सुरेश वशिष्ठ. तेजवीर सिंह तेज. शैलेश वीर

पाँच लघुकथा

सुरेश वशिष्ठ


लघुकथा-१
कोड़ी की कीमत

फोन की घंटी घनघना उठी। स्क्रीन पर किसी उर्वशी का नाम था। सोचा–‘कौन होगी?’ कुछ देर असमंजस में रहा, फिर फोन रिसीव कर कहा–‘हेलो !’

“पवित्र बोल रहे हो?” आवाज आई।

“हाँ, तुम कौन?”

“भूल गए?”

“कुछ याद नहीं पड़ रहा… तुम्हीं बतला दो !”

“तुम्हारे कॉलेज के समय की हीरोइन, जिसे तुम बहुत चाहते थे–‘उर्वशी’…याद आया?”

“ओह ! उर्वशी तुम….इतने सालों बाद आज अचानक? मेरा नम्बर कहाँ से मिला तुम्हें?”

“कॉलेज में हमारे साथ थी न….उमा त्यागी, आज-कल पहुँची हुई कवियत्री है। एक गोष्ठी में उनसे मुलाकात हो गई। तुम्हारी बातें चली तो नंबर मिल गया। आज सुकून से बात करने बैठी हूँ। तुम्हारे पास समय का अभाव तो नहीं है ना?”

“नहीं-नहीं, मुझे तो खुशी हो रही है कि तुमसे बात कर रहा हूँ।”

“हाँ, प्यार तो परवान चढ़ न सका, अब बातों से ही दिल बहला लें !…कुछ और जरिया तो है नहीं।”

“तुम छोड़कर गई तो दिल में मलाल था। लम्बे अर्से तक दिल की गहराई में तुम्हें बैठे हुए महसूस करता रहा। तुम शाहिद के साथ निकाह कर चली गई थी। लेकिन तुमने ऐसा किया क्यों? मुझे बीच मझधार में छोड़कर यूँ चले जाना मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा था?”

“वह मेरी भूल थी। मैंने तुम्हारे समर्पण और प्रीत को समझा ही नहीं था। उसके झाँसे में ऐसी आई कि पूरी कायनात में वही एक दिखता था।”

“अब कहो, वही प्रीत अब भी बची है या नहीं?”

“किससे….तुमसे या शाहिद से?”

“शाहिद से, मुझसे तो तुमने प्रीत की ही कब थी जो बची रहती?”

“कहा ना–मेरी भूल थी वह। सब्जबाग ऐसे दिखाए कि कुछ समझ ही नहीं सकी।” और वह बिसुरने लगी।

“क्या हुआ….लगा कि तुम रो रही हो ! कानो ने बिसुरने की आवाज सुनी है।”

“तुम्हारे कानों ने सही सुना है।”

“क्यों….जिसके लिए छोड़कर गई थी, उसने तुम्हारे प्यार को बिसरा दिया क्या?”

एक टीस और सिसकन बह चली थी। काँपती-सी आवाज में उसने कहा–‘धोखेबाज था वह….मुझसे निकाह करना साजिश थी, एक जिहाद था।…. आँखें जब खुली तब तक वह तलाक दे चुका था।”

“तलाक…!”
“हाँ तलाक….और फिर नदीम ने, उसी के नक्शे कदम पर चलते हुए फिर से मुझे फुसला लिया। मेरा घर-बार, नाते-रिश्ते, धर्म-संस्कृति सब तो छूट ही गए थे। उसी का फायदा उठाकर वे मुझे इस्तेमाल करते रहे। फिर ‘बोली’ लगने का सिलसिला शुरू हुआ।”

“मतलब…?”

“तुम्हें मेरी देह चाहिए तो बोली लगानी पड़ेगी और कोड़ियों के भाव मुझे खरीदा जा सकता है। मेरी कीमत ज्यादा नहीं है।”

लघुकथा-२
किसका घर

“सुनों प्रतिभा, कुंभ स्नान के लिए चलते हैं। कुछ दिन घर से बाहर रहेंगे तो सुकून मिलेगा। बेटे और बहुओं में आये दिन की कलह से बचे भी रहेंगे।” देवेश ने पत्नी से कहा।

पत्नी ने पति को लाचार निगाहों से देखा। कुछ क्षण मौन रही। फिर कहने लगी–“आत्मिक शान्ति के लिए आध्यात्म ने प्रयास तो बहुत किए लेकिन सफलता नहीं मिली। चार दिन बाद वापस यहीं लौटकर आना पड़ेगा। चार दिन की खुशियों से बाकी बचा जीवन तो कटने वाला नहीं?”

