्रस्तर खंड क्षुधार्त्त हो उठा है, जीवित मनुष्य को पाने पर वह उसको लालायित पिशाचिनी के समान खा डालना चाहता है। जिन्होंने दिन-रात उस प्रासाद में निवास किया है उनमें से केवल मेहरअली पागल होकर बाहर निकला है, आज तक और कोई उनके ग्रास से बचकर नहीं निकल सका है।

मैंने पूछा--“ क्या मेरे उद्धार का कोई मार्ग नहीं है?“

वृद्ध ने कहा-“ केवल एक उपाय है, जो अत्यंत कठिन है। वह मैं तुम्हें बताता हूँ—लेकिन इसके पहले उस गुलबाग की एक ईरानी क्रीतदासी का पुराना इतिहास बताना जरूरी है। वैसी आश्चर्यजनक और वैसी हृदय-विदारक घटना संसार में और कभी नहीं घटी।“

तभी कुलियों ने आकर खबर दी, गाड़ी आ रही है। इतनी जल्दी ? जल्दी-जल्दी बिस्तर-सामान बांधते-बांधते गाड़ी आ गई। उस गाड़ी के फर्स्ट क्लास में सोकर उठे एक अंग्रेज सज्जन खिड़की के बाहर चेहरा निकालकर स्टेशन नाम पढ़ने की कोशिश कर रहे थे, हमारे सहयात्री मित्र को देखते ही हैलो कहते हुए खिल उठे और उसे अपने डिब्बे में बैठा लिया। हम सैकिंड क्लास में चढ़े। बाबू कौन थे, पता नहीं लगा, कहानी भी मैं पूरी नहीं सुन सका।

मैने कहा--“ वह आदमी हम लोगों को मूर्ख समझकर मजाक-मजाक में बुद्धू बना गया, कहानी शुरू से आखिर तक कल्पित थी।“

इस तर्क की वजह से अपने थियोसोफिस्ट संबंधी के साथ हमेशा के लिए मेरा संबंध-विच्छेद हो गया है।

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                                                                                                                                                              कहानी-विदेश


                                                                                                                                                      -नादिया तेसिच

                                                                                                                                               (अनुवादः मृदुला गर्ग)


आखिरी बयान की तलाश में

इतने बरसों बाद, आज भी उसे वह दिन याद है। यातना, हर्ष और बेपनाह दर्द का वह दिन, जब उसने बन्दूक दस्ते का सामना करते हुए अपना आखिरी बयान दिया था। औरों को भी याद है, वे वहां थे।

उसे टैसा से पता चल चुका था कि तीन महीने पहले, सरहद पार करते हुए, पार्को प्रवेश पत्रों के साथ पकड़ा गया था। जाने के तुरंत बाद शायद किसी ने उसके साथ विश्वासघात किया था। “ बहुत मासूम था वह जिंदा रहने के लिए,  “ टैसा ने ने कहा था। तत्य इतना भर था। बाकी सब कुछ, जो बाद में हुआ, अनिश्चित था और रहेगा। कौन कह सकता है ठीक क्या हुआ होगा ? उन्होंने उसे वहीं मार गिराया था या उसने भागने की कोशिश की थी ? उनका कहना है कि उसने खुद को मारा, यकीन के काबिल नहीं था...पार्को को डटकर खाने का शौक था। बढ़िया जो भी मिले, खासकर सेब, संतरे, नाशपाती आदि फल। उसे वह हमेशा इसी तरह याद रहेगा—मुंह में नाशपाती ठूंसता, टैसा को चूमता, उसके साथ हंसता-हंसाता। उसका प्यार सच्चा था। टैसा एकदम बदल गई थी। उसने जिंदगी की बेइंसाफी को कोसा था पर टैसा को दिलासा नहीं दे पाई थी। कोई नहीं दे पाया था, घिसे-पिटे शब्द काम नहीं आए थे। उसकी लाश जहाज पर लदकर घर आ गई थी, दूतावास के हवाले कर दी गई थी और गोलियों की मार से फटी छाती लिये दफना दी गई थी। सब वहां थे।

वह चुप्पी साधे मर गया था, आखिरी बयान नहीं दे पाया था। देता तो उन्हें पता जरूर चलता, टैसा को सबसे ज्यादा ठेस इसी बात से पहुंची थी कि वह यूं अप्रस्तुत मर गया। उसने जब टैसा को देखा तो सोचा, कितने अचरज की बात है कि पार्को मरा, वह मैं भी तो हो सकती थी, आखिर तय तो उसे भेजना हुआ था। बाद में किसी कारण उन्होंने उसकी योग्यता के बारे में अपनी राय बदल ली थी।

और अब तीन महीने बाद, चौक में बंदूकधारी दस्ते के सामने खड़े होने की उसकी बारी थी। वह भी वहीं खड़ा हुआ होगा। पहले उसे लगा, नहीं, ये काम को अंजाम नहीं दे पाएगी, औरतों को ज्यादातर बख्श दिया जाता था पर वह जख्मी थी और यहां थी, चर्बी की परतों से ढकी। पिछले दिनों उसका वजन काफी बढ़ गया था। उसके लिबास पर मिट्टी और खून के छींटे थे, गर्मी में जख्म गमक रहा था, मीठी बू के साथ। अब किसी भी क्षण मक्खियां उसपर भिनभिनाने लगेगीं और हाथ बंधे होने से वह उन्हें भगा भी नहीं पाएगी।

वह चौक में खड़ी है, धूसर दीवारें ऊपर बढ़ी जा रही हैं। उसके और सैनिकों के ऊपर गहरा नीला आसमान है। बस यही एक रंग बचा है। मोरपंखी नीला, उसने सोचा, मेरा प्रिय रंग, जब ये मुझे मारेंगे तो लाल भी फैलेगा, कुछ तो बदलेगा। जहां वह खड़ी है वहां से सैनिक दूर लग रहे हैं, धूमिल, सिर्फ बन्दूकें साफ हैं, संगीने उसे निशाना बनाये हैं। उसके पेट में, कमर में, सब जगह दर्द के सिवा कुछ नहीं है। भगवान का शुक्र है, अब जल्दी ही सब कुछ खत्म हो जाएगा। इस वेदना से कुछ भी बेहतर है, मौत भी। हां उसे यकीन है कि वह मौत का स्वागत करेगी, डरेगी नहीं। सैनिकों से कुछ ऊंचाई पर, सींखचे जहां खिड़कियों के पीछे शायद और लोग अपनी बारी का इन्तजार कर रहे हैं। कुछ उसी तरह यंत्रणा झेलते हुए। क्या वे मुझे देख रहे हैं, देख सकते हैं या उसके लिए लोग, एक अनंतकाल। उसका सिर चकरा रहा था। एक क्षण को लगा वह होश गंवा देगी। फिर उसे वह ऊपरी मंजिल की दूसरी जगह याद आ गई, बत्तियां और उसपर झुके आदमी, सब मुख पर पट्टियां बांधे। कायर! उसके लिए डॉक्टरों का इस्तेमाल ! जब वे उसका मांस चीड़-फाड़ रहे थे, वह चीखी थी, ‘शर्म करो, शर्म ‘ पर उसे यकीन है, उसने उन्हें कोई सार्थक जानकारी नहीं दी थी।

वह फिर से जग गई है। सब कुछ साफ है, पारदर्शी, नुकीला, कुछ नहीं बदला। अब एक और आकृति पास आती दिखलाई दे रही है, काले कपड़ों में एक बूढ़ी औरत। यह यहां क्या कर रही है, वह बुदबुदाती है। क्या-क्या तमाशे करेंगे ये लोग? औरत के दांत नहीं हैं, चेहरे पर झुर्रियां हैं। बिल्कुल मौत-जैसी शक्ल है। कह रही है,“ पट्टी ले लो, आसान रहता है।“

“मुझे जरूरत नहीं है,“ वह कहती है, सोचती है किसकी याद दिला रही है यह मुझे।

“तुम अपना काम करो। मैं जैसे चाहूंगी वैसे मरूंगी। खड़े-खड़े मरना चाहती हूं मैं।“

“तब दीवार के साथ लगकर खड़ी हो जाओ। सहारा ले लो उसका। चलो और कुछ नहीं तो इतना तो करो।“

“ऐसे?“ उसने पूछा।

“नहीं, पूरा बदन उस पर छोड़ दो। आसान रहेगा।“

“आसान, किसके लिए?“

“मरने के लिए “ औरत कहती है, “ जल्दी मरोगी। मैं जानती हूं। खच्चरपना मत करो।“

औरत गायब हो जाती है और चुप्पी छा जाती है। पहले से गहरी है। लगता है वे अब तैयार हैं। चुप्पी और बंदूकों से अंदाज लगाया जा सकता है। अब वे सीधी तनी हुई हैं। कितनी सारी बंदूकें हैं। सहसा। अब, पहले पहल, वह दहशत से भर जाती है...वे तैयार हैं पर खुद वह नहीं है। सारा वक्त यूं ही गंवा दिया, इधर-उधर की सोचकर।

“ रुकिए, “ वह पूरी ताकत से चीखती है। सफेदपोश जवान आता है, पूछता है “पानी?“ “ नहीं, बस दो मिनट। मुझे कुछ करना है...। “

“ प्रार्थना?“ वह हंसता है, “मेरा खयाल था आप लोग उसमें विश्वास नहीं करते।“

“बस दो मिनट। मुझे सख्त जरूरत है।“

“ठीक है।“

वह दीवार का सहारा लेती है, धरती का अंतिम स्पर्श और उसका अंतर वेदना से भर जाता है...उसने अपना आखिरी बयान तो तैयार ही नहीं किया, सबसे अहम बयान, वह जो बाद में याद रखा जाएगा। उसे पता है, क्या होता है, तभी न वह जान पाई थी कि उसके चाचा-ताऊ जर्मन सैनिकों का सामना करते हुए चिल्लाए थे, ‘क्रांति चिरंजीवी हो।‘ ‘खून का बदला खून! ‘ वह इन सैनिकों को जानती है और उस जमीन को भी जहां वे जनमे-पनपे हैं। वह जानती है कि उसे मारकर भी वे उसके अंतिम शब्द याद रखेंगेऔर बाद में , आदर के साथ उन्हें दोहराएंगे। गांव में, आग तापते हुए, हर जगह वे फुसफुसाएँगे,“पता है गिरने से पहले उसने क्या कहा?“ उसके अपने बचपन में प्रचलित शब्दों की तरह, इन शब्दों की अतिरंजित प्रतिध्वनि भी सब सुनेंगे-बच्चे बूढ़े सब। वे एक संदेश बन जाएंगे, एक आदेश। ऐसा ही होता आया है। फिर हम हथियार उठा लेते हैं, चाकू, बंदूक, बम। लड़ाई, प्रतिशोध और अंततः मर्द की मौत। हां, ऐसा ही होता है पर उसके दो मिनट पूरे हो गए हैं और बयान हुआ नहीं। उसने हाथ उठाया, “ दो मिनट और“ वह चीखी, “ बस दो मिनट और दीजिए मुझे।“

अब वे उसकी बात नहीं सुन रहे। कोई नहीं सुना। वे निशाना साधनेवाले हैं। नगाड़ा तेज-तेज बज रहा है। जल्दी सोचो, क्या कहा जा सकता है। सोचो पिछले तमाम नारे-‘ कुत्तों की मौत।‘ ‘ बदला लेना मेरे खून का।‘ ‘ईंकलाब जिंदाबाद! ‘ और नारे भी हैं जरूर। वह खुद नारे लगाती हुई चीखा करती थी बचपन में। सोचो, सोचो जल्दी।

गोलियां जब आर-पार हुईं तो पता नहीं क्यों, वह जोर से चिल्लाई, “ जिए जिन्दगी! “ वह भी फ्रांसिसी भाषा में। और फिर बस अंधकार।

शून्य में विलीन होने के बजाय, वह उसी यंत्रणा कक्ष में है, जिसमें पिछली रात थी। बत्तियां जल रही हैं, मुंह पर पट्टी बांधे आदमी भी हैं पर उसका अपना मुंह उसके शब्दों से भरा हुआ है ‘ जिए जिन्दगी‘। बाहर निकलकर वे फैलते हैं, दीवारों से टकराते हैं, चरों तरफ मंडराते हैं और लौट आते हैं उसके पास। उनके थमने पर वह और नारे लगाती है। सामान्य किस्म के नारे, जैसे ‘ खून का बदला खून‘। ऐसे ही ढेरों और। दर्द अब नहीं है। वह सोचती है मैं मर चुकी हूं और यह बाद की जिंदगी है। एक सफेद कमरा और दर्द से छुटकारा, बस।कुछ देर में, उसके शब्द दब जाते हैं और वह औरों की फुसफुसाहट को सुनती है। लगता है कोई जोर-जोर से रो रहा है। नहीं, वह नहीं।

“ठीक है यह?“ कोई पूछता है।

“हो जाएगी“, कोई और कहता है।

“अजीब रही यह यात्रा भी। कोई सोच सकता था।“

“कभी देखा न सुना!“

“है कौन यह, छात्रा? “

“ फ्रांसीसी तो नहीं? “

“ नहीं, विदेशी।“

“ यंत्रणा कब दी गई इसे? “ कोई कहता है।

“किसे कब दी गई यंत्रणा? “

“अस्वाभाविक है न, “ वे फुसफुसाते हैं।

“इसने बच्चे का जिक्र तक नहीं किया ? “

कौन हैं ये लोग जो यहां बोल-बतिया रहे हैं। वह सोचती है और सो जाती है।

जब वाकई सोकर उठी तो कमरा तब भी सफेद था पर डॉ. वहां नहीं थे। कमरा सूरज की रोशनी से भरा हुआ था और हर जगह, कुर्सियों पर, जमीन पर, कामरेड बैठे मुस्कुरा रहे थे, फूल और शैंपेन लिए। उसके बिस्तर के सामने लंबा-चौड़ा पोस्टर लटका हुआ था जिस पर लाल रंग से फ्रेंच में लिखा था, ‘ नारी मुक्ति की न्यायोचित लड़ाई चिरंजीवी हो।‘ यह मजाक सिर्फ रिनाटो कर सकता था। उन्होंने उसे शैंपेन दी और बतलाया कि लड़का मोटा-ताजा, तंदरुस्त है और सो रहा है। ‘चे‘ या ‘ निकोलस‘ ग्रीक भाषा में उसका मतलब फतह होता है। एंड्रिया औरों को बतला रही है। “ दोनों क्यों नहीं“?  मार्क कहता है। सब लोग जाहिराना ढंग से प्रभावित नजर आ रहे हैं कि जन्म देते हुए ‘ उसने राजनीतिक काम के अलावा कुछ नहीं किया।‘ वे उसे कभी मात नहीं दे पाएंगे। बाप जरूरकुछ निराश था कि अपने पूरे संघर्ष के दौरान, उसने एक बार भी उसका या बच्चे का नाम नहीं लिया। ऐसा भी कहीं हुआ करता है ? उसे उसकी बुर्जुआ भावनाओं के लिए काफी फटकारा गया। नाम अभी तय नहीं हुआ।

शाम को टैसा फूल लेकर आई। उदास न दिखने की कोशिश कर रही थी। उन सबके लिए यह एक मुबारक मौका था पर पार्को तो मर ही चुका था, सिर्फ तीन महीने पहले और बिना तैयारी, उसने फिर कहा। पर जो बात उसकी समझ में बिल्कुल नहीं आ रही थी, वह यह थी कि उसने वे शब्द, ‘जिये जिन्दगी‘ , फ्रांसीसी भाषा में क्यों कहे? सब जानते हैं कि मुसीबत के वक्ता लोग बुनियाद को याद करते हैं। अपनी भाषा बोलते हैं।


“ यह अस्वाभाविक है।“, उसने कहा, “  तुम फ्रांसीसी नहीं हो।“

वह स्वयं चकित थी। वह नहीं जानती थी ऐसा क्या हुआ। हो सकता है, उस ध्वनि के कारण हुआ हो जो सिर्फ उन्ही शब्दों से फूट सकती थी, जो फ्रांसीसी भाषा के थे। 

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                                                                                                                                                             दो लघुकथाएँ


                                                                                                                                                 अनुवादः सुभाष नीरव

सम्मान

स्टेशन के उस विश्राम घर के बाहरी चबूतरे पर उसे न देखकर वह घबरा-सा गया। अभी कल तो वह यहीं बैठा था।

     पिछले कई महीनों से वह उस दरवेश को देख रहा है। वह पहली ट्रेन से डयूटी पर जाता है। वह कलाकार है और अपने रंग-ब्रश साथ ही रखता है। वह मंगता किसी से कुछ मांगता नहीं, बस जो मिल जाता है, खा लेता है। आलसी-सा, न नहाने का चाव, न दातुन-कुल्ला करने की इच्छा। सदैव लिबड़ा हुआ-सा रहता है। आने-जाने वालों की तरफ हसरत से देखता है। नैण-नक्श सुन्दर हैं, आँखों में अजीब सी चमक।

      पता नहीं क्यों वह ज़िन्दगी से हार माने बैठा है।

      कलाकार उसे रोज़ देखता। उसके मन में उसका चित्र बनाने की ख्वाहिश थी। कल उसे समय मिल गया था। गाड़ी आधा घंटा लेट थी। वह उसके करीब एक बेंच पर जा बैठा था और उसकी ओर देख देखकर अपने पेपर पर ब्रश चलाने लगा था।

      अपनी ओर बार-बार उसे देखता पकार मंगता झुंझला उठा।

      ''क्या करते हो ?... मुझे यूँ क्यूँ घूर रहे हो ?''

      ''कुछ नहीं... कुछ नहीं, बस।''

      पंद्रह मिनट में कलाकार ने उसे उसका चित्र दिखाया।

      ''हैं... यह कौन है ?''

      ''यह तुम ही हो... तेरा ही चित्र है। तेरी फोटो...''

      ''मैं इतना सुन्दर...।'' वह हर्षित सा उठ बैठा।

      ''हाँ, तू तो इससे भी अधिक सुन्दर है, बहुत सुन्दर।''

 

      और आज, उस मंगते को वहाँ न पाकर कलाकार ने स्टेशन मास्टर से पूछा।

      ''वह तो कल तुम्हारे जाने के बाद ही नल के नीचे नहा कर मेरे पास आया था। मैंने उसे अपना पुराना सूट पहनने के लिए दे दिया था। सूट पहनकर वह बड़ा खुश है। ''

      ''पर वह गया कहाँ ?''

