पाँच लघुकता

स्वाति कमल
लघुकथा-१
और दोस्त मर गया”
तारीख- मार्च 2021
डियर डायरी,
आज मैं बहुत दुखी हूं। पता है क्यों? क्योंकि आज मेरा एक दोस्त मर गया। ये सब अचानक से तो नहीं ही हुआ होगा, लेकिन सच कहूं तो मुझे ऐसा होने का बिल्कुल भान नहीं था। एक दिन उसने मुझसे पूछा कि ये कौन है जो तुम्हारी तस्वीरों पर हमेशा कमेंट करता है?
मेरे सच बताने पर भी उसकी निगाहों में मुझे शंका दिखी। मैं इस घटना को भूलने ही वाली थी कि फिर कुछ ऐसा ही हो गया।
मैं बाकी दोस्तों की तरह उससे भी अपने जीवन के मस्ती मजाक वाली बातें बता रही थी लेकिन तभी मुझे उसके चेहरे पर अलग ही भाव दिख गया। और आज तो उसने हद ही कर दी। उसने साफ-साफ कह दिया कि गृहस्थ जीवन में पत्नी के अलग कर्तव्य होते हैं, पति से कोई तुलना नहीं होती।
जो अब तक मेरा दोस्त था, जिससे हर छोटी-बड़ी बात बताए बिना मुझे तसल्ली नहीं होती थी, अब वो मर गया था। या फिर अपनी खोली से बाहर निकल कर अब वो अपने वास्तविक रूप में दिखने लगा था।
अरे! घबराओ मत, मेरा पति अभी जिंदा है, बस दोस्त मर गया है।
***
लघुकथा-२
‘पूर्वाग्रह’
कितनी बार कहा कि’ साड़ी पहनकर रहा करो’ ,सबसे तुरन्त घुल मिल मत जाओ,इतनी जोर से मत हंसो, मुझे’ तुम ‘और नाम से मत बुलाओ;लेकिन इस पर किसी बात का असर ही नहीं होता।
कितनी उम्मीद थी कि मेरी शादी के बाद पिता जी को आराम मिल जाएगा।लोग कहते हैं कि स्त्री के बिना घर ,घर नहीं होता।मां की मौत के बाद वृद्ध पिताजी और मैं ही अकेले घर में थे।लेकिन इस लड़की में तो लड़कियों वाले कोई लक्षण ही नहीं। और ये शादी के बाद मेरी बढ़ती खिझ का बड़ा कारण था।
ऑफिस से घर पहुंचा तो देखकर आंखे फ़टी की फटी रह गयीं।पिताजी को कंधे से पकड़कर सहारा देकर बैठी वो उन्हें दवा पिला रही थी।बगल में कूड़ेदान वाली बाल्टी में उल्टियों का ढेर पड़ा था।मैं निस्तब्ध हो गया और आत्मग्लानि से भर गया।साथ ही आश्वस्त भी।पिताजी की सही देखभाल हो पाएगी अब।हां, साड़ी उसने अब भी नहीं पहनी थी।
***
लघुकथा-३
कोई मिल गया।
“हालांकि आप तो पूरी तरह से आत्मनिर्भर हैं, फिर भी कोई ऐसी उम्मीद या सपना है जो आप शादी के बाद करना चाहती हैं?” मानसी को शादी के लिए देखने आये लड़के नें सहजता से पूछा।
“जी,मैं शादी के बाद अपने बच्चे पैदा ना कर अनाथाश्रम से एक बच्चा गोद लेना चाहती हूं।मैं शादी उसी से करूंगी ,जिसे मेरी ये बात स्वीकार हो।” मानसी नें थोड़ी कठोरता के साथ मन में संशय लिए कहा।
हालांकि उसे पूरी उम्मीद थी कि हर बार की तरह आज भी बनते-बनते बात बिगड़ जाएगी।बाकी सब तो ठीक रहता है, लेकिन उसकी ये बात किसी को नहीं भाती।
लोग कहते हैं अपना खून तो अपना ही होता है,और रिश्ते के लिए साफ मना कर देते हैं।
“मुझे कोई आपत्ति नहीं।ये तो बहुत अच्छा निर्णय है।हमें बच्चा मिल जाएगा और बच्चे को मां- पिता।मुझे तो लगता है कि बच्चों के व्यक्तित्व पर सबसे ज्यादा प्रभाव उनकी परवरिश का पड़ता है।”
अपने ख्यालों में खोयी मानसी को ये जवाब हर्षित कर गया।
आखिर देर से ही सही,मिला तो हमसफ़र।
***
लघुकथा-४
“ससुराली गुण”
“ढोलक बजाना आता है?”
