कहानी समकालीनः आम आदमीः शैल अग्रवाल

आम आदमी

सामने फैली, पीली, मटमैली गँगा शिवानी के मन सी ही उमड़ी आ रही थी– जल से लबालब फिर भी सोच और सँयम से जुड़ी — अपने ही कच्चे किनारों में रिसती-उफनती। उफान देखकर तो ऐसा लग रहा था मानो आस-पास का सबकुछ ही बहा ले जाएगी यह।  अभी-अभी जो शिवानी ने देखा, वह भी तो कुछ ऐसा ही था–आदमियों का उमड़ता रेला उससे चुपचाप किनारा काटकर निकला जा रहा था। बहाने को तो बहुत सारी दया-ममता— सबकुछ ही बहाया जा सकता था, बहुत कुछ किया जा सकता था पर कुछ नहीं हुआ।

वैसे भी यह हिन्दुस्तान है यहाँ अक्सर सब अपरिवर्तित ही तो रह जाता है। कुछ नहीं हिलता डुलता–जरूरत पर भी नहीं । दूसरों की जरूरत पर, विशेषत: एक गरीब की जरूरत पर, तो हरगिज ही नहीं। एक कुत्ते के इस तरह से मरने पर शायद कोई सह्रदय लाश को हटा भी देता पर एक गरीब आदमी की मौत तो रोज की बात है– खासकरके इस व्यस्त, बदनाम जी.टी. रोड पर। कई बार मुगलसराय से काशी जाती शिवानी भी इस ट्रैफिक-जाम में फँसी है पर यूँ बगल में पड़े मरते, घायल आदमी की तरफ से आँख चुराकर चुपचाप इँतजार करने का यह उसका पहला मौका था।

दुश्मन को भी न डाले भगवान कभी ऐसी परिस्थिति में। दम तोड़ते उस गरीब को लगता है अभी-अभी  ट्रक कुचलकर गई है। खून अभी भी बह रहा था और गिनी-चुनी साँसों का कोटा लगता है अभी कुछ और बाकी था पर खामख्वाह कौन हाथ लगाए इस झँझट में, वह भी सुबह-सुबह आठ बजे, जबकि हर आदमी व्यस्त होता है– जल्दी में रहता है। आखिर अपने-अपने काम पर भी तो पहुँचना है ? किसी को दुकान खोलनी है तो किसी को दफ्तर जाना है। किसी के इम्तहान हैं तो कोई सुबह चार बजे का निकला हुआ है। पूजा-पाठ, सैर-सपाटे के बाद अब तुरँत ही घर वापस पहुँचना है। मदद को कौन आए — आखिर किसके पास इतनी फुरसत है ? फिर पुलिस केस भी तो बन सकता है ? बैसे भी उस आदमी की अचेत मूर्छा तो अब उसे कराहने और चीखने-चिल्लाने, मदद माँगने, इन सब झँझटों से बहुत दूर ले जा चुकी थी। सहायता माँगना तो उसके लिए हमेशा से ही शायद कठिन और बेकार रहा था। फिर आज ही कोई उसके लिए आफत क्यों मोल ले, क्यों जान जोखम में डाले ? जो भी किया उसने तो हमेशा अकेले ही किया है–तड़प-तड़प-और पिस-पिसकर– फिर मौत ही क्यों एक अपवाद बने ?

सैकड़ों कारों, बसों, और ट्रकों की लाइन उस ट्रैफिक जाम में लगी हुई थी। हजारों लोग उस दम तोड़ते आदमी का नजारा उचक-उचककर अपनी सीट से देख रहे थे पर किसी को भी इतनी फुरसत नहीं थी कि उसके लिए, उसके आराम के लिए कुछ कर पाए–

अचानक एक दूधवाला उधर से गुजरता है और अपने काँधे का अँगोछा उतार कर उढ़ा देता है–शायद उसके दर्द ने उसे छू लिया है या फिर उसमें उसे अपना ही आने वाला कल दिख गया है। जरूर उसीके जैसा–उसीकी जात-बिरादरी का ही कोई रहा होगा—

