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                            सोच और संस्कारों की साझी धरोहर


         


                                             अँक-13-वर्ष-2


                             "चमन में बज रही है फूलों की पायल

                             सुरभि के स्वर पवन को कर रहे चंचल

                               किरण कलियां गगन से फेंकता कोई

                              किसी का हिल रहा लहरों भरा आंचल!"
 
                                            -राजनरायण बिसारिया 

 
                                           (सर्वाधिकार सुरक्षित)

                                     संरचना व संपादन: शैल अग्रवाल. 

               संपर्क -सूत्र- 
editor@lekhni.net  ,  shailagrawal@hotmail.com

                     पत्रिका प्रति माह की पहली तारीख को परिवर्तित की जाती है।

                

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मार्च का महीना आ गया है। मुड़कर देखती हूँ तो 17 मार्च 2007, वह तारीख है जब एक सपना आँखों से किलककर 'लेखनी ' में आन छुपा  था और उस दिन से आजतक उसी नटखट को ढूँढते,पकड़ते, उसीके पीछे-पीछे दौड़ते-भागते वक्त कितना गुजर गया, जान ही नहीं पायी! 12 अंक और कई-कई पन्नों का सफर तय करती लेखनी वर्ष पूरा भी कर चुकी; विश्वास ही नहीं होता, वह भी पाठकों के भरपूर स्नेह से सिंची- लहलहाती और झूमती...सोचती और देखती हूं तो आँखें आभार से छलक आती हैं ! आभार उन सभी मित्र और पाठकों का , जिन्होंने बड़ी ईमानदारी व लगन से साथ निभाया और लगातार लेखनी के पन्ने पलटते रहे। न सिर्फ इसके हर रूप को चाहते और सराहते रहे, बल्कि विषयों और भावों को भी परखा और जाना। इरादों की, मेहनत की, इस आन्दोलन की कद्र की। इस सफर के दौरान न सिर्फ हमें कई-कई अच्छे दोस्त और सहयात्री मिले, अपितु बहुत कुछ सीखा और जाना भी है हमने आपसे। वाकई में आभारी हूँ  आपके स्नेह और सहयोग की। प्रिय कवि श्री शिवमंगलसिंह 'सुमन' जी के शब्दों में कहूँ तो,

' जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला

उस उस राही को धन्यवाद

जीवन अस्थिर अनजाने ही

हो जाता पथ का मेला कहीं

सीमित पग-डग, लंबी मंजिल

तय कर लेना कुछ खेल नहीं

दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते

सम्मुख चलता पथ का प्रमाद

जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला

उस उस राही को धन्यवाद।

 

साँसों पर अवलंवित काया

जब चलते चलते चूर हुई

पथ के पहचाने छूट गए

पर साथ साथ चल रही याद

जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला

उस उस राही को धन्यवाद।

 

जो साथ न मेरा दे पाए

उनसे कब सूनी हुई डगर

मैं भी न चलूँ यदि तो भी क्या

राही मर लेकिन है राह अमर

इस पथ पर वे ही चलते हैं

जो चलने का पा गए स्वाद

जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला

उस उस राही को धन्यवाद।

 

कैसे चल पाता यदि न मिला

होता मुझको आकुल-अंतर

कैसे चल पाता यदि मिलते

चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर

आभारी हूँ मैं उन सबका

दे गए व्यथा का जो प्रसाद

जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला

उस उस राही को धन्यवाद। '

जहां मील का पत्थर, यह अंक थमने और सोचने के लिए मजबूर कर रहा है... एक सुखद व रुचिकर दिशा की तरफ इंगित करना चाहता है, वहीं उल्लासित मन पाठकों और मित्रों से पूछना और जानना चाहता है कि क्या और देखना चाहेंगे आप इसके आगामी पन्नों में...क्या क्या नई संभावनाएँ और दिशाएँ हो सकती हैं भविष्य में लेखनी के लिए ?  

आपकी रचनाएं मिल रही हैं और भरपूर सराही भी जा रही हैं। अंक प्रायः विषयोन्मुख होने की वजह से सभी कवि और लेखकों द्वारा भेजी गयी, सभी रचनाओं को अभी तक लेखनी के पन्नों पर यथोचित स्थान और सम्मान नहीं मिल पाया है, लेखनी इसके लिए क्षमा प्रार्थी है और उम्मीद करती है कि शीघ्र ही भविष्य में लेखनी के किसी-न-किसी पन्ने पर आपको अपनी रचनाएँ अवश्य ही दिख जाएँगी ।  लेखनी हर 'लेखनी ' की कद करती है और हर रचना के समावेश का भरसक प्रयत्न भी। आपकी अच्छी रचनाओं का न सिर्फ स्वागत है वरन् प्रतीक्षा भी।  ऐसे ही रचनाएँ भेजते रहें। आपके सहयोग, सद्भाव व स्नेह पर ही तो लेखनी आश्रित है। इस नए वर्ष में भी लेखनी आपके निरंतर सहयोग व स्नेह की कामना और अपेक्षा रखती है।

अतीत के अमर शब्द-शिल्पियों के अमर ग्रन्थों के साथ-साथ, गत वर्ष कई-कई हिन्दी और अंग्रेजी की पत्रिकाओं और संकलनों से ढूंढ-ढूंढकर भी हम आपके लिए भांति-भांति की रचनाएं लाए। संपादक व लेखकों ने भी, जहाँ जैसे संभव हुआ,सहर्ष और तुरंत ही अनुमति दी। हम उन सभी लेखक और संपादकों के प्रति भी तहेदिल से शुक्रगुजार हैं  जिनकी  अनमोल रचनाओं को हमने लेखनी के पाठकों के साथ बांटा और सराहा। लेखनी के कुछ  मित्र ऐसे भी हैं जिनसे मांगकर या बिना मांगे ही एक अधिकार के साथ लेखनी ने उनकी रचनाएं छापीं..उन सभी विशेष मित्रों से आभार के साथ-साथ अनुरोध है कि माना विध्या, सद्भाव और कला बंटने-बांटने से ही बढ़ते हैं, परन्तु कहीं यदि कुछ भी आपको नागवार गुजरे या अतिक्रमण-सा महसूस हो, तो सचेत करना भी मत भूलिएगा। सहज विश्वास और सद्भाव... आडम्बरहीन स्नेह-साथ ही तो है जो दुनिया...  जीवन को रहने-सहने लायक बनाता है।  आप जो पलपल साथ हैं , यह खुशकिस्मती ही नहीं, जीवन का एक नायाब तोहफा है हमारे लिए और ईश्वर की अनमोल नेयमत से कम नहीं। भावातिरेक में ज्यादा बहूँ, इसके पहले आप मेरे मन की बात समझ गए हैं, इस विश्वास के साथ अगले मुद्दे पर आती हूँ।

यूँ तो लेखनी के बारे में आपने सब अच्छा ही अच्छा लिखा, पर एकाध सुझाव यह भी मिले कि 'लेखनी' अन्य मैगजीन की तरह क्यों नहीं दिखती? हमें किसी वेब डिजाइनर की मदद लेनी चाहिए। (स्वस्थ आलोचना सुधार की जननी है इसलिए लेखनी सुधी पाठकों की आभारी है और उम्मीद है कि ऐसे ही भविष्य में भी आप हमारी कमियों की तरफ ध्यान इंगित करते रहेंगे)।

मानती हूँ कि तकनीकी रूप से कमियां हैं और कई सुधार किए जा सकते हैं।  सजाने-संवारने लायक अभी भी बहुत कुछ है, जो अधूरा है...। आपने पूछा- आउटलुक दूसरों की तरह क्यों नहीं ; आप में से एकाध को शायद अखरता भी है यह, परन्तु विश्वास मानिए, हम ध्यान से सुन रहे हैं और लेखनी को बेहतर बनाने का प्रयास भी निरंतर ही जारी है। अधिकांश पाठकों ने इसी ' ईजी टु नैविगेट ले आउट ' को बेहद सराहा भी है। लेखनी मित्रों और आलोचकों  से एक बात और बांटना चाहेगी, मानाकि सीखने और सुधारने के लिए हम सदैव ही तत्पर और उत्सुक हैं, पर जहां तक पत्रिका 'लेखनी ' का सवाल है इसका ध्येय कभी दूसरी पत्रिकाओं की तरह दिखने, या स्पर्धा करने का नही रहा; और अगर  इसके विषय और सजधज दूसरों से भिन्न हैं तो यह स्वाभाविक ही तो है... क्या यही प्रकृति नियम भी नहीं ! 

खैर... आपकी लेखनी तो बस यही चाहती है कि आप ऐसे ही  एक उत्साह और कौतुक से पन्ने-दर-पन्ने इसे खोलते और पढ़ते रहें और नया ढूँढने के प्रयास में, अचानक ही खुलते रहस्यों से विस्मित हों, उनमें रमें। इस प्रयास में लेखनी आपकी आनन्द-स्थली... प्रेरणा-स्रोत्र भी बन पायी तो प्रयास वास्तव में सार्थक है।

सामग्री संजोने में जो जी तोड़ मेहनत की है हमने और वह रंग भी ला रही है। हर महीने ही ड्योढ़ी होती पाठकों की संख्या हमारे लिए अब एक सुखद अहसास बन चुका है। बाल साहित्य, हास्य व्यंग्य, पर्यटन, ज्ञानविज्ञान और प्रेरक प्रसेंगों और कविता कहानियों व विभिन्न विषयों पर लेख जैसे स्थाई स्तंभों को साथ लिए लेखनी के पिछले बारहों अंक बारह विविध विषयों को लेकर आए। मार्च के पहले अंक ने जहां नारी के विविध रूपों को उकेरा, दूसरा सच पर आधारित था...हमारे अपने-अपने आंतरिक या आत्मा के सच , जिनपर काल और परेशानियों का कोई असर नहीं होता और जो हमें 'हम' बनाते हैं। इन्सान को दूसरे जीवों से ही नहीं, बल्कि एक इन्सान को भी अन्य इन्सानों से भिन्न करते हैं। यह हमारे वैयक्तिक सिद्धान्त, अनुभव, और अभिलाषा का समन्वय ही तो है, जिसके आधार पर  हम इस दुनिया को परखते, खुद को ढालते हैं। जीतते-हारते ही नहीं, सुखी-दुखी, संतुष्ट और भ्रमित तक होते हैं। निजी संस्कार ... संकल्पों को मन की गहराई तक स्थापित कर पाते हैं।

तीसरा मई का अंक 'सुमन' यानी फूलों से हसीन और खूबसूरत महकते पल और इन्सानों का समारोह था। दूसरे शब्द  में बाह्य रूप और आत्मा की गन्ध लिए था। चौथा 'तपिश' या बेचैनी पर था। चीजें, जो हमें सह्य नहीं, या जिन्हें हम बदलना चाहते हैं। पांचवा यानी जुलाई का अंक बरखा पर था। छठा अगस्त का अंक 'हिन्दी के बढ़ते कदम ' यानी कि भारत के गांव, हाटों से निकली हिन्दी के वेस्ट मिनिस्टर से लेकर स्टैच्यू औफ लिबर्टी तक के अथक और जुझारू सफर पर था। कैसे हम इस आगे बढ़ती हिन्दी के कदमों की बाधा या फिसलन नहीं, सहारा और सम्बल बन सकते हैं... अक्षुण्णता और सनातनता को कायम रख सकते हैं, इन मुद्दों पे समाधिस्थ था। आज जब भारत में ही भाषा और प्रान्तीयता को लेकर शर्मनाक आन्दोलन और प्रदर्शन हो रहे हैं। भाषा, जातिवाद और प्रन्तीयता की बिना पर लोग बहलाए और बर्गलाए जा रहे हैं। विकास और सद्भाव की जगह इसे ही लेकर, चारो तरफ अनचाही तोड़फोड़ और नुकसान हो रहे हैं, तो क्या एक  राष्ट्र को जोड़ने वाली भाषा की जरूरत और भी प्रखर और अनिवार्य नहीं?

सशक्त और एक दूसरे से जोड़ने वाली राष्ट्रभाषा की जरूरत सिर्फ भारत की विश्व के आगे प्रभावशाली छवि की ही जरूरत नहीं, अपितु हमारी एक आन्तरिक जरूरत बन चुकी है। सोचना अब यह है कि देश की राष्ठ्र-भाषा हिन्दी को हम गौरव देते हैं या पुनः पुरानी गलतियों  को ही दोहराते हैं? आन्तरिक भेदभावों से त्रसित और भ्रमित होकर एकबार फिर 'विदेशियों' (अंग्रेजी) को ही सत्ता सौंप देते हैं? विश्वीकरण के युग में कन्धे-से कन्धे मिलाकर चलना और बात है, पैरों में लेट जाना.. अपनी हस्ती मिटा देना कुछ और ! जानती हूँ, जबाव भावी पीढ़ी की शिक्षा...देश के तेजी से बदलते रुझान और जरूरतें...अर्थ व्यवस्था से संचालित, यह समय ही दे पाएगा, परन्तु  कम-से-कम सोच-समझकर सही दिशा चुनना , सही व संतुलित निर्णय...यह तो हमारे अपने हाथों में ही है आजभी ! कोई कुछ भी कहे, कितना भी बहकाए या ललकारे, सामूहिक जनमत नकारा नही जा सकता और भविष्य को सुधारने की, आज को बनाने की कुंजी आजभी हम सबके अपने ही हाथों में है ! 

सातवां अंक एकांत ...सूनापन नहीं, जो सहारा और सृजन-संसार या हमारा बैटरी-चार्जर है, उसमें जा रमा। आठवां अक्तूबर का अंक महात्मा गांधी और उनके प्रेरणा-दायक जीवन-दर्शन के सार में डूबकर मोती चुन रहा था। नवां दीपावली यानी उजाले की अँधेरे पर विजय पर केन्द्रित था। दसवां गीत और गजल विशेषांक था। 11 वां अंक नववर्ष यानी पुराने को त्याग नई की शुरुवात का अंक था। और अंत में बारहवां अंक प्रेम-प्यार पर केन्द्रित था। आप सोच रहे होंगे कि मैं इतनी बहक क्यों गई हूँ, अंकों के विषय क्यों गिनवा रही हूँ? बस ! इसलिए कि अगर आपने पुराने अंक नहीं देखे, तो शायद कभी फुरसत से आप देखना ही चाहें...!

मार्च यानी कि फागुन, फागुन यानी कि होली  ...सृजन-सुख से प्रेरित रंगरूप भरा उत्सवों का महीना...गीत-संगीत और राग-रंग का महीना...हास-उल्लास और कवि सम्मेलनों व मूर्खाधिवेशनों का महीना; लहलहाते खेतों बीच सजी-संवरी बैठी पृथ्वी ने एकबार फिर अपनी धानी चूनर पर रंग-बिरंगे बेल-बूटे काढ़ लिए है... नए-नए पुष्प-पल्लवों की अनूठी सजधज से हमें रिझाने व लुभाने लगी है। इसके छलकते-बहते उत्साह में डूबे पशु-पक्षी तक जब तिनका-तिनका नीड़ बना रहे हैं और नेह के अटूट बन्धनों को प्रगाढ़ करता तरल यह नवजीवन संचार मन ही नहीं, कोपल-कोपल पल्लवित दिख रहा है... जब बासन्ती बयार के कान्धे तो कभी गुनगुनी धूप में नहाई नन्ही कूकें हर आंगन, हर डाली, हर बगिया फुदक रही है...  जब पूरी ही प्रकृति चारोतरफ एक अनोखा जादू बुन रही है, तो हम आप भी क्यों न इसी रूप,रस और गंध में डूबजाएं...इसे जी भर-भरकर सोखें और सराहें ! 

 रास-रंग में डूबा, लगन व मेहनत की स्याही से छपा लेखनी का यह तेरहवां अंक, या फिर दूसरे साल का पहला अंक,  आपके लिए सज-संवर चुका है और आपके अपने हाथों में है । चलते-चलते एकबार फिर आपके सुकर्म, यश, आनन्द, रचनाधर्मिता... आपके स्वास्थ और दीर्घ आयु की कामना करते हुए, पुनः होली की अनेक शुभकामनाओँ के साथ आपसे अगले अंक तक के लिए विदा लेना चाहूंगी।...   

                                                                                       -शैल अग्रवाल


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बसंत पंचमी के आते-आते ही मौसम में एक मादकता सी छा जाती है। बौराए आमों के साथ मानव पशु-पक्षी, पूरी पृथ्वी ही मानो बौरा-सी जाती है। हरियाली धरती पीली सरसों की चूनर ओढ़े नई-नवेली दुल्हन सी खिलने और फलने लगती है और खुले नीले आकाश से झरझर झरती सुहानी गुलाबी धूप मानो पृथ्वी के सारे रंगों को अपनी  सुहानी आभा से कुछ और ही निखार देती है। कुहकती कोयल, दादुर, मोर ...सभी का मन एक नए आल्हाद से झूमने लगता है और हवाओं तक में शुरु हो जाता है एक अनूठा संगीत...एक गुनगुनी छेड़छाड़। फिर तो किसी को याद दिलाने की जरूरत नहीं... पूरी प्रकृति ही शोर मचा देती है, ' जागो! फाग-फगवाड़ा आ गया। मिलन का प्रियतम के साथ छेड़छाड़ का मौसम आ गया। एक दूसरे के रंग में भीगने और भिगोने का मौसम आ गया।'   



 




होरि खेलत हैं गिरधारी।

  मुरली चंग बजत उफ न्यारो, संग जुवति ब्रजनारी।

चन्दन केसर छिरकत मोहन अपने हाथ बिहारी।

भरि-भरि मूठ गुलाल लाल चहुँ देत सबन पै डारी।

छैल छबीले नवल कान्ह संग स्यामा प्राण पियारी।

गावत चार धमार राग तँह दै दै कर करतारी।

फागु जु खेलत रसिक साँवरो बाढ्यो रस ब्रजभारी।

मीरा के प्रभु गिरधरनागर, मोहनलाल बिहारी।

फागुन के दिन चार रे, होरी खेल मना रे। टेक।

बिनि करताल पखबाज बाजै अणहद की झणकार रे।

बिनि सुर राग छतीसों गावैं, रोम रोम रंग सार रे।

सील संतोष की केसर चोली, प्रेम प्रीत पिचकार रे।

उड़त गुलाल लाल भयौ अंबर, बरसत रंग अपार रे।

घट के पट सब खोल दिए हैं लोक लाज सब डार रे।

होली खेलि पीय घर आये, सोई प्यारी प्रिय प्यार रे।

मीरा के प्रभु गिरधर नागर चरण कमल बलिहार रे।

                                           -मीराबाई



 
होलीः कुछ कविताएँ



 


 




 
 

होली के रंग

रंग होली के कितने निराले,
आओ सबको अपना बना लें,
भर पिचकारी सब पर डालें,
पी को अपने गले लगा लें ।

रक्तिम कपोल आभा से दमकें,
कजरारे नैना शोखी से चमकें,
अधर गुलाबी कंपित दहकें,
पलकें गिर गिर उठ उठ चहकें ।

पीत अंगरिया भीगी झीनी,
सुध बुध गोरी ने खो दीनी,
धानी चुनर सांवरिया छीनी,
मादकता अंग अंग भर दीनी ।

हरे रंग से धरा है निखरी,
श्याम वर्ण ले छायी बदरी,
छन कर आती धूप सुनहरी,
रंग रंग की खुशियां बिखरीं ।

नीला नीला है आसमान,
खुशियों से बहक रहा जहान,
मस्ती से चहक रहा इंसान,
होली भर दे सबमें जान ।

कवि कुलवंत सिंह
 

 
 

 

 

 फाग

 
फागुन का महीना है, मचा है फाग
होली छाक छाई है; सरस रँग-राग !

बालों में गुछे दाने, सुनहरे खेत
चारों ओर झर-झर झूमते समवेत !

पुरवा प्यार बरसा कर, रही है डोल
सरसों रूप सरसा कर, खड़ी मुख खोल !

रे, हर गाँव बजते डफ़ मँजीरे ढोल
देते साथ मादक नव सुरीले बोल !

चाँदी की पहन पायल सखी री नाच
आया मन पिया चंचंल सखी री नाच !

