
पाँच लघुकथा
वीणा सिंह, लखनऊ
लघुकथा-1-
उलझे हुए धागे
“अरे रधिया, तू अब तक धागे सुलझा रही है? सुबह से देख रही हूँ… मशीन चली ही नहीं!”
“मशीन तभी चलेगी, चाची… जब ये धागे अलग-अलग होंगे। सब एक-दूसरे में फंसे हैं।”
“धागे ही तो हैं, काट दे कुछ को… नया लपेट ले। इतना माथापच्ची क्यों कर रही?”
“हर रंग का एक मतलब है, चाची… ये नीला पापा की पैंट से बचा था… ये सफेद मां की साड़ी से… और ये लाल? ये तो मेरी पहली फ्रॉक का है। काट दूँ क्या?”
“तो क्या हर टुकड़ा सम्हाल कर रखेगी? पुराने धागे नई सिलाई में उलझन देते हैं, रधिया।”
“मैं उलझन से डरती नहीं… जो उलझे हैं, वही सिखाते हैं जोड़ना।”
“कभी-कभी जोड़ने की कोशिश ही हमें और उलझा देती है।”
“या फिर सिखा देती है कि धैर्य क्या होता है। देखो ना, ये गांठ खुल गई…”
“चलो… कम से कम मशीन अब चलेगी?”
“अब चलेगी भी… और बोलेगी भी। हर टांका मेरी एक कहानी है, चाची… उलझे हुए धागों से बुनी हुई।”
***
लघुकथा-2
डिलीट का बटन
आकाश ने मोबाइल की स्क्रीन पर उंगलियाँ फेरीं। चैटबॉक्स खुला था — नीला गोला, “टाइपिंग…” और फिर चुप्पी।
कभी ये चैट उसकी दुनिया थी। वही प्रिया, वही इमोजी, वही “क्या खाया?” से लेकर “सो जा पगले” तक की बातें। लेकिन अब? अब हर जवाब में एक थकान थी। एक औपचारिकता।
कॉल की घंटियाँ बजतीं और काट दी जातीं। रिप्लाई “सीन” बनकर रह जाता। और आज… आज उस चैट में आखिरी मैसेज था —
“हम आगे नहीं बढ़ सकते। मत पूछो क्यों। बस मान लो।”
आकाश ने उंगलियाँ कांपते हुए उस चैट पर होल्ड किया। स्क्रीन पर कुछ विकल्प उभरे:
आर्काइव,म्यूट, डिलीट,
उसने गहरी साँस ली। फिर आँखें बंद करके “डिलीट” दबा दिया।
लेकिन डिलीट करके भी कुछ हल्का नहीं हुआ। उल्टे अब एक खाली जगह और चुभ रही थी — वहाँ जहाँ कभी शब्द थे, एहसास थे, प्रिया थी।
मोबाइल की स्क्रीन काली हो गई। पर उसके भीतर एक पुरानी स्मृति की स्क्रीन अब भी जल रही थी — जिसे न “डिलीट” किया जा सकता था,न ही “म्यूट”।
***
लघुकथा-3
‘अधूरी अलमारी’
शीला ने आज सुबह-सुबह अलमारी खोली। कपड़ों के ढेर के बीच कई खांचे खाली पड़े थे—जिनमें उसकी पसंद के कपड़े कभी जगह नहीं बना पाए। शादी के बाद से उसमें जो भी जुड़ता गया, सब दूसरों की पसंद का था। सास की करवाचौथ पर दी गई ‘ सितारों वाली साड़ी’ पति की शादी की सालगिरह पर लाई गईं. रेशमी बूँटों वाली साड़ी | मोहल्ले वालों की, रिश्तेदारों की, इनकी, उनकी दी गईं अनगिनत सड़ियाँ |
नौकरी के लिए खरीदा हुआ उसका एकमात्र सूट, अलमारी के बिल्कुल कोने में दबा पड़ा था। महीनों की धूल में दबा, जैसे किसी अधूरे वादे की याद।
