साधना वैद, विनीता राउरीकर, सरस दरबारी

पाँच लघुकथा

साधना वैद
लघुकथा १
सवाल
“ब्रेन ड्रेन का प्रसंग उठा कर आप क्या प्रूव करना चाहती हैं माँ, यू एस में मिले इतनी बड़ी मल्टी नेशनल कंपनी के प्रस्ताव को ठुकरा देना सही होगा ? क्या उसकी जगह देश में ही किसी छोटी मोटी कंपनी में कामचलाऊ वेतन के साथ समझौता करके अपनी योग्यता और प्रतिभा को हाशिये पर सरका मुझे भी यहाँ के हताश लोगों की कम्यूनिटी का हिस्सा बन जाना चाहिए ?” गौरव के सवाल की गूँज जैसे हर पल के साथ बढ़ती जा रही थी !
माँ खामोश थी ! आँखों के सामने कई खूब सम्पन्न मित्रों, परिचितों, नाते रिश्तेदारों के चहरे घूम गए जो विदेशों में बसे अपने होनहार प्रतिभाशाली बच्चों को अंतिम बार देख लेने की साध मन में लिए ही चिर निंद्रा में सो गए ! अंतिम दिनों में न उनसे मिल पाए, न उन्हें देख पाए, न उनकी सेवा सत्कार का सुख ही उठा पाए ! एक सवाल उसके मौन अधरों में भी घुट रहा था, “इतने योग्य इतने प्रतिभाशाली बच्चों के माता पिता को बुढ़ापे में अस्वस्थ असहाय हो जाने पर अपनी वृद्धावस्था किसी वृद्धाश्रम या किसी अस्पताल में नितांत अजनबी लोगों के बीच काटने के लिये विवश हो जाना ही क्या उनकी नियति है ? या तो वे अपने खाली घरों में एकाकी गुमनामी में मरें या वृद्धाश्रमों में अपरिचितों के हाथों पंचतत्व में विलीन हों !”

लघुकथा-2
सयानी श्रेया
सरिता जी की तबीयत ठीक नहीं थी ! रात से ही बुखार चढ़ा हुआ था और बदन में भी बहुत दर्द था ! किसी तरह वो किचिन में बेटे, बहू और पोती के टिफिन बनाने में लगी हुई थीं ! पोती श्रेया के स्कूल का वैन वाला आने ही वाला होगा ! ज़रा सी देर भी नहीं रुकता ! बच्चा बाहर न मिले तो वो दो बार हॉर्न बजा कर चला जाता है ! सरिता जी का बुखार शायद सुबह और तेज़ हो गया था !
बहू दीपा ऑफिस के काम में व्यस्त रहती थी तो सरिता जी ने ही उससे यह ज़िम्मेदारी ले ली थी ! अंधा क्या चाहे दो आँखें ! बहू को तो जैसे मुँहमाँगी मुराद मिल गई थी ! उसने सुबह किचिन में आना ही बंद कर दिया ! संकोच के मारे दरवाज़ा खटखटा के बुलाना सरिता जी को उचित नहीं लगता था ! अब अगर वो टिफिन नहीं बनाएँगी तो श्रेया क्या खाएगी स्कूल में ! बेटे महेंद्र को भी उनके हाथ के बने पनीर के पराँठे बहुत पसंद हैं ! सारी तैयारी रात को ही कर ली थी लेकिन इस समय बुखार के मारे उनके हाथ काँप रहे थे ! फिर भी किसी तरह वे पराँठे सेकने की कोशिश कर रही थीं ! आँखों के आगे अँधेरा सा छा रहा था ! उन्हें पता ही नहीं चला श्रेया कब पीछे आकर खड़ी हो गई थी !
सरिता जी अचेत होकर गिरने ही वाली थीं कि दो नन्हे हाथों ने जल्दी से एक कुर्सी खींच कर उनके पीछे लगा दी ! “मम्मी जल्दी आओ ! दादी गिर जाएँगी !” श्रेया की आवाज़ पूरे फ्लैट में गूँज रही थी !
दीपा और महेंद्र के कमरे का दरवाज़ा फटाक से खुला ! दोनों भागते हुए किचिन में आए !
सरिता जी की आँखों में अपराध बोध था, “पराँठे बन गए हैं दीपा बस टिफिन में रखने भर हैं ! मुझे ज़रा सा चक्कर आ गया था ! श्रेया ने कुर्सी पीछे लगा दी और मुझे गिरने से बचा लिया ! इसने बेकार शोर मचा दिया ! अभी लगा देती हूँ टिफिन !”
महेंद्र की घूरती हुई नज़रों से कुछ लज्जित सी दीपा ने जल्दी-जल्दी टिफिन में पराँठे डालते हुए कहा,
“नहीं माँ, श्रेया ने तो आज मुझे भी गिरने से बचा लिया

