
पाँच लघुकथा

सविता इंद्र गुप्ता
नौएडा, दिल्ली
लघुकथा-१
तिलिस्म
“और भाई वर्मा जी, कहाँ चल दिए ?”
“सब्जी लेने, इतवारी बाज़ार जा रहा हूँ।”
“वहाँ सब्जी के क्या भाव हैं, आजकल ?”
“यही कोई सोलह रूपये किलो आलू और तीस रूपये गोभी।”
“सुपर मॉल से क्यों नहीं लाते ? आलू नौ रूपये और गोभी सोलह। काफी बचत हो जाएगी।”
“यह तो बड़ी अच्छी बात बताई।”
उनके कदम सुपर मॉल की ओर बढ़ गए। एक किलो की जगह तीन-तीन किलो तुलवा लिए। एक खूबसूरत स्टाफ ने बताया,
“सर, हमारे यहाँ कई ऑफर चल रहे हैं। आज अंतिम दिन है, प्लास्टिक के सामान, किराना, किचन-वेयर, एक बार देख लें, भले ही न लेना।”
वहाँ की वातानुकूलित चका-चौंध का असर कहो या फीमेल स्टाफ की शहद लिपटी बातों का, हाथ रोकते-रोकते भी बारह सौ का सामान खरीद लिया। फिलहाल जरूरत के एक दो आइटम ही थे। उन्हें ठगे जाने का जैसा भाव साल रहा था। तभी कैश काउंटर पर बैठी मुग्धकारी मुस्कान लिए सेल्स गर्ल ने उन्हें लालच दिया,
“सर, आपका बिल बारह सौ का बना है यदि आप आठ सौ की शॉपिंग और करते हैं तो आपको दो सौ रूपये का गिफ्ट वाउचर मिलेगा अर्थात आठ सौ का सामान सिर्फ छह सौ में।”
उसे अनसुना करते हुए, वे मॉल से तेजी से बाहर निकल गए, जैसे उन्हें निगलने को अजगर ही अजगर मुँह बाए बैठे थे।
***
लघुकथा-२
खड़ूस बॉस
लंच टाइम में गप-शप चल रही थीं –
“यार ! अपने मैनेजर साहब भी एक नंबर के खड़ूस हैं। लाखों का पैकेज है, लेकिन रहन-सहन क्लर्क जैसा।” बड़े बाबू ने कहा। “जाने क्यों, ऊपर वाले को भी इन्हें ही छप्पर फाड़ कर देना था।” “जब देखो शो-कॉज नोटिस, सख्ती, डाँट-फटकार …देख लेना, कंजूस की दौलत को उसके नालायक बच्चे एक दिन बेरहमी से उड़ाएँगे।”
बड़े बाबू ने सबको खिड़की से दिखाई देते बंदर की ओर इशारा करते हुए कहा –
“देखो, बंदर नारियल को कितने जतन से सँभाले है। इस से वह किसी का सिर तो फोड़ सकता है, परन्तु इस के भीतर का स्वाद नहीं चख सकता।”
“क्या मतलब ?”
“अपने मैनेजर साहब का भी यही हाल है। वह अपनी सम्पत्ति पर जतन से कुंडली मारे बैठे हैं, न अच्छा खाते-पहनते हैं और न कभी पार्टी-जश्न। ठीक इस बंदर की तरह …हे ..हे ..हे।”
एक सामूहिक ठहाका वातावरण में गूंज गया। लेकिन अगले पल जैसे सब को साँप सूँघ गया। दरवाजे पर मैनेजर साहब कब से खड़े सबकी बातें सुन रहे थे। वे भावहीन से अपनी केबिन की ओर चल दिए, पीछे से बड़े बाबू ने दबी जबान में कहा –
“राम जाने, नारियल किस के सिर पर गिरेगा ? ”
बॉस ने पलट कर जवाब दिया,
“किसी के नहीं। हाँ, आज न चाहते हुए भी आप सब को एक बात बताता हूँ। मेरे पिता को कैंसर था। मैंने उन्हें तिल-तिल मरते देखा है। बेशुमार दौलत उनकी साँसें लम्बी न कर सकी। वे एक साल तक दर्द से रोते-तड़पते रहे …. मौत के लिए गिड़गिड़ाते रहे। बस, उनके गुजरने के बाद मैंने विरासत में मिली सारी जायदाद कैंसर शोध संस्थान को दान कर दी और आज भी अपने वेतन में से गुजारे लायक रख कर, बाकी कैंसर अस्पताल में जरूरतमंद रोगियों की सेवा में अर्पित कर देता हूँ।”