उसने एक-एक कर सारे रेशमी लिबास बाहर निकाले और थैले में भर दिए। सूट को झाड़कर सामने टाँग दिया।
आईने में नज़र पड़ी। हल्की मुस्कान आई, फिर होंठ कस गए।
धीरे से बुदबुदाई—
“अलमारी पूरी करने का हक अब दूसरों को नहीं दूँगी।”
***
लघुकथा-4
पोस्टकार्ड
शहर के कोने पर बने ‘स्नेहनिकेतन वृद्धाश्रम’ में आज चहल-पहल कुछ ज़्यादा थी। नये साल की शुरुआत थी — बाहर से लोग उपहार और खाना लेकर आए थे। बुज़ुर्गों के चेहरे पर थोड़ी रौनक थी, सिवाय एक के — श्रीधर बाबू, 82 वर्षीय पूर्व डाकिया, जिन्हें किसी ने वर्षों से याद नहीं किया था।
वो हमेशा दरवाज़े की ओर पीठ किए बैठते। कहते, “अब कौन चिट्ठी लिखता है! लोग जब बूढ़े हो जाते हैं, तो याद भी पुरानी हो जाती है।”
संध्या में आश्रम की देखरेख करने वाली नर्स मीरा उनके पास आई। हाथ में एक रंगीन लिफाफा था — उस पर पुराने हस्ताक्षरों में नाम लिखा था:
“प्रिय बाबूजी — आपका बेटा, रवि।”
श्रीधर बाबू के हाथ काँपे। काँपती उँगलियों से चिट्ठी खोली। पढ़ना शुरू किया —
“बाबूजी, आपको बहुत याद करता हूँ। नौकरी और ज़िम्मेदारियों के बीच फँस गया हूँ, लेकिन जल्द ही आपसे मिलने आऊँगा। आप जैसे पोस्टमैन ने देश को जोड़े रखा — मैं गर्व से कहता हूँ कि आप मेरे पिता हैं।”
श्रीधर बाबू की आँखें भीग गईं। बोले — “रवि… बहुत बदला है… पहले इतना लिखता नहीं था…”
***
लघुकथा-5
हंसी का पोस्टर
बस अड्डे की टूटी बेंच पर बैठी रधिया की आँखें सूख चुकी थीं। अब रोने से भी कुछ नहीं बदलने वाला था। परचे हाथ में थे—रंग-बिरंगे, चमकते हुए, हर एक पर वही चेहरा मुस्कुरा रहा था, जो हर चुनाव से पहले गाँव में मीठी बोली में वादों की झड़ी लगा जाता था।
“घर-घर शौचालय,” “हर हाथ को काम,” “बेटी बचाओ, पढ़ाओ”—जैसे नारे अब उसे चिढ़ाने लगे थे। दसवीं पास रधिया की बेटी, सरस्वती, पिछले साल इंटर में पूरे जिले में टॉप आई थी। अख़बार में फोटो भी छपी थी। नेता जी खुद माला लेकर घर आए थे, सेल्फी खिंचवाई थी।
फिर वही नेता—आज सरस्वती की छात्रवृत्ति फाइल फाड़कर कह रहे थे, “रिकॉर्ड गायब है, बाद में आइए।”
पिछली बार भी रधिया यही सुनकर लौटी थी। इस बार बस कुछ बदला था—सरस्वती की आँखों की चमक बुझ चुकी थी।
“बिटिया अब खेतों में काम करेगी,” रधिया ने मन में तय किया। स्कूल की दीवार पर चिपका सरस्वती का पोस्टर अब भी हँस रहा था—सिर पर नेता जी का हाथ, नीचे ‘नारी-गौरव सम्मान योजना’ का चमचमाता लोगो।
पास ही बकरी चरा रहा घसीटे चच्चा ने मुस्कराकर कहा, “अब तो बहुते आगे बढ़ गई है सरस्वती… कागज पर।”
रधिया कुछ नहीं बोली। बस पोस्टर की तरफ देखा—वो हँसी अब झूठी लग रही थी|