लघुकथा-3
मेरा फैसला
आज कक्षा में टीचर बहुत खुश दिखाई दे रही थीं | उन्होंने इशारा करके रोहित को खड़ा किया |
“रोहित, तुम अपनी पढ़ाई समाप्त करने के बाद क्या बनना चाहते हो ?”
“जी टीचर, मैं डॉक्टर बन कर दीन दुखियों और निर्धन रोगियों का मुफ्त में उपचार कर मानवता की सेवा करना चाहता हूँ |”
“शाबाश ! और आकाश तुम ?”
“टीचर, मैं पायलट बनना चाहता हूँ और देश विदेश के सभी प्रसिद्ध स्थानों को देखना चाहता हूँ |”
इसी तरह, कोई जज, कोई वकील, कोई इंजीनियर, कोई स्पेस साइंटिस्ट, कोई कलाकार तो कोई अध्यापक बनना चाहता था और सबके पास अपने सबल तर्क भी थे जो उनकी महत्वाकांक्षा का समर्थन कर रहे थे | टीचर बहुत खुश हो रही थीं अपने विद्यार्थियों के सपनों की खूबसूरत उड़ान और उनकी सुलझी हुई सोच को देख कर |
अंत में बारी आई देवांश की | टीचर ने उससे भी यही सवाल किया |
“टीचर, मैं साधू बाबा बनना चाहता हूँ |”
टीचर के साथ सारे बच्चे भी हैरान थे !
“और भला तुम साधू बाबा क्यों बनना चाहते हो, बताओगे ?” टीचर ने पूछा |
“टीचर, सबसे बड़ा फ़ायदा तो साधू बाबा बनने में ही है | कहीं कोई डिग्री नहीं दिखानी पड़ती, कोई एंट्रेंस इम्तहान पास नहीं करना पड़ता, किसी को रिश्वत नहीं देनी पड़ती | बस किराए के कपड़े पहन कर, दो चार बढ़िया-बढ़िया भजन याद कर कीर्तन और सत्संग के नाम पर थोड़ी सी भीड़ जुटा लो एक दो बार, आपके तो समर्थक बढ़ते ही जायेंगे | पुराने संतों के उपदेशों को सुन कर चार-छ: दमदार डायलॉग्स याद कर लो | इस धंधे में बड़ी इज्ज़त मिलती है | आप चाहे तीस बरस के भी न हों बड़े, बूढ़े, बुज़ुर्ग भक्त आपके चरणों में लोट लगाने को तैयार रहते हैं | भेंट पूजा उपहार में इतने फल फ्रूट मेवा मिठाई और तरह-तरह के व्यंजन आते हैं कि कितना भी खाओ खिलाओ ख़त्म ही नहीं होते | दान पेटी हर समय रुपयों से भरी रहती है और बिन माँगे पुलिस-प्रशासन आपकी सेवा-सुरक्षा में लगा रहता है | बड़े-बड़े नेता आपके आगे सर झुकाते हैं और हर समाचार पत्र में, टी वी के हर चैनल पर आपके ही इंटरव्यू आते रहते हैं | इसके अलावा लोग हज़ारों रुपयों के टिकिट खरीद कर आपकी सभा में आने के लिए हफ़्तों पहले से बुकिंग कराते हैं | जितना पैसा ये जीवन भर नौकरी करके नहीं कमा पायेंगे उससे कहीं अधिक मेरे पास बिना कुछ करे धरे एक सभा में आ जाएगा ! इंसान को इससे ज़्यादह और क्या चाहिए | बताइये टीचर मेरा फ़ैसला इन सबसे बढ़िया है या नहीं ?”