ससुराल में पहले ही दिन स्त्रियों के घेरे में से एक स्त्री ने सवाल उछाला।
मैंने घूंघट के अंदर से ही सर ‘ना’में हिलाया।
“कुछ बना कर नहीं लायी। लगता है सिलाई,कढ़ाई,बुनाई,पेंटिंग आदि कुछ नहीं आता।”
दूसरी नें जोड़ा।
“देखने में भी तो गोरी, सुंदर, लंबी नहीं है। पता नहीं क्या देखकर शादी हुई है।”
तीसरी नें अपनी जिज्ञासा प्रकट की।
कहना चाहती थी कि एम. ए,बी एड कर के इंटर कॉलेज में अंग्रेजी की लेक्चरर हूं, दो किताबें छप चुकी हैं; लेकिन मुंह से एक शब्द नहीं निकला।
शायद इन सब बातों का यहां कोई महत्व ही नहीं था और जिनका यहां महत्व था,वे गुण मेरे अंदर थे ही नहीं।
***
लघुकथा-५
” निर्णय”
आखिरकार वही हुआ,जिसका अंदेशा था। डरते-डरते मानव से ज्योंही इस बात की चर्चा करनी चाही, पूरी बात सुनने से पहले ही फट पड़ा।”ये क्या ऊलजलूल बातें कर रही हो तुम?तुम्हें पता भी है तुम क्या कह रही हो?कितना बुरा लगेगा उसे,जब पता चलेगा कि मामी उसके बारे में क्या सोचती हैं?अरे!बच्चा है वो अभी।तुम्हारी बेटी भी किसी दूसरे ग्रह से नहीं आयी है।ओवर प्रोटेक्टिव हो तुम उसे लेकर।सच तो ये है कि शादी के इतने सालों बाद भी तुम मेरे परिवार वालों को नहीं दिल से नहीं अपना पायी।”मानव अपनी रौ में लगातार बोले जा रहा था।
खुद पर व्यक्तिगत आक्षेप सुनकर मानवी की आंखों से आंसू आ गये।बीते सालों में क्या नहीं किया उसने परिवार के लिए?तन,मन ,धन से समर्पित रही। जहां गलत लगा अपनी ससुराल के लिए अपने मायके वालों से उलझने में भी पीछे नहीं रही।इसी का ये सिला मिल रहा है?
लेकिन ये समय कमजोर पड़ने का नहीं है।उसे अपनी बात तो सशक्त रूप से कहनी ही पड़ेगी।आखिर उसकी बेटी का सवाल है।
“तुम्हें नहीं कहना तो मत कहो,मैं खुद हैंडल कर लूंगी।मेरा काम था तुम्हें आगाह करना,ताकि तुम बाद में ये ना कह सको कि मैंने तुम्हें बताया नहीं।मैं खुद ही सख्ती से चेतावनी दे देती हूं उन्हें कि उनका मेरी बेटी को जकड़ना,उसकी मर्जी के बगैर खींच कर किस करना मुझे जरा भी नहीं पसन्द।और हां, ये मत कहना कि वो अभी बच्चे हैं।अठारह साल की उम्र हो गयी उनकी।होंगे तुम्हारे लिए वो बच्चे।शायद तुम्हें पता ना हो,ग्यारह-बारह वर्ष की उम्र से ही ऐसी भावनाएं जगने लगती हैं।मैं अपनी बेटी को किसी का शिकार नहीं होने दूंगी।पता है ऐसी घटनाओं के शिकार बच्चे बड़े होने तक प्रभावित रहते हैं।” कहते-कहते गुस्से से तमतमा गया उसका चेहरा।
“और दूसरी बात ,हो सकता है ये सिर्फ मेरे मन का वहम हो और उनके मन में ऐसी कोई भावना ना हो।फिर भी किसी के साथ जबर्दस्ती कुछ भी करना क्या ठीक बात है?क्या छोटे बच्चों की भावनाएं नहीं होती?” इतना कह के गुस्से में कांपती मानवी वहां से चल पड़ी।
जानती थी, लोग उसे ही बुरा-भला कहेंगे।कहें,मेरी बला से।मेरी बेटी से बढ़कर अन्य कोई नहीं है मेरे लिए।कम-से-कम बेटी तो सुरक्षित रहेगी?