      ''वो देखो, स्टेशन का नया फर्श बन रहा है, दिहाड़ी करने लगा हुआ है।''

      कलाकार ने उसकी ओर देखा, जीती-जागती कलाकृति की ओर, और मुस्करा दिया।




                                                                                                                                -सतपाल खुल्लर












पराया देश, अपना चाँद


किरन और निर्मल को अमेरिका आए लगभग एक महीना हो चला था। दोनों में से किसी को भी ठीकठाक काम नहीं मिल सका था। अपने बड़े भाई प्रभजोत के अपार्टमेंट में बैठी किरन उदासी के आलम में विचर रही थी, निर्मल बच्चों के संग मन बहला रहा था। संध्या समय जब दोनों परिवार इकट्ठा होते तो चित्त को थोड़ा राहत मिलती। एक दो बार किरन, भैया-भाभी से वापस लौट जाने का जिक्र भी कर चुकी थी। लेकिन बच्चों को तो यहाँ अच्छा लगने लगा था, ''हमने नहीं इंडिया वापस जाना, वहाँ सब डर्टी है, कारें भी इतनी सुन्दर नहीं...'' बेटी हरप्रीत अमेरिकन पंजाबी बोलने लग पड़ी थी।

      किरन पीछे छोड़े गए भर-भराये घर को याद करते दुखी होती, ''कैसे उसने तीला-तीला करके घोंसला बनाया था, सजाया था। स्कूल में भी अध्यापिका के तौर पर इज्ज़त मिलती थी, मुहल्ले में अच्छी बना कर रखी हुई थी, फिर कोई न कोई रिश्तेदार-स्नेही मिलने आया ही रहता... कभी कोई फंक्शन, कभी कोई... और यहाँ तो कहीं कोई अपनत्व नहीं... कोई मिठास नहीं... बाहर भी सब सूना-सूना, कोई रौनक नहीं... इमारतें, सड़कें... लोग... यहाँ तक कि हवा-पानी भी ... सब पराया... अनजान...।''

      आज रात भी वह इन्हीं विचारों में खोई मैगजीन के पन्ने पलट रही थी, कभी कभी आँखें भी पोंछ लेती। अचानक हरप्रीत आकर उसका हाथ खींचने लगी, ''मम्मी-मम्मी ! विंडो के पास आकर देखो... बिलकुल अपने चाँद जैसा चाँद...''


                                                                                                                          डा. बलदेव सिंह खहरा

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                                                                                                                         लियो ताल्सताय का अंतरंग संसार


                                                                                                                                  अनुवादः रूपसिंह चंदेल


अकाल के दौरान लेव निकोलायेविच के साथ

तोल्स्तोय परिवार के साथ जान-पहचान

वेरा वेलीच्किना
(वेरा मिखाइलोव्ना वेलिच्किना -१८६८-१९१८ - एक फीजिशियन थी। क्रान्ति के बाद 'कॉलेजियम ऑफ दि पीपुल्स कमिसारियत ऑफ हेल्थ' की सदस्य, कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य और वी.डी. बोंच-ब्रुयेविच की पत्नी)

१८९१-९२ का प्रचण्ड जाड़ा प्रारंभ हो गया था। काली-मिट्टी क्षेत्र के कोई छत्तीस गुबेर्निया अकाल से पीड़ित थे। अकाल अपेक्षित था। मास्को में सभी प्रकार के मंडल और समितियों का गठन फण्ड एकत्र करने और अकाल पीड़ित किसानों की सहायता करने के लिए किया गया। मास्को समाज मानो लंबी नींद से जागा था। सभी उत्तेजित थे। सभी के पास कुछ करने के लिए था और वे प्रसन्न प्रतीत हो रहे थे। आप जहां जाते आप लोगों को केवल अकाल के विशय में ही चर्चा करते सुनते। मैं, भी जागी, और मास्को से प्रस्थान कर वहां जाने का निर्णय किया जहां जोग इसप्रकार भयंकर विपत्ति में थे। मुझे यह बोध नहीं था कि मैं उनके लिए क्या सहायता कर सकती थी। मेरे पास कोई साधन भी नहीं थे। लेकिन मैंने अनुभव किया कि मैं मास्को के गर्म कमरे में रुकी नहीं रह सकती, इसलिए मुझे वहां जाना चाहिए जहां लोगों के कश्टों में प्रतिदिन भयानक वृद्धि हो रही थी। लेकिन, मैं, एक नौजवान लड़की, जो कभी अपने परिवार से अलग नहीं हुई थी और उसके बिना रहने की कल्पना नहीं कर सकती थी, यह सब कैसे कर पायेगी ?

एक परिचित ने एक दिन मुझसे कहा कि तोल्स्तोय ने अकाल पीड़ित किसानों के लिए 'सार्वजनिक भोज कक्ष' स्थापित किए हैं और उन्हें चलाने के लिए उन्हें लोगों की आवश्यकता है। उसने मुझे एक महिला का पता दिया और कहा कि वह मुझे अपेक्षित जानकारी दे सकती हैं। घर लौटकर मैंने अपनी मां को बताया । मेरी भावना की कद्र करते हुए मां ने मेरे अकाल क्षेत्र में जाने पर कोई आपत्ति नहीं की। बल्कि उन्होंने मुझे जाने की सलाह दी। मुझे जो पता दिया गया था वहां मैंने आवेदन किया । वहां से मुझे मार्गरिटा अलेक्जैंद्रोव्ना सबाश्निनकोवा से बात करने के लिए भेजा गया। जिस मकान में वह रहती थीं उसे देख मुझ पर बुरा प्रभाव पड़ा,  जो बाद में गहराता गया। वह मुझसे ऐसे मिलीं मानो मैं उनसे सिफारिश चाहती थी। यह कहकर कि उनके पास पर्याप्त लोग हैं, वह बोलीं कि मैं अपना नाम और पता उनके पास छोड़ दूं और यदि कुछ संभावना  हुई तो वह मुझे सूचित कर देंगी। निसंदेह कुछ नहीं किया गया और उन्होंने जिसप्रकार से मेरा ठण्डा स्वागत किया था उसने मुझमें तोल्स्तोय के संपर्क में आने की मेरी इच्छा को समाप्त कर दिया। फिर भी मां ने कहा कि मैं सीधे उन्हें आवेदन करूं।

पहले इस विचार से मैं स्तब्ध हुई कि मैं लोंगो के पास अनिमंत्रित कैसे जा सकती हूं? उन पर जबर्दस्ती, विशेशरूप से तोल्स्तोय जैसे व्यक्ति पर अपने को थोप दूं? मैं इस विचार से भयभीत हुई कि वे सोच सकते थे कि केवल उनसे जान-पहचान बनाने के लि मैं वैसा कर रही थी। एक बार मेरा स्वागत अनुग्रह प्राप्त करने वाले व्यक्ति के रूप में किया जा चुका था, और एक बार ही  पर्याप्त था। मुझे तोल्स्तोय के विचारों से, तब जैसा मैंने समझा था, कोई सहानुभूति नहीं थी और उन्हें और बेहतर समझने की लालसा भी न थी। इसलिए तोल्स्तोय को मेरे आवेदन करने का कोई कारण नहीं था। मैं कहीं अन्यत्र आवेदन करना बेहतर समझती थी, लेकिन कहां करती ?

अंत में मां ने मुझे उनके पास जाने के लिए राजी कर लिया। इससे मेरी स्वाभाविक सकुचाहट की आदत पर मुझे विजय प्राप्त करने के लिए बहुत प्रयत्न करना पड़ा, लेकिन दिसम्बर, १८९१ के अंत में मैंने वह किया।

सोफिया अन्द्रेयेव्ना ने मेरा स्वागत किया। उनकी दृश्टि तटस्थ, विद्वेशी थी। बाद में उन्होंने मुझसे कहा कि मेरे दुर्बल शरीर को देखकर उन्होने यह माना था कि मैं कोई गंभीर सहयोग नहीं कर सकती और उनके परिवार पर बोझ ही बनूंगी। फिर भी, उन्होंने मुझे पूरी तरह से हताश नहीं किया था। उन्होंने कहा कि मैं ३ जनवरी को पुन: आऊं जब उनके पति और उनकी बेटी देहात से वापस आयेंगे। वह स्वयं सुनिश्चितरूप से कुछ नहीं कह सकती थीं क्योंकि उन्हें यह सूचना नहीं थी कि स्थिति कैसी थी।

३ जनवरी को मैं पुन: वहां गयी. इस बार तात्याना ल्वोव्ना ने ऊपर के एक बड़े कमरे में मेरा स्वागत किया। उनकी आवाज भी रूखी थी, हांलाकि हमारी बातचीत देर तक हुई थी। '' हमने सत्तर 'सार्वजनिक भोज कक्ष' खोले हैं, '' उन्होंने कहा , '' धनाभाव के कारण हम और अधिक नहीं खोल सकते और उन्हें चलाने वाले लोग पर्याप्त हैं। इसके अतिरिक्त असंख्य प्रार्थना पत्र आये हुए हैं। सभी अकाल क्षेत्र में जाना चाहते हैं।''

मैंने कुछ नहीं कहा। निश्चित था कि मामला समाप्त हो गया था। यदि असंख्य लोग आवेदन कर रहे थे, तब उन्हें एक अनजान लड़की को बिना किसी अनुशंसा और इस बात का किचिंत ज्ञान न रखने वाली कि उसे क्या करना होगा, उन्हें क्यों लेना चाहिए ?
                  
''तथापि''  अप्रत्याशितरूप से तात्याना ने कहा, ''तीन दिन बाद आओ। तब तक स्थितियां स्पश्ट हो जायेगी। संभवत: तुम्हारे करने के लिए हम तब कुछ खोज लेंगे। ''

 मैं यह अनुभव करती हुई वापस लौटी कि मेरा 'केस' निराशाजनक था।

फिर भी, तीन दिन बाद खमाव्दिचेस्की स्ट्रीट के दरवाजा सं. १५ के सामने मैं पुन: खड़ी थी। बाद में कितनी ही बार मैं उस स्थान पर खड़ी हुई, और उसी घबड़ाहट के  साथ। इस बार मैंने अभी घण्टी बजायी ही थी कि दरवाजा खुला और सफेद भेड़ की खाल की जैकेट पहने लंबे भारी-भरकम व्यक्ति को मैंने खड़ा पाया, जिन्होंने मुझसे पूछा :

''क्या है ?''
 मैंने तत्काल उन्हें पहचान लिया और उत्तर देने के बजाय मैंने कहा :
''क्या आप लेव निकोलायेविच हैं ?''
''हां, मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं ?''
कुछ असम्बद्ध वाक्यांश बुदबुदाते हुए मैंने अपने आने का उद्देश्य बताया।
''मैं जानता हूं. मेरी बेटी ने मुझे बताया था. तुम्हें ठण्ड लग रही है?''
मैंने कहा मुझे ठण्ड नहीं लग रही।
'अंदर जाओ और मेरी प्रतीक्षा करो, यदि कर पाओ, मैं जल्दी ही लौट आऊंगा। यदि प्रतीक्षा न कर पाओ, मेरे साथ आओ, यदि रास्ता तुम्हारे रास्ते से अलग नहीं है, और मैं तुम्हें स्पश्ट करूंगा कि स्थिति कैसी है।'`

हम चल पड़े। मुझे आश्चर्य हुआ। लेव निकोलायेविच ने इस प्रकार मेरी ओर देखा मानों मेरा चयन कर लिया गया  था और मुझे क्या कार्य करना होगा मुझे समझाने लगे।

''पिछली रात एक तुलना मेरे दिमाग में आयी। हम उन लोंगो की तरह हैं जो छोटी बोतल बड़े वेसिन से भरना पसंद करते हैं। प्रत्येक बोतल में द्रव्य का बिना एक बूंद भी नश्ट किये प्रत्येक बोतल को बिल्कुल ठीक-ठाक भरते हैं। यह एक कठिन काम है और प्रत्येक अलग बोतल भरने के लिए यह पूर्ण ध्यानाकर्शण की मांग करता है। अपने विशय में इस दृश्टि से देखो जब तुम वहां होगी।  तुम कब जाने की सोच रही हो ? '' उन्होंने पूछा।

मैंने कहा यह उन पर है। मैं तो तुरंत जाने को तैयार हूं।'

''बहुत अच्छा। कल या परसों प्रस्थान कर दो और चीजों के विशय में मेरी बेटी से बात कर लो। वह तुम्हें बता देगी कि कैसे जाना है। इस बीच हम तुम्हारे लिए आवश्यक कागजात प्राप्त कर लेंगे।``

हम अलग हो गये। मैंने इस प्रकार तुरंत सफलता का स्वप्न नहीं देखा था। यह स्पश्ट था कि नये 'सार्वजनिक भोज कक्ष' खोले जाने के साधन और अवसर थे अथवा नहीं, यह प्रश्न स्वयं लेव निकोलायेविच के समक्ष कभी प्रस्तुत नहीं किया गया।

अगले दिन १२ जनवरी थी, और माना जा रहा था कि परिवार तात्याना ल्वोव्ना का नाम दिन मनायेगा। मैंने अगले दिन उनसे पुन: मिलने जाने तक प्रतीक्षा की।

इस बार मुझे एक छोटे कमरे में बैठाया गया जो तोल्स्तोय की दूसरी-बड़ी बेटी मारिया ल्वोव्ना का था, जो मेरे प्रति बहुत ही सह्यदय थी और उन्होंने सब कुछ स्पश्ट बताया था।
     
''तुमने कब जाने का निर्णय किया है ?'' उन्होंने पूछा।

''मैं आज भी जा सकती हूं.'' मैंने कहा, ''जितनी जल्दी उतना अच्छा।''

''मेरी,  क्या तुम हड़बड़ी में नहीं हो !'' वह हंसी । ''लेकिन यह अच्छा है। जब हम बहुत दूर हों तब यह बहुत अच्छी चीज होगी कि हमारे पास एक अतिरिक्त व्यक्ति हो। तुम अकेली नहीं होगी। मेरा भाई इंचार्ज है और क्या करना है वह बता देगा। हम उसके नाम पत्र दे देंगे।एक और लड़की, मोहक लड़की, एक डाक्टर की सहायक भी वहां है। मुझे पक्का विश्वास है कि तुम और वह ख्याति अर्जित करोगी। वह आयुर्विज्ञान की प्रैक्टिस कर रही है।''

तभी लेव निकोलायेविच अंदर आये।

''पापा'' उनकी ओर मुड़ती हुई मारिया ल्वोव्ना बोली, ''यह आज ही जाना चाहती है. हमें इल्या और यर्मोलायेव के नाम पत्र दे देना चाहिए।''

''निश्चित ही हमें दे देना चाहिए । तुम उन्हें लिखो।  येर्मोलायेव से कहो कि वह इनके लिए उपयुक्त व्यवस्था करें.... बहुत ठण्ड है और उसे बहुत लंबी यात्रा करनी है। इल्या को मैं स्वयं लिखूंगा।हमने यर्मोलायेव के पास बहुत-सी गर्म चीजें छोड़ी हैं।''

वे मार्ग के लिए मेरे वस्त्रों के विशय में चर्चा कर रहे थे और मेरे छोटे  डील-डौल पर हंस रहे थे। दो छोटे सुन्दर बालों वाले बच्चे दौड़ते हुए अंदर आए ... एक लड़का और एक लड़की और अपने पिता के ऊपर चढ़ गये। उन्होंने उनके बाल सहलाये और अन्यमनस्क भाव से उनके बकबक का उत्तर दिया .

अंतत: आवश्यक पत्र और सलाह लेकर मैंने पिता और पुत्री से विदा ली।

''हम जल्दी ही बेगीचेव्का में मिलेंगे।'' विदा होते समय वे बोले।


गांव में मेरा आगमन

कुछ घण्टो बाद मैं पूर्णरूप  से उदास ट्रेन में थी। पहले मैं कभी अपने परिवार से एक क्षण के लिए भी अलग नहीं हुई थी। तुला में मैंने तीसरे दर्जे के गंदे और भीड़भाड़ वाले डिब्बे में शिफ्ट कर लिया ( मुझे र्याज्स्क-व्याजेक्स्की रेलमार्ग से जाना चाहिए था). अंदर असह्य गर्मी थी और मखोर्का सिगरेट के धुंए से हवा भारी थी। अधिकांश यात्री किसान थे और ट्रेन के विलंब के बावजूद, प्रत्येक स्टेशन में नये यात्री डिब्बे में धुस रहे थे। मौसम बहुत ठण्डा था।  यदि अधिक नहीं तो शून्य से २५ डिग्री सेंटीग्रेट से नीचे और हर बार स्टेशन पर ट्रेन के देर तक रुकने और दरवाजा खुलने पर बादलों में से दौड़ती ठण्डी हवा डिब्बे में घुस रही थी। मैं थकावट और मखोर्का के धुंए से व्याकुल थी, लेकिन बहुत प्रसन्न थी क्योंकि बहुत समय से इसके लिए लालायित थी। अपने परिवार से अलग होने का दुख अब तक समाप्त हो गया था। शेश  मेरे सामने जो था उसका एक सुखद पूर्वानुमान।

डिब्बे में मेरे पड़ोसियों ने पूछना प्रारंभ किया कि मैं कहां जा रही थी और किस उद्देश्य से। पहले मैं चुप रही, फिर जल्दी ही मैं उन्हें सब कुछ बता रही थी। मैं कहां जा रही थी और क्यों। मैंने क्या सुना और अखबारों में क्या पढ़ा था ! मैं नहीं जानती थी कि मैं तुला गुबेर्निया क्षेत्र से गुजर रही थी जो उतनी ही बुरी तरह अकाल प्रभावित था जितना वह जहां मैं जा रही थी। उस समय मैं डिब्बे के बीच में किसानों की भीड़ से घिरी बैठी थी, अधिकांश पुरुश , जो उत्सुकतापूर्वक, ध्यानपूर्वक और सहानुभूति के साथ जो कुछ मैं कह रही थी, सुन रहे थे। समय-समय पर मैं किसी को अपने एक पड़ोसी से यह कहते सुनती कि मेरे चेहरे की ओर धुंआ न फेंके ''अथवा उसका सिर तुम्हारी तंबाकू से चकरा जायेगा।'' अथवा भीड़ को चेतावनी देता कोई कहता  कि मेरे चारों ओर अधिक दबाव न बनाएँ। मैं मखोर्का अथवा अपनी थकान के प्रति अधिक चेतन न रही थी, क्योंकि मैं उन लागों के साथ स्वयं उल्लसित अनुभव कर रही थी जिनके साथ जीवन में पहली बार मैं सीधे संपर्क में आयी थी। मुझे किंचित भी स्मरण नहीं कि मैं, एक युवा, अनुभवहीन लड़की, ने उन क्षुधित दाढ़ीवाले लागों से क्या कहा था! मुझे केवल इतना याद है कि किस अफसोस के साथ मैंने वह गर्म और भीड़भाड़ वाला डिब्बा छोड़ा था। जब मैं स्टेशन पर उतर रही थी मेरे पीछे मेरे लिए स्नेह शील शुभकामनाएं बोली गयीं और कई सशक्त हाथ मेरे बैग उतार कर लाए थे।    

