हास्य-व्यंग्यः पांच पांच सौ वाले लब्ध प्रतिष्ठित-अशोक गौतम

शहर के केवल चार पांच जाने माने पांच पांच सौ रुपए वाले प्रख्यात छपास नहीं, प्रख्यात बकास कवि थे। उन्हें बकास रोग के अतितिक्त और दूसरा कोई रोग न था । वैसे जब कविता के नाम पर कुछ भी बकने के पांच सौ मिल जाएं तो फ्री में माथापच्ची कर गति की कविता छपने क्यों भेजें? फ्री में भी किसीने न छापी तो? इसलिए वे कविता कहीं छपने भेजते ही नहीं थे।
उनका सिम्पल सा साहित्यिक फंडा था, उधर बकास कविता हवा में तो इधर पांच सौ क नोट पेट में। इसी लत के बुरी तरह शिकारियों को जहां भी पांच सौ रुपए वाली कोई भी कवि गोष्ठी दिखती, वे वहां पर बुलाए बिन बुलाए कविता के नाम पर सादर बकने पहुंच जाते। फिर वहां से कविता सुनाकर भले ही न उठते , पर पारिश्रमिक के पांच सौ लेकर ही उठते।
केवल उन चारों पांचों ने मिलकर कविता के संवर्धन एवं विकास लिए आल इंडिया मौलिक कविता संघ बनाया था ताकि वे कविता की पूरे मनोरोग से पेड सेवा कर सकें। उनमें से एक का काम होता मंच पर जैसे कैसे कब्जा करना। अगर वे ऐसा करने में असफल हो जाते तो उन्हें मुंह तक से दस्त होने लगते। वे छटपटाने लगते, घायल गिद्ध की तरह। दूसरे का काम होता पेड कवि गोष्ठी कराने वाले अधिकारी को गोष्ठी खत्म होने के बाद दारु शारु, मुर्गा शुर्गा खिलाने को फर्जी कवियों के नाम से पारिश्रमिक के भरे पांच पांच सौ का हिसाब रखना। तीसरा प्रेस का काम देखता था ताकि अपने ग्रुप वाले कवियों के सिवाय किसी तीसरे का नाम अखबार में न जाए। चौथा अपनी कविताओं को सुनने वालों का इंतजाम करता। पांचवां उनके साथ यदा कदा छोटा मोटा काम निपटा अंत में पारिश्रमिक वाला कवि हो जाता।
वैसे वे चारों पांचों एक साथ रहते पर पीठ पीछे एक दूसरे को नंगा करने का कोई भी छोटे से छोटा मौका हाथ से न जाने देते। पर जब किसी पांच सौ रुपए वाली कवि गोष्ठी में होते तो किसी छठे को अपने पास न फटकने देते।
अपनी कविता को पेड बनाने के के लिए वे ये करते कि ज्यों ही शहर में कवि गोष्ठी करवाने को कोई अकवि अधिकारी उनके सम्पर्क में आता, वे चारों पांचों चुपके से उसका स्वागत करते। उसके स्वागत पर हजार पंद्रह सौ निवेश करते तो अकवि सरकारी अधिकारी प्रसन्न! फिर उन्हें हर पेड कवि गोष्ठी में बुलाना उसकी मजबूरी हो जाता। जब वह वहां से कहीं और ट्रांसफर होता तो वे फिर चुपके से उसकी विदाई पार्टी आयोजित करते। उससे लिए का दशांश उस पर लगाते और और मौलिक हो जाते।
इन चारों पांचों में से जो एक कुछ कुछ संवेदनशील हो कुछ कुछ मौलिक किस्म की कविता लिखता था, अचानक सख्त बीमार हो गया। उसके बीमार होते ही आल इंडिया मौलिक कविता संघ के जिंदा सदस्य दांत काटी कविता के साथी होने के बाद भी बहुत खुश हुए। साला, अपने को बड़ा मौलिक लिखने वाला बनता था। अब बचाकर दिखाए अपने को डॉक्टरों से? यमराज भले ही उसे छोड़ दें, पर डॉक्टर उसे छोड़ने वाले नहीं। आजकल यमराज बंदे को उतनी बेदर्दी से उठने के लिए विवश नहीं करते जितनी बेदर्दी से डॉक्टर बंदे को जाने के लिए मजबूर करते हैं।
इधर आल इंडिया मौलिक कविता संघ का सदस्य बीमार तो उधर ऊपर से दो दिन बाद हिंदी पखवाड़ा। आल इंडिया मौलिक कविता संघ के स्वस्थ सदस्यों को ज्यों ही यह याद आया तो उन्हें अपने पांव के नीचे से एक ही कविता के हरबार पांच सौ सरकते नजर आने लगे। उन्हें पिस्सू पड़ने लगे। उन्होंने मिलकर तब भगवान के आगे हाथ जोड़े,‘ हे प्रभु! आपसे हाथ जोड़ विनती है कि हमारे आल इंडिया मौलिक कविता संघ के इस बेशर्म सदस्य को या तो आज ही उठा लो या फिर हिंदी पखवाड़ा खत्म होने के बाद ही उठाना। तब तक जैसे आप चाहो इसे जिंदा रखना। इसे बीच में उठाया तो … हम तुम्हें कभी माफ नहीं करेंगे। आप नहीं जानते कि हमारे जैसे कवियों के लिए हिंदी पखवाड़े का एक एक घंटा कितना मूल्यवान होता है,’ उसके बाद उन्होंने साहित्य की देवी सरस्वती से भी अपील की पर उन्हें लगा अपील में कुछ कमी रह गई है।
फिर उन्होंने अपने मौलिक कविता संघ के सदस्य की तत्काल मृत्यु पर दुराचार विमर्श किया,‘ यार! ये तो मरने का नाम ही नहीं ले रहा? अब अगर बंधु हिंदी पखवाड़े के बीच गया तो ???’ उनमें से एक के पेड कवि हृदय में एक कवितामय सुविचार कौंधा तो दूसरे ने कहा,‘ यार! उसके लिए भी एक आइडिया है मेरे पास!’