                      -महेन्द्र भटनागर

 

 
 

होली हाइकू

 

फागुन मन

इन्द्रधनुष तन

होली पे आज

 

 

उमड़ा फिर

रंगों का सागर

पलकों तले

 

मलते हम

प्यार का गुलाल

छूटे ना कभी।

       -शैल अग्रवाल

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प्रस्तुत है लेखनी के पाठकों के लिए भारत की प्राचीन संस्कृति और जीवन शैली को उजागर करता हुआ आचार्य श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का एक रोचक आलेख;

 

प्राचीन भारत में मदनोत्सव

संस्कृत के किसी भी काव्य, नाटक, कथा और आख्यायिका को पढ़िए, वसन्त ऋतु का उत्सव उसमें किसी-न-किसी बहाने अवश्य आ जाएगा। कालीदास तो बसन्त-उत्सव का बहाना ढूँढते रहते थे। मेघदूत वर्षा ऋतु का काव्य है, पर यक्षप्रिया के उद्यान के वर्णन के प्रसंग में प्रिया के नूपुरयुक्त वामचरणों के मृदुल आघात से कन्धे पर से फूट उठने वाले अशोक और मुखमदिरा से सिंचकर खिल उठने को लालायित बकुल की चर्चा उसमें आ ही गयी है। वस्तुतः अशोक और बकुल को इस तरह खिला देने का उत्सव बसन्त में ही मनाया जाता था। बसंत का समय प्राचीन भारत में उत्सवों का काल हुआ करता था। 'कामसूत्र' में इस समय के कई उत्सवों की चर्चा आती है। इसमें दो बहुत प्रसिद्ध हैं-मदनोत्सव और सुवसन्तक। ' कामसूत्र ' के टीकाकार यशोधर ने दोनों को एक ही मान लिया है, पर अन्य ग्रन्थों से स्पष्ट है कि ये दोनों उत्सव अलग-अलग दिनों को मनाये जाते थे। भोजदेव के अनुसार सुवसन्तक वसंतावतार का उत्सव है-आजकल का वसंत-पंचमी का उत्सव। मदनोत्सव आज भी पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। वात्सायन के 'कामसूत्र ' में भी इसका उल्लेख है।

पुराने ग्रन्थों से पता चलता है कि फागुन से आरम्भ करके चैत के महीने तक वसंतोत्सव कई प्रकार से मनाया जाता था। इसके दो रूप बहुत प्रसिद्ध थे। एक सार्वजनिक धूमधाम का और दूसरा कामदेव के पूजन का। सम्राट हर्षदव की ' रत्नावली ' नाटिका में इन दोनों प्रकार के उत्सवों का बड़ा ही सरस और जीवन्त वर्णन मिलता है। उस दिन सारा नगर पुरवासियों की करतल ध्वनि, मधुर संगीत और मृदंग क मादक घोष से मुखरित हो उठता था। नागराजन मदमत्त हो उठते थे। राजा अपने प्रसाद की सबसे उँची चन्द्रशाला में बैठकर नगरवासियों के आमोद-प्रमोद का रस लेते थे। नागरिकाएँ मधुमास से मत्त होकर सामने पड़ जाने वाले किसी भी पुरुष को पिचकारी (श्रृंगक) के रंगीन जल से सराबोर कर देती थीं। राज-मार्गों के चौराहों पर मदल नाम के ढोल और चर्चरी गीत की ध्वनियां मुखरित हो उठती थीं। सुगन्धित पिष्टातक (अबीर) से दिशाएं रंगीन हो उठती थीं। केशरमिश्रित पिष्टातक से राजपथ और प्रसाद इस प्रकार आच्छादित हो उठते थे कि प्रातःकालीन उषा की छाया का भ्रम होने लगता था। नागरजनों के शरीर पर शोभमान हेमालंकार और सिर पर धारण किए हुये अशोक के फूल इस सुनहरी आभा को और भी बढञा देत थे। ऐसा जान पड़ता था कि कुबेर को भी अपनी समृद्धि से जीतने का दावा करने वाली सारी नगरी सुनहरे रंग में डुबो दी गयी है। 

कीर्णौःपिष्टातकौधैः कृतदिवसमुखैः कुंकुमसिनात गौरेः

हेमालंकारभाभिर्भरनमितशिखैः शेखरैः कैकिरातैः।

एषा वेषाभिलक्ष्यस्वभवनविजिताशेषवित्तेशकोषा

कौशाम्बी शातकुम्भद्रवखजितजनेवैकपीता विभाति।

                                  -'रत्नावली', 1.11

उस दिन बड़े घरों के सामने आंगन में फव्वारे पूरे वेग से छूटते रहते थे और नागरिकों की, अपनी पिचकारी में पानी भरने की उल्लास-लालसा को पूरा करने में सहायक हुआ करते थे। इस स्थान पर पौर-युवतियों क बारबार आते रहने से उनके सीमंत के सिन्दूर और कोपलों के अबीर झरते रहते थे और सारा फर्श लाल कीचड़ से भर जाता था, फर्श सिन्दूरमय हो उठता थाः

धरायंत्रविमुक्तसंततपथः पूरलुप्ते सर्वतः 

सद्यःसान्द्रविमर्दकर्दमकृतकोड़े क्षणं प्रांगणे।

उद्दामप्रमदाकपोलनिपतत् सिन्दूर रागरूणैः

सैन्दूरीक्रियते जनने चरणन्यासैः पुरः कुट्टिमम्।।

मगर इस उत्सव का सर्वाधिक हुड़दंगी रूप वार-वनिताओं के मुहल्ले के वर्णन में मिलता है। निस्सन्देह यह होली का पुराना रूप है। 

इसके साथ ही इस उत्सव का एक शांत-स्निग्ध चित्र भी मिलता है। भवभूति के 'मालती माधव' नामक प्रकरण में एक मदनोत्सव का चित्र है। इससे पता चलता है कि मदनोद्यान- जो विशेष रूप से इस उत्सव के लिए ही बनाया जाता था - इसका मुख्य केन्द्र हुआ करता था। उसमें कामदेव का मन्दिर हुआ करता था। इसी उद्यान में नगर के स्त्री-पुरुष एकत्र होकर भगवान कन्दर्प की पूजा करते थे। यहाँ पर लोग अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार फूल चुनते, माला बनाते, अबीर-कुंकुम से क्रीडा करते और गीत-नृत्य आदि से मनोविनोद किया करते थे। इस मंदिर में प्रतिष्ठित परिवारों की कन्याएँ भी पूजनार्थ आया करती थीं और मदनोत्सव की पूजा करके मनोवांछित वर की प्रार्थना करती थीं। जनता की भीड़ प्रातःकाल से ही शुरु हो जाती थी और मध्यकाल से अबाध गति से आती रहती थी। ' मालती-माधव' से पता चलता है कि अमात्य भूरिवसु की कन्या मालती भी इस उद्यान में कन्दर्प-पूजन के लिए आयी थी। इस पूजन में धार्मिक बुद्धि की प्रधानता होती थी और शोरगुल और हुड़दंग का नाम भी नहीं था। यह मंदिर नगर के बाहर हुआ करता था।

मदनोत्सव की एक पूजा चैत्र के महीने में होती थी। अशोक वृक्ष के नीचे मिट्टी का कलश स्थापित किया जाता था। सफेद चावल भरे जाते थे। फल और ईख का रस इस पूजा के नैवेध्य थे। कलश को सफेद वस्त्र से ढका जाता था। चन्दन भी उस पर सफेद ही छिड़का जाता था। कलश के ऊपर ताम्रपत्र पर केले के पत्ते रखे जाते थे, जिस पर कामदेव और रति की प्रतिमा उतारी जाती थी और नाना भांति के गन्ध, धूप, नृत्य, गीत आदि से देवताओं को तृप्त किया जाता था। वह 'मत्स्य पुराण' की बात है। इसके दूसरे दिन चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को भी पूजा होती थी। लोग व्रत रखते थे।

 ' शिल्प रत्न', ' विष्णु धर्मोत्तर पुराण' आदि ग्रन्थों में कामदेव की प्रतिमा बनाने की विधियां दी गयी हैं। ' विष्णुधर्मोत्तर' के अनुसार उसके आठ भुज हैं, तार पत्नियां: परन्तु 'शिल्परत्न ' में केवल यही कहा गया है कि वह अपूर्व सुन्दर हो और उसके बाँयी ओर अभिलाषवती रति और दाहिनी ओर गृहकर्म-निरता प्रीति, ये दो पत्नियां हों। स्थायी मन्दिरों में दोनों प्रकार की मूर्तियां बनती थीं, पर अशोक वृक्ष के नीचे जो मूर्ति बनती थी वह द्विभुज ही होती होगी। 'रत्नावली' नाटक में राजा को अशोकवृक्ष के नीचे बैठा देखकर रत्नावली को भ्रम हो गया था कि कामदेव साक्षत आकर पूजा गृहण करते हैं। 

कालीदास के 'मालविकाग्निमित्र' और श्री हर्षदेव की 'रत्नावली' में इस उत्सव के सर्वाधिक सरस अनुष्ठान, अशोकवन में पुष्प ले आने का विवरण मिल जाता है। भोजराज और श्री हर्षदव की गवाही पर कहा जा सकता है कि उस दिन सुन्दरियां कुसुम्भी रंग की साड़ी पहनती थीं। तुरंत स्नान करने से रानी वासवदत्ता की शरीर-कान्ति और भी निखर आयी थी, वह कौसुम्भराग से रंजित साड़ी पहनकर जब अशोकवृक्ष के नीचे कामदेव की पूजा कर रही थी तो उसकी साड़ी का लाल पल्ला फड़फड़ा उठा था। उस समय राजा को ऐसा लगा था, जैसे तरुण प्रवाल-विटप की लता ही लहरा उठी हो।

प्रत्यग्रमज्जनविशेष विविक्त कान्तिः

कौसुम्भरागरुचिस्फुरदंशुकान्ता।

विभ्राजसे मकरकेतनमर्च्चयन्ती

बालप्रवालविटपिप्रभया लतेव।

' मालविकाग्निमित्र' से पता चलता है कि मदनदेवता की पूजा के बाद ही अशोक में फूल खिला देने का अनुष्ठान होता था। 'रत्नावली' में भी इसकी चर्चा है। इस अनुष्ठान का रूप इस प्रकार था- कोई सुन्दरी सर्वाभरणभूषिता होकर, पैरों को अलक्तकराग से रंजित करके, नूपुर सहित बांये चरण से अशोकवृक्ष पर आघात करती थी। इधर नूपुरों की हल्की झनझनाहट, उधर अशोक का सोल्लास कन्धे पर से ही फूल उठना। साधारणतः रानी यह कार्य करती थी। पर 'मालविकाग्निमित्र' में बताया गया है कि उस रानी के पैर में चोट आ गयी थी, इसलिए उन्होंने मालविका को भेज दिया था। मालविका अशोकवृक्ष के पास गयी, पल्लवों का गुच्छा हाथ से पकड़ा और बांये पैर से अशोक पर मृदु आघात किया।कालिदास की लेखनी ने इस मादक चित्र को अपूर्व गरिमा से भर दिया है।

परब्रह्म की उस मानसिक इच्छा का, जो संसार की सृष्टि में प्रवृत्त होती है, मूर्तरूप ही 'काम' है। जब यह सृष्टिरचना के अनुकूल होती है तो विष्णु और शिव का साक्षात रूप कही जाती है। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि मैं जीवमात्र में धर्म के अविरुद्ध रहने वाला 'काम' हूँ, परन्तु जो व्यक्तिगत इच्छा धर्म के विरुद्ध जाती है, वह अपदेवता है। काम का एक रूप धर्म के अविरुद्ध जाने वाला है, दूसरा धर्म के विरुद्ध जाने वाला। पहला साक्षात विष्णुरूप है। 'बृह्मसंहिता' में कहा गया है कि जो आनंद और चेतनामय रस से मन को भरता है, प्राणियों के मन में 'स्मर' या 'काम' रूप से प्रतिफलित होता है और इस अशेष भुवनों को जीतकर नित्य विद्यमान है, उस आदिपुरुष गोविन्द को मैं स्मरण करता हूँ(46)। 'मत्स्यपुराण' में ' काम्नाम्ना हरेरर्चा' कहकर बताया गया है कि वस्तुतः 'काम' नामक हरि की ही पूजा की जाती है। इसलिए मंदिर और मूर्ति बनाकर जिस दवता की पूजा की जाती है, वह साक्षात् विष्णु ही है। श्रीकृष्ण-गायत्री और काम-गायत्री में कोई फर्क नहीं है।

परन्तु इसका एक दूसरा रूप भी है, जो व्यक्ति के विवेक को दबा देता है। पश्चिम में 'किउपिट्' नामक देवता (या अपदेवता) को अन्धा माना गया है, क्योंकि वह विवेक को नष्ट करता है, मनुष्य को अन्धा बना देता है। शिव ने इसी मादक मदनदेवता को भस्म किया था। उसके भावात्मक ' मानसिक' रूप को बचा लिया था। यह आश्चर्य की बात है कि हमारे शास्त्रों में वार-वनिताओं के लिए जिस मदन-मूर्ति का विधान किया गया है, उसकी आँखों पर सोने के पत्तर की पट्टी बँधवा दी जाती है। 'किउपिट्' देवता की तरह उसे अन्धा तो नहीं कहा गया, पर अन्धे-जैसा बना अवश्य दिया गया है। 'हेमनत्र परावृतम् ' में पट्टी सोन की होने पर भी दृष्टिशक्ति का अभाव तो हो ही जायेगा। कामदव वसन्त-ऋतु का मित्र है। परन्तु 'कुमारसंभव' में वर्णित वसन्त अकाल का वसन्त है; अस्वाभाविक , बलादानीय, अपदवता। शिव ने इसी को ज्ञान के नेत्र उन्मीलित करके भस्म किया था।

शास्त्रों में काम के बाण और धनुष फूलों के बताये गये हैं। अरविन्द, अशोक, आम, नवमल्लिका और नीलोत्पल, ये उसके पांच बाण हैं, जिन्हें क्रमशः उन्मादन, तापन, शोषण, स्तम्भन और सम्मोहन भी कहा गया है।

संसार की सभी सभ्य आदमजातियों में वसन्तकाल में उद्दाम यौवन-उन्माद के उत्सव पाए जाते हैं। कहीं-कहीं ये उत्सव बहुत ही स्थूल यौन-वासना रूप में पाये जाते हैं, कहीं संयत और सुरुचिपूर्ण रूप में। प्राचीन भारत में इस उत्सव के उद्दाम रूप को संयत, सुरुचिपूर्ण और धर्माविरुद्ध देवता के रूप में सँवारन का सफल प्रयत्न किया गया था। अपेक्षाकृत निम्न स्तर के लोगों में सदा वह सीमातिक्रमण करके प्रकट होता रहा और दुर्भाग्यवश अभी भी किसी-न-किसी रूप में जी रहा है, परन्तु इस सहज उद्दाम लीला को शान्त, संयम और शिष्ट रूप में डालने का प्रयत्न अवश्य श्लाघ्य माना जायेगा। आदिम सहजात वृत्तियों को सुरुचिपूर्ण, संयत और कल्याणमुखी बनाकर ही मनुष्य  ' मनुष्य' बना है, नहीं तो वह पशु ही रह गया होता। प्राचीन भारत के मदनोत्सव में मनुष्य के इस प्रयत्नशील तत्व को ही चरितार्थता प्राप्त होती है।   

                                                                   

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                                                                                                           कविता-धरोहर


                                                                                                          भगवती चरण वर्मा

 बसन्तोत्सव



मस्ती से भरके जबकि हवा

सौरभ से बरबस उलझ पड़ी

तब उलझ पड़ा मेरा सपना

कुछ नये-नये अरमानों से;

गेंदा फूला जब बागों में

सरसों फूली जब खेतों में

तब फूल उठी सहस उमंग

मेरे मुरझाये प्राणों में;

कलिका के चुम्बन की पुलकन

मुखरित जब अलि के गुंजन में

तब उमड़ पड़ा उन्माद प्रबल

मेरे इन बेसुध गानों में;

ले नई साध ले नया रंग

मेरे आंगन आया बसंत

मैं अनजाने ही आज बना

हूँ अपने ही अनजाने में!

 

जो बीत गया वह बिभ्रम था,

वह था कुरूप, वह था कठोर,

मत याद दिलाओ उस काल की,

कल में असफलता रोती है!

जब एक कुहासे-सी मेरी

सांसें कुछ भारी-भारी थीं,

दुख की वह धुंधली परछाँही

अब तक आँखों में सोती है।

है आज धूप में नई चमक

मन में है नई उमंग आज

जिससे मालूम यही दुनिया

कुछ नई-नई सी होती है;

है आस नई, अभिलास नई

नवजीवन की रसधार नई

अन्तर को आज भिगोती है!

 

तुम नई स्फूर्ति इस तन को दो,

तुम नई नई चेतना मन को दो,

तुम नया ज्ञान जीवन को दो,

ऋतुराज तुम्हारा अभिनन्दन!





 

 

 


संकोच-भार को सह न सका
पुलकित प्राणों का कोमल स्वर
कह गये मौन असफलताओं को
प्रिय आज काँपते हुए अधर ।

 

छिप सकी हृदय की आग कहीं ?
छिप सका प्यार का पागलपन ?
तुम व्यर्थ लाज की सीमा में
हो बाँध रही प्यासा जीवन ।

 

तुम करूणा की जयमाल बनो,
मैं बनूँ विजय का आलिंगन
हम मदमातों की दुनिया में,
बस एक प्रेम का हो बन्धन ।

 

आकुल नयनों में छलक पड़ा
जिस उत्सुकता का चंचल जल
कम्पन बन कर कह गई वही
तन्मयता की बेसुध हलचल ।

 

तुम नव-कलिका-सी-सिहर उठीं
मधु की मादकता को छूकर
वह देखो अरुण कपोलों पर
अनुराग सिहरकर पड़ा बिखर ।

 

तुम सुषमा की मुस्कान बनो
अनुभूति बनूँ मैं अति उज्जवल
तुम मुझ में अपनी छवि देखो,
मैं तुममें निज साधना अचल ।

 

पल-भर की इस मधु-बेला को
युग में परिवर्तित तुम कर दो
अपना अक्षय अनुराग सुमुखि,
मेरे प्राणों में तुम भर दो ।

 

तुम एक अमर सन्देश बनो,
मैं मन्त्र-मुग्ध-सा मौन रहूँ
तुम कौतूहल-सी मुसका दो,
जब मैं सुख-दुख की बात कहूँ ।

 

तुम कल्याणी हो, शक्ति बनो
तोड़ो भव का भ्रम-जाल यहाँ
बहना है, बस बह चलो, अरे
है व्यर्थ पूछना किधर-कहाँ?

 

थोड़ा साहस, इतना कह दो
तुम प्रेम-लोक की रानी हो
जीवन के मौन रहस्यों की
तुम सुलझी हुई कहानी हो ।

 

तुममें लय होने को उत्सुक
अभिलाषा उर में ठहरी है
बोलो ना, मेरे गायन की
तुममें ही तो स्वर-लहरी है ।

 

होंठों पर हो मुस्कान तनिक
नयनों में कुछ-कुछ पानी हो
फिर धीरे से इतना कह दो
तुम मेरी ही दीवानी हो ।







  

 
अज्ञात देश से आना,
अज्ञात देश को जाना,
अज्ञात अरे क्या इतनी
है हम सब की परिभाषा ?

 

पल-भर परिचित वन-उपवन,
परिचित है जग का प्रति कन,
फिर पल में वहीं अपरिचित
हम-तुम, सुख-सुषमा, जीवन ।

है क्या रहस्य बनने में ?
है कौन सत्य मिटने में ?
मेरे प्रकाश दिखला दो
मेरा भूला अपनापन । 

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                                                                                                             मां तुझे नमन

उसकी सस्ती धोती में लिपट

मैने न जाने

कितने रंगीन सपने देखे हैं

उसके खुरदुरे हाथ

मेरी शिकनें संवार देते हैं

उसकी दमे से फूली सांसें

पड़ाव हैं

कमजोर दो बाहें

मेरी ठांव हैं

उसकी झुर्रियों में छिपी हैं

मेरी खुशियां

और बिवाइयों में

भविष्य!

