
शिवानी खन्ना, दिल्ली

लघुकथा-१
मटर पनीर
अमित की तेहरवी पर अमिता के आगे थाली में जब मटर पनीर परोसा गया तो बचपन की बातें याद आ गयी
अमित मटर पहले खाता क्योंकि उसे पनीर पसंद था और मटर नहीं । पूरी ज़िंदगी वह मटर खाता रहा की बाद मे पनीर खाएगा … पर ज़िंदगी मटर खाने के बाद पनीर खाने का मौक़ा दे ये ज़रूरी नहीं ।
ज़िंदगी भर पैसे जोड़ता रहा … गिन कर चार जोड़े कपड़े ही रहते … भाभी को कड़ी हिदायत थी की जब तक रफ़ू हो सके चलाओ
१० रुपए बचाने के चक्कर में दूर फल सब्ज़ी ख़रीदने जाता पैदल आता जाता। एक चप्पल कई बार जुड़वाता ….. बच्चे देखते थाली में पनीर है पर उन्हें भी खाने की मनाही थी इसलिए वे भी चिढ़ते
एक दिन बीमारी ने दस्तक दी … नीम हकीम से इलाज कराया …
आज अमित नहीं था पर उसके हिस्से का पनीर वैसे ही था काश थोड़ा पनीर चख लिया होता …
लघुकथा-२
खर्राटे
“ आँटी जीं बरामदे में पोछा रहने दूँ “
बरामदे से खर्राटों की आवाज़ सुन मंजु बोली ।
“ नहीं लगा ले तेरे अंकल ऐसे ही सुस्ता रहे होंगे “ सोफ़े पर बैठी पुष्पा ने कहा ।
“ आँटी जी ,अंकल जी के खर्राटों की कितनी ऊँची आवाज़ है , आप रात को सोती कैसे है ? पुष्पा की चहेती मंजु ने पूछा ।
“ नज़र ना लगा , इनके खर्राटों से पता चलता है ठीक है । आवाज़ आती रहती है तो मैं निश्चिंत हो जाती हूँ”।
बरामदे में ऊँघते सुरेंद्र के चेहरे पर मीठी याद की मुस्कान थी ।
आज से 48 साल पहले जब दरवाज़े में खड़े उन्होंने सुना कि उनकी नई नवेली दुल्हन मायके में अपनी माँ से शिकायत कर रही थीं “ माँ कैसे आदमी से शादी कर दी है । इतनी ज़ोर से खर्राटे लेते है , नींद आती ही नहीं ।लड़की से इतने सवाल पूछे जाते है , खाना बनाना , सीना पिरोना , यहाँ तक कि चाल , आवाज़ कैसी है ? लड़के को कोई सुला कर नहीं देखता की खर्राटों की आवाज़ किस रेल गाड़ी से मेल खाती है
लघुकथा-३
परसेंटेज
“आओ नेहा तुम भी मुँह मीठा करो “कहते हुए प्रीति की मम्मी ने काजू कतली का डिब्बा आगे कर दिया ।
“आंटी जी कंग्राट्युलेशन्स … प्रीति कहाँ है “नेहा ने हड़बड़ी में कहा ।
“ऊपर कमरे में “
नेहा का मन बहुत विचलित था सरपट सीढ़ियाँ चढ़ गई ।
दरवाज़ा खुला था प्रीति बेड पर औंधी लेटी हुई थी ।
“ प्रीति! प्रीति !तू ठीक है ना । नेहा की आवाज़ में बैचैनी थी ।
हाँ ! हाँ गदाधारी भीम शांत क्या हुआ ? अपनी मस्त अंगड़ाई लेती प्रीति बोली ।
“ मुझे अभी प्रणव का मेसेज आया कि तुम्हारी शादी फिक्स हो गई है … कोई ज़ोर ज़बरदस्ती से घबराना नहीं .. वोह उसके पापा के दुबई से आते ही तुम्हारे घर आएगा “ ।एक साँस में नेहा ने संदेशा दिया ।
“ हाउ स्टुपिड ! व्हाट ऐन इमोशनल फूल “
मैं कोई उन्नीसवी सदी की लड़की हो जहाँ लड़की से बिना पूछे उसे किसी अनजान के साथ बांध दिया जाता था । यह सब मेरी मर्ज़ी से हो रहा है “ बालों को सही करती प्रीति बोली ।
“पर तुम तो प्रणव के साथ काफ़ी सीरियस थी … गोवा भी गई थी ? “नेहा ने अचरज से पूछा
“हा हा ! गोवा जाने से कोई शादी फिक्स हो जाती है ? “नेहा की बात को मज़ाक़ में लेते हुए प्रीति ने कहा ।
“देख तू चिल कर और बात समझ
रमन माँ बाप का इकलौता बेटा है और प्रणव दो भाई
यानी रमन का 100 % प्रणव का 50 %
रमन के पापा एक फैक्ट्री है मतलब 100 %
प्रणव के दादा की २ … एक उसके चाचा की एक उसके पापा की एक तो प्रणव को मिला एक फैक्ट्री का 50%