स्टेशन मास्टर मुझे एजेण्ट येर्मोलायेव के पास ले गया, जिसके लिए मेरे पास तोल्स्तोय का पत्र था। डिब्बा, जिसने मुझे इतना सत्कार शील सम्मान दिया था, रेलवे लाइन पर घड़घड़ाता हुआ जा रहा था।

दो युवक स्टेशन पर मेरे सामने आ उपस्थित हुए थे। वे जागीर के मालिक रायेव्स्की के लड़के थे, जहां मैं जा रही थी और जो 'सार्वजनिक भोज कक्ष' का संघटनात्मक केन्द्र था। लड़के तूला जा रहे थे।

''उत्तम'' येर्मोलायेव बोले, ''आप मेरे यहां रात बिताएं और सुबह यही घोड़े आपको बेगीचेव्का ले जायेंगे।''

मैंने येर्मोलायेव के घर के बैठकखाने में सख्त सोफे पर रात बितायी। अगली सुबह उन्होंने मुझे नाश्ता करवाया और मेरी यात्रा की तैयारी की। मैं मात्र एक शहर निवासी थी और मुझे बिल्कुल जानकारी नहीं थी कि सर्दियों के मध्य में खेतों के बीच से जब यात्रा करनी हो तब अपने को कैसे तैयार करना चाहिए। हमें आगे चालीस वर्स्ट्स की यात्रा करनी थी। दिन ठण्डा था और धूप खिली हुई थी। येर्मोलायेव ने हालांकि अपेक्षाकृत अधिक सावधानी बरतते हुए मुझे इतने अधिक गर्म कपड़े ओढ़ाए कि मैं फर का एक निश्चल पुलिन्दा बन गयी थी।

जब उन्होंने फर का कंबल स्लेज पर बांध दिया, उन्होंने ड्राइवर को चेतावनी दी, ''देखना युवा लेडी के साथ कुछ घटने न पाए। ''

हम चल पड़े थे।

मैंने पहले कभी अकेले व्यापक बर्फ से ढके मैदानों के बीच से यात्रा नहीं की थी। शहर के गर्म कमरों, मुलायम फर्नीचर और ढक्कनवाले लैम्पों के विचार पीछे छूट गए, और मैंने अपने को पूरी तरह नये जीवन के विचार के हवाले कर दिया।

रास्ते में हमने कुछ गांव पार किये, लेकिन उन्हें देख मैं कितना आतंकित हुई थी! मेरी जानकारी थी कि गांव जंगल क्षेत्र में बड़े शहरों के चारों ओर होते हैं, जहां अधिकांश घर लट्ठों के और कुछ धनी लागों के ईटों से बने होते हैं। यहां हमें वृक्ष-रहित मैदान में छोटी झोपड़ियों के छोटे समूह मिले जो 'असम पत्थरों' से बनी हुई थीं और जिन पर पुआल की छाजन थी। उनमें जगह-जगह अंतराल था ( बाद में मुझे ज्ञात हुआ कि यह पुआल जानवरों को चारे के रूप में दिया जाता है) । झोपड़ियों में चिमनी नहीं थीं। खुला चूल्हा बीच में था जिसका धुंआ छत में बने छेद से बाहर निकलता था। में उन जैसी झोपड़ियों में काम करने जा रही हूं, मेंने स्वयं से कहा। मैं अपने विचारों में इतना तल्लीन थी कि ड्राइवर से बात नहीं की। कुछ घण्टो तक चलने के बाद उसने चाबुक से कुछ दूरी की ओर संकेत किया और मेरी ओर मुड़कर बोला -

''वह उधर गोर्की है। हम लगभग पहुंच गये।''

बिल्कुल सच, हम हरी छतवाले एक मंजिला मकान तक गये और दरवाजे के ठीक सामने जा रुके।

घर के अंदर से एक नौकर की आवाज सुनाई दी।

''ईश्वर ने हमारे लिए एक युवा लेडी भेजी है।''

हॉल में कोई मेरे स्वागत के लिए आया, और उसने मेरा फर खोलना प्रारंभ किया, जो सहज कार्य नहीं था।

अंतत: जब मैं अपने फरों और कोटों से मुक्त हुई, मैंने बताया कि मैं कौन हूं और मैं किसलिए वहां आई हूं। मैंने यह भी बताया कि मेरे पास इल्या ल्वोविच के लिए पत्र है। लंबे,दुबले, भूरे बालों वाले नौजवान ने बताया कि वही इल्या ल्वोविच हैं और पत्र ले लिए। मुझे डिनर के लिए बुलाया गया।

घर को लेकर मेरी पहली राय निश्चितरूप से अच्छी नहीं थी। गर्म आरामदायक अपने घर के बाद, यहां सबकुछ गंदा और अनाकर्शक प्रतीत हो रहा था। वहां बहुत कमरे थे, लेकिन कुछ समय तक मैं समझ नहीं सकी कि उनमें से किसमें मैं एकांतवास कर सकती थी। सभी फेल्ट बूट पहने हुए थे, जिसका अर्थ था कि फर्श ठण्डा था।

डिनर के बाद येलेना मिखाइलोव्ना (उस युवती का नाम जिसके विशय में मारिया ल्वोव्ना ने बताया था ) मुझे मेरे कमरे में ले गईं, फिर अपने कमरे में, जहां उनके पास दवाओं का छोटा-सा भंडार था। उसके बाद उन्होंने मुझे अकेले छोड़ दिया जिससे मैं स्वयं को और अपने सामान को व्यवस्थित कर सकूं।

हे ईश्वर, मैने कैसा अकेलापन अनूभव किया! मुझे नहीं मालूम था कि किसी चीज को कैसे व्यवस्थित करके रखूं। यह भी नहीं मालूम था कि कोई चीज कहां थी, यहां तक कि स्नान करने के लिए पानी कहां था! सभी नौकर पुरुश थे... दूसरे शब्दों में सब कुछ मुझे ही करना था। मैं किसी भी व्यक्ति को नहीं जानती थी और मैंने अनुभव किया कि हममें बहुत कम समानता थी। मैं अपरिचित, अप्रीतिकर कमरे में बच्चो की तरह गृहासक्ति से इतना ग्रस्त हुई कि अंतत: मैं फूट-फूटकर रो पड़ी।  इससे मैंने हल्का अनभव किया और कुछ देर रोने के बाद मैं इल्या ल्वोविच के पास गयी और कहा कि वह मुझे करने के लिए कुछ काम दें। वह येलेना मिखाइलोव्ना के साथ बातचीत में डूबे हुए थे, और मेरा अनुरोध सुनते ही वे दोनों हंस पड़े थे।

''अभी-अभी आयी हो और कहती हो कि काम सौंप दिया जाये। इस समय करने के लिए कुछ भी नहीं है। ''

कुछ भी नहीं ? मैं निश्चित ही उदासीन दिखी होऊंगी, क्योंकि येलेना ने त्वरितता से कहा,''जब सपर का समय होगा तब मैं तुम्हें दूसरे गांव में 'सार्वजनिक भोज कक्ष' ले जाऊंगी. तब तक आराम करो।''

इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता था कि मैं शाम तक प्रतीक्षा करती।

कार्यारंभ

पहला 'सार्वजनिक भोज कक्ष' मैंने देखा. उसने मुझपर बहुत अधिक प्रभाव डाला।  यह भी एक 'ब्लैक हीटेट' झोपड़ी में स्थापित था। उस जिले की अधिकांश झोपड़ियां उसी प्रकार की थीं। उनके अंदर मैं पहले कभी नहीं गई थी। मुझे वह घिनावनी और अंधकारपूर्ण मिली। धुंए से जिसकी दीवारें काली हो गयी थीं। यह छोटी और धुंए की बदबू और लोंगो से भरी हुई थी।

झुककर नमस्कार करते हुए हमारा स्वागत किया गया, और कोयले की भांति काली दाढ़ी,काली आंखों और अत्यंत प्रसन्न चेहरे वाला एक युवक  स्वदिश्ट काली ब्रेड,जो ओवन से ताजी निकली होने के कारण अभी भी गर्म थी, से भरी टोकरी हमारे पास लेकर आया। हमने ब्रेड और सूप का परीक्षण किया, जिसे सभी हमारे लिए लेकर रुके हुए थे। हमने उसी के चम्मच से उसका स्वाद लिया। अब सभी लोग बैठ गये थे। गर्म धुंआयी छोटी झोपड़ी के अंदर सुखद हवा आयी। घर की मालकिन देखने में बहुत ही सौम्य, विनम्र और शिश्ट थी कि जब हम विदा होने लगे हमें अफसोस हुआ।

वापस लौटते समय मैंने अपने साथी से कहा कि मालिक लोग बहुत खुशमिजाज प्रतीत होते हैं।

''हां'' उन्होंने उत्तर दिया, ''लेकिन अपने सौम्य स्वभाव के बावजूद वह तेज है।''

मेरे लिए, जिसके सद्भाव विस्तार का पहला अनुभव था, इन शब्दों का अधिक अर्थ न था।

अगले दिन मैंने पाया कि मेरे करने के लिए कुछ था। एक पड़ोसी गांव गाई (ळंप) में 'सार्वजनिक
भोज कक्ष' को लेकर कुछ भ्रम उत्पन्न हो गया था और इल्या ल्वोविच ने येलेना मिखाइलोव्ना से कहा कि किसी को उसे देखने जाना है, लेकिन भेजे जाने के लिए कोई नहीं था। मैंने सुना और अपनी सेवा प्रस्तुत की।

''लेकिन तुमने अभी तक काम को समझा नहीं है। और तुम्हे बिना ड्राइवर के जाना होगा। हमारे पास कोई अतिरिक्त व्यक्ति नहीं है।''

मैंने उनसे कहा कि मुझे रास्ता दिखा दें और बोली कि पूछती हुई मैं रास्ता पा लूंगी। जहां तक स्लेज का प्रश्न है, मैं स्वयं उसे हांक लूंगी।

इल्या ल्वोविच ने मेरा प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। उन्होंने एक बड़ी स्लेज पर घोड़े जोते। इस प्रकार की स्लेज पर मैंने कभी यात्रा नहीं की थी। मुझे बैठने की सुविधाजनक स्थिति नहीं मिली, लेकिन इससे मैं चिन्तित नहीं हुई। मैंने खड़े होकर घोड़ों को हांका।

संध्या उतर रही थी और हल्की हवा बहने लगी थी। गांव नजदीक था और मुझे किंचित भी संदेह नहीं था, बल्कि विश्वास था कि मैंने जिस कार्य का भार अपने पर लिया था उसे पूरा कर सकूंगी।

जल्दी ही मैं पहुंच गई और 'सार्वजनिक भोज कक्ष' भी मुझे मिल गया, जहां लोग रात के भोजन के लिए एकत्रित थे। इस पहले स्वतंत्र कार्य ने सच मुझे आनंददायक क्षण प्रदान किए। यहां भीड़-भाड़ वाली झोपड़ी में मैंने तत्काल घर जैसा महसूस किया। सच, पहले वे जो बोले मैं बहुत कम समझ पायी, लेकिन फिर जो कहा गया उसे मैंने ध्यानपूर्वक सुना, फिर उनके साथ मामले पर विचार-विमर्श किया। जब वहां से चली मैं प्रसन्न और संतुश्ट थी।

जब मैं वापस लौटी अंधेरा हो गया था।  मैंने पाया कि सभी मेरे लिए चिन्तित थे, और एक सज्जन ने, जो मेरी अनुपस्थिति में आए थे अपने कोचवान को मुझे देखने के लिए भेजा था। नि:संदेह मार्ग के खराब ज्ञान के कारण मैं उसे भूल गयी थी।

अगले कुछ दिनों के दौरान मैंने येलेना मिखाइलोव्ना की उनकी दवाओं के काम में सहायता की। परिश्रमपूर्वक पाउडर मापती जिसे कफ पीड़ित बच्चों को दिया जाता जो बड़ी संख्या में घर के हॉल में इलाज के लिए आते थे।

क्या करना है यह मैंने थोड़ा-थोड़ा सीख लिया। मुझे वे छोटे कार्य याद नहीं जो मैंने किये थे, क्योंकि सब कुछ शायद उस समय इतना अनिश्चित था और मुझे किसी ऐसे बड़े कार्य के लिए बुलाया भी नहीं गया था जो कोई बड़ा प्रभाव छोड़ता। हम दोस्ताना और सहयोगी भाव से कार्य कर रहे थे। येलेना मिखाइलोव्ना अथक मरीजों का इलाज करती थीं। मैं कभी-कभी बुलाने पर उनके साथ जाती थी और उनकी सहायता करने का प्रयत्न करती थी।

उस समय लगभग सत्तर अथवा अस्सी 'सार्वजनिक भोज कक्ष' थे, लेकिन उनमें से कुछ दूर-दराज गांवों में थे और दूसरे सहायकों द्वारा संचालित थे, जिनसे मैं अब तक नहीं मिली थी। 'सार्वजनिक भोज कक्षों' की योजना सबसे पहले तोल्स्तोय द्वारा नहीं चलायी गयी थी, बल्कि उनके एक अच्छे मित्र इवान इवानोविच रायेव्स्की द्वारा चलायी गयी थी,जिन्होंने अपने निजी धन से पहले छ: 'सार्वजनिक भोज कक्ष' खोले थे, जिन्हें ''अनाथ आश्रम'' कहा जाता था। शरद ऋतु में तोल्स्तोय ने इस सम्पूर्ण क्षेत्र की, जो उस समय अकाल का केन्द्र था, स्वयं कार्य करने की वास्तविक स्थिति से परिचित होने के लिए यात्रा की थी, और अस्थायीरूप से मकान लेने का निर्णय किया था। तथापि, वह यह सब नवम्बर के प्रारंभ में कर पाने में सफल हो पाये थे,जब इस क्षेत्र के समाचार अधिक से अधिक भयप्रद हो गये थे। वह और उनकी दो बेटियां साफिया  अन्देयेव्ना द्वारा  दिया गया धन लेकर पीड़ितों को भोजन करवाने और देने हेतु ''ईश्वर की इच्छा की पूर्ति'', जैसा कि वह कहते थे,  इवान इवानोविच  रायेव्स्की के यहां पहुँचे थे।

तेल्स्तोय के पहुंचने के बाद जल्दी ही रायेव्स्की गंभीर रूप से बीमार हुए थे और सब कुछ निकोलायेविच तोल्स्तोय के हाथें सौंपकर मर गये थे, जिन्होने योजना को तब तक आगे बढ़ाया था जब तक वह बहुत बड़े आयाम तक नहीं पहुंच  गयी थी। सोफिया अन्दे्रयेव्ना ने तब सहायतार्थ एक अपील लिखी थी जो रस्कीये वेदोमोस्ती ;त्नेपलम टमकवउवेजपद्ध में प्रकाशित हुई जिससे पैसे, आनाज और कपड़ों के दान की बाढ़ आ गयी थी।

जमींदार के पड़ोसी फिलोसोफोव परिवार ने इसीप्रकार की योजना हाथ में ली, लेकिन बहुत ही छोटे स्तर पर। जब मैं पहले गांव में पहुंची मुझे एक बहुत युवा लेकिन ओजस्वी और समर्थ लड़की नतालिया इवानोव्ना मिली, जो अपनी जागीर में रहती थी।  मैंने जल्दी ही उससे परिचय कर लिया। वह एक छोटे-से घर में अकेली रहती थी जहां क्रमशः हम जो पीड़ितों की सहायता के लिए वहां एकत्रित हुए थे लगातार इकट्ठा होते थे। मैं अचंभित थी कि वह बिल्कुल अकेली रहती थी, लेकिन बाद में पता चला कि जागीर का नौकर उसका समर्पित सहायक था।

एक सुहावनी सुबह अधिक दूर जिलों में काम करने वाले स्वयंसेवक हमारे घर आये और मुझे यह जानकर आश्चर्य और प्रसन्नता हुई कि उनके साथ एक उम्रदराज मित्र, एम.ए. नावोसेलोव थे। मैं उन्हें बचपन से जानती थी, और मेरे लिए, जो अपने, नये परिचितों के साथ अकेला अनुभव करती थी, एक परिचित चेहरा देख सुखद लगा था।

''हमारी शांत नन्हीं मित्र कैसी इतरा रही है !'' येलेना मिखाइलोव्ना चिल्लायी , ''देखो इसकी आंखें कैसी चमक रही हैं ? '' उस क्षण से मैं अपने सहयागियों के साथ अधिक सहज हो गयी थी और हमारे संबन्ध निकटतम हो गये थे।

और इस प्रकार, तोल्स्तोय के पहुंचने से पहले मैंने बेगीचेव्का में दो सप्ताह व्यतीत किये। जो कुछ करना था, वह सीख लिया था और अपने सहयागियों के साथ घर जैसा अनुभव करने लगी थी।

तोल्स्तोय का आगमन
कार्य का संघटन और कपड़ों का वितरण

जनवरी के अंत में हमें बताया गया कि दूसरे तोल्स्तोय पहुंचने वाले थे। इस समय तक इल्याल्वोविच अपनी पत्नी और परिवार के लिए गृहासक्त हो चुके थे और यह उनके वापस जाने के लिए सुखद अवसर था। लेकिन शेश हम इस समाचार से व्यग्र थे।  नि:संदेह इसका अर्थ था कि हमें निश्चित ही अपने जीवन के रंग-ढंग बदलने थे और अधिक गंभीर होना था। इल्या ल्वोविच कुछ उदासीन थे। उन्होंने येलेना मिखाइलोव्ना से मजाकिया स्वर में कहा कि वह उनकी रोवान शराब की बोतल अपनी दवाओं के बीच छुपा दें। वह उन पर हंसी और उनसे पूछा कि वह बताएं कि उनके पिता को क्या पसंद था। मुझे ध्यान नहीं कि किस परिवर्तन की हम अपेक्षा कर रहे थे, लेकिन में बिल्कुल कुछ नहीं चाहती थी। मुझे अपने मित्रवत कामों में व्यवधान और खाली समय में हमने जो अच्छा वक्त बिताया था उसके छूट जाने का अफसोस हो रहा था।

अंतत: वे पहुंच गये। सोफिया अंद्रेयेव्ना अपने पति और बेटियों के साथ आयीं। मैं अत्यधिक संकुचित थी कि मैंने लेव निकालायेविच की ओर नहीं देखा। लेकिन मारिया ल्वोव्ना आश्चर्यजनक रूप से भली थीं। - कृपालु और उत्साही और जो कार्य हम कर रहे थे उसकी अनिवार्यता और महत्व को समझनेवाली थीं। मैंने इस बार उन्हें मास्को में मिलने की अपेक्षा अधिक पसंद किया। अत्यंत सहानुभूति के साथ उन्होंने जानना चाहा कि मेरा कार्य कैसा चल रहा था और क्या काम में मुझे कोई परेशानी है। मैंने तत्काल अनुभव किया कि वहां कोई अच्छा और सच्चा मित्र था।

