मंथनः केन्द्र से परिधि तक -शैल अग्रवाल/लेखनी-सितंबर-अक्तूबर 16

0471-0610-1820-3558_TNरिश्तों के सुख और शान्ति से निर्वहन में नींव के पत्थर-सी प्रायः नारी केन्द्र में स्थापित या खड़ी है। मानव परिवार हो या प्रकृति, नारी की ही गाथा दिखती है, उसी के आंसू और मुस्कान, संघर्ष व सृजन की कहानी है चारोतरफ । ‘ या देवी सर्व भूतेषु सर्व रूपेण संस्थिता। ‘ यानी कि भगवती या नारी शक्ति जो कण -कण में व्याप्त और विभिन्न रूपों में हमारे चारो तरफ विद्यमान है …जगत जननी …लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती…हमारी पूज्यनीय …, पोषक, सहचरी , दुहिता, वैभवदायनिनी, ज्ञानदायिनी….और जरूरत पड़े तो विनाशिनी भी। सीता -जिसके लिए राम वन-वन भटके और द्रोपदी- जिसके एक उपहास से पूरा महाभारत मच गया….ऐसी ही तो है यह नारी शक्ति; समर्थ और बहु वर्णित। चारो तरफ चित्रित व अंकित, बहु अभिलाषित भी, फिर भी आज तक पूरे विश्व में सर्वाधिक तिरस्कृत , उपेक्षित और अपने फायदे के लिए इस्तेमाल की गई …चाहे हेलन औफ ट्रौय हो या क्लिओपाट्रा… अंग्रेजी में कहूँ तो सबसे ज्यादा ‘यूज्ड एन्ड एब्यूज्ड आज भी मानव समाज में नारी ही है

सिवाय मां के इसके हर रूप का समाज ने पूरा फायदा उठाया है। मां का ममतामय रूप तक आज इतना बदल गया है , विकृत और जटिल हो गया है कि मातृत्व की इस बदलती परिभाषा और जिम्मेदारी को खुद नारी को भी फिरसे समझने की जरूरत है। भटकते और मां के आंचल से छांवहीन आधुनिक बचपन की चिलक को समझने की जरूरत है। आगे बढ़ने की दौड़ में ठोकर नहीं, बचपन और अंतस दोनों को ही संभालने की जरूरत है, तभी शायद महत्वाकांक्षा की कड़ी धूप में तड़कता आज के समाज का शुष्क मरु कुछ नम हो पाएगा।

देखा जाए तो, नारी को सदा से ही पाला-पोसा, खरीदा और बेचा गया है। छला व सराहा गया है। वस्तु की तरह ही त्यागा और अपनाया गया है। मां, बहन, बेटी, हर रूप में हमारे साथ तो है नारी , वंदनीय भी है, पर जरूरत और सहूलियत अनुसार ही, छाया-सी अनदेखी और अनसुनी। वक्त-बेवक्त खंगालता, सवाल करता समाज आज भी, घर बाहर की दुहरी जिम्मेदारी जीती पिसती नारी से भी वही सब सवाल-जबाव करता वही अपेक्षाएं रखता है, जो सदियों से करता आया है। कोई लचीलापन नहीं। सहचरी तो है ही वह, साथ में पोषिता और दुहिता भी।…जिसे आज तक संरक्षण और आरक्षण में ही रखा गया, उसे ही प्रतिद्वंदी रूप में पाकर न सिर्फ पुरुष वर्ग भ्रमित है, .स्वयं नारी भी। युगों बाद अस्मिता के लिए संघर्ष करती, पहचान ढूंढती नारी की आज आंतरिक संरचना और बाह्यरूप दोनों ही बदल रहे हैं। जरूरतें और मिज़ाज बदल रहा हैं पर समाज का उसके प्रति रवैया नहीं। बदला भी है तो बहुत ही नगण्य। ममत्व और नारीत्व के जिस बोझ या अलंकरण से दबी सहर्ष वह मंदिर और घरों में सजी और स्थापित थी, आज नहीं है। उसने अलंकरण उतार फेंके हैं या उतारने को बेताब है और आश्चर्य नहीं कि नारी-सुलभ गुण जो उसके रेशे-रेशे में व्याप्त थे, आज इन गुणों में क्षरण नज़र आने लगा है। गुण जो कभी शक्ति और औजार थे। संतोष बस इतना है कि हमारा समाज देवी-भक्त समाज है और आज भी देवी के हर रूप की ही पूजा करता है…कर सकता है या करने का दम भरता है।
सीताः आदर्श भारतीय नारी चेतना की साकार प्रतिमा- जिसके जीवन में हर त्याग और निष्ठा के बाद भी दुःख और विछोह ही था…पति द्वारा सतीत्व की सफल परीक्षाओं की श्रंखला के बाद भी परित्याग ही था; याद करते ही एक असह्य अवसाद से मन भर उठता है। सीता ही क्यों, राधा हो या मीरा , अहिल्या हो या द्रोपदी, जीवन को पूरी लगन और ईमानदारी से जीती, कर्तव्य की हर कसौटी पर खरी उतरती नारी की नियति यही तो है; राम और कृष्ण के युग में ही नहीं, आज भी।

