संकलनः हिन्दी हम सबकी परिभाषा

 

हिन्दी दिवस 14 सितंबर पर  विशेष …

‘ हिन्दी दिवस आते हैं और चले जाते हैं पर हमें खुद सुधरने  या इसे संवारने की क्या जरूरत…हिन्दी ही तो है यह,मात्र एक भाषा। हमारा काम तो आराम से चल ही रहा है। फिर इसे विधि व्यापार और चिकित्सा, जीवनयापन के साधन और व्यापार आदि से जोड़ना आसान भी तो नहीं। इतनी कवायत और माथापच्ची का वक्त किसके पास है! त्वरित सुविधा का युग है हमारा।  हमारे खानपान और रहन सहन की तरह हमसे छूटती है तो छूटे आखिर वैश्विक दौड़ में हैं हम और हमारा भारत। प्रगति करनी है हमें। क्या एक भी ढंग की नौकरी दिला सकती है यह भाषा- सचमें “कंगले साहित्यकारों व गंवारों की भाषा” ही तो है हिन्दी…। वर्ष में एकाध बार इसे याद कर लेते हैं, उत्सव मना लेते हैं क्या यही पर्याप्त नहीं !’  -देश के युवा शायद यही और ऐसा ही सोचते होंगे। और यदि एक ईमानदार कोशिश न हुई , चीजें न बदलीं,  तो हम इन्हें इसके लिए दोष भी नहीं दे सकते। 
हर वर्ष हम एक रस्मी याद के साथ रवायतें भी पूरी कर लेते हैं परन्तु सवाल और समाधान तो आज भी अनुत्तरित ही हैं… जाने कब फूटेगी इन निराश अंधेरों से रौशनी,

 

 

मिटेगी नहीं …
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कब खिली कब मुरझा गई…
कब चांद तारों सी पुनः बिखरी
महकाती मन का कोना कोना
जिसने बूझी बस उसने जानी
शबनम के कतरों-सी
बारबार फना होती रही
नरगिसी है यह जुबां अपनी
 
ख्वाबों के इन कालीनों पे मगर
संभस-संभल कर ही चलना दोस्त
इन दागों को धोते-मिटाते
पीढ़ियाँ बूढ़ी हो जाती हैं
हमने तो बस इतना देखा
हमने तो बस इतना जाना
तह में गिरे या तट पर खेले
एक लहर है यह भी,
जुबाँ मां के दूध की
जुबाँ यह अपने जजबातों की
सिमटी तो,
दुगने वेग से वापस आ जाएगी…

-शैल अग्रवाल

 

 

 

  निज भाषा…

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निज भाषा  उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

 

अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।

 

उन्नति पूरी है तबहि, जब घर उन्नति होय।
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।।

 

निज भाषा उन्नति बिना, कबहूँ न ह्यौंहिं सोच।
लाख उपाय अनेक यों, भले करो किन कोय।।

 

इक भाषा  इक जीव इक मति, सब घर के लोग।
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।।

 

और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात।
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।।

 

तेहि सुनि पावैं लाभ सब, बात सुनै जो कोय।
यह गुन भाषा और मंह, कबहू नाहीं होय।।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

 

 

 

 

हिन्दी महिमा

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हिन्दी मे गुण बहुत है, सम्यक देती अर्थ।
भाव प्रवण अति शुद्ध यह, संस्कृति सहित समर्थ।।

 

वैयाकरणिक रूप में, जानी गयी है सिद्ध।
जिसका व्यापक कोश है, है सर्वज्ञ प्रसिद्ध।।

 

निज भाषा के ज्ञान से, भाव भरे मन मोद।
एका लाये राष्ट्र में, दे बहु मन आमोद।।

 

बिन हिन्दी के ज्ञान से, लगें लोग अल्पज्ञ।
भाव व्यक्त नहि कर सकें, लगे नही मर्मज्ञ।।

 

शाखा हिन्दी की महत्, व्यापक रूचिर महान।
हिन्दी भाषा जन दिखें, सबका सबल सुजान।।

 

हिन्दी संस्कृति रक्षिणी, जिसमे बहु विज्ञान।
जन-जन गण मन की बनी, सदियों से है प्राण।।

 

हिन्दी के प्रति राखिये, सदा ही मन में मोह।
त्यागे परभाषा सभी, मन से करें विछोह।।

 

निज भाषा निज धर्म पर, अर्पित मन का सार।
हर जन भाषा का करे, सम्यक सबल प्रसार।।

 

