कई शब्द अप्रासंगिक नहीं होते कभी जैसे हवा, पानी, धूप, ..... जीवन, अस्तित्व ....... ....... ....... ....... ....... सूची लंबी हो सकती है चाहो तो बहुत छोटी भी मात्र एक शब्द तक सिमट सकती है ये सूची ओर वो एक शब्द है 'गाँधी` यदि गाँधी है तो हवा, पानी, धूप, ..... जीवन, अस्तित्व, ..... तथा और भी कई जरूरी शब्द बचे हुए ही हैं 'गाँधी` कभी न चुकने वाला शब्द है ये तभी तो समाप्त नहीं हुई है प्रासंगिकता इसकी अभी होगी भी नहीं उपजता है अनायास ये शब्द लेखकों की रचनाओं में कल्पनाओं में कवियों की बार-बार उभरता है कभी शिल्पियों की कलाओं में जब कोई किसी कमजोर की ओर डालता है दृष्टि तो यही एक शब्द बन जाता है ढाल अन्याय का करता है प्रतिकार यही एक शब्द निर्मित करता है करुणा और संवेदना की सृष्टि दम घुटने लगता है जब सभ्यता के धुएँ में मनुष्य का विकास के दुष्चक्र में फंसकर तड़पने लगता है जब वो तो इसी एक शब्द को निहारना अनिवार्य हो जाता है ये अलग बात है कि इस शब्द का लेकर नाम कुछ लोग छीन रहे हैं दूसरों का हक़ लेकिन ये शब्द है तो वापस दिला सकता है छीना हुआ हक़ भी तुम्हें मृतात्माओं को पुनरुज्जीवित कर सकता है ये ढाई आखर का शब्द हाँ, ढाई आखर का ये शब्द ''ढाई आखर प्रेम का`` की तरह दूसरों के सुख के लिए अपने सुखों को तिलांजलि देने को कर देता है विवश हार कर बैठ गए हो तो पुकार लो इसी शब्द को सहारा मिलेगा प्रेरणा देता है ये शब्द रास्ता भटक गए हो तो मार्गदर्शन करेगा ये शब्द कमजोर नहीं है ये शब्द न था और न होगा बस इतना याद रख लेना !
-सीताराम गुप्ता
गाँधीजी के बन्दर तीन
गाँधीजी के बन्दर तीन, सीख हमें देते अनमोल।
बुरा दिखे तो दो मत ध्यान, बुरी बात पर दो मत कान, कभी न बोलो कड़वे बोल।
याद रखोगे यदि यह बात , कभी नहीं खाओगे मात, कभी न होगे डाँवाडोल ।
गाँधीजी के बन्दर तीन, सीख हमें देते अनमोल।
-बालस्वरूप राही
बापू
पुतली बाई का मान करमचंद की संतान मोहनदास नाम जिसका वह बेटा बना महान ।
अहिंसा थी तलवार सत्य उसकी धार दुश्मन को भी गले लगा करते सबको प्यार ।
काम अपना खुद करते नही किसी से थे डरते मीलों -मीलों तक वह लगातार पैदल चलते ।
इंसानों में भेद मिटाया गोरा- काला एक बताया अछूतों को हरि-जन बता उनको अपने गले लगाया ।
'सत्याग्रह' बना आधार 'सविनय अवज्ञा' एक विचार 'दांडी यात्रा', 'भारत छोड़ो' इनसे हिली ब्रिटिश सरकार ।
'महात्मा' कहा टैगोर ने 'राष्ट्रपिता' बुलाया बोस ने बस गए हृदय वह सबके 'बापू' पुकारा जन जन ने ।
कवि कुलवंत सिंह
साबरमती के सन्त
दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल आँधी में भी जलती रही गाँधी तेरी मशाल साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
धरती पे लड़ी तूने अजब ढंग की लड़ाई दागी न कहीं तोप न बंदूक चलाई दुश्मन के किले पर भी न की तूने चढ़ाई वाह रे फ़कीर खूब करामात दिखाई चुटकी में दुश्मनों को दिया देश से निकाल साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
शतरंज बिछा कर यहाँ बैठा था ज़माना लगता था मुश्किल है फ़िरंगी को हराना टक्कर थी बड़े ज़ोर की दुश्मन भी था ताना पर तू भी था बापू बड़ा उस्ताद पुराना मारा वो कस के दांव के उलटी सभी की चाल साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
जब जब तेरा बिगुल बजा जवान चल पड़े मज़दूर चल पड़े थे और किसान चल पड़े हिंदू और मुसलमान, सिख पठान चल पड़े कदमों में तेरी कोटि कोटि प्राण चल पड़े फूलों की सेज छोड़ के दौड़े जवाहरलाल साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
मन में थी अहिंसा की लगन तन पे लंगोटी लाखों में घूमता था लिये सत्य की सोटी वैसे तो देखने में थी हस्ती तेरी छोटी लेकिन तुझे झुकती थी हिमालय की भी चोटी दुनिया में भी बापू तू था इन्सान बेमिसाल साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
जग में जिया है कोई तो बापू तू ही जिया तूने वतन की राह में सब कुछ लुटा दिया माँगा न कोई तख्त न कोई ताज भी लिया अमृत दिया तो ठीक मगर खुद ज़हर पिया जिस दिन तेरी चिता जली, रोया था महाकाल साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल!