कुछ दूर पर सरस्वती मिट्टी में गड्ढा खोद रही थी—कह रही थी, “अम्मा, अब पढ़ाई नहीं करनी।”
रधिया ने परचे फाड़कर हवा में उड़ा दिए, और नेता जी की हँसी आसमान में तैर गई—बिना ज़मीन के।
अंत में पोस्टर दीवार पर रह गया।
सरस्वती खेत में |
सपने कहीं नहीं |
पाँच लघुकथा

सुहेल आजाद
हल्द्वानी, उत्तराखंड
लघुकथा-१
“आस ”
दरवाज़ा खुला था।
अंदर कोई नहीं था—शायद।
या शायद सिर्फ़ किसी के होने भर की आस थी।
वह आस किसी वैज्ञानिक, ऐतिहासिक, सामाजिक या दार्शनिक प्रमाण से जन्मी नहीं थी।
वह बिना आधार की थी, फिर भी ज़िद्दी।
साये की तरह—मौजूद, पर छुअन से मुक्त।
हर शाम मैं उस खुले दरवाज़े के सामने से गुज़रता,
धीमे से झाँकता,
और फिर ख़ुद को समझाता कि खालीपन भी कभी-कभी
किसी के आने से पहले का विराम होता है।
सालों से मैं इसी दरवाज़े से
किसी के आने का मुन्तज़िर हूँ।
और अब मुझे डर नहीं लगता—
क्योंकि इंतज़ार ने ही मुझे
अंदर से भर दिया है।
***
लघुकथा-२
“शुक्रिया रेलवे, शुक्रिया ”
आख़री गाड़ी उदास और बेबस सीटी बजाती हुई जा चुकी थी।
रेलवे स्टेशन पर हमेशा की तरह फिर वही गहरा सन्नाटा उतर आया।
दिसम्बर की सर्द रात में वह आज भी किसी स्तंभ की तरह
एक ही दिशा में निस्पंद खड़ा देखता रहा।
रात और गहरी हुई।
वह देर से उठा, कोट के कॉलर में ठुड्डी छिपाई
और धीमे से बुदबुदाया—
“शुक्रिया रेलवे… शुक्रिया।”
उसकी आवाज़ प्लेटफ़ॉर्म की ठंडी हवा में
घुलकर खो गई,
और वह ख़ुद भी
सन्नाटे का एक और नाम बन गया।
***
लघुकथा-३
” अपना पन ”
घंटी बजी, प्रेयर के लिये लाइनें लग गईं। आँखें बन्द किये बच्चे रोज़ की तरह गा रहे थे। कुछ देर बाद हेडमास्टर की स्पीच हुई और फिर बच्चे लाइनें बनाकर अपनी-अपनी कक्षाओं में बैठ गए।
“तू आज क्या लाया है?”
“मैं कचौड़ी, और तू?”
“पराठे।”
ख़ामोशी में एक आवाज़ आई। सबने पलटकर देखा। वह राहुल था—चुपचाप, बिना किसी टिफ़िन के।
“तू कुछ नहीं लाया?” किसी ने पूछा।
राहुल ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिला दिया, “आज माँ की तबियत ठीक नहीं थी।”
एक पल को कक्षा में सन्नाटा छा गया। फिर पराठे वाला आगे बढ़ा, “आधा मेरा।”
कचौड़ी वाला बोला, “और आधी मेरी।”
एक-एक कर सबने अपने-अपने टिफ़िन से थोड़ा-थोड़ा निकालकर राहुल के सामने रख दिया।
घंटी फिर बजी—अब लंच ख़त्म होने की। मास्टर आए, पढ़ाना शुरू हुआ।
राहुल ने किताब खोली, पर आँखों में कृतज्ञता चमक रही थी।
उस दिन किसी ने पाठ याद नहीं किया,
पर सबने एक सबक ज़रूर सीख लिया—
भूख सिर्फ़ पेट की नहीं होती, कभी-कभी अपनापन भी बाँटा जाता है ।
***
लघुकथा-४
इसका दुःख है-
रेल का आख़री डिब्बा
कभी कभी तो शायद
डरता होगा
