पाँच लघुकथा


सुरेंद्र कुमार अरोड़ा
साहिबाबाद Mo.9911127277
लघुकथा – 1
बिजनेस
आखिरी बार जब आशुतोष मुझे मिला था , पहले की तरह तब भी उसकी माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी। उससे मेरी दोस्ती कालेज के ज़माने से थी । इसकी वजह थी कि वो गाता बहुत अच्छा था । पुराने क्लासिक फ़िल्मी गीतों पर तो उसे महारत हांसिल थी। उसके साथ समय बिताने का मतलब था फिल्मों के सुरीले गानों के युग में वापसी। कालेज के बाद अधिकांश के शहर बदल गए और सभी अपनी – अपनी पसंद के काम – धंधों में व्यस्त हो गए । अधिकतर को मैं भूल भी गया पर वो आशुतोष अपनी आवाज की वजह से मेरा दोस्त बना रहा। मुझे पता लगा कि कोई ढंग की कोई नौकरी न मिलने के कारण उसने अपनी आवाज को ही अपने रोजगार का साधन बना लिया है। विवाह – शादियों और रईसों की पार्टियों में आइटम – गाने पेश करने के लिए उसने एक आर्केस्ट्रा ग्रुप भी बना लिया है और उसमें गा – बजाकर वो अपना और अपने बच्चों का पेट पाल रहा है।शादी वगैरह के सीजन के दिनों में तो कमाई ठीक – ठाक हो जाती है पर ये काम सारा साल नहीं चल पाता क्योंकि शादियां पूरे साल नहीं होतीं । तब घर चलाने में बड़ी दिक्कत आ जाती है। सीजन में जो कुछ कमाता है , वह सब खर्च हो जाता है। इसलिए उसकी माली हालत सुधर नहीं पा रही थी। मुझे हमेशा उसके प्रति हमदर्दी बनी रहती थी कि आज भी एक प्रतिभावान इंसान को रोजी – रोटी के लिए कितनी जद्दोजहद करनी पड़ती है । कुछ अंतराल के बाद मुझे उससे मिलने की इच्छा होती थी और मैं सेकड़ो किलोमीटर की दूरी तय कर उससे मिलने चला जाता था। तब मैं उसकी कुछ मदद भी कर दिया करता था । इस बार निजी परेशानियों के कारण , समय कुछ ज्यादा बीत गया और मैं उससे मिलने नहीं जा पाया। परेशानियों से उबरा तो मैंने उससे मिलने का मन बनाया और उसके शहर के लिए निकल पड़ा। साथ ही उसके लिए कुछ गिफ्ट और अपने रोजगार में उसकी पार्टनरशिप का ऑफर भी मेरे साथ था , जिससे उसकी माली हालत में सुधार हो सके । मुझे उम्मीद थी कि पहले की तरह वो अब भी अपने पिता द्वारा छोड़े गए उसी जर्जर हो चुके पुराने से मकान में ही गुजर – बसर करके अपने बच्चों का पेट पाल रहा होगा और मेरा ऑफर पाकर वो सहर्ष मेरे साथ काम करने को तैयार हो जायेगा। मै वहां पहुंचा तो इस बार मुझे उसका घर ढूंढने में कठिनाई हुई। वहां सभी कुछ बदला हुआ था । उसके पुराने घर की जगह एक नए और सुन्दर घर ने ले ली थी। मैं डर गया कि कहीं वो अपना पुश्तैनी मकान बेचकर कहीं चला तो नहीं गया । उससे बिना मिले वापस आना मेरे लिए सम्भव नहीं था। मैंने सोचा कि इस घर का नया मालिक उसका नया पता – ठिकाना जरूर जानता होगा। मैंने हिम्मत करके गेट पर लगी बेल का बटन दबा दिया। थोड़ी ही देर में दरवाजा खुल गया । मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। दरवाजा आशुतोष की बेटी ने खोला था। उसने मुझे पहचानने की कोशिश की। मैंने स्वयं ही कहा , ” मैं करन अंकल हूँ बेटा। ” अब तक मैं भी उसकी याददाश्त में आ चुका था। झट से बोली , ” नमस्ते अंकल जी । ” ” आशुतोष घर पर ही हैं न ? ” ” जी अंकल। बाहर क्यों खड़े हैं , पहले अंदर तो आइये। ” कहकर बिटिया अंदर चली गयी और मैं उसके पीछे – पीछे ही उस कमरे में आ गया जो अब एक व्यवस्थित और आधुनिक सा ड्राइंग – रूम लग रहा था। आशुतोष का यह काया – कल्प मेरी उम्मीद से बिलकुल अलग था। सबकुछ भूलकर मैं उसकी तरक्की का राज जानने के लिए उतावला हो रहा था। आशुतोष के आने से पहले ही मेरे सामने साफ – सुथरे गिलास में पानी की व्यवस्था की जा चुकी थी। मेरी नजरें आशुतोष को ढूंढ़ रहीं थी। थोड़ी ही देर में नए कुर्ते – पायजामें में सजा आशुतोष भी मेरे सामने था। वो मुझसे गले लगकर बड़ी गर्म जोशी से मिला। मैं भी खुश था। शुरूआती दुआ – सलाम के बाद मैं अधिक देर तक अपनी जिज्ञासा शांत करने से खुद को रोक नहीं पाया। मैंने सवाल दाग दिया , ” भाई तेरी तरक्की के लिए ईश्वर का लाख – लाख शुक्रिया पर अल्लादीन के उस चिराग का नाम तो बता जिसकी वजह से ये सब कुछ सम्भव हो पाया ? ” मेरे सवाल को सुनकर वो हल्का सा मुस्कुराया और फिर बोला , ” ये सब तरक्की कर रहे नए ज़माने