यादेंः जब बाथरूम में कविता लिखी गई-नीरजा द्विवेदी

यह घटना इलाहाबाद की है जब मेरे पति की नियुक्ति ए.डी.जी. पुलिस मुख्यालय के पद पर थी. हम लोग 6 मिशन रोड पर सरकारी आवास में रहते थे. आवास का अंदर का लान अत्यंत सुंदर था. वहाँ की प्राकृतिक सुंदरता अत्यंत मोहक थी. मेरा बड़ा पुत्र राजर्षि नागपुर में ट्रेनिंग में था और छोटा देवर्षि रुढ़्की में इंजीनियरिंग कर रहा था. हम दोनों अकेले थे अतः जब मेरे पति दफ्तर चले जाते थे तो मैं सुबह हो या शाम, दिन हो या रात, अंदर वाले लौन के सामने बने बरामदे में बैठ जाती थी. प्रकृति एवं मौसम के विविध रंग मानस में अनेकों भाव उत्सर्जित करते, मन गुनगुना उठता और माँ शारदा की अनुकम्पा एकांत में लेखनी प्रवाहमान कर गीतों की सृष्टि कर देती.
हम दोनों का जीवन अत्यंत सौहार्दपूर्ण चल रहा था. अचानक मेरे जीवन में भूचाल आ गया. मेरे पति अकारण गुस्सा करके बमकते नहीं हैं और न तोड़-फोड़ या वस्तुओं की उठा-पटक करते हैं, पर यह न समझियेगा कि वह गऊ हैं. उनका गुस्सा तो बहुत भयंकर होता है. वह एक दम मौन साध लेते हैं और सामने वाले को समझ नहीं आता कि हुआ क्या है? आप यह भी नहीं जान पायेंगे कि उनकी तबियत खराब है या वह आप पर गुस्सा हैं या किसी और पर. अब मैं आपको एक व्यक्तिगत संस्मरण ऐसा सुना रही हूँ जो अनोखे वातावरण में गीत सृजन का कारण बना.
एक दिन द्विवेदी जी दोपहर को लंच पर आये तो भौंहें तनी हुई, एकदम मौन साधे हुए. चुपचाप थोड़ा सा भोजन करके जाकर अपने कक्ष में लेट गये. मैं काम समाप्त करके जब पहुंची तो ऐसा लगा कि सो रहे हैं पर भाव भंगिमा से यह प्रतीत हुआ कि सो नहीं रहे हैं, कुछ बेचैनी है. मैंने धीरे से माथे पर हाथ लगाकर देखा—ज्वर नहीं था. थोड़ी देर विश्राम करके वह चुपचाप उठे और दफ्तर चले गये. जब यह अनमनस्क होते हैं तो मैं इनको छेड़ती नहीं केवल इन्हें तटस्थ होने का अवसर देती हूं.
मेरे मामा आर्येंद्र कुमार मिश्रा इलाहाबाद में रहते थे. मामा को कैंसर हो गया था और बहुत बीमार थे अतः शाम को हम लोग उनके पास चले गये. वहाँ पर द्विवेदी जी सामान्य अवस्था में रहे पर घर आकर उनकी मुद्रा पुनः वैसी ही हो गई. रात को भी वह चुपचाप कुछ सोचते रहे और जब मैं पहुँची तो आंख बंद करके सोने का बहाना कर लिया. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. यदि हमारी किसी बात पर बहस भी होती तो कुछ देर बाद ही हम भूल जाते थे. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि हुआ क्या है? सरकारी विषयों के बारे में द्विवेदी जी आवास में कभी कोई बात नहीं करते थे. पहले दिन तो मैं समझी कि हो सकता है कि कोई सरकारी मामला होगा, परन्तु जब इसी तरह एक सप्ताह होने को आया तो मैं चिंतित हो उठी. मैंने बहुत सोचा कि सम्भवतः मेरी कोई गल्ती से नाराज़ हों पर ऐसा भी कुछ नहीं हुआ था. उनकी तबियत भी ठीक थी. मुझे अपने से अधिक उनके चरित्र पर विश्वास था. जो व्यक्ति मेरी अपेक्षा अधिक बोलने वाला और हँसमुख हो वह एकदम मौन साध ले और घर में केवल दो ही व्यक्ति हों तो सोचिये क्या दशा होगी? उन दिनों मुझ पर कविता लिखने का भूत तो सवार था ही. रात को जब सोने को लेटी तो मन में कविता की एक पंक्ति गूँजीं—