बॉस अपनी केबिन की ओर चले गए और बड़े बाबू के साथ-साथ सब की आँखें नम हो गयी थीं।
***
लघुकथा-३
पुनर्जन्म
अभी-अभी एक वृद्धा को ‘जीवन संध्या’ वृद्धाश्रम में लाया गया है, जिसे उसका बेटा पार्क की बैंच पर बैठा कर एक गिलास पानी लाने की बात कह कर गया, किन्तु लौटा नहीं। वृद्धा की आँखें मेले में खोए हुए बच्चे जैसी लग रही हैं।
शोभा को याद है कि तीन साल पहले उसका बेटा भी, यहाँ वृद्धाश्रम में छोड़ गया था, ” माँ, बस छ: महीने की बात है। नए शहर में हम जैसे ही एडजस्ट हो जायेंगे, मैं आकर तुम्हें ले जाऊँगा।” वह भी मान गयी थी कि केवल छः महीने की ही बात है … गिनने लगी उँगलियों पर, तीन …चार…पांच…।
“बेटे की प्रतीक्षा करते हुए ही जीवन बीता है – छोटा था तब – स्कूल से आने की प्रतीक्षा, बड़ा हुआ तो कालेज से आने की, नौकरी लगने के बाद ऑफिस से आने की। लेकिन वृद्धाश्रम से मुझे वापिस ले कर जाने की प्रतीक्षा लम्बी हो रही है।”
तनाव व दुःख के अतिरेक में शोभा बार-बार उँगलियों पर महीने गिनती – तीस…इकत्तीस …बत्तीस … गिनती आगे बढ़ती जाती है। तब से अवचेतन में रात-दिन उँगलियों के पोरों पर अँगूठा चलता रहता है।
वृद्धाश्रम में अपने जैसे और बुजुर्गों को देख कर उस की आह निकल जाती है। सब की कहानी सुनती, सब के आँसूं पोंछती, अपने आँसू छिपा कर।
शोभा उस वृद्धा के पास जा कर बैठ गयी। अपनी मोहक मुस्कान से उसकी सारी पीड़ा हर लेटी है। वृद्धा की हालत देख उसका मन द्रवित हो उठा। हाथों में उसका हाथ ले कोमलता से दबाया। अपनत्व की गर्माहट भरे स्पर्श से वृद्धा की रुलाई फूट पड़ी। कुछ देर शोभा ने उसे रोने दिया। दोनों वृद्धाओं को एक दूसरे के कंधों का सहारा मिल गया। वे परस्पर गले लग गयीं।
अचानक शोभा का ध्यान गया, आश्चर्य ! सोते जागते उँगलियों के पोरों पर चलने वाले अँगूठे ने महीने गिनना बंद कर दिया है।
शोभा मुस्करा कर बोली –
“बहन, हम सब सूखे पत्ते हैं। चाहें तो भी वापस पेड़ से नहीं जुड़ सकते। इससे पहले कि तेज़ हवा का झोंका किसी पत्ते को उड़ा ले जाए, आओ जीवन का अंतिम पृष्ठ खुशी से लिखें।”
लघुकथा-४
बड़ा कौन
काम के बोझ से असमय ही कुम्हलाते बच्चों को छुड़वाया गया था। बाल-श्रम अधिनियम का
पालन करते हुए आज फिर एक कारखाने पर छापा पड़ा था। पकड़े गए सब बच्चे थाने के बाहर
बैठे थे। एक-एक बच्चे से घर का पता पूछ कर उनके अभिभावकों को बुला, चेतावनी देकर बच्चों को उनके सुपुर्द किया जा रहा था। एक दस साल का बच्चा अलग को खड़ा सुबक रहा था,”बहन तो आँगनबाड़ी में खा लेगी लेकिन दिहाड़ी न मिलने से माँ भूखी रह जाएगी।”
“क्यों बे, तुझे घर नहीं जाना क्या ? तेरे बाप को बुलाना है, पता बता।” सिपाही ने कड़कती आवाज़ में कहा।
“बाप नई है साब। पिछले साल ट्रक ने कुचल दिया था।” बच्चे ने सुबकते हुए कहा।
“माँ है ? उसे बुला लेते हैं।” सिपाही ने कुछ नरम हो कर कहा।
“साब, माँ तब से पगला-सी गयी है जब से बापू मरा। ‘मुझे पुलिस ने पकड़ लिया है’ सुनेगी तो कहीं जान ही न दे दे।” बच्चे की सुबकियाँ अब रोने में बदलने लगीं थीं।
“और कौन है घर में ?”