मन-ही-मन ऐसा सोचते हुए मानसी मानव के भांजे राहुल को सख्त चेतावनी देने के लिए निकल गयी।
मानव और मानसी दोनों ही उच्च शिक्षित और नौकरीपेशा हैं।उनकी एक ही बेटी है पांच साल की पीहू।इसके अलावे उनके साथ मानव का अठारह वर्षीय भांजा राहुल भी पढ़ाई के उद्देश्य से रहता है।राहुल जब से यहाँ आया है तभी से मानवी को उसका पीहू को जबरदस्ती गले लगाना,किस करना नहीं अच्छा लगा।उसने कई बार प्यार से उसे समझाया भी,लेकिन राहुल हर बार बात मजाक में टाल देता और फिर से वही हरकतें शुरू।इसलिए उसने आज सब कुछ साफ-साफ कहने का निर्णय लिया।
उसे याद है बचपन में उसे एक दूर के रिश्तेदार का छूना,बोलना,हँसी-मजाक करना जरा भी नहीं भाता था।वो प्रतिकार भी करती लेकिन उम्र में बड़ा वो लड़का उसकी नहीं सुनता।अंततः एक दिन माँ से उसने उसकी शिकायत कर दी।लेकिन ये क्या?मां तो उल्टे उसे ही समझाने लगी।”तू अभी इतनी छोटी(आठ साल की) है, वो तेरे बड़े भाई की तरह है।प्यार से पुचकारता है तुझे।मैं उसे कुछ नहीं कह सकती, सबको बुरा लगेगा।” माँ की बातों से उसे बड़ी निराशा हुई।धीरे-धीरे वो खुद उस लड़के से यथासंभव बचने लगी। आखिर वो समय भी निकल गया,लेकिन आज भी इस घटना को याद करके उसे बुरा लगता है।
“नहीं।जो उसके साथ जो हुआ,वो अपनी बेटी के साथ नहीं होने देगी।जब मां ही बच्चे की नहीं सुनेगी तो कौन सुनेगा?अगर उसे कुछ हो गया तो क्या वो खुद को माफ कर पायेगी?हरगिज नहीं।” और निकल पड़ी दृढ़ कदमों से।

पाँच लघुकथा
ऋचा वर्मा
लगुकथा-१
लघुकथा
बाबुल मोरे काहे को ब्याहे ऐसो देस
टंकी के ओवरफ्लो होने के बाद पानी की पहली धार की चोट पड़ते ही दीवार फिर से कांप उठी। उसे पता था कि अब लगभग आधे घंटे तक यह यातना उसे भुगतनी पड़ेगी। यह लगभग रोज का नियम था, इस इमारत का केयरटेकर टंकी में पानी भरने के लिए मोटर का स्विच ऑन तो करता तो पर कभी भी पानी भर जाने के बाद ध्यान से उसे ऑफ नहीं करता। “अभी तो साल भर पहले ही मुझे खड़ा किया गया था। कितना खूबसूरत और चमकदार रंग मुझ पर चढ़ाया गया था, मेरी देखा देखी आसपास की बहुत सी इमारतों को भी इसी रंग से सजाया गया । परंतु फिजूल के बहते पानी की स्वच्छंद धार ने मुझे कितना मलिन कर दिया! पानी के धार से लगे चोट से मेरे शरीर पर गहरे पीले निशान पड़ गए हैं।” दीवार के दिमाग में हमेशा की तरह यह खयाल फिर घुमड़ने लगा। तभी दीवार ने महसूस किया कि घर के अंदर भी कोई उसी की तरह सिसकियां भरकर रो रहा है उसने अपने कान लगाकर सुनने की कोशिश की। केयरटेकर और उसकी पत्नी अपने हाल में ही ब्याही गई पुत्री के साथ वीडियो कॉल पर थे, ”आप