सुरेश सौरभ, महेश केसरी, विजयानंद विजय,

पाँच लघुकथा

सुरेश सौरभ
निर्मल नगर लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश पिन-262701
मो- 7860600355

लघुकथा-1
छानबीन
प्रदेश में सरकार एंटी रोमियो अभियान चला रही है। पुलिस कायदे से हर जगह मुस्तैद है।
थाने में एक युवती आयी बोली-‘‘शादी का झांसा देकर मेरा शोषण हुआ। मेरी मदद करें।’’
पुलिस-‘‘सुबूत।’’
युवती ने अपने मोबाइल से कुछ फोटो, कुछ वीडियो पुलिस को सौंपे।
पुलिस-‘‘ठीक है। मामला प्रेम-प्रसंग का लग रहा है। हम छानबीन करेेेंगे।’’
पुलिस छानबीन कर रही थी। छानबीन में, खोज में, सिर्फ वह पैसा ही पैसा, पा रही थी और युवती को पुलिस की दुतकार मिल रही थी। फिर भी युवती थाने जाती, डीएम, एसपी के सामने रोती-गिड़गिड़ाती, उम्मीद कभी न कभी तो न्याय मिलेगा ही।
महीने बीते, साल बीतने लगे, उसे कुछ न मिला, पुलिस छानबीन ही कर रही थी, वह हिम्मत न हारी, मंत्री, मुख्यमंत्री तक अपनी फरियाद की, पर पुलिस अभी भी छानबीन ही कर रही थी, उसके हाथ में सिर्फ आश्वासनों का झुनझुना आ रहा था।
युवती के घरवाले, उसके प्यार पर पहले ही पहरे बिठाए थे, फिर भला मदद कैसे करते, घर से निकाल दिया। फिर भी वह हिम्मत न हारी। कमरा किराये पर लेकर, कुछ कारबार कर, अपने पेट की दो रोटी का जुगाड़ कर, अपनी लड़ाई लड़ती रही।
प्रेमी ने दगा दिया। अब परिवार और मित्रों ने भी हाथ खड़े कर दिये, पर वह न्याय के लिए बार-बार थाने जाती और जब बुलाया जाता तब जाती, अब तो पूछतांँछ के लिए रात-बिरात पुलिस उसे उठाने लगी। प्रताड़ित करने लगी। अकेली लड़की का भगवान के अलावा इस दुनिया में और कोई सहारा न था। जब वह इसकी शिकायत बड़े अधिकारियों से करती, तो पुलिस कहती-हम छानबीन कर रहे है। आवश्यक कार्यवाही हो रही है।
वह दु:खी थी। उसका तन और मन टूट चुका था। बिखर चुका था। आत्मा और दिल जार-जार रो रहा था। वह न्याय माँगती तो उसे दुतकार मिलती। यातना-प्रताड़ना मिलती। उसे अपमानित-प्रताड़ित करने के लिए पुलिस पर पानी सा पैसा, उसका प्रेमी बहा रहा था। पैसे से न्याय की देवी परास्त हो रही थीं। पैसे का भारी बुलडोजर, एक लड़की के जज़बातों को, एक लड़की की आत्मा को, उसके आंसुओं को, कुचले जा रहा था।
एक रोज उस लड़की की लाश दूसरे शहर में लावारिस बरामद हुई। अब पुलिस छानबीन कर रही थी। शहर में एंटी रोमियो अभियान पूरे शाबाब पर था।