तेल्स्तोय के पहुंचने के बाद हमारा कार्य सुव्यवस्थित ढंग से होने लगा था। प्रतिदिन सुबह सात बजे से पहले हम उठ जाते थे। उस समय तक हाल में अर्जीदारों की भीड़ एकत्रित हो जाती थी। यदि हमें उठने में विलंब होता लेव निकोलायेविच हमारे दरवाजे खटखटा देते थे। हमारी सुबह उन अर्जीदारों के आवेदन सुनते हुए व्यतीत होती थी। बाद में हममें  से एक ड्यूटी छोडकर घर चला जाता। शेश लेव निकोलायेविच के निर्देश पाकर गांवों में घूमने जाते। उन्हें काम के प्रत्येक पक्ष से अवगत करवाना होता। हमें छोटी-छोटी बातें याद रखनी होतीं, और हमारे लिए यह जानना आवश्यक होता कि हमें कहां जाना चाहिए और क्या करना चाहिए। लेकिन हॉल में होने वाला साक्षात्कार सदैव उन्हें अशांत कर देता और हमारा प्रयत्न होता कि हम उन्हें उनके वहां पहुंचने से पहले समाप्त कर दें जिससे वह सुबह का समय शांतिपूर्वक अपने लेखन को दे सकें।  जब हम ऐसा कर पाने में सफल होते वह अच्छा अनुभव करते थे क्योंकि वह बहुत सुबह उठ जाते थे और किसानों का प्रतीक्षा करना उन्हें बर्दाश्त नहीं होता था।

वास्तविकता यह थी कि हॉल का साक्षात्कार हमारे कार्य का सबसे निराशाजनक पक्ष था। बहुत सुबह से ही हॉल हर प्रकार के आवेदकों से ठसाठस भर जाता था। चीजों की तह तक पहुंचना बहुत कठिन होता था। हमें गांवों में हर मामले की अलग से जांच करने के लिए जाना पड़ता था। अपने निवेदनों के प्रभाव को भावानात्मक चरम तक पहुंचाने के लिए किसान नाटकीय दृश्य का सहारा लेते थे। लेव निकोलायेविच उनका अपने सामने घुटनों के बल गिरने से निरंतर अवमानित अनुभव करते थे। एक दिन जब एक किसान ने ऐसा किया लेव निकोलायेविच भी उसके बगल में घुटनों के बल झुक गये।

''बहुत अच्छा, यदि आपको यह उचित लगता है तब हम इसी प्रकार बात करेंगे।'' उसके बाद घबड़ाकर वह किसान उठ खड़ा हुआ था।  
      
एक बार एक महिला उनके सामने दण्डवत पड़ गयी और इसप्रकार अण्ड-बण्ड बोलती हुई विलाप करने लगी कि लेव निकोलायेविच उसका अनुरोध समझने में असमर्थ रहे। ज्ञात हुआ कि वह उनसे कह रही थी कि उसके बेटे का नाम उस सूची से हटा दिया जाये जिन्हें सार्वजनिक भोजन कक्ष में भोजन करवाया जाता था। लेव निकोलायेविच अत्यधिक आश्चर्यचकित हुए. अधिकांश अनुरोध इसके विपरीत होते थे।

''मेरा अविस्मरणीय प्राण खो जायेगा.`` महिला बोली, ''घर में हमारे खाने के लिए कुछ भी नहीं है लेकिन तब भी मैं अपने बच्चे को शैतान के लिए कुर्बान नहीं करूंगी।``

मामला यह था कि पादरी अपने इलाकों में जाकर लोंगो को चेतावनी दे रहे थे कि वे तोल्स्तोय की सहायता स्वीकार न करें क्योंकि वह शैतान के एजेण्ट हैं।

''तुम सोचो क्या शैतान विपत्ति के रूप में प्रकट हुआ है !`` वे कहते . ''ओह, नहीं. वह सहायता के रूप में भूखों को ब्रेड दान कर रहा हैं। लेकिन उनका दुर्भाग्य जो प्रलोभन के वशीभूत हो जाते है।``

निश्चित ही भूखों के लिए इस प्रलोभन का प्रतिरोध कठिन था, और इसप्रकार कुछ ही थे जो उस स्त्री के दृश्टांत का अनुगमन करते थे। इसके अतिरिक्त लोग वास्तव में अपने पादरी की बात पर विश्वास नहीं करते थे। लेकिन इस प्रकार की बहुत-सी बात की जा रही थीं। बहुत से स्थानों में हमने स्वयं बच्चों को शैतान कहते सुना। किसानों का इस प्रकार का व्यवहार वास्तविक खतरा प्रस्तुत करता था क्योंकि हम अकेले और असुरक्षित गांव-गांव घूमते थे।

हमारे कमरों की धूल और अव्यवस्था देखकर सोफिया अन्द्रेयेव्ना दुखी थीं। सबसे पहला काम उन्होंने यह किया कि घर को विशिश्ट ऊर्जा के साथ सुव्यवस्थित किया। उन्होंने स्वयं फर्श की सफाई की और फर्नीचर की धूल झाड़ी। मेज पर साफ कपड़ा नजर आया। सामान्य बात यह कि हम अपने बीच एक कठोर गृहणी से परिचित हुए। उसके बाद उन्होंने कोशागार की ओर ध्यान दिया अब तक जिसकी येलेना मिखाइलोव्ना इंचार्ज थीं। सोफिया अन्द्रेयेव्ना ने हमारे भण्डार गृहों का परीक्षण किया और उन्हें हर प्रकार के कपड़ों, पोशाकों और लिनेन का ढेर मिला, जिन्हें वितरित किया जाना था। अपने वर्तमान स्वरूप में उनमें से अधिकांश किसानों के प्रयोग के लिए अनुपयुक्त थे। बच्चों के लिए बुनी हुई उत्तम कोटि की चीजों का गट्ठर था, लेकिन वे कपड़े गांव के बच्चों के हिसाब से अधिक ही फैंसी थे। 

इन चीजों का वितरण इतना नाजुक कार्य था कि हम सभी उससे बचते थे। सबसे पहले तातान्या ल्वोव्ना ने इस काम को संभाला लेकिन इसने उन्हें इतनी अप्रियता प्रदान की कि उन्होंने उसके लिए जाने से इंकार कर दिया। एक बार उन्होंने पेनी गांव की दो या तीन स्त्रियों से कहा कि अगले दिन वे बच्चों के लिए कपड़े लेने घर आ जाएं। उससे पहले कि वह सुबह बिस्तर से उठ पातीं आहाता महिलाओं से भर चुका था। जिन महिलाओं से उन्होंने बात की थी उन्होंने अपनी सभी पड़ोसिनों को इस विशय में बता दिया था, और गांव की सभी महिलाएं हिस्सेदारी के लिए वहां आ गयी थीं। ''हम सभी पेन्की से हैं।`` वे चीखी थीं, ''हमने सुना कि  कपड़े दिये जाने हैं।``

जब उन्होने चीजें देखीं उनकी आंखें चमक उठीं। उन्होंने उससे पहले उतनी सुन्दत चीजें कभी नहीं देखी थीं। ऐसे प्रलोभन का वे कैसे विरोध करतीं ?

मुझे, स्वयं, नयी होने के कारण, इस कार्य के अप्रिय पक्ष का अनुभव नहीं था, और जब मारिया  ल्वोव्ना ने निश्चय ही कपड़ों के वितरण का कुछ भी कार्य करने से इंकार कर दिया और सोफिया अन्द्रेयेव्ना ने मुझे उनकी सहायता के लिए कहा, मैने खुशी से सहमति दे दी। जल्दी ही मुझे पछतावा हुआ। एक दिन मैं और मारिया ल्वोव्ना दूर के एक गांव गये जहां हम एक नया सार्वजनिक भोज कक्ष खोलने की तैयारी कर रहे थे। मैंने कुछ चीजें, अधिकांश बच्चों के कपड़े, अपने साथ ले लिए। जब हम वहां पहुंचे, हम एक-दूसरे से अलग हो गये। हम दोनों आधे गांव का सर्वेक्षण करते थे जिससे जनसंख्या गणना कर सकें। मैंने अपना आधा सर्वेक्षण समाप्त कर लिया और जरूरतमन्द लोगों को कपड़े देने के लिए मैं मारिया ल्वोव्ना की प्रतीक्षा कर रही थी। बहुत ही कम चीजें मैंने स्लेज से लीं, और उनके साथ पहली झोपड़ी में प्रविश्ट हुई तभी स्लेज को भीड़ ने घेर लिया। इसने बिना देखे मेरे और जिसे मैं उपयुक्त समझकर चीजें बांटती उसे असंभव बना दिया। भीड़ की आंखें क्षुधित भाव से मेरी छोटी-सी आपूर्ति पर टिकी हुई थीं। हर चेहरे पर कुछ दिये जाने की तीव्र उत्कंठा थी। पुरुश भी उतने ही लालची थे जितनी महिलाएं और सभी मुझे बता रहे थे कि मुझे क्या करना चाहिए। मेरा दिमाग परेशान हो उठा। मैं अपना  सुविचारित उद्देश्य भूल गयी । मैंने अनुभव किया कि मैं भीड़ की दया पर निर्भर थी और वहीं पूरी तरह परेशान खड़ी थी। उसी समय मेरे बचाव के लिए मारिया ल्वोव्ना आयीं। उन्होंने तेजी से सभी कपड़े फेंक दिये और जितनी तेजी से संभव था हम वहां से भाग खड़े हुए थे।

ठण्ड की एक खूबसूरत शाम थी। पूरा चांद आकाश में लटक रहा था, लेकिन मेरा ह्रदय कुछ भयानक गलती करने के निराशाजनक भाव से भरा हुआ था।  मानिया ल्वोव्ना ने मेरे भाव को समझा और अनोखी व्यवहारशीलता दिखाई। उसके बाद मैंने भी कपड़ों के वितरण संबन्धी कुछ भी कार्य, आवश्यक स्थिति के अतिरिक्त, करने से इंकार कर दिया। यह आवश्यकता तब तक उत्पन्न नहीं हुई जब तक सोफिया अन्द्रेयेव्ना हमारे साथ रहीं। उन्होंने गांव के दर्जियों को बुलाया, उनसे गर्म कपड़ों को कटवाकर किसानों के छोटे बच्चों के लिए कोट बनवाये और यह खयाल रखा कि जाड़ा प्रारंभ होने से पहले ही वे तैयार हो जायें। उन्होंने स्वयं कपड़ा काटने के कार्य का ठण्ड में बिना कमरा गर्माये निरंतर दिनोंदिन निरीक्षण किया। उन्होंने जो ऊर्जा दिखायी उसने मुझे आश्चर्यचकित किया।बहुत जल्दी बड़ी संख्या में छोटे बच्चे नये कोटों में इठलाने लगे थे।

बर्फानी तूफान और तोल्स्तोय परिवार के साथ मेरी घनिश्ठता   

जब तोल्स्तोय परिवार आया मैं लेव निकोलायेविच से बचती रही और इस वास्तविकता को छुपाया भी नहीं कि मैं उनके विचारों और दृढ़ -धारणाओं में हिस्सेदार नहीं थी। स्थिति असामान्य थी, क्योंकि जहां जक मुझे याद है कि उस समय उनके साथ आकर रहने और काम करने वाले वे ही लोग थे जो उनके विचारों के प्रति सहानुभूति रखते थे। उनके साथ बातचीत करने से बचने का एक अन्य कारण यह था कि मैं अत्यधिक संकोची और अल्पभाशी थी। अपने विचारों और भावों को किसी को बतलाना मेरी आदत नहीं थी।

एक बार जब मैं लेव निकोलायेविच के लिए कॉफी तैयार कर रही थी उन्हें निश्चय ही अचानक यह जिज्ञासा हुई कि बंद मुंह वाली यह कौन छोटा-जीव उनके साथ काम कर रहा था। उन्होंने मूझसे मेरे विचारों के विशय में प्रश्न करने प्रारंभ कर दिये। मैं सोचती हूं कि उन्हें यह जान लेने की आशा थी कि मैं साधारण धार्मिक विचार रखती थी। मैं उन्हें उत्तर देने की इच्छुक न थी, लेकिन जब लेव निकोलायेविच अपने मस्तिश्क में यह तय कर लेते कि उन्हें कुछ हासिल करना ही है तब निश्चित ही वह वैसा कर लेते थे। उनके साथ यह  मेरी पहली गंभीर वार्तालाप थी। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि मेरे विचार क्या थे वह प्रसन्नतापूर्वक मुस्काराये और बोले -

''मैं जानता हूं, मैं जानता हूं, मिखाइलोव्स्की, भोल्गुनोव, तिमिर्याजेशव, और  ऐसे ही लोंगो की अनुयायी।``

उन्होंने पूछा मैंने क्या पढ़ा था। मैंने उन्हें बताया। उस समय तक मैं इतिहास, दर्शन और साहित्य में बहुत कुछ पढ़ चुकी थी।

''तुमने कांट; ज्ञंदजद्ध  को पढ़ा?`` उन्होंने पूछा.

''नहीं।``

'' शौपेनहॉवर ;शैबीवचमदींशूतद्ध ।``

''नहीं।``

''इन महान लोगो की ओर ध्यान  कैसे नहीं दिया, दर्शन के ये स्तंभ हैं ?``

मेंने उन्हें इसलिए नहीं पढ़ा था, क्योंकि वे उस ग्रुप में प्रसिद्ध नहीं थे जिसमें मेरा उठना-बैठना था। लेकिन अब मैंने यह अनुभव किया कि मेरे द्वारा यह एक गंभीर त्रुटि थी और निर्णय किया कि जैसे ही संभव होगा वह सब पढ़ना है लेव निकोलायेविच जिसकी सलाह देंगे।

मेरा विचार था कि इस बातचीत के बाद तोल्स्तोय मेरी ओर अधिक ध्यान देने लगे थे और इससे मैं पहले की अपेक्षा अधिक संकोची हो गयी थी। उसके बाद एक छोटी-सी घटना घटित हुई जो तुरंत हमें एक-दूसरे के निकट ले आयी और तोल्स्तोय परिवार के साथ जीवन-पर्यंत के लिए मैं जुड़ गयी थी।

जैसा कि मैंने पहले ही कहा, प्रत्येक सुबह तोल्स्तोय से इस बात की सलाह लेना हमारी आदत थी कि हमें कहां जाना है! वह सदैव हमें बताते और हमारे काम तय करते-- कभी-कभी कठिन कार्य। जिस दिन की बात हैं, उस दिन उन्होंने रिखेशत्का नदी के साथ के कई गांवों में जाने के लिए कहा, जो घर से लगभग अठारह वर्स्ट्स दूर थे। हम नदजीक गांवों में गये थे और मार्ग जानते थे, लेकिन दूर के गांवों की यात्रा हमने नहीं की थी। इसके अतिरिक्त ठण्ड भी थी। मैंने फर-कोट, जिसे मैं मास्कों में पहनती थी ( लेव निकोलायेविच इसे मेरा किमोनो  (जापानी चोगा) कहते थे, फर की टोपी और मफलर पहना हुआ था। एक शब्द में, शहर में अपने को गर्म रखने के पर्याप्त कपड़े थे, लेकिन जिस यात्रा में मुझे जाना था, वह लंबी थी और मैं अकेली बिना ड्राइवर के जा रही थी। लेव तोल्स्तोय की भतीजी ने अपना लबादा मेरे कोट पर डाल दिया था।

मैंने प्रस्थान किया। पहले सब ठीक-ठाक रहा, लेकिन शाम के समय हवा चलने लगी। मौसम बदल रहा है यह न जानते हुए मैं बहादुरों की भांति चलती रही...... विशेशरूप से जब चलना आसान था, हवा मेरे साथ साथ चलती रही। रास्ता भटकने का कोई खतरा नहीं था, क्योंकि मैं नदी के साथ-साथ चल रही थी। अंतत: मैं एक गांव में पहुंची जहां मैं पहले कभी नहीं गयी थी। यह जबोरोव्का नामक गांव था जो हमारे घर से लगभग पन्द्रह वर्स्ट्स दूर था। इस समय तक हवा के साथ बर्फ पड़ने लगी थी। अंधेरा घिर आया था। मुझे  सुस्पश्ट हो गया कि जो काम मेरे लिए निर्धारित किया गया था उसे मैं पूरा नहीं कर सकती और दुखपूर्वक मैंने घर वापस लौटने का निर्णय किया। लेकिन जब किसानों को मेरा इरादा ज्ञात हुआ वे भयभीत हो उठे।  उन्होंने मुझे विश्वास दिलाया कि इस प्रकार के मौसम में इतनी दूर जाना कठिन ही नहीं बल्कि असंभव होगा।

''ऐसे झंझावात में तुम्हे जाने देना अपराध होगा। रात हमारे साथ रुक लो।``

मैं अपरिचित गांव में रात नहीं बिताना चाहती थी, विशेशरूप से तब जब मैं जानती थी कि घर में लोग मेरे लिए चिन्तित होगें। अभी देर नहीं हुई थी ।  मेरे पास पर्याप्त समय था। अचानक मुझे याद आया कि अंद्रेयेव्का गांव में, जो वहां से पांच वर्स्टस दूर था, मेरा मित्र  नावोसेलेव गास्तेव के साथ रह रहा था। वह पहला व्यक्ति था जिससे बेगीचेव्का पहुँचने पर मैं मिली थी। ग्रामीणें ने मेरे अंद्रेयेव्का जाने का विरोध नहीं किया, क्योंकि वह बहुत निकट था और उसी दिशा में था जिधर को हवा बह रही थी। मैंने सोचा कि रास्ते में मैं अपने कुछ अपूर्ण कार्य कर सकती हूं। लेकिन मैं अगले गांव पहुंचती उससे पहले ही बर्फानी तूफान पूरी ताकत से मुझ पर टूट पड़ा । मुझे गांव मिल गया, लेकिन मेरे सामने जो काम था उसके कारण मुझे जल्दी से अगले गांव पहुंचना था। सड़क अच्छी थी,  घोड़े अच्छी गति से चल रहे थे, लेकिन बर्फ ने निश्चय ही सब कुछ नश्ट कर दिया था। कम दिखाई देने के कादण मैं सड़क की झलक पाने के लिए स्लेज पर खड़ी हो गयी थी। मेरी कैप हवा में फड़फड़ा रही थी, जिससे घोड़े भयभीत हो रहे थे। मेरे हाथ जमकर सख्त हो गये थे, लेकिन मैं वास्तविक खतरे को भांप नहीं पायी। प्रतीत हुआ कि हम दो सफेद दीवारों के बीच चल रहे थे। घोड़े सहज-बोध से सड़क जान पा रहे थे। वे डरे हुए लगे। एक बार हम सड़क से भटक गये और अपने को एक फार्म हाउस में पाया। वहां उन्होंने हमे दिशा बतायी और हम पुन: सही चलने लगे थे। उन कुछ वर्स्टस को तय करने में पर्याप्त लंबा समय लगा, क्योंकि जब हम अंद्रेयेव्का के समीपस्थ गांव इस्लेन्येवो पहुँचे पूरी तरह से अंधेरा हो गया था। वहां भी उन लोंगो ने वहीं रात ठहरने के लिए कहा लेकिन मेरा गंतव्य आधा वर्स्ट्स दूर रह गया था और इतने प्रयासों के बाद वहां न पहुंचना दुखद होता। सौभाग्य से ग्रामीणें ने मेरे साथ दिशा निर्देश के लिए एक लड़के को कर दिया अन्यथा उस बर्फानी तूफान में सड़क की उस कठिन दूरी में मैं भटक जाती । इस प्रकार मैं अपने गंतव्य तक पहुच गयी। मैं अभी भी घर लौट जाने के विशय में सोच रही थी। मेरा किचिंत भी इरादा अंद्रेयेव्का में ठहरने का नहीं था।