की देन है करन भाई। ” ” खुल कर बता न यार। पहेलियां मत बुझा। ” उसने एक ठंडी सांस ली और फिर किसी दार्शनिक के अंदाज में कहने लगा , ” तुझसे क्या बयां कहूं मेरे यार ! वक्त का तकाजा या कुछ भी समझ ले कि मैंने एक ऐसी एजेंसी खोली है जो औलाद वाले उन अकेले और गुमसुम पड़े बुजुर्गों की देख – रेख से लेकर , अंतिम संस्कार तक का जिम्मा उठाती है जिनके बच्चे देश के दूसरे बड़े शहरों या फिर विदेशों में बड़ी – बड़ी मल्टी नेशनल कंपनियों में ऊंची – ऊंची पगारों पर काम करने चले गए हैं और उनके पास न तो इतनी जगह है और न ही इतना समय कि अपने माँ – बाप को अपने पास रख सकें या उनकी देख भाल कर सकें। ये बुजुर्ग अपने बड़े शहरों के ऊंचे – ऊंचे फ्लैटों में एक गुमनाम सी जिंदगी बिताने को मजबूर हैं। इनके वारिस इनकी अंतिम यात्रा का ही नहीं , इनके अंतिम दिनों की देख – रेख का जिम्मा भी मेरी एजेंसी के हवाले कर देते है , जिसके लिए मुझे मोटी रकम हर महीने मिल जाती है और वो भी एडवांस में। ” मैं अवाक् नजरों से आशुतोष को देख रहा था। थोड़ा रुक कर वो फिर बोला , ” मेरी एजेंसी ने सौ उन लोगों को रोजगार भी दे रखा है जो मेरे इस काम में मेरा हाथ बंटाते है ।काम और मांग इतनी है कि मुझे फुर्सत नहीं है मेरे भाई। तू बुरे वक्त का मेरा साथी है ,इस बिजनेस में क्या तू मेरा पार्टनर बन सकता है। यकीन कर तरक्की करते इस देश में तुझे पैसे की कमी कभी नहीं होगी। ” मैं हतप्रभ था और खुश भी कि मेरा फक्क्ड़ गायक यार भी नए जमाने के साथ पैसे वाला हो गया है ।
लघुकथा–2
मितलाई
देश में अब भी बड़ी ग़ुरबत है भाई। पुरखे भी यही सब सहते – सहते मर गये। बदलाव की सख्त जरुरत है। बड़े होकर हम तो जरूर कुछ ऐसा करेंगें कि देश के लोगों को अन्याय , अत्याचार , नाइंसाफी और गरीबी से मुक्ति मिले । कितने दुःख की बात है कि बहुत सारे बच्चे तो अभी भी स्कूल नहीं जा पाते।,” हम दोनों क्लास की सीट पर अगल – बगल बैठते थे और वह अक्सर मुझसे कहा करता था , ” इन बुराइयों के खिलाफ अगर कुछ कर पाए तो जरूर करेंगे। ” मैं बड़ी तत्परता से उसकी हाँ में हाँ मिलाता था। मास्टर जी ने कक्षा में आते ही कहा , ” कल सब बच्चे अपनी-अपनी फीस जरूर ले आना। ”
मैंने पूछा , ” कितनी मास्टर जी ? ”
” तुम्हें हर महीने दो रूपये देने हैं । ”
” मास्टर जी ये तो बहुत ज्यादा है। ” वह बोला।
” अरे तू क्यों घबराता है , तुझे कुछ नहीं देना । ” मास्टरजी ने कहा तो रमैया चुप लगा गया।
मेरी समझ में कुछ नहीं आया। समय के साथ रमैया और मैं दोनों ही बड़े हो गए। कोशिश की और दोनों की नौकरी भी लग गई। मैं बिजली विभाग में बाबू लग गया और रमैया मेरा बचपन का हमसफ़र कलेक्टरेट में अधिकारी की नौकरी पा गया। दोस्ती बरक़रार रही क्योंकि स्कूल के साथी थे । एक – दूसरे के घर में आना – जाना भी लगा रहा। रमैया की माली हालत दिन पर दिन अच्छी, बहुत अच्छी होती गयी। सरकारी नौकरी की वजह से दाने-पानी का जुगाड़ मेरा भी ठीक -ठाक था। एक दिन मुझे रमैया बहुत खुश और संतुष्ट नजर आया। मैंने मौका देखकर उससे कहा,
” रमैया जी। समय के साथ जिंदगी ने आपको बहुत कुछ दिया है, आगे भी देगी। ऊपर वाले की मेहरबानी से मैं भी रोजी -रोटी के जुगाड़ से निश्चिंत हूँ।”
“तो ?” रमैया जी ने सवाल किया।
“क्या हम दोनों मिलकर कोई ऐसी व्यवस्था नहीं कर सकते जहां गरीब घरों के वंचित बच्चे आकर बिना किसी शुल्क के पढ़ सकें। वहां जो भी अध्यापक रखे जायेंगें, वे भी उसी वर्ग के होंगें, जिस समाज के वे मजलूम बच्चे होते हैं। ये हम दोनों का बचपन का सपना था।”
“तेरा ख्याल कबीले तारीफ़ है। जरूर कर इस काम को। तेरा सपना पूरा हो, मैं भी यही चाहता हूँ।”
रमैया जी ने सहमति दी। मेरा उत्साह बढ़ गया।
मैंने कहा,”रमैया जी, मेरे अकेले का नहीं, सपना हम दोनों का था। ऊपरवाले ने हम दोनों पर पर्याप्त अनुकम्पा की है। अब उस सपने को साकार करते हैं दोनों मिलकर।”
“हरी चरण भाई ,उपरवाले को क्यों घसीटते हो बीच में। हमने मेहनत की और अपने हिस्से का आसमान हमारे हिस्से में आ गया। इन जाहिलों का पढ़ना या इन्हें पढ़ाना कोई आसान काम है क्या।”
“रमैया जी ! करना तो पड़ेगा वार्ना हमारे सपनो का क्या होगा?”