राम के दैवीय चरित्र के शिवत्व की बात तो छोड़ें, क्या मात्र सत्य के अनुचारी तक को असह्य दुख नहीं सहने पड़ते और नारी के लिए तो यह मार्ग दुगनी चुनौतियां, दुगने संघर्ष लेकर आता है। पल पल ही उसे न सिर्फ एक नटी जैसे संतुलन के साथ जीवन की कसी रस्सी पर चलना पड़ता है, अपने हर सुख दुख को भी छुपाती है वह, वजह बेवजह मान्यताओं और कसौटियों पर खरी उतरने के लिए परीक्षाएं देती है, देने को उत्सुक रहती है। अपने लिए नहीं प्रायः दूसरों के लिए ही जीने वाली यह नारी ( वजह प्यार या कर्तव्य कुछ भी हो) अपने आंसू और मुस्कानों तक को बचपन से ही पीने की अभ्यस्त हो जाती है । जानती है, भले ही हृदय माने या न माने पर परिवार और समाज के हित में यही है क्योंकि जीवन रथ का चालक कोई भी हो, धुरी तो वही है। अच्छी हो या बुरी , सुगढ़-अनगढ़, शिक्षित-अशिक्षित , नारी की ताकत आज भी किसी बृह्मास्त्र से कम नहीं । बारबार जाने क्यों नारी के संदर्भ में अग्नि का प्रतिमान ही मन में उठता है…सही रहे तो पुष्टि और पूर्ति करने वाली , गलत हाथों में पड़कर दाह दायिनी और सर्व विनाशनी। जीवन को हरा-भरा रखे या भस्मीभूतकरके दारुण निर्जन और बीहड़ में पहुंचाए , बड़ी हद तक उसी के हाथ में है।

सत्ता और अधिकार का ( पुरुष और नारी दोनों ही अब तो) भूखा व अंधा समाज न तो नारी की सहज स्वाभवगत् उष्मा और शक्ति को भली भांति समझ पाया है और ना ही उसके धैर्य और त्याग को। यही वजह है कि उसकी पूऱी क्षमता और शक्ति का लाभ और संतोष भी नहीं मिला है, ना तो पुरुष को और ना ही खुद नारी को ही। बारबार हाथ जलाकर, खून बहाकर भी नहीं। आरक्षण और संरक्षण के बीच ही अधिकांश नारियां आज भी अपनी जीवन लीला पूरी कर लेती हैं। भय और विष्तृणा इतनी अधिक है कि खुद नारी ही कोख में पलते नारी भ्रूण तक को नष्ट करने को कटिबद्ध है। दूसरों के लिए ही जीती, आज भी जीना सीख ही नहीं पाई है वह। नफे नुकसान के आधुनिक तराजू पर बैठी वह खुद अपने स्वभावजन्य गुण प्यार और ममता आदि से दूर जाती दिखती है। सचाई तो यह है कि नारी खुद नहीं जानती कि वह चाहती क्या है ? या तो मर्द की दुनिया में धान सी रुपकर ही खुश है, इस्तेमाल हो रही हैं, या फिर शोर-शराब में डूबी आइना तक देखने का वक्त नहीं निकाल पा रही। संतुलित और संतुष्ट जीवन का आज के उपभोक्तावादी समाज में नितांत अभाव-सा दिखता नजर आता है।

ऊपर से देखें तो बहुत खुश नजर आती है आज की ताकतवर अधिकार के गलियारों में घूमती आधुनिक नारी। परन्तु अंदर ही अदर कितने समझौते किए हैं उसने , कितने टूटे सपनों की किरच से लहूलुहान है वह; एक अलग ही मुद्दा और सवाल है। मनमाफिक सबकुछ तो किसी को भी नहीं मिलता, पर त्याग और प्रतिबंध आज भी, हर सफलता के बाद भी, नारी के हिस्से में ही अधिक आते जान पड़ते हैं। हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चालीस सर्वशक्तिशाली कंपनी संचालकों में अठ्ठारह नारियों को भी सम्मानित किया है। घरों और कंपनियों की ही नहीं, दुनिया के कई देशों की सफल बागडोर संभाल रखी है इन्होंने। शौर्य , बुद्धि और विवेक में नारी पुरुषों से कम नहीं, मौका मिले तो आगे ही दिखेंगी। इन सफलताओं पर नारी होने के नाते, गर्व है, परन्तु सफलता के रास्ते खोदती नारी को सावधान रहने की जरूरत है। सफलता का एकाकी रास्ता चुनती वह कहीं खाई तो नहीं खोद रही अपने लिए। चंद्रकांता जी के शब्दों में कहना चाहूंगी-