लघुकथा-२
जख्म
“पापा आज फिर मुझे पूरी कक्षा में मास्टर जी ने जलील किया। आखिर मेरी कॉपी-किताबें कब लाओगे?“ टुनकते हुए प्रीतम बोला।
“बेटा! क्या बताएँ कोशिश बहुत करता हूँ, पर घर की दाल-रोटी में ही उलझा रहता हूँ, देखो, कुछ बचे तो जल्दी लाता हूँ, तेरी किताबें-विताबें। भगवान् गरीबी किसी को न दे?“
“पापा हम लोग इतने गरीब क्यों हैं।“ प्रीतम ने बाल सुलभ जिज्ञासा प्रकट की।
“बेटा न पूछो तो अच्छा है।“ पापा लंबी उबांसी लेकर बोले।
“बताओ न बताओ न?“ प्रीतम मचल गया।
पापा के बरसों पुराने सूख चुके हृदय के जख्म, आज फिर से हरे हो गये, “बेटा उस समय मैं तेरे जितना था। पिता जी मेरे परदेस में काम करते थे। हम चार-भाई बहनों को माँ अच्छे से संभालती थीं। पिता जी हर माह अच्छा-खासा पैसा भेजते थे, जिससे हमारा परिवार बड़ी खुशहाल जिन्दगी जी रहा था। हम भाई-बहन आराम से पढ़-लिख रहे थे। तीज-त्योहारों में या किसी छुट्टी में जब कभी पिता जी घर आते, तो हमारी खुशी का कोई ठिकाना न रहता!“ कहते-कहते पापा अटक गये, जैसे एकदम से बत्ती चली जाने पर टेलीविजन फट्ट से बंद हो गया हो, तब प्रीतम ने सुकून से लेटे पापा को फिर कुरेदा, ‘‘फिर फिर..गरीबी कैसे आई?“
“एक पुरोहित जी उस दिन घर में पधारे। माँ को अगड़म-बगड़म न जाने क्या-क्या समझाते हुए बोले, “कुंभ का मेला लगा है। 144 साल बाद प्रयागराज में अमृत स्नान का दुर्लभ पुण्य संयोग बना है। दुनिया पुण्य कमा रही है। आप लोग भी जाएँ।…. फिर माँ ने पिता को फोन किया, कुंभ के महत्व को बताया। माँ, पिता जी को, अपने साथ वहाँ ले जाना चाहती थीं ,पर पिता ने अपने काम की व्यस्तता बता कर, माँ को अकेले जाने की अनुमति दे दी। पिता ने कुंभ जाने के लिये, माँ को पर्याप्त पैसा भेज दिया। हम छोटे भाई-बहनों को माँ ने समझाया-तुम सब बच्चे हो, वहाँ भीड़ में खामख्वाह परेशान हो जाओगे, फिर हमें पुचकार कर एक रिश्तेदार के यहाँ ठहरा दिया। कहा-‘अमृत स्नान का पुनीत पर्व है, मैं दो दिन बाद अवश्य आ जाऊँगी। कोई चिंता न करना। माँ हमें छोड़कर कुंभ नहाने चलीं गयीं। उनके साथ गाँव के तमाम परिचित लोग थे, इसलिए हमारे पिता जी और हम सब भाई-बहन निश्चिंत थे। पर….
“पर क्या ?“
“पर कुंभ… “पापा दुरदुराते हुए अपने होंठ चबाने लगे।
“बताओ न पापा आगे क्या हुआ?“’
उठ बैठे पापा, उनके दोनों नथुने गुस्से से फूलने-पिचकने लगे।
“बताओ न पापा आगे क्या हुआ।“ शून्य में खो गए पापा को प्रीतम ने झिझोंड़ा।
“वह आधी रात थी, मेले में अमृत स्नान करने के लिये, हजारों लोग संगम की ओर बढ़ रहे थे। अचानक भगदड़ मच गयी, फिर उसी भयावह भगदड़ में, कोहराम में, आदमी को कुचलते आदमी निकल गये। तमाम मरे, तमाम घायल हुए।…. पिता जी ने माँ को फोन मिलाया, पर फोन बंद। एक दो दिन बाद जब माँ न लौटीं, न फोन मिला, तब दुःखी पिता जी प्रयागराज गये, महीनों तक, सालों तक वहाँ भटकते रहे। इधर-उधर से माँग-जाँच कर लाखों फूँक मारे माँ के लिए, सिर पर बहुत कर्जा हुआ, पर माँ न जिंदा मिलीं न मुर्दा। सरकार नहाने वालों का आंकडा बता रही थी, पर कितने भगदड़ में मर गए, कितने लापता हो गए, उसका पूरा सही आंकड़ा कभी न बता सकी। पिता जी का काम-धाम छूटा। परदेस से वापस आकर गाँव में ही मजूरी-धतूरी करते हुए हमारी देखभाल करने लगे। कर्ज के बोझ में, फिर गरीबी आयी, ऐसी आयी कि हमारी-पढ़ाई लिखाई सब चौपट हो गयी। गरीबी ने हमारे घर में ऐसा स्थाई बसेरा बनाया, जो आज तक हमारे संग बसी हुई है। माँ के कुंभ नहाने से यही पुण्य मिला हमें।“
‘‘पापा क्या कुंभ में नहाने से सारे पाप धुल जाते हैं?’’
पापा खामोश।
“पापा क्या कुंभ में मरने वाले सीधे भगवान के घर जाते हैं?“
“पापा एकदम मौन।“
“पापा गंगा नहाने से और क्या-क्या पुण्य मिलता है?“
“बेटा सो जा मुझे नींद आ रही है, सुबह जल्दी काम पर जाना है। मुझे बस घर की दाल-रोटी के सिवा कुछ नहीं पता।“

लघुकथा-३
लिफाफे
दो अलग-अलग धर्मों के धर्म गुरुओं की एक चैनल पर जोरदार बहसें जारी थीं, लाइव। दोनों अपने-अपने धर्म को श्रेष्ठ बता कर कांव-कांव कर रहे थे। एंकर हड़ा-हड़ा कर रहा था। बहस खत्म हुई। अब वे दोनों, चैनल के एंकरों के साथ नाश्ता करके आपस में हंसी-ठिठोली कर रहे थे।
नाश्ता करके, दोनों चलने को उद्यत हुए तो दोनों को एक-एक लिफाफा पकड़ा कर एक एंकर ने अपने दांत चियारे-“हें हें हें चैनल में बस आप लोग ऐसे ही माहौल बनाए रखें।”
अब दोनों धर्म गुरु एक ही गाड़ी में चुहलबाजी करते हुए जा रहे थे।

लघुकथा-४
बेकारी

“ये पत्थर क्यों तुम फेंक रहे हो।”
“इसके लिए मुझे पैसे मिलतें हैं।”
“कौन पैसा देता है।”
“नेता जी।”
“अगर इन दंगाइयों के साथ पकड़े गए तो।”
“तो हमारे नेता जी धरना-प्रदर्शन करके हमें छुटा लेंगे।”
“कितने लड़के हैं तुम्हारे साथ”
“सैकड़ों”
“यह काम तुमने कब से शुरू किया।”
” जब से नेता जी हमारे गांव आए।”
” क्यों करते हो तुम लोग यह रिस्की काम।”
“बेकारी दूर करने के लिए।”