रमन के पापा की हज़ार गज़ की कोठी ।
रमन को मिला 100 %
प्रणव की हज़ार गज़ की कोठी पर चाचा के पाँच सौ और प्रणव के पापा के 500 आगे चलके प्रणव को मिले 250 गज़ यानी 25 %
स्कूल में मुझे लगता था यह क्या मैथ्स ( गणित)में परसेंटेज पढ़ाते है पर कुछ दिन पहले मुझे यह परसेंटेज समझ आया तो मैंने अपनी लाइफ में अपना लिया … मम्मी पापा भी खुश की उनकी पसंद के लड़के से शादी कर रही हूँ कल को नहीं निभी तो कह सकती हूँ आप ही ने ढूँढा था । “गणित का पूरा हिसाब समझाते प्रीति ने कहा ।
“और हाँ ;मैंने ही प्रणव को मेसेज कर के बताया था और कहा था मैं खुश हूँ और वो भी लाइफ में आगे मूव ऑन करे । मैंने उसका नंबर ब्लॉक कर दिया है। अगर तुम्हें करे तो एक बार समझा देना नेक्स्ट टाइम ब्लॉक कर देना । “प्रीति ने हिदायत दी ।
“अब यह सब पास्ट भूल ,आ तुझे रमन की और अपने रोके की पिक्स दिखाती हूँ “कहते हुए प्रीति ने अपने फ़ोन को नेहा के आगे कर दिया ।
लघुकथा-४
बूढ़ा या बुज़ुर्ग
“ क्या हुआ बस दो ही चक्कर” पूछते हुए कर्नल वर्मा कमलेश बाबू के पास बेंच पर बैठ गए ।
“हाँ हिम्मत नहीं होती और मन भी उदास है “कमलेश बाबू ने दुःखी मन से कहा
“क्यों घर परिवार सब है ,बेटा बहू पोता पोती सब बहुत सभ्य प्यार करने वाले है “कर्नल वर्मा बोले
“अब कुछ ग़लत होगा तब बोलूँ नहीं
कामवाली ने पोछा नहीं लगाया मैंने बोला तो बहू बोली ठंड बहुत है भला ये कैसे सफ़ाई हुई … बच्चे देर रात तक जागते है देर से उठते है ,बूढ़ा हो गया हुँ मेरी बात का कोई मोल नहीं “ कमलेश बाबू ने उलहाने भरे स्वर में कहा ।
“कभी समझा है बूढ़ा क्यों कहते हैं
बूढ़ा जिसके सब अंग धीरे धीरे अपनी क्षमता से कम काम करते हैं आँखे , जोड़ पाचन इत्यादि पर एक ज़ुबान ज़्यादा चलती है सारा दिन बुढ बुढ तभी बूढ़ा “ कहते हुए कर्नल वर्मा ने ज़ोर से ठहाका लगाया |
कमलेश बाबू बुज़ुर्ग बनो, जिसके पास
ब से बहुत , ज़ से ज़िंदगी का तज़ुर्बा है और ग से गर्व है की वो आनेवाली पीढ़ी को दे रहे है
जिस दिन ये समझ जाओगे ख़ुश रहोगे.. तुम्हें उन्हें सही दिशा दिखानी है उपदेश नहीं देना ,उठो एक चक्कर और लगाते है हाथ बढ़ा कमलेश बाबू को साथ ले कर्नल वर्मा चल पड़े।
लघुकथा-५
ख़िदमतगार अपराधी
सुनैना के जाने के बाद सब अपनी ज़िंदगीमें व्यस्त हो गए .. मेज़ का दराज़ खोला तो अशोक की निगाह सुनैना के चाबियों के छले पर गयी .. एक छोटी चाबी पर लाल धागा बँधा था। उत्सुकतावश अशोक ने सारी अलमारियाँ खोल दी दराज़खोल दिये पर धागे वाली चाबी किसी की नहीं थी ।
इसी उधेड़बुन में सारा समान बाहर निकालदिया तभी उसकी शॉल से ढकी एक संदूकचि मिली जैसे ही चाबीलगायीताला खुलगया
खोलते ही अशोक अवाक् रहगया है और 4 जोड़े सोने के कंगन 2 सोने की चेन .. 5 सोने के सिक्के और 12 चाँदी के सिक्के और एक चिट्ठी
प्रिय अशोक
जब तुम्हें ये चिट्ठी मिलेगी तब मैं इस दुनिया में नहीं होंगी … ये सब मैंने चोरी से बनवाया था हाँ चोरी से
तुम हमेशा कहते मैं 1940 की पैदैयाश …इन्वेस्टमेंट फ़्यूचर प्लैनिंग क्या जानु ….. तो ये समझना ये मेरी पफ का कट था और ये ग्रटूयटी है जो मेरे बच्चों में बाँट देना
तुम्हारी ख़िदमतगार अपराधी
पढ़ते अशोक की आँख से आँसू की बूँद गिरी और अपराधी शब्द धूल गया ।

अनिल मकारिया 
लघुकथा-१
सोपान
याद है मुझे !
