सन्नाटा वसुधा पर छाया, नभ में हमनें कान लगाया, फ़िर भी अगणित कंठो का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं कहते हैं तारे गाते हैं "
-हरिवंशराय बच्चन
-धुँध के पार-
लेखनी-नवंबर-2009
(वर्ष-3-अँक-33)
इस अंक में- कविता धरोहरः अज्ञेय। कविता आज और अभीः गिरीश पंकज, शैल अग्रवाल, किशोर काला, तेजराम शर्मा, रामाश्रय सिंह। माह के कविः सुरेश पंडा। गजलः जतिन्दर परवाज़ । बाल कविताः शेरजंग गर्ग ।
परिचर्चाः सुशील कुमार । मंथनः लक्ष्मीमल सिंघवी। परिचयः अनवर सुहैल। कहानी समकालीनः अनवर सुहेल। कहानी धरोहरः निर्मल वर्मा।लघुकथाः डॉ. श्याम सखा श्याम । परिदृश्यः शैल अग्रवाल। रागरंगः सीताराम गुप्ता। गुलदस्ताः डॉ. ओमप्रकाश श्रीनिवास येमुल। हास्य व्यंग्यः संदीप मील। बाल कहानीः शमशेर अहमद खान। चौपालः वेदप्रताप वैदिक और माह की साहित्यिक व सांस्कृतिक खबरों से भरपूर विविधा।
In the English Section:
Autumn: by various artists. Favourite Forever: John Dunn. Poetry Here & Now: Ashok Gupta. Story:James Joyce. Talking Heads:Devi Nagrani. Kids' Corner: Akbar-Birbal story and a poem by Richard Edwards.
जाड़ों की सुबह और छह बजे का समय... दांत किटकिटाती ठंड में गुड़गांव से अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड़्डे की तरफ कार दौड़ी चली जा रही थी। आसपास बिखरी गहरी और घटाघोप धुंध को चीरती, दौड़ती-भागती सैकड़ों कारें भयभीत करने वाली सरसराहट के साथ दाँये-बाँये दोनों तरफ से ही निकल जातीं। जल्दी तो थी, परन्तु कभी ड्राइवर को धीरे कार चलाने को आगाह करती तो कभी संभलकर। अचानक सारी मानसिक व्यग्रता को दुगना करता, सड़क पर पड़ा एक कटे हाथ का पंजा दिखलाई देता है।... विस्मित और भयभीत आँखें सबकुछ साफ-साफ देखने की केशिश करती हैं। जैसे ही कार थोड़े और पास पहुँची... पाँचों मुड़ी उंगलियाँ पंजे सहित सामने छिली पड़ी हुई थीं और ऐसे मुड़ी, मानो कुछ समय पहले ही किसी वाहन का हैंडल पकड़े हुए थीं, पर अब सफेद क्षत-विक्षत मांसपेशियों के जाल में जकड़ी और शरीर से छिटककर दूर सफेद रबर के खिलौने सी बेजान: ऊपर की चमड़ी पूरी तरह से छिल चुकी थी। थोड़े और आगे दूसरा ढेर दिखलाई दिया, शायद पेट से निकली आंतों का; दृश्य किसी डरावनी फिल्म-सा अविश्वनीय हो गया।
जानवर तो ऐसे पड़े देखे थे, परन्तु सड़क पर मानव अवयवों का यूँ उपेक्षित पड़े दिखना..., मन गहरे अवसाद से भर गया...पता नहीं कौन था वह...पता नहीं घर वालों को पता भी है या नहीं! क्षोभ से विकृत मन और मुख को विंग मिरर में देख ड्राइवर अनायास ही कहता है ...' आप उधर मत देखो, आंखें बंद कर लो...यह तो यहाँ रोज की ही बात है। सुबह जब आदमी घर से निकलता है तो पता नहीं रहता कि शाम को घर वापस पहुँचेगा भी या नहीं।' एक युवा के मुंह से निकली हुई वे बातें पूरी मानवता का, विकसित सभ्यता का मखौल-सा करती प्रतीत हुईं और बेचैन मन दार्शनिक बना विचारों की गूढ़ कन्दराओं में जा छुपा...।
जिस ‘मैं‘ को कभी देखा नहीं, जो ‘मैं‘ निश्चय ही एकदिन अपनी कहलानेवाली हर चीज को यूँ छोड़कर चला जाता है...या जबर्दस्ती उठा लिया जाता है; कितने आश्चर्य की बात है उसी मैं की सेवा करते, बातें करते, सोचते-बिचारते पूरी उम्र निकल जाती है ; शायद ऐसी ही किसी मनःस्थिति में शेक्सपियर ने कहा था कि ‘चांद तारों से आगे भी जहाँ और हैं’... कहने वाले तो यहाँ तक कह गए कि जागती आंखों से देखा-सुना यह संसार मात्र एक स्वप्न है और जो वास्तविक है, जगने या स्वप्न टूटने के बाद ही शुरु होता है। दूसरी तरफ विपक्ष में ऐसे भी हैं जिन्होंने इस मान्यता को खंडित करते हुए कहा है कि जो है, यहीं है, इसके आगे-पीछे कुछ भी नहीं! ...'
विचारों की गहराती उलझनें अक्सर ही सोचने को मजबूर कर देती हैं कि क्या ये ज्ञानी-विज्ञानी वाकई में कुछ ऐसा जानते है, अनुभव कर चुके हैं, जिसे हम-आप कभी जान या समझ ही नहीं पाए या फिर सिर्फ बातें करने को, तर्क करने को अटकलें लगाते रहते हैं वे ! आम आदमी को तो पूरी भ्रमित करने वाली हैं ये बातें... खिड़की से बाहर दिखती घनी उस धुंध की तरह जो दस-दस फुट लम्बे पेड़ों तक को अपनी चादर में छुपा ले जाती है। वैसे भी तो अक्सर ही आँखें बहुत कुछ देखकर भी देख नहीं पाती या देखना तक नहीं चाहतीं...कभी भय से घबराकर तो कभी उपेक्षा या अवहेलना में, विशेषकर दूसरों का दुख-दर्द ...!
बेचैन करती चुप्पी के साथ गाड़ी की रफ्तार तेज करके वह झट आगे बढ़ आया था। सोचती हूँ,- कार को तो वहाँ से जल्द-से जल्द हटा ले गया , और पल भर में ही सब कुछ वैसे ही पड़ा पीछे छूट भी गया; पर क्या आज भी दृश्य पीछे छूट पाया..? क्या यही इलाज है इन परिस्थितियों से निपटने का..'.पलायन' ...क्या बस यही एक तरीका शेष रह गया है हमारे पास! ...
सोच की भंवरों में कितना भी डूब लें सच्चाई तो यह है कि न तो आम आदमी के पास इतना वक्त रहता है न ही इतना साहस कि दूसरों की सोचे, कानून और व्यवस्था से उलझ पाए, हाँ इतना जानना अवश्य जरूरी है कि जहां कहीं भी अति या अन्यथा अतिक्रमण और अन्याय ... स्वार्थ होगा, वहीं धुंध ( देखने-सोचने-समझने की अस्पष्ट प्रक्रिया ) होगी। ... भले ही मौसम की धुंध हो या लालच और कुरीतियों की। दुर्व्यवहार और अनाचारों की हो या दीन-दुनिया को भुलवा देने वाला कोई खुद हमारा अपना पाला भ्रम हो। या फिर सब कुछ और धुंधला कर देने वाली प्यार की दीवानगी , या फिर नफरत या निराशा की ही धुंध हो !
धुंध, जो रहस्य है, चित्र है, भ्रान्ति है, इस घटाघोप कुहासे की वजहें तो कई हो सकती हैं परन्तु परिणाम सदा एक ही रहता हैः धुंधला और अस्पष्ट- समझ और सोच की पकड़ से दूर और पूर्णतः भ्रामक... दृष्टि से सब कुछ लपेटे और छुपाए...एक बेचैन और लाचार करता कोहराम। देखना चाहें तो भी दिखे नहीं, और दिखे भी तो स्वप्न-सा धुंधला...अस्पष्ट और अनचीन्हा...समझ और पहुंच से परे...जैसे अवचेतन मन में तैरती यादें; अधबनी बेरंग तस्बीरें... स्मृति और विस्मृति की तरंगों पर बेमतलब ही डूबती-उतराती।
चीजों को देखने, अनुभव करने, समझने की क्रिया भी तो व्यक्तिगत ही होती है। ज्ञानी को जहां यह धुंध परदे के पीछे छिपी अनिश्चितता या रहस्य लगती है, जिसे वह सुलझाना चाहता है, तो प्रेमीयुगल को बेहद रोमांटिक। उमड़ते बादलों को देख प्रियतमा के साथ बैठा प्रेमी मेघ-मल्हार गाता है तो विरही नीर बहाता है। मानव स्वभाव की तरह ही समझ या अनुभूति भी तो कई-कई रूप और आयाम लेती रहती है...लेती आई है और आँखों के आगे भांति-भांति के प्रश्नचिंह लगाती चलती है; जैसे क्या यह धुंध बाहर दृश्य में है या फिर खुद देखने वाली आंखों में... इनकी ठीक से न देख पाने की असमर्थता में? फिर इस कोहरे को लौकिक-पारलौकिक भांति-भांति के रहस्यों के अतिरिक्त अज्ञान और माया से भी तो जोड़ा जाता रहा है। तो क्या अंधेरे को चीरती मनःस्थिति या ज्ञान ही वह रोशनी है जिससे मंडित होकर हम चीजों को उनके वास्तविक और विविध रंगों में देख पाते हैं...देख सकते हैं। पर ऐसी दृष्टि के लिए भी तो एक पारदर्शी मन की जरूरत होती है, जबकि मानव मूल्यों के प्रति पूर्ण तिरस्कार और दूसरों के अहसासों के प्रति पूर्णतः अवहेलना और उपेक्षा निश्चय ही आज हमें और-और संवेदना हीन और अकेला ही करते जा रहे हैं ।
प्रकृति और मन की यह आंख-मिचौली और फिर इनके आपसी उलझाव और अपरिहार्य सामंजस्य का खेल तो सृष्टि के शुरुवात से ही चला आ रहा है। प्रकृति की विविधता को...उदारता को, इसके कोप को, मानव विविध रूपों में सहता और समझता है; कभी डूबकर तो कभी उनसे डरकर। पूजा से लेकर पर्व और पर्यटन तक जाने किस-किस रूप में अभिव्यक्त किया है उसने खुद को, कभी आभार स्वरूप तो कभी मात्र प्रसन्न करने के लिए ... गहनतम रूप तक में रोशनी की एक लकीर, एक रास्ता-सा ढूँढते हुए ।
मौसम ही नहीं धुंध आज के शब्दकोष में अवचेतन मन का भी पर्याय बनती जा रही है। इसके आते ही अपराध और कुत्सित व्यवहारों में वृद्धि हो जाती है। वह जमाना और था जब मन या इन्द्रियों पर नियंत्रण की बातें होती थीं, हमारे ऋषि-मुनि इच्छाओं की तुलना एक ऐसी अग्नि से करते थे जिसमें जितनी कामना की आहुति दो उतनी ही तीव्र होकर धू-धू करेगी। आज तो लगता है मानव ने अपने जीवन की बागडोर ही इसे सौंप दी है। शोध-पर शोध हो चुके हैं और बहुत कुछ लिखा-पढ़ा जा चुका है अवचेतन मन पर। फ्रायड और यंग के अनुसार तो यह ‘इड’ या आंतरिक मन ही सबकुछ है, इसीके सहारे मानव जीवन पूर्णतः संचालित होता है और यही उसकी सफलता, असफलता..रुचि और व्यवहार आदि की क्लिष्ट गाथा लिखता है। यही उसके सारे आंतरिक.स्पष्ट-अस्पष्ट रहस्य और विकारों का ठिकाना भी है और उनसे छुटकारा पाने का यंत्र भी। तो क्या यही मन में छुपा राम और रावण दोनों ही है। सोने की लंका है...दम तोड़ते दशरथ हैं...कैकयी और मंथरा हैं… दानव व महादानव ही नहीं, निर्बल परन्तु चतुर वानर सेना भी है... राम के दूरदर्शी, सक्षम पर समर्पित नायक हनुमान हैं...सहगामी और सहधर्मी, कर्तव्यपरायण लक्ष्मण और सीता हैं? जब सब कुछ हमारे अपने अंदर ही है तो कहीं-न-कहीं नियंत्रण भी तो हमारे अपने अंदर ही होना चाहिए। फिर क्यों यह मन सदैव ही अश्वमेध यज्ञ रचाता रहता है और अपनी शर्तों पर जीने व जीतने में ही सुखी रह पाता है, हार और अपनों से हारने के सुख को समझना ही नहीं चाहता, क्यों संयम और धैर्य आज के तेज गति वाले जीवन और मन दोनों से ही छूटते और टूटते जा रहे हैं!
सब जान-बूझकर भी क्यों होने देते हैं हम इतने राक्षसी और क्रूर अत्याचार खुद पर भी और अपने आसपास पर भी? क्यों नहीं मार सकते मन के अंदर बैठे रावण को…? माना कि कवियों ने कहा है कि वियोगी होगा पहला कवि, आह से निकला होगा गान, और मानव-मन नित नई कविता- कहानी और गीत रचता रहता है...तस्बीरें बना-बनाकर अमर कर देना चाहता है अपने हताश-निराश सभी तरह के मनोभावों को, परन्तु सच्चाई यह है कि मनुष्य स्वभावतः ही सरवाइवर और योद्धा है। कलि और प्रलय की कल्पना के पहले वह बृह्मा और विष्णु को रच लेता है ...नोहा की नाव बना लेता है क्योंकि विषम से विषम परिस्थिति में भी जीतना और जीना ही चाहता है। हजार तकलीफों और विषमताओं के बाद भी इतना निराशावादी नहीं वह कि बस दुख-दर्द और भटकन को ही आजीवन सीने से लगाए रहे, और एक नशे की सी हालत में जीता रहे, अपने गम गलत करता हुआ।...दुरूह जंगल हो या अगम्य पर्वत; धरातल पर ही नहीं सागर की अभेद्य गहराइयों से भी उसने जीवन विष के साथ आनंद का अमृत कलश ढूँढा हैः और उसीका संकल्प और स्थापन दोनों ही करता आया है वह जीवन में... धरोहर की तरह निराशा और कुंठा को संभाल कर रखना नहीं चाहा कभी उसने।
सत्यं शिवं और सुन्दरम् की तरफ ले जाने वाली कला और कलाकार क्या दोनों ही आज भटक चुके हैं, या यह भी हमारी हताश आंखों की धुंध मात्र है...कला का एक प्रचलन मात्र है? माना कि धुंध का संबंध अवचेतन मन की यादें और ग्रन्थियों के साथ-साथ चेतन मन के भ्रम और भ्रान्ति...छलावा आदि से भी है...अवसाद से है, परन्तु गहरी-से गहरी धुंध में भी तो पता रहता है..(.आस रहती ही है) कि पीछे सूरज भी है, जो मौका मिलते ही निकल आएगा और सब पुनः साफ नजर आने लगेगा। धुँध हो या चटक धूपः सोच न सिर्फ व्यक्ति की निर्मात्री और अधिधात्री है; चरित्र , आचरण खुद राग-रंग, सफलता-असफलता आदि की सहज सहचरी भी।
प्रस्तुत है लेखनी का यह अंक इसी धुंध यानी कि अंतर्मन(चेतन, अवचेतन) की जटिलताओं पर...इनके अनचीन्हे, अधूरे और जटिल स्वप्नों पर, उनसे निकल पाने की व्यग्र और बेचैन ललक व तड़पड़ाहट पर ...
सच-मुच के आये को कौन खोले द्वार! हाथ अवश नैन मुँदे हिये दिये पाँवड़े पसार!
कौन खोले द्वार!
तुम्ही लो स्त्रहास खोल तुम्हारे दो अनबोल बोल गूँज उठे थर-थर अन्तर में सहमें साँस लुटे सब, घाट-बाट, देह-गेह चौखटे-किवार।
मीरा सौ बार बिकी है गिरिधर ! बेमोल ! सच मुच के आये को कौन खोले द्वार!
नाच
एक तनी हुई रस्सी है जिस पर मैं नाचता हूँ। जिस तनी हुई रस्सी पर मैं नाचता हूँ वह दो खम्भों के बीच है। रस्सी पर मैं जो नाचता हूँ वह एक खम्भे से दूसरे खम्भे तक का नाच है। दो खम्भों के बीच जिस तनी हुई रस्सी पर मैं नाचता हूँ उस पर तीखी रोशनी पड़ती है जिस में लोग मेरा नाच देखते हैं। न मुझे देखते हैं जो नाचता है न रस्सी को जिस पर मैं नाचता हूं न खम्भों को जिस पर रस्सी तनी है न रोशनी को ही जिस में नाच दीखता हैः लोग सिर्फ नाच देखते हैं। पर मैं जो नाचता हूँ जो जिस रस्सी पर नाचता हूँ जो जिन खम्भों के बीच है जिस पर जो रोशनी पड़ती है उस रोशनी में उन खम्भों के बीच उस रस्सी पर असल में मैं नाचता नहीं हूँ। मैं केवल उस खम्भे से इस खम्भे तक दौड़ता हूँ कि इस या उस खम्भे से रस्सी खोल दूँ कि तनाव चुके और ढील में मुझे छुट्टी हो जाये- पर तनाव ढीलता नहीं और मैं इस खम्भे से उस खम्भे तक दौड़ता हूँ पर तनाव वैसा ही बना रहता है सब कुछ वैसा ही बना रहता है। और वही मेरा नाच है जिसे सब देखते हैं मुझे नहीं रस्सी को नहीं खम्भे नहीं रोशनी नहीं तनाव नहीं देखते हैं नाच !
चीनी चाय पीते हुए
चाय पीते हुए मैं अपने पिता के बारे में सोच रहा हूँ।
आप ने कभी चाय पीते हुए पिता के बारे में सोचा है ? अच्छी बात नहीं है पिताओं के बारे में सोचना। अपनी कलई खुल जाती है।
हम कुछ दूसरे हो सकते थे। पर सोच की कठिनाई यह है कि दिखा देता है कि हम कुछ दूसरे हुए होते तो पिता के अधिक निकट हुए होते अधिक उन जैसे हुए होते। कितनी दूर जाना होता है पिता से पिता जैसा होने के लिए !
पिता भी सवेरे चाय पीते थे। क्या वह भी पिता के बारे में सोचते थे- निकट या दूर ?
बोलो चिड़िया
चिड़िया को जितने भी नाम दिए थे सब झूठे पड़ गये स्वयं जब बोली चिड़िया नहीं कहा कुछ मैं नेः ताका किया से चुप चिड़िया ने भी नहीं कहा चिड़िया केवल बोली रही अप्रतिम गुणातीत आप्लवनकरी
बोलो, बोलो, बोलो, चिड़िया भरो जगत् को एक बार फिर डूब चलूँ मैं डूब चलूँ पर डूबूँ नहीं रहूँ सुनता सुनने में रहूँ अनश्वर बोलो चिड़िया बोलो, बोलो, बोलो !
अजीब मौसम है यह आँसुओं सा उमड़ता-जमता धरती के सीने से आह बन जो उठता धुँआ धरती के सीने पे कहर-सा बरसता धुँध बनकर जम गए सपने आँखों के नम काँच पे और फैलता गया अँधेरा रातभर - फिसल-फिसल काँपती उँगलियों के ठँडे बेजान पोरों से पर सूखी-नंगी मनकी नादान ये टहनियाँ करती रहीं इन्तजार आज भी जाने किसका यूँ एड़ियों पे उचक-उचक
-शैल अग्रवाल
साथ आओगे तो ...
