कहानी समकालीनः घुसपैठ-हंसा दीप

घर में हर तरह का ऐशो आराम था, छोटा-सा परिवार, सुखी परिवार। सुख के इन दो अक्षरों में बहुत कुछ छुपा था। वह सब कुछ जो कभी किसी को संतुष्ट नहीं कर पाता। इतना लालची है यह शब्द कि बस मुँह फैलाए खड़ा रहता है सामने, और, और की रट लगाए। बेचारा आदमी लगा रहता है इस ‘और’ के हर ‘और’ को पूरा करने में। ‘और’ की कोई सीमा नहीं होती बस एक के बाद एक आते ही रहते हैं मानों एक दूसरे का अनुसरण कर रहे हों। यह अनवरत सिलसिला कभी रुकता नहीं।
सुखी परिवार दिख सकता है, पर सुखी है या नहीं, एक प्रश्नवाचक चिन्ह हमेशा लगा रहता है। उस परिवार में भी यही हो रहा था। पति, पत्नी और वो तीन प्राणी थे। एक माँ, एक बेटी और एक दामाद। दामाद के लिये अपनी सास ‘वो’ थी, और सास के लिये दामाद ‘वो’ था। बिटिया रेने उन दोनों के ‘वो’ के चक्कर में कभी इधर तो कभी उधर शटल कॉक बनी रहती।
कहने-करने को तो बहुत कुछ था घर में, पर जो नहीं था, वह बस नहीं था। ऐसा ही कुछ था रुबिन, रेने और मार्शलीन के बीच। तीनों अलग-अलग व्यक्तित्व के धनी। एक साथ एक घर में टकराते रहते एक दूसरे से। मार्शलीन की बेटी रेने और दामाद रुबिन। तीन खाने वाले और तीन कमाने वाले। पैसा तीन ओर से आता तो खुशियाँ भी तीन ओर से आ सकती थीं। लेकिन तीन ओर से आती थी चिड़चिड़ाहट, एक-दूसरे की नुक्ताचीनी। राई जैसी छोटी-छोटी बातें देखते ही देखते पहाड़ में बदल जातीं और उससे टकराता रहता तीनों का अहं। तीन मजबूत व्यक्तित्वों की टकराहट में घर की चहारदीवारी की शांति चकनाचूर हो जाती।
कौन, किस समय, क्या करता, वह अधिक महत्व नहीं रखता था। महत्व तो रखता यह कि कौन कितना ‘और’ करता है। दामाद रुबिन को उसकी सास ‘पैकेज डील’ में मिली थी। जहाँ एक के साथ दूसरा मुफ्त में मिलना तय था। लेना चाहे, या न चाहे, लेने वाले के पास चयन का कोई अधिकार था ही नहीं। शादी की पहली और आखिरी शर्त यही थी क्योंकि इकलौती बेटी रेने के अलावा मार्शलीन का इस दुनिया में कोई नहीं था।
उस समय तो प्यार की सुगबुगाहट ही कुछ ऐसी थी कि सब कुछ मंजूर था रुबिन को, आकाश के तारे तोड़ना भी। फिर यह तो एक बहुत ही छोटी सी बात थी उन पलों में। बहुत अच्छा लगा था कि घर पर कोई होगा जो हरदम घर का, रेने का ध्यान रखेगा। शुरुआती दिनों के बाद, कहीं न कहीं रेने और मार्शलीन की जुगलबंदी रुबिन को खलने लगी थी। उसे लगता था कि वह पिस कर रह गया है इन दोनों पाटों के बीच। मार्शलीन मनवा ही लेती थी अपना कहा। बड़ी होने का वह बड़प्पन छोटों के आड़े आ जाता। रेने को माँ की बात मानने की आदत सालों से थी। कुछ नया नहीं था उसके लिये। दिक्कत तो रुबिन के लिये थी वह तो इस परंपरा में अभी-अभी शामिल हुआ था। उसके लिये हाँ में हाँ मिलाना आवश्यक-सा था।
‘हाँ जी’, और ‘जी हाँ’ में सिर हिलाना कुछ दिनों तक अच्छा लगा था, धीरे-धीरे सिर को हिलने में समय लगने लगा। कई बार तो हिलता भी नहीं। माँ की नहीं सुनी तो बेटी आकर दबाव बनाती, तब असहाय-सा महसूस करता रुबिन। ऐसा लगता था कि जैसे उसको एक घोड़ा बना दिया गया हो जिसकी लगाम माँ-बेटी खींचती रहती थीं, समय-समय पर। हिनहिनाता घोड़ा धीरे-धीरे बगावत करने लगा। खेल शुरू तो हो चुका था पर तब से बिगड़ने लगा जब एक दिन कुछ पसंद का बना किचन में, वह और खाना चाहता था। कड़कती आवाज से रोक दिया गया – “बस करो, अपनी ओर देखो।”
उसने अपनी ओर देखा, यानि उसके ‘खाते-पीते घर’ वाली सेहत का मजाक था। चुभा तो सही पर रेने को कुछ इस तरह देखा उसने मानो कह रहा हो कि – “कम से कम मेरी खाने की आजादी तो न छीनी जाए।”