“छोटी बहन है साब। लेकिन अब तक वो आँगन-बाड़ी जा चुकी होगी।” बहन का ख्याल आते ही बच्चे का रोना बंद हो गया। चेहरे पर अचानक अभिभावक जैसे फ़िक्र के भाव आ गए।
“और कोई बड़ा है घर में, जो तुझे यहाँ से ले जाये ?” सिपाही ने झुँझला कर कहा। वह असमंजस में था कि इस बच्चे का क्या करे।
“अब तो मैं ही अपने घर का बड़ा हूँ साब।” इस बार बच्चे की आवाज़ आत्मविश्वास से लबरेज़ थी।
***
लघुकथा-५
दीमक
हनीमून के लिए दोनों ने मॉरीशस चुना था। वे शानदार रिसॉर्ट के एक विशेष थीम से सजाए गए कमरे में थे।
दोनों अपने जॉब में बारह-बारह घण्टे तक व्यस्त रहते। सुकोमल अनुभूतियाँ लैपटॉप के अन- गिनत एप्स के बीच एक एप बन कर रह गयी थीं। उनके प्यार की पतंग बड़ी सूझ-बूझ से परवान चढ़ी थी। यह प्यार अठ्ठारह-उन्नीस का भावावेश न था। कदम अंतरंगता के शिखर की और बढ़ गए और विवाह के मंडप तक जा पहुँचे।
आज प्रथम मिलन की यादगार रात्रि थी। रूमानी माहौल था। बाहर दरवाजे पर ‘डू नॉट डिस्टर्ब’ की तख्ती लटकी थी लेकिन पचासों दोस्तों की भीड़ सेल फोन के रास्ते बरबस प्रवेश कर चुकी थी। दो घंटों से आपस में कोई बातचीत न हुई थी क्योंकि दोनों अपने-अपने व्हाट्सएप व फेस-बुकिया मित्रों को अपना स्टेटस बता रहे थे।
चेहरे पर आते-जाते भिन्न भाव साक्षी थे कि जो कुछ भी चल रहा है, उसमें वे दोनों आस-पास से बेखबर गहरे डूबे हैं।
दोनों के अँगूठे अपने-अपने सेल-फोन पर मशीन-सी तेजी से चल रहे थे। अचानक लड़की ज़ोर से खिलखिला पड़ी।
लड़का चौंका,”क्या हुआ ?”
“था एक इडियट, प्रपोज़ कर रहा था।”
“तो हाँ कर देतीं।”
“यार, मज़ाक मत करो।”
दोनों सेलफोन पर आँख गड़ाए, एक दूसरे को देखे बिना ‘हाँ’, ‘हूँ’, ‘ओ.के.’ में जवाब दे रहे थे। जब लड़का आभासी दुनिया से उकता गया, तो सजी-धजी नवब्याहता को बाहों में लेने के लिए उतावला हो गया। प्रश्न कर बैठा,
“क्या हम अपने मित्रों से चैट करते हुए आज की रात यूँ ही … ? ”
“होल्ड ऑन यार, कितने दिनों बाद सोशल मीडिया पर सम्बन्धों को पानी दे पा रही हूँ।” लड़की ने बिना उसकी तरफ देखे कहा।
“और रियल लाइफ में हम दोनों के सम्बन्ध … ?”
लड़की के कानों तक ये शब्द नहीं पहुँचे क्योँकि वह बड़ी तन्मयता से सेल फोन पर फिर व्यस्त हो चुकी थी।
कोई रिस्पांस ना पाकर लड़का उठा। एक गिलास ठंडा पानी पी कर सिर तक चादर ओढ़ कर सो गया।
दो घंटों के बाद मानसिक रूप से पस्त होकर लड़की भी, लड़के की तरफ से पीठ करके सो गयी।
पाँच लघुकथा

शील निगम
लघुकथा-१
काठ की हांडी
रसोई चकाचक साफ़ थी। सभी बरतन प्रसन्न थे।दोस्ती जो थी उनमें। पर यह क्या?
मालकिन हाट से एक सुंदर नक्काशीदार हंडिया लाई और छीके पर रख दी।
बरतनों के चेहरे लटक गये।सबसे खूबसूरत जो थी, वह ‘काठ की हांडी’।
रात भर बरतनों में गुप्त सभा होती रही।बरतन नाखुश थे।अपने बीच इतनी खूबसूरत हांडी को देख कर।
अचानक बेपेंदी का लोटा उछल कर बोला, “मित्रों चिन्ता क्यों करते हो? सुंदर है तो क्या? काठ की हांडी है।बस, एक ही बार चूल्हे पर चढ़ेगी फिर जल कर राख हो जाएगी।”
तभी मालकिन सुलगती हुई अंगीठी ले कर रसोई में आई।
लोटे ने चाकू के कान में कुछ कहा और उसे छीके की तरफ़ उछाल दिया।
चाकू छीके की रस्सी काटता हुआ सीधे सुलगती हुई अंगीठी में जा गिरा और उसके बाद गिरी काठ की हांडी,जमीन पर।पर टूटी नहीं।
आँख मलते हुए उठी और अपने आस-पास षड़यंत्रकारियों को देख कर सहम गई।
उसके मन से आवाज़ आई, “काश! मैं हाट में ही रहती!”