“ प्रिय तुम हो क्यों गुमसुम?
अब क्या था ये तो अपने मुँह पर चादर ढक कर लेटे थे और मुझे बेचैनी में नींद नहीं आ रही थी तो कविता की चार पंक्तियाँ मन में कौंधी—
“प्रकृति प्रिय का अनुपम दर्शन,
तन में भर-भर उठती सिहरन
मन में भावों का उद्दीपन,
ऐसे में प्रिय हो क्यों गुमसुम?’’
जैसे ही मैं आकर लेटती कि अचानक दूसरी पंक्तियां याद आतीं. मैं इनकी नींद में व्यवधान नहीं डालना चाहती थी अतः बाथरूम में बार-बार जाती और वहाँ कविता की पंक्तियां नोट करने लगती क्योंकि यदि कविता का क्रम टूट जाता है तब दुबारा फिर ठीक नहीं बनता. बार-बार अंदर-बाहर आ-जाकर मेरी कविता पूरी हो गई. इधर मेरे पति की नींद खुल गई और वह मेरे बार-बार बाथरूम जाकर लौटने से चिंतित होकर मेरे पीछे-पीछे बाथरूम में चले आये. मेरी कविता लिखने की पोल खुल गई और इनकी मौन साधना भी. मेरी कविता देखकर इन्होंने अपने मौन व्रत का राज़ खोला.
ए.डी.जी. मुख्यालय के अंतर्गत पुलिस कर्मचारियों की पेंशन का कार्य भी आता है. इन्होंने अपने कार्यकाल में देखा था कि बीस-बीस साल पूर्व अवकाशप्राप्त कर्मचारी पुलिस मुख्यालय के चक्कर लगाया करते थे और कुछ तो दिवंगत भी हो गये थे पर उनकी पेंशन की व्यवस्था नहीं होती थी. जब द्विवेदी जी की नियुक्ति पुलिस मुख्यालय में हुई तो इन्होने कर्मचारियों की इस व्यवस्था को सुधारने का बीड़ा उठाया. जो कर्मचारी मुख्यालय में नियुक्त थे वे भला व्यवस्था को सुधारने के लिये क्यों प्रयत्न करते, उनकी आमदनी का ज़रिया खत्म हो जाता. द्विवेदी जी कर्मचारियों के रिकौर्ड्स कम्प्यूटर पर डलवाने का प्रयत्न कर रहे थे पर मुख्यालय के बाबू सहयोग नहीं कर रहे थे. उनको समझाकर जब द्विवेदी जी हार गये तो उन्हें डाँट कर पेंशन के रिकौर्ड्स पूरे करा रहे थे और इस प्रक्रिया में उनका क्रोध उतरता नहीं था.
मुझे गर्व है कि इनके सद्प्रयत्नों से इलाहाबाद से स्थानांतरित होने के पूर्व सभी पुलिस कर्मचारियों के रिकौर्डस कम्प्यूटर पर चढ़ गये थे और संतोष भी है क्योंकि पुलिस महिला कल्याण केंद्र में पुलिस आरक्षियों की विधवायें मेरे पास भी आकर अपना दुखड़ा रोया करती थीं. अपना काम चुपचाप करके अपने कार्यों का बखान न करने वाले द्विवेदी जी के इस अथक परिश्रम का श्रेय इनके बाद नियुक्ति पाने वाले अधिकारियों ने अपना प्रचार कर लिया.
आज बाथरूम में लिखी इस कविता को सबके सामने प्रस्तुत करने का साहस कर रही हूँ.