लघुकथा-4
पितृ दिवस _ लघुकथा
गर्मियों की शाम थी ! देवांश के दोस्त इन दिनों घर के अन्दर ही डेरा जमाये रहते थे ! मम्मी लू लगने के डर से बाहर जाने ही नहीं देती थीं ! स्कूल में अध्यापिका थीं तो उन्हें बच्चों को किसी न किसी गतिविधि में व्यस्त रखने का खूब अनुभव था ! आज भी मम्मी ने सब बच्चों को ड्रॉइंग शीट देकर सबसे आगामी पितृ दिवस के उपलक्ष्य में एक ड्रॉइंग बनाने के लिए कहा ! विषय था बच्चे और उनके पापा एक दूसरे के साथ कैसा समय बिताते हैं इसे चित्र के द्वारा बताएं ! क्योंकि यह एक प्रतियोगिता थी इसलिए सब बच्चों को दूर दूर बैठाया गया था कि वे एक दूसरे का चित्र देख कर नक़ल ना करें !
बच्चे उत्साह से चित्र बनाने में जुट गए ! घर में काम करने वाली लीला का बेटा कन्हैया भी यह सब बहुत ध्यान से देख रहा था ! देवांश के पास जाकर बोला –
“भैया जी हमको भी एक कागज़ दो ना ! हम भी चित्र बनायेंगे !”
“तुझे आता भी है चित्र बनाना ?” देवांश ने हँस कर कहा ! लेकिन उसका उत्साह देख कर उसने कन्हैया को भी एक ड्रॉइंग शीट और रबर पेन्सिल पकड़ा दी !
प्रतियोगिता का समय समाप्त हो चुका था और सब बच्चे अपनी अपनी ड्रॉइंग देवांश की मम्मी के पास जमा कर चुके थे ! आज का परिणाम सबको चौंकाने वाला था ! सर्वश्रेष्ठ चित्र का पुरस्कार कन्हैया को मिला था ! देवांश की मम्मी ने कन्हैया को खूब सारी चॉकलेट्स इनाम में दीं और उसे गले से लगा कर बहुत प्यार किया !
बच्चों के चित्रों में विविधता थी ! किसीमें पापा बच्चों के लिए घोड़ा बने हुए उन्हें सवारी करा रहे थे, किसीमें बच्चों को चॉकलेट और गुब्बारे दे रहे थे, किसी में बच्चे पापा के कंधे पर सवार थे तो किसीमें बच्चों को पापा किताब से कहानी सुना रहे थे ! कन्हैया के चित्र में उसके पापा हाथ में डंडा लेकर बच्चे की पिटाई लगा रहे थे और खाट के नीचे दारू की बोतल और एक गिलास लुढ़का हुआ पड़ा था !

लघुकथा-5
इम्प्रेशन
“सुनिए जी, मुझे कुछ रुपये चाहिए ! एक साड़ी लानी है आज ही !”
अर्पिता अलमारी से अपना शॉपिंग बैग निकालते हुए बोली ! वरुण हैरान था !
“ऐसी भी क्या जल्दी है ! तुम्हारे पास तो एक से बढ़ कर एक कीमती और खूबसूरत साड़ियाँ भरी पडी हैं अलमारी में ! फिर ऐसी क्या इमरजेंसी आ गयी कि आज ही साड़ी खरीदनी है !”
“अरे, आपको याद नहीं है ! कल विधायक जी की माताजी की उठावनी में जाना है ना ! वहाँ शादी ब्याह में पहनने वाली तड़क भड़क की साड़ी पहन कर थोड़े ही जाउँगी ! कितने बड़े-बड़े लोग आएँगे उनके यहाँ ! सुना है दिल्ली से भी पार्टी के उच्चाधिकारी आने वाले हैं ! उनकी बहू अमेरिका से, बेटी इंग्लैण्ड से आ रही है ! मुझे प्योर खादी सिल्क की सोबर से कलर की एक कीमती साड़ी चाहिए कल पहनने के लिए ! अच्छा इम्प्रेशन पड़ना चाहिए ! तभी तो अगले चुनाव के लिए टिकिट मिलेगा मुझे ! आप तो कुछ समझते ही नहीं !” अर्पिता झुँझला उठी थी !

पाँच लघुकथा

विनीता राउरीकर
लघुकथा-1
यूज़ एंड थ्रो…
लिखते हुए अचानक स्याही खत्म हो गई। बोतल में भी स्याही नहीं थी। सोचा शायद बेटे के पास हो। लेकिन उससे पूछे या न पूछे। आजकल हर बात पर झल्लाने लगा है। वे तो यूँ भी अधिकाँश समय अपने कमरे में ही चुपचाप पढ़ते-लिखते रहते हैं। बेटे के जीवन में दखल भी नहीं देते तब भी पता नहीं हर बार उपेक्षा ही मिलती है। ये पेन उनकी पत्नी ने उपहार में दिया था तबसे वे इससे लिखते हैं। आखिर हिम्मत करके सुरेश जी अपना पेन लेकर बेटे के कमरे में गए। वह टेबल पर झुका कुछ लिख रहा था। अचानक उसने पेन को दो-तीन बार झटकारा, चलाया फिर पास रखे डस्टबिन में फेंक दिया।
“अरे पेन फेंक क्यों दिया बेटा। अच्छा भला है। रिफिल ले आना अभी तो खूब चलेगा।” पुराने जमाने के सुरेश को यूँ पेन को फेंक देना अच्छा नहीं लगा।
“ढेर पेन रखे हैं।” बेटे ने ड्रावर से नया पेन निकालते हुए कहा।
“फिर भी अच्छा भला तो पेन है क्यों फैंकना। मुझे देखो कितने बरस हो गए इस पेन से लिखते हुए आज तक बढ़िया चल रहा है।” सुरेश ने हाथ में पकड़ा पेन दिखाते हुए कहा “मेरे पास स्याही खत्म हो गई है। तुम्हारे पास रखी है क्या”
“ये डिस्पोजेबल युग है, काम हो गया बस। वो पेन डस्टबिन में डालिये और नया ले जाइए। कौन स्याही इस्तेमाल करता है आजकल। ये यूज एंड थ्रो का जमाना है पिताजी।” अजीब उपेक्षा के साथ बोलकर बेटा अपने काम में व्यस्त हो गया।
सुरेश ने हाथों में पकड़े पेन को कसकर भींच लिया। उन्हें लगा डस्टबिन में पेन नहीं एक रिश्ता पड़ा हुआ है जिसका काम अब खत्म हो चुका है।