***
लघुकथा-२
तृषा
“हम इक्यावन वर्ष एक साथ थे. मैंने एक दिन भी महसूस नहीं किया कि हम कभी भावनात्मक रूप से एक हुए.”
माधवी जी ने मनोचिकित्सक से दुखी स्वर में कहा.
“फिर उनके न रहने पर आप विचलित क्यों है? बार-बार की बेहोशी और खा़मोशी आपकी सेहत के लिये ठीक नहीं.” मनोचिकित्सक डाॅ. रंजन सिंह ने समझाया.
“खा़मोशी तो मेरी चिर-संगिनी है और बेहोशी पर मेरा नियंत्रण नहीं.”
“अच्छा दुखद यादों को छोड़िये, कोई सुखद बात आपके जे़हन में ताज़ा है?”
“जी डाॅक्टर साहब, मैं ज़िन्दगी भर उनसे सच्चा प्यार करती रही, इस उम्मीद में कि कोई तो दिन ऐसा आयेगा जब वे भी मुझे प्यार करेंगे. अब उनके इस दुनिया से चले जाने से मेरी उम्मीदों पर पानी फिर गया.”
“अच्छा! उनकी कोई निशानी है आपके पास?”
“जी, दो अनमोल रतन.” कहते हुए माधवी जी की आँखों से दो अश्रु ढुलक पड़े और उन्हें फिर से बेहोशी का दौरा पड़ गया.
माधवी जी को इंजेक्शन देते समय डाॅक्टर साहब के मुँह से निकला, “दो अनमोल रतन पा कर भी न जाने कौन सा प्यार पाने को आतुर है यह माधवी!”
माधवी जी को बिस्तर पर ठीक से लिटाते हुए नर्स गीताश्री बुदबुदाई, “स्त्री के मन की पीड़ा आप क्या जानें सर? सुहाग की सेज पर साथ सोने और पति का प्रेम पाने के बीच एक पारदर्शी दीवार होती है जिसका अदृश्य होना जरूरी होता है.”
“कुछ कहा तुमने, गीताश्री?” डाक्टर साहब ने पूछा.
“नहीं, बस यूँ ही एक ख़्याल आया मन में.” गीताश्री ने कहा.
“मुझे भी तो बताओ.”
“आप नहीं समझ सकते, पुरुष हैं न.”
“ऐसा कौन सा रहस्य है जो हम पुरुषों की समझ से बाहर है?”
“सर, देह से परे भी एक दुनिया होती है आत्मिक प्रेम की, स्त्री के हृदय में. अधिकतर पुरूष उसमें प्रवेश ही नहीं करते.” कहते हुए गीताश्री केबिन से बाहर चली गई.
डाक्टर साहब ठगे से आत्मविश्लेषण करते रह गये. याद आया पत्नी राधा के पूर्ण समर्पण के बावजूद वे अपने प्रेम के स्पर्श को उसके हृदय में संजो नहीं पाये थे. वह असंतुष्टि की कसक लिये असमय ही इस संसार को अलविदा कह गई और उन्हें एकांतवास दे गई।
***
लघुकथा-३
मुखौटे
बहुत से चेहरे आये थे जूलिया के जीवन में।कौन उसकी बेटी एंजेलिना कि पिता था वह स्वयं नहीं जानती। एक-एक रात उसके साथ बिताने के बाद वे सब कहाँ गुम हो गए, बेटी को कैसे बताती?