लघुकथा-५
अनकही आहें

बादल बरसने लगे फिर भी वह कालिख न धुली। तब वह बादल बोला-“हर साल बरसता हूँ यहाँ, पर नीचे फैली यह कालिख नहीं मिटती?”
दूसरा बादल बोला-‘पुराने लोग बताते हैं कि बरसों पहले यहाँ कोई प्लेन क्रैश हुआ था। फिर हर ओर आग ही आग और धुआं-धुआं ही फैल गया। सैकड़ों जल कर मरे। दूर तक काली-काली राख ही राख फैल गयी। आकाश तक उठी लोगों की आहें।”
“अरे! पर जब बरसों बीत गये, तब भी यह कालिख अब तक क्यों दिखाई पड़ रही है।”
“अरे भाई! यह कालिख नहीं प्लेन में दिवगंत हुए निर्दोष मासूम लोगों के दुखों, टीसों और उनकी अनकही, आहों का, अरमानों का मंडराता वह गुबार है जो अमिट कालिख के रुप में हमें दिखाई देता है।

पाँच लघुकथा

महेश कुमार केशरी
C/O -मेघदूत मार्केट फुसरो
बोकारो झारखंड ( 829144)
मो-9031991875
email-kesheimahesh322@gmail.com


लघुकथा-१
मुल्क

“माँ तुम रो क्यों रही हो ? ” -सादिक ने अमीना बीबी के कँधे पर धीरे से हाथ रखकर पूछा।
” नहीं, मैं रो कहाँ रही हूँ ? ”
” नहीं, तुम रो नहीं रही हो तो तुम्हारी आँखों से आँसू कैसे निकल रहे हैं ? ” सादिक , वैसे ही बोल रहा था। जैसे वो, अमीना बीबी की बात को ताड़ गया हो।
“कुछ नहीं होगा… हमलोग..कहीं.. नहीं जा रहें हैं। सादिक ने अमीना बीबी को जैसे विश्वास दिलाते हुए कहा। ”
बहुत मुश्किल से अमीना बीबी का जब्त किया हुआ बाँध जैसे भरभराकर टूट गया। और वो रुआँसे गले से बोलीं – ” इस तरह से जड़ें… बार-बार नहीं खोदी जातीं। ऐसा ही एक गुलमोहर का पेंड़ हमारे यहाँ भी हुआ करता था। तुम्हारे अब्बा ने उसे लगाया था। इस गुलमोहर के पेंड़ को देखकर तुम्हारे अब्बा की याद आती है। सोचा , इस गुलमोहर के पेंड़ को ही देखकर मैं बाकी की बची-खुची जिंदगी भी जी लूँगी। मैंने यहाँ बहुत समय निकाल दिया। अब, सोचती हूँ की बाकी का समय भी इसी जमीन पर इसी गुलमोहर के नीचे काट दूँ। यहाँ की तरह ही वहाँ भी धूप के कतरे , पानी की प्यास और आदमी को लगने वाली भूख में मैंने कोई अंतर नहीं पाया। बार-बार जड़ें नहीं खोदी जाती ..सादिक मियाँ ! ..ऐसे गुलमोहर एक दिन में नहीं बनते। ”
और अचानक से अमीना बीबी जोर जोर से रोने लगीं।
सादिक ने अमीना बीबी को अपनी बाहों में भर लिया और चुप कराने की कोशिश करने लगा। अमीना बीबी को चुप कराते- कराते सादिक भी पता नहीं कब खुद भी रोने लगा।

लघुकथा-२
कॉलम
दसवीं में पढ़ने वाले गौरव के सवाल पर पहले तो सुधांशु सर खीजे, फिर वे बोले – ” तुम्हें क्या फर्क पड़ता है, कि इस काॅलम में हिन्दू, क्यों लिखा हुआ है..? या इस काॅलम में मुस्लिम , सिक्ख , ईसाई , या पारसी क्यों लिखा हुआ है ? तुम्हारा काम है फार्म भरना। चुपचाप फार्म भरकर जमा करो। और अपने इम्तिहान की तैयारी करो । ” और, वे अपने रजिस्टर में कुछ दर्ज करने लगे।
ठीक है सर – ” तब आप मुझे ये बताइये। मुनव्वर जिस ब्रेड को खाता है। वो भी उसी बेकरी से आती है, जहांँ से मेरे पिताजी ब्रेड लाते हैं। ब्रेड के रंग में मैनें कोई अंतर नहीं पाया। जो , ग्वाला हमारे यहांँ दूध पहुंँचाता है। उसका रँग सफेद होता है। ऐसे ही मुनव्वर के यहांँ भी आने वाले दूध का रँग भी सफेद ही होता है। पेंड़, सबको बराबर, फल और हवा देते हैं। सूर्य की किरणें भी नाप- तौलकर किसी को धूप के रेशे नहीं बांँटती। जब सारे लोग एक जैसे ही हैं। तो, धर्म का काॅलम क्यों बनाया गया है ,सर ? ”
सुधांशु सर गौरव के इतने सारे सवालों को सुनकर भौंचक्के से रह गये। एक बार उनको लगा की ये लड़का पढ़ता जरूर छोटी क्लास में है, लेकिन, है बहुत ही जहीन। गौरव के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोले – ” बेटा आदमी और आदमी को बाँटने के लिए ही कुछ स्वार्थी लोगों ने ऐसे कॉलम बनाये हैं। ताकि उनका हित सधता रहे। आदमी इसी तरह एक काॅलम के अंदर बंँद होता है। साँसें जरूर प्रकृति के दिये पेंड़ों से लेता है। पीता जरुर चश्मे का पानी है। लेकिन वो अपने कॉलम में ही सिकुड़ा -सिमटा रहता है।
अपने अंतर्विरोधों और कुँठाओं से लड़ता रहता है। जब वो इस कॉलम से निकलना चाहता है, तो अक्सर छोटे-बडे़, ऊंच – नीच और अमीरी गरीबी के भेद उसे घेर लेते हैं। दूसरों से अपने को श्रेष्ठ समझना, इसी में उलझकर वो ताउम्र अपने और अपने जैसे लोगों से लड़ता रहता है। अच्छा लगा ये जानकर, कि नई पीढ़ी अपनी इन कुंठाओं से निकल कर ऐसे कॉलम को खत्म करना चाहती है। तुमसे और तुम्हारे जैसी सोच रखने वाले विधार्थियों से ही ये कॉलम खत्म होगा। चलता हूँ बेटा। मुझे साइंस का क्लास भी लेनी है। ”
धीरे-से उठकर सुधांशु सर क्लास से बाहर चले गये।