लघुकथा-2
किनारों का गठबंधन…
“अरे यह क्या कर रही हो। बाफले कोई इतने छोटे बनाता है क्या, बड़े बनाओ जरा।” विशाल भगोने में उबलते बाफलों का आकार देखकर बोला।
“उबल कर दुगुने हो जाएंगे। यही आकर सही है नहीं तो कच्चे रह जाएंगे।” अनुभा ने कहा।
“मजा ही नहीं आएगा। दुबारा बनाओ” विशाल ने कहा।
“उबले हुए बाफलों को अब बड़ा नहीं किया जा सकता।” अनुभा बोली।
रश्मि देख रही थी सुबह से ही विशाल और अनुभा में हर बात पर बहस ही हो रही थी। आज सारे दोस्तों की परिवार सहित पिकनिक थी जिसमें अनुभा और विशाल को बाफले बनाकर ले जाने थे। रश्मि और अरुण सब्जी बनाकर विशाल के यहाँ आ गए थे।
“कितने मतभेद हैं तुम दोनों के बीच, किसी बात में एकमत नहीं हो। आश्चर्य है तब भी इतना सुखी दाम्पत्य कैसे है तुम्हारा। वास्तव में तुम सुखी हो या दूसरों के सामने दिखावा करते हो? मेरे और अरुण के बीच थोड़ा सा भी मतभेद हुआ तो हम तो चार दिन आपस में बात ही नहीं करते। मूड खराब हो जाता है।” रश्मि ने अनुभा को कुरेदा।
“तुम्हे क्या लगता है?” अनुभा ने मुस्कुराते हुए पूछा।
“कुछ समझ में नहीं आता। नदी के दो किनारों जैसे हो तुम दोनों तो।” रश्मि बोली।
“सही कहा, दो भिन्न परिवारों, परिवेश से आए पति-पत्नी तो होते ही है दो किनारों जैसे। हम भी दो किनारे हैं।” अनुभा बोली।
“तब फिर ”
“जैसे नदी के दो किनारों को बीच में बहती धारा एक कर देती है वैसे ही हम दोनों के बीच की प्रेम धारा हमें एक करके रखती है। किनारे कितने भी दूर हो लेकिन धारा उन्हें जोड़े रखती है। ऐसे ही हमारे बीच की प्रेमधारा हमें सुखी रखती है और मतभेदों को मन की तलहटी में जमने नहीं देती बहा देती है। ये प्रेमधारा बहती रहनी चाहिए कभी सूखनी नहीं चाहिए।” अनुभा ने भेद की बात बताई।
“मैं समझ गयी।” रश्मि बोली।
“क्या समझी?”
“यही कि वो बहती प्रेमधारा ही है जो तमाम नोंकझोंक, मतभेदों के बाद भी दो किनारों का गठबंधन कर उन्हें हमेशा साथ रखती है।”
दोनों की सम्मिलित खिलखिलाहट से रसोईघर गूँज उठा।