साथ आओगे तो मुझको हौसला मिल जाएगा साँस लेने का समझ लो सिलसिला बन जाएगा यूं अकेला भी चलूँ तो कौन रोकेगा मुझे तुम रहोगे साथ तो ये रास्ता कट जाएगा थे बहुत छोटे तो सारे भाई-बन्धु एक थे क्या पता था के बड़े होंगे तो घर बंट जाएगा आपके होने का दम जो लोग भरते है यहाँ आने दो कोई मुसीबत सब पता चल जाएगा प्यार दे कर जीत लो इस ज़िंदगी की जंग को हो कोई दुश्मन तुम्हारे रंग में ढल जाएगा
-गिरीश पंकज
पाप
हमें लगता है मरने के बाद भी पुरखों की आत्माएँ भटकती रहती हैं
विरोध करते रहते हैं वे उनके साथ हुए वर्ताव का गाँव के ओझा को सुनाई दे जाती हैं उनकी आवाजें
उनके अदृश्य हाथ चाहे उठते रहते हों दुआओं में पर ओझा कर देता है हमारे कलुष की पुष्टि
पुरखे बन जाते हैं पाप आत्माएँ पीढ़ियों के बीच रहती है खाली जगह
हमारे समय तक आते जाते फैल जाता है उसमें आकाश जहाँ उठती रहती हैं हमारे ही पापों की अनुगूँजें।
-तेजराम शर्मा
पिंड दान
क्या तुम्ही हो वहाँ पर सुन सकते हो मुझे स्वीकारते हो अर्पण या फिर यह अन्धी आस्था मेरी बिखर जाएगी यूं ही लहरों सी धुन धुन के सर झाग फेंकती संस्कार और अनुष्ठानों के पथरीले तट।
शैल अग्रवाल
जीवन के रंग
जीवन के होते है कई रंग जो हर पल बनते बिगड़ते रहते हैं इन्द्रधनुष की तरह
बिजली की चमक के साथ गरजते हुए बादलों की तरह बरसती रहती है जिंदगी
लहराती बलखाती नदी की तरह इठलाती है जिंदगी पेडो में उगते नव-पल्लव हहराती हवा में झूमते नाचते सिखाते है जिंदगी को एक नया सबक
उगती हुई धरती के सीने पर खड़ी होती है जब अट्टालिकाएँ जिंदगी बेबसी के आंसू रोती है
और जब आती है ऋतुएँ बदल-बदल कर बदल देती है आबो हवा बदलते रहतें है जिंदगी के रंग कभी सुख में कभी दुःख में --
-किशोर काला
मुट्ठी भर
बचपन में माँ मुट्ठी भर आटा रोज परात से एक कनस्तर में डालती थी सदाव्रत के लिए
नियम अटल था बस मुट्ठी भर
पर मेरी उंगलियों के बीच से रेत की तरह फिसल रहे हैं मुट्ठी भर सपने मुट्ठी भर हवा मुट्ठी भर आकाश मुट्ठी भर धूप
अमूर्त छबियों के झरोखे में बंद तुमको देखकर दीर्घ निश्वासों की कड़ी दिखती नहीं टूटेगी अब कंदर्प को अब तक नहीं पहचान पाया था कुसुम शर से बिद्ध होने का ही था अहसास कब ।
भाव जलनिधि का अतुल विस्तार क्या देखा कहीं अपनी इयत्ता को सकल साकार बस देखा वहीं फिर न कहना जागतिक अनुताप का भय विकल हो भागा कहीं हूँ ।
स्वप्न से जागा नहीं हूँ ।
अनकही बातें पुरानी आज फिर आतुर हुई हैं तृप्त मन की वंदना फिर आज अभिमंत्रित हुई है मापने की क्या जरुरत नया सा कुछ भी नहीं है होने न होने का नहीं संशय अटल विश्वास ही है ।
रुप , रस और गंध की बढ़ती पिपाशा आसक्त मन का जागरण निःशेष आशा कर रहा है दर्पमय जयघोष फिर अपने अहं का अवांतर की जोड़ का धागा नहीं हूँ ।
स्वप्न से जागा नहीं हूँ ।
मन मेरा चंचल हुआ है ।
जागरण की ले अभिप्सा दूर तक चलता रहा हूँ अठखेलियाँ करता रहा तन जानकर गलता रहा हूँ एक अनसुलझी पहेली है मुझे फिर आज घेरे भ्रान्ति में करता रहा हूँ अनगिनत अनवरत फेरे ।
प्यास की उस तीव्रता ने अश्वगति को छू लिया है । मन मेरा चंचल हुआ है ।
कामनामय ज्वार थमने का नहीं है नाम लेता सरस उर की धड़कनों से भी अजाने काम लेता प्रार्थना के स्वर अबोले कंठ से झरते नहीं हैं विकल मन में राग के कुमकुम बिखरते जा रहे हैं ।
थिर नहीं होता है तन मन कौन जाने क्या हुआ है । मन मेरा चंचल हुआ है ।
अहम की सत्ता निराली फैलती चौदह भुवन में दर्प बनकर है खड़ा अगुवार फिर अपने बरन में स्वाँस बेचारी बनी चढ़ती उतरती जा रही है काल के आगोश में स्वयमेव तिरती जा रही है ।
फिर भुलावे में रहा जी, स्वप्न क्या कब सच हुआ है । मन मेरा चंचल हुआ है ।
तुम न आये लौटकर फिर, आ गया संदेश मेरा
स्निग्ध स्नाता चाँदनी थी मन विहग था पाँख खोले तरंगायित रागिनी के मदिर स्वर थे सुमन फूले उल्लास का पर्वत हरा था बरसते थे मेह झरझर भोर का तारा उगा था हर्ष का मनुहार बनकर ।
बाट तकने की न सुध आई सुवाषित था बसेरा तुम न आये लौटकर फिर, आ गया संदेश मेरा
ओस भीगी यामिनी थी कांपते थे अंग मेरे टीसती थी अलस काया ताप के थे तंग घेरे नयन अश्रु से भरे थे विकल मन का संग पाकर समय का आभास खोकर जगे थे आशा सुलाकर ।
स्पर्श की कमनीयता से बन रहा था पुलक घेरा तुम न आये लौटकर फिर, आ गया संदेश मेरा
स्वप्न की माया ने दिखलाये अनेकों विरल रंग शिखर को भी छू लिया अनुराग मुद्रा थी त्रिभंग सजगता क्या भिन्न रुपा नाटिका बन जायेगी संगिनी बनने की मेरी चाह ना घुट जायेगी ।
ओह कितना क्लेशदायी बन गया निज सत्य मेरा तुम न आये लौटकर फिर, आ गया संदेश मेरा ।
क्यों खड़ी हम ने की हैं दीवारें दूर जब कर रही हैं दीवारें
जैसे कोई सवाल करता है इस तरह देखती हैं दीवारें
अब मुलाक़ात भी नहीं मुमकिन दरमियाँ आ गई हैं दीवारें
इक झरोका भी इन में रख लेना रौशनी रोकती हैं दीवारें
बारिशों ने गिरा दिया छप्पर सिर्फ़ अब रह गई हैं दीवारें
लग के दीवानों-ओ-दर से रोता हूँ और मुझे देखती हैं दीवारें
कितना दुशवार है सफ़र 'परवाज़' हर क़दम पर उठी हैं दीवारें।
ख़्वाब देखें थे घर में क्या क्या कुछ मुश्किलें हैं सफर में क्या क्या कुछ फूल से जिस्म चाँद से चेहरे तैरता है नज़र में क्या क्या कुछ तेरी यादें भी अहल-ए-दुनिया भी हम ने रक्खा है सर में क्या क्या कुछ ढूढ़ते हैं तो कुछ नहीं मिलता था हमारे भी घर में क्या क्या कुछ शाम तक तो नगर सलामत था हो गया रात भर में क्या क्या कुछ हम से पूछो न जिंदगी ‘परवाज़’ था हमारी नजर में क्या क्या कुछ
यूँ ही उदास है दिल बेकरार थोड़ी है मुझे किसी का कोई इंतजार थोड़ी है नजर मिला के भी तुम से गिला करूँ कैसे तुम्हारे दिल पे मेरा इख़्तियार थोड़ी है मुझे भी नींद न आए उसे भी चैन न हो हमारे बीच भला इतना प्यार थोड़ी है ख़िज़ा ही ढूंडती रहती है दर-ब-दर मुझको मेरी तलाश मैं पागल बहार थोड़ी है न जाने कौन यहाँ सांप बन के डस जाए यहाँ किसी का कोई ऐतबार थोड़ी है
यार पुराने छूट गए तो छूट गए कांच के बर्तन टूट गए तो टूट गए सोच समझ कर होंठ हिलाने पड़ते हैं तीर कमाँ से छूट गए तो छूट गए शहज़ादे के खेल खिलोने थोड़ी थे मेरे सपने टूट गए तो टूट गए इस बस्ती में कौन किसी का दुख रोये भाग किसी के फूट गए तो फूट गए छोड़ो रोना धोना रिश्ते नातों पर कच्चे धागे टूट गए तो टूट गए अब के बिछड़े तो मर जाएंगे ‘परवाज़’ हाथ अगर अब छूट गए तो छूट गए
यह गंभीरता से विचारने का वक्त आ चला है कि वे कौन-कौन से कारक हैं जिसने कविता को आमजन से दूर कर दिया है जहाँ संचार-तकनीक की नित्य फैलती इस मायावी दुनिया में कविता की जगह निरंतर सिकुड़ती जा रही है। हालाकि यह विचार भी अर्धसत्य ही है क्योंकि वास्तव में यदि कविता का संसार लघुतर हो रहा होता तो फिर रोज़ इतनी कवितायें क्यों लिखी जातीं? आखिर कौन लिख रहा इन्हें और पढ़ कौन रहा ? इतना तो अवश्य है कि कविता में जो बोझिलता, उबाऊपन और नीरसता के जो अक़्स आये हैं उससे पाठकों में वह चाव नहीं रहा जो आज से दो-तीन दशक पहले हुआ करता था। इस कारण कविता जितनी तेजी से आज लिखी - पढ़ी जाती है उतनी ही गति से विस्मृत भी हो जाती हैं। खुद कवियों तक को अपनी कवितायें याद नहीं रहती। मैं बात मंच पर गाने वाली कविता की नहीं कर रहा। पर निराला, जयशंकर प्रसाद, दिनकर, महादेवी, पंत, मुक्तिबोध की कविता की पंक्तियाँ हमारे जेहन में आज भी गाहे-ब-गाहे आ जाती है। इसके क्या कारण है? क्या आज कविता अपने मूल स्वभाव से विलग हो गयी है? क्या हमने अपनी बुद्धि-विस्तार में कविता की भावपरायणता को इतना दरकिनार कर दिया है? विचार-बोध के प्राबल्य से रची कविता में वह लोच क्यों नहीं आ पा रही जो पहले की कविता में हुआ करती थी? * * * * * * * * * * * मध्यकालीन भक्ति-साहित्य को कुछ लेखक-पाठक हिन्दी काव्य का स्वर्ण-युग मानने से कतराते हैं और अपनी बात के समर्थन में यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि धर्म-अध्यात्म इस देश की जड़ में है, यह यहाँ की परम्परा का उत्स रहा है। यही कारण है कि सूर-कबीर-तुलसी-जायसी साहित्य के पुरोधा-कवि हो गये।आगे वे कहते हैं कि जिन घरों में कोई साहित्यिक माहौल नहीं, वहां भी तुलसी की चौपाईयाँ और कबीर के सबद गाये जाते हैं। उनका यह भी कहना है कि अगर उन्होंने कालजयी साहित्य का सृजन किया होता तो आज के दौर में उनकी कृतियां भी अपेक्षाकृत क्यों कम पढ़ी जाने लगी हैं। * * * * * * * * * * * * अंतर्जाल पर आम तौर पर जो कवितायें लिखी जा रही हैं वह मध्यमवर्गीय बुर्जुआ सोच की तस्वीर की ही है। उनका मानना है कि अगर साहित्य में सार्वजनीनता और सार्वदेशिकता की बात होती है तो उसमें सब सम्मलित होता है यानी कि रूपवादी भाव और मध्यमवर्गीय सोच से बुनी-रची कवितायें भी साहित्य का प्रधान अंग होना चाहिये और उसको भी उतना ही दर्जा मिलना चाहिये। सोवियत-युनियन के विघटन के बाद मार्क्स-वाम सत्ताधीशों का जिस तरह से पतन हुआ और वहां के गणराज्य अलग होकर पूँजीवाद के हिमायती हो गये, रूस जैसे देश जी- आठ ग्रुप में शामिल हो गये और पूँजीवाद के समर्थक देश बन गये, उसके बाद तो जन- सामान्य में भी यह विचार तेजी से घर कर गया कि वाम विचार-धारा का इतिश्री हो चुका है। जनवादी लेखकों के गिरते चरित्र का हवाला देकर अब वे लोग कविता या कहें पूरे साहित्य को उसी दिशा में घसीट कर ले जाने का उपक्रम कर रहे हैं जिस दिशा में उनकी सोच और संस्कृति अग्रसर हो रही हैं। यहां बाजारवाद गहरी चोट पड़ रही है और लोग लोकधर्मिता और जनचेतना को बाज़ार का बलि बना देने पर आमादा हैं। * * * * * * * * * * कुछ समय पहले आज की गद्य-कविता के स्वरूप को लेकर प्रसिद्ध कथाकार संजीव जी ने कई जेनुईन सवाल उठाये थे और जयपुर की कविता पत्रिका "कृति-ओर" में इस पर लम्बी बहस चल पड़ी थी। यह ठीक है कि आज जितनी भी कविता लिखी जा रहीं है, उसे काव्य- रूप-विधान की दृष्टि से जाँच-परखकर कविता को परिभाषित करने की आवश्यकता है क्योंकि यह जरूरी है कि कविता को हर सूरत में कविता ही बना रहना चाहिये। वह गद्य के वेश में भी कविता रहे, यह उसकी पहली शर्त होनी चाहिये। निराला ने जब पुराने छंद का बंधन तोड़कर, गद्यात्मक वाक्यों से बने हुए मुक्त-छंद को अपनाया था, तब उन्होंने अपने तरह से, उसके लिये छोटे-छोटे , क्रियाशील और सिद्ध वाक्यों की संरचना को काम में लेकर एक नयी राह खोली थी। उन्होंने उसे मुक्त करते हुए भी उसे "कवित्त" छंद की लय को उसकी रूप संरचना में बनाये रखा था। उसके बाद दूसरे और तीसरे तारसप्तक के कवियों ने भी कविता में प्रगीत के अनुशासन को बनाये रखा। इसी तरह सप्तकों के बाहर के कविगण नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध, त्रिलोचन, विजेन्द्र, एकान्त श्रीवास्तव इत्यादि कवियों ने भी कविता की लय पर अपना पूरा ध्यान केन्द्रित किया। परन्तु कविता में अराजकता की प्रवृति तबसे अधिक लक्षित होने लगी जबसे आलोचना में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के बाद कविता के रूप संबंधी प्रश्नों पर गंभीरता और सावधानी नहीं बरती गयी। इसकी फलश्रुति यह हुई कि अकविता का मौहाल बनने लगा और कविता के नाम पर एक तरह की उच्छृंखलता और अनुशासनहीनता को प्रोत्साहित किया जाने लगा। फलत: कविता के रूप में लद्धड़ गद्य-रूप की कविता सामने आने लगी। कविता में प्रगीतात्मकता और बिम्बग्रहण का तिरस्कार किया गया। नामवर सिंह जैसे नामचीन आलोचकों ने कविता के नये प्रतिमान में भी पाश्चात्य शैली की कविता का अनुसमर्थन कर तत्कालीन भारतीय चित्त के श्रेष्ठ कवियों यथा त्रिलोचन, नागार्जुन जैसे कवियों की अपेक्षा रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा जैसे मँझोले कवियों की काव्य-व्यंजना को पाठकों के समक्ष प्रभावशाली ढंग से परोसा। नजीतन, कविता अपनी रूपाभा खोकर पूरी तरह गद्यात्मक और स्मृतिहीनता की जद में आने लगी। पर ये कवितायें जब दृश्य में देर तक टिक न पायीं तो फिर कविता के क्षितिज पर कई कवि उदित हुए जिनकी लोकधर्मिता और इन्द्रियबोधात्मकता के कारण उनकी कविता महत्वपूर्ण मानी गयीं। जहाँ तक कविता की स्मृति का प्रश्न है तो यह बात सही नहीं कि सारी गद्य कविता लयविहीन और नीरस है। कविता अब श्रव्य होने के बजाय ज्यादातर पाठ्य हो गयी है। स्मृतिपरकता कविता की कसौटी नहीं हो सकती। श्रुति परम्परा में तो लोगों ने पूरे वेद को ही कंठाग्र कर लिया था।पर वह सब काव्य की परिधि में नहीं आता। हमारे कवियों ने मुक्तक और प्रबंध काव्य के साथ -साथ गीति-काव्यों की भी रचना की। आधुनिक युग में भारतेन्दु, प्रसाद और निराला इसके प्रमाण हैं। जहाँ तक गीत का सवाल है, वह कविता से स्वतंत्र विधा है। हमें छंद से आज भी परहेज नहीं, कोई लिखता है तो अच्छी बात है। पर आज जीवन जितना व्यापक, जटिल और कठोर हो गया है और यथार्थ जितना दुरुह कि पूरे जीवन के स्पंदन और रंग को छंदयुक्त कविता में समेट पाना संभव नहीं। ध्यान देने वाली बात है कि छंद योजना के अंदर भी पहले विद्रोह हुए थे और कवियों ने परम्परागत छंद-योजना की जगह भावानुकूल छंद-योजना योजना को अपनाया था। यह तो युग के भीतर जो स्पंदन है उसकी पुकार है कि कविता का स्वरूप क्या होगा और उसी से वह तय भी होता है। तभी तो एक समय रामधारी सिंह "दिनकर’ जैसे कवि ने सायास छंद-योजना की अपेक्षा भावानुकूल छंद-योजना पर बल दिया। इसी कारण परम्परा-प्राप्त छंदों के स्थान पर नये छंदों के निमार्ण की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने लिखा कि- “अब वे ही छंद कवियों के भीतर से नवीन अनुभूतियों को बाहर निकाल सकेंगे जिसमें संगीत कम, सुस्थिरता अधिक होगी, जो उड़ान की अपेक्षा चिन्तन के उपयुक्त होंगे।क्योंकि हमारी मनोदशाएँ परिवर्तित हो रही हैं और इन मनोदशाओं की अभिव्यक्ति वे छंद नहीं कर सकेंगे जो पहले से चले आ रहे हैं।”क्योंकि वे मानते थे कि-“कविता के नये माध्यम यानी नये ढाँचे और नये छंद कविता की नवीनता के प्रमाण होते हैं। उनसे युगमानस की जड़ता टूटती है, उनसे यह आभास मिलता है कि काव्याकाश में नया नक्षत्र उदित हो रहा है। जब कविता पुराने छंदों की भूमि से नये छंदों के भीतर पाँव धरती है, तभी यह अनुभूति जगने लगती है कि कविता वहीं तक सीमित नहीं है जहाँ तक हम उसे समझते आये हैं बल्कि और भी नयी भूमियाँ है जहाँ कवि के चरण पर सकते हैं। नये छंदों से नयी भावदशा पकड़ी जाती है। नये छंदो से नयी आयु प्राप्त होती है।” इसी प्रकार वर्तमान में कविता की आवश्यकता मुक्तछंद में ही पूरी हो सकती है क्योंकि जीवनानुभव की संपूर्ण अभिव्यक्ति के लिये कविता के गद्य-रूप को छोड़कर किसी अन्य रूप का वरण करना कदाचित संभव नहीं। पर आवश्यकता है उसके गद्य-रूप को सँवारने की। इसके लिये कविता में ‘लय’ के अभ्यास की महती आवश्यकता है। वही कविता का प्राण है जो कविता को कविता बनाये रख सकता है अन्यथा राजेन्द्र यादव जैसे अलेखक-अकवि ‘चिल-पों’( हल्ला-गुल्ला) मचायेंगे ही कि यह युग कविता से मुक्त होने का युग है। लय तो सारी सृष्टि में भी वर्तमान है।लय के बिना जीवन भी नहीं। स्वाँस-प्रस्वाँस में भी लय और संगति है।पर दीगर है कि कविता में यह लय चार कारकों से आती है-1) बिम्ब-ग्रहण 2) प्रगीतात्मकता 3) इंद्रियबोध और 4)सघन जीवनानुभव| अर्थ-ग्रहण कविता को सपाट और नीरस बनाता है। बिम्ब-ग्रहण का अभिप्राय है वस्तु पर प्रत्यारोपित विचार की जगह वह भाव जो कवि की कल्पना-शक्ति को भाव-लोक में मूर्तिमान कर दे। यानी वस्तु के भौतिक विश्लेषण के बजाय उसकी आंतरिक भावमयता को कवि आत्मसात करे जो वस्तु में न होकर कवि की अपनी अर्जित संपत्ति हो जाती है। प्रगीतात्मकता से गद्य का विन्यास कविता के विन्यास में बदलता है। उसी प्रकार कवि का इन्द्रियबोध तब प्रखर होता है जब वह सिर्फ़ मन से काम नहीं लेता बल्कि कवि का हृदय और ईश्वर की दी हुई समस्त इन्द्रियाँ यथा आवश्कतानुसार आँख, कान, नाक़, जीभ, त्वचा सब सृजनकाल में समान रूप से सक्रिय हों। आजकल कमरे में बंद होकर जो किताबी कवितायें लिखी जाती हैं उनमें इनका नितांत अभाव होता है। पर यह लक्ष्य करने वाली बात है कि सघन जीवनानुभव व्यष्टि को समष्टि से जोड़ता है, उसे व्यक्तिपरक आत्मबद्धता से मुक्त कर उसकी रचना का आयाम को वृहत्तर और गहराई प्रदान करता है और उसकी रचना का समाजीकरण भी करता है जिससे रचना में युग-बोध के गुण प्रकट होते हैं। आप पायेंगे कि भक्ति काल की रचनाओं में ये तत्व समस्त रूप से पूरी शिष्टता और प्रभूता से विद्यमान हैं जो युगमानस की जड़ता को तोड़ने में सहायक हुए और वह युग कविता का स्वर्णिम युग कहलाया, न कि धार्मिक मतांधता के कारण। मध्ययुगीन भक्तिकाल के काव्य की साहित्यिक अर्थवत्ता का मतलब भी सिर्फ़ उसकी पारिभाषिक विवेचना ( literal translation) से नहीं समझा जाना चाहिये, बल्कि इसका संबंध उसकी भावमयता से है जिसके केन्द्र में मानव का हृदय है न कि खाली मन और विचार का उद्वेग । इसी सुदीर्घ भाव-परम्परा की भूमि पर कविता के आत्म-पक्ष का संधान होना चाहिये न कि पाश्चात्यायातित उन विचारों की पृष्ठभूमि में जहाँ न हमारी तरह समृद्ध लोक है न कला वर्ना लोक का अर्थ फोक बनकर रह जायेगा और कविता भी दिनानुदिन लोक से अलग होती चली जायेगी।
कई दशाब्दियों पूर्व बड़ी गरम चर्चा चली साहित्य और राज्याश्रय के अंतर्विरोध पर और धुरी हीनता नाम का पदार्थ साहित्य की आलोचना से आ जुड़ा। आजकल वह चर्चा ठंडी हो चली है। अब चर्चा गरम है कि साहित्य सेकुलर हो, दलित हो, स्त्री विमर्श और जाने क्या-क्या हो। मेरे मित्र स्व. वासुदेव गोस्वामी ' साहित्य-संगीत-कला विहीनः साक्षात्पशुपुच्छविषानहीनः' की विनोदपूर्ण व्याख्या करते थे। कहते थे कि आदमी अगर साहित्य-संगीत-कला से युक्त नहीं है तो बिना सींग-पूँछ के पशु है, साहित्य-संगीत-कला से युक्त है सींग-पूँछवाला पशु है। सींग या सिंह का संबंध एक ओर श्रृंगार से है, दूसरी ओर आदि वाद्य सिंगी या सिंगा से है। पूँछ का संबंध चित्रकला की तूलिका से है और साहित्य तो साक्षात गऊ है ही। पंडितों ने उसे कामधेनु भी कहा है। गऊ शब्द 'गम' अर्थात जाना धातु से बना है, इसलिए वह स्वभाव से ही चार चरणवाला है। वह गतिशील है, कोई प्रगतिशील कहना चाहे तो प्रगतिशील कह ले, वह है बड़ा सीधा-सादा पशु, बड़ा पालतू। खूँटे से बाँध दो तो बँध जाए। अपने ढंग से तब चलता है जब छुट्टा छूट जाए। वैसे अपनी स्वतंत्रता में प्रतिरोध बर्दाश्त नहीं करता, उकसाने पर मरखना भी हो जाता है। ज्यादा नहीं, बस आतंकित भर करने को। हाँ, यह बात जरूर है कि इस मामले में बड़ा संवेदनशील होता है कि उसका जो इलाका है उसमें अगर कोई आता है तो मरने-मारने पर उतारू हो जाता है।