मैं घर के आँगन में कंचे खेल रहा था और माँ हरबार की तरह घूँघट ओढ़े गुनगुनाते हुए बाजरा साफ कर रही थी और तभी पहलीबार मैंने उनकी गुनगुनाहट को ध्यान से सुनने की कोशिश की थी ।
“अरे… संसार संसार
जैसे तवा चूल्हे पर,
लगते हाथ को चटके
तब मिलती भाकर …”
यक़ीनन यह मेरे गाँव का कोई लोकगीत तो नहीं था और ना ही गाँव के किसी स्कूल की किताब की कोई कविता जो बच्चे अमूमन गाते रहते हैं !
किसी कविता की किताब से पढ़े होने का भी कोई सवाल ही नहीं था क्योंकि मेरे परिवार में उस समय तक मेरे अलावा सभी अनपढ़ ही थे । और …और मैं भी तो सातवीं में ही था मतलब अभी-अभी ढंग से लिखना-पढ़ना सीखा भर ही था । अब मैं हरबार अपनी माँ के घूँघट से आती गुनगुनाहट या महिलाओं के बीच बोली गई माँ की कविताओं को एक बही में दर्ज करने लगा । अपनी उम्र के पचास साल पार करने के चंद महीने पहले ही जब मैंने वह कविताएँ अपने गुरु को दिखाई तो उनकी प्रतिक्रिया सुनकर मैं अवाक रह गया ।
“सोपान… यह कविताएँ नहीं बल्कि ख़ालिस सोना है और तुमने इन्हें सालों तक लोगों से छिपाकर एक गुनाह ही किया है ।”
वाकई ! लोगों का ही नहीं बल्कि अपनी माँ का भी गुनाहगार ही था मैं… मृत्यु शैय्या पर थी मेरी माँ, जब मैं उन्हें उनकी कविताओं के राज्यभर में प्रसिद्ध होने की खबर सुना रहा था और उनकी आँखों से खुशी के आँसू झर-झर बहे जा रहे थे ।
“माँ ! काश की तुम पढ़ी-लिखी होती … तो …तो बड़ी होकर तुम क्या बनती ?” मुझे नहीं सूझ रहा था कि माँ की उपलब्धि पर हुए गर्व का बखान कैसे करूँ ?
“एक कवियत्री !… जैसी अभी मैं हूँ, तुम्हारी वजह से… तुम्हारे शिक्षित होने की वजह से !”
अंतिम समय में मेरी माँ के चेहरे पर दर्द की लकीरें नहीं बल्कि आत्मसम्मान का तेज था ।
लघुकथा-२
सभ्यताएँ
समुद्र में उभरी हुई दोनों चट्टानों पर लहरें बराबर अपनी दस्तक दिया करती थी लेकिन फिर भी पहली चट्टान के अलाने घोंघे एक खास लय में झूमते थे, तो दूसरी चट्टान के फलाने घोंघे ऊपर-नीचे कूदते रहते थे।
एक झूमते हुए घोंघे को सामने की चट्टान के कूदते हुए घोंघे बड़े आकर्षक लगते थे लेकिन जब उसकी नजर दोनों चट्टानों के बीच बहते हुए तेज पानी और डूबती-उठती लहरों पर पड़ती तो वह मायूस हो जाता। कभी बहता हुआ लकड़ी का एक लट्ठा उस झूमते हुए घोंघे की चट्टान के पास आकर रुका और झूमता हुआ घोंघा वक्त न गँवाते हुए उस पर सवार हो गया। उसकी देखा-देखी कुछ और झूमते घोंघे उसके साथ हो लिए।
लहरों में लहराता लट्ठा जैसे ही ऊपर-नीचे कूदते घोंघों की चट्टान की ओर बढ़ता उस पर सवार झूमते हुए घोंघे खुशी के मारे किलकारी मार उठते। यदा-कदा कोई बड़ी लहर आकर लट्ठे को चट्टान के नजदीक तो पहुँचा देती लेकिन चट्टान की सतह पर कूदते घोंघों तक नहीं पहुँचा पाती। अब तो कूदते घोंघे भी चट्टान के छोर पर खड़े हो गए ताकि अपनी चट्टान की सतह तक पहुँचने में उन झूमते घोंघों की मदद कर सकें। आखिरकार एक बड़ी लहर के उछाल ने उन लट्ठे सवारों को उस चट्टान की सतह पर ला ही पटका। धीरे-धीरे झूमती किलकारियों और कूदते उत्साह के साथ ही दोनों चट्टानों के बीच का पानी भी उतराता-सा प्रतीत होने लगा। किसी सुबह वह पानी पूरी तरह उतर चुका होता है। अब दोनों चट्टानों पर कुछ अलाने घोंघे ऊपर-नीचे कूद रहे होते हैं और कुछ फलाने घोंघे एक खास लय में झूम रहे होते हैं। पानी उतरने के बाद यह स्पष्ट दिख रहा है कि वे दोनों चट्टाने एक ही धरातल का हिस्सा हैं जिसे पानी ने बाँट रखा था।
लघुकथा-३
रिश्तों की बर्फ
“ए कहवा…ए कहवा!”