शिवानी की आँखें भर आर्इं–इन गरीबों की भी क्या जिन्दगी है—समस्याओं से घुनी–कब पके फोड़े सी फूट पड़े–वे खुद भी नहीं जानते। पापा की नजरें चुराकर शिवानी ने आँखें पोंछ लीं– अब वह आखिर किस मुँह से कहे कि गाड़ी रोको पापा और इसकी मदद करो—-

बरसों पहले एकबार ऐसे ही रो-धोकर, जिद करके, नन्ही शिवानी ने गाड़ी रुकवाई थी और रात के अँधेरे में जेवरों से लदी भाभी, मा, पापा सब को मजबूर कर के, कार से उतारकर सड़क पर खड़ा कर दिया था– वह भी बेबस असहाय– एक अनजान गाँव के अनजाने नुक्कड़ पर। एक अच्छी-खासी मुसीबत खड़ी कर दी थी उसने उस दिन तो समूचे परिवार के लिए।

सामने एक जीप दुर्घटना की शिकार, पेड़ में धँसी खड़ी थी और अन्दर फँसे, दम तोड़ते नौजवान का शरीर बीच-बीच में झटके ले-लेकर मदद माँग रहा था। शायद कोई उम्मीद की डोर उसके जाते प्राणों को अभी तक हिलगाए हुई थी– बगल में बैठा साथी तो कबका  जा चुका था। जीप सड़क से फिसल कर पेड़ से जा टकराई थी और स्टीयरिंग-व्हील ड्राइवर के सीने से। अब तो शायद काट कर ही शव को अलग किया जा सकता था। पर यह दूसरा तो अभी साँसें ले रहा था। कँधे अभी भी हिल रहे थे और अभी भी जख्मों से खून बह-बहकर बाहर आ रहा था। देखकर पापा को भी दया आ गई। जल्दी-जल्दी उसके घाव पर अपनी नई लुँगी की पट्टी कसकर बाँध दी और मातादीन से कहा कि तुम इसे जीप में लिटाकर पास के अस्पताल में ले जाओ। हमलोग यहीं इन्तजार कररहे हैं। बस जाना और आना। वक्त बहुत ही नाजुक है।

और ‘जी बाबूजी’ कहकर उस अधमरे अजनबी को लेकर मातादीन चल पड़ा था बिना यह पूछे या जाने-समझे कि अगला अस्पताल कितनी दूर है, कौनसा रास्ता ठीक रहेगा और उसे कितना वक्त लगेगा ? इस सबसे भी ज्यादा कि अब आगे उसके साथ और क्या-क्या बीतेगी?

पता नहीं अगला शहर कितनी दूर था—उसे कितनी देर लगी, बस शिवानी को इतना ही याद है कि जब रात खूब हो गई तो पापा ने वहाँ और खड़ा रहना उचित नहीं समझा था। वह अभी सोच ही रहे थे कि कहाँ जाएँ, क्या करें कि सामने से एक गाँव वाला आता दिखाई दे गया था और पापा के पूछने पर “क्यों भैया यहाँ कहीं रात में ठहरने का इन्तजाम हो सकता है क्या ?”-वह वहीं हाथ जोड़कर खड़ा हो गया था–“नाहीं, बाबूजी, ई तौ बहुत छोटा सा गाँव है। हमार छुपड़िया है न– आपलोग दुखम्-सुखम् वहीं रतिया निकाल लें। ऐसन बेबखत जनानी और बचवा लोगन के सँग, इहाँ पे ठहरना भी तो उचित नाहीं।”

पापा को आदमी सच्चा और ईमानदार लगा फिर और कोई चारा भी तो नहीं था वैसे भी जोखम की सब चीजें तो पहले ही पहने हुए कपड़ों में इधर-उधर छुपा दी गर्इं थीं। मम्मी बार-बार न जाने किस-किसको कोसे जा रहीं थीं–

“पता नहीं किस कमबख्त का मुँह देखकर उठी थी आज सुबह मैं!”