लोगों ने कैसे शहर में मेरी शादी कर दी पानी की कितनी किल्लत है यहाँ! मुहल्ले में एक टैंकर आता है उसके लिए लंबी कतार लगानी पड़ती है तब जाकर कहीं एक बाल्टी पानी मिलता है और कभी-कभी तो वह भी नहीं। अब बिन पानी के आदमी कैसे रहे…” कहते हुए उनकी बिटिया सिसक-सिसक कर रोने लगी। तभी किसी ने अप्रत्याशित रूप से मोटर का स्वीच ऑफ कर दिया और पानी गिरना बंद हो गया। “आज इन्हें पानी का मोल समझ में आया “ बुदबुदाते हुए दीवार ने राहत की सांस ली।
***
लघुकथा-२
प्रथम प्रणाम
“सोच रहीं हूँ अपनी लघुकथाओं को संकलित कर एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाऊँ ।”
बहन ने अपने भाई से कहा।
“यह कैसी सनक सवार हो गई तुम पर… अच्छा खासा पाठक वर्ग है तुम्हारा सोशल मीडिया पर…।”
भाई ने हंँसते हुए कहा।
“बिना पुस्तक का स्वरूप दिये किसी भी लेखक या लेखिका का सही मूल्यांकन नहीं हो पाता।”
बहन ने भाई को समझाने की कोशिश की।
“जब इतना पैसा खर्च करना ही है तो बेहतर है कि इन सबको इंग्लिश में ट्रांसलेट कर एक बुक फॉर्म में पब्लिश करवाओ, क्या पता…”
“ठीक है – ठीक है समझ गई तुम्हारा प्वाइंट..”
बहन का इरादा बदलने लगा था,वह आगे कुछ कह पाती कि आठ वर्षीय लाड़ले भतीजे अक्षय ने आकर अपनी दोनों बाहें उसके गले में डाल दी।
“बुआ, ‘देवरानी’,का मैस्कुलिन,आई मीन ,पुल्लिंग वर्ड क्या होता है?”
“तुम गेस करो..”
बुआ ने बड़े प्यार से अक्षय की ठुड्ढी पकड़ते हुए कह।
“देवराजा…करेक्ट!”
अक्षय ने किंचित आत्मविश्वास से उत्तर दिया था, परंतु शाबाशी के बजाए पूरा कमरा उसके डैडी, बुआ और मम्मी के ठहाकों से गूंज उठा।
“हम तो इसे सही उत्तर बता देंगे, परंतु इनकी पीढ़ी अपने बच्चों को क्या बताएगी, अगर इस तरह हम हिन्दी भाषा से विमुख होते रहें.…”
बहन ने थोड़ा संयत होते हुए कहा ।
“ठीक कहती हो दीदी हिन्दी हमारी माँ है और अंग्रेजी आंटी…पहले माँ के चरण फिर आंटी के..”
“..तो पहले हिन्दी फिर अंग्रेजी संस्करण ..”
कमरे में उपस्थित सभी व्यक्तियों ने सहमति व्यक्त की।
***
लघुकथा-३
समय की नब्ज
“पापा इन्होंने अगर मुझे जन्म दिया तो मेरी मांँ हुई ना?”
सना ने फोटोज एप में ‘हाउ सना केम टू द वर्ल्ड’ वाले एल्बम पर उस महिला के फोटो को इंगित करते हुए पूछा।
“हांँ एक तरह से तुम्हारी मांँ ही हुई।”
“अगर यह मेरी मांँ है तो इनके साथ फोटो में कहीं आप क्यों नहीं दिख रहें है, और मेरी भी इनके साथ केवल एक ही फोटो है… एकदम न्यूबॉर्न वाली”
“बेटा यह आपकी बायोलॉजिकल माँ है..”
जतिन ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा।
“बायोलॉजिकल माँ…!”