देश प्रेम अनुरक्ति का, हिन्दी सबल आधार।
हिन्दी तन मन में बसे, आओ करें प्रचार।।

 

हिन्दी हिन्दी सब जपैं, हिन्दी मय आकाश।
हिन्दी ही नाशक तिमिर, करती दिव्य प्रकाश।।

 

हिन्दी ने हमको दिया, स्वतंत्रता का दान।
हिन्दी साधक बन गये, अद्भुत दिव्य प्रकाश।।

 

नही मिटा सकता कोई, हिन्दी का साम्राज्य।
सुखी समृद्धिरत रहें, हिन्दी भाषी राज्य।।

 

हिन्दी में ही सब करें, नित प्रति अपने कर्म।
हिन्दी हिन्दुस्थान हित, जानेंगे यह मर्म।।

 

ज्ञान भले लें और भी, पर हिन्दी हो मूल।
हिन्दी से ही मिटेगी, दुविधाओं का शूल।।

 

हिन्दी में ही लिखी है, सुखद शुभद बहु नीति।
सत्य सिद्ध संकल्प की, होती है परतीति।।          

डॉ.महेन्द्र प्रताप पाण्डे ‘ नन्द ‘

 

 

 

         हिन्दी

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खुसरो के हृदय का उद्‌गार है हिन्दी ।
कबीर के दोहों का संसार है हिन्दी ।।

 

मीरा के मन की पीर बन गूँजती घर-घर ।
सूर के सागर – सा विस्तार है हिन्दी ।।

 

जन-जन के मानस में, बस गई जो गहरे तक ।
तुलसी के ‘मानस’ का विस्तार है हिन्दी ।।

 

दादू और रैदास ने गाया है झूमकर ।
छू गई है मन के सभी तार है हिन्दी ।।

 

‘सत्यार्थप्रकाश’ बन अँधेरा मिटा दिया ।
टंकारा के दयानन्द की टंकार है हिन्दी ।।

 

गाँधी की वाणी बन भारत जगा दिया ।
आज़ादी के गीतों की ललकार है हिन्दी ।।

 

‘कामायनी’ का ‘उर्वशी’ का रूप है इसमें ।
‘आँसू’ की करुण, सहज जलधार है हिन्दी ।।

 

प्रसाद ने हिमाद्रि से ऊँचा उठा दिया।
निराला की वीणा वादिनी झंकार है हिन्दी।।

 

पीड़ित की पीर घुलकर यह ‘गोदान’ बन गई ।
भारत का है गौरव, श्रृंगार है हिन्दी ।।

 

‘मधुशाला’ की मधुरता है इसमें घुली हुई ।
दिनकर के ‘द्वापर’ की हुंकार है हिन्दी ।।

 

भारत को समझना है तो जानिए इसको ।
दुनिया भर में पा रही विस्तार है हिन्दी ।।

 

सबके दिलों को जोड़ने का काम कर रही ।
देश का स्वाभिमान है, आधार है हिन्दी ।।

रामेश्वर कम्बोज हिमांशु

 

 

 

मां हिन्दी

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कितना और सहे माँ हिन्दी
कितना और सहे-
अपनों से ना कहे तो बोलो
किससे आज कहे-

कितना और सहे माँ हिन्दी…।।

 

धरती उसकी अम्बर उसका
उसके नदिया नाले
आंगन उसका-घर भी उसका
उसके चाबी ताले
लेकिन उसको जगह नहीं है
जाकर कहाँ रहे-
कितना और सहे माँ हिन्दी…।।

 

चला गया घर से परदेसी
छोड़ गया है भाषा
उसने सचमुच बना दिया है
हमको एक तमाशा
षडयंत्रों के महाज्वार में
क्यों कर देश बहे-
कितना और सहे माँ हिन्दी…।।

 

छीन रहे हैं माँ के मुँह से
बच्चे आज निवाला
लगता है दे देंगे हम ही
माँ को देश निकाला
अपमानों के दावानल में
कितना और दहे-
कितना और सहे माँ हिन्दी.
कितना और सहे।।

बालकवि बैरागी

 

 

 

  मेरी भाषा

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भाषाओं के ढेर मे
अपनी भाषा तलाशते
आधी उम्र बीती

 

अपनी भाषा देश में
अपनी भाषा परदेश में
अपनी भाषा दुनिया में

 

सब अपनी-अपनी भाषाएं
छांट कर ले गए
सब अपनी-अपनी भाषाएं बोलते हैं

 