“सारे सपने पूरे हो जायं, ये किस किताब में लिखा है हरिचरण बाबू। इस महंगाई में अपने ही सपने पूरे हो जायं, वही बड़ी बात है। पहले उन्हें तो पूरा हो जाने दो।”
रमैया जो अब रमैया जी बन चुका था, ने बड़ी बेतकल्लुफी से कहा।
हरिचरण का उत्साह ठंडा पड़ गया। फिर भी उसने हिम्मत करके एक जोर और मारा,
” रमैया जी! कुछ तो करना चाहिए।”
” जो ठीक समझो करो हरिचरण बाबू। मैं तो इस जिंदगी में एक ही नतीजे पर पहुंचा हुं कि बचपन का बचपना बड़ा बचकाना होता है, वक्त के साथ सगे भी पराये हो जाते हैं और बचपन की जिल्ल्तों को ढोने का मतलब है उसके बोझ तले दबकर मर जाना।”
” …………………..”
हरिचरण को कोई जवाब नहीं सूझा।
” चिंता छोड़ो। एक मतलब की बात करता हुं क्योंकि अपनी यारी स्कूल के दिनों की है। समाज कल्याण मंत्रालय की तरफ से विदेश के टूर पर एक डेलिगेशन जा रहा है, कहे तो उसमें तेरा भी नाम लिखवा देता हुं।”
हरिचरण को मितलाई आने को हुई। वो जल्द से जल्द घर पहुंचना चाहता था।
लघुकथा–3
भीख
सुबह का समय ढलने को था । वह अखबार पढ़ चुका था।
रोज की तरह अखबार के पन्ने तरह-तरह के अपराधों के किस्सों से भरे पड़े थे । एक पन्ने पर सुरसा की तरह बढ़ती आबादी पर विचारकों की चर्चा और चिंता भी थी । इससे वो भी थोड़ा अवसादित हो गया था कि देश का भविष्य न जाने कैसा होगा !बढ़ती हुई आबादी पर रोक कैसे लगेगी ! इसी बीच गेट पर किसी ने सांकल खटखटाई । उसने सोचा कोई अपना आया है । उसने कमरे से झांका । एक मजबूर औरत खड़ी थी । वो मजबूरी में निकल कर बाहर आ गया । औरत की गोद में एक बच्चा भी था । उसका मन कसैला हो गया ।
” क्या है ? ” वो झुंझलाया , ” क्यों शोर मचा रही है ।”
औरत के हाव भाव में उसकी झुंझलाहट का कोई असर नहीं हुआ।औरत ने अपनी मुद्रा को थोड़ा सा दयनीय बनाया । उसकी तरफ देखा और फिर अधिकार पूर्वक बोली ,” भीख दे दो ।”
उसकी झुंझलाहट, क्रोध की जगह हैरानी में बदल गई ।
” भीख की मांग और वो भी इतने अधिकार पूर्वक ?”
अब तक औरत की कांख में दबा बच्चा भी हाथ फैला चुका था, उसे लगा ऐसा करने की आदत बच्चे को डाल दी गई थी । वह पहली बार भीख की मांग को इस रूप में देख रहा था। वो जल्दी यह निर्णय नहीं कर पाया कि उसे,उस औरत से कैसे निपटना चाहिए! कुछ क्षण की प्रतीक्षा के बाद उसका मस्तिष्क हरकत में आ गया।
” इस बच्चे का बाप कहां है?”
” बाबू! भीख देनी है तो दे दो, सवाल – जवाब मत करो ।”
औरत को या तो उससे इस सवाल की उम्मीद नहीं थी या इस तरह के सवाल का सामना वो पहले भी कई बार कर चुकी थी । औरत की साफगोई भरी ढिठाई ने उसे सब कुछ समझा दिया था, फिर भी उसने पूछा,
” इस बच्चे का बाप कहां है? वो इसकी परवरिश की जिम्मेदारी क्यों नहीं लेता, जो तू इसे कांख में लटकाकर इसके नाम पर भीख मांग रही है?”