लघुकथा-3
स्वाद….
श्वेता बड़े मन और लगन से मनु के पसन्द का नाश्ता बना रही थी। गरमा-गरम नाश्ता प्लेट में परोसकर वह उसे को देने गयी। वह टीवी पर कुछ देखता हुआ झल्ला रहा था बुरी तरह से।
“ओफ्फो। सब दूर ब्रेक आ रहा है। ये नहीं कि एक जगह ब्रेक हो तो दूसरी जगह कुछ देख लो…” कहते हुए मनु ने जोर से रिमोट टेबल पर दे मारा।
“लो बेटा कुछ खा लो।” श्वेता ने उसके सामने प्लेट रखी। न जाने आजकल के बच्चों को क्या होता जा रहा है। जरा देर का सब्र भी बर्दाश्त नहीं।
“क्या है ये?” मनु ने टीवी पर नजर गड़ाए ही पूछा।
“पास्ता है। तुम्हे बहुत पसंद है न।” श्वेता ने प्यार से कहा।
एक चम्मच मुँह में डालते ही वह चिल्लाया “ये क्या बना कर रख दिया। बेस्वाद बिलकुल। कुछ भी ढंग से नहीं बनाना आता। नहीं खाना, ले जाओ”
“कुछ भी बनाओ तुम्हारे तो वही नखरे हैं। अब इसमें क्या खराबी है?” श्वेता ने गुस्से से पूछा लेकिन तब तक भुनभुनाता हुआ मनु फिर टीवी पर अपनी झल्लाहट निकालने लगा था।
शायद हमने ही अपने बच्चों को सुविधा देने के नाम पर ज्यादा सर चढ़ा लिया है। अब फिर घंटा भर खपाओ किचन में। श्वेता रसोई में जाने लगी तो आँगन में झूले पर बैठे चार-पाँच वर्ष के बच्चे पर नजर पड़ी जो चिड़ियों को देखकर ताली बजा कर खुश हो रहा था। बाई आज अपने बच्चे को लेकर आयी थी।
श्वेता एक प्लेट में पास्ता लेकर बच्चे को देने गयी। मन में सहज वात्सल्य भी था और अपनी पाककला की तारीफ सुनने का स्वार्थ भी। मनु को बताएगी की देख मैं तो अच्छा ही पकाती हूँ।
बच्चा उसे देख सहम कर झूले से उतर गया।
“ये लो बेटा, पास्ता खाओगे।”
बच्चे के चेहरे पर आई लम्बी मुस्कान और खुशी देखकर श्वेता के मन से स्वार्थ की भावना तिरोहित हो कर सहज ममता ही बाकी रह गई।
“अच्छा लगा।” श्वेता ने स्नेह से पूछा।
बच्चे ने खाते हुए मुस्कुराकर गरदन हाँ में हिला दी। श्वेता सन्तुष्ट होकर फिर काम में लग गई। कुछ देर बाद उसे पानी देने गयी तो देखा मनु की प्लेट वैसी ही रखी है और वो अब भी चिड़चिड़ा रहा है। बाहर देखा तो मुग्ध दृष्टि से देखती रही। बच्चे की प्लेट में एक भी दाना नहीं बचा था और एक परितृप्त, सन्तुष्ट मुस्कान चेहरे पर लिए बच्चा फिर ताली बजाता हुआ चिड़ियों के साथ खेलने में आनंदमग्न था।

लघुकथा-4
इंसान
“ये क्या कर रही हो तुम?” अमित ने निशा को प्लेटें साफ करते देखा तो पूछ बैठा।
“समझ नहीं आता कि लोग प्लेट में उतना ही खाना क्यों नहीं लेते जितनी भूख होती है। ढेर सारा खाना भर लेते हैं और फिर इतनी सारी झूठन प्लेट में छोड़ देते हैं। अन्न की बर्बादी तो करते ही हैं साथ ही ये भी नहीं सोचते कि दूसरे इंसान को उनकी झूठन साफ करने में कैसा लगेगा।” निशा जरा गुस्से से बोली। वह रात की पार्टी की प्लेटों में लोगों द्वारा छोड़ी गई झूठन एक बर्तन में इकठ्ठा कर रही थी।
“तो तुम्हे किसने कहा है लोगों की झूठन साफ करने को? ये बर्तन धोने वाली बाई का काम है। वो करेगी साफ।” अमित ने कहा।
“क्या उसे इस तरह के गंदे, झूठन भरे बर्तन साफ करने को देना गलत नहीं है? क्या उसे बुरा नहीं लगेगा, क्या वो इंसान नहीं है?” निशा को अब सचमुच गुस्सा आ गया था।