बारह साल मिशनरी स्कूल के बोर्डिंग में रह कर वापस आई एंजेलिना अपने पिता से मिलने की जिद पर अड़ी हुई थी।
जूलिया ने अपनी याद्दाश्त के आधार पर उन चेहरों के मास्क बना कर रख दिए और बेटी से कहा, “लो ढूँढ लो अपने पिता को।”
इतने सारे घिनौने मुखौटे देख कर एंजेलिना घबरा गई।
उसने माँ की आँखों में आँखें डालकर उसने प्रश्नसूचक नज़रों से देखा।
जूलिया की झुकी नज़रों में छिपे आँसू देखकर एंजेलिना को अपनी माँ की मजबूरी का अहसास हो गया।
माँ की ममता को ठेस न पहुँचे, इसलिए उसने बिना कोई सवाल किये, चुपचाप एक मुखौटा उठा लिया और माँ को गले से लगा कर चूम लिया।
अब पिता का होना न होना, उसके लिए कोई मायने नहीं रखता था।
माँ का निश्छल प्रेम के होते किसी चेहरे के मुखौटे की आवश्यकता नहीं थी।
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लघुकथा-४
श्याम-सुन्दरी
रंग श्याम वर्ण का था पर स्वप्न सप्तरंगी थे कजरी के।झोंपड़ी की खिड़की पर खड़ी मासूम प्रतीक्षारत निगाहों से वह क्षितिज की ओर निहारा करती।कभी तो उसके सपनों का राजकुमार आयेगा,डोली में बिठा कर ले जायेगा।माँ बाहर से ताला लगा जाती झोंपड़ी का।कचरा बीनने वाली सावित्री को कचरे के ढेर पर नवजात पड़ी मिली थी। काली थी तो कजरी नाम दिया।माँ बन कर पाल-पोस कर इसीलिये बड़ा किया कि एक दिन उसे बेचकर मोटी रक़म कमायेगी।
आज सावित्री कजरी को सजा-सँवार कर गई थी।कानों में कुंडल और नाक में नथनी भी पहना गई थी।
“साहब गूँगी है।अनपढ़ गँवार है तो क्या? एकदम ख़ालिस है।किसी ने न छुआ अब तक।इसलिये तो ताला लगा कर अंदर बंद कर जाती हूँ कजरी को।” ताला खोलकर सावित्री अंदर आई किसी अपटूडेट साहब के साथ।
पर सुरेन्द्र सिंह साहब को तो उसमें दूसरा ही रूप नज़र आया।नथ उतारने का कार्यक्रम रद्द करके उसे मॉडलिग सिखाने का निर्णय कर लिया।दस हज़ार की गड्डी सावित्री के हाथ में रख दी और कजरी को अपने साथ ले गये।
अब हर रोज़ कजरी की काली आँखें बोलतीं, हर एंगल से,उसके उघड़े अंगों की दास्तान, सारी दुनिया के सामने।
एक फ़िल्म में मूक आदिवासी नायिका बन कर पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री में तहलका मचा दिया कजरी ने।चण्डी बनकर बलात्कारियों से चुन-चुन कर बदला लिया।
‘ब्लैक-ब्यूटी’ की पूरी क़ीमत वसूली सुरेन्द्र सिंह ने मुनाफ़ा कमा कर।
कजरी अपने आलीशान बंगले की खिड़की पर खड़ी सपनों के राजकुमार की प्रतीक्षा करती है। तन तो कई बार बिका।अपने मन को संभाल कर रखा है कजरी ने अब तक, गूँगी सलाखों के पीछे।
काश! असल ज़िन्दगी में भी वह अपने बलात्कारियों को सलाखों के पीछे करवा पाती।
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लघुकथा-५
विष बेल
“सारे फसाद की जड़ यह लैपटॉप है।” कहते हुए मीरा ने निशा से लैपटॉप छीन लिया।
उस पर बने अधखाये ‘एप्पल’ को देखकर निशा के मन में आया कि सारे फसाद की जड़ तो यह सेब है जो आदम और हव्वा ने खाया था। जिसने उनमें प्रेम भाव जागृत किया। नितिन के प्रेम में पड़ने के कारण ही वह स्वयं अपनी माँ के क्रोध का कारण बनी।
“नहीं केवल प्रेम नहीं, मेरा भी योगदान है इस दुनिया में इश्क को बनाने में।” एक आवाज आई।
“कौन?” निशा ने इधर-उधर देखा। कोई नहीं था।
“मैं अनंग हूँ। तुम्हारे अंदर हूँ।” फिर से आवाज आई।
“अनंग? मैं समझी नहीं।” निशा को आश्चर्य हुआ।
“लोग मुझे ‘कामदेव’ के नाम से जानते हैं। मैं बिना शरीर धारण किए ही इस संसार के प्राणियों में बसता हूँ।”