‘क्या??’ तीसरे की बीस साल बासी कविता ने फ्रेश सांस लेते पूछा।
‘ ऐसा करते हैं। इसकी श्रद्धांजलि एवं शोक सभा मृत्यु की पूर्व संध्या, पूर्व दिनों ही कर देते हैं। सारा झंझट खत्म! ये भी खुश और हम भी खुश!’
‘ पर यार! इतने सालों तक हमने एक साथ एक ही मंच से एक ही कविता पचासियों बार पढ़ एक दूसरे की कविता को युग की सबसे मौलिक कविता करार दिया है। अब ऐसे में….’
‘पर यार! अब दूसरा कोई चारा भी तो नहीं। अच्छा तू ही बता! अगर जो बंधु हिंदी पखवाड़े में कूच कर गया तो तू आएगा इसे शोक सभा में श्रद्धांजलि देने?’
‘ देख दोस्त! मैं हिंदी पखवाड़े के एक एक पल को पूरी तरह दुह लेना चाहता हूं। ये जाए भाड़ में।’
‘ तो ले देकर बस एक ही रास्ता बचता है कि ये आज या कल शाम तक हर हाल में टपक जाए तो…. इधर ये दिवंगत हो अंतिम यात्रा पर तो उधर हम इसके दुख में श्रद्धांजलि सभा कर साहित्यिक शोक से फ्री हो लेंगे।’
‘पर वह श्रद्धांजलि सभा आयोजित होगी या प्रायोजित?’
‘ सो तो साहित्य विभाग वालों से पूछ लेंगे। वे वैसे भी लेखकों द्वारा जैसे तैसे प्रकाशित किताबों की दो दो विभागीय प्रतियां लेने में बीसियों आपत्तियां लगाते हैं, परंतु उसके दिवंगत होने पर उसकी पुण्यतिथि पर हजारों मजे से बहा देते हैं।’
‘देख लेना! तुम्हें तो पता ही है कि मैं किसीकी शोक सभा तक में मुफ्त में कविता सुनाने वाला बिल्कुल नहीं। अपनी श्रद्धांजलि सभा में भी नहीं। अपने कविता सुनाने के कुछ उसूल हैं, लिखने चोरने के कोई उसूल भले ही न हों। तीसरे ने कविता की रक्षा करते कहा और मन ही मन पता नहीं किसकी चोरी कविता पर अपनी मौलिकता की मुहर लगा गुनगुनाने लगा।
…….आखिर बड़े विचार विमर्श के बाद बहुमत से फाइनल हुआ कि बीमार कवि को कल शाम तक उसके मरने या न मरने पर भी हर हाल में दिवंगत की कविता की शांति के लिए शोकसभा कर उसे भावभीनी श्रद्धांजलि दे न चाहते हुए भी औपचारिक तौर पर सीना चौड़ा कर विदा किया जाए ताकि उन्हें हिंदी पखवाड़े में कविता की खाने का किसी तरह का कोई पातक न हो।
जैसे ही इस प्रस्ताव का ड्राफ्ट फाइनल कर आल इंडिया मौलिक कविता संघ के शेष सदस्य सरकारी अस्पताल के जनरल वार्ड के खटमलों से अपने को कटवाते आल इंडिया मौलिक कविता संघ के बीमार तैयार यमराज के वाहन की पल पल बाट जोहते होनहार कवि के पास पहुंचे तो पहले तो वह सोचा कि वे उसका हालचाल पूछने आए होंगे। उन्हें अपने पास आया देख उसे मरते मरते भी इतनी खुशी हुई कि उसने पल में ही तय कर लिया कि जो यमराज उसे इसी वक्त उनके सामने उठाने आ जाते हैं तो वे अपने दोस्तों की दोस्ती की दुहाई दे उनसे कुछ और पांच पांच सौ रुपए की कविता सुनाने के लिए मोहलत मांगेंगे। भले ही उसे आधे पैसे आयोजक को देने के बाद शेष यमराज को बतौर रिश्वत देने पड़ें।
अपने संघ के सदस्यों को अपने पास आया देख उसके सूखे होंठों पर मुस्कुराहट तैरने लगी। तभी एक ने परले दर्जे की विनम्रता के भाव क्रूर चेहरे पर लाते हिम्मत कर उससे सीधा सवाल पूछा,‘ और दोस्त! कब तक जाने की सोच रहे हो?’