“आज के इस भूमंडलीकरण और वीडियो व इंटरनेट के दौर में, जब उपभोक्तावादी रुझानों ने स्वतंत्रता के नाम पर स्त्री को एक वस्तु ही बना डाला है, मुझे लगता है हमें नए सिरे से स्त्री-अस्मिता के प्रश्नों पर विचार करने की जरूरत है। स्त्रियों को आत्ममंथन की जरूरत है कि वह कैसी स्त्री बनना चाहती हैं? दूसरी ओर यह भी विचारणीय स्थिति है कि प्रगति कई सोपान पार करने के बाद भी हम एक अँधेरे युग में जी रहे हैं, जहाँ आज भी पारिवारिक शोषण, बलात्कार, दहेज-दहन और स्त्री-उत्पीड़न की घटनाएँ आए दिन होती रहती हैं।“

सहयोग और समर्पण में बुराई नहीं है और ना ही विद्रोह में । परिस्थिति अनुसार विवेकपूर्ण आचरण नारी हो या पुरुष दोनों को ही सुख शान्ति देगा और विद्रोह के नाम पर विद्रोह आज भी अराजकता और विनाश ही लेकर आएगा। कगार से फिसलकर जिन्होंने विद्रोह किया है उनका हश्र किसी से छुपा नहीं, क्योंकि किसी भी भाषा में इसे दुर्घटना या आत्महत्या….जीवन का अपव्यय ही कहा और माना जाएगा। और इन दोनों का ही जीवन से तालमेल नहीं।

आदि शक्ति और मातृ शक्ति के पुजारी इस भारत देश में पाषाण प्रतिमाओं की तो पूजा होगी परन्तु अधिकांश घरों में मां, बहन और बेटियों…पत्नियों की दशा..कम-से-कम उनकी मानसिक स्थिति तो सोचनीय ही है। और यदि रिश्ता नहीं, तब तो वह एक मांस के लोथड़े से ज्यादा कुछ भी नहीं। प्राप्ति और तृप्ति यही दो शब्द और यही दो लक्ष्य रह जाते हैं भूखे शिकारी भेड़िया आंखों में और नारी का यही भोग्या स्वरूप चमकाया और भुनाया भी जाता रहा है सदियों से. चाहे बिकने वाला सामान तेल साबुन हो या वह खुद। वजह शायद समाज के के साथ-साथ खुद नारी का अपना रवैया भी हो सकता है। उसकी भ्रमित, असुरक्षित, ढुलमुल सोच, जो सहज तुष्ट भी होती है और कुपित भी। उसे जानना और समझना होगा कि मात्र कोरी भावुकता जिन्दगी नहीं, ना ही अनियंत्रित आकांक्षा। इस मानसिकता से निकल कर ही वह समाज और परिवार में पुरुषों के बराबर के हक ले सकती है। वरना इक्के दुक्के अपवादों को छोड़कर ये आरक्षण और नारी-प्रगति की बातें आज ही नहीं भविष्य में भी उसका मज़ाक ही उड़ाती रहेंगी। व्यवस्थाएं ही परंपराओं की जननी हैं और व्यवस्थाएं सुविधा व जरूररत अनुसार होती हैं। सड़ी-गली टहनियां न काटो तो पेड़ तक फल -फूल देने लायक नहीं रह जाते। परंपरा और संस्कार जेवर की तरह हों तभी तक सुन्दर लगते या भाते हैं, वरना बेड़ियां बन जाते हैं। दुर्गा, सीता और मीरा की धाती लिए जिस नारी ने लक्ष्मीबाई और मदर टरेसा तक कई-कई प्रशंसनीय रूप धरे हैं, क्या वजह है कि यदि आंकड़ों को सही मानें तो आज भी सर्वाधिक उपेक्षित और तिरस्कृत हैं।
जब जब उसने धरती मांगी है , प्रायः उसे समाधि ही मिली है। आज जब वह आकाश मांग रही है क्या उसे वाकई में पंख मिल पाएंगे। कोई सोचेगा सहयोग देगा !गीत और कविताओं में , कला आदि में बहुत प्रशस्तिगान हो चुके , अपनी अस्मिता और गौरव की न सिर्फ तलाश है अब उसे, वह उसे स्थापित करना चाहती है। शब्द नहीं ठोस प्रमाण चाहती है वह। पर क्या नारी के देवीरूप की पूजा करने वाला समाज इतना उदार है , उसे यह अधिकार देने के लिए शिक्षित, संयमित और दत्तचित् है? एक-दूसरे को दोष देकर जिम्मेदारियों से झुटकारा पा लेना कितना आसान है हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं; पर जबाव हमारे अपने अंदर और आसपास ही तो हैं।