लघुकथा ३
दर्द

उस्मान साहब कुर्सी पर बैठते हुए अचानक से फिर उसी रौ में कराहे, जैसे इन महीनों में‌ जब से सर्दियाँ शुरु हुई थीं वे कराहा करते थे। दर्द की एक पतली महीन रेखा उनके चेहरे पर उभर आई थी । कमबख्त घुटनों ने परेशान कर रखा है, इन दिनों । सर्दियों में उनकी तकलीफ अक्सर बढ़ जाया करती है‌ ।
वे फिर से एक बार कराहे
_” ऊफ! या अल्लाह ..।”
और बैठक से निकलकर ओसारे में आ गए। जहाँ फलांग भर की दू‌री पर रूकैया साड़ी वा‌ले से साड़ी खरीद रही थी । उनको देखा तो ‌उनको नजरअंदाज करते हुए साड़ी वाले से ‌बातों में उलझी रही।
थोड़ा रुककर वो‌ रुकैया से बोले – ” बहू, ‌‌मेरा ‌ नीकैप कब‌का खराब हो गया है। और , ठंड की वजह से जोड़ों मे कनकनाहट होती रहती है । अनवर से कहो ना एक जोड़ी नीकैप बाजार से ला दे । मैं तो अनवर‌ से कह-कहकर‌ थक गया। लेकिन‌ वो आज-कल करके टाल जाता है। ”

रूकैया साड़ी को एक तरफ रखते हुए बोली – ” यहाँ लोग अपने लिए कमाएँ या औरों के लिए । समझ में नहीं आता। मर- मर के दिन रात काम करो। तब भी घर में बरकत नहीं होती। छोटी सी नौकरी में लोग क्या-क्या जुटायें? एक तरफ ढको तब दूसरी तरफ उघड़ जाता ‌है। अभी पिछले साल ही तो उन्होंने आपको नीकैप खरीदकर दिया था। क्या इतनी जल्दी खराब हो गये।”
” अरे, पिछले साल कहाँ दो- तीन साल पहले अनवर ने नीकैप लाया था। एक नीकैप का रबर पूरी तरह खराब हो गया है। घुटनों से नीकैप नीचे गिर जाता है। और घुटनों में कनकनाहट बढने लगती है।”
ग्रामो फोन की सुई जैसे उस्मान साहब के गले में घरघराई ।
” दोनों पैर में दर्द है या एक ही पैर में? ” –
रूकैया ने पाँच सौ के दो नोट साड़ी वाले की तरफ बढाते हुए पूछा ।
” कभी-कभी एक पैर में भी करता है। और‌ कभी-कभी दोनों पैरों में भी ।”
उस्मान साहब खुरदरी दीवार की तरफ ताकते हुए बोले‌ ।
” आप एक ही नीकैप को बदल-बदल कर क्यों नहीं पहनते ? जब जिस पैर में दर्द ज्यादा हो उस पैर में पहन‌ लिया कीजिए। इससे पैसा भी बचेगा और सामान‌ की यूटीलिटी भी बरकरार रहेगी ।
” रूकैया कमरे में जाते हुए बोली ।
उस्मान साहब के चेहरे पर उदासी और दु:ख के कोहरे और ज्यादा घने हो गए। जो आँखों के रास्ते धीरे- धीरे बहने लगे।
वे अस्फुट स्वर में जैसे बोले – ” दर्द को बदलकर भी भला कोई पहनता है क्या? मेरा बस चलता तो उसे साबुत उखाड़कर ना फेंक देता !”

४.
लघुकथा..
सॉरी दीदी..