वह रात सचमें बहुत ही लम्बी और डरावनी थी और वह घसियारा हम सबसे ज्यादा समझदार और दुनियादार—

“बाबूजी काहे को दूसरे की चिता पर रोने पहुँच गए आप भी। ऊ भला मानष तो जी चुका आपन जिन्दगी। इस गढ़ियल सड़कवा पर तो रस्ता बिच ही टें कर जाएगा–हस्पताल का पहुँचेगा ऊ– और आपके डराइबर साहब को दरोगा बाबू दफा तीन सौ दो में धर लेवेंगे। ई सब सालन की आपस में मिली-भगत जो होत है। ऊपर से नीचे तक सब आपन जेब भरन में ही लगे रहत हैं। भलाई का तो जमाना ही नाहीं, बाबूजी।”

मन का पूरा गुस्सा निकाल लेने के बाद वह खुद ही थम गया और शरमाकर बोला,

” पर अगर आप जैसे लोग न हों तो ई ससुरी धरती धरातल में न धँस जाए ? ”

लगता है उसने भी अपना कोई प्यारा, कोई निजी, ऐसी ही किसी दुर्घटना में खोया था। पापा ने सहानुभूति से उसके कँधों पर हाथ रख दिए–बातों से भुक्त-भोगी जो लग रहा था वह–पर उसकी बातों से सभी डर गए थे।

अगले दिन सुबह सात बजे तक, बारह घंटे बाद भी जब मातादीन न लौटा तो पापा को चिन्ता होने लगी। आसपास के दो-तीन कस्बों के सरकारी अस्पतालों में फोन करने के बाद भी निराशा ही हाथ लगी। लगता था केस काफी सीरियस था और सीरियस केस में कम डॉक्टर ही अपना हाथ डालते हैं। रेप्यूटेशन और प्राइवेट प्रैक्टिस दोनों का ही जो सवाल होता है।

पर अगले दो शहर सासाराम और पटना ही थे। पूछताछ करने पर पता चला कि हाँ इस नाम का एक आदमी एक मृत शव को लेकर आया जरूर था, रात में दो बजे पटना के अस्पताल में, पर अब वह पुलिस की हिरासत में बन्द है क्योंकि उसके ऊपर, उसी आदमी के खून का इल्जाम है।

“अजीब अँधेरगर्दी है– मदद करो तो यह सजा मिलती है–?” पापा का गुस्सा आपे से बाहर हो रहा था।

“तो क्या हम उस बीस-पच्चीस साल के नौजवान को वहीं सड़क पर मरता छोड़ देते–?” ” आप बाबू लोगों का भी दिमाग खराब रहता है– हर दम घूस खा-खाकर। अपने साहब को बुलाइये, आप।”

वह तो किस्मत की बात थी कि पटना के डी. आई. जी. तक पहुँच हो गई और दस हजार रुपए ले-देकर मामला सिलट गया। वैसे दस हजार रुपए कम रकम नहीं थी उस जमाने में– लोगों की बेटियों की शादियाँ हो जाती थीं इतने रुपयों में– मुफ्त की यह थुक्का-फजीहत अलग–परेशान पापा शिवानी की तरफ देखते हुए मन ही मन बड़बड़ाए जा रहे थे पर डरी शिवानी को देखते ही अगले पल ही आगे बढ़कर उन्होंने उसे गोदी में छुपा लिया।

“तुझपर नहीं नाराज हूँ बेटा, तूने तो अपनी तरफ से भला ही सोचा था।”