‘अब नहीं जाऊंगा। जिसके साहित्य में भी ऐसे ऐसे दोस्त हों…उसे…..’
‘ जो तुम सोच रहे हो, गलत सोच रहे हो। साहित्य की दुनिया में कोई किसीका दोस्त नहीं होता। सब बस, मुंह आगे के सगे होते हैं। हम तुम्हारे पास तुम्हारे हित का एक प्रस्ताव लेकर आए हैं।’
‘क्या?’
‘ परसों से हिंदी पाखवाड़ा है।’
‘ तो??’
‘हम संघ के सारे पदाधिकारी तो उसमें व्यस्त हो जाएंगे।’
‘तो?? मेरे नाम की पांच सौ रुपए वाली कविता किसीसे आधे में पढ़वा देना।’
‘नहीं, सोच रहे हैं, कल तक तुम चले गए तो ठीक नहीं तो…’वह यह सुन आल इंडिया मौलिक कविता संघ के प्रधान कविता चोर का मुंह देखने लगा।
‘नहीं तो??’
‘नहीं तो हम कल शाम को हर हाल में तुम्हारी मृत्यु की पूर्व संध्या पर तुम्हारे लिए श्रद्धाजंलि समारोह आयोजित कर …डॉक्टर से बात हुई थी। कह रहा था कि….’
‘ कि… ???’
‘ कि ले देकर तुम मैक्सिमम कल तक ही टिक सकते हो। उसके बाद भी टिके तो मरने से भी बदतर होंगे तुम्हारे हाल,’ तीसरे ने उसे डराते हुए मरने को विवश करने के इरादे से स्थिति स्पष्ट की।
‘मतलब?? मरने से पहले ही श्रद्धांजलि सभा कैसे हो सकती है दोस्त?’ वह अपने दोस्तों के साथ होते सरकारी अस्पताल की चरमराती चारपाई की तरह सरकारी अस्पताल की चारपाई पर चरचराया।
‘हो सकती है। जैसे स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर ये वे गुलाम जनता को स्वतंत्रता दिवस की बधाई देते हैं, वैसे ही हम भी तुम्हारी मृत्यु की पूर्व संध्या पर….’
‘दोस्त! ये सरासर बेइंसाफी नहीं?’
‘ हद है यार! हम तेरे सामने तेरी इज्जत रखने के लिए इतना गिड़गिड़ा रहे हैं और एक तू है कि हमारे लिए इतना भी नहीं कर सकता ? कल के बाद भी तो मरना ही है दोस्त! तो क्यों न हमारे लिए आज ही….’ पांच सौ रुपए वाली कवि गोष्ठियों में अधिकारी से जुगाड़ करने वाले ने उसके सिर पर जिस स्नेह से हाथ फेरते उदास हो कहा तो… उसने मरने को न चाहते हुए भी मन बना लिया,‘ तो दोस्तो! तुम्हारी खुशी के लिए आज ही मरने की पूरी कोशिश करता हूं ताकि….’
‘ये हुई न दोस्त दोस्ती वाली बात! इस कहते हैं दोस्ती! अब तुम इधर मरने की कोशिश करो, उधर हम तुम्हारी श्रद्धांजलि सभा की तैयारी तुम्हारे मन माफिक करते हैं। वैसे भी दोस्त! हम दोस्तों के लिए कौन सा रोज रोज मरा करते हैं दोस्त! ’ एक साथ कह उन चारों ने बारी बारी उसकी पीठ धौल जमाते थपथपाई ताकि उसके पीठ के ईद गिर्द कहीं अटके प्राण हों तो वे जल्दी निकल जाएं और हसरत पूरी होने की तमन्ना लिए उसका चेहरा आखिर बार देखने की दुआ कर अस्पताल से बाहर हो लिए।
उनके जाते ही उसे महसूस होने लगा कि ज्यों चारों ओर से उसे खटमलों से भी भयंकर तरीके से उसके आल इंडिया मौलिक कविता संघ के सदस्य काट रहे हों। उसने हिम्मत कर अपनी आखिरी मौलिक कविता की पहली लाइन बकी- कल मरे सो आज मर, आज मरे सो अभी…. वरना तेरे शोक में, श्रद्धांजलि सभा हो या न हो क्या पता कभी …..उच्चारते उच्चारते उसने दोस्ती की सारी पीड़ाएं भूल जोर से सारे दांत दबा मरने को आखिरा बार मन कठोर किया और…
अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड़
नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र.