-दिव्या माथुर

 


 

 

मां के नाम चिठ्ठी

 

प्यारी माँ
तू कैसी है
क्या मुझको याद करती है  
तूने पूछा था कैसा  हूँ मै 
मै अच्छा हूँ
तेरी ही सोच के जैसा हूँ
यंहा  सब सो  गए हैं
मै अकेला बैठा  हूँ
सोचता  हूँ
क्या करती होगी तू
काम करते करते
बालों का जूडा बनाती होगी
या फिर
बिखरे समानो को समेटती होगी
पर माँ
अब समान फैलाता  होगा कौन
मै तो यंहा बैठा हूँ मौन 
सुनो माँ
तुमने सिखाया था
सच बोलो सदा
आज जो सच बोला
तो क्लास के बाहर खड़ा था
तुमने ने जैसा कहा है
वैसा ही करता हूँ
ख़ुद से पहले
ध्यान दुसरों का रखता हूँ
पर देखो न माँ
सब से पीछे रह गया हूँ
सब कुछ आता है मुझको
फ़िर भी
टीचर की निगाह से गिर गया हूँ
किसी पे हाथ न उठाना
तुम ने कहा था 
पर जानती हो माँ
आज
उन्होंने बहुत मारा  है मुझे
जवाब मै भी दे सकता था
पर मारना तो
बुरी  बात है न माँ
यंहा सभी मुझे
बुजदिल समझते  हैं
मै कमजोर  नही हूँ
मै तो तेरा बहादुर बेटा हूँ
हूँ न माँ
अब तुम ही कहो
क्या मै
कुछ ग़लत कर रहा हूँ
तेरा कहा ही तो कर रहा हूँ
तू तो
ग़लत हो सकती नही
फिर सब कुछ
क्यों ग़लत हो रहा है
बताओ न माँ
क्या
इनको ये बातें मालूम नही
माँ
एक बार यहां आओ न
जो कुछ मुझे बताया
इन्हे भी समझाओ न
एक बात बताओ
क्या आज भी तू कहेगी
कि तुझे  मुझपे  गर्व है
माँ बोलो न
क्या मै तेरी सोच के जैसा हूँ 
और तेरा राजा बेटा हूं!

    -रचना श्रीवास्तव

 

 


 

 

  मां



अपनी कमजोर आंखों से

चुन लेती है वह मेरे फूल शूल

अपने से सटा लेती है मुझे

अपने जोड़ों का वह दर्द भूल

हैं शुभ्र-केश प्रकाश स्तंभ

मेरी कश्ती कभी नहीं डोली

है ध्रुवतारे सी साथ सदा

मैं रास्ता कभी नहीं भूली

 

पांव पोंछता रहता है

उसका सदा उजला आंचल

आज भी मेरे सर पर है

उसकी दुआओं का गगनांचल

             -दिव्या माथुर

 

 

 

 जाल                                                                                                              

 

हर आशीष में तुमने कहा

चांद सूरज से आकाश पे चमको

जीवन के मनचाहे मुकाम पर पहुँचो

पर राह में गिरे इन थके लोगों का

क्या हो माँ, तुम ही कहो

जीवन की इस दौड़ में

गिरतों को झुककर उठा लूँ

साथ लेकर चलूँ

या

रौंदकर आगे बढ़ जाऊँ

मत कहना फैसला यह

निजी खयाल का है

आदमी और अस्मद् के

अपने सवाल का है

अहमियत और सहूलियत के

अनगिनित टकराव का है

मेरे ख्याल से तो

शेर और बकरी बनाए

जिसने इसी दुनिया में

उसी अनदेखे जाल का है...

               -शैल अग्रवाल

 

 



 

 
मां के हाथ का खाना



बहुत स्वादिष्ट खाना बनाती है 

तुम्हारी मां

कौन-से मसाले डालती है वो

पूछकर आना उनसे

कहा एक मित्र ने,

हंस पड़ी मां

स्वादिष्ट खाना क्या सिर्फ मसालों से बनता है?

 

कौन-सा घी इस्तेमाल करते हो तुम

पूछा दूसरे मित्र ने,

खाने में तरलता सिर्फ घी से आती है?

एक प्रश्न मस्तिष्क में कौंधा

इसमें कोई खास बात नहीं,

अगर हमारे पास समय हो

तो हम भी बना दें

इतना ही स्वादिष्ट खाना

जवान लड़कियों ने कहा

क्या सिर्फ समय देने से ही बन जाता है

खाना स्वादिष्ट

 

नहीं,

कुछ न कुछ अद्भुत जरूर है मां के पास

तभी तो

करेले में भी आ जाती है मिठास!

 

उन्हें बहुत अच्छा लगता है

गर्म गर्म खाना और अपने सामने बैठकर खिलाना

गुब्बारे सी फूल जाती है रोटी

मचल उठता है बच्चा

पहले मैं लूंगा

 

फूलों सी महक आती है उसमें

तैरता रहता है स्नेह का घी

सब्जी जीभ से लगते ही

सम्पूर्ण जिस्म बन जाता है जीभ

तृप्त हो जाती है आत्मा

 

मां देखती रहती है, मुस्कुराती रहती है

कभी-कभी आंसू छलक जाते हैं उसके,

सोचता हूं किसी मां के हाथ का खाना खाकर ही

ऋषियों ने कहा होगा-

अन्न ही ब्रह्म है!

    -अनिल जोशी

 



 

 

 

प्रवासी चिन्ता

मां आज व्याकुल है मेरा मन, चिंता तेरी सताती है।

तूने अपना सुख, अपना श्रम, अपना श्वेद सघन देकर,

मेरे सुख मे अपने सुख, दुख में अपने दुख बिलराकर,

जीने की कला सिखाई थी, उंगली मेरी पकड़-पकड़कर,

तेरा वह निश्छल निश्वार्थ प्रेम, तेरी वह अथक लगन,

स्नेहपूर्ण नयनों की छवि, अब भी मन मे आती है।

 

मां आज व्याकुल है मेरा मन, चिंता तेरी सताती है।

 

माना मैने ही की थी, तुझसे सात समंदर की दूरी,

इसे बनाए रखना अब, बन गयी है अपनी मजबूरी,

पर तू यह न समझना, मेरी भक्ति घटी है तुझमें,

तू निशिदिन प्रतिपल रहती है मेरे मन मंदिर में,

आ-आकर तू मेरे जागृत मन में या कभी सपन में,

कभी बनती है सघन छांव, कभी फुहार बरसाती है।

 

मां आज व्याकुल है मेरा मन, चिंता तेरी सताती है।

 

तेरे सम अपनी, तेरे सम प्यारी, मुझको मेरी मातृभूमि,

भवसागर की झंझा में उसको, बना न सका मैं कर्मभूमि,

उस मातृभूमि के ऊपर जब, संकट के बादल घिरते हैं,

उसके ही जाये पाले पोसे, विश्वासघात जब करते हैं,

पंजाब या कश्मीर की घाटी, लहू बहाता भाई का भाई,

नस-नस में रक्त उबलता है, फटने लगती यह छाती है।

 

मां आज व्याकुल है मेरा मन, चिंता तेरी सताती है।

चिता जलाए एक बार, चिंता पल पल सुलगाती है।

मां आज व्याकुल है मेरा मन, चिंता तेरी सताती है।

                               -महेशचन्द्र द्विवेदी  

 

 


                        

 

चिहुक 

 

चिहुक पपीहा अब ना गाए

कागज की नैया ले डूबी

पूरा जंगल...

बरसाती सब ताल-तलैया

 

नेहभरा मन

 

जलती मशाल ले

टोहता वही आजभी

एक ढहती कुटिया

 

कंद में लिपटे धूल-धूसरित

वे गीता और रामायन...

सर्फ ये कुंडली मारे बैठे

 

धनकती एक आवाज

कनक किरन-सी कोने-कोने

आजभी रहे उजागर...

 

मेरा ही बस जो नाम पुकारे

चलती-फिरती कपड़े तहाती

बरी तोड़ती, हंसती-गाती

 

चहके ना पर सूखी तुलसी

बिन भोग उदास ये ठाकुर

बिखरा पड़ा जलता नहीं

अब आरती का दिया...

          -शैल अग्रवाल

 

*

          

 

     (2007)

माँ

 

 

 

क्या सूरत क्या सीरत थी

माँ ममता की मूरत थी

 

पाँव छुए और काम हुए

अम्माँ एक महूरत थी

 

बस्ती भर के दु:ख-सुख में

मां एक अहम ज़रूरत थी

 

सच कहते हैं माँ हमको

तेरी बहुत ज़रूरत थी

 मंगल नसीम 

 

*

  

मुक्त किया

 

जाओ बेटे,

मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।

मैने ही नही,

हर माँ ने अपने बेटे को मुक्त कर दिया।

 

तुम्हे बाँध लिया था

मैने अपने आँचल में।

लेकिन बँध गई मैं

अपने ही बंधन में।

तुमने रेशमी डोर तोड़कर

स्वयं को स्वतंत्र कर लिया,

मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।

 

तुम तो अतिथि थे मेरे,

अपना बसेरा बनाने से पूर्व

आश्रय लेने मेरे घर आए थे।

मैने ही घर की दीवारों पर,

तुम्हारा नाम लिख दिया।

मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।

 

अपने अंक में भरकर,

तुम्हे अपना मान बैठी।

तुम्हारे सपनों पर,

अपना अधिकार जमा बैठी।

तुमने ही तो मुझे,

स्वयं को स्वयं से अलग करना सिखलाया।

मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।

 

तुम्हारी अंगुली पकड़कर,

जिस राह पर चलना सिखलाया।

वह तो पगडंडी थी,

तुम्हे मुख्य मार्ग तक ले जाने वाली 

 उसी दोराहे पर आकर,

तुमने मेरा हाथ छुड़ाकर अपना रास्ता अपना लिया।

मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।

 ईश्वर द्वारा नियुक्त

मैं धाय थी तुम्हारी,

जिसका दायित्व आज पूर्ण हुआ।

हे मेरी अनमोल निधि,

मैने तुम्हे आज जगत के हवाले कर दिया।

मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।।

 रेणु 'राजवंशी' गुप्ता 

 

*

 

मां

द्वार पर बिछी हुई

मां के माथे की शिकन

प्रतिरात कुचली जाती है

मेरे पांवों तले,

न वह छोड़ती है

प्रतीक्षा करना

न मैं कभी आता हूँ समय से पहले

पद्मेश गुप्त

 


 

एक प्रश्न

यह जो भाई हमारे हैं

तेरी आँखों के तारे हैं

मैं कौन हूँ माँ

मेरा तुम्हारा रिश्ता क्या है?

बूढ़ी माँ के छुर्रियों वाले हाथों ने

मेरा सर सहलाया

मुझे बतलाया----

'' तू मेरा हृदय है बेटी

तेरे ही सहारे

मैने हर सुख-दुख

यह जीवन जिया है।

साँसों के इस रिश्ते को

समझ ले मेरी लाडली

मैने तुझे और तूने मुझे रोज ही

एक नया जन्म दिया है।''

 शैल अग्रवाल

 



 

मां

पूछा जब सूरज ने

घास के तिनके से

सूख सूख कैसे तू हरियाता है

इतनी ज्वाला सह जाता है

बोला वह हंसकर

बैठा हूँ मां की गोद में।

शैल अग्रवाल



 

(मातृ दिवस पर विशेष)

  

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                                                                                                                 माह की कवियत्री
      


                                                                                                                    -इला कुमार

नन्ही चिड़िया



पीले परों वाली

सलेटी नन्ही चिड़िया

मुलायम रोऔं से ढकी है तुम्हारी छाती

दाना चुगने के क्रम में

तुम

मेरे कितने पास आ गयी हो

फिर भी

नहीं गया है तुम्हारा डर

मेरे प्रति यह वेवजह आशंका

आखिर क्यों है?

चुगती हो कुछ दाने

जाती हो ऊपर

उस पेड़ पर बने अपने घोंसले में

रुकती हो वहां कुछ क्षण

नन्ही चोंच में डालकर वे कण

वापस आती हो

चुगती हो अगला दाना

मैं भी तो बीनती हूँ दाल

बच्चों की रसोई के लिए

आओ मेरे पास

समझो मैं

नहीं जानती मेरी भाषा

मैं कहां समझ पाती हूँ

मन की सात तहों के भीतर बैठा

हमारे चेतन का स्वामी

एक ही है अदृश्य अगोचर

वह जो  रचयिता है इस मैं उस तुम का

आओ बैठो मेरी कुर्सी के हत्थे पर

खा लो कुछ दाने इसी थाली से

ले जाओ

चोंच में भरकर कुछ और दाने

नन्ही चिड़िया! 

 

 


जिद मछली की

समुद्र के रास्ते से आता है सूरज

सूर्य

जो उदित होता है सीना चीरकर

बादलों का

धप्प् से गिर जाता है सागर की गोद में

गोद भी कैसी

आर न पार कहीं और छोर दीखती नहीं

एक सुबह अल्ल सबेरे जागी

छोटी सी मछली

मचल गयी देखेगी वह

सूरज का आना

तकती रही रह रहकर

 

दुsप्प...! दुsप्प...! सतह के ऊपर

बार बार

जान नहीं पाई

कब और कैसे सूरज उग पड़ा

 

जिद मझली की

जरूर देखेगी वह जाना सूरज का

आखिर

घूम फिरकर आएगा थककर

खुली खुली अगोरती बाहों में

सागर के

 

शाम की लाली तले एकबार फिर

दप्प् से कूद गया सूरज

समय की अतल गहराइयों में

न जाने कितने काल खंडों में

तैरती है वही मछली

दिग्भ्रमित

युग युगान्तरों से अतल तल को

अपने डैनों से कचोटती

 

क्या जान पाएगी कभी

खुद ही है

वह सूरज और सागर भी

बादलों के पार स्थित

निर्द्वन्द आकाश में उद्बूत

अनन्य महाभाव भी...

 

 

फूल चांद और रात


अब कोई नहीं लिखता 

कविता फूलों की सुगन्ध भरी

रात नहाई हो निमिष भर भी

चांदनी में 

फूलों के संग

पर कोई नहीं कहता

उस निर्विद्ध निमिष की बात

जो अब भी टिका है

पावस की चम्पई भोर के किनारे

 

चांदनी की बात

झरते हुए हारसिंगार तले

बैठकर रचे गए विश्वरूप

श्रंगार की बात

 

अभी अभी साथ की सड़क पर गुजरा है

मां के साथ

मृग के छौने सरीखा

रह रहकर किलकता हुआ बालक

 

चलता है वह नन्हे पग भरता

बीच बीच में फुदकना

उसकी प्रकृति है

 

कोई नहीं करता प्रकृति की बात

फूल चांद और रात की बात। 

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                                                                                                          लावणया शाह (यू .एस.ए)



ज़िंदगी ख्वाब है ...
 

 



 

-भागः1

उस रात रोहित को काम करते करते समय वक्त किस तेज़ी से गुज़रा, उसका एहसास ही नहीँ रहा। जब आँख उठाई फाइल की चौकोर सीमा से तो हाथ की कलाई भी सुन्न पड गई थी। उसे जैसे तैसे सहलाते हुए अपनी नई चमचमाती पाकेट फिलिप घड़ी के नक्शेदार मूँगे से बने गोलार्ध को देखा तो हीरे से बनी बड़ी सूँइ अब ९ पर थी। आह ! आज भी शालू नाराज़ होगी। वह हठात् सोचने लगा शालू और अपने बारे मेँ .... शालू रास्ता देख रही होगी !..और रोहित हडबडाकर उठ बैठा।
उसका अपना व्यवसाय था। तकनीकि क्षेत्र में, उसकी कँपनी का नाम अब प्रतिष्ठित हो चुका था। पर कितनी कडी मेहनत की थी उसने। पहले अमरीका आया.....यू, एस. सी से तकनीकि डिग्री हासिल की और उस के काम शुरु करते ही मानोँ इन्टर्नेट की दुनिया मेँ एक विस्फ़ोट आया और तेज़ रफ्तार से रौकेट अँतरिक्ष मेँ उड़े, ऐसी प्रगति आई, जो उसे एक आम तकनीकि विशेषज्ञ से सफल व्यापारी बनाती गई।
उसने जल्दी भाँप लिया था कि अमरीका मेँ कई सारे, उसी के जैसे लोगोँ की आवश्यकता बढेगी और वह बँबई जाने के साथ साथ हैद्राबाद और बँगलूर की हवाई टिकट लेकर सीधा भारत पहुँचा था - सबसे पहले १० प्रतिभावान छात्रोँ का इन्टर्व्यू लिया था उसने! किसी को कैण्टीन मेँ ही मिला था रोहित तो किसी को कोफी हाउस मेँ! तै किया था उन की माँगोँ को। अपना कोन्ट्रेक्ट उसने हवाई जहाज यात्रा के दौरान, अपने ही पीसी पर बहुत सोचने के बाद तैयार किया था - कुछ शर्तेँ भी रखी थीँ अपनी - कि ये लोग कम्स्कम २ साल उसके लिये काम करने पर अनुबँधित होँगेँ और करार पर हस्ताक्षर करेँगे - और उसकी कँपनी "गणमान्य" - अपने तहत्` काम करने वाले को अमरीका की किसी भी कँपनी मेँ काम करने के लिये भेज सकेगी। एक तरह का यह " व्यक्ति व्यापार " था - उसे मन ही मन ये भी विचार आया था कि "क्या मैँ यह ठीक कर रहा हूँ ? " -फिर उसके रेशनल दिमाग ने कहा था, " अगर ये तुम नहीँ करोगे रोहित तो कोई और करेगा !"

इसके बाद अपने वकील से पूछकर रोहित ने भारत से काम पर अनुबँधित कर्मचारीयोँ के अमरीकन वीज़ा के बारे मेँ उसके इन्तजामात तैयार किये थे।  मामला एक के बाद एक बातोँ से गुजर कर अपने आप ठीक से बैठ रहा था।

इससे पहले ऐसा हुआ नहीँ था।...
आज अमेरीका और पश्चिम के मुल्कोँ को भारत के तकनीकि विशेषज्ञ वहाँ पहुँचेँ उसकी सख्त्` जरुरत थी और उनके बीच की जोडनेवाली कडी रोहित की कँपनी थी!

उसने आलस से अपने केशोँ मेँ हाथ फेरा ...और याद आई उसे शालिनी की ...कितनी शालीन थी शालू ! उसने भी अमरीका आकार पर्यावरण विषय लेकर उसी क्षेत्रमेँ काम किया था और उसके शहर मेँ पर्यावरण को दूषित होने से बचाने वाले व्यक्तियोँ मेँ शालू के प्रयोगोँ की, नवीन उपायोँ की, सराहना ही नहीँ की गई थी, उसे सम्मान देकर नवाज़ा भी गया था।
और उस शाम जब शालू सुफेद लिबास मेँ सज कर सभारँभ मेँ स्टेज पर अपना पारितोषक ले रही थी तब रोहित को कई दिनोँ के बाद अपने दिल से उठी शायरी पर सुखद आश्चर्य हुआ था। ओहो ..तो अब तक शायराना अँदाज़ बाकी बचा है जहन मेँ !

ये व्यापार, तकनीकि दौड मेँ, भागते भागते, शुष्क नहीँ हुआ मैँ ! वह सोचता रहा ...
और गाडी मेँ , जब वे दोनोँ घर लौट रहे थे तब तक उसने , अपने शेर को कई दफे गुनगुना भी लिया था ..शालू के साड़ी को सहेज कर बैठते ही उसने कहा था,
" बधाई हो मेम सा'ब ! आपको ये ऐवोर्ड मिला हमेँ बड़ी खुशी हुई ! "
--" अरे, थेन्क्यू थेन्क्यू जनाब!"
शालू ने हँसते हुए कहा ..और शीशे पर एक उँगली से ठँड मेँ शीशे पर छाये धुँध पर " रोहित आइ लव यू " लिख दिया था।

तो रोहित ने अपनी रौबदार आवाज़ को थोडा नीचे कर के आखिरकार सुना ही दिया शालू को अपना नया शेर ,
" सुनिये, शालू जी, आपकी खिदमत मेँ अर्ज़ किया है ,
' रुई के नर्म फाहोँ जैसे मेरे अह्सास, और तुम, मिट्टी के इत्र की शीशी,
सिमटी है खुश्बु सारे कायनात की बिखरती जा रही खयालातोँ मेँ मेरे ! '
 

' तुझसे मिलने का मौसम, बिछुडने के पल भी,
  हसीं ख्वाबोँ मेँ लिपटी तारोँ की बारात,
वह झीनी सी बारिश,हल्का सा धुँधलकाकोहरे से भरी, तेरे काजल में डूबी -सी रात

वाह वाह ! सुभान अल्ल्लाह ...क्या बात है ! आज़ तो आप के भीतर मियाँ गालिब की रुह दाखिल हुई हो ऐसा लग रहा है"

...शालू ने मुस्कुराते हुए कहा ..पर उसका सलोना चेहरा खिल उठा था। रोहित रास्ते को देखता रहा और कनखियोँ से शालू को भी देखे जा रहा था। जो मँद मंद मुस्कुराती बडी भली लग रही थी। अचानक शालू सँज़ीदा हो गई बोली, "R " ..