सुबह-सुबह गुलमर्ग की वादियों में गूंजती यह आवाज यकीनन उसके कश्मीरी कहवा की तरह ही जायकेदार है जिसे रोज यह बारह-तेरह साल का कश्मीरी बच्चा हमारे पड़ाव पर बेचने चला आता है।
कड़कड़ाती ठंड में बारह-बारह घण्टे की बारी से पहरा देते फौजियों के पास जाकर पूछना “ए… कहवा ?” यूँ लगता है मानो मोहनी अवतार पास आकर पूछे “अमृत पीना है?”
लेकिन इस गुलाबी लड़के ने उसदिन के बाद मुझसे कभी कहवा के लिए नही पूछा जब मेरी नई-नई पोस्टिंग इस गांव में हुई थी और मैंने इसके “ए… कहवा” कहने पर झिड़क दिया था और गुस्से से कहा था “कॉफी है तो लाओ हम साउथ इंडियन कहवा नही पीते।”
मेरे शब्द उसे कितने समझ आये होंगे यह मुझे नही पता मगर तब से उसने मुझसे कहवा के लिए कभी नही पूछा मगर हाँ! मुझे देखकर उसके गुलाबी चेहरे पर एक मुस्कराहट जरूर आ जाती है।
टूटी-फूटी हिंदी में कभी उसने मेरे साथी फौजियों को बताया था कि उसके अम्मी-अब्बा सीमापार से हुई फायरिंग में मारे गए थे। वह इस पहाड़ी के नीचे बने छोटे से लकड़ी के घर में रहता है और कहवा बेचकर अपनी रोजी चलाता है।
“ए …इधर आ!” मेरे बुलाते ही वह गुलाबी मुस्कान लिए पास आकर खड़ा हो गया और मुझे टुकुर-टुकुर निहारने लगा।
“कॉफ़ी क्यों नही लाता?” मैंने किंचित नर्म स्वर में पूछा।
एक पल के लिए उसकी आँखों में उदासी और नमी एक साथ झलकी और फिर अगले ही पल उदासी को शब्द मिल गए।
“मेरा घर नीचे…आना!” बोलकर वह दूसरे फौजी की ओर कहवा देने बढ़ गया।
मुझे लगा जैसे मेरे सख्त फौजी लहजे ने शायद उसे आहत किया होगा।
मैं बिना कुछ बोले उसके पीछे हो लिया उसने मुझे पीछे मुड़कर देखा लेकिन वह कुछ न बोला।
सफेद बर्फ पर समोवर हाथ में थामे कूदता-फांदता वह लड़का पहाड़ी उतरते ही लकड़ी के केबिन नुमा घर में घुस गया।
मैं अधखुले दरवाजे के बाहर खड़ा कुछ सोच ही रहा था कि अचानक दरवाजा पूरा खुल गया और उसने अंदर आने का इशारा किया ।
खस्ताहाल एक कमरे के घर में जमीन पर पड़े छोटे से स्टूल को मेरी ओर सरका दिया और खुद एक कोने में रखे हुए पुराने ट्रंक की ओर मुड़ गया।
मैं यंत्रवत स्टूल पर बैठ गया और उसके क्रियाकलाप को उत्सुकता से देखता रहा।
पुराने ट्रंक को खोलकर उसने स्टील का छोटा डिब्बा बरामद किया और स्टोव पर दूध गर्म करने लगा।
कुछ ही देर में उसने एक प्याले में भाप उड़ाती हुई कॉफी मेरे सामने पेश कर दी।
मेरी नजरें उस प्याले में से ऊपर की ओर उठती भाप का पीछा करती हुई उसके गुलाबी मासूम चेहरे की ओर उठ गई ।
उसकी आँखें नम थी और होंठ लरजते हुए कुछ बुदबुदा रहे थे।
मैंने वह बुदबुदाहट सुनी।
“मेरा अब्बा साउथ इंडियन…वह कहवा नही पीता…कॉफी पीता था
लघुकथा-४
नमक ,मिर्च और शक्कर
मैं लोगों की बेस्वाद-सी जिंदगी में स्वाद घोलता हूँ। छोटी-सी कढाई में छनछनाती पानी और तेल की बूंदों में मैने अदरक और लहसुन का पेस्ट झोंका ही था कि,
“मिस्टर और मिसेज बत्रा का आर्डर है… हमेशा की तरह तीखा कम और नमक बिलकुल… नहीं।”
‘नहीं’ शब्द को चबाता हुआ वेटर आर्डर की पर्ची टेबल पिन में खोंसकर बोला।
बुढ़ापे में पति-पत्नी के रिश्ते में अगर नमक बढ़ जाता है तो शरीर के नमक का संतुलन बनाये रखने के लिए खाने में से नमक को कम करना पड़ता है।
और तीखापन!