इस समय विचार का मुद्दा यह है कि साहित्य का जनतंत्र से क्या नाता है या उलटकर कहें तो जनतंत्र का साहित्य से क्या लेना-देना है। जनतंत्र के लिए जो तीन अभिलक्षण चाहिए, उनमें पहला है कि चुनाव हो और चुनाव में राजा-रंक सभी भागीदार हों, दूसरा कि उसमें असहमति की छूट हो, लेकिन तीसरा कि निर्णय बहुमत के आधार पर हो।
साहित्य इस मामले में तो जनतांत्रिक है कि वह सबको संबोधित है, प्राणिमात्र के सुख-दुःख के साथ उसकी साझेदारी है और साझेदारी को प्रेषित करना ही उसका धर्म है; लेकिन मूल्यांकन मत-संग्रह द्वारा नहीं होता। लोकप्रियता की दृष्टि से या आजकल के परिप्रेक्ष्य में बिक्री की दृष्टि से बहुत सी उत्तम रचनाएँ अपने समय में लोकप्रिय नहीं होतीं और न उनकी बिक्री ही अधिक होती है। पर कालांतर में वे ही सामान्य-से-सामान्य व्यक्ति के कंठ में बस जाती हैं और उनकी गूंज बिना किसी प्रचार के दूर-दूर तक फागुन-चैत महीने के अरधान की तरह फैल जाती है। साहित्य लिखनेवाले को एक भी पारखी मिल जाता है तो अपने को कृतार्थ समझता है और पारखी न भी मिले, सहृदय श्रोता भी मिल जाये तो उसका संप्रेषण सार्थक हो जाता है।
साहित्य और जनतंत्र की प्रक्रिया में एक अंतर और भी है। जनतंत्र चलता तो है सहमति के आधार पर. पर असहमति को बर्दाश्त करता चलता है। साहित्य ठीक उलटे, असहमति पर ही चलता है। असहमति ही एक तरह से साहित्य के लिए इकसावा होती है; पर उसका उद्देश्य लोगों को अपनी और खींचना होता है।
जनतंत्र सर्वहित का संकल्प ही नहीं लेता, उस संकल्प की पूर्ति न कर पाए तो वह सत्ता को अस्वीकार भी कर देता है। साहित्य मुखर रूप से संकल्प भी नहीं लेता और पूर्ति तो अकेले उससे होती नहीं। पूर्ति तो उस समाज से होती है, जो साहित्य के संस्कार से दीपित हुआ है। अगर समाज साहित्य से प्रभावित होकर भी तटस्थ रह जाता है तो साहित्य ऐसे में कुछ विशेष कर नहीं पाता। साहित्य अनुभाविता पैदा करता है, कर्ता नहीं। यदि करता भी है तो प्रत्यक्ष नहीं। यह दूसरी बात है कि आल्हा-ऊदल सुनकर दो गाँव में लाठी चल गई हो और इस आधार पर उसे युद्ध का कारण मान लिया गया हो। दरअसल आल्हा-ऊदल के नाते सोया हुआ प्रतिशोध भाव जगता है और उसका परिणाम लठैती की जोर-अजमाइश के रूप में सामने आ जाता है। यह भी हो सकता है कि नए प्रणय-प्रसंग में कुछ दोहे, कुछ शेर और अब तो फिल्मी गीत भी कुछ उद्दीपन कर देते हों ; पर वहाँ भी साहित्य भला बुरा एक बहाना भर होता है। एक सीमा तक जनतंत्र भी बहुत कुछ नहीं कर पाता, करने की बात ही करता रहता है। जनतंत्र जितना ही स्वतंत्र होता है उतना ही कायदे-कानूनों का परतंत्र होता है। इसलिए जनतंत्र की गति धीमी होती है, उसके दावे जरूर बड़े तेज होते हैं। साहित्य तो कोई दावा ही नहीं करता। केवल वैसा ही दावा करता है जो अपने को मंत्र मान रहा हो। तुलसीदास-कबीरदास ने तो दावा नहीं किया था, न प्रसाद ने किया था, लेकिन ऐसे समझदार लोग जरूर हुए जिन्होंने तुलसी के दोहे-चौपाइयों को विभिन्न अनुष्ठानों के लिए मंत्र मान लिया। काशी के ही एक अध्यापक ' कामायनी' की पंक्तियों को ताबीज में रखकर देते थे और उससे तिजला ज्वर ठीक करते थे। कुछ साहित्यकार भी ऐसे होते हैं जो साबर मंत्र ही लिखते हैं--' अनमिल आखर अरथ न जाके।' ऐसी किसी रचना पर ही सम्मति देते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा था कि यह साबर मंत्र है। साहित्य में न तो ' अनमिल आखऱ ' हो सकता है, न ' आखर' अरथहीन हो सकता है। आखर का अर्थ के साथ मिलना आवश्यक ही नहीं, परम आवश्यक है। जनतंत्र में सत्ता का प्रायः जन से अनमिल भाव ही रहता है। ऐसी सत्ता टिकाऊ भी नहीं होती।
साहित्य की एक भूमिका बड़ी जबर्दस्त है। वह जनतंत्र की भावना को जगाए रखता है, क्योंकि साहित्य का प्राण है असहमति। बाणभट्ट ने ' हर्षचरित ' में लिखा हर्ष आश्रयदाता थे ; लेकिन उसमें जहाँ वह प्रसंग आता है जहाँ हर्ष की सेना राज्यश्री को ढूँढ़ने और मौखरि राजधानी पर आक्रमण करने वाली सेना का पीछा करने निकली है। वहाँ पर बाणभट्ट का चित्त उद्विग्न हो जाता है, क्योंकि सेना विंध्य के उपांत ग्रामों की फसल कुचलती हुई जा रही है। उनका उद्वेग कई रूपों में प्रकट होता है। बच्चे दूर से सैनिकों को चिढ़ाकर भाग रहे हैं। एक अध्यापक निर्भय होकर सामने आता है--कैसा राजा, जिसकी सेना किसानों की फसल बरबाद कर रही है। सबसे करुण प्रसंग तब आता है जब कुछ खरगोश झाड़ियों से प्रयाण करती हुई सेना की पगचाप सुन कुतुहलवश बाहर निकलते हैं और सैनिकों के पदत्राणों से कुचले जाकर चिंदी-चिंदी बिखर जाते हैं। इस निर्ममता का बहुत ही द्रावक वर्णन बाणभट्ट ने किया है। मुझे ऐसा लगता है कि ' हर्षचरित ' को इसीलिए बाणभट्ट ने अधूरा छोड़ दिया था। संभवतः राज्याश्रय को भी इसीलिए वे आगे सहन नहीं कर पाए। रीतिकाल के भी बहुत सारे कवि हैं, जो राज्याश्रय में रहकर भी राज्याश्रय को ठुकराते रहे। साहित्यकार किसी का मनसबदार बनकर रहना नहीं गवारा कर सकता। वह इसलिए जनतंत्र में एक कारक घटक बनता है, प्रतिरोध को शक्ति देता है--सत्ता के प्रतिरोध की शक्ति ; साहस के साथ खड़े होने का निर्भय भाव देता है।
परन्तु जनतंत्र क्या साहित्य का मूल्य ठीकठाक आँकता है ? आँक पाता है ? यह प्रश्न उठता है और इसका उत्तर ठीक-ठीक मिलता नहीं। दिखावे के रूप में तो उसे आदर मिलता है। अमेरिका का राष्ट्रपति रॉबर्ट फ्रास्ट को शपथ ग्रहण के समय आदरपूर्वक बुलाता है। जवाहरलाल नेहरू उसकी--
' हरियाली सुहानी है, रुको नहीं
मीलों जाना है, वादे निभाने हैं।'
कविता की पंक्तियाँ दुहराते रहते थे। गांधी जी के लिए तो मानस सबकुछ था, ' रघुपति राघव राजाराम ' के बल पर वे ब्रिटिश शासन को चुनौती देते रहते थे। स्वतंत्रता के संघर्ष में बंकिमचंद्र चटोपाध्याय को ' आनंदमठ ' और उसमें आया हुआ ' वंदे मातरम ' गीत आंदोलन में प्राण फूंकता था। यह सब सही है, पर क्या साहित्य ' सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ' तक ही सीमित है अथवा जहाँ कविता का विषय राजनीति न हो, राजनीति का कर्णधार न हो, सृष्टि का सौंदर्य हो, सृष्टि की विसंगति की व्यथा हो, देवदास के जंगलों के कागज की लुगदी में रूपांतरित होने की कथा हो, हिम शिखरों के हिम के पिघलते जाने की व्यथा हो, ऐसे विषय का प्रभाव जनतंत्र पर पड़ता है कि नहीं पड़ता है? पड़ता भी हो तो, स्थूल अर्थों की कतरनें पेश करने वाले लोगों की जय हो! ऐसी बातें सिंहासन तक पहुंचती नहीं हैं। इसलिए जनतंत्र में संस्कृति का गहरा अर्थ तिरोहित रह जाता है, केवल कुछ साज-बाज, रंग-रोगन और लटक-मटक संस्कृति के पर्याय बनने लगते हैं। गाहे-बगाहे राजनेताओं के फतबे भी सुनने को मिलते हैं कि साहित्य ऐसा लिखिए, वैसा लिखिए और इसी में जनतंत्र की तस्बीर बोंदी हो जाती है। वैसे ही जैसे किसी फिल्म को बनाते समय पैसा देनेवाले सेठ का देर तक अच्छा फिल्मांकन देखते-देखते धैर्य छूट जाता है, चिल्ला उठता है--अब तो कोई गाना गवाओ--भले ही प्रसंग चिता पर सुलाए जाते शव का हो। सेठ को शव से भी गाना चाहिए। इस तरह के प्रसंग या तो भाँड़ पैदा करते हैं या विदूषक। यह सुनिश्चित करना कि किसी साहित्य की आवाज जनतंत्र के नियामकों के पास पहुँचे, आसान नहीं है। आवाज पहुँचने में किसी-न-किसी का बुरा बनने का डर है और तंत्र कोई भी हो, आदमी बुरा बनना नहीं चाहता। इसलिए आवाज पहुँचाने वाले की जरूरत न रहे, ऐसे जनतंत्र की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। नौकरशाही ने सुरक्षा का ऐसा आडंबर रच रखा है कि एक प्राचीर खड़ी हो गई है जिसका ' जनता दरबारों ' से भी टूटना नहीं हो पाता। जनता दरबार खुद एक तरह के ओट बन जाते हैं--आत्ममुग्धता के।
ऐसी परिस्थिति में साहित्य की भूमिका बड़ा कठिन हो जाती है। उसे कुछ कहना भी है और कुछ नहीं भी कहना है। कुछ कहने के लिए छोड़ देना है, चुप रहना है। आपदकाल में एक भविष्यद्रष्टा आलेचक ने भविष्यवाणी की थी कि अब वक्त आ गया है कि लोग चिरई-चिरूँग के बारे में बात करेंगे, राजनीति के बारे में सीधी बात नहीं करेंगे। उन्होंने मान लिया कि चिरई-चुरूँग, पेड़-पौधे की बात करना साहित्य के लिए मानो बड़ी छोटी बात हो। सर्वभोजी जीवन पद्धति में भी भोज्य के रूप में ही सही, चिरई-चुरूँग और पेड़-पौधों की जरूरत तो है ही। उनके आरक्षण की भी चिंता है; पर साहित्य में यह काम गोया बहुत घटिया है। वैसे उनकी भविष्यवाणी के बावजूद बहुत कुछ वैसा लिखा जाता रहा है जो उसके विपरीत था। उसी काल में भाई ने ' त्रिकाल-संध्या' ' लिखीलेकिन बहुत सारे कवि रचनाकार चुपे थे या उसे अनदेखा करके कुछ ऐसा लिख रहे थे जो अन्याय का प्रतिरूप दिखाकर उसका सामना करने के तौर-तरीके बता रहे थे। ङमारी समझ में ऐसा ही साहित्य जीता है। तुलसीदास ने अकबर और जहाँगीर का नाम नहीं लिया, कबीरदास ने सिकंदर लोदी का नाम नहीं लिया, कुँभदास ने अकबर का नाम नहीं लिया। इन उपेक्षाओं में बहुत बड़ी शक्ति थी और इसलिए ये उपेक्षाएँ सर्वभाव से भावित मनुष्य की अपेक्षाएँ पूरी करने में अधिक सहायक हुईँ।
जो जनतंत्र ऐसे साहित्य का महत्व समझता है और जितना समझता है उतना ही बडा जनतंत्र बनता है। जनतंत्र और साहित्य के बीत एक ऐसा ही रिश्ता एक स्वस्थ रिश्ता है। ऐसा खुला पर बेनाम रिश्ता ही रिश्ता है। न नजदीकी अच्छी है, न दूरी अच्छी है।
जनतंत्र यदि अपना हित चाहता है और साहित्य का भी हित चाहता है तो उसे साहित्य को हकीकी रिश्तेदाक नहीं बनाना चाहिए। साहित्यकार के राजनीतिक विचार हो सकते हैं , पर राजनीतिक विचार का साहित्य नहीं होता। साहित्य विचार देता है और जनतंत्र से भी यह अपेक्षा है कि वह साहित्य को विचार न दे--साहित्य से विचार ले और अपने विचार में संशोधन भी आमंत्रित करे। दोनों के बीच में इतनी औपचारिक दूरी होगी तो हित्य जनतंत्र की प्रक्रिया को सक्रिय कर सकेगा। जनतंत्र की प्रक्रिया में पहले ही लिखा जा चुका है कि असहमति एक आवश्यक घटक है, वह अआसहमति सबसे स्वस्थ रूप में, बिना किसी उपद्रव के साहित्य से आती है। साहित्य जनतंत्र से यही अपेक्षा रखता है कि वह खुल करके साँस ले सकता है, वैसे जनतंत्र का जहाँ दम घुटता है वहाँ भी साहित्य मौन भी रहता है तो उसका मौन कम मुखर नहीं रहता। साहित्य जनतंत्र का पहरेदार नहीं है। जैसा कि पत्रकारिता होने का दावा करती है। साहित्य केवल संभावनाओं का संकेत है। कोई आदेश-निर्देश या परामर्श नहीं है। वह एक गहन विमर्श है और ऐसा विमर्श है जिसमें अपने को भी बख्शा नहीं जाता। ऐसा साहित्य ही समय की सजगता रखता हुआ भी अपने समय का अतिक्रमण करता है।
परिचय यादों के गलियारों से आती कुछ अनुगूँजें...अनायास-ही चेतन से टकरातीं...पहचाने वे पदचाप आजीवन साथ-साथ चलते...अनुभव और ऊँगलियाँ जिन्होंने गढ़ा और तराशा हमें...अनवरत एक तलाश...लगातार और पल-पल एक नई चुनौती और नई जीत-हार; जीवन वाकई में किसी भी कहानी-किस्से से कहीं ज्यादा रोचक है...बशर्ते उसे जिया गया हो, एक लगन और त्वरा के साथ, मात्र झेला या निभाया नहीं। शैलेश मटियानी के बाद परिचय स्तंभ में प्रस्तुत हैं इसबार चर्चित लेखक और कवि अनवर सुहैल; खुद उन्हीं की कलम से...
अनवर सुहैल
जीवन संघर्ष
अब्बा रेल्वे स्कूल में शिक्षक थे, जो अब अवकाश प्राप्त कर चुके हैं। वह एक अनुशासन प्रिय, गम्भीर एवं धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं। उन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं रहती। वह अपने जीवन से इतने संतुश्ट रहते हैं कि उन्हीं से प्रेरणा पाकर मेरे अंदर अनुशासनप्रियता और संतोश का भाव गहराया है। अब्बा जानते हैं कि 'साहेब से सब होत है, बंदे से कुछ नाहिं`। अब्बा का एक और ध्येय-सूत्र है कि आराम करने के लिए क़ब्र ही बेहतर जगह है। यह जीवन लगातार कुछ नया रचने के लिए है। मैं भी भूमिगत कोयला खदान में काम करने के बावजूद नया रचने या नया पढ़ने की ललक का मारा रहता हूं। बाबा कबीर की उक्ति अक्सर बच्चों को सुनाया करता हूं-''सुखिया सब संसार खावै अरू सोवै / दुखिया दास कबीर जागे अरू रोवै।`` जो चेतनासम्पन्न होगा यानी कि बाबा कबीर के शब्दों में जो 'जागा` होगा वह सांसारिक दु:ख देख कर चिंतित रहेगा। जो तबका स्वार्थ, लिप्सा और भोगविलास में डूबा रहता है उसे कबीर दास सुखिया कहते हैं। मेरे विचार से तमाम शायर, लेखक बिरादरी कबीर दास की दुखिया कैटगरी में आती है। मेरी अम्मी उर्दू, अंग्रेजी, फ़ारसी और अरबी की जानकार थीं। वह इतने खू़बसूरत अल्फ़ाज़ लिखती थीं कि ऐसा लगता जैसे कहीं कोई छपी हुई स्क्रिप्ट हो। हम बच्चों को हिन्दी लिखते-पढ़ते देख उन्होंने भी हिन्दी लिखना-पढ़ना सीख लिया था। उनकी संदूक में चंद किताबें ज़रूर रहा करती थीं। जैसे, हफ़ीज़ जालन्धरी की ' शाहनामा ए इस्लाम` चार वाल्यूम, अल्लामा इक़बाल की किताब 'बांगे दरा`, स्मिथ की 'दि स्पिरिट ऑफ इस्लाम`, कृश्न चंदर की 'एक गधे की आत्मकथा`। उर्दू माहनामा 'बीसवीं सदी` के सैकड़ों अंक उनके कलेक्शन में थे। वह इब्ने सफी बीए की जासूसी दुनिया भी ज़रूर पढ़ा करती थीं। मुझे उर्दू पढ़ने की ललक इब्ने सफी बीए की जासूसी दुनिया पढ़ने से जागी। अम्मी एक चलता-फिरता शब्दकोष हुआ करती थीं। शेरो-शायरी, से उनकी गहरी वाबस्तगी थी। वह कठिन से कठिन अशआर कहतीं और फिर उनकी तफ़सील बताया करती थीं। अक्सर वह एक शेर कहती थीं-''सामां है सौ बरस का, पल की खब़र नहीं।`` मेरे विचार से मेरे अंदर कवि या लेखक बनने का ज़ज्ब़ा अम्मी के कारण पैदा हुआ क्योंकि अम्मी अक्सर अकेले में मौका पाकर कॉपी के पिछले पन्ने पर कुछ न कुछ लिखती रहती थी। मुझे अफ़सोस है कि उन पन्नों को मैं सम्भाल कर रख न पाया वरना तत्कालीन भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति स्वरूप वे तहरीरें आज मेरे कितने काम आतीं। मेरे मुहल्ले में गिरीश भइया रहते थे। वह पुराने उपन्यासों के उदात्त नायकों की तरह मुझे नज़र आया करते थे। वह व्यंग्य लिखा करते थे। उस समय उत्तर प्रदेश से एक हास्य व्यंग्य की पाक्षिक पत्रिका 'ठलुआ` निकला करती थी। गिरीश भइया उसके नियमित लेखक थे। मैं उनके व्यक्तित्व से इतना प्रभावित था कि उनसे मिलने उनके घर गया। उन्होंने ठलुआ का पुराना अंक देकर मुझे कहा कि इसके लिए मैं भी कुछ लिखूं। तब मैं सातवीं या आठवीं कक्षा में था। मैंने सम्पादक के नाम पत्र लिखा। वह पत्र प्रकाशित हुआ और लेखकीय प्रति के रूप में ठलुआ का अंक जब मेरे नाम से पोस्टमैन घर दे गया तो अचानक मुझे महसूस हुआ कि मैं एक बड़ा लेखक बन गया हूं। शाम के समय राम मंदिर के प्रांगण में गिरीश भइया, आर एस एस की शाखा में अवश्य उपस्थित हुआ करते। मैं तब बालक ही था। राजनीति की कोई समझ तो थी नहीं। शाखा में झण्डा-वन्दन, प्रार्थना के बाद सभी लोग खेल खेला करते थे। मुझे वहां अच्छा लगता। इसलिए भी अच्छा लगता कि मेरे समय का एक लेखक गिरीश भइया भी वहां खूब आनन्द लेते थे। ठलुआ में मैंने नगर की सड़कों की दुर्दशा पर, एकमात्र छविगृह पर, पगार की पहली तारीख पर व्यंग्य लिखे। मैं जो भी लिखता थोड़े-बहुत संशोधन के साथ वह ठलुआ में छप जाया करता था। गिरीश भइया अर्थात गिरीश पंकज बाद में एक बड़े लेखक बने। वर्तमान में वह साहित्य अकादमी के सदस्य हैं। गिरीश पंकज सद्भावना दर्पण के नाम से एक त्रैमासिक लघुपत्रिका का सम्पादन भी कर रहे हैं। विद्यालय में पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी के दिन होने वाले काय्रक्रमों में मैं भाग लिया करता था। देशभक्ति से प्रेरित कविताएं तुकबंदी के साथ लिखा करता था। कविता पाठ करने पर बच्चे तालियां बजाते और शिक्षकों की उत्साह वर्धन करती निगाहें मुझे अन्य बच्चों से हटके बना दिया करती थीं। हिन्दी के अध्यापक श्री अमर लाल सोनी 'अमर` मेरी कविताई देखकर मुझे 'बूढ़ा बालक` कहा करते थे। वह हमारे घर के सामने रहा करते थे। अक्सर मुझे अपने पास बुलाते और अपनी ताज़ा कविताएं सुनाया करते। उनकी कविताएं अतुकांत होतीं साथ ही उनमें आद र्श होता। वह शिक्षक के नज़रिए से संसार को देखा करते थे और हर खराब को अच्छा बनाने की ज़िद पाले बैठे थे। उनकी कविताएं मुझे अच्छी लगतीं लेकिन मेरे मित्र उनका मज़ाक उड़ाया करते थे। वास्तव में उस समय का समाज भी लेखक या कवि को अनुत्पादक काम में लिप्त मानता था। लेकिन मेरे मन में तो जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद या रवीन्द्र नाथ टैगोर बनने की ललक थी। मैं खूब कविताएं लिखा करता था। अम्मी के सम्पर्क में रहने के कारण मेरी कविताओं में उर्दू के भाब्दों की अधिकता होती थी। अम्मी मेरी कविताओं की सराहना किया करतीं। वह मुझे इस्लाह भी किया करती थीं। नगर में किराए से किताब मिलने की एक दुकान थी। मैं वहां से दस पैसे रोज पर एक किताब लाया करता था। वहां नंदन, पराग, चंदामामा और धर्मयुग जैसी पत्रिकाएं किराए पर मिलती थीं। मुझे बच्चों की पत्रिका 'पराग` अत्यंत प्रिय थी। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना उसके सम्पादक हुआ करते थे। खूबसूरत सजी-धजी पत्रिका थी 'पराग`। उस समय के तमाम मशहूर लेखकों की बाल रचनाएं 'पराग` में प्रकाशित हुआ करती थीं। आज हिन्दी में ऐसी बाल-पत्रिका का नितान्त अभाव है। जाने क्यों 'पराग` पढ़ते-पढ़ते एक दिन मैंने सोचा कि अपने मन से मैं भी तो कहानी बना कर लिख सकता हूं। छोटी बहिन भामॉं को रात के वक्त कहानी सुनने की आदत थी। मैं तब दसवीं का छात्र था। मैंने उस दिन सुनी-सुनाई कहानी न सुना कर उसे एक कहानी गढ़ कर सुनाई। वह कहानी बहन को बहुत पसंद आई। मैंने रजिस्टर के पन्ने फाड़े और उस पर कहानी को दर्ज किया। नाम दिया 'नन्हा भोर`। कहानी भेज दी 'पराग` के पते पर। 