१६ सितंबर और ३० अक्तूबर दो हिन्दी साहित्य के बटबृक्षों का ढह जाना, हिन्दी प्रेमियों के लिए एक बड़ा धक्का है। दोनों ही संत प्रवृत्ति के शब्द-साधक और प्रेरक व्यक्तित्।
ख़ुद को सौभाग्य शाली मानती हूँ कि दोनों का ही स्नेह-सानिध्य मिला यहाँ सात-समंदर पार मेरी कुटिया में एक बार पदार्पण और रैन बसेरा भी हुआ दोनों का ही। भारत और ब्रिटेन दोनों ही देशों में हुई मुलाकातों की चन्द प्यारी और प्रेरक यादें हैं । दोनों का ही गंभीर परन्तु मुस्कुराता चेहरा भुलाए नहीं भूलता और भूलना भी मुश्किल ही है। हर बार एक सत्संग सा ही आनंद और संतोष मिला था सानिध्य में और लिखे को पढ़ने में गहन संतुष्टि और अपने ही मन की-सी बात भी… निश्चल और सहज शब्द-चितेरे। शताब्दी पुरुष रामदरश जी ने १५० से अधिक पुस्तकों की रचना की थी। और सीतेश जी बिल्कुल अपने और बड़े भाई से बेहद स्नेहिल। लेखनी के आरंभिक दिनों में ही हमें आपकी रचनाएं व स्नेह मिला था।
लेखनी परिवार की तरफ़ से दोनों ही अविस्मरणीय व्यक्तित्वों को उन्ही की दो रचनाओं द्वारा स्मृति नमन और भावभीनी श्रद्धांजलि…
सीतेश आलोक
१
क्या दिया
कितना दिया
और क्यों दिया?
और जो नहीं दिया…!
अपना यह सारा गणित
हे प्रभु, तुम्ही जानो।
मेरी तो बस
इतनी विनती मानो-
कि जो पाया
उसपर न इतराऊँ
और जो हाथ नहीं आया
उसपर…
रोते-बिसूरते ही न बीत जाऊँ।
–00–

बनाया है मैं ने ये घर धीरे धीरे
खुले मेरे ख़्वाबों के पर धीरे धीरे
किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला
कटा ज़िंदगी का सफ़र धीरे धीरे
जहाँ आप पहुँचे छलांगें लगा कर
वहाँ मैं भी पहुँचा मगर धीरे धीरे
पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी
उठाता गया यूँ ही सर धीरे धीरे
गिरा मैं कहीं तो अकेले में रोया
गया दर्द से घाव भर धीरे धीरे
–0–