( जब भी वे अकेले होते वह उसे सिर्फ यही कहती थी )।

" प्रि-दीदी ( डो.प्रियँका मेहता ) का फोन आया था - बुला रहीं हैँ हमेँ ! कहतीँ थीँ देर ना करो ! बताओ कब चलेँ ? "

" चलेंगे...चलेँगे" ...आहिस्ता से अब रोहित की आवाज़ आयी -" बहोत सा काम बाकी है शालू ।"

" ' ओके ओके' ..तुम बात कर लेना नही तो दीदी मुझ पे गुस्सा होगीँ। ठीक है ना ? " और उसने रोहित का हाथ अपने हाथोँ मेँ लेते हुए सहलाया। अब रात के सन्नाटे मेँ उन दोनोँ की चुप्पी गाड़ी की तेज रफ्तार के साथ साथ गहरी होती चली गयी। घर आया तो नीचे गराज मेँ रोहित ने कार को पार्क किया। तब तक शालू उनके अपार्टमेन्ट का दरवाज़ा खोलकर दाखिल हो चुकी थी। रात मेँ थके हुए लौटे थे दोनोँ, तो झट रात के खुले, आरामदेह कपडे पहनकर सोने चले गये। पर उस रात रोहित को देर तक नीन्द न आई। वह कभी खिडके पे झूलते पर्दोँ के पार गहराये बादलोँ को देखता तो कभी शालू को, जो थककर सो रही थी। वह उठा और खिडकी के सामने खडा हो गया -- याद आया उसे जब उसने पहली बार शालू को देखा था, जैसे वह कल की सी बात थी। कालिज से एक शाम वह अपने दोस्त प्रकाश के घर चला गया था। प्रकाश और वह, बचपन के सहपाठी थे। पर प्रकाश की शादी हो गई थी राजश्री से ! उन्हेँ एक नन्ही सी प्यारी गुडीया सी बच्ची भी हो गई थी। और उनसे मिलने शाम को टहलता हुआ पहुँच जाता था। आज शाम जब रोहित उनके घर पहुँचा तो बहाँ प्रकाश की माँ बाहर झूले पर अपनी बेटी के साथ दिखलाई दीँ। रोहित ने नमस्ते किया। दीदी वसुँधरा से भी बातचीत होने लगी। तब दीदी ने ही कहा, " अरे रोहित, तुम्हारा दोस्त मेरे ससुराल गया है और आप यहाँ बैठी हैँ।''

रोहित ने हँसते हुए कहा..." अभी आई ना। बाज़ार ले गई थी माँ को ..अब चलते हैँ। चलोगे मेरे साथ?"

उन्होँने उठते हुए माँ से कहा, " चलूँ माँ ? कल आऊँगी फिर " और रोहित प्रकाश की दीदी के साथ उनके ससुराल की ओर चल पड़ा। वहाँ प्रकाश उसे मिलने आया देखकर बडा खुश हुआ! दोनोँ दोस्त, हँसी मज़ाक मेँ डूब गये। तभी एक १९ या २० वर्षीय लडकी शर्माती हुई कमरे मेँ दाखिल हुई, तो प्रकाश की पत्नी राजश्री ने तपाक्` से उन दोनोँ का परिचय करवा डाला, " रोहित मिलो, ये है शालिनी ! शालिनी, मीट रोहित दवे ! "
" हेल्लो " एक मीठे स्वर को रोहित ने सुना तो उसे भी सलीका याद आया -"हेल्लो हेल्लो ", उसने भी कहा पर आगे कुछ सूझा नहीँ कि और क्या कहे ? पर उसने देखा था एक सलोने चहेरे को जो उसे ध्यान से देख रहा था बडी बडी सँवेदनाशील आँखोँ नेँ एक सँज़ीदगी थी और एक चौकन्ने होने का स्वभाव भी बना हुआ था। आम लडकियोँ की तरह नहीं, शालिनी अपनी युवावस्था मेँ भी कुछ कुछ गँभीर थी। हाँ जब भी वह अनायास मुस्कुराती तब मानोँ उसका पूरा चेहरा खिल उठता था!

बिना चाहे भी अपनी आदतानुसार इतना सब कुछ रोहित ने देख लिया था। दूसरे क्षण उसने अपना ध्यान हटा लिया था। सही है कि वह आजकल लडकियाँ देख रहा था - उसने तकरीबन्` २० २५ लडकिय़ोँ से बातचीत की थी अपनी शादी के सिलसिले मेँ --- वह जाता नाश्ते पर तो कभी खाने का निमँत्रण मिलता -- बातेँ होतीँ।  किसी लडकी के रँगरुप उसे जचते , किसी के घरवालोँ से मिलकर खुशी होती, तो किसी की प्रतिभा से वह प्रभावित होता ।  परँतु आजतक ऐसी लडकी उसे नहीँ दिखी थी जो उसे पहली नज़रोँ मेँ भा जाये ! शायद शालिनी से वह कुछ हद तक प्रभावित ज़रुर हुआ था, परँतु दूसरे ही पल उसने सोचा, " अरे यार ! ये तो मुझसे उम्र मे बहुत छोटी लगती है ! " और फिर वह पूरा समय प्रकाश और नन्ही पँखुरी से खेलता रहा --

 
"याद है ..एक बार बँगाल गया था तब सध्य स्नाता सुँदरी को घाट पर देखा था मानोँ कवि रवीँद्र की कविता मूर्त हो उठी हो. समीप के मँदिर मेँ जा कर दीप जलाती उस कन्या का स्वरुप आजतक मेरे मन मेँ अकँपित लौ की तरह विराजमान है !" उसने प्रकाश से कहा था तो दोनोँ हँस पडे थे. अब
राजश्री भी आ गई थी और बातेँ सुन रही थी -उसी ने कहा था, वो बोली, " सुनो ...मेरी मरज़ी है कि तुम शालिनी और हम इस इतवार को उस नये रीवोल्वीँगरेस्तराँ मेँ लँच लेने जायेँ कैसा है आइडीया मेरा ? "
" अरे मियाँ बीबी मेँ हमेँ हड्डी नहीँ बनना भाभी " रोहित ने कहा तो राजश्री और भी ज्यादा ज़िद्द करने लगी थी . इस तरह दूसरी बार शालिनी से मुलाकात उसी घूमते रेस्तराँ मेँ हुई थी. खाना लज़ीज़ था और खाने के बाद शालिनी ने कहा था कि उसे अपनी मम्मी से मिलने , नानी जी के यहाँ जाना है तो रोहित ही उसे वहाँ तक पहुँचा आया था और दोनोँ से शिष्टाचार वश मिला भी पर चाय या कोफी के लिये मना करते हुए जल्द ही निकल कर अपने घर जाने को निकल पडा था --
. राजश्री ने बहुत बार पूछा पर उसका यही कहना था, "वो मुझसे १२ साल छोटी है ! " जिसे सुनकर राजश्री ने कहा, " जब उसे ऐतराज़ नहीँ तब तुम्हेँ क्यूँ इतनी छोटी लग रही है, हुम्म रोहित ! " रोहित ने बात को टाल कर फिर आगे बढने न दी और वह उसके बाद भी कई लडकियाँ देखता रहा था और आखिर डाक्टर माता पिता की इकलौती सँतान रीना से उसने शादी कर ली थी। सोचा था, पढे लिखे परिवार से है तो उसके साथ अच्छी निभ जायेगी. पर शुरु से ही रीना का अपने माइके ही सुबह से चले जाना, बात बात पर रोहित के परिवार के छोटे फ्लेट के बारे मेँ मुँह फूलाना और माँग करना कि "जब अपना अलग और बडा फ्लेट खरीदोगे तभी वहाँ आऊँगी " ये सब रोहित को सहमा गया था. भविष्य मेँ और भी माँगेँ बढेँगीँ वो ये जान गया था.
शादी के आगामी ३ वर्ष रोहित की ज़िँदगी के सबसे दुख्दायी, मस्तिष्क को जकडकर,त्रस्त करनेवाले, सबसे ज्यादा परेशानी वाले साबित हुए ! रीना और रोहित के बीच हर छोटी बात के लिये झगडा होना आम बात होने लगी थी। अगर वह किसी दोस्त को खाने पे न्योता देता तो वह माइके चली जाती या बहाना करती कि सर दर्द है । अपने नये फ्लेट के कमरे मेँ चली जाती।
रोहित को मेहमान के साथ बाहर खाना पडता। उसके माता पिता से वह झूठ बोलता कि " खाना खा लिया "। जबकि कई दिन उसे भूखे पेट सोने की नौबत आई थी और दूसरे दिन फिर सुबह काम के लिये भागना और रीना का मैके चले जाना ! हद्द हो गई ! पर रोहित करता भी तो क्या ? सोचता, " क्या शादी के बाद सब की ऐसी हालत होती है " पर जवाब उसे पता था -
"नहीँ प्रकाश और राजश्री को ही देख लो !
कैसे दोनोँ एकदूसरे का खयाल रखते हैँ।" - हाँ उनका प्रेम विवाह हुआ था और उन्होँने परिवार वालोँ को कई साल समझाते हुए बिताये थे पर क्या उसकी तरह लडकी देखभाल कर, घर परिवार की टोह लेने के बाद शादीयाँ होतीँ हैँ, वे भी तो सुखी होते हैँ ! शायद कसूर उसके भाग्य का था। पर अब वह जैसे तैसे निभाने की कोशिश किये जा रहा था ...
                                         तेरा देर से आना, आकर मुझे रुलाना,

                                          वादे कसमेँ तोडने का लम्बा सिलसिला,
                                          और मुकर जाना बात बात पे वो रोना,

                                           क्यों करतीँ थीँ झूठे बहाने, ऐसे हरदम ?...

..मरता क्या न करता ! कौन मानेगा उसकी बात अगर वह कह भी दे कि उपर से सँभ्राँत कुलीन दीखनेवाली यही रीना कुपित होकर कैसी तीखी भाषा मेँ उसे अपमानित करते बिलकुल हिचकती न थी ! और उसके परिवार के प्रति मोह इतना कि भागी चली जाती थी हर सुबह. शाम लौटती तो उसकी मम्मी जी रसोइया और २ आयाओँ को भी साथ भेज देतीँ -- बेबी को खाना खिला देना और बाई , रसोई का सारा काम निपटाके ही घर वापुस आना समझीँ ? " उनकी हिदायत होती और तीन नौकर २ सेठ और सिठानी !! माने रीना और रोहित की सेवा करते. बिस्तर लगता और ऐरकन्डीशन की तेज़ ठँडी हवा कमरे को और भी ठँडा बना कर रख देत और रोहित परेशान अगले दिन काम के बारे मेँ सोचता हुआ सो जाता। सुबह वो तैयार होकर कालबा देवी तक जाता और रीना उसीके साथ अपनी मम्मी जी के यहाँ चली जाती ! खैर ! उसका कारोबार बढने लगा तो उसे अमरीका के दौरे भी जल्दी लगने लगे जिससे रीना को चिढ हो आई थी। वह हमेशा कहती, " क्या रखा है वहाँ ? क्यूँ भागे जाते हो ? " वो कहता, " तुम्हारा वीज़ा आये तो तुम भी चलना मेरे साथ!" तो वह तुनककर कहती, " जाये मेरी जूती ! हमेँ वहाँ नौकरानी बनाने ले जाओगे ? हमेँ नहीँ आना ...! वहाँ ..तो बहुत काम करना पडता है मालूम है ... मेरी कई सहेलियाँ ऐसी गल्तियाँ करके अब पछता रहीँ हैँ !"

"अरे वहाँ भी काम करनेवाले मिल जाते हैँ। ", वो धीरे से कहता तो वो मुँह फूला के कमरे से मँथर गति से ऐसे निकल जाती मानोँ सुना अनसुना कर रही हो ! एक बार वो नई फीयाट लेके मैके चली गई। वो घर आया तो ड्राइवर को भेजा कि  "मेमसाहिबा से जाकर गाडी ले आओ और रर्जिस्ट्रेशन करवा लाओ " ड्राइवर खाली हाथ, भीगी बिल्ली बना लौट आया।

पूछा तो बोला, " मालकिन ने साफ मना किया है। कह रहीँ कि गाडी उनकी है। " उसने गर्दन झुकाके नज़रेँ नीची कर लीँ।

 

अब रोहित झल्ल्ला उठा, " हाँ उन्हीँ की है पर रजिस्ट्रेशन तो करवाना जरुरी है ! " रोहित की खीज, मायूसी मेँ बदली तो उसने फोन मिलाया और रीना को समझा बुझा कर काम करवाया। गाडी तो आ गयी पर दूसरे दिन शाम को जब रोहित घर लौटा तो किचन मेँ जाते उसकी आँखेँ आश्चर्य से खुली की खुली रह गईँ ! देखता क्या है कि समाचार पत्र खुला हुआ था पूरे फर्श पर और उस पर सारी दालेँ, चावल, आटा, हल्दी, मिरची , धनिया सब उलट दिया गया था! अजीब तस्वीर बन गई थी सारे मिश्रण से! ये किसने नुकसान किया? उसकी कल्पना के बाहर की द्रश्यावली देखकर रोहित का चेहरा फक्क पड गया था। रुँआसा हो गया था वह! उसका मन प्रश्न किये जा रहा था -- पर वहाँ तो आज कोई नहीँ था उसे जवाब देने के लिये । कहाँ होगी रीना ? उसने सोचा और फोन घुमा दिया ससुराल, " हेल्लो, नमेस्ते पापा जी, जी हाँ रीना है? दीजियेगा उसे फोन। आभार - थैन्क्स! " रीना आयी तो उससे रहा नही गया, पूछा, " हमारे फ्लेट के किचन मेँ ये किसने बिखराया है सब? "

" मैँने"

उसने शाँति से कहा तो उसका पारा भी सातवेँ आसमान पर चढ गया;

" ये क्या बचकानी हरकेतेँ करती हो! यही सीखा है ? "

अब रीना भी चीखती हुई बोली,

" वो सारा सामान मेरा था। मेरे मम्मी पापा ने दिया था । जैसे तुम्हारी कार है, वैसे वो मेरा सामान था। इसलिये कूड़ा कर के फेँक दिया।" 

रोहित ने फोन पटक दिया और अपना माथा पकड कर पहली बार उसे भीतर तक गुस्सा आ गया। दूसरे दिन बिना बतलाये अमेरीका की फ्लाइट लेकर भारत से, रीना से, अपने परिवार से, सभी से, वह ह्ज़ारोँ मील दूर चला गया था।

........

 

समय : २ साल बाद :



बहारेँ आयेँगीँ, मुझे ले जायेँगीँ, फिर,
उन मस्त अमिया के बागोँ मेँ चुपचाप,
आँख मिचौनी खेला करते थे हम तुम,
आँखोँ मेँ हँसती थी हर मुबारक रात!


उस बात को शायद रोहित भूल ही जाता अगर एक दिन जब वह बँबई के कालबा देवी के भीड़ भरे इलाके से गुजर रहा न होता और वहीँ प्रकाश भी सामने से आता हुआ दीखाई दे गया। प्रकाश के मुख पर एक रहस्यमय मुस्कान थी -

"क्योँ बर्खुदार, कहाँ की सवारी है? शादी क्या कर ली तुम तो इद का चाँद बन गये लाला! कैसी हैँ रीना जी? "

उसने पूछा तो रोहित ने बतला दिया कि अभी अभी वीजा के खास खास डोक्युमेन्ट्स तैयार करने मेँ उसने दिनभर कितनी भागदौड की है !

"अच्छा शाम को घर आ जा, साथ खाना खाते हैँ। और ठीक ७ बजे पहुँच जाना -- "

" क्या... ? ७ बजे डीनर खाते हो?", रोहितने पूछा।

अब हँसने की बारी प्रकाश की थी -वो बोला,

" अरे ! तू बडा लेट लतीफ है यार! और मेरा महाराज ९ बजे रसोई घर बँद कर देता है! समझे? तो आ जाना वक्त पे! "

अब तो रोहित भी उतावला भागा । चूँकि शहर के आफिस के इलाके से उपनगर तक जाते जाते २ घँटे का समय तो लगने ही वाला था । प्रकाश ने आकर राजश्री को बता दिया कि उसका मित्र रोहित भी आ रहा है। तो राजश्री ने कहा," अरे उससे कहा ना कि जल्दी आये ? वो हमेशा देरी से आता है ! "

प्रकाश ने कहा, " मैँने जानबूझकर उसे २ घँटे पहले का समय बतलाया है, तुम देख लेना मेरा यार ९ बजे तक आ ही जायेगा! और क्या पता अब बीवी के साथ शायद टाइम का पाबँद भी हो गया हो! मुझे देख लो! आपके साथ रहकर हम घडी के काँटोँ के साथ साथ साँस लेना सीख गये हैँ!"
"अजी जाओ जाओ .." राजश्री ने कहा, " सारा दोष मेरा ही तो है ...अब इस जनम मेँ तो भुगतना ही है भाग्य मेँ!"

और वही हुआ ! रोहित आया ९ बजे और वह भी रीना के बगैर! बहाना बना गया। पर अब दोस्तोँ ने मिलकर खाना खाया -- बडे अर्से बाद रोहित कुछ स्वस्थ हुआ। रोहित को प्रकाश के महाराज, यानी खानसामा साहब के हाथ का बना भोजन बहुत प्रिय था! सबने छक्क कर खाया। फिर बाग मेँ बँधे बडे से झूले पे तीनोँ सुस्ताने लगे। पँखुरी भी राजश्री की गोद मेँ झूलते-झूलते कब सो गई पता भी नहीँ चला। फिर अचानक बातेँ शालिनी की ओर मुड गईँ ।

"कैसी है वो ? " रोहितने पूछा तो राजश्री ने लँबी साँस छोडते हुए कहा, " वो अब यहाँ नहीँ रहती अपनी नानी जी के यहाँ कालिज के फाइनल ईयर मेँ है --"


 

" उसके पापा कहाँ हैँ?" उसने प्रश्न किया-
तब प्रकाश ने समझाते हुए कहा, " शालिनी के मम्मी पापा का तलाक हो चुका है . मगर शालिनी अपनी दादी और काकी याने के मेरी दीदी वसुँधरा के साथ ही रहना चाहती थी और रह रही थी -- इँटर पास किया -- बडी काबिल और नेक लडकी है। " उसने भूमिका बाँधते हुए कहा।

अब राजश्री ने आगे बात बढायी " क्या कहते हो ? इतनी सारी लडकियोँ को तो देख चुके थे -- पर आखिर रईसजादी रीना जी पर हमारे रोहित का दिल आ गया! क्योँ आईँ नहीँ हमारे यहाँ खाने पे ?"
उसने यूँ ही मजाक किया तो रोहित सँजीदा हो गया।

"मेरी मानते तो शालिनी ही तुम्हारे लिये सही जीवन साथी बनने की क्षमता रखती थी!"

"राजश्री -- अब रहने दो ये बातेँ " प्रकाश ने डाँट लगायी तो राजश्री को रोहित के उदास चेहरे का ध्यान हो आया।

रोहित ने एक कोशिश की और अपने आपको सहज करते हुए हँसते हुए पूछा,

" अरे बाबा ! मुझे मिलाने मेँ कोयी कसर नहीं रखी थी तुमने पर उपरवाले की रज़ा न थी -- "

राजश्री बोली, " जब उसे कोयी आपत्ति नहीँ थी पर, आज तुम क्यूँ ये सारी बातोँ को इतना तूल दे रहे हो ! "

" चलो छोडो बेकार की बातोँ मे कहीँ बित न जाये रैना __ "

प्रकाश ने कहा तो रोहित भी उठ खडा हुआ -

" तुमसे मिलने के लिये अब कब का अपोइन्टमेन्ट दे रहे हो ? उसने पूछा तो

" अच्छा तब तो लँच पक्का रहा -- आ जाऊँगा -" इतना कह कर रोहित चला गया । वह प्रकाश और राजश्री के साथ उसी नियत किये रेस्तराँ मेँ मिला था -- कुछ खास बातेँ तो नहीँ हुई पर उस बार रोहित उखडा-उखडा सा रहा सारा वक्त! बस, १० मिन्टोँ तक एक औपचारिक सी मुलाकात हुई थी उन दोनोँ से!

यह थी उनकी दूसरी भेँट! रोहित सोचता रहा, " हम अचानक क्यूँ मिलते हैँ खास व्यक्तियोँ से?"