“आस्था के मार्ग से भटक जाना ही दोष है। पता क्या, इस मार्ग से हम भी भटक रहे हों? और वहाँ सुकून के अच्छे दिनों में क्या मालूम, हम भगवान को प्यारे हो जावें। पहले चल तो पड़ें। वहाँ तय कर लेगें कि कहाँ समय बिताना है। और कैसे बचे दिनों को जीना है?”

“नहीं। जिस औलाद को जन्म दिया। समझा कि बुढ़ापे में ये हमारा ख्याल रखेंगे। वही बेकद्री करने लगें, तो बात समझ से परे हो जाती है।… उस दिन, तीनों लड़कों के बीच नौंक-झौंक के बाद जो झगड़ा हुआ, उसे बर्दाश्त करने की हिम्मत ना तुम्हारी रही, ना मेरी?”

“अभी तक तो इनके खर्चे हम ही कर रहे हैं। इतने पर भी ये हालत?.. खर्च करना बंद कर देगें, तब देखना–ये ना तुम्हारे रहेंगे, ना मेरे?”

“बात तो ठीक है।… अब मोह, प्रीत और ममता मिटती जा रही है। यहाँ भी रहने को मन नहीं है। सोचा नहीं था, ऐसे भी दिन देखने पड़ जाएँगे।… जैसा आपको अच्छा लगे, वही ठीक। आगे नसीब में जो होगा, देखा जाएगा?”

अगली सुबह। कंधों पर बैग लादे दोनों पति-पत्नी घर से बाहर निकल लिए। बेटे और बहुएँ तो नींद से जागे भी नहीं थे। वे सोकर ही देर से उठते हैं। उन्हें तो मालूम भी नहीं कि माँ-बाप कहीं बाहर जाने की तैयारी में हैं। घर से निकले और दस-पन्द्रह कदम ही चले थे कि पत्नी पीछे मुड़कर घर की तरफ अजीब-सी नजरों से देखने लगी।
देवेश ने पूछा–“पीछे मुड़कर क्या देख रही हो प्रतिभा?”

“देख रही हूँ, इस बसेरे को बनाने में, पूरा एक जन्म बीत गया। कितना परिश्रम किया और पसीना बहाया। तिनका-तिनका जोड़ कर इसे पूरा किया। सुख के दिन और रातें बीत गई। हमारा मोह था, इसे बनाने और सँवारने में। यह कभी हमारे सपनों का महल था। आज सोचती हूँ–“नहीं जानते थे कि यह घर कभी हमारा नहीं रहेगा?”

लघुकथा-३
सुख

“हाँ बोलो, क्यों तुमने मुझे यहाँ बुलाया?” नाराजगी प्रकट करते हुए श्रद्धा ने परेश से पूछा।

“मिलने को जी चाहता था, इसलिए।” परेश बोला।

“अपने जी को काबू में रखो। अब हमारे बीच कुछ रह नहीं गया है। तुम्हें बताया तो था कि मैं अब किसी और की होने जा रही हूँ। तुम आगे से मुझे फोन भी नहीं करना।” तीखेपन से श्रद्धा ने कहा।

“देखो यहाँ सड़क पर खड़े रहकर कोई बात नहीं हो सकती। अंदर कैफे में कुछ देर बैठते हैं। या फिर सामने पार्क के एकांत में। एक लंबे अरसे तक हमने एक-दूजे को चाहा है। आज एकदम से इतनी लम्बी दूरी बना लेना ठीक नहीं। हमने प्यार किया था, फिर अचानक तुम्हारा यह फैसला?” परेश की आँखों में पानी छलक आया था।

“लेकिन मेरे पिता ने अब मेरा रिश्ता तय कर दिया है। अगले दस दिन में, फेरों में बंधकर मैं पोलैंड चली जाऊँगी। दिलों की वह चाहत अब खत्म हुई। भूल जाओ कि कभी हमने एक-दूसरे को चाहा था। वह हमारी भूल थी या जवानी का जोश था। लेकिन घर बसाने के लिए तो सीरियस होना पड़ता है। अब मैं कोई भी रिस्क लेना नहीं चाहती। अच्छा होगा कि तुम भी मुझे भूलकर किसी के साथ बंधन में बंध जाओ?” माथे पर लकीरें खिंच गई थीं।

परेश का मन दूखा। पूछा उसने–“और वह, जो तुम्हारे पेट में पल रहा है, मेरा अंश… उसका क्या?”