वह तो शादी के कुछ सालों बाद ही इतना बढ़ जाता है कि जिंदगी के लिए जरूरी बाकी चीजों में तीखापन सिर्फ आपसी नोकझोंक जितना ही लिया जाता है।
“मिस्टर और मिसेज बत्रा का आर्डर तैयार है।” मैं अगले आर्डर की तैयारी करता हुआ बोला।
“तेरे को मालूम है ?…वेटरों में होड़ लगी रहती है, मिस्टर और मिसेज बत्रा को अपनी टेबल की ओर आकर्षित करके सर्व करने की!”
मेरा सहकर्मी सब्जियां काटते हुए मुझे बताने लगा।
कभी-कभी केवल भाप सूँघकर पता लगाया जा सकता है कि डिश में नमक और मिर्च का प्रमाण सही है अथवा नहीं ?
मैंने अपनी नाक शोरबे से निकलती हुई भाप की ओर स्थिर करके जोर की साँस लेते हुए पूछा, “क्यों?”
“शायद वे बुजुर्ग दम्पति बेहद पैसेवाले हैं…जब भी तेरी बनाई डिश खाते हैं तो वेटर को पाँच सौ रूपये टिप देकर जाते हैं।”
यह बताकर सहकर्मी मेरे चेहरे के भावों को पढ़ने के लिए मेरी ओर देखने लगा।
“कभी ये दोनों इस जगमगाते शहर के नामी वकील थे और चाहते थे कि इनकी इकलौती औलाद भी इनके ही नक्शेकदम पर चले लेकिन, इनके इसी जुनून की वजह से इनकी संतान ने घर छोड़ दिया।” मैंने उसके मन में छिपी जिज्ञासा को शांत करने की कोशिश की ।
“तो अब इस कहानी में यह तीन सितारा होटल और पाँच सौ रुपये की टिप कहाँ फिट बैठते हैं ?”
मेरे इस सहकर्मी की एक कमजोरी थी कि वह पकने से पहले ही किसी भी डिश के स्वाद का अंदाजा लगाने की कोशिश करता था।
कभी-कभी नमक और तीखेपन का संतुलन बनाने के लिए शक्कर की जरुरत पड़ती है और मिस्टर और मिसेज बत्रा की जिंदगी से शक्कर गायब थी।
“इनकी इकलौती संतान मैं ही हूँ।”
मैंने शोरबे में कुछ दाने शक्कर के डाल दिए।
लघुकथा-५
अव्यय बीज
वह जीवन रहित मरुस्थल बन चुके ग्रह को अपनी तर्जनी के इशारे से उल्टा घुमा देता है। गर्म रेत से पटी हुई ग्रह की ज़मीन शनै: शनै: हरियाली से ढकती जाती है और विलुप्त हो चुके जीव पुनः अवतरित होने लगते हैं। महासागरों का दूषित जल प्रदूषण मुक्त होने लगता है फलस्वरूप विभिन्न मछलियों के झुंड फिर से इन दरियाओं में विचरण करने लगते हैं। हवा अब कार्बन मोनोऑक्साइड नामक ज़हर से मुक्त होने लगती है और आसमान पंछियों की स्वच्छंदता व कलरव से जीवंत हो उठता है। पहाड़ों का बर्फ से व नदियों का प्रवाह से पुनर्मिलन हो जाता है और इस विवाह के समाचार से मानो वर्षावन झूम उठते हैं।
धरा पर कहीं से मनुष्य का शोर उठता है, जिसे सुनते ही वह एक झटके से धरा का विलोम परिवलन रोक देता है। अनियंत्रित हावभाव से उसकी मानव के प्रति खीझ साफ़ परिलक्षित हो रही होती है। वह ग्रह को फिर से वर्तमान की जीवन रहित स्थिति में ले आता है। मरुस्थल की रेत से अलग कोई स्थान तय करके वह उस धरती में चंद बीज बो देता है। शुष्क हवाओं में उड़ते हुए उसके आँसू ठीक उसी स्थान पर गिरते हैं, जहाँ गुजरे पल में उसने बीज बोए थे।

संध्या तिवारी, पीलीभीत

लघुकथा-२
मानदण्ड