फिर बात आयी गयी हो गई --उसे फिर अमरीका जाना पडा था - काम बढ रहा था ---

रोहित को मानोँ अपने जीवन के बारे मेँ उस वक्त सोचने का समय नहीँ था। आज अचानक उसे ये सारी बातेँ अतीत के पन्नोँ से निकल कर याद आ रही थीँ शालिनी उसे। अपने जीवन से कहीँ दूर करके उसने रीना से नाता जोड तो लिया पर एक दबी चिनगारी सी उसे शालिनी याद आ जाती -- कभी उसे पूरी दुनिया से नाराजगी हो जाती।


 

वह सोचने लगा, किस तरह सब अचानक हुआ था ---माता पिता की एकमात्र सँतान! बहोत समृध्ध परिवार की कन्या के बारे मेँ सँदेशा आया। देखते देखते बात तै हो गई । शादी भी हो गई। और उसके बाद के ३ वर्ष रोहित के जीवन के सबसे कठोर, ह्रदयविदारक, आघात जन्य साबित हुए! ना तो कन्या का कसूर था ना उसके घरवालोँ का !


 

लाड प्यार मेँ बडी हुई रीना को रोहित के मित्रोँ से कितनी चिढ थी -- ये उसका अहम्  भाव ही था। वो किसी को खाने पे बुलाता तो वह बहाना बना कर मैके चली जाती...ये भी कोई बात हुई ? वो सोचता रहा। 


बार बार उसे अपने माता पिता से झूठ बोलना पडा था जब वे पूछते, " बेटे खाना खा लिया ? कैसे हो तुम लोग? "


" ठीक हैँ हम " इतना ही कह पाता खाली पेट, दुविधा मेँ रोहित। ये कैसे बतलाता कि उसका वैवाहिक जीवन नर्क यातना से गुजर रहा है?  आख़िर कब तक ऐसे चलता ? बात इतनी पटरी से उतरती गई की रीना ने ही तलाक के कागज़ भेजे --

रोहित ने पहली फीयट पद्मिनी गाडी खरीदी थी। उसे भी रीना मैके लेकर चली गई । उसे अपना पति जो धीरे धीरे मेहनत करके अपना नया कारोबार जमा रहा था, अत्यँत नापसँद था । तलाक के कागज़ात मेँ रीना ने उससे ५० लाख रुपये का हर्जाना भी माँगा था, जिसे देखकर रोहित को आघात लगा - ये कैसी अजीब लडकी है ? क्या करूँ? उसके माता पिता को भी भनक आ गयी तो उन्होँने बेटे को अमरीका फोन किया और चिँता व्यक्त की। एकबारगी रोहित को लगा कि वह सो रहा है और ये सारी घटनाएँ एक बुरे स्वप्न की तरह चलती जा रहीँ हैँ जिनपर उसका कोयी जोर नहीँ। पर वास्तविकता दूसरे क्षण उसे ठोस धरातल पर ला पटकती। उसने भी वकील रख लिया  और सँदेशा भेजा कि भारत आने पर आगे की कार्यवाही होगी। तब तक रीना को मिसेज दवे, यानी रोहित की पत्नी का तमगा लगाये ही समाज मेँ घूमना पडेगा। जिसका उसे खेद है ।

रोहित इस वक्त काम मेँ ऐसा उलझ के रह गया था कि, उसे इतने समय की मोहलत माँगनी पड रही थी। भारत जाकर अपने वृद्ध माता पिता से क्या कहेगा वह? ये सोच-सोच कर रोहित का क्षोभ बढता जा रहा था। जैसे तैसे काम निपटा कर उसने अपनी डाक्टर बडी बहन जो केन्सास रहती थीँ, उन्हेँ फोन करके सारी बातेँ बतलयीँ। दीदी चुप सुनतीँ रहीँ। अपने प्यारे छोटे भाई के साथ हुए इस मूर्खतापूर्ण कटु व्यवहार के बारे मेँ सुनकर प्रियँका को पहली बार विचार आया -- ये कैसी कन्या है रीना? डाक्टर तो मैँ भी हूँ! माता पिता के डाक्टर होने का इतना घमँड? क्या सीख दी है इसे ?

दीदी ने ढाढस बँधाया तब रोहित के आँसू निकल आये। अपने को सँयत कर के अब रोहित ने भारत यात्रा के लिये भारी मन से प्लेन का टिकट लिया और लौट पडा घर की ओर ..पर घर कहाँ था ? ...कौन इँतज़ार कर रहा था उसका? तलाक ? ये सोच भी नहीँ सका था वो कि ऐसा भी सुनेगा। पर अब ऊखल मेँ सर रख दिया तो चोट की क्या परवाह ...ये सोचते हुए ,प्लेन की खिडकी से सुफेद घने बादलोँ को देखता रहा रोहित पथराई आँखोँ से।

रोहित को ऐयर पोर्ट से घर ले जाने के लिये उसका ड्राइवर आ गया था। उसके माता पिता ने कहा कि "हम आयेँगेँ तुम्हेँ लेने।"तब रोहित ने मना किया था कि, " मैँ जब सोके उठूँगा तब आपके पास आ जाऊँगा -आप लोग कष्ट ना करेँ !"
जेट-लेग से तँग आकर रोहित पूरे १२ घँटोँ बाद ही उठ पाया था। चाय पीते हुए, बिल, डाक वगैरह देखने लगा तो एक हरे लाल रँग का ब्याह का निमँत्रण पत्र देखा तो कौतूहल से उलट पुलट कर नाम इत्यादि पढने लगा .
" अब कौन फँसने जा रहा है ?...कोल्हू का बैल बनेगा!" उसके सिनिकल दिमाग ने चुहल की तो रेशनल माइन्ड ने उलाहाना दिया, " ऊँहूँ! इसका लक मुझसे तगडा होगा और जन्न्नत नसीब होगी मेरे यार को! "  नाम था पीयूष परमार।

- आहा ! मिस्टर परमार ईज गेटीँग मेरीड!वो स्वगत बोल उठा - दुल्हन कौन हैँ -देखेँ तो,... नाम उभर कर सामने आया, " पायल बजाज "  वाह !अब तो पीयूष के पैरोँ मेँ पायल बँधेगी, उसने सोचा और तारीख भी कल की ही थी। विवाह की दावत पे जाना तो होगा ही ।  ड्राइवर से कह दिया कि कल शाम के बाद उसकी रात ११ बजे तक की ड्यूटी ओवर टाइम की होगी ।
" जी साब।" ड्राइवर ने आहिस्ता से पूछा, " आज कहीँ चलना है साब?"
" हाँ, मैँ आता हूँ। तुम नीचे इँतजार करो।" कहता रोहित स्नान करने चला गया। और माता पिता के छोटे से फ्लेट की ओर चल दिया । रास्ते मेँ रोहित ने उन सारे सवालोँ के जवाब मन ही मन तैयार कर लिये जो उसे मालूम था कि उसके सीधे सादे माता पिता उसे पूछेँगे ।

जो जो सोचा था उसी तरह उसने उनसे बातेँ कीँ और उन्हेँ ढाढस बँधाया। हिम्मत दी कि अब जो भी होगा देखा जायेगा ---
इस परिस्थिती मेँ और क्या किया जा सकता है? " उसके ये कहने पर वे आश्वस्त हुए और वो घर चला आया था। हाँ, घर पर रीना उसे अब नहीँ मिलनेवाली थी,ये भी वो जानता था --खैर!
दूसरे दिन उसने फिर बातेँ कीँ अपने वकील से और तलाक की कार्यवाही को किस तरह निपटाया जाये उस पर सलाह मश्वरा भी किया। फिर शाम होते ही फ्रेश हो कर रोहित पीयूष के विवाह समारोह मेँ शामिल होने के लिये चल पडा!
धूम धाम, फूलोँ से सजा प्रेवेश द्वार, स्कूल कालिज के कई परिचित दोस्तोँ के चेहरे, बँबई के गुजराती परिवारोँ के सँभ्राँत बुजुर्ग वर्ग के सदस्य, कुछ परिचित कुछ नये चेहरे। आगे स्टेज भी फूलोँ से लदा सजा। रँगीन रोशनी के बल्ब। हवा मेँ सँगीत लहरी बहती हुई खुश्बुओँ के झोँकोँ से झकझोर कर बारी बारी से कह रही थी, " आ जाओ भारत मेँ रोहित! ये तुम्हारे देश का विवाह उत्सव है " -सच! भारतीय शादीयोँ मेँ फूलोँ की जितनी तेज मादक सुगँध उसने महसूस की है, वैसी खुश्बू लँदन अमरीका के बेशकिमती फूलोँ के गुल्दस्तोँ मेँ उसने नहीँ पायी। भारतीय गुलाब व मोगरोँ के गजरोँ से महकती शामेँ , सर्वथा बेजोड होतीँ हैँ, उसे ये पता था ।
" हेल्लो ! बिग शॉट ! आप यहाँ तशरीफ लाये। बडी मेहरबानी की हुज़ूर!" इतना कहती , बेला उसके पास चल कर आयी ।
उसकी सहपाठी थी वो ।और भी कई सारे मित्र उसे देखते, सामने से चलकर आने लगे ।बहुतोँ से वो कई महीनोँ बाद मिला था। खूब बातेँ होने लगीँ --कभी अमरीका की कितनी ट्रिप उसने कीँ, उसके बारे मेँ,तो कभी क्या काम कर रहा है उस विषय पर । प्रश्न करते दोस्तोँ से घबराया रोहित, सबके जवाब देता मुस्कुराता हुआ खडा था। तभी मनोज ने पूछा, " यार ! तेरी बीवी कहाँ है? नहीँ मिलवाओगे ? "अब रोहित ने जो सूझा कह दिया, ' आज उसकी तबियत ठीक नहीँ, इसलिये नहीँ आ पायी । मिलवा दूँगा - फिर कभी!"

इतने मेँ बेला फिर चहक कर बोली," तुम्हारी गप्प मारने की आदत अब भी वैसी ही है रोहित! केमेस्ट्री क्लास मेँ गली पार करके स्कूल आधा घॅँटा देरी से पहुँचते थे और रस्तोगी सर से कहते थे,"ट्रेन लेट थी सर बैठ जाऊँ क्लास मेँ? -ह हा ... ह हा ..हाँ ..झूठे कहीँ के !वो देखो, रीना तो आयी है शादी मेँ !वहाँ डा. मोदी के साथ कौन खडा है?"
उसने कहा तो सारे मित्र मँडली की निगाहेँ उसी ओर घूम गईँ, जहाँ रीना अपनी डा. मम्मी के साथ खडी होकर आइस्क्रीम की तश्तरी वेटर के हाथोँ से ले रही थी। अब तो रोहित के चेहरे से खून उतर गया --क्या कहता सब के सामने?

" अरे यार, अब मिलवा दे रीना से " गौतम ने कहा तब तो रोहित की रही सही सँज्ञा भी सुन्न पडने लगी -- क्या करे वो?
रीना उससे सीधे मुँह बात भी करेगी या नहीँ उसका रोहित को भरोसा नहीँ था -- और क्या ठाठ थे उसकी अब चँद दिनोँ की मेहमान बीवी जी के! खूब सज सँवर कर आयी थी रीना । रोहित मौन खडा था और उसके दोस्त ,रोहित के, बदलते हाव भाव देखकर सोच रहे थे कि "ये माजरा क्या है ? कुछ तो है जिसके तहत ये खामोश है!"-
लोगबाग भी समझ लेते हैँ खत का मजमूँ, लिफाफा देखकर! सो, भीड छँट गयी रोहित के इर्दगिद से। सिर्फ एक बेला वहीँ खडी उसका चेहरा पढने की नाकाम कोशिश कर रही थी, " क्या बात है ? " उसने पूछा तो रोहित ने दो टूक उत्तर दीया," प्लीज, फिर कभी" इतना कह कर रोहित नवविवाहीत वर वधु को उनके विवाह पर अपनी बधाई और शुभ सँदेश देने स्टेज की ओर चल पडा। " मुबारक हो सब को समाँ ये सुहाना ...मैँ खुश हूँ मेरे आँसूओँ पे न जाना ...मैँ तो दीवाना दीवाना दीवाना ...मैँ तो दीवाना दीवाना दीवाना " रोहित के जहन मेँ ये मुकेश जी का गाया हुआ गीत बजने लगा तो उसने सोचा - हिन्दी फिल्मोँ के गाने हर मौके की तलाश मेँ छिपे बठे रहते हैँ घात लगाये ...मौका देखते ही छा जाते हैँ ...और आज यही गाना उभर आया था। रीना की मम्मी ने रोहित को स्टेज पर खडे देखा तो अपनी लाडली को कुहनी मारकर सँकेत करके रोहित की उपस्थिती के बारे मेँ सावधान कर दिया ।
माँ बेटी मौन ही रहे पर देखते रहे रोहित के नये सूट को । --- अब तो आगमन हो गया है महाशय का !आगे क्या होगा देखते हैँ --ऐसी ही कुछ अस्फुट सी बातेँ दोनोँ के बीच हुईँ । " चल बेटी, हम भी मिल आयेँ नये जोडे को।", कहती मम्मी जी रीना को लेकर रोहित के सामने ही रीना के साथ स्टेज पर गईँ परँतु रोहित से कोयी बातचीत ही नहीँ की उल्टे वे रोहित से कतरा कर उतर गये और सामने ही सोफे पे जाकर पीयूष की मम्मी के पास बैठ गये !...
ये सारा द्रश्य सारे मेहमानोँ ने न चाहते हुये भी देख ही लिया था और सभी जान गये कि रोहित का काम जिस तेजी से सफलता की सीढीयाँ चढ रहा था उसकी निजी जिँदगी उतनी ही तेजी से, मुँह के बल गिर कर गर्त मेँ गिरी जा रही थी।
सभी जानते हैँ कि, समाज एक ऐसी व्यवस्था है कि, जब कोयी मुश्किल मेँ हो, गहरे पानी मेँ मेँ गोते खाता है तब लोग किनारे की सुरक्षित सतह से तमाशे को देखते रहते हैँ! गहरे पानी मेँ डूबते को बचाने कोयी बिरला ही छलाँग लगा कर मदद करने का साहस करता है ! -
- लोग देखते रहे, रोहित और रीना के इस अलग अलग आने और बैठने को -- ये कैसा दँपति है ?
 "छोडो जी ...बडे लोगोँ की बडी बातेँ !!

-- अजी जो भी होगा आ जायेगा सामने। आखिर " डाइवोर्स " और " प्रेग्नन्सी "कितने दिन कोयी छिपा लेगा भला? दुनिया के सामने आ ही जायेगा जो भी हो रहा है ! " - लोग फुसफुसा रहे थे। -
और रोहित अनसुना कर के वहाँ से जल्दी ही घर की ओर , अपने सूने मगर आलीशान आशियाने की ओर चल पडा। एक मशहूर चित्रपट के हीरो की बीवी जो आजकल " इन्टीरीयर डेकोरेशन " का सफल व्यवसाय कर रही थी,उसी ने रोहित का फ्लेट, अत्याधुनिक साज सज्ज्जा से सँवारा था और रोहित ने मुँहमाँगी कीमत चुका कर रीना को तोहफे मेँ पेश किया था नये आशियाने को! और आज ये क्या हुआ ?
इसी आशियाने को छोड कर रीना अपने मैके के शानदार तिमँजिले , राजसी शानो शौकतवाले घर को चुनकर ,
रोहित को अकेला छोड कर चली गयी थी ---अब रोहित उसे कोर्ट मेँ ही मिलेगा। -उसने भी फैसला कर ही लिया।
दुस्वप्न की तरह सारी कार्यवाही निपट गयी।
उसके बाद रीना ने एक अजीब प्रस्ताव रखा, " रोहित क्या हम एक बार और साथ रहने का प्रयास करेँ...क्या खयाल है तुम्हारा ? "
और रोहित, हतप्रभ: उसका चेहरा विषाद के साथ देखता रह गया था -
" पागल ये लडकी हे या मैँ हूँ? साथ रहकर फिर वही लडाई झगडे और रोज की यातना? क्या उसके लिये रोहित तैयार था? "
- नहीँ --उसने अपने इस चेप्टर का अँत किया था।
" रीना ! तुम मुझे समझ ही नहीँ पायीं। जो मेरा है वह सब तुम्हारा था। सिर्फ ५० लाख माँग कर तुमने मुझे सदा-सदा के लिये खो दीया है। रोज रोज के लडाई झगडोँ से अच्छा है कि हम अपनी अपनी ज़िँदगी अब अपने तरीकोँ से जीयेँ। तुम्हेँ आज़ादी मुबारक हो!"

इतना कह कर रोहित ,रीना से लँबे डग भरता हुआ सदा के लिये दूर होता चल निकला भविष्य की ओर ।...रास्ता कहाँ पहुँचायेगा उसकी रोहित को भी खबर नहीं........                                                (अगले अंक में समाप्त)


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                                                                                                                   दो लघु कथाएँ

संस्कार 

 -श्याम सुन्दर व्यास



सार्वजनिक नल पर पानी भरने वालों की भीड़ जमा हो गयी थी। हंडा भर जाने के बाद बूढ़ी अम्मा से हंडा उठाया नहीं जा रहा था।

लोगों का धैर्य बड़बड़ाहट में बदलने लगा। मनकू ने हंडा हटाकर अपनी बाल्टी लगाते हुए कहा-" बहू को मैंहदी लगी है क्या, जो तू आई है?"

 कातर स्वर में बुढ़िया के बोल फूटे-" उसका पांव भारी है। "

मनकू को लगा जैसे किसी ने उस पर घड़ों पानी डाल दिया हो। उसने हंडा उठाया और बूढ़ी अम्मा के द्वार पर रख आया।







* * * 



  

  

  

श्रद्धांजली

नदीम अहमद नदीम



अनुशासनहीनता के नाम पर अग्रिम पंक्ति के एक नेता को पार्टी द्वारा निष्काषित कर दिया गया। पूरी जिन्दगी निष्ठापूर्वक समर्पित कार्यकर्ता की तरह पार्टी के लिए काम करने का दम्भ भरने वाले नेताजी उम्र के आखिरी दौर में यह सदमा सहन नहीं कर सके तथा कुछ समय में ही हृदयगति रुकने से दुनिया से कूच कर गये। अंतिम दर्शन के लिए घर के बाहर भीड़ जमा हो गई। अनेक पार्टियों के नेताओं के साथ निष्काषित करने वाली पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी मौजूद थे।

मीडिया ने उनको घेर लिया। अपने को गमजदा दिखाने का प्रयास करते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष रुँधे गले से श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए कह रहे थे।

" आज देश ने एक महान नेता खो दिया, मजदूरों किसानों ने अपना सच्चा हमदर्द खो दिया। वे आदर्शवादी इंसान थे। हमें चाहिए कि ङम उनके बताए हुए मार्ग पर चलें। " 





  



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शेष-अशेष (धारावाहिक)

                                                                                                                        शैल अग्रवाल

भाग-6

 



 

 

 


“ यह तो निश्चित  वर्जिन लगती है!”

“ छोड़ यार! देखना, बिस्तर भी यही सबसे ज्यादा  गर्म करेगी। बस, पटने भर की बात होती है। उस 'नन' सी लगती रोजी को नहीं देखा, कितने नखरे करती थी!”

“ क्या तुम ऐसे ही..आई मीन, ‘ यू नो व्हाट’ के बिना ही, बता सकते हो सबकुछ?”

पहले ने भद्दी सी हंसी हंसते हुए आँख मारी और दूसरे ने उतने ही मसखरेपन से ज़बाव  दिया,  

“ अरे, और नहीं तो क्या! गुरू हूँ आखिर तुम्हारा...। बाल यह कोई ऐसे ही धूप में ही तो हरे, लाल, पीले और बैंजनी नहीं हो गए। एक-एक करके ये  सारे रंग भरे हैं।"

हॉल के एक कोने में खड़ा शरारती लड़कों का वह झुंड नवांगतुका सहपाठिनियों को देखकर जाने क्या-क्या अश्लील और अटपटी अटकलें लगाए जा रहा था और फिर खुद ही, एक बेहद भौंडी हंसी के साथ बेमतब की उन बातों का पूरा-का-पूरा ज़ायका भी ले लेता था।  रिफ्रेशर सप्ताह था वह।  रिफ्रेशर यानीकि एक-दूसरे को जानने पहचानने का, दूसरों के साथ, उस नये माहौल के साथ सामंजस्य का... गंभीर पढ़ाई शुरू करने के पहले पूरी तरह से मौज-मस्ती का सप्ताह।

न चाहते हुए भी, यूनिवर्सिटी में आते ही,  अपने आकर्षक और सुरुचिपूर्ण परन्तु गम्भीर और अलग वेशभूषा व व्यक्तित्व के कारण, बेहूदे मज़ाकों का निशाना बनी मनु सब कुछ सुन, देख और सह रही थी।.वही मनुश्री सरकार जो  जरा-सी भी उलटी-सीधी  बात स्वीकार तक न कर पायी थी, खड़ी-खड़ी न सिर्फ सबकुछ सुन ही रही थी अपितु  सोच भी रही थी कि अब उसका अगला कदम क्या होना चाहिए...क्या उचित रहेगा उसके लिए ऐसे में...'ऐसी घटिया सोच वालों के लिए क्या सजा हो सकती है!'  मन तो कर रहा था  कि पास पड़े पत्थर से सर फोड़ दे, बेवकूफ-से दिखते उन विदूषकों का, परन्तु अगल पल ही उसने खुदको संयत कर लिया खुदको और ऐसा कुछ भी तो नहीं किया । पहले दिन से ही जान चुकी थी सयानी मनु कि इस यौनमुक्त समाज में ऐसी बातें...इस तरह के मज़ाक और छेड़छाड़, बेहद  आम बातें हैं। तेज तर्रार मनु तो यह भी जानती थी कि अपने देश में नहीं, एक अपरिचित और अनजानों के बीच खड़ी थी वह, जहां बहुत कुछ जानना समझना और सीखना था अभी उसे... व्यर्थ की मुसीबतों से दूर रहते हुए; क्योंकि यहांपर शायद ही कोई मदद के लिए आगे आ पाए!