“अभी तो दो ही महीने हुए हैं। पोलैंड में कोई भी बहाना कर मैं उसे गिरा दूँगी।… और वो मेरी प्रोब्लम है।”

“तुमने तो मेरे साथ पूरा जीवन बिताने की कसमें खाई थी।” परेश की अधीरता बढ़ने लगी।

“खाई थी, लेकिन फिर विचार हुआ कि तुम मुझे वह ऐशो आराम, वह साधन नहीं दे सकते, जो पोलैंड में बसा मेरा मंगेतर मुझे देगा। उसके पास धन-दौलत है। अच्छी तनख्वाह वह पाता है। तुम कभी इतना नहीं कर पाओगे। मुझे अपना सुख तो देखना ही है।” श्रद्धा बोली।

“अच्छा रुको।… थोड़ी देर शान्ति से बैठकर विचार कर लेते हैं। सामने के पार्क की बेंच पर बैठ जाते हैं।” परेश उसे समझाने लगा।

“मुझे समझाने की जरूरत नहीं। ना मैं सहज तुम्हारी बातों में आने वाली। मैंने जो कहा, उसे समझने की कोशिश करो। अब मैं किसी और की हो चुकी हूँ। मुझे कोई बदनामी नहीं चाहिए और ना ही तुम्हारा कोई मशविरा।”

“मानता हूँ। मैं तुम्हें वह ऐशो आराम नहीं दे सकता, जो वह अमीर आदमी दे सकता है। लेकिन हम दोनों के बीच प्रीत का दरिया जो बहा, उसका क्या?”

क्रोध उमड़ा और बोली वह–“तुम्हें उस दरिया में डूबे रहना है तो डूबो, डूबकर चाहे मरो भी ! मुझे तो सुविधा से जीवन जीना है। अपना सुख देखना है। बगैर धन वह सुख तुम मुझे कभी नहीं दे सकते।… इसलिए अच्छा होगा कि तुम अपने रास्ते चलते बनो और मैं अपने रास्ते।” और क्रोध भरी आँखों से उसे घूरते हुये वह वहाँ से चली गई।

लघुकथा-४
कहर

“तनिक देर आँखें बंद कर बैठ जा बिटिया। कई घंटों से रोती ही तो रही है। आँखें सूजकर लाल हो गई हैं। हृदय छीजने लगा है। बेचैनी बहुत है। आ मेरे पास… यहाँ बैठ। साँसों की धौंकनी को ठहर जाने दे ! रोने को पूरा जीवन पड़ा है, अब तो तनिक ठहर जा?” पहलगाँव से पति के शव के साथ लौटी बेटी से उसके पिता ने कहा।

“इन आँखों ने जिस मंजर को देखा है, ईश्वर किसी को भी ऐसा मंजर न दिखाए। मैंने कहा था विनय से, नहीं जाते कश्मीर… घर में जो सुकून है, बाहर कहीं नहीं… लेकिन वे नहीं माने।” और वह फिर से बिलख पड़ी। अंतस् की चीत्कार बाहर आती गई और वह तड़पती रही।

“तुम्हें जरा भी संदेह नहीं हुआ कि मिल्ट्री की ड्रेस में खुंखार आतंकवादी हैं, जानवर हैं?” पिता पूछने लगे।

“जब तक सोच पाते, गोलियाँ बरसने लगीं। विनय के साथ और भी बहुतों को गोलियों से छलनी कर दिया गया। उन्हें मारकर वे आगे बढ़े तो चीखकर मैंने कहा–‘कायरो जाते कहाँ हो, मुझे भी गोली मारो न?’ गन पर झपटी भी लेकिन छीन न सकी। गन अगर छीन लेती तो उन्हें जिंदा नहीं जाने देती।”

पापा का हृदय विदीर्ण हुआ और आँखों से तीव्र-वेग आँसू बहते चले गए। दुखी पिता बिलखती बेटी को गोद में समेटे दिलासा ही देते रहे।

बेटी पुनः चींखी–“कायरों ने कहा, अपने चौकीदार को बताना यह मंजर, तुझे इसके लिए ही जिंदा छोड़ रहे हैं।… और हैवानों ने दाँत निपोर दिए पापा। विनय तड़पते रहे और वे कहकहे लगाते वहाँ से चले गए। कोई मदद को नहीं आया। हरसूँ चींख लेने के बाद भी किसी ने हमारी आवाज तक नहीं सुनी।” दरिया बह चला और पापा ने बेटी के मुख को हथेलियों में सहेज लिया।

लघुकथा-५
खेल पसारें

“अरे भाई, ये कैसा खेल पसार रहे हो? नफरत, नफरत क्यूँ खेल रहे हो? मत खेलो यह खेल।”

“हम क्यों नहीं खेलें यह खेल?”

“इस खेल से तुम्हें हासिल क्या हो रहा है?”

“बहुत कुछ…।”

“क्या बहुत कुछ?”