सना विस्मित थी।
“मतलब सरोगेट मदर…।”
अपना गला साफ करते हुए और अपनी पूरी शक्ति लगाकर जतिन ने वह बात कह दी जिसे कहने की हिम्मत वह सना के पैदा होने के दिन से ही जुटा रहा था।
“तब मेरी अपनी मांँ यानि कि आपकी पत्नी?”
“मेरी तो कभी शादी ही नहीं हो पाई तो पत्नी कहां से..”
जतिन एक-एक राज से पर्दा उठाते जा रहा था।
“क्यों..?”
11 वर्षीय सना अब इन बातों को समझने लायक हो गई थी।
“ उस जमाने में भ्रुण हत्या के कारण लड़कियों की संख्या लड़कों से कम रहती थी इसीलिए बहुत से लड़के कुंवारे ही रह जाते थे। वैसे नौकरी वाले लड़कों की शादी में ज्यादा दिक्कत नहीं आती थी। मैं अपना व्यवसाय करता था जब तक मेरा व्यवसाय जमा मेरी शादी की उम्र निकल गई थी।”
“फिर ..?”
सना कौतूहल से अपने पिता की जिंदगी की कहानी सुन रही थी।
“मुझे बहुत शौक था कि मेरे अपने बच्चे हों, इसलिए मैंने इन फोटो वाली महिला को पैसे देकर तुम्हारी सरोगेट मदर बनने के लिए राजी कर लिया।”
“तब तो आप यह भी चाहते होंगे कि आपको एक बेटा हो और हो गई मैं..”
“नहीं बेटे मुझे तो बेटी ही चाहिए थी …कितने वर्षों के बाद हमारे खानदान में कोई लड़की पैदा हुई थी।”
“ पापा इस बार मेरे जन्मदिन पर मेरी सरोगेट मदर को जरूर इन्वाइट कीजिएगा.. मैं उन्हें अपने दोस्तों से मिलवाऊंगी और सबको बताऊंगी कि मैं भी शाहरुख खान और प्रियंका चोपड़ा के बच्चों की तरह सरोगेसी से पैदा हुई हूँ।”
***
लघुकथा-४
श्रेय
समीर सक्सेना अपने पोते चिन्मय के साथ ड्राइंगरूम में डिस्कवरी चैनल पर अपना पंसदीदा शो देख रहे थे, और दूसरे कमरे में उनके तीनों बच्चे चिन्मय के इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने लिए आयोजित सम्मान समारोह में जाने के लिए तैयार बैठे, धीमी आवाज में बातचीत कर रहे थे।
“बहुत – बहुत बधाई, भईया”,
सुजाता ने अपनी प्रसन्नता प्रगट की।
“यह सब अच्छी परवरिश का नतीजा है, मैत्रीपूर्ण व्यवहार, बच्चों की भावनाओं को समझना और उनके साथ संवाद बनाये रखना….”,
किशोर अपने बेटे की सफलता के राज खोल ही रहा था कि सुजाता बोल पड़ी,
“और, एक हमलोगों का बचपन था, कितना अभावग्रस्त और तनावग्रस्त…., तुम संवाद की बात करते हो भईया, आज तक हमलोगों में इतनी हिम्मत नहीं कि पापा की उपस्थिति में ऊंँची आवाज में बोल सकें।”
“यही कारण है कि आज तक न तो हम इतनी सफलता प्राप्त कर सके और न पापा के लिए अपने दिलों में उतनी जगह बना सके”,
आनंद ने भी अपने दिल की बात कह दी। तभी ड्राइवर ने गाड़ी तैयार कर सूचना दी और पूरा परिवार गंतव्य की ओर प्रस्थान कर गया।
मुख्य अतिथि के हाथों चिन्मय को पुरस्कार और सम्मान प्रदान किये जाने के उपरांत मंच संचालक द्वारा पूछे गए प्रश्न कि,
“आप अपनी सफलता का श्रेय किसको देते हैं?”, किशोर के आंँख और कान दोनों मानों ठहर गये, उत्तर तो उसे पता था परंतु चिन्मय के मुख से सुनकर वह उन शब्दों को आत्मसात कर लेना चाहता था।
“अपने दादाजी को,जिन्होंने मुझे अनुशासित और एकाग्रचित्त होकर पढ़ने के लिए प्रेरित किया।”
चिन्मय का यह जवाब उसके पिता और उनके भाई बहन के लिए अप्रत्याशित था, परंतु उनकी आंँखों में आये खुशी के आंँसू बहुत ही स्वाभाविक थे।
***
लघुकथा-५
वेशभूषा
‘हियर कम्स द पोयटेस ‘
सभी की नजरें समीरा पर जाकर टिक गई।
”हांँ सचमुच क्या लिखती हो यार ..फेसबुक पर तुम ही तुम हो आजकल’
‘सो वी ऑल आर साहित्यिक पर्सन्स ‘
‘बट, सुमित की वाइफ यहां क्या करने आई है”
‘क्यों..”
