श्रद्धांजलिः मंगलेश डबराल

अपने पहले काव्य संग्रह-पहाण पर लालटेन – से ही विशिष्ट पहचान रखने वाले एक बेहद संवेदनशील और मानवीय सरोकारों से भरपूर कवि और उतने ही अच्छे इंसान मंगेश डबराल का बहत्तर वर्ष की अल्प आयु में हमसे छिन जाना एक उज्जवल नक्षत्र का हिन्दी काव्याकाश से असमय ही अस्त हो जाना है। लेखनी परिवार की तरफ से भावभीनी श्रद्धांजलि, उन्ही की कुछ चुनिंदा कविताओं के साथ, प्रभु उन्हें अपने चरणों में स्थान दे…

यहाँ थी वह नदी
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जल्दी से वह पहुँचना चाहती थी
उस जगह जहाँ एक आदमी
उसके पानी में नहाने जा रहा था
एक नाव
लोगों का इन्तज़ार कर रही थी
और पक्षियों की क़तार
आ रही थी पानी की खोज में

बचपन की उस नदी में
हम अपने चेहरे देखते थे हिलते हुए
उसके किनारे थे हमारे घर
हमेशा उफनती
अपने तटों और पत्थरों को प्यार करती
उस नदी से शुरू होते थे दिन
उसकी आवाज़
तमाम खिड़कियों पर सुनाई देती थी
लहरें दरवाज़ों को थपथपाती थीं
बुलाती हुईं लगातार

हमे याद है
यहाँ थी वह नदी इसी रेत में
जहाँ हमारे चेहरे हिलते थे
यहाँ थी वह नाव इंतज़ार करती हुई

अब वहाँ कुछ नहीं है
सिर्फ़ रात को जब लोग नींद में होते हैं
कभी-कभी एक आवाज़ सुनाई देती है रेत से


वर्णमाला
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एक भाषा में अ लिखना चाहता हूँ
अ से अनार अ से अमरूद
लेकिन लिखने लगता हूँ अ से अनर्थ अ से अत्याचार
कोशिश करता हूँ कि क से क़लम या करुणा लिखूँ
लेकिन मैं लिखने लगता हूँ क से क्रूरता क से कुटिलता
अभी तक ख से खरगोश लिखता आया हूँ
लेकिन ख से अब किसी ख़तरे की आहट आने लगी है
मैं सोचता था फ से फूल ही लिखा जाता होगा
बहुत सारे फूल
घरो के बाहर घरों के भीतर मनुष्यों के भीतर
लेकिन मैंने देखा तमाम फूल जा रहे थे
ज़ालिमों के गले में माला बन कर डाले जाने के लिए

कोई मेरा हाथ जकड़ता है और कहता है
भ से लिखो भय जो अब हर जगह मौजूद है
द दमन का और प पतन का सँकेत है
आततायी छीन लेते हैं हमारी पूरी वर्णमाला
वे भाषा की हिंसा को बना देते हैं
समाज की हिंसा
ह को हत्या के लिए सुरक्षित कर दिया गया है
हम कितना ही हल और हिरन लिखते रहें
वे ह से हत्या लिखते रहते हैं हर समय ।

घर

यह जो हाथ बांधे सामने खड़ा है घर है

काली काठ की दीवालों पर सांप बने हैं
जिन पर पीठ टेकने के निशान हैं
इनमें दीमकें लगी हैं
जो जब चलती हैं पूरा घर कांपता है

इसमें काठ का एक संदूक है
जिसके भीतर चीथड़ों और स्वप्नों का
एक मिला-जुला अंधकार है
इसे पिता ने दादा से प्राप्त किया था
और दादा ने ख़ुद कमाकर

घर जब टूटेगा बक्स तभी उठेगा

कई बच्चे बड़े हुए इस घर में
गिरते पड़ते आख़िरकार
खाने-कमाने की खोज में तितर-बितर होते हुए
यहां कुछ मौतें हुईं
कुछ स्त्रियां रोईं इस तरह
कि बस उनका सुबकना सुनाई दे
कुछ बहुत पुरानी चीज़ें अब भी बजती हैं घर में

दिन-भर लकड़ी ढोकर मां आग जलाती है
पिता डाकख़ाने में चिट्ठी का इंतज़ार करके
लौटते हैं हाथ-पांव में
दर्द की शिकायत के साथ
रात में जब घर कांपता है
पिता सोचते हैं जब मैं नहीं हूँगा
क्या होगा इस घर का।