भीषण गर्मी में मैं अपनी सलवार पेट से नीचे खिसका पेड़ू पर करते हुए, कुर्ते का दामन छाती पर पलट पेट-पीठ को नँगा कर कमरे की नँगी फर्श पर पड़ी शरीर को ठंडक पहुँचा रही थी।
पास ही गुलगुली चादर पर पाँच महीने की बेटी सोई हुई थी।
सूती धोती के पल्ले से पसीना पोंछती माँ एक हाथ में हाथ से झलने वाला पंखा लिए आकर बेटी के पास बैठकर पंखा डुलाने लगी।
“जे मरी बत्ती भरी गर्मिययें म जात
सुबेरे संझा नाइ जाइ पाउत, कि चैन से दुपाहरी कटि जाइ।” माँ ने बिजली को कोसा।
“सही बात हइ।” मैने माँ की बात का समर्थन किया
अरे! सलोनी तुम्हारे पेड़ू पर तो निरे फटे के निसान हैंइ? तेरी सासु ने कुछ तेल लोसन वगैरा नाइ बताओ लगाउन के लये?
अपनी कमर पर कसी धोती को पेड़ू पर सरकाते हुए माँ ने अपना पेट और पेड़ू दिखाते हुए कहा
देखउ जरा एक हमारो पेट है छः छः बच्चा हुइ गये तहूँ खाल फटन को एकउ निसान नाइ। कैसी फूहर हइ आज की जनरेसन।इत्तो सुन्दर गोरो गोरो पेट थो कैइसे एकइ बच्चा म नास लगि गई। कुछू अकल नाइँ तुम लोगन कउ।
माँ हमें कौन माॅडलिंग करनी जो बर्थ स्ट्रेच मार्क्स न दिखना कम्पल्सरी शर्तों में गिना जाये। मैंने हँसते हुए सलवार नाभि तक खींच ली।
अरे! कमाल है स्त्री सौंदर्य की कोई परवाह ही नहीं तुम्हें, तभी आदमी इधर-उधर मुँह मारते हैं। कुछ तो अकल सीखो। सब-कुछ माॅडर्न किताबों में ही नहीं लिखा है। कुछ बातें व्यवहार से भी सीखी जाती हैं।
गुस्सा सातवें आसमान पर हो तो मम्मी अपनी ठेठ देहाती छोड़ खड़ी बोली में सामने वाले प्रतिद्वंद्वी को पटखनियाँ देती थीं ।
मैं उनकी सौंदर्य परिभाषा पर
प्रत्यक्ष तो कुछ कह नहीं सकी, लेकिन सोचती रही एक उम्र के बाद तोंदियल, गंजे, नाक से झाँकते बालों वाले, आँखों में लिप्सा और लुतुराती जीभ पर गालियाँ लिए पुरुषों के लिए भी कोई मानदण्ड समाज ने स्थापित किए हैं या सबकुछ स्त्रियों के लिए ही…
लघुकथा-३
शव साधना
“सोभा आ जा बाहेर तुम्हारी चाची आयी हैं। आ जा बिटिया तनि चाय बना ले मैं तेरी चाची कने बैठ जाऊंँ नाय तो पचास बातें बनायेगी बिरादरी में।”
मांँ कमरे में झांकते हुए फुसफुसाईं ।
शोभा ने हाथ की किताब बन्द कर मसहरी के सिरहाने रखते हुए धीरे से कहा
“आती हूंँ मां”
चाची को नमस्ते करके उसने रसोई में आकर स्टोव्ह में पम्प भरकर माचिस दिखा दी कुछ क्षण स्टोव्ह भकभकाने के बाद जल उठा। स्टोव्ह के बर्नर पर नीली रौशनी का फूल उग आया। बिल्कुल वैसा ही फूल जैसा उस अघोरी ने चुना था शव साधना के लिए।
स्टोव्ह झर्र झर्र करके जल रहा था और वह उसकी फ्लेम में खोई थी।
चेतना लौटी तब, जब मांँ रसोई के दरवाजे पर खड़ी बड़बड़ा रही थी “सब जला दें मिट्टी का तेल ऐसेई, जब राशन की दुकान पर लाइन में लगके लाना पड़े तो पता चले…”