समीरा ने पूछा
‘वह तो एकदम अनपढ़ और गंवार दिख रही है’
‘हां ! मांग में भर -भर कर सिंदूर, एंब्रॉडिर्ड सिंथेटिक साड़ी ….सर पर पल्लू’
बातों ही बातों में महिलाओं ने सुमित की पत्नी रमा का एक खाका सा खींच दिया।
..और थोड़ी देर में सभी सभागार कक्ष में थे । मंच से सम्मानित किए जाने वाले साहित्यकारों के नाम की घोषणा हो रही थी ,समीरा का भी नाम आया, वह अपनी कुर्सी से उठी ,सभी सखी सहेलियों से हाथ मिलाया पर रमा को लगभग नजरअंदाज करती हुई मंच पर चली गई ।
तभी मंच से पुनः आवाज आई,
‘और हमारे बीच उपस्थित हैं श्रीमती रमा द्विवेदी, स्नातकोत्तर तो इन्होंने अंग्रेजी साहित्य में किया पर लिखती हिंदी में हैं ,बहुत अच्छी कविताएं लिखती हैं, देश के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कविताएं प्रकाशित होती हैं , बहुत सारे साहित्यिक सम्मान अपने नाम किए हैं और वे हमारी विशिष्ट अतिथि भी हैं जिनके हाथों से सभी को पुरस्कार दिया जाएगा।”
कार्यक्रम खत्म होने के बाद सभी महिलाएं रमा को घेरे खड़ीं थीं और उससे उसका फेसबुक लिंक मांग रही थी
ताकि उसकी कविताएं पढ़ सकें और उससे कुछ सीख सकें!
लघुकथा-२

पाँच लघुकथा
आशमा कौल
2665/16
फरीदाबाद, हरियाणा
9868109905
लघुकथा-१
जगह नहीं बची
नेहा और सुधीर ने अपने नए घर में प्रवेश किया है । उनके चेहरे से खुशी और थकावट दोनों झलक रहे हैं । सामान लगभग अपनी अपनी नियत जगह पर रख दिया गया है और कुछ रखा जा रहा है।
“ सुधीर अब क्या कर रहे हो “ – नेहा ने पूछा तो जवाब मिला ,
“ कुछ खास नहीं बस ममी पापा की तस्वीर के लिए टेबल पर जगह बना रहा हूँ , हाँ बोलो “
“ मैं भी यही पूछना चाह रही थी कि माँ बाबू जी की तस्वीर को कहाँ लगाऊँ “
“ अरे नेहा रानी अब कोई जगह खाली नहीं बची जहां तुम तस्वीर लगा सको, फिलहाल उन्हे बैग में ही रहने दो “ – सुधीर तल्खी से बोला ।
सुधीर के इस जवाब ने नेहा को अंदर तक आहत कर दिया लेकिन उसने चुप रहना ही ठीक समझा और दोनों फिर से काम में व्यस्त हो गए ।
“ नेहा तुम निपट गयी क्या काम से, मैं नहा चुका हूँ और खाने का ऑर्डर बुक कर रहा हूँ। ”
“ लगभग निपट ही गई हूँ समझो, माँ बाबूजी की तस्वीरें मंदिर में लगा दी हैं । सोचा पूरे घर में तो जगह बची ही नहीं तो मंदिर मे ही सजा दूँ ताकि सुबह शाम ईश्वर की पूजा के समय उन्हे भी नमन कर लिया करूँ, आखिर ईश्वर के बाद तो उनकी खास जगह है मेरे जीवन में “ – कहते हुए नेहा स्नान गृह की तरफ बढ़ गई।
***
लघुकथा-२.