मालती ने अपने भाई, सुभाष को उलाहना देते हुए कहा-” तुम को तो क्षण भर का भी समय नहीं रहता होगा , कि अपनी बहन और अपने भाँजे की कभी खैर-ख्वाही ही पूछ लो। उस दिन जब मेरे बेटे ने प्रतियोगिता परीक्षा में टॉप किया तो सोशल मीडिया पर बधाईयों का ताँता लग गया। लेकिन, तुम्हें शायद खुशी नहीं हुई होगी। तुम तो सोशल मीडिया पर भी बहुत एक्टिव रहते हो। फिर भी कभी तुमने फोन भी ना किया, कि अपनी बहन और भाँजे का हाल ही ले लेते। ”
रसगुल्ले के प्लेट से एक रसगुल्ला उठाकर अपने मुँह में रखते हुए सुभाष मजाकिया अँदाज में बोला -” नहीं दीदी, ऐसी कोई बात नहीं है। बस यूँ ही याद नहीं रहा। इसलिए फोन नहीं कर पाया। सॉरी..दीदी। ” सुभाष बात को टालने की गरज से बोला।
मालती देवी फिर, उसी रौ में बोली- ” आखिर, अपनी जाति- बिरादरी का नाम प्रभाकर ने रौशन किया है। अब तक हमारी जाति में ऐसा मुकाम बहुत कम लोगों ने हासिल किया है। मुझे गर्व है अपने बेटे पर ! ”
आखिर, सुभाष से भी ना रहा गया। वो भी पहलू बदलते हुए बोला- ” हम किस बात का घमंड करें दीदी। इस बात का कि हमारा भाँजा, प्रभाकर ने लॉ की परीक्षा टॉप क्लास में पास कर ली है। देखियेगा, हमारा यही प्रभाकर, जब प्रैक्टिस करने लगेगा। जब कोई अपनी जाति वाला ही अपनी कोई परेशानी लेकर जायेगा, तो कैसे कन्नी काटता है.? फाइल पर बिना चढ़ावा रखे उसे छूएगा भी नहीं । फिर, किस बात का गौरव। हमें क्यों खुश होना चाहिए? अपनी जाति पे दीदी? प्रभाकर अब हमारा रहा ही कहाँ है? वो तो अब एक अलग दुनिया का होकर रह गया है। फिर, उसे किस लिए बधाई और, शुभकामनाएँ दी जाये? अपने ही लोगों का खून चूसने के लिए?
आम- आदमी, जब आदमी से बाबू बनता है, तो उसके और उसके बाबू पन के बीच एक महीन रेखा खिंच जाती है। सीमा के इस पार आम आदमी होता है और उस पार बाबू। आम-आदमी से बाबू बनते हुए उसे पता ही नहीं चलता , कि कब वो अपने साथ वालों को बहुत पीछे छोड़ आया है। सॉरी, दीदी, मैं प्रभाकर को बधाई नहीं दे सकता। ”
अपने, सगे भाई सुभाष के मुँह से ऐसी बात सुनकर मालती देवी को शॉक-सा लगा। छत पर घूमते हुए हाईस्पीड पँखे की ठंढी हवा के बावजूद मालती देवी की पेशानी पसीने से तरबतर हो गयी।

लघुकथा -५
रावण..

दस साल का विशाल दशहरे का मेला देखने रामलीला
मैदान अपने पिताजी के साथ गया था। राष्ट्राध्यक्ष ने रावण के ऊपर तीर चलाया और कुछ ही देर में रावण का पूतला धू-धू करके जलने लगा।
जिसे देखकर लोग आपस में हर्ष और उल्लास मनाते हुए
एक -दुसरे को अबीर और गुलाल लगाने लगे थे। आज दशहरे का पर्व संपन्न हुआ था। और लोग बुराई पर अच्छाई की जीत की खुशी धीरे- धीरे मनाने लगे।
विशाल अपने घर आकर अपने पिता अंकित से बोला -“पिताजी, रावण की हत्या क्यों हुई थी…?”
अंकित अपने बेटे विशाल को सदियों पहले का किस्सा बताने लगा – ” उन्होंने विशाल को बताया, बेटा सालों पहले, रावण, ने सीता जी का अपहरण कर लिया था। श्रीराम जी ने, रावण को बहुत समझाया, कि वो सीता को ज्यों- का- त्यों लौटा दे। लेकिन, रावण बहुत ही जिद्दी और अहंँकारी व्यक्ति था। वो नहीं माना। और परिणाम स्वरूप राम ने रावण का वध कर दिया। ”
विशाल अपनी जिज्ञासा को ज्यादा देर तक नहीं रोक सका। एक बार फिर उसी लहजे में अपने पिता अंकित से बोला – ” पिताजी मैनें किताबों में पढ़ा है, कि हम मनुष्य हैं। हमारे अंदर करुणा, क्षमा , दया , संवेदनशीलता हमेशा मौजूद होनी चाहिए। यदि ये चीजें हमारे अंदर नहीं है। तो हम मनुष्य नहीं हैं। हमारे धर्म में तो यही सिखाया जाता है, कि सभी जीवों पर दया करनी चाहिए। अहिंसा परमो धर्म: । गलती से भी हम एक चींटी को भी ना मारें। क्या भगवान श्री राम के अंदर ऐसी, दया, करुणा , क्षमा और संवेदनशीलता नहीं थी…?”
तभी, उसने एक सवाल और पूछ लिया – ” क्या हम मनुष्य भी इतने असंवेदनशील हैं, कि हर साल एक रावण को जलाते हैं। हमारे अंदर भी दया, करूणा, खत्म हो गई है, शायद। ”
विशाल के इस प्रश्न पर अंकित उजबकों की तरह खाली दीवार को ताकने लगा। एकाएक उसे कोई जबाब नहीं सूझ रहा था।