- प्रदीप
तुम कागज पर लिखते हो
तुम काग़ज़ पर लिखते हो वह सड़क झाड़ता है तुम व्यापारी वह धरती में बीज गाड़ता है ।
एक आदमी घड़ी बनाता एक बनाता चप्पल इसीलिए यह बड़ा और वह छोटा इसमें क्या बल ।
सूत कातते थे गाँधी जी कपड़ा बुनते थे , और कपास जुलाहों के जैसा ही धुनते थे
चुनते थे अनाज के कंकर चक्की पीसते थे आश्रम के अनाज याने आश्रम में पिसते थे
जिल्द बाँध लेना पुस्तक की उनको आता था भंगी-काम सफाई से नित करना भाता था ।
ऐसे थे गाँधी जी ऐसा था उनका आश्रम गाँधी जी के लेखे पूजा के समान था श्रम ।
एक बार उत्साह-ग्रस्त कोई वकील साहब जब पहुँचे मिलने बापूजी पीस रहे थे तब ।
बापूजी ने कहा - बैठिये पीसेंगे मिलकर जब वे झिझके गाँधीजी ने कहा और खिलकर सेवा का हर काम हमारा ईश्वर है भाई बैठ गये वे दबसट में
पर अक्ल नहीं आई ।
- भवानी प्रसाद मिश्र
अच्छा ही हुआ
गुज़र गई एक और पुण्यतिथि अच्छा ही हुआ कानों में नहीं पड़ी रामधुन एक बार भी बापू के प्रिय भजन सुनाई नहीं पड़े रेडियो पर टीवी पर वैष्णव जन ... गाता नहीं दिखलाई पड़ा कोई अच्छा ही हुआ कितनी शान्ति से गुजर गया आज का दिन रोज़-रोज़ अब तो वर्ना सुननी पड़ती है रामधुन हर सभा में गूँजता है वैष्णव जन ... हर छोटे-बड़े चोर, डाकू, अत्याचारी, हत्यारे, बलात्कारी की भी मनाई जाती है पुण्यतिथि और होती है एक विशाल सर्वधर्म प्रार्थना सभा अच्छा ही हुआ गुज़र गई एक और पुण्यतिथि नीरव नि:शब्द!
-सीताराम गुप्ता
सुना है...
सुना है कहते कुछ लोगों को गाँधी की बकरी खाती थी मेवे पत्तियाँ नहीं दी जाती थीं खाने को उसे खाती होगी ज़रूर वो बकरी काजू-किशमिश, बादाम-चिलगोज़े यदि खाती होंगी सभी बकरियाँ और गाय-भैंसें देश की सेब संतरे, अंगूर और चेरी उस समय, आज की बात अलग है आज मौजूद हैं ऐसे गधे और घोड़े भी जिन्हें मयस्सर है मुनक्का और शैंपेन और इसके लिए ज़रूरत नहीं है उन्हें देने की दूध बनने की किसी की बकरी काम चल जाता है उनका हिलाने से सिर्फ पूँछ शायद इन्हीं की फैलाई हुई है ये बात कि बकरी गाँधी की खाती थी मेवे पर क्या खाता था गाँधी खुद? वही ना जो खाता था एक गऱीब किसान हिंदू या मुसलमान मिट्टी में सना कुम्हार एक मोची बुनकर या लुहार उन्हीं जैसा उन्हीं के साथ हाँ! और भी बहुत कुछ खाया था गाँधी ने पर सिर्फ अकेले नहीं खाने दीं लाखों करोड़ों को गोलियाँ उसने झेलीं सिर्फ अपने सीने पर अकेले और सबके बीच
-सीताराम गुप्ता
मैं गांधी बन जाऊँ
मां खादी की चादर दे दे, मैं गांधी बन जाऊं सब मित्रों के बीच बैठ कर रघुपति राघव गांऊ
घड़ी कमर में लटकाऊंगा सैर सवेरे कर आऊं मुझे रुई की पोनी दे दे तकली खूब चलाऊं
मां खादी की चादर दे दे, मैं गांधी बन जाऊं
( कवि अज्ञात)
जीवित हैं बापू...
अर्थहीन सामूहिक सभाएं
वाग्जाल बिंधी ये चहचहाटें
कैसे याद करें, मान रखें
मना जयंती बिठा पुतले
पार्क और दफ्तरो मे?
मूक दृष्टा हैं ये पुतले विगत
इतिहास और वर्तमान के
सिरपर बैठकर जिनके
कबूतर, चिड़िया
करते जाते हैं बीट !