औरत भीख मांगने में सिद्धहस्त हो चुकी थी, इसलिए बेशर्मी उसके व्यवहार का हिस्सा बन गई थी । बिना कोई भूमिका बांधे बोली, ” बाबू! इसके बाप ने इसकी नींव रखने से पहले एक महीने तक मुझे भरपेट रोटी खिलाई थी, साथ में बड़े जानवर का कोरबा और दारू भी पिला देता था कभी-कभी। उन्हीं दिनों पता नहीं कैसे ये बदजात मेरी कोख में आ गया । मुझे पेट से देखकर मुआ ऐसा भागा कि फिर कभी वापस नहीं आया। मुझे नहीं पता, अब वो कहां है! तुम्हें कहीं मिले तो बता देना।”
उसे इस कहानी की उम्मीद नहीं थी। वो सकते में आ गया। उसने अपनी जो कहानी बताई थी,वो उसके खुद गढ़ी थी या उसके द्वारा भीख मांगने का सच थी। बच्चा अब तक रोने के कगार पर आ चुका था। उसके पास अब कोई रास्ता नहीं था ।मरता क्या न करता! लाचारी में उसने जेब में हाथ डाला और मुट्ठी में जो कुछ भी आया, औरत की तरफ बढ़ा दिया ।
लघुकथा-4
दोष
“आपको पता है न, इस नौकरी में दिन में कई बार आपको चार मंजिलें ऊपर-नीचे भी करनी पड़ सकती हैं? लिफ्ट हमेशा चालू रहे, इसकी गारंटी नहीं है।”
“जी सर, मुझे अपनी सीमाओं और कंपनी को मुझसे क्या अपेक्षाएं हैं, इसका का पूरा अंदाज़ा है और मैं पूरी तरह तैयार हूँ।”
“लेकिन आप दृष्टि बाधित हैं… सीढ़ियाँ चढ़ना जोखिम भरा हो सकता है। यदि कोई दुर्घटना हो गई तो?”
आनंद ने कंपनी के नियोजनकर्ता की बात को ध्यान से सुना और फिर शांत स्वर में बोले, “सर, क्या सड़क हादसों में आँखों वाले नहीं मरते? क्या वे विकलांग होते हैं? इस डर से, क्या हम गाड़ियां चलाना बंद कर दें कि देश की सड़कें सुरक्षित नहीं हैं?”
“आप कहना क्या चाहते हैं, मिस्टर आनंद? क्या हमें संभावित खतरे से बचने के बारे में सोचना नहीं चाहिए?”
“अवश्य सोचना चाहिए सर परन्तु मेरा यह भी कहना है कि दोष दृष्टि में नहीं होता,दोष कर्तव्यहीन दृष्टिकोण में होता है। ” ” मिस्टर आनंद ! हम जानबूझकर आपके जीवन को खतरे में नहीं डाल सकते ।”
“विद ड्यू रिस्पेक्ट सर! मेरी अयोग्यता, मेरे शरीर की कमजोरी नहीं, मुझे लगता है मेरे प्रति आपका पूर्वाग्रह ही मेरी अयोग्यता है।”
आनंद की बातों में दृढ़ता थी, आत्मसम्मान का भाव था। नियुक्ति बोर्ड के सदस्य एक-दूसरे की ओर देखने लगे। अधिकारी ने धीमे स्वर में पूछा,” नौकरी के दौरान अगर आपको कुछ हो गया तो, उसका जिम्मेदार तो हमें ही ठहराया जाएगा न?” आनंद ने बिना विचलित होते हुए मुस्करा कर कहा, “जीवन में अनिश्चितता सबके साथ है सर। लेकिन मैं पूरी तरह से कांफिडेंट हूँ कि यदि मुझे सेवा का अवसर मिलता है तो मैं कंपनी को सभी अपेक्षित परिणाम दे सकूँगा। निर्णय आपके हाथ में है। ठीक है, अब मुझे चलना चाहिए।”
कहकर आनंद उठने को ही थे कि बोर्ड के सभी सदस्य एक स्वर में बोले, “रुकिए मिस्टर आनंद! हमारी कंपनी को आपकी ही ज़रूरत है।”
लघुकथा-5
लेबल
दोस्त ने बुलाया तो जाना पड़ा । न जाओ तो कम्बख्त नाराज हो जाता है । शाम को अक्सर उसके घर जाने से बचता हूं क्योकिं उस समय उसकी मेज पर दारू की बोतल भले ही दिखाई न देती हो पर गिलास जरुर मिलता है जिसका कुछ हिस्सा वो खाली कर चुका होता है । मजे कि बात ये है कि उसे इस काम के लिये कोई साथी मिल जाये तो ठीक है , न मिले तब भी वो अपनी दिनचर्या को बदलता नहीं है । टोको तो कहेगा यार इसे ले लेने के बाद नींद जरा सलीके से आ जाती है ,वरना तो गोली कोई भी खा लो , बेअसर ही रहती है । तू भी लगा और फिर देख इसका असर । इतना कहते हुए बिना देरी के वो झट से दूसरे गिलास में थोड़ी सी उड़ेल भी देता है । मना करने का कोई असर नहीं होता इसलिए चुप लगाने के अलावा कोई चारा नहीं होता । इस बार शाम को ही जाना हुआ। मैं पहुंचा तो वो हमेशा की तरह अपने काम में लगा हुआ था । फर्क सिर्फ ये था कि इस बार गिलास के साथ बोतल भी मेज पर थी जो दिखाई दे रही थी । मेरे पहुँचने पर, इसके पहले कि वो कुछ कहता , मैनें कहा ” तूने अपना ब्रेंड बदल लिया है क्या ? ये तो महंगी वाली है । इतने महंगे ब्रेंड की पियेगा तो सारे घर को बर्बाद कर देगा ।” उसने अभी पीना शुरु ही किया था । इसलिये होश में था । वो