“और मैं कामना। मैं भी तो हूँ। बिना कामना के कामदेव किस काम के?” एक मधुर स्वर उभरा।
“तुम? तुम तो बस चुप ही रहो। तुमने और तुम्हारी सखी ‘वासना’ ने मिलकर तो कलियुग में हाहाकार मचा रखा है। नाम मेरा बदनाम हो रहा है।” कामदेव क्रोध से कांपती आवाज़ में बोले।
अब निशा को अन्तर्द्वन्द समझ में आने लगा। इससे पहले कि वह कुछ बोल पाती माँ का स्वर कान में पड़ा, “लो अपना लेपटॉप,बस कालेज के प्रोजेक्ट का काम करना। दोस्तों से चैटिंग नहीं।”
निशा आँख मलते हुए उठ कर बैठ गई।
फिर से उसकी नज़र कटे हुए ‘एप्पल’ पर पड़ी। उसे लगा,कटा सेब बोल पड़ा, “सारे फसाद की जड़ वासना है, ‘विष बेल’ कहीं की।”
पाँच लघुकथा

पूर्णिमा सहारन
लघुकथा-१
घड़ा
“आंटी जी ! फ़्रिज में पानी नहीं रखती आप? अब तो गर्मी शुरू हो गई है।अब इस पानी से प्यास नहीं बुझती।” सिजरा, जो अभी झाड़ू-पौंछा करके निबटी थी, उसने हाथ धोकर अपने गिलास में फ़िल्टर का पानी भरते हुए पूछा। जब तक सविता जी उत्तर देती वह गटागट पानी पी गई।
“ हाँ, तेरे लिये और मेहमानों के लिए कल से रख दूँगी लेकिन अपने लिए तो हम घड़ा लायेंगे।” सविता जी ने कहा।
“ घड़ा तो मेरी अम्मी भी कई बार कह चुकी पापा से लाने के लिए। लेकिन पापा को फ़ुरसत ही नहीं मिल रही बाज़ार जाने की।” सिजरा का पिता दिहाड़ी मज़दूरी पर जाता था और शाम को गर्मी से थका-थका सा घर में घुसता था।
दो दिन बाद सविता जी पति के साथ बाज़ार गयीं और अचानक ही उन्हें सिजरा की बात याद आयी और वे दो घड़े ले आयीं। एक अपने लिए और दूसरा सिजरा के घर के लिए। सिजरा ने एक घड़ा धोकर भर दिया और शाम को ख़ुशी-ख़ुशी अपना घड़ा घर ले गई।
“सिजरा! हमारे घड़े में तो पानी ठंडा नहीं हो रहा। तुम्हारे घड़े में हो रहा है क्या?” आठ-दस दिन बाद सविता जी ने पूछा।
“ हाँ आंटी जी! हमारा घड़ा तो बहुत अच्छा निकला। खूब ठंडा कर रहा पानी। गिलास पर पसीना आ जाता है। और उसमें से आपके घड़े की तरह पानी भी नहीं चू रहा। उसने हँसकर कहा।
“अच्छा? इतना ठंडा! चलो तुम्हारा तो अच्छा निकला।” सविता जी ने कुछ निराशा से कहा। परंतु उन्हें मन ही मन संतोष हो रहा था कि सिजरा के घर का घड़ा पानी खूब ठंडा कर रहा है। कहीं वह घड़ा उनके घर और उनका सिजरा के घर जाता तो वे सोच सकते थे कि आंटी जी अपना घड़ा ज़्यादा अच्छा लायी हैं। जबकि वे दोनों घड़े एक जैसे ही लायी थीं।
अभी तो गर्मी अपने चरम पर थी कि डेढ़ महीने बाद ही सिजरा ने ख़बर सुनाई “आंटी जी! कल हमारा घड़ा फूट गया।”
“अरे! कैसे?”
“ मेरे छोटे भाई-बहन बाहर खेल रहे कि उनमें लड़ाई बज गई। तभी भाई दौड़ता हुआ घर में घुसा और सीधा घड़े से जा टकराया। पानी से भरा घड़ा धड़ाम से गिरा। पता है आंटी! अब्बू ने भाई की ख़ूब पिटाई की। घर में सब बड़े दुःखी हुए।”
“भाई के पिटने से?”
“ नहीं! घड़े के फूटने से!”
जाने क्यों अफ़सोस की एक लहर सविता जी के दिल से भी गुज़र गई।
***
लघुकथा-२
दो, तीन, चार रोटी
दिन ढल गया था और सूरज छुपने जा रहा था। रामफल भी यूँ ही घूमकर, भटककर अपने घर लौट आया। भीतर आ, उस कच्चे घर के कोने में एक दीवार से पीठ टिकाकर बैठ गया। रज्जो और बच्चे भीतर ही थे लेकिन सब शांत थे। उसने सिर का गमछा उतारकर बगल में रखा और एक बीड़ी सुलगा ली। उसने देखा, रज्जो ने चूल्हा जलाकर पतीली चढ़ा दी थी। फिर दो आलू काटकर, चार-पाँच गिलास पानी भरकर, नमक और हल्दी डालकर पकने रख दिए। अब कनस्तर की तली तक जा चुके आटे से, प्रतिदिन की निश्चित मात्रा का आटा ले,गूँथने लगी। तभी जैसे उसे कुछ याद आया। वह पति से मुख़ातिब हुई….