और यही सब सोच-समझकर सबकुछ अनदेखा करती,  लम्बे-लम्बे, तेज कदम लेती,  किनारा काटती  वापस कमरे में भी आ गई मनु।  ...कैसे रह और पढ़ पायेगी  इस अभद्र और अशिष्ट वातावरण में ...क्या आदत पड़ पाएगी उसे भी, यह सब यूँ ही अनदेखा और अनसुना करते रहने की?..हमेशा मज़ाक की तरह ही झेलते रहने की?...दुस्वप्न की तरह  बारबार बस वही बात कचोटे जा रही थी उसे-  ' कैसा है यह, यहां का उन्मुक्त और आधुनिक समाज, जहां उच्छृंखलता और अभद्रता  ही जरिया है आपसी परिचय का इन युवाओं में...और फिर परिचय भी किसलिए; मात्र मौज-मस्ती और उच्छृंखलता के लिए?  कोई रोक नहीं किसीपर..!जहां 12-12 साल के बच्चों को यौन निरोधक दवाएं देकर मां-बाप और समाज, दोनों ही अपनी-अपनी जिम्मेदारी से छुटकारा पा लेते हैं... और क्या अपेक्षा की जा सकती है? '

 वैसे तो उसने यह भी सुन और पढ़ रखा था कि जीवन के अधिकांश स्थाई और महत्वपूर्ण रिश्तों की नींव यहां विद्यार्थी दिनों में ही रखी जाती है, परन्तु खुद अपने साथ उसे कोई ऐसी संभावना दूरदूरतक नजर नहीं आ पा रही थी...उस घटना के बाद तो हरगिज ही नहीं। यूनिवर्सिटी में पहला दिन था उसका और ऐसी शुरुवात की अपेक्षा नहीं की थी शिष्ट और सौम्य मनु ने। आर्किटेक्ट बनने आई थी वह और सिर्फ खूबसूरत इमारतें ही नहीं, एक सभ्य और सुसंस्कृत समाज भी बसता था उसकी सपने देखती आँखों में।  ' जरूरी आवेदन-पत्र, शिक्षाशुल्क आदि की कार्यवाहियां तो कल के सत्र में भी  पूरी की जा सकती हैं, अभी तो इन असभ्यों से कैसे निपटना है, यह सोचो!'... और अपनी वर्षों की आदत के खिलाफ, खिन्न मनु ने उसी वक्त अपने सभी आवश्यक काम अगले दिन के लिए टाल दिए।

 ...इंगलैंड के उस बर्फीले मौसम में दूर-दूरतक कोई ऐसा नहीं था जिसके साथ वह सलाह मशवरा कर सके,  रोज-रोजके अच्छे-बुरे वे अनुभव और अकेलापन बांट पाए! बाहर तेज हवा के साथ बरसात हो रही थी और पानी से भी ज्यादा सूखे पत्ते बरस रहे थे। देखते-देखते ही हवा के भंवरों में फंसी, तेज गति से गोल-गोल घूमती पत्तियों से पूरा लॉन ढक गया। कोई और दिन होता तो  इंगलैंड के इस आकस्मिक पतझड़ का यह अनूठा और नया दृश्य बेहद सुन्दर और आकर्षक लगता मनु को, परन्तु उस दिन तो ऐसा लगा मानो प्रलय ही आ गयी थी...मानो शिवजी ने  अपनी तीसरी आंख खोल दी  थी और क्रुद्ध  होकर तांडव नृत्य कर ने लग गए थे। मनु परदे खींच, अधिकाशतः बन्द कमरे में ही पढ़ाई करते या टेलिविजन के आगे वक्त गुजारने की ठान चुकी थी। ऐसे सहपाठियों से तो यही अच्छा है...क्या पता एक भी उसके स्वभाव , उसके संस्कारों जैसा मिले भी या नहीं उसे, यही गुनती-बुनती! अनायास ही अम्मा, बाबा और दादी की बेहद याद आने पर , मनु ने खुद को भी समझा लिया-'जिद करके आई हो, तो अब दुखम-सुखम कैसे भी, यह पढ़ाई तो पूरी करनी ही होगी।'

वह तो अच्छा था कि अगले दिन ही जोनुस और मोती मिल गए  और दोनों ने ही मनु का साथ परछांई जैसी वफादारी से निभाया। नहीं, परछाँई से भी कहीं ज्यादा...परछाँई तो अंधेरे में साथ छोड़ देती है, पर इन दोनों ने तो सोते-जागते कभी मनु का साथ ही नहीं छोड़ा। हर सुख-दुख में साथ-साथ रहे। मोती एक लावारिश कुत्ता, जिसके परित्यक्त जीवन की खबर टेलीविजन पर सुनकर वह उसे सेंट बर्नार्डो से उठा लायी थी और जोनुस---जोनुस को तो किसी परिचय की जरूरत ही नहीं पड़ी कभी! हर व्यक्ति जानता था जोनुस को, हरेक ने नाम सुन रखा था जोनुस का। जो भी पल भर के लिए उससे मिलता, बस उसीका होकर रह जाता। उसके आकर्षक और प्रभावशाली व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना न रह पाता।

 पूरी यूनी के कैम्पस में बिल्कुल ही अकेला और अलबेला था जोनुस। लम्बा-पतला, बड़े-बड़े बालों और बेहद आकर्षक और तरल आँखों वाला। दूसरों से इतना अलग कि दूर क्या, मीलों से पहचाना जा सके। सिर्फ भव्य शरीर का ही नहीं, एक भव्य मन का मालिक। विध्यालय के पहले दिन की उस भूलभुलैया में उसी से तो पूछा था मनु ने रजिस्ट्रार के औफिस तक जाने का रास्ता! व्यक्तित्व ही ऐसा था उसका कि हर आदमी खुद ही तो खिंच जाता था उसके प्रति और मनु भी खिंचती ही चली गयी थी उसके रूप-गुण... उसकी अच्छाइयों की तरफ। हमेशा दूसरों के बारे में सोचने वाला, हर पल मदद को तत्पर... एक मसीहा-सा... हर मददगीर को बस जोनुस ही तो दिखलाई देता था हर पल उस यूनी में। चौबीसों घंटे मदद को तत्पर...वक्त और सहूलियत की कोई पाबंदी नहीं थी उसके साथ। उसके दरवाजे हर सहपाठी के लिए हरदम खुले रहते। कुछ मनचलों ने तो उसका नाम ही जोनेथन 'सेवियर' अब्राहम  रख डाला था। किसी को नोट्स चाहिएं तो जोनुस से मिल सकते थे-फुटबॉल किट या टैनिस-रैकेट से लेकर रात-बेरात खाने-पीने का सामान, सबके लिए सबकुछ रहता था हरदम उसके पास। नहीं हो, तो जुटा पाने की क्षमता थी जोनुस में। यही नहीं, और भी बहुत कुछ एक-सा था उन दोनों के स्वभाव में। सहपाठी जब एक-दूसरे की बाहों में डूबे, शरीर के सुख ढूंढ रहे होते या आमोद-प्रमोद और शराब, कहकहों में खाली वक्त गुजार रहे होते, मनु और जोनुस  दर्दमन्दों का सहारा बने सड़कों पर घूमते नज़र आते।  दुखियों और  भ्रमितों का दुखदर्द बांटते फिरते। कभी कड़ाके की ठंड में साथ-साथ खड़े होकर गरम सूप बांटते तो कभी कंबल। हर बेघर के लिए छत और दो वक्त की रोटी जुटाने की लालसा रखते थे दोनों ही। शायद यही वजह थी कि जहां हमउम्र उन्हें बौर्न फोर्टी या अंकल, आंटी कहते थे, लंदन के कोने-कोने में बसे अधिकांशतः बेघर और शरणार्थी हमदर्द और हमराज की शकल में पहचानते और मानने लगे थे... जानते थे कि इन पर भरोसा किया जा सकता है, क्योंकि सिर्फ सूप और कम्बल ही नही,  दया और ममता भी भरपूर थी उनके पास बांटने के लिए... चाहे फिर वह अंधे विकलांगों को सड़क पार कराने की बात हो या फिर बूढ़े असहायों के घर जाकर छोटे-छोटे काम करने की, या फिर बस पल दो पल साथ बैठकर उनका सूनापन बांटने और राहत देने की ही ...।

मनु जो बचपन से ही दूसरों की आंखों का दुख-दर्द पढ़ती और समझती हुई ही बड़ी हुई थी, उसके लिए भी यह सब करना, दूसरों के दुखदर्द को बांट पाना, जौनेथन की तरह ही, बेहद  स्वाभाविक ही था । चारो तरफ और आसपास, आनन्द, उत्साह और विश्वास की भरपूर लहर ही तो देखना चाहती थी वह भी।

यही वजह थी कि घर से जब भी किसी नेक इरादे के साथ मनु निकलती, तो अगले मोड़ पर ही जौनेथन उसे मिल जाता...। कभी बांगलादेश में आई बाढ़ के लिए चंदा एकत्रित करता, तो किसी दिन बौसनिया के शरणार्थियों के हक के लिए प्लैकार्ड लिए खड़ा, बारिश में चौराहे पर भीगता खड़ा जोनुस। कभी लाइब्रेरी में बैठा बच्चों के लिए वर्कशौप आयोजित करता देर रात तक, तो कभी स्थानीय कलाकारों के साथ किसी अन्य चैरिटी के लिए एक रंगारंग शाम। अक्सर ही चाहे-अनचाहे मनु की उससे मुलाकात हो ही जाती थी... कहीं भी, किसी भी सांस्कृतिक या सामाजिक आयोजन में। मनु  खुदको उससे दूर नहीं रख पा रही थी। गिटार पर जौन बर्न्स, ब्राउनिंग या टैगोर के गीत गाता वह मनु को उतना ही अच्छा लगता था, जितना कि हाइड-पार्क में खड़े होकर मानव अधिकार और मानवता की बातें समझाता हुआ। अनूठी विलक्षण प्रतिभा के साथ-साथ एक बेहद कोमल और सहृदय मन भी तो था जोनुस का।

परन्तु मनु से पहली करीबी और निजी मुलाकात पार्क में स्केच करते हुए ही हुई थी उसकी। यही वह शौक था, जिसने दूर से प्रशंशा करती मनु को जोनुस के बगल में ही नहीं, नजदीक लाकर खड़ा कर दिया था। यह बात और है कि बगल-बगल में खड़े घंटों स्केच करते रहने के बाद भी, महीनों उन्होंने एक दूसरे से बात तक नहीं की थी। कभी-कभार गुड-मौर्निंग के अलावा और कुछ नहीं कहा था एक-दूसरे से। और फिर एक दिन पेन्ट करते-करते अचानक ही मनु का ‘ बर्न्ट एम्बर’ रंग का ट्यूब खतम हो गया, जिसके बिना न शाम की लाली पूरी हो सकती थी और न तनों और पत्तों का भूरापन। और मनु मांगने से रोक भी तो न  पायी थी खुदको। शायद यह भी बात करने का एक सुविधाजनक बहाना ही तो था स्वभाव से बेहद शर्मीली मनु के लिए। 

मांगने पर हंसकर ही जबाव दिया था जोनुस ने-" ओह, तो तुम्हारे जंगल में भी हर सुबह एक शर्मीला सूरज निकल आता है औरफिर शाम को इन्ही चार रंगों के पीछे छुप जाता है ?"

इसके पहले कि मनु कुछ जबाव दे या सोच तक पाए, दोनों ही एक साथ बोल पड़े थे-" बर्न्टएम्बर, योलो ओकर, इन्डिगो और सीपिया ग्रीन !"  

शर्म से बीरबहूटी बनी मनु अब और क्या जबाव देती,  कुछऔर सकुचा गयी। मात्र किसी के बगल में खड़े होना...बातें करना इतना सुख दे सकता है- नया अनुभव था मनु के लिए। लालची मन अब यह सिलसिला खतम ही नहीं होने देना चाहता था। पलकें नीचे किए खुदमें ही डूबी मनु कहना कुछ और चाह रही थी और कह कुछ और बैठी,-"नहीं, ऐसी बात तो नहीं। मेरा काम इन रंगों के बिना भी चल  जाता है। " अगले पल ही गला घंघारकर उसने खुदको संयत करने की एक और असफल कोशिश की।  "बस! मैं न जाने कबसे तुमसे बातें करना चाहती थी। बहाना ढूँढ रही थी और आज रंग खतम होते ही, सहज ही मांग भी बैठी। विश्वास करो, हरेक से ऐसे,यूँ नहीं खुल पाती हूँ मैं। आज ही न जाने क्या हो गया मुझे।" अनायास ही मन की बात होठों पर आ ही गयी। अब तो उसे खुद ही नहीं मालूम था कि क्या कहना चाह रही थी और क्या कह रही थी वह या फिर किस बात की सफाई दिए जा रही थी और क्या छुपाना चाह रही थी मनु। तब मनु का हाथ प्यार से अपने हाथ में ले लिया जोनुस ने।  

" कोई बात नहीं, मेरी नन्ही राजकुमारी! तुम्हारे द्वारा बनाई  हर तस्बीर के लिए  सिर्फ मेरे रंग ही नहीं, मैं खुद भी हाजिर हूँ हर पल। तुम बेझिझक, वक्त-बेवक्त, कभी भी मुझे आवाज दे सकती हो। मित्र आखिर होते किस लिए हैं ?" फिर तो रोज ही दोनों की खनकती हंसी से पूरा जंगल गूंजने लगा। नदी-किनारे हाथों में हाथ लिए साथ-साथ  घूमते,  बातों का सलसिला जो चला, तो खतम ही नहीं हो पाया। हाथ जो पकड़ा, छूटा ही नहीं।...पढ़ाई ही नहीं, ब्रिटेन को, उस अपरिचित समाज के रीति-रिवाजों को...खुद मनु के मन तक को जानने समझने में, जौनेथन उसकी पूरी मदद कर रहा था और घर-परिवार से दूर, अकेली बैठी मनु के लिए यह कोई कम सहारे या सुख की बात नहीं थी।...


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लक्ष्य से जीत तक

 

      -कवि कुलवंत सिंह

जीवन अनमोल है। आधुनिक युग में हर व्यक्ति बेहतर भविष्य, सामाजिक प्रतिष्ठा एवं अच्छे जीवन के लिए सदा प्रयत्नशील रहता है। आपको भी यदि सफल होना है; जीवन में कुछ पाना है; महान बनना है; तो निम्न बातों को जीवन में अपना लीजिए ।

1. लक्ष्य निर्धारण - सर्व प्रथम हमें अपने जीवन में लक्ष्य का निर्धारण करना है। एक लक्ष्य - बिलकुल

निशाना साध कर। अजनु की चिड़िया की आँख की तरह। स्वामी विवेकानंद ने कहा था - जीवन में

एक ही लक्ष्य साधो और दिन-रात उसी लक्ष्य के बारे में सोचो । स्वप्न में भी तुम्हें वह लक्ष्य दिखाई

देना चाहिए । और फिर जुट जाओ, उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए - धुन सवार हो जानी चाहिए

आपको । सफलता अवश्य आपके कदम चूमेगी । लेकिन एकबात का हमें ध्यान रखना है। हमारे

लक्ष्य एवं कार्य के पीछे शुभ उद्देश्य होना चाहिए। पोप ने कहा था - शुभ कार्य के बना हासिल

किया गया ज्ञान पाप हो जाता है। जैसे परमाणु ज्ञन - ऊर्जा के रूप में समाज के लिए लाभकार है

तो वही बम के रूप में विनाशकारी भी ।

2. कर्म - लक्ष्य निर्धारण के बाद आता है कर्म । गीता का सार है- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु

कदाचन । कम में जुट जाओ। उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए, जो आपने चुना है। हर पल । बिना कोई

वक्त खोए। गांधी जी ने कहा था - अपने काम खदु करो, कभी दूसूरों से मत करवाओ। गांधी जी खदु

भी अपने सभी कार्य खदु करते थे। दसूरी बात जो गांधी जी ने कही थी - जो भी कार्य करो, विश्वास

और आस्था के साथ, नहीं तो बिना धरातल के रसातल में डूब जाओगे। यह अति आवश्यक है कि

हम अपने आप पर विश्वास और आस्था रखें , यदि हमें अपने आप पर ही विश्वास नहीं है तो हमारे

कार्य किस प्रकार सफल होंगे? जरूरी है- अपने आप पर मान करना, स्वाभिमान रखना । विश्वास

और लगन के साथ जुटे रहना । हमारे कार्य से हमेशा एक संदेश मिलना चाहिए । नेहरू जी से

एकबार एक राजदतू , एक सैनिक एवं एक नवयुवक मिलने आए । तो नेहरू जी ने सबसे

पहले नवयुवकों को मिलने के लिए बुलाया, फिर सैनिक को एवं सबसे बाद में विदेशी राजदतू को ।

बाद में सचिव के पूछने पर बताया कि नवयुवक हमारे देश के कर्णधार हैं , सैनिक देश के रक्षक;

उनको सही संदेश मिलना चाहिए । बिना बोले हमारे काम से समाज को संदेश मिलना चाहिए ।

3. अवसर - हर अवसर का उपयोग कीजिए। कोई भी मौका हाथ से न जाने दीजिए । स्वेट मार्टेन  ने

कहा था - अवसर छोटे बड़े नहीं होते; छोटे-से-छोटे अवसर का उपयोग करना चाहिए। चैपिन ने तो

यहां तक कहा कि जो अवसर कि राह देखते हैं , साधारण मनुष्य होते हैं ; असाधारण मनुष्य तो

अवसर पैदा कर लेते हैं । कई लोग छॊटे-छॊटे अवसर यूं ही खॊ देते हैं कि कोई बड़ा मौका हाथ में

आएगा, तब देखेंगे। यह मूर्खता की निशानी है।

4. आशा / निराशा - आप काम करेंगे तो जरूरी नहीं कि सफलता मिल ही जाए। लेकिन आपको

घबराना नहीं है। अगर बार बार भी हताशा हाथ आती है, तो भी आपको निराश नहीं होना है।

मार्टन ने ही कहा था - सफलता आत्मविश्वास की कुंजी है। ग्रेविल ने कहा था - निराशा मस्तिष्क के

के लिए पक्षाघात (Paralysis) के समान है| कभी निराशा को अपने पर हावी मत होने दो ।

विवेकानंद ने कहा था - 1000 बार प्रयत्न करने के बाद यदि आप हार कर गिर पड़े हैं तो एकबार

फिर से उठो और प्रयत्न करो । अब्राहम लिंकन तो 100 में से 99 बार असफल रहे। जिस कार्य को भी

हाथ में लेते असफलता ही हाथ लगती । लेकिन सतत प्रयत्नशील रहे। और अमेरिका के राष्ट्रपति

पद तक जा पँहुचे। कुरान में भी लिखा है- मुसीबत टूट पड़े,  हाल बेहाल हो जाए, तब भी जो लोग

निश्चय से नहीं डिगते, धीरज रखकर चलते रहते है, वे ही लक्ष्य तक पहुँचते है।

5. आलस्य - आलस्य को कभी अपने ऊपर हावी मत होने दो । कबीर की यह पंक्तियां तो हम सभी

के मुंह पर रहती हैं - काल करे सो आजकर ।और यह मत सोचो कि आपका काम कोई दूसरा कर

देगा । राबट कैलियर ने कहा था - मनुष्य के सर्वोत्तम मित्र उसके दो हाथ हैं । अपने इन हाथ पर