राजसी ठाठ हैं
सभी भाषाओं के
मेरी भाषा कहां है

पूर्णिमा बर्मन

 

 

 

 

वह…

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वह राजघाट पर बैठे -बैठे रो रही थी
न जाने किसका पाप था कि ढो रही थी.
मैने पूछ-”माते, तुम कौन?” बहुत देर तक वो रही मौन
मगर जैसे ही उसने अपना मुँह खोला,
लगा दिल्ली का सिंहासन ही डोला.
उसने आँसू पोछते हुए कहा- ‘
‘तुम जैसे नालायको के कारण
खुद पर शर्मिंदा हूँ
पता नहीं क्यों ज़िंदा हूँ
तुम्हारी उपेक्षा के कारण ही तार-तार हूँ, चिंदी हूँ .
मुझे गौर से देख, मैं राष्ट्रभाषा हिंदी हूँ.
जिसे होना था महारानी, वो आज नौकरानी है.
मेरी आँखों में पानी-ही-पानी है .
दो फीसदी अँगरेज़ी के गुलाम
फ़िज़ाओं में जहर घोलते हैं
अपने अनपढ़ नौकर और कूकुर से भी
अँगरेज़ी में बोलते हैं .
ये लोग नित नए गुल खिलाते हैं
अपने जीवित माता-पिता को भी
”ममी और ”डेड’ कह कर बुलाते हैं
और लोग कहते हैं कि मैं भारत के माथे की बिंदी हूँ ?
अपने ही देश में उपेक्षित हूँ यानी कि हिंदी हूँ .

-गिरीष पंकज

 

 

 

 

हिंदी का सौन्दर्य !”

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ह्रदय के संयोजन की
भाषा हिंदी
जनमानस की आशा हिंदी
तन- मन में उमंग जगाती हिंदी
मिश्री मिठास सी भाषा हिंदी
ईद ,होली ,दशहरे पर प्रतिस्पर्धी नहीं
पूरक बन जाती प्यारी सी हिंदी
क्षेत्रीय भाषाओँ को
एक वट वृक्ष सी समेटती ,
हिन्दुओं की अभिलाषा हिंदी
हिंदी दिवस पर ना बांधें रस्मो में
कहती है इसकी अभिव्यक्ति
की हमारी परिभाषा हिंदी!
डॉ सरस्वती माथुर

      

 

 

मां बोली

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पहले अपनी बोली बोलो
फिर चाहे तुम कुछ भी बोलो
इंगलिश बोलो, रूसी बोलो
तुर्की बोलो, स्पैनिश बोलो
अरबी बोलो, चीनी बोलो
जर्मन बोलो, डैनिश बोलो
कुछ भी बोलो लेकिन पहले
अपनी मां की बोली बोलो

 

अपनी बोली मां की बोली
मीठी-मीठी, प्यारी-प्यारी
अपनी बोली मां की बोली
हर बोली से न्यारी-न्यारी
अपनी बोली मां की बोली
अपनी बोली से नफरत क्यों
अपनी बोली मां की बोली
दूजे की बोली में खत क्यों
अपनी बोली का सिक्का तुम
दुनिया वालों से मनवाओ
खुद भी मान करो तुम इसका
औरों से भी मान कराओ
मां बोली के बेटे हो तुम
बेटे का कर्तव्य निभाओ
अपनी बोली मां होती है
क्यों न सर पर इसे बिठाओ!

प्राण शर्मा

 

 

हिन्दी अपने घर की रानी

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हिन्दी नहीं किसी की दासी
हिन्दी अपने घर की रानी
हिन्दी है भारत की भाषा
हिन्दी है गंगा का पानी
हिन्दी अपने घर की रानी।।

 

1.

भारत में ही जन्मी हिन्दी
भारत में परवान चढ़ी
भारत इसका घर आंगन है
नहीं किसीसे कभी लड़ी
सबको गले लगाकर चलती
करती सबकी अगवानी
हिन्दी अपने घर की रानी।।

 

2.

खेतों खलिहानों की बोली
आंगन-आँगन की रंगोली
सत्यम्, शिवम्, सरलतम्, सुन्दर
पूजा की यह चन्दन रोली
जनम जनम जन-जन की भाषा
कण-कण की वाणी कल्याणी
हिन्दी  अपने घर की रानी।।

 

3.