लघुकथा-5
कड़वी मिठाई…
नन्हे-नन्हे गुलाबी रंगत वाले दो प्यारे जुड़वां शिशुओं को देखकर ईशा का मन प्रसन्न हो गया। वैसे भी शिशु तो होते ही हैं प्रसन्नता के सूचक। माँ को बधाई देकर और बच्चों को प्यार से निहारकर वह जच्चा के कमरे से बाहर आ गई।
“यह लो मुँह मीठा करो” मनीषा दीदी ने एक प्लेट में चार-छह तरह की मिठाइयाँ सामने रख दीं। शहर की सबसे महँगी दुकान की मिठाइयाँ प्लेटों में सजी थीं।
“बड़े प्यारे बच्चे हैं। खूब बधाई आपको भी दादी बनने की” ईशा ने अपनी पड़ोसन मनीषा दीदी को बधाई दी।
दादी बनने की अपार खुशी लहक रही थी उनके चेहरे पर। प्लेट उठाकर उन्होंने ड्रायफ्रूट्स की बर्फी ईशा को थमाते हुए कहा “पहली सोनोग्राफी में जब हर्ष ने बताया कि जुड़वाँ बच्चे हैं तब मैं तो घबरा ही गयी थी। दबी जुबान से उसे कहा भी था कि अगली सोनोग्राफी के बाद चाहो तो बहु का अबॉर्शन करवा देना। हर्ष तो थोड़ा नाराज भी हो गया था सुनकर”
“आजकल तो मेडिकल साइंस इतना एडवांस हो चुका है। मेडिकल फैसिलिटी भी इतनी बढ़िया है। जुड़वा बच्चों की डिलीवरी में कोई दिक्कत नहीं होती। कितने लोगों को होते हैं जुड़वा बच्चे। उसमें क्या घबराना दीदी।” ईशा ने बर्फी का एक टुकड़ा खाते हुए कहा।
“मैं तो हर बार सोनोग्राफी के बाद उन दोनों से पूछती थी कि बच्चे लड़कियाँ हैं या लड़के। लेकिन दोनों ही कह देते की नहीं पता चलता। अब बताओ बहु ख़ुद डॉक्टर है क्या उसे भी समझ नहीं आ गया होगा। लेकिन मुझे नहीं बताया दोनों ने ही” मनीषा दीदी अपनी रौ में बोलती रही।
बर्फी खाते हुए ईशा का हाथ अचानक ठिठक गया।
“लेकिन मैं समझ गयी थी, पक्का हो गया था मुझे जब अगली सोनोग्राफी के बाद भी उन्होंने बच्चों को रखा न तभी मैं समझ गयी थी कि जरूर बेटे ही होंगे…” उन्होंने खुशी से चहकते हुए अपनी समझदारी का कसीदा काढा।
लेकिन उनके कहने का आशय समझकर दुःख और क्षोभ से ईशा के मुँह में मिठाई का स्वाद अचानक बेहद कड़वा हो गया।

पाँच लघुकथा

सरस दरबारी
लघुकथा-1
रंग
“न जाने मेरे शहर को किसकी नज़र लग गई”,
समीक्षा अपनी खिड़की से बाहर का नज़ारा देख, यही सोच रही थी। कभी सब कितने प्यार मोहब्बत से रहते थे। सभी त्योहार मिलकर मनाते थे। एक दूसरे के सुख दुख में शामिल होते थे। पर आज सब एक दूसरे की तरफ पीठ करने से डर रहे थे।
वह भाई चारा, दंगों की आग में मानो जलकर भस्म हो गया था।
वह जब ब्याहकर इस मोहल्ले में आई थी, तब किसी को नही जानती थी। पर पूरे मोहल्ले ने उसे हाथों हाथ लिया था।
“अरे दुल्हन, अपने आपको कभी अकेला मत समझना। हम सब एक परिवार हैं, और तुम इस परिवार की नई सदस्या। कोई दिक्कत कोई परेशानी हो, बस हमें याद कर लेना।” और वाकई, पूरा मोहल्ला उसका परिवार बन गया था।
पहले प्रसव के समय, राजीव को अचानक दौरे पर जाना पड़ा था। बहुत चिंता हो रही थी उन्हें, अगर वक़्त बेवक्त अस्पताल जाना पड़ा तो।
सभी ने आश्वस्त किया था,
“अरे भाई क्यों परेशान हो रहे हो। हम हैं न। बेफिक्र होकर जाओ।” और राजीव चले गए थे। तब उसका, यही परिवार, उसे अस्पताल ले गया था। और एक प्यारे से बेटे के आने की खबर रज्जन चाचा ने ही राजीव को फ़ोन पर, कुछ यूँ दी थी।
“अरे बरखुरदार, बहुत बहुत बधाई। जल्दी से आकर मुँह मीठा करवाइए। हम नाना बन गए हैं।”
पूरे मोहल्ले में जश्न का माहौल था। शैशव को सभी बहुत चाहते थे। कोई उसका चाचा ताऊ,नाना या चाची मौसी, नानी,थे , तो कोई, खाला, मामू या आपा। समीक्षा के पास तो वह सिर्फ दूध पीने या सोने आता।
होली पर तो यहाँ की छटा ही निराली होती थी। पूरे मोहल्ले में पतंगी कागज की झंडियाँ लग जाया करतीं। लाउडस्पीकर पर होली के गीत बज रहे होते, और बच्चे बड़े सभी मस्ती में चूर, रंगों में सराबोर रहते।
पिछले पच्चीस वर्षों में लोगों के स्नेह में रत्तीभर फर्क नही आया था। होली यूँही मनती आई थी।
पर इस बार, ज़रा सी गलत फहमी की वजह से शहर में दंगे भड़क उठे थे।
आज भी होली थी। उसने बाहर सड़क पर झाँका।
मजहबी आग में, भाई चारा, प्यार, मोहब्बत, सौहार्द अब भी चौराहे पर सुलग रहे थे। और सड़कों पर सिर्फ तीन रंग दिखाई दे रहे थे।
हरा, भगवा और लाल…!