मुस्कुराया और धीरे से बोला , दोस्त ब्रेंड ही नहीं बोतल भी पहले वाली ही है , सिर्फ लेबल बदल दिया है । इस महंगे लेबल से फील जरा अच्छी आने लगी है कि अपना भी कुछ स्टेंडर्ड है । वरना तो जिंदगी गटर के कीड़ों की तरह पहले वाले लेबल के साथ भी गुजर ही रही थी। जमाना बदल जाये तो खुद को भी बदलना पड़ता है। जमाने के बदलाव को न मानो तो अपने भी साथ छोड़ देते हैं। ” मुझे लगा मेरा यार बिना पिए भी सच कहने की ताकत रखता है। वरना इस जैसे फक्कड़ के लिए झूठ को सच की तरह कहना और फिर उसे पचा जाना कितना मुश्किल काम है। अगले पल मैं भी अपने दूसरे पैग की प्रतीक्षा कर रहा था। सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा साहिबाबाद ( ऊ. प्र . Mo. 9911127277 )
पाँच लघुकथा

भुवनेश दशोत्तर
इंदौर
संपर्क-7879219700
लघुकथा–1
।। रोटियाँ।।
उसने नीचे झाँका।
लड़की कंधे पर बोरी लटकाए, गली से गुजर रही थी।
“ए लड़की, रुक जरा।” उसने उसे आवाज़ दी।
लड़की ने ऊपर देखा और रुक गई।
“ले, ये रोटियाँ… कुत्ते को दे देना। रोज कुत्ता दिख जाता है,आज एक भी नज़र ही नहीं आया।”
लड़की ने कंधे पर लटकती बोरी को ठीक किया और रोटियाँ थाम ली।
गली खत्म हो चुकी थी। उसे कोई कुत्ता नज़र नहीं आया।
आगे टीला था।
उसके नन्हें कदम टीला चढ़ रहे थे
टीला चढ़ने के बाद वह रुक गई।
उसकी साँस फूलने लगी थी।
वह, पत्थर पर बैठ गई।
उसकी नज़रें कुत्ते को तलाश कर रही थीं।
दूर,पेड़ के नीचे एक कुत्ता नज़र आया।
उसके चेहरे पर सुकून छा गया।
वह दौड़ती हुईं उसके पास पहुँची।
कुत्ता सो रहा था।
कुत्ते के आसपास कई रोटियाँ फैली हुईं थीं।
वह बुदबुदा उठी -“अरे,..इसका तो पेट भरा हुआ है।”
उसकी आँखों में चमक जाग उठी।
” ओ हो…अब तो यह रोटियाँ अम्मा की और मेरी।” वह खुशी से चिल्ला उठी और घर की ओर दौड़ पड़ी।
लघुकथा-2
।। मुस्कान।।
उसने विशाल मॉल में प्रवेश किया।
जगमगाती दुकानों के बाहर खड़ी लड़कियाँ मुस्कुराते हुए, उसे अंदर आने का संकेत कर रही थीं ।
उसने अपनी निश्चित जगह पहुँचकर,एक बार फिर से फाइल पर नज़र डाली।
सारी अंक सूचियाँ, प्रमाणपत्र, सिलसिलेवार लगे थे।
उसने राहत की साँस ली।
बुलावा आने पर वह सलीके से अंदर गई।
फाइल मैनेजर के सामने रख दी।
मैनेजर ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।
“आपका बायो मैंने देखा है। कम्प्यूटर की डिग्री है…आपके पिता नहीं रहे, माँ और छोटा भाई हैं।”
“जी सर।”
“देखिए, यहाँ मॉल दस बजे खुलता है। साढ़े नौ तक आना होगा।”
“जी,कम्प्यूटर पर सब काम कर सकती हूँ।”
“उसके लिए तो एक लड़का रखा हुआ है। उस डिग्री को अभी यहाँ भूल जाओ।”
“फिर?”
“कुछ खास नहीं करना है। अभी आपने पास वाले रेस्टोरेंट के बाहर दो लड़कियाँ खड़ी देखी होंगी। वे मुस्कुराते हुए ग्राहकों को आने का कह रही होंगी।”
“जी।”
“बस, वही करना है…जरा मुस्कुरा कर दिखाइए।”
एक फीकी मुस्कुराहट उसके होंठों पर फैल गई।
उसके चेहरे पर पसीने की बूँदे उभरने लगी थीं।
“कल से आना होगा …, मेकअप थोड़ा और गहरा …बधाई।”
वह भारी कदमों से बाहर निकली।
बाहर निकलते समय उसके होंठ, मुस्कुराने की मुद्रा से खेल रहे थे।
पास वाले रेस्टोरेंट की लड़की उसे देख मुस्कुरा दी,”इंटरव्यू हो गया ?”
वह रुक गई।
“हाँ… कल मिलूँगी।” कहते हुए उसने चेहरे पर नकली मुस्कान बिखेर दी।
” सुनो, आज घर जाकर, जी भर मुस्कुरा लेना। कल से तो असली भूल ही जाओगी।”
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लघुकथा-३
। ‘अ’ अनार का।।
“बिटुआ, थोड़ा पढ़ ले।”
बिटुआ ने किताब खोली।
पढ़ने लगा- “अ… अनार का… अ अनार का।”
फिर वह माँ की ओर मुड़ा।
“अम्मा, अनार अंदर से कैसा होता है?”
“अंदर लाल -लाल दाने होते हैं।”
” उसको खा सकते हैं? ”
“हाँ।”
” मुझे भी खाना है।”
“इस बार मालकिन से पगार मिलेगी तो ला दूँगी।”
बिटुआ के चेहरे पर मुस्कान फ़ैल गई।
माँ बुद्बुदा उठी,”सरकार को भी कुछ समझ नहीं आता…’अ’ से कुछ और पढ़ा देते।”
लघुकथा-४
नया रिसॉर्ट
” परसों तुम्हारा जन्मदिन है, कहाँ चलें? ”
” तुम बताओ। ”
” हमेशा की तरह कहीं रिसॉर्ट में चलें?”