“इसी से तो हमारी रोजी-रोटी चलती है।”

डॉ. सुरेश वशिष्ठ, गुरुग्राम

मो. 9654404416पाँच लघुकथा

तेज वीर सिंह “तेज”
पुणे – महाराष्ट्रा

लघुकथा-1
चिता
मैं आज सुबह की सैर करने तनिक देर से निकला । जैसे ही पार्क के मोड़ पर बने शमशान पर निगाह पड़ी, मैंने देखा कि हमारे मोहल्ले के बुजुर्ग दीनानाथ जी एक चिता के पास बैठे कुछ पूजा पाठ कर रहे थे। लेकिन मुझे उनके और चिता के आस पास कोई मुर्दा नहीं दिखा। साथ ही लोगों का जमघट भी नहीं दिखा।
परिस्थिति वश अचानक मेरे कदम भी शमशान की ओर मुड़ गये।
मैंने सोचा कि शायद इनको पहले ही यह प्रबंध करने भेजा होगा क्योंकि ये इस कार्य के जानकार व्यक्ति हैं। मुर्दा शायद लाने में समय लग रहा होगा।
मैं भी शांति से एक बैंच पर बैठ कर मुर्दा आने की प्रतीक्षा करने लगा।जब बहुत देर होने पर भी कोई आता नहीं दिखा तो मैं उठ कर दीनानाथ जी के पास गया,”बाबू जी, कोई आ रहा है क्या?”
हमारे मोहल्ले के ज्यादातर लोग दीनानाथ जी को बाबू जी कह कर ही पुकारते हैं।वैसे भी वह मेरे तो पिता जी से भी बड़े थे तथा पिताजी के मित्र भी थे ।
“ना बेटा, कोई भी ना आ रहा।”
मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ।
“तो फिर ये चिता किसके लिये है?”
“यह तो मेरे लिये ही है।”
मुझे फिर एक झटका लगा।
“बाबू जी, आप तो सही सलामत दिख रहे हो।”
“बेटा मौत का क्या भरोसा? क्या पता, कब आ जाये?”
“मौत आने पर तो कोई ना कोई सब रस्म रिवाज पूरे कर ही देता है। आप क्यों चिंता कर रहे हो। और हम किस दिन काम आयेंगे।”
“तो बेटा पिछले साल तेरे ताऊ ने अपने जीते जी अपना त्रयोदश संस्कार क्यों कर दिया था।सारे मोहल्ले को बुला कर जिमाया था।”
“बाबू जी, ये तो उनकी भूल थी। वैसे भी उनकी कोई औलाद नहीं थी। पर हम भी तो थे। उन्हें हमारे पर विश्वास करना चाहिये था।”
“बेटा जब तुम्हारे सगे ताऊ को तुम पर भरोसा नहीं था तो मैं किस हैसियत से तुम पर विश्वास कर लेता।”

लघुकथा-2
शिनाख्त
कोहरे के कारण ट्रेन इतनी लेट हो गई कि दिल्ली पहुँचते पहुँचते रात के दो बज गये। उसे आज किसान रैली में शामिल होना था। प्लेटफ़ार्म से बाहर निकल कर चारों तरफ देखा कि शायद कोई परिचित आया हो।लेकिन उसे निराशा हाथ लगी।
संज्ञा शून्य कुछ देर यूँ ही अनमना सा खड़ा रहा।फिर कुछ सोच विचार कर चाय की एक दुकान पर खड़े होकर चाय पीने लगा।वहीं खड़े खड़े दो तीन बार मोबाईल पर कोई नंबर लगाया। लेकिन किसी ने नहीं उठाया। साथ साथ चाय वाले से किसानों के आंदोलन की जानकारी लेता रहा।चाय खत्म होने पर वह अपने गंतव्य की ओर पैदल ही चल दिया।
अब तक रात के तीन बज चुके थे।सड़कें सुनसान थीं। इक्के दुक्के वाहन स्टेशन की ओर आ जा रहे थे।देहाती आदमी था अतः मन में डर जैसा कुछ भी नहीं था।पैदल चलने का अच्छा खासा अभ्यास था।इसलिये मस्ती में गुनगुनाते हुए चला जा रहा था।
लेकिन होनी बहुत बलवान होती है।पीछे से एक भारी वाहन उसे ठोकर मार कर चला गया।यह हादसा कोहरे की सघनता के कारण हुआ था।ठोकर इतनी तेज और गंभीर थी कि उसे चीखने का भी अवसर नहीं मिला।और सड़क किनारे ढेर हो गया।वहाँ आसपास कोई भी नहीं था जो उसे देखता कि वह मर गया या जीवित है।
छह बजे के करीब एक पुलिस की पेट्रोलिंग वाली गाड़ी उधर से निकली।थोड़ी आगे जाकर रुक गई।
“देख उधर कोई पड़ा है। साला रात को ज्यादा पी गया होगा।धुत्त पड़ा है।”
“साहब यह तो एक्सीडेंट केस है।”
“मर गया कि जिंदा है?”
“साहब मुझे तो लगता है कि निबट गया।”
“तलाशी ले, कुछ अता पता मिले तो सूचित कर देते हैं।”
सिपाही ने उसकी जेबें टटोलीं। “सब खाली है| कुछ नहीं है साहब।कोई सब निकाल ले गया।”
“देख, उधर वह चाय की दुकान खुली है।उसे पकड़ ला। शायद कुछ देखा होगा।”
चाय वाला उसे देखते ही पहचान गया,”साहब, इसने तो अभी थोड़ी देर पहले मेरे यहाँ चाय पी थी।”
“चाय के पैसे दिये थे क्या?”
“हाँ साहब, भला आदमी था।किसी को मोबाईल पर फोन भी किया था। उससे सब पता चल जायेगा।”
“पर यहाँ तो कुछ भी नहीं मिला।ना मोबाईल, ना पर्स, ना घड़ी।”
“साहब, एक छोटा सा बैग भी था।”
“इधर से किसी को गुजरते देखा?”
“साहब, एक दो औटो रिक्शा निकले थे।”
“चलो, इसे गाड़ी में डाल लो।दिल्ली दंगों के मृतकों में शामिल कर लेंगे।”