लघुकथा-2
भूख
रोते रोते सुबह से शाम हो गई थी। बदहवास रमईया ठाकुर के आदमियों को दाँत पीसपीसकर गालियाँ दिये जा रही थी।
“अरे नासपीटों छोड़ूँगी नहीं तुम्हें। गरीब हूँ लाचार नहीं। एक एक को हवालात की हवा न खिलायी तो रमईया नहीं मैं।”
और जब हिम्मत टूटती तो निढाल होकर पति के शव के पास, बिलख बिलखकर रो पड़ती।
उस अँधेरी कुटिया में एक कच्ची गृहस्थी, भूख से तड़पकर सोये बच्चे और मृत पति के बीच रमईया सारी रात बैठी रही।
न जाने किस पल आँख लगी, तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। चौंककर उठी। देखा ठाकुर के आदमी थे ।
उसकी आँखों से अँगारे बरसने लगे ।
“यहाँ आने की तुम लोगों की हिम्मत कैसे हुई, निकलो यहाँ से। सुबह होने दो, तुम सबको जेल भेजकर रहूँगी।”
तभी एक आदमी गुर्राया।
” क्यों, पति को खोकर जी नहीं भरा तेरा, कि अब बच्चे भी खोना चाहती है? वह भी कीड़े मकौड़ों की तरह भूख से तड़प तड़पकर मर जाएँगे। यह ले 20,000 रुपए और अपना मुँह बंद रख। खबरदार जो कल थाने में हमारी शिनाख्त की।”
रुपए उसके हाथ में धरकर वे लोग चले गए।
रमईया ठगी सी उन पैसों को लिए बैठी थी ।
आज पति के साथ हुए अन्याय पर बच्चों की भूख भारी थी।

लघुकथा-3
संकल्प
वह चौराहे से गुज़र रही थी। तभी बापू की प्रतिमा बोल उठी।
“बेटी यह लाठी रख लो।”
“यह लाठी क्यों बापू ?”
“बेटा, तुम्हारी रक्षा के लिए”
“किस किस से !”
“ मैं समझा नहीं”
“ क्या उन लफंगों से जो रास्ता रोककर भद्दे भद्दे इशारे करते हैं, राह चलते आवाज़ा कसी करते हैं, या राह चलते दुपट्टा खींच लेते हैं। या उन आशिकों से जो आए दिन प्रेमिकाओं के चेहरों पर तेज़ाब फेंकते रहते हैं ? या फिर उस पुलिस से जो शान्ति से न्याय की गुहार पर आँसू गॅस छोड़ती है, या फिर उस प्रशासन से जो सुरक्षा माँगने पर हमपर लाठी बरसाता है?”
“किस से बापू , किस से ?”
बापू गर्दन झुकाये खड़े थे।
“ नहीं बापू ,इस सहारे की हमसे ज़्यादा अब आपको ज़रूरत है। कहीं अराजकता की पराकाष्ठा देखकर आपके कदम न लड़खड़ा जाएँ। इसे रखिए अपने पास। बहुत रो चुके, गिड़गिड़ा चुके इंसाफ के लिए। भीख के लिए उठे हाथ अब मुट्ठी बन गए हैं। हमने अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ उठाने का संकल्प लिया है।”
“ अब यह संकल्प ही हमारी लाठी है।”