“ आज तो गाँव में सरकारी आदमी आए थे न! दो साल से अकाल की मार सहते किसानों को क्या देने का कह गये? कुछ मिलेगा भी या पहले की तरह ख़ाली पूछ-ताछ करके चले गये?”
“ इस बार कह तो गये हैं कि जल्दी ही कुछ दिवा देंगे।”
“ कितनी जल्दी? कब तक?”
“ ये मैं क्या जानूँ? जो कह गये, वह बता दिया।” कहकर रामफल ने बीड़ी का कश खींचा।
बच्चे जो रोटी की प्रतीक्षा में शांत बैठे माता-पिता का वार्तालाप सुन रहे थे, उत्साहित हो उठे। उनमें से दूसरे नंबर का दस वर्षीय सोनू बोल उठा..
“ फिर तो दोनों टेम मिलेगी ? और सबको एक-एक रोटी नहीं मिलेगी न? मैं तो कई सारी रोटी खाऊँगा।”
“मैं भी तीन-चार खाऊँगा पेट भरकर।” मोनू भी बोला
“ मुझे भी दो मिलेंगी न अम्माँ ?” सबसे छोटी गुड्डी ने भी अपनी भूख बता दी।
“ अरे! तीन-तीन, चार-चार रोटी खाने का तो मेरा भी जी करता है। इतनी तो मैं भी खा लूँगी लेकिन हमारा पेट झेल पाएगा क्या? कल जब बबलू और रोटी माँग रहा था तो सत्तो चाची बबलू को कह रही थी कि जियादा खाकर पेट में दर्द हो जाता है। हमारे भी दर्द नहीं हो जाएगा इतना खाकर?” सबसे बड़ी, बारह वर्षीय बबली ने उत्साह में भी अपनी चिंता जतायी। बच्चों की चर्चा सुनते रामफल के गले में बीड़ी का धुआँ फँस गया और वह खाँसने लगा। इधर, गीली हो चली आँखों को छुपाने के लिए रज्जो फूँकनी उठाकर चूल्हे में फूँक मारकर बुझती आग को तेज़ करने लगी थी।
***
लघुकथा-३
आउट ऑफ़ फैशन
मल्टी नेशनल कम्पनी में अच्छे पद पर कार्यरत , महानगर में रह रहा बेटा दो दिन के लिए दीपावली पर घर आया था। उसके दीपावली पर घर आने के आश्वासन पर माँ ने आँखों की कम हो गयी रौशनी के साथ जूझते हुए, ऊन के गरम धागे के फंदे से फंदा जोड़कर बड़े प्रेम और मनोयोग से पंद्रह-बीस दिन में, रात-दिन लगकर बेटे के लिए स्वेटर बुना था। जाते समय जब बेटा वापसी की पैकिंग करने लगा, तब बड़े प्रेम और उत्साह से माँ ने अलमारी से स्वेटर निकाला और बेटे को दिखाती हुई बोली, “देख तो ज़रा…. कैसा है? पहनकर दिखा, नाप ठीक है क्या?”
“ओ माँ! यह क्या? क्या ज़रूरत थी स्वेटर बुनने की? बाज़ार में बहुत मिलते हैं! और आजकल कौन पहनता है ये घर के बुने स्वेटर? अब ये आऊट ऑफ़ फ़ैशन हो गये हैं।”
कहते हुए रवि के माथे में कुछ बल पड़ गये थे। उसने स्वेटर हाथ में लेकर देखा तक नहीं। उसने माँ के चेहरे और उसके उत्साह पर कोई ध्यान नहीं दिया।
“लेकिन इनमें जो गरमाहट होती है वह रेडीमेड़ में कहाँ?”
माँ ने कुछ खिसियाते हुए अपनी ही तरह का कमज़ोर-सा तर्क देने की कोशिश की।
माँ, जो छोटे शहर में रहती थी उसे आज पहली बार बेटे के स्वर में अवहेलना का पुट नज़र आया।
“अरे माँ!… कुछ पता भी है? एक से एक ब्रांड के इतने बढ़िया और गर्म स्वेटर आते हैं कि पसीना आ जाए पहनकर! और वे इन घर जैसे मोटे और चुभने वाले भी नहीं होते। बड़े पतले और नर्म होते हैं!”