भरोसा रखो एवं सतत प्रयत्नशील रहो ।

6. निंदा/ बुराई - जब हमने लक्ष्य ठान लिया है, काम कर रहे हैं, अवसर का उपयोग कर रहे हैं ,

निराशा से बच रहे हैं , सतत आगे बढ़ रहे हैं तो राह में हमें कई प्रकार के लोग मिलते हैं । हमारे

विचार, दृष्टिकोण, लक्ष्य परष्पर टकराते हैं । लेकिन हमें एक चीज से बचना है। दूसरे की बुराई से,

उनकी निंदा से। रिचड  निक्सन ने कहा था - निंदा से तीन हत्याएं होती हैं ; करने वाले की , सुनने

वाले की और जिसकी निंदा की जा रही है। स्विफ्ट ने कहा था - आदमी को बदमाशियां करते देखकर मुझे हैरानी नहीं होती है, उसे शर्मिंदा न देखकर मुझे हैरानी होती है। इसिलए आवश्यक है कि

हम अपनी गलितयों को सहर्ष कबूलें। हम इंसान हैं , हमसे गलितयां भी होंगी। लेकिन गलती को

मान लेना सबसे बड़ा बड़प्पन है।और इन गलितयों से सीख लेते हुए हमें आगे बढ़ना है।

7. परोपकार - हमारे लक्ष्य, हमारे कर्मों में कहीं-न-कहीं परोपकार की भावना अवश्य होनी चाहिए।

चाहे वह हमारे समाज, जाति, देश, धर्म , परिवार, गरीबों के लिए हो । परोपकार की भावना जितने

बड़े तबके के लिए होगी आप उतने ही महानतम श्रेणी में गिने जाएंगे। गांधी जी ने कहा था - जिस

देश में आप जन्म लेते हैं, उसके खुश हो कर सेवा करनी चाहिए। तुलसीदास जी ने कहा है-

पर हित सरस धरम नहिं भाई । नेहजी ने भी कहा था - कार्य महत्वपूर्ण नहीं होता, महत्वपूर्ण

होता है- उद्देश्य; हमारे उद्देश्य एवं कर्म के पीछे परोपकार की भावना निहित होनी चाहिए।

8. जीत - आपने लक्ष्य ठाना; काम कर रहे हैं; अवसर का उपयोग कर रहे हैं; निराशा, आलस्य और

निंदा से बच रहे हैं ; परोपकार की भावना से निहित हैं । बस एक ही चीज अब बचती है। जीत ।

जीत  निश्चित ही आप की है। ऋगवेद में भी लिखा है- जो व्यक्ति कर्म करते हैं , लक्ष्मी स्वयं उनके

पास आती है, जैसे सागर में नदियां।

जो इन सब पर चलते हैं, असाध्य कार्य भी संभव हो जाते हैं । दो उदाहरण देना चाहता हूँ-

1. एक गुरु ने अपने शिष्य को बांस की टोकरियां दीं और कहा कि इनमें पानी भर कर लाओ। सभी

शिष्य हैरान थे, यह कैसा असंभव कार्य गुरुजी ने दे दिया। सब तालाब के पास गए। किसी ने एक

बार, किसी ने दो बार और किसी ने दस-बीस बार प्रयत्न किया । कुछने तो प्रयत्न ही नहीं किया।

क्योंकि पानी टोकरी में डालते ही निकल कर बह जाता था। लेकिन एक शिष्य को गुरू पर बहुत

आस्था थी, वह सुबह से शाम तक लगातार लगा रहा। प्रयत्न करता रहा। शाम होते-होते धीरे-धीरे

बांस की लकड़ी फूलने लगी और टोकर में छिद्र छोटे होते गए और धीरे-धीरे बंद हो गए। इस तरह

टोकर में पानी भरना संभव हो सका।

2. 1940 के ओलंपिक खेल में शूटिंग के लिए सभी की नजरें हंगरी के कार्ली टैकास पर टिकी थीं;

क्योंकि वह बहुत अच्छा निशानेबाज था । लेकिन विश्वयुद्ध छिड़ गया। 1944 में भी विश्वयुद्ध के

चलते ओलंपिक खेल नहीं हो पाए । विश्वयुद्ध तो समाप्त हो गया लेकिन 1946 में एक दुर्घुटना में

कार्ली का दायां हाथ कट गया । जब हाथ ही नहीं तो शूटिंग भला कैसी ? कार्ली ने घर छोड़ दिया।

सबने सोचा निराशा के कारण कार्ली ने घर छोड़ दिया है। लेकिन जब 1948  में लंदन में ओलंपिक

खेल हुए तो सबने हैरानी से देखा कि शूटिंग का गोल्ड-मैडल लिए कार्ली खड़ा है। बाएं हाथ से गोल्ड-मैडल जीता ।

9. अहंकार - जीत आपने कर ली । अब एक बात का और ध्यान रखना है। कभी अहंकार को

अपने ऊपर हावी नहीं होने देना है। अहंकार मनुष्य के विनाश का कारण बनता है। सहजता और

सौम्यता बड़प्पन के गुण हैं । शेक्सपीयर ने कहा था - अहंकार स्वयं को खा जाता है। अपनी दो

पंक्तियों के साथ -

हिम बन चढ़ो शिखर पर या मेघ बन के छाओ,

रखना है याद तुम्हे, सागर में तुमको मिलना।

 


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 हो-ली-सो-होली



 
चुटकी एक गुलाल की!

बरसाने  लाल ने जब से सुनी है कि ब्रिटेन और फ्रांस क्या अमेरिका तक की पार्लियामेंट में दिवाली मनाई गईं, उनके मन में खलबली मच गई हैं। सर पर भूत सवार है कि इसबार विदेश  जा कर ही होली मनाएँगे, वह भी ऐसी कि दुनिया देखती रह जाए - याद रखे उन्हें और उनके भारत दोनों  को ही - भारतीय सभ्यता के साथ-साथ  उनके इस रंग-बिरंगे त्योहार  को भी। बरसों तक ना भूले कि बस भाषण देना ही नहीं,  हम भारतीयों को हँसना-हँसाना...मस्ती करना भी आता है।

बाहर मोहल्ले के हुड़दंगिए टीन कनस्तर पीट-पीटकर होली के लिए चंदा माँग रहे थे। घर का लक्कड़-कबाड़ - टूटी कुरसी, फटा सोफा - पुराना और बेकार, सब दे दो। 'क्यों जी, टूटी यह मेज़ दे दूँ इन्हें इस बार?' पत्नी पूछे जा रही थी। 'हाँ हाँ क्यों नहीं और खुद को भी।' मन ही मन वे बुदबुदाये।
'जी क्या कहा?' इसके पहले कि पत्नी कुछ समझ पाए उन्होंने बात पलट दी, 'यह जो सामने दूरदर्शन पर मुँह में बिना दाँत और पेट में बिना आँत के मंत्री जी हाल ही में की अपनी विदेश यात्रा का वृतांत सुनाए जा रहे हैं, उन्ही की बात कर रहा था। सोचता हूँ, उन्हें क्यों नहीं दे देता कोई इन लड़कों को!'

पत्नी हंसकर  'आप भी...' कहती चौके में चली गईं और बरसाने लाल ने अपनी सोच पर लगाम लगा ली - 'छी: छी:, ऐसा अभद्र तो मज़ाक भी शोभा नहीं देता। अबलाओं की रक्षा और बड़ों का आदर किया जाता है। पर अब यह रक्षा या आदर का तो नहीं, भारत की प्रतिष्ठा का सवाल था और विश्व के आगे भारत की सद्भावना की ज़िम्मेदारी थी बाँके बिहारी पर। नहीं, वो द्वापर का बाँके बिहारी नहीं, जो राधा के संग होली खेलने बरसाने जाता था और जिसे ब्रिजवासी आज भी गा-गाकर बुलाते नहीं थकते - 'कान्हा बरसाने में आ जइयो, बुलाय गई राधा प्यारी।' वह तो बात कर रहे थे अपने मित्र बाँकेबिहारी यादव की। बचपन से ही चोली दामन का साथ  जो ठहरा दोनों का... और यहीं  पड़ौस में, उन्हीं के गाँव में ही तो रहता है वह। वही, जिसके यहाँ पाँच सौ से भी ज़्यादा गाय भैसों का तबेला है और जिसकी माता जी की सूझबूझ से अब छाछ ही नहीं, गोबर की खाद भी पूरे गाँव को मुफ़्त ही मिलती है। आजके ज़माने में भाइचारे की ऐसी अनूठी मिसाल और कहाँ देखने को मिलेगी? माताजी का आशीर्वाद और मित्र मंडली का सहयोग ही तो है कि आज न सिर्फ़ बाँकेबिहारी देश का  सांस्कृतिक मंत्री बना बैठा हैं, वरन खाद और समन्वय विभाग भी उसी के पास है। हाँ यह बात दूसरी है कि जबसे संस्कृत और समन्वय के साथ पर्यटन विभाग भी उसे  मिला है, रोज़ ही एक नई योजना लेकर मित्र-मंडली घेरे रहती है उसे और सौभाग्यवश विदेश-भ्रमण के नए-नए संयोग भी  जुटते ही रहते हैं। आख़िर दोस्त के काम न आए,  तो  वो भी भला कैसा दोस्त?

तुरंत ही मित्र की अनुमति से एक नयी 'विश्व मैत्री संघ' नामकी संस्था बना डाली गईं। आनन-फानन ही सदस्यों की सूची व योजना और कार्य-प्रणाली का खाका भी तैयार हो गया- शर्त, नियम और कानून सबके साथ मुकम्मल। अब होली से बढ़िया और कौन-सा त्योहार हो सकता हैं मित्रता और सद्भावना के लिए जिसमें न सिर्फ़ सारी ग़लतियों और विषमताओं को भूलकर दुश्मन के गले मिला जा सकता हैं अपितु विषमताओं और ग़लतियों का बदला भी लिया जा सकता है? मुँह काला पीला कर दो, गधे पर बिठाकर घुमा दो, बैंड बजवा दो, कोई बुरा नहीं मानता। मान ही नहीं सकता। आख़िर होली जो ठहरी। फिर  हो--ली सो होली,  बिल्कुल अपनी भारतीय परंपरा क्या, मानवीय और विश्व परंपरा की तरह - एक हाथ से थप्पड़ मारो और दूसरों से तुरंत ही गाल सहला दो - सब ठीक पल भर में ही।

खुद बाँकेबिहारी की बैठकी में सब-कमेटी बनी और तुरंत ही समस्त कार्यभार सक्षम पी. ए. मथुरा प्रसाद जी के सूझ-बूझ भरे कंधों पर डाल दिया गया। वैसे भी बाँकेबिहारी जी अंगूठा लगाने से ज़्यादा कोई सरदर्द नहीं ही लेते। मथुरा प्रसाद ने भी बिना वक्त ख़राब किए तुरंत ही ना सिर्फ़ पूरी मित्र-मंडली, काशी प्रसाद, बिहारी लाल, अवध बिहारी, गया प्रसाद और ब्रिजरमण सभी को बुला लिया गया, बल्कि यह भी बता दिया कि अगली होली इंग्लैंड में ही मनानी हैं, कैसे और कहाँ यह अभी मिल-जुलकर सोचना था। ब्रज की लठ्ठमार होली होगी या फिर कानपुर और लखनऊ की वार्निश पेंट-वाली...कनस्तर पीटकर होली का हुड़दंग होगा या सांस्कृतिक मेल-मिलाप कार्यक्रम ...ऐसी अन्य छोटी-मोटी बातें भी तय होनी थीं । हां, यह  निश्चित था...बाहर जाकर मौज-मस्ती मं कोई कसर नहीं रहेगी।  अगर इस मनमोहन सरकार के नीचे, सोनिए के राज में भी यह न कर पाए तो कभी भी न कर पाएंगे ...कड़क जासनी में लपेटकर बात प्रस्तावित की गयी । फिर तो फटाफट सभी संग हो अधिवेशन की तैयारी में जुट गए।

निश्चय किया गया कि होली भी ब्रिटिश पार्लियामेंट में ही होनी चाहिए...आखिर अब भारत और भारतीयों की इतनी साख तो है ही वहाँ। काशी प्रसाद जी ने प्रस्ताव रखा कि हमारी काशी में तो धुलहटी के साथ-साथ होली की शाम को एक मूर्खाधिवेशन का भी रिवाज़ है। जिसमें सारे नामी-गिरामी मूर्ख इकठ्ठे किए जाते हैं और उन्हें अनूठे-अनूठे नाम और सम्मान दिए जाते रहे हैं - जैसे कि घर फूँक तमाशा देख, मान न मान मैं तेरा मेहमान, बछिया का ताऊ, धूमकेतु आदि-आदि। सभापति के लिए सर्व सम्मति से बुश का नाम पास हो गया और महारानी एलिजाबेथ और ड्यूक सहित, ब्लेयर, सद्दाम, अपनी सोनिया...वगैरह के नाम तुरंत ही तीस-चालीस निमंत्रण पत्र भी लिख डाले गए। ऊपर सत्यमेव जयते के साथ यह भी छापा गया कि बुरा ना मानो होली है। बाकी सब मेहमान तो आने को राज़ी हो गए परंतु चीन और पाकिस्तान ने आने में यह कहकर असमर्थता ज़ाहिर कर दी कि वे तो यह वाला अधिवेशन हर महीने ही करते आए  हैं और इसी व्यस्तता के रहते आने में असमर्थ हैं।

बिहारी लाल का सुझाव आया कि इसबार ठंडाई में भांग, गुलाबजल, बादाम और सौंफ के संग थोड़ा भारतीय चारा भी ज़रूर ही घुटना चाहिए क्योंकि आजकल विदेशी मालों की भरमार होने के कारण भारत में देशी चारे की खपत बिल्कुल ही ख़तम हो गई हैं और यह माल खपाने का एक बढ़िया मौका है।  गाय भैंस तक को अब बस विदेशी चारा ही चाहिए। सुना है समिति अभी भी इस प्रस्ताव पर विचार कर रही है। अवध बिहारी और गया प्रसाद ने एक हास्य कवि सम्मेलन का ज़िम्मा ले लिया और सुनाने के लिए नए-नए होली के गीत और रसिया रचे जाने लगे। जैसे कि होली खेलें अवध में रघुबीरा की अगली लाइन लिखी गई - 'अल्लाह के हाथ कनक पिचकारी, जीसस के हाथ अबीरा' क्योंकि उन्हें इस होली की ठिठोली में बेमतलब की और बेसुरी बाबरी और दरबारी नहीं चाहिए थी।बरसाने लाल ने होली के स्वांग के लिए लखनऊ से कुछ पुलिस अधिकारी और मंत्रियों को भी बुलवा लिया क्योंकि सुनते हैं वहाँ पर चारोतरफ  आजकल बहुत ही मुलायम ककड़ियों और भिंडियों की माया फैली हुई है।

इस तरह से सभी इस आयोजन से खुश थे, ख़ास करके अब जब कि खुद बिल क्लिंटन ने होली के उस स्वांग में ना सिर्फ़ कृष्ण कन्हैया बनना स्वीकार कर लिया था वरन सभी गोपिकाओं को लाने की ज़िम्मेदारी भी खुद अपने ऊपर ही ले ली थी।
अब जब होली की यह टीम समन्वित हो गई और पूरे ताम-झाम के साथ लंदन जा पहुँची, (अबीर गुलाल रंग, पिचकारी, कविता, चुटकुले सभी कुछ तो था उनके पास) तो ऐन वक्त पर कमबख़्त कस्टम ऑफ़िसर ने ही रोड़ा डाल दिया। पिछले चार घंटों से हीथ्रो के हवाई अड्डे पर ही ता-ता थैया करवाने लगा वह उनसे। मथुरा प्रसाद बार-बार कह रहे थे कि हम पी. ए. हैं और वह कह रहा था कि अगर आप पीए हैं तो हम आपको पार्लियामेंट में तो हरगिज़ ही नहीं जाने दे सकते क्योंकि वहाँ पर ईराक के बाद ईरान के पास रासायनिक हथियार हैं या नहीं के साथ-साथ अगले सत्र में महिला विधायकों की स्कर्ट की लंबाई जाँघ तक हो या एड़ियों तक या फिर उनकी लिपिस्टिक का रंग गर्मियों में हो रहे जी सेवेन के अधिवेशन में गुलाबी हो या नारंगी जैसे कई मुख्य और गंभीर मुद्दों पर बहस चल रही हैं।

उस चुस्त-दुरुस्त ऑफ़िसर के आगे विपदा के मारे मथुरा प्रसाद जब गिड़गिड़ाते-गिड़गिड़ाते थक गए तो झल्लाकर बृजभाषा में ही रोने लगे,
"अरे भइया, मैं तो बस पी.ए. हूँ मेरे पीछे चौं पड़ गए हो आप - कछू दुस्मनी है का हमते - हाँ मोए तौ जेई मामलौ दीखै अब, वरना का ज़रूरत थी यौं परेशान करन की, कोई पहली बार तो विलायत आए ना हैं हम अब?"
"इतना पीकर एयरपोर्ट पर तमाशा करोगे तो क्या मैं तुम्हें छोड़ दूँगा?" ऑफ़िसर लाल आँखों से तर्राया।
"बो पीए नायैं, हम तौ बस पी. ए. हैं यानी की मंत्री जी के प्राईबेट असिस्टैंट। जे देख लल्ला, सातौ ब्लैक हौर्स अभी खोली भी नाएं हमनै तौ। वैसै थोरी-भौत अंगरेज़ी तौ पढ़ी ही होगी तैने भी?"
''क्या मंत्री जी सात काले घोड़े भी लाए हैं।'' टी टोटलर अवध बिहारी जोश में थे।
"ना बे गधे तेरे लिए शेरबानी और सेहरा भी। बारात जो सजानी है हमें तेरी। पाँच मिनट कू चुप ना रह सकौ का तुम सब।" बरसाने लाल को विश्वास नहीं हो रहा था कैसे-कैसे अकल के मद्दों से यारी निभ रही  हैं उनकी।
"अच्छा तो अब मंत्री जी के पी. ए. बन गए तुम।" गुस्से से भी ज़्यादा हँसी आ रही थी लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट पर खड़े कड़क सरदार को।

ज़रा भी डरे या विचलित हुए बगैर, बेख़बर पांडे जी हाथ ऊपर उठाए अभी भी वैसे ही गोल-गोल घूम रहे थे, और भांग के नशे में ज़ोर-ज़ोर से गा रहे थे, "कान्हा ने कीन्हीं बरज़ोरी होरी पर/भीज गई मोरी अंगिया सारी होरी पर।" बीच-बीच मैं खुद ही 'जय राधे' की टेक लगाकर एकाध ठुमका भी ले लेते। आज भी राधेरानी पर ही तो पूरा ध्यान था उनका! होठों पर लाली, कान में बारी, माथे पर बिंदिया, और सर पर लाल चुन्नी, कौन कह सकता था कि वह भी कभी ऐसे ही एक कड़क ऑफ़िसर थे पुलिस में। आता-जाता हर यात्री कौतूहलवश रुक जाता, बिना टिकट के पूरा मनोरंजन जो हो रहा था सबका।
काशी प्रसाद, अयोध्या दास और बरसाने लाल सभी आँख बंद किए माथे पर हाथ रखे चुपचाप बैठ गए। साँस रोके प्रतीक्षा करने लगे मित्र मंत्री जी का और मन ही मन कोसने लगे खुद को कि क्या ज़रूरत थी वे भांग के लड्डू खाने की, पर यह काशी प्रसाद भी तो नहीं मानता बात ही ऐसी कर देता है। अब भला बाबा भोलेनाथ के प्रसाद को कैसे मना कर पाते वे। वह भी शिवरात्रि का प्रसाद? वैसे भी फगवाड़ा तो शुरु ही हो चुका है। ऑफ़िसरों को भी तो समझना चाहिए यह। कुरसी के नशे में धुत रहते हैं सब। होली पर ऐसी छोटी-मोटी ठिठोली तो होती ही रहती हैं। पर अब तो बस इंतज़ार ही करना होगा उन्हें बाँकेबिहारी जी का और कोई चारा भी तो नहीं। वह ढिबरी टाइट करेगा इन सबकी। चारे की याद आते ही याद आया कि बिहारी लाल सही ही कर रहा था अगर चारा मिला देते तो एक-आध लड्डू इस ऑफ़िसर के लिए भी बच ही जाता और फिर क्या पता यह भी बरसने की बजाय पांडे जी की तरह नाच ही रहा होता?