उसने हड़बड़ा कर चाय का पानी चढ़ा दिया, स्टोव्ह पर रखे भगौने में पानी उबल रहा था लेकिन उसका मन कहानी में उलझा था, चिताओं के अंगारों के लाल, धूमिल, क्षीण प्रकाश से रचे बसे झुटपुटे आलोक में शव के सीने पर बैठा अघोरी जोर-जोर से मंत्र पढ़ रहा था, मंत्र के बीच-बीच में वह शव तान्त्रिक को खा जाने के लिए बार-बार अपना मुख खोलता जैसे ही शव अपना मुख खोलता अघोरी उसके मुख में अपने साथ लाया हुआ मांँस का टुकड़ा रख देता, इस तरह वह शव मांँस खाकर थोड़ी देर के लिए शान्त हो जाता। थोड़ी देर बाद वह फिर अपना मुख खोलता…
“सोभा चाय ले आ, चाची को जरा जल्दी है।” मांँ की आवाज सुन शोभा की तन्द्रा टूटी उसने जल्दी से चीनी, पत्ती, दूध डाल, चाय कपों में छान मांँ और चाची के आगे लाकर रख दी और घूमकर कमरे में जाने लगी,
“अरे! तनि हमारे पास भी बैठो सोभा बिटिया।” चाची ने कहा
“हांँ हांँ बैठ जा बाद में पढ़ लेना।” मांँ ने साधिकार बात को दोहराया
शोभा का मन तो कहानी में अटका था लेकिन मन मारकर वह खटिया की पाटी पर उटकी-उटकी बैठ गई जैसे अभी ही छूटकर भाग खड़ी होगी। दस मिनट की हूंँ-हांँ के बाद वह सचमुच कमरे में जाकर छूटी हुई कहानी का अंत जानने को बेताब हो उठी।
अघोरी की साधना पूरी होने में कुछ ही क्षण शेष थे कि शव ने मुख खोल दिया इस बार अघोरी के पास मांस शेष नहीं था जब तक वह अपने मांस को काटकर उसके मुख में डालता तब तक शव उसे पूरे का पूरा निगल गया…
सोभाऽऽ… शोभाऽऽ… सोभाऽऽ…
घर के हर कमरे से पिछले चालीस सालों से सोभा,भाभी या मम्मी की आवाज ही उसके कानों में गूंजती रहती है।
शोभा के रोटी बेलते हाथों में नीली नसें मोटी होकर फूल गईं हैं, कानों की लौरों पर बुन्दें कांधों की ओर लटकने लगे हैं।
आंँखों पर चश्मा चढ़ गया है।
हर हफ्ते रंगने पर भी बाल
अपनी सफेदी की चुगली न करें ऐसा हो नहीं सकता । कमर के आसपास चर्बी लटकने लगी है।
लेकिन वह कर्मपरायण आदर्श देवी स्वरूपा बहू, भाभी,पत्नी और एक मांँ है जो चुटकियों में सबको सबका मनचाहा दे दे। क्योंकि
देवियांँ देती हैं मांगती कुछ नहीं…।
परन्तु शोभा को न जाने क्यों उम्र के इस पड़ाव पर शव साधना वाला अघोरी बहुत याद आने लगा है…
लघुकथा-४
दुरमति कूप खनावै
अपना हरा-भरा छोटा सा शहर और घर छोड़ नौकरी के चलते मेट्रो सिटी में एक किराए के फ्लैट में दो दिन पहले ही शिफ्ट हुई थी।
मैं अपने फ्लैट के दरवाजे की जाली से मकान मालिक को लिफ्ट से गमले निकाल कर अपने दरवाजे पर रखते देख रही थी। वे दोनों पति पत्नी पत्तियाँ डंठल आदि छू-छूकर उनके बारे में धीमे स्वर में बातें कर रहे थे। बेला के नाजुक तंतु छूकर पत्नी ने पति से मुस्कुराते हुए कहा;
” ओह एक महीने में कितनी बड़ी हो गई…”
“पता नहीं…, चाँदनी तो जैसे हमसे दूर होकर सूख ही गई है…! ” चाँदनी के पीले पत्ते तोड़ते हुए पति ने कुछ उदास स्वर में कहा।
पत्नी ने एक नज़र चाँदनी के पौधे पर डाली और लम्बी साँस भरी।कहा कुछ नहीं।
पति ने तुलसी, एलोवेरा, बोगन वेलिया, ईस्टर लिली, एरिका पाम आदि के पौधे दरवाजे पर जमा कर दिये और उनकी निराई गुड़ाई के लिए टूल्स लेने अंदर चला गया।
पौधों को देख अपनी उत्सुकता रोक न पाई और बाहर आकर मैंने मकान मालकिन से पूछा;
“भाभी जी ये पौधे कहाँ से ला रही हैं?”