पिछड़ जाने से
बिछड़ जाने से
मगर- शायद
उसको डरने का हक़ नहीं है
रात के मुहीब जंगल से गुज़रते हुए भी
ना कानों में अंगुलियाँ लगाने की इजाज़त
इंजन की बार बार बजती सीटियों पर
किसी थके हुए बूढ़े की तरह
वह भी बस
चलता रहता है , चलता रहता है
और ख़ामोशी से आ कर
किसी बे आबाद स्टेशन पर
खड़ा हो जाता है
अगले सफ़र की
तैय्यारी से पहले
***
लघुकथा-५
सच है
मुसलसल सांस लेना
जिस्म की ख़ाली इमारत पर ज़रा सा बार होता है
इमारत जब कि ख़ुद बीमार हो
या गिर कर बिखर जाने ठहरी हो
मुसलसल सांस लेना भी हवा को ज़ाया करना है , कि कुछ दिन याद , हसरत , बे सरो सामानी आख़िर ज़िन्दा रखती है

पाँच लघुकथा

पूनम सिंह ‘ भक्ति ‘
दिल्ली
लघुकथा-1
“लास्ट स्ट्रोक”
अंतरास्ट्रीय स्तर पर होने वाली चित्रकारी प्रतियोगिता हेतु देश – विदेश से कलाकार शिरकत कर चुके थे और ज्वलंत विषय पर चर्चा की गूंज थी। वो चित्रकारी में हिन्दुस्तान का चेहरा था और राष्ट्रीय स्तर पर अपना वर्चस्व स्थापित कर चुका था। सब अपने मन मस्तिष्क में एक रूप रेखा खींच कर प्रतियोगिता के लिए तैयार थे…।
विषय मिला,- “माँ” , सुनते ही उत्सुकता का तापमान एक दम से ठंडा पड़ गया। सभी अपनी अपनी तूलिका व कैनवस लेकर तैयार हो गए। वो भी अपनी कैनवस पर तूलिका और रंगों के सहारे माँ की छवि को उकेरने के लिए बेचैन था । बचपन से लेकर अभी तक माँ के साथ बिताए हर पल कि स्मृति उसके मनस पटल पर उतरती और उसे वो कागजों पर एक रूप रेखा खींच देता। किन्तु जो भी रेखा खींचता उसे अधूरी लगती। उसे मिटाता और दूसरी, तीसरी, चौथी कितनी ही रेखाएं खींच दी पर सब अधूरी। फिर भी रंग और रेखाओं का बादशाह आखिरी उम्मीद तक लड़ता रहा। ऐसा करते उसके भीतर के चित्रकार के कई टूटते रूप नीचे ज़मीन पर बिखर चुके थे। पर माँ की पूर्ण छवि और रंग भरने में हर बार असफल रहा। अब उसकी तुलिका भी दम तोड़ चुकी थी। वही उसके प्रतिद्वंदी साथी लगभग अपनी चित्रकारी बना कर पूरा कर चुके थे। ‘यह क्या हो गया है मुझे.. मैं माँ की छवि क्यों बना नहीं पा रहा। मेरी बरसों की तपस्या का क्या असल सत्य यही है..?’ वह सर पकड़ कर बैठ गया। ‘मुझे माफ करना माँ! आज तेरा बेटा हार गया… हार गया… ।’
…आँखों से बहते आँसुओ की बूंद टपक कर उसके पेंटिंग पर गिर पड़ी ।
समय समाप्ति की घोषणा हुई और उसे वो अधूरी पेंटिंग ही जमा करनी पड़ी..।
विजेता घोषित के लिस्ट में अपना नाम सबसे ऊपर देख कर उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ।
नीचे उसने समीक्षा पढ़ा,- लिखा था ,- “माँ को उकेरना आसान नहीं.. आपकी पेंटिंग में उभरी रेखाएं सब कुछ कह गई…।”
***
लघुकथा-2