प्रिय तुम हो क्यों गुमसुम?

प्रकृति प्रिय का अनुपम दर्शन
तन में भर-भर उठती सिहरन
मन में भावों का उद्दीपन
प्रिय तुम हो क्यों गुमसुम?

पुष्पों पर भौरों का गुन्जन,
मदिर वायु का मूक प्रलोभन,
सांसों में भीषण आन्दोलन
प्रिय तुम हो क्यों गुमसुम?

कोयल का उपवन में कूजन,
चकवे का सरि तट पर क्रन्दन,
कलियों का अलि लेते चुम्बन,
प्रिय तुम हो क्यों गुमसुम?

नभ में श्याम घटा की भटकन,
सुरधनु के रंगों की थिरकन ,
फिर चंचल चपला का नर्तन,
प्रिय तुम हो क्यों गुमसुम?

पायल की वह मीठी रुनझुन,
खन-खन चूडी कंगन की धुन.
अधरों पर गीतों की गुनगुन
प्रिय तुम हो क्यों गुमसुम?

रात दिवस का मिलन सुहावन,
देख हृदय करता है नर्तन ,
आज तुम्हें सर्वस्व समर्पण
प्रिय तुम? हो क्यों गुमसुम?

तुम क्या जानो मेरी तड़पन?
जब सर्वस्व किया है अर्पण,
फिर मैं तो रह गई अकिन्चन,
प्रिय तुम हो क्यों गुमसुम?

नीरजा द्विवेदी
जन्म स्थान एवं तिथिः दातागंज, बदायूं / 5 मार्च, 1946
पताः 1/137, विवेकखंड, गोमतीनगर, लखनउू
सामाजिक सेवा-
अ. अध्यक्ष, ‘ज्ञान प्रसार संस्थान’
1. निर्बल वर्ग के लगभग 100 बच्चों हेतु विवेकखंड-1, गोमतीनगर में निःशुल्क शिक्षा, चिकित्सा-सुविधा, व्यवसायिक कार्यक्रम एवं पुस्तकालय
2. ग्राम मानीकोठी एवं कुदरकोट, जनपद औरैया में छात्रों के प्रशिक्षण एवं प्रोत्साहन हेतु वाचनालय, प्रतियोगिताओं एवं साहित्यिक गोष्ठियों का आयोजन
3. लखनऊ में साहित्यिक गोष्ठियों का आयोजन
ब. पूर्व अध्यक्ष, उ. प्र. पुलिस कल्याण संस्थान- उत्तर प्रदेश पुलिस के समस्त कर्मियों हेतु समग्र कल्याण कार्य
साहित्यकार एवं गीतकार
1. कादम्बिनी, सरिता, मनोरमा, गृहशोभा, पुलिस पत्रिका, सुरभि समग्र आदि अनेक पत्रिकाओं एवं समाचार पत्रों मे लेख, कहानियां, संस्मरण आदि प्रकाशित
2. भारतीय लेखिका परिषद, लखनउू एवं लेखिका संघ, दिल्ली की सदस्य
3. भारत, ब्रिटेन एवं अमेरिका में कवि गोष्ठियों मे काव्य पाठ
4. बी. बी. सी. एवं ए. आई. आर. पर कविता/कहानी का पाठ
5. ‘गुनगुना उठे अधर’ नाम से गीतों का टी. सीरीज़ का कैसेट
प्रकाशित पुस्तकें: 17 – उपन्यास, कहानी संग्रह, संस्मरण, लोक-गीत संकलन, कविता संग्रह आदि
सम्मान व पुरस्कार- देश-विदेश की विभिन्न संस्थाओं द्वारा लगभग पचास