कहानी समकालीनः सासु माँ- डॉ. शालिनी गोयल

“माला, भई आज चाय नहीं मिलेगी क्या?”

दीपक अपनी पत्नी को आवाज देते हुए रसोई में जा पहुंचे, वहां देखा माला बर्तन मांजने में व्यस्त है और चाय का पानी गैस पर उबल रहा था।

“ये आज सुबह तुम बर्तन क्यों मांज रही हो, सीमा आज फिर छुट्टी पर है क्या?”

दीपक ने गैस पर उबलते हुए पानी में चायपत्ती डालते हुए पूछा।

हाथ का काम रोकते हुए माला ने जवाब दिया…”मैंने रात को बताया था ना सीमा गांव चली गई है। हमेशा के लिए उसका भाई आया था उसे लेने। पति के गुज़र जाने के बाद वो अकेली यहां कैसे रहती, वहीं गांव में सबके साथ रहेगी तो ठीक है ना। आज तो नई कामवाली को बुलाया है, सोचा सुबह का काम करके छोड़ दूं बस इसलिए बर्तन धो रही थी,खैर वो बाद में हो जायेगा तुम चलो मैं चाय लेकर आती हूं।”

कुछ देर बाद दोनों ने साथ बैठकर चाय पी ,फिर दीपक ऑफिस का काम देखने लगे और माला रसोई में जुट गई।

दीपक के ऑफिस जाने के बाद माला ने अपने लिए एक कप चाय बनाई, अभी कप लेकर ही बैठी थी कि दरवाजे की घंटी घनघना उठी। “इस वक्त कौन होगा?” ये सोचते हुए माला दरवाजे की ओर चल दी, ये उसका रोज़ का नियम है, सुबह की भागदौड़ में उसकी चाय अकसर ठंडी हो जाती है इसलिए वो दीपक के ऑफिस जाने के बाद एक कप चाय आराम से बैठ कर पीती है। माला ने दरवाजा खोला तो सामने एक अधेड़ औरत खड़ी थी, पहनावा तो किसी आम काम करने वाली नौकरानी जैसा ही था मगर उम्र को देखते हुए कुछ शंका थी, उसने पूछा….”कहिए किससे मिलना है।”

“मैडम जी मैं कांताबाई, मेरे को सीमा ने बताया था आपके बारे में, मुझे काम की बहुत जरूरत है।”हाथ जोड़ते हुए उस औरत ने कहा “तुम काम करने के लिए आई हो!”

माला ने आश्चर्य चकित होते हुए कहा “अभी कहां काम करती हो, अच्छा अन्दर आ जाओ।” माला ने उसे भीतर बुलाया तो वो वहीं जमीन पर बैठ गई।
“मैडम जी इस बिल्डिंग में पहली बार आपके ही आई हूं, पहले बाजू वाली बिल्डिंग में वो वर्मा रहते थे ना उनके बेटे की शादी में मैंने ही काम किया था फिर बहु के बच्चा हुआ तब भी मैं ही थी, आप चिंता मत करो मैं आपको शिकायत का कोई मौका नहीं दूंगी, पूरी ईमानदारी और मेहनत से काम करुंगी बस आप मुझे पगार नियम से दे देना बड़ी मेहरबानी होगी।”कांताबाई ने सारी बात एक सांस में बता दी।

“तुम्हारी तो बात ही कुछ समझ नहीं आ रही, यहां पहली बार आई हो तो काम कैसे करोगी, और इस उम्र में तुम बर्तन,झाड़ू वगैरह कर पाओगी।” माला कुछ शंकित होते हुए बोली।

“आप मेरा विश्वास करो मैडम मै बहुत अच्छे से काम करुंगी, आप एक बार मुझसे काम करवा कर तो देखो, मेरे जैसी कामवाली दूसरी नहीं मिलेगी।”

कांता बाई के शब्दों में अनुरोध के साथ दर्द भी था।

“तुम काम कर सकती हो मुझे नहीं लगता, तुम जाओ मैं किसी और कामवाली को ढूंढ लूंगी।” माला ने स्पष्ट शब्दों में इनकार करते हुए कहा।

“मैडम, मुझे काम की बहुत जरूरत है, आप मुझे काम देकर मुझपर बहुत उपकार करेंगी, मुझे पैसे की जरूरत है, अपनी बहु के लिए पैसा कमाना है।”
बोलते बोलते उसकी आंखें नम हो गई।

“बहु के लिए पैसा कमाना है? मुझे तुम्हारी बात समझ नहीं आई, पहले पूरी बात बताओ फिर मैं सोचूंगी क्या करना है। ” माला के शब्दों में कठोरता थी