रेने बोली तो सही मगर एकदम विपरीत – “हाँ बिल्कुल, कितना भी अच्छा बना हो खाना, आदमी को अपना पेट देखना चाहिए।”
“लेकिन मैं इतना मोटा नहीं कि मेरा खाना बंद कर दिया जाए।”
“कैसी बात करते हो रुबिन, बंद कौन कर रहा है तुम्हारा खाना, पर देख कर खाओ, अभी नहीं ध्यान दोगे तो हो जाओगे मोटे।”
उसे अच्छा नहीं लगा यूँ खाने पर टोक देना। और कहीं टोका जाना तो वह जैसे-तैसे निबाह रहा था पर खाने पर इस तरह रोक देना उसे अपना अपमान लगा। अपने घर में, अपने खाने की मेज पर खाने पर पाबंदी थी। जिस घर में मन से पसंद का खाना न खा पाए इंसान वह भला घर कैसे हुआ। अपने जीवन में अगर कुछ अच्छा चाहता था तो वह था स्वादिष्ट खाना। फिर चाहे उससे कितना ही काम क्यों न करवा लिया जाए।
हालांकि उस समय तो बगैर खाए, बगैर कुछ कहे उठ गया था वह। मार्शलीन और रेने दोनों को अहसास तो हो गया था कि इस तरह रुबिन का उठना सामान्य उठना नहीं है। इसमें गुस्सा है, गुस्से के साथ और भी बहुत कुछ है। मार्शलीन को रेने का सपोर्ट मिला था, वह खुश थी कि बेटी समझती है उसकी बात को। रेने को कुछ खटका तो था कि यह अच्छा नहीं हुआ पर उपेक्षा कर दी कि मना लेगी उसे। शिकायतों का पुलिंदा लिए तो वह भी घूम ही रही थी।
एक कुरसी भी नहीं खिसकाता।
कभी एक गिलास तक उठाकर यहाँ से वहाँ नहीं रखता।
वह भी काम करके आती है पर घर आकर भी क्या-क्या नहीं करती।
माँ भी काम से लौटकर किचन सम्हालती है।
एक रुबिन ही है जो आकर सोफे पर पसर जाता है, खर्राटे भरने के लिये। अपनी व माँ की व्यस्तता देखकर रेने को कभी नहीं लगा कि रुबिन को बुरा लगेगा या वह चोट खाया महसूस करेगा। हालांकि यह बात और थी कि रुबिन बाहर स्नो साफ करके आता वह किसी को दिखाई नहीं देता पर उसका चाय का कप जो चाय पीने के बाद वहाँ रह जाता तो उस पर बवाल मच जाता। गर्म दोपहर में घास काटकर आता वह भी नहीं दिखता किसी को पर मशीन बाहर छोड़ आता तो कोर्ट में पेशी हो जाती। शनि-रवि के दिन गराज में घंटों खड़े होकर गाड़ियों की मरम्मत करता वह भी दिखाई नहीं देता पर किसी दिन गाड़ी में पेट्रोल खत्म हो जाता तो जुमला उछल कर आता – “कम से कम इतना तो कर दिया करो।”
यह नहीं करता, वह नहीं करता, आँखों के काले चश्मे वही देखते जो देखना चाहते। यों किश्त दर किश्त गुस्सा जमा होता रहा। मार्शलीन को तो शुरू से कुछ न कुछ गलत ही दिखता था दामाद में, अब रुबिन को भी सब कुछ गलत दिखने लगा, रेने की माँ में और रेने में भी। दोनों के इस टकराव में रेने कभी रुबिन का पक्ष नहीं ले पाती। उसके लिये तो अपनी माँ सदा से सही थीं और रहेंगी।
दामाद और सास ने कमर कस ली थी एक दूसरे के खिलाफ। इस खींचतान के चलते पति-पत्नी के बीच अनमनापन आना ही था। एक खिंचाव उधर भी आने लगा। रिश्तों की कसती लगाम अधिक कसती गयी तो घुटन होना स्वाभाविक था। ऐसी घुटन कि बस दम लेकर साँस ली जाती। दिन में दस बार हिसाब लगता – मैंने यह किया, मैंने वह किया। इस एकाउंटिंग में रुबिन का कॉलम खाली ही रहता। रुबिन के पास बस एक ही सीधा सा हिसाब था उसके अपने खाते में कि वह काम से लौटा है, बारह घंटों की ड्यूटी करके। जो उन दोनों महिलाओं के लिये कुछ भी नहीं था। काम तो वे दोनों भी करती थीं। पर घर आकर फिर से घर के काम में जुट जाती थीं। खाना पकाना, सफाई करना, रास्ते से आते हुए दूध उठाना, सब कुछ। उन दोनों में से किसी को भी इस बात का अहसास नहीं था कि उनके काम में और रुबिन के काम में तनख्वाह का अंतर भले न हो पर काम के श्रम का अंतर था। रुबिन का शारीरिक रूप से थका देने वाला काम ऐसा था कि वह आते से ही खा-पीकर सोना चाहता था जो मार्शलीन को फूटी आँखों नहीं सुहाता था।