'पराग` जिसके अंकों का मुझे बेसब्री से इंतज़ार रहता था। 'पराग` जिसके नए अंक मेरे सपने में आते तो ज़रूर थे लेकिन इतने अस्पश्ट होते कि मैं मुखपृश्ठ भी देख न पाता और नींद खुल जाती। 'पराग` जिसके दिल्ली स्थित सम्पादकीय कार्यालय में मैं न जाने कितनी बार सपने में गया था, जहां चारों तरफ 'पराग` के पुराने अंकों के बंडल पड़े दिखते थे लेकिन वह अंक न दिखता था जो अभी छपा न था। 'पराग` में कहानी भेजने के एक सप्ताह के बाद प्रतिदिन पोस्टआफिस जाने लगा कि कहानी स्वीकृत हुई या नहीं। एक दिन मेरे आनंद का ठिकाना न रहा, जब डाकिए ने एक प्रिंटेड पोस्टकार्ड मुझे पकड़ाया जिसमें छपा हुआ था कि आपकी कहानी 'नन्हा भोर` स्वीकृत कर ली गई है जिसे यथासमय 'पराग` में प्रकाशित किया जाएगा। मैंने वह पत्र माननीय गिरीश भइया को दिखलाया। वह भी खुश हुए। अम्मी ने अल्लाह का शुक्रिया अदा करते हुए फातिहा पढ़ी। इस तरह से मैं एक लेखक बन गया। नगर में एक साहित्यिक संस्था थी 'संबोधन साहित्य एवम् कला परिशद` जिसके अध्यक्ष थे श्री वीरेन्द्र श्रीवास्तव 'विह्वल`। वह समय अपने नाम के साथ उपनाम लगाने का था। जैसे अमर लाल सोनी 'अमर`, कासिम इलाहाबादी, जगदीश पाठक ने तो अपना नाम ही बदल लिया था - भतीजा मनेंद्रगढ़ी। जब मैंने संबोधन की सदस्यता ली तो उनकी तर्ज पर मैंने अपना नाम रखा अनवर सुहैल 'अनवर`। मैंने इस नाम की एक सील भी बनवाई। मैं अब संस्था की परम्परानुसार कविता और ग़जलें कहनी शुरू कर दी। कविताएं और ग़जलें ऐसी कि हर लाईन पर लोग 'वाह-वाह` कहें। मैं तब तुकों की खोज में रहा करता था। एक बार मैंने 'हो गया है` की तुक को पकड़ कर ग़जल लिखी और उसके लिए मैंने 'खो गया है` 'सो गया है` 'बो गया है` 'धो गया है` आदि तुकों पर काम करते हुए ग़जल बनाई थी जिसपर संस्था की गोश्ठी में बहुत दाद मिली थी। मेरे लिए तुक तलाशना और गीत-कविता गढना एक आसान काम बन गया। मैंने कई गीत लिखे जिनमें एक गीत मैं गोश्ठियों में सस्वर पढ़ा करता था-''घूम आई अंखियां नगर घर देस, आया न कहीं से प्यार का संदेस`। मंचीय कविता मंच में तो खूब दाद दिलवा देती थीं लेकिन जिन्हें सम्पादक खेद सहित वापस कर देते थे। सम्बोधन संस्था में एक नई बात ये थी कि वहां पहल, सम्बोधन जैसी लघुपत्रिकाएं आया करती थीं। मैंने पहलेपहल 'पहल` वीरेंद्र श्रीवास्तव के घर देखी थी। मुझे उसकी कविता और कहानियां बहुत पसंद आई थीं। अब मेरा मन भी ऐसी ही कविताएं लिखने को करने लगा। नगर में बैंक है, स्कूल है, कॉलेज है सो इनमें स्थानान्तरित होकर नए लोग भी आते। जो साहित्यिक मिजाज़ के होते उन्हें सम्बोधन संस्था से जोड़ लिया जाता था। इसी तारतम्य में कई ऐसे कवि भी देखने सुनने में आए जिनकी कविताएं सिर के उपर से निकल जाया करतीं लेकिन जिन्हें सुनकर लगता कि इनमें वह बात है जो कि गीत-ग़जलों में हो नहीं सकती। जीतेंद्र सिंह सोढ़ी, विजय गुप्त, अनिरूद्ध नीरव, माताचरण मिश्र, एम एल कुरील की कविताएं मन को बेचैन कर दिया करती थीं। संबोधन से एक लघुपत्रिका ' शुरूआत` निकला करती थी। वह एक साइक्लोस्टाईल पत्रिका थी। उसमें मेरी कविता और लघुकथा प्रकाशित हुई। धीरे-धीरे मैं अपने को स्थापित लेखक समझने लगा। बेरोजगारी के दिनों में मैंने सम्बोधन संस्था द्वारा संचालित वाचनालय और पुस्तकालय का कार्यभार सम्भाला। केयर-टेकर के अभाव में वह पुस्तकालय अक्सर बंद रहता और सम्बोधन की गोश्ठियों, सभाओं के काम आता था। वीरेंद्र श्रीवास्तव ने सहर्श मेरी बात मानकर पुस्तकालय का जिम्मा मुझे सौंप दिया। मैं और मेरा मित्र राजीव सोनी उस पुस्तकालय को नियमित खोलने लगे। शाम को छ: से नौ बजे तक हम पुस्तकालय खोलकर बैठा करते। वहां की सारी किताबें हमने चाट डालीं। तब धर्मयुग, सारिका, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, दिनमान निकला करती थीं। हमने पुराने अंक पलट डाले। राजीव सोनी की इस बीच शादी हो गई। वह अमृता प्रीतम की लेखनी का मुरीद था। इस चक्कर में हमने अमृता प्रीतम का समग्र साहित्य खोज-खोज कर पढ़ डाला। इमरोज़ और अमृता के सम्बंध हमें एक रूमानी दुनिया की सैर कराया करते। मैं तो इतना ज्यादा उनके जीवन से प्रभावित हुआ कि अपने एक भांजे का नाम ही रख दिया 'इमरोज़`। मुझसे किसी मित्र ने अपनी बिटिया के लिए नाम पूछा तो तत्काल मेरे मुंह से निकलता 'अमृता`। अमृता प्रीतम के अलावा मुझे निर्मल वर्मा, रमेश बक्षी, शैलेश मटियानी, मण्टो, इस्मत चुगत़ाई, दास्तोयेव्स्की, गोर्की, फैज़, सामरसेट माम, चेखव, उग्र, मोहन राकेश, अज्ञेय, रेणु और मुक्तिबोध की लेखनी ने अत्यधिक प्रभावित किया। जाने क्यों टॉलस्टाय की अन्ना-केरेनिना के आठ भाग खरीद लेने के बावजूद मैं उसे पढ़ नहीं पाया। बेस्ट-सेलर होने के बावजूद मैंने धर्मवीर भारती की 'गुनाहों का देवता` पसंद नहीं की। जबकि राजेंद्र यादव की 'सारा आकाश` ने ज़रूर उद्वेलित किया था। ठीक इसी तरह मुंशी प्रेमचंद की गबन और मानसरोवर की कहानियों के अलावा अन्य कोई उपन्यास पूरा पढ़ नहीं पाया। हां, अमृतलाल नागर की लेखकीय प्रतिभा का ज़रूर मैं मुरीद रहा। पात्रानुकूल भाशा का सृजन करने में उन्हें महारत थी। मुझे यथार्थ की ज़मीन से उपजे पात्र और उनके मनोविज्ञान पर आधारित कथानक प्रभावित करते हैं।
आशाढ़ के मटमैले-धूसर बादल बिन बरसे छाये हुए थे। 'दुबे नर्सिंग होम` के गलियारे में तनाव के बादल तैर रहे थे। प्रजापति अंकल कभी गलियारे में रखी कुर्सियों पर बैठते और कभी उठकर टहलते। उनके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। मधुमेह और उच्च रक्तचाप के मरीज़ जो ठहरे। संतान भी इतनी नालायक कि मुसीबतें खड़ी कर देतीं, परिणामत: अंकल का रोग बढ़ता जाता।
आण्टी, अंकल का साथ निभाते जब थक गईं तो वह मेरे पास चली आईं। मैं सजग हो गया। मैं जानता था कि वह तत्काल बेटा-बहू निंदा पुराण खोल कर बैठ जाएंगी। मैंने उन्हें पास पड़ी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। वह थकी सी बैठ गईं। मैं भी एक कुर्सी खींच कर उनके पास बैठ गया। यह शहर का सबसे महंगा 'नर्सिंग-होम` है। खुशनुमा रंगों से सजा गलियारा। छत पर जगह-जगह लटकते झाड़-फ़ानूस। साफ़-सुथरी दीवारों पर करीने से चस्पां स्वास्थ्य-चेतना जगाने वाले पोस्टर्स। यहां सिर्फ हैसियत वाले ही आते हैं। यह नगर का सबसे अच्छा प्रसूति-गृह है। यहां स्त्री- शरीर संबंधित जांच के अत्याधुनिक उपकरण हैं। वे उपकरण भी जिनसे गर्भ के पल रहे बच्चे का लिंग-निर्धारण होता है, और होती हैं अनिच्छित गर्भ से मुक्ति की क्रूर-जटिल प्रक्रियाएं। साथ ही यहां मिलती है गोपनीयता की गारंटी। इस नर्सिंग होम की सूत्र-धार हैं डाक्टर दुबे मैडम। जिनके दिमाग और हाथों के जादू की इस नगर में सर्वत्र चर्चा है। डाक्टर दुबे मैडम नगर की सभ्रान्त महिलाओं की हमराज़ हैं। तमाम उल्टे-सीधे , टेढ़े-मेढ़े केस उनके पास आते हैं। प्रजापति अंकल जिला शिक्षा-अधिकारी हैं। राज्य की राजधानी तक पहुंच के स्वामी, जो इतने वर्शों से यहीं जमे हुए हैं। उनको उखाड़ने वाले स्वयं उखड़ जाते हैं। खुद को बेहद ईमानदार प्रशासक सिद्ध करते हैं, किन्तु उनके विभागीय मातहत यही कहते पाए जाते हैं ---''प्रजापति साहब कथरी ओढ़कर घी पीते हैं।`` तीन बेटे और बड़ी बेटी-दामाद, इन सभी को सरकारी शिक्षक के पद पर उन्होंने ही आसीन कराया है। छोटे बेटे का एक निजी-स्कूल है। इस वर्श उसे भी हाई-स्कूल तक की मान्यता उन्होंने दिलवा दी है। उनका बड़ा बेटा राकेश मेरा मित्र है। आण्टी आंखें मूंदे कुछ सोच रही थीं। राकेश आपरेशन थियेटर के बंद दरवाज़े के आस-पास चहलकदमी कर रहा था। मैंने आण्टी से राकेश की दोनों बेटियों नेहा और मेहा के बारे में पूछा जो कि कहीं नज़र नहीं आ रही थीं। आण्टी ने इशारे से बताया कि स्कूल गई हैं। फिर वह बड़बड़ाने लगीं--'' सब अपनी मर्जी के मालिक हैं! हम बूढ़े हो गए... हमें अब कौन पूछता है ?`` मैंने टुकड़ा जोड़ा--''सब ऊपर वाले का किया धरा है आण्टी!`` -''हां बेटा, भगवान की यही इच्छा हो शायद...बस संगीता को कुछ न हो देवी मां !`` --''मैंने खुद मैडम दुबे से बात की है आण्टी! कह रही थीं कि घबराने की कोई बात नहीं। दो दिन में छुट्टी भी मिल जाएगी। आजकल मेडिकल-साइंस काफी तरक्की कर गया है।`` ज्यादा ज्ञान-प्रदर्शन अवसरानुकूल न पाकर मैं खा़मोश हो गया। आण्टी-अंकल से जब भी मिला, राकेश और उसकी बीवी संगीता के विरूद्ध खूब शिकायतें सुनने को मिलतीं। उन दोनों की नालायकी के नित नए कारनामे! आण्टी के चेहरे से लगा कि उनके मन में काफ़ी गर्दो-गुबार इकट्ठा है। वह बहुत कुछ सुनाना चाह रही हैं। जाने क्यों मुझे भी राकेश घामड़ के खिलाफ़ बातें सुनकर आत्म-संतोश मिला करता। मैंने आण्टी को उकसाने के लिए गहरी सांस ली। ''हमें कुछ समझते नहीं ये दोनों। राकेश अपने ससुराल से ही सारी सलाह लिया करता है। संगीता जब देखो तब मैके फोन लगाकर बतियाती रहती है । मुझे देखकर पत्थर की मूर्तियां बन जाते हैं दोनों। बताओ बेटा! इतना बड़ा निर्णय और हमें कोई खब़र नहीं। क्या करूं...दुश्मन हैं न हम! हमारी क्या बिसात ! भगवान न करे, कि कुछ ऊंच-नीच हुई तो समाज थू-थू करेगा। समधी-समधनको क्या जवाब देंगे हम ? वैसे भी समधन हम लोगों से नाराज़ ही रहती हैं। जाने कितनी चुगलियां लगाती है संगीता। अरे भइया! वो क्या कहते हैं न कि यदि अपना सोना ही खोटा हो तो फिर सुनार को दोश देने से क्या फ़ायदा। मेरा राकेश ऐसा नहीं था भइया... कुछ समझ में नहीं आता कि क्या करूं ?`` अंकल-आण्टी मुझे अपना हमदर्द समझते। वे मुझसे यही चाहते -'' तुम उसके दोस्त हो न बेटा...उसे समझाया करो !`` क्या मैं स्वाभावत: दुश्ट हूं ? राकेश मेरी इस आदत को भली-भांति जानता। अक्सर मुझे 'नारद जी` की उपाधि से विभूशित करता। मैंने आण्टी के ज़ख्म़ों पर नमक छिड़का--'' अंकल की हालत देखिए न आण्टी, कितना परेशान हैं वह !`` --''रात-रात भर जागते हैं तुम्हारे अंकल! एक ही छत के नीचे, इतना तनाव ? क्या कहूं, कहते रहते हैं कि तनाव से दिमाग की नसें फट न जाएं। किन्तु लड़कों और बहुओं के कान में जूं तक नहीं रेंगती। मेरे नसीब फूटे हैं बेटा... जाने किसने जीव-हत्या की ये सलाह इन्हें दी! पाप है यह सब बेटा, पाप है ये...हे भगवन!`` नम आंखों को आंचल के कोर से पोंछा उन्होनें। मैंने सोचा वाकई पाप ही तो है ये! एक घनघोर शाकाहारी और अहिंसक परिवार की हिंसक वारदात! गर्भ में फलते-फूलते एक जीव की योजना-बद्ध हत्या...! कहने को मंडल-कमीशन के बाद बने पिछड़े-वर्ग में सूचि-बद्ध है प्रजापति परिवार। जाति के लोहार हैं वे, लेकिन रहन-सहन में द्विजों को भी मात देते हैं। नियम-धरम में इतने रूढ़िवादी कि उच्च-कुल ब्राम्हण भी लजा जाएं। उसी प्रजापति परिवार की नई पीढ़ी उन तमाम वर्जनाओं-परम्पराओं की बेड़ियों से मुक्ति चाहती है। नगर में कई लोग प्रजापति अंकल की जीवन पद्धति का अनुसरण करते हैं किन्तु उनके बच्चे ही उनके सबसे बड़े आलोचक निकल गए। यहीं से शुरू हुई पीढ़ियों के बीच अंतहीन अंतराल की खाइयां... प्रतिदिन की खिच-खिच! राकेश की पत्नी संगीता मांसाहारी परिवार से है। उसके कारण राकेश ने भी अण्डा वगैरा खाना प्रारम्भ किया। मेरे घर ईद-बकरीद के मौके पर दोनों जी भर कर दावतें उड़ाते। चूंकि उनकी रसोई में अण्डा भी नहीं उबाला जा सकता था अत: राकेश पत्नी और बच्चियों की फ़रमाइशें पूरा करने के लिए बाजार से उबले अण्डे छिलवाकर जेब में छुपाकर घर ले जाता। मैं चूंकि मुसलमान हूं, इसलिए मुझसे भी उनके घर में छुआ-छूत का व्यवहार होता। मेहमानों के लिए घर में अलग तरह के कप-प्लेट और गिलास आदि रखे जाते। मुझे एक खास किस्म के कप-गिलास में चाय-पानी मिला करता। मुझे इससे बुरा तो ज़रूर लगता किन्तु राकेश मेरा लंगोटिया यार था। मैं भरसक उसके घर खाने-पीने से परहेज़ किया करता। अक्सर उसके पढ़ने के कमरे में बैठकें होतीं या कि हम नदी के किनारे एकान्त सड़क पर टहलने निकल जाते। राकेश की आवाज़ में जादू है। राकेश से जगजीत सिंह की ग़जलें सुनिये, दिल झूम उठेगा। उनका घर हमारे घर के सामने ही है। बचपन में वे लोग मिलकर मुझे चिढ़ाया करते-'' मुर्गा-मुसल्लम बना क्या आज घर में ?`` कभी पूछा करते-'' जीव-हत्या करते दया नहीं आती तुम लोगों को ?`` मैं उन्हें क्या बताता। मुस्लिम-परिवेश में जन्म लिया है सो यह तो एक सामान्य सी बात होनी चाहिए। मैं स्वयं मुर्गा जिबह कर लिया करता। कितना मज़ा आता है जिबह करने में। होंठों पर दुआ के बोल 'बिस्मिल्लाहो - अल्लाहो अकबर ` यानी कि शुरू करता हूं अल्लाह के नाम से जो कि सबसे बड़ा है। और तेज़ धार छुरी से मुर्गे की गरदन पर हल्का सा दबाव...!गरदन की सिऱ्फ मुख्य नस ही कटे, बस इतनी सावधानी चाहिए। पूरी गरदन कटी नहीं कि मुर्गा हराम... यही तो 'झटका` और 'हलाल` में फ़र्क है।? बिना मांस, मछली या अण्डा के हमें रसोई सूनी लगती। अब्बा साग-भाजी देख के पिनक जाते हैं--''क्या यही तात-पात खाने के लिए मैं कमाता हूं ?`` मैं प्रजापति परिवार या अपने अन्य बहुसंख्यक मित्रों को कैसे समझाता कि ये सब बड़ी स्वाभाविक बातें हैं। खान-पान का मनुश्य के विवके- शीलता और नैतिकता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है। वे तो यही समझते कि हम अपने बाप को जेल में मार डालने वाले दुश्ट औरंगज़ेब के वंशज हैं। वे यही समझते हैं कि ये लोग बड़े बर्बर, ज़ालिम और असहिश्णु होते हैं। वे यही समझते हैं कि हम मूर्ति-भंजक, विधर्मी-आतताई हैं। वे यही समझते हैं कि हम म्लेच्छ हैं। इन म्लेच्छों ने लड़कर जब पाकिस्तान ले लिया तब अब यहां क्यों हिस्सा बंटाने के लिए रूके हुए हैं। हमें पाकिस्तान चले जाना चाहिए या फिर यहां छोटे भाई की हैसियत से सिर झुकाकर रहना चाहिए। बावजूद इन सबके, राकेश मेरा सबसे पक्का दोस्त है। हर शाम हमें साथ घूमता देख लोग यही टिप्पणी किया करते हैं --'' कहां चली राम-रहीम की जोड़ी?`` पिछले कई दिनों से परेशान है राकेश! ''क्या करूं...कोई राह नहीं सूझती ?`` मैं क्या समझाता। बस यही कहता--''कैरी ऑन ब्वाय!`` उसने बताया कि लेडी डॉक्टर ने भी संगीता का 'कैरी` करने को कहा है, लेकिन संगीता माने तब न! कहती कि इस 'अबार्शन` से भले ही मर जाऊं, किन्तु मैं तीन-तीन बेटियों की मां कहलाना पसंद न करूंगी... ''समाज के ताने अब और बर्दाश्त नहीं करूंगी...आपका क्या आप तो बाहर रहते हैं...चौबीस घण्टे मांजी बस एक ही अलाप...पोते का मुंह देखने की चाहतें मुझे आतंकित किये रहती हैं। अच्छा किया कि जो जांच करवा लिया...जब से पता चला है कोख में बोझ सा मालूम पड़ता है। लगता है कि कितनी जल्दी इससे छुटकारा पा लूं !`` राकेश ने अपनी पत्नी की बातें सामने रखीं। ''खत़रा तो है ही!`` मैं चिन्तित हो उठा। अजीब घामड़ है राकेश...जब 'अबार्शन` कराना था तब इतना विलम्ब क्यों किया ? पांचवें महीने का 'अबार्शन` एक 'रिस्क` है। हम दोनों मित्रों में और भी कई समानताएं हैं।एक ही वर्श हम दोनों का विवाह हुआ। हम दोनों को ही दो-दो बेटियां हैं। घरवालों को बिना बताए मैंने तो चुपचाप परिवार नियोजन कर लिया था, किन्तु राकेश गर्भधारण की प्राकृतिक प्रक्रिया को युक्ति-पूर्वक टालते रहता। उसकी पत्नी संगीता जब मेरी बीवी से मिलती तो बताती कि हर माह चिन्ता लगी रहती है। कहीं गलती न हो गई हो। कहीं 'ठहर` न जाए। मैंने समझाया कि यह एक खतरनाक खेल है। किसी भी तरह गणना में चूक फंसा देगी। वह न माना। मैंने एक बार उसकी व्यक्तिगत पुस्तकालय में एक किताब देखी। 'पुत्र-प्रात्ति योग`... किन्हीं आयुर्वेदाचार्य श्री श्री द्वारा रचित किताब...जिसके बारे में उसने आज तक मुझे कुछ न बताया था। मुझसे छिपाकर रखी थी उसने वह पुस्तक...लेकिन मेरी गिद्ध-दृश्टि से बच न सकी। चुपके से पढ़ी थी वह किताब मैंने! उस पुस्तक में पौराणिक संदर्भों के अलावा पुत्र-प्राप्ति के लिए धार्मिक कर्मकाण्डों के अतिरिक्त स्त्री-सहवास के लिए सुदिन-चर्चा भी थी। मुझे राकेश की मूढ़ता पर तरस आता। संगीता जब मेरी बीवी से मिलती तो घुमा-फिरा कर बस एक ही बात --''सास के उलाहने-ताने...पोता न आया तो पुरखों की आत्माएं भटकती रहेंगी!`` ''पोता न खिला पाने का दुख तो मेरी सास को भी है, किन्तु पोता न आने से हमारे मज़हब में ऐसा कोई संकट नही आता!`` मेरी बीवी समझाती। उसके तर्क की धज्जी उड़ा दी जाती कि म्लेच्छों का क्या धर्म और कैसी मुक्ति ? मेरी बीवी को बेटा खिलाने का कितना शौक है, मुझे मालूम है, लेकिन इस बात पर अपना बस तो नहीं। जो परम्परागत मार्ग यह है कि जब तक बेटा न पैदा हो अनिच्छित पुत्रियों की लाईन लगाते रहीए। कभी-कभी बेटे वालियों को इतराते देख वह कहती--''मन करता है कि किसी का बेटा चुरा कर ले आऊं! वाह रे खुदा की कुदरत...किसी को बेटे पर बेटा और किसी के पास बेटियों का ढेर...`` रियाज़ ड्राइवर की बीवी को ही देखें...बेटे की तलाश में पांच लड़कियों की आमद और सुना है कि इस साल वह पुन: पेट से है! एकान्त में मेरी बीवी अक्सर कहा करती-''बेटियां तो चल देंगी,हमारी इस कमाई, धन-दौलत का क्या होगा ?`` मैं क्या जवाब देता। बस, मुझे इतना पता था कि पुत्र के आविश्कार के लिए अब और कोई प्रयोग नहीं। अल्लाह ने जो दिया, सब उसी की मेहरबानी है। उसको यह संसार चलाना है। उसे अच्छी तरह मालूम है कि संसार में नर-नारी का अनुपात क्या हो? हमारे नसीब में बेटियां हैं तो हम उन्हें बेटों की तरह पालेंगे। लेकिन क्या भावनात्मक रूप से मेरा यह तर्क हमें राहत दे पाता था? राकेश ने बताया कि उसकी ससुराल इंदौर में भी संगीता का 'चेक-अप` कराया गया था। भ्रूण-परीक्षण से यही पता चला कि पेट में पल रहा भ्रूण नर नहीं बल्कि मादा है। राकेश और संगीता दोनों नहीं चाहते थे कि एक और 'कन्या-शिशु` उनके संसार में आए। अंकल-आण्टी की नाराज़गी के बावजूद उन लोगों ने ये निर्णय लिया है। कुर्सी पर बैठी आण्टी की आंखें बंद हैं। अंकल उसी तरह बेचैन से टहल रहे हैं। आपरेशन-थियेटर के दरवाज़े के पास राकेश चिन्तित-मूर्तिवत खड़ा है।
नर्सिंग-होम के गलियारे से दीख पड़ता आसमान का टुकड़ा अब मटमैला-धूसर हो गया है। लगता नहीं कि बारिश होगी। बस, उमस बनी रहेगी। पसीने से तन-बदन चिपचिपाने लगा । मौसम में मनहूसियत सी जारी है....