घर में केवल गास्तेव मुझे मिले. वह और नोवोसेलोव स्वर्णकार के साथ रहते थे, जिसकी सम्पन्नता इस बात से स्पश्ट थी कि घर में लकड़ी की फर्शवाला एक अतिरिक्त कमरा उसके पास था और एक समोवार भी था। मुझे भोजन और पेय और मेरे घोडों को चारा दिया गया। तब तक रात हो गयी थी। अपने आतिथेय को आश्चर्यचकित करते हुए मैंने घर जाने के अपने इरादे की यह कहते हुए घोशणा की कि मुझे रास्ता पता है।  बर्फानी तूफान का प्रकोप अभी तक जारी था। लेकिन शहरवासी, जो कि मैं थी, को होने वाले खतरे का भान नहीं था। मैं इस विचार से अधिक ही परेशान थी कि बेगीचेव्का में तोल्स्तोय मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। मुझे यकीन था कि उन्हें इस प्रकार व्याकुल करने के लिए सोफिया अंदयेव्ना मुझ पर क्रोधित होंगी। और गास्तेव के साथ मेरे रात बिताने पर वे क्या कहेंगे, लेकिन स्वर्णकार मेरे जाने की बात सुनने का तैयार नहीं था।

''क्यों, ऐसी रात में तुम गांव के अंतिम छोर तक नहीं जा सकती, फिर अकेली बीस वर्स्ट्स की यात्रा.......!`` चिड़चिड़ाता हुआ वह बोला. ''इसे अपना सौभाग्य समझना यदि मौसम कल जाने की अनुमति दे दे।.``

इसके अतिरिक्त अन्य उपाय नहीं था, सिवाय मेरे सोचने के, मुझे सुबह तक इंतजार करना था।

सुबह बहुत शानदार थी और गास्तेव  मेरे साथ वापस आये। मैं बहुत प्रसन्न थी क्योंकि मैं अपने को दोशी मान रही थी और सोफिया अंद्रेयेव्ना से सामना होने से भयभीत थी, जो अपने परिवार के हित के लिए चिन्तित और सावधान रहती थीं, विशेशरूप से उनकी मानसिक शांति के लिए। फिर मुझे याद आया कि वह कहीं जाना चाहती थीं और यह सोचकर हमें राहत मिली कि जब हम पहुंचेगे तब तक शायद वह जा चुकी होंगी।

बीच रास्ते में  स्लेजें हमारे बराबर आ पहुंची। उनकों हांक रहे कोचवानों ने प्रसन्नतापूर्वक हमें बधाई दी और कहा कि वे रातभर मुझे खोजते रहे थे। बेगीचेव्का के घर वालों ने इस भय से उन्हें भेजा था कि रास्ता भटक गयी होउंगी और बर्फ में जम जाने से मेरी मृत्यु हो जायेगी। इस समाचार ने मुझे भयानकरूप से अशांत कर दिया।

यह स्पश्ट था कि जितनी मैंने कल्पना की थी वे उससे कहीं अधिक चिन्तित थे। ग्रामीण जीवन के अभ्यस्त होने के कारण वे मेरे हालात के संकट को अधिक समझते थे। मारिया ल्वोव्ना ने मुझे बताया कि लेव निकोलायेविच रातभर सोये नहीं थे। मुझसे नाराज होने के बावजूद वह मुझसे हाथ खोलकर मिले। ''खोया हुआ यह रेवड़ का अत्यंत प्यारा मेमना है।`` खुशी से मुस्काराते हुए लेव निकोलायेविच ने कहा।

पता चला कि सोफिया अंदे्रयेव्ना के विशय में भी मेरा अनुमान गलत था। मैंने सोचा था कि स्वभाव से वह तटस्थ थी, लेकिन उन्होंने जोरदार ढंग से मुझे गले लगाया और जब मैंने कहा में अपेक्षा करती थी कि वह जा चुकी हागीं, वह बोलीं :

''यह जाने बिना कि तुम्हारे साथ क्या घटित हुआ, मैं कैसे जा सकती थी ?``

''पिछली रात हम लोगों की कैसी बीती, जीवन के कुछ वर्शों तक उसे हम भूल न पायेंगे,`` मारिया ल्वोव्ना ने कहा, लेकिन उनका स्वर सहज था और उसमें उपालंभ नहीं था।

इस अनुभव के बाद मैं पूरी तरह अपने को तोल्स्तोय परिवार का हिस्सा मानने लगी थी।
        
अगले दिन सोफिया अंद्रेयेव्ना बाहर चली गयीं। उन्होंने एक पत्र छोड़ा जिसमें उन्होंने कहा कि उनका ह्रदय और आत्मा बेगीचेव्का में ही बसते हैं। इस पत्र को पढ़ा जाता मैंने सुना और अनुभव किया कि सोफिया अंद्रेयेव्ना भी मुझे बहुत चाहती हैं और उनके प्रति मैं सहानुभूति से भर उठी थी।



तति चेवो के लिए स्थानातंरण

इसके तुरंत बाद मेरे लिए यह उचित था कि मैं 'स्टॉफ हेडक्वार्टर` , जैसा कि बेगीचेव्का के घर को कहा जाता था, छोड़ दूं, जो हमारे सभी कार्यों के लिए प्रशासनिक केन्द्र के रूप में कार्यरत था और जहां तोल्स्तोय परिवार रहता था. तात्याना ल्वोव्ना के पहुँचने के बाद मेरे बिना भी वहां पर्याप्त लोग थे जबकि क्षेत्र के दूसरे गांवों में काम करने वालों की आवश्यकता थी जो अधिक दूर-दराज में कार्यरत 'सार्वजनिक भोज कक्षों` पर दृश्टि रख सकते और संभव होने पर नये 'सार्वजनिक भोज कक्ष` खोल सकते। संयोग से यह पूरे वर्श संभव था, क्योंकि आने वाली प्रत्येक डाक से नये चंदे आते थे। हमारे पास इतना पैसा एकत्र हो गया  था कि हम उसे आनेवाले वर्श के लिए बचा सकते थे, जो इस वास्तविकता को देखते हुए सौभाग्य की बात थी कि आने वाले वर्श में कुछ जिलों में फसल नहीं होने की आशा थी। तति चेवो बेगीचेव्का से केवल पांच वर्स्ट्स था, जिसे मेरे नये निवास के लिए चुना गया था। निखेश्त्का नदी के साथ के सभी गांव यहां तक कि अंद्रेयेव्का भी अब मेरे अधीक्षण में था। मैं चौदह 'सार्वजनिक भोज कक्षों` की इंचार्ज थी। जो तति चेवो में थे वे मारिया ल्वोव्ना द्वारा खोले गये थे। (लेव निकोलायेविच ने अपने आलेख ''मीन्स ऑफ एडिगं दि पापुलेशन इन दि फेमिन एरिया`` में इसका वर्णन किया है)। मारिया ल्वोव्ना तति चेवो के लोगों को भलीभांति जानती थीं और मेरे साथ जाने का उनका उद्देश्य लोगों से मेरा परिचय करवाने में सहायता करना और काम को नियंत्रित करना था।

तति चेवो एक बड़ा गांव था (सौ से अधिक घरों वाला) जो दो भागों में बटा हुआ, पुराना और नया। चर्च और पुरोहितवर्ग के मकान पुराने थे। प्राय: हम अपने 'सार्वजनिक भोज कक्ष` गरीब लोगों की झोपड़ी में खोलते थे जहां पर बहुत-से बच्चे होते जिससे मकान मालिक को उसके श्रम के बदले पूरे परिवार को भोजन मिल जाता था और झोपड़ी गर्म रहती थी। दिमाग में इन बातों को ध्यान में रखते हए ग्रामीण स्वयं 'सार्वजनिक भोज कक्ष` के लिए झोपड़ी का चयन करते थे, और इस प्रकार वह मुझे स्पश्ट करते कि उन्हें किस पर विश्वास था और किसकी झोपड़ी में वे जाने को तैयार थे। एक बार हमें अपना मकान बदलना आवश्यक  हो गया था क्योंकि किसानों ने मकान मालिक के फूहड़पन और उसकी पत्नी के बड़बड़ाने का विरोध किया था।

दूरस्थ गांवों की स्थिति

कार्यवश बेगीचेव्का आने या तोल्स्तोय से मिलने आने पर मुझसे कभी-कभी एक-दो दिन ठहरकर अतिरिक्त काम में सहायता के लिए कहा जाता अथवा विशेश कार्य से कहीं दूर जाने के लिए कहा जाता। ऐसा करते हुए मैंने उन सभी शहरों की यात्राएं कीं जहां हम काम कर रहे थे और हेडक्वार्टर से बहुत दूर नये 'सार्वजनिक भोज कक्ष` खोले। एक बार रेड क्रास द्वारा संचालित 'सार्वजनिक भोज कक्ष` में जाने का मुझे अवसर मिला। यह कैसे हुआं! लेव निकोलायेविच ने मुझे दोन नदी के किनारे गांवों में स्थित 'सार्वजनिक भोज कक्षों` में यह संकेत दिए बिना भेजा कि किसमें जाना था।  उनका अनुमान था कि मैं जानती थी कि किसमें जाना था। मुझे यह जानकारी नहीं थी कि उनमें से कुछ रेड क्रास द्वारा संचालित थे, मैं  सभी में गयी। रेडक्रास केन्द्र के लागों ने भोजन की शिकायत की। उन्हें खाने में बाकला और मसूर दिया जा रहा था, किसान जिसके अनभ्यस्त थे और जिससे वे बीमार पड़ रहे थे। उन्होंने अनुरोध किया कि उन्हें मेरे 'सार्वजनिक भोज कक्ष` में स्थानातंरित किया जाये जहां पर खाना अच्छा और प्रचुर मात्रा में मिलता था।

वसंत के आगमन के साथ क्षेत्र के बाह्यांचल में हमारे द्वारा संचालित 'सार्वजनिक भोज कक्षों` वाले गांवों में टाइफाइड की महामारी फैलने लगी। हमने महामारी को शांत करने वाला भोजन भेजा और वह समाप्त भी हो गयी। नि:संदेह जिसने यह सिद्ध कर दिया कि ऐसी अपेक्षाकृत थोड़ी सहायता ने अनेकों जिन्दगी बचा ली थी।

इसका वर्णन असंभव था। गांवों में गरीब लोगों के लिए जो भोजन सामग्री आपूर्ति होती ऐसा प्रतीत होता मानों ईश्वर और मनुश्यों ने उसका परित्याग कर दिया था। मैं उनके एहसानमंदी से अभिभूत थी जब मुझे पहली बार अकाल प्रभावित गांव में 'सार्वजनिक भोज कक्ष` खोलने का सौभाग्य मिला। गांव था येकातेरिनोव्का। वहां भयानकरूप से टायफाइड महामारी फैली थी। जब मैं पहुँची वह कम हो गयी थी।  बहुत-से लोंगों की मृत्यु हो गयी थी और लोग निराशा का शिकार थे। उन्होंने अपने उद्धारक के रूप में मेरा स्वागत किया। महिलाएं रो रही थीं और छाती पर क्रास बना रही थीं।

''हमने सोचा ईश्वर खुद ही हमें भूल गया है।`` वे बोले ''हर दिन एक और अंत्येश्टि यहां तक कि दो होतीं थीं।``

भारी ह्रदय से मैंने येकातेरिनोव्का गांव छाड़ा था। इसके अतिरिक्त महामारी से हुई मौतों के कारण गांव की कंगाली वर्णनातीत थी।

बेगीचेव्का लौटकर मैंने उन्हें महामारी के विशय में बताया, जिसे किसीने नहीं सुना। मैंने मारिया ल्वोव्ना से कहा कि वह सोफिया अंद्रेयेव्ना से नहीं कहें । मैं नहीं चाहती थी कि उनमें अतिरिक्त चिन्ता उत्पन्न हो। लेकिन मारिया ल्वोव्ना उन्हें बताने से अपने को रोक नहीं पायी, परिणामस्वरूप सोफिया अंद्रेयेव्ना ने अनेक बार मुझे न केवल अपनी जिन्दगी जोखिम में डालने बल्कि दूसरे को भी खतरे में डालने के लिए फटकारा। मैंने, फिर भी, अपने को दोशी नहीं माना, क्योंकि जब मैं वहां गयी मुझे महामारी की जानकारी नहीं थी।

लेव निकोलायेविच देख रहे थे कि जहां भी हमने 'सार्वजनिक भोज कक्ष` खोले थे महामारी कम हुई थी। वास्तव में र्याजान गुबेर्निया में टायफायड के मामलों की संख्या दूसरे अकाल पीड़ित क्षेत्रों की अपेक्षा कुछ भी नहीं थी।

बेगीचेव्का वापसी और सर्दी में वहां का जीवन

डस समय सीनियर डाक्टर टायफायड से सख्त बीमार होकर लगभाग मरणासन्न हो गया था।
येलेना मिखाइलोव्ना, जो उसके और उसके परिवार के प्रति अत्यधिक आसक्त थीं उसकी देखभाल के लिए चली गयी थीं। और इस प्रकार मुझे तति चेवो छोड़कर उनका स्थान ग्रहण करने के लिए बेगीचेव्का लौटना पड़ा था। वहां बहुत अधिक काम था और हेडक्वार्टर में कुछ लोग ही करने वाले थे।

बेगीचेव्का के अपने जीवन के उस दौर में मैं मारिया ल्वोव्ना के प्रति बहुत स्नेहशील हो गयी थी। अधिकांशतया घर में हम तीन ही होते थे। लेव निकोलायेविच , मारिया ल्वोव्ना और मैं। कुछ हफ्ते हमने जिसे आत्मीय भाव से व्यतीत किये थे उसकी स्मृतियां मेरे जीवन की अत्यंत मूल्यवान स्मृतियां थीं।

उस समय लेव निकोलायेविच एक तात्विक आलेख : 'दि किंगडम ऑफ गॉड इज विदिन यू` लिखने में व्यस्त थे। उन्होंने कर्म पर अपना चर्चित पत्र भी लिखा था। जैसे ही उनके विचार उभरते वह हम, दो युवा और अनुभवहीन लड़कियों को बतलाते। प्राय: वह इतना उल्लसित मनस्थिति में होते कि उनकी आँखों में आंसू छलछला आते। उस बर्फानी तूफान और बर्फबारी के मौसम में बाह्य दुनिया का हमारे लिए अधिक आकर्शण नहीं था।और हम दम साधे लेव निकोलायेविय को सुनते हुए अपनी शामें व्यतीत करते थे। जैसे ही वह सुबह जागते वह अपना पेन उठा लेते थे। इससे पहले मैं कभी रचनात्मक प्रक्रिया में व्यस्त किसी प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्ति के सान्निध्य में नहीं रही थी और मैं उनसे बहकर आने वाले विचारों से इतना अधिक प्रेरित थी कि कुछ और सोच नहीं सकती थी। मैं मारिया ल्वोव्ना से बातें करते हुए अथवा दिन में विचार-विमर्श की गयी समस्याओं पर मनन करते हुए एक के बाद एक रातें बिता रही थी। मेरा मस्तिश्क अत्यधिक उत्तेजनापूर्ण ढंग से काम करता था। स्वभावत: विचारशील होने के कारण तोल्स्तोय के चित्तवृत्ति के प्रभाव में सबकुछ पर विश्वास कर लेती थी। जब शाम होती मैं पूर्वगत दिन उनके द्वारा व्याख्या किये गये विशय पर निर्भीकतापूर्वक उनसे बहस करती थी। उससे पहले और बाद में मैंने कभी -कभी उन्हें उतना सौम्य, सहिश्णु और गहन उदार नहीं पाया था। उनके चेहरे पर आश्चर्यजनक चमक फैल जाती थी। मेरी बौद्धिक सूक्ष्मता के प्रति उनकी उत्साहित करने वाली सहानुभूति और दिलचस्पी मुझे उत्साहित करती और मुझे मेरे सामान्य संकोच पर विजय पाने की भाक्ति देती थी। उस समय मारिया ल्वोव्ना स्वस्थ अनुभव नहीं कर रही थीं और हालांकि वह सदैव हमारी बातचीत के दौरान उपस्थित रहती थीं, वह कभी ही उसमें शामिल होती थी। जब मैं चाय ढाल रही होती, बातचीत प्राय: इस प्रकार शुरू होती कि कुछ ऐसे बिन्दु हैं जिन पर मैं लेव निकोलायेविच से सहमत नहीं हूं।

''बोलो, बोलो, यह दिलचस्प है। तुम्हारी आपत्तियां क्या हैं ?``

मैं उन्हें बताती और जो चीजें मुझे समझ न आयी होतीं, उनसे पूछती। वह धैर्यपूर्वक और विस्तारपूर्वक समझाते। वह विशय की गहराई तक जाते और अपने अनुसार विशय का समाधान प्रस्तुत करते।

उनकी जिन्दगी कितनी स्वस्थ, शांत और छलकती हुई थी। उस समय तक हमारे लिए यह संभव हो जाता कि हम उन्हें 'सार्वजनिक भोज कक्ष` से सम्बद्ध दैनन्दिन कार्यों से मुक्त कर दें इससे वह अपने को पूरी तरह लेखन कार्य में व्यस्त कर सकें। वह प्रसन्नचित्त रहते। प्राय: मुस्कराते रहते, और हमारे साथ मजाक और हंसने के अवसर देखते रहते।

''वेरा मिखाइलोव्ना जंगले पर छलांग लगाने की कोशिश करो।`` वह अचानक कहते, और पहले ही सीढ़ियों के पास के एक नीचे जंगले पर छलांग लगा देते।