भूख नहीं है इसे राज की
प्यास नहीं है इसे ताज की
करती आठों पहर तपस्या
रचना करती नव समाज की
याचक नहीं-नहीं है आश्रित दाता
सनातन अवढर दानी
हिन्दी अपने घर की रानी।।

बाल कवि वैरागी-

 

 

हिन्दी हम सबकी परिभाषा

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कोटि कोटि कंठों की भाषा
जन-गण की मुखरित अभिलाषा
हिन्दी है, पहचान हमारी,
हिन्दी हम सबकी परिभाषा।

 

आजादी के दीप्त भाल की,
बहुभाषी बसुधा विशाल की,
सहृदयता के एक सूत्र में,
यह परिभाषा देशकाल की।

 

निज भाषा जो स्वाभिमान को
आम आदमी की जुबान को
मानव-गरिमा के विहान को
अर्थ दे रही संविधान को।

 

हिन्दी आज चाहती हमसे
हम सब निश्छल अंतस्तल से,
सहज विनम्र अथक यत्नों से
मांगे न्याय आज से, कल से।

श्री लक्ष्मीमल सिंघवी

 

 

मातृ भाषाएँ

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अब हम पर अपना राज्य कायम करने के लिए
किसी सिकंदर को युद्ध करने की जरूरत नहीं
हमने खुद आगे बढ़कर,
घुटनों के बल आत्म-समर्पण कर दिया है
दुनिया के सबसे शक्तिशाली समाज के सामने
अपनी मातृभाषा को दफना दिया है,
बुजुर्ग पीढ़ी की बगल में
एक गहरी कब्र खोदकर।

 

अब हमारी दो दर्जन मातृ भाषाओं में
सिर्फ शालीन शिलालेख लिखे जाएंगे,
श्मशान घाटों पर।
अब हमारी मातृभाषाएँ,
नई पीढ़ी के पढ़े-लिखे लोग नहीं बोलेंगे
वे या तो, अनपढ़ों की भाषाएँ रहेगीं,
उनके पढ़े-लिखे होने तक
या रेगिस्तानी गरम हवाओं की तरह
प्रेत बनकर घूमेंगी
इतिहास की गलियों में
और देववाणी की तरह यदा-कदा
पूजी जाएँगी धार्मिक, सांस्कृतिक
और सरकारी समारोहों आयोजनों आदि में।

 

अब सोलह आने सही लगती है
जॉन स्टूअर्ट मिल की
उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यांतर की
वह अवधारणा
कि सांस्कृतिक रूप से हम भारतीय,
नहीं हैं लोकतंत्र के लायक़
लोकतंत्र के लायक़ होने के लिए
हमें उबरना ही होगा,
मैकाले की क्लर्क पैदा करने वाली
भ्रामक शिक्षा प्रणाली से
लोकतंत्र के लायक़ होने के लिए
हमें याद करना होगा,
आज़ाद होने के बाद दिया गया
गांधी का वह वक्तव्य
कि बता दो दुनिया को,
गांधी अँग्रेज़ी भूल गया है,
बता दो दुनिया को,
गांधी अब हिंदी या गुजराती में ही
बोलेगा…लिखेगा।

कैसी विडंबना है हमारे समय की
कोई बाहर से नहीं तोड़-फोड़ रहा
हमारी मातृभाषा का आत्म-सम्मान
हमने खुद ही घर से निकालकर ,
सर्वेंट-क्वाटर्स में बिठा दिया है
अपनी संस्कारी मातृभाषाओं को।

 

मुख्य घर में वर्जित है उनका प्रवेश
बड़े स्कूलों में उनके घुसने पर
कड़ा प्रतिबंध है हमें
नफ़रत है उनके चेहरों से,
उनके आसपास फटकने से भी
होने लगती है, बेचैनी हमें,
हम नहीं चाहते कि उनका साया भी पड़े
अंग्रेजी के क्रिसमस ट्री की छाँव में पलते,
हमारे नौनिहालों के दिलो-दिमाग पर।

आर. के. पालीवाल  

 

 

हिन्दी

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भाषा तुम मां हो, शिशु हैं जिज्ञासाएं,
तुम्हारे अस्वस्ति बोध से,
भूखी जिज्ञासाएं दम तोड़ती रहेंगी।
उंची होती रहेंगी इमारतें,
लंबी होती जाएंगी परछाइयां,
एक दिन सूरज की जड़ें काट देंगी।

 

सुतलियों में बंधी हिन्दी की अनपढ़ी किताबें
कार्यालय के किसी कोने में धूल खाती रहेंगी।
हम राजभाषा नीति की पोथियां छापते रहेंगे।
खोजते रहेंगे उपयुक्त पदों के लिए उचित अधिकारी।

कुरसियां भरी होंगी, पर पद रिक्त रहेंगे,
एक दिन निरस्त हो जाएंगे।
हम जो प्रवीण हैं, अंग्रेज़ी प्रमाण-पत्रों से
अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने में व्यस्त हो जाएंगे।
लोग शायद हम पर हंसेंगे, कि हम हिंदी में हंसते हैं।

मधुप मोहता

 

 

 

 हिंदी  अब  बलिदान  मांगती..