“दूरदर्शिता”
”क्या बात है भाई उदास दिख रहे हो। कल तक तो बहुत खुश थे कह रहे थे बेटा आया है । बहुत बड़े ऑटोमोबाइल कंपनी में नौकरी लगी है लाखों में कमायेगा। सब ठीक तो है ना ? ”
“उसने तो मेरे सपनों पर कुदाल ही चला दिया। ”
“कुदाल ! ऐसा क्या हो गया ? ”
“कहता है नौकरी नहीं करूंगा यहीं गांव में रहकर जैविक खेती करूंगा। ”
“जैविक खेती करना आसान थोड़े ही ना है।”
” मुझे समझ नही आ रहा जब यही करना था तो इतनी महंगी पढ़ाई क्यों की! ” उन्होंने अपने खंडहर होते घर की ओर निहारते हुए कहा।
” वैसे उसने सोच समझकर ही फैसला लिया होगा। ”
“कहता है सरकार अब जैविक खेती के लिए अच्छे प्रावधान दे रही है और इससे सब अच्छी रकम भी पा रहे है। उसके कई दोस्त भी अपनी ख्यातनाम नौकरी त्याग कर जैविक खेती कर रहे हैं ।
” अच्छा। ”
“उसको सिर्फ अपने भविष्य की नहीं बल्कि देश के भविष्य की अधिक चिंता है रासायनिक खाद से होने वाले गंभीर समस्याओं से निजात पाने के लिए उसने यह कदम उठाया है। पर क्या पता कामयाबी मिलेगी भी या… नहीं।”
“ख्याल तो बड़ा नेक है। वैसे सच कहूं तो बेटे की पीठ थपथपाओं जिसे सिर्फ अपना ही नहीं बल्कि पूरे देश के बच्चों के भले के लिए सोचा । वैसे देखा जाए तो जैविक खेती करने वालों को सरकार से कई एकड़ जमीन के साथ – साथ खेती करने वाले को मुनासिब रकम भी मिलता है । ”
तभी उनका बेटा खुशी से भागता हुआ उनके पास आया, “यह देखिए बाबूजी सरकार को जो मैंने अर्जी भेजी थी उस
पर मेरी मांग की मंजूरी मिल गई । पैसा सरकार का और मेहनत मेरी।
पापा अब तो आप मुझे अनुमति देंगे ना ?”
वो उसकी ओर वात्सल्य भरी निगाह से देखते हुए मुस्कुरा दिये।
***
लघुकथा-3
“ उचित कदम”
“अलख निरंजन!”
“लो मां! आ गए तुम्हारे बाबा। “
‘जा उनकी झोली में कुछ डाल दे। ”
” तुम भी ना माँ इसी तरह पैसे बांटती फिरती हो। ये तुम्हारे जितने भी पंडित है ना जाकर देखो सब ने बड़ी बड़ी कोठी खड़ी कर रखी है । ”
” अपनी पंडितई का खाते है बेटा। चावल आटा या फिर जो तेरा मन हो दे दे। ज्यादा बहस नहीं करते। ”
जैसी तुम्हारी इच्छा। ” वो अनमने ढंग से कटोरा भर आटा ले कर देने गई।
” बाबा झोली खोलो। ”
“यह क्या है बेटी ?”
” आटा ”
” ये कच्चा आटा लेकर हम कहां घूमेंगे बेटा।तीर्थ यात्रा पर जाना है । मुद्रा मिल जाता तो ठीक रहता।” उसने अपने पीले दांत दिखाते हुए कहा।
” देखा माँ उन्होंने ठुकरा दिया ना। ”
“ठीक ही तो बोल रहे है। बेटा पैसा ही दे दे उन्हें। “
” अच्छा तु रहने दे मैं ही दे देती हूँ। ”
वो उठी और बंद मुट्ठी से कुछ मुद्राएँ उनके कमंडल में डाल दिया। ”
” दे दिये माँ तूने पैसे, गांजा फूंकने के लिए।”.