ठण्ड और बर्फ के बावजूद वह प्राय: दिन में घुड़सवारी करते। लेकिन एक दिन मैं उदास और दुखी दिखती हुई उनके पास गयी। मैंने बिना साहस यह पूछने के लिए कि उनकी उदासी का क्या कारण था जांचती हुई उनकी ओर देखा।

''मुझे कैसे जागना चाहिए वेरा मिखाइलोव्ना !`` वह बोले।

उनका मतलब दूसरी दुनिया में ''जागने`` से था। दूसरे शब्दों में, 'मरना`। मैं घबड़ा उठी और कुछ कह नहीं पायी। जल्दी ही उनकी मनोदशा का कारण स्पश्ट हो गया था। वह स्वयं में हताश थे। उन दिनों हमारे एक शहर में काम करने वाला एक निराला चरित्र था। वह अनपेक्षित रूप से अपने बारे में अस्पश्ट और चकरा देने वाली सूचना लेकर प्रकट हुआ था, लेकिन हमने उसे अपने एक केन्द्र में काम करने के लिए भेज दिया था। हम तक अफवाहें पहुचतीं कि उसने बहुक अधिक पी ली थी और कभी-कभी झगड़ा भी कर लेता था। हमारे सभी स्वयंसेवक काम के प्रति समर्पित थे, उनमें से अधिकांश तोल्स्तोय के शिश्य और उनकें अनुयायी थे। लेकिन इस व्यक्ति का व्यवहार अप्रिय था जो हमारे सम्पूर्ण दल की सुव्यवस्था को बेसुरे ढंग से चूर-चूर कर रहा था। लेव निकोलायेविच ने इसे दिल से लगा लिया। तोल्स्तोय शराबियों को बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। उस दिन वह व्यक्ति बेगीचेव्का आया था, और लेव निकोलाचेविच को अकेला पाकर बैठ गया था और उनसे निर्भीक और बेलगाम धृश्टता से बोलता रहा था। लेव निकोलायेविच उसके लिए अपनी नापसंदगी पर नियंत्रण नहीं पा पाये, और इसने, जिसे वह कमजोरी मानते थे, उनके मस्तिश्क पर भारी प्रभाव डाला था। उन्होंने मुझे कहा कि जाओ उससे बातें करो। मैं गयी और हम शेश दिन उसे लेव निकोलायेविच की नजरों से दूर रखने में सफल रही थीं।

लेकिन अंत में हम उससे अलग हो गये । कुछ देर बाद वह पुन: हाथ में एक पोटली थामें बेगीचेव्का में प्रकट हुआ। उसे वोद्का की गंध मिली और जब उसने पोटली खोली उसमें उसे वोद्का की बोतल मिली। उसके सभी कपड़े उससे दुर्गंधयुक्त हो गये थे। लेव निकोलायेविच उसके बगल में थे। उन्होंने बहुत ही उत्तेजित स्वर में कहा कि उनके लिए यह कश्टकर था और हम लोगों के पास उसका और अधिक रुकना घोर आपत्तिजनक था।

''मैं अनुरोध करता हूं कि आप मुझ जैसे बूढ़े व्यक्ति को क्षमा करेंगें, लेकिन मैं प्रार्थना करता हूं कि आप यहां से चलें जायें।``

जब वह चला गया हमारी जीवन गति लौट आयी थी।      

किसानों के साथ संबन्ध

किसानों को भोजन कराने का विचार एक परोपकारी कार्य था। तोल्स्तोय इस सबके विरुद्ध थे और हम सब उनके साथ थे। हम उन्हें कैसे भोजन दे सकते थे जो स्वयं हमारे लिए  अन्न उपजाते थे और जो अपने श्रम से उत्पन्न पैदावार से हमारा पोशण करते थे। जनता के साथ हमारे संबन्ध सामान्य नहीं थे और तोल्स्तोय ने जिनकी सहायता की उनकी चापलूसी और  कुटिलता से कश्ट पाया था। निश्चित ही उन्होंने इसे  स्पश्ट अनुभव किया था। संबन्ध जितना भी थे, उनसे कुछ भी और  अपेक्षा नहीं की जा सकती थी। लेकिन उन्होंने कम कश्ट नहीं पाये। जहां भी  वह गये (और वह सभी जगह गये और घृणायुक्त 'महामहिम` उनके पीछे -पीछे चला ) । उनका मनपसंद घोड़ा मुखोर्ती यास्नाया पोल्याना से लाया गया और प्राय: वह दूर तक घोड़े पर सवार होकर जाया करते थे। वह अज्ञात बने रहकर जब भी यात्रा करने में सफल होते और अपने को 'महामहिम` के बजाय 'ग्रैण्डपा` पुकारा जाना सुनते तो अत्यंत प्रसन्न होते। इस प्रकार की भूमिका में वह दूसरे बूढ़े लोंगों से बात करना  पसंद करते, उनके विचार सुनते और अपने विचार बताते।

एक दिन वह बहुत प्रसन्न घर लौटे। वह एक दूर के गांव  गये थे जहां उन्हें कोई नहीं जानता था और जब उन्होंने एक  किसान की झोपड़ी में विश्राम करना चाहा, तब उन्हें एक साधारण झोपड़ी में ले जाया गया और उन्हें सार्वजनिक  कटोरे से भोजन के लिए आमंत्रित किया  गया।  इसने उन्हें अपने आतिथेय से दिल खोलकर बात करने का अवसर प्रदान किया। लेकिन, प्राय: की भांति, सार्वजनिक कटोरे  में शामिल होने से उनके स्वास्थ्य पर बुरा परिणाम हुआ  था।

छोटे बच्चों से बातें करके भी वह आनन्दित होते थे, और एक दिन उन्होंने हमसे कहा कि एक दो वर्श छोटी बच्ची उन पर आंखें गड़ाकर स्पश्ट और अबोध भाव से उन्हें टकटकी लगाकर देखती रही  कि ऐसा लगा कि ''उनमें स्वर्ग प्रतिबिबित हो रहा था। एक बड़ा बच्चा , यहां तक कि पांच साल का, इसप्रकार की टकटकी नहीं लगायेगा।``

जैसा कि बाद में सिद्ध हुआ लोग वास्तव में तोल्स्तोय को महत्व देते थे और संबन्धों की अस्वाभाविकता के बावजूद उनमें 'मनीबैग` की अपेक्षा कुछ और ही देखते थे। वसंत में, अफवाह उड़ी कि तोल्स्तोय को गिरफ्तार किया जाना था, और जब अन्नन्कोव का अभियान दल हमारे शहर में जनकार्यों के उद्देश्य से पहुंचा, किसानों ने निश्कर्श निकाला कि उन्हें तोल्स्तोय को गिरफ्तार करने के लिए भेजा गया था। किसानों ने बेगीचेव्का को घर को चारों ओर से इस दृढ़ निश्चय के साथ घेर लिया कि वे किसी को भी उन्हें स्पर्श करने की अनुमति नहीं देगें, और लेव निकोलायेविच के लिए उन्हें समझाना अत्यंत कठिन हो गया कि उनका भय निराधार था।

जब शरद में फसल इकट्ठा हुई और लेव निकोलायेविच ने किसानों से विदा ली तब उन लोगों ने उनके प्रति इतना प्रेम प्रकट किया कि उसकी लेव निकोलायेविच ने कल्पना नहीं की थी और उन्होंने स्पश्ट अनुभव किया कि उन लोगों ने उनके परिश्रम और हित चिन्ता को महत्व दिया था।

(प्रस्तुत संस्मरण वरिश्ठ कथाकार रूपसिंह चन्देल द्वारा संचयित और अनूदित पुस्तक 'लियो तोल्स्तोय का अंतरंग संसार` से उद्धृत है. इस पुस्तक में महान रूसी लेखक लियो तोल्स्तोय पर उनके परिवार के लोंगो, उनके मित्रों-सहयोगियों , लेखकों, रंगकर्मियों और कलाकारों के तीस से अधिक संस्मरण संग्रहीत हैं जो 'संवाद प्रकाशन` मुम्बई/मेरठ  से शीघ्र ही प्रकाश्य है।) 

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                                                                                                                                                             -श्रद्धांजलि






                      लेखन  से साहित्यकार और विचारों से संत विष्णु प्रभाकर का  विगत 11 अप्रैल को चले जाना मानो अपने साथ एक हिन्दी गद्य साहित्य का एक विशेष अध्याय ही समेट ले गया। गांधी जी के जीवन और दर्शन से गहरे प्रभावित विष्णु प्रभाकर जी गांधी जी की सोच और दर्शन को आजीवन  साहित्य  में  प्रतिफलित  करने का प्रयास करते रहे थे। जब छायावाद के प्रभाव में हिन्दी गूढ़ और  रहस्यमय हो रही थी वे उसमें यथार्थ रोशनी लेकर आए। उन्होंने अपनी रचनाओं में समाज की जड़ता और व्यवस्था की क्रूरता पर कठोर प्रहार किए। परन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि वे संवेदनाओं और अनुभूति की ग्राह्यता  से दूर या उनमें असमर्थ थे।  उपन्यास, कहानी, नाटक, एकांकी और बालसाहित्य के अलावा उन्होने शरदचन्द की जीवनी आवारा मसीहा लिखकर हिन्दी साहित्य में जीवनी -लेखन को सपृहणीय आयाम दिए। जहाँ शरदचंद्र अपने मर्मस्पर्शी साहित्य के कारण अमर हैं, आज विष्णुप्रभाकर शरदचंद्र की जीवनी पर रचित अपने आवारा मसीहा के कारण अमर हैं। शरदचंद्र के जीवन से जुड़े हर संदर्भ को जानने, समझने और परखने के लिए वे भागलपुर ( बिहार) से लेकर थाइलैंड, वर्मा और बंगाल तक 14 वर्षों तक यायावर बनकर घूमते रहे और गहन संवेदना और मानव भावों के सूक्ष्म चितेरे शरद बाबू को अपनी हृदयग्राही संवेदना के साथ उन्होंने पुनः जीवित कर दिया। अनेक विधाओं के समर्थ रचनाकार, मनीषी और संवेदनशील सहज व्यक्तित्व के साहित्यकार विष्णु प्रभाकर का विछोह हिन्दी साहिय की गहरी क्षति है। प्रस्तुत हैं उनकी स्मृति को पुष्पांजली स्वरूप लेखनी के पाठकों के लिए दो संस्मरणात्मक और भावभीने आलेख-


साहित्यिक मसीहा हैं   विष्णु प्रभाकर ( 2006  के अप्रैल-जून के सद्भावना दर्पण में प्रथम प्रकाशित )


जून 1912 को मीरापुर में जन्मे विष्णु प्रभाकर इस वक्त हिन्दी के सबसे बड़े साहित्यकार हैं। उनका रचना वैविध्य प्रणम्य है। उनकी कृतियाँ नई पीढ़ी के लिए मार्गदर्शन करती है। वे स्वतंत्रता सेनानी भी थे। इस सिलसिले में दो बार गिरफ्तार किए गए थे। हिसार में पले-बड़े, पंजाब में नौकरी की और फिर दिल्ली में आकर बस गए। कोई भी रचनाकार अपनी एक-दो कृतियों के कारण ही रेखांकित किया जाता है। लगभग सत्तर कृतियों के रचयिता विष्णु प्रभाकर को शरत्चंद्र की प्रामाणिक जीवनी आवारा मसीहा लिखने के कारण काफी यश मिला। यह कृति हिन्दी साहित्य की युगांतकारी घटना निरूपित की जा सकती है। हम कह सकते हैं कि आवारा मसीहा लिखकर वे खुद मसीहा बन गए। इस कृति को लिखने के लिए प्रभाकर जी ने चौदह वर्ष तक साधना की। श्रम-साध्य शोध कार्य़ किये। समकालीन लोगों से मुलाकातें कीं। तब कहीं यह कालजयी कृति तैयार हो सकी।


विष्णु प्रभाकर जी ने उपन्यास, नाटक, संस्मरण, जीवनी, कहानियाँ, चिंतनपरक लेख लिख कर साहित्य को समृद्ध किया। और आज भी सक्रिय बने हुए हैं। आवारा मसीहा के बाद प्रभाकर जी की अन्य चर्चित कृतियों में धरती अब भी घूम रही है, अर्धनारीश्वर, होरी, निशिकांत, मेरी प्रेम कहानियाँ, मैं नारी हूँ, कौन जीता कौन हारा, गंधार की भिक्षुणी, समांतर रेखाएँ, गाँधी, समय, समाज और संस्कृति, जन समाज और सस्कृति, अमर शहीद भगत सिंह, ज्योतिपुंज हिमालय, युगे-युगे क्रांतिकारी, सृजन के सेतु, स्वप्नमयी, कोई तो, यादों की छाँव में, एक और कुंती आदि अनेक कृतियाँ हैं।


यह दौर ऐसा है, जब लेखन में कई तरह की विकृतियाँ आती जा रही हैं। प्रयोधर्मिता के नाम पर साहित्य से खिलवाड़ हो रहा है। व्यवस्था के निकट जाने की ललक बढ़ी है। लेकिन ईमानदार और संघर्षशील लेखक इस विसंगति से दूर रहना चाहता है। एक जगह प्रभाकर जी लिखते हैं कि 'लेखक सत्ता नहीं चाहता  मगर  सत्ता लेखक को चाहती है,  इसलिए कि उसकी धार को भोथरा कर सके। पुरस्कारों की बाढ़ ने भी लेखक को भिखारी बनाने में बड़ा योगदान किया है। अपने बारे में प्रभाकर जी कहते हैं कि मैने जो कुछ किया ईमानदारी से किया। अहम् जो था, वह बस यहीं तक सीमित रहा कि किसी के सामने हाथ नहीं फैलाएँगे। किसी की चाकरी नहीं करेंगे। कोई आलोचक-समीक्षक नहीं पाला। किसी को पसंद आता है तो पढ़ लेता है नहीं आता तो नहीं पढ़ता।'


ऐसी महान सोच वाले लेखक अब दुर्लभ प्रजाति के जीव की तरह हो गए हैं। विष्णु प्रभाकर जैसे लोग तो अब दूर-दूर तक कहीं नजर ही नहीं आते। इसलिए विष्णु प्रभाकर जी का हमारे बीच होना हमें हौसला देते रहता है।


विष्णु प्रभाकर जी के लेखन-चिंतन ने मुझे गहरे तक प्रभावित किया है। ईश्वर की सत्ता को लेकर मेरे मन एक प्रश्नचिन्ह रहा है। मैने भगतसिंह को पढ़ा है। वे भी ईश्वर को नहीं मानते थे। विष्णु  प्रभाकर कहते हैं कि मैं ईश्वर में अखंड विश्वास नहीं रखता। मैं तो समझता हूँ कि आध्यात्म भी एक खोज है। जिस तरह विज्ञान, भौतिक खोज करता है, अध्यात्म पराभौतिक खोज करता है। दोनों खोज जारी हैं। उनके प्रश्न जारी हैं- उत्तर किसी को मिला नहीं है।


हंसराज रहबर ने बिल्कुल ठीक कहा है कि विष्णु प्रभाकर संवेदना के कलाकार हैं। प्रभाकर जी का समग्र लेखन संवेदना की बुनियाद पर ही टिका हुआ है। उनके लेखन में रूढ़िवाद नहीं दिखता। वे प्रगतिशील विचारों के ही पोषक नजर आते हैं। उनमें परिवर्तन की छटपटाहट है मगर हिंसा नहीं है। वे अहिंसक तरीके से परिवर्तन के पक्षधर नजर आते हैं। गाँधीवाद का गहरा असर उनके लेखन में द्रष्टव्य होता है। वे सत्य के अन्वेषक हैं।


मूर्तिदेवी पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, सोवियत लैंड पुरस्कार, महात्मा गांधी पुरस्कार समेत लगभग पचास महत्वपूर्ण सम्मान से विभूषित प्रभाकर जी को साहित्य अकादमी ने महत्तर सदस्यता प्रदान कर उनकी महत्ता को सम्मानित किया। हिन्दी अकादमी ने उन्हें शलाका सम्मान भी प्रदान किया। पिछले दिनों उन्हें राष्ट्रपति अब्दुल कलम ने पद्मविभूषण से अलंकृत किया।


साहित्यिक मसीहा प्रभाकर जी बड़े उदारमना हैं। उनको पत्र लिखिए, उत्तर जरूर भेजते हैं। सद्भावना दर्पण पर अपनी प्रतिक्रिया भेज कर उन्होंने मेरे काम की मुक्त कंठ से सराहना की। मेरे जैसे अनेक लोगों को उनके आशीर्वाद से बड़ी प्रेरणा मिली। खुशी की बात है कि दिल्ली की साहित्यिक पत्रिका कल्पांत  (मुख्य संपादक मुरारी लाल त्यागी, बी-2 , मानसरोवर पार्क, शाहदरा, दिल्ली।) ने विष्णुप्रभाकर जी पर एक संग्रहणीय विशेषांक प्रकाशित कर के सराहनीय कार्य किया है। प्रभाकर जी शतायु हों, निरंतर गतिमान  रहें, हम सबको आसीर्वाद देते रहें। इन्ही शुभकामनाओं के साथ-


                                                                                                                                         -  गिरीश पंकज











 जीवन के यथार्थ अक्षर लिखने वाला ही होता है महान योद्धा

     यदि हमसे पूछा जाए कि संसार में सबसे बड़ा योद्धा कौन हुआ है अथवा है तो हम असमंजस में पड़ जाएंगे। इतिहास भरा पड़ा है अनेक योद्धाओं से। लेकिन वास्तविक योद्धा कौन है ? गुरुग्रंथसाहिब में लिखा है, ''जो लरै दीन के हेत सूरा सोई।`` सच्चा योद्धा वो जो दूसरों की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा दे। सच्चा दानी वो जो दूसरों की भूख मिटाने के लिए खुद भूखा रह जाए। जो अपने हाड़-मांस के शरीर की स्थूलता का विस्तार करने की बजाय दधीचि ऋषि की तरह किसी की रक्षा के लिए अपनी अस्थियाँ तक दान में दे दे वही है सच्चा दानी तथा वास्तविक योद्धा। इतिहास भरा पड़ा है ऐसे वास्तविक योद्धाओं से।

गीता में एक श्लोक है :
यद्यदाचरति  श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो  जन: ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।।
महापुरुष जो जो आचरण करता है सामान्य व्यक्ति उसी का अनुसरण करते हैं। वह अपने अनुसरणीय कार्यों से जो आदर्श प्रस्तुत करता है सम्पूर्ण विश्व उसका अनुसरण करता है अर्थात् श्रेष्ठ व्यक्तियों द्वारा प्रस्तुत आदर्श विश्व के तमाम लोगों के आदर्श बन जाते हैं।
     एक बार गाँधीजी से जब कोई संदेश देने के लिए कहा गया तो उन्होंने कहा कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। चीन के प्रसिद्ध दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने भी कहा है कि अच्छे लोग अपने आचरण से दूसरों को उपदेश देते हैं, मुख से नहीं। वास्तव में संसार को वही लोग ऊपर उठाते हैं तथा जीवन प्रदान करते हैं जो कोई ग्रंथ लिखने की अपेक्षा अपना जीवन ग्रंथ पीछे छोड़ जाते हैं। कहने का तात्पर्य ये है कि मात्र मौखिक उपदेश या ज्ञान का कोई महत्त्व नहीं है जब तक कोई अपने आचरण द्वारा उसे दूसरों तक नहीं पहुँचाता।

     एक अकर्मण्य व्यक्ति यदि कर्म का संदेश देगा तो कौन उसकी बात पर ध्यान देगा जबकि एक कर्मशील व्यक्ति को इसकी शिक्षा देने की आवश्यकता ही नहीं क्योंकि उसका आचरण स्वयं कर्म करने की शिक्षा और प्रेरणा दे रहा है। इसी प्रकार एक अनैतिक व्यक्ति के नैतिकता विषयक संभाषण पर कोई ध्यान नहीं देगा। मुरलीधर देवीदास आमटे जिन्होंने अपना सारा जीवन कुष्ट रोगियों की सेवा और उनके पुनर्वास में लगा दिया गाँधीजी ने इस क्षेत्र में उनके अथक प्रयासों के लिए उन्हें अभय साधक कह कर पुकारा। इस अभय साधक बाबा आमटे ने कुष्ट रोग के बैक्टीरिया को चिकित्सीय प्रयोग के लिए अपने शरीर में प्रविष्ट करा लिया ताकि कुष्ट रोग पर उचित शोध कार्य करके शीघ्र इसके उपचार में सफल हो सकें। क्या अपने शरीर के साथ ऐसा प्रयोग कोई कायर कर सकता है?