"अरे भाई पर हम भी तो होली जैसा गंभीर त्यौहार मनाने सात समंदर पार यहाँ पर, तुम्हारे देश में आए हैं।" मथुरा प्रसाद जी ने इस बार हाथ जोड़कर दाँत निपोरे।
"ओह तो सिर्फ़ पीए ही नहीं, 'होली' भी हो आप। कौन से सेक्ट को बिलांग करते हो? परेशान कर रखा है इन होली मेन और उनके सर्मनों ने हमें। अबू सलेम के बाद हमारी सरकार की यही पौलिसी है कि हर होली मैन को चौबीस घंटे के ऑबज़रवेशन और हर तरह की जाँच पड़ताल के बाद ही देश में आने दिया जाए।"
सुनते ही धैर्य छूट गया उनका। सबकुछ भूल गए मथुरा प्रसाद। सर पकड़कर धम से वहीं बैठ गए। मुँह बाए एकटक देखते रह गए। बड़ी गुस्सा आ रही थी उन्हें मित्र बाँकेबिहारी पर जो कि ओरिजिनल पत्नी को सास की सुरक्षा में छोड़, कॉपी की जुगाड़ में कल ही पहुँच गया था यहाँ। पर अब उसे दोष भी तो नहीं दिया जा सकता, ... विदेश मंत्रालय का सख्त आदेश जो ठहरा, 

" कृपया विदेश-यात्रा   दौरान  अनिवार्य चीजों की कॉपी साथ लें।".... 

  -शैल अग्रवाल  

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कानपुर की होली





           -श्याम सुन्दर चौधरी

कई प्रमुख भारतीय त्योहारों की तरह भाईचारा और आपसी सद्भावना को जिन्दा रखने का एक प्रयास होली भी है। होलिका का अपने भतीजे प्रहलाद को लेकर आग में बैठना और फिर चमात्कारिक रूप से उसका खुद का जल कर मर जाना यद्यपि इसका प्रीरंभिक बिन्दु है लेकिन उसके बाद यह त्योहार कालचक्र के साथ विभिन्न प्रान्तों और शहरों में अपने-अपने ढंग से मनाया जाने लगा जिसमें उस स्थान विशेष की कुछ परम्परायें, घटनाएं जुड़ती चली गयीं। ऐसा ही एक शहर है कानपुर। गंगा किनारे स्थित उत्तर भारत के इस औद्योगिक नगर की होली यहां के लोगों की मस्ती, जिन्दादिली और जुनून की हद तक जाकर किसी भी त्योहार को मनाना दर्शाती है।

प्राचीन किवदन्ती के अनुसार यहां के गांव के जमींदार के घर पर होली के पन्द्रह दिन पहले गांव वाले इकट्ठा होते थे और ढोल मंजीरा आदि लेकर होली का आगमन गीत फाग गाते थे और जिस दिन होली जलने वाली होती थी उस दिन फाग गाने वालों का जुलूस जमींदार के घर से उठकर उस स्थल पर जाता जहां होली जलाने के लिए बसंत  पंचमी के दिन से ही लकड़ियां इकट्ठी करके रखी रहती थीं।

जुलूस के पहुंचने तक पुरोहित पूजा की तैयारी कर चुके होते हैं और फिर लोग पूजा के बाद आग जलाकर उसमें गन्ना और गेहूं की बालियां जलाते थे। ऐसा करके वो ईश्वर से प्रार्थना करते थे कि वो होली जलाकर होलिका रूपी बुराई का नाश कर रहे हैं, अतः ईश्वर इस बार फसल की कटाई के बाद उन्हें हर तरह से समृद्ध करे। दूसरी ओर घर की महिलाएं, किशोरियां तथा युवतियां रात को देर तक जागकर गुझिया और भिन्न भिन्न पकवान का आयोजन करती थीं। अगले दिन एक-दूसरे के ऊपर रंग डाला जाता था।

उन्ही दिनों यह भी सोचा गया कि कोई ऐसी व्यवस्था की जाए कि होली के बाद सभी लोग एक जगह एकत्र हों और तमाम आपसी कटुता आदि को भुलाकर एक-दूसरे से गले मिलें तथा अपने रिश्तों को एक मजबूत शुरुआत दें, इसके लिए होली के पांच-छह दिन पड़ने वाले अनुराधा नक्षत्र का ही चयन किया गया। चूँकि शास्त्रों में यह नक्षत्र मानव जीवन के लिए कल्याणकारी माना गया है इसलिए गांव के प्रतिष्ठित और साधारण बड़े बुजुर्गों ने फैसला किया कि इस एक दिन मेले का आयोजन किया जाए जिसमें लोग होली मिलन के साथ-साथ खरीददारी भी कर सकें। इसलिए शहर के सरसैया घाट नामक तट को चुना गया।

तत्कालीन ब्रिटिश प्रसाशन को होली के हफ्ते भर बाद फिर से दिन भर रंग खेलना और भीड़ जुटाकर मले का आनन्द लेना उचित नहीं लगा इसलिए आदश दिया गया कि होली के दूसरे दिन ही मेले का आयोजन कर लिया जाये लेकिन बात तो अनुराधा नक्षत्र में मेले के आयोजन की थी और इसके पीछे यहां के लोगों की आस्था भी जुड़ी हुई थी। फलतः ऐसी ही एक होली में जब स्वयं शासन द्वारा ठीक एक दिन बाद मेले का आयोजन किया गया तो लोगों ने सामूहिक रूप से इस मेले का बहिष्कार कर दिया, कोई भी वहाँ नहीं पहुँचा और इसके बाद अनुराधा नक्षत्र वाले दिन जमकर रंग खेलने के बाद लोग नहा धोकर नये नये कपड़ों में सजधज कर घरों से निकलने लगे और देखते ही देखते सरसैया घाट पर जनसैलाब उमड़ पड़ा, जिसे काफी कोशिशों के बावजूद ब्रिटिश प्रशासन रोकने में सफल नहीं हो सका। तब से आजतक होली के बाद अनुराधा नक्षत्र वाले दिन इस मेले की परम्परा चली आ रही है। लोग चूंकि उस दिन नहा धोकर बिल्कुल नये और उजले कपड़ों में मेले का आनंद लेते थे इसलिए इसे उजरा मेला भी कहा जाता रहा है। इस मेले की नींव हटिया (नगर का प्रमुख बर्तन बाजार) के व्यापारियों द्वारा रखी गयी थी।

सबसे खास बात यह है कि इन व्यापारियों के अधीन काम करने वाले कर्मचारी और श्रमिक जो होली से मेला तक अपने गांव फसल की कटाई के लिए जाते थे उन्हें उस पूरे सप्ताह की तनख्वाह कानपुर के व्यापारियों द्वारा दी जाने की एक सुखद परंपरा थी। कानपुर नगर का लगभग डेढ़ सौ वर्षों का इतिहास है और यह परंपरा भी तभी से लागू है। हटिया नामक इस स्थान से कोई कोरा बचकर नहीं जा सकता है। हौज में रंग खोलकर रखा जाता है, जो भी कोरा दिखा उसे पकड़कर एक बार गर्दन तक डुबोकर निकाल दिया जाता है। इसके बाद वह व्यक्ति कहीं भी जाने को स्वतंत्र है।

कानपुर जिले के अंतर्गत लगने वाले एक क्षेत्र विशेष का नाम है अहिरवाँ। यहां होली के बाद पँचमी के दिन होली मनायी जाती है, यानी एक ही जिले में दो भिन्न-भिन्न दिनों में यह त्योहार मनाया जाता है इससे अनोखी मिसाल और क्या हो सकती है। इसकी वजह है इस गाँव के जमीदार को ब्रटिश प्रशासन की किसी बात का विरोध करने पर होली के दिन ही गिरफ्तार कर दिया गया था और पंचमी वाले दिन छोड़ा गया था। इस घटना से क्षुब्ध गाँव वालों ने ठीक त्योहार के दिन होली न मनाकर पंचमी वाले दिन ही मनाने का निर्णय लिया। तब से अहिरवाँ नामक इस स्थान पर इसी परंपरा का पालन किया जा रहा है।

लेकिन धीरे-धीरेनगर की होली को कुछ शरारती और असामाजिक तत्वों ने विकृत करने की कोशिश की है। खतरनाक से खतरनाक पेंट किसी के भी चेहरे पर लगा देना, कीचड़ और मशीन की कालिख से होली खेलना जैसी घटनाएं नगर के समृद्ध होली के इतिहास को कलंकित तो करती ही हैं साथ ही गुण्डा किस्म के लोगों ने इसी आपसी वैमनस्य का प्रतिशोध लेने का भी उचित अवसर मान रखा है।

इस मौके पर होने वाली हिंसक घटनाओं के चलते पिछले कुछ वर्षों से प्रशासन को सख्त कदम उठाने पड़े हैं। अब वो पुरानों दिनों जैसी होली तो नहीं है, फिर भी लोग तमाम बन्धनों के बीच भी अच्छी से अच्छी तरह त्योहार मनाने की कोशिश करते हैं। हालांकि किसी भी त्योहार में हर एक की भावना होनी चाहिए कि हर दूसरा आदमी भी अच्छी तरह त्योहार का आनन्द लूटे तब शायद पुलिस या प्रशासन की आवश्यकता नहीं रह जाती है। 

     (साभार समरलोक) 

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रागरंग (तीज-त्योहार) 


शैल अग्रवाल

फाग (होली)

 

वर्ष भर प्रकृति मंच तैयार करती है तब कहीं जाकर वसंत ऋतु अपने ही मोहक और अनूठे अंदाज में आ पाती है। प्रकृति और पुरुष, दोनों ही को पूरी तरह से लुभाती- रिझाती। ठंडी सिहरती हवा और गुलाबी गुनगुनी धूप। खेतों पर दूर तक फैली पीली सरसों की चादर और खिले-अधखिले रंग-बिरंगे फूलों से लंदी फंदी डालियां और.क्यारियां, वह भी साफ-सुथरे, चमकते नीले आकाश के नीचे...पूरी ही पृथ्वी एक आकर्षक तस्बीर सी सज उठती है...कुशल नृत्यांगना सी थिरकती और लरजती।...नाजुक कोपलें मन्द-मन्द हवा पर झूमती, मानो अपने ही रूप-रंग पर शरमा-शरमाकर इतरा रही हों। सिहरती पत्तियां और चटकती कलियां... सुर और लय के साथ ताल में थिरकती। धरती जाने कैसे दिव्य घुँघरू बांध चुकी होती है कि दादुर मोर पपीहे सभी वाहवाह कर उठते हैं। नन्हे नवजात पक्षियों का कलरव, एक नया उत्साह, नया संगीत देता हुआ सुरभित हवाओं में गूंजने लग जाता है। ताजा हवा के ये झोंके जब खुशबूओं के मस्त कलीन पर सवार हो कर बगल से गुजरते हैं तो उदास से उदास मन पंक्षियों की तरह खुले आकाश में विचरने लग जाता है,  लाचार और कमजोर पंख तक अपनी ताकत तौलने लग जाते हैं। शायद इसीलिए तो बसंत ऋतु को ऋतुराज कहा जाता है...सृजन और उल्लास की ऋतु माना जाता है। महकती-लहकती इस ऋतु को प्राचीन काल से ही भारत में एक उत्सव नहीं, महोत्सव की तरह मनाया जाता है। गीत-संगीत और भरपूर राग-रंग के साथ। भारत ही नहीं विश्व के कई विभिन्न भागों में भी थोड़े बहुत फर्क के साथ इस ऋतु का उत्सव मनाया जाता है। बड़ी सख्या में एकत्रित होकर लोग एक दूसरे को रंगों और खुशबुओं में भिंगोते-डुबोते हैं और आनन्द मनाते हैं। फ्रान्स, इटली आदि के साथ यूरोप और दक्षिणी अमेरिका के कुछ देशों में 'मार्डीग्रास' नामका एक उत्सव मनाया जाता है, जिसमें युवक, युवती कई-कई टन टमाटरों से एक दूसरे को रंग देते हैं और हंसी खुशी के माहौल में तरह तरह की झांकियों और नाच-गाने के साथ कार्निवाल के रूप में पूरा दिन गुजार दिया जाता हैं।    

हमारे प्राचीन ग्रन्थों में भी कई-कई नाम मिलते हैं इस पर्व के; होलाका, फागुनोत्सव, चैत्रोत्सव, फागु मधुत्सव, कामोत्सव, मदनोत्सव, काममहोत्सव, सिरापंचमी, यात्रामहोत्सव, मदनद्वादशी, मदनत्रयोदशी, अनंगोत्सव आदि। यदि हम इन नामों पर गौर करें तो पता चल जाएगा कि इस उत्सव की रूपरेखा क्या थी और भारत के विभिन्न भागों में आज भी है।

 

माघ की शुक्ल पंचमी (वसंत पंचमी) से आरंभ यह उत्सव अब भी कई-कई जगह होली तक मनाया जाता है। उत्तर भारत में आजभी बसंत पंचमी के दिन से ही होली आरंभ हो जाती है। सुबह सरस्वती पूजन और शाम को गुलाल उड़ाकर इसी दिन से होली की शुरुआत आज भी कई जगह एक प्रचलित प्रथा है और वह भी रात को मिलबैठकर होली और धमार गाते हुए लोगबाग एकदूसरे को गुलाल लगाते हैं। होली का नाम लेते ही ब्रज की होली सबसे पहले ध्यान में आती है जो भारत में ही नहीं पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यूँ तो राजस्थान में हाथियों की पीठपर बैठकर खेली गयी होली भी प्रसिद्ध हो चुकी है और बड़ी संख्या में विदेशी सैलानी इसे देखने और हिस्सा लेने आते हैं। परन्तु ब्रज ,जो 'कान्हा बरसाने में आई जइयो बुलाए गई राधा प्यारी’ ‘फाग खेलन आए हैं नटवर नंद किशोर’ और ‘उड़त गुलाल लाल भए बदरा’ जैसे गीतों की मस्ती से झूम उठता है, में आज भी यही कहा जाता है कि- सब जग होरी, जा बृज होरा।



 

ब्रज की लठ्ठमार होली ही नहीं, कोमल फूलों से राधाकृष्ण का नयनाभिराम श्रंगार भी दर्शनीय है जिससे ब्रज के हर मन्दिर का कोना-कोना सज और महक उठता है।  मन्दिरों में एक से एक सुन्दर फूलों के श्रंगार होते  हैं और होली के गीत-संगीत के साथसाथ कई जगहों पर फूल डोल के मेले भी लगाए जाते हैं। यहाँ आज भी रंगों के साथ साथ मुख्यतः फूलों से ही होली खेलने का रिवाज है, जिसमें टेसू और गुलाब के साथसाथ, केतकी, चम्पा, बेला और चमेली  का प्रयोग  अधिक किया जाता   है। फूल...जिनकी महक मन को और रंग त्वचा को निखारने और कोमल करने में मदद करते हैं। इस दौरान ब्रज में होली और रसिया जैसे मीठी छेड़छाड़ वाले गानों की ही नहीं, धुलंडी से लेकर कृष्ण दशमी तक जगह जगह चरकुला नृत्य, ङुक्का नृत्य, बेब नृत्य, तख्त नृत्य, चोचर नृत्य एवं झूला आदि मनोहारी नृत्य भी देखे जा सकते हैं।...   ब्रज की बरसाने और दाऊ जी की होली देखने आजभी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं और मन्दिर के परिसर के कोने कोने से गूंजती आवाज में उनकी भी  मस्ती में डूबी आवाज गूंजने लग जाती  हैं ---' आज बिरज में होरी है रसिया/ होरी है रसिया, बरजोरी है रसिया।' 

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    चाँद परियाँ और तितली 



  


हलवा
     -रचना श्रीवास्तव


एक छोटी सी लड़की  थी उसका नाम था अन्विक्षा। बहुत प्यारी थी वो, पर थोडी नटखट भी थी।
खेलने  मे उस को बहुत मजा आता था। कल्पना की दुनिया मे रहती थी। माँ पापा की दुलारी थी।

पर उस मे एक कमी भी थी, उस को टालने की आदत थी । जब भी माँ कोई काम कहती तो बोलती अभी करती हूँ पर उसका अभी कभी नही आता। माँ उस को जब समझती तो कहती ""माँ कल कर लूँगी"".और भाग जाती खेलने ।
उसके स्कूल मे इम्तिहान आने वाले थे माँ कहती अन्विक्षा पढ़लो तो वह रटा-रटाया जवाब देती, कल पढ़ लूंगी । "अरे बेटा इम्तिहान सर पे हैं। तुम टालो मत। कितना सारा पढ़ना है, चलो पढो। "

पर अन्वी को कंहा कब  सुनना होता था।   
एक दिन माँ ने कहा अन्विक्षा "जानती हो तुम्हारी नानी क्या कहती थी ?"

अन्विक्षा बोली ""क्या?"

माँ ने कहा "कहती थी, काल करे सो आज कर ,आज करे सो अब। पल मे परलय होएगी, बहुरि करेगा कब?"
पर अन्विक्षा को कहाँ सुनना होता था उस के पास तो हर बात का जवाब होता था बोली ""माँ नानी को मालूम नही इसको ऐसे कहते हैं आज करे सो काल कर, काल करे सो परसों। जल्दी जल्दी क्यों करता है, अभी तो जीना बरसों। "

माँ बेचारी कुछ कह नही पाती। बहुत दुखी होती। सोचती क्या करूं इस लडकी का !

अन्विक्षा को हलवा बहुत पसंद था। एक दिन जब वो खेल के आई तो माँ से बोली "माँ आज हलवा बना दो न।"

माँ कुछ काम कर रही थी "बोली बेटा आज तो बहुत काम है कल बना दूंगी।"
अन्विक्षा ने कहा ""ठीक है।"कह के कमरे मे चली गई ।
दुसरे दिन अन्विक्षा ने  कहा "माँ तुम ने कहा था आज बना दोगी, बना दो न। "

माँ ने फ़िर कहा "ओहो बेटा मैं तो भूल गई। आज मुझे बाजार जाना है। कल बना दूंगी।"
इसी तरह से अन्विक्षा रोज़ हलवा बनने को बोलती, माँ कोई न कोई बहाना बना के टाल देती। इस तरह ७ दिन बीत गए। आठवीं रोज जब अन्विक्षा सो के उठी तो देखा की मेज पे ८ प्लेट हलवा रखा है । अन्विक्षा की खुशी का तो ठिकाना नही था, वो फटाफट ब्रश कर के खाने बैठी।
उसने पहली प्लेट और दूसरी प्लेट बहुत मन से खाई। तीसरी भी खा ली । चौथी थोडी  मुश्किल से खाई, फ़िर पांचवी तो खा नही पाई। माँ से बोली माँ अब नही खाया जाता ।

माँ ने कहा "अरे बेटा थोड़ा और खालो तुम को तो बहुत पसंद है।"

"नही माँ अब नही खा सकती " अन्विक्षा बोली।
"अन्विक्षा देखो तुम को ये हलवा कितना पसंद है पर तुम ज्यादा नहीं खा सकती। यदि यही हलवा एक प्लेट रोज मिलता तो तुम आराम से खा लेतीं, क्यों है न ?इसी तरह से पढ़ाई भी है तुम एक साथ ज्यादा नही पढ़ सकती। जब 8 दिन् का हलवा तुम एक दिन मे नही खा सकतीं, तो 8 दिन् की पढ़ाई कैसे एक दिन मे कर पाओगी । इसीलिए रोज का काम रोज करना चाहिए, टालना नही चाहिए।"
अन्विक्षा को बात समझ मे आ गई।  इस दिन के बाद से अन्विक्षा ने कभी भी बात को टाला नही।  रोज का काम रोज करती थी । अब वो सभी की प्यारी बन गई और  माँ बहुत खुश थी।

*
बच्चों आप समझ ही गए होगे,इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है की रोज का काम रोज करना चाहिए, कल पर टालना नही चाहिए।
 

कविता की जगह इसबार हम आपके लिए दो पहेलियां लेकर आए हैं। सही जवाब वाले बच्चों का नाम चांद परियां और तितली के अगले अंक में दिया जाएगा। फिर देर किस बात की बूझिए और फटाफट लिख भेजिए, और अगर हल समझ में न आए तो अगले महीने तक उत्तर का इन्तजार कीजिए।

 

पहेली- 1.



अन्दर-बाहर सोते जगते 

हरदम ही यह अपने साथ

ऊबें हंसे चाहें ना चाहें

बिन इसके तो सभी

हो जाते हैं बेकार।।

 

 

*

 

 

पहेली-2.

 



जल में से ही पैदा हुई

जलहि देखि मर जाए,

आओ पंच इसे फूंक दें

उमर बड़ी हो जाए।।