लघुकथा-3
तपस्या
सुबह के लगभग नौ बजे सुधा सोकर उठी और सीधे रसोईघर में पहुंची।
लेकिन तुरंत कमरे में वापस लौटी,”सुधीर, ये रसोई में कौन महिला है?”
“वे सीमा जी हैं।”
“वे हमारे किचन में क्या कर रही हैं?”
“वे पिताजी के लिये दलिया बना रही हैं।”
“अरे वाह, ये काम तो बहुत बढ़िया किया आपने। अब हम दोनों भी एक साथ खा पी सकेंगे।”
“नहीं सुधा, यह संभव नहीं होगा। वे केवल पिताजी के खान पान के लिये ही रखी गई हैं।”
“अरे, ये क्या बात हुई? जब किसी को रसोई के काम काज के लिये रखा ही है तो सभी के लिए क्यों नहीं?”
“उसकी दो वजह हैं। पहली तो यह कि तुम पिताजी के पसंद के खाने बनाने में आनाकानी करती हो।कभी भी समय से उन्हें खाना नहीं दे पातीं। सुबह की चाय तो वे हमेशा खुद ही बनाते हैं।क्योंकि तुम सुबह नौ बजे तक बिस्तर ही नहीं छोड़ती हो।
दूसरी वजह यह कि मैं सबके लिये रसोइया रखने का खर्चा नहीं उठा सकता।”
“तो फिर ये खर्चा भी क्यों कर रहे हो? मैं जैसे तैसे कर तो रही हूँ। धीरे धीरे पिताजी भी आदी होते जा रहे हैं।”
“नहीं सुधा, ये परिस्थिति मेरे लिए असहनीय है। मैं तुम्हें समझा कर थक गया। तुम इस उम्र में अपने आचरण को नहीं बदल सकती तो मैं अपने सत्तर वर्षीय पिता को किस मुँह से बदलने के लिये बोलूं?”
“सुधीर, मैं कोशिश तो कर रही हूँ ना?”
“सुधा, मैं जब दो साल का था, मेरी माँ चल बसी थी। मेरे पिता चाहते तो दूसरी शादी कर सकते थे।शादी के लिये उनके ऊपर परिवार का भी बहुत दवाब था। लेकिन उस वक्त उनके समक्ष केवल मेरा जीवन, मेरा लालन पालन और मेरा भविष्य था।उन्होंने कितना संघर्ष किया जीवन भर। मेरे लिए एक तपस्वी की भाँति जीवन बिताया। मेरे पिता मेरे लिए भगवान है। मेरे रक्त की एक एक बूंद उनकी ऋणी है।”