” ऐसे नही बोलते बेटा । ”
“माँ तुने देखा नहीं उनके दाँत कितने पीले थे। “
”हो सकता है ठीक से दातून नहीं करते होंगे। “
”नहीं माँ, गाँजा अपना रंग दिखा रहा था।”
उसने आटा को वापस ड्रम में रखते हुए कहा।
तभी फिर से डोर बेल बजी।
”दीदी हमारे मोहल्ले के बीच जो जगह खाली थी, आपने देखा ही होगा जहाँ बच्चे खेलने आते हैं और बड़े बुजुर्ग भी घास पर बैठकर प्रणायाम भजन कीर्तन करते हैं, हम सब मिलकर उस पार्क के चारों ओर पेड़ लगाने का सोच रहे है। उसके लिए आपका थोड़ा सहयोग चाहते है। ”
“पर ये तो हमारे एरिया के सरकारी कार्यकर्ता का काम है ना।”
” अब और कितनी प्रतीक्षा करें दीदी। साल भर से उपर हो गया पर कोई सुनवाई नहीं। वैसे भी पर्यावरण हेतु हमारी भी तो कुछ नैतिक जिम्मेदारी बनती है ना। इसलिए हमने फैसला लिया है कि ये काम हम सब मिलकर करेंगे। आपकी इच्छा हो तो दे दीजिये नहीं तो कोई बात नहीं। ” उन्होंने सहजता पूर्वक अपनी बात रखी और कोई जवाब ना पाकर जाने को हुए।
“अरे नहीं ! रुको … ।” उसने पलभर सोचा और कुछ रुपये उन्हें पकड़ा दिया।
” अब तूने उन्हें पैसे क्यों दिये ! क्या ये लोग …?”
इससे पूर्व की माँ बात पुरी करती उसने कहा, “कोई बात नहीं मां इनके थोड़ा खाने से अगर पर्यावरण सरंक्षण पार्क बन जाता है तो भी हम ही फ़ायेदे में रहेंगे। सड़कों पर बढ़ती मोटर गाड़ियों से बढ़ रही प्रदूषित हवा से बचने के लिए । पेड़ लगाओ स्वास्थ बढ़ाओ । ” उसने मुस्कुराकर कहा।
***
लघुकथा-4
” सत्यमेव जयते”
“अरे वाह ! आज बहुत दिनों बाद खादी का कुर्ता , ब्रैंडेड बैग की जगह झोला..! वह भी खादी का .. ..और ये खिड़की से बाहर क्या देख रही है ? ”
“भूत ! ‘
“भूत.. ! ” उसने अचंभित स्वर में कहा,- “..अच्छा तो अब वर्तमान में आ जा …. चलना नहीं है क्या ? इतनी बड़ी पार्टी है, देर हो रही है।”
“नहीं या..र ! वहीं पार्टी, वहीं लोग और वही घिसी पिटी बाते। लोगो को खुश रखने के लिए जिसने जो चश्मा पहना दिया , ..उन्हीं के नज़रिए से ही अब तक देखती और लिखती आई हूँ।”
“ओह! व्हाट हैपेंड ? इतनी सीरियस क्यों? ”
“कुछ नहीं यार ! थक चुकी हूँ दोहरी जिंदगी जीते जीते ! ऐसा लगता है कि किसी अदृश्य माया जाल में फँसती चली जा रही हूँ। जब तक मैं कुछ खास लोगों के हाथों की कठपुतली बनकर उनके हित के बारे में लिखती रही जनता भी मेरी वाह वाही करती रही ….. लेकिन आज जब अपनी अंतरात्मा की आवाज पर मैं जनता के हित में इन शक्तिशाली व खास लोगों के खिलाफ लिख रही हूँ , वही जनता मुझपर दोहरे मापदंड का इल्जाम लगाकर मुझे बार बार शक के कटघरे में खड़ा कर देती है। ”
” हांँ तो ..?”
” अपने आँखों पर लगे ये रंग बिरंगे चश्मे फ़ेकने ही पड़ेंगे। अब सिर्फ अपनी अंतरात्मा की आवाज …!”
“हाँ ठीक है.., पर तुझे क्या लगता है कि जनता तेरे इस बदलाव को समझ या अपना पाएगी ?”
“..एक ना एक दिन जरूर समझेगी। “सत्यमेव जयते।”
***
लघुकथा-5
“भूख की पीड़ा”
“ऐसे हाथ पीछे क्यों खींच रहा है तुझे कंबल नहीं चाहिए क्या ? ”
“नहीं !” उसने विश्वास भरे लहजे में कहा।
“बड़ा अकड़ कर बोल रहा है फिर क्या चाहिए ?”
“रोटी !”