वे छड़ी उठाते हैं, सीढ़ियां दांए पैर से उतरना शुरु करते हैं, उनका यह विश्वास है कि दिन दाएँ पैर पर उठाया जाए तो वे किसी विपत्ति में नहीं घिर सकते। वे सुबह उठते भी दाईं करवट से हैं और जब उनकी बांई आँख फड़कती है तो उन्हें अपने लड़के का ख्याल आता है, जो बरसों से विदेश में पड़ा है।
छड़ी घुमाते हुए वे नाले की तरफ चलने लगते हैं। वहां अब नाला नहीं है। तीन बरस पहले कमेटी ने उसे पाट दिया था लेकिन आस-पड़ोस के लोग अब भी उनके घर को ‘नालेवाला मकान ‘ कहते हैं। पुराने दोस्तों की चिठ्ठियां अब भी इस पते पर आती हैः कर्नल निहालचंद्र, नालेवाला मकान और डाकिया भी उन चिठ्ठियों को सीधा उनके घर ले आता है।
वे चलते जाते हैं। नारे के परे एक छोटी-सी पुलिया है, सफेद चूने में चमचमाती हुई। यहां आकर वे ठहर जाते हैं-यह उनकी सुबह की सैर का पहला स्टेशन है। वे अपनी छड़ी को पुलिया के सहारे टिका देते हैं, थैले को कंधे से उतारकर मूठ पर लटका देते हैं, सीधे खड़े हो जाते हैं, लगभग अटेंशन की मुद्रा में। एक सांस खींचते हैं, भीतर ले जाते हैं, फिर एक गांठ में कसकर बाहर फेंक देते हैं। फिर दूसरी सांस खींचते हैं, वही कसावट, वही गांठ वही ढील। फिर तीसरी सांस...इससे उन्हें कोई आराम मिलता है ? किसी को नहीं मालूम। वे अपने से पूछते नहीं और कोई दूसरा उनसे पूछनेवाला नहीं।
उन्हें यह भी चिंता नहीं कि पुलिया के नीचे स्कूल जानेवाले लड़के उन्हें देखकर हैरत में खड़े हो जाते हैं-एक पतली सींक-सा लंबा आदमी , हवा में सांस खींचता हुआ, बांस-सा हिलता हुआ।
“कर्नल सा‘ब, कर्नल सा‘ब
कहां हैं आपकी बंदूक तलवार ? “
हंसते, चीखते, डरते हुए वे भागते जाते हैं। बारिश के पानी में उनके पैर छप-छप करते हैं और हवा में घास सरसराती रहती है।
उस दिन निहालचंद्र के कानों में देर तक बच्चों की आवाजें गूंजती रहीं फिर सब कुछ शांत हो गया। उन्होने आखिरी सांस खींची जो एक गीली-सी उच्छ्वास बनकर बाहर निकल आई। पुलिया से अपनी छड़ी उठाई और रूमाल से उसकी मूठ साफ करने लगे। उसी रूमाल में अपनी नाक सिनकी और आँखें पोंछी। फिर थैला उठाकर कंधे पर लटका लिया। गले में सूखी-सी किरक चुभने लगी। धुंधला-सा ख्याल आया, शायद कहीं भीतर कोई तकलीफ है लेकिन इतनी जुर्रत नहीं हुई कि इस तकलीफ को ‘प्यास‘ का नाम दे सकें। वे तकलीफों की धुंध में रहते थे, नाम देने का मतलब था, पिंडारे की पिटारी खोलना, जिसके भीतर से पता नहीं कितनी दूसरी तकलीफें बाहर निकल पड़ेंगी। ना भाई, इससे बेहतर यह धुंध है, जहां सब कुछ एक जैसा है।
निहालचंद्र पुलिया पार करने लगे।
नीचे, आगे, पीछे चारें तरफ मैदान फैला है। पूरा मैदान भी नहीं, आधा हिस्सा धोबीघाट है, बाकी हिस्सा पेड़ों से ढक गया है। वह नाला जिसे शहर में ढक दिया गया था, अब यहां बेशर्मी से नंग-धड़ंग बहता है। किनारे पर चौड़े, सपाट पत्थर बिखरे हैं, जो आँखों में शूल से चुभते हैं। निहालचंद्र ने थैले से धूप का चश्मा निकाला, पहनकर चारों तरफ देखा तो ठंडा-सा अंधेरा दिखाई दिया, रात का ठहरा हुआ अंधेरा जैसा नहीं बल्कि काली रोशनी का दरिया, वे धीरे-धीरे उसमें उतरते हैं और पत्थरों से बच-बचकर चलने लगते हैं।
कहां जा रहे हैं कर्नल बाबू?
पत्थरों पर कपड़े पीटती हुई धोबिनों की आंखें ऊपर उठती हैं, हाथ हवा में ठिठक जाते हैं, धोबियों के कुत्ते-घर के न घाट के-कर्नल निहालचन्द्र की एकनिष्ठ, नीरव, मंद चाल को देखकर कुछ ज्यादा ही भभक जाते हैं, दांत निपोरते, खंखारते हुए उनके पीछे भागते हैं किंतु उनके पास आने की हिम्मत नहीं करते, उनकी मीटरभर लंबी छड़ी को देखकर बीच में मीटरभर का फासला छोड़ना नहीं भूलते और निहालचन्द्र? उनके लिए जैसे चिंघाड़ते बच्चे, वैसे रिरियाते कुत्ते, सब एक चलते हुए दृश्य का हिस्सा हैं, एक धुँए-सी ध्वनि जिसमें सब कुछ समा जाता है...
यह नजारा अगर टूटता है सिर्फ एक जगह-जहां जंगल शुरु होता है। वहां कोई आवाज नहीं, न कोई रंग, न रोशनी...सिर्फ पेड़ों की लम्बी कतार के नीचे धूप के धब्बे टिमटिमाते हैं। यहां काले चश्मे की कोई जरूरत नहीं। निहालचन्द्र एक कंधे से थैला उठाकर दूसरे कंधे पर लटका लेते हैं। कोट के बटन खोलते हैं, तो नवंबर की हवा सर्र-सर्र करती देह को खटखटाने लगती है। ऊपर पेड़, नीचे झाड़ियां, बीच-बीच में गुलमोहर की सुर्ख, लहराती लपटें, सुर्र-सुर्र-सी आवाजें, जिन्हें सुनकर निहालचन्द्र को ग्वालियर के जंगल याद आ जाते, जहां वे अपने फौजी अफसरों के साथ शिकार पर जाते थे। वे अब उसे याद भी नहीं करते थे। खट-से कोई स्लाइड पर्दे पर चमक जाती थी...पुरानी जिन्दगी का एक हिस्सा सांस लेने ऊपर आता था- फिर छप से अंदर डूब जाता-और निहालचन्द्र तेजी में कदम बड़ाते हुए जंगल में गुम हो जाते।
कुछ देर तक पता भी नहीं चलता था, वह कहां हैं, किधर गायब हो गए ? सिर्फ झाड़ियों में हल्की-सी सरसरहट सुनाई देती- जैसे कोई जानवर भागा जा रहा हो और तब अचानक उनका सिर दिखाई देता। अभी यहां अभी वहां ! कोई छिपकर उन्हें देखता तो हैरत में पड़ जाता कि इतनी उम्र में भी वे इतनी तेजी से भाग सकते हैं, छड़ी और थैले के साथ किंतु निहालचन्द्र के लिए यह मामूली-सी कसरत होती। महज कसरत नहीं-एक तरह का ध्यान। उनका चेहरा एक अलौकिक-सी तल्लीनता में डूबा रहता। एक अजीब-सा भ्रम होता, मानो वे एक जगह स्थिर हों, सिर्फ उनकी लंबी, सीकियां टांगें भागी जा रही हों फिर धीरे-धीरे उनकी टांगें भी स्थिर हो जातीं, सिर्फ बूढ़ा दिल हड्डियों के सींकचे पर टकराता रहता और...वे रुक जाते, अधमुंदी पलकों को खोल देते, चारों तरफ देखने लगते।
सामने हवामहल दिखाई देता, पीले पत्थरों का मुगलिया मानूमेंट नवंबर की मंद धूप में सुलगता हुआ...
निहालचंद्र के सफेद बालों से पसीने का परनाला बहता हुआ उनकी कनपटियों पर चूने लगता। वे सिर को झटका देते, रूमाल से माथा पोंछते, छड़ी और थैले हवामहल की सीढ़ियों पर टिका देते। सांस लेते। सैर की थकान उनकी देह से टूटकर टूटे हुए खंडहर से जुड़ जाती।
यह उनकी सैर का दूसरा ‘ स्टेशन ’ होता।
यह हवाघर बहुत पहले शायद सचमुच कोई ‘ स्टेशन ‘ रहा हो, एक पड़ाव, जहां मुगल सेनाएं दिल्ली से मार्च करतीं, यहां घड़ी-दो घड़ी डेरा डालती होंगी। स्वयं शहंशाह शायद छुट्टी के दिन पिकनिक के लिए आते हों। वरना इस उजाड़ जंगल में इतने नखरे नक्काशीवाली इमारत ही क्यों बनाते ? निहालचन्द्र को यह छिपा खजाना अचानक ही मिल गया था- एक दिन सैर करते-करते यहां आ भटके और आंख उठाते ही हवा से हवाघर उतर आया। सफेद सीढ़ियां, झालरदार झरोखे, बड़ी-बड़ी आंखों से रोशनदान-किन्तु जो चीज निहालचन्द्र को अचंभे में डाल देती थी, वह था नीला गुंबद, भूरे पीले जंगल में वह नीलापन उनकी आंखों को अजीब-सी राहत देता था-एक स्वच्छ हीरे-सा झिल-मिलाता हुआ।
उस दिन भी निहालचन्द्र गुंबद को निहारते रहे फिर एक लंबी सांस खींची, जो ‘ आह ‘ और ‘ हे ईश्वर ‘ के बीच-जैसी कराहट में बुझ गई फिर थैले से एक खाकी रंग की बरसाती निकाली और हवाघर की सीढ़ियों तले करीने से बिछा दी। यह उनकी प्रिय जगह थी...झरोखों से आती हवा में डोलता गुंबद, नवंबर की धूप –और क्या चाहिए ?
कुछ भी नहीं। सारी हलचल बंद। न कोई आवाज, न शोर, न किसी तरह की हलचल। एक तिनका भी हिलता तो उसकी गूंज निहालचंद्र की नसों को खटखटा जाती जैसे वह अपनी भूखी चीख से निहालचंद्र की दबी भूख को कुरेद रहा हो। उसकी चीख को सुनकर निहालचंद्र की दबी भूख को कुरेद रहा हो। उसकी चीखें सुनकर निहालचंद्र को अपना लंच याद हो आया और उनका हाथ अनायास अपनी पोटली की तरफ मुड़ गया।
उबला हुआ अंडा, टमाटर और खीरे की सैंडविच, थर्मस में काफी--देवीसिंह हर चीज बड़े करीने से रखता था, मानो वह सुबह की सैर के लिए नहीं, जिंदगी के सफर पर निकल रहे हों। उस पहाड़ी छोकरे को सब कुछ याद रहता था, यहां तक कि वह नमक और काली मिर्च की पुड़िया भी रखना नहीं भूलता था। थैले के दूसरे कोने में ट्रांजिस्टर भी दुबका होता था, जिसे मुन्नू विदेश से उनके लिए लाया था- जर्मन ट्रांजिस्टर- उनकी हिंदुस्तानी ऊब और शून्यता को भरने के लिए। वे शायद ही कभी खोलते। कई बार इच्छा हुई थी कि उसे देवीसिंह को दे दें-वह भी तो दिनभर सांय-सांय करते मकान में ऊंघा करता है, घड़ी-दो घड़ी इस खिलौने से ही खेल लिया करेगा किंतु फिर वे अपनी इच्छा दबा डालते, गूंगे ट्रांजिस्टर से बेटे की आवाज सुनाई देती, “आप दिनभर खाली बैठे रहते हैं, जरा इसे ही सुना कीजिएगा। “ और तब उन्हें अजीब-सा सन्नाटा घेर लेता, दम तोड़ती जम्हाई खींचते हुए वह बुड़बुड़ाने लगते, “ खाली कहां प्रभु, मुझे एक मिनट की फुरसत नहीं। “
पता नहीं, यह बात वे अपने बेटे से कहते जो विदेश में था या अपनी पत्नी से जो परलोक में थी या सचमुच प्रभु से जो कहीं न था। उन्हें शायद खुद भी पता नहीं होता था, कि वे अपने से क्या कहते हैं, हवा में जहाँ इतनी आवाजें बहती हैं, वहाँ उन्हें अपनी बातें भी उड़ती जान पड़ती थीं- कोई उनसे पूछता, आपको एक मिनट की फुरसत नहीं, आखिर आप करते क्या हैं? तो वह झट कह देते, देखते नहीं, खाना खा रहा हूँ। और यह सच भी होता- खाना, देखना, चलना, सोना...जीने के साथ-साथ ये काम एक रौ में चलते थे- और निहालचन्द्र इस बीच अपने से बातें भी करते थे और अपने को ही सुनते थे।
सुनना। वह सोते हुए भी होता था। खाने के बाद आँखें मुंदने लगतीं। निहालचन्द्र डबलरोटी के कंडल और अंडे के छिलके अखबार में बटोरकर रख देते, थैले की गुड़मुड़ी बनाकर, बरसाती के सिरहाने टिका देते, पैर पसारकर लेट जाते किंतु इसके पहले कि नींद आती, परिंदों का रेला उनकी जूठन पर टूट पड़ता। खट, खट, खट-निहालचन्द्र को लगता जैसे उनकी चोंचें अकबार पर नहीं, उनकी नींद में सुराख भेद रही हों।
चिड़िया के पीछे चीलें आतीं और उन्हें खदेड़कर बचे-खुचे टुकड़ों को दबोचकर गायब हो जातीं। हवा में उनकी डाइव और उठाईगिरी उड़ान के बीच छपाक-सी आवाज होती-जैसे नींद के बीचोबीच किसी ने छलांग लगाई हो- सिमटते हुए सपने तितर-बितर हो जाते। बादलों की सरकती छाया में नीला गुंबद कुछ टेढ़ा सा हो जाता और निहालचन्द्र को लगता जैसे वे सब कुछ एक डोलते पर्दे के पीछे से देख रहे हों, एक लेटा हुआ आदमी, सिराहने पर दबा थैला, हवा में फड़फड़ाती बरसाती- और तब उनका दिल तेजी से धड़कने लगता। वे प्रतीक्षा करने लगते।
वह ऐसे ही आ जाती थी। वह आकर कुछ दूर फासले पर ठिठक जाती थी। गले में झूमती रस्सी, बेचैन-से टटोलते हाथ, झरोखों के भीतर झांकती आंखें-उस आदमी पर टिकी हुईं, जो सीढ़ियों के नीचे खुद एक सीढ़ी-सा लेटा था।
निहालचंद्र लेटे रहते, आवाज को अपनी गति से पास आने देते, न हिलते, न डुलते, दम साधकर दिल को ढांपे रखते, उन्हें अंदेशा होता, जरा-सी भी हरकत करेंगे तो वह बिदक जाएगी, जंगल की अन्य अनर्गल आवाजों में खो जाएगी। असली बात विश्वास की है, जब लड़की को विश्वास हो जाता कि आसपास कोई जोखिम नहीं है तो वह धीरे-धीरे पास आती, चौकन्नी, सतर्क और झिझकती हुई, इसलिए नहीं कि निहालचन्द्र पर उसे भरोसा न हो, बल्कि इसलिए कि वे जीवित हैं, निरीह भी, खतरनाक भी, दोनों ही...इसलिए वह एकदम पास नहीं आती थी, एक हाथ की दूरी बनाए रखती थी, दूसरा हाथ आगे बढ़ाती थी, उनकी जेबों को टटोलने लगती थी, आर्मी ओवरकोट की लंबी अंधेरी जेबें, जिन्हें उसकी उंगलियां धीरे-धीरे सहलाने लगतीं ‘निहाली ओ निहाली ? ‘
क्या पूछ रही है, कौन-सा भेद, जिसे वह खींच रही है, खाली जेबों के बीच ? उसकी छुअन लगते ही खून सुलगने लगता, दौड़ने लगता, पागल बैल की तरह अंधाधुंध, बदहवास, लगी-बंधी लीकों को तोड़ता हुआ, दिल को अपने साथ घसीटता हुआ, पुरानी हड्डियों से टकराता हुआ और निहालचंद्र अपनी उम्र के बंद सींकचे उठा देते, देह-पिंजरे को खुला छोड़ देते, जाने दो, कोई भीतर कहता, भागने दो, कब तक इसे बचाकर रखोगे ?
वह शांत घड़ी होती। नवंबर की मुरझाई धूप हवाघर के कंकाली खंडहर पर धीरे-धीरे सरकने लगती। पेड़, पत्ते, झाड़ियां निष्पंद खड़े रहते। निहालचन्द्र दम रोके प्रतीक्षा करते, एक भी पत्ता हिलता तो उनकी देह तन जाती। पलकों को कसकर भींच लेते, जिनके भीतर आंखों के डेले धूप में रंग-बिरंगे गोले-से नाचने लगतेऔर तब एक झटके से वे अपने से छूट जाते-देह अलग पड़ी रहती। और निहालचंद्र ? वे दूसरी तरफ ले जाते, जहां उनका तीसरा और अंतिम स्टेशन होता।
वहां उन्हें कोई देखनेवाला नहीं था, न डर, न खटका, न कोई गवाह। खंडहर की छाया में उनकी देह औंधी पड़ी रहती। वह उनके पास सरक आती, अपनी चुन्नी को छाती से उड़काकर कंधों पर फेंक देती, उनसे सटकर उकड़ूँ बैठ जाती और तब निहालचंद्र को भ्रम होता कि पलकों के पीछे जो धूप के धब्बे थे, वे असल में सलवार-कमीज की सुर्ख सुलगती बुदकियां हैं- सामने, वे चाहें तो उन्हें छू सकते थे लेकिन वे अपने को रोके रखते। बहाना करते कि वे कुछ भी देख नहीं रहे, उसकी उंगलियों को अपनी देह से खेलने देते, “ ओ निहाली, क्या सब कुछ खाली ? “
नहीं, आज उनकी जेबें खाली नहीं थीं, आज मैं सब कुछ साथ लाया हूँ। देखोगी ? वे अपना सिर थोड़ा-सा ऊपर उठाते तो उसकी काली, कलपती आँखें उन्हें लीलने लगतीं, आँखें जो पिछली जिन्दगी की धोखा-धड़ी को एक निगाह में तौल लेती हैं। क्या दिखाएगा, भोंदू! सड़ा हुआ अलूचा, मरा हुआ तीतर या किसी झींगुर की मरी हुई लोथ? यही चीजें तो वह बहुत पहले लड़की को दिखाता था, निकर की जेबों में ठूंसकर लाता था, एक-एक करके निकालता था, किसी बिल्ली की मूंछ, बुढ़िया का बाल?
कुछ भी नहीं। उस दिन जेब में से एक चीज ऐसी नहीं निकली, जिसे वे पहचान सकतीं। सिर्फ कागजों के ढेर। बैंक के पासबुक, नई ताजी चिठ्ठियां, जायदाद के कागज...और एक नीली-सी नन्ही किताब, जिस पर उसकी निगाहें जम गईः कर्नल निहालचंद्र का पासपोर्ट जिसे वे हमेशा साथ लेकर चलते थे। सड़क पर कुछ हो जाए तो पुलिस उनकी फोटो, नाम-पता देखकर घर-ठिकाने का पता तो लगा ही सकती है। हर तीन साल बाद पासपोर्ट आफिस जाकर रिन्यू करवाते थे, कभी लड़के से मिलने गए तो काम आएगा। तेरी लालसा मरी नही, निहाली?
लालसा ! एक तितली-सा उड़ता हुआ वह शब्द निहालचंद्र के इर्द-गिर्द घूमने लगा। क्या कोई ऐसी चीज बची रह गई है, जहां वे एक क्षण बैठ सकें, जो सचमुच लालसा हो, जहां वे अपने पंख समेटकर आराम से अकेले मेंघट सकें ? उन्होंने अपने भीतर झांका तो वहां लालसा नहीं, लड़की बैठी थी-कौन है यह ? गले में फसी चुन्नी, पीला-सा गोल चेहरा, धूल में सनी लटें और रस्सी कूदने वाली रस्सी जो मानो पिछले पचास सालों से उसके साथ घिसट रही थी। उसका सिर नीचे झुका था और वह एकटक आंखों से उस फोटो को निहार रही थी जो अचानक कागजों के ढेर से बाहर निकल आई थी। निहलचंद्र अपनी उत्सुकता नहीं दबा सके। देखने के लिए नीचे सिर झुकाया तो लड़की की आंखें ऊपर उठ आईं।
“ कौन है यह औरत ? “
औरत ! उन्हें झटका-सा लगा।
“ मेरी पत्नी “, उन्होंने कहा।
“ सच? “
“ हां सच नहीं तो क्या ऐसे ही। “
निहालचंद्र का स्वर कुछ संकुचित-सा हो आया- भीतर-ही-भीतर कुछ दहलने-सा लगा।
“और वे पहाड़? “
“पहाड़? “
निहालचंद्र का ध्यान भटकने लगा। नहीं, वह सपना नहीं था। पीछे सचमुच पहाड़ थे, नंगे और धूप में चमकते हुए। उन दिनों उनकी पोस्टिंग लद्दाख में हुई थी। पीछे मानेस्टरी थी, और वहां दो बौद्ध भिक्षु उनकी पत्नी को देखते हुए सीढ़ियां उतर रहे थे और वह बाजार की तरफ देख रही थी-कैमरे से बिल्कुल बेखबर।
उनकी पत्नी ? हां, यह वही थी, फोटो पर निहारता चेहरा, जिस पर आखिरी बीमारी का अंदेशा अभी नहीं बैठा था। पीड़ा बहुत आगे थी...क्या वह उसे देख रही थी ? नहीं, नहीं, यह देखते हो निहालचंद्र, वह नहीं। कैमरे का क्षण ही उसका चेहरा था, होंठ हल्के-से खुले थे और वह जानती थी कि तुम हो, पहाड़ है, सीढ़ियों पर पैर रखते हुए बौद्ध भिक्षु, दुकानों पर टंगे हुए सैकेंड हैंड कपड़े, हवा में फड़फड़ाते हुए, उस दिन कितनी हवा थी, साड़ी का पल्लू बार-बार उड़ता हुआ उसके चेहरे को ढक लेता था लेकिन आश्चर्य ! फोटो में सब कुछ शांत था। वहां कोई हवा नहीं थी।
वहां सिर्फ लड़की की उंगली थी, धूल में सनी हुई, उस चेहरे पर गड़ी हुई जो उनकी पत्नी थी, मैला कागज था, एक गोल सिफर, फोटो की छांह...।
“ निहाली “ , लड़की का स्वर बहुत धीमा था, “ क्या वे अभी आते हैं? “
“ कौन ? “ उन्होंने कुछ विस्मय से पूछा “ कौन आते हैं ? “
“ तुम्हारा लड़का? “
“ वह बाहर है।“
“ और वह ? “ लड़की ने फोटो को देखा।
“ पागल। “ निहालचंद्र उसकी बेवकूफी पर हंस दिए, “ वह अब इस दुनिया में नहीं है। “
“ फिर तुम? “
“ मैं क्या कट्टो ? “
पहली बार उनके मुंह से लड़की का नाम निकला-दहशत में... “मैं क्या ? क्या मतलब है इसका ? “
लड़की हकबकी आंखों से उन्हें देखने लगी। मुंह थोड़ा-सा खुला रह गया...