पाँच लघुकथा

विजयानन्द विजय
राजगीर, नालंदा।

लघुकथा-१
जन-गण-मन

मैदान में स्कूली बच्चे, पुलिस के जवान और एनसीसी कैैैडेट्स मुस्तैद थे। स्वतंत्रता दिवस पर झंडोत्तोलन होने वाला था।
ज्यों ही मुख्यमंत्री ने झंडा फहराया, स्कूली बच्चों, पुलिस के जवानों और एनसीसी कैडेट्स के साथ उपस्थित जनसमूह ने भी जोरदार सलामी दी और ” जन गण मन….” फ़िजां में गूँजने लगा।
मेरी निगाह ध्वज-मंच और मैदान से होकर भीड़ के उस हिस्से पर गयी, जहाँ गाँधी टोपी पहने, खादी वस्त्रों में एक कृशकाय वृद्ध आसमान में फहराते राष्ट्रीय ध्वज को एकटक देख रहे थे और सलामी देते हुए पूरे जोश से राष्ट्रगान गा रहे थे। उनके हावभाव, उनका स्वर और उनकी मुद्रा सभी से अलग थी।
जब राष्ट्रगान खत्म हुआ, तो मैं उनके पास गया। उनकी आँखों से झर-झर आँसू बह रहे थे। हाथ जोड़कर मैंने उनसे उनका परिचय पूछा।
” मैं एक स्वतंत्रता सेनानी हूँ…।” उन्होंने डबडबाई आँखों से काँँपती आवाज में कहा…।

लघुकथा-२.
डोर

उसने सड़क किनारे कार रोकी ही थी कि वे दौड़कर उसके पास आ गये।फटे-पुराने कपड़े पहने सभी बच्चे कातर नजरों से उसे देखने लगे।उसने कार की डिक्की खोली और लंच पैकेट उन्हें देने लगा। वे उन पर ऐसे टूट पड़े, मानो कई दिनों के भूखे हों। वह वहीं खड़ा होकर उन्हें देखता रहा। एक बच्चा उसके पास आया और एक कौर उसके मुँह में भी डाल दिया। वह मुड़ा और अपनी आँखें पोंछते हुए कार में बैठ गया।
फिर वह आगे बढ़ गया।फुटपाथ पर दोनों पैरों से लाचार एक बूढ़े बाबा बैठे दिखाई दिए।उन्हें लंच पैकेट और पानी की एक बोतल थमाई।बाबा खुश हो गये और उसके सिर पर हाथ रखकर ढेरों आशीर्वाद दिए।
सामने एक मजदूर अपनी पीठ से बोरा उतारने की कोशिश कर रहा था। उसने उसकी मदद कर दी।वह खुश हो गया।उसने जब लंच पैकेट और पानी का बोतल बढ़ाया, तो मजदूर ने आगे बढ़कर उसे गले लगा लिया।उसका गले मिलना आज उसे बहुत अच्छा लगा।
अपने जीवन की घड़ी की टिक-टिक की आवाज उसे साफ -साफ सुनाई पड़ रही थी।ज़िंदगी की सच्चाई का अहसास उसे हो गया था। बेहिसाब अर्जित धन, आलीशान घर, बँगले, गाड़ियाँ, ऐश्वर्य, सुख-सुविधा, मँहगी जीवन शैली और अनाप – शनाप खर्चे…सब उसे बेमानी लगने लगे थे। नहीं ! यह जीवन नहीं है। जब तक दुनिया में कोई भी भूखा, दु:खी या कष्ट में है, तब तक वह खुश कैसे रह सकता है ? जबसे डॉक्टर ने उसे थर्ड स्टेज कैंसर बताया है, जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण ही बदल गया है। बिजनेस की जिम्मेदारी पत्नी-बच्चों ने सँभाल ली है। वे धीरे – धीरे उसके बिना जीने की तैयारियाँँ करने लगे हैं, और वह निराशा के गर्त्त में जाना नहीं चाहता है।
बैठे-बैठे मौत का इंतजार करने की बजाय उसने अब दूसरों को खुशी और ज़िंदगी देने का निश्चय कर लिया है।रोज सुबह वह पास वाले होटल में जाता।वहाँ से लंच पैकेट्स और पानी की बोतलें डिक्की में भरवाता और निकल पड़ता – शहर की सड़कों पर – उदास आँखों में खुशी की किरण तलाशने।गरीब, बेसहारा, असहायों को खुशी देकर, उन्हें खुश देखकर, उनका स्नेह और आशीर्वाद-भरा स्पर्श पाकर उसे बहुत संतोष मिलता था और उन अनगिनत उदास आँखों में सूरज की चमक देखकर उसकी उम्र की डोर भी लंबी होती जाती थी।