खानदानी
मंजू सफाई करते समय बार-बार अपना पल्लू ठीक कर रही थी।
आज मेमसाहब कहीं जरूरी काम से बाहर थी और साहब घर की देख-रेख कर रहे थे।
साहब ड्राईंग रूम में बैठे अखबार कम पढ़ रहे थे और अखबार की आड़ में मंजू को ज्यादा निहार रहे थे। उसकी सुन्दरता और जवानी दोनों ही चरम पर थी। मंजू को साहब की घूरती नजरें बहुत असहज बना रही थी और वह बार-बार अपने पल्लू से अपने गठीले बदन को ढकने की कोशिश करने में नाकामयाब सी हो रही थी।
अचानक फोन की घण्टी बजी और साहब ने फोन उठाया। शायद मेम साहब कुछ पूछ रही थी।
‘’नहीं-नहीं वहां जाने की जरूरत नहीं है, वह आदमी मुझे सही नहीं लगता है, उससे जितना दूर रहोगी, उतना अच्छा है। वे लोग हम जैसे खानदानी नहीं हैं’’ कहते-कहते साहब की नजर फिर मंजू के गदराए बदन पर जाकर ठहर गई।
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लघुकता-३.
ज़िम्मेदारी
सूती मांड लगी गुलाबी साड़ी में अलका आज बहुत जच रही है। जचे क्यों न आज तो वह बतौर मुख्य अतिथि के रूप में बाल सदन के कार्यक्रम में आमंत्रित है।
पति देव दौरे पर बाहर गए हैं इसलिए बुखार में तप रहे मासूम रोहन को वह पड़ोसन के हवाले करके गाड़ी में निकलने लगी है। रोहन गर्म है, बैचेन है- ‘’मां आज मेरे पास ही रहो, मुझे डर लग रहा है’’ ‘’ओ बेटा तुम तो बहादुर हो चलो मेरा हाथ छोड़ो और सो जाओ, मैं जल्दी आ जाऊंगी।‘’ कहती हुई अलका बिलखते तपते रोहन को पड़ोसन के पास छोड़ गई।
‘’ड्राईवर जल्दी चलो, देर हो रही है’’ अलका गाड़ी में बैठते हुए लगभग चीखी। बाल सदन में हुए स्वागत सत्कार से अभिभूत अलका मंच पर संबोधन के लिए पहुंची है ’’प्यारे बच्चों और प्यारी बहनों, से मां का पहला कर्त्तव्य बच्चे की अच्छी परवरिश पर ध्यान देना होता है। बच्चा कोमल फूल सा होता है और स्नेह की गर्मी के अभाव में मुरझा जाता है’’, अलका बड़ी शिद्दत से अपने व्याख्यान में लगी हुई है और लोगों की तालियों की गड़गड़ाहट में उसे न तो फोन की घण्टी ही सुनाई दे रही है और न ही एस.एम.एस.।
‘’बहनों कितना भी जरूरी काम क्यों न हो, बच्चे की सेहत सर्वोपरि है।‘’ चार घण्टे से ऊपर हो चुका है और रोहन का ताप बढ़ता जा रहा है, वह अचेत-सा ‘’मां-मां पुकार रहा है’’। पढ़ोसन फोन लगा-लगाकर थक चुकी है और खुद ही रोहन को अस्पताल में दाखिल कर आई है।
शाम देर हो गई और उसकी अनुपस्थिति में रोहन की हालत और बिगड़ गई। अलका को खबर मिल गई है और वह अस्पताल पहुंच गई है जहां रोहन को ऑक्सीजन पर रखा है।
कुछ ही देर में‘’संध्या टाईम्स’’ की प्रतियां भी अस्पताल पहुंच गयी हैं। सुर्खियां हैं- ‘’आज विदूषी अलका जी ने बाल सदन के कार्यक्रम में बाल विकास के क्षेत्र में अपने संवेदनशील संबोधन से हर मां को अपनी जिम्मेदारी का एहसास करा दिया है।‘’
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लघुकथा-४.