“हाँ, बबलू भी अब दस साल का हो गया है। थोड़ा स्विमिंग सीख लेगा।”
” बढ़िया रहेगा।”
“ऑनलाइन देखता हूँ। ”
पढ़ाई करते बबलू ने गर्दन घुमाई, “पापा, मुझे रिसॉर्ट नहीं जाना।”
“क्यों?”
” मुझे दादा -दादी जी के पास जाना है।”
” वहाँ गाँव में क्या रखा है, मजा तो रिसॉर्ट में आएगा।”
” नहीं आएगा…आप मेरा जन्मदिन मेरे साथ मनाते हो ना!”
” तो?
“तो फिर आपको भी तो दादा -दादी के साथ मनाना चाहिए ना! हर साल ऐसे ही गाँव है,गाँव है, कहकर टाल देते हैं।”
रिसॉर्ट तलाश करती उँगलियाँ थम गईं।
लघुकथा-५
मुफ्तखोर
मैं नाश्ता कर, चाय लाने का कह चुका था।
मेरी नज़रें थोड़ी दूर बैठे पुलिस वाले पर गई।
उसकी पीठ मेरी ओर थी। वह कुर्सी पर सिर टिकाए, आराम की मुद्रा में बैठा था।
“मुफ्तखोर, रेस्टोरेंट वालों को भी नहीं छोड़ते। मुफ्त का खाने-पीने चले आते हैं।” मैं बुद्बुदा उठा।
“लो बाबूजी, आपकी चाय।”
वेटर ने चाय रखी और चला गया।
पुलिस वाला भोजन करने में तल्लीन हो चुका था।
“बाबूजी और कुछ?” वेटर ने गिलास उठाते हुए पूछा।
” नहीं, बस…अख़बार देख लूँ।”
मेरा ध्यान अख़बार पर कम, उस पर ज्यादा था।
मेरी आँखें उसे बेशर्मी से मुफ्त में खाकर, अकड़ कर जाते हुए देखने के दृश्य को कैद करने के लिए बेचैन थीं।
उसने हाथ धोए।
पर्स निकाल, बिल चुकाया।
मेरी सारी बेचैनी धराशायी हो चुकी थी।
मैंने अख़बार टेबल पर पटक दिया।
वह आगे बढ़ा और उसकी नजरें मुझसे टकरा गईं।
वह तेजी से चलता हुआ मेरे पास आया।
“सर…मुझे पहचाना?…मैं दिलीप, आपने बारहवीं में मुझे पढ़ाया था।” कहते हुए उसने मेरे पैर छुए।
” खुश रहो… खूब तरक्की करो।” मैंने भीतर से खुद को व्यवस्थित करते हुए कहा।
“आपका आशीर्वाद बना रहे …आप यहाँ कैसे?”
“पेंशन के काम से आया था।” यह कह, मैं खड़ा हो चुका था।
“आपने कुछ लिया?” उसकी आँखों में आदर, स्नेह झलक रहा था।
“हाँ बेटा, सब हो गया।”
“आप ठहरिए, आप बिल नहीं चुकाएँगे।”
वह काउंटर की ओर जा रहा था।
और मैं, चाहकर भी उसे रोक नहीं पा रहा था।
पाँच लघुकथा

डॉ. सत्यवीर ‘मानव’
642, सैक्टर 1, नारनौल, हरियाणा -123001

लघुकथा-१। बदला
“यह स्वेटर तो मुझे लेना है।”
“यह शाल मैं ले लेती हूं।”
“भैय्या, यह कुर्ता मुझे दिखाना!”
“यह जैकेट अच्छा है ना?”
गली के नुक्कड़ पर अपनी गठरी खोल कर वह अपने साथी के साथ गर्म कपड़े बेचने में व्यस्त था। जब से कश्मीर में उग्रवाद शुरू हुआ है, तब से हजारों कश्मीरियों की तरह उसका भी यही सिलसिला है। हर वर्ष सर्दियों के चार-पांच महीने यहीं पर गुजरते हैं। गली के अधिकतर लोगों से उसका परिचय हो गया है।
“बंद करो इन उग्रवादियों से कपड़े खरीदना!” धर्मसिंह ने पास आते हुए कहा।
“हम यहां इनसे कपड़े खरीदते हैं, रोज़ी-रोटी देते हैं। सरकार भी इन पर करोड़ों रुपए रोजाना खर्च करती है और ये हमारे जवानों को गोलियों से भूनते हैं!….. सुना नहीं तुम लोगों ने? अभी-अभी हमारे सीआरपीएफ के काफिले पर हमला हुआ है…. पैंतालीस जवान शहीद हो गए हैं!” वह बाजार से खबर सुनकर आ रहा था।
“लेकिन हम तो गरीब आदमी हैं साब! किसी तरह मेहनत करके अपने परिवार का पेट पालते हैं।” अनवर ने हिम्मत जुटाई।
“चुप रह साले! तुम सब एक ही हो। भागो यहां से! नहीं तो अभी लोगों को बुलाता हूं और तुम्हें सबक सिखाते हैं।”
गठरी को समेटते हुए अनवर की आंखों से झर-झर सपने झर रहे थे – ‘अब क्या होगा? इस बार ठंड ज्यादा पड़ी है, इसलिए अच्छी बिक्री हो रही थी। सोचा था कि ठीकठाक बचत हो जाएगी, तो शकीला का निकाह भी कर दूंगा और बेटे का दाखिला दिल्ली में करवा दूंगा… फिर तो पांच-सात साल बाद पढ-लिखकर कुछ बन ही जाएगा…. फिर स्थाई रूप से इधर ही कहीं बस जाएंगे….. लेकिन अब?’