लघुकथा-३
भगवान को बताऊँगा !
” भगवान से सबकी शिकायत करूँगा माँ।उन्हें सब कुछ बताऊँगा…बताऊँगा कि तुम लोगों ने क्या किया है…। ” – अस्पताल में बुरी तरह लहूलुहान, दर्द से कराहते और रोते हुए उस मासूम बच्चे के कातर स्वर ने कलेजा छलनी कर दिया।सबकी रगों में खून मानो जम-सा गया था और कंठ अवरूद्ध हो गये थे। शब्द जुबाँ पर आ-आकर लौट जाते थे।इंसान को इंसान होने पर शर्म आने लगी थी। संवेदना और चेतना तक स्तब्ध हो गयी थी।
इंसान ही इंसान के खून का प्यासा !
क्या इंसानियत मर गयी है, या इंसान में ही दानवता समा गयी है ?
युद्ध के अंतहीन काले, घने, अंधेरे, डरावने और वीभत्स बादलों से बुरी तरह घिरे उस देश में रोज बमों के धमाके होते रहते थे। खंडहर में तब्दील हो चुके घर, मकान, गाँव, शहर और उसकी हर दरो-दीवार तबाही की मनहूस कहानी कह रहे थे।
सत्तामद, लोभ, अहंकार और वर्चस्व स्थापित करने की शैतानी होड़ में सिर्फ़ जान ही नहीं जाती, इंसानियत और इंसानी सोच के भी चीथड़े उड़ते हैं… !
शहर से दूर देश की सीमा पर बसे उस गाँव में अमन-चैन की ज़िन्दगी बसर कर रहा था बप्पा..अपने माँ-बाप, दादा-दादी के साथ। हरे-भरे खेत-खलिहान और लहलहाते फसलों को छूकर गुजरती शीतल हवा, मनोहारी दृश्यावलियाँ, चिड़ियों की अनवरत चहचहाहट, कल-कल बहते झरनों का सुमधुर संगीत और खेतों की उन सर्पीली पगडंडियों से होकर स्कूल की ओर जाने वाले रास्ते का हर मोड़ बप्पा को याद था, जिसे वह अक्सर मस्ती में गुनगुनाते हुए ही पूरा कर लेता था। पता ही नहीं चलता था कि कब स्कूल आ गया।
स्कूल में दिन भर स्लेट और पेंसिल की ” खट-खट “, खेल-खेल में पढ़ाई करना, पाठ याद करना, साथियों के संग भरपूर धमाचौकड़ी और गुरू जी की छड़ी की मार…जीवन का हर सबक सिखा देती थी।
शाम को घर आते ही वह मचलकर दादी की गोद मेंं बैठ जाता। माँ के हाथ से दूध-रोटी खाता और चंदा मामा की कहानी सुनते हुए दादी की गोद में ही सो जाता। यही तो उसकी रोज की दिनचर्या थी। द्वेष, छल-कपट और इंसानी वैमनस्य से कितना बेफिक्र था उसका प्यारा-सा बचपन… !
मगर, वह काली अँधेरी रात तो रूह तक को कँपा देने वाली थी… !
आसमान में ” साँय-साँय ” की आवाज !
सायरन की गूँज !
कानों को फाड़ देने वाला तेज धमाका।
…और फिर डरावना सन्नाटा।
फिर एक-पर-एक धमाके…और फिर स्तब्धकारी सन्नाटा।
दिल दहलाने और हड्डियों तक को सिहरा देने वाला डर…..और आबोहवा में घुलती हुई बारूदी गंध !
लगातार धमाकों की आवाज़ से माँ डर गयी थी उस रात।
मगर दादाजी ने कहा – ” यह तो रोज – रोज की बात है देश की सीमा-रेखा पर बसे इस गाँव के लिए। इससे क्या डरना ? ”
अगली सुबह तैयार होकर, बस्ता कंधे पर टाँगे घर से निकलकर बस, नजर के सामने स्थित उस गाँव में पहुँचा ही तो था नन्हा बप्पा, जहाँ उसका स्कूल था…कि अचानक आसमान में एक चिंगारी उभरी, जो उस स्कूल पर ही आकर गिरी। जोरों का एक धमाका हुआ, धुएं का गुबार उठा और फिर चारों ओर अँधेरा छा गया…!
भयावह चीख-पुकार मच गयी। करूण, कातर आर्त्तनाद जमीन से उठकर आसमान तक को गुँजायमान कर गया !
माँ-बाबूजी, दादा-दादी समेत पूरा गाँव स्कूल की ओर दौड़ पड़ा।
” बप्पा…बप्पा ” – चीखती हुई माँ अपने लाल को तलाशने लगी…लाशों के उन ढेरों में !
आखिर, पिता को मिला वह….बुरी तरह खून से सना हुआ… स्कूल की सीढ़ियों पर, जहाँ उसके कई साथी और गुरू जी भी निष्प्राण पड़े हुए थे… !
उन्होंने भगवान का नाम लेकर डरते-डरते बप्पा को उठाकर गले से लगा लिया। कलेजे पर हाथ रखा, तो साँसें चल रही थीं। सुकून हुआ। भगवान का शुक्र है।
उनकी जान-में-जान आई।
एंबुलेंसों के सायरन और पास आते सैनिकों के बूटों की आवाज सुन वे बप्पा को लेकर दौड़ पड़े।
शरीर से खून बहुत बह चुका था। बप्पा का पूरा शरीर जख़्मों से भरा हुआ था। पूरे शरीर पर पट्टियाँ-ही-पट्टियाँ थीं। सभी उसके आस-पास ही बैठे थे !
माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरा, तो बप्पा ने आँखें खोलीं। अधमुँदी आँखों से बप्पा ने मां की ओर देखा, तो दोनों की आँखों की कोरों से आँसू ढुलक पड़े।
माँ ने कलेजा कड़ा करके बप्पा से पूछा – ” तुम ठीक तो हो न बेटा… ? ”
बप्पा ने माँ की ओर देखते हुए हल्के से सिर हिलाया और बुदबुदाया – ” मैं भगवान से सबकी शिकायत करूँगा माँ। उन्हें सब कुछ बताऊँगा…। ” और.. बप्पा शाँत हो गया ! उसकी आँखें हमेशा के लिए मुँद गयीं !
एक मासूम आत्मा मानव के क्रूर अत्याचार की कहानी भगवान को सुनाने भगवान के पास चल पड़ी…!
पर आश्चर्य !
वहाँ किसी के गले से चीख भी नहीं निकली !
किसी के पास बप्पा के प्रश्नों के उत्तर नहीं थे !
वहाँ शांत, नीरव खामोशी थी…इंसान के अंदर के इंसान के मर जाने की..!
नि:शब्द कातरता की..!
मौन हाहाकार की..!
दानवता के नग्न नृत्य की.. !
इंसानियत के अंत की !