वह तो बस पापा का शिवानी के प्रति प्यार और वक्त की नाजुकता ही थी जिसने उन्हें शाँत रखा पर उसके बाद एक बात तो निश्चित हो गई थी कि अब सड़क पर पड़ी किसी लावारिश जिन्दा या मुर्दा लाश की मदद करने की कोई जरूरत नहीं। ज्यादा मन न माने या आत्मा कचोटे, तो बाद में क्रिया-करम के लिए पैसे भिजवा दो। गरीबों में बँटवा दो। मन्दिर जाकर भगवान से अपनी बेबसी के लिए माफी माँग लो।—बस, इससे ज्यादा और कुछ नहीं।

आज फिर पापा और शिवानी दोनों के ही मन में उथल-पुथल थी– कोई भी कुछ नहीं बोल पा रहा था। बोलते भी क्या ? डर जो रहे थे कि किसी नई मुसीबत में न फँस जाएँ ? वह तो बस जल्दी ही वहाँ से निकल भागना चाहते थे। दोनों ने ही आँखें बन्द कर लीं– उधर उस घायल की तरफ देखा तक नहीं।

अभी-अभी दस घँटे की यात्रा के बाद बदन थक कर चकनाचूर था और मारे गर्मी के बुरा हाल।.. अब तो बस घर जाकर ही आराम मिलेगा। पौन्टून ब्रिाज से ही गाड़ी निकाल लो, उन्होंने ड्राइवर को आदेश दिया। मनोहारी गँगा का दृश्य लुभावना था–थके मन को चैन मिला। उस पानी के विस्तार को छूकर आती ठँडी हवा के सुहाने छोकों से पल भर को तो ऐसा लगा, मानो मन तरोताजा हो गया।

पर अँदर की टीस अभी भी बार-बार ही उभर आ रही थी— पता नहीं कौन होगा वह– उसके घर वालों को जाने कब पता चले—जाने कितनी तकलीफ से गुजरना पड़े उस अभागे को– वगैरह-वगैरह ?

मा दरवाजे पर ही इन्तजार करती मिलीं, “इतनी देर कैसे कर दी बेटी? मैं तो कबसे इन्तजार कर रही थी। बुरे-बुरे खयाल मन में आ रहे थे। आखिर जब नहीं रहा गया तो दिनेश को भेजा मैने, ” जा देखकर आ। ” सोचा वैसे भी तुम्हें थोड़ी मदद ही मिल जाएगी बच्चों के साथ… सामान चढ़ाने-उतारने में।

नाती नातिनों को गोद में उठाए-लड़ियाते, मा पूछे जा रहीं थीं, ” मिला या नहीं ? आराम-आराम से गया होगा– कम नटखट नहीं  है, यह भी। कहीं रुककर, पान वगैरह खाने लगा होगा ? चलो तुम सब फ्रेश हो लो। कुछ खा पीकर आराम कर लो। परेशान हो गए होगे ?”

साल भर से बिछड़ी बेटी के लिए मा का हेज उमड़ा पड़ रहा था।

नहा धोकर निकली शिवानी और बच्चे अभी डोसे का पहला निवाला ही तोड़ पाए थे कि दूध वाले का बेटा गोपाल दौड़ा-दौड़ा आया–,

“बाबूजी, बाबूजी–” “बाबूजी कहाँ हैं?”

“इतना घोड़े पर सवार होकर क्यों आया है–क्या बात है? क्या काम है बाबूजी से ? अभी-अभी थककर सोए हैं। शाम को आना–“,

मा बीचमें ही उसकी बात काटकर बोल पड़ीं।

“नहीं माजी बहुत बुरी खबर है। अभी-अभी भोलू के ससुर का फोन आया था-वह अपना दिनेश है न—-”

“क्या हुआ दिनेश को?”, बाबूजी कमरे से हड़बड़ाकर तुरन्त बाहर आगए।

“कुछ नहीं बाबूजी।”