लघुकथा-4
मेरा भारत महान
मोहन मिश्रा जी अपने घर के बरामदे में कुर्सी पर बैठे शाम की चाय का आनंद ले रहे थे। तभी किसी ने आवाज लगाई,”मोहन मिश्रा जी, नमस्कार |”
मोहन जी के गेट पर एक सज्जन खड़े थे।
“मैंने आपके पड़ोस में आज ही शिफ़्ट किया है।मैं सरकारी विद्यालय में हिंदी पढ़ाता हूँ।मेरा नाम तोता राम मेघवाल है|”
“लेकिन मैं तो आपको कभी मिला नहीं, फिर आपको मेरा नाम कैसे पता है?”
“ये तो आपके गेट पर लगी नेम प्लेट में देखा।”
“ओह, लेकिन आपने ऐसे पुकारा जैसे आप मुझसे पूर्व परिचित हों| बताइये आपकी क्या सेवा करूं?”
” मोहन जी , थोड़ी देर के लिये आपकी सीढ़ी चाहिये।”
“हमारे पास तो कोई सीढ़ी नहीं है।”
“अरे भाई साहब। सीढ़ी तो ये सामने ही आपकी चार दीवारी में पड़ी है।”
“ओह अच्छा, वह हमारी नहीं है।वह तो मंदिर वाले पवन शुक्ला जी की है।”
“मेरा तो बहुत छोटा सा काम है। अभी आधे घंटे में वापस रख दूंगा।”
“नहीं जनाब, यह संभव नहीं है। किसी दूसरे का सामान उसकी अनुमति के बिना देना उचित नहीं।”
“आप उनका पता दीजिये, मैं उनसे ही पूछ लेता हूँ।”
“वे रहते तो मेरे पड़ोस में ही हैं लेकिन वे आज ही हरिद्वार अपनी माँ की अस्थियाँ विसर्जन करने गये हैं।”
“तो आप उनसे मोबाइल पर पूछ लीजिये।”
“वे मोबाइल नहीं रखते।”
“कमाल है? आज के समय में तो मामूली सा मामूली आदमी भी मोबाइल रखता है।”
“अब आपकी इस बात का सही जवाब तो शुक्ला जी ही दे सकते हैं।”
” मोहन जी ,बुरा मत मानिये। यह तो बड़ा मामूली सा काम है।यह निर्णय तो आप खुद भी ले सकते हैं।वैसे भी अब हम पड़ोसी बन गये हैं।”
“अरे नहीं जनाब, आप शुक्ला जी के मिजाज से वाक़िफ़ नहीं हैं। वे नियम क़ायदे कानून में बहुत सख्त हैं।”
“ये क्या बात कर रहे हो मोहन जी । इसमें कौनसा नियम आड़े आ रहा है।”
“जनाब असल बात यह है कि यह सीढ़ी मंदिर की संपत्ति है।और भी बहुत सारे सामान हैं मंदिर में ।जैसे दरियाँ, टाट पट्टी,भगोने,बाल्टी,हार्मोनियम, ढोलक, तबला, मजीरे आदि।लेकिन ये सब उन्हीं लोगों को दिये जाते हैं जो मंदिर निर्माण समिति के सदस्य हैं।”
“तो आप हमको भी सदस्य बना लीजिये।जो भी सदस्यता शुल्क लगता हो ले लीजिये।”
“वैसे तो यह कार्य भी शुक्ला जी ही देखते हैं।परंतु मुझे नहीं लगता कि आपको सदस्य बनाया जायेगा।”
“ऐसा क्यों ?”
“भाई साहब, आप एक शिक्षित पुरुष हैं। यह तो एक सामान्य ज्ञान की बात है। फिर भी बेहतर होगा यदि आप इस विषय पर शुक्ला जी से ही संपर्क करें|”
मौलिक लघुकथा
तेज़ वीर सिंह “तेज़”

पाँच लघुकथा

डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)


लघुकथा-१
विडम्बना

पारसपुर के कवि सम्मेलन की तैयारी इस बार भी धूमधाम से की गयी थी। श्रोताओं के के लिए सामने कुर्सियाँ सजी हुई थीं। विशिष्ट अतिथियों के लिए अग्रिम पंक्ति में सोफे रखवाये गये थे। मुख्य चौराहे पर प्रत्येक वर्ष होने वाले इस कार्यक्रम में पंडाल लगभग भरा रहता था। संयोग से इस वर्ष ठीक उसी दिन कार्यक्रम स्थल से बमुश्किल दो सौ मीटर की दूरी पर एक नाच का प्रोग्राम भी आयोजित किया गया था। हसीनाओं का नाच देखने के लिए दो एलसीडी भी लगायी गयी थीं। नाच शुरू होने से दो घंटे पहले ही भीड़ इकट्ठा थी। आगे खड़े होने की होड़ में जमकर धक्का-मुक्की हो रही थी। उधर कवि सम्मेलन शुरू हो गया था। आयोजक मंडल के सदस्य और उपस्थित कुछ बुजुर्ग काव्य-रसिक बीच-बीच में तालियाँ बजा रहे थे और ख़ाली कुर्सियाँ श्रोताओं का रास्ता ताक रही थीं।