रवि ने बैग बंद करते हुए माँ की अज्ञानता की कुछ खिल्ली-सी उड़ाते हुए कहा।
“मैंने तो सोचा था कि अब भी उसी चाव से पहनेगा, जैसे पहले पहनता था। ”
माँ ,मुँह ही मुँह में बुदबुदाई, जिसे बेटा न सुन सका। माँ ने बेटे का मूड भाँपते हुए कुछ और कहना मुनासिब न समझा और आँखों तक तेज़ी से बहते आते सैलाब को जबरन भीतर ही रोक दिया। फिर एक लम्बी, गहरी साँस के साथ स्वेटर की तह बनाकर अलमारी में वापस रखते हुए माँ के मन का उल्लास, उत्साह भी मन की अलमारी में क़ैद हो गया।
***
लघुखथा-४.
रंगोली
दो महीने चढ़ गये थे। आज सुबह से ही रजनी का जी मिचला रहा था। नींबू चाटते-चाटते भी आख़िर उल्टी हो ही गयी। अनपचे भोजन के अंश, सफ़ेद वाशबेसिन में बिखरे हुए रजनी को चटकीले रंगों से बनी रंगोली से लगे जो किसी उत्सव, त्योहार या नए मेहमान के स्वागत में द्वार पर बनायी जाती है। और यह नए मेहमान के आने की ही तो सूचक थी! रजनी ने मुस्कुराते हुए पानी खोला, मुँह धोया और ख़ुशी-ख़ुशी स्वयं को शीशे में निहार कर बिस्तर पर आकर लेट गयी। डॉक्टर ने आराम की सलाह दी थी। विवाह के आठ वर्षों बाद डॉक्टरों द्वारा न जाने कितने टेस्ट और उपचार, मंदिरों में पूजा-अर्चना, सिद्ध पीठों पर मन्नतें, दान-दक्षिणा और भूले-बिसरे देवताओं की मान-मनौव्वल का परिणाम यह हुआ कि बाँझ क़रार दे दी गयी कोख में अंकुर फूट गया था। पूरा परिवार रजनी को हाथों पर रखे हुए था। उसके खान-पान और आराम का पूरा ख़्याल रखा जा रहा था। तीन महीने पूरे हुए अभी एक सप्ताह ही बीता था कि बाथरूम में फिसलकर रजनी गिरी और रक्तस्राव शुरू हो गया। तुरत-फ़ुरत उसे उठाकर बिस्तर पर लिटाया गया और डॉक्टर को ख़बर दी गयी। इसी दौरान रजनी को फिर उल्टी हुई और कमरे के फ़र्श पर फैल गई। ओह्ह!…सारी ख़ुशियों और आशाओं को फ़र्श पर लथेड़े, कितनी बदरंग और बदबूदार थी यह उल्टी !…
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लघुकथा-५
हाई कैलरीज़
छोटे शहर से महानगर बेटे के घर आई माँ ने बड़े चाव से दो डिब्बे थैले से निकाल कर मेज़ पर रख दिए। सूखे मेवे डले हुए गोंद के और बादाम डले हुए बेसन के लड्डू के डिब्बे खोलकर देखती हुई बहू सास से मुख़ातिब हुई
“ मम्मी जी!… इनकी तो जबसे शुगर बॉर्डर लाइन पर आयी है तबसे मीठा न के बराबर ही लेते हैं। बच्चे भी मीठे में चोकलेट्स और आइसक्रीम ही खाते हैं। और देखिए न मम्मी जी!…. मेरा भी वज़न बढ़ रहा है तो मैंने भी ये ‘हाई कैलरीज़’ बंद कर दी हैं। अब आप भी ये फ़ालतू मेहनत न किया करें। कोई नहीं खाता इन्हें! और …….वैसे भी कभी-कभार कुछ मीठे का मन हो तो थोड़ा-बहुत मार्केट से ख़रीद लाते हैं।”
पूरे दो दिनों की मेहनत और माँ की ममता को बहू ने दो मिनट में बेमोल कर दिया।
“ बाज़ार में घर जैसी शुद्ध चीज़ कहाँ मिलती हैं बहू? ये लड्डू तो काफ़ी दिनों तक भी ख़राब नहीं होते और देसी घी के हैं! बच्चों को कुछ अच्छा मिल जाए बस यही सोचकर बना लायी थी।”
“अरे मम्मी जी!….ये सब न लाया करें। हमें तो शहर में अब अशुद्ध खाने की आदत हो गयी है। ये शुद्ध हमें नहीं पचता।” बहू कहकर व्यंग्य से हँसी और डिब्बों के ढक्कन बंदकर वहाँ से हट गयी।
बहू के इस तिरस्कार से सास, दुःखी व तिरस्कृत सी वहीं की वहीं बैठी रह गई| उनकी नज़रें लड्डुओं के डिब्बे पर चिपकी हुई थीं।
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