हम जो देखते हैं
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मैं चाहता हूँ कि स्पर्श बचा रहे
वह नहीं जो कंधे छीलता हुआ
आततायी की तरह गुज़रता है
बल्कि वह जो एक अनजानी यात्रा के बाद
धरती के किसी छोर पर पहुँचने जैसा होता है
मैं चाहता हूँ स्वाद बचा रहे
मिठास और कड़वाहट से दूर
जो चीज़ों को खाता नहीं है
बल्कि उन्हें बचाए रखने की कोशिश का
एक नाम है
एक सरल वाक्य बचाना मेरा उद्देश्य है
मसलन यह कि हम इंसान हैं
मैं चाहता हूँ इस वाक्य की सचाई बची रहे
सड़क पर जो नारा सुनाई दे रहा है
वह बचा रहे अपने अर्थ के साथ
मैं चाहता हूँ निराशा बची रहे
जो फिर से एक उम्मीद
पैदा करती है अपने लिए
शब्द बचे रहें
जो चिड़ियों की तरह कभी पकड़ में नहीं आते
प्रेम में बचकानापन बचा रहे
कवियों में बची रहे थोड़ी लज्जा ।


कहीं मुझे जाना था
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कहीं मुझे जाना था नहीं गया
कुछ मुझे करना था नहीं किया
जिसका इंतजार था मुझको वह यहाँ नहीं आया
खुशी का एक गीत मुझे गाना था गाया नहीं गया
यह सब नहीं हुआ तो लंबी तान मुझे सोना था सोया नहीं गया
यह सोच-सोचकर कितना सुख मिलता है
न वह जगह कहीं है न वह काम है
न इंतजार है न वह गीत है और नींद भी कहीं नहीं है

पत्तों की मृत्यु
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कितने सारे पत्ते उड़कर आते हैं
चेहरे पर मेरे बचपन के पेड़ों से
एक झील अपनी लहरें
मुझ तक भेजती है
लहर की तरह काँपती है रात
और उस पर मैं चलता हूँ
चेहरे पर पत्तों की मृत्यु लिए हुए
चिड़िया अपने हिस्से की आवाजें
कर चुकी हैं, लोग जा चुके हैं
रोशनियाँ राख हो चुकी हैं
सड़क के दोनों ओर
घरों के दरवाजे बंद हैं
मैं आवाज देता हूँ
और वह लौट आती है मेरे पास।

एक जीवन के लिए
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शायद वहाँ थोड़ी सी नमी थी
या हल्का सा कोई रंग
शायद सिरहन या उम्मीद
शायद वहाँ एक आँसू था
या एक चुंबन
याद रखने के लिए
शायद वहाँ बर्फ थी
या छोटा सा एक हाथ
या सिर्फ छूने की कोशिश
शायद अँधेरा था
या एक खाली मैदान
या खड़े होने भर की जगह
शायद वहाँ एक आदमी था
अपने ही तरीके से लड़ता हुआ।


आसान शिकार
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मनुष्य की मेरी देह
ताक़त के लिए एक आसान शिकार है
ताक़त के सामने वह इतनी दुर्बल है
और लाचार है
कि कभी भी कुचली जा सकती है
ताक़त के सामने कमज़ोर और
भयभीत हैं मेरे बाल और नाख़ून
जो मेरे शरीर के दरवाज़े पर ही
दिखाई दे जाते हैं
मेरी त्वचा भी इस कदर पतली
और सिमटी हुई है
कि उसे पीटना बहुत आसान है
और सबसे अधिक नाज़ुक और
ज़द में आया हुआ है मेरा हृदय
जो इतना आहिस्ता धड़कता है
कि उसकी आवाज़ भी शरीर से
बाहर नहीं सुनाई देती
ताक़त का शरीर इतना
बड़ा इतना स्थूल है
कि उसके सामने मेरा अस्तित्व
सिर्फ़ एक सांस की तरह है

मिट्टी हवा पानी ज़रा सी आग
थोड़े से आकाश से बनी है मेरी
देह
उसे फिर से मिट्टी हवा पानी और
आकाश में मिलाना है आसान
पूरी तरह भंगुर है मेरा वजूद
उसे बिना मेहनत के मिटाया जा
सकता है
उसके लिए किसी अतिरिक्त
हरबे-हथियार की ज़रूरत नहीं
होगी
यह तय है कि किसी ताक़तवर
की एक फूंक ही
मुझे उड़ाने के लिए काफ़ी होगी
मैं उड़ जाऊंगा सूखे हुए पत्ते नुचे
हुए पंख टूटे हुए तिनके की तरह

कभी-कभी कोई ताक़तवर थोड़ी
देर के लिए सही
अपने मातहतों को सौंप देता है
अपने अधिकार
उनसे भी डरती है मेरी मनुष्य देह
जानता हूं वे उड़ा देंगे मुझे अपनी
उधार की फूंक से।

मंगलेश डबराल


(16 मई 1948-09 दिसम्बर 2020)