बैठक में सोफे से उठते उसके खर्राटे कानों में गूँज-गूँज कर तिलमिलाहट का गुबार इकट्ठा करते रहते। वह भरा गुबार का गुब्बारा फट पड़ता जब वह खाना खाने बैठता। एक दिन, दो दिन फिर तो रोज ही यह बगैर रुके चलने लगा। रुबिन को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं थी कि खाने के बीच कोई उससे दस सवाल करे, बीस रोक-टोक लगाए। वह मौन रहकर खाना खाने का आदी था। जब उन्हें खाते हुए, टोकते हुए देखता तो मन खराब होता। उनके मुँह के अंदर का अधचबा खाना दिखाई देता लार के साथ। उसे घिन-सी आती, इसीलिये न देखता, न बोलता, बस नीचा मुँह करके अपना खाना खाता।
यह तिरस्कार हो जाता, माँ के लिये बेटी का, और बेटी के लिये माँ का।
तब रुबिन को वे सारे पल याद आते जब उसके काम को सराहना तो दूर, बुरी तरह से दुत्कारा गया था। फिर चाहे वह किसी बिल का पेमेंट करना हो या फिर कोई चीज़ खरीदनी हो। वह चीज़ कोई महंगी चीज़ नहीं होती, छोटी-सी चीज़ होती जैसे उसके खरीदे गए केलों का कच्चापन या पक्कापन होता, नींबुओं में रस की कमी होती और उसके द्वारा की गयी साफ टेबल को फिर से साफ किया जाता।
इन सड़ी-सड़ी मगर बढ़ी-चढ़ी बातों से इतने प्यारे रिश्तों पर जो धब्बे लगते वे शायद छूटने के लिये नहीं लगते, परत दर परत जमते उन धब्बों को अमिट कर देते। फिर उन धब्बों की वजह से रिश्ते का असली चेहरा इस कदर धूमिल होता जाता कि एक दिन अस्तित्व खतरे में पड़ जाता। यही हुआ, तीनों खोजते रहते अपने आत्मीय रिश्तों के बीच का असली चेहरा जो दिखाई नहीं देता। तब घर, घर नहीं रहता। साजिशों और नफरतों का अड्डा बन जाता। तब अपने लिये अलग ठिकाना ढूँढना ही एकमात्र उपाय बचता।
यूँ सुख में ही सुख की खोज करते वे रिश्ते, कभी नहीं खोज पाते अपने खोए हुए सुख को। चहारदीवारी से रूठा हुआ सुख चला जाता अपना एक अदद ठिकाना ढूँढने। अपने भीतर छुपा सुख खोज नहीं पाने का गम सदा के लिये हावी हो जाता। कभी किसी ने सोचा नहीं कि आखिर वजह क्या है घर में इतना किच-किच करने की। क्या सचमुच रुबिन का खाना खाना इतना अखर रहा है। क्या सचमुच उसके द्वारा किए गए कामों में काम जैसा कोई काम कभी दिखाई नहीं देता। ऐसा नहीं हो सकता कि वे एक दूसरे में वह ढूँढे जो उन्हें दिखाई नहीं देता।
और एक दिन बस वह हुआ जो नहीं होना चाहिए था। रास्ते अलग हुए, घर के टुकड़े हुए। नेपथ्य वही था जो सालों से परिवारों में था, सिर्फ कथ्य भर बदला था, जरा-सा। परिणाम भी वही था जो सालों से था, बस अर्थ भर बदला था, जरा-सा। किसने, किसके घर को तोड़ा था, यह सोचने का समय नहीं था किसी के पास। सुख की खोज फिर से चालू हो गयी थी इधर रुबिन की, उधर रेने की। टूटने के निशान बने भी नहीं थे कि मिटने लगे। अपने-अपने जीवन की दखलंदाजी को बाहर निकाल कर फेंकते हुए अजीब सा सुख मिला था, अपने अहं की जीत का सुख। किसके जीवन में किसने घुसपैठ की थी यह एक अनुत्तरित प्रश्न था। ऐसा प्रश्न जिसका उत्तर सबको मालूम था सिवाय घुसपैठिए के।

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हंसा दीप
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Dr. Hansa Deep
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संक्षिप्त परिचय
यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में लेक्चरार के पद पर कार्यरत। तीन उपन्यास, तीन कहानी संग्रह प्रकाशित। कई प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का निरंतर प्रकाशन।

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