“वो भाभी जी हम महीना भर के लिए घूमने-फिरने शहर से बाहर गए हुए थे। जिस दिन आप ने यहाँ शिफ्ट किया उसी के एक दिन पहले आयी हूँ। मेरे ये पौधे सूख जाते, इसलिए इन्हें अपने दोस्त के घर रख कर गई थी।”
“ओह! ये बात, मेरे घर और शहर में भी बहुत हरियाली है। मैंने जोश में भरकर उन्हें बताया
” हाँ भाभी जी और क्या, मुझे भी नेचर से बहुत लगाव है। अब देखिए न जिस बिल्डिंग में आप और हम हैं। यहाँ कभी मेरे बाप दादाओं ने आम, नीम, शीशम, सागौन, कटहल का जंगल ही उगा डाला था, लेकिन मैट्रो सिटीज में रहने बसने के चलते यह सब कटवा कर हमने बिल्डिंग बनवा ली। वैसे भाभी जी एक बात तो माननी पड़ेगी… पेड़ पौधे चाहे ज़मीन में हों या गमलों में… होने अवश्य चाहिए। आखिर हमें आॅक्सीजन तो यही देते हैं न,और हमें अपने पर्यावरण की देखभाल भी तो करनी चाहिए…।
आम, जामुन, लीची, कटहल काटवाकर गमलों में बेला, बोगनवेलिया, पाम, तुलसी आदि से पर्यावरण की रक्षा…?
मेरे मन की जमीन पर औचक ही न जाने क्यों सूरदास की यह पंक्तियाँ उग आईं-
“परम गँग को छाड़ि पियासो दुरमति कूप खनावै…।”
लघुकथा-५
हो गई है पीर पर्वत सी…
जैसे कोई रईसजादा अपनी माँ के कहने से किसी गरीब कामगार को बुलाने उसकी देहरी पर ठहर कर कुछ देर उसका रास्ता देखता है फिर चला जाता है बिल्कुल ऐसे ही मेरे बचपन में भी धूप आँगन की दीवार पर यूँ ही ठिठकी सी कुछ देर ठहर कर चली जाती थी।
मैंने अपने नन्हें हाथों से आँगन में हरसिंगार बो दिया और आँखों में उसके झरते हुए फूलों के सपने उगा लिए, लेकिन पेड़ तो बढ़ ही नहीं रहा, बड़े भाई ने बताया छोटे इसे अच्छी धूप नहीं मिल रही इसलिए यह नहीं बढ़ रहा। मैं अपनी नाज़ुक नाज़ुक हथेलियाँ धूप में पसारता और जब धूप की किरणों से वे गर्म हो जाती तो हरसिंगार के पत्तों को अपनी हथेलियों के बीच रख उन्हें गर्माहट देता। लेकिन मेरा नन्हा यत्न अपने उस नन्हें पौधे को न बचा पाया। और उसके मरने पर मुझे बहुत दुख हुआ मैंने देर तक उन पड़ोसियों को कोसा जिन्होंने मेरे घर के आसपास ऊँची ऊँची दीवारें बनवा ली थीं।
बचपन की धूमिल स्मृतियाँ इस महानगर में आकर एकबार फिर गाढ़ी तब हुई, जब मेरे फ्लैट की धूप को कई-कई मंजिला बनी अट्टालिकाओं ने छीन लिया। सूर्य के उत्तरायण होने पर धूप की एक लकीर मेरी खिड़की पर प्रवासी पक्षी सी कुछ देर आकर ठहर जाती। बचपन की तरह मैं उस धूप को मुट्ठी में भरकर घर के बिस्तर पर पड़ी ठंड से सीझती माँ की देह को सौंपना चाहता हूँ, मैं उस धूप से पापा के गठिया से बेकार होते घुटनों को सेंकना चाहता हूँ, मैं उस धूप से पत्नी के गीले बालों को सुखाना चाहता हूँ। मैं उस धूप से बरस भर के लिए बालकोनी में रखे छोटे-छोटे ठिठुराये पौधों को सींचना चाहता हूँ। मैं धूप को कन्टेनर में स्टोर कर साल भर उसके छोटे-छोटे टुकड़ों का कैंडी की तरह स्वाद लेना चाहता हूँ लेकिन महानगरों के दड़बे नुमा फ्लैटों से न चाँद दिखता है और न सूरज।
सुनते हैं कि अर्जुन ने विराट रूप में सूरज चंदा को भगवान की आँखों के रूप में देखा था, तो अब तो न हमें भगवान देख पा रहा है और न ही हमें उसका कोई डर है…।
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