     किसी विशेष स्थिति में शरीर कैसे व्यवहार करता है यह देखने के लिए ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड में जन्मे तथा बाद में स्थायी रूप से भारत की नागरिकता ले लेने वाले प्रसिद्ध वैज्ञानिक जे बी एस हॉल्डेन अपने शरीर के साथ विचित्र और भयंकर प्रयोग करने से भी नहीं घबराते थे। प्रयोग के बाद वे भयंकर पीड़ा की स्थिति में भी जो कुछ अनुभव करते थे उसे फ़ौरन रिकॉर्ड कर लेते थे। उनके इस अपूर्व साहस के द्वारा ही कई रोगों के उपचार की खोज संभव हुई। अपने ऊपर प्रयोग करके ही उन्होंने यह अध्ययन किया कि कार्बन डाइऑक्साइड और बहुत ठंडे तापमान का साँस पर क्या प्रभाव होता है और इसके द्वारा ही उन्होंने टेटनस तथा कन्वलशन का उपचार खोजने में सफलता प्राप्त की। क्या वास्तविक बहादुरी के अभाव में इस प्रकार के प्रयोगों और परीक्षणों की कल्पना भी की जा सकती है?

     बुद्ध, महावीर, नानक और कबीर से लेकर गाँधी, मदर टैरेसा और बाबा आमटे तक एक विस्तृत सूची हमारे सामने है महान योद्धाओं की। और अब इस विस्तृत सूची में एक नाम और जोड़ना अत्यंत प्रासंगिक ही होगा और वह नाम है विष्णु प्रभाकर का। विष्णु प्रभाकर और एक महान योद्धा? विष्णु प्रभाकर का शुमार क्रांतिकारी अथवा प्रगतिशील लेखकों में भी नहीं होता और न ही उन्होंने कभी कोई झंडा विशेष ही उठाया अथवा किसी आंदोलन का ही नेतृत्व किया। कुछ लोग तो उन्हें लेखक मानने को भी तैयार नहीं हुए फिर कैसे महान योद्धा हुए विष्णु प्रभाकर?

     विष्णु प्रभाकर हिन्दी के एक प्रसिद्ध गाँधीवादी लेखक हुए हैं जिनका लेखन सदैव मानवीय मूल्यों के लिए समर्पित रहा इसमें संदेह नहीं। उनके जीवन और लेखन दोनों में अत्यंत सादगी रही और यही सादगी उन्हें विशिष्ट बना देती है। लेकिन इससे कोई व्यक्ति महान योद्धाओं की श्रेणी में कैसे आ सकता है? विष्णु प्रभाकर एक ऐसे लेखक हुए हैं जिन्होंने आम आदमी की पीड़ा को पहचानकर सही रास्ता सुझाया। जीवनपर्यंत लोगों की मदद भी करते ही रहे। जितनी सादगी से जिये उतनी ही सादगी से चुपचाप चले भी गए लेकिन जाने से पहले वो काम कर गए जो बड़े-बड़े योद्धाओं के लिए भी असंभव है।

     मृत्यु के बाद भी हमें अपने भारीर से बेहद लगाव होता है। कई लोग तो जीते जी अपना श्राद्ध करने तथा अपनी मूर्तियाँ स्थापित करवाने से भी परहेज़ नहीं करते। पाश्चात्य  देशों में अनेक लोग मृत्यु से पहले ही अपने कफ़न-दफ़न का चुनाव कर लेते हैं। अपनी देख-रेख में महँगी से महँगी डिज़ायनर भाव-पेटिका बनवाकर रख लेते हैं। मृत्यु के बाद कुछ लोग शव का दाह-संस्कार करते हैं (जलाते हैं) तो कुछ उसे सुपुर्दे-खाक कर देते हैं (ज़मीन में गाड़ते हैं) लेकिन पारसी लोग मृत शरीर को किसी ऐसे ऊँचे स्थान पर रख देते हैं जहाँ दूसरे जीव-जंतु उसे खाकर अपनी भूख मिटा सकें।

     मरने के बाद भी हमारा शरीर दूसरों के काम आ सके हमारे यहाँ तो यह भी कम क्रांतिकारी विचार नहीं और इस प्रकार का निर्णय कोई बहादुर व्यक्ति ही ले सकता है। आज हमारे देश में न जाने कितने लोग दृश्टिदोश के कारण देख नहीं पाते। किसी के गुर्दे खराब हैं तो किसी के फेफड़े। अनेक लोग अस्थिदोशों से पीड़ित हैं। यदि हम मरने के बाद अपनी आँखों को दान में दे सकें तो असंख्य लोग जो देख नहीं पाते इस सुंदर संसार को देखने में सक्षम हो सकें, बिना किसी के सहारे के सामान्य जीवन जी सकें।  

विष्णु प्रभाकर की शवयात्रा नहीं निकली, अंत्येष्टि पर साहित्यकारों की भीड़ जमा नहीं हुई क्योंकि उन्होंने अपना पूरा शरीर ही दान करने की घोषणा कर दी थी ताकि उनके पार्थिव शरीर से दूसरों को जीवनदान मिल सके। विष्णु प्रभाकर का आदर्श काल्पनिक आदर्श नहीं था। मन, वचन और कर्म तीनों से ही वे आदर्शवादी थे इसीलिए जाते-जाते जीवन के आदर्श को यथार्थ में बदल गए। उनका देहदान करने का संकल्प एक बार फिर हमें दधीचि ऋषि की याद दिला देता है। उन्होंने जाते-जाते जीवन के जो अक्षर लिखे वही अक्षर जीवन का वास्तविक संदेश हैं तथा उन्हें महान योद्धा बनाने के लिए पर्याप्त भी।                                                                            

                                                                                                                                                          -सीताराम गुप्ता    

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एक बार फिर वह लेखा-जोखा लेने का समय आ गया है जब  विगत इतिहास के पन्नों में सिमटने को तैयार है और नवागत द्वार थपथपा रहा है। प्रायः नववर्ष की संध्या पर संकल्प लेने का रिवाज है; समय ही धन है- मानने वाले आज के इस भौतिकवादी  समाज में प्रस्तुत है लेखनी के जाने माने लेखक डॉ. सीताराम गुप्ता का एक ठहरा हुआ पर विचारोत्तेजक आलेख-समय की नई समझ और संभवतः हमारे लिए एक नए संकल्प की सौगात के साथ...    


                                                                                                                                                 नववर्ष मंगलमय हो !!


समय ही नहीं अनुपेक्षणीय है तनावमुक्ति भी

     पुणे-बैंगलुरु हाइवे पर प्रसिद्ध ऐतिहासिक शहर सतारा से आगे एक स्थान है कराड़। किसी काम से कराड़ जाना हुआ। साथ में था मेरा पुत्र डॉ अमित। हम दोनों रविवार शाम को कराड़ पहुँचे। लगता था दो-तीन दिन रुकना पड़ेगा लेकिन सोमवार दोपहर एक बजे तक स्थिति स्पष्ट हो गई कि अब यहाँ रुकना बेकार है। वापस दिल्ली लौटने का कार्यक्रम बनाया। कराड़ से पुणे और पुणे से दिल्ली।

     दोपहर दो बजे कराड़ से पुणे के लिए बस ली। कराड़ से पुणे तक लगभग तीन घंटे का सफ़र है। शाम तक दिल्ली लौटना चाहते थे अत: बस में बैठने के बाद सबसे पहले पता लगाया कि आज शाम को पुणे से दिल्ली के लिए कौन सी फ्लाइट मिल सकती है। पता चला कि पौने सात बजे की फ्लाइट उपलब्ध है। एयरपोर्ट पर भी फ्लाइट से कम से कम एक घंटा पहले पहुँचना अनिवार्य है।

     बस में कंडक्टर से पूछने पर पता चला कि पाँच-सवा पाँच बजे पुणे के स्वारगेट  बस अड्डे पर पहुँच जाएँगे। वहाँ से एयरपोर्ट का भी कम से कम आधे घंटे का सफ़र है। यदि बस सही समय पर पहुँचा दे और वहाँ से आधे घंटे में एयरपोर्ट भी पहुँच जाएँ तो  फ्लाइट पकड़ी जा सकती थी लेकिन यदि किसी कारण से बस लेट हो जाती अथवा बस अड्डे से एयरपोर्ट पहुँचने में विलंब हो जाता तो फ्लाइट मिस होना स्वाभाविक था। ऐसे में टिकिट कन्फर्म कराने का सीधा सा अर्थ था  फ्लाइट मिस होने पर साढ़े तेरह हज़ार रुपये का नुक़सान।

     पूरी स्थिति पर ध्यानपूर्वक विचार करने पर एक बात स्पष्ट हो गई कि यदि टिकिट कन्फ्ऱ्म कराते हैं तो चाहे फ्लाइट मिस भी न हो लेकिन आगामी चार घंटे गुज़रेंगे बेहद तनाव में । हर क्षण लगेगा हम लेट हो रहे हैं। भारी आर्थिक नुक़सान हो रहा है। कभी ड्राइवर पर क्रोध आएगा तो कभी कंडक्टर पर और कभी सहयात्रियों पर। बस कितनी ही तेज़ क्यों न चले लगेगा बस रेंग रही है। सब हमारे खिलाफ़ साज़िश में शामिल हो गए हैं (वास्तविकता तो ये है कि अन्य कोई हमारे खिलाफ़ साज़िश कर ही नहीं सकता। हम स्वयं अपनी क्षणिक लाभवृत्ति या लोभ के कारण गल़त नीतियों का चुनाव कर अपने खिलाफ़ साज़िश रचते हैं)। यह भी संभव था कि हम दोनों  आपस में ही उलझ पड़ें और बिना वजह ही एक दूसरे पर दोषारोपण करने लगें। हमारे सामने कोई जीवन-मरण की स्थिति तो थी नहीं। एक दिन बाद पहुँचने पर भी कोई विशेष लाभ या हानि होने वाली नहीं थी सिवाय एक दिन की छुट्टी लेने के। तो फ़िर क्यों इतना रिस्क लिया जाए? क्यों बेवजह तनाव मोल लिया जाए? यह तनाव ही तो है जिसने हमारी ज़िंदगी को नरक बना रखा है।

     यह हमारी तनावयुक्त जीवनशैली ही तो है जिसके कारण आज हम अनेक व्याधियों के शिकार बने हुए हैं। हर रोज़ न जाने जाने-अनजाने कितने प्रकार के तनावों से हमें गुज़रना पड़ता है। इनका प्रभाव धीरे-धीरे हमें रोगी बनाकर रख देता है और हमें पता भी नहीं चलता। जब पता चलता है तब तक देर हो चुकी होती है। यदि हम जानते-पूछते भी इस स्थिति से बचने का प्रयास नहीं करते तो हमसे बड़ा मूर्ख नहीं। हम खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हैं। सारी स्थिति पर गौ़र करने के बाद हमने निर्णय लिया कि आज रात पुणे में ही रुकेंगे और कल दोपहर को जो भी फ्लाइट आसानी से उपलब्ध होगी उससे वापस लौट जाएँगे। दोबारा फोन करके अगले दिन दोपहर बारह बजे की एक फ्लाइट के टिकट कन्फर्म करा लिए। पैसे भी दो हज़ार रुपये कम लगे।

     पुणे में बेटे के कई मित्र हैं। उसे भी इस निर्णय से प्रसन्नता ही हुई। पुणे पहुँचकर मैं तो चाय पीकर आराम से लेट गया क्योंकि मुझे पिछले दो दिनों से ज्वर था। बेटा अपने मित्रों से मिलने चला गया। वह खाने के समय पर जब वापस लौटा तो अधिक प्रसन्नचित्त लग रहा था क्योंकि कई मित्रों से मुलाक़ात कर आया था। यह प्रसन्नता ही तो है जो हमारे अच्छे स्वास्थ्य को अक्षुण्ण बनाए रखने तथा व्याधि की अवस्था में व्याधिमुक्त करने  में सक्षम होती है अत: जीवन में तनाव की अपेक्षा प्रसन्नता प्रदान करने वाले क्षणों को खोजते रहना अनिवार्य है। रात को आराम से खाना खाया और सो गए। तनाव का कहीं नामोनिशान नहीं था। ज्वर के बावजूद नींद ठीक से आई।

     सुबह नींद खुली तो देखा बेटा नदारद था। वह अपने कुछ अन्य शेष मित्रों से मिलने चला गया था। जल्दी ही लौट आया। उसके हाथों में कई थैले भी लटक रहे थे। अपनी बहन के लिए उसकी पसंद के बिस्कुट और शरीफे या कस्टर्ड एप्पल, जिन्हें यहाँ सीताफल कहते हैं, लाना नहीं भूला था। यदि कल रात को ही जाने का प्रोग्राम बन जाता तो मित्रों से मिलने तथा खरीददारी की खुशी कैसे मिलती? जीवन में यदि हम थोड़ा सहज और संतुलित होकर निर्णय लें तो न केवल तनाव से बच सकते हैं अपितु अतिरिक्त आनंद के क्षण भी उत्पन्न कर सकते हैं। तनाव से बचकर विभिन्न व्याधियों से तो बच ही सकते हैं साथ ही प्रसन्नता के कारण मनोभावों में सकारात्मक परिवर्तन के कारण शरीर में रोगावरोधक शक्ति का विकास कर अधिक स्वस्थ और रोगमुक्त भी हो सकते हैं।

वास्तव में हम स्वयं अवांछित स्थितियों को आमंत्रित कर तनाव और व्याधियाँ मोल लेते हैं। रोगमुक्त स्वस्थ जीवन जीने के लिए जीवन में सहजता अपनाना तथा तनावप्रद स्थितियों से बचने का प्रयास करना अनिवार्य है। माना समय की क़ीमत है लेकिन स्वास्थ्य से अधिक नहीं। बहुमूल्य समय की बचत के लिए अमूल्य जीवन को दाँव पर नहीं लगाया जाना चाहिए। जीवन अथवा अच्छे स्वास्थ्य के अभाव में बहुमूल्य समय ही क्या कर लेगा? वैसे भी जब तक हम पूर्णरूपेण स्वस्थ नहीं होंगे समय का भी उचित उपयोग नहीं कर पाएँगे।

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                                                                                                                                                               हास्य व्यंग्य






                                                                                                                                                          - अशोक गौतम


 नव वर्ष : नव संकल्प

हर पल नया जोश, नई उमंग! भौतिकवादी समाज में जीने का एक यही ढंग! सुबह ठेला,शाम को रेला, बंधु, यही है संसार रूपहला! समय से भी तेज दौड़ रहा है यहां हर किरदार! लंगड़ाता हुआ,गच्चा खाता हुआ!! 