लघुकथा-४.
धर्म और मज़हब

जंगल के सारे जानवर बेचैन हो गये थे। पास के नगर के भयंकर सन्नाटे ने उन्हें परेशान कर दिया था।
नगर का दृश्य देख वे सिहर गये। चारों ओर आग की उठती लपटें…धुआँ….कालिख…राख….जली हुई बस्तियाँ….यत्र-तत्र जले-अधजले शव ! हवाओं में घुली अमानुषिक और दमघोंटू गंध।
” लगता है लोग यहाँ आपस में ही लड़ मरे हैं। ” – एक वृद्ध जानवर ने लंबी साँस खींचते हुए कहा।
” क्या ? ऐसा ? मगर वे तो इंसान हैं। सृष्टि के सबसे बुद्धिमान और विवेकशील जीव ! वे ऐसा कैसे कर सकते हैं ? ” – एक साथ सभी जानवर बोल पड़े।
” उससे क्या फ़र्क पड़ता है। सुना नहीं है कि जब विचार कलुषित और दूषित हो जाते हैं, तो लोग जानवर से भी बदतर हो जाते हैं ? जाति-धर्म जैसी संकीर्ण विचारधारा के आधार पर जब वे बँट जाते हैं, तो फिर एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। इतने जानवर तो हम भी नहीं !” – एक बुजुर्ग ने तार्किक रूप से समझाने की कोशिश की। सभी जानवर उसकी ओर देखने लगे।
सहसा सबकी नजर सड़क पर खून से लथपथ मरे पड़े एक कुत्ते की ओर जाती है और प्रश्न हवाओं में तैर जाता है – ” मगर….इस बेजुबान का धर्म और मज़हब क्या था ? ”
किसी के पास इसका कोई जवाब नहीं था।

लघुकथा-५
खुलती गाँठें

” पापा ! पापा ! देखो न ! स्वीटी को क्या हो गया… ? ” चार वर्षीया बेटी घबराकर दौड़ती हुई उसके पास आई और हाथ पकड़कर उसे गार्डेन की ओर ले जाने लगी…गुड़हल के उस पेड़ के पास जहाँ स्वीटी अक्सर रहा करती थी अपने चारों बच्चों के साथ।
” पापा, देखो, स्वीटी कैसे सो गयी है ? उठ ही नहीं रही। ” कहते हुए बेटी सुबकने लगी।
उसने पास बैठकर धीरे से बिल्ली को सहलाया।मगर, आह !
” ओ माई गॉड ! ये तो….। ” शब्द जैसे उसके मुँह में ही अटक गये।मगर, बेटी शायद समझ गयी।
” मम्मी..ई…ई।” बेटी जोर से चिल्लाई और पापा से चिपट गई। बेटी का करूण-क्रंदन उसके अंतर्मन को बेध गया।
रोते-रोते बेटी ने पूछा – ” पापा, स्वीटी के बच्चे मम्मी के बिना अब कैसे रहेंगे ? इनके तो पापा भी नहीं हैं। ” अनुभूति और दर्द से उपजे बेटी के इस सहज स्वाभाविक प्रश्न ने उसके वजूद तक को झकझोर दिया।लगा जैसे अंदर कुछ ‘ छनाक ‘ से टूटकर बिखर गया हो। मगर, खुद को सँभालते हुए उसने कहा – ” नहीं बेटा।हम हैं न ? ” और प्यार से उसे गोद में उठा लिया।
” हम हैं न ! ” कितनी आसानी से बेटी को कह दिया था उसने।
मगर, उसे पता था कि वह झूठ बोल रहा है।
श्वेता के मम्मी-पापा इसी शहर में रहते थे।ऑफिस से लौटते वक्त अक्सर वो उनके पास चली जाया करती थी।कभी-कभी तो वहीं रूक भी जाती थी।बस फोन पर उसे ” सारी ” कह देती।
उस दिन बस इतना ही तो कहा था उसने श्वेता से कि माँ-बाबूजी और अपनी बेटी के प्रति भी उसके कुछ दायित्व हैं। उसे इस बारे में भी सोचना चाहिए।
बस, इतनी-सी बात पर वह सबकुछ छोड़कर अपने मम्मी-पापा के पास चली गयी थी।कई बार उसने फोन किया, मगर श्वेता ने उठाया ही नहींं।
मगर, इसमें गलती श्वेता की भी नहीं थी। उसका छोटा भाई राकेश जब अमेरिका जाकर बस गया, तो बूढ़े मम्मी-पापा की देखरेख करने वाला श्वेता के सिवा था भी कौन ?
आखिर वह भी अपने माँ-बाबूजी की देखभाल तो कर ही रहा है न ? अगर श्वेता भी यही कर रही है, तो इसमें गलत क्या है ? गलती दरअसल उसी की है। उसे ही श्वेता से माफी माँग लेनी चाहिए।
सोचते-सोचते बेटी को गोद में लेकर वह मुड़ा और उसकी पनीली आँखों में उतरते हुए कहा, “मम्मा को लाने चलें?”
” हाँ पापा।” – बेटी ने चहकते हुए कहा और पापा से लिपटकर उनके गाल पर एक मीठा-सा ‘पुच्चू’ दे दिया और मुस्कुराने लगी। उसकी मुस्कुराहट से जैसे सारा जहाँ मुस्कुरा उठा था। उनकी कार अब श्वेता के घर की ओर जा रही थी। उसके मन पर पड़ा बोझ अब उतर चुका था।

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