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हिंदी  अब  बलिदान  मांगती …
अपनी  खोई  शान  मांगती .
बहुत  हो  गया ,हिंदी – जननी –
अपनी  इक  पहचान  मांगती .
हिंदी  अब  बलिदान  मांगती .

 

अंगरेजी  की  जय -जय  कब  तक ?

 

हिंदी  वो  उद्यान  मांगती .
जहां  खिले  सारी  भाषाए ,
अपना  गौरव- गान  मांगती .
हिंदी  अब  बलिदान  मांगती .

अपना  यह सम्मान  मांगती .
मै हूँ जन-गन-मन की भाषा
हिंदी  अब  बलिदान  मांगती .
हिंदी  वही जहान मांगती
खून नहीं, हम प्यार बाँटते
हिंदी  अब  बलिदान  मांगती .

गिरीश पंकज

 

 

 

किस लिये रहने लगी हिन्दी बहुत बीमार-सी

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किस लिये रहने लगी हिन्दी बहुत बीमार-सी
डाक्टर ने दी विदेशी चीज़ ख़ुश्बूदार-सी

 

यह चली कैसी हवा पत्ते सभी के झ़ड़ गये
माँग पेड़ों ने न की थी आपसी संहार-सी

 

प्यार से जिसको रखा दिल ने बनाया धड़कनें
भागकर आई पराई लग रही वह नार-सी

 

सोचता है भक्त देवी पर चढ़ाऊँ किस तरह  फूल
देसी और माला प्यार के व्यापार-सी

 

खिड़कियाँ हैं बंद लेकिन साँस फिर भी चल रही
मिल रही उसको हवा बासी व बदबूदार-सी

 

सर्दियों में जाएँ कैसे धूप छत पर सेंकने
सीढ़ियाँ ख़ुद बन गईं किरचों भरी दीवार-सी

 

वह इमारत है पुरानी और सुनते हैं बड़ी
पर न जाने दिख रही है क्यों गिरी मीनार-सी

 

दूर भाषा के सभी संकट हुए इस ढंग से
पूँछ लम्बी की सभी ने अहम् के विस्तार-सी

 

माँ गँवारिन है हमारी बाप से बेटे कहें
मेम होती बोलती इंग्लिश फ़राटेदार-सी

 

बात इंग्लिश में करो ‘गौतम’ कि हिन्दी बच सके
अन्यथा हो जायेगी बेशर्म यह बाज़ार-सी

गौतम सचदेव

 

 

 

मैं,  हिन्दी !

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अच्छा नही लगता
जब अपने ही घर में
हाशिए पर रखकर मुझे
चिंतित होते हो तुम
मेरे भविष्य के बारे में
और विचार विमर्श करते  हो
मेरे उत्थान और पतन पर
जलती बुझती चिनगारियों सा
तुम्हारा यह उत्साह
मन के अँगार को
कुछ और हवा दे जाता है।

 

जैसे जीती आई हूँ
वैसे ही  जी लूँगी मैं आगे भी
आंसुओं की स्याही में डूबी
तो किलकारियों में अनुगुंजित
कहीं तुम्हारे आस पास ही
यादों की धरोहर बनी
अपने प्रेमियों के ह्रदय में, जिह्वा पर.
कलम से  प्रेरणा का अदम्य स्रोत-बनी
बहती ही रहूँगी गंगा-सीं

शरमाओ मत,भूलो मत,
मुझसे ही है
तुम्हारी यह संस्कृति
आचार संहिता वांगमय
सारा गौरवमय अतीत
मेरे सहारे है पहचान तुम्हारी
तुम्हारे सहारे जिन्दा मैं नहीं।…

शैल अग्रवाल

 

 

 

 

यदि हिंदी से है तुम्हे प्यार…

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यदि हिंदी से है तुम्हे प्यार,
तो ‘हैलो’ की जगह करो,
हाथ जोड़ नमस्कार।

 

भाषा भाषा एक है,
देखना एक भाषा के दबाव में
कोई कर न दे हिंदी का तिरस्कार।
यदि हिंदी से है तुम्हें प्यार…