“ निहाली ? “
“ क्या? “
“ मुझे देखते हो ? “ निहालचंद्र उसे भूखी खाली निगाहों से कते रहे। अचानक ध्यान आया, इतने बरस बाद भी कट्टो ठिगनी और छोटी दिखाई देती है-बौनी-सी। मुद्दत पहले जब वह उम्र में सचमुच छोटी थी तो कितनी लंबी जवान दिखाई देती थी, क्या समय उल्टा चलता है ? नहीं, यह उनका भ्रम है। शायद बचपन में हर चीज बड़ी दिखाई देती है...घर, पेड़, मां-बाप और अचानक निहालचंद्र चौंक गए जैसे लड़की ने पीछे मुड़कर उनके कानों में फुसफुसाया हो ,
‘ और प्रेम, नहीं तो क्या? ‘
“ प्रेम ? क्या तुम किसी से प्रेम कर सके निहाली ? कर्नल निहाल चंद्र ? “
एक धक्का-सा खाकर वे होश में आये। किसकी आवाज थी यह-या सिर्फ छल और धोखा था। भीतर की अटपटी पुकार, जो बुढ़ापे के जंगल में उठती है, लावारिस-सी तपती आवाज, दरवाजा खटखटाती है, खोलो, तो कुछ नहीं, शून्य का अनंत विस्तार दिखाई देता है, दूर-दूर तक कोई नहीं, भीतर का लहू बाहर की झुलसती लू पर धधकता है, न प्रेम, न लगाव, न मोह की पीड़ा-पीड़ा भी नहीं, कुछ भी दिखाई नहीं देता, पत्नी का चेहरा और बेटे की याद, कुछ भी नहीं-सिर्फ मैं। तुम कौन निहालचंद्र, क्या हो तुम ?
खट-खट-खट...वह रस्सी कूद रही थी। ऊपर-नीचे-खंडहर के सूने में उसके पैरों की गूंज निहालचंद्र की मुंदी पलकों को छप-छपाने लगी।
वो सो रहे थे। खाने के बाद वे घड़ी-दो घड़ी जरूर सो लेते थे। जब वे सो रहे होते चीलों-चिड़ियों का झुंड हवाघर के झरोखों पर बैठ जाता। निहालचंद्र की जूठन खाकर अब उनकी निगाहें निहालचंद्र की देह पर चिपक जातीं- मानो सोच रहे हों, क्या यह देह भी उनके आहार में शामिल है? उन्हें काफी निराशा हुई, जब निहालचंद्र ने आंखें खोल दीं। सबसे पहले आकाश दिखाई दिया...नवंबर का नीला टुकड़ा। वह उनकी नींद से निकलकर गुंबद पर आ अटका था। नीला और सफेद, सर्दी की धुंध में स्वप्न के फाहे-सा, वह नींद की धुंध थी-जिसमें आधी देह सोयी रहती है, आधा सिर बाहर निकालकर दुनिया को देखती है...देवीसिंह! उन्होंने धीरे-से आवाज लगाई फिर अचानक याद आया, वे घर में नहीं, बाहर लेटे हैं। लेटे-ही-लेटे हाथ बढ़ाकर थैले को टटोला, वे थर्मस निकालकर बची हुई काफी से गला तर करना चाहते थे किंतु उनका हाथ थैले पर नहीं-कागजों के ढेर पर जा पड़ा।वे हवा में सरसरा रहे थे। पेंशन के दस्तावेज, फोटो, खत, खुला हुआ पासपोर्ट। निहालचंद्र ने झटके से सिर मोड़ा...वे यहां कैसे निकल आये ? उन्हें ठीक से याद नहीं पड़ा, कब उन्हें अपनी जेबों से बाहर निकाला था ? कुछ चीजें उनकी चेतना की चौहद्दी के बाहर हो जाती थीं... अनदेखे घट जाती थीं-अपनी मौजूदगी को अचानक उनके सामने पटक देती थीं...देखो, ये हम हैं, तुम्हारे सामने, और तुम्हें पता भी नहीं ? और निहालचंद्र खिसियाने-से होकर उन्हें स्वीकार कर लेते हैं, कभी यह पूछने का साहस नहीं हुआ, मैने तो तुम्हें जेब में रखा था, तुम बाहर कैसे निकल आईं? सच पूछो तो निहालचंद्र को चीजें आदमियों से कहीं ज्यादा सगी और समझदार जान पड़ती थीं- पालतू जानवरों-सी- वे बरसों उनके साथ रही थीं और कभी उन्हें धोखा नहीं दिया था। वे आंख मूंदकर सिर्फ छूनेभर से उनकी पुरानी, पपड़ाई पहचान को पकड़ लेते थे- यह मुन्नू का पत्र है और यह है बैंक की पासबुक, यह लद्दाख का फोटो, और यह? अचानक उनकी टटोलती उंगलियां ठिठक गईं। आंखें खोलीं तो देवीसिंह का पोस्टकार्ड दिखाई दिया जो उसने छुट्टियों में गांव से भेजा था...। देवीसिंह का ध्यान आते ही वे हड़बड़ा से गये। वह बरामदे में गुड़ीमुड़ी-सा बना बैठा होगा-पता नहीं कितनी बार खाने को गर्म किया होगा, दरवाजा खोलकर बाहर झांका होगा। उन्हें अक्सर देर हो जाती थी और वह अपनी बड़ी, पहाड़ी आंखें उठाकर गहरे आश्चर्य में उन्हें देखता था, कहता कुछ नहीं था किंतु हर बार एक ही प्रश्न उसकी गूंगी निगाहों में झलक जाता था- आप कहां जाते हैं ? सुबह की सैर और शाम तक गायब- अगर आपको कुछ हो गया तो मैं कहां आपको ढूंढ़ता फिरुंगा ? निहालचंद्र हर रोज कोई-न-कोई बहाना खोज निकालते लेकिन भीतर एक धुकधुकी-सी मची रहती कि कहीं वह उनकी शिकायत मुन्नू को न लिख भेजे। विदेश जाने से पहले वह बार-बार उनसे कह गया था, " देवीसिंह के अलावा आपके पास कोई नहीं... वह चला गया, तो आप अपाहिज हो जाएंगे ।" “अपाहिज। ठीक है हो जाऊंगा। तुम तो देखने नहीं आओगे। बरामदे में खटिया डालकर पड़ा रहूंगा-मुझे अब किसी की जरूरत नहीं। मेरे लिए अब सब कुछ एक जैसा है...जैसी रात वैसा दिन...।“
उनका गुस्सा बहने लगा,एक रुंआसा बेबस क्रोध, उस पानी की तरह बांझ और बेतुका जो रेगिस्तान की झुलसती जमीन पर बरसता है, बह जाता है, सूख जाता है, सूख जाता है, अपने पीछे रत्तीभर हरियाली नहीं छोड़ता।
रेगिस्तान! उनके हाथ बिखरे हुए कागजों पर ठिठक गये। उनकी अंतिम पोस्टिंग वहीं हुई थी, राजस्थान और पाकिस्तान के बार्डर पर, चारो तरफ रेगिस्तान फैला था। अब सोचते हैं तो हंसी आती है लेकिन उन दिनों वहीं बस जाने की इच्छा होती थी। लगता था वे अपनी जिन्दगी के आखिरी पड़ाव पर आ पहुंचे हैं। घंटों रेगिस्तान में घूमते रहते, रेत के कंगूरों पर बैठे रहते, न पत्नी की याद आती, न लड़के की, अकेली घड़ियों में लगता जैसे वे धीरे-धीरे किसी सत्य की तरफ पहुंच रहे हैं, उस अंधेरे कुंए की थाह को छू रहे हैं, जो उम्र के अंतिम छोर पर उन्हें इतना अकेला छोड़ गया था...कभी-कभी हैरानी भी होती थी कि जो सत्य लद्दाख में बौद्ध भिक्षुओं से नहीं मिल सका, वह आखिर में रेगिस्तान की सायं-सायं करती उड़ती धूल में दिख गया? कैसा सत्य निहाली ?
निहालचंद्र ने सिर मोड़ा, वे कुछ कहना चाहते थे, कोई बात जो बरसों से भीतर घुमड़ती रही थी-लबालब गले में भर आती थी, थकान, उम्र और हिचकिचाहट को काटती हुई...किंतु वहां कोई न था। झाड़ियों पर नवंबर की धूप गिर रही थी। हवाघर का गुंबद एक निस्पंद और नीली मुठ्ठी-सा हवा में उठा था...न चील, न चिड़िया, न कोई आवाज। रस्सी कूदने की भी खटपट नहीं। सिर्फ एक पथराई सर्द रोशनी थी...जो अब एक मुरझाई सफेदी-सी जंगल पर फैली थी।
निहालचंद्र कुछ देर बिना हिले-डुले बैठे रहे...फिर उन्होंने जबर्दस्ती अपने को खड़ा किया, जैसे वह अपनी नहीं किसी दूसरे की देह को घसीट रहे हों। पोटली, छड़ी, थर्मस,...जेबों में ठुंसे कागज। जब निहालचंद्र चलने लगे तो सब कुछ उनके पास था। वह कुछ भी नहीं भूले थे और कुछ भी नहीं छूटा था।
पीछे मुड़ने का रास्ता नहीं था, जिस पर वे चलकर आए थे। पथरीली पगडंडी, झाड़-झंखाड़, दूर-दूर तक खड़े मिट्टी के ढूह, पीले और सफेद दागों से दगे हुए, जिन पर परिन्दों ने बीट कर दी थी। वे कब पीछे छूट गये, निहालचंद्र को पता भी न चला। वे कुछ खास सोच भी नहीं रहे थे, जो उनका मन भटका देता, सिर्फ कोई भटका सा ख्याल आ जाता जो उनके मन को छूता हुआ निकल जाता, देवीसिंह का चेहरा, घर का कमरा, जेब में ठुंसे कागजों की खड़खड़- इन सबकी छोटी-छोटी चिंदियां उनके रास्ते पर उड़ती जातीं, वे एक को पकड़ते तो दूसरी उन्हें पकड़ लेती। सुबह की एकाग्र तन्मयता अब खत्म हो चुकी थी, जब वे आंखें मूंदे हवाघर की ओर भागते जा रहे थे; अब सिर्फ बदहवासी थी, जिसमें आंखें खुली रहती हैं और कुछ नहीं देता।
फिर जंगल का एक टुकड़ा आया और निहालचंद्र को लगा, जैसे वे धूप की सफेदी से उतरकर एक लंबी छांह में चले आए हैं। आंखों को राहत मिली। पत्तों पर पैर आसानी से पड़ते जाते, कभी कोई झाड़ी उनके कोट में अटक जाती तो वह खड़े हो जाते, बहुत कोमलता से अपने को रिहा करते, एक अजीब –सा भ्रम होता- जैसे कोई दबे पांव उनके पीछे आ रहा है। वे मुड़कर पीछे देखते तो कोई दिखाई नहीं देता- सिर उठाए पेड़, नीचे झुकी झाड़ियां...बीच में नाचते धूप के छल्ले। उन्हें लगता, मानो ऐसा कभी पहले भी हुआ है...मुद्दत पहले- जब वह उनके पीछे गायब हो जाती थी और वे अपने घर के बाग में अकेले चक्कर लगाते थे- कट्टो ? वह आवाज देने की कोशिश करते किंतु कोई उनका गला पकड़ लेता- जाने दो, उनके भीतर का शैतान कहता, तुम्हारे आगे सारी जिन्दगी पड़ी है। आगे और आगे...वह उन्हें घसीटता हुआ यहां तक ले आया था...।
कैसी जिन्दगी ? ऊपर हल्की-सी फड़फड़ाहट हुई और उनके पैर सहसा ठिठक गये। सिर उठाया तो पहले क्षण कुछ दिखाई नहीं दिया। दोनों तरफ के पेड़ एक-दूसरे पर झुके थे। पत्तों के बीच आकाश की नीली फांक चमक जाती थी। उन्हें समझ में नहीं आया, यह आवाज कहां से आई है, फिर सोचा, ऊपर की कोई शाख हिली है, एक डाल से जब कोई पक्षी उड़ता है तो वह कांपती है, किंतु दूसरी डाल भी थोड़ा-सा हिलती है, जिस पर वह बैठता है लेकिन ऊपर कोई पक्षी दिखाई नहीं दिया- उस अजीब-सी खड़खडाहट के बाद सब कुछ शांत हो गया था।
निहालचंद्र आगे बढ़े और तब उन्हें एक बार किसी ने फिर रोक लिया। इस बार कोई आवाज नहीं थी। सिर्फ उनकी आंखों के आगे कुछ डोल रहा था। उन्होंने अपने चश्मे को सीधा किया जो ऊपर देखने से नीचे खिसक आया था- इस बार उनकी आंखें उठीं तो वहीं स्थिर होकर रह गईं।
वह बरगद का छितनार पेड़ था। उसकी शाख नीचे झुकी थी, एक बूढ़ी बांह की तरफ मुड़ी हुई, जिसके किनारे पर एक रस्सी लटकी थी, धीरे-धीरे हवा में डोल रही थी, जैसे कोई सांप बीन सुनता हुआ फन हिलाता है। उन्हें कुछ आश्चर्य हुआ कि रस्सी को पेड़ से बांधा नहीं गया था, सिर्फ टहनी पर फेंक दिया गया था और वह वहां अटक गई थी, अधर में लटकी हुई, दोनों सिरों को हवा में झुलाती हुई। रस्सी के किनारों पर दो नन्हे मेंहदी रंगे हाथों से बेलन जुड़े थे, काठ के बेलन, हथेलियों की रगड़, धूल और पसीने से घिसे हुए...।
पता नहीं, कितनी देर निहालचंद्र उसे निहारते रहे, जैसे वह रस्सी न होकर कोई मायापाश हो...नवंबर की धूप में झूलती मृगतृष्णा। हवा ठहर गई थी, सारा जंगल एक घोंसले सा सिमट आया था...अपने भीतर ही सांसें खींचता हुआ। वह सिर उठाए हुए निश्चल खड़े थे। कोई उन्हें देखता तो भ्रम होता कि वह आदमी नहीं है- जंगल का ही कोई बूढ़ा, लंबा जंतु कोई अनहोनी-सी आहट सुनकर बीच पगडंडी पर खड़ा हो गया है। उनका कद इतना लंबा था कि जरा-सा हाथ उठाते ही वे रस्सी को छू सकते थे किंतु वे बिना हिले-डुले खड़े रहे ‘ कट्टो‘ उन्होंने धीरे-से फुसफुसाया, फिर आवाज कुछ ऊपर उठ गई, छाती के बलगम के बीच एक खंखारती पुकार जो भीतर की दलदल से बाहर निकलने को छटपटा रही थी। कुछ देर अभेध्य सन्नाटा सनसनाता रहा...फिर अचानक उन्हें अपनी चीख सुनाई दी जो किसी तरह बाहर निकल आई थी, और इस बार किसी ने उनको नहीं रोका, गला दबाकर उन्हें चुप नहीं कराया और वे उसे सुनते रहे जो उनकी आवाज थी, जंगल के आर-पार, झाड़ियों के आर-पार, झाड़ियों और पेड़ों के बीच, बचपन के एक सिरे से बुढ़ापे के दूसरे सिरे तक गूंजती हुई...।
कोई जवाब नहीं मिला। आसपास कहीं कोई न था। हवा उठी थी और पेड़ सरसरा रहे थे...रस्सी के दोनों सिरे नशे में झूल रहे थे। कुछ देर तक वे इस आशा में खड़े रहे कि वह अचानक झाड़ियों के बीच प्रकट हो जाएगी, अपनी रस्सी लेने दोबारा लौट आएगी...किंतु बहुत देर तक कहीं कोई दिखाई नहीं दिया, न उसकी हंसी, न झाड़ियों की खड़खड़-कुछ भी ऐसा नहीं जो उन्हें विश्वास दिला सके कि वह उस दोपहर उनके पास आई थी, उनसे सटकर बैठी थी, जेबों की तलाशी ली थी, जब वे सो रहे थे और उनके कागज बिखरे थे जब वे जागे थे...।
निहालचन्द्र? क्या तुम सचमुच जागे थे?
अंधेरा होते ही हवा रुक गई। कुछ भी नहीं हिल रहा था, न झाड़ी, न पत्ता, न पेड़। कभी-कभी जंगल के भीतर से एक गर्म उसांस-सी निकलती थी, सिर-सिर करती एक सीटी बजाती थी- ऊपर उठ जाती थी-धोबी घाट के ऊपर...कुत्तों को चौंकाती हुई आगे बढ़ती थी, गंदे नाले पर उतर जाती थी और धीरे-धीरे सरकती हुई निहालचंद्र के घर के फाटक पर आकर रुक जाती थी।
देवीसिंह उसे ऊँघते हुए सुनता और रह-रहकर हुड़क जाता। वह पहाड़ी था और बचपन से इस तरह की स्वरहीन आवाजों को सुनता आया था जो आवाजें भी नहीं थीं केवल जंगल की देह की गूंगी वासनाएं जो पशुओं और पेड़ों की कराहों में सिसका करती थीं। वह बारबार दरवाजे की तरफ भागता, बाहर झांकता और फिर वैसे ही भागता हुआ रसोई में लौट आता।
उस रात वह रसोई में ही लेटा था। रात का खाना दो बार गर्म होकर अब ठंडा पड़ गया था। ऐसा बहुत कम होता था कि कर्नल साहब सुबह की सैर को निकलें और दोपहर तक घर न लौट आयें। देरी हो जाती थी तो भी अंधेरा होने से पहले जरूर लौट आते थे। सीढ़ियों पर छड़ी की खड़खड़ाहट से ही देवीसिंह पहचान जाता था कि वे लौट आये हैं। कभी-कभी गुस्से णें भरा वह रसोई में ही लेटा रहता, जैसे उनकी आहट सुनी ही न हो, ऐसे दिनों में निहालचंद्र उसे बुलाते नहीं थे, उसकी आंखें बचाकर दबे पांवों से अपने कमरे में घुस जाते, बिस्तर पर लेट जाते और तब देवीसिंह का मन हुलसने लगता, जल्दी से चाय बनाकर उनके कमरे में ले जाता और वह आंखें मूंदकर बहाना करते, जैसे उसे दा ही न हो।
किंतु उस रात उनका कमरा खाली था, पलंग के नीचे उनकी चप्पलें पड़ी थीं। कोने में चिलमची और गर्म पानी का जग जो अब एकदम ठंडा पड़ गया था। देवीसिंह ने कमरे की अंगीठी में आग जला दी ताकि जब वे आयें तो उसे परेशान न करें, खाना खाकर तुरंत सो जायें। खुद उसकी आंखें बोझिल हो रही थीं- एक बार इच्छा हुई कि पड़ोस के मकान में खबर दे आये कि कर्नल साहब अभी तक नहीं लौटे किंतु फिर पैर रुक गये। शहर में छोटी-से-छोटी बात पर पुलिस आ धमकती है। देवीसिंह को पुलिस देखते ही कंपकंपी छूटने लगती थी। चुप रहना ही बेहतर था। अबी नहीं, कुछ देर में आते होंगे, अकेले आदमी, जाएंगे कहां ? और इस उम्र में भला ?
यह बहुत बड़ी सांत्वना थी। निहालचंद्र सचमुच ही कहीं नहीं जा सकते थे- सिर्फ लौट सकते थे- हर दोपहर साल में तीन सौ पैंसठ बार। बेनागा, उम्र के आकिरी दिन तक।
धीरे-से कुछ खड़का तो वह चौंक गया। क्या दरवाजा खटका है। या सिर्फ हवा है? देवीसिंह कुछ देर अँधेरे में बैठआ रहा, फिर दबे पांव निहालचंद्र के कमरे में गया। आग में सुलगती लकड़ियां कड़क उठती थीं, जिनकी आवाज ने उसे जगा दिया था। अंगीठी के पास रखी लोहे की सलाख से उसने नीचे दबी लकड़ियों को ऊपर खिसकाया, राख को कुरेदा और जब वे बल-बल करती हुई दुबारा जलने लगीं तो वहीं लेट गया, निहालचंद्र के पलंग के नीचे, आग की लपकती लपटों की गरमाई कब उसकी नींद को घेर लायी, उसे पता भी नहीं चला। यह भी पता नहीं चला कि कब वह दरवाजे की सांकल खोलकर बाहर चला आया, उसी रास्ते पर चलने लगा, जिस पर हर रोज निहालचंद्र सैर के लिए जाते थे, गंदा नाला, धोबीघाट का मैदान, नहर की चमकीली, संकरी धार।
पेड़ों के ऊपर चांद निकल आया था और सारा जंगल एक अद्भुत उजाले में चमक रहा था। कुछ दूरी पर वह दिखाई दिये, दोनों हाथों को हवा में डुलाते हुये। देवीसिंह के पैर ठिठक गये। उसे कुछ अजीब-सा लगा कि कर्नल साहब का वही चेहरा-मोहरा है, वही देह, वही कपड़े- लेकिन उस क्षण वे चौदह बरस के लड़के दिखाई दे रहे थे। साफ, कुंआरा, उत्सुक चेहरा-वे अपने दोनों हाथ हवा में हिला रहे थे। वे उ बुला रहे थे- और तब वह निडर होकर भागने लगा। बिल्कुल उनके पास चला आया, वहीं खड़ा हो गया, जहां वे पेड़ के नीचे झूल रहे थे। निहालचंद्र के गले में रस्सी फंसी थी और रस्सी का सिरा पेड़ की टहनी से बंधा था। टहनी हिल रही थी और निहालचंद्र लटक रहे थे। नीचे घास पर उनका थैला, उनकी थर्मस, उनका आमी का कोट पड़ा था, दोनों जेबें उघड़ी पड़ी थीं- नंगी और उल्टी, बिल्कुल खाली। खट-खट...खट...उसे अजीब-सी आवाज सुनाई दी, सिर उठाया तो बच्चों की कूदने वाली रस्सी दिखाई दी, चांदनी में हिलते हुए दो नन्हे पीले बेलन, जो टहनी के हिलने से बार-बार निहालचंद्र के झूलते सिर से टकरा जाते थे।
इधर कुछ दिनों से उसके पति पर चुनाव का भूत सवार था, उठते-बैठते, खाते-पीते, जागते-सोते, नहाते-धोते, बस चुनाव।
चुनाव भी क्या, झाड़ू पार्टी का भूत सवार था। झाड़ू पार्टी का बहुमत आएगा, झाड़ू पार्टी की सरकार बनेगी, क्योंकि झाड़ू पार्टी के प्रधान उनकी जाति के थे।
चिड़िया पार्टी तो गई समझो, वह अक्सर गुनगुनाता फिरता था।
काना बाती कुर्र
चिड़िया उड़ गई फुर्र
उसे चिड़िया पार्टी पर काफी गुस्सा था। उनके हल्के के विधायक चिड़िया पार्टी के थे और उन्ही की शिकायत पर उसका ताबादला यहां हुआ था।
पति उसे पिछले तीन दिन से एक डम्मी मतपत्र दिखलाकर बारबार समझा रहे थे कि झाड़ू पर मोहर कैसे लगानी है! कागज कैसे मोड़ना है ! उसने तो जूते के खाली डिब्बे की मतपेटी बनाकर उसे दिखलाया था कि वोट कैसे डालनी है !
आज वे मतदान केन्द्र पर सबसे पहले पहुंच गए थे। फिर भी आधे घंटे बाद ही उन्हें अंदर बुलाया गया। चुनाव कर्मचारी उनकी उतावली पर हंस रहे थे।
फिर उसका अंगूठा लगवाकर उसकी अँगुली पर निशान लगाया गया, उसका दिल कर रहा था कि अपनी ठुड्डी पर एक तिल बनवा ले, निशान लगाने वाले से।
पिछले चुनाव में उसकी भाभी ने अपने ऊपरी होठ पर एक तिल बनवाया था। हालाँकि उसका भाई बहुत गुस्साया था, इस बात पर। जब उसकी भाभी हँसती थीं तो तिल मुलक-मुलक जाता था। उसकी भाभी तो मुँह भी कम धोती थीं उन दिनों, तिल मिट जाने के डर से। पर वह लाज के मारे तिल न बनवा पाई। मर्द जाति का क्या भरोसा, क्या मान जाए क्या सोच ले!