लड़का सकपका गया। क्या कहे, कैसे कहे वह इनसे—? वैसे भी बाबूजी दिल के मरीज हैं। फिर दिनेश तो बाबूजी का खास आदमी था। दिन-रात इनकी सेवा करता था। बाबूजी को रात में भी किसी चीज की जरूरत और तकलीफ न हो इसलिए वहीं उनके कमरे में उनके पास ही जमीन पर सोता था– बिल्कुल अपने रामभक्त हनुमान की तरह। और यह भी तो उसे बेटे जैसा ही मानते थे वरना कौन आजकल नौकरों को इतनी अच्छी तरह से रखता है। बस सूखी-सूखी तनख्वाह ले लो। …पर बताना तो पड़ेगा ही, देर-सबेर—-

और गोपाल ने हिम्मत करके खबर दे ही दी,

“असल में आज सुबह मुगलसराय में दिनेश का एक्सीडेंट हो गया बाबूजी। किसी को पँचनामे के लिए चलना पड़ेगा, अभी-तुरँत। ”

एक ह्रदय-विदारक घुटी चीख को अँदर ही रोकने के प्रयास में काँपते पापा वहीं जमीन पर गिरते-गिरते से बैठ गए। दर्द के मारे जानवरों की तरह कराहने और छटपटाने लगे। धीर-गँभीर पापा को इतना विचलित शिवानी ने पहले कभी नहीं देखा था। वह तो गीता के आदर्शों पर चलते थे– फिर यह आज क्या हो गया पापाको ? शिवानी ने लपककर पापा को सँभालने की कोशिश की।

मातादीन दौड़कर चौके से पानी ले आया,

” आखिर बेटे जैसा ही तो था–बेटे सी ही सेवा की है दिनेश ने इनकी। मोह तो हो ही जाता है बिटिया—बीस-पच्चीस साल का साथ है। मुश्किल से दस-बारह बरस का लड़कवा ही तो था जब आया था– तबही से तो इहाँ बाबूजी के पास, आपलोगों के साथ रह रहा है।”

पापा के चेहरे पर पानी की बूँदें छिड़कते हुए मातादीन शिवानी को बाबूजी की हालत का मर्म समझाने का प्रयास करने लगा, पर किंकर्तव्य-विमूढ़ सी शिवानी को तो कुछ समझ में ही नहीं आरहा था। बस चारो तरफ से आते शब्दों के पक्षी उसके कानों के आसपास चोंच मार-मार कर उसे लहुलुहान कर रहे थे।

अपनी ही समाधि में लीन शिवानी सोचे जारही थी-मा को कैसे बता पाएगी वह कि दिनेश उसे मिला था आज ही…अभी और-इसी सुबह।—उसी सड़क पर, वहीं उन्हीकी कार के पास— खून में लथपथ, आखिरी साँसें लेता हुआ। और उन लोगों ने मदद की तो दूर, उसकी तरफ मुड़कर भी नहीं देखा था। यूँ ही तड़प-तड़पकर मरता छोड़ आए थे उसे। जल्दी से झट अपने घर आ गए थे ,  क्योंकि किसी पराई झँझट में नहीं फँसना चाहते थे वह लोग। एक बार पहले भी ऐसे ही जल जो चुके थे वे—और जान-बूझकर बारबार जलना तो मूर्खों का ही काम है।

काश–एकबार—बस एकबार वह या पापा मुड़कर देख लेते,  शायद दिनेश बच जाता। कम से कम उसे कुछ आराम, कुछ राहत, कोई मदद या तसल्ली तो दे ही सकते थे वे।–कम से कम इस आग में तो न जलते । माना जीना मरना भगवान के हाथ में है, पर उन्हें भी तो कुछ न कुछ करना ही चाहिए था…

शिवानी की दुख और पश्चाताप से झुकी आँखों के आगे बीस साल पुराना एक दृश्य, चलचित्र सा घूम रहा था–कुछ हठीली आवाजें कान में गूँजे जा रही थीं। यही सुबह का सात आठ-बजे का समय और यही गर्मियों का उमस भरा मौसम। …हरिया काका की उँगली पकड़े एक आठ-नौ साल का लड़का, पट्टे का पैजामा और मारकीन की कमीज पहने शरमाया-शरमाया खड़ा है और बगीचे में अपने पैर के अँगूठे से क्यारी की मिट्टी कुरेदे जा रहा है।