 

जब हो सामना भारतीय से
करना आत्मीयता का प्रदर्शन हिंदी में,
छाए अधरों पर हिंदी में मुस्कान।
यदि हिंदी से है तुम्हें प्यार…

 

जाओ कोई दर्शनीय स्थल
सर्वभाषाओं के मध्य खोजना हिंदी का नाम,
ना हो तो अवश्य करना अधिकारियों से दरकार।
यदि हिंदी से है तुम्हें प्यार…

 

खरीदना हो कोई भारतीय साज-सामान
ढूंढना हिंदी में लेबल हिंदी में नाम,
क्रय करना उनका रखना दुकानदार के सामने अपने विचार।
यदि हिंदी से है तुम्हे प्यार…

 

जो हिंदी की रोटी खाते
हिंदी के प्रयोग से कतराते,
हिंदी फिल्मों में करोड़ों कमाते
हिंदी बोलने में शरमाते,
ऐसे लोगों के विरुद्ध करना हमको अभियान
यदि हिंदी से है तुम्हें प्यार…

 

एकाकी ना कोई मैदान जीतता,
परंतु बूंद-बूंद से घड़ा भरता
हम हिंदी भाषी बन जाएँ एक सागर,
कर लें वसुंधरा पर विस्तार।
यदि हिंदी से है तुम्हें प्यार…

रेणु राजवंशी गुप्ता

 

 

 

आओ लगाऍं अक्षत माथे पे उसके रोली

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पूरब से ले के पश्‍चिम
उत्‍तर से ले के दक्‍खिन 
हजार भले अलग हो,
मीठी है सबकी बोली।
आओ लगाऍं अक्षत माथे पे इसके रोली।।

 

वह बह रही सुबह की ठंडी हवा की मानिंद
होठों पे खेलती है बन करके वो ऋचाऍं
मिट्टी के व्‍याकरण से इसका करीबी रिश्‍ता
सुख-दुख में थपथपाती देती हुई दुआऍं

टूटे हुओं को जोड़े  रूठे हुओं को मोड़े
हर दिलअजीज़ भाषा हर दिलअजीज़ बोली।
आओ लगाऍं अक्षत माथे पे इसके रोली।।

 

इक वक्‍त था कि इसने की है मिसाल कायम
इसने सिखाया सबको मिल जुल के साथ रहना
शालीनता से सुनना शालीनता से गुनना
देखो किसी भी भाषा से वैर नहीं रखना है

बॉंधता खुलापन  इसका धुला धुला मन
सबको गले लगाती यह ईद हो कि होली।
आओ लगाएं अक्षत माथे पे उसके रोली।

 

जो संप्रदाय भाषा की राजनीति करते
सदभाव की मशालों को वे बुझा रहे हैं
वे देश की रगों में बारूद भर रहे हैं
अपने ही घर को अपने हाथो जला रहे हैं
उनका धरम न कुछ भी  उनका धरम है गोली
हिंदी को देखिए तो फिर भी कितनी भोली।
आओ लगाऍं अक्षत माथे पे उसके रोली।।

 

यह क्‍या विडंबना है कैसी नियति की माया
अंग्रेजियत की इस पर अब भी है प्रेत छाया
बंधक बनी हुई है अपने ही मुल्‍क में यह
बरसों की साधना में इसने है कुछ न पाया
अब तो ज़रा सँभलिये  मिल जुल के साथ चलिए
इस वक्‍त को बदलिये रखिए अहम की झोली।
आओ लगाऍं अक्षत माथे पे उसके रोली।।

 

इसका प्रशस्‍त पथ हो इसका निरभ्र नभ हो
सबके लिए खुला हो इसका उदार ऑंगन
हर शास्‍त्र के लिए हो इसके हृदय में निष्‍ठा
मन से वचन से कर्मो से यह नहीं विरत हो
होने न पाए छल-बल  टूटे नहीं मनोबल
यह किंवदन्‍तियों में घुट कर ही रह न जाए
चलने न पाए हिंदी के नाम पर ठिठोली।
आओ लगाऍं अक्षत माथे पर उसके रोली।।

ओम निश्‍चल

1 Comment on संकलनः हिन्दी हम सबकी परिभाषा

  1. हिंदी पर कितनी अच्छी-अच्छी और माननीय कविताएँ आपने संजोई हैं. इस गुलदस्ते में मेरी भावनाए भी सज गयी है, यह देख कर खुशी हुयी. आपकी ”लेखनी” यूं ही सबको संजो कर चलती रहे.

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