लघुकथा-२
‘बोल्ड’

राघव के विवाह में अब एक दिन शेष बचा था। तमाम नज़दीकी रिश्तेदार आ चुके थे। लेडीज़ संगीत और डिनर के पश्चात आगन्तुक बातचीत में मशग़ूल थे। अचानक बातचीत का मिज़ाज बदला और बात यहाँ पर आकर टिक गयी कि अपने ब्वायफ़्रेन्ड के साथ लौट रही दिल्ली में रात साढ़े बारह बजे जिस लड़की के साथ रेप हुआ; उसके लिए कौन दोषी है, समाज या संस्कार। चर्चा में स्त्री-पुरुष, युवा तथा वृद्ध सभी शामिल थे। विनीता चाची बोल पड़ीं- “बताओ दिल्ली में तो औरतें सुरक्षित ही नहीं।” सन्तो मौसी ने भी सहमति में सिर हिलाया। रमेश फूफा तैश में आकर बोल पड़े- “सरकार ही निकम्मी है, हाथ में हाथ धरे बैठी है। मेरा वश चले तो शोहदों को ही नहीं, उनके माँ-बाप को भी फाँसी दे दूँ।” धीर-गम्भीर रहने वाले राजू चाचा ने जब अपनी राय व्यक्त की- “उस लड़की को इतनी रात गये क्या ज़रूरत थी बाहर जाने की, क्या सिनेमा देखना इतना ज़रूरी था?” राजू चाचा पर सवालों के ‘बाउंसर’ दग़ने लगे। पहला ‘बाउंसर’ चाची ने ही दाग़ा- “औरतों को गुलाम बनाकर रखना चाहते हो क्या?” और लोगों के भी ‘बाउंसर’ पड़ने लगे- “मर्दों की सोच ही घिनौनी होती है।” “क्या महिलाओं को आज़ादी का कोई हक़ नहीं है?” राजू चाचा अरे-अरे करते ‘डिफेंसिव’ हो गये थे कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई पढ़ रही अल्पना ने भी अपनी बात कह दी- “चाचू अपनी सोच बदल लो, ‘थिन्क पाज़िटिव’। हम क्या पहनते हैं, क्या खाते हैं, कहाँ जाते हैं, किसके साथ घूमते हैं…ये सब पुराने ज़माने की बातें हैं। अब लड़के-लड़की में कोई अन्तर नहीं है।” अल्पना को वहाँ मौजूद ‘माडर्न’ सोच का भरपूर समर्थन मिला। चाचा ‘बोल्ड’ हो चुके थे कि चाची ने फिर हुंकार भरी- “कोई कड़ा क़ानून बनना चाहिए।” तभी दुलारे बाबा ने सबको शान्त कराते हुए पूछा- “मैं मानता हूँ कि इन बलात्कारियों को फाँसी दे देनी चाहिए और औरतों को आज़ादी भी मिलनी चाहिए, लेकिन यहाँ मौजूद सभी अभिभावकों से मैं जानना चाहता हूँ कि ‘माडर्ननिटी’ के इस युग में कितने ऐसे लोग हैं, जो अपनी बेटी को उसके ब्वायफ़्रेन्ड के साथ रात नौ से बारह बजे का फ़िल्म शो देखने के लिए भेजेंगे?” सन्नाटा पसरा हुआ था।

लघुकथा-३
अकृतज्ञ

बस में बहुत ज़्यादा भीड़ थी। बैठने के लिए तो दूर की बात, ठीक से खड़े होने तक की जगह नहीं थी। कुछ देर बाद बस अगले ठहराव पर रुकी। वहाँ से एक दम्पति चढ़े, उनके साथ एक दुधमुँहा भी था। अपनी सीट पर आराम से बैठे विमल बाबू से न रहा गया और वे उठ खड़े हुए। महिला उनकी सीट पर बैठ गयी। कुछ देर बाद विमल बाबू के घुटनों में असहनीय दर्द होने लगा…ख़ैर वे किसी तरह खड़े रहे, उन्हें तसल्ली इस बात की थी कि उनकी वज़ह से दुधमुँहे बच्चे को लिये एक औरत की यात्रा आसान हो गयी। इसी सोच-विचार के बीच एक स्थान पर बस रुकी, शायद कोई गाँव था, उस औरत के ठीक बगल में बैठा व्यक्ति उतरने के लिये उठ खड़ा हुआ। विमल बाबू जैसे ही बैठने के लिये सीट की ओर झुके, उस महिला ने आँखों के इशारे से अपने पति को बैठ जाने के लिए कहा…यद्यपि वह व्यक्ति विमल बाबू के झुकने से पहले ही उस जगह बैठने की तैयारी में था।
“अरे बेटा, मुझे बैठ जाने दो, घुटनों…”, विमल बाबू बस इतना ही कह सके थे कि वह आँखें तरेर कर बोला, बाबूजी कुछ तो लिहाज़ कीजिए। बगल में बैठने के लिए आपको मेरी ही औरत मिली है?”
“नहीं-नहीं, मेरी बात तो सुनो…” वह धृष्ट पति लाल-पीला होते हुए कुछ कहने ही जा रहा था कि उसकी बीवी उसे शान्त कराते हुए बोली- “आप चुपचाप बैठ जाइए न, क्यों किसी के मुँह लगते हो। सफ़र में तरह-तरह के लोग मिलते हैं। वह आराम से बैठ गया। विमल बाबू अपनी कर्तव्य-परायणता पर कुछ ज़्यादा ही पछताने लगे।