खड़े रह जाते ये पाषाण
गर्मी-जाड़ा धूप बरसात
अत्याचार, अन्याय
सब सहते - देखते
विक्टोरया और हिटलर...।
पर बापू पुतले नहीं ...
बुलंद हैं उनके कर्म, आवाज
अत्याचार और अन्याय के खिलाफ
उठी उनकी सत्य-अहिंसा की लाठी
आज भी है हमारे साथ।
सूरज-सा जो उजियारा दे
शीष लगाकर संग ले चलो
छोड़ो ना, खोओ ना उसे
मदभरे...अशांत पुतलों के
इस जंगल में।
मौन भी था ललकार सत्य की
बिगुल थे संकल्प, आत्मबल के
सशरीर नहीं तो क्या
जीवित हैं बापू कोटि-कोटि रूप लिए
आज भी इस मिट्टी में।...
- शैल अग्रवाल
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बापू तुम जागो एक बार
शिलाओं की ओट में छिपकर ,
मृत्यु के संकोच में रहकर,
तुम कब तलक सोते रहोगे,
इस जग के जलन को सहोगे,
देखो सब रहे तुम्हें पुकार।
बापू तुम जागो एकबार...
आज सामने है सत्य खड़ा,
कहता है उसे आना पड़ा,
घृणा की आंच सह चुका है,
इस भट्टी में झुलस चुका है,
उसे चाहिए एक आधार।
बापू तुम जागो एकबार...
जीने पर सबका अधिकार,
कह रहा अहिंसा बारबार।
प्राणों के लाले पड़ते हैं,
हिंसा की ज्वाला में जलते हैं,
शायद सको इन्हें सुधार।
बापू तुम जागो एकबार...
दिलों में भरकर तो आत्मबल,
बने थे तुम सबों के संबल।
बदल दी युद्ध की परिभाषा,
समझा सबको मन की भाषा
सत्य करे आग्रह इस प्रकार।
बापू तुम जागो एकबार...
समाज कितना है गया बिखर,
भय का राज्य है गया संवर,
सब स्वार्थ लिए चलते हैं,
अपनी आग में जलते हैं,
तुम दे सहयोग दो संवार।
बापू तुम जागो एकबार...
प्रभुता का सबको ध्यान यहाँ,
मानवता की पहचान कहाँ ?
गोली बारूद के इस वन में,
खोया न्याय तो उलझन में,
तुम ही सकते इन्हें उबार।-
बापू तुम जागो एकबार...
-रामाश्रय सिंह
है किसकी तस्बीर
सोचो और बताओ आखिर है किसकी तस्बीर नंगा बदन कमर पर धोती और हाथ में लाठी बूढ़ी आंख पर है ऐनक कसी हुई कद काठी लटक रही है बीच कमर पर घड़ी बंधी जंजीर सोचो और बताओ आखिर है किसकी तस्बीर
उनको चलता हुआ देखकर आंधी शरमाती थी उन्हें देखकर अंग्रेजों की नानी मर जाती थी उनकी बात हुआ करती थी पत्थर खुदी लकीर सोचो और बताओ आखिर है किसकी तस्बीर
वह आश्रम में बैठ चलाता था पहरों तकली दीनों और गरीबों का था वह शुभ चिंतक असली मन का था वह बादशाह पर पहुँचा हुआ फकीर सोचो और बताओ आखिर है किसकी तस्बीर
सत्य अहिंसा के पालन में पूरी उमर बिताई सत्याग्रह कर करके जिसने आजादी दिलवाई सत्य बोलता रहा जनम भर ऐसा था वह वीर सोचो और बताओ आखिर है किसकी तस्बीर
जो अपनी ही प्रिय बकरी का दूध पिया करता था लाठी डंडे बंदूकों से जो न कभी डरता था तीस जनवरी के दिन जिसने अपना तजा शरीर सोचो और बताओ आखिर है किसकी तस्बीर
डॉ. जगदीश व्योम
बापू,
मैं कोई चित्रकार नहीं हूँ नहीं तो क्रॉस पर लटकाता तेरी ही लहूलुहान तस्वीर मैं कोई शायर या कवि भी नहीं हूँ नहीं तो गाता एक करुणार्द्र शोकगीत नहीं हूँ मैं एक क्षुद्र-सा मूर्तिकार भी नहीं तो अवश्य ही बनाता तेरी एक प्रस्तर प्रतिमा और करता उसे प्रतिष्ठित पूजा-प्रकोष्ठ में अपने काश! पूजा-अर्चना के निमित्त सुपारी पर कलेवा लपेट कर बनाई गई विघ्न विनायक प्रतिमा की भाँति बना पाता तेरा एक प्रतीकात्मक विग्रह ही न होता मैं एक महान कलाकार एक अज़ीम शायर एक जादूगर बुततराश तो भी होता मैं थोड़ा-सा बड़ा थोड़ा महान एक इंसान