“पापा, कौन है यह? “-लगभग उसी उम्र की, अधजगी शिवानी वहीं बिस्तर से, कौतूहल वश पूछे जा रही है।

“तेरा भैया है बेटी।” इसके पहले कि वह कुछ और पूछे, पापा जबाब देते हैं।

“अपने हरिया काका का बेटा है। जा इसे अन्दर ले जा– कुछ खिला-पिला दे। रात भर का भूखा-प्यासा है। अभी-अभी इस नासमझ ने अपनी मा को खोया है। और हाँ, मा से कहना- थोड़ा तेरे हिस्से का लाड़-दुलार इसे भी दें। इसका भी वैसे ही ध्यान रखें।”

वह दिन और आजका दिन, दिनेश घर का सदस्य ही तो था–पापा का अजन्मा बेटा। शिवानी का अपना बड़ा भाई। वह तो छोटे से ही रहता-सोता सब घर के अन्दर ही था। हरिया काका की कोठरी में तो उसका मन ही नहीं लगता था और उसकी यह आदत किसी को कभी खली भी तो नहीं थी– क्योंकि बदले में दिनभर सबका काम जो करता रहता था दिनेश। हरेक की जीभ पर बस एक दिनेश का ही नाम तो रहता था। हरिया काका को तो मानो उसने रिटायर ही कर दिया था। तेज और सच्चे स्वभाव के दिनेश को ज्यादा वक्त नहीं लगा था घर-बाहर का हर काम सीखने में। और अपनी निष्ठा और लगन से तो उसने सबका मन ही जीत लिया था। कितनी जल्दी अपना बन गया था वह, पर बदले में क्या मिला उसे?

और यही सच शिवानी को दँशने लगा—क्या उनके अँदर का आदमी हमेशा के लिए सो गया– अब कभी नहीं जगेगा वह ? क्या बस एक ही दुर्घटना में मर गया वह– या समाज और परिस्थितियों की आड़ ले वे (वह और पापा) और उनके जैसे जाने कितने, अनगिनित पढ़े-बेपढ़े, बेबकूफ स्वार्थ-वश उसे खुद ही मार आए ? कम-से-कम अस्पताल में एम्बुलेंस के लिए एक फोन तो कर ही सकती थी वह— इतना तो गैरों के लिए भी किया ही जा सकता है–इसमें तो कोई अहित नहीं, कोई खर्च नहीं- बस बहनें ऐसी ही होती हैं क्या-? और यह पापा—? पापा तो उसके बाबूजी थे—–हरिया काका से भी ज्यादा प्यार दिया था उसने इन्हें।

शिवानी रोते-बिलखते पापा का दर्द अच्छी तरह से महसूस कर पा रही थी, पर एक बात उसकी समझ में नहीं आ रही थी कि पापा इस तरह से बिलख क्यों रहे हैं ? वह क्या चीज थी जिसने उन्हें पूरी तरह से तोड़ दिया …दिनेश की अकाल-मृत्यु? उसके न रहने से, होनेवाली ढेरसारी असुविधाएँ?–या फिर खुद इनकी अपनी कायरता और निष्कर्मता? अनजाने में ही सही, निर्मम और ठँडी, -स्वार्थी निष्ठुरता ! क्यों वह आज अपने को साँत्वना नहीं दे पा रहे? क्यों गीता के श्लोकों से भी आज कुछ समझ नहीं पा रहे? क्यों पापा एक आम आदमी की तरह बस फूट-फूटकर रोए ही जा रहे हैं?
पर, एक आम-आदमी इससे ज्यादा और कर भी क्या सकता हैं?  …

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