लघुकथा-4
सेमिनार से रेस्टोरेंट तक

पर्यावरण बचाओ के ब्रांड एम्बेसेडर और प्रख्यात समाजसेवी दिवाकर दास राजधानी में “जल है तो कल है” विषय पर आयोजित हो रहे नेशनल सेमिनार के मुख्य अतिथि थे। कार्यक्रम में लगभग दो घंटे की देरी से पहुँचने के बाद बिजी शेड्यूल का हवाला देकर उन्हें उनके वक्तव्य के लिए शीघ्र ही पोडियम पर आमंत्रित किया गया। “हमें जल की एक-एक बूँद का मूल्य समझना होगा। यह अनमोल है। करबद्ध निवेदन है कि प्रकृति के इस अनुपम वरदान का उतना ही उपयोग करें, जितनी आवश्यकता हो। भावी पीढ़ी के लिए भी तो बचाकर रखना होगा। जहाँ लोग पीने के पानी के लिए घड़े और बाल्टियाँ लेकर चार-चार किलोमीटर पैदल चलते हैं, उनसे पूछो इसका मूल्य।” यह कहते-कहते दिवाकर सर की आँखों में आँसू आ गये। ऑडिटोरियम में सन्नाटा पसर गया कि तभी उन्होंने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, “तो मुझे चलने की आज्ञा दीजिए” और हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।

सेमिनार से विदा होने के बाद दिवाकर सर अभी सौ मीटर दूर ही आगे आये थे कि ड्राइवर से कहा, “यार अपनी फॉर्च्यूनर वॉश नहीं करोओगे क्या?” “साहब कल रात ही तो वॉश हुई है।” “तुम भूल गये क्या! शाम में मंत्री जी के साथ मीटिंग है।” “नहीं वे अभी आप सेमिनार में, इसलिए मैं…!” ड्राइवर से हो रहे संवाद को विराम देते हुए दिवाकर सर बोले, “तुम अधिक मत सोचो। सामने दिख रहे रेस्टोरेंट में मुझे ड्रॉप कर दो और गाड़ी वॉश करा कर यहीं मिलो।

लघुकथा-6
नवजीवन

“तुम लोग कुछ और क्यों नहीं करते? यों ताली पीटकर और गा-बजाकर कब तक काम चलेगा? समय के साथ बदलते क्यों नहीं?” लड़का होने की आहट पाकर घर आयी किन्नरों की टोली को मोटा शगुन देते हुए आरव ने एक प्रश्न हवा में उछाल दिया तो एक किन्नर ने उत्तर भी दे दिया- “और हम कर भी क्या सकते हैं? हमारे घरवाले हमारे सगे तो अपने हुए नहीं। और तुम कहते हो कि”, तभी दूसरा किन्नर बोल पड़ा- “बाबू! आपका इतना बड़ा बिज़नेस है, आप ही कोई काम दे दो। हम छोड़ दें ये सब। हम सब गँवार नहीं, कुछ पढ़े-लिखे भी हैं।” आरव के चेहरे की हवाइयाँ उड़ने लगीं कि टोली में से एक किन्नर और बोल पड़ा- “साहब! आपका समाज हमें बख़्शीश तो दे सकता है, पर पेट भरने के लिए कोई काम नहीं।”

पास बैठी आरव की माँ भी बोल पड़ी- “जब तूने प्रश्न किया था तो अब इनको उत्तर भी दे।” “इस टोली के सभी सदस्य आज अभी से मेरी कम्पनी के इम्पलॉयी होंगे। काम का बँटवारा कल कर दूँगा।” आरव के इतना कहते ही नवजात शिशु का क्रन्दन वातावरण में अलौकिक मिठास घोलने लगा। मानो नवजीवन के उत्सव में आकाश से पुष्पवर्षा हो रही थी।

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