“वो कमाएगा तभी तो खाएगा ना।” वो होठो को ऐठते हुए बोला।
“और उसके लिए रोजगार चाहिए ये कंबल नहीं।” उसने ढृढता पूर्वक अपनी बात रखी।
“फिलहाल तो कड़कती ठंड से हड्डी पसली बचानी है तो ये कंबल रख ले।”
“नहीं साब ! बिल्कुल नहीं। क्यों भाइयों ! तुम सब क्या कहते हो।” पीछे कतार में खड़े अन्य मजदूरों की ओर देखते हुए उसने कहा।,
हाँ- हाँ बिल्कुल ! सब एक साथ एक सुर में चिल्लाए। ” कुछ देना ही है तो रोजगार दीजिए । ये सिर्फ कंबल और दो बकत का राशन बाट देने से क्या होगा। हमारी गरीबी तो दूर नहीं होगी ना साब ! कभी आपके पेट में भूख की आग लगी है ? हमारी तरह भूखे पेट चार दिन रह कर देखिए । पेट में ऐसी मरोड़ आती है ना की अपने देह का भी होश नहीं रहता। वो भी इतना कि, इ मन है ना, इधर-उधर भटकने लगता है। सामने में रोटी खा रहे कुत्ते के मुँह से निवाला छीन लेने को जी करता है।”
“अच्छा चल हट ! तुझे कंबल लेना है तो ले, नहीं तो जा यहाँ से। तेरा भाषण सुनने नहीं आए हम “। कहकर वो वाहाँ से निकलने को हुआ।
“जाते कहाँ हो साब, तुम्हारे जाने से सच्चाई नहीं बदल जाएगी। अब भी सुधार जाओ चुनाव जीतने के लिए ना, जनता के पेट से गुजरिए। और ये मदारी का खेल खेलना बंद करो और ईमानदारी की ताकत से गरीबी उन्मूलन का रास्ता खोलो और अपना चुनाव जीतो । ऐसे में तुम भी खुश और जनता भी सुखी । और इतना ही नहीं बल्कि जनता सदा के लिए तुम्हारी। ”
ये बात सीधी जाके उसके सीने में लगी। एक भूखे आज उसे राजनीति का असल पाठ पढ़ा गया, वो अवाक हो देखता रह गया।
***
6/”परछाई”
————–
पति जब ऑफिस से घर पहुँचे तो ठंडा पानी का गिलास उनकी ओर बढ़ाते हुए प्रेम पूर्वक पूछा ,- ऑफिस में कुछ खा तो लिया था ना ? ”
” हाँ बाबा… कैंटीन में खा लिया था। उसकी तरफ देखे बग़ैर ऑफिस के कुछ कागजों को पलटते हुए कहा।
” अच्छा किया ! ” और कहती हुई चाय बनाने के लिए वापस रसोई में चली गई।
” बहू तू जा आराम कर ले तेरी तबियत ठीक नहीं, आज खाना मैं पकाती हूँ।”
माँ की आवाज कानों में पड़ते ही बेटे ने दूर से ही कहा, ” माँ तुम आराम करो खाना ही तो पकाना होता हैं कौन सा मुश्किल काम है बना लेगी।”
” बना तो लेगी… लेकिन फिर पकाने में कोई कमी रह गई तो मैं नहीं चाहती कि तुम थाली सरकाकर उसके सामने फेंक दो और शारदा रात को भी भूखी ही सोए।” माँ ने रसोई से कमरे में प्रवेश करते हुए कहा। सुनते ही पति की गर्दन एकदम से माँ की ओर मुड़ी, ” क्या…! शारदा ने आज खाना नहीं खाया ?”
“ऐसा एक दिन हुआ हो तब ना ! तू तो बाहर में अपने दोस्तो संग हंस बोल कर अपना जी हल्का कर लेता है। बहू दिन भर घर के काम, सेवा शुश्रुषा में लगी रहती है। वो अपने मन की किससे कहे ! ”
‘…माँ ठीक ही तो कह रही है मैं तो दिनभर ऑफिस में दोस्तो संग गप – शप कर इधर उधर घूम कर अपना मन हल्का कर लेता हूँ लेकिन शारदा…! घर में भी ऑफिस के काम मे व्यस्त रहने के कारण मैं उसे अक्सर झिड़ककर दूर कर देता हूँ। कितना जड़ हो गया था मैं।’