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लघुकथा-२ क्षिप्रिका
माता-पिता की खुशियों के उच्छल पर अंकुश लग ही नहीं रहा था। उन्हें अपनी इकलौती पुत्री के लिए मनचाहा भारतीय प्रशासनिक सेवक, घर-जमाई मिल गया था। बारात का स्वागत हो चुका था। वरमाला के बाद वर-वधू गाड़ी में बैठ चुके थे। शादी के लिए मंडप घर की छत पर बना था। लेकिन वर-बधू वाली गाड़ी घर की तरफ न जाकर दूसरी तरफ मुड़ गई। बेबस होकर सभी गाड़ियाँ वर-बधू वाली गाड़ी का अनुसरण करते हुए शहर से बाहर बने वृद्धाश्रम के सामने पहुँच गईं।
वृद्धाश्रम के प्राँगण में मंडप सजा हुआ था। एक वृद्ध पीली धोती और सिल्क का नया कुर्ता पहने आगवानी में खड़े थे। वधू के माता-पिता भौंचक्के से पत्थर की मूर्तिवत खड़े थे।
“क्या आप अपने पिता को पहचान रहे हैं?” वर ने वधू के माता-पिता से पूछा।
“यहाँ तुम लोगों को आना था, तो हमें पहले से क्यों नहीं बताया।” वधू की माता ने वर से कहा। आखिर उनकी जड़ता टूट ही गई।
“दादा को वृद्धाश्रम में छोड़कर विदेश में भटकते रहे। आज भी आपने इन्हें याद नहीं किया। इन्हें यहीं छोड़ने का इरादा है क्या? आपने बताया भी नहीं था।” वर ने वधू के पिता, माता और वधू से पूछा।
“हुँह्ह्ह,..बताया जाता…कैसे बताया जाता? जब तक बुआ भारत में रहीं, दादा उनके साथ ज्यादा रहते थे। मेरी हम-उम्र फुफेरी बहन के साथ भी खुश रहते थे। मुझे तो दादा से बहुत दूर हॉस्टल में रखा गया।” आहत स्वर में वधू ने वर से कहा।
“सत्ता का उन्माद बिना महावत का रहा। महावत के बिना मदमस्त हाथी अलग-अलग दिशाओं में भ्रमित रहा। क्या अब इनका स्थानांतरण कर दें?” वधू के माता-पिता लजाए से खड़े रहे लेकिन वधू ने, वर से कहा–“नहीं। गलतियों के इतिहास को दोहराया नहीं जाता। मै अपने दादा के सामने और उनके आशीर्वाद से आपके अंक में आऊँगी।” वधू ने कहा।
….और तब, वहीं वृद्धाश्रम में विवाह मंडप सज गया। वधू के माता-पिता, दादा के चरणों में बैठकर अश्रुपूरित आँखें लिए रोने और बिलखने लगे।
2)
किसकी मां
November 15, 2022
+91 9416238131 ~यशोदा
अजय तुम्हें याद है- जब तुम बच्चे थे, तुम और अरुण झगड़ा किया करते और झगड़े का कारण मैं होती थी। तुम कहते थे कि मां मेरी है… मैं मां के पास सोऊंगा और अरुण कहता था- “नहीं, मां मेरी है… मुझे मां के पास सोना है!”
10.34 AM
अजय शर्मा
मां आप को तो कोई काम नहीं है, लेकिन मुझे तो ऑफिस में बहुत से काम हैं। मैं ‘बिजी’ हूं, मुझे परेशान मत करो।
10.38 सुबह
+91 9416238131 ~यशोदा
मैं तुम्हें ‘डिस्टर्ब’ नहीं कर रही, बस कुछ याद दिलाना चाहती हूं। आज सुबह तुम और अरुण फिर फोन पर झगड़ रहे थे। आज भी तुम्हारे झगड़े का कारण मैं थी। लेकिन आज तुम दोनों के सुर बदले हुए थे। इधर से तुम कह रहे थे कि मां सिर्फ़ मेरी ही मां नहीं है, तुम्हारी भी तो मां है। इन्हें तुम भी तो अपने साथ रख सकते हो! … और उधर से अरुण जवाब दे रहा था – “तो क्या मां मेरी ही मां है… आप उन्हें क्यों नहीं रख सकते?”
10.45 AM
+91 9416238131 ~यशोदा
तुमने कोई जवाब नहीं दिया बेटा! बहुत ज्यादा ‘बिजी’ हो क्या?
11.15 AM …
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लघुकथा-३ लौट आया नरेन
आज तक तो कभी उसके साथ ऐसा नहीं हुआ था। लेकिन आज उसके साथ यह क्या हो रहा है, वह समझ ही नहीं पा रहा। कभी भावना गीत बन जाती है, तो कभी गीत भावना में बह जाता है। वह अपने आप को पर्वत की सूखी चोटी समझता रहा है, फिर आज वह हिमाच्छादित शिखर कैसे बनता जा रहा है?