कातिल कौन
सुबह उठने के साथ ही अखबार की सुर्खियों पर मेरी नजर दौड़ रही थी। आज फिर राष्ट्रीय राजमार्ग-4 पर दुर्घटना में एक लजवान आदमी की मौत। तेज स्पीड से आती बस ने एक पैदल सवार को टक्कर मारी। ड्राईवर ने डर के मारे बस नहीं रोकी, बल्कि उस आदमी को दूर तक घसीटता हुआ ले गया।
ड्राईवर फरार हुआ और घटनास्थल पर लोगों का मजमा लग गया। उस समय आदमी जिंदा था, धीमी-धीमी सांसे चल रही थी, लेकिन खून बहुत बह रहा था। लोग तमाशबीन बने खड़े थे लेकिन कोई भी मदद के लिए आगे नहीं आया। किसी भले मानस ने पुलिस को फोन लगाया।
पुलिस भी आधे घण्टे बाद पहुंची। स्थल का मुआयना करने लगी। वह व्यक्ति वहीं पड़ा तड़प रहा था। पुलिस अधिकारी ने अपने फर्ज की पूर्ति कर ली। यह कहकर कि ‘’यह जगह हमारे अधिकारी क्षेत्र में नहीं आती ‘’दूसरे थाने से पुलिस आई। बहसबाजी हुई और आदमी को अस्पताल ले जाया गया। वहां भी डॉक्टर व्यस्त थे। इधर कागजाई कारर्यवाही में समय लग रहा था उधर आदमी की स्थिति बद-से-बदतर होती जा रही थी। जब तक डॉक्टर आया और आदमी को ऑपरेशन थियेटर ले जाने लगे, उसी बीच उसने दम तोड़ दिया।
यह सारी खबर मेरे दिमाग में हलचल मचा रही थी कि उस व्यक्ति का कातिल आखिर कौन था, वह खुद, अनाड़ी बस ड़ाईवर, वहां खड़े लोग, पुलिस अधिकारी या अस्पताल के व्यस्त डॉक्टर। ‘’कातिल आखिर कौन था।‘’
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लघुकथा-५
आत्म-सम्मान
विजय राज के इकलौते सुपुत्र का आज विवाह है। बराती सजे-धजे चलने को तैय्यार हैं। आज उसकी और उसकी पत्नी आभा के ख्वाबों की तामील होगी। आभा सुर्ख जोड़े में दुल्हन-सी ही दिख रही है और पूरे होशो-हवास में हर किसी की उपस्थिति का जायजा ले रही है।
घर के एक कोने में बैठी बुढिया, विजय राज की मां जैसे किसी के संदेश का इंतेजार कर रही है। पर किसी का भी ध्यान उसकी तरफ नहीं जा रहा है। धीरे-धीरे घर खाली होने लगा है और मां का धीरज ढोल रहा है वह धीरे से पुकार रही है- ‘’विजय, बेटा विजय, क्या मैं नई साड़ी पहन लूँ।‘’
इतनी व्यस्तता में शायद विजय राज मां को सुन नहीं पा रहे और आभा भी जैसे सुनना नहीं चाहती। बाहर बैण्ड बाजे की आवाज और तेज हो गई है और घर के भीतर अब सन्नाटा छा रहा है।
आभा ने अपनी आया को आवाज दी,”मैना नया सूट पहन कर जल्दी निकलो देर हो रही है।”
मां जी विस्मित और पनीली आंखों से अभी भी बेटे के बुलावे का इंतजार कर रही है।
आभा तेज कदमों से चलती हुई आ गई है, ‘’मां हम जा रहे हैं आपका यहीं रहना ठीक होगा, वहां आपको कौन संभालता फिरेगा।’’
मां का मन भर आया कि कहे बेटा मुझे भी पोते की शादी देखने का चाव है, एक कोने में बिठा देना लेकिन वह कह न पाई और दोनों हाथों में नई साड़ी समेट कर वहीं दरवाजे की मुंडेर पर बैठ गई। उसके आत्मसम्मान ने उसे कुछ भी कहने से रोक दिया और अपने आंसुओं को भी आंखों की दहलीज में ही उसने किसी तरह थाम लिया।

***