“बात ये है मैडम कि मैं बहुत परेशानी में हूं,मेरे चार बेटे और मेरा मर्द ठेके पर मजदूरी का काम करते थे, रोज़ की अच्छी कमाई हो जाती थी घर की दाल रोटी आराम से चल जाती थी फिर मेरे बड़े बेटे की शादी हुई तो घर में बहु आ गई और घर का पूरा काम उसने संभाल लिया, थोड़े दिनों बाद मेरे दूसरे बेटे का भी ब्याह हो गया,अब मैं घर के काम से एकदम फारिग हो गई दोनों बहुएं घर का काम मिल बांट के निपटा लेती, मैंने आस पास के दो चार घरों काम पकड़ लिया,घर में सब आराम से चल रहा था। मगर मेरी तीसरी बहु का मिजाज अलग ही निकला उसने शादी के कुछ दिन बाद ही मेरा-तेरा शूरु कर दिया वो बस अपना काम करती। उसकी देखा-देखी बाकी दोनों का भी दिमाग बदलने लगा,रोज़ घर में झगड़े होने लगे, मैं ने बाहर के काम छोड़ दिए, एक तो मेरी उमर हो गई थी फिर दूसरे घर की कलह के कारण काम पर जाना मुश्किल होता जा रहा था। बस कुछ पुराने घर थे जिनके ब्याह और जच्चगी वगैरह का काम मिल जाता।ये तीसरी बहु ने तो मेरे बेटे पर भी ना जाने क्या जादू टोना करा कि उसने हमारी बात सुननी बंद कर दी,रोज़ की एक ही रट “चूल्हा अलग कर दो अपना कमाना अपना खाना ”, पर मैंने भी साफ़ कह दिया छोटू के ब्याह तक तो साथ ही रहना पड़ेगा उसकी लुगाई आ जाये फिर कर दूंगी चूल्हे अलग।

फिर मेरे छोटू की भी सगाई हो गई, बहुत सुंदर जोड़ी थी दोनों की एकदम राम-सीता जैसे।सब के चूल्हे अलग हो गए,छोटू और उसकी बहु ने मना कर दिया वो हमारे साथ ही रहे, छोटू की लूगाई घर का सारा काम कर लेती मैं फिर से चैन की जिंदगी जीने लगी,एक ही आस थी मन में कि छोटू के बच्चें मेरी गोद में खेलें। पर मैडम जी भगवान की तो मर्जी ही कुछ और थी, छोटू के ब्याह को तीन महीने ही पूरे हुए थे कि एक दिन उसे खून की उल्टियां होने लगी, डाक्टर के पास गए तो भर्ती कर लिया, पता नहीं कौन सी जांचें करवाई चार दिन बाद पता चला कि उसे कैंसर हो गया है, बचपन से गुटका खाता था वो ही उसके शरीर में जहर घोल गया, खूब इलाज करवाया बड़े अस्पताल में भर्ती कराया मगर कुछ नहीं हुआ, एक महीने में सब खत्म हो गया। छोटू की बहु सुहाग का एक त्यौहार भी नहीं मना पाई और विधवा हो गई, उसे देखकर कलेजा मुंह को आता है मैडम जी।”

कांता बाई बोलते हुए सुबकने लगी, माला ने पानी लाकर पिलाया तो आंचल से मुंह पोंछ कर उसने फिर से बोलना शुरू किया।

“बात ये है मैडम जी कि अब मैंने सोचा है कि काम करके पैसा कमाऊंगी और छोटू की बहु का दूसरा ब्याह कर दूंगी, अब हमारे अलावा उसका है ही कौन पीहर में भी बस एक छोटी बहन है जो अपनी ससुराल में रहती हैं। मुझे अपने तीनों बेटों से कोई आस नहीं कि हमारे बाद कोई इसकी सुध लेगा,एक फूटी कौड़ी भी नहीं देगा कोई इसे,जब तक मैं और छोटू के बापू है उसे रोटियों की कमी नहीं मगर हमारे बाद उसका क्या होगा, दुनिया बहुत बुरी है पहाड़ जैसी जिंदगी अकेली कैसे गुजारेगी वो। अपने जीते जी बेटी बनाकर उसे बिदा कर दूं तो चैन से मर सकूंगी, यही बात है कि मुझे काम और पैसे की जरूरत है बाकी जैसी आपकी मर्जी।”

कांता बाई बात खत्म कर माला की तरफ देखने लगी।

“आज का काम तो मैंने कर लिया है तुम कल टाइम पर आ जाना और पगार हमेशा समय से मिल जायेगी इसकी फिकर मत करो।”

माला की बात सुनकर वो आश्वस्त हो गई। नमस्कार की मुद्रा में हाथ जोड़ते हुए उठ कर चली गई।

माला उसे धीरे सीढ़ीयां उतरते देख रही थी और मन ही मन सोच रही थी कि नारी की पीड़ा को समझने और समाज में नारी उत्थान के लिए क्या वाकई हमें महिला दिवस मनाने की जरूरत है या इन सब के लिए एक अच्छी सोच और सच्ची भावना ही काफी है।

ड़ॉ. शालिनी गोयल, जोधपुर

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