अभी-अभी पापा का फोन आया था। हालांकि उन्होंने शब्दों में तो कुछ नहीं कहा था, लेकिन उनके बार-बार रुंधते गले और रह-रह कर नाक सुड़कने की आवाज ने बहुत कुछ कह दिया था।
उसे काफ़ी वर्ष पहले पढ़ी पापा की एक लघुकथा ‘लौट आओ नरेन’ याद आ रही थी। लघुकथा का नायक नरेन बिल्कुल उसी की तरह एमबीबीएस करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चला जाता है और फिर वहीं का होकर रह जाता है। कथा-नायक का पिता उसे बहुत समझाता है- ‘मेरे और अपनी मम्मी के लिए नहीं, तो अपनी मातृभूमि के लिए ही आ जाओ बेटा! उसका कर्ज तो तुम हजारों जन्म निछावर करके भी नहीं उतार सकते। अमेरिका के लोग तो बहुत धनी हैं, लेकिन तुम्हारे देश के गरीब मरीज़ तो तुम्हारे पास ईलाज के लिए नहीं आ पायेंगे ना! फिर उन्हें तुम्हारी उच्च शिक्षा और प्रतिभा का क्या फायदा हुआ?’ आदि-आदि। लेकिन कथा-नायक पर इसका कोई असर नहीं हुआ- ‘इन सब व्यर्थ की बातों के लिए मैं अपना कैरियर तो बर्बाद नहीं कर सकता ना!’ और कथा-नायक का पिता पापा के टूटते शब्दों की तरह ही टूटकर चला गया था।
उसे लगा कि यह लघुकथा अभी-अभी फिर लिखी गई है और इसका नायक कोई और नहीं वह स्वयं है। किंतु वह इसका अंत पहले जैसा नहीं होने देगा। उसने सोचा और पापा को फोन लगा दिया- “मैं इंडिया आ रहा हूं पापा!”
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लघुकथा-४ ईमानदार
अखबार हाथ में लेते ही विद्यासागर जी उबल पड़े – “लूट मचा रखी है स्सालों ने! रोज एक नया घोटाला… अखबार उठाते ही पहली खबर यही मिलती है।”
“क्या हुआ पापा? क्यों गुस्सा करके अपना मूड खराब कर रहे हैं?” बेटे ने पूछा।
“दिमाग तो खराब होगा ही बेटा! सारा अखबार घोटालों और भ्रष्टाचार के समाचारों से भरा रहता है।”
“भ्रष्टाचार अब इस देश में शिष्टाचार हो गया है पापा! इसलिए अब इस पर ध्यान देने की जरूरत ही नहीं है।”
“जरूरत क्यों नहीं है? क्या हम देश को यूं ही लुट जाने दें?” उनका गुस्सा अभी भी कम नहीं हुआ था।
“आप खामखां परेशान हो रहे हैं पापा! हम किस-किस को रोकेंगे? आज जिसकी जितनी पार पड़ती है, वह उतना ही भ्रष्टाचार करता है… दूधिया दूध में मिलावट करता है, किसान सब्जियों और फसलों में ज़हर मिला रहे हैं… मसालों में, मिठाइयों में मिलावट हो रही है… यहां तक कि दवाइयां भी नकली मिल रही हैं… शराब तक नकली बिक रही है… जब भ्रष्टाचार इतना निचले स्तर तक आ गया हो, तब कौन उसे रोकेगा?”
“फिर भी बेटा, कुछ लोग अभी भी उम्मीद की किरण की तरह ईमानदार बचे हुए हैं। उन्हें ही आगे आना होगा।” अध्यापक पिता ने बेटे को समझाना चाहा।
“पापा, यह सिर्फ आपका बहम है। आज सच्चाई में जिसे ईमानदार कह सकें, ऐसा कोई बचा ही नहीं है।… दफ्तर में कर्मचारी लेट आते हैं या जल्दी चले जाते हैं, वहां बैठकर काम करने की बजाय गप्पे लड़ाते हैं… यह भी तो भ्रष्टाचार ही है।”
“लेकिन हमारे विभाग में कोई क्या भ्रष्टाचार करेगा?”
“कुछ अध्यापक क्लास में पढ़ाने की जगह ट्यूशन पढ़ाते हैं या आपस में प्लॉट खरीदने-बेचने की बात करते रहते हैं- वह क्या है? … और आप कल ही जो स्टेशनरी के कुछ आइटम स्कूल से लाये थे- वह क्या था?”
“हां बेटा! यह तो मैंने सोचा ही नहीं था।” विद्यासागर जी का गुस्सा ठंडा पड़ गया था।
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लघुकथा-५। शगुन
वह बरामदे में बैठा अपलक देख रहा था। दालान का जो कच्चा हिस्सा था, उसमें कई चिड़िया मिट्टी में नहा रहीं थीं। चिड़ियों में कुछ छोटे-छोटे बच्चे भी थे। वे भी बड़ी चिड़ियों की नकल करने का प्रयास कर रहे थे। कभी एक, तो कभी दूसरी चिड़िया उन्हें ऐसा करते देखती- जैसे अपनी प्यार भरी नजरों से उन्हें सहला रही हो और फिर मग्न हो जाती उसी खेल में। उन्हें देख कर मुझे मां से सुनी हुई बचपन की बात याद आ रही थी, “जब चिड़िया मिट्टी में नहाती हैं, तो बारिश जरूर होती है।”
“छी-छी! रोहण तुम कितने गंदे बच्चे हो गये हो। कितनी बुरी तरह मिट्टी में सने हुए हो! और कपड़े भी गंदे कर लिए हैं।” पत्नी की गुस्से से भरी डपट सुनकर मेरी तंद्रा टूटी।
“मम्मी मैं तो मिट्टी से खेल कर आया हूं।”
मुझे लगा, ‘रोहण भी चिड़िया के छोटे बच्चे-सा ही है, लेकिन इसकी मम्मी चिड़िया जैसी क्यों नहीं है?’ मैं फिर बह गया था।
“चटाक!” की आवाज के साथ मैंने चौंककर देखा,रोहण की आंखों में बादल घुमड़ आये थे।
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