उसका पति वन विभाग में कुछ था। क्या था? पता नहीं। कौन सर खपाई करे! वह वन विभाग में था, इसकी जानकारी भी उसे यहीं आकर हुई जब वे फारेस्ट कॉलोनी के एक कमरे के क्वार्टर में रहने लगे।
यहाँ आकर चम्पा, हाँ यही उसका नाम था न, बहुत खुश थी। यहीं उसे पता लगा कि चम्पा का फूल भी होता है। और वो इतना सुंदर खुशबू वाला होता है और तो और उसकी माँ, चमेली के नाम का फूल भी था, यहाँ। इतनी हरियाली, इतनी साफ-सुथरी आबो-हवा, इतना अच्छा मौसम, जिंदगी में पहली बार मिला था उसे। फिर सर्दियों में उसका पति उसे शिमला ले गया था। कितनी नरम-नरम रूई के फाहों जैसी बर्फ थी देखकर पहले तो वह भौंचक्की रह गई और फिर बहुत मजे ले लेकर बर्फ में खेलती रही। इतना खेली थी कि उसे निमोनिया हो गया था।
यहाँ कोई काम-धाम भी तो नहीं था उसे। चौका-बर्तन और क्वार्टर के सामने को फुलवाड़ी में सारा दिन बीत जाता था। वहाँ सारा दिन ढोर-डंगर का काम, खेत-खलिहान का काम और ऊपर से सास के न खत्म होने वाले ताने। फिर ढेर सारे ननद देवरों की भीड़ में, कभी पति से मुँह भरकर बात भी नहीं हो पाई थी उसकी।
उसने मतपत्र मेज पर फैला दिया। हाय! री दैया ! मरी झाड़ू तो सबसे ऊपर ही थी। उसने और निशान देखने शुरू किए। कश्ती, तीर कमान। तीर कमान देखकर उसे रामलीला याद आई। उसे लगा चिड़िया उदास है, पतंग हाँ पतंग उसे हँसती नजर आई। साईकल, हवाई जहाज, हाथी सभी कितने अच्छे निशान थे और झाड़ू से तो सभी अच्छे थे। अभी वह सोच भर रही थी कि निशान कहाँ लगाए? तभी वह बाबू जिसने उसे मत पत्र दिया था बोला- “ बीबी जल्दी करो और लोगों को भी बोट डालने हैं। “
उसने मोहर उठाई और मेज पर फैले मतपत्र पर झाड़ू को छोड़कर सब निशानों पर लगा दी और मोहर लगाते हुए वह कह रही थी कि चिड़िया जीते, साईकल जीते, कश्ती जीते पर झाड़ू न जीते।
झाड़ू को जितवाकर वह अपना संसार कैसे उजाड़ ले? हालांकि वह मन ही मन डर रही थी कि कहीं पति को पता न लग जाए।
यदि कभी बरमिंघम आएंगे, तो किसी न किसी मोड़पर, दूर से ही दिखती सड़कों की एक लम्बी स्पाघेटी ( सेवइयों)- सी कई-कई सड़कों वाली उलझी-उलझी, घुमावदार एक भूलभुलैया निश्चय ही आपको चमत्कृत और भ्रमित कर देगी, वैसे ही जैसे कि हर अप्रत्याशित और अनोखी वस्तु कर देती है--हजारों कारें ऊपर से नीचे, बाँए से दाँए हर दिशा में दौड़ती नजर आती हैं यहां पर । आँखें कहीं ठहर ही नहीं पातीं। वैसे भी किसी तेज घूमती चीज को अनदेखा कर पाना आसान नहीं, चाहे आवागमन विचारों का ही क्यों न हो?
शहर को सुचारु और जीवित रखने के लिए बनाया गया, शिराओं और धमनियों सा बिखरा यह सड़कों का जाल निश्चय ही बरमिंघम को आज एक नयी उर्जा और गति दे रहा है -बरमिंघम को चारो तरफ से लपेटे समेटे यह जन्कशन, अब न सिर्फ इस शहर की पहचान है, वरन इसकी जरूरत भी बन चुका है और बखूबी अपनी हर जिम्मेदारी निभा रहा है- रोज यह हजारों से बरमिंघम की पहचान कराता है और हजारों बरमिंघम वासियों को गन्तव्य तक पहुँचाता है। बरमिंघम, जो कभी कारों और औजारों के लिए ही नहीं, टोकिन के "हौबिट" के लिए भी जाना जाता था, कैडबरीज चौकलेट ही नहीं, मशहूर बेवरली स्कौट रिवौल्वर और रौल्स रौयस व जैगुअर कारों के लिए मशहूर था, अब आए दिन किसी न किसी प्रदर्शनी या सम्मेलन के लिए खबरों में रहने लगा है। चैम्बरलिन और शेक्सपियर जैसी प्रतिभाओं को हृदय से लगाए खड़ा इंगलैंड का यह बहुआयामी शहर सिर्फ पर्यटकों का ही आकर्षण केन्द्र नहीं, आज ब्रिटेन का दिल ( मध्य भाग के साथ-साथ औधेयोगिक केन्द्र) कहलाता है। सच्चाई तो यह है कि आज भी बरमिंघम एक ऐसा शहर है जो यथार्थ के धरातल पर खड़े होकर कल्पना का आकाश छूना ही नहीं चाहता, अपितु बुनता रहता है। हमारे लिए तो यह बात और भी अहम् है क्योंकि दक्षिणी एशियन संस्कृति और सभ्यता अब इसके ताने बाने में रच-बस गई है। चाइना टाउन और सोहो रोड के चक्कर लगाए बगैर तो अब शायद बरमिंघमबासी अंग्रेजों का भी काम नही चल पाता है। वैसे भी पापड़ और चोमीन की लत ही कुछ ऐसी है--यही नही, ये तो ब्रूस ली या अमिताभ बच्चन ही नही.. शाहरूख खान और ऐश्वर्य राय को ही नहीं, शिल्पा शेट्टी और ढोंढी को भी अब तक भली भांति जान और पहचान चुके हैं। ब्रिटिश फैशन स्टोर्स और शो में अब भारतीय धुनें, भारतीय चेहरेः एक आम-सी बात होती जा रही है। आसपास का इलाका जो कारखानों और मिलों की चिमनी से निकलते धुँए की वजह से कभी ब्लैक काउन्टी कहलाता था, आज अधिकांश मिल और फैक्ट्रियों के बन्द हो जाने के बाद भी--चिमनियाँ से कोई धुँआ न निकलने के बावजूद भी, बढ़ती एशियन और अफ्रीकन आबादी की वजह से वास्तविक ब्लैक काउन्टी बन चुका है और आज बरमिंघम इंगलैड की करी कैपिटल के नाम से जाना जाने लगा है। भारतीय व्यंजनों की विविधिता ही नहीं, संगीत और कला के भी कई नए नए प्रयोग यहीं से शुरु हुए थे जो अब भारत से अमेरिका तक धूम मचा चुके हैं। रिमिक्स गानों की धूम तो पूरे विश्व में ही सुनी जा सकती है। कोने-कोने एशियाई दुकानें, धर्म संस्थान और आए दिन मनाए जाने वाले तीज त्योहार इस बात के गवाह हैं कि अब ब्रितानवी जीवन के हम अभिन्न हिस्सा हैं। ये आयोजन और जश्न-जुलूस--इसलिए भी प्रवासियों के लिए औरभी महत्वपूर्ण हो चले हैं, क्योंकि इन्ही के सहारे तो वे अपने खोए और छूटे जीवन को बचाकर रखने का सपना संजोते हैं। इन्ही दिवाली, मुहर्रम, नानक जयन्ती, रथयात्रा, जन्माष्टमी और बैशाखी के सहारे वे बच्चों को अपना रहन सहन, पहनावा उढ़ावा और तौर-तरीके ही नहीं, देश और उसकी यादें तक धरोहर में देना चाहते हैं। कुछ दिनों पहले अपने देश की एक खबर पढ़ी थी कि किसी ऐसे ही एक सार्वजनिक उत्सव के बाद अलीगढ़ में हुए सांप्रदायिक दंगों में एक त्रिलोकी नाम का युवक दिनदहाड़े सड़क पर गोली खाकर, कराहता और तड़पता ही मर गया था, बेमदद और असहाय--- अपने ही देश, अपने ही शहर और अपनों के ही बीच। परन्तु मरते ही दावेदारों और मददगारों में होड़ लग गई थी। पहले जावेद कहकर उसे दफनाया गया फिर अगले दिन ही दुबारा हिन्दू रीति-रिवाज से भी जलाया गया। जब हमारा धर्म और समाज इतना खोखला और निष्क्रिय है कि मृतक को भी चैन नहीं लेने देता, तो अब हम किस धर्म या मूल्य की बात करें ---कौनसी धरोहर दे पाएँगे हम अपनी भावी पीढ़ी को ? क्या वह जो बस बाँटेगी और तोड़ेगी, आडम्बर पूर्ण है। जिन्दों को ही नहीं, दिवगंतों को भी कब्जे में रखना चाहती है, प्रचार का मुद्दा बनाती है --- या फिर वह जिसकी संरचना समाज के संरक्षण के लिए की गई थी, और जो यदि ठीक से समझा जाए तो आज भी नैतिक और सामाजिक संबल बनकर लम्बे समय तक हमारा साथ निभाने की सामर्थ रखता है? कोई औकात नही हमारी कि हम इन महती सवालों को उठाएँ, या इन जलती समस्याओं के सेतोषपूर्ण हल ढूँढें, पर क्या हम जैसे आम आदमियों का भी कर्तव्य नहीं कि जो घट रहा है उसे देखें, सुनें और समझें, और यदि कुछ अवाँछनीय है, देश या समाज के हित में नही है, तो उसके खिलाफ आवाज उठा पाएँ? सभ्यता की इस इक्कीसवीं सदी में बहुत नहीं तो कम से कम तृणमूल मानवता तो अपेक्षित होनी ही चाहिए ? शायद कोई समर्थ सुन ले, सिर्फ पढ़े ही नही, सक्रिय सोच के साथ समझे इस कुंठित और रोगी समाज की इस मानसिकता को और सही निदान व उपचार ढूँढ लाए ---वैसे भी क्या सहित सोच का नाम ही साहित्य नही ?
जब हम किसी विषय, सोच या मुद्दे को उठाते हैं तो आपसी तारतम्य जरूरी होता है, बिल्कुल इन्ही उलझी फैली सड़कों सा, एक जगह पर खड़ी होकर ये भी तो कहीं भी आ जा सकती हैं, मनचाही मंजिलें सामने ला सकती हैं और कदम न उठाओ तो वहीं के वहीं...होते हुए भी कुछ नहीं। फिर यह तो संचार का युग है। भावों का सहज और सुचारु आदान प्रदान अब एक अभिलाषा नहीं, जरा सा प्रयास करें तो एक महती सच्चाई है, वह भी घर के अन्दर बैठे-बैठे ही, बिना अपनी आरामदेह कुर्सी से उठे बगैर ही। ---- कोशिश तो हमारी भी यही है कि सक्रिय और जागृत साहित्य और सोच से रूबरु रहपाएँ ---विदेश की मिट्टी में भी रची जा रही अनूठी काव्य व विचार-यात्रा के साथ-साथ चलें। ऐसी रचनाएं जो आज और अभी रची जा रही हैं, साथ साथ मिलजुलक पढ़ें और जानें। इनमें से कुछ तो ऐसी होंगी जो पाठकों के मन में एक विशेश स्थान लेकर रचनाकार को गौरव ग्राम में बिठा चुकी हैं, तो कुछ ऐसी भी होंगी, जो आज भी जंगली फूल सी अकथनीय सौंदर्य के बावजूद भी, किताबों के ढेर में खोई पड़ी हैं, सही गन्तव्य न पा सकी हैं--- किसी खयाल या संग्रह के कीमती गुलदान में न सज सकी हैं क्योंकि कोई नजर ही उनतक न पहुँच पाई है। कभी आपके पास आएँगे तो कभी आपको बुलाएंगे ---माध्यम व तरीका चाहे जो भी हो, लक्ष्य बस यही रहेगा कि मिलने मिलाने का, विचारों के आदान प्रदान का एक रोचक और सार्थक सिलसिला लगातार ही रहे। विश्वीकरण की हजार बातों के बावजूद भी हर देश की संस्कृति और सोच थोड़ी सी भिन्न होती है और यही भिनन्ता किसी साहित्य को अनोखे और विशिष्ट रंग देती है। शब्दावली और मानक सबमें नया अनूठापन आ जाता है, जो उस समाज की झलक ही नहीं, तत्कालीन प्रचलन और सामाजिक मूल्यों और मान्यताओं से भी हमें अवगत कराता चलता है। इसी संदर्भ में याद आ रही हैं यहीं पर रची, युवा स्थानीय कवियत्री की अंग्रेजी में लिखी एक कविता जिसके बेबाक मानक इस बेझिझक और स्वच्छंद यूरोपियन धरातल पर ही जन्म ले सकते थे, भाव कुछ इस तरह से थे--- कल जब तुमने मेरे खयालों के साथ छेड़छाड़ की थी तो मेरा मष्तिष्क फूल गया था बधाई हो तुम्हे, नए नए पापा शायद तुम्हे तो पता ही नहीं कि तुम्हारे घर अभी अभी कुछ ही घंटे पहले चौबीस घंटे की लम्बी प्रसव वेदना बाद गोल मटोल कविता का जन्म हुआ है। दूसरा रंग देखिए। यह कविता भी बरमिंघम की ही है और उस स्थानीय कवियत्री की है, जो यहाँ की (बरमिंघम शहर की) पोएट लौरिएट भी रह चुकी हैं। इसमें माँ जो कि एक औजार बनाने वाले की पत्नी है, बच्चे को समझाती है कि यह तेजमय सूरज, चाँद कुछ और नहीं, पिता के हथौड़े की चोट से निकला हुआ आग का गोला है जो अपनी तेजी और गरमी की वजह से छिटककर आकाश पर जा पहुँचा है। सूरज, चाँद दो हिस्सों में बट गया है। यही नही, ये तारे भी उसी घर्षण से उत्पन्न चिनगारियाँ हैं जो उनके स्वेत बिन्दुओ में भीगकर झिलमिला रही हैं। किसी मजदूर नेता की आंदोलक सोच नहीं है यह, वरन् यहाँ के पढ़े लिखे समाज की प्रतिनिधि सोच है। यहाँ हर काम गौरव लायक होता है, चाहे वह कितना भी बड़ा हो, या कितना भी छोटा। सुबह-सुबह जो घर या सड़क साफ करता है शाम को वही साथ-साथ ब्रिज या क्रिकेट भी खेल सकता है--घृणा या हीन भावना का तो सवाल ही नही। सामाजिक उत्सवों में भाग लेता है। अच्छे और नेक कामों के लिए पैसे जमा करता है। सांस्कृतिक व सामाजिक समारोह आयोजित करता और करवाता है। संस्थाए चलाता है। समाज और उसके निर्णय में एक जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से हर स्तर पर भाग लेता है --यानी कि व्यक्ति की पहचान व्यक्तित्व से है, जाति, समाज, वैभव या परिवार से नहीं, ओहदे से भी नहीं---यदि है भी तो बस तबतक ही, जबतक कि वह काम या नौकरी की वेशभूषा में है ---यानी कि ड्यूटी पर है। शायद यही वजह है कि ये पश्चिमी देश प्रगति करपाए और आजभी कर रहे हैं जबकि हमारे देशों की युवा प्रतिभाएँ और बुद्धिजीवी आजभी डिग्रियों को जेब में रखे कुंठा और भूख की चिता पे सुलग रहे हैं। यह सामाजिक सच आज भी क्यों हमारे गले में काँटे सा ही अटका है और हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं। विचारक और सुधारक महाकवि रहीम भी तो इसी छोटों और बड़ों की बराबर की महत्ता और योगदान को समझा रहे थे, जब उन्होंने कहा था कि,- " रहिमन देख बड़न को लघु न दीजिए डार / जहाँ काम आवै सुर्इं कहा करे तलवार।।" कोई भी समाज अपने पीर पैगम्बरों को, धर्म को नही भूलता। पीढ़ी दर पीढ़ी आयोजन और स्मारकों में सजा संवारकर रखता है इन्हें। हमारे त्योहारों की ही तरह यहाँ भी हर ईस्टर और क्रिसमस पर क्राइस्ट को याद किया जाता है। क्रिसमस जिसकी तैयारी महीनों पहले शुरू हो जाती है और साथ में उपहार व दावतों का सिलसिला भी। पर कोशिश तो यह भी रहनी चाहिए कि हम उन नामों के साथ उनके संदेशों को भी याद रख पाएं। अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लड़ते सच को सूली पर न चढ़ायें--- ये गलतियाँ फिर से न हों; यह सीख याद रखें---बस उपहारों के आदान प्रदान और मौजमस्ती के लिए ही त्योहार नहीं। त्योहार और मेलों की भीड़ और मेलमिलाप के कहकहों में विचारों का भी आदान प्रदान होते रहना चाहिए...नई और पुरानी पीढ़ियों के बीच एक सजगता, एक जागरूकता बनी रहनी चाहिए, जिससे कि नए युग की नई समस्याओं के सार्थक हल ढूँढा जा सकें। और यहीं आती है समाज के बुद्धिजीवी और कलाकारों पर जिम्मेदारी कि कैसे वे इन मूल सच और संदेशों को रोचक और ग्राह्र बनाते हैं--- पर क्या किसी भी समाज में संभव है ऐसा --इन्सान तो आजभी खुदसे बाहर तक नहीं आ पाया है--- अगर ऐसा हो पाता तो क्या रामराज्य का सपना, सपना न होकर एक यथार्थ न होता और इस यूटोपिया की कल्पना मात्र एक कल्पना ही नही, वास्तविकता न होती। पता नही कब हम विचारों की नजदीकी के इस महत्व को समझ पाएँगे। कुरुतियों और स्वार्थ के पहियों से कुचला, घायल समाज आज भी प्लास्टर में है और लंगड़ा घूम रहा है, चाहे बगदाद की सड़कें हों या फिर ब्रौडफर्ड, बनारस, अलीगढ़ या आसाम की--हम बस हाथ पर हाथ रखे दोष ही देते रह जाते हैं, लादेन. सदाम, बुश, ब्लेयर या फिर मायावती, मुलायम सिंह, आशाबापू या कोईऔर--जो भी--कोई भी--कहीं भी!
पर निराश होने की जरूरत नहीं। माना कि मानवीय आस आज आपदकालीन स्थिति में है, पर जिन्दा तो है। ---और शायद रहेगी भी। क्योंकि हम अभी भी कराह सुन सकते हैं। पूरी तरह से बहरे नही हुए हैं। आजभी सत्य शिव और सुन्दर की लौ क्षीण ही सही, टिमटिमा तो रही है।...
जिस प्रकार गायन-वादन, नृत्य-अभिनय, चित्राकला, मूर्तिकला तथा अन्य ललित कलाओं और लोक कलाओं के अभ्यास से एकाग्रता का विकास होता है उसी तरह लेखन से भी एकाग्रता तथा ध्यान के लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं। इस दृष्टि से लेखन एक उपचार पद्धति या थैरेपी से कम नहीं है। लेखन क्या है? लेखन से तात्पर्य मौलिक सृजन से है। लेखन दरअसल हमारे मन में समाए हुए विचारों की लिखित अभिव्यक्ति ही तो है। हमारे मन में अनेक प्रकार के विचार समाए होते हैं। कुछ विचार अच्छे तो कुछ बुरे। कुछ सकारात्मक तो कुछ नकारात्मक। कभी हम आशावादी होते हैं तो कभी निराशावादी। इन परस्पर विरोधी विचारों में संघर्ष चलता रहता है और ये घनीभूत होकर मन पर बोझ बन जाते हैं। यदि इस बोझ को हल्का नहीं करेंगे तो विभिन्न प्रकार के तनावों का शिकार हो जाएँगे। लेखन के माध्यम से मन में बोझ बने विचारों को प्रकट कर हम मुक्त हो जाते हैं। लेखन अभिव्यक्ति के माध्यम के साथ-साथ तनाव मुक्ति का साधन भी है। लेखन एक उपचार पद्धति कैसे है? लेखन क्योंकि तनावमुक्ति का माध्यम है अत: यह रोगों से भी रक्षा करता है। जब हम लंबे समय तक तनावग्रस्त रहते हैं तो उससे अनेक साइकोसोमेटिक बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं। तनावमुक्त रहकर हम इन मनोदैहिक व्याधियों से मुक्ति पा लेते हैं। लेखन स्वयं में एक उपचार पद्धति है। लेखन के दौरान हम अत्यंत शांत-स्थिर अवस्था में होते हैं जो एक प्रकार से ध्यान की अवस्था ही है। ऐसी अवस्था में हमें मेडिटेशन के लाभ स्वत: ही प्राप्त हो जाते हैं और मेडिटेशन तो स्वयं एक उपचारक तकनीक या पद्धति है। क्या लेखन को नियंत्रित करके उपचार में मदद ली जा सकती है? जैसे मलिन जल के स्थिर हो जाने पर जल धीरे-धीरे स्वच्छ हो जाता है उसी प्रकार शांत स्थिर चित्त भी धीरे-धीरे प्रसन्न हो जाता है और यहाँ मनुष्य अपने मूल स्वरूप में लौट आता है। मनुष्य का मूल स्वरूप या स्वभाव है आनंद। यहाँ यदि हमें लगता है कि हमारे मन में विकारों का संग्रह हो गया है तो लेखन द्वारा न केवल उन्हें बाहर निकाला जा सकता है अपितु सकारात्मक लेखन द्वारा विकारों को संस्कारों में परिवर्तित किया जा सकता है। कैसे? समस्याओं या विकारों का उपचार क्या है? विकारों का रूपांतरण करके हम न केवल सकारात्मक लेखन करते हैं अपितु इन सकारात्मक विचारों या सुझावों की संस्कार के रूप में हमारे मन में कंडीशनिंग भी हो जाती है जो हमारे रूपांतरण और उन्नति का सबसे अच्छा मार्ग और उपाय है। यहाँ लेखन द्वारा सकारात्मक विचारों की रीकंडीशनिंग हो जाती है। क्या लेखन द्वारा दूसरों के उपचार में मदद ली जा सकती है? किसी व्यक्ति की दमित भावनाओं अथवा उसके मन में दबे हुए विचारों को अच्छी प्रकार समझने के लिए लेखन की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। कोई रोगी या दुखी व्यक्ति जब अपने मनोभावों को कागज पर उतारता है तो कुछ तो इस प्रयास में ही वह मुक्त अनुभव करता है और उसके मनोभावों का विश्लेषण कर चिकित्सक या मनोचिकित्सक भी उसे उचित परामर्श दे सकता है। जो व्यक्ति अपने मनोभावों को व्यक्त नहीं कर सकता या करना नहीं जानता वह सबसे बड़ा रोगी है और उसका निदान ;डायग्नोसिस और ट्रीटमेंट दोनों ही मुश्किल हैं। मनोभावों की अभिव्यक्ति तो मौखिक रूप से भी की जा सकती है फिर लिखित अभिव्यक्ति पर ही जोर क्यों? लेखन मौखिक अभिव्यक्ति से अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि लिखने में व्यक्ति को पर्याप्त चिंतन का समय मिलता है। इस समय व्यक्ति सेल्पफ-रियलाइजेशन का प्रयास करता है और इससे अच्छी तो कोई उपचार पद्धति हो ही नहीं सकती। आत्मनिरीक्षण या आत्मावलोकन के उपरांत व्यक्ति स्वयं को बिल्वुफल यथार्थ स्थिति में प्रस्तुत करता है अत: निदान और उपचार दोनों सरलता से किये जा सकते हैं। क्या हर व्यक्ति एक लेखक की तरह स्वयं को सही-सही अभिव्यक्त कर सकता है? हर व्यक्ति एक अच्छा लेखक नहीं हो सकता लेकिन प्रयास करने पर और पर्याप्त अभ्यास के बाद हर व्यक्ति स्वयं को व्यक्त करने में सक्षम हो जाता है। कई बार जीवन में ऐसी घटनाएँ हो जाती हैं जिन्हें हम दूसरों को बता नहीं पाते। स्थान और पात्रा बदल कर यदि हम उस घटना को लेखन यथा कहानी, लघुकथा आदि का रूप दे दें तो निश्चित रूप से उस घटना के दुष्प्रभाव से मुक्त हो जाते हैं। लेखन के किन-किन रूपों या विधओं से उपचार में मदद मिलती है? उपन्यास, कहानी, नाटक, एकांकी, संस्मरण, रेखाचित्रा, जीवनी, आत्मकथा, लघुकथा अथवा अन्य कोई भी विध क्यों न हो यदि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आप लेखन से जुड़े हैं तो हर प्रकार का लेखन आपको उपचार के लाभ देगा ही। मौलिक लेखन के अलावा पुस्तक का नाट्यांतरण से अथवा लिप्यांतरण या भाषांतरण हो कार्य के साथ-साथ आपका उपचार करने में भी सक्षम हैं। इससे न केवल लिखने वाले की एकाग्रता का विकास होता है अपितु सर्जनात्मकता का आनंद भी मिलता है। इससे आपके तनाव और चिंता के स्तर में कमी आती है जिससे आपकी रोगावरोधक क्षमता विकसित होकर आपको स्वस्थ बनाए रखने में सहायक है। कई व्यक्ति रात को सोने से पूर्व जरूरी पत्रादि लिखते हैं और कुछ डायरी इत्यादि लिखते हैं। डायरी लिखने का अर्थ है दिनभर की या पिछली घटनाओं का चिंतन और विश्लेषण प्रस्तुत करना। तकनीकी भाषा में इसे रेट्रोस्पेक्शन कह सकते हैं। यह मौखिक हो या लिखित इसमें ध्यान के तत्त्व समाहित होते हैं। ध्यान व्यक्ति को आराम देता हे, उसे स्वस्थ करता है, तनाव को कम करता है। सारे दिन के काम के बाद यदि नींद आने में बाधा आ रही हो तो सोने से पूर्व इस विधि अर्थात् रेट्रोस्पेक्शन से उपचार किया जा सकता है। ये सब लेखन के ही विविध रूप हैं। इन विभिन्न विधियों द्वारा स्वयं को तनावमुक्त कर उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु प्राप्त करें।
आखिर चीन ऐसा क्यों कर रहा है? क्या कारण है कि वह हमारे कश्मीरी और अरूणाचली नागरिकों को वीज़ा वैसे नहीं दे रहा है, जैसे अन्य भारतीय नागरिकों को देता है? इन नागरिकों के पासपोर्टों पर वह वीज़ा नहीं छापता| उसका दूतावास इन नागरिकों को वीज़ा का एक अलग कागज पकड़ा देता है| वह कागज दिखाकर वे चीन में प्रवेश कर सकते हैं याने वह उन्हें वीज़ा तो दे रहा है लेकिन भारतीय पासपोर्ट पर नहीं ! यह फर्क वह क्यों कर रहा है ?