नव वर्ष का नया सूरज, आदर्श टाउन के जागरूक नागरिकों ने शाम को ही नए दिन के स्वागत के लिए नये संकल्प लिए। बेचारे संकल्पों की छटपटाहट से रात भर सो नहीं पाए। शर्मा जी ने संकल्प लिया कि नव वर्ष से बिजली के मीटर की सांसें वे सदा के लिए चलना बंद कर देंगे। गुप्ता जी ने संकल्प लिया कि नव वर्ष से तराजू के गले का फंदा कुछ और टाइट कर देंगे। वकील साहब ने संकल्प लिया कि आने वाले कल से वे अपने ही बनाए झूठ के रोज रिकार्ड तोड़ेंगे। जिस दिन न टूटा उस दिन शाम को खाना नहीं खाएंगे। पत्रकार बंधु ने संकल्प लिया कि नए वर्ष से वे खबरों पर कम, खबरों से होने वाली आय पर ज्यादा ध्यान देंगे। वर्मा जी ने संकल्प लिया कि कल से वे अपने पटवारखाने में बैठने के भी जनता से पैसे वसूलेंगे। ठाकुर साहब जिनके पिता मुफ्त की ज्यादा पीने से अपना अंत कर गए थे ने संकल्प लिया कि नए वर्ष के नए दिन के सूरज के साथ ही वे हफ्ता वसूली की जगह हर दिन वसूली करेंगे। जो न करें तो नरक को जाएं। मास्टर जी ने फिर और जोश से न पढ़ाने का संकल्प दोहराया। अब आदर्श टाउन का एक जागरूक नागरिक शेष मैं बचा था। आदर्श नागरिक टाउन का नव निर्वचित सचिव! दोस्तो! मौके की नजाकत देख मैं मजे से रंग बदलने के फन में माहिर हूं, सो बिना किसी संकोच के मैंने भी नव वर्ष के नए सूरज के साथ नए संकल्प लेने की ठानी । न लेता तो चुल्लू भर पानी में डूब मरने वाली बात होती। समाज से अलग होकर कोई जी सका है क्या?
    तो दोस्तो, नव वर्ष के आगमन के लिए मैंने भी कुछ हल्के फुल्के संकल्प लिए हैं। अगर उन्हें अपने प्राण देकर भी पूरा करना पड़े तो भी पीछे नहीं हटूंगा। कारण? मैं उस देश का वोटर हूं जहां पर सदियों से संकल्पों की फसलें सूखा पड़ने के बाद भी संसद से लेकर सड़क तक लहलहाती रही हैं, ताबड़तोड़!
  आपको मेरे संकल्पों में जो दम लगे तो आप भी ले सकते हैं। मैंने अभी इनका पेटेंट नहीं करवाया है। और पेटेंट न हुई चीजों पर नगों से नंगों तक का हक होता है।
मेरा पहला संकल्प:   नव वर्ष के नए सूरज की पहली किरण ज्यों ही मेरे आदर्श टाउन का स्पर्श करेगी मैं झूठ बोलना शुरू कर दूंगा। इससे पहले बीच बीच में सच बोल लिया करता था। अब नव वर्ष से सच बोलना बिल्कुल बंद! झूठ भी सफेद बोलूंगा। क्योंकि मैं अपने मित्रों से सीख गया हूं कि दिमाग को स्वस्थ रखने के लिए झूठ नहीं सफेद झूठ बोलना बहुत जरूरी होता है। जो आज के दौर में झूठ नहीं बोलता वह जिंदगी भर दिमागी तौर पर बीमार ही रहता है। और बीमार व्यक्ति देश का उत्थान नहीं कर सकता। मैं भी देश के विकास में बढ़ चढ़ कर हिस्सा देना चाहता हूं। इसलिए देशहित में बिल्कुल स्वस्थ रहूंगा आने वाले कल से। अत: आप भी आने वाले कल से देश हित में झूठ बोलिए, आपसे मेरी करबद्ध प्रार्थना है। मेरा झूठ वराइटीदार होगा। झूठ दिमाग के लिए प्रोटीन,हाइडरेट,मिनरल्स,विटामिंस, सभी कुछ की पूर्ति एक साथ करता है। इसलिए आप भी नियमित झूठ कहिए, मैं तो कहूंगा ही।
 
मेरा दूसरा संकल्प :  अगली सुबह से मैं दफ्तर में हल्का लेना छोड़ दूंगा। जो भी मेरे से काम करवाने आएगा उससे पहले कटोरे में डालने के लिए कहूंगा। अगली सुबह से मांगने के मामले में बची शर्म भी छोड़ दूंगा। जो कुछ जनता देगी प्रेम से लूंगा। कल से चूजी होना बंद। साहब के चरणों की सौगंध लेकर कहता हूं कि अगर अपना बाप भी मेरी सीट से काम करवाने आए तो उसका काम भी बिना कुछ लिए नहीं करूंगा। बाप हो तो बाप की जगह! कुर्सी की मर्यादा रिश्तों के आगे कमजोर नहीं पड़ने दूंगा।

मेरा तीसरा संकल्प :  नव वर्ष से मैं पत्नी से ज्यादा तरजीह प्रेमिका को दूंगा। अपने बच्चों के बाप से ज्यादा बाप  प्रेमिका के बच्चों का बनूंगा। पत्नी में  पहले से ज्यादा दोष देखूंगा। प्रेमिका के दोषों को सदा नजरअंदाज करूंगा। अपने जज्बातों पर अब मैं कतई काबू नहीं रखूंगा। समाज जो कहता हो कहता रहे। वह कौन सा दूध का धुला है?
 
मेरा चौथा संकल्प :  नव वर्ष  से मैं अपना सामाजिक दायरा बढ़ाऊंगा। जीने के लिए शारीरिक वजन नहीं ,सामाजिक वजन जरूरी होता है। अपने हाथ लंबे करूंगा। हाथ लंबे करने के लिए चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े। ईमान मारना पड़े, चाहे ईमानदारी। वर्तमान युग लंबे हाथ वालों का युग है। वजनी महापुरूषों से सब डरते हैं, भले ही वे जेल के भीतर हों। कम वजनी व्यक्ति की न घर में पूछ होती है,न घर के बाहर। सामाजिक, पारिवारिक, राजनीतिक बीमारियां उसे तिल तिल मरने के लिए विवश कर देती हैं। और वह बेचारा मर भी जाता है। पर कल से मैं जीने के लिए उठूंगा।

मेरा पांचवां संकल्प :  नव वर्ष से मैं एक नए ढंग का हरामी होने का संकल्प लेता हूं। शातिर समाज में जीने के लिए शातिर होना बहुत जरूरी है। आदर्श, नैतिक हो कछुए की चाल  नहीं चला जा सकता। इसके कारण तनाव हो जाता है, आपकी तरह मुझे भी कभी कभी। हरामी व्यक्ति ही दूसरों को तनाव में रख खुद तनावमुक्त रह सकता है। परमानंद की स्थिति यही होती है। हरामी व्यक्ति कहीं भी हो,चैन की बंसी बजाते हैं। मैं भी अब बंसी प्रिय होना चाहता हूं। दुनिया मरती है, तो मरती रहे।

मेरा अंतिम संकल्प :  नव वर्ष से मैं संकल्प लेता हूं कि मैं उत्तम नहीं सर्वोत्तम ढंग से साहब की चापलूसी करूंगा। साहब की चापलूसी के अपने ही बनाए अपने पिछले सभी रिकार्ड ध्वस्त कर दूंगा। और दाव लगा तो साहब को भी! पीठ के पीछे उसे डट कर गालियां दूंगा और सामने पड़ते ही सदियों पहले गुम हो चुकी दुम सगर्व निकाल उसके आगे हिलानी शुरू कर दूंगा। साहब के मूत को गंगाजल समझ नित्य उसका आचमन करूंगा। घर में भगवान की जगह साहब के जूते रख दूंगा और भगवान को घर से निकाल दूंगा, मन से तो बहुत पहले निकाल चुका हूं। दोस्तों के लिए बगल में रखी छुरी अब हफ्ते में एक बार नहीं, हर रोज पैनी करूंगा। दिमाग में अब रिश्तों के बदले उल्लुओं,सियारों,गीदड़ों को पनाह दूंगा।
 तो मित्रो! ये हैं मेरे नव वर्ष की नई सुबह के मेरे कुछ नव संकल्प! तो मुझे आशीर्वाद दीजिए कि मैं अपने संकल्पों को हर हाल में पूरा कर रात को चैन से सो सकूं। सही मायने में सामाजिक होने की ओर यह मेरा पहला कदम है, मिलके सब दुआ करो। 

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                                                                                                                                                       डॉ. वेदप्रताप वैदिक

चीन अमेरिका की मजबूरी पर भारत जरूरी



प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की वाशिंगटन-यात्रा के दौरान परमाणु-सौदे को लागू करने की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई लेकिन क्या सिर्फ इसीलिए उनकी इस यात्रा को मात्र् औपचारिकता मान लिया जाए ? क्या यह मान लिया जाए कि ओबामा ने भारत के उन घावों पर सिर्फ मरहम लगाने का काम किया, जो अचानक ही पिछले हफ्ते उनकी चीन यात्र के दौरान उभर आए थे ? जहां तक परमाणु-सौदे का प्रश्न है, स्वयं प्रधानमंत्री ने कहा है कि कुछ ही हफ्तों में सारे मुद्दों पर समझौता हो जाएगा| ओबामा ने भी उनके इस कथन का समर्थन किया है| यह तो हमें पता है कि ओबामा और उनके डेमोक्रेट साथियों ने बुश द्वारा किए गए परमाणु-सौदे के कई प्रावधानों का विरोध किया था और ओबामा प्रशासन परमाणु-अप्रसार का घनघोर समर्थक है| ऐसी हालत में यदि सौदे के कुछ मुद्दों को लेकर दोनों पक्षों के बीच कुछ खींचातानी चल रही है तो यह स्वाभाविक ही है| इसके अलावा सबसे अधिक ध्यातव्य बात यह है कि किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत को पहली बार 'परमाणु शक्ति' कहा है और अगले साल होनेवाले परमाणु अप्रसार सम्मेलन में उससे भाग लेने का आग्रह किया है| यह भारत को छठे परमाणु शस्त्र्संपन्न राष्ट्र के तौर पर मिली अनौपचारिक मान्यता ही है|

             भारत के प्रधानमंत्री को ओबामा ने अपना पहला औपचारिक मेहमान बनाया, यह तो उल्लेखनीय है ही, इससे भी बड़ी बात यह है कि दोनों देशों के संबंध अब व्यक्तियों और पार्टियों पर निर्भर न होकर राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गए हैं| अमेरिका में राष्ट्रपति क्ंलिटन हैं या बुश हैं या ओबामा हैं और भारत में प्रधानमंत्र्ी अटलबिहारी वाजपेयी हैं या मनमोहन सिंह हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता| न ही इस बात से फर्क पड़ता है कि अमेरिका में रिपब्लिकन्स का शासन है या डेमोक्रेटस का और भारत में भाजपाइयों का है या कांग्रेसियों का| रिश्तों का कारवां बराबर आगे बढ़ता चला जा रहा है| इस नए तथ्य को प्रधानमंत्री की इस यात्रा ने रेखांकित किया है|

जहां तक चीन का सवाल है, डॉ. सिंह ने बहुत ही सलीके से ओबामा और अमेरिकियों को समझा दिया है कि दोनों एशियाई देशों में बुनियादी फर्क क्या है ? अर्थशास्त्री होते हुए भी उन्होंने किसी दार्शनिक की तरह पूछ लिया कि क्या सकल राष्ट्रीय आय ही प्रगति का एकमात्र् पैमाना है ? क्या मानव अधिकार, लोकतंत्र् और खुलापन बेकार की बातें हैं ? भारत के ये आदर्श अमेरिका के भी आदर्श हैं| इसीलिए भारत और अमेरिका 'स्वाभाविक मित्र्' हैं| क्या यह कम बड़ी बात है कि ओबामा ने भारत-अमेरिकी संबंधों को 21वीं सदी के भविष्य से जोड़ा है और स्पष्ट शब्दों में कहा है कि 'एशिया के नेतृत्व' में भारत की विशिष्ट भूमिका है| यदि चीन और भारत के बारे में ओबामा द्वारा कही गई बातों की बारीक़ी से तुलना की जाए तो यह रहस्य तुरंत समझ में आ जाएगा कि चीन अमेरिका की मजबूरी है  और भारत अमेरिका की पंसद है| अमेरिका पर चीन का 800 बिलियन डॉलर का कज़र् चढ़ा हुआ है, चीन की आर्थिक शक्ति बहुत तेज रफ्तार से बढ़ रही है, सैनिक दृष्टि से भी वह एशिया का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र है और वह सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य भी हैं| ऐसी स्थिति में ओबामा चीन की खुशामद न करें, तो क्या करें ? वे चीन के मुकाबले भारत को क्यों खड़ा करें ? जैसा कि शायद बुश चाहते थे, भारत-चीन-अमेरिका - यह नया त्रिकोण क्यों बने ? भारत चीन से प्रतिस्पर्धा में क्या उलझे ? इसीलिए डॉ. सिंह ने ठीक ही कहा कि वे 'शांतिपूर्ण चीन' के नवोदय का स्वागत करते हैं| वे चीन-अमेरिका संबंधों में अपनी टांग क्यों अड़ाएँ ? लेकिन उन्होंने यह अच्छा किया कि चीन की 'दादागीरी' का खुला जि़क्र कर दिया| यह कम महत्वपूर्ण नहीं कि दोनों देशों के संबंधों को प्रगाढ़ बनाने में अमेरिका में रहनेवाले भारतवंशियों का भी स्पष्ट उल्लेख हुआ| स्वयं ओबामा के प्रशासन में जितने भारतीयों को प्रमुख स्थान मिले हैं, क्या चीनियों को मिले हैं ? ओबामा का हिंदी बोलना, शाकाहारी भोजन परोसना, उनकी पत्नी मिशेल का भारतीय दर्जी से सिला सूट पहनना और हमारे प्रधानमंत्री के सम्मान में इतना बड़ा शामियाना-भोज आयोजित करना क्या विशेष आत्मीयता का परिचायक नहीं है ?

               इस आत्मीयता का अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका चीन और पाकिस्तान को दरकिनार कर सकता है| ये दोनों राष्ट्र उसकी मजबूरी हैं लेकिन संयुक्त वक्तव्य में अमेरिका ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि आतंकवाद की जड़ भारत के अड़ोस-पड़ोस में ही है| दोनों राष्ट्र आतंकवाद को उखाड़ने के लिए कटिबद्घ हैं| यदि आज अमेरिका का गुप्तचर विभाग भारत की सहायता नहीं करता तो क्या मुंबई-कांड के अपराधियों को पकड़ा जा सकता था ? ओबामा ने अफगानिस्तान में भारत की रचनात्मक भूमिका की तारीफ की लेकिन क्या पाकिस्तान के सहयोग के बिना अफगान-संकट का हल हो सकता है ? फिर भी ओबामा प्रशासन के दौरान ही कैरी-लुगार एक्ट पास हुआ है, जिसके तहत पाकिस्तान को मिलनेवाली मदद पर कड़ी नज़र रखी जाएगी ताकि उसका फौजी इस्तेमाल न हो सके| डॉ. मनमोहन सिंह ने वाशिंगटन-यात्र के दौरान भारत के प्रति पाकिस्तानी रवैए का विवेचन भी सही ढंग से कर दिया है| देखना यही है कि पाकिस्तान को पटरी पर लाने में भारत अमेरिका का कितना इस्तेमाल कर पाता है| यदि अमेरिकी दबाव नहीं होता तो क्या पाकिस्तानी अदालतें मुंबई के दोषियों को पकड़तीं ? डॉ. सिंह ने ओबामा को यह सही सलाह दी है कि वे अफगानिस्तान को अधबीच में छोड़कर न भागें लेकिन अगर वे उन्हें अफगान-चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता बता पाते तो उनकी हैसियत विश्व-नेता की बन जाती| ओबामा ने भारत और अमेरिकी संबंधों को निरंतर घनिष्टतर बनाने की वकालत की है| दोनों पक्षों ने शिक्षा, कृषि, सुरक्षा, पर्यावरण, व्यापार आदि क्षेत्रें में सहयोग बढ़ाने के लिए छोटे-मोटे कई समझौते किए हैं लेकिन अभी भी कई ऐसी तकनीकें हैं, जिन्हें अमेरिका भारत को देने में संकोच करता है| अभी तक अमेरिका ने भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने के बारे में कोई स्पष्ट राय प्रगट नहीं की है| यह ठीक है कि अभी भारत और अमेरिका के रिश्ते उस मुकाम पर नहीं पहुंचे हैं, जिस पर बि्रटेन और अमेरिका के हैं लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री की इस वाशिंगटन-यात्र ने उस मुकाम तक पहुंचने का रास्ता जरूर पक्का किया है|

(लेखक अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ है)

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                                                                                                                                          चांद परियाँ और तितली



लोमड़ी की पूँछ सफेद क्यों होती है ?


(नार्वेजियन लोककथा- अनुवादः शरद आलोक)



एक बार की बात है। एक औरत अपने मवेशियों (पशुओं) के लिए चरवाहा ढूंढने निकली। रास्ते में उसे एक भालू मिला।

“तुम कहाँ जा रही हो ?“ भालू ने पूछा।

“ मैं एक चरवाहा ढूंढने निकली हूं। “ औरत ने जवाब दिया।

“हो-हो“ भालू ने कहा।

“ नहीं, मैं तुम्हें चरवाहा नहीं बना सकती।“ कहकर औरत अपने रास्ते पर चल पड़ी। औरत अभी कुछ दूर तक ही गई थी कि उसे रास्ते में एक भेड़िया मिला।

“ तुम कहाँ जा रही हो? “ भेड़िया ने पूछा।

“ मैं एक चरवाहे की खोज में निकली हूँ।“ औरत ने उत्तर दिया।

“ क्या तुम मुझे चरवाहा नहीं रख सकती हो ? “ भेड़िये ने पूछा।

“ हाँ यदि तुम चारा खिला सको तब, “ औरत ने कहा।

“ ऊँह-ऊँह “ भेड़िया ने कहा।

“ नहीं- नहीं, मैं कतई नहीं रख सकती।“ औरत ने कहा और आगे अपने मार्ग पर चल पड़ी। वह कुछ ही दूर चली थी कि उसे एक लोमड़ी मिली।

“तुम कहाँ जा रही हो ?“ लोमड़ी ने पूछा।

“ओह! मैं एक चरवाहा ढूंढने जा रही हूँ,“ औरत ने कहा।

 “ क्या तुम मुझे अपना चरवाहा बनाओगी, “ लोमड़ी ने पूछा।

“ हाँ, यदि तुम चरा सकती हो, तब “ औरत ने कहा।

“ डिम डिमाडिम डिम “ कहकर लोमड़ी नाचने लगी।

“ हाँ, मैं तुम्हे चरवाहा बनाऊँगी “ औरत ने कहा और अपने मवेशियों को चराने के लिए लोमड़ी के हाथों सौंप दिया।

जब लोमड़ी पहले दिन औरत के मवेशियों को चराने गयी तो उसने औरत की सभी बकरियां खा ली। दूसरे दिन लोमड़ी ने सभी भेड़ों को मार डाला। लोमड़ी ने तीसरे दिन सभी गायों को मारकर खा लिया। एक दिन जब शाम को लोमड़ी को खाली हाथ वापस आते औरत ने देखा तो उसने उससे पूछा कि उसके मवेशी (पशु) कहाँ हैं ?


औरत मट्ठा मथ कर मक्खन निकाल रही थी। औरत ने सोचा कि मवेशियों को ढूँढना चाहिए। जब वह मवेशियों को ढूँढने बाह चली गई, लोमड़ी ने मक्खन और मट्ठे का मटटका लुढ़का कर मक्खन और मट्ठे को बाहर निकाल दिया। लोमड़ी जमीन पर गिरा सारा मक्खन और मट्ठा खा गयी। जब औरत वापस घर आयी और उसके मक्खन और मटके की दुर्दशा देखी, तो उसे बहुत गुस्सा आया। औरत ने बचे हुए मक्खन और मट्ठे को लोमड़ी के ऊपर फेंक कर मारा जो जाकर लोमड़ी की पूँछ के किनारे पर लगा। इससे लोमड़ी की पूँछ का सिरा सफेद हो गया। तभी से लोमड़ी की पूँछ का सिरा सफेद होता है।



***

1.








मुन्ना तेरा पालना


डलवाया सबने सामने


झुलावें तेरे दादा, झुलावें तेरे पापा 


झुलावें  सब घरवाले आते-जाते


तेरा सोने का है झुनझुना


तेरी चांदी की है पायलिया


तेरे आंगन नांचे मोर रे


झूल ललना झूल तू झूलना।


          बालगीत (राजस्थान)





2.








अट्टन बट्टन दही चटोरन


मामा लाए सात कटोरी


एक कटोरी फूटी


मामा की बहू रूठी


किस बात पे रूठी


दूध-दही बहुतेरा


मामी का मुंह टेढ़ा।  


           बालगीत (ब्रिज)



                                                     अनुवादः शैल अग्रवाल