लघुकथा-4
परवरिश
पार्टी में सबकी नज़र उसी पर थी। पूरे शरीर पर टैटू, बाल अजीबो गरीब रंग में रंगे हुए, कलाई में छोटे बड़े साइज के रंगीन कंगन झूल रहे थे। गले में मोतियों की छ सात मालाएँ। छोटा सा टॉप और कसी हुई लो वैस्ट जीन्स , कमर का पूरा हिस्सा उघडा हुआ। एक हाथ में व्हिसकी का ग्लास और दूसरे में सिगरैट लिए वह हौले हौले पश्चिमी धुन पर लहरा रही थी। वहाँ मौजूद सभी लोगों ने अलग अलग धारणाएँ बना लीं थीं । पुरुष वर्ग बड़े कौतूहल से उसे निहार रहा था , सभी के दिमाग में तिकड़में चल रहीं थीं।
” क्यों यार क्या कहते हो, कोशिश की जाए ।”
“नहीं भाई, अपनी तो हिम्मत नहीं, देख नहीं रहे कैसी तेज़ तर्रार है, धड़ल्ले से सिगरैट के छल्ले बना रही है “।
“इसीलिए तो कह रहा हूँ । ”
वहीं स्त्रियाँ उसे देख नाक मुँह सिकोड़ रहीं थीं,
“हाय राम कैसी असभ्य है, कोई शर्म लिहाज़ नहीं। कैसी परवरिश दी है माता पिता ने ।”
तभी अचानक हॉल के एक कोने से शोर सुनाई दिया।
“देखकर नहीं चल सकता बुड्ढे”। कहकर किसी मेहमान ने एक वेटर को ज़ोर का तमाचा जड़ दिया।
वेटर गिड़गिड़ाने लगा, “माफ़ कर दीजिये गलती हो गयी सर , दरअसल वह डांस करते करते किसी का हाथ लग गया और गिलास आप पर गिर गया ।”
“अब ज़बान भी लड़ाता है, इतना महंगा सूट ख़राब कर दिया। दो कौड़ी का आदमी,” कहते हुए उसने मारने के लिए जैसे ही दोबारा हाथ उठाया, उस लड़की ने उसे हवा में रोक दिया।
“खबरदार जो हाथ उठाया।”
“यही परवरिश है आपकी। दौलत आ गयी तो इंसानियत भूल गए। गरीब महनत बेचने आता है , इज़्ज़त नहीं। आपको कोई हक़ नहीं उसे बेइज़्ज़त करें।
इज़्ज़त, सिर्फ दौलत आ जाने से नहीं आती, कमानी पड़ती है। दूसरों की इज़्ज़त करना सीखिए, आपको इज्ज़त खुद ब खुद मिल जाएगी .”
“अरे कम से कम इसकी उम्र का ही लिहाज़ कर लिया होता .”
कहते हुए उसने वेटर को उठाया .
“उठो बाबा , चलो यहाँ से .”
“बेटी चला गया तो आज का मेहनताना गँवा दूँगा.”
“तुम्हारा आज का मेहनताना मैं दे दूँगी . चलो तुम्हें घर छोड़ दूँ.”
“पर बेटी .”
“बेटी कहा है न . तो बेटी का फ़र्ज़ भी अदा करने दो .”
और वह उसे पार्टी से ले गयी .
सभ्य महफ़िल उस असभ्य सी चीज़ को जाता देखती रही .

लघुकथा-5
त्राण
वह एक डरावनी रात थी। दूर से फौजी जूतों की पास आती ध्वनि, पूरे मोहल्ले में मृत्यु का आतंक फैला रही थी। देश के तानाशाह ने एक नया फरमान जारी किया था। एक विशेष समुदाय के लोगों को खोज खोजकर कोण्सेंट्रेशन कॅम्पस में ठूँसा जा रहा था। प्रतिरोध करने वालों को तुरंत मौत के घाट उतार देने का फरमान था। लोग छिपते फिर रहे थे। घरों के दरवाजे तोड़कर लोगों को तहखानों से घसीट घसीटकर लाया जा रहा था।
धर्म, मानवता, संवेदनशीलता कूड़े के ढेर पर दम तोड़ रहे थे। मनुष्य बेबसी से उन्हें मरते देख रहा था।
दया, क्षमा, की संभावनाएँ ध्वस्त हो चुकी थीं। अब तो केवल प्रतीक्षा थी, पल पल पास आती मृत्यु की, जो आज या कुछ दिनों, महीनों बाद कॅम्पस में अनिवार्य थी। एल्ली अपनी तीन बहनों के साथ तहखाने में छिपी थी। एक एककर घर के सदस्य मारे जा चुके थे। आज इनकी बारी थी। वह चारों एक दूसरे के कंधों पर बाहें डाल, एक घेरा बनाकर खड़ी हो गईं।
“मरना तो हमें है ही। क्यों न हम इन अंतिम पलों को खुशी खुशी गुजारें। पास आती मृत्यु के अस्तित्व को ही हम क्यों न कुछ पलों के लिए नकार दें। चलो हम सब मिलकर खूब नाचें गाएँ। ताकि मौत की अनिवार्यता में साथ बिताए यह खुशी के कुछ पल, उसकी भयावहता को कम कर दें। ताकि काल कोठरियों की उस नश्वरता में जब हम एक दूसरे को याद करें, तो हम सबका हँसता हुआ चेहरा आँखों के सामने उभरे, मृत्यु की विभीषिका से आतंकित चेहरा नहीं।”
और वह सभी बहनें गाने लगीं, नाचने लगीं। उन्होने ऊँचे बर्फीले पहाड़ों से बहते झरनों के, बागों के खिलते सुंदर फूलों के, समुंदर के , आसमानों में उड़ते स्वतंत्र पंछियों के गीत गाये। उन्होने इन स्वप्नों के गीत गाये, जो पूरे न हो सके, उन्होने आश्वासनों के गीत गाये, कि वह पूरे होंगें। अगले जन्म में ही सही। वे नाचती रहीं, गातीं रहीं, खिलखिलाती रहीं। मौत की आहट पास आती गई।
फौजी जूतों की निकट आती ध्वनि के साथ, उनके गीतों और नृत्य की गति तेज़ होती गई।
वह दंड, अत्याचार और मृत्यु के भय से कहीं ऊपर उठ चुकीं थीं।

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