इस फर्क का मतलब साफ है| वह कश्मीर और अरूणाचल के नागरिकों को भारत का नागरिक नहीं मानता| दूसरे शब्दों में वह इन दोनों प्रदेशों को भारत का अंग नहीं मानता| इन्हें वह या तो चीन का प्रदेश मानता है या विवादास्पद प्रदेश ! कश्मीर में वह लद्दाख को अपना हिस्सा मानता है और शेष प्रदेश को पाकिस्तान का हिस्सा मानता है| पाकिस्तान ने 1963 में एक संधि के तहत चीन को कब्जाए हुए कश्मीर की हजारों वर्गमील ज़मीन भी भेंट कर दी है| जिन दिनों राजीव गांधी चीन के साथ राजनयिक संबंध सामान्य बनाने की क़वायद कर रहे थे, तत्कालीन चीनी राजदूत भारत के बारे में मीठी-मीठी बातें करने लगे थे| उन्होंने कहा कि वे सारा भारत घूमना चाहते हैं| मैंने कहा आप कश्मीर से ही शुरू क्यों नहीं करते तो वे तपाक से बोले कि ''कश्मीर तो मैं बिल्कुल नहीं जा सकता|'' मैंने पूछा, ''क्यों'' तो बोले कि ''मेरे कश्मीर जाने का अर्थ होगा, यह मान लेना कि कश्मीर भारत का हिस्सा है|''
कश्मीर और अरूणाचल भारत के अंग नहीं हैं, यह चीन की पुरानी और दृढ़ मान्यता है| माओ त्से तुंग लद्दाख, अरूणाचल, सिक्किम वगैरह को चीन की उंगलियां कहा करते थे| अरूणाचल के तवांग-क्षेत्र् को चीन अपना हिस्सा इसलिए मानता है कि उसके अनुसार तंवाग कभी तिब्बत का हिस्सा रहा है और तिब्बत आजकल चीन का हिस्सा है| 2003 में जब वाजपेयी सरकार ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया तो चीनी सरकार ने आश्वासन दिया था कि वह अरूणाचल पर विवाद को खत्म करने की कोशिश करेगी| उसने चीन के नक्शे से अरूणाचल को हटाने के संकेत भी दिए थे लेकिन पिछले छह वर्षों में चीन टस से मस भी नहीं हुआ है| उसने सिर्फ दलाई लामा के तवांग जाने का ही विरोध नहीं किया है, भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अरूणाचल जाने को भी आपत्तिजनक बताया है| इससे बढ़कर चीन की हिमाकत क्या हो सकती है ?
इसे कूटनीतिक दुस्साहस के अलावा क्या कहा जा सकता है ? इस दुस्साहस का जवाब क्या है ? इसका सीधा जवाब यही है कि चीन के तिब्बत और शिन-च्यांग (सिंक्यांग) में रहनेवाले नागरिकों को भी भारतीय दूतावास अलग कागज़ पर वीज़ा देने लगे| वीज़ा के बजाय वह उन्हें सिर्फ 'प्रवेश-पत्र्' देने लगे| तिब्बत के लोग तिब्बती हैं, हान नहीं| इसी प्रकार सिंक्यांग के लोग उइगर मुसलमान हैं| वह उन्हें 'राज्यविहीन नागरिक' भी घोषित कर सकती है, जैसे कि तालिबान के ज़माने में अफगान नागरिकों को किया जाता था| दूसरे शब्दों में हम बिना कहे ही यह कह देंगे कि हम तिब्बत और सिंक्यांग को 'राज्यविहीन' क्षेत्र् मानते हैं| यदि हम ऐसा करें तो चीनी सरकार के पसीने छूट जाएंगे|
यदि हम यह जवाबी कार्रवाई नहीं करते हैं और सिर्फ विरोध-पत्र् पठाते रहते हैं तो यह शुद्घ दब्बूपना होगा| इसके परिणाम आगे जाकर काफ़ी घातक होंगे| यह विचित्र् है कि हम अपने कश्मीरियों और अरूणाचलियों को अपने ही हवाई अड्डों से वापस लौटा रहे हैं ! जिन्हें चीन जाकर पढ़ाई या नौकरी या व्यापार करना है, हम उनके अवसरों पर कुठाराघात कर रहे हैं| उनका कसूर क्या है ? कसूर चीन का है और नुकसान हमारे नागरिकों का हो, यह कैसी कूटनीति है ? यदि हमारे कश्मीरियों और अरूणाचलियों को हम चीन नहीं जाने देंगे तो इसमें चीन का क्या नुकसान है ? यदि हम चीन को उसी की भाषा में जवाब दे तो क्या होगा ? चीन क्या कर लेगा ? वह कुछ नहीं कर सकता ! ज्यादा से ज्यादा वह तिब्बती, उइगर, मंगोल, मंचू, किरगिज़ मूल के यात्रियों को भारत नहीं आने देगा| न आने दे तो मत आने दे| भारत का क्या बिगड़ रहा है ? कुछ नहीं ! भारत के अरूणाचली और कश्मीरी तो 'कागज़-वीज़ा' पर चीन जाते रहेंगे|
यदि चीन दादागीरी पर उतर आए तो वह क्या करेगा ? वह ऐसा क्या करेगा, जो अभी नहीं कर रहा है ? उसने पाकिस्तान को परमाणु हथियार दिए, तीनों युद्घों के दौरान कूटनीतिक समर्थन दिया, बलूचिस्तान के ग्वादर में बंदरगाह बना दिया और उसे भारत के विरूद्घ उकसाता रहा| उसने नेपाल और म्यांमार तक रेल्वे-लाइन डालना शुरू कर दिया है| श्रीलंका में वह हन्मंतोता बंदरगाह बना रहा है| बांग्लादेश से होकर गैस की पाइप लाइन भारत नहीं आने दे रहा है| वह भारत को सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य बनाने पर अपने होंठ सिले हुए है, जबकि साम्यवादी चीन को मान्यता देनेवाला पहला देश भारत ही था और भारत ने ही उसे संयुक्त राष्ट्रसंघ में प्रवेश दिलवाने की कमान थाम रखी थी| वह परमाणु सप्लायर्स ग्रुप में भारत-अमेरिकी परमाणु सौदे के विरूद्घ काम कर रहा है| अरूणाचल को मिलनेवाली विश्व-बैंक की सहायता में भी उसने अडंगा लगाया है| अफगानिस्तान में उसने तीन अरब डॉलर देकर तांबे की खदानें खरीद ली है| ईरान में वह गैस के सौदे में भारत को पछाड़ रहा है| भारत के सभी पड़ौसी देशों में वह अपने पांव पसार रहा है|
मान लें कि वीज़ा के मुद्रदे पर चीन भारत से नाराज़ हो जाएगा| तो क्या वह व्यापार बंद कर देगा ? 60 बिलियन डॉलर के आपसी व्यापार में भारत के मुकाबले चीन को ज्यादा फायदा है| चीन का विदेशी व्यापार इधर इतना घट गया है कि अब वह ऐसा खतरा मोल नहीं लेगा| भारत भी नहीं चाहेगा कि चीन से संबंध खराब हों लेकिन वह यह न भूले कि भारत को चीन की जितनी गर्ज है, उससे ज्यादा चीन को भारत की गर्ज है| चीन के साथ भारत के संबंध सहज और घनिष्ट हों, यह जरूरी है लेकिन यह काम बराबरी के स्तर पर हो, यह बेहद जरूरी है|
साधारणतया लोग भूतों से डरते हैं मगर इस देश के राजनेता,प्रशासक , सैनिक अधिकारी आदि लोगों को भूतों से बहुत प्रेम हैं। वे जब तक पद पर बने रहते हैं तब तक बेचारे भूत की कोई फिक्र नही करते और पद छोङते ही श्री मान जी अपने पीछे `भूतपूर्व' हो जाते हैं। जैसे- भूतपूर्व प्रद्यानमंत्री, भूतपूर्व मुख्यमंत्री, भूतपूर्व सचिव आदि। इन दिनों तो यह प्रचलन इतना बढ चुका है कि लोग अपने नाम के पीछे `भूतपूर्व चोर' भी लगा लेते हैं। जिसका अर्थ बताते हैं कि वो पहले चोर थे मगर अब आघ्यात्म अपना लिया है। फिर भी उन्हे अपने भूतकाल पर इतना .फक्र है कि वो आज भी पहले `भूतपूर्व चोर' लिखते हैं फिर अपना नाम। हाल ही में इस देश में एक आदमी बिमार था यूँ तो हजारों लोग यहाँ मरते है जिनकी कहीं कोई चर्चा नही होती मगर वो भूतपूर्व प्रद्यानमंत्री होने के नाते रोज समाचार पत्रों की दो बाई दो की जगह घेरे रहता है। मेरा भी आजकल मन करता है कि मैं भी `भूतपूर्व' हो जाऊ मगर मुझे भूतों से बहुत डर लगता है इसलिए यह क्रांतिकारी कदम नहीं उठा सकता। भूतपूर्व लगाने से आदमी को उसका भूतकाल हमेशा याद रहता है वैसे सारे मनुष्य लगा सकते है `भूतपूर्व जानवर' ताकि आदमी को यह अहसास रहे कि वो कभी जानवर था इसीलिए आज भी जानवरो जैसी हरकते कर देता है। क ल श्री राम सेना वाले भी अपने नाम के पिछे लगाएगे `भूतपूर्व पब कलचर पर हमलाकारी'। मेरे दादा जी के एक दोस्त भूतपूर्व मंत्री है। वो कहते है कि जब हम मंत्री थे तब यह भ्रष्टाचार जैसी चीजों के लिए कोई जगह नही थी मगर अब क्या करें हम तो भूतपूर्व हो गये। वो बात अलग थी कि उनके सरकारी कार्यकाल के दौरान उनकी सम्पति मे अभूतपूर्व वृद्धि हुई। आज भी उनके यहॉं आयकर विभाग का छापा नही पङता है क्योंकि उनके पास `भूतपूर्व मंत्री' का कवच है। उनकी गाङी को कोई पुलिस वाला नहीं रोकता क्योंकि उन्होंने अपनी गाङी की नम्बर प्लेट पर बङे बङे लाल अक्षरो में छपवा रखा था `भूतपूर्व मंत्री'। बेचारे पुलिस वाले डरते है कि कहीं भूत इनका पीछा छोङ दिया और यह सिर्फ मंत्री रह गये तो उनके बत्त्चों को मिड डे मिल पर काम चलाना पङेगा, और यह अपना भूत उनके पीछे लगाकर उन्हे `भूतपूर्व इन्सपेक्टर' बना देंगे। वाह रे ! कुर्सी जब तक नीचे है तब तक तो मजा है ही और नीचे से हटते ही लोग भूतपूर्व' लगा कर मजा करेंगे। अगर उपयोगितावाद का यह सिद्धान्त बेचारे जरमी बेंथम को पता होता तो वह छाती पीट पीटकर रोता कि वो हिन्दुस्तान में क्यों नही जन्मा? कुछ दिनों पहले राजस्थान के विधानसभा चुनाव में मैं वहॉं एक गावॅं में था, उसी दिन एक विधायक पद के उम्मीदवार का भाषण था जो पहले मुख्यमंत्री थे और आजकल `भूतपूर्व मुख्यमंत्री' रह गये है। वे सभा में आये और बोले, `भाइयों और बहनों मुझे बचा लीजिए, मेरी जान आपके हाथों में है, मुझे भूत से बहुत डर लगता है। आप इस बार अपना अमूल्य वोट देकर मेरा भूतपूर्व हटा दें ताकि मैं मुख्यमंत्री रह जाऊ।'
मुझे भी इस भूतपूर्व शब्द से इतनी मोहब्बत हो गई है कि मैने उठकर पूछा,`श्रीमान जी आपके भूतपूर्व वादों का क्या हुआ?' वे जोश के साथ बोले,`मैं वादा करता हूँ कि मेरा भूतपूर्व हटने के साथ ही मैं वादों का भी भूतपूर्व हटा दूगॉं तब मैं सिर्फ मुख्यमंत्री रह जाऊगा और भूतपूर्व वादे सिर्फ वादे।'
अतर, इत्र या इतर मूलरूप से अरबी शब्द है जिसका अर्थ है खुशबू और ऐसा समझा जाता है कि इसकी व्युत्पत्ति संस्कृत शब्द सुगंध से हुई है। अतर के सबसे आरंभिक आसवन का उल्लेख आयुर्वेदिक ग्रंथ चरक संहिता में मिलता है। भारतीय इत्रों का इतिहास भारतीय सभ्यता जितना प्राचीन है। पुरातत्वीय प्रमाण से ज्ञात होता है कि भारतीय उप महाद्वीप के प्राचीनतम वासी पेड़ पौधों के प्रति असीम आदर भाव रखते थे। समय गुजरने के साथ सुगंधित वनस्पति व जीव उत्पादों को पीस कर, कुचल कर व आसवन करके सुगंधित तैल तैयार किया जाता था। इन प्रक्रियाओं ने कीमिया (अलकेमी) कला का प्रदुर्भाव किया जिसके आरंभिक प्रमाण सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाइयों में मिलने वाले सुगंध पात्रों और टैराकोटा आधानों में मिलते हैं। इनके तैयार करने की विधियों का इतनी शताब्दियों तक विद्यमान रहना स्वयं भारतीय सुगंधों की विशेषताओं का द्योतक है। भारत की दैनिक जीवन शैली में अभिन्न रूप से घुले-मिले सुगंधित पौधे भारतीय संस्कृति के प्रत्येक पहलू, अनुष्ठान से पाक संबंधी, योग से भोग तक सभी में अहम भूमिका निभाते हैं। वेदों में अनेक पौधों, शाखाओं, छालों और पुष्पों के विभिन्न मिश्रणों के यज्ञों में देवी देवताओं को अर्पण का उल्लेख मिलता है।
भारतीय सुगंधों से संबंधित एक रोचक तथ्य यह है कि लोग कई वर्षों तक एक ही सुगंध का प्रयोग करते हैं। भारतीय सुगंधों की एक खूबी यह भी है कि पश्चिमी जगत के विपरीत, जहां पुरुष और महिला के लिए भिन्न प्रकार की सुगंधें तैयार की जाती है, भारतीय सुगंधों में यह भेद नहीं होता। भारत में अतर हमेशा से राजाओं और रानियों की पसंद रहे हैं। स्वतंत्र भारत में राष्ट्रपति और विभिन्न प्रकार के अतरों को पसंद करते रहे हैं और प्रत्येक की अपनी निजी पसंद रही है।
सुगंध चिकित्सक अतरों के चिकत्सीय गुणों का दावा करते हैं। सुगंध चिकित्सा का सबसे आम उदाहरण है हरे तैल के प्रयोग से तत्काल मिचली और उलटी पर नियंत्रण पाना। अतर गिल या इत्र ए खाकी में जिसे मिट्टी से बनाया जाता है, वर्षा ऋतु की पहली फुहारों की सुगंध होती है और यह रक्त चाप के उपचार में लाभकारी है। चमेली के सत्व मानसिक तनाव और त्वचा रोगों के उपचार में उपयोगी सिद्द हुआ है। चंदन के तैल की गंध सूंघने से तनाव घटता है और उल्टी रुकती है। वक्ष और गले पर इसके लेप से सूखी खांसी दूर होती है। इससे त्वचा रोगों में भी लाभ पहुंचता है। गेंदे के सत्व पुराने जिद्दी घावों के उपचार में प्राचीन काल से दवा की तरह प्रयुक्त किया जा रहा है। इसमें असाधारण विषाणुरोधी खूबियां होती हैं। नींबू तैल मधुमेह, दमा, छालों और स्फीत शिरा (वेरीकोज वेन्स) में लाभकारी है.। मीठे मुरबक की तीन बूंदों का चीनी के साथ सेवन अधसीसी व नशे के बाद के सिर का भारीपन दूर करती है। केसर का अतर शरीर की शिथिलता दूर करने और सिर दर्द का प्राकृतिक उपचार है।
हिना अपनी उष्मा उत्पन्न करने वाले गुणों के लिए जानी जाती है और यदि इसे शीतकाल के दौरान कम्बलों पर लगाया जाता है तो उससे अतिरिक्त उष्मा मिलती है। गर्मियों में यदि इसे सूंघा जाता है तो उससे नाक से खून भी निकल सकता है। ऐसा समझा जाता है कि मोतिया के अतर की एक बूंद से रक्त स्राव और मवाद बनना थम जाता है और केवड़ा या खस को सूंघने से गर्मी से होने वाला सिरदर्द गायब हो जाता है। अतर खस के शरबत को गर्मियों में पसंद किया जाता है क्योंकि यह पाचन तंत्र को शीतलता प्रदान करता है। त्वचा रोगों के उपचार में चमेली उपयोगी है और गुलाब हृदय के लिए हितकारी होता है। कस्तूरी और केसर से तैयार शोख हिना हर त्वचा पर बिन्न सुगंध उत्पन्न करती है। शीतकाल में यह एक सुखद अहसास प्रदान करती है। जानकार लोगों का मानना है कि अतर की सुगंध कृतिम रेशों से बने वस्त्रों की बजाय सूती वस्त्रों पर अधिक समय तक ठहरती है. गर्मियों में कुछ अतर यदि सावधानी पूर्वक नहीं लगाए जाते तो वे उड़ जाते हैं। यदि आप वास्तव में कोई असाधारण सुगंध की खोज में हैं तो भारतीय अतर आपको अवश्य पसंद आयेंगे।
बिल्लू अपने मेहनतकश मज़दूर मां-बाप का इकलौता बेटा था। वह उनकी उम्मीदों का सहारा था। होनहार बिल्लू दिन भर अपने मां-बाप की मदद करता और शाम को मन लगाकर पढ़ता। शाम के स्कूल में उसके अच्छे दोस्तों में कालू और ढीलू थे। दिन में जहां वह अपने मां -बाप के साथ रहता वहां पीपल का एक पेड़ था। उसपर गिल्लू गिलहरी रह्ती थी। बिल्लू अपना बचा हुआ खाना वहां छोड़ आता। गिल्लू उसे खा जाती। धीरे-धीरे गिल्लू ,बिल्लू की दोस्त बन गई।
कह्ते हैं सब दिन एक जैसे नहीं होते। बिल्लू और गिल्लू की दोस्ती परवान चढ़ ही रही थी कि किसी की बुरी नज़र उनपर लग गई। गिल्लू अपने दोस्त बिल्लू जैसा बन गई थी। वह भी बिल्लू की ही तरह अन्य पशु- पक्षियों की सहायता किया करती थी। एक दिन जब वह अपने मित्र बिल्लू का दिया हुआ अन्न ग्रहण कर रही थी थका-मांदा कालिया वहां आया और बड़ी ही दीनता से बोला, ‘बहन, गिल्लू! बहुत दिनों से भूखा हूं. मुझे भी थोड़ा सा खाना दे दो. मैं तुम्हारा बहुत्त आभारी रहूंगा.’ गिल्लू में बिल्लू ही जैसी दयालुता थी, कालिया के हालत पर तरस खाते हुए अपने खाने में शामिल कर लिया। कालिया बहुत धूर्त था। खाना मिलते ही अपनी मक्कारी पर आ गया और पूरे खाने पर कब्जा जमा लिया।
भोली-भाली गिल्लू एक जगह जाकर उदास बैठ गई। उसे पहली बार अपने भोलेपन का पछ्तावा हुआ,लेकिन अब पछताने से क्या होना था जब चिड़िया चुग गई खेत।
-शमशेर अहमद खान
***
सुंदर है आँखों की खिड़की
सुंदर है आँखों की खिड़की एक नहीं लाखों की खिड़की रंग आंकती, ढंग आंकती, हर खिड़की में यही झांकती
यही देखती नए नजारे यही देखती सपने सारे आँखें खोले रखना भाई, आँखों में हर चीज समाई।
पेड़
कई तरह के फल उपजाते खुशबू वाले फूल खिलाते लेकिन थोड़ा-सा झुक जाते सज्जनता के नाते पेड़ फूले नहीं समाते पेड़ !
कड़ी धूप में बनते साया सारा जीवन सरस बनाया पेड़ों की है अद्भुत माया पहले वर्षा लाते पेड